Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा ) - SexBaba
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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

hotaks

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अनहानी ( एक प्रेत गाथा )



वह एक बड़ी विचित्र रात थी।

आकाश के माथे पर चांद किसी दुल्हन के टीकें की तरह चमक रहा था। पूरे चांद की रात थी। रेत के समुद्र पर चांदनी किसी चादर की तरह बिछी हुई थी।

फिर भी यह एक भयावह रात थी।

ऐसी मनमोहक रात और ऐसी भयावह?

जब दिलों पर बहशत बरसती हो। अगले पल की खबर न हो कि क्या होने वाला है तो चांदनी क्या करेगी? चांद का यह आकर्षण, यह सौन्दर्य कौन देखेगा? बाहर के नजारे और बाहर का मौसम उसी वक्त ही अच्छा लगता है, जब आदमी के अन्दर का मौसम अच्छा हो। मन में उमंग हो, खुशी हो, सुकून हो।

दूर क्षितिज तक फैला रेगिस्तान..किसी मोटे कालीन की तरह जमीन पर बिछी रेत... धीरे-धीरे बहती ठण्डी हवा....और किसी सुन्दरी के चेहरे की तरह चमकता हुआ...खिला-खिला चांद। सब कुद ही ऐसा था कि मन

खिल-खिल जाए, लेकिन इस आकर्षक रात से आनन्दित होने वाला यहां कोई न था।

जो थे....उनकी आंखों में निर्ममता भरी हुई थी, या आंसू या फिर नींद।

किसी की आंख में आंसू थे तो कोई सो रहा था। जिसकी आंखें बन्द थी...उसकी किस्मत के जुगनू उसकी जिन्दगी में, अंधेरा फैलाने वाले थे।

उस मासूम का क्या दोष था? उस मासूम का कोई दोष हो भी कैसे सकता था? उसका तो अभी नाम तक नहीं रखा गया था। इस दुनिया में आये उसे हुआ ही कितना वक्त था।

एक दिन... बस, एक दिन।

और इस एक दिन ने उसे यह दिन दिखा दिया था कि उसका पालना ऊंट पर कसा जा रहा था। कुछी ही देर की बात थी कि उसक मासूम को इस पालने में डालकर ऊंट हो हांक दिया जाना था...इस अनन्त रेगिस्तान में।

यहां दो ऊंट थें

दूसरा ऊंट उस मजलूम के लिए था, जिसकी आंखें आंसुओं आंखें आंसुओं से भरी हुई थी। उस ममता की मारी का रोआ-रोआ चीख रहा था.... मगर होंठ भिंचे हुए थे। ऐसी वेआवाज चीख को कौन सुनता ? यहां तो चीखने वालों को कोई नहीं सुनात। दूसरे ऊंट पर काठी बांधी जा रही थी..... इस काठी पर इस आंसू भरी आंखों वाली मजलूम औरत को बैठाकर इस ऊंट को भी रेगिस्तान में हाक दिया जाना था।

यहां तीन घोड़े भी थे। दो घोड़ों की पीठ खाली थी। इनके सवार इन ऊंटो को तैयार करने में लगे हुए थे, जबकि एक घोड़े की पीठ पर घुड़सवार मौजूद था और इस घुड़सवार का अंदाज ही निराला था।

वह पचास-पचपन साल का एक तुन्दुरुस्त मजबूत बदल का शख्स था। उसका लिबास हुक्मरानों जैसा था, वह घोड़े की पीठ पर तनी कमर के साथ बैठा था। उसकी गोल-गोल आंखें किसी उल्लू की आंखों की तरह चमक रही थीं। वह अपने बायें हाथ से अपनी मूंछों को बल दे रहा था। वह एक नशे से मदमस्त शख्स था। उसे अपनी दौलत का नशा था। जैसे कोई विजेता था, जिसे अपनी ताकत का घमण्ड था।

ऐसे निर्गम लोग कब किसी की आंख देखते हैं। उन्हें अपनी ख्वाहिशों के सिवाय कुछ नजर नहीं आता। ख्वाहिशों भरी आंखों से कब किसके आंसू नजर आ सकते

यह जमींदार रोशन राय था। वह नाम का ही रोशन था, उसके अन्दर अन्धेरा-ही-अन्धेरा था। उसने अपनी मूंछ छू कर हाथ सीधा किया और कर्कश आवाज में दहाड़ा

"जल्दी करो!"

उसकी कर्कश आवाज सुनकर वे दोनों घुड़सवार, जो उसके वफादार थे.और तेजी से अपना काम निपटाने लगे। पालने को जल्दी-जल्दी ऊंट की पीठ पर बांध दिया गया और ऊंट की दुम में एक बड़ी घन्टी बांध दी गई।

दूसरा ऊंट भी तैयार था। उस पर काठी बांधी जा चुकी थी और एक बड़ी घन्टी दुम से लटकाई जा चुकी थी। अपना काम निपटा वे दोनों घुड़सवार रोशन राय के सामने आदर से आ खड़े हुए और सीने पर हाथ बांधकर, सिर नवां कर बारी-बारी बोले

"सरकार! मेरा ऊंट तैयार है।"

"मालिक ! मेरा ऊंट भी तैयार है।"

"जाओ, फिर रवाना हो जाओ.... ।” रोशन राय की कर्कश आवाज रात के सन्नाटै में गूंजी।

वे दोनों वापिस पलटे। सामने खड़ी हुई अबला, जो गम से निढाल थी और आने वाले वक्त की कल्पना से

ही जिसका दिल कांप रहा था। आंखों में आंसू थे। जिसकी दुनिया अन्धेरी थी। इस औरत के सीने से लगा, उसका जिगर का टुकड़ा, जो आने वाले वक्त से बेखबर मीठी-मीठी नींद के मजे ले रहा था उसे उस वफादार ने एक झटके से छीन लिया और उसे ऊंट की तरफ से चला।
 
ममता तड़प उठी। असहाय-अबला ने हाथ बढ़ाकर उस वफादार से अपना बच्चा लेना चाहा, लेकिन दूसरे गुलाम ने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे खींचते हए दूसरे ऊंट की तरफ ले चला।

और अब इस औतर के जल के तमाम बन्द टूट गये...वह विक्षिप्त अंदाज में चीख उठी। उसकी दुख में डूबी हुई आवाज रेगिस्तान में गूंज उठी। चांदनी में नहाये रेगिस्तान की दिल चीर गई।

"रोशन राय तूने मुझसे मेरा बच्चा छीना है। मुझे बरबार किया है। याद रखना, एक दिन तम भी बर्बाद हो जायेगा। तेरा बच्चा भी कोई तुझसे छीनकर ले जायेगा। यह मेरी बद्दुआ है....एक मां की बददुआ....."

उसके दुख भरे क्रन्दन के जवाब में रोशन राय का एक भयानक कहकहा गूंजा।

मां की गोद छिनते ही उस नन्हीं बच्ची की आंख खुल गई और खौफजदा होकर एक हृदय-विदारक चीख मारी ओर फिर विलख-बिलख कर रोने लगी। रोशन राय के वफादार ने उस मासूम के रोने की कोई परवाह नहीं की। उसने बच्ची को ऊंट पर कसे पालने में डाला और ऊंट की दुम पकड़कर उसे हिला दिया। ऊंट हड़बड़ज्ञकर उठ गया।

तब वह वफादार वापिस पलटा और तेजी से निकट खड़े अपने घोड़े पर सवार हुआ और ऊंट के निकट आकर आकर उसने अपने मुंह से एक अजीब-सी आवाज निकाली और उसकी दुम एक बार फिर जोर से हिलाई।

वह ऊंट एक दिशा में दिशा में तेजी से हिलौरे लेता भाग निकला।

बच्ची के रोने की आवाज...ऊंट की दुम में बंधी घन्टी की टन-टन..चांदनी रात और रेत का समुद्र । एक अजीब भयावह मंजर था।

वह औरत अपनी नन्ही-सी बच्ची से बिछुड़ने के इस हृदयग्राही नजारे की ताब न ला सकी। वह लड़खड़ाकर रेत पर गिर पड़ी, लेकिन वह नौकर जिसे उसे हाथ पकड़कर दूसरे ऊंट की तरफ ले जाना था... उसने औरत का हाथ न छोड़ा और उसे रेत पर घसीटता हुआ ऊंट की तरफ ले गया।

और फिर रोश्न राय के इस वफादार ने औरत को अपने हाथों पर उठाकर काठी में डाला... आवाज निकाली और ऊंट को खड़े होने का इशारा किया, फिर अपने घोड़े पर सवार होकर इस ऊंट को विपरीत दिशा में दौड़ा दिया।

अब रेगिस्तान की निस्तब्धता में दो घन्टियों की आवाजों गूंज रही थी और ये आवाजें भिन्न व विपरीत दिशाओं से आ रही थीं। फिर धीरे-धीरे ये आवाजें मन्द होती चली गईं। न वे ऊंट रहे और ना उसका पीछे दौड़ते हुए घुड़सवार... दोनों दिशाओं में धुन्ध रह गई।

वीरान रेगिस्तान में अब अकेला जमींदार रोशन राय रह गया था। चांद उसकी पीठ की तरफ था, इसलिए उसके चेहरे पर साया था... चेहरे पर स्याही मली नजर आ रही थी। ऊंटों व घुड़सवारों के नजरों से ओझल हो जाने के बावजूद वह कुछ देर वहां खड़ा रहा। आंखें फाड़-फाड़ कर बारी-बारी दोनों दिशाओं में देखता रहा। एक क्षण के लिए उसे अपनी इस संगदिली व निर्ममता पर मलाल हुआ। बस एक क्षण के लिए... फिर उसने अपने आपको सम्भाल लिया.... और अब उसके होठों पर एक क्रूर मुस्कान नाच रही थी।

उसने अपनी मूंछों को एक खास अंदाज से मरोड़ा और फिर घोड़े को ऐड देकर उसका मुंह मोड़ा और फिर देखते -ही-देखते उसका घोड़ा हवा से बातें करने लगा। पीछे उड़ी हुई रेत रह गई जो चांद के उज्जवल चमकते चेहरे को छुपाने की नाकाम कोशिश कर रही थी।

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रेत का समुद्र पार करके जमींदार रोशन राय खुश-खुश सा अपनी हवेली के दरवाजे पर पहुंचा।

फिर जैसे अचानक उसे कोई ख्याल आया हो। उसने फौरन अपने घोड़े का रुख फेरा व धीरे-धीरे हवेली की दीवार के साथ आगे बढ़ने लगा। हवेली के मालिक को वापिस पलटते देखकर हवेली के फाटक पर तैना दोनों निगरानी... घोड़े के पीछे दौड़ने लगे।

जमींदार रोशन राय, घोड़ा दौड़ाते हुए, दीवार के साथ-साथ चलता हवेली के पिछवाड़े पहुंच गा। यहां उसने घोड़े पर बैठे-बैठे ही, आदतन अपनी मूंछ को बल दिया व बड़े गर्वित अन्दाज में अपने पूर्वजों के जाती कब्रिस्तान की तरफ देखा। कब्रिस्तान का गेट खुला हुआ था। वह घोड़ा दौड़ता हुआ गेट में दाखिल हो गया।

उसने घोड़ा रोका और एक नजर कब्रिस्तान में चारों तरफ डाली। कब्रिस्तान में एक हौलनाक सन्नाटा व्याप्त था। इस कब्रिस्तान में पचास-साठ करें बनी हुई थीं

और एक विस्तृत क्षेत्र खाली पड़ा था।

उसे कुछ फासले पर एक पैट्रोमेक्स लैम्प की रोशनी नजर आई। वह घोड़े को धीरे-धीरे दौड़ते हुए उस जगह पहुंच गया।

यहां उसके तीन मुलाजिम मौजूद थे। वे रोशन राय को देखते ही आदर से खड़े हो गये, फिर उनमें से एक नौकर जो छोटे कद का व मोटा था, आगे आया और रोशन राय के सामने हाथ बांधकर और झुककर खड़ा हो गया।

__ "हां, रौली! क्या हुआ? काम ठीक से निपट गया?" रोशन राय ने पूछा। "जी, सरकार!" रौली ने अपने बायें तरफ देखते हुए जवाब दिया।

रोशन राय ने घोड़ से उतरने का कष्ट नहीं उठाया। उसने घोड़े को थोड़ा आगे बढ़या और 'काम का जायजा लिया।

उसके सामने दो ताजा करें बनी हुई थीं। एक कब्र छोटी थी और एक बड़ी।

कब्रों का जायजा लेकर उसने गर्दन हिलाई और फिर अपना घोड़ा मोड़कर धीरे-धीरे चलने लगा। रौली घोड़े के साथ-साथ चल रहा था।

"ठीक है रौली! अब तुम जाओऋ यहां एक बन्दे को छोड़ देना... वो जरा कब्रिस्तान का ख्याल रखेगा।" रोशन राय ने अपनी एक मूंछ को बल दिया।

"समझ गया सरकार..!" रौली बोला।

"बस तो फिर जा... आराम कर। मैं भी आराम करता हूं। आज तो कुछ लम्बी ही घुड़सवारी हो गई।"

"जी, सरकार!" रौली चलते-चलते रुक गया और फिर जब रोशन राय और उसके बीच फासला बढ़ गया तो वो नई बनी कब्रों की तरह पलट गया।

हवेजी के वे दोनों निगराना कब्रिस्तान के फाटक पर खड़े अभी हांफ रहे थे, जो हवेली से यहां तक रोशन राय के पीछे-पीछे दौड़ लगाते पहुंचे थे। उन्होंने अपने मालिक को लौटते हुए देखा तो सम्भलकर खड़े हो गये। रोशन राय ने उन पर एक नजर डालना भी जैसे जरूरी नहीं समझा था। वह कब्रिस्तान ने बाहर निकते ही अपने घोड़े को सरपट दौड़ाने लगा। वे दोनों फिर अपने मालिक के घोड़े के पीछे हो लिए। वे जब हवेली के फाटक तक पहुंचे....उस वक्त तक रोशन राय अपने बैडरूम में दाखित हो चुका था।

और फिर अभी उसने कपड़े बदले ही थे कि उसकी बीवी नफीसा बेगम कमरे में दाखिल हुई । उसने शंकित निगाहों से अपने पति को देखा व पूछा

"कहां चले गए थे...?"

"नफीसा को सम्भालना कोई आसान काम नहीं है। जाहं से भी आ रहा हूं, मैं कुछ करके ही आर रहा हूं। तुम्हारे बेटे की तरह नहीं हूं। मैंने अपने मां-बाप का नाम रोशन कर रखा है। एक वह हे कि रोशन राय के नाम को बट्टा लगाया हुआ है। बड़े लोगों के पूत....?" रोशन राय गुस्से में आ गया।

"पढ़ तो रहा है... और कैसे पढ़े..? एम.ए.कर रहा है मेरा बेटा । पढ़ाई के साथ उसने अगर अपना शौक पूरा करा लिया तो कौन-सा ऐसा जुर्म कर दिया। आखिरकार उसने पलटकर आना तो हवेली में ही है। तुम्हारे बाद अपनी जागीर सम्भालनी है.....।"

"बस....सम्भाल ली उसने जागी...." रोशन राय ने मुंह बनाया-"पूत के पांव पालने में नजर आ जाते हैं, नफीसा बेगम!"

"पूत के पांव पालने में नहीं... आठ नम्बर जूत में हैं। हां, जरा सम्भलकर रहना। तुम्हारे और उसके पांव में अब कोई फर्क नहीं रहा है। कहीं किसी दिन वह तुम्हारे जूतों में पांव न डाल दे।" नफीसा बेगम अथूपूर्ण लहजे में बोली...और फिर बेअख्तियार हंस दी। हंसी में जहर घुला हुआ था।

"मुझे धमकी दे रही हो..?" रोशन राय उसे घूरने लगा।

"धमकी नहीं दे रही..सच्चाई बता रही हूं..।" नफीसा सपाट हलजे में बोली।

___"तुम मुझे बिल्कुल नहीं जानती हो...।" रोशन राय ने भी घुड़की दी।

"मैं तुम्हें जानना भी नहीं चाहती, मेरे सरताज..1" नफीसा बेगम ने शुष्क व व्यंगपूर्ण स्वर में कहा और उन्हें घूरने लगी।
 
"मैं तुम्हें जानना भी नहीं चाहती, मेरे सरताज..1" नफीसा बेगम ने शुष्क व व्यंगपूर्ण स्वर में कहा और उन्हें घूरने लगी।

पत्नी का यह अन्दाजा, यह लहजा रोशन राय को बड़ा नागवार गुजरा था। इसके बावजूद उसने संयम से काम लिया और लापरवाही से बोला-"नफीसा बेगम! मैं अब सोना चाहता हूं।"

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"जरूर सोओ.....लेकिन क्या तुम्हें इतनी जल्दी नींद आ जाएगी? अभी तो रात जबान भी नहीं हुई...।" नफीसा बेगम ने मुस्कुराती नजरों से अपने शौहर की आंखों में झांका। रोशन राय खामोश रहा तो वही आगे बोली-"उसका फोन आया था।"

"किसका...?" रोशन राय बैइ पर बैठते हुए बोला।

"समीर का..| वह कल आ रहा है..।" नफीसा बेगम ने एक धमाकाखेज खबर बड़े इत्मीनान से सुनाई।

रोशन राय के चेहरे पर चिन्ता के भाव उपजे। वह कुछ क्षण अपनी बीबी को घूरमा रहा, फिर पूछा-"तुमने उसे कुछ बताया तो नहीं..?"

"मैं उसे क्या बतात....मेरे पास अपने बेटे को बताने के लिए है ही क्या...?" नफीसा बेगम के लहजे में व्यथा भर आई थी।

"नफीसा बेगम, तुम एक खुशनसीब औरत हो... | तुमने समीर को कुछ न बताकर अक्लमंदीह का सबूत दिया है। अपनी जिन्दगी लम्बी कर ली है..." रोशन राय ने सरसराते लहजे में कहा।

नफीसा बेगम ने अपने शौहर के चेहरे पर नजर डाली तो उसे उसके चेहरे पर जैसे कोई काला नाग फल फैलाए बैठा नजर आया। वह रोशन राय की संगदिली से अच्छी तरह वाकिफ थी। वह भली-भांति जानती थी कि मौत से खेलना और किसी की जिन्दगी की किताब बन्द कर देना उसके शौहर के लिए तीतर मारने के बराबर था। यह और बात थी कि वह अपने खौफ को अपने चेहरे से जाहिर नहीं होने देती थी...हालांकि हकीकतन वह अन्दर-ही-अन्दर उससे खौफजदा रहती थी।

नफीसा भी आखिर इसी खानदान की थी। वह रोशन राय के चाचा क बेटी थी और आठ भाइयों की इकलौती लाडली बहन थी। जब कभी भी उसके आठों भाई इकट्ठे होकर किसी समारोह में शामिल होने को इस हवेली में आते थे तो हवेली के दरो-दीवार कांपने लगते थे। उनके बीच बैठकर रोशन राय के लिए अपना रौब व दबदबा बनाये रखना मुश्किल हो जाता था।

नफीसा के नाम अच्छी-अच्छी खासी जायदाद भी थी। यानी कि वह हर तरह से मजबूत थी। पर अपनी इस सुदृढ़ सामाजिक व आर्थिक स्थिति के बावजूद वह रोशन राय की गोल-गोल उल्लुओं जैसी आंखों को देखकर अन्दर-ही-अन्दर कांप जाती थी। वह उसकी निर्मम आंखों में खून की झलक देखती। अपने भीतर के इस खौफ को दूर करने के लिए वह कभी-कभी बदजुबानी पर उतर आती।

इस वक्त भी जब रोशन राय ने ढके-छिपे शब्दों में उसकी जिन्दगी खत्म करने की धमकी दी तो वह खौफजदा हो गई। पर अपना खौफ दूर करने के लिए वह बड़ी जुर्दत से मुस्कुरा दी और फिर उसने एक ऐसी बात कह दी कि रोशन राय उस बात को सुनकर हक्का-बक्का रहा गया | खुद नफीसा बेगम भी अपनी इस जुर्रत पर आश्चर्यचकित रह गई थी।

उसने कहा था-"रोशन राय साहब! क्या आपको याद है कि मैंने एक बार आपके मुंह पर थप्पड़ मारा था ...?"
 
__ और रोशन राय को एकाएक यही महसूस हुआ जैसे उसकी बीवी ने उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया हो। उसका चेहरा जैसे शोलों में घिर गया। उसने अपने मोटे होंठ सख्ती से भींच लिए। उसकी गोली आंखें और अधिक फैल गई... उनमें कहर नजर आने लगा। लेकिन उसकी वह अवस्था बस, कुद ही क्षण रही। वह जानता था कि अगर उसने जवाब में गुस्सा दिखाया तो बना-बनाया खेल बिगड़ जाएगा। कल उसका बेटा समीर राय आ रहा था और अगर नफीसा ने समीर को वह सब बता दिया...जो वह जानती है तो समीर ज्वालामुखी बन जाएगा, फिर इस तूफान से बचना किसी तरह भी मुमकिन न होगा।

रोशन राय ने नफीसा बेगम के ये जहरीले शब्द सुनकर एक कहकहा लगाया...फिर नर्म लहजे में बोला

"बाबा, उसे थप्पड़ ने ही तो हमें तुम्हारा दीवाना बना दिया था। बड़े होकर आखिर हम तुमसे शादी करेन पर मजबूर हो गये, फिर तुम हमसे दो साल बड़ी भी तो हो...अगर बचपन में हमारी किसी शरारत पर तुमने थप्पड़ मार लिया तो क्या हुआ...बड़े बच्चों को सजा देते ही हैं।"

"राय साहब..आपका भी जवाब नहीं। कोई बातें बनाना तो आपसे सीखे। अच्छा मैं चलती हूं | आप आराम फरमाइये..." और वह कमरे से बाहर निकल गई।

रोशन राय उस दरवाजे को घूमता रहा गया...जहां से नफीसा बेगम अभी बाहर गई थी।

वह कुछ देर तक अपनी गोल-गोल आंखों से दरवाजे को घूरता रहा, फिर तकिये सीधे किए और बिस्तर के हवाले हो गया। उसने अपनी आंखों बन्द कर लीं।

आंखें बन्छी की तो नवजात बच्ची के रोने की आवाजें उसके कानों से टकराने लगीं। रेगिस्तान का वह घटना-चक्र, वह मंजर उसकी आंखों के सामने घूमने लगा। उस औरत की बददुआ उसका दिल चीरने लगी। रोशन राय ने घबराकर अपनी आंखें खोल दीं।

बैडरूम का दरवाजा खुला हुआ था। उसने उठकर दरवाजा बन्द किया। लाईट जल रही थी.... वह उसने बन्द नहीं की। वह अब अन्धेरे में नहीं सो सकता था । एक जमाना था कि हल्की सी रोशनी भी उसे चैन की नींद न सोने देती थी। उसके बैडरूम के दरवाजे और खिड़कियों पर भारी परदे पड़े हुए थे। इन परदों को जब फैला दिया जाता तो उसका बैडरूम किसी फोटोग्राफर के 'डार्क-रूम में बदल जाता था। नफीसा बेगम को ऐसे अन्धेरे से वहशत होती थी। शुरू के कुछ दिन तो वह रोशन राय के सा सोई..फिर उसने मजबूर होकर अपने अलग बैडरूम में सोना शुरू कर दिया था।

पर, अब जबकि रोशन राय को भी अन्धेरे में नींद न आती और वह कमरे की लाईट जलाकर सोता था, तो भी नफीसा बेगम ने अपना अंदाज न बदला था। ऐस तेज रोशनी में भी उसका सोना सम्भव नहीं था। वह आरम्भ ही से हरे रंग के जीरो वाट के बल्ब की रोशनी में सोने की आदी थी।

रोशन राय को जहां दूसरे शौक थे-वहीं शिकार खेलने का भी शौक था और इस शौक ने ही उसकी जिन्दगी नर्क बना दी थी। एक बार तीतर का शिकार खेलते हुए उसके रास्ते में एक काला नाग आ खड़ा हुआ था।

रोशन राय का...और कोई रास्ता रोके, यह बात उसे किसी तौर पसन्द नहीं थी। वह अपने रास्ते में आने वाले को बड़ी बेदर्दी से कुचलने का आदी था....उस नाग को वह भला क्या खातिर में लाता। उसने कन्धे से बन्दूक उतारकर उस नाग का निशाना लिया... जो उसके रास्ते में फन का निशाना बांधकर गोली चला दी। एक जोरदान धमाका हुआ और सांप के फन के परखच्चे उड़ गये।

रोशन राय टुकड़ों में बंट चुके उस सांप की विजयी भाव से देखता हुआ आगे बढ़ गया।

यहां से ही उसकी मुश्किलें आरम्भ हुई थीं..जिसके कारण से रोशन राय लाईट जलाकर सोने पर मजबूर हुआ।
 
यह उसी रात की बात है कि.रोशन राय जब शिकार खेलकर हवेली लौटा और रात को अपने बैडरूम में सोया तो उसने एक बड़ा डारवना सपना देखा। यह ख्वाब इतना गहरा और साफ था कि उसे लगा कि वास्तव में ही यह सब हो गया है।

उसकी आंख खुल गई और उसने घबराकर साइड-लैम्प रोशन किय और सामने लगे आइने में घबराकर ही अपनी आंख पर नजर डाली। उसने खुदा का शुक्र किया कि उसकी आंखें सही-सलामत थीं।

उसने ख्वाब में देखा था कि वह अपने बिस्तर पर आंखें बन्द किये लेटा है...अचानक सांप की फुफकार सुनाई देती है। वह आंखें खोलता है तो अपनी आंखों के सामने काले नाग को पाता है। आंखें खोलते ही नाग उसकी सीधी आंख पर फन मारता है उसकी आंख लहूलुहान हो जाती है। आंख में तीव्र दर्द उठता है और अचानक उसकी नींद टूट जाती है।

हवास बहाल होने पर ही यह हकीकत सामने आती है कि यह महज, एक ख्वाब था ...तो उसकी जान में जान आई थी, लेकिन इस ख्वाब की दहशत जाने क्यों उसके विवेक व उसके हवासों पर छाकर रह गई।

फिर एक रात रोशन राय ने अपने बैठ के चारों तरफ बेशुमार सांप देखे...इतने कि अगर वह पांव कालीन पर राता तो वह किसी सांप पर ही पड़ता। यह ख्वाब देखने के बाद उसने कई गिलास ठण्डा पानी पिया, तब कहीं जाकर हवास ठिकाने आये। और फिर इन ख्वाबों ने दृष्टि-भम्र व आवाजों का रूप लेना शुरू किया।

वह बैठा अखबार पढ़ रहा होता कि अचानक उसे किसी सांप के फुफकारने की आवाज सुनाई देती और उसे यूं महसूस होता जैसे उसके निकट से कोई सांप तेजी से सरसराता हुआ गुजर गया हो। इसके बाद इन ख्वाबों व दृष्टि-भम्र ने हकीकत का रूप धार लिया।

एक रात जब वह राते गये अपने बैडरूम में में आया तो उसने एक काले नाग को तकिये पर कुण्डली मारे बैठे देखा। वह फन फैलायें झूम रहा था। रोशन राय को देखते ही वह तेजी से फिसल कर बैड के नीचे चला गया।

उस रात उसने पहरा देने वाले अपने आदमियों को बुलाकर कमरे का चप्पा-चप्पा छनवा मारा.... लेकिन सांप कहीं दिखाई नहीं दिया। यह भी निश्चित था कि सांप कमरे से नहीं निकला था... क्योंकि अपेन नौकरों के आने तक रोशन राय स्वयं दरवाजे पर मौजूद रहा था। बैडरूम में ऐसा कोई सुराख न था, जिसमें घुसकर सांप गायक हो जाता।

अब रोशन राय अन्धेरे में सोते हुए डरने लगा था। शुरू-शुरू में उसे रोशनी में नींद आती थी। धीरे-धीरे वह रोशनी का आदी हो गया। अब वह रोशनी में बिना किसी परेशानी के सो जाता था।

आज की रात एक बार फिर उस पर भारी थी। वह करवटें बदल रहा था.... लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थीं।

बच्ची के बिलख-बिलख कर रोने की आवाज कभी दूर से आती और कभी यूं महसूस होता जैसे वह बच्ची उसके तकिये के साथ ही लेटी हो । रोशन राय को सिर उठाकर तकिये के किनारे पर देखना पड़ता। कभी उसे औरत की दुा भरी फरियाद सुनाई देती। उसे यूं महसूस होता जैसे श्राप देती वह औरत उसके बैइ के सामने खड़े हो। वह आंखें खोलने पर मजबूर हो जाता...लेकिन सामने कुछ न होता।

रोशन राय के लिए एक और बड़ी मुसीबत भी तो थी। उसका अपना बेटा समीर राय! उसके ख्यालों में अपने बेटे समीर का चेहरा उभरा....गुस्से में लाल-भभूका....आंखों से आग बरसती हुई। वह रोषपूर्ण आवाज के साथ पूछता

"बाबा....! यह आपने क्या किया? मुझे यह किस जुर्म की सजा दी आपने...?

यूं रोशन राय की यह बात आंखों में कटी। ऐसा होना भी चाहिये था, जो दूसरों को दुख देते हैं...जो दूसरों की जिन्दगी जहन्नुम बनाते हैं.... वे भला किस तरह सुकून की नींद सो सकते हैं?
 
सुबह नमाज के वक्त उसकी आंख मुश्किल से ही खुली। अभी वह कुछ ही देर सो पाया होगा कि अचानक उसे अहसास हुआ, जैसे वह किसी गहरे अन्धेरे में है। कब्र में लेआ हुआ है। इतना घोर अन्धेरा था कि आंखें खोलते हुए भी खौफ महसूस हो रहा था।

उस याद आया कि वह तो कमरे की लाईट जलाकर सोया था। यह करे की लाईट कैसे बुझ गई? कमरे में कोई दाखिल नहीं हो सकता था, क्योंकि वह दरवाजे बन्द करके सोया था फहवाल संयत हुए तो उसे ख्याल आया कि कहीं लाईट न चली गई हो?

हो...लाईट जा सकती थी..लेकिन इससे क्या फर्क पड़ना था? हवेली में शक्तिशाली जनरेटर भी तो था.. जो लाईट जाते ही चालू हो जाता था। उसने गौर से सुना....जनरेटर चलने की आवाज नहीं आ रही थी। इसका मतलब था लाईट गई नहीं थी।

फिर कमरे में यह अन्धेरा क्यों है?

वह अंधेरे में टटोलते हुए स्विच बोर्ड की तरफ बढ़ा....फिर ख्याल आया कि परदा हटाकर क्यों न देख ले। हवेली की राहदारी में पूरी रात रोशनी रहती थी। उसने अभी परदा सरकाने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि कमरे में एकदम उजाला फैल गया।

कमरा प्रकाशमान होते ही उसने एक जोरदार फुफकार की आवाज सुनी और उसने एक सांप को परदे के पीछे जाते देखा। उसने परदा छोड़कर तकिये के नीचे से रिवाल्वर निकाल लिया और तेजी से परदा समेटा, लेकिन उसे सांप कहीं नजर नहीं आया। उसने पूरा परदा अच्छी तरह देख लिया। सांप परदे के पीछे गया था...यह बात यकीन थी। अब सांप परेद के पीछे नहीं था...य हबात भी निश्चित थी। इतनी देर में वह कहां गायब हो गया.....यह कोई नहीं बता सकता था।

रोशन राय ने सतर्कतावश, रात के पहरेदारों को बुलाकर कमेरे का अच्छी तरह जायला ले लिया, लेकिन सांप नहीं दिखा।

सुबह हो चुकी थी...लेकिन आंखों में नींद भरी हुई थी। उसने नौकरों को हिदायत दी कि उसके दरवाजे पर तब तक दस्तक न दी जाए....जब तक वह खुद दरवाजा ने खोल दे...वह सो गया।

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नफीसा बेगम सुबह ही उठ जाने की आदी थी।

वह सुबह उठते ही अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गई। इस बीच उसने कई बार अपनी खास नौकरानी लोंगसरी से रोशन राय के बारे में मालूम किया। वह हर बार यही खबर लाई कि 'मालिक अभी नहीं उठे।

जब नाश्ते का भी वक्त गुजर गया और दोपहर के खाने का वक्त सिर पर आ पहुंचा तो नफीसा बेगम ने एक बार फिर लोंगसरी को रोशन राय के बार में मालूम करेन के लिए भेजा।

वह फिर वही खबर लाई-"बीवी! मालिक अभी नहीं उठे। वो कहकर सोये हैं कि जब तक वो खुद दरवाजा न खोलें....दस्तक न दी जाए....."

नफीसा सोच में पड़ गई। वैसे तो यह कोई नई बात नहीं थी। रोशन राय प्रायः देर तक सोता रहता था, लेकिन बारह, साढ़े बारह बजे तक जरूर उठ जाता था। अब तो दो बज रहे थे। इतनी देर तक वह कभी नहीं सोया था। नफीसा बेगम चिन्ति थी। वह चिन्तित जरूर थी, लेकिन उसमें इतनी साहस नहीं था कि वह किसी नौकर-चाकर से उसके दरवाजे पर दस्तक दिवा दे। वह अपनी परेशानी दूर करने के लिए लोंगेसरी से इधर-उधर की बाते करने लगी।

अभी वे बातें कर ही रही थीं कि एक नौकरानी भागती हुई कमरे में आई, नफीसा बेगम न उसके चेहरे की तरफ देखा-नौकरानी के चेहरे पर खुशी थी। वह कोई खुशखबरी लाई थी। नफीसा बेगम ने सुकून का सांस लिया। पूछा-"क्या हुआ?"

"मालकिन, छोटे मालिक आ गये हैं।"

"अच्छा....!" नफीसा के चेहरे पर भी जैसे फूलों की बारिश होने लगी। वह जल्दी से उठ खड़ी हुई। लोंगसरी ने फौरन उसे जूतियां पहनाई।

तभी जाने क्या सोचकर नफीसा बेगम की खुशी हवा हो गई। वह एकाएक ही उदास और संजीदा नजर आने लगी। वह धीरे-धीरे आगे बढ़ी। अभी यह दरवाजे की तरफ बढ़ी ही थी कि उसे अपने बेटे समीर की आवाज सुनाई दी

"मेरी मां...तुम कहां हो?"

"मैं यहां हूं बेटे...मेरे समीर... | उसने ठिठकते हुए आवाज दी।

समीर कमरे में दाखिल होते ही बेआख्तियार अपनी मां से लिपट गया-"कैसी हो तुम, मां?"

नफीसा बेगम कुछ न बोली। उसने बोलने की कोशिश की तो उसका गला रुंध गया। बदन में कंपकंपी-सी उठी। अपनी मां को कांपते देखकर समीर राय ने उसे स्वयं से जुदा किया और जरा पीछे, होकर अपनी मांक का चेहरा देखा। उसका चेहरा धुआं हो रहा था। यूं महसूस हो रहा था जैसे वह अपनी भावनाओं पर कन्ट्रोल करेन की कोशिश कर रही हो....लेकिन जज्बात बेकाबू होते जा रहे हो।

___"मां, क्या हुआ? खैरित तो है?" समीर ने उसकी आंखों में देखते हुए पूछा।

___ "कुछ नहीं, बेटा! सब खैरियत ही है। उन्होंने समीर को अपने करीब कर लिया। वह उससे अपनी आंखें चुराना चाहती थी। उनकी आंखें भर आई थीं।

___ "मां....बाबा तो ठीक हैं..?" समीर ने घबराकर ही पूछा था।

"हां, बेटा! वह बिल्कुल ठीक हैं.....।"

"फिर क्या गड़बड़ है.....मां, कुछ हुआ जरूर है....क्या हुआ है, मां...?"

"कुछ नहीं हुआ, समीर! बैठो। तुम एक लम्बा सफर करके आये हो।"

नफीसा बेगम ने उसे अपने बैड पर ही प्यार से बैठा लिया और फिर उसके करीब बैठते हुए पूछा-"तुझे भख लगी होगी। खाना लगवाऊं...?"

"हां मां....। भूख तो लगी है, लेकिन पहले जरा फेश होकर नहा धो लूं। फिर खाऊंगा खाना....।"

"लोंगसरी...!" नफीसा ने नौकरानी से कहा-"जा,साहब के कपड़े निकाल...और जरा बाथरूम में देख लेना। देख....जरा भी गन्दा न हो।"

___ "बीवी, आप फिक्र न करें, मैं देख लेती हूं...।" कहते हुए लोंगसरी कमरे से निकल गई।

"हां, मां । यह तो बताएं, नमीरा का क्या हाल है?" समीर ने अपनी बीवी के बारे में पूछा-"मैं उधर नहीं गया, सीधा आपके पास ही आया हूं। पहले मां, फिर बीवी।"

यह सुनते ही नफीसा बेगम के मुंह से एकद सिसकारी निकल गई। लाख जब्त किया...लेकिन बेअख्तियार ही सिसक उठी थी वह।
 
समीर चौंका-"मां, तुम मुझसे क्या छिपा रही हो...बोलिये ना...नमीरा ठीक तो है.?"

"नहीं, समरा। वह ठीक नहीं है। वह....वह एक बच्ची को जन्म देकर चल बसी.....।" नफीसा बेगम ने दिल पर पत्थर रखकर खबर सुनाई।

"क्या...! मेरी नमीरा चल बसी....।" समीर तड़प उठा। उसके चेहरे पर जर्दी फैल गई-"और...और मेरी बच्ची...?"

"वह भी न रही....।" नफीसा बेगम ने एक गहरी सांस ली।

"उसे क्या हुआ.?" समीर ने तड़पकर पूछा।

"नमीर की मौत के बाद वह घण्टा भर भी जिन्दा न रही। वह भी चल बसी....."

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"मां.. | यह इतनी बड़ी बात हो गई। यह सब हो गया और आपने मुझे इत्तला भी नहीं दी..? समीर ने भर्राये स्वर में पूछा था।

"बेटा! मैंने चाहा था कि तुम्हें इत्तला दे दूं, लेकिन तुम्हारे बाप ने मुझे रोक दिया।" नफीसा ने बताया।

"क्यो...?" समीर की आंखें फैल गई।

"मैं नहीं जानती । शायद इसी में तुम्हारी कोई बेहतरी होगी। बेटे, तुम गम न करो। सब्र से काम लो....तू

तो मेरा बहादुर बेटा है....।" सह उसे तो सब्र का पाठ पढ़ा रही थी, लेकिन खुद उसका यह हाल था कि आंखों से मोटे-मोटे आंसू बह निकले थे।

"मां....मेरी बीवी मर गई....मेरी बच्ची मर गई और आप...आप कहती हैं कि सब्र पर...मैं कैसे सब्र करूं.?" समीर तड़प-तड़प गया।

नफीसा बेगम ने खुद को सम्भाला, बोली-"अरे छोड़....बेटी ही तो थी.....बेटी का क्या गम..? चल बसी तो अच्छा हुआ। तुझे तो अपनी जागीर के लिए बारिस चाहिए और रही नमीरा की बात तो वह कौन-सी हमारे खानदान से थी। खानदार में कई लड़कियां तेरे नाम की बैठी हैं.... जिस पर उंगली रखेगा उस ही ले आऊंगी....।"

"मां.....यह आप कह रही हैं...?" समीर ने अविश्वासव व हैरत से मां को देखते हुए कहा-"आप पर कब से बाबा का साया पड़ गया है..?"

"देख बेटा, बात.....।" नफीसा बेगम अपनी बात पूरी नहीं कर पाई थी कि लोंगसरी कमरे में दाखिल हुई।

"बीवी....मालिक इधर आ रहे हैं......।" यह सूचना दे लोंगसरी उल्टे कदमों वापिस चली गई।

"ओह...हमारा बेटा आया है....।" लोंगसरी के निकलते ही रोशन राय कमरे में दाखिल हुआ।

उसने आगे बढ़कर समीर को गले से लगाया। समीर खामोशी से उनके गल लग गया। रोशन राय ने उसके दोनों-"मेरा बहादुर बेटा।"

समीर ने खाली-खाली निगाहों से अपने बाप की तरफ देखा ओर बिना कुछ बोले कमरे से निकल गया। रोशन उसे हक्का-बक्का देखता रह गया।

समीर राय क बेचैनी देखने वाली थी।

उसे किसी पहलू चैन न था। वह पूरी रात ठीक से सो नहीं पाया था। उसे ख्वाब में नमीरा नजर आई थी। वह किसी जंगल में भटक रही थी... और उसका नाम लेकर उसे पुकार रही थी।

इस ख्वाब ने उसे और व्याकुल कर दिया था।

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हवेली की फिजा बड़ी अजीब-सी थी। नमीरा के बारे में कोई कुछ बताने को तैयार नहीं था। होंठ सिले हुए थे। साथ ही कई अनकही कहानियां नमीरा और उसकी बच्ची के बारे में गर्दिश कर रही थीं, लेकिन कोई किसी बात की पुष्टि करने को तैयार नहीं था। खुद मां-बाप का रवैया उलझा देने वाला था। नफीसा के चेहरे पर जो भाव थे... वह उनकी जुबान पर न थे और जो जुबान पर था, उनके चेहरे से मेल न खाता था।

नमीरा और उसकी नवजात बच्ची के पीछे कोई रहस्य जरूर था, लेकिन वह क्या रहस्य था, इसका सिर समीर क हाथ में नहीं आ रहा था। उसक बेचैनी....बेकरारी बढ़ती जा रही थी।

शायद उसी से गफलत हो गई थे।

अभी पन्द्रह दिन पहले ही तो समीर को नलमीरा का पत्र मिला था। वह बस, सिर्फ एक पंक्ति का पत्र था, लेकिन इस एक पंक्ति में एक वाक्य में ही जैसे एक पूरी दास्तान लिखी हुई थी। नमीरा ने लिखा था

"मैं खुद को बहुत अकेली महसूस करती हूं...हो सके तो मुझसे मिल जाओ.... ।"

इस संक्षिप्त से व्यथापूर्ण पत्र को पढ़कर समीर कुछ देर के लिए उदास हो गया था। उस शाम उसे एक म्यूजिक प्रोग्राम में जाना था। उसकी वक्त उसके दोस्त उसे लेने आ गये थे और वह उसे म्यूजिक कन्सर्ट में शामिल हो कुछ ऐसा व्यस्त हुआ कि नमीरा उसके जहन में निकल गई।

फिर मुम्बई की रंगीन शामों, संगीत भरी रातों, युनिवर्सिटी की हंसती-मुस्कुराती सुबहों में वह कुछ इस तरह गुम हुआ था कि प्रायःवह यह भी भूल जाता था कि वह कौन है।

नमीरा उसका चुनाव और उसकी पसन्द थी। वह उसे एक संगीत समारोह में मिली थी। उनकी यह पहली मुलाकाल ही बहुत गहरी साबित हुई। वे एक-दूसरे के दिलों में उतरते चले गये। नमीरा एक मध्यवर्गीय परिवार की लड़की थी। परिवार का नाता एक छोटे से शहर अमरोहा से था। उसके पिता बरसों पूर्व ही अमरोहा छोड़कर मुम्बई में आ बसे थे और यहां वह एक प्राइवेट फर्म में मैनेजर के पद पर थे।

_ नमीरा कुछेक मुलाकातों में ही समीर के दिल पर किसी स्टिकर की तरह चिपक गई। समीर राय ने 'प्रपोज' किया...शादी की पेशकश की और नमीरा शादी के लिए फौरन तैयार हो गई। लेकिन उसके मां-बाप ने कहा, जब तक समीर के घरवाले रिश्ता मांगने नहीं आते, वे रिश्ता नहीं करेंगे।

समीर ने अपने आपसे बात की। उसने खुले दिल होने का सबूत देते हुए नमीरा को अपनी बहू बनाने पर तो रजामन्दी जाहिर कर दी..... लेकिन अपने से छोटे लोगों के दर पर रिश्ता मांगने जोन से साफ इंकार कर दिया।

बिना उसके मां-बाप के आये....नमीरा का बाप रिश्ता देने पर तैयार नहीं था...और समीर का बाप रिश्ता मांगने पर राजी न था। परिणाम यह रहा-समीर व नमीरा का रिश्ता परम्पराओं के अनुसार न हो सका और समीर व नमीरा ने अपने तौर पर औपचारिकताएं पूरी कर ली। समीर ने अपने एक दोस्त के घर..अपने दोस्तों की मौजूदगी में चुपचाप नमीर से निकाह (विवाह) कर लिया।

जब नमीरा के मां-बाप को अपनी बेटी के इस दुस्साहस व संगीन कदम की सूचना मिली तो उन्होंने जिन्दगी भर के लिए उसका मुंह न देखने की कसम खा ली-और जब समीर, अपनी विवाहित नमीरा का लेकर हवेली पहुंचा तो उसके मां-बाप ने भी बड़े बुझे मन से उनका स्वागत कियां बाप तो बाप, समीर की मां को भी यह बात पसन्द नहीं आई थी। पसन्द न आने के बावजूद भी नफीसा ने नमीरा को हवेली से निकाल बाहर नहीं किया था। शायद इसलिए कि वह जानती थी कि अगर ऐसा किया तो समीर बिगड़ इसलिए कि वह जानती थी कि अगर ऐसा किया तो समीर बिगड़ जाएगा और वे दोनों अपने इकलौते बेटे से हाथ धोना नहीं चाहते थे।

नमीरा सुन्दर तो थी ही...खूबसूरत होने के साथ-साथ जहीन भी थी। उसने शीघ्र ही नफीसा बेगम को अपनी तरफ झुका लिया। सास-बहू के रिश्ते में जो ठण्डापन था...वह धीरे-धीरे कम होता गया। नमीरा ने अपनी जहानत और अपने मधुर व्यवहार से नफीसा बेगम के दिल में घर करना शुरू कर दिया।

इधर वह सास के दिल में घर करती जा रही थी तो समीर के दिल से निकलती जा रही थी। नमीरा का नशा उतरा जा रहा था। वह नमीरा को भूलता जा रहा था। समीर एन.ए. कर रहा था और होस्टल में रहता था। मुम्बई में, बांद्रा के इलाके में उसके बाप का बंगला था, लेकिन समीर को उसमें रहना पसन्द नही था। उसकी तो हवेली से जान जलती थी.फिर वह इतने बड़े बंगले में अकेला कैसे रहता। उस होस्टल ही रास आता था। दूसरो के साथ उनके बीच रहना पसन्द था। वह एक भावुक लेकिन दृढ़ निश्चय नौजवान था। जो दिल में समा जाता था...उसे कर गुजरता था। नमीरा से शादी भी उसने दिल में उठने वाले ज्वार-भाटा के प्रभाव में कर ली थी। अब वह जोश कम हो रहा था। वह नमीरा को हवेला में पहुंचाकर जैसे भूल ही गया था।

यहां तक कि नमीरा का एक पंक्ति वाला जज्बाती पत्र भी समीर के दिल के समुद्र में हलचल नहीं मचा सका था और यूं नमीरा अपने अकेलेपन का रोना रोती व उसे याद करती मर गई थी.... ।

समीर सोचे जा रहा था और जितना सोच रहा था, उसका गम, उसकी पीड़ा बढ़ती जा रही थी। उसका गला बार-बार रुंध जाता था। आंखें छलकी जा रही थीं।
 
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