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- Dec 5, 2013
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इसी रात की सुबह!
सुबह का उलाला फैलने लगा था। कंगनपुर में जिन्दगी अंगड़ाई ले रही थी। हाकम अली अपेन कमरे से निकल अपने जानवारों को चारा डालने के लिए बाड़े की तरफ बढ़ा। वह जब 'बाड़े के दरवाजे पर पहुंचा तो उसने एक अजीब मंजर देखा। पहले तो उसे यकीन ही नहीं आया। अपनी नजर का धोखा महसूस हुआ, लेकिन वह नजर का धोखा नहीं था।
वह उसी का ऊंट ही था.... जो बाड़े के दरवाजे पर बैठा ऊंची गर्दन किये जुगाली किए जा रहा था। उसकी पीठ पर काठी बंधी हुई थी उस काठी में एक औरत बेसुध-सी पड़ी थी। इस अजीब नजारे ने उसे दहलाकर रख दिया। वह तेजी से अपने ऊंट की तरफ बढ़ा।
वह एक खूबसूरत औरत थी, जिन्दा थी, मगर बेहोश थी।
हाकम अली उस औरत को ऊंट सहित अपेन घर ले आया। घर की औरतों ने उसे औरत को पूरी सावधानी से ऊंट से उतारा और सहन में बिछी एक चारपाई पर लिटा दिया।
हाकम अली की मां ने उसे औरत का अच्छी तरह मुआयना किया। वह औरत किसी अच्छे घर की लगती थी। पहली समस्या उसे होश में लाने की थी। हाकम अली की मां ने उसके मुंह पर धीरे-धीरे पानी के छींटे ङ्केमारे....उसके अलव सहलाये। कुछ देर बाद जाकर औरत के निर्जीव हरकत हुई। उसने धीरे-से आखें खोल दी।
उसने अपने सामने देहात की एक बूढ़ी औरत को पाया....जो बड़धी चिन्ता से उसकी तरफ देख रही थी। उसे आंखें खोलते देख, बूढी औरत के चेहरे के भाव तेजी से बदले। उसका चेहरा खुशी से खिल उठा।
___ "लेटी रहो....अभी उठने की कोशिश न करो। मैं तुम्हारे लिए दूध लाती हूं।" वह मुहब्बत से बोली।
___ "अम्मा, तुम बैठो..मैं लाती हूं दूध....." हाकम अली का बीवी चांद ने कहा।
"अच्छा ठीक है। जरा जल्दी ला...।" और फिर वह बूढ़ी हाकम अली की मां, उस औरत से मुखातिब हुई-"तुम कौन हो बेटी?"
"मेरा नाम नमीरा है...मांजी....।" वह नमीरा थी...उसने अपनी कजोर आवाज में जवाब दिया।
हाकम अली की मां ने जब महसूस किया कि नमीरा कमजोरी की वजह से बोलने में दिक्कत महसूस कर रही है तो उसने उससे और कुछ न पूछा।
नमीरा को गर्म-गर्म दूध पिलाया। कुछ देर बाद मक्की की रोटी, मक्खन और गुड़ का नाश्ता कराया। नमीरा भूखी थी। पेट में कुछ पड़ा तो उसे सुकून मिला। उसने अपनी आंखें पूरी तरह खोल दी और इस घर को नजरें घुमाकर देखा।
वह एक छप्पर तले चारपाई पर लेटी हुई थी। उस घर में तीन औरतें थीं....एक हाकम की मां, जो उसकी सेवा करने में सबसे आगे थी..दूसरी हाकम अली की बीवी चांद, जो अपनी सास की मदद कर रही थी..और तीसरी हाकम अली की छोटी बहन.... कोई सत्रह-अठारह बरस की...वो दूर खड़ी बस नमीरा को देखे जा रही थी।
"मां जी, मैं कहां हूं...?" नमीरा ने बुढ़िया से पूछा।
"यह कंगनपूर है बेटा! सरहदी इलाका । लेकिन तुम कहां से आई हो...?" अम्मा ने पूछा।
"अब मैं क्या बताऊं कि मैं कहो से आई हूं..?" नमीरा दुविधा का शिकार थी।
अम्मा मुस्कुराकरक बोली-"अरी बताएगी नहीं तो हमें पता कैसे पड़ेगा कि तुम कहां की हो?"
"मैं रोशनगढ़ी की हूं...।" नमीरा ने सच बोला।
"तू कहां जा रही थी....?"
__"कहीं नहीं, अम्मा.....बस किस्मत जहां ले आई, वहां आ गई....।" नमीरा ने भीगी आंखों के साथ जवाब दिया।
"आखिर कुछ पात तो पड़े कि इस नाजुक हालत में तू घर से क्यों निकली..?"
इस सवाल के जवाब में नमीरा ने कुछ छिपाना ठीक नहीं समझा। जो उस पर गुजरी थी... सक कह सुनाई।
हाकम अली की मां उसकी कहानी सुनकर हैरान रह गई। यह सन्देह तो पहले ही था कि वह किसी बड़े घर की औरत है। उसका अन्दाजा सही था। नमीरा हवेली से आई थी और रोशनगढ़ी के मशहूर जागीरदार रोशन राय की बहू थी।
उसने नमीरा की दुखभरी दास्तान हाकम अली को कह सुनाई। वह भी नमीरा की आपबीती सुनकर स्तब्ध रह गया।
हाकम बली ने कुछ सोचा, फैसला किया और फिर अपनी मां को नमीरा का खास ख्याल रखने की हिदायत दे खुद राजा सलीम की हवेली पहुंच गया। नमीरा के बारे में उसे बताना जरूरी समझा था हाकम अली ने।
सुबह का उलाला फैलने लगा था। कंगनपुर में जिन्दगी अंगड़ाई ले रही थी। हाकम अली अपेन कमरे से निकल अपने जानवारों को चारा डालने के लिए बाड़े की तरफ बढ़ा। वह जब 'बाड़े के दरवाजे पर पहुंचा तो उसने एक अजीब मंजर देखा। पहले तो उसे यकीन ही नहीं आया। अपनी नजर का धोखा महसूस हुआ, लेकिन वह नजर का धोखा नहीं था।
वह उसी का ऊंट ही था.... जो बाड़े के दरवाजे पर बैठा ऊंची गर्दन किये जुगाली किए जा रहा था। उसकी पीठ पर काठी बंधी हुई थी उस काठी में एक औरत बेसुध-सी पड़ी थी। इस अजीब नजारे ने उसे दहलाकर रख दिया। वह तेजी से अपने ऊंट की तरफ बढ़ा।
वह एक खूबसूरत औरत थी, जिन्दा थी, मगर बेहोश थी।
हाकम अली उस औरत को ऊंट सहित अपेन घर ले आया। घर की औरतों ने उसे औरत को पूरी सावधानी से ऊंट से उतारा और सहन में बिछी एक चारपाई पर लिटा दिया।
हाकम अली की मां ने उसे औरत का अच्छी तरह मुआयना किया। वह औरत किसी अच्छे घर की लगती थी। पहली समस्या उसे होश में लाने की थी। हाकम अली की मां ने उसके मुंह पर धीरे-धीरे पानी के छींटे ङ्केमारे....उसके अलव सहलाये। कुछ देर बाद जाकर औरत के निर्जीव हरकत हुई। उसने धीरे-से आखें खोल दी।
उसने अपने सामने देहात की एक बूढ़ी औरत को पाया....जो बड़धी चिन्ता से उसकी तरफ देख रही थी। उसे आंखें खोलते देख, बूढी औरत के चेहरे के भाव तेजी से बदले। उसका चेहरा खुशी से खिल उठा।
___ "लेटी रहो....अभी उठने की कोशिश न करो। मैं तुम्हारे लिए दूध लाती हूं।" वह मुहब्बत से बोली।
___ "अम्मा, तुम बैठो..मैं लाती हूं दूध....." हाकम अली का बीवी चांद ने कहा।
"अच्छा ठीक है। जरा जल्दी ला...।" और फिर वह बूढ़ी हाकम अली की मां, उस औरत से मुखातिब हुई-"तुम कौन हो बेटी?"
"मेरा नाम नमीरा है...मांजी....।" वह नमीरा थी...उसने अपनी कजोर आवाज में जवाब दिया।
हाकम अली की मां ने जब महसूस किया कि नमीरा कमजोरी की वजह से बोलने में दिक्कत महसूस कर रही है तो उसने उससे और कुछ न पूछा।
नमीरा को गर्म-गर्म दूध पिलाया। कुछ देर बाद मक्की की रोटी, मक्खन और गुड़ का नाश्ता कराया। नमीरा भूखी थी। पेट में कुछ पड़ा तो उसे सुकून मिला। उसने अपनी आंखें पूरी तरह खोल दी और इस घर को नजरें घुमाकर देखा।
वह एक छप्पर तले चारपाई पर लेटी हुई थी। उस घर में तीन औरतें थीं....एक हाकम की मां, जो उसकी सेवा करने में सबसे आगे थी..दूसरी हाकम अली की बीवी चांद, जो अपनी सास की मदद कर रही थी..और तीसरी हाकम अली की छोटी बहन.... कोई सत्रह-अठारह बरस की...वो दूर खड़ी बस नमीरा को देखे जा रही थी।
"मां जी, मैं कहां हूं...?" नमीरा ने बुढ़िया से पूछा।
"यह कंगनपूर है बेटा! सरहदी इलाका । लेकिन तुम कहां से आई हो...?" अम्मा ने पूछा।
"अब मैं क्या बताऊं कि मैं कहो से आई हूं..?" नमीरा दुविधा का शिकार थी।
अम्मा मुस्कुराकरक बोली-"अरी बताएगी नहीं तो हमें पता कैसे पड़ेगा कि तुम कहां की हो?"
"मैं रोशनगढ़ी की हूं...।" नमीरा ने सच बोला।
"तू कहां जा रही थी....?"
__"कहीं नहीं, अम्मा.....बस किस्मत जहां ले आई, वहां आ गई....।" नमीरा ने भीगी आंखों के साथ जवाब दिया।
"आखिर कुछ पात तो पड़े कि इस नाजुक हालत में तू घर से क्यों निकली..?"
इस सवाल के जवाब में नमीरा ने कुछ छिपाना ठीक नहीं समझा। जो उस पर गुजरी थी... सक कह सुनाई।
हाकम अली की मां उसकी कहानी सुनकर हैरान रह गई। यह सन्देह तो पहले ही था कि वह किसी बड़े घर की औरत है। उसका अन्दाजा सही था। नमीरा हवेली से आई थी और रोशनगढ़ी के मशहूर जागीरदार रोशन राय की बहू थी।
उसने नमीरा की दुखभरी दास्तान हाकम अली को कह सुनाई। वह भी नमीरा की आपबीती सुनकर स्तब्ध रह गया।
हाकम बली ने कुछ सोचा, फैसला किया और फिर अपनी मां को नमीरा का खास ख्याल रखने की हिदायत दे खुद राजा सलीम की हवेली पहुंच गया। नमीरा के बारे में उसे बताना जरूरी समझा था हाकम अली ने।