अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़ - Page 5 - SexBaba
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अम्मी और अंकल — एक नया अंदाज़

This Story is inspired By Ammi and uncle written by author Lucky2.

अध्याय 1

मैं साहिल हूँ। यह कहानी मेरी ज़िंदगी के उस मोड़ की है जब वक्त ने एक अजीब करवट ली थी। हम दिल्ली गए थे, मेरी अम्मी आयशा की कज़िन, सायमा, की शादी के लिए। सायमा अम्मी के मामा की बेटी थी, इसलिए यह एक बड़ा फैमिली इवेंट था।

घर से हम तीनों निकले थे—मैं, मेरी अम्मी, और मेरी नानी। मेरे अब्बू, फहद, को बिज़नेस के काम से रुकना पड़ा, इसलिए वह हमारे साथ नहीं आ सके। मैं कॉलेज में था, अपनी ही धुन में रहने वाला एक एवरेज सा लड़का। मीडियम हाइट, पतला सा जिस्म, और काले बाल जो अक्सर मेसी रहते थे, हवा में लहराते हुए। मेरा चेहरा अम्मी से ज़्यादा अब्बू से मिलता था। देखने में मैं मासूम लगता था, पर मेरे अंदर एक बेचैनी थी, एक तेज़ धड़कन जो हर नए तजुर्बे को तलाशती थी।

मैं साहिल हूँ, और यह वाकया मेरी अम्मी, आयशा, के उस जादुई रूप के इर्द-गिर्द बुना गया है जिसने मुझे पहली बार यह अहसास कराया कि कुदरत ने उन्हें किस कदर फुर्सत में तराशा था।

मेरी अम्मी की खूबसूरती सिर्फ एक बेटे की नज़र से ही नहीं, बल्कि किसी भी देखने वाले के लिए एक मदहोश कर देने वाला मंज़र थी। कॉलेज में होने के नाते, मैं औरों की नज़रों को पढ़ना सीख गया था, और अक्सर देखता था कि जब अम्मी कमरे में दाखिल होतीं, तो वक्त जैसे ठहर सा जाता। उनकी लंबी सुराहीदार गर्दन और उस पर टिका वह चाँद सा गोल चेहरा किसी संगमरमर की मूरत जैसा लगता था। उनकी त्वचा का रंग इतना साफ और दूधिया सफेद था कि रोशनी जैसे उनसे टकराकर वापस लौटती थी।

उस दिन उन्होंने एक महीन कपड़े का सूट पहना था, जो उनके छरहरे मगर गठावदार बदन पर इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म का हर उभार अपनी एक अलग कहानी कह रहा था। उनकी पतली कमर जब चलने के दौरान हल्की सी बल खाती, तो उनके भरे हुए पुष्ट कूल्हे और पुष्ट सीना एक ऐसी लय पैदा करते थे जिसे अनदेखा करना नामुमकिन था। उनके काले घने बाल उनकी पीठ पर किसी नागिन की तरह लहरा रहे थे, और उनसे आती चमेली की भीनी खुशबू हवा में एक नशा सा घोल रही थी। मैं उनका बेटा था, उनसे बेइंतहा प्यार करता था, पर उस दिन मेरी आँखों में उनके लिए सिर्फ ममता नहीं, बल्कि उनकी बेपनाह खूबसूरती के लिए एक गहरी अचरज भरी कशिश थी।

मेरी अम्मी बहुत केयरिंग थीं, जिनकी दुनिया उनकी फैमिली के इर्द-गिर्द ही घूमती थी। उनकी मुस्कुराहट ऐसी थी जो दिल को सुकून दे।

सफर की शुरुआत ही हंगामेदार रही। रेलवे स्टेशन पर जैसे इंसानों का समंदर उमड़ पड़ा था। अब्बू साथ नहीं थे, इसलिए नानी और अम्मी की ज़िम्मेदारी मेरे कंधों पर थी।

उस दिन सफर के लिए अम्मी ने एक ढीला-ढाला काला अबाया और चेहरे पर ब्राउन वेल (नकाब) पहना हुआ था। उनका पूरा जिस्म सिर से पैर तक ढका था। ऊपर से देखने पर सिर्फ एक स्याह साया नज़र आता, लेकिन अम्मी का वह अबाया उनकी बेपनाह खूबसूरती को छुपाने में नाकाम था।

उनका गोरा रंग अबाया के स्याह काले रंग के कॉन्ट्रास्ट में किसी जलते हुए दीये की तरह खिल उठा था। अबाया ने उनके जिस्म को ज़रूर ढका था, मगर उनके दूधिया सफेद हाथ जब अबाया की आस्तीनों से बाहर निकलते, तो काले कपड़े पर उनकी सफेदी किसी संगमरमर की तरह चमकती थी। नकाब के पीछे से उनकी बड़ी-बड़ी काली आँखें जब उठतीं, तो ऐसा लगता जैसे कोई गहरा राज़ बेपर्दा होने को हो।

चलते वक्त जब अबाया की ज़मीन चूमती हुई किनारियाँ हल्की सी ऊपर उठतीं, तो उनके नर्म और गोरे पैरों की एक छोटी सी झलक दिख जाती, जो काले अबाया के साथ एक कयामत सा कंट्रास्ट पैदा कर रही थी। वह झलक चीख-चीख कर बता रही थी कि उस काले लिबास के नीचे छिपा हुआ पूरा बदन किस कदर दूधिया और बेदाग होगा।

अबाया कितना भी ढीला क्यों न हो, जब हवा का कोई झोंका उनसे टकराता या वह मुड़तीं, तो कपड़े का खिंचाव उनके भरे हुए सीने और पुष्ट कूल्हों के कर्व को साफ़ बयां कर देता था।

जैसे ही ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आकर रुकी, कोच के दरवाजे पर चढ़ने वालों की एक अंधी दौड़ शुरू हो गई। स्टेशन का वह शोर-शराबा और धक्का-मुक्की किसी अनहोनी का इशारा दे रहे थे। भीड़ का फायदा उठाकर कुछ आवारा किस्म के लोग अम्मी के इर्द-गिर्द घेरा बनाने लगे। हालाँकि अम्मी उस ढीले-ढाले काले अबाया में पूरी तरह ढकी थीं, लेकिन उन भेड़ियों की भूखी नज़रें उस कपड़े के पार देख रही थीं। वे अम्मी के चलने की लय और अबाया के खिंचाव से उनके जिस्म के उतार-चढ़ाव का अंदाज़ा लगा रहे थे।

मैंने देखा कि कैसे एक हट्टे-कट्टे आदमी ने जानबूझकर अम्मी के बिल्कुल करीब आने की कोशिश की, उसकी नज़रें अम्मी के अबाया से ढके पुष्ट कूल्हों पर जमी हुई थीं। भीड़ के एक ज़ोरदार रेले ने अम्मी का संतुलन बिगाड़ दिया, और वह लड़खड़ाकर पीछे की ओर झुकीं।

"साहिल... बचा मुझे!" अम्मी की आवाज़ नकाब के पीछे से कांपती हुई और बेहद बेबस सी आई।

उसी पल, उस भीड़ का फायदा उठाकर एक गंदा हाथ बड़ी चालाकी से अम्मी के अबाया के ऊपर से ही उनकी सुडौल गाँड तक पहुँचा। उस शख्स ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई और अम्मी के भरे हुए कूल्हे को मजबूती से दबोचकर भींच दिया। अम्मी के मुँह से एक दबी हुई चीख निकली, वह बुरी तरह डर गईं और थरथराने लगीं। उस स्पर्श की दरिंदगी ने उन्हें अंदर तक हिला दिया था।

"साहिल!" उन्होंने दहशत में मेरा नाम पुकारा।

मेरी रगों में खून खौल उठा। मैंने पलक झपकते ही अम्मी की कमर में अपना हाथ डाला और उन्हें अपनी ओर पूरी ताक़त से खींच लिया। मेरा हाथ उनके अबाया के कपड़े के ऊपर था, लेकिन उस ढीले लिबास के नीचे से भी मुझे उनकी पतली कमर की गोलाई और उनके दहकते बदन की तपिश का साफ़ अहसास हुआ। वह खौफ के मारे मुझसे पूरी तरह चिपक गईं। उनका अबाया से ढका हुआ भारी सीना मेरी छाती से ज़ोर से सट गया था। मैं उनकी तेज़ होती धड़कनों को अपने सीने पर महसूस कर सकता था, और उस पल उनकी बेबसी ने मेरे अंदर उन्हें बचाने के एक नए जुनून को जन्म दे दिया था।

जैसे ही भीड़ का एक और रेला आया, अम्मी पूरी तरह से मुझ पर ढह गईं। उनकी पूरी देह मेरे जिस्म से इस कदर चिपकी हुई थी कि उनके और मेरे बीच हवा की भी जगह नहीं बची थी। उस पल, पहली बार मुझे अपनी अम्मी के भरे हुए सीने का स्पर्श इतनी नज़दीकी से महसूस हुआ। अबाया के कपड़े के पीछे भी उनके उरोजों की नरमी और उनका उभार मेरी छाती पर दबाव बना रहा था। वह अहसास इतना नर्म और मखमली था कि मेरे ज़हन में एक बिजली सी कौंध गई। एक बेटे के तौर पर मैंने कभी ऐसा नहीं सोचा था, पर उस दबाव और उनके बदन की गर्मी ने मेरे अंदर एक अजीब सी सिहरन पैदा कर दी थी।

तभी पीछे से लोगों का एक ज़ोरदार धक्का लगा, जिसने अम्मी को मेरे और करीब धकेल दिया। वह इस कदर घबरा गईं कि उन्हें लगा जैसे उनका दम घुट जाएगा। अपनी स्थिति को समझने और भीड़ के बीच रास्ता देखने की जद्दोजहद में, उन्होंने आनन-फानन में अपने चेहरे से ब्राउन नकाब हटा दिया।

जैसे ही उन्होंने नकाब हटाया, ऐसा लगा मानो काली घटाओं के पीछे से अचानक पूरा चाँद निकल आया हो। उनका वह दूधिया सफेद चेहरा, पसीने की छोटी-छोटी बूंदों से चमकता हुआ, उन गंदी नीयत वाले लोगों के सामने बेपर्दा हो गया। उनकी बड़ी-बड़ी आँखों में फैली दहशत और उनके गुलाबी लब, जो डर से कांप रहे थे, ने वहाँ मौजूद हर शख्स की साँसें थाम दीं।

स्टेशन की रोशनी में उनका चेहरा किसी दैवीय अप्सरा की तरह दमक रहा था। जो लोग अब तक सिर्फ अबाया के पीछे के जिस्म का अंदाज़ा लगा रहे थे, उनके सामने अब वह बेपनाह हुस्न साक्षात था। हर तरफ जैसे एक सन्नाटा सा छा गया, हर नज़र उनकी उस नूरानी खूबसूरती पर गड़ गई थी। अम्मी अपनी ही खूबसूरती से बेखबर, बस मेरी आँखों में अपनी जान की सलामती तलाश रही थीं, जबकि मैं उन्हें उस भीड़ की दरिंदा नज़रों से बचाने के लिए और कसकर अपने घेरे में ले चुका था।

नानी, जो उम्र के इस पड़ाव पर भी अपनी पैनी समझ रखती थीं, तुरंत ताड़ गईं कि भीड़ की आड़ में क्या गंदा खेल खेला जा रहा है। उन्होंने देखा कि कैसे अम्मी बेबस होकर मुझ पर ढह गई हैं और उनका चेहरा बेपर्दा हो चुका है। अपनी उम्र की कमज़ोरी को दरकिनार करते हुए, वह फौरन अम्मी के पीछे आकर किसी ढाल की तरह खड़ी हो गईं।

नानी की आँखों में उस वक्त ममता नहीं, बल्कि एक शेरनी जैसा गुस्सा था।

उन्होंने ज़ोरदार आवाज़ में उन आवारा लोगों को फटकारते हुए कहा:

"शर्म नहीं आती तुम लोगों को? डूब मरो कहीं! यह जो हरकतें कर रहे हो, याद रखना, तुम्हारे घर में भी माँ-बहनें और बेटियाँ होंगी। क्या उनके साथ भी यही तमाशा होते देखना चाहते हो? इंसानियत मर गई है क्या तुम सबकी?"

नानी की कड़क आवाज़ और उस फटकार में इतना दम था कि आस-पास के कुछ लोग शर्मिंदगी से नज़रें झुकाने लगे। उनका वह रौब देखकर जो हाथ अम्मी के मखमली बदन की टोह ले रहे थे, वे अचानक ठिठक कर पीछे हट गए।

नानी ने अम्मी का हाथ मज़बूती से पकड़ा और मेरी तरफ देखते हुए इशारा किया कि हम अंदर की तरफ बढ़ें। अम्मी अभी भी कांप रही थीं, उनका चेहरा मेरी छाती में छिपा हुआ था और उनके नर्म सीने का दबाव अभी भी मेरी धड़कनों को बेकाबू कर रहा था। नानी के पीछे से मोर्चा संभालने के बाद, मैंने भी पूरे ज़ोर से रास्ता बनाया और हम आखिरकार उस दरिंदा भीड़ को पीछे छोड़ते हुए ट्रेन के डिब्बे के अंदर दाखिल हो गए।

मुश्किल से हम डिब्बे के अंदर पहुँचे। अम्मी की साँसें अभी भी उखड़ी हुई थीं। जब वह अपनी सीट पर बैठीं। उनके चाँद से गोल चेहरे पर पसीने की नन्हीं बूंदें चमक रही थीं। उन्होंने अबाया को थोड़ा ढीला किया, जिससे उनकी लंबी सुराहीदार गर्दन का वह गोरा हिस्सा अबाया के काले कॉलर से उभर कर सामने आ गया।

मैं उनके सामने बैठा, उन्हें देख रहा था। मेरे मन में उनके लिए कोई गलत विचार नहीं था, पर उस भीड़ भरे हादसे और अबाया के ऊपर से हुए उन स्पर्शों ने मेरे अंदर एक अजीब सी जागरूकता भर दी थी। मुझे अहसास हुआ कि मेरी अम्मी सिर्फ मेरी अम्मी नहीं, बल्कि एक ऐसी औरत हैं जिनकी एक झलक, चाहे वह अबाया में ही क्यों न हो, ज़माने को बेताब कर देती है। उनकी वह मासूमियत और अबाया के पीछे छिपा वह कातिलाना बदन, दोनों मिलकर एक ऐसा जादू जगा रहे थे जिसने मुझे उस दिन पहली बार अपनी ही अम्मी को एक अलग नज़रिए से देखने पर मजबूर कर दिया।

अम्मी ने मेरी तरफ देखकर एक फीकी सी मुस्कान दी और कहा, "शुक्रिया साहिल, अगर तू नहीं होता तो आज पता नहीं क्या होता..."

उनकी वह शहद सी मीठी आवाज़ मेरे कानों में मिश्री की तरह घुली, और मैंने बस इतना सोचा कि मैं ता उम्र उनकी ढाल बनकर खड़ा रहूँगा।

ट्रेन की डिम लाइट और पहियों की गूँज के बीच, वह सफर मेरे वजूद में एक ऐसी हलचल मचा रहा था जिसे मैं चाहकर भी दबा नहीं पा रहा था। मैं अम्मी के बिल्कुल बगल में सटकर बैठा था। नानी खिड़की वाली सीट पर गहरी नींद में थीं, उनकी हल्की खर्राटों की आवाज़ डिब्बे के सन्नाटे में घुल रही थी।

अम्मी का वह काला ढीला-ढाला अबाया अब हमारे बीच की दूरी को मिटाने में नाकाम साबित हो रहा था। ट्रेन की हर थरथराहट और हर मोड़ पर आने वाला झटका अम्मी के नर्म और गर्म जिस्म को मेरे शरीर से ज़ोर से टकरा देता था।

जब भी ट्रेन की रफ़्तार तेज़ होती, उनका भारी और सुडौल सीना मेरी बाँह से रगड़ खाता, जिससे मुझे उस मखमली दबाव का गहरा अहसास होता। उनके जिस्म की वह आग जैसी तपिश अबाया के कपड़े को पार कर मेरे जिस्म में उतर रही थी, जिससे मेरी नसों में एक अजीब सी बेचैनी दौड़ने लगी।

अबाया की आस्तीनों से बाहर झाँकते उनके दूधिया सफेद हाथ चांदनी में और भी हसीन लग रहे थे। उनसे आती लोशन और चमेली की मिली-जुली भीनी खुशबू मेरे नथुनों से टकराकर मेरे दिमाग में एक नशा सा घोल रही थी।

"बेटा, दिल्ली में बहुत मज़ा आएगा," अम्मी ने आहिस्ता से फुसफुसाकर कहा।

उनकी वह शहद सी मीठी आवाज़ और उनके लबों की गर्माहट मेरे कान के पास महसूस हुई, जिससे मेरे रोंगटे खड़े हो गए। उनकी आँखों में शादी की खुशी थी, पर मेरी नज़रें उनके उन गुलाबी होंठों और उस लंबी सुराहीदार गर्दन पर टिक गई थीं जो नकाब हटने के बाद अब पूरी तरह नुमाया थी।

ट्रेन की एक ज़ोरदार वाइब्रेशन ने अम्मी को पूरी तरह मेरी तरफ धकेल दिया। उनका चौड़ा कूल्हा मेरी जांघ से ज़ोर से सटा और उनकी पतली कमर का झुकाव मेरे पर आ टिका। उस पल मुझे गहराई से अहसास हुआ कि मेरी अम्मी कितनी सेक्सी और दिलकश हैं। उनके बदन का हर कर्व, हर उभार एक कयामत था। मेरे अंदर कामुकता की एक तेज़ लहर उठी, जिसने मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू कर दीं।

पर जैसे ही यह ख्याल आया, मेरे ज़हन में एक बिजली सी कौंधी। 'यह क्या सोच रहा हूँ मैं? यह गुनाह है, महापाप है!' मैंने झटके से अपनी आँखें बंद कर लीं और उस ज़हरीले मगर मीठे ख्याल को झटकने की कोशिश की।

वह मेरी अम्मी थीं, मेरी जन्नत। लेकिन उनके बदन की वह छुअन और वह खुशबू मुझे बार-बार उसी दलदल की तरफ खींच रही थी। मैंने अपना सर उनके कंधे पर टिका दिया, पर ट्रेन की हर हरकत उनके नर्म गोश्त को मुझसे रगड़ रही थी, जो मुझे बार-बार यह याद दिला रहा था कि मेरी 'जन्नत' इस दुनिया की सबसे खूबसूरत और कशिश भरी औरत है। वह रात महज़ एक सफर नहीं, बल्कि मेरे अंदर शुरू होने वाले एक नए और खतरनाक अध्याय की पहली दस्तक थी।
वाह!
 
अध्याय 2

रात के दस बज रहे थे। ट्रेन की पीली डिम लाइटों ने डिब्बे के भीतर एक धुंधला और कामुक सा माहौल बना दिया था। सोने की तैयारी हो रही थी, और अम्मी अपनी नीचे वाली बर्थ पर अपना बैग टटोल रही थीं। नानी पहले ही चादर ओढ़कर सुस्ताने लगी थीं।

अम्मी ने बैग से अपनी नीले रंग की रेशमी नाइटगाउन निकाली। अम्मी ने उसे हाथ में लिया, तो उनके दूधिया सफेद हाथ उस नीले रंग के साथ एक गजब का कंट्रास्ट बना रहे थे। वह रात के इस पहर में भी बला की खूबसूरत लग रही थीं।

अम्मी: (धीरे से, नकाब को संभालते हुए) "साहिल... बेटा, सुन तो?"

मैं: (लेटे-लेटे, आवाज़ में थोड़ा आलस भरते हुए) "जी अम्मी, क्या बात है? अब तो सोने का वक्त है।"

अम्मी: (अपनी नाइटगाउन की तरफ इशारा करते हुए) "मुझे कपड़े बदलने हैं... वॉशरूम तक चलना पड़ेगा। पर मुझे बहुत डर लग रहा है। वो स्टेशन वाले लोग... मैंने देखा है, वो अभी भी वहीं गेट के पास खड़े बीड़ी पी रहे हैं।"

मैं: (थोड़ा हिचकिचाते हुए, एक टीनएजर की तरह) "अरे अम्मी, आप भी न! अब मैं क्या साथ चलूँ? लोग देखेंगे तो क्या सोचेंगे कि इतना बड़ा लड़का अपनी अम्मी को कपड़े बदलवाने ले जा रहा है? आप नानी को बोल लो।"

अम्मी: (आँखों में गहरी मिन्नत और थोड़ा डर समेटे) "नहीं बेटा, नानी थक गई हैं। और वो लोग... उनकी नज़रें बहुत गंदी हैं। तू बस दरवाज़े के बाहर खड़ा रह जाना, मुझे लगेगा कि तू पास है तो सुकून रहेगा। प्लीज, मेरा प्यारा बेटा है न?"

अम्मी का वह नर्म और शहद जैसा लहजा सुनकर मेरा सारा विरोध पिघल गया। मुझे अंदर ही अंदर एक अजीब सा गर्व महसूस हुआ कि मेरी इतनी हसीन अम्मी खुद को सुरक्षित रखने के लिए मेरे सहारे की तलाश में हैं।

मैं: (नीचे उतरते हुए) "ठीक है, चलिए। घबराइए मत, मैं हूँ न।"

अम्मी के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आई। वह आगे बढ़ीं और मैं उनके पीछे। गलियारे के तंग रास्ते में जब वह चल रही थीं, तो उनका ढीला-ढाला काला अबाया उनके सुडौल कूल्हों की हरकत के साथ लहरा रहा था। उनकी चमेली की भीनी खुशबू उस बंद गलियारे में एक नशा सा घोल रही थी।

जैसे ही हम वॉशरूम के करीब पहुँचे। वही हट्टे-कट्टे लोग, जिन्होंने स्टेशन पर अम्मी को छेड़ा था, गेट के पास झुंड बनाकर खड़े बीड़ी पी रहे थे। बीड़ी का कड़वा धुआँ और उनकी दरिंदा नज़रें जैसे ही अम्मी पर पड़ीं, वे आपस में फुसफुसाने लगे। उनकी आँखें अम्मी के हाथ में दबी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन को देख रही थीं, जैसे वे अंदाज़ा लगा रहे हों कि उस अबाया के नीचे क्या-क्या छिपा है।

अम्मी ने डर के मारे मेरा हाथ ज़ोर से पकड़ लिया। उनके नर्म और गर्म पंजों की पकड़ मेरे जिस्म में एक करंट की तरह दौड़ी। उन्होंने खुद को मेरे और करीब कर लिया, जिससे उनका उभरा हुआ सीना मेरी बाँह से रगड़ खाने लगा। उस पल, मुझे अपनी मर्दानगी का अहसास हुआ और साथ ही अम्मी के उस कातिलाना बदन की छुअन ने मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू कर दीं। मैंने उन लोगों को घूरकर देखा और अम्मी को वॉशरूम के दरवाज़े तक ले गया।

जैसे ही अम्मी ने वॉशरूम का भारी लोहे का दरवाज़ा खोला, अंदर से आती एक तेज़ और सड़ांध भरी बदबू ने उनका स्वागत किया। सफ़ाई की कमी और फिनाइल की तीखी गंध ने उनके चेहरे पर शिकन ला दी। अम्मी हमेशा से नज़ाकत और सफ़ाई की आदी रही थीं, और ट्रेन के उस गंदे टॉयलेट को देखकर उनकी आँखों में घिन और बेबसी साफ झलक रही थी।

उन्होंने अपनी नाक पर नाइटगाउन रखा और अंदर की तंग जगह का मुआयना किया। वहाँ न तो कपड़े टांगने की कोई साफ जगह थी और न ही हुक पर भरोसा किया जा सकता था। वह वापस मुड़ीं और मेरी आँखों में झांकते हुए धीरे से फुसफुसायीं।

अम्मी: (नाक सिकोड़ते हुए) "उफ़, साहिल... कितनी गंदी जगह है! यहाँ तो अपना बैग या कपड़े रखना भी मुश्किल है। सब गीला और गंदा पड़ा है।"

मैं: (उनकी परेशानी समझते हुए) "हाँ अम्मी, ट्रेन के टॉयलेट ऐसे ही होते हैं। आप जल्दी से बदल लीजिए, मैं बाहर ही खड़ा हूँ।"

अम्मी: (हिचकिचाते हुए, अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन मेरी तरफ बढ़ाते हुए) "बेटा, तू ज़रा ये पकड़। मैं अंदर जाकर पहले अपना अबाया उतारती हूँ, फिर तू मुझे ये पकड़ा देना। यहाँ कहीं भी रखने की जगह नहीं है, मेरा नया गाउन गंदा हो जाएगा।"

मैंने अम्मी के हाथ से वह नीला रेशमी कपड़ा थाम लिया। उस सिल्क की छुअन इतनी नर्म और चिकनी थी, जैसे अम्मी की अपनी त्वचा।

मुझे अच्छी तरह याद था कि आज सफर के लिए अम्मी ने अबाया के नीचे अपना वह खूबसूरत पीला सूट पहना था। वह सूट काफी तंग था और उसके बाजू नहीं थे—एक स्लीवलेस फिटिंग वाला कुर्ता जो उनके बदन से चिपक कर उनके हर कर्व को उभार देता था।

जैसे ही अम्मी ने दरवाज़ा आधा बंद किया और अंदर की कुंडी लगाई, मुझे अहसास हुआ कि कुछ ही पलों में वह उस भारी काले अबाया को उतार देंगी और उनके उस दूधिया सफेद बदन पर सिर्फ वह तंग पीला कपड़ा रह जाएगा।

मेरे हाथ में उनका नाइटगाउन था। अम्मी अंदर थीं, और मैं बाहर खड़ा उस बंद दरवाज़े के पीछे होने वाली हर सरसराहट को महसूस कर रहा था। मुझे पता था कि जब वह हाथ बाहर निकालेंगी, तो उनके नंगे और गोरे कंधे उस पीले कपड़े के कंट्रास्ट में किसी बिजली की तरह चमकेंगे।

पास खड़े वही आवारा लोग अभी भी तिरछी नज़रों से हमें देख रहे थे, पर मेरा पूरा ध्यान उस दरवाज़े की दरार पर था, जहाँ से अम्मी की गर्माहट और उनकी साँसों की आवाज़ मुझ तक पहुँच रही थी।

ट्रेन ने अचानक एक ज़ोरदार झटका लिया, ठीक उसी पल जब अम्मी ने अपना काला अबाया उतारकर दरवाज़े की कुंडी हल्की सी खोली थी। उनका इरादा बस इतना था कि वह एक हाथ बाहर निकालकर मुझे अबाया पकड़ा दें और मुझसे वह नीली सिल्क की नाइटगाउन ले लें। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।

उस झटके से दरवाज़ा अम्मी के हाथ से छूट गया और पूरी तरह पीछे की ओर खुल गया। अंदर का नज़ारा बिजली की तरह उन आवारा लोगों और मेरी आँखों के सामने कौंध गया।

अबाया के बिना, अम्मी उस तंग और स्लीवलेस पीले सूट में किसी जलपरी की तरह लग रही थीं। वह कुर्ता उनके बदन से इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म का हर उतार-चढ़ाव नुमाया हो रहा था। उस चटक पीले रंग के साथ उनकी दूधिया सफेद त्वचा का कंट्रास्ट इतना तीखा था कि देखने वाले की आँखें चुंधिया जाएँ। उनके गोरे, सुडौल और नंगे कंधे रोशनी में संगमरमर की तरह चमक रहे थे।

चूँकि उन्होंने दुपट्टा नहीं लिया था, उनके गर्व से भरे पुष्ट स्तन उस तंग कपड़े के नीचे अपनी पूरी गोलाई और उभार के साथ साफ़ नज़र आ रहे थे। उनकी पतली कमर और वहाँ से नीचे की ओर बढ़ते चौड़े कूल्हों के कर्व ने एक ऐसी कामुक लय बनाई थी जिसे देखकर कोई भी अपना आपा खो दे। उनके मखमली और गोरे हाथ हवा में आधे खुले हुए थे, और उनके चेहरे पर अचानक आई उस आफत की वजह से गहरी दहशत थी।

वहाँ खड़े उन रऊडी लोगों की आँखों में जैसे हवस का लावा उबल पड़ा। अम्मी की उस नूरानी और कामुक छवि को अचानक अपने सामने पाकर वे अपनी औकात भूल गए।

उनमें से एक हट्टा-कट्टा शख्स, जो बीड़ी पी रहा था, आगे बढ़ा और अम्मी के उस बेपर्दा हुस्न को अपनी गंदी नज़रों से ऊपर से नीचे तक चाटते हुए बड़े भद्दे लहजे में बोला:

"वाह भाई! क्या माल छिपा रखा था काली चादर में... मैडम, अकेले-अकेले बड़ी मुश्किल हो रही होगी। कहो तो अंदर आकर चेंज करने में आपकी थोड़ी मदद कर दें?"

उसकी बात सुनकर पीछे खड़े उसके साथियों ने ज़ोरदार ठहाका लगाया और एक ने लंबी सीटी बजाई। उनकी वह भद्दी हँसी और सीटियाँ उस खामोश गलियारे में ज़हर की तरह घुल गईं। अम्मी का गोरा चेहरा शर्म और खौफ से एकदम लाल पड़ गया। वह अपने दोनों हाथों से अपने भरे हुए सीने को ढंकने की कोशिश करने लगीं, लेकिन उस छोटे से बाथरूम में उनकी बेबसी साफ़ दिख रही थी।

मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने मेरे कान में गरम तेल डाल दिया हो। मेरी अम्मी, जो मेरी नज़र में पवित्रता की मूरत थीं, उनके उस कातिलाना और सेक्सी रूप का इस तरह सरेआम मज़ाक उड़ते देख मेरा खून खौल उठा। एक तरफ तो अम्मी के उस अर्धनग्न और मोहक बदन की छुअन और दृश्य ने मेरे टीनएज दिमाग में एक करंट पैदा कर दिया था, और दूसरी तरफ उन लोगों की ज़ुबान ने मेरी मर्दानगी को ललकारा था।

मेरा खून खौल उठा था। उन बदतमीजों की सीटी और वह भद्दा जुमला मेरे कानों में शीशे की तरह चुभ रहा था। मैंने जैसे ही अपनी मुट्ठियाँ भींचीं और उन दरिंदों की तरफ एक कदम बढ़ाया, अम्मी ने फुर्ती से अपना गोरा और रेशमी हाथ बाहर निकाला और मेरी बाजू थाम ली।

अम्मी: (धीमी और कांपती हुई आवाज़ में) "साहिल... नहीं बेटा! पागल मत बन। तू चुपचाप यहाँ खड़ा रह, बस।"

उनकी आँखों में गहरी दहशत थी। उन्होंने जल्दी से अपना काला अबाया मेरे हाथों में थमाया और बदले में अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन मुझसे ले ली। वह इतनी डरी हुई थीं कि उन्हें होश ही नहीं था कि वह किस हाल में सबके सामने खड़ी हैं। जैसे ही वह मुड़ीं ताकि वापस उस तंग बाथरूम में जाकर दरवाज़ा बंद कर सकें, उन्होंने अनजाने में उन आवारा लोगों को अपनी खूबसूरती का वह हिस्सा दिखा दिया जिसे अब तक सिर्फ अबाया के काले पर्दे ने छुपा रखा था।

जैसे ही अम्मी मुड़ीं, उस तंग पीले सूट का पिछला हिस्सा पूरी तरह नुमाया हो गया। उस कुर्ते की गर्दन पीछे से बहुत गहरी थी, जो उनकी दूधिया सफेद और चिकनी पीठ को लगभग आधा नंगा कर रही थी। उनकी रीढ़ की हड्डी के पास की वह गहरी ढलान और उस पर चमकता पसीना किसी भी मर्द का ईमान डगमगा देने के लिए काफी था।

लेकिन असली कयामत तो नीचे थी। वह पीला सूट उनके सुडौल कूल्हों पर इस कदर चिपका हुआ था कि उनकी गाँड का हर उतार-चढ़ाव साफ़ नज़र आ रहा था। चलते वक्त जब उनके कदम डगमगाए, तो उनके उन मखमली और पुष्ट नितंबों में एक ऐसी लचक पैदा हुई जिसे देखकर वहाँ खड़े उन रऊडी लड़कों की आँखें फटी की फटी रह गईं। वह नंगी गोरी पीठ और उसके नीचे उस पीले कपड़े में कैद वह कातिलाना उभार... वह नज़ारा किसी के भी ज़हन में आग लगाने के लिए काफी था।

उनमें से एक ने अपनी बीड़ी का धुआँ हवा में छोड़ते हुए एक और गंदी आवाज़ निकाली।

"उफ़... पीछे का मंज़र तो सामने से भी ज़्यादा ज़ालिम है! यार, ऐसी 'जन्नत' तो मैंने आज तक नहीं देखी।"

अम्मी ने हड़बड़ी में दरवाज़ा बंद किया। मेरा दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि मुझे अपनी पसलियों में उसकी चोट महसूस हो रही थी। एक तरफ उन लोगों की बदज़ुबानी पर मेरा गुस्सा और दूसरी तरफ अपनी ही अम्मी के उस बेपनाह सेक्सी और छुपे हुए रूप का साक्षात दर्शन—मैं एक ऐसे भंवर में फँस गया था जहाँ 'पाप' और 'हकीकत' के बीच की लकीर धुंधली होती जा रही थी।

बाथरूम के अंदर से कपड़ों की सरसराहट की आवाज़ आ रही थी, और मैं बाहर खड़ा उनके उस दूधिया बदन और उस गहरी गर्दन वाले पीले सूट की यादों से जूझ रहा था।

माहौल पल भर में तनावपूर्ण से खौफनाक हो गया। उन आवारा लड़कों की टोलियों ने बड़ी चालाकी से घेराबंदी कर ली थी। दो लड़के मेरे दाएं-बाएं आकर खड़े हो गए, जिससे मैं उनके बीच सैंडविच की तरह फंस गया। उनमें से एक, जिसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी और मुँह से बीड़ी की बदबू आ रही थी, उसने बड़े हक के साथ अपना हाथ मेरे कंधे पर रख दिया—जैसे हम पुराने दोस्त हों।

उसने अपना मुँह मेरे कान के बिल्कुल करीब लाया और अपनी आवाज़ को इतना धीमा रखा कि सिर्फ मैं सुन सकूँ। उसकी आवाज़ में एक नशीली और गंदी तारीफ घुली हुई थी।

"अबे ओ छोटे... सच बता, ये तेरी अम्मी ही हैं? कसम खुदा की, कोई देख ले तो यकीन न करे। जिस तरह का इनका दूधिया बदन है और वो पीला तंग कुर्ता, ये तो 25 की भी नहीं लगतीं। ऐसी कयामत चीज़ घर में छुपाकर रखी है तूने?"

उसकी बातों ने मेरे ज़हन में एक साथ कई भावनाओं का विस्फोट कर दिया—एक तरफ अम्मी के उस कातिलाना हुस्न का सरेआम ज़िक्र सुनकर मुझे घिन आ रही थी, तो दूसरी तरफ उनकी सेक्सी इमेज का यह खौफनाक सच मुझे अंदर तक हिला रहा था।

तभी मेरी नज़र गैलरी के दूसरे छोर पर पड़ी। दो और लड़के वहाँ दीवार से टिक कर खड़े हो गए थे, उन्होंने हमारा रास्ता पूरी तरह ब्लॉक कर दिया था। अब न तो कोई उधर से आ सकता था और न ही हम वहाँ से भाग सकते थे। नानी अपनी सीट पर सो रही थीं और इस खतरे से बिल्कुल बेखबर थीं।

अचानक मुझे अपनी सुरक्षा की भी उतनी ही फिक्र होने लगी जितनी अम्मी की। मैं सिर्फ एक कॉलेज जाने वाला पतला-दुबला लड़का था, और वे चार हट्टे-कट्टे रऊडी लड़के थे। मुझे समझ आ गया कि वे सिर्फ अम्मी के उस मखमली बदन को निहारने नहीं आए थे, उनके इरादे बहुत खतरनाक थे।

बाथरूम के अंदर से अम्मी के कपड़ों की सरसराहट आ रही थी। मुझे अहसास हुआ कि जब वह उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में बाहर निकलेंगी, तो वह उन भेड़ियों के लिए और भी आसान शिकार बन जाएँगी। उस रेशमी और पारदर्शी कपड़े में उनके भरे हुए सीने और चौड़े कूल्हों का उभार उन लोगों को और भी पागल कर देगा।

मेरी हथेलियाँ पसीने से भीग गई थीं। मैं उन दो लड़कों के बीच फंसा हुआ था, और सामने खड़े दो और लड़के मुस्कुराते हुए मुझे देख रहे थे, जैसे वे किसी बड़ी वारदात की तैयारी में हों। उस बंद और घुटन भरी गैलरी में, अम्मी की सुरक्षा अब पूरी तरह मेरी हिम्मत और समझदारी पर टिकी थी, पर मेरा खुद का दिल खौफ और एक अजीब सी उत्तेजना के बीच बुरी तरह धड़क रहा था।

"देख छोटे, हम बस मैडम से थोड़ी जान-पहचान करना चाहते हैं, तू बीच में मत आना," कंधे पर हाथ रखे हुए शख्स ने दबाब बढ़ाते हुए कहा।

अम्मी को अब किसी भी पल बाहर आना था, और मुझे पता था कि उनका वह गोरा हुस्न इन चार भूखे भेड़ियों के सामने तमाशा बनने वाला है। क्या मैं अपनी अम्मी की इज़्ज़त बचा पाऊँगा? या उनकी वह कातिलाना खूबसूरती हमें किसी बड़ी मुसीबत में झोंक देगी?
बहुत खूब!
 
अध्याय 3

बाथरूम के भीतर से कपड़ों की सरसराहट थमी और कुंडी खुलने की आवाज़ आई। अम्मी ने अपना एक सफेद हाथ बाहर निकाला ताकि मुझसे वह काला अबाया वापस ले सकें और उसे अपनी नीली सिल्क की नाइटगाउन के ऊपर पहन सकें। वह अंदर की गंदगी और बदबू से इतनी परेशान थीं कि जल्द से जल्द बाहर निकलना चाहती थीं।

मगर जैसे ही दरवाज़ा थोड़ा सा खुला, उन भेड़ियों में से एक अपनी जगह से उछला और दरवाज़े के पास जा पहुँचा।

उस शख्स ने अपनी गंदी नज़रों को अम्मी के उस नीले रेशमी लिबास पर गड़ा दिया, जो उनके बदन से चिपक कर उनके पुष्ट सीने और कूल्हों की नुमाइश कर रहा था। वह बड़े बेशर्म लहजे में मुस्कुराते हुए बोला:

"अरे मैडम, इतनी जल्दी क्या है? अंदर बड़ी घुटन है, आप बाहर ही आ जाइए और आराम से यहीं अपना अबाया पहन लीजिए। हमें भी तो ज़रा कुदरत का यह नूरानी बदन जी भर के देखने दीजिए। हम बस आपको ठीक से देखना चाहते हैं, कोई गुनाह तो नहीं कर रहे!"

अम्मी यह सुनकर सन्न रह गईं। उनके चेहरे का रंग सफेद पड़ गया। उन्होंने घबराकर दरवाज़ा ज़ोर से बंद करने की कोशिश की, ताकि वह उन वासना से भरी नज़रों से बच सकें।

मगर वह आदमी शातिर था। जैसे ही अम्मी ने पल्ला खींचा, उसने फुर्ती से अपना भारी जूता दरवाज़े की दरार में फँसा दिया। लोहे का दरवाज़ा उसके पैर से टकराकर रुक गया और बंद नहीं हो सका। अम्मी ने अंदर से पूरी ताक़त लगाई, लेकिन उस हट्टे-कट्टे मर्द के पैर के सामने उनकी नर्म बाहें बेबस थीं।

"प्लीज... दरवाज़ा छोड़ो! साहिल! देखो ये क्या कर रहे हैं!" अम्मी की आवाज़ में रोनी सी चीख थी।

साहिल अम्मी की तरफ बढ़ने की कोशिश करने लगा और चिल्लाया, "मेरी अम्मी को छोड़ दो!" उसे पकड़े हुए एक शख्स ने उसके पेट में घूँसा जड़ दिया और बोला, "ज्यादा बहादुर मत बन।"

साहिल दर्द से दोहरा हो गया, लेकिन फिर भी अम्मी की ओर बढ़ने की कोशिश करता रहा। उसे फिर से पेट में एक और घूँसा पड़ा।

उस शख्स ने दरवाज़े पर अपना हाथ टिका दिया और झुककर अंदर झाँकने की कोशिश करने लगा, जहाँ अम्मी उस पारदर्शी नीली सिल्क में अपनी इज़्ज़त बचाने की जद्दोजहद कर रही थीं। उसने बड़े इत्मीनान से कहा:

"अरे मैडम, घबराती क्यों हैं? आप ज़रा बाहर तो आइए। देखिए, आपका लाडला बेटा भी तो यहीं बाहर खड़ा है। हम कोई पराये थोड़े ही हैं, बस आपकी इस कातिलाना खूबसूरती के कायल हो गए हैं।"

"ज़रा ये दरवाज़ा खोलिए, देखिए, आपका बेटा आपको पुकार रहा है, शायद वह भी अपनी अम्मी को देखना चाहता है।"

मैं उन दो लड़कों के बीच जकड़ा हुआ था, मेरे पेट में असहनीय दर्द हो रहा था। मैं दर्द और अपमान के मारे रो रहा था, तभी एक लड़के ने कहा, "अगर तुमने ज़बान खोली तो अंजाम बुरा होगा," और इतना कहते ही उसने एक रामपुरी चाकू निकाला और मेरी गर्दन पर टिका दिया।

मेरी आँखों के सामने मेरी अम्मी, जो मेरी दुनिया थीं, उस तंग नाइटगाउन में कांप रही थीं। उनके मखमली और भरे हुए अंगों का उभार उस नीले कपड़े के नीचे साफ़ झलक रहा था, जिसे वे दरिंदे अपनी नज़रों से नोच रहे थे।

मुझे अपनी सुरक्षा का भी डर था, पर अम्मी की वह बेबसी देखकर मेरा कलेजा मुँह को आ रहा था। वह दरवाज़ा अब खुला हुआ था, और उन लोगों की पहुँच और अम्मी के दूधिया बदन के बीच अब सिर्फ चंद इंच का फासला बचा था।

"छोड़ दो उन्हें... प्लीज," मेरे मुँह से बस एक कमज़ोर सी आवाज़ निकली, जिसे उन लोगों ने एक ज़ोरदार ठहाके के साथ उड़ा दिया।

अम्मी की आँखें मुझसे मदद मांग रही थीं, और मैं अपनी ही अम्मी के उस सेक्सी और बेपनाह हुस्न को सरेआम नीलाम होते देख रहा था।

जैसे ही अम्मी ने दरवाज़ा बंद करने की आखिरी कोशिश की, उस शख्स ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी।

उसने झटके से अम्मी का वह गोरा और नर्म हाथ पकड़ा और उन्हें बाहर की तरफ खींच लिया। वह ज़ोर इतना ज़बरदस्त था कि अम्मी खुद को संभाल नहीं पाईं और सीधे उस दरिंदे की बाहों में जा गिरीं।

वह आदमी करीब 5 फीट 8 इंच का था, जिसका रंग गहरा सांवला और बदन गठा हुआ था। उसने सिर्फ एक काली बनियान और ट्राउजर पहन रखा था, जिससे उसकी पसीने से तरबतर बाहें और चौड़ा सीना साफ़ दिख रहा था। जब अम्मी का दूधिया सफेद और कोमल बदन उस काले बनियान वाले शख्स के सीने से टकराया, तो वह नज़ारा किसी भी देखने वाले की धड़कन रोक देने के लिए काफी था।

अम्मी उस नीली सिल्क की नाइटगाउन में उसके हाथों में कैद थीं। झटके की वजह से उनका संतुलन बिगड़ गया था और उनके भरे हुए सीने का उभार उस आदमी की सख्त छाती से ज़ोर से सट गया था। सिल्क का वह पतला कपड़ा उन दोनों के जिस्म की गर्मी को एक-दूसरे तक पहुँचा रहा था। अम्मी का वह नूरानी और सेक्सी रूप उस सांवले शख्स की गिरफ्त में और भी ज़्यादा नाजुक और कीमती लग रहा था।

उस शख्स ने अपनी मज़बूत बाहें अम्मी की पतली कमर के गिर्द लपेट लीं, उसकी उंगलियाँ उस नीले रेशम के ऊपर से अम्मी की मखमली त्वचा को महसूस कर रही थीं।

"उफ़... मैडम, आप तो वाकई रुई की तरह नर्म हैं। इतनी जल्दी क्या थी अंदर भागने की? देखिए, अब तो आप खुद ही हमारी बाहों में आ गईं।"

उसने अम्मी के गोरे और नंगे कंधों के पास झुककर एक गहरी साँस ली, जैसे वह उनके बदन की खुशबू को अपने अंदर उतार लेना चाहता हो। अम्मी की आँखें दहशत से फटी रह गई थीं, उनके गुलाबी होंठ थरथरा रहे थे और वह अपनी जान बचाने के लिए उस शख्स के सीने पर अपने दोनों गोरे हाथ रखकर उसे पीछे धकेलने की नाकाम कोशिश कर रही थीं।

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी को एक अजनबी, गंदे आदमी की बाहों में इस तरह अर्धनग्न और बेबस हालत में। उन दो लड़कों ने मुझे अभी भी जकड़ रखा था। मेरे अंदर एक तरफ तो अम्मी को बचाने का पागलपन सवार था, और दूसरी तरफ उनके उस कातिलाना और कामुक बदन की यह नुमाइश मुझे सुन्न कर रही थी।

अम्मी की वह नीली नाइटगाउन उनके सुडौल कूल्हों पर थोड़ी ऊपर चढ़ गई थी, जिससे उनके गोरे पैरों की सफेदी उस अंधेरी गैलरी में चमक रही थी।

वह शख्स अब धीरे-धीरे अपना हाथ उनके कूल्हों की तरफ नीचे ले जा रहा था, और उसके साथियों की गंदी हँसी पूरे डिब्बे में गूँज रही थी।

"साहिल! बचा मुझे... साहिल!" अम्मी की वह बेबस पुकार सीधे मेरे कलेजे को चीर गई। पर फिर अम्मी की निगाह मेरी तरफ गई और उन्होंने देखा कि मेरी गर्दन पर एक रामपुरी चाकू टिका हुआ है। फिर वह अपनी हालत भूल गईं और गिड़गिड़ाते हुए बोलीं, "मेरे बेटे को छोड़ दो, मैं आपकी हर बात मानूँगी।"

वहाँ कोई नहीं था जो हमारी मदद कर सके। नानी सो रही थीं, और रास्ता उन रऊडी लड़कों ने ब्लॉक कर रखा था। मैं अपनी अम्मी की इज़्ज़त को उन गंदे हाथों में बिखरते देख रहा था।

उस सांवले, काली बनियान वाले शख्स की गिरफ्त अम्मी की मखमली कमर पर और मज़बूत हो गई। अम्मी खौफ के मारे पत्थर बन चुकी थीं, उनकी आँखें फटी की फटी रह गई थीं और साँसें तेज़-तेज़ चल रही थीं, जिससे उनकी नीली सिल्क की नाइटगाउन उनके भरे हुए सीने पर ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे हो रही थी।

उस सांवले शख्स ने कहा, "वह तो तुम मानोगी ही मेरी जान।"

उस शख्स ने अपनी नज़रों को अम्मी की लंबी सुराहीदार गर्दन पर टिकाया, जहाँ पसीने की एक नन्हीं बूंद चमक रही थी। उसने अपना गंदा मुँह झुकाया और अपनी जीभ अम्मी की उस सफेद गर्दन पर फेर दी।

वह शख्स: (हवस भरी आवाज़ में चाटते हुए) "उफ़... कितनी मीठी है तू! कसम से, चीनी जैसी सफेदी और शहद जैसी मिठास।"

अम्मी के पूरे बदन में एक सिहरन दौड़ गई। उन्होंने अपनी आँखें ज़ोर से बंद कर लीं और उनके मुँह से एक दबी हुई सिसकी निकली। वह घिनौना स्पर्श उनके नर्म त्वचा पर किसी ज़हर की तरह लग रहा था।

वह शख्स: "डर मत जान... हम कुछ नहीं करेंगे। हम बस तुझे अच्छी तरह से देखना चाहते हैं। इतना कातिलाना हुस्न खुदा ने सिर्फ पर्दों में छुपाने के लिए थोड़े ही बनाया है।"

यह कहते हुए, उसने अम्मी को झटके से ट्रेन के टॉयलेट वाले कॉरिडोर के बीच में धकेल दिया, जहाँ रोशनी थोड़ी ज़्यादा थी। उसने अम्मी को बीच में खड़ा कर दिया ताकि वह एक तमाशा बन जाएँ। अब घेराबंदी ऐसी थी कि अम्मी का नूरानी बदन हर तरफ से देखा जा सकता था।

सामने का मंज़र: दो लड़के अम्मी के ठीक सामने खड़े थे, उनकी भूखी नज़रें अम्मी के नीले रेशमी गाउन के नीचे छिपे उनके पुष्ट स्तनों और उनके मखमली पेट के उभारों को ताक रही थीं। अम्मी ने अपने दोनों हाथ अपने सीने पर रख लिए थे, मगर वह रेशमी कपड़ा इतना पतला था कि उनकी बेबसी छिप नहीं पा रही थी।

पीछे का मंज़र: बाकी के दो लड़के (जिन्होंने मुझे पकड़ रखा था) अम्मी की पीठ की तरफ थे। उन्हें अम्मी की वह नंगी गोरी पीठ और उस तंग नाइटगाउन में कैद उनके सुडौल कूल्हों का पूरा नज़ारा मिल रहा था।

मैं अपनी अम्मी को इस तरह चार दरिंदों के बीच एक खिलौने की तरह नुमाइश बनते देख रहा था। मेरे कंधे पर रखा वह हाथ अब और नीचे सरक रहा था, जैसे वह मुझे डरा रहा हो। अम्मी उस नीली सिल्क में किसी अप्सरा जैसी लग रही थीं, पर उनकी आँखों में जो बेबसी थी, उसने मेरा कलेजा छलनी कर दिया था।

उन लड़कों की गंदी फुसफुसाहट और उनकी सीटियाँ उस बंद गलियारे में गूँज रही थीं। वे अम्मी के बदन के एक-एक हिस्से पर गंदे कमेंट्स कर रहे थे।

"देख भाई, क्या सुडौल बनावट है... पीछे से तो एकदम कयामत लग रही है!" एक ने अम्मी के कूल्हों की तरफ इशारा करते हुए कहा। मैंने न चाहते हुए भी उस तरफ देखा, अम्मी की नाइटी उनके कूल्हों से चिपकी हुई थी और उनके उभारों को साफ़ बयां कर रही थी। मेरे साथ वाला लड़का बोला, "क्या मस्त गांड है, आज तो मारने का मज़ा आ जाएगा।"

अम्मी रो रही थीं, उनका चेहरा लाल पड़ गया था और वह बस दीवार से सटकर खुद को छोटा करने की कोशिश कर रही थीं। पर वह तंग नाइटगाउन उनके हर कामुक कर्व को धोखेबाज़ की तरह ज़माने के सामने पेश कर रहा था। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहा था, बस अपनी ही अम्मी के उस सेक्सी और बेपनाह हुस्न को इन भेड़ियों की नज़रों से नीलाम होते देख रहा था।

उस काली बनियान वाले शख्स ने अम्मी की पतली कमर पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली, उसकी उंगलियाँ नीले सिल्क के कपड़े को मरोड़ते हुए अम्मी के नर्म त्वचा में धंस रही थीं।

उसने अम्मी के कान के पास झुककर अपनी भारी और घिनौनी आवाज़ में आदेश दिया:

"चल अब धीरे से घूम जा... ताकि सबको अच्छे से तू नज़र आ सके। आगे का नज़ारा तो देख लिया, अब ज़रा पीछे की वह कातिलाना ढलान भी दिखा दे सबको।"

अम्मी पत्थर की मूरत बन गई थीं। उनकी आँखों से आँसू बहकर उनके दूधिया गालों पर लुढ़क रहे थे। उन्होंने इनकार में धीरे से सिर हिलाया, उनकी रूह कांप रही थी। पर उस काली बनियान वाले दरिंदे को 'ना' सुनने की आदत नहीं थी।

उसने अम्मी को कंधे से पकड़ा और ज़ोर का झटका देकर उन्हें गोल घुमा दिया। अम्मी की नीली सिल्क की नाइटगाउन हवा में एक लहर की तरह लहराई, जिससे उनके गोरे और सुडौल पैरों की सफेदी घुटनों तक नुमाया हो गई।

अब अम्मी की पीठ उस काली बनियान वाले शख्स की तरफ थी, और उनके शरीर का पिछला हिस्सा पूरी तरह उसके सामने था। उस डीप नेक नाइटगाउन में अम्मी की नंगी सफेद पीठ किसी संगमरमर की सिल्ली की तरह चमक रही थी। रीढ़ की हड्डी के पास जो पसीने की चमक थी, वह रोशनी में किसी हीरे जैसी लग रही थी। मगर उस भेड़िये की नज़रें तो नीचे टिकी थीं, जहाँ वह रेशमी कपड़ा अम्मी के पुष्ट कूल्हों पर इस कदर चिपका था कि उनके जिस्म की हर लचक साफ़ दिखाई दे रही थी।

इस घुमाव के कारण, अम्मी का सामने का पूरा हिस्सा अब मेरी और मेरे साथ खड़े उन दो रऊडी लड़कों की तरफ हो गया था। उस तंग और झीने नीले रेशमी कपड़े के नीचे अम्मी के रसीले और भरे हुए मम्मे अपनी पूरी गोलाई और उभार के साथ साफ़ नज़र आ रहे थे। वे कयामत ढा रहे थे। उन दोनों लड़कों की आँखें हवस से फैल गईं और वे अम्मी के उस बेपनाह और कामुक हुस्न को एक-टक निहारने लगे। अम्मी ने शर्म के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं और अपने दूधिया हाथों से अपने सीने को ढंकने की नाकाम कोशिश करने लगीं, पर उनकी बेबसी उस पारदर्शी कपड़े के आर-पार साफ़ झलक रही थी।

अम्मी ने शर्म के मारे अपना चेहरा दीवार की तरफ कर लिया था, पर उनका वह कातिलाना बदन अब सबके लिए एक खुली किताब बन चुका था।

एक लड़का: (सीटी बजाते हुए) "वाह भाई! क्या गज़ब की बनावट है। कसम से, ऐसी सुडौल गाँड तो मैंने आज तक नहीं देखी। ये पीला सूट उतारकर इस नीले रेशम में तो मैडम एकदम परी लग रही हैं।"

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी को एक बाज़ारू चीज़ की तरह गोल-गोल घूमते हुए। मेरा दिल चीख रहा था, पर उन दो लड़कों ने मुझे अपनी गिरफ्त में इस कदर जकड़ रखा था कि मैं हिल भी नहीं पा रहा था। एक तरफ अम्मी की वह बेबसी और दूसरी तरफ उनके उस सेक्सी और कामुक रूप की यह नुमाइश मेरे किशोर मन में एक ऐसा तूफ़ान खड़ा कर रही थी जिसे मैं समझ नहीं पा रहा था।

वह सांवला शख्स अब अम्मी की पीठ पर अपनी उंगलियाँ फेर रहा था, जैसे वह उस दूधिया सफेदी का अंदाज़ा लगा रहा हो। अम्मी की सिसकियाँ तेज़ हो गई थीं, और वह उस तंग बाथरूम के दरवाज़े की चौखट को अपनी मखमली उंगलियों से ज़ोर से पकड़े हुए थीं, जैसे वही उनका आखिरी सहारा हो।

वही काली बनियान वाला सांवला शख्स, अम्मी के मखमली और पुष्ट बदन को अपनी गिरफ्त में लिए हुए एक शैतानी मुस्कान के साथ खड़ा था। फिर उसने अम्मी के कूल्हों पर धक्का मारा, अम्मी की आँखें डर से फैल गईं क्योंकि उन्हें अहसास हो गया था कि उन्होंने अभी अपनी गांड के बीच क्या महसूस किया है।

उनके मुँह से एक लंबी सिसकी निकली, "नहीं!"

तभी मुझे जकड़े हुए उस राजू नाम के लड़के ने अपनी लार टपकाते हुए सलीम की तरफ देखकर आवाज़ लगाई।

राजू: "ओ सलीम भाई! ज़रा इसके हाथ तो ऊपर करवाओ। इस हूर की परी ने अपने मर्मरी हाथों से अपने रसीले मम्मे ढंक रखे हैं। बाहर से उभार तो दिख रहा है, पर ढंग से दीदार नहीं हो पा रहा। ज़रा पर्दा तो हटाओ!"

राजू की बात सुनकर सलीम ज़ोर से ठहाका मारकर हँसा, उसकी गंदी हँसी उस तंग गलियारे में ज़हर की तरह गूँजी। उसने अम्मी के गोरे और कांपते हुए कन्धों पर अपनी पकड़ और मज़बूत कर ली।

सलीम: (कमीनी मुस्कान के साथ) "अच्छा! तो हमारे राजू भाई को मम्मे देखने हैं? क्यों बे, क्या अभी से दूध पीने का मन कर रहा है क्या? बड़े रसीले और भरे हुए लग रहे हैं न इस नीली सिल्क के नीचे?"

सलीम ने फिर मेरी तरफ एक हिकारत भरी नज़र डाली, जैसे वह मुझे नीचा दिखाना चाहता हो।

सलीम: "क्यों छोटे? तूने तो अपनी अम्मी का दूध पिया ही होगा यहाँ से? अब ज़रा अपने भाईयों को भी तो देखने दे कि कुदरत ने इन्हें कितना सुडौल और भारी बनाया है!"

अम्मी यह सुनकर शर्म और ज़िल्लत से जैसे ज़मीन में गड़ गईं। उनके दूधिया गाल खौफ और अपमान से लाल पड़ गए थे। उन्होंने अपने दोनों हाथों को अपने भरे हुए सीने पर और भी ज़ोर से भींच लिया, जिससे उनकी नीली सिल्क की नाइटगाउन उनके उरोजों की गोलाई पर और भी ज़्यादा तन गई।

सलीम ने अम्मी के दोनों हाथों को झटके से उनके सिर के ऊपर उठा दिया। इस हरकत ने अम्मी के नीले रेशमी लिबास को उनके जिस्म पर और भी ज़्यादा तान दिया। हाथ ऊपर होने की वजह से उनका भरा हुआ सीना और भी बाहर की तरफ उभर आया, जैसे वह उस पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब हो।

उस नीली सिल्क के पारदर्शी खिंचाव के नीचे अम्मी के कठोर और उभरे हुए निप्पल्स साफ़ नज़र आने लगे, जो डर और ठंड की वजह से और भी नुमाया हो गए थे।

अम्मी का वह रसीला और पुष्ट उभार अब सीधे मेरी और उस राजू की नज़रों के सामने था। राजू की आँखों में हवस की चमक बढ़ गई और वह अम्मी के उन मखमली मम्मों को अपनी गंदी नज़रों से टटोलने लगा। अम्मी की आँखें शर्म के मारे बंद थीं, और उनका गोरा चेहरा ऊपर की तरफ खिंच गया था, जिससे उनकी सुराहीदार गर्दन और भी लंबी और दिलकश लग रही थी।

सलीम, जो अम्मी के पीछे खड़ा था, उनकी उन नंगी कलाइयों को ऊपर थामे हुए था। अम्मी की वह नंगी सफेद पीठ उस डीप नेक नाइटगाउन में पूरी तरह बेपर्दा थी। सलीम ने अपनी हवस भरी निगाहें उस संगमरमर जैसी पीठ पर गड़ाईं और अपना गंदा मुँह नीचे झुकाया।

सलीम ने अपनी जीभ अम्मी की उस दूधिया सफेद और चिकनी पीठ पर फेर दी। उसने उनकी रीढ़ की हड्डी के पास चमकते पसीने को चाटते हुए एक गहरी आवाज़ निकाली।

सलीम: "उफ़... खुदा की कसम! कितनी चिकनी और गरम पीठ है तेरी। मन करता है बस यहीं पिघल जाऊँ।"

अम्मी के पूरे वजूद में एक बिजली सी कौंधी। वह अपने हाथ छुड़ाने के लिए छटपटाईं, जिससे उनके उभरे हुए सीने की हरकत और भी तेज़ हो गई और उस नीले रेशम के नीचे उनके मखमली अंगों की लचक ने राजू और उसके साथी को पागल कर दिया।

राजू: (लार टपकाते हुए) "भाई! क्या गज़ब की चीज़ है। इसके मम्मे तो एकदम कयामत हैं। देख तो सही कैसे ऊपर-नीचे हो रहे हैं!"

मैं यह सब देख रहा था—अपनी अम्मी के उस बेपनाह और सेक्सी बदन को इस तरह सरेआम नीलाम होते हुए। उनके उठे हुए निप्पल्स और वह नंगी गोरी पीठ... वह नज़ारा किसी भी मर्द के होश उड़ा देने के लिए काफी था, पर एक बेटे के तौर पर मेरी रूह इस ज़िल्लत से छलनी हो रही थी। अम्मी बस बेबसी में अपना सिर हिला रही थीं, और उनकी सिसकियाँ उस खौफनाक रात की खामोशी को चीर रही थीं।

उन्होंने बड़ी मुश्किल से अपनी आवाज़ को समेटा और कांपते हुए लबों से विनती की।

अम्मी: (रुँधे हुए गले से) "खुदा के वास्ते... अब तो जाने दो। देख लिया न तुमने... अब बस करो, हमें अपनी सीट पर जाने दो।"

उनकी आवाज़ में इतनी बेबसी थी कि कोई पत्थर दिल भी पिघल जाए, मगर उन भेड़ियों पर हवस का भूत सवार था। सलीम एक बार फिर अम्मी के सामने आकर खड़ा हो गया। उसने अम्मी की आँखों में आँखें डालीं और बड़े इत्मीनान से अपना काला हाथ उठाया।

उसने अपनी उंगलियाँ अम्मी के उन गुलाबी और कांपते हुए होंठों पर रख दीं।

सलीम: (फुसफुसाते हुए) "अभी कहाँ जान... अभी तो पार्टी शुरू हुई है। ज़रा ठहरो तो सही, इतनी जल्दी भी क्या है?"

उसकी उंगलियाँ अम्मी के मखमली लबों पर रेंग रही थीं। अम्मी ने खौफ के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं, और उनके गोरे गालों पर शर्म की सुर्खी दौड़ गई।

सलीम: "बस थोड़ा सा टच करने दो... कसम से, अपनी इन आँखों पर यकीन नहीं होता कि खुदा ने किसी को इतना दूधिया और बेदाग गोरा भी बनाया होगा। मन करता है बस इस सफेदी को चख लूँ।"

यह कहते हुए उसने अपना दूसरा हाथ अम्मी के नंगे और सुडौल कंधे पर रख दिया। वह हाथ धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकने लगा, उस नीली सिल्क की नाइटगाउन के कॉलर की तरफ, जहाँ से अम्मी के भरे हुए सीने की गहरी ढलान शुरू होती थी।

अम्मी का पूरा बदन थर-थर कांप रहा था। उनका वह कातिलाना बदन उस तंग नीले लिबास में हर धड़कन के साथ उभरकर सामने आ रहा था।

बाकी लड़के: (पीछे से देखते हुए) "हाँ भाई, ज़रा देख तो सही... ये रंग असली है या कोई जादू है! ऐसी मखमली काया तो सिर्फ ख्वाबों में होती है।"

मैं अपनी अम्मी को इस तरह नीलाम होते देख रहा था। मेरे कंधे पर रखा हाथ अब मुझे और ज़ोर से भींच रहा था।

मेरी नज़रें अम्मी के उस उभरे हुए सीने और सलीम के काले हाथों पर टिकी थीं। एक तरफ अम्मी की इज़्ज़त का सवाल था, और दूसरी तरफ उनकी वह बेपनाह और सेक्सी खूबसूरती जो इस वक्त पूरी दुनिया के सामने बेपर्दा थी।
शानदार लेखन!
 
अध्याय 14

मैं वहीं खड़ा रहा। उन्होंने फोन को अपने सामने रखा। स्क्रीन उनके चेहरे को रोशन कर रही थी।

और अपने होठों को हल्का सा दबाकर एक एंगल बनाया... और वही राज़ भरी मुस्कुराहट उनके चेहरे पर आ गई।

क्लिक।

"उन्होंने सेल्फी ले ली थी। इसके बाद वह अपनी उंगलियों से स्क्रीन पर कुछ टाइप करने लगी। एक पल के लिए उनके हाथ रुके, शायद उन्होंने कुछ सोचा, और फिर 'सेंड' का बटन दबा दिया। इसके तुरंत बाद, वह अपने फोन में कुछ ढूंढने लगीं, जैसे कोई और पुरानी तस्वीर तलाश रही हों।

कुछ ही देर बाद मैंने देखा कि अम्मी के हाथ बुरी तरह कांप रहे थे—अब वह कंपन किसी गहरी उत्तेजना की वजह से था या फिर किसी अनजाने खौफ से, मैं इस बात को समझ नहीं पा रहा था। फिर ऐसा लगा जैसे उन्होंने एक और मैसेज भेजा हो। उस वक्त अम्मी का पूरा चेहरा शर्म और घबराहट से लाल हो चुका था।

उन्हें इस हालत में देखकर मेरा दिल बैठा जा रहा था... मेरे ज़हन में बस एक ही खौफनाक सवाल बार-बार कौंध रहा था कि क्या अम्मी ने विशाल की उस गंदी डिमांड के हिसाब से अपनी तस्वीरें उसे भेज दी हैं?"

“आयशा…कहाँ हो…” नीचे से किसी रिश्तेदार की आवाज़ आई।

"बस आई….," उन्होंने फोन को क्लच में डालते हुए, बिना मेरी तरफ देखे, कहा और कमरे से निकल गईं।

मैं अपनी जगह पर जड़ होकर वहीं खड़ा रहा, जैसे पैर ज़मीन से चिपक गए हों। मेरे कानों में नीचे चल रही पार्टी का वह हल्का, धुंधला सा शोर अब बिल्कुल नहीं आ रहा था; बल्कि मेरे दिमाग के सन्नाटे में विशाल के वो खौफनाक मैसेज बार-बार गूँज रहे थे: "ब्लैक पहनिये, विद रेड अंडरगारमेंट्स ... मुझे पिक्चर में गुलाबी निपल्स नज़र आने चाहिए..."

एक-एक शब्द मेरे कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहा था। और अब... सबसे बड़ा खौफ हकीकत में बदल चुका था। उसने सब कुछ देख लिया था।

मेरा गला सूख रहा था। मैंने ड्रेसिंग टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाया और एक ही सांस में पूरा पी लिया। फिर मैंने आईने में खुद को देखा। वही आईना जिसमें अम्मी ने अभी अपना अक्स देखा था। मुझे अपनी आँखों में गुस्से के बदले एक अजीब सी थकावट और बेचारगी दिखाई दी।

'तैयार हो जाओ,' उन्होंने कहा था। हाँ, मैं तैयार होऊँगा।

मैं अब इस पार्टी को मिस नहीं कर सकता। मैं अब सिर्फ एक बेटा नहीं था जो शादी में आया है। मैं एक गवाह बन गया था। एक जासूस।

मैंने रोबोट की तरह अलमारी खोली और अपना कुर्ता निकाला। मैं जल्दी-जल्दी तैयार हुआ। हर कपड़ा जो मैं पहन रहा था, वह मुझे कांटों की तरह चुभ रहा था। मेरा दिमाग बस एक ही चीज़ सोच रहा था...।

उसने अब वह तस्वीर देख ली होगी। वह अब क्या कह रहा होगा? क्या अम्मी नीचे पार्टी में भी उससे बात करेंगी?

मैं कमरे से निकला और सीढ़ियों की ओर बढ़ा। जैसे-जैसे मैं नीचे उतर रहा था, म्यूज़िक तेज़ होता जा रहा था। लॉन को लाइटों से सजाया गया था। लोगों का एक बड़ा हुजूम था—रिश्तेदार, दोस्त, सभी हंस-बोल रहे थे।

मेरी आँखें भीड़ को चीरते हुए सिर्फ एक शख्स को ढूँढ रही थीं। और वह मुझे फौरन दिख गई। वह लॉन के एक कोने में सायमा और कुछ दूसरी औरतों के साथ खड़ी थीं। उनके हाथ में एक जूस का गिलास था। और वह हंस रही थीं। खिलखिला कर। वह काला सूट भीड़ में अलग ही चमक रहा था, बिल्कुल वैसा ही जैसा विशाल ने इमेजिन किया होगा।

मैं वहीं, सीढ़ियों के पास, एक पत्थर की मूरत बनकर खड़ा रहा।

बाहर लॉन में ढोल की थाप, म्यूज़िक का शोर और लोगों के बुलंद कहकहे गूँज रहे थे। लेकिन मेरे कानों में, ये सारी आवाज़ें जैसे हज़ारों मील दूर से आ रही थीं। एक घुटन वाली खामोशी ने मुझे जकड़ रखा था।

मेरी निगाहें, एक चुंबकीय कशिश के साथ, भीड़ को काटकर सिर्फ अम्मी पर टिक गईं। रिश्तेदारों और लोगों का हुजूम था और लाउडस्पीकर पर फिल्मी गाने बज रहे थे। चारों ओर खुशी का माहौल था, पर पता नहीं मैं क्यों उदास था।

वह एक माँ, एक बीवी और एक इज़्ज़तदार औरत की तरह बहुत ही नॉर्मल और बेफिक्र लग रही थीं। लेकिन अंदर ही अंदर मैं जानता था कि यह सब एक झूठ और धोखा था।

उन्होंने अपने एक हाथ में एक सुनहरा क्लच पकड़ा हुआ था। वही क्लच जिसमें उनका फोन था। और वही फोन जिसमें अब 'विशाल' का जवाब आ चुका होगा।

'मस्त…' 'काश मैं वहाँ होता…..' 'तिल…..,'

मेरे दिमाग में उस हरामखोर के लफ़्ज़ गूँज रहे थे।

"अरे साहिल, यहाँ अकेले क्यों खड़े हो?" सायमा खाला की दूसरी बहन ने मेरे पास आते ही कहा।

"सब वहाँ हैं। चलो।"

मैंने ज़बरदस्ती अपने चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की कोशिश की। एक ऐसी मुस्कुराहट जो मेरे होंठों से आगे नहीं जा सकी।

"जी… बस अभी आया।"

"अम्मी को देखा?" उन्होंने अम्मी की तरफ इशारा करते हुए कहा। "आज तो बहुत खूबसूरत लग रही हैं।"

"हाँ," मैं बस इतना ही कह पाया। मेरी ज़बान मेरा साथ नहीं दे रही थी।

वह आंटी आगे बढ़ गईं, और मैं वहीं खड़ा रहा।

अम्मी,सायमा और दूसरी औरतों से हंस-हंस कर बातें कर रही थीं लेकिन उनकी नज़र बार-बार भीड़ में इधर-उधर दौड़ जाती थी…जैसे किसी को ढूँढ रही हों।

फिर, वही हुआ जिसका मुझे इंतज़ार था।

उन्होंने बातों-बातों के बीच बड़े ही कैज़ुअल अंदाज में, अपना क्लच खोला और अपने मोबाइल को चेक किया। फिर उन्होंने फौरन फोन को वापस अंदर रख दिया और क्लच बंद कर दिया।

उन्होंने सायमा खाला से कुछ कहा और पलटकर भीड़ से निकल गईं। वह आहिस्ता से लॉन के उस हिस्से की तरफ चलने लगीं जहाँ कैटरिंग के स्टॉल्स लगे हुए थे। स्टॉल्स के पीछे रोशनी थोड़ी कम थी और लोगों का आना-जाना भी बहुत नहीं था।

मेरे पैरों ने खुद-बा-खुद हरकत की।

मैं लोगों के बीच से रास्ता बनाता, उनसे थोड़ा सा फासला रखते हुए, उनके पीछे चल पड़ा। हर कदम जो मैं उठा रहा था, मेरे दिल पर बोझ बन रहा था। मैं यह नहीं करना चाहता था। मैं भाग जाना चाहता था। लेकिन मैं रुक नहीं सका। मुझे जानना था। मुझे पूरा सच देखना था।

वह एक सजावटी दरख्त के पास, अंधेरे में रुक गयीं। उन्होंने इधर-उधर देखा। मैं एक फूड स्टॉल के पीछे छुप गया।

उन्होंने फोन निकाला। स्क्रीन की रोशनी ने उनके चेहरे को एक पल के लिए नीला कर दिया। और फिर... उन्होंने फोन को अपने कान से लगा लिया। वह किसी से फोन पर बातें कर रही थी।

मैं थोड़ा और करीब हुआ, इतना कि उनकी आवाज़ का हल्का सा, सरसराता अंदाज़ मुझ तक पहुँच सके।

"हेलो…," उन्होंने कहा। आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी।

"पागल हो," वह धीरे से हंसीं। "अभी तो भेजी… इतनी जल्दी?"

मेरा खून जिस्म में जम गया।

"नहीं, नहीं…. अभी नहीं…सब लोग हैं यहाँ...," उन्होंने अपनी पीठ भीड़ की तरफ करते हुए कहा, ताकि उनकी आवाज़ साफ़ जा सके।

"अच्छा... सच में? ... Thank you."

वह 'thank you' इतना नर्म था, इतना... गहरा था। यह वह 'thank you' नहीं था जो रिश्तेदारों को दिया जाता है।

"तुम भी ना..." वह फिर से हंसीं। "बस अब रखती हूँ... कोई आ ना जाए। बाद में।"

"हेलो…," अम्मी ने फोन कान से लगाते हुए कहा।

दूसरी तरफ से विशाल की हवस से भरी आवाज़ गूँजी: "तुम सच में बहुत सेक्सी हो... प्लीज, मुझे कुछ और तस्वीरें भेजो न।"

"पागल हो," वह धीरे से हंसीं। "अभी तो भेजी… इतनी जल्दी?"

विशाल ने फिर से ज़िद की: "प्लीज... और भेजो। मेरा इतने से पेट नहीं भरने वाला।"

"नहीं, नहीं…. अभी नहीं…सब लोग हैं यहाँ...," उन्होंने हॉल में मौजूद मेहमानों की भीड़ की तरफ अपनी पीठ घुमाते हुए कहा।

तभी विशाल ने अपनी असली चाल चली: "मैं तुमसे बहुत ज़्यादा इम्प्रेस हुआ हूँ, आयशा... अब तुम सायमा की तीन की बजाय पूरी छह तस्वीरें डिलीट करवा सकती हो। देखा कितना सस्ता सौदा है... तुम्हारी सिर्फ हॉट पिक्चर के बदले, तुम्हारी बहन की छह गंदी तस्वीरें हमेशा के लिए डिलीट!"

विशाल के मुँह से सायमा का नाम और यह सौदा सुनते ही आयशा की आँखों में एक अजीब सी चमक कौंध गई।

उन्होंने राहत की गहरी साँस ली और कहा, "अच्छा… सच में? … थैंक यू।"

वह 'थैंक यू' इतना नर्म था, इतना... गहरा और जज्बातों से भरा हुआ था। यह वह 'थैंक यू' बिल्कुल नहीं थी जो किसी रिश्तेदार या आम इंसान को दी जाती है। उस एक 'थैंक यू' में अपनी जवान बहन सायमा की इज़्ज़त और उसकी पूरी ज़िंदगी को उस दरिंदे के चंगुल से बचाने की तड़प और लाचारी छुपी हुई थी। अम्मी अपनी बहन सायमा की खातिर अपने खुद के पाक जिस्म का सौदा करने को तैयार हो रही थीं।

"तुम भी ना..." वह फिर से धीरे से मुस्कुराईं, जिसमें अपनी हार और विशाल के आगे घुटने टेकने का अहसास था। "बस अब फोन रखती हूँ… कोई आ न जाए यहाँ। जो भी होगा… बाद में।"

उन्होंने फोन काटा। एक लंबी सांस ली। अपनी आँखें बंद कीं। और एक पल के लिए, उनके चेहरे पर सुकून की मुस्कराहट फैल गई।

मैं तेज़ी से पलटा। इससे पहले कि वह मुझे देख ले। मैं वापस भीड़ की तरफ, रोशनी की तरफ भागा।

मेरा गला बिल्कुल सूख चुका था। ऐसा लग रहा था जैसे रेगिस्तान में मील का सफर तय किया हो। सीधे जूस काउंटर की तरफ गया।

"भैया कुछ ठंडा दे दो... कुछ भी," मैंने काउंटर वाले से कहा।

उसने मुझे एक गिलास पकड़ाया। मेरे हाथ अब भी कांप रहे थे। मैं पूरा गिलास एक ही सांस में गटक गया। ठंडा पानी मेरे अंदर की आग बुझाने की नाकाम कोशिश कर रहा था।

गिलास को काउंटर पर रखते ही, मैंने लंबी सांस ली और नज़रें उठाकर भीड़ पर डालीं। यह शादी के अगले दिन की एक आम दावत थी, बिल्कुल वैसी ही जैसी हमेशा होती है। जैसे एक रंगीन, शोर मचाता हुआ समंदर।

हर तरफ मेहमान और रिश्तेदार का हुजूम था। हवा में महंगे, मिले-जुले इत्र की महक थी, जो पास ही में पकते हुए कबाबों और बिरयानी की खुशबू से टकरा रही थी।

सायमा खाला के रिश्तेदार अलग-अलग झुंडों में खड़े होकर बातें कर रहे थे और ठहाके भी लगा रहे थे। उनके भारी-भरकम सोने के सेट उनके हैवी डिज़ाइनर कपड़ों पर दौलत और मालदारी की नुमाइश करते थे। उनके कहकहे बुलंद थे, उनकी बातें साफ़ सुनायी दे रही थीं—किसी की नयी गाड़ी, किसी की बहू का नया जोड़ा, किसी का ये, किसी का वो। वह सब "show-off" कर रही थीं।

पूरा लॉन एक जश्न का मंज़र पेश कर रहा था। ज़िंदगी से भरपूर। हर कोई यहाँ... मौजूद था।

और फिर मेरी नज़र वापस अम्मी पर पड़ी।

वह उस झुंड में बिल्कुल अलग दिख रही थी। दूसरी औरतों ने रंग पहने थे, जश्न मनाने के लिए, और अम्मी ने काला पहना था… एक वादा पूरा करने के लिए।

वह उस पार्टी का हिस्सा होते हुए भी, उसका हिस्सा नहीं थीं। वह वहाँ खड़ी थीं, लेकिन उनका दिमाग, उनका दिल... उस फोन कॉल में, उस 'विशाल' के पास था।

मेरी अम्मी, उस पूरी महफ़िल में, सबसे ज़्यादा अकेली.. सबसे ज़्यादा हसीन और सबसे ज़्यादा खतरनाक लग रही थीं।

खाना लगते ही भीड़ में एक हरकत सी पैदा हो गई। लोगों के झुंड लॉन में रखे डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ने लगे, जहाँ से बिरयानी की तेज़ भाप और कोफ्ता कोरमा की महक उठ रही थी। प्लेटों के टकराने और चमचों की 'खान-खान' ने म्यूजिक की आवाज़ को भी दबा दिया था।

मैं अभी तक वहीं, काउंटर के पास, अपना खाली गिलास हाथ में लिए खड़ा था।

"बेटा, यहाँ खड़े हो?" मैंने पलटकर देखा। मेरी नानी थीं। वह एक छोटी सी प्लेट पकड़े, भीड़ में रास्ता तलाश करने की कोशिश कर रही थीं। उनका चेहरा थकान और भीड़ की उलझन से परेशान लग रहा था।

"नानी, लाइए।" मैंने उनके हाथ से प्लेट ले ली। एक पल के लिए, उनकी झुर्रियों-भरी, नर्म उंगलियों का एहसास मुझे उस ज़हनी अज़ियत से बाहर खींच लाया।

"जीते रहो। बहुत भीड़ है। मुझे बस थोड़ी सी बिरयानी और एक-दो कबाब दे दो। तुमने कुछ लिया?"

"मैं… मैं आपके बाद ले लूँगा," मैंने झूठ बोला। मुझे भूख का कोई एहसास नहीं था।

मैं उनके लिए प्लेट भरकर लाया और भीड़ से थोड़ा दूर एक खाली टेबल तलाश की। हम वहीं बैठ गए।

"तुम भी ले आओ ना, बेटा। ऐसे क्यों खड़े हो?" नानी ने पहला निवाला लेते हुए कहा।

"लाता हूँ," कहकर मैं उठा और अपने लिए एक प्लेट ले आया। उसमें बे-दिली से थोड़ी सी बिरयानी और एक कबाब रख लिया।

मैं वापस नानी के पास बैठ गया।

"खाना अच्छा है। सायमा ने इंतज़ाम तो बहुत अच्छा किया है," नानी धीमी आवाज़ में बोल रही थीं।

"हूँ," मैंने कहा। मेरा पूरा ध्यान, मेरी पूरी तवज्जो, लॉन के दूसरे कोने में थी।

आयशा... अम्मी... वहाँ थीं। सायमा खाला और वही दो-तीन औरतों का ग्रुप ने एक अलग, बड़ा राउंड टेबल ले लिया था। उनकी प्लेटें भरी हुई थीं, लेकिन खाना कम और बातें ज़्यादा हो रही थीं। कहकहों की आवाज़ वहाँ से लगातार आ रही थी।

अम्मी उनके बीच बैठी थीं। बिल्कुल सेंटर में। वह हंस रही थीं, सायमा खाला की किसी बात पर उन्होंने अपना सिर पीछे झटक लिया। उनका काला हिजाब उस हंसी में भी बिल्कुल सलीके से अपनी जगह पर था।

मैंने प्लेट में चम्मच घुमाया।

तभी... मैंने देखा।

उनका क्लच टेबल पर नहीं था। उनके हाथ में भी नहीं था। वह उनकी गोद में रखा था। और उस क्लच के ऊपर उनका फोन था।

मैंने अपनी निगाहें सख्त कर लीं।

सायमा खाला ने कुछ कहा, और सब हँसे। अम्मी भी हंसीं। लेकिन उनकी हंसी के दौरान, उनका उल्टा हाथ उनकी गोद में, टेबल के नीचे, हरकत कर रहा था। उनका अंगूठा तेज़ी से स्क्रीन पर चल रहा था।

वह चैट कर रही थी। वह उन सबके सामने बैठकर, उनकी बातों पर हंसते हुए, उनकी आँखों में देखते हुए... टेबल के नीचे, उस 'विशाल' से बात कर रही थीं।

स्क्रीन की हल्की सी नीली रोशनी उनके काले सूट पर पड़ रही थी, जिसे टेबल क्लॉथ ने बाकी दुनिया से छुपा रखा था।

एक ही वक्त में दो किरदार। एक ही चेहरा, दो जगहें। एक "आयशा" जो सायमा खाला के जश्न में शरीक थी। और एक "आयशा" जो उस 'विशाल' के साथ अपने राज़ भरे खेल में मगन थी।

मेरा गला फिर से सूख गया। मैंने बिरयानी का जो निवाला मुँह में रखा था, वह ज़हर बन गया। ऐसा लगा जैसे मैं रेत चबा रहा हूँ।

"क्या हुआ? खाना पसंद नहीं आया?" नानी ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा।

मैंने फौरन खुद को संभाला। अपने गले में अटके हुए निवाले को ज़बरदस्ती नीचे उतारा।

"नहीं... नहीं नानी, बहुत अच्छा है। बस... पानी पीना है," मैंने कहा और पास ही रखा पानी का गिलास उठा लिया।

मैं पानी पी रहा था, लेकिन मेरी निगाहें अब भी उन पर थीं। वह अब भी टाइप कर रही थीं। मुस्कुराते हुए। हंसते हुए।

और मैं, उनका बेटा, अपनी नानी के पास बैठा, यह पूरा मंज़र देखने के लिए मजबूर था।

तभी... एक हंगामा हुआ। एक वेटर, जो शायद नया था, ड्रिंक्स की एक भारी ट्रे ले कर उनके टेबल के पास से गुज़रा। ना जाने उसका पैर कैसे फिसला... पूरी की पूरी ट्रे, लाल शरबत के गिलासों से भरी, उल्टी हो गई। एक चीख निकली।

"हाएईई!"

पूरा ट्रे का लाल, चिपचिपा शरबत सायमा खाला के महंगे, क्रीम रंग के डिज़ाइनर सूट पर गिरा था। एक पल के लिए, सब कुछ थम गया। फिर, अराजकता फट पड़ी।

"अरे रे….!"

"अबे, क्या कर रहा है, दिखता नहीं है क्या!"

"पानी लाओ! टिश्यू दो!"

सायमा खाला हड़बड़ा कर खड़ी हो गईं, अपने कपड़ों को झटकने लगीं। उनके साथ बैठी सभी औरतें, अम्मी समेत, अपनी कुर्सियों से उछल पड़ीं।

"हाय हाय, मेरा पूरा सूट खराब हो गया... यह दाग नहीं जाएगा!" सायमा खाला की आवाज़ में रोने जैसा अंदाज़ था।

"सायमा! सायमा, सुनो…." अम्मी की आवाज़ सबसे पहले आई। वह फौरन सायमा खाला की तरफ लपकीं।

"कुछ नहीं होता, ओके, अभी साफ़ हो जाएगा।"

"कैसे साफ़ होगा, आयशा दीदी? देखो तो..."

"आप मेरे साथ अंदर चलिए," अम्मी ने फौरन फैसला किया, एक एक्सपर्ट की तरह सिचुएशन संभालते हुए।

"चलिए, मैं आपको वॉशरूम ले जाती हूँ। नमक या सोडा से शायद हल्का हो जाए। चलिए!"

अम्मी ने सायमा खाला को बाज़ू से पकड़ा और उन्हें घर के अंदर की तरफ ले जाने लगीं। उस जल्दबाज़ी में, उस दोस्ती निभाने के जोश में... वह सबसे ज़रूरी चीज़ भूल गईं—अपना फोन।

उनका फोन उनकी खाली कुर्सी पर पड़ा था। सब लोग उस हंगामे में बिजी थे। कोई भी उस फोन को नहीं देख रहा था। सिवाए मेरे।

मैं उठा और फुर्ती से भीड़ में चलता हुआ उनके टेबल के पास जा पहुँचा। लोग अभी भी सायमा और आयशा की जोड़ी को देख रहे थे।

मैं उस टेबल के पास पहुँचा और कांपते हाथों से फोन उठाया। फोन की स्क्रीन हमेशा की तरह लॉक थी, लेकिन मुझे पैटर्न याद था। मैंने फोन को अनलॉक किया और व्हाट्सएप खोला।

जैसा कि उम्मीद थी, अम्मी विशाल से ही चैट कर रही थीं। मैंने चैट को ऊपर स्क्रॉल किया। मेरी उंगलियाँ स्क्रीन पर फिसल रही थीं।

मैंने ध्यान से देखा, उस आखिरी मैसेज के बाद विशाल ने अम्मी को कुछ और भी भेजा था। लेकिन वह मैसेज अब स्क्रीन से गायब था, उसे पूरी तरह डिलीट कर दिया गया था। चैट बॉक्स में 'This message was deleted by sender' देखकर मेरा दिमाग सुन्न हो गया।

मैं गहरी सोच में डूब गया कि आखिर उस डिलीटेड मैसेज में ऐसा क्या रहा होगा? क्या विशाल ने अपनी कोई बेहद अश्लील तस्वीर भेजी थी, या अम्मी से उनके जिस्म की कुछ और मांग की थी? मेरा दिल तेजी से धड़कने लगा। तभी अचानक मेरी नजर उस सेल्फी पर पड़ी, जिसे अम्मी ने खुद खींचकर विशाल भेज दी थी। उस तस्वीर ने मेरे पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया।

अम्मी ने शाम को उसे जो सेल्फी सेंड की थी उस को विशाल ने थम्स अप किया था और रिप्लाई दिया था—

लेकिन मेरी तो जान ही निकल गई जब मैंने दूसरी तस्वीर देखी। मम्मी विशाल का वादा पूरा करने के लिए आईने की तरफ देख रही थीं। ओह गॉड... वह काफी नीचे झुकी हुई थीं, जिससे उनके काले सूट का गला पूरी तरह से खुल गया था और सामने का सब कुछ नुमाया हो रहा था। उस गहरे खुले गले के ठीक बीच में से उनकी लाल रंग की ब्रा साफ नजर आ रही थी, जो उनके गोरे बदन पर बिजली की तरह कौंध रही थी।

मगर उससे भी ज्यादा चौंकाने वाली और होश उड़ा देने वाली बात तो कुछ और ही थी… अम्मी के दोनों दूध जैसे सफेद और गोल-मटोल मम्मे उस ढीले गले से बाहर छलक रहे थे, जो पूरी तरह से नंगे नजर आ रहे थे। उनके उन उभरे हुए स्तनों के बीच के हिस्से और उनके गुलाबी निपल्स साफ दिखाई दे रहे थे, जो इस वक्त पूरी तरह से तन चुके थे। यह खौफनाक और बेहद कामुक नजारा देखकर मेरी सांसें जैसे वहीं थम गईं, सीना ऊपर-नीचे होने लगा।

एक तरफ दिल में अम्मी और विशाल के लिए बेइंतहा गुस्सा उबल रहा था—आखिर अम्मी इतनी बेवफा और बेशरम कैसे हो गईं? उन्होंने अब्बू को इस तरह धोखा कैसे दे दिया? लेकिन दूसरी तरफ, अम्मी के उस मदहोश कर देने वाले जिस्म और इस तड़पा देने वाले नजारे को देखकर मेरे पैरों के बीच, मेरी टांगों के बीच एक अजीब सी बेचैनी और तेज हलचल होने लगी थी। मेरा अंग-अंग वासना की आग में सुलगने लगा था।

विशाल: वूऊऊव…जस्ट वूऊऊव…आयशा जी…थैंक यू फॉर कीपिंग प्रॉमिस….

विशाल: "मैं भी अपना वादा पूरा करूँगा..."

जैसे ही स्क्रीन पर विशाल का यह मैसेज चमका, मेरे पूरे बदन में एक ठंडी सिहरन दौड़ गई। 'वादा...' कैसा वादा? अम्मी ने आईने के सामने झुककर, अपने बदन की नुमाइश करके विशाल के लिए जो किया था, उसके बदले विशाल अम्मी को क्या देने वाला था? क्या वह अम्मी के इस दीवाने कर देने वाले जिस्म को अपनी बाँहों में भरने का वादा था?

उसके बाद विशाल ने कुछ और मैसेज किए थे…..क्या कर रही हो…कहाँ हो…एक और पिक दो…. और उसने अपनी एक सेल्फी भी सेंड की थी…..लेकिन अम्मी ने कोई रिप्लाई नहीं दिया था। मैं समझ गया कि उस दौरान अम्मी ने फोन नहीं देखा होगा।

फिर अम्मी का मैसेज,

आयशा: अरे बाबा….इतने सारे मैसेज…पूरा दिन बस व्हाट्सएप ही करते हो क्या….

विशाल: फाइनली….टाइम मिला आपको…बताओ क्या कर रही हो?

आयशा: कुछ नहीं….डिनर कर रही थी….

विशाल: अच्छा जी…डिनर के साथ-साथ चैटिंग…वाह…

आयशा: मल्टीटास्किंग हूँ मैं….

विशाल: अच्छा, और क्या टास्क कर रही हो अभी??

आयशा: डिनर कर रही हूँ….चैट कर रही हूँ और सायमा की स्टुपिड बातों पर हंस भी रही हूँ ताकि किसी को शक ना हो….

विशाल: "अरे बाप रे…. बहुत टैलेंटेड हो आप तो…."

आयशा: "वह तो मैं हूँ….." (अम्मी के इस जवाब में एक अजीब सा नशा और अपनी खूबसूरती पर गुरूर था, जैसे वह विशाल को अपनी उँगलियों पर नचाने का मज़ा ले रही हों।)

विशाल: "और बहुत हॉट भी….."

आयशा: "बदमाश…."

विशाल: "नहीं हो क्या?"

आयशा: ब्लशिंग इमोजी…

विशाल: "और हाँ…. आप जादूगर भी हो…."

आयशा: "जादूगर?"

विशाल: "हाँ…. जादूगर… वहाँ बैठे-बैठे आपने किसी को खड़ा कर दिया… आपकी वो मदहोश कर देने वाली सेल्फी और उसके बाद वो काले सूट के गहरे गले से झांकते आपके वो गोरे-गोरे मम्मे, वो सुर्ख लाल रंग की ब्रा और उसमें से कसमसाते वो गुलाबी टिप्स… उन्हें देखते ही मेरा अंग-अंग बेकाबू होकर आपको सैल्यूट करने लगा… वह पूरी तरह खड़ा हो गया है…."

आयशा: "काबू में रखो…. अपने… इमोशंस को…" (अम्मी ऊपर से तो उन्हें रोकने का नाटक कर रही थीं, लेकिन अंदर ही अंदर उनका अपना बदन भी इस नग्न सच को सुनकर सुलगने लगा होगा।)

विशाल: "यह तो मुश्किल है…. मेरा इमोशन… मेरी कैसे सुनेगा… इसका रिमोट कंट्रोल तो अब पूरी तरह तुम्हारे पास है… तुम्हारी इन कातिल तस्वीरों के पास है…."

आयशा: "उफ़्फ़…. अच्छा जी… तो वह क्या कह रहा है…."

विशाल: "आपके रिस्पेक्ट में खड़ा हो गया है…. कह रहा है… सिर्फ सेल्फी से अब प्यास नहीं बुझने वाली… तुम्हें लाइव देखना है… इसी तंग काले सूट में, इन्हीं लाल रंग के अंडरगारमेंट्स के साथ तुम्हें अपनी बांहों में भीचना है…."

आयशा: "पागल हो गए हो क्या…. और सुनो, आपने वह अश्लील सेल्फी तो डिलीट कर दी है ना… जो मैंने भेजी थी?" (अम्मी के दिल में एक डर था, लेकिन उस डर के पीछे एक अजीब सी उत्तेजना भी थी।)

विशाल: "ना… कभी नहीं करूँगा। तुम्हारी इस जवानी के खजाने को मैं अपनी आँखों से कभी दूर नहीं होने दूंगा। ?"

आयशा: "बदमाश।"

विशाल: "ऐसा ही हूँ मैं… अच्छा… यह बताओ… उस पारदर्शी काले सूट के नीचे, पैन्टी का कौन सा कलर है…." (विशाल अब अम्मी के जिस्म के आखिरी हिस्से के राज़ भी जान लेना चाहता था।)

आयशा: "तुम्हें कैसे नहीं पता होगा?"

विशाल: "फिर भी। मैं तुम्हारे इन रसीले होठों से सुनना चाहता हूँ।"

आयशा: "'लाल'..." (सिर्फ एक शब्द—'लाल'... जिसने चैट के तापमान को और बढ़ा दिया। अम्मी ने कबूल कर लिया था कि उन्होंने नीचे भी उसी सुर्ख लाल रंग की पैन्टी पहनी हुई है।)

विशाल: "ओह्ह भेनचो…… अब तो मिलना ही पड़ेगा… अब यह बर्दाश्त नहीं होता। आ जाऊँ क्या अभी?" (विशाल वासना में पूरी तरह अंधा हो चुका था और गाली देते हुए अपनी चरम उत्तेजना ज़ाहिर कर रहा था।)

आयशा: "ना…. पागल मत बनो, घर में बहुत लोग हैं… पकड़े गए तो अनर्थ हो जाएगा।"

विशाल: "लोगों को मरने दो….. बस 10 मिनट के लिए… वैसे मैं तुम्हारे बहुत करीब हूँ…."
 
आयशा: "मतलब? तुम इस वक्त कहाँ हो?"

विशाल: "मतलब मैं तुम्हारी ही गली में, अपनी कार में बैठा हूँ…. ठीक स्ट्रीट के एंड में…"

आयशा: "ओह्ह खुदा….. तुम तो सच में पागल हो गए हो!"

विशाल: "प्लीज आयशा…. अब मना मत करना… सिर्फ 10 मिनट… किसी तरह चुपके से टेरेस (छत) पर आ जाओ…."

आयशा: "पर तुम ऊपर कैसे आओगे?... सब नीचे ही हैं।" (अम्मी ने मना नहीं किया, बल्कि उनके इस सवाल ने साफ कर दिया कि वह भी छत पर विशाल के उस गर्म जिस्म से टकराने के लिए तैयार हो चुकी थीं।)

विशाल: "तुम बस वहाँ पहुँचो… मैं पीछे के रास्ते से कुछ जुगाड़ करता हूँ…."

यह विशाल का लास्ट मैसेज था…मैं समझ गया कि इसके बाद वह शरबत वाला हादसा हुआ था और अम्मी ने फोन वहीं छोड़ दिया था।

"हो गया क्लीन, सायमा?"

टेबल पर बैठी एक औरत की आवाज़ ने मुझे होश में ला दिया।

अम्मी और सायमा खाला वॉशरूम से वापस आ रही थीं। सायमा खाला अब भी अपने सूट का भीगा हुआ पल्ला पकड़े थीं।

"...तुमने बचा लिया, आयशा दीदी," सायमा खाला कह रही थीं। "वरना मेरा तो दिल ही बैठ गया था।"

मैंने फौरन फोन को वापस वैसे ही कुर्सी पर रख दिया, स्क्रीन को लॉक करके।
 


अम्मी इस टेकिंग ा सेल्फी.

 
अध्याय 14

मैं वहां hi खड़ा रहा. उन्होंने फ़ोन को अपने सामने रखा. स्क्रीन उनके चेहरे को रोशन कर रही थी.

और अपने होठों को हल्का सा दबाकर एक एंगल बनाया... और वही राज़ भरी मुस्कराहट उनके चेहरे पर आ गयी.

क्लिक.

"उन्होंने सेल्फी ले ली थी. इसके बाद वह अपनी उँगलियों से स्क्रीन पर कुछ टाइप करने लगी. एक पल के लिए उनके हाथ रुके, शायद उन्होंने कुछ सोचा, और फिर 'सेंड' का बटन दबा दिया. इसके तुरंत बाद, वह अपने फ़ोन में कुछ ढूंढ़ने लगीं, जैसे कोई और पुरानी तस्वीर तलाश रही हों.

कुछ hi देर बाद मैंने देखा का अम्मी के हाथ बुरी तरह कांप रहे the—ab वह कम्पन किसी गहरी उत्तेजना की वजह से था या फिर किसी अनजाने खौफ से, मैं इस बात को समझ नहीं प् रहा था. फिर ऐसा लगा जैसे उन्होंने एक और मैसेज भेजा हो. उस वक़्त अम्मी का पूरा चेहरे शर्म और घबराहट से लाल हो चूका था.

उन्हें इस हालत में देखकर मेरा दिल बैठा जा रहा था... मेरे ज़हन में बस एक hi खौफनाक सवाल baar-baar कौंध रहा था की क्या अम्मी ने विशाल की उस गन्दी डिमांड के हिसाब से अपनी तसवीरें उसे भेज दी हैं?"

“Aisha…kahaan हो…” नीचे से किसी रिश्तेदार की आवाज़ आयी.

"बस आयी….," उन्होंने फ़ोन को क्लच में डालते हुए, बिना मेरी तरफ देखे, कहा और कमरे से निकल गयीं.

मैं अपनी जगह पर जड़ होकर वहां hi खड़ा रहा, जैसे पेअर ज़मीन से चिपक गए हों. मेरे कानों में नीचे चल रही पार्टी का वह हल्का, धुंधला सा शोर अब बिलकुल नहीं आ रहा था; बल्कि मेरे दिमाग के सन्नाटे में विशाल के वो खौफनाक मैसेज baar-baar गूँज रहे थे: "ब्लैक पहनिए, विथ रेड उन्देर्गर्मेन्ट्स ... मुझे पिक्चर में गुलाबी निप्पल्स नज़र आने चाहिए..."

Ek-ek शब्द मेरे कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहा था. और अब... सबसे बड़ा खौफ हकीकत में बदल चूका था. उसने सब कुछ देख लिया था.

मेरा गाला सुख रहा था. मैंने ड्रेसिंग टेबल पर रखा पानी का गिलास उतःया और एक hi सांस में पूरा पी लिया. फिर मैंने आईने में खुद को देखा. वही आइना जिसमें अम्मी ने अभी अपना अक्स देखा था. मुझे अपनी आँखों में गुस्से के बदले एक अजीब सी थकावट और बेचारगी दिखाई दी.

'तैयार हो जाओ,' उन्होंने कहा था. हाँ, मैं तैयार होऊंगा.

मैं अब इस पार्टी को मिस नहीं कर सकता. मैं अब सिर्फ एक बीटा नहीं था जो शादी में आया है. मैं एक गवाह बन गया था. एक जासूस.

मैंने रोबोट की तरह अलमारी खोली और अपना कुरता निकाला. मैं jaldi-jaldi तैयार हुआ. हर कपडा जो मैं पहन रहा था, वह मुझे काँटों की तरह चुभ रहा था. मेरा दिमाग बस एक hi चीज़ सोच रहा था...

उसने अब वह तस्वीर देख ली होगी. वह अब क्या कह रहा होगा? क्या अम्मी नीचे पार्टी में भी उससे बात करेंगी?

मैं कमरे से निकल और सीढ़ियों की ओरे बढ़ा. Jaise-jaise मैं नीचे उतर रहा था, म्यूजिक तेज़ होता जा रहा था. लॉन को लिघ्तों से सजाया गया था. लोगों का एक बड़ा हुजूम tha—rishtedaar, दोस्त, सभी hans-bol रहे थे.

मेरी आँखें भीड़ को चीरते हुए सिर्फ एक शख्स को ढून्ढ रही थीं. और वह मुझे फ़ौरन दिख गयीं. वह लॉन के एक कोने में सीमा और कुछ दूसरी औरतों के साथ कड़ी थीं. उनके हाथ में एक जूस का गिलास था. और वह हंस रही थीं. खिलखिला कर. वह काला सूट भीड़ में अलग hi चमक रहा था, बिलकुल वैसा hi जैसा विशाल ने इमेजिन किया होगा.

मैं वहां hi, सीढ़ियों के पास, एक पत्थर की मूरत बनकर खड़ा रहा.

बाहर लॉन में ढोल की थाप, म्यूजिक का शोर और लोगों के बुलंद कहकहे गूँज रहे थे. लेकिन मेरे कानों में, ये साड़ी आवाज़ें जैसे हज़ारों मील दूर से आ रही थीं. एक घुटन वाली खामोशी ने मुझे जकड रखा था.

मेरी निगाहें, एक चुम्बकीये कशिश के साथ, भीड़ को काटकर सिर्फ अम्मी पर टिक गयीं. रिश्तेदारों और लोगों का हुजूम था और लाउडस्पीकर पर फ़िल्मी गाने बज रहे थे. चारों ओरे ख़ुशी का माहौल था, पर पता नहीं मैं क्यों उदास था.

वह एक माँ, एक बीवी और एक इज़्ज़तदार औरत की तरह बहुत hi नार्मल और बेफिक्र लग रही थीं. लेकिन अंदर hi अंदर मैं जानता था की यह सब एक झूठ और धोखा था.

उन्होंने अपने एक हाथ में एक सुनहरा क्लच पकड़ा हुआ था. वही क्लच जिसमें उनका फ़ोन था. और वही फ़ोन जिसमें अब 'विशाल' का जवाब आ चूका होगा.

'मस्त…' 'काश मैं वहां होता…..' 'टिल…..,'

मेरे दिमाग में उस हरामखोर के लफ़्ज़ून गूँज रहे थे.

"अरे साहिल, यहां अकेले क्यों खड़े हो?" सीमा खला की दूसरी बहिन ने मेरे पास आते hi कहा.

"सब वहां हैं. चलो."

मैंने ज़बरदस्ती अपने चेहरे पर मुस्कराहट लाने की कोशिश की. एक ऐसी मुस्कराहट जो मेरे होंठों से आगे नहीं जा सकीय.

"जी… बस अभी आया."

"अम्मी को देखा?" उन्होंने अम्मी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

"आज तोह बहुत खूबसूरत लग रही हैं."

"हाँ," मैं बस इतना hi कह पाया. मेरी ज़बान मेरा साथ नहीं दे रही थी.

वह आंटी आगे बढ़ गयीं, और मैं वहां खड़ा रहा.

अम्मी, सीमा और दूसरी औरतों से hans-hans कर बातें कर रही थीं लेकिन उनकी नज़र baar-baa भीड़ में idhar-udhar दौड़ जाती thi…jaise किसी को ढून्ढ रही हों.

फिर, वही हुआ जिसका मुझे इंतज़ार था.

उन्होंने baaton-baaton के बीच बड़े hi कासुअल अंदाज़ में, अपना क्लच खोला और अपने मोबाइल को चेक किया. फिर उन्होंने फ़ौरन फ़ोन को वापस अंदर रख दिया और क्लच बंद कर दिया.

उन्होंने सीमा खला से कुछ कहा और पलटकर भीड़ से निकल गयीं. वह आहिस्ता से लॉन के उस हिस्से की तरफ चलने लगीं जहां कैटरिंग के स्टाल्स लगे हुए थे. स्टाल्स के पीछे रौशनी थोड़ी काम थी और लोगों का aana-jaana भी बहुत नहीं था.

मेरे पैरों ने khud-ba-khud हरकत की.

मैं लोगों के बीच से रास्ता बनाता, उनसे थोड़ा सा फासला रखते हुए, उनके पीछे चल पड़ा. हर कदम जो मैं उठा रहा था, मेरे दिल पर बोझ बन रहा था. मैं यह नहीं करना चाहता था. मैं भाग जाना चाहता था. लेकिन मैं रुक नहीं सका. मुझे जानना था. मुझे पूरा सच देखना था.

वह एक सजावटी दरख़्त के पास, अँधेरे में रुक गयीं. उन्होंने idhar-udhar देखा. मैं एक फ़ूड स्टाल के पीछे छुप गया.

उन्होंने फ़ोन निकाला. स्क्रीन की रौशनी ने उनके चेहरे को एक पल के लिए नीला कर दिया. और फिर... उन्होंने फ़ोन को अपने कान से लगा लिया. वह किसी से फ़ोन पर बातें कर रही थी.

मैं थोड़ा और करीब हुआ, इतना की उनकी आवाज़ का हल्का सा, सरसराता अंदाज़ मुझ तक पहुँच सके.

"Hello…," उन्होंने कहा. आवाज़ में एक अजीब सी खनक थी.

"पागल हो," वह धीरे से हंसीं. "अभी तोह भेजी… इतनी जल्दी?"

मेरा खून जिस्म में जैम गया.

"नहीं, नहीं…. अभी nahi…sab लोग हैं यहां...," उन्होंने अपनी पीठ भीड़ की तरफ करते हुए कहा, ताकि उनकी आवाज़ साफ़ जा सके.

"अच्छा... सच में? ... थैंक यू."

वह 'थैंक यू' इतना नरम था, इतना... गहरा था. यह वह 'थैंक यू' नहीं था जो रिश्तेदारों को दिया जाता है.

"तुम भी न..." वह फिर से हंसीं. "बस अब रखती हूँ... कोई आ न जाए. बाद में."

"Hello…," अम्मी ने फ़ोन कान से लगाते हुए कहा.

दूसरी तरफ से विशाल की हवस से भरी आवाज़ गूंजी: "तुम सच में बहुत सेक्सी हो... प्लीज, मुझे कुछ और तसवीरें भेजो न."

"पागल हो," वह धीरे से हंसीं. "अभी तोह भेजी… इतनी जल्दी?"

विशाल ने फिर से ज़िद की: "प्लीज... और भेजो. मेरा इतने से पेट नहीं भरने वाला."

"नहीं, नहीं…. अभी nahi…sab लोग हैं यहां...," उन्होंने हॉल में मौजूद मेहमानों की भीड़ की तरफ अपनी पीठ घुमाते हुए कहा.

तभी विशाल ने अपनी असली चाल चली: "मैं तुमसे बहुत ज़्यादा इम्प्रेस हुआ हूँ, ऐसा... अब तुम सीमा की तीन की बजाये पूरी छह तसवीरें डिलीट करवा सकती हो. देखा कितना सस्ता सौदा है... तुम्हारी सिर्फ हॉट पिक्चर के बदले, तुम्हारी बहिन की छह गन्दी तसवीरें हमेशा के लिए डिलीट!"

विशाल के मुंह से सीमा का नाम और यह सौदा सुनते hi ऐसा की आँखों में एक अजीब सी चमक कौंध गयी.

उन्होंने राहत की गहरी सांस ली और कहा, "अच्छा… सच में? … थैंक यू."

वह 'थैंक यू' इतना नरम था, इतना... गहरा और जज़्बातों से भरा हुआ था. यह वह 'थैंक यू' बिलकुल नहीं थी जो किसी रिश्तेदार या आम इंसान को दी जाती है. उस एक 'थैंक यू' में अपनी जवान बहिन सीमा की इज़्ज़त और उसकी पूरी ज़िन्दगी को उस दरिंदे के चंगुल से बचाने की तड़प और लाचारी छुपी हुई थी. अम्मी अपनी बहिन सीमा की खातिर अपने खुद के पाक जिस्म का सौदा करने को तैयार हो रही थीं.

"तुम भी न..." वह फिर से धीरे से मुस्कुराईं, जिसमें अपनी हार और विशाल के आगे घुटने टेकने का एहसास था. "बस अब फ़ोन रखती हूँ… कोई आ न जाए यहां. जो भी होगा… बाद में."

उन्होंने फ़ोन काटा. एक लम्बी सांस ली. अपनी आँखें बंद कीं. और एक पल के लिए, उनके चेहरे पर सुकून की मुस्कराहट फैल गयी.

मैं तेज़ी से पलटा. इससे पहले की वह मुझे देख ले. मैं वापस भीड़ की तरफ, रौशनी की तरफ भागा.

मेरा गाला बिलकुल सुख चूका था. ऐसा लग रहा था जैसे रेगिस्तान में मील का सफर तय किया हो. सीधे जूस काउंटर की तरफ गया.

"भैया कुछ ठंडा दे दो... कुछ भी," मैंने काउंटर वाले से कहा.

उसने मुझे एक गिलास पकड़ाया. मेरे हाथ अब भी कांप रहे थे. मैं पूरा गिलास एक hi सांस में जातक गया. ठंडा पानी मेरे अंदर की आग बुझाने की नाकाम कोशिश कर रहा था.

गिलास को काउंटर पर रखते hi, मैंने लम्बी सांस ली और नज़रें उठाकर भीड़ पर डालीं. यह शादी के अगले दिन की एक आम दावत थी, बिलकुल वैसी hi जैसे हमेशा होती है. जैसे एक रंगीन, शोर मचाता हुआ समंदर.

हर तरफ मेहमान और रिश्तेदार का हुजूम था. हवा में महंगे, mile-jule इत्र की महक थी, जो पास hi में पकते हुए कबाबों और बिरयानी की खुशबू से टकरा रही थी.

सीमा खला के रिश्तेदार alag-alag झुंडों में खड़े होकर बातें कर रहे थे और ठहाके भी लगा रहे डिस्ट्रक्शन. उनके bhaari-bharkam सोने के सेट उनके हैवी डिज़ाइनर कपड़ों पर दौलत और मालदारी की नुमाइश करते थे. उनके कहकहे बुलंद थे, उनकी बातें साफ़ सुनाई दे रही theen—kisi की नयी गाडी, किसी की बहु का नया जोड़ा, किसी का ये, किसी का वो. वह सब "show-off" कर रही थीं.

पूरा लॉन एक जश्न का मंज़र पेश कर रहा था. ज़िन्दगी से भरपूर. हर कोई यहां... मौजूद था.

और फिर मेरी नज़र वापस अम्मी पर पड़ी.

वह उस झुण्ड में बिलकुल अलग दिख रही थी. दूसरी औरतों ने रंग पहने थे, जश्न मनाने के लिए, और अम्मी ने काला पहना था… एक वादा पूरा करने के लिए.

वह उस पार्टी का हिस्सा होते हुए भी, उसका हिस्सा नहीं थीं. वह वहां कड़ी थीं, लेकिन उनका दिमाग, उनका दिल... उस फ़ोन कॉल में, उस 'विशाल' के पास था.

मेरी अम्मी, उस पूरी महफ़िल में, सबसे ज़्यादा अकेली.. सबसे ज़्यादा हसीं और सबसे ज़्यादा खतरनाक लग रही थीं.

खाना लगते hi भीड़ में एक हरकत सी पैदा हो गयी. लोगों के झुण्ड लॉन में रखे डाइनिंग टेबल की तरफ बढ़ने लगे, जहां से बिरयानी की तेज़ भाप और कोफ्ता कोरमा की महक उठ रही थी. प्लाटों के टकराने और चमचों की 'khan-khan' ने म्यूजिक की आवाज़ को भी दबा दिया था.

मैं अभी तक वहां, काउंटर के पास, अपना खाली गिलास हाथ में लिए खड़ा था.

"बीटा, यहां खड़े हो?" मैंने पलटकर देखा. मेरी नानी थीं. वह एक छोटी सी प्लेट पकडे, भीड़ में रास्ता तलाश करने की कोशिश कर रही थीं. उनका चेहरा थकावं और भीड़ की उल्जन से परेशान लग रहा था.

"नानी, लाइए." मैंने उनके हाथ से प्लेट ले ली. एक पल के लिए, उनकी jhurriyon-bhari, नरम उँगलियों का एहसास मुझे उस ज़हनी अज़ीयत से बाहर खींचर लाया.

"जीते रहो. बहुत भीड़ है. मुझे बस थोड़ी सी बिरयानी और ek-do कबाब दे दो. तुमने कुछ लिया?"

"मैं… मैं आपके बाद ले लूँगा," मैंने झूठ बोलै. मुझे भूख का कोई एहसास नहीं था.

मैं उनके लिए प्लेट bhar-kar लाया और भीड़ से थोड़ा दूर एक खाली टेबल तलाश की. हम वहां बैतह गए.

"तुम भी ले आओ न, बीटा. ऐसे क्यों खड़े हो?" नानी ने पहला निवाला लेते हुए कहा.

"लाता हूँ," कहकर मैं उठा और अपने लिए एक प्लेट ले आया. उसमें be-dili से थोड़ी सी बिरयानी और एक कबाब रख लिया.

मैं वापस नानी के पास बैतह गया.

"खाना अच्छा है. सीमा ने इंतज़ाम तोह बहुत अच्छा किया है," नानी धीमी आवाज़ में बोल रही थीं.

"हूँ," मैंने कहा. मेरा पूरा ध्यान, मेरी पूरी तवज्जो, लॉन के दुसरे कोने में थी.

ऐसा... अम्मी... वहां थीं. सीमा खला और वही do-three औरतों का ग्रुप ने एक अलग, बड़ा राउंड टेबल ले लिया था. उनकी पलटें भरी हुई थीं, लेकिन खाना काम और बातें ज़्यादा हो रही थीं. कहकहों की आवाज़ वहां से लगातार आ रही थी.

अम्मी उनके बीच बैठी थीं. बिलकुल सेण्टर में. वह हंस रही थीं, सीमा खला की किसी बात पर उन्होंने अपना सर पीछे झटक लिया. उनका काला हिजाब उस हंसी में भी बिलकुल सलीक़े से अपनी जगह पर था.

मैंने प्लेट में चम्मच घुमाया.

तभी... मैंने देखा.

उनका क्लच टेबल पर नहीं था. उनके हाथ में भी नहीं था. वह उनकी गॉड में रखा था. और उस क्लच के ऊपर उनका फ़ोन था.

मैंने अपनी निगाहें सख्त कर लीं.

सीमा खला ने कुछ कहा, और सब हांसे. अम्मी भी हंसीं. लेकिन उनकी हंसी के दौरान, उनका उल्टा हाथ उनकी गॉड में, टेबल के नीचे, हरकत कर रहा था. उनका अँगूठाह तेज़ी से स्क्रीन पर चल रहा था.

वह चाट कर रही थी. वह उन सबके सामने बैतःकार, उनकी बातों पर हँसते हुए, उनकी आँखों में देखते हुए... टेबल के नीचे, उस 'विशाल' से बात कर रही थीं.

स्क्रीन की हलकी सी नीली रौशनी उनके काले सूट पर पद रही थी, जिसे टेबल क्लॉथ ने बाकी दुनिया से छुपा रखा था.

एक hi वक़्त में दो किरदार. एक hi चेहरा, दो जगहये. एक "ऐसा" जो सीमा खला के जश्न में शरीक थी. और एक "ऐसा" जो उस 'विशाल' के साथ अपने राज़ भरे खेल में मगन थी.

मेरा गाला फिर से सुख गया. मैंने बिरयानी का जो निवाला मुंह में रखा था, वह ज़हर बन गया. ऐसा लगा जैसे मैं रेट चबा रहा हूँ.

"क्या हुआ? खाना पसंद नहीं आया?" नानी ने मेरी तरफ देखते हुए पूछा.

मैंने फ़ौरन खुद को संभाला. अपने गले में अटके हुए निवाले को ज़बरदस्ती नीचे उतारा.

"नहीं... नहीं नानी, बहुत अच्छा है. बस... पानी पीना है," मैंने कहा और पास hi रखा पानी का गिलास उठा लिया.

मैं पानी पी रहा था, लेकिन मेरी निगाहें अब भी उनपर थीं. वह अब भी टाइप कर रही थीं. मुस्कुराते हुए. हँसते हुए.

और मैं, उनका बीटा, अपनी नानी के पास बैतह, यह पूरा मंज़र देखने के लिए मजबूर था.

तभी... एक हंगामा हुआ. एक वेटर, जो शायद नया था, ड्रिंक्स की एक भारी ट्रे ले कर उनके टेबल के पास से गुज़रा. न जाने उसका पेअर कैसे फिसला... पूरी की पूरी ट्रे, लाल शरबत के गिलासों से भरी, उलटी हो गयी. एक चीख निकली.

"हाईए!"

पूरा ट्रे का लाल, चिपचिपा शरबत सीमा खला के महंगे, क्रीम रंग के डिज़ाइनर सूट पर गिरा था. एक पल के लिए, सब कुछ थम गया. फिर, अराजकता पहात पड़ी.

"अरे रे….!"

"अबे, क्या कर रहा है, दीखता नहीं है क्या!"

"पानी लाओ! टिश्यू दो!"

सीमा खला हड़बड़ा कर कड़ी हो गयीं, अपने कपड़ों को झटकने लगीं. उनके साथ बैठी सभी औरतें, अम्मी समेत, अपनी कुर्सियों से उछाल पड़ीं.

"है है, मेरा पूरा सूट खराब हो गया... यह दाग नहीं जाएगा!" सीमा खला की आवाज़ में रोने जैसा अंदाज़ था.

"सीमा! सीमा, सुनो…." अम्मी की आवाज़ सबसे पहले आयी. वह फ़ौरन सीमा खला की तरफ लपकीं.

"कुछ नहीं होता, okay, अभी साफ़ हो जाएगा."

"कैसे साफ़ होगा, ऐसा दीदी? देखो तोह..."

"आप मेरे साथ अंदर चलिए," अम्मी ने फ़ौरन फैसला किया, एक एक्सपर्ट की तरह सिचुएशन संभालते हुए.

"चलिए, मैं आपको वाशरूम ले जाती हूँ. नमक या सोडा से शायद हल्का हो जाए. चलिए!"

अम्मी ने सीमा खला को बाज़ू से पकड़ा और उन्हें घर के अंदर की तरफ ले जाने लगीं. उस जल्दबाज़ी में, उस दोस्ती निभाने के जोश में... वह सबसे ज़रूरी चीज़ भूल gayeen—apna फ़ोन.

उनका फ़ोन उनकी खाली कुर्सी पर पड़ा था. सब लोग उस हंगामे में बिजी थे. कोई भी उस फ़ोन को नहीं देख रहा था. सिवाए मेरे.

मैं उठा और फुर्ती से भीड़ में चलता हुआ उनके टेबल के पास जा पहुंचा. लोग अभी भी सीमा और ऐसा की जोड़ी को देख रहे थे.

मैं उस टेबल के पास पहुंचा और कांपते हाथों से फ़ोन उतःया. फ़ोन की स्क्रीन हमेशा की तरह लॉक थी, लेकिन मुझे पैटर्न याद था. मैंने फ़ोन को अनलॉक किया और व्हाट्सप्प खोला.

जैसा की उम्मीद थी, अम्मी विशाल से hi चाट कर रही थीं. मैंने चाट को ऊपर स्क्रॉल किया. मेरी उँगलियाँ स्क्रीन पर फिसल रही थीं.

मैंने ध्यान से देखा, उस आखिरी मैसेज के बाद विशाल ने अम्मी को कुछ और भी भेजा था. लेकिन वह मैसेज अब स्क्रीन से गायब था, उसे पूरी तरह डिलीट कर दिया गया था. चाट बॉक्स में 'थिस मैसेज वास् देलेटेड बी सेन्डर' देखकर मेरा दिमाग सुन्न हो गया.

मैं गहरी सोच में डूब गया की आखिर उस देलेटेड मैसेज में ऐसा क्या रहा होगा? क्या विशाल ने अपनी कोई बेहद अश्लील तस्वीर भेजी थी, या अम्मी से उनके जिस्म की कुछ और मांग की थी? मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा. तभी अचानक मेरी नज़र उस सेल्फी पर पड़ी, जिसे अम्मी ने खुद खींचकर विशाल भेज दी थी. उस तस्वीर ने मेरे पूरे वजूद को हिलाकर रख दिया.

अम्मी ने शाम को उसे जो सेल्फी सेंड की थी उस को विशाल ने थम्ब्स उप किया था और रिप्लाई दिया था—

लेकिन मेरी तोह जान hi निकल गयी जब मैंने दूसरी तस्वीर देखि. मम्मी विशाल का वादा पूरा करने के लिए आईने की तरफ देख रही थीं. ओह गॉड... वह काफी नीचे झुकी हुई थीं, जिससे उनके काले सूट का गाला पूरी तरह से खुल गया था और सामने का सब कुछ नुमाया हो रहा था. उस गहरे खुले गले के ठीक बीच में से उनकी लाल रंग की ब्रा साफ़ नज़र आ रही थी, जो उनके गोर बदन पर बिजली की तरह कौंध रही थी.

मगर उससे भी ज़्यादा चौकाने वाली और होश उदा देने वाली बात तोह कुछ और hi थी… अम्मी के दोनों दूध जैसे सफ़ेद और gol-matol मम्मी उस ढीले गले से बाहर छलक रहे थे, जो पूरी तरह से नंगे नज़र आ रहे थे. उनके उन उभरे हुए स्तनों के बीच के हिस्से और उनके गुलाबी निप्पल्स साफ़ दिखाई दे रहे थे, जो इस वक़्त पूरी तरह से तन चुके थे. यह खौफनाक और बेहद कामुक नज़ारा देखकर मेरी सांसें जैसे वहां hi थम गयीं, सीना oopar-neeche होने लगा.

एक तरफ दिल में अम्मी और विशाल के लिए बेइंतेहा गुस्सा उबाल रहा tha—aakhir अम्मी इतनी बेवफा और बेशर्म कैसे हो गयीं? उन्होंने अब्बू को इस तरह धोखा कैसे दे दिया? लेकिन दूसरी तरफ, अम्मी के उस मदहोश कर देने वाले जिस्म और इस तड़पा देने वाले नज़ारे को देखकर मेरे पैरों के बीच, मेरी टांगों के बीच एक अजीब सी बेचैनी और तेज़ हलचल होने लगी थी. मेरा ang-ang वासना की आग में सुलगने लगा था.

विशाल: Woooow…just woooow…Aisha ji…thank यू फॉर कीपिंग प्रॉमिस….

विशाल: "मैं भी अपना वादा पूरा करूंगा..."

जैसे hi स्क्रीन पर विशाल का यह मैसेज चमका, मेरे पूरे बदन में एक ठंडी सिहरन दौड़ गयी. 'वादा...' कैसा वादा? अम्मी ने आईने के सामने झुककर, अपने बदन की नुमाइश करके विशाल के लिए जो किया था, उसके बदले विशाल अम्मी को क्या देने वाला था? क्या वह अम्मी के इस दीवाना कर देने वाले जिस्म को अपनी बाँहों में भरने का वादा था?

उसके बाद विशाल ने कुछ और मैसेज किये the…..kya कर रही ho…khaan ho…ek और पिक दो…. और उसने अपनी एक सेल्फी भी सेंड की thi…..lekin अम्मी ने कोई रिप्लाई नहीं दिया था. मैं समझ गया की उस दौरान अम्मी ने फ़ोन नहीं देखा होगा.

फिर अम्मी का मैसेज,

ऐसा: अरे baba….itne सारे message…poora दिन बस व्हाट्सप्प hi करते हो क्या….

विशाल: Finally….time मिला aapko…batao क्या कर रही हो?

ऐसा: कुछ nahi….dinner कर रही थी….

विशाल: अच्छा ji…dinner के sath-sath chatting…vaah…

ऐसा: मल्टीटास्किंग हूँ मैं….

विशाल: अच्छा, और क्या टास्क कर रही हो अभी??

ऐसा: डिनर कर रही hoon….chat कर रही हूँ और सीमा की स्टुपिड बातों पर हंस भी रही हूँ ताकि किसी को शक न हो….

विशाल: "अरे बाप रे…. बहुत टैलेंटेड हो आप तोह…."

ऐसा: "वह तोह मैं हूँ….." (अम्मी के इस जवाब में एक अजीब सा नशा और अपनी खूबसूरती पर गुरूर था, जैसे वह विशाल को अपनी उँगलियों पर नचाने का मज़ा ले रही हों.)

विशाल: "और बहुत हॉट भी….."

ऐसा: "बदमाश…."

विशाल: "नहीं हो क्या?"

ऐसा: बलुशिंग इमोजी…

विशाल: "और हाँ…. आप जादूगर भी हो…."

ऐसा: "जादूगर?"

विशाल: "हाँ…. जादूगर… वहां baithe-baithe आपने किसी को खड़ा कर दिया… आपकी वो मदहोश कर देने वाली सेल्फी और उसके बाद वो काले सूट के गहरे गले से झांकते आपके वो gore-gore मम्मी, वो सुर्ख लाल रंग की ब्रा और उसमें से कामसमाते वो गुलाबी टिप्स… उन्हें देखते hi मेरा ang-ang बेकाबू होकर आपको सलूट करने लगा… वह पूरी तरह खड़ा हो गया है…."

ऐसा: "काबू में रखो…. अपने… इमोशंस को…" (अम्मी ऊपर से तोह उन्हें रोकने का नाटक कर रही थीं, लेकिन अंदर hi अंदर उनका अपना बदन भी इस नग्न सच को सुनकर सुलगने लगा होगा.)

विशाल: "यह तोह मुश्किल है…. मेरा इमोशन… मेरी कैसे सुनेगा… इसका रिमोट कण्ट्रोल तोह अब पूरी तरह तुम्हारे पास है… तुम्हारी इन कातिल तस्वीरों के पास है…."

ऐसा: "उफ्फ्फ…. अच्छा जी… तोह वह क्या कह रहा है…."

विशाल: "आपके रेस्पेक्ट में खड़ा हो गया है…. कह रहा है… सिर्फ सेल्फी से अब प्यास नहीं बुझने वाली… तुम्हें लाइव देखना है… किसी तंग काले सूट में, इनहिईन लाल रंग के उन्देर्गर्मेन्ट्स के साथ तुम्हें अपनी बाँहों में भीचना है…."

ऐसा: "पागल हो गए हो क्या…. और सुनो, आपने वह अश्लील सेल्फी तोह डिलीट कर दी है न… जो मैंने भेजी थी?" (अम्मी के दिल में एक दर था, लेकिन उस दर के पीछे एक अजीब सी उत्तेजना भी थी.)

विशाल: "न… कभी नहीं करूंगा. तुम्हारी इस जवानी के ख़ज़ाने को मैं अपनी आँखों से कभी दूर नहीं होने दूंगा. ?"

ऐसा: "बदमाश."

विशाल: "ऐसा hi हूँ मैं… अच्छा… यह बताओ… उस पारदर्शी काले सूट के नीचे, पंतय का कौन सा कलर है…." (विशाल अब अम्मी के जिस्म के आखिरी हिस्से के राज़ भी जान लेना चाहता था.)

ऐसा: "तुम्हें कैसे नहीं पता होगा?"

विशाल: "फिर भी. मैं तुम्हारे इन रसीले होठों से सुन्ना चाहता हूँ."

ऐसा: "'लाल'..." (सिर्फ एक shabd—'Laal'... जिसमें चाट के तापमान को और बढ़ा दिया. अम्मी ने कबूल कर लिया था की उन्होंने नीचे भी उसी सुर्ख लाल रंग की पंतय पहनी हुई है.)

विशाल: "ओह्ह्ह भेंचो…… अब तोह मिलना hi पड़ेगा… अब यह बर्दाश्त नहीं होता. आ जाऊं क्या अभी?" (विशाल वासना में पूरी तरह अँधा हो चूका था और गाली देते हुए अपनी चरम उत्तेजना ज़ाहिर कर रहा था.)

ऐसा: "न…. पागल मत बनो, घर में बहुत लोग हैं… पकडे गए तोह अनर्थ हो जाएगा."

विशाल: "लोगों को मरने दो….. बस 10 मिनट के लिए… वैसे मैं तुम्हारे बहुत करीब हूँ…."

ऐसा: "मतलब? तुम इस वक़्त कहाँ हो?" (अम्मी की धड़कनें अब दर और चाहत के मारे तेज़ी से भागने लगी थीं.)

विशाल: "मतलब मैं तुम्हारी hi गली में, अपनी कार में बैतह हूँ…. ठीक स्ट्रीट के एन्ड में…"

ऐसा: "ओह्ह्ह खुदा….. तुम तोह सच में पागल हो गए हो!"

विशाल: "प्लीज ऐसा…. अब मन मत करना… सिर्फ 10 मिनट… किसी तरह चुपके से टेरेस (छत) पर आ जाओ…."

ऐसा: "पर तुम ऊपर कैसे आओगे?... सब नीचे hi हैं." (अम्मी ने मन नहीं किया, बल्कि उनके इस सवाल ने साफ़ कर दिया की वह भी छत पर विशाल के उस गर्म जिस्म से टकराने के लिए तैयार हो चुकी थीं.)

विशाल: "तुम बस वहां पहुंचो… मैं पीछे के रास्ते से कुछ जुगाड़ करता हूँ…."

यह विशाल का लास्ट मैसेज tha…main समझ गया की इसके बाद वह शरबत वाला हादसा हुआ था और अम्मी ने फ़ोन वहां छोड़ दिया था.

"हो गया क्लीन, सीमा?"

टेबल पर बैठी एक औरत की आवाज़ ने मुझे होश में ला दिया.

अम्मी और सीमा खला वाशरूम से वापस आ रही थीं. सीमा खला अब भी अपने सूट का भीगा हुआ पल्ला पकडे थीं.

"...तुमने बचा लिया, ऐसा दीदी," सीमा खला कह रही थीं. "वार्ना मेरा तोह दिल hi बैतह गया था."

मैंने फ़ौरन फ़ोन को वापस वैसे hi कुर्सी पर रख दिया, स्क्रीन को लॉक करके.
 
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