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- Dec 5, 2013
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इस तरह समीर राय ने हवेली से बुरे लोगों को निकाल बाहर किया और वे सारे लोग अन्धेरों में कहीं गुम हो गये। उन्होंने रोशन गढ़ी को वाकई छोड़ दिया। समीर राय को वह उस इलाके में फिर कहीं नजर नहीं आये यह हवेली में एक खुशगवार परिवर्तन था। उन लोगों के जाने के बाद हवेली में उन लोगों के जुर्म की दास्तानें सुनाई देने लगी। जो लोग अब तक खौफ की वजह से चुप थे.....उन्होंने नई-नई कहानियां सुनाई। बहरहाल, रोशनगढ़ी के वासी अब निश्चित व खुश थे।समीर राय ने अपनी जागीर का काम -काज बड़ी कुशलता के साथ सम्भाल लिया था दिन....महीने.....साल, बीत गये थे। नफीसा बेगम को अब समीर राय की शादी की फिक्र हुई। आस-पास लड़कियों की कमी नहीं थी। खुद नफीसा के भाइयों की लड़कियों की कमी नहीं थी। खुद नफीसा के भाइयों की लड़किया थोक के हिसाब से मौजूद थी। हर तरह की, हर रंग की और हर स्तर की लड़कियां उपलब्ध थीं। बोल-बोल कर कान खा जाने वाली और खामोश रहकर उकता देने वाली लडकियां । हर मिजाज और हर तरह कल लड़कियां सामने थीं....और नफीसा बेगम के बस एक इशारे की देर थी कि उनमे से कोई भी उसकी बहू बन सकती थी।लेकिन वह इशारा किसे करती। इशारा तो ऊपर से होना था। समीर राय को करना था और समीर राय को अपने खानदान की लड़कियों से कोई दिलचस्पी नहीं थी। उसे तो अब वैसे भी लड़कियों से कोई दिलचस्पी नहीं थी ।नफीसा बेगम के इशारों पर मामों की लड़कियों ने हवेली में आना-जाना शुरू कर दिया था। लड़कियां तो खैर पहले भी आती थी और अपनी फूफी से मिलकर चली जाती थी। अब उन्होंने एक खास सोच के साथ आना शुरू कर दिया था। अब वे नफीसा फूफी से मिलकर वापिस नहीं जाती थीं, बल्कि समीर राय के कमरे का चक्कर भा लगाता था ।इन ढेर सारी लड़कियों में एक लड़की उन सब में नुमायां थी। वह सबसे बड़े मामू की बेटी थी। उसका नाम मायरा था। अच्छी खूबसरत लड़की थी। पढ़ी-लिखी थी। उठने-बैठने का सलीका था। दुबली-पतली व खुशमिजाज थी। यह मामू अरशद की सबसे छोटी बेटी थी। नफीसा बेगम की इस मायरा पर ही नजर थी, लेकिन समीर राय अपनी मां की पसन्द व ख्वाहिश से बेखबर था ।समीर राय को तो अपने ही गमों से फुर्सत नही थी कि वो किसी को नजर उठाकर देखता। नमीरा उसके दिल में बैठी हुई थी। वह नमीरा को अभी तक नहीं भूला था। वह उसे शायद भूला ही नहीं सकता था। उसके दिल पर बड़ी सख्त चोट लगी थी और यह जख्म अब शायद जिन्दगी भर भरने वाला। नहीं था। नमीरा के साथ उसे अपनी बच्ची भी याद आती थी। नमीरा की मौत की तो तस्दीक हो गई थी..... लेकिन अपनी बेटी के बारे में वह आशावान था। उसे जाने यह आशा क्यों थी कि उसकी बेटी एक दिन उसे जरूर मिलेगी ।समीर राय ने पढ़ाई छोड़ दी थी। उसने मुम्बई जाना भी छोड़ दिया था। म्यूजिक भी अब अतीत की बात हो गई थी। वह अपनी मां को अब अकेला नहीं छोड़ सकता था और न नफीसा बेगम उसकी बिना रह सकती थी। यह दूसरी बात थी कभी-कभी मुम्बई से समीर राय के 'म्यूजिक' के दीवारे दोस्त आते रहते थे और तब हवेली में रौनक हो जाती थी। हवेली के बाग में संगीत की महफिल जमती और गाने वाले व बजाने वाले रात गये तक धमाल करते ।इन महफिलों में समीर राय खनदान की लड़कियों को कदापि आमंत्रित नहीं करता था, बस वह होता और उसकी मित्र-मण्डली होती ।समीर राय को मछली के शिकार से भी दिलचस्पी थी। वह एकान्तप्रिय था। शायद इसलिए यह शौक भी पाल लिया था। वह पानी में डोर डाले अपनी कल्पनाओं की दुनिया में गुम हो जाता था....मछली फंसे या न फंसे उसे इसकी परवाह न थी।फिर एक दिन एक अजीब घटना घटी।मायरा की बड़ी बहन सादिया की ‘मेंहदी की रस्म थी। ऐसे समारोह में लड़कियों का इकट्ठा होना जरूरी था और साथ ही बन-सवंर कर आना थी जरूरी था। नफीसा बेगम, समीर राय को अपने साथ बांधकर ले गई। समीर राय अपनी मां के कहने पर चला तो गया, लेकिन एक कोने में बैठा रहा। मेंहदी की रस्म के बाद जब लड़कियों ने एक-दूसरे को उबटन लगाना शुरू किया तो इस खेल में लड़के भी शामिल हो गये और तभी किसी लड़की ने शीशा छेड़ा-“समीर भाई के कोई उबटन लगाये तो जानें........।"
और मायरा को जाने क्या सूझी....उसने यह चैलेंज कबूल कर दिया और हाथ में 'उबटन' लेकर एक तरफ खामोश बैठे समीर राय की तरफ बढ़ी |समीर राय ने जब मायरा को अपनी तरफ आते देखा तो उसने उसका इरादा फौरन भांप लिया। वह एकमद शालीन लहजे में बोला-"देखो, मायरा! मुझे उबटन न लगाना।"\
मायरा तो चैलेंज कबूल करके आई थी, वह समीर राय के अनुराध पर भवा वापिस कैसे जा सकती थी। उसने हाथ बढ़ाकर समीर राय के चेहरे पर उबटन मलना चाही समीर राय ने फौरन उसकी कलाई थाम ली ।मायरा ने अपनी कलाई छुड़ानी चाही तो कट-कट करके उसके हाथ की चूड़ियां मोल गई। एक-दो चूड़ियां मोलकर मायरा की जाजुम कलाई में घुस गई। समीर राय के हाथ में भी चूड़ियां चुभीं। मायरा की कलाई पर गहरा जख्म लगा। भल–भल करके खून बहने लगा दोनों की नजरें मिली। समीर राय शर्मिन्दा था, जबकि मायरा के चेहरे पर जख्मी होने के बावजूद शोखी थी। मैंने मना किया था ना......।" समीर राय ने शिकायतपूर्ण लहजे में जैसे हमदर्दी जतलाई-"जख्म आ गया ना.....।"
मायरा ने कोई जवाब नहीं दिया। बस एक लम्हा गहरी नजरों से उसे देखा और फिर पलटकर लड़कियों में गुम हो गई। तभी लड़कियों ने एकदम शोर मचाया।"मायरा हार गई...मायरा हार गई...।"
समीर राय के कान खड़े हुए। मायरा हार गई। इसका मतलब था कि इन लड़कियों ने आपस में जरूर शर्त लगाई थी। उसे बड़ा दुख हुआ कि अगर वह जरा-सा उबटन लगवा लेता तो उसका कया बिगड़ जाता । यह तो मायरा पर जुल्म हुआ था और उसने तो किसी पर जुल्म करना सीखा ही नहीं था ।वह फौरन उठा।
उसने मायरा को फौरन तलाश किया। वह अभी तक अपनी कलाई पकड़े खड़ी थी......और खून बह रहा था। समीर ने पहले तो अपनी जेब से रूमाल निकालकर उसकी कलाई पर बांधा, फिर मुस्कुराकर बोला-"मायरा हार नहीं सकती। लाओ, लगाओ मुझे उबटन....।"
यह सुनकर मायरा खिल उठी। उसने फौरन समीर राय के चेहरे पर थोड़ा उबटन मल दिया। लड़कियों ने फिर शोर मचाया
"मायरा जीत गई....मायरा जीत गई....।"समीर राय की फितरत में चूंकि किसी को देख देना शामिल ही नहीं था। इसलिये यही सोचकर कि उसने मायरा का दिल दुखाया हैं, उसे पर जुल्म किया है, उससे उबटन लगवा लिया था,
लेकिन मायरा ने इस वाकया को किसी और नजर से लिया और उसकी सहेलियों ने उसकी इस 'जीत' को कुछ का कुछ रंग दे दिया ।समीर राय अब मायरा के ख्वाबों में बस गया......उसके ख्वाबों का शहजादा हो गया |नफीसा बेगम को जब इस घटना का पता चला तो वह बहुत खुश हुई। वह मायरा को अपनी बहू बनाने का सपना देखने लगी। यूं भी मायरा उसकी पहली पसंन्द थी। वह अगर अपनी बहू बनाने का ख्वाब देख रही थी तो कोई बुरा नहीं कर रही थी ।
………………………..
और मायरा को जाने क्या सूझी....उसने यह चैलेंज कबूल कर दिया और हाथ में 'उबटन' लेकर एक तरफ खामोश बैठे समीर राय की तरफ बढ़ी |समीर राय ने जब मायरा को अपनी तरफ आते देखा तो उसने उसका इरादा फौरन भांप लिया। वह एकमद शालीन लहजे में बोला-"देखो, मायरा! मुझे उबटन न लगाना।"\
मायरा तो चैलेंज कबूल करके आई थी, वह समीर राय के अनुराध पर भवा वापिस कैसे जा सकती थी। उसने हाथ बढ़ाकर समीर राय के चेहरे पर उबटन मलना चाही समीर राय ने फौरन उसकी कलाई थाम ली ।मायरा ने अपनी कलाई छुड़ानी चाही तो कट-कट करके उसके हाथ की चूड़ियां मोल गई। एक-दो चूड़ियां मोलकर मायरा की जाजुम कलाई में घुस गई। समीर राय के हाथ में भी चूड़ियां चुभीं। मायरा की कलाई पर गहरा जख्म लगा। भल–भल करके खून बहने लगा दोनों की नजरें मिली। समीर राय शर्मिन्दा था, जबकि मायरा के चेहरे पर जख्मी होने के बावजूद शोखी थी। मैंने मना किया था ना......।" समीर राय ने शिकायतपूर्ण लहजे में जैसे हमदर्दी जतलाई-"जख्म आ गया ना.....।"
मायरा ने कोई जवाब नहीं दिया। बस एक लम्हा गहरी नजरों से उसे देखा और फिर पलटकर लड़कियों में गुम हो गई। तभी लड़कियों ने एकदम शोर मचाया।"मायरा हार गई...मायरा हार गई...।"
समीर राय के कान खड़े हुए। मायरा हार गई। इसका मतलब था कि इन लड़कियों ने आपस में जरूर शर्त लगाई थी। उसे बड़ा दुख हुआ कि अगर वह जरा-सा उबटन लगवा लेता तो उसका कया बिगड़ जाता । यह तो मायरा पर जुल्म हुआ था और उसने तो किसी पर जुल्म करना सीखा ही नहीं था ।वह फौरन उठा।
उसने मायरा को फौरन तलाश किया। वह अभी तक अपनी कलाई पकड़े खड़ी थी......और खून बह रहा था। समीर ने पहले तो अपनी जेब से रूमाल निकालकर उसकी कलाई पर बांधा, फिर मुस्कुराकर बोला-"मायरा हार नहीं सकती। लाओ, लगाओ मुझे उबटन....।"
यह सुनकर मायरा खिल उठी। उसने फौरन समीर राय के चेहरे पर थोड़ा उबटन मल दिया। लड़कियों ने फिर शोर मचाया
"मायरा जीत गई....मायरा जीत गई....।"समीर राय की फितरत में चूंकि किसी को देख देना शामिल ही नहीं था। इसलिये यही सोचकर कि उसने मायरा का दिल दुखाया हैं, उसे पर जुल्म किया है, उससे उबटन लगवा लिया था,
लेकिन मायरा ने इस वाकया को किसी और नजर से लिया और उसकी सहेलियों ने उसकी इस 'जीत' को कुछ का कुछ रंग दे दिया ।समीर राय अब मायरा के ख्वाबों में बस गया......उसके ख्वाबों का शहजादा हो गया |नफीसा बेगम को जब इस घटना का पता चला तो वह बहुत खुश हुई। वह मायरा को अपनी बहू बनाने का सपना देखने लगी। यूं भी मायरा उसकी पहली पसंन्द थी। वह अगर अपनी बहू बनाने का ख्वाब देख रही थी तो कोई बुरा नहीं कर रही थी ।
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