Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा ) - Page 7 - SexBaba
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Horror अनहोनी ( एक प्रेत गाथा )

'"क्या है वह..?" नफीसा ने बेअख्तियार पूछा।"

आज बस इतना ही । आप अब दो दिन बाद आएं। हमें कुछ 'अमल' करने होंगे। अब इस मामले में हमारी खुद ही दिलचस्पी जाग उठी है।" यह कहते हुये वह उठ खड़ी हुई ।इस अरूणिता के चेहरे पर इस क्षण कुछ ऐसे भाव थे, जिन्हें नफीसा बेगम कोई नाम नहीं दे सकी। वह नफीसा बेगम के कुछ बोलने से पहले ही अन्दरूनी कमरे से अंदर चली गई थी।

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और फिर दो दिन बाद... जब नफीसा बेगम दोबारा अरूणिमा के पास पहुंची तो अरूणिमा ने कहा-"हमें छ: चाकू और छ: नींबू चाहिये...।

''कोई मसला नहीं..मिल जाएंगे...।" नफीसा बोली ।

लेकिन ये चीजें हमें 'बच्ची' के बाप को लाकर देनी होंगी। आपका बेटा यह छ: चाकू और छ: नींबू खुद अपने हाथों से खरीदे और खुद ही हम तक पहुंचाए...।" अरूणिमा ने आगे कहा ।

ठीक है...।" नफीसा सोचपूर्ण लहजे में बोली-“मैं कल समीर राय को लेकर आ जाऊंगी....।''

"दोपहर और संध्या के बीच के समय में यहां आएं। न पहले न बाद में...।" अरूणिमा ने हिदायत दी।

बेहतर...ऐसा ही होगा...।" नफीसा बेगम का सिर इकरार में हिला ।

'बस, तो फिर आप जाएं...।" अरूणिमा ने संजीदगी से कहा ।

नफीसा बेगम उसके पास थोड़ा और बैठना चाहती थी। वह नमीरा और बच्ची में सवाल करना चाहती थी...लेकिन अरूणिमा ने इसका मौका नहीं दिया। अपनी बात पूरी करके उसने उसे उठा दिया था। नफीसा बेगम दिल में हसरत लिए अरूणिमा के कमरे से निकल आई ।बाहरी कमरे में लोगसरी बैठी थी। वह मालकिन को देखकर फौरन खड़ी हो गई। कुछ देर बाद ही वे दोनों गाड़ी में बैठी रोशन गढ़ी की तरफ लौट रही थीं |समीर राय हवेली में अपनी मां का बड़ी बेचैनी से इंतजार कर रहा था। नफीसा बेगम ने उसे अरूणिमा से अपनी मुलाकात के बारे में बता दिया था और जबसे उसने अपनी मां से यह सुना था कि उसकी बच्ची जिन्दा है...उसे मिल सकती है.तब से उसके अंदर एक नया समीर राय अंगड़ाई लेकर उठ बैठा था।उसकी बेकरारी देखने वाली थी। वह तो अपनी मां के साथ इस नजूमी युवती 'अरूणिमा से मिलने जाना चाहता था, लेकिन नफीसा बेगम ने ही मना कर दिया था...क्यों कि अरूणिमा एक लड़की थी..जाने वह समीर राय के सामने आना पसन्द करे या न करे |हालात की यह करवट भी समीर राय को उद्धेलित कर गई थी। बच्ची के जिन्दा होने की खबर ने तो उसके जिस्म में जैसे एक नई रूह फूंक दी और वह नमीरा को भूल गया था। अब वह अपनी बच्ची के लिये बेकरार था। वह बच्ची उसका अपना खून थी...उसकी नमीरा की निशानी थी। नमीरा न रही तो कम-से-कम उसकी यह निशानी ही मिल जाए। वह इंतजार कर रहा था कि यह अरूणिमा उसकी बच्ची के बारे में आज क्या बताती है।नफीसा बेगम हवेली पहुंची तो समीर राय का धैर्य जवाब दे चुका थां नफीसा बेगम ने कमरे में आ सांस भी लिया था कि समीर राय ने पूछा-"अम्मी क्या रहा? उस नजूमी लड़की ने क्या कहा?

"नफीसा बेगम ने उसे बताया कि अरूणिमा ने क्या चीजें मांगी हैं।अरूणिमा की मांग कोई बड़ी मांग न थी।अगले ही दिन व निश्चित समय पर समीर राय छ: चाकू व छ: नींबू लेकर अरूणिमा के घर पहुंच गया। नफीसा बेगम भी साथ थी। अरूणिमा की मां, रजनी देवी ने उन दोनों को ड्राइंगरूम में बैठाया और खुद अंदर चली गई।कुछ देर बाद वह अंदर से वापिस आई और उसने समीर राय को अपने साथ आने का इशारा किया। समीर राय फौरन उठकर खड़ा हो गया, मेज पर रखा वह लिफाफा उठाया जिसमें चाकू व नींबू थे और अरूणिमा की मां के पीछे चल दिया। नफीसा बेगम ने भी उसके साथ चलना चाहा तो अरूणिमा की मां ने रूककर, हाथ के इशारे से उसे अपने पीछे आने से रोक दिया।फिर रजनी देवी ने समीर राय को 'सब्ज कालीन वाले कमरे में बैठाया। उसके बैठते ही अरूणिमा कमरे में दाखिल हो गई। समीर राय ने उसके सम्मान में उठकर खड़ा होना चाहा। अरूणिमा ने हाथ के इशारे से उसे बैठे रहने को कहा और फिर स्वयं भी उसके सामने गोल-तकिये का सहारा लेकर बैठ गई।अरूणिमा ने सिर पर काला दुपट्टा ले रखा था और उसमें उसका चेहरा चांद की तरह चमक रहा था। समीर राय को उसके चेहरे में अपनी नमीरा का चेहरा नजर आया था। क्षण भर के लिये उसकी सोच बहकी, लेकिन फिर उसने स्वयं को संभाल लिया। जब उसने अपनी नजरें नीची कर ली थी।अरूणिमा की निगाहें समीर राय के चेहरे पर टिकी रही, फिर वह बोली-"लाइये, राय साहब! चाकू और नीबूं..।“

समीर राय ने उससे नजरे नहीं मिलाई और लिफाफे से छ: चाकू और छ: नीबूं निकाल कर उसके कदमों में रख दिये

|अरूणिमा ने एक चाकू उठाकर उसे खोला। इस चाकू का फल लगभग चार इंच का था। सारे चाकू आकार व साइज में एक जैसे ही थे नये थे। अरूणिमा की हिदायत के अनुसार ही थे ।अरूणिमा ने चाकू को वस्ता, मुट्ठी में दबाकर अपनी हाथ ऊपर उठाया। कुद इस अंदाज में जैसे वह चाकू का फल कालीन में गाड़ देगी, लेकिन ऐसा न हुआ ।उसने चाकू हाथ में लिये-लिये समीर को हुक्म दिया-“एक नीबूं अपनी हथेली पर रख लो...हथेली मेरे सामने फैला लो... "

समीर राय ने नीबूं अपने हाथ पर रखा और हाथ उसके सामने कर दिया। जाने वह क्या करने वाली थी।

"समीर साहब...क्या आपको अपनी पत्नी से बहुत प्यार था..?" अरूणिमा ने अचानक सवाल किया। उसने चाकू वाला हाथ ऊपर उठाया था..और समीर राय का हाथ उसके सामने फैला हुआ था, जिसमें नीबूं था।"

जी हां...मुझे उससे बहुत प्यार है...।" समीर राय ने बड़ी सादगी से कहा।

"काश...आपने यह मुहब्बत उससे उसकी मौत से पहले की होती तो उस पर जो कयामत गुजरी है..शायद वह न गुजरती...'
 
"मुझे अपनी लापरवाही का अच्छी तरह अहसास है।" समीर ने ठण्डी सांस ली-"मैं शर्मिन्दा हूं। मैं क्या करूं, गया वक्त तो वापिस नहीं आ सकता। मैं अगर उसे अपनी जिन्दगी देकर भी वापिस ला सकू तो वह मेरी खुशकिस्मती होगी... '

'समीर साहब...! जिस तहर गया वक्त वापिस नहीं आ सकता...उसी तरह जाने वाले भी कभी लौटकर नहीं आते.. । अरूणिमा बोली ।"

अभी कुछ दिन पहले मैंने अपनी नमीरा को देखा था। आखिर वह कौन थी?" समीर राय ने पूछा।

फिलहाल इतना सुन लें कि आपकी नमीरा मर चुकी है...और आप इस हकीकत पर यकीन कर लें। रहा यह प्रश्न कि फिर आपने नमीरा के रूप में किसको देखा..वह वक्त आने पर बताया जाएगा... | अरूणिमा में जवाब दिया, उसका हाथ वैसे ही उठा हुआ था..कुछेक क्षणों बाद वह आगे आकर बोली-"फिलहाल आप अपनी बच्ची को फिक करें।

"मुझे बताएं, वह कहां है...?" समीर राय की बेताबी जाग उठी-" उसके लिए मुझे पाताल में भी जाना पड़ा तो जाऊंगा...।"

वह शैतान प्राणियों के संरक्षण में हैं। आप उनका कुछ न बिगाड़ पाएंगे...।

"फिर...फिर मेरी बच्ची मुझे किस तरह मिल सकेगी.?"

"हम मिलाएंगे उसे आपसे...।" अरूणिमा शून्य में निहारते बोली-"भगवान ने चाहा तो बच्ची दो दिन के अन्दर आपकी हवेली में पहुंच जाएगी। यह बड़ा अनूठा दावा था। समीर राय ने अपनी बच्ची के आगे की भविष्यवाणी सुनी तो खुशी में कुद कहना चाहा। लेकिन अरूणिमा ने फौरन उसे रोक दिया। वह बोली-"बस, अब कोई प्रश्न नहीं...। इसके बाद वह भी खामोश हो गई। अब उसकी नजर चाकू की नोंक पर थी और उसका हाथ धीरे-धीरे नीचे की तरफ आ रहा था। उसके होठ हिल रहे थे. लेकिन वह क्या पढ़ रही थी, यह सुनाई नहीं दे रहा । था।और फिर..जब समीर राय की हथेली पर रखे नींबू और चाकू की नोक के बीच तीन इंच का फासला रह गया तो अचानक नींबू ऊपर उठा व चाकू में पैवस्त हो गया या यूं कहिये कि चाकू नींबू में घुस गया।"

देखो, तुम्हें समीर राय साहब की बेटी को उनसे मिलाना है...।" अरूणिमा ने नींबू पर नजर जमाये कहा..वह न जाने किससे सम्बोधित थी।उसी क्षण नींबू के अंदर से दो कतरे खून के निकलें। वह खून बहकर थोड़ा-सा ही नीचे आया था कि जम गया।

"शाबाश... |" अरूणिमा ने खुश होकर कहा और चाकू में पैवस्त नींबू को, चाकू साहित एक बड़ी प्लेट में रख दिया ।इसके बाद अरूणिमा ने तमाम नींबुओं पर यही अमल दोहराया और फिर चाकुओं से भरी उस प्लेट को उठाया और खड़ी हो गई।उसे खड़े होते देख, समीर राय भी उठ खड़ा हुआ।“समीर साहब...अब आप इत्मीनान से अपनी हवेली जाएं, दो दिन बाद यानि शुक्रवार की सुबह को अपनी बच्ची भी हवेली में पहुंच जाएगी। अब आप तशरीफ ले जाएं...।"यह भविष्यवाणी कर उसने समीर के जवाब का इंतजार नहीं किया..फौरन कमरे से निकल गई।

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समीर रायक के लिये यह दो दिन जैसे कयामत बन गये। काटे नहीं कट रहे थे।वह बार-बार अपनी मां से सवाल करता-'अम्मीजान! क्या वाकई मेरी बेटी आ जाएगी?"नफीसा बेगम जवाब देती-"क्यों नहीं बेटे! जब अरूणिमा ने कह दिया है तो जरूर आ जाएगी। ऐसे मामलों में उसका बहुत नाम है, बेटे । लेकिन समीर राय को विश्वास ही नहीं आता था, पर वह चमत्कार देख चुका था। यह अरूणिमा किशोरी-सी दिखती, नवयौवना ही थी...फिर वह कैसे ऐसी 'पहुंची हुई' बन गई। फिर चाकू और नींबू का मामला..? नींबू किस तरह उठकर चाकू में जा घुसा था और किस तरह खून के कतरे निकले थे।यह सब तो समीर राय के सामने ही हुआ था। आंखिन देखी को कैसे झुठलाया जा सकता था?इस अरूणिमा के बारे में अब तो जाने कहां-कहां से क्या-क्या सुना था। उसे चमत्कारी तांत्रिक माना जाता था। इस उम्र में भी उसने बड़े-बड़े चमत्कार कर दिखाये थे। दूर-दूर तक उसके मुरीद फैले हुए थे। कईयों को बड़ी भयावह परिस्थितियों से मुक्ति दिलाई थी उसने। कितनों के जाने कैसे-कैसे बिगड़े काम संवारे थें उसने अरूणिमा अपने आपमें कम रहस्यमयी न थी। बहरहाल, वह दुखियों व पीड़ितों की सेवा कर रही थी और इस सिलसिले में किसी से एक पैसा भी कबूल नहीं करती थी।
 
अरूणिमा के पिता का देहान्त हो चुका था। वह अपने मां-बाप की इकलौती संतान थी। उसकी मां रजनी देवी एक स्कूल में टीचर थी। खासी तनख्वाह थी.कुछ वह ट्यूशनें पढ़ा लेती थी। गुजार मजे से चल रहा था अरूणिमा स्वयं सैकेन्ड इयर में पढ़ रही थी। जब वह कालेज जाती तो एक नार्मल लड़की होती। कालेज में उसके बारे में कोई नहीं जानता कि वह 'रूहानी ताकतों' की मालिक है। वह अपने बारे में कोई चर्चा नहीं करती थी। अपने पास आने वालों को भी ताकीद करती थी कि उसकी चर्चा न करे। पर यह होता नहीं था। जिस किसी को भी वह उसके संकट से उबारती...वह किसी-न-किसी मुसीबत के मारे को लेकर पहुंच ही जाता था।नफीसा बेगम भी तो इसी तरह उस तक पहुंची थी। खुदा का शुक था कि इस चमत्कारी लड़की ने खुद दिलचस्पी लेकर समीर राय की बेटी को हासिल करने में अपनी सहायता का वचन दे डाला था.वरना वह तो कभी-कभी अपने पास आने वालों को कोरा जवाच भी दे देती थी।

समीर राय के ये दो दिन बड़ी मुश्किल से कटे थेफिर शुक्रवार की सुबह हुई...यह रात समीर राय हवेली में चकराता ही रहा। उसने पूरी रात जागकर गुजारी थी..आखिर उसकी बेटी आ रही थी। वह बेटी, जिसके मिलने की कोई उम्मीद न रही थी। समीर राय ने तो उसकी मौत का यकीन भी कर लिया था। एक दिन की बच्ची..जिसे ऊंट पर लादकर रेगिस्तान में छोड़ दिया जाए..वह भला किस तरह जीवित रह सकती थी। लेकिन मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है। जिसे खुदा जिन्दा रखना चाहे, उसे भला कौन मार सकता है ।समीर राय ने हवेली का बड़ा दरवाजा खुलवा दिया था। चौकीदार से कह दिया था कि अगर कोई बच्ची नजर आये तो उसे अंदर आने दिया जाये। पौ फटते ही वह खुद हवेली की असली इतास्त के दरवाजे पर बैठ गया।

हवेली का बाहरी मुख्यद्वार सामने था। नफीसा ने उसे दरवाजे के सामने बरामदे की सीढ़ियों पर बैठे देखा तो उसके लिए अंदर से कुर्सी मंगवाई और फिर वह खुद भी उसके साथ ही एक कुर्सी पर बैठ गई।अरूणिमा ने बच्ची के आने का कोई निश्चित वक्त नहीं बताया था...बस इतनी भविष्यवाणी ही की थी कि बच्ची शुक्रवार की सुबह को हवेली पहुंच जाएगी।इस वक्त सुबह पूरी तरह हो चुकी थी। अच्छा खासा सूरज निकल आया था। हर तरफ उजाला फैला हुआ था।समीर राय टकटकी बांधे आंखें भी अपनी पौत्री को देखने को प्रतीक्षारत थीं।

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बरहा पीपल के पेड़ के नीचे एक 'सीढ़ी' पर बैठी थी।देवांग की मां पार्वती...बाल्टी से खाली प्यालों में दूध डाल रही थी। बरहा बड़ी दिलचस्पी से पार्वती का वह शुगल देख रही थी। सुबह का वक्त था...अंधरा धीरे-धीरे छंट रहा था ।पार्वती जब सारे प्यालों में दूध भर चुकी तो उसने खाली बाल्टी रसोई में जाकर रखी रखी व वापिस पेड़ के नीचे आई। उसने मुस्कुराकर बरहा की तरफ देखा, पूछा- "तमाशा देखेगी..?"

हां...।" बरहा ने अपनी खूबसूरत आंखों से बुढ़िया की तरफ देखकर कही पार्वती ने फौरन अपनी लाठी जोर-जोर से तीन बार जमीन पर बजाई वे बड़े प्यार से बोली-“जाओं, बच्चों... ।" उसका यह आवाज लगाना था कि विभिन्न स्थानों से छोटे-बड़े सांप लहराते हुए उन दूध भरे प्यालों की तरफ बढ़े।

इन सांपो को देखकर बरहा को जाने क्या शरारत सूझी कि उसने बूढ़ी पार्वती के लहजे की नकल करते हुये कहा-"आओ, बच्चों... ।' 'बरहा की आवाज ने उन सांपो को चौंका दिया और वे प्यालों की तरफ बढ़ते-बढ़ते रूक गये। सारे सांपों ने बरहा को अपनी चमकती आंखों से देखा और दूध पीना भूलकर बरहा की तरफ बढ़े और उसकी पीढ़ी के गिर्द चक्कर लगाने लगे।पार्वती ने जब इन सांपों को बरहा के गिर्द चक्कर लगाते देखा तो उसे खुद चक्कर आ गये तब बरहा खिलखिला कर हंसी और उसी अंदाज में बोली-“देखा..तमाशा।

"हां, देखा... ।" पार्वती ने मुस्कुराते हुए कहा। उसकी आंखों में बरहा के लिए प्यार था-"तू वाकई परमान का चुनाव है...तेरा जवाब नहीं...

"जाओ, बच्चों दूध पीओ... ।" बरहा ने उन सांपों को मुखतिब करते कहा, तो वे लहराते हुए अपने-अपने प्याले की तरफ बढ़ गये।देवांग इस वक्त घर पर नहीं था। उर्वशी कुछ सामान लेने बाजार गई हुई थी। यानि कि इस वक्त घर में बरहा और पार्वती के सिवा कोई नहीं था ।अभी वे सांप प्यालों में मुंह डाले दुध पी रहे थे कि किसी ने दरवाजे की कुण्डी बड़े जोर से खटखटाई ।

“बरहा दरवाजा खोल। देख, उर्वशी लौट आई होगी...।"पार्वती ने कहा ।बरहा उछलती-कूदती दरवाजे की तरफ बढ़ गई। उसने दरवाजे के बीच लगी जंजीर खोली। जंजीर खुलते ही किसी ने दरवाजे को धक्का दिया और दरवाजे के सामने खड़ी बरहा का हाथ पकड़ कर बाहर खींच लिया ।बूढ़ी पार्वती को अचानक खतरे का अहसास हुआ। वह जल्दी-जल्दी लाठी टेकती दरवाजे की तरफ बढ़ी। वो जब तक दरवाजे पर पहुंची उस वक्त तक वारदात हो चुकी थी। खेल खत्म हो चुका था। गली सुनसान पड़ी थी। वहां दूर तक कोई नहीं था ।पार्वती 'धक्क' से रूक गई। यह क्या हुआ? बरहा परमान की पसन्द और उसकी अमानत थी। कोई वह अमानत उनके घर के दरवाजे से उठा ले गया था। आखिर कौन था वह? वह पार्वती न देख पाई थी।

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वह एक बलिष्ठ व फुर्तीले जिस्म का मालिक था।सफेद चमकता हुआ चेहरा...काली खूबसूरत दाढ़ी.बड़ी-बड़ी आंखे...सुख लिबास..वह मजबूत शख्स बरहा को अपने कंधे पर डाले तेजी से दौड़ रहा था। वह यूं ही दौड़कर बस्ती से दूर दरिया के किनारे पहुंचा |फिर वह नूरानी चेहरे वाला सुर्खपोश दरिया में उतर गया। बरहा उसके कंधे पर बेसुध पड़ी थी। इस बरसाती नदी में अधिक पानी नहीं था। वह तेज-तेज चलता नदी पार करने लगा |जब वह दूसरे किनारे पर पहुंचा तो अचानक उसकी नजर सामने खड़े एक शख्स पर पड़ी। उसका उस्तरा फिरा सिर था जो सफेद चादर में लिपटा हुआ था। हाथ में एक लोहे की जंजीर थी। वह देवांग था। वह बड़ी खूखार नजरों से इस सुर्ख लिबास वाले को देख रहा था जो बरहा को कन्धे पर डाले दरिया से बाहर निकलने को था ।इससे पहले कि वह लाल लिबास वाला नदी से बाहर निकलता, देवांग ने आगे बढ़कर उस लाल लिबास वाले पर अपनी जंजीर से वार किया। अगर लोहे की वह भारी जंजीर उस लाल लिबास वाले कि सिर पर पड़ जाती तो उसका सिर यकीनन फट जाता...लेकिन वह लाल लिबास वाला उसे देखते ही होशियार हो चुका था ।सुर्ख लिबास वाले ने जंजीर के वार को अपने हाथ पर रोक लिया। न सिर्फ रोक लिया बल्कि उसने जंजीर को पकड़कर एक जोरदार झटका दिया। देवांग को इसकी आशा नहीं थी। वह अपनी जंजीर के साथ नदी में आ गिरा ।वह लाल लिबास वाला बड़ी फुर्ती से नदी से निकला और इससे पहले कि देवांग नदी से निकलकर दोबारा वार करता...वह तेजी से जंगल की तरफ दौड़ने लगा। वह लाल लिबास वाला हवा-वेग से दौड़ रहा था। यूं जब देवांग नदी से निकलकर ऊपर किनारे पर आया, तब तक वह लाल लिबास वाला जंगल में घुस गायब हो चुका था ।उसे कहीं न देख, देवांग की जान निकल गई।

वह परमान की अमानत की सुरक्षा ठीक से नहीं कर पाया था। वह तो सोच भी नहीं सकता था कि कोई बरहा को इस तरह उठाकर ले जाएगा। आखिर यह शख्स था कौन? उसने परमान के चुनाव पर हाथ डालने की जुर्रत कैसे की |पर यह वक्त यह सब सोचने का नहीं था। वह तेजी से दौड़ता हुआ जंगल में प्रवेश कर गया कि वो किसी बरहा को इस आसानी से तो नहीं ले जाने दे सकता था ।परन्तु जंगल में प्रवेश कर देवांग ने आंखें फाड़-फाड़ चारों तरफ देखा। जंगल के बाहर तो थोड़ा उजाला था...लेकिन यहां तो थोड़ी रोशनी भी न थी और ऐसा घने पेड़ों के सबब था। उसके हाथ-पांव फूल गए। कुछ समझ में नहीं आया कि क्या करे? किस तरफ जाए? जंगल में तो सैकड़ों रास्ते थे और वह लाल लिबास वाला जिस तेज रफ्तारी से जंगल में घुसा था...वो तो न जाने किस रास्ते पर कितना अंदर जा चुका होगा?किसी अनजान दिशा में उसका पीछा करना व्यर्थ था ।यह वक्त तत्काल ही कोई फैसला करने का था। उसे परमान को मदद के लिए पुकार लेना चाहिये कि अगर उसे ज्यादा देर हो गई तो वह बरहा को पा न सकेगा। यही सोचकर वह एक पेड़ के तने की तरफ बढ़ा ।देवांग ने कुछ अजीब से ऊल-जलूल शब्द अपने मुंह से निकाले और जंजीर को जोर-जोर से पेड़ के तने पर रगड़ा ।पेड़ से फौरन चिंगारियां निकलने लगीं।अब देवांग बड़े दर्द भरे लहजे में चीखा-"परमान मदद...परमान मदद.. !

और कुछ ही क्षण बीते थे कि हूरा उसके सामने आ खड़ा हुआ। देवांग को ऐसा लगा जैसे हूरा उसी पेड़ से कूदा हो।“मैं हूं हूरा...।" उसने प्रगट होते ही नारा लगाया।

हूरा...वो एक सुर्ख लिबास वाला बरहा को उठाकर भाग रहा है...!" देवांग असहाय चीखा। क्या...?

हाय, देवांग तूने यह क्या किया।" हूरा उसे घूरते बोला-"अच्छा, मेरे साथ आ...।"

उसने देवांग का हाथ पकड़ लिया-"किधर गया है वो...?"

"मैंने उसे जंगल में दाखिल होते देखा था...।" देवांग ने बताया \

हरा ने उससे कोई सवाल नहीं किया। उसने अपने कंधे पर लटकी घन्टी उतारी और उसे तीन बार बजाया और फिर घन्टी में झांकने लगा, घन्टी के अन्दर उसे जाने क्या नजर आया कि उसने देवांग का हाथ पकड़ लिया और बोला-"भाग देवांग..!"फिर हूरा उसे लेकर जंगल में भागने लगा ।दो-चार मिनट में ही देवांग हांफने लगा। हूरा इस कदर तीव्र गति से भाग रहा था कि देवांग उसका साथ नहीं दे पा रहा था...हालांकि हूरा न दौड़ रहा था और ना ही तेज चल रहा था..इसके बावजूद धरती उसके पैरों के नीचे से खिसक रही थी।हूरा ने उसे हांफते देखा तो उसका हाथ छोड़ दिया।

"देवांग, तू मेरी घन्टी की आवाज पर पीछे आ...मैं आगे चलात हूं। वो 'हुर्रा बहुत तेज रफ्तार से दौड़ रहा है।" यह कहकर हूरा ने जंजीर में बंधी घन्टी जोर से जमीन पर मारी.. रेत का एक बादल-सा उठा और हूरा आंखों से ओझल हो गया। घन्टी की आवाज धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।देवांग इस आवाज पर सरपट दौड़ने लगा।

वो लाल लिबास वाला जो जंगल में काफी अंदर निकल आया था। उसे अचानक खतरे का अहसास हुआ तो वो एक पेड़ के नीचे रूक गया ।उसने जल्दी से अपने कुर्ते के बटन खोलकर गले में पड़ा 'ताबीज' अपने हाथ में लिया और जल्दी-जल्दी कुछ पढ़कर जैसे अपने आपसे बोला-"खलस बढ़ रहा है...दोस्त तुम कहां हो...?"

"हम यहां हैं तुम्हारे पास...।“जवाब मिला और वे एक-एक करके आनन-फानन में ही उसके सामने प्रगट हो गये।वे पांच थे और उनका हुलिया भी वही था जो इस लाल लिबास वाले का था। शक्लें भी मिलती-जुलती थीं। यही लगता था जैसे वे सगे भाई हों।

"दोस्तों, मैं इस लड़की को लेकर निकलता हूं। तुम उस 'शैतान' का इंतजार करो। देखो, वो मेरे पीछे न आने पाये...।"

बरहा को सम्भाले हुए, सुर्खपोश बोला।

"ठीक है, तुम जाओ। हम देखते हैं उस मनहूस को। वह हमारे हाथों से निकलकर आगे नहीं जा सकेगा। तुम निश्चिन्त होकर अपना सफर जारी रखो...।" उन चारों में से एक ने कहा।

फिर पहले वाले 'सुर्खपोश' ने समय नष्ट करना उचित नहीं समझा और बरहा को लेकर पहले की तरह विधुतीय गति से दौड़ने लगा।अभी उसे आगे बढ़े कुछ ही देर हुई थी कि वो 'मनहूस' वहां आ पहुंचा। उन पांचों ने उसकी घेराबंदी कर दी थी। पहले चरण में एक 'सुर्खपोश (लाल लिबास वाला) ने एक पेड़ की आड़ से अपनी टांग निकाल कर अड़ाई।हूरा धाड़ से मुंह के बल जमीन पर गिरा |उसे अपनी ताकत पर बड़ा घमण्ड था,

और हकीकत में कोई अगर उसके मुकाबले पर आता तो वो उसे मच्छर की तरह मसल दिया करता था। ऐसा पहली बार हुआ था कि किसी ने टांग अड़ाई थी और धूल चटा दी थी ।वो गिरते ही तेजी से उठा..बड़ी फुर्ती से पलटा और उसने वह जंजीर हाथ में ले ली जिसमें घन्टी बंधी थी। उसने जंजीर को गुस्से में कुछ इस तरह झटका दिया कि घन्टी बुरी तरह बज उठी। कौन है? किसने अपनी मौत को दावत दी है। आओ, सामने आओ... |

और वो सुर्खपोश जिसने उसे अड़गा मारकर गिराया था..वो पेड़ की ओट से निकल आया। दोनों में एक-दूसरे के सामने आकर एक-दूसरे को घूरा ।

किस बस्ती का है तू.?" हूरा ने उसके हुलिये पर नजर मारकर पूछा।

भगवान की बस्ती का..उस सर्वशक्तिमान का एक तुच्छ सेवक..।" सुर्खपोश ने इत्मीनान से जवाब दिया।

बरहा को किस लिए अगवा किया गया है?" हुरा ने गुस्से से पूछा । जंजीर में लटकी घन्टी बार-बार रही थी।"

हमने अगवा नहीं किया। हमने तो शैतानों से उसे छुड़ाया है। मुक्त कराया है उस मासूम बच्ची को। वह किसी की अमानत है...।" सुर्खपोश ने जवाब दिया। उसकी नजरें हूरा के साथ-साथ अपने साथियों को भी देख रही थीं...जो पीछे से हरा के गिर्द अपना घेरा तंग कर रहे थे।

"क्या बकता है.? वह सिर्फ परमान की अमानत है... उसका चुनाव है। उसे परमान से कोई नहीं छीन सकता ।जाओ...वह बच्ची फौरन मेरे हवाले कर दो, वरना...देख लो मौत तुमसे ज्यादा दूर नहीं है..।" हूरा ने धमकी दी।

धमकी मत दे, खब्बीस! वह बच्ची तो यहां से बहुत दूर जा चुकी ।

"नहीं... ।” कहते हुए हूरा ने जंजीर घुमाई।इससे पहले कि वह घन्टी सामने खड़े 'सुर्खपोश' के सिर पर लगली...पीछे खड़े एक सुर्खपोश ने वह जंजीर हूरा के हाथ से छीन ली और एक भी क्षण गंवाये बिना घुमाकर हूरा के ही सिर पर दे मारी। पीतल की भारी घन्टी जब हूरा के सिर पर पड़ी तो उसने अपने सिर में आग भरती हुई महसूस की...उसकी आंखों के सामने अंधेरा-सा छा गया ।उस सुर्खपोश ने एक ही वार पर बस नहीं किया था, उसने दो-तीन घन्टियां और हूरा के सिर पर मारी । हूरा किसी शहतीर की तरह जमीन पर आ रहा और अपने होश गंवा बैठा।उस सुर्खपोश ने घन्टी वाली जंजीर हूरा के चौड़े-चकले सीने पर डाल दी और सामने खड़े सुर्खपोश की तरफ देखा जिसने अड्गी मारकर हूरा को गिराया था।वो सुर्खपोश खामोश खड़ा जैसे कुछ सुनने की कोशिश कर रहा था।

"कोई दौड़ता हुआ इस तरफ आ रहा है..हालांकि अभी वो कुछ फासले पर है..।" उसने अपने साथियों को बताया।

"ठीक है...उसे भी आने दो। उसे भी ठिकाने लगाने के बाद वापिस चलेंगे...। फिर वे पांचों बेसुध हूरा के इर्द-गिर्द ही पेड़ों के पीछे छिप कर बैठ गये और आने वाले का इंतजार करने लगे कुछ ही देर बीती थी कि पेड़ों की ओट से देवांग बाहर आया। वह यथासम्भव तेजी से दौड़ता हुआ आ रहा था। उसने जमीन पर पड़े हुए हूरा को देखा तो उसकी सिट्टी गुम हो गई। हूरा चारों खानों चित बेहोश पड़ा था और उसकी घन्टी उसके चौड़े-चकले सीने पर रखी थी। यह देखकर उसकी आंखें फट चली कि हूरा के फटे हुए सिर से खून बहकर जमीन को 'नीला' कर रहा है। खौफ की एक जहर देवांग के अंदर उठी और उसने घबराकर चारों तरफ देखा। उसे आसपास कोई नजर नहीं आया। उसने राहत की सांस ली और सोचने लगा कि अब क्या करें? उल्टे कदमों वापिस अपनी बस्ती चला जाये या फिर बच्ची को उठा ले जाने वाले का पीछा करे?पीछा करने का परिणाम तो उसके सामने जमीन पर जख्मी हालत में पड़ा था...अब एक ही रास्ता था कि वापिस लौट जाए। वह वापिस जाने कि लिये मुड़ने को ही था कि उसकी नजर अचानक एक सुर्खपोश पर पड़ी जो मुस्कुराते हुए एक पेड़ के तने के पीछे से नमुदार हो रहा था ।फिर देवांग की नजरें एक जगह न ठहर सकीं...क्योंकि एक सुर्खपोश दाएं से एक पेड़ की ओट से बाहर आ रहा था..तो दूसरा सामने से चला आ रहा था। कोई पेड़ से कूद रहा था तो कोई बायीं तरफ से मुसकुराता हुआ उसके सामने आ रहा था। वो देखता भी तो किधर-किधर देखता?कुछ ही क्षणों में वे पांचों के पांचों उसके सामने थे ।देवांग को पसीने छूट गये।
 
वो हूरा का अंजाम देख चुका था और हूरा की तुलना में तो वो खुद कुछ भी नहीं था। उसने निकल भागने के लिए इधर-उधर नजरें दौड़ाईं, लेकिन उन पांचों ने उसके गिर्द कुछ इस तरह घेरा तंग किया था कि वो उनके घेरे से निकल कर नहीं भाग सकता था। हां, एक रास्ता था कि वो किसी बंदर की तरह छलांग मारकर पेड़ पर चढ़ जाये। पर वो बंदर कहां था।

"हां, भाई। अब तू क्या चाहता है? इस देव का तो हग्न तूने देख लिया?" एक सुर्खपोश ने हंसते हुए पूछा।

मैं कुछ नहीं चाहता...मैं वापिस अपनी बस्ती जाना चाहता हूं।" देवांग ने घिघियाकर कहा ।

"ठीक है..अगर तू वापिस जाना चाहता है..तो हम तुझे कुछ न कहेंगे। जा, तू वापिस चला जा, और हां, अपने इस लम्बू को भी अपने कंधे पर डालकर ले जा। वरना यहां पड़ा-पड़ा यह मर जाएगा... " एक सुर्खपोश ने उसे जैसे हुक्म सुनाया था।

आओ दोस्तो चलो...।" दूसरा सुर्खपोश बोला ।और फिर वो जिस तरह प्रकट हुए थे, कुछेक क्षणों में वैसे ही गायब भी हो गये। देवांग उन्हें देखता ही रहा गया।

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बाप और दादी, उस बच्ची की बेचैनी से प्रतीक्षक थे, जिसके बारे में अरूणिमा ने भविष्यवाणी की थी कि वह शुक्रवार की प्रातः को उसकी हवेली पहुंच जाएगी और इसके लिए उसने अपने तांत्रिक अमल के बाद किसी अदृश्य शक्ति को आदेश भी दिया था कि ऐसा होना ही चाहिये ।अब आठ बज रहे थे। सूरज काफी चढ़ आया था और उन्हें यानी नफीसा बेगम और समीर राय को हवेली के दरवाजे पर बैठे और बाहरी दरवाजे पर नजरें टिकाये, आने वाली की राह तकते बहुत देर हो चुकी थी।यह सुबह तेजी से बीत रही थी, बीत रही थी और समीर राय क दिल पर निराशा के बादल छाते जा रहे थे। वह कभी बाहरी मुख्य गेट को देखता था और कभी अपनी मां की तरफ देखने लगता था। मां, जिसने उम्मीद का दामन न छोड़ा था, मुस्कुरा देती। उसकी ममतामयी मुस्कान समीर को हौसला देती थी...पर आखिर कब"मेरा ख्याल है अम्मी...हम अपना वक्त जाया कर रहे हैं। हवेली के नौकर-चाकर हमारे बारे में जाने क्या सोच रहे होंगे... ।“समीर राय ने अंततः कहा।

"नहीं समीर, ऐसा मत सोचो । उस अरूणिमा ने कहा है तो तुम्हारी बच्ची मेरी पौत्री हमारे पास जरूर वापिस आएगी।" नफीसा बेगम ने विश्वास के साथ ही उसे समझाने की कोशिश की।

अभी वे आशा-निराशा की ये बातें ही कर रहे थे कि समीर राय की नजरें बाहरी गेट की तरफ गईं और वह उछल पड़ा। एक बहुत प्यारी-सी...बहुत खूबसूरत बच्ची गेट से दाखिल हो चुकी थी।"अम्मी, उधर देखो...।" समीर चीख ही तो उठा था-"मेरी बच्ची आ गई...मेरी बच्ची आ गई। अम्मी आपकी पौत्री आ गई...

'"हा..हा...वही है..यह यकीनन मेरी पौत्री है।" नफीसा बेगम की आंखें भर आई ।बरहा बड़ी तेजी से सीधी दौड़ी चली आ रही थी। समीर राय बेअख्तयार होकर उकसी तरफ बढ़ा। नफीसा बेगम भी पीछे कहां रही थी। बरहा ठिठकी और अपनी तरफ भागकर आते देख समीर को घूरने लगी। समीर ने खुद को सम्भाला और फिर धीरे-धीरे चलता बरहा से पांच कदम के फासले पर आ रूका। मेरी बच्ची...।" समीर ने अपनी बांहें फैला दी थी.वह फिर आगे बढ़ा-"तुम यकीनन मेरी बच्ची हो...।"

"आप कौन हैं..?" बरहा ने बड़ी मासूमियत से सवाल किया।

"मैं तुम्हारा बदनसीब बाप हूं..तुम्हारा बाबा हूं, बेटी...।'' उसने लपक कर बरहा को अपनी बांहों में उठा लिया और उसे बेतहाशा चूमने लगा।

बरहा ने भी अपनी नन्हीं बाहें उसकी गर्दन के गिर्द डाल दी थीं और बरहा अब निकट आती नफीसा बेगम को निहार रही थी।"यह कौन है...?" बरहा ने मासूमियत से पूछा।

"यह तुम्हारी दादी हैं, बेटा...।" समीर प्यार से बोला ।

"यह दादी क्या होता है..?" बरहा के मासूम सवाल बढ़ते ही जा रहे थे।

मेरी जान... । यह मेरी मां हैं..तुम्हारी दादी... "

"अच्छा... ।” बरहा ने समझने वाले अंदाज में गर्दन हिलाई...जैसे इस रिश्ते को समझ गई हो।

नफीसा बेगम निकट आ चुकी थी। उन्होंने बच्ची को समीर से झपट लियां'मेरी बच्ची. मेरी जान. । आज! आज मैं कितनी खुश हूं...।" वह खुशी से पागल हो रही थी |समीर ने उसे फिर मां से ले लिया और उसके फूल से गाल पर प्यार करते हुए पूछा-'बेटी तुम्हारा नाम क्या है...?"

"बरहा...।" उसने अपना नाम बताया, उसकी आवाज भी तो बड़ी प्यारी थी..मधुर थी। जैसे संगीत लहरी।

बरहा..." समीर राय ने जरा हैरत से दोहराया। उसे यह नाम अजीब-सा लगा था-"तुम्हारा यह नाम किसने रखा..?"

"परमान ने...।'' वह बोली।

''यह परमान कौन है...?"

"वह 'बुतों का राजा' है...सांपो का बादशाह है....।" बरहा ने बताया।

“सांपों का बादशाह..."समीर हैरान हुआ।

"हां, सर्पराज!" बरहा ने जैसे खुलकर समझाया-"उसके सिर पर एक सुनहरा सांप हर वक्त कुण्डली मारे बैठा रहता है और परमान एक बहुत बड़े कमरे में 'बुतों' से खेलता रहता है...।"

"तुम कहां रहती थीं..?"

"मैं नहीं जानती । बस इतना जानती हूं कि वहां सांप ही सांप थे... ।

समीर की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी-"तुम्हारी परवरिश किसने की..?"

"मुझे तबूह और दरसी ने पाला..दोनों ने मुझे बड़े प्यार से रखा..।" बरहा ने बताया।

"और इस वक्त तुम्हें यहां तक कौन लाया?''

मुझे कुछ ही दिन पहले सांपों की बस्ती से देवांग के घर पहुंचाया गया था। देवांग की मां पार्वती ने भी बहुत से सांप पाल रखे थे वहीं से मुझे एक लाल कपड़ों वाले शख्स ने उठाया..वहीं मुझे इस घर के सामने छोड़ गया है। उसने मुझे आपके बारे में बहुत-सी बातें बताईं...तब मुझे मालूम हुआ कि मैं असल में आपकी बेटी हूं...। मैं आपकी बेटी हूं?"

"हां, मेरी जान । तुम मेरी बेटी हो। अब तुम्हें मुझसे कोई नहीं छीन सकेगा...।" समीर ने उसे अपने सीने के साथ भींच लिया ।

इस बीच हवेली के तमाम मुलाजिम उनके गिर्द उमड़ आये। वे हैरान भी थे व खुश भी । बरहा को देखकर वे नारे लगाने लगे-"आहा, छोटी मालकिन आ गई... ।

समीर राय ने बरहा को लोंगसरी की गोद में दे दिया। लोंगसरी ने उसे बहुत प्यार किया व फिर उसे हवेली के नौकर-चाकरों से मिलाया। जिस बच्ची के बारे में भविष्यवाणी की गई थी-'कि वो यहां रही तो हवेली वीरान और सुनसान हो जाएगी उसी बच्ची की आमद ने हवेली की फिजा में रंग भर दिये थे। हर तरफ खुशी नाच रही थी। मेले का सा समां था।
 
देवांग की बस की बात न थी कि वो हूरा जैसे देव को अपने कंधे पर उठाकर ठिकाने पर ले जाता। उसने हूरा के सिर का जायजा लिया ।उसका सिर तीन जगह से फटा हुआ था और 'नीला खून' सिर से बहकर जमीन पर जम गया था। उसने हूरा के बायें पैर के अंगूठे को पकड़कर जोर से एक झटका दिया। इस झटके से उसका खुला हुआ मुंह और भी खुल गया..मगर वह होश में नहीं आया। मुंह खुलते ही देवांग को अंदाजा हो गया कि वह अभी मरा नहीं है।देवांग ने कुछ सोचा और फिर दोनों हाथों में रेत भरकर उसके सिर के जख्मों पर बरसाई । रेत उसके सिर के छोटे व सख्त बालों में भर गई। कुछ ही क्षणों में उस रेत ने अपना असर दिखाया। उसके जख्म तेजी से लुप्त हो गये और कुछ देर बाद ही उसने अपनी आंखें खोल दीं ।उसने अपने सामने देवांग को पाया और स्वयं को जमीन पर। उसे बड़ी ग्लानि का अहसास हुआ...वह एक झटके से उठकर बैठ गया और फिर अगले ही क्षण खड़ा हो गया। उसने अपने सिर पर अपना भारी हाथ फेरा तो रेत झड़ने लगी सिर से रेत झाड़ कर उसने जंजीर से बंधी घन्टी जमीन से उठाई और कंधे पर लटका ली। फिर उसने देवांग की तरफ देखा और जैसे सफाई देते बोला-"वे कई थे। मैंने उसे अकेल समझा। उन्होंने मुझ पर छिप कर वार किया, वरना मैं उन्हें जिन्दा न छोड़ता...

''मैं जानता हूं, हूरा! वे पांच थे..और छोटा वो था जो बरहा को ले उड़ा। मैं बेबस था। मैं क्या करता...।" देवांग ने असहाय-निराश स्वर में कहा।

"देवांग, तू बरहा की हिफाजत नहीं कर सका... | यह तेरी गलती है और अपराध भी। तुझे परमान के दरबार में चलना होगा...।" हूरा का लहजा बदल गया।"

हूरा, मैं निर्दोष हूं। मैं इस वक्त नदी पर नहाने आया था, जब उस सुर्ख लिबास वाले ने बरहा को बस्ती से निकाला। देवांग ने अपनी सफाई देने की कोशिश की।

अब तूने जो कुछ कहना है, परमान के सामने कहना है। तुझे मेरे साथ चलना होगा...।“ हूरा ने सर्द स्वर में कहा और इसके साथ ही उसने अपने कंधे से जंजीर उतारी और देवांग के दोनों हाथ जंजीर से जकड़ दिये और जंजीर पकड़े-पकड़े झुककर उसे अपने कन्धे पर डाला और फिर वह अपने विशिष्ट अंदाज में चलने लगा।

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अगले ही दिन, समीर राय अपनी मां के साथ, बरहा को लेकर अरूणिमा के घर पर उसकी सेवा में पहुंचा यह भविष्यवक्ता नवयौवना तो उसके लिए एक फरिश्ता साबित हुई थी ।समीर राय ने जाते ही अरूणिमा के चरणों में नजराना पेश किया...कई कीमती जोड़े, मिठाई और नगद पन्द्रह हजार रूपये ।

अरूणिमा के कोमल चेहरे पर सख्ती के भाव उपजे। वह खिन्न स्वर में बोली-“मैं जानती हूं कि आप अपने इलाके के बहुत बड़े जमींदार हैं और यह सब कछ आपके लिये बहुत मामूली है। लेकिन शायद आप नहीं जानते कि मैं आपसे भी बड़ी 'भू-स्वामिनी' हूं। मेरे दिल की जमीन इतनी बड़ी है कि आपका पूरा इलाका इसमें समा जाए। यह सब चीजें यहां से उठाइये और अपनी बेटी की आमद पर मेरी तरफ से मुबारकबाद कबूल कीजिये... ।

समीर राय उसकी सूरत ही देखता रह गया। नफीसा बेगम ने कुछ कहना चाहा तो अरूणिमा ने हाथ उठा दिया, बोली-"इस बारे में प्लीज कुछ न कहें। ये चीजें आपको वापिस ले जानी होंगी। मैं यहां नजराने-तोहफे कबूल करने नहीं बैठी हूं...।''

समीर ने खामोशी से वे चीजें उठाईं और बाहर जाकर लोंगसरी के हवाले कर आया। बरहा को अरूणिमा ने अपनी गोद में बैठा लिया था और उससे हंस-हंस कर बातें कर रही थी।"अरूणिमा बीवी, हम आपके बहुत शुक्रगुजार हैं। आपने जैसा कहा, वैसा हो गया। हमारी खोई हुई बच्ची हमें मिल गई। अब एक प्राब्लम और है..।" नफीसा बेगम ने विजयपूर्ण स्वर में कहा ।

“वो समस्या भी हल हो जाएगी..हमने सोच लिया है। समीर राय साहब, आप तीन दिन बाद हमारे पास आइयेगा और एक साबुत नारियल लेते आइयेगा। लेकिन आइयेगा अकेले...!"

यह कह कर वह कमरे से निकल गई ।

नफीसा बेगम की खुशी भरी नजरें अपने बेटे की तरफ उठ गई थीं।वह समझ गई थी कि इस चमत्कारी अरूणिमा ने नमीरा की गुत्थी सुलझाने को कह दिया है तो यह गुत्थी भी जरूर सुलझ जाएगी। यानी कि अब उसक बेटे की जिन्दगी में सुकून ही सुकून होगा। तब वह समीर राय की शादी के बारे में भी कुछ तय कर लेगी।

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हूरा, चौथे दरवाजे से हालनुमा कमरे में दाखिल हुआ। सर्पराज परमान कमरे में मौजूद था। वह हमेशा की तरह 'बुतों' को इधर-से-उधर कर रहा था, यानी कि फैसले की घड़ी थी। रानी मलायका उसके साथ-साथ चल रही थी।जब हूरा ने देवांग को सुर्ख ईंटों के फर्श पर पटका और जंजीर में बंधी घन्टी जोर से बजी तो परमान ने फौरन पलट कर देखा और यह देखकर हैरान रह गया कि देवांग के हाथ जंजीर में बंधे हुए हैं और वह दया मांगती निगाहों से उसकी तरफ देख रहा है।

'अरे हूरा, क्या हुआ उसे?" परमान ने निकट आते हुए पूछा ।

परमान यह तेरी अमानत की हिफाजत न कर सका...।'' हूरा ने बताया।

"क-क्या..?" परमान स्तब्ध रह गया-"यह कैसे हुआ..?"\

"चल देवांग, जल्दी बोल... । हूरा उसे बंधन मुक्त करते बोला ।

"परमान, इसमें मेरा कोई दोष नहीं...वो न जाने कौन था, उसने मेरे घर से बरहा को उठाया..मुझे उठाकर नदी में फेंका। जब मेरी मदद को हूरा आया तो वे एक के छ: हो गये। उन्होंने हूरा का सिर फाड़ दिया..यह बेहोश हो गया तो उन्होंने मुझे घेर लिया। जिसने बरहा को उठाया था, वो बहुत आगे निकल चुका था। मैं बेबस था परमान। मैं क्या करता...।" देवांग ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए दुहाई दी।

यह तो बहुत बुरा हुआ कि बरहा हमारे हाथ से निकल गई।हमारी सारी मेहनत बेकार गई। रनत्तारों तो पागल हो जाएगा...।“परमान ने रानी मलायका की तरफ देखते हुए कहा ।"अखिर वो कौन लोग थे जिन्होंने ‘परमान की पसन्द' पर हाथ डालने की जुर्रत की..?" रानी मलायका ने देवांग की तरफ देखते पूछा।

मैंने उन्हें पहले कभी नहीं देखा...वे हमारी बस्ती के नहीं थे... ।'"

"पर आखिर वे थे कौन..?" परमान गुस्से से बोला-"और तू भी हूरा, उनके काबू में आ गया। जरा मुझे उनके बारे में विस्तार से बता।

और अब हूरा ने...उस पर जो गुजरी थी सब सविस्तार कह सुनाया |

परमान ने एक गहरा सांस लिया, फिर सोचपूर्ण लहजे में बोला-"यह तो कोई और ही मामला मालूम होता है। देवांग तुम वापिस जाओ और ओघड़नाथ से संबन्ध स्थापित करो। तुम्हें उसक साथ मिलकर बरहा को तलाश करना है। याद रहे, अगर बरहा नहीं मिली तो तुम्हारी जिन्दगी की कोई जमानत नहीं दी जा सकती...।'

'जो परमान का आदेश । मैं फौरन जाता हूं..।" देवांग फौरन दरवाजे की तरफ पलटा। वो खुश था । आशा के विपरीत परमान उसे क्षमा कर दिया था। शायद क्षमा तो अभी भी नहीं किया था, लेकिन फिलहाल जान-बख्शी हो गई थी, और इस मिली मोहलत से फायदा उठाया जा सकता था ।वह मुस्कुराता हुआ दरवाजे की तरफ बढ़ गया था।

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तीन दिन बाद!समीर राय नारियल लेकर अकेला अरूणिमा के पास पहुंच गया ।शाम का वक्त था। उसने जैसे ही बेल बजाई, दरवाजा लगभग तुरन्त ही खुला। उसका ख्याल था कि हमेशा की तरह अरूणिमा कि स्वयं अरूणिमा दरवाजे पर मौजूद थी।अरूणिमा ने शालीन मुस्कान के साथ समीर राय का अभिवादन किया, फिर उसे रास्ता देते हुये बोली-" आइये...।"

समीर राय के अंदर आने के बाद अरूणिमा ने दरवाजा बंद करना चाहा तो पीछे से उसकी मां रजनी देवी की आवाज आई-"तुम चलो, बेटा। मैं बन्द करती हूं दरवाजा...।''

अच्छा, अम्मी...।" यह कहकर वह ड्राईंग रूम से होती हुई अपने कमरे में आ गई |सब्ज कालीन पर गाव-तकिये से कमर टिकाकर वह बैठ गई और बोली-“कैसी है आपकी बेटी?"

ठीक है। हवेली में आकर खुश है।"प्र

भु के रंग भी निराले हैं। बहुत प्यारी बच्ची है। प्रभु उसे बुरी नजर से बचाये...।" अरूणिमा ने कहा।

"मैं आपका अहसानमंद हुं कि आपने मेरी बेटी मुझे मिला दी।" समीर आभारी स्वर में बोला था।

"मैं कौन हूं कुछ करने वाली, यह सब प्रभु की कृपा है... | मेहरबानी है अल्लाह की... | खैर...।" वह समीर को

सवालिया नजरों से देखने लगी।

"मैं, जैसा कि आपने कहा था..नारियल ले आया हूं...।"

समीर राय ने रूमाल में बंधा नारियल उसके सामने रख दिया।

"ठीक है। यह नारियल हम ‘पढ़कर आपको देंगे। साथ ही बताएंगे कि आगे क्या करना है।

''जी...।" समीर राय उसका आशय समझ बोला-"मुझे कब आना होगा..?

"तीन दिन बाद...लेकिन अंधेरा होने के बाद आइयेगा... |इस नारियल को आपके हवाले करते वक्त सूरज की रोशनी नहीं पड़नी चाहिये-"। अरूणिमा ने समझाया ।

“क्या नमीरा मुझे मिल जाएगी..?" समीर ने धड़कते दिल के साथ पूछा। हम आपको बता चुके हैं कि आपकी बीवी मर चुकी हैं...।" अरूणिमा ने संजीदगी से कहा-"आपकी पत्नी की लाश एक कुत्ते के मुंह में है। वो उसे घसीट रहा है और उसके जरिये अपने घिनौने प्रयोजन सिद्ध कर रहा है।

"मुझे मेरी बीवी की लाश ही मिल जाये, ताकि मैं उसे अपने हाथों दफन कर सकूँ..।" समीर राय ने भरे गले से कहा।

"लाश तो खैर मिल जाएगी...लेकिन इसके लिए आपको उस कुत्ते को जिन्दा जलाना होगा...।'

"जलाऊंगा...जरूर जलाऊंगा...।" समीर राय ने आवेश में कहा, फिर पूछा-"लेकिन क्या वह वाकई कुत्ता है..?"

"कुत्ता तो नहीं...लेकिन आप उसे कुत्ता ही समझें..बल्कि कुत्ते से भी बदत्तर...।' अरूणिमा ने कटुता के साथ कहा।

कहां है वो..?" समीर राय ने तेजी से पूछा।

"जब हम आपको नारियल देंगे...तभी उससे सम्बन्धित पूरी जानकारी भी देंगे। आप पेरशान न हो...।

"नहीं, मैं परेशान नहीं हूं.बेचैन हूं। मैं...मैं जल्द-से-जल्द नमीरा की लाश हासिल करना चाहता हूं।"

"समीर साहब! हर चीज का एक वक्त मुकर्रर है। हर काम अपने वक्त पर होता है। न एक पल इधर और न एक पल उधर... । हां, खूब याद आया..अपनी बच्ची की सुरक्षा आपने पूरे ध्यान के साथ करनी है। वह अकेली बच्ची की सुरक्षा आपने पूरे ध्यान के साथ करनी है। वह अकेली हवेली से न निकले, और हां, एक बात और बता दें...।" यह कहकर वह कुछ क्षणों के लिए खामोश हो गई।उसकी यह खामोशी समीर राय को बेचैन कर गई। वह कुछ चिन्तित हो उठी थी। उसका चेहरा बता रहा था कि वह जो कुछ कहने वाली है वह कोई प्रसन्नताजनक बात नहीं है। अंततः वह बोली-"आपकी बच्ची पर पंद्रहवां साल बहुत भारी है...।"

ओह...।" समीर राय को धक्का-सा लगा-"क्या होगा..?"

लेकिन उसके इस सवाल का जवाब देने को अरूणिमा वहां नहीं थी।वह खामोशी से कमरे से उठकर जा चुकी थी

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देवांग जब झोंपड़ी में दाखिला हुआ तो ओघड़नाथ भांग घोटने में व्यस्त था और उसके चेले 'सुल्फे भरी' चिलम के दम लगाने में मस्त ।देवांग को देखते ही ओघड़नाथ ने जैसे नारा लगाया-“पधारिये देवांग जी...पधारिये... । महाराज नमस्कार...।" तीनों चेलों ने बारी-बारी अभिवादन किया ।देवांग ने उनकी इस गर्मजोशी का जवाब खामोश रह कर दिया। उसका मुंह लटका हुआ था।

ओघड़नाथ ने गौर से उसका चेहरा देखा..और समझ गया कि वो किसी मुश्किल में है।"आओ, देवांग...बैठो... | पहले चिलम पीओ, फिर भाांग का नशा करना... । तैयार कर रहा हूं।" उसने खुशदिली से दावत दी।

देवांग उसके निकट बैठ गया। एक चेले ने चिलम पेश की। देवांग ने दम लगाया और चिलम वापिस कर दी।"देवांग, कुछ परेशान दिखाई देते हो। मामला क्या है...?"

ओघड़नाथ ने पूछा।

"ओघड़नाथ, मेरी जान खतरे में है...।" देवांग दबे स्वर में बोला।"

अरे, क्या हुआ..?" ओघड़नाथ ने हाथ रोक लिये।

उसने अपने चेलों को एक नजर देखा और उन्हें बाहर जाने का इशारा किया।तीनों आंख का इशारा पाते ही उठ गये।उनके बाहर निकल जाने के बाद देवांग बोला-"मुझसे बहुत बड़ी भारी गलती हो गई है, ओघड़नाथ। मैं परमान की अमानत की हिफाजत न कर सका। उसने मुझ पर भरोसा करके वह अमानत मेरे हवाले की थी। पर मैं क्या करता...उसने मुझे सम्भलने का मौका ही नहीं दिया था।

मुझे क्या, वे तो हूरा जैसे महाबली को भी जख्मी करके निकल गये थे।"

"अरे.हूरा भी काबू आ गया..हैरत है।

देवांग बाबू जरा सारी बात खुलकर बताओ... ।“

देवांग ने बरहा के अपहरण से लेकर परमान के दरबार में हाजिरी तक सारी आपबीती सुना दी।ओघड़नाथ ने एक गहरा सांस लिया, फिर बोला-"देवांग बाबू! फिक मत करो। अभी ओघड़नाथ जीवित है। मैं देखता हूं उन 'सुर्खपोशों' को। काली मां की सौगन्ध, बरहा को ढूंढकर दूंगा..! परमान ने भेजा है तुझे..उसका मान भी रखूगा और तुम्हारी जान भी बचाऊंगा। बस तुम निश्चिन्त हो जाओ... |"कुछ देर में भांग तैयार हो गई तो उसने पीतल के गिलास में देवांग को दी। देवांग ने भांग चूंट-बूंट पीकर गिलास पत्थर पर रख दिया। ओघड़नाथ ने भांग एक सांस में चढ़ा ली थी और नारा लगाया-"जय काली...तेरा वार कभी न जाये खाली...तू है बड़े दिल वाली... | ओह, वाह-वाह...ओह, वाह...वाह...।"फिर वो उठकर झोंपड़ी के अन्दरूनी हिस्से में गया। उसने चटाई पर लेटी हुई नमीरा उर्फ शान्ति पर नजर डाली और खामोशी से एक कोने में रखी खोपड़ी उठाई और बाहर आ गई।उसने खोपड़ी देवांग के सामने रखी और एक चरस भरी सिगरेट उस खोपड़ी के दांतों में फंसा दी।

"यह क्या कर रहे हो...?" देवांग हैरानी से बोला।

"तुम्हें परमान ने मेरे पास भेजा है तो कुछ सोचकर ही भेजा होगा। देखते जाओ...।" ओघड़नाथ ने हंस कर कहा। फिर उसने झोंपड़ी के प्रवेश द्वार की तरफ देखते पुकारा-"पुरूषोत्तम...।"

"जी, महाराज...।" वह चेला लपककर दरवाजे पर आया था।

एक कून्डा भरकर नदी का ताजा पानी ला..जल्दी करो...।" ओघड़नाथ ने उसे हुक्म सुनाया।

"जी, महाराज....।" पुरूषोत्तम ने कहा व झोंपड़ी में रखा 'कून्डा उठाकर बाहर निकल गया |चेले के बाहर जाने के बाद ओघड़नाथ ने माचिस उठाई, एक तीली निकालकर जलाई। उसके शोले पर नजरें टिका...मुंह-ही-मुंह में कुछ पढ़ा। फिर 'जय काली' का नारा लगाया और तीली से खोपड़ी के मुंह में दबी सिगरेट सुलगा दी।देवांग को उस वक्त बड़ी हैरत हुई जब खोपड़ी ने सिगरेट में कश लगाया और अपने मुंह से धुआं निकाला। ओघड़नाथ खोपड़ी को देखते हुए बार-बार नारा लगा रहा था-"मस्त हो जा...मस्त हो जा...।"उस खोपड़ी ने जब आधी सिगरेट पी ली तो पुरूषोत्तम इस बीच नदी से ताजा पानी लेकर आ गया। उसने पानी से भरा कून्डा खोपड़ी के सामने रखा और अगले आदेश के लिए ओघड़नाथ की तरफ देखने लगा। ओघड़नाथ ने हाथ के इशारे से उसे बाहर जाने के लिए कहा... | ओघड़नाथ बस बार-बार यही दोहराये जा रहा था-"मस्त हो जा...मस्त हो जा।"खोपड़ी के मुंह से लगी सिगरेट छोटी होती जा रही थी। जब वह सिगरेट खत्म होने को आई तो ओघड़नाथ ने उसके मुंह से सुलगता हुआ टोटा निकाल कर पानी से भरे कून्डे में डाल दिया।सिगरेट के पानी में पड़ते ही पानी उबलने लगा। पानी से भाप उठ रही थी। छोटे-बड़े बुलबुले बन रहे थे और पानी बड़ी तेजी से गर्दिश कर रहा था ।देवांग उबलते पानी को एकटक देखे जा रहा था। यह सारा खेल उसके लिए निराला था। देवांग स्वयं तांत्रिक विद्या में माहिर था लेकिन ओघड़नाथ का 'इलम' ही दूसरा थां वो अघोरी साधू था और उसका सारा खेल मुर्दो के साथ था। वो एक अत्यन्त ही घिनौना शख्स था। अधजली लाशों का मांस उसका प्रिय भोजन था, हर तरह का नशा करता था। लाशों की पूजा-अर्चना...खोपड़ियों द्वारा काले जादू का अमल...भटकती रूहों से काम लेना... | यह था ओघड़नाथ।

"शिन शिला की भू-भला भू.. ।” ओघड़नाथ ने अर्थहीन शब्द बोलने शुरू किए। कुछ देर वो इन शब्दों को दोहराता रहा, फिर एकाएक रूक गया। अब उसकी आंखें सुर्ख-अंगार हो चुकी थीं। चेहरा भयानक हो गया था। वो देवांग से बेखबर अपने 'अमल' में व्यस्त था ।फिर सहसा उसने जोर से नारा लगाया.'जय काली..जय काली...। उसके नारा लगाते ही कून्डे का उबलता पानी कम होकर धुएं की सूरत में कुन्डे के ऊपर घूम रहा था।

"आ गया..मस्त होकर...देख मैंने तुझे क्या चीज पिलाई...।" ओघड़नाथ ने उस धुएं के चक्र पर नजर गड़ाते हुए कहा-“मेरी बात जरा गौर से सुनना..तूने एक काम करना है...बरहा को तलाश करना है...जा, जल्दी कर...।"ओघड़नाथ की बात सुनकर धुआं कून्डे से ऊपर उठा और झोंपड़ी से बाहर निकल गया।"देवांग बाबू बरहा का पता अभी लग जाता है....।" उसने बड़े गर्व से देवांग की तरफ देखा था।उसके इस आश्वासन पर देवांग के चेहरे पर इत्मीनान और सुकून फैल गया।

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"यह नारियल हमने 'पढ़कर' तैयार कर दिया है। अब इसे कोई साधारण नारियल न समझे। अब यह एक तरह का पैट्रोल पम्प है...।" अरूणिमा ने नारियल समीर राय की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

"इसका क्या करना है..?" समीर राय ने नारियल पूरी एहतियात के साथ अपनी गोद में रखते हुए पूछा ।

उस दुष्ट को जीवित जलाना है, जिसने अब तक ना जाने कितनी लाशों की दुर्गति की है। अपमानित और बेइज्जत किया है लाशों को...।“ अरूणिमा के लहजे में अजीब-सी कटुता थी।

"तुम्हारी नमीरा का शरीर भी उसी के कब्जे में है। वो एक अघोरी साधु है। लाशों का मांस खाने वाला.लाश को बुरी नजर से देखने वाला। वो इस धरती का बोझ है। जब तक जीवित नहीं जलेगा, वह इसी तरह दुनिया में शैतानियत फैलाता रहेगा...।

'"कौन है वो..?" समीर राय ने उत्सुकता से पूछा।

उसका नाम ओघड़नाथ है। नदी किनारे एक श्मशान घाट में उकसा डेरा है। उसे जितनी जल्दी हो सके मौत के घाट उतार दें...।' अरूणिमा घृणा भरे स्वर में बोली,

और फिर कुछ देर बाद उसने ओघड़नाथ का पुरा पता-ठिकाना भी समीर राय को बता दिया। उस नारियल के बारे में सविस्तार जानकारी दी-समझाया। इस नारियल को किस तरह इस्तेमाल करना है...यह भी बताया सब ऊंच-नीच समझाकर उसने समीर राय को विदा किया।

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धुएं के उस चक को गायब हुए आधा घन्टे से ज्यादा हो चुका था वह अभी तक नहीं लौटा था और ज्यूं-ज्यू देर होती जा रही थी, ओघड़नाथ के चेहरे पर परेशानी के भाव बढ़ते जा रहे थे।देवांग खामोश बैठा था। उसे बरहा के बारे में सूचना दरकार थी और ओघड़नाथ के इस अविश्वसनीय अमल के बाद उसे यकीन हो गया था कि धुएं का वह चक कोई सिद्ध-शक्ति थी जो बरहा की खोज निकालकर ओघड़नाथ को बता देगी, पर अब ओघड़नाथ की बढ़ती पेरशानी देखकर उसके दिल पर घबराहट बढ़ती जा रही थी।"

ओघड़नाथ...क्या हुआ..?" वो अंततः खामोश न रह सका।

"देवांग बाबू..कुछ समझ नहीं पड़ रही...।" ओघडनाथ खाली कुन्डे पर नजरें जमाते बोला ।

"कुछ करो ओघड़नाथ... । मुझे तो उसकी वापसी खतरे में पड़ती नजर आ रही है। देवांग घबराकर बोला।

"ऐसा तो खैर नहीं हो सकता। ओघड़नाथ के 'अमल' का काट करना कोई बच्चा का खेल नहीं। अभी कोई माई का लाल ऐसा पैदा नहीं हुआ जो मेरे काम में टांग अड़ाये...।" उसने ऊंचा बोल, बोला।

फिर इतनी देर क्यों..?" देवांग उलझ गया।

"ढूंढ रहा होगा...।" ओघड़नाथ ने कहने को तो यह बात कह दी...लेकिन अंदर से वह खुद भी विचलित था। उसने खोपड़ी को उठाकर खाली 'कून्डे' में रखा और फिर जैसे कोई मंत्र-सा पढ़कर 'जय काली' का नारा लगाया ।वह यही मंत्र व अमल खोपड़ी पर नजर गड़ाये, बार-बार दोहराने लगा।

"सत्यानाशी चल जल्दी लौटकर आ..सत्यानाशी चल जल्दी लौटकर आ... |"ओघड़नाथ अभी अपने इन शब्दों को झूम-झूम कर दोहरा रहा था कि अचानक कुद टूटने की आवाज आई।

देवांग ने घबराकर 'कून्डे' की तरफ देखा...क्योंकि आवाज वहीं से आई थी। वो यह देखकर परेशान हो गया कि खोपड़ी दो टुकड़े हो चुकी थी और कून्डे में दोबारा पानी भरना शुरू हो गया था।

"अरे, यह क्या हुआ..?" ओघड़नाथ उछल कर खड़ा हो गया और जोर से चीखा-"पुरूषोत्तम...!"

चेला उसकी पुकार पर फौरन झोंपड़ी में आया-"जी, महाराज...

"अरे, यह देख...यह क्या हो रहा है...।"

ओघड़नाथ ने कून्डे की तरफ इशारा किया।

"महाराज..यह तो 'काला' हो गया...।" चेला आंखें फाड़े कून्डे को देखने लगा ।अब उस कून्डे में पानी पूरी तरह भर चुका था और वह खोपड़ी पानी में इस तरह पिघलती जा रही थी... जैसे वह पानी में न हो..तेजाब में हो। खोपड़ी देखते-ही-देखते पानी में खांड की तरह घुलकर गायब हो गई।

"अरे, पुरूषोत्तम.इस सत्यानाशी को उठा यहां से और नदी में फेंक आ। इस सत्यानाशी ने तो हमें शर्मिन्दा कर दिया...।"

ओघड़नाथ शर्मसारी और गुस्से से चीख रहा था।

"जी, महाराज...।“ पुरूषोत्तम कून्डे को उठाने के लिए झुका।

"देख, सावधानी से... | अगर एक बूंद पानी भी तेरे ऊपर गिर गया तो तू कोढ़ी हो जाएगा... |"ओघड़नाथ ने उसे चेतावनी दी।
 
"अच्छा, महाराज...।" पुरूषोत्तम ने बड़ी सावधानी के साथ कून्डा उठाया और बहुत सम्भल-सम्भल कर बाहर निकल गया।

"देवांग बाबू..अपनी जिन्दगी में कभी ऐसा नहीं हुआ। यह आखिर हुआ क्या।" ओघड़नाथ अपनी जगह पर धम्म से बैठते हुए बोला-"यह कमीना तो 'काला' हो गया।''मैं क्या कहूं..मैं अब क्या करूं...।"

देवांग निराश हो गया-“मेरी जान तो फिर से खतरे में पड़ गई।

"नहीं, देवांग बाबू... | तुम परेशान मत होओ। अभी एक 'अमल' और है मेरे पास, लेकिन उस 'अमल' में दो-तीन दिन लगेंगे। तुम्हें मेरे पास ही रहना होगा।'

'रहुंगा...। बरहा का पता मालूम करने के लिए मैं यहां तीन महीने भी रह सकता हूं..।

''बस-बस...फिर फिक की कोई बात नहीं। तुम यहां से बरहा का पता निशाना लेकर ही जाओगे...।' ओघड़नाथ ने उसे तसल्ली दी।

पुरूषोत्तम कुछ देर बाद ही खाली कून्डा लेकर झोंपड़ी में दाखिल हुआ, बोला-"महाराज, “काले' को नदी में बहा दिया।"

अच्छा किया... | वो सत्यानाशी तो बड़ा ही कमीना निकला। देख, तूने कून्डा अच्छी तरह धोया है या नहीं..?"ओघड़नाथ ने पूछा ।

"हां, महाराज...।

"ठीक है। फिर तू जा...।

''महाराज, एक खुशी की खबर है...।"

पुरूषोत्तम जाते-जाते रूक कर बोला।

"हैं...वो क्या..?"

ओघड़नाथ उसे घूरने लगा।“

घाट में एक चिता तैयार हो रही है, महाराज... | कोई अर्थी आने वाली है...।

"अरे, वाह! यह तो वाकई खुशी की खबर है। पता किया, कौन मरा है...कोई स्त्री या मर्द?

" पता करके आया हूं, महाराज! औरत की अर्थी है...।"

पुरूषोत्तम ने अपनी चमकती हुई मुस्कान भरी आंखों से ओघड़नाथ की तरफ देखा।

"बस, बन गया काम...।" ओघड़नाथ ने देवांग की तरफ देखा-"देवांग बाबू, तुम बड़ें खुशकिस्मत हो। जिसकी जरूरत थी वह भी अविलम्ब मिल गई। अब देखता हूं कि बरहा को कोई कैसे छिपा कर रखता है... ।

"अब तो तीन दिन नहीं लगेंगे...?" देवांग ने फौरन पूछा।

"नहीं, अब काम जल्दी बन जाएगा...।" ओघड़नाथ ने जवाब दिया और फिर अपने चेले से बोला-"जब वे लोग चले जाएं तो मुझे आकर बताना..।

''जी, महाराज...।" पुरूषोत्तम ने कहा व बाहर निकल गया। उसने सीधे श्मशान घाट का रूख किया था।वो वहां पीपल के पेड़ पर चढ़कर बैठ गया।अंधेरा फैलते ही पन्द्रह-बीस लोग एक अर्थी के साथ श्मशान घाट में पहुंचे। शव चिता पर रखकर आग लगाई गई। देखते-ही-देखते चिता भड़क उठी। फिर जलती लाश की सड़ांध चारों तरफ फैलने लगी। अर्थी के साथ आने वाले चिता के पूर्णतया भड़क जाने की इंतजार में खड़े रहे, फिर वे वापिस चल दिये। उन्हें अंदाजा हो चुका था कि लाश आधी से ज्यादा जल चुकी है। यही वे क्षण थे जब शव यात्रा में आए लोग लौट जाते थे।ओघड़नाथ को ऐसी ही लाश की जरूरत रहती थी और वह अधजली लाशों के साथ जो कुछ करता था...उसे देखकर एक अच्छा-भला आदमी भी बेहोश हो सकता था ।बहरहाल, जब उस अर्थी के साथ आने वाले लोग चले गए...तो पुरूषोत्तम पेड़ से नीचे उतरा और दौड़ लगाकर ओघड़नाथ की झोंपड़ी में पहुंचा। चलिये, महाराज...।" वह अंदर आते ही बोला।

"आओ...देवांग बाबू... | हमारे साथ चलोगे या यहीं बैठोगे? तुम्हें तो मालूम है कि हम मुर्दाखोर लोग हैं। अधजली लाश का मजा ही कुछ और होता है। आओ, तुम्हें दिखायें.. |"ओघड़नाथ ने मुस्कुराते हुए कहा ।

देवांग तो अधजले मांस का सुनकर ही थर्रा गया..और वह भी एक लाश के मांस का। वह थूक निगलते बोला-"ओघड़ तुम हो आओ, मैं..मैं यहां बैठा हूं..।"

"ठीक है। तुम बैठो। थोड़ी-सी भांग और पीओ। हम थोड़ी देर में आते हैं। जय काली...।" वह यह कहकर उठा और कंधे पर एक तेज धार गंडासा रखकर झोपड़ी से निकल गया ।ओघड़नाथ के बदन पर इस वक्त एक लंगोट के सिवा और कुछ नहीं था। वो कंधे पर गंडासा रखे पुरूषोत्तम के पीछे चला जा रहा था। चारों तरफ घुप्प अंधेरा था लेकिन उन दोनों को चलने में कोई दिक्कत पेश नहीं आ रही थी। यह रास्ता उनका देखा-भाला था। सो, वे पूरे इत्मीनान से चल रहे थे।चिता अभी जल रही थीं कुछ लकड़ियां जल चुकी थी...कुछ अभी पूरी नहीं जली थीं, ओघड़नाथ ने एक लम्बी-सी लकड़ी से लाश को कुरेद कर बाहर निकाला। उसे उठाकर निकट ही बहमी नदी में धोया और गंडासे से उसके टुकड़े करके, वो अभी एक टुकड़ा अपने मुंह में रखने ही वाला था कि अचानक तेज रोशनी उसकी आंखों पर पड़ी और साथ ही कोई लोहे की चीज उसकी कनपटी से आ लगी ।यही अमल पुरूषोत्तम के साथ भी दोहराया गया। ओघड़नाथ के लिए यह बिल्कुल नया अनुभव था। पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि ये कौन लोग हैं...फिर जब उन लोगों ने समझाया तो वो समझा कि उसकी कनपटी से पिस्तौल लगी हुई है जिसका घोड़ा दबाते ही गोलियां निकल कर उसकी खोपड़ी के आर-पार हो जाएगी।“

महाराज...तुम लोग चाहते क्या हो..?"

ओघड़नाथ घिघिया कर बोला।

"ओ, खब्बीस..! खड़ा हो और हमारे साथ चल...।" आने वाले ने सख्त लहजे में कहा।

"कहां जाना है..?" ओघड़नाथ कांप उठा।

"ज्यादा दूर नहीं... | इस श्मशान घाट के एक कोने में..." आने वाले ने बताया।

"वहां क्या है..?

''वहां कोई तेरा प्रतीक्षक है...।

'"कौन महाराज...?"

"अब सारे सवाल यहीं बैठे-बैठे कर लेगा...चल उठ खब्बीस...।" पिस्तौलधारी ने उसे एक लात जमाई।
 
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