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रोशन राय के कमरे की लाईट अभी जल रही थी। लाईट तो उसके कमरे की जलती ही रहती थी क्योंकि अब वह अन्धेरे में नहीं सो पाता था। जब से सांप दिखाई देने का चक्कर चला था.....तब उसे उसकी नीदें और उड़ गई थीं। कुछ उसके कर्म थे और कुछ उम्र का तकाजा था। अब वह पहली सी नींद रही ही नहीं थी।
रौली ने एक विशिष्ट अंदाज में दस्तक दी थी। इस दस्तक को रोशन राय अच्छी तरह पहचानता था। वह अभी सोने की तैयारी में था कि इस दस्तक ने उसे चौंका दिया।
"इस वक्त यह कैसे आ गया? उसके कोई ऐसा खास काम भी न था....जिसे पूरा करके वो यहां पहुंचा हो।" यही सोचते हुए रोशन ने उठकर दरवाजा खोला था।
रौली का चेहरा बता रहा था कि कोई खास बात हुई है।
"हां, क्या हुआ?" रोशन राय ने बड़े इत्मीनान से पूछा-"आओ, अन्दर आओ....."
वह रोशन राय के साथ अन्दर आया और हाथ बांधकर खड़ा हो गया, बोला-"मालिक, कब्रिस्तान से 'गोरकन' पोखर को पकड़कर लाया हूं.....।"
___ "पोखर को....क्यों...?" रोशन राय चौंकर उसकी आंखों में देखने लगा-"बाबा, खैर तो है...?"
"मालिक, खैर नहीं है। उस कुत्ते ने छोटे मालिक को कब्र खोदकर दिखा दी....।" रौली ने धमका किया।
__"हैं, बाबा...।" रोशन राय के चेहरे पर हवाइयों उड़ने लगीं- "अरें, बाबा! यह पोखर ने क्या किया। उसने हमारा सारा खेल ही चौपट कर दिया। बाबा.वो है कहा?"
"हवेली में ही है। अपने साथ ले आया हूं......" रौली ने बताया।
"ओ, बाबा! उसको यहां क्यों ले आए। बाबा, उसे तो कब्रिस्तान ही ले जाओ। पहले उसके बीवी-बच्चों को आग दिखाओ, फिर उस भी भून दो। देखो, उसका घर-बार कुछ न बचे और हां, अब उन कब्रों को भी हमें क्या फायदा। बाबा....उन्हें भी जला दो। आग लगा दो। जाओ, जल्दी जाओ! इससे पहले कि समीर हवेली से बाहर निकले, सब कुछ जल चुका हो। समझ गये बाबा..."
"जी मालिक! अच्छी तरह समझ गया....." शैली ने मुंडी हिलाई।
___ "बस तो बाबा, फिर जाओ.... । अभी इधर क्यों खड़े हो? इस पोखर के बच्चे ने बड़ी बेवकूफी का काम किया...।" वह बेचैनी से अपने हाथ मलने लगा।
रौली फोरन अपने पंजों के बल घूमा था और कमरे से निकल गया था।
फिर उसेन कब्रिस्तान पहुंचकर जो तमाशा किया, वह समीर के सामने था।
समीर कब्रों का हाल देखकर वापिस आया तो उसने रौली को गाड़ी के पास अलर्ट खड़े पाया। वो दूसरे नौकरों को हाथ उठा-उठाकर हिदायतों दे रहा था।
समीर ने उसके पास पहुंचते ही पूछा-"रौली, पोखर कहां है?"
"नहीं मालूम, छोटे मालिक...।" रौली ने धीमे स्वर में जवाब दिया।
"कहीं आग लगाने वाले ने उसे घर समेत ही तो नहीं जला दिया? फिर उस घर में उसके बीवी-बच्चे भी
थे। अगर ऐसा हुआ जो याद रखना, कमायत टूटेगी...।" समीर राय ने गाड़ी में बैठते हुए कहा।
"अब मैं क्या बता सकता हूं, छोटे मालिक!" रौली ने हाथ जोड़ते हुए कहा-"आग बुझे तो कुछ पता चले, छोटे मालिक....."
रौली अच्छी तरह जानता था कि कब्रिस्तान में क्या हुआ था। उसी ने तो रोशन राय का हुक्म पाते ही...सबसे पहले पोखर को उसके घर में लाकर एक चारपाई से बांध दिया था। ऐसा ही उसने उसकी बीवी और बच्चों के साथ भी किया था। इसके बाद उसने पूरे घर में पैट्रोल छिड़कर घर में आग लगा दी थी।
पोखर बेचारा मूक-आंखों से रहम की अपील करता रह गया था। बोल वह सकता नहीं था.....क्योंकि उसक मुंह में कपड़ा ढूंस दिया गया था। आग ने देखते-ही-देखते पूरे घर को अपनी लपेट में ले लिया था।
पोखर....अपनी बीवी-बच्चों सहित जिन्दा जल मरा।
196%
इस बीच रौली के आदमियों ने पुख्ता सिमेन्टिड कब्रों को तोड़ था। टूटी कब्रों में सूखी लकड़ियां व घास-फूस डालकर और उन पर पैट्रोल डालकर यहां भी रौली ने दियासलाई दिखा दी थी। जलती दियासलाई ने पैट्रोल को छुआ तो जैसे जहन्नुम की आग भड़क उठी।
रौली ने जिन लोगों के साथ मिलकर यह आग लगर्दा थी.....अब वही लोग उस आग को बुझाने की कोशिश कर रहे थे। वह आग कम बुझा रहे थे...शोर ज्यादा मचा रहे थे। इधर-से-उधर खामखां भाग रहे थे
और यह बात समीर राय ने अच्छी तरह नोट कर ली थी। समीर फिर वहां रुका नहीं।
वहा वहां रुककर करता भी क्या....जो कुछ होना था हो चुका था।
दोपहर तक समीर का यह भी मालूम हो गया कि पोखर और उसके बीवी-बच्चे भी इस आग में जल मरे हैं। उसका दिल कटकर रह गया।
आखिर उस गरीब का क्या कसूर था?
रौली ने एक विशिष्ट अंदाज में दस्तक दी थी। इस दस्तक को रोशन राय अच्छी तरह पहचानता था। वह अभी सोने की तैयारी में था कि इस दस्तक ने उसे चौंका दिया।
"इस वक्त यह कैसे आ गया? उसके कोई ऐसा खास काम भी न था....जिसे पूरा करके वो यहां पहुंचा हो।" यही सोचते हुए रोशन ने उठकर दरवाजा खोला था।
रौली का चेहरा बता रहा था कि कोई खास बात हुई है।
"हां, क्या हुआ?" रोशन राय ने बड़े इत्मीनान से पूछा-"आओ, अन्दर आओ....."
वह रोशन राय के साथ अन्दर आया और हाथ बांधकर खड़ा हो गया, बोला-"मालिक, कब्रिस्तान से 'गोरकन' पोखर को पकड़कर लाया हूं.....।"
___ "पोखर को....क्यों...?" रोशन राय चौंकर उसकी आंखों में देखने लगा-"बाबा, खैर तो है...?"
"मालिक, खैर नहीं है। उस कुत्ते ने छोटे मालिक को कब्र खोदकर दिखा दी....।" रौली ने धमका किया।
__"हैं, बाबा...।" रोशन राय के चेहरे पर हवाइयों उड़ने लगीं- "अरें, बाबा! यह पोखर ने क्या किया। उसने हमारा सारा खेल ही चौपट कर दिया। बाबा.वो है कहा?"
"हवेली में ही है। अपने साथ ले आया हूं......" रौली ने बताया।
"ओ, बाबा! उसको यहां क्यों ले आए। बाबा, उसे तो कब्रिस्तान ही ले जाओ। पहले उसके बीवी-बच्चों को आग दिखाओ, फिर उस भी भून दो। देखो, उसका घर-बार कुछ न बचे और हां, अब उन कब्रों को भी हमें क्या फायदा। बाबा....उन्हें भी जला दो। आग लगा दो। जाओ, जल्दी जाओ! इससे पहले कि समीर हवेली से बाहर निकले, सब कुछ जल चुका हो। समझ गये बाबा..."
"जी मालिक! अच्छी तरह समझ गया....." शैली ने मुंडी हिलाई।
___ "बस तो बाबा, फिर जाओ.... । अभी इधर क्यों खड़े हो? इस पोखर के बच्चे ने बड़ी बेवकूफी का काम किया...।" वह बेचैनी से अपने हाथ मलने लगा।
रौली फोरन अपने पंजों के बल घूमा था और कमरे से निकल गया था।
फिर उसेन कब्रिस्तान पहुंचकर जो तमाशा किया, वह समीर के सामने था।
समीर कब्रों का हाल देखकर वापिस आया तो उसने रौली को गाड़ी के पास अलर्ट खड़े पाया। वो दूसरे नौकरों को हाथ उठा-उठाकर हिदायतों दे रहा था।
समीर ने उसके पास पहुंचते ही पूछा-"रौली, पोखर कहां है?"
"नहीं मालूम, छोटे मालिक...।" रौली ने धीमे स्वर में जवाब दिया।
"कहीं आग लगाने वाले ने उसे घर समेत ही तो नहीं जला दिया? फिर उस घर में उसके बीवी-बच्चे भी
थे। अगर ऐसा हुआ जो याद रखना, कमायत टूटेगी...।" समीर राय ने गाड़ी में बैठते हुए कहा।
"अब मैं क्या बता सकता हूं, छोटे मालिक!" रौली ने हाथ जोड़ते हुए कहा-"आग बुझे तो कुछ पता चले, छोटे मालिक....."
रौली अच्छी तरह जानता था कि कब्रिस्तान में क्या हुआ था। उसी ने तो रोशन राय का हुक्म पाते ही...सबसे पहले पोखर को उसके घर में लाकर एक चारपाई से बांध दिया था। ऐसा ही उसने उसकी बीवी और बच्चों के साथ भी किया था। इसके बाद उसने पूरे घर में पैट्रोल छिड़कर घर में आग लगा दी थी।
पोखर बेचारा मूक-आंखों से रहम की अपील करता रह गया था। बोल वह सकता नहीं था.....क्योंकि उसक मुंह में कपड़ा ढूंस दिया गया था। आग ने देखते-ही-देखते पूरे घर को अपनी लपेट में ले लिया था।
पोखर....अपनी बीवी-बच्चों सहित जिन्दा जल मरा।
196%
इस बीच रौली के आदमियों ने पुख्ता सिमेन्टिड कब्रों को तोड़ था। टूटी कब्रों में सूखी लकड़ियां व घास-फूस डालकर और उन पर पैट्रोल डालकर यहां भी रौली ने दियासलाई दिखा दी थी। जलती दियासलाई ने पैट्रोल को छुआ तो जैसे जहन्नुम की आग भड़क उठी।
रौली ने जिन लोगों के साथ मिलकर यह आग लगर्दा थी.....अब वही लोग उस आग को बुझाने की कोशिश कर रहे थे। वह आग कम बुझा रहे थे...शोर ज्यादा मचा रहे थे। इधर-से-उधर खामखां भाग रहे थे
और यह बात समीर राय ने अच्छी तरह नोट कर ली थी। समीर फिर वहां रुका नहीं।
वहा वहां रुककर करता भी क्या....जो कुछ होना था हो चुका था।
दोपहर तक समीर का यह भी मालूम हो गया कि पोखर और उसके बीवी-बच्चे भी इस आग में जल मरे हैं। उसका दिल कटकर रह गया।
आखिर उस गरीब का क्या कसूर था?