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'"क्या है वह..?" नफीसा ने बेअख्तियार पूछा।"
आज बस इतना ही । आप अब दो दिन बाद आएं। हमें कुछ 'अमल' करने होंगे। अब इस मामले में हमारी खुद ही दिलचस्पी जाग उठी है।" यह कहते हुये वह उठ खड़ी हुई ।इस अरूणिता के चेहरे पर इस क्षण कुछ ऐसे भाव थे, जिन्हें नफीसा बेगम कोई नाम नहीं दे सकी। वह नफीसा बेगम के कुछ बोलने से पहले ही अन्दरूनी कमरे से अंदर चली गई थी।
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और फिर दो दिन बाद... जब नफीसा बेगम दोबारा अरूणिमा के पास पहुंची तो अरूणिमा ने कहा-"हमें छ: चाकू और छ: नींबू चाहिये...।
''कोई मसला नहीं..मिल जाएंगे...।" नफीसा बोली ।
लेकिन ये चीजें हमें 'बच्ची' के बाप को लाकर देनी होंगी। आपका बेटा यह छ: चाकू और छ: नींबू खुद अपने हाथों से खरीदे और खुद ही हम तक पहुंचाए...।" अरूणिमा ने आगे कहा ।
ठीक है...।" नफीसा सोचपूर्ण लहजे में बोली-“मैं कल समीर राय को लेकर आ जाऊंगी....।''
"दोपहर और संध्या के बीच के समय में यहां आएं। न पहले न बाद में...।" अरूणिमा ने हिदायत दी।
बेहतर...ऐसा ही होगा...।" नफीसा बेगम का सिर इकरार में हिला ।
'बस, तो फिर आप जाएं...।" अरूणिमा ने संजीदगी से कहा ।
नफीसा बेगम उसके पास थोड़ा और बैठना चाहती थी। वह नमीरा और बच्ची में सवाल करना चाहती थी...लेकिन अरूणिमा ने इसका मौका नहीं दिया। अपनी बात पूरी करके उसने उसे उठा दिया था। नफीसा बेगम दिल में हसरत लिए अरूणिमा के कमरे से निकल आई ।बाहरी कमरे में लोगसरी बैठी थी। वह मालकिन को देखकर फौरन खड़ी हो गई। कुछ देर बाद ही वे दोनों गाड़ी में बैठी रोशन गढ़ी की तरफ लौट रही थीं |समीर राय हवेली में अपनी मां का बड़ी बेचैनी से इंतजार कर रहा था। नफीसा बेगम ने उसे अरूणिमा से अपनी मुलाकात के बारे में बता दिया था और जबसे उसने अपनी मां से यह सुना था कि उसकी बच्ची जिन्दा है...उसे मिल सकती है.तब से उसके अंदर एक नया समीर राय अंगड़ाई लेकर उठ बैठा था।उसकी बेकरारी देखने वाली थी। वह तो अपनी मां के साथ इस नजूमी युवती 'अरूणिमा से मिलने जाना चाहता था, लेकिन नफीसा बेगम ने ही मना कर दिया था...क्यों कि अरूणिमा एक लड़की थी..जाने वह समीर राय के सामने आना पसन्द करे या न करे |हालात की यह करवट भी समीर राय को उद्धेलित कर गई थी। बच्ची के जिन्दा होने की खबर ने तो उसके जिस्म में जैसे एक नई रूह फूंक दी और वह नमीरा को भूल गया था। अब वह अपनी बच्ची के लिये बेकरार था। वह बच्ची उसका अपना खून थी...उसकी नमीरा की निशानी थी। नमीरा न रही तो कम-से-कम उसकी यह निशानी ही मिल जाए। वह इंतजार कर रहा था कि यह अरूणिमा उसकी बच्ची के बारे में आज क्या बताती है।नफीसा बेगम हवेली पहुंची तो समीर राय का धैर्य जवाब दे चुका थां नफीसा बेगम ने कमरे में आ सांस भी लिया था कि समीर राय ने पूछा-"अम्मी क्या रहा? उस नजूमी लड़की ने क्या कहा?
"नफीसा बेगम ने उसे बताया कि अरूणिमा ने क्या चीजें मांगी हैं।अरूणिमा की मांग कोई बड़ी मांग न थी।अगले ही दिन व निश्चित समय पर समीर राय छ: चाकू व छ: नींबू लेकर अरूणिमा के घर पहुंच गया। नफीसा बेगम भी साथ थी। अरूणिमा की मां, रजनी देवी ने उन दोनों को ड्राइंगरूम में बैठाया और खुद अंदर चली गई।कुछ देर बाद वह अंदर से वापिस आई और उसने समीर राय को अपने साथ आने का इशारा किया। समीर राय फौरन उठकर खड़ा हो गया, मेज पर रखा वह लिफाफा उठाया जिसमें चाकू व नींबू थे और अरूणिमा की मां के पीछे चल दिया। नफीसा बेगम ने भी उसके साथ चलना चाहा तो अरूणिमा की मां ने रूककर, हाथ के इशारे से उसे अपने पीछे आने से रोक दिया।फिर रजनी देवी ने समीर राय को 'सब्ज कालीन वाले कमरे में बैठाया। उसके बैठते ही अरूणिमा कमरे में दाखिल हो गई। समीर राय ने उसके सम्मान में उठकर खड़ा होना चाहा। अरूणिमा ने हाथ के इशारे से उसे बैठे रहने को कहा और फिर स्वयं भी उसके सामने गोल-तकिये का सहारा लेकर बैठ गई।अरूणिमा ने सिर पर काला दुपट्टा ले रखा था और उसमें उसका चेहरा चांद की तरह चमक रहा था। समीर राय को उसके चेहरे में अपनी नमीरा का चेहरा नजर आया था। क्षण भर के लिये उसकी सोच बहकी, लेकिन फिर उसने स्वयं को संभाल लिया। जब उसने अपनी नजरें नीची कर ली थी।अरूणिमा की निगाहें समीर राय के चेहरे पर टिकी रही, फिर वह बोली-"लाइये, राय साहब! चाकू और नीबूं..।“
समीर राय ने उससे नजरे नहीं मिलाई और लिफाफे से छ: चाकू और छ: नीबूं निकाल कर उसके कदमों में रख दिये
|अरूणिमा ने एक चाकू उठाकर उसे खोला। इस चाकू का फल लगभग चार इंच का था। सारे चाकू आकार व साइज में एक जैसे ही थे नये थे। अरूणिमा की हिदायत के अनुसार ही थे ।अरूणिमा ने चाकू को वस्ता, मुट्ठी में दबाकर अपनी हाथ ऊपर उठाया। कुद इस अंदाज में जैसे वह चाकू का फल कालीन में गाड़ देगी, लेकिन ऐसा न हुआ ।उसने चाकू हाथ में लिये-लिये समीर को हुक्म दिया-“एक नीबूं अपनी हथेली पर रख लो...हथेली मेरे सामने फैला लो... "
समीर राय ने नीबूं अपने हाथ पर रखा और हाथ उसके सामने कर दिया। जाने वह क्या करने वाली थी।
"समीर साहब...क्या आपको अपनी पत्नी से बहुत प्यार था..?" अरूणिमा ने अचानक सवाल किया। उसने चाकू वाला हाथ ऊपर उठाया था..और समीर राय का हाथ उसके सामने फैला हुआ था, जिसमें नीबूं था।"
जी हां...मुझे उससे बहुत प्यार है...।" समीर राय ने बड़ी सादगी से कहा।
"काश...आपने यह मुहब्बत उससे उसकी मौत से पहले की होती तो उस पर जो कयामत गुजरी है..शायद वह न गुजरती...'
आज बस इतना ही । आप अब दो दिन बाद आएं। हमें कुछ 'अमल' करने होंगे। अब इस मामले में हमारी खुद ही दिलचस्पी जाग उठी है।" यह कहते हुये वह उठ खड़ी हुई ।इस अरूणिता के चेहरे पर इस क्षण कुछ ऐसे भाव थे, जिन्हें नफीसा बेगम कोई नाम नहीं दे सकी। वह नफीसा बेगम के कुछ बोलने से पहले ही अन्दरूनी कमरे से अंदर चली गई थी।
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और फिर दो दिन बाद... जब नफीसा बेगम दोबारा अरूणिमा के पास पहुंची तो अरूणिमा ने कहा-"हमें छ: चाकू और छ: नींबू चाहिये...।
''कोई मसला नहीं..मिल जाएंगे...।" नफीसा बोली ।
लेकिन ये चीजें हमें 'बच्ची' के बाप को लाकर देनी होंगी। आपका बेटा यह छ: चाकू और छ: नींबू खुद अपने हाथों से खरीदे और खुद ही हम तक पहुंचाए...।" अरूणिमा ने आगे कहा ।
ठीक है...।" नफीसा सोचपूर्ण लहजे में बोली-“मैं कल समीर राय को लेकर आ जाऊंगी....।''
"दोपहर और संध्या के बीच के समय में यहां आएं। न पहले न बाद में...।" अरूणिमा ने हिदायत दी।
बेहतर...ऐसा ही होगा...।" नफीसा बेगम का सिर इकरार में हिला ।
'बस, तो फिर आप जाएं...।" अरूणिमा ने संजीदगी से कहा ।
नफीसा बेगम उसके पास थोड़ा और बैठना चाहती थी। वह नमीरा और बच्ची में सवाल करना चाहती थी...लेकिन अरूणिमा ने इसका मौका नहीं दिया। अपनी बात पूरी करके उसने उसे उठा दिया था। नफीसा बेगम दिल में हसरत लिए अरूणिमा के कमरे से निकल आई ।बाहरी कमरे में लोगसरी बैठी थी। वह मालकिन को देखकर फौरन खड़ी हो गई। कुछ देर बाद ही वे दोनों गाड़ी में बैठी रोशन गढ़ी की तरफ लौट रही थीं |समीर राय हवेली में अपनी मां का बड़ी बेचैनी से इंतजार कर रहा था। नफीसा बेगम ने उसे अरूणिमा से अपनी मुलाकात के बारे में बता दिया था और जबसे उसने अपनी मां से यह सुना था कि उसकी बच्ची जिन्दा है...उसे मिल सकती है.तब से उसके अंदर एक नया समीर राय अंगड़ाई लेकर उठ बैठा था।उसकी बेकरारी देखने वाली थी। वह तो अपनी मां के साथ इस नजूमी युवती 'अरूणिमा से मिलने जाना चाहता था, लेकिन नफीसा बेगम ने ही मना कर दिया था...क्यों कि अरूणिमा एक लड़की थी..जाने वह समीर राय के सामने आना पसन्द करे या न करे |हालात की यह करवट भी समीर राय को उद्धेलित कर गई थी। बच्ची के जिन्दा होने की खबर ने तो उसके जिस्म में जैसे एक नई रूह फूंक दी और वह नमीरा को भूल गया था। अब वह अपनी बच्ची के लिये बेकरार था। वह बच्ची उसका अपना खून थी...उसकी नमीरा की निशानी थी। नमीरा न रही तो कम-से-कम उसकी यह निशानी ही मिल जाए। वह इंतजार कर रहा था कि यह अरूणिमा उसकी बच्ची के बारे में आज क्या बताती है।नफीसा बेगम हवेली पहुंची तो समीर राय का धैर्य जवाब दे चुका थां नफीसा बेगम ने कमरे में आ सांस भी लिया था कि समीर राय ने पूछा-"अम्मी क्या रहा? उस नजूमी लड़की ने क्या कहा?
"नफीसा बेगम ने उसे बताया कि अरूणिमा ने क्या चीजें मांगी हैं।अरूणिमा की मांग कोई बड़ी मांग न थी।अगले ही दिन व निश्चित समय पर समीर राय छ: चाकू व छ: नींबू लेकर अरूणिमा के घर पहुंच गया। नफीसा बेगम भी साथ थी। अरूणिमा की मां, रजनी देवी ने उन दोनों को ड्राइंगरूम में बैठाया और खुद अंदर चली गई।कुछ देर बाद वह अंदर से वापिस आई और उसने समीर राय को अपने साथ आने का इशारा किया। समीर राय फौरन उठकर खड़ा हो गया, मेज पर रखा वह लिफाफा उठाया जिसमें चाकू व नींबू थे और अरूणिमा की मां के पीछे चल दिया। नफीसा बेगम ने भी उसके साथ चलना चाहा तो अरूणिमा की मां ने रूककर, हाथ के इशारे से उसे अपने पीछे आने से रोक दिया।फिर रजनी देवी ने समीर राय को 'सब्ज कालीन वाले कमरे में बैठाया। उसके बैठते ही अरूणिमा कमरे में दाखिल हो गई। समीर राय ने उसके सम्मान में उठकर खड़ा होना चाहा। अरूणिमा ने हाथ के इशारे से उसे बैठे रहने को कहा और फिर स्वयं भी उसके सामने गोल-तकिये का सहारा लेकर बैठ गई।अरूणिमा ने सिर पर काला दुपट्टा ले रखा था और उसमें उसका चेहरा चांद की तरह चमक रहा था। समीर राय को उसके चेहरे में अपनी नमीरा का चेहरा नजर आया था। क्षण भर के लिये उसकी सोच बहकी, लेकिन फिर उसने स्वयं को संभाल लिया। जब उसने अपनी नजरें नीची कर ली थी।अरूणिमा की निगाहें समीर राय के चेहरे पर टिकी रही, फिर वह बोली-"लाइये, राय साहब! चाकू और नीबूं..।“
समीर राय ने उससे नजरे नहीं मिलाई और लिफाफे से छ: चाकू और छ: नीबूं निकाल कर उसके कदमों में रख दिये
|अरूणिमा ने एक चाकू उठाकर उसे खोला। इस चाकू का फल लगभग चार इंच का था। सारे चाकू आकार व साइज में एक जैसे ही थे नये थे। अरूणिमा की हिदायत के अनुसार ही थे ।अरूणिमा ने चाकू को वस्ता, मुट्ठी में दबाकर अपनी हाथ ऊपर उठाया। कुद इस अंदाज में जैसे वह चाकू का फल कालीन में गाड़ देगी, लेकिन ऐसा न हुआ ।उसने चाकू हाथ में लिये-लिये समीर को हुक्म दिया-“एक नीबूं अपनी हथेली पर रख लो...हथेली मेरे सामने फैला लो... "
समीर राय ने नीबूं अपने हाथ पर रखा और हाथ उसके सामने कर दिया। जाने वह क्या करने वाली थी।
"समीर साहब...क्या आपको अपनी पत्नी से बहुत प्यार था..?" अरूणिमा ने अचानक सवाल किया। उसने चाकू वाला हाथ ऊपर उठाया था..और समीर राय का हाथ उसके सामने फैला हुआ था, जिसमें नीबूं था।"
जी हां...मुझे उससे बहुत प्यार है...।" समीर राय ने बड़ी सादगी से कहा।
"काश...आपने यह मुहब्बत उससे उसकी मौत से पहले की होती तो उस पर जो कयामत गुजरी है..शायद वह न गुजरती...'