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ओघड़नाथ इस लात को बर्दाश्त कर गया, वह उठ खड़ा हुआ। पिस्तौलधारी ने पिस्तौल उसकी गर्दन से लगाई और उसे धक्का देते हुए बोला-"चल, आगे बढ़..!"पिस्तौलधारी उसे इसी पोजीशन में श्मशान घाट के एक कोने की तरफ ले चला.और उसका साथी पुरूषोत्तम को झोंपड़ी की तरफ ।
ओघड़नाथ ने रास्ते में उससे कई बार पूछा कि वो कौन है और क्या चाहता है? मगर उसे कोई जवाब न मिला। कोई जवाब मिला भी था तो वह यह कि उसे पिस्तौल के मूठ का प्रहार अपने कनपटे पर झेलना पड़ा था। तब जाकर वह चुप हुआ था ।कुछ दूर चलने के बाद एक पेड़ के पीछे से एक टार्च चमकी और आवाज सुनाई दी-"नादर, ले आये इस खब्बीस को...
''हां मालिक, ले आया हूं...।" पिस्तौलधारी, नादर ने जवाब दिया।
"इसे बिठाओ जमीन पर...।" पेड़ के पीछे से फिर जवाब आई और यह आवाज रोशनगढ़ी के समीर राय की थी।
"अच्छा, मालिक...।" नादर ने जवाब दिया और फिर ओघड़ से बोला-"भई, बैठ जा...।"
ओघड़नाथ की सिट्टी-पिट्टी गुम थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब हो क्या रहा है। वो खामोशी से जमीन पर बैठ गया।
"नादर, इसके चेहरे पर रोशनी डालो... ।" आदेश देते हुए समीर राय पेड़ के पीछे से निकल आया। उसके पीछे दो हथियारबंद व्यक्ति और भी थे, जो किसी भी खतरे से निपटने के लिए तैयार थे ।
नादर ने एक शक्तिशाली टार्च का बटन दबाकर उसका रूख ओघड़नाथ की तरु कर दिया। टार्च की रोशनी में ओघड़ का भयानक चेहरा और भी भयानक नजर आ रहा ।
समीर राय ने अरूणिमा का दिया हुआ नारियल हाथ में पकड़ा हुआ था। उसने चाकू निकाला और नादर के करीब होकर टार्च की रोशनी की तरफ हाथ बढ़ाकर चाकू से नारियल का एक छोटा-सा टुकड़ा काटा। वह पका हुआ सूखा नारियल था। इस नारियल में पानी के होने की कोई सम्भावना ही नहीं थी...और समीर राय ने उसे अपने कान के पास हिलाकर इसकी तस्दीक भी कर ली थी..लेकिन अब उसने जैसे ही नारियल से टुकड़ा अलग किया तो उसे एकाएक नारियल के भारी होने का अहसास हुआ। उसे लगा जैसे नारियल पानी से भरा हुआ हो |उस पहुंची हुई' ने उसे पैट्रोल पम्प कहा था ।समीर राय ने आगे बढ़कर और अपना हाथ लम्बा करके ओघडनाथ पर नारियल उलटना चाहा। लेकिन फिर फौरन ही अपना हाथ खींच लिया। यही ख्याल आया था कि अगर उस पर इस तरह नारियल का पानी डाल दिया तो वो अचानक उठकर खड़ा हो जाएगा। ऐसे में जाने फिर क्या स्थिति बने? वह अपने पीछे खड़े शख्स से बोला-"मुश्ताक..रस्सी भी साथ लाया है या नहीं..?"
"लाये हैं, मालिक...।" फौरन जवाब मिला ।
तो फिर इस कुत्ते के हाथ-पांव बांध | जल्दी कर... |"
मुश्ताक अंधेरे से निकल कर रोशनी में आया । नादर ने पिस्तौल की मूठ ओघड़नाथ के कनपटे से बजाई और बोला-"अपने हाथ-पांव आराम से बंधवा ले वरना...।
"लो बांध लो महाराज...।" ओघड़नाथ ने अपने हाथ फौरन आगे कर दिये थे ।मुश्ताक ने बड़ी दक्षता से उसके हाथ बांधे और उसे जमीन पर धक्का दे दिया ।अब समीर राय आगे बढ़ा और उसने जल्दी से नारियल उसके सिर के ऊपर रखकर उलट दिया। नारियल से आश्चर्यजनक तौर पर गट्-गट करके पानी निकलने लगा। जब वो उस पानी से भली-भांति भींग गया और नारियल का पानी भी खत्म हो गया तो समीर राय पीछे हटा । उसने पीछे हटते हुये नादर से भी दबी जुबान में पीछे हटने को कहा था |नादर, टार्च का रूख बदस्तूर ओघड़नाथ की तरफ रखे तेजी से हटा। समीर राय भी आठ-दस कदम पीछे हटकर रूक गया और फिर उसने ओघड़नाथ का निशाना लेकर उसके पेट पर दे मारा। नारियल का उसके शरीर से टकराना था कि एक तीव्र रोशनी-सी हुई और ओघड़नाथ का समूचा शरीर शोलों की लपेट में आ गया ।सहसा चीखें सुनाई देने लगीं। ये ओघड़नाथ की चीखें न थीं। ओघड़नाथ को तो चीखने का मौका ही नहीं मिला था। उसकी हृदयगति तो आग लगते ही बंद हो गई थी। ये आवाजें तो कहीं दूर से आ रही थीं..जैसे भटकती हुई दुष्टात्माएं चीख रही हों।सुनसान और वीरान श्मशान घाट में रूहों के चीखने की आवाजें एक हौलनाक समां पेश कर रही थीं सामने ओघड़नाथ शोलों की लपेट में था और किसी सूखी लकड़ी की तरह धूं-धूं जल रहा था।
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ओघड़नाथ ने रास्ते में उससे कई बार पूछा कि वो कौन है और क्या चाहता है? मगर उसे कोई जवाब न मिला। कोई जवाब मिला भी था तो वह यह कि उसे पिस्तौल के मूठ का प्रहार अपने कनपटे पर झेलना पड़ा था। तब जाकर वह चुप हुआ था ।कुछ दूर चलने के बाद एक पेड़ के पीछे से एक टार्च चमकी और आवाज सुनाई दी-"नादर, ले आये इस खब्बीस को...
''हां मालिक, ले आया हूं...।" पिस्तौलधारी, नादर ने जवाब दिया।
"इसे बिठाओ जमीन पर...।" पेड़ के पीछे से फिर जवाब आई और यह आवाज रोशनगढ़ी के समीर राय की थी।
"अच्छा, मालिक...।" नादर ने जवाब दिया और फिर ओघड़ से बोला-"भई, बैठ जा...।"
ओघड़नाथ की सिट्टी-पिट्टी गुम थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि यह सब हो क्या रहा है। वो खामोशी से जमीन पर बैठ गया।
"नादर, इसके चेहरे पर रोशनी डालो... ।" आदेश देते हुए समीर राय पेड़ के पीछे से निकल आया। उसके पीछे दो हथियारबंद व्यक्ति और भी थे, जो किसी भी खतरे से निपटने के लिए तैयार थे ।
नादर ने एक शक्तिशाली टार्च का बटन दबाकर उसका रूख ओघड़नाथ की तरु कर दिया। टार्च की रोशनी में ओघड़ का भयानक चेहरा और भी भयानक नजर आ रहा ।
समीर राय ने अरूणिमा का दिया हुआ नारियल हाथ में पकड़ा हुआ था। उसने चाकू निकाला और नादर के करीब होकर टार्च की रोशनी की तरफ हाथ बढ़ाकर चाकू से नारियल का एक छोटा-सा टुकड़ा काटा। वह पका हुआ सूखा नारियल था। इस नारियल में पानी के होने की कोई सम्भावना ही नहीं थी...और समीर राय ने उसे अपने कान के पास हिलाकर इसकी तस्दीक भी कर ली थी..लेकिन अब उसने जैसे ही नारियल से टुकड़ा अलग किया तो उसे एकाएक नारियल के भारी होने का अहसास हुआ। उसे लगा जैसे नारियल पानी से भरा हुआ हो |उस पहुंची हुई' ने उसे पैट्रोल पम्प कहा था ।समीर राय ने आगे बढ़कर और अपना हाथ लम्बा करके ओघडनाथ पर नारियल उलटना चाहा। लेकिन फिर फौरन ही अपना हाथ खींच लिया। यही ख्याल आया था कि अगर उस पर इस तरह नारियल का पानी डाल दिया तो वो अचानक उठकर खड़ा हो जाएगा। ऐसे में जाने फिर क्या स्थिति बने? वह अपने पीछे खड़े शख्स से बोला-"मुश्ताक..रस्सी भी साथ लाया है या नहीं..?"
"लाये हैं, मालिक...।" फौरन जवाब मिला ।
तो फिर इस कुत्ते के हाथ-पांव बांध | जल्दी कर... |"
मुश्ताक अंधेरे से निकल कर रोशनी में आया । नादर ने पिस्तौल की मूठ ओघड़नाथ के कनपटे से बजाई और बोला-"अपने हाथ-पांव आराम से बंधवा ले वरना...।
"लो बांध लो महाराज...।" ओघड़नाथ ने अपने हाथ फौरन आगे कर दिये थे ।मुश्ताक ने बड़ी दक्षता से उसके हाथ बांधे और उसे जमीन पर धक्का दे दिया ।अब समीर राय आगे बढ़ा और उसने जल्दी से नारियल उसके सिर के ऊपर रखकर उलट दिया। नारियल से आश्चर्यजनक तौर पर गट्-गट करके पानी निकलने लगा। जब वो उस पानी से भली-भांति भींग गया और नारियल का पानी भी खत्म हो गया तो समीर राय पीछे हटा । उसने पीछे हटते हुये नादर से भी दबी जुबान में पीछे हटने को कहा था |नादर, टार्च का रूख बदस्तूर ओघड़नाथ की तरफ रखे तेजी से हटा। समीर राय भी आठ-दस कदम पीछे हटकर रूक गया और फिर उसने ओघड़नाथ का निशाना लेकर उसके पेट पर दे मारा। नारियल का उसके शरीर से टकराना था कि एक तीव्र रोशनी-सी हुई और ओघड़नाथ का समूचा शरीर शोलों की लपेट में आ गया ।सहसा चीखें सुनाई देने लगीं। ये ओघड़नाथ की चीखें न थीं। ओघड़नाथ को तो चीखने का मौका ही नहीं मिला था। उसकी हृदयगति तो आग लगते ही बंद हो गई थी। ये आवाजें तो कहीं दूर से आ रही थीं..जैसे भटकती हुई दुष्टात्माएं चीख रही हों।सुनसान और वीरान श्मशान घाट में रूहों के चीखने की आवाजें एक हौलनाक समां पेश कर रही थीं सामने ओघड़नाथ शोलों की लपेट में था और किसी सूखी लकड़ी की तरह धूं-धूं जल रहा था।
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