अपडेट-6
अगली प्रतियोगिता से पहले सभी भोजन करने में व्यस्त थे, दूसरे राजयो के राजा राजकुमार यहाँ की राजकुमारियों से बात चित करने में लगे हुए थे, जिसका मौका लगता वो अपना प्रभाव ज़माने में लगा हुआ था, वही प्रताप सिंह निहारिका के आस पास घूम रहा था, वैसे तो सभी का धयान निहारिका पैर hi था लेकिन किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी, लेकिन प्रताप सिंह को फरक नहीं पद रहा था, उसे बस निहारिका चाहिए थी,
प्रताप सिंह- कैसी हैं महारानी
निहारिका- मैं ठीक हु महाराज, आपको हमारे राजय का स्वागत पसंद तो आया न
प्रताप सिंह- पसंद तो बहुत आया ह, मन करता ह अपने साथ ले जाऊ
निहारिका- जी मैं कुछ समझी नहीं
प्रताप सिंह- मेरा मतलब ह, मन करता ह यही रह जाऊ,
निहारिका- ये तो हमारी खुशकिस्मती ह, हो सकता ह जल्दी hi दोनों परिवारों का सम्बन्ध जुड़ जाये, तो फिर आप यहाँ कभी भी आ सकते हैं,
प्रताप सिंह- मैं भी यही सोच रहा हु, तभी का इंतजार क्र रहा हु,
प्रताप दोहरी बात कर रहा था, जबकि निहारिका सीधे सवभाव में बात कर रही थी, इन दोनों को बात करते हुए भवर सिंह ने देख लिया, भवर सिंह जलन और गुस्से में भड़क गया, और उसमे घी का काम किया काम्य ने,
काम्य- भैया ये निहारिका प्रताप सिंह के आस पास कुछ ज्यादा hi घूम रही ह, प्रताप सिंह को तो आप जानते hi हैं वो कैसा इंसान ह, अगर उसकी नजर आपकी पत्नी पैर पद गई तो वो कुछ भी कर जायेगा, और ये निहारिका उसके साथ hi है है क्र बात कर रही ह, कही कोई योजना तू नहीं बना रही ये,
भवर सिंह गुस्से में निहारिका की तरफ गया, भवर सिंह को उस तरफ आता देख नजाने प्रताप सिंह को क्या हुआ वो वह से हैट गया, भवर सिंह का गुस्सा और बढ़ गया, उसके दिमाग में शक पैदा हो गया, वो निहारिका के पास पंहुचा
भवर सिंह- निहारिका ये प्रताप सिंह तुम्हारे पास क्या कर रहा था,
निहारिका- कुछ नहीं महाराज, बस यहाँ की तारीफ क्र रहा था,
भवर सिंह- तुम्हे बड़ी ख़ुशी हो रही थी तारीफ सुनकर
निहारिका- हमारे महेमान खुश हैं इसमें हमे तो खुश होना चाहिए न,
भवर सिंह ज्यादा बात कर पता तब तक काम्य वह आ गई, और भवर सिंह को प्रतियोगिता की बात करने के लिए ले गई,
निहारिका असमंजस सी में कड़ी रह गई,
चारो राजकुमारों को अभी तक किसी से मिलने की अनुमति नहीं थी, वो अगली प्रतियोगिता के इन्तेजार में थे, तीनो भाइयो को तो पता था अगली प्रतियोगिता क्या ह, उन तीनो के चेरे पैर चिंता साफ़ दिख रही थी, लेकिन देव आराम से बैठा हुआ था, उसे दर hi नहीं था क्या होने वाला ह,
कुछ देर बाद राजगुरु ने सन्देश भेज दिया की चारो राजकुमार तैयार रहे प्रतियोगिता शुरू होने वाली ह,
राजगुरु ने फिर से सबका धयान अपनी तरफ किया, और अगली प्रतियोगिता के बारे में बताया जो थी युक्ति मतलब चालाकी.
तीनो राजकुमार एक एक करके मैदान में गए और अपनी प्रतियोगिता खेल क्र बहार आ गए, उसके बाद गया देव सबसे आखिर में, वो जैसे मैदान में पाहकः और अपने चारो तरफ देखा तो देव एक दम घबरा गया क्योकि उनके सामने 5 जानवर खड़े थे, एक था शेर दूसरी तरफ था मगरमछ तीसरी तरफ था घोडा और चौथी तरफ था हठी, और बिच में थी 1 बकरी, चारो जनवाओ के पीछे थे दरवाजे, राजकुमार को अपनी बूढी के बल पैर वह से बहार निकलना था,
मैदान ुचि ुचि दीवारों से घिरा हुआ था वह से बहार निकलना आसान नहीं था, उनके उप्पेर लोग बैठे हुए देख रहे थे,
राजगुरु ने सभी को प्रतियोगिता के बारे में बता दिया,
सूरज ज्वाला और अभिजीत को तो पता था वह क्या होना ह, इसलिए वो तीनो पहले से तैयारी करके वह गए थे इस हिसाब से बहार निकल गए, लेकिन देव को कोई जानकारी नहीं थी, वो कुछ देर खड़ा रहा, फिर वो घोड़े की तरफ गया लेकिन घोडा ने उसके करीब आते hi उछलना शुरू क्र दिया, देव समझगया ये जंगली घोडा ह सवारी नहीं करने देगा, और रस्ते से हटेगा भी नहीं, हठी को अपनी जगह से हटाना भी आसान नहीं था, मगरमछ और शेर के तो पास जाना भी नामुमकिन था,
देव बकरी के पास गया और बकरी को खोल लिया, सभी को समझ आ गया की क्या होने वाला ह क्योकि इससे पहले तीनो राजकुमारों ने भी यही किया था, सूरज ने बकरी को खोला और मगरमछ के पास ले गया, मगरमछ के सामने बकरी को कर दिया मगरमछ बकरी की तरफ बछड़ा तो सूरज ने मगरमछ को खोल दिया और खुद उसके पीछे से निकल गया,
वही ज्वाला ने खुद को बहादुर दिखने के लिए बकरी को शेर के सामने डाला और शेर को खोल दिया और खुद दरवाजे से निकल गया, अभिजीत ने भी बकरी को मगरमछ के सामने डाला और वह से निकल गया,
नियम ये था की बिना जवार को खोले दरवाजे से बहार नहीं निकल सकते थे,
जब देव ने बकरी को खोला तो सब समझ गए की देव भी यही करेगा क्योकि तर्क भी ये hi था, लेकिन देव ने बकरी को मगरमछ के पास नहीं किया उससे थोड़ा दूर रखा, मगराच बकरी की तरफ बढ़ा तो देव ने पीछे से जाकर मगरमछ को खोल दिया, मगरमछ तेजी से बकरी की तरफ गया लेकिन देव उससे पहले दौड़ क्र बकरी के पास पहुंच गया और बकरी जो दर क्र भागने लगी थी उसे पकड़ लिया और मगरमछ से दूर ले गया, मगरमछ ने देव के पीछा किया लेकिन देव उससे दूर भाग रहा था, देव को मौका मिल गया की बहार निकलने का वो जैसे hi बकरी को लेकर दरवाजे पैर पंहुचा तो उसने देखा मगरमछ घोड़े की तरफ जा रहा ह, और घोडा बंधा हुआ, वो अपनी जान बचने के लिए बस अपनी जगह पैर कूद सकता ह, और मगरमछ आजाद ह,
देव एक पल के लिए रुका और दरवाजा खोल क्र बकरी को बहार भगा दिया और खुद वापस आ गया, सभी लोग ाश्चरा से देखने लगे, लेकिन भौमिक जी के चेरे पैर एक मुस्कान थी, उन्होंने गर्व से इधर उधर देखा,
देव दौड़ता हुआ घोड़े के नजदीक पंहुचा, घोडा डरा हुआ था, वो किसी को नजदीन नहीं आने दे रहा था, देव घोड़े के नजदीक पाहकः घोडा दर क्र पीछे हुआ तभी वह मगरमछ भी आ गया, देव ने तुरंत घोड़े की राशि खोल दी, जिससे घोडा उछलता हुआ भगा, मगरमछ देव की तरफ भगा लेकिन देव जल्दी से घोड़े की रस्सी पकड़ क्र उसके साथ भागने लगा, मगरमछ जैसे hi मुद क्र उनके पीछे गया देव ने रस्सी छोड़ी और दरवाजे की तरफ भगा और दरवाजा खोल दिया, और खड़ा हो गया,
सभी लोगो को लगा देव अब बहार आ जायेगा लेकिन वो खड़ा रहा, दरवाजा खुला देख घोडा भी उसकी तरफ आ गया देव ने उसे भी बहार निकल दिया और खुद दरवाजे से बहार निकल क्र दरवाजा बंद क्र दिया,
सभी ने तालिया बजा क्र देव क बहादुरी का स्वागत किया,
प्रतियोगिता समाप्त हो चुकी थी, राजगुरु फिर से अपनी जगह पहुंच गए,
राज गुरु – इस प्रतियोगिता में भी चारो राजकुमार सफल रहे, लेकिन तीनो राजकुमारों ने जो अपनी जान बचन के लिए किया उससे दो जाने चली गई,
तीनो राजकुमार चौंक गए, 2 जाने कैसे,
राजगुरु- उन्होंने बकरी का सहारा लेकर मगर को खोल दिया, जो बकरी के बाद सीधा घोड़े के पास जायेगा और कुछ देर घोडा खुद को बचा सकता ह लेकिन जल्दी hi मगर का शिकार हो जायेगा, लेकिन देवदूत ने अपनी बूढी और बहादुरी से अपने साथ साथ बाकि दोनों जाने भी बचा ली, उस बकरी की भी जो केवल वह राजकुमार की रक्षा के लिए बंधी थी और उस घोड़े की भी,
यही एक सच्चे योद्धा और राजा की पहचान होती ह जो अपनी जान से पहले बेजुबानो और परजा की सोचे,
प्रताप सिंह बिच में बोल पड़ा,
प्रताप सिंह- राजगुरु वो मगर खुला हुआ ह, वो उस हठी और शेर को भी तो खा सकता ह,
राजगुरु- इस हिसाब से तो तीनो राजकुमारों ने 4 जाने ले ली, लेकिन ऐसा नहीं ह, शायद उन तीनो राजकुअंरो ने ऐसा न सोचा हो की कोण जियेगा कोण मरेगा लेकिन देवदूत ने ऐसा सोचा, क्योकि मगर हठी से नहीं लड़ सकता, हठी उसे मर देगा और शेर से तो खुद हठी भी नहीं लड़ता, मगर शेर के पास जायेगा भी नहीं क्योकि ये पानी नहीं ह, पानी के अंदर मगर उन दोनों पैर हुम्ला कर सकता था लेकिन खुले मैदान में नहीं,
राजगुरु की बात पैर तालियों की गड़गड़ाहट होने लगी, खुद भवर सिंह ताली बजने से नहीं रह सका, लेकिन अमरावती सौमित्र काम्य सूरज ज्वाला और अभिजीत गुस्से में पागल हुए जा रहे थे,
राजगुरु खुद हैरत में थे, ये क्या हो गया, ये कैसे हो सकता ह, भौमिक जी राजगुरु के पास आये,
भौमिक जी- क्या हुआ भैया आप चिंतित हैं,
राजगुरु- ये सही नहीं हो रहा ह, इस लड़के को बचपन से कुछ नहीं सिखाया गया, बस विद्या दी गई ह बाकि कुछ नहीं फिर भी ये सबसे आगे ह,
भौमिक जी- आप शायद भूल रहे हैं विद्या से ज्यादा शक्तिशाली कुछ नहीं होता, हर मुश्किल का जवाब होता ह विद्या में,
राजगुरु- अगर ये जीत गया तो अनर्थ हो जायेगा,
भौमिक जी- ऐसा क्यों भैया आप कुछ छुपा रहे हैं मुझसे, आप इस लड़के से इतना डरते क्यों हैं, इतना मासूम ह ये लड़का,
राजगुरु- उधर देखो, (राजगुरु ने अमरावती सौमित्र और काम्य की तरफ इशारा किया,) वो तीनो अपने अपने बेटे को युवराज बनाना चाह्हती हैं, इसके लिए उन्होंने इस प्रतियोगिता के सरे चरण पहले hi पता कर लिए थे, फिर भी उनके बेटे हार रहे हैं, वो तीनो साजिसों की महारानी हैं, अगर उनके बेटे युवराज नहीं बने तो वो सब तबाह कर सकती हैं,
भौमिक जी- उनके दर से किसी गलत इंसान को युवराज बना देंगे आप
राजगुरु- तुम्हे क्या लगता ह भवर सिंह अच्छा इंसान ह, नहीं वो बहुत बुरा ह लेकिन हमारा धरम राजय को बचाना ह, मैं किसी तरह से इस राजय को बचता आ रहा हु, लेकिन अब साजिशे बहुत बढ़ गई हैं, और जैसा मैं देख रहा हु एक विध्वंश आ रहा ह इस राजय की तरफ, मुझे दर ह कही ये वही समय न हो, अगर देवदूत युवराज बना तो ये लोग उसे मरवा देंगी, और साथ में निहारिका को भी, जो होता दिख रहा ह,
भौमिक जी- इसीलिए उन दोनों की कुंडली में कुछ नहीं दीखता क्योकि उनकी जीवन रेखा hi नहीं ह,
राजगुरु- लेकिन मैंने उनकी मृत्यु नहीं देखि, उनकी कुंडली में उनकी मृत्यु का कोई योग नहीं बनता, ऐसा लगता ह जैसे उनकी कुंडली कोई और hi अपने हिसाब से लिख रहा ह,
भौमिक जी- भैया इस संसार में कितना भी ज्ञान आ जाये लेकिन कोई भगवान् के फैसलों को नहीं समझ सकता, शायद ये hi नियति हो, जो हो रहा ह होने दीजिये, बिच में बढ़ा मत बनिए,
राजगुरु- मैं नहीं चाहता इस लड़के को कुछ हो, लेकिन इससे इस राजय का विध्वंश जुड़ा हुआ ह,
तभी वह भवर सिंह आ गए, राजगुरु ने भौमिक जी को वह से भेज दिया,
भवर सिंह- राजगुरु देवदूत ने ये सब कैसे क्र लिया, हमारी उम्मीद के परे ये कैसे हो गया, क्या वो युवराज बन जायेगा, क्या वही होने जा रहा ह जिसका दर था,
राजगुरु- मुझे नहीं पता महाराज, लेकिन कुछ ठीक नहीं लग रहा, वैसे अभी दो प्रतियोगिता बची हुई हैं, अगर बाकि राजकुमारों में से कोई उन दोनों में जीत जाता ह, और देवदूत हर जाता ह तो ऐसा कुछ नहीं होगा,
भवर सिंह- वो हारना चाहिए राजगुरु,
रात में महल के कमरों में बहुत से लोग अलग अलग जगह एक hi बात पैर चर्चा कर रहे थे, की देव ने ये सब कैसे किया,
अमरावती- सूरज तू कैसे हर सकता ह,
सूरज- माँ मैं तो वही कर रहा हु जिसकी तैयारी की थी लेकिन वो हरामखोर देवदूत न जाने कैसे कुछ नै तरकीब लगा रहा ह,
अमरावती- वो युवराज नहीं बनना चाहिए, अगर वो युवराज बना तो सब तबाह हो जायेगा,
सूरज- तबाह हो जायेगा, कैसे तबाह हो जायेगा.
अमरावती- तू ये सब छोड़ बस किसी तरह उसे हरा
सूरज- आप चिंता मत कीजिये, मैंने सब इंतजाम किये हुए हैं,
वही काम्य अपने कमरे में थी अभिजीत के साथ
काम्य- मैं इस देवदूत को बर्बाद कर दूंगी, इसका ऐसा हशर करुँगी ये अपनी मोत के लिए तड़पेगा,
अभिजीत- माँ वो ये सब कैसे कर गया, मुझे यकीन नहीं हो रहा
काम्य- चुप हो जा तू नालायक, तू हमेषा अयाशी में hi लगा रहे, वो सूरज भी तुझसे जीत गया, कभी ठीक से अपने गुरु की बातो पैर धयान दिया होता तो आज ये हार न देखनी पड़ती,
अभिजीत चुप हो गया, काम्य गुस्से में इधर उधर घूमने लगी,
सौमित्र अपने कमरे में- अब वक़्त आ गया ह,
ज्वाला- कैसा वक़्त माँ,
सौमित्र- सब पता चल जायेगा, बहुत समय से इंतजार था मुझे इस समय का,
ज्वाला- क्या होने वाला ह माँ
सौमित्र- विनाश
इधर चारो राजकुमारिया एक hi कमरे में बैठी हुई थी,
अक्षरा- आज तो देव ने कमल hi कर दिया, दोनों प्रतियोगिता में विजेता रहा, किसी को उम्मीद नहीं थी वो ऐसा कर पायेगा,
रीवा- सही बोल रही ह, मैंने कभी सोचा भी नहीं था देव के पास इतनी बूढी ह, बिलकुल नासमझ सा लगता ह, लेकिन देखो आज कैसा कारनामा कर दिखाया,
अमिता- सच में यार आज तो कमल hi क्र दिया उसने, सूरज को भी हरा दिया,
सोमिया- मुझे कुछ अच्छा सा महसूस नहीं हो रहा दिल बहुत घबरा रहा ह, जिस लड़के से मेरी शादी की बात हो रही ह मुझे उसकी हरकते अच्छी नहीं लग रही,
अक्षरा- ये सभी राजा राजकुमार एक जैसे hi होते हैं, सभी कितनी गन्दी तरीके से देख रहे थे हमे,
रीवा- और वो प्रताप सिंह, मुझे तो उससे दर लग रहा ह,
अमिता- मुझे मर्दो की नजरे अच्छी लगती थी लेकिन आज ऐसा लग रहा था जैसे मैं एक नुमाइश की चीज हु, मुझे पता ह मुझे किसके गले में वरमाला डालनी ह फिर भी मैं लोगो के लिए तमशा सा बानी हुई थी,
रीवा- आज जो भी हो रहा था उसमे एक बात तो समझ आई गई की हम लड़किया खुद को कितना भी ताकतवर दिखा दे लेकिन हम बस इन मर्दो के लिए उन्हें खुश करने और राजनीती करने का सामान हैं, आज किसी की नजरो में छुपी अच्छे का अहसास हो रहा ह, साफ़ नजरे कितना सकूं दे सकती हैं,
सोमिया - किसकी बात कर ह्री हो तुम
अक्षरा- सिर्फ एक hi ह जिसकी नजरो में हमेशा सच्चाई और सफाई देखि ह, वो ह देव, क्यों रीवा सही कहा न
रीवा- है सही कहा, सूरज ज्वाला और अभिजीत की नजरो में भी मैंने खुद के लिए गन्दगी हवस देखि ह, लेकिन देव की नजरो में कभी किसी के लिए कुछ गलत नहीं देखा,
चारो बहेनो ने जब समाज का असली चेरा देखा तो उन्हें देव की अच्छे का अनुभव हुआ, दुनिया में हर औरत ताकतवर की तरफ आकर्षित होती ह, लेकिन जब उसे जीवन साथी चुनना होता ह तो वो हमेषा अच्छा और सच्चा इंसान hi ढूंढ़ती ह, और अब वो अपने पति के रूप में देव जैसी अच्छे वाला इंसान ढूंढ रही थी, लेकिन देव तो अकेला था इस दुनिया में और वो भी उनका भाई था,
इधर देव निहारिका के पास बैठा हुआ था,
निहारिका- आज तूने मेरा सर गर्व से ुचा कर दिया बीटा,
देव- मैंने कुछ नहीं किया माँ, मैं तो वही कर रहा था जो आपसे सीखा ह, ये सब ज्ञान मुझे आपसे hi तो मिला ह, आचार्य जी के बाद आपने hi मुझे सब सिखाया ह,
निहारिका- लेकिन तेरे जितने से कोई खुश नहीं ह, अगर तू बाकि दो प्रतियोगिता भी जीत गया तो
देव- तो क्या मैं खुद युवराज बनने से मन कर दूंगा, मैं तो बस आपके सम्मान के लिए ये प्रतियोगिता खेल रहा हु, आज मैंने सबकी नजरो में सम्मान देखा माँ, बस वही सम्मान चाहिए मुझे, इससे ज्यादा मई कुछ नहीं छठा,
निहारिका ने देव को गले से लगा लिया,
अगली सुबह सभी वैसे hi मैदान में पहुंच गए, राजगुरु जी अपनी जगह खड़े थे, सभी का स्वागत किया गया, प्रताप सिंह वह आते hi निहारिका को ढूंढ़ने लगा, निहारिका सबसे पीछे बैठी थी, प्रताप सिंह की नजर बार बार निहारिका पैर जा रही थी, काम्य ने भवर सिंह का धयान प्रताप सिंह पैर करवाया,
भवर सिंह का माथा फिर से चढ़ गया था, वो खुद निहारिका के पास नहीं जाता था लेकिन कोई और उसे देख ले ये उसे बर्दास्त नहीं था,
राजगुरु ने प्रतियोगिता की शुरुआत करवाई, ये प्रतियोगिता थी शहन्शक्ति की, इसमें चारो राजकुमारों को एक hi जगह पैर खड़े रहना था, जमीन में चार लकड़ी की बल्लिया गाड़ी हुई थी, जिन्हे पकड़ क्र खड़ा होना था, और जब तक कोई एक न रह जाये तब तक खड़े रहना था, तब तक न भोजन मिलेगा न hi पानी, वो कितने समय तक खड़े रह सकते थे, और वह आने वाली समश्याओ को कब तक झेल सकते थे, और किसी को बैठने की भी अनुमति नहीं थी,
चारो राजकुमार वह आ गए और अपनी अपनी जगह पैर खड़े हो गए, चारो नंगे पेअर थे, निचे राइट थी, कुछ देर तो सब आराम से खड़े रहे लेकिन एक जगह पैर खड़े रहना आसान काम नहीं था, जैसे जैसे गर्मी बढ़ने लगी, पानी की प्यास भी बढ़ने लगी, निचे से राइट गरम होने लगी थी, और उसमे जो चीटिया घूम रही थी वो राजकुमारों के शरीर पैर चढ़ने लगी थी, पैरो में दर्द होने लगा था, बाकि सब लोग आराम से बैठे थे भोजन कर रहे थे, वही प्रताप सिंह निहारिका के आस पास hi घूम रहा था, जिससे भवर सिंह गुस्से में आग बबूला हो रहा था,
काम्य भवर सिंह के आस पास hi घूम रही थी, वो बार बार भवर सिंह को प्रताप सिंह और निहारिका के बारे में भड़का रही थी,
काम्य- भैया ये औरत आपकी इज्जत पैर दाग लगवायेगी,
भवर सिंह- काम्य इसे यहाँ से ले जाओ,
काम्य- यहाँ से ले जाने से इसका क्या होगा, ये इस राजय में hi रहने लायक नहीं ह,
भवर सिंह- फ़िलहाल इसे ले जाओ, और मुझे लगता ह इस प्रताप सिंह के मुझे अपनी बेटी की शादी नहीं करनी छाइये,
काम्य- भैया प्रताप सिंह से दुश्मनी हमारे लिए ठीक नहीं ह, इस निहारिका की वजह से हम उससे दुश्मनी क्यों ले,
भवर सिंह चुप हो गया,
काम्य- मुझे कुछ साजिश का दर लग रहा ह
भवर सिंह – कैसी साजिश
काम्य- इधर ये निहारिका प्रताप सिंह से याराना बढ़ा रही ह, और उधर इसका बीटा देवदूत जिसे कोई ज्ञान नहीं था, कोई युद्ध कला नहीं सिखाई गई वो कितने आराम से प्रतियोगिता जीत रहा ह, कही ये सब इस निहारिका ने प्रताप सिंह के साथ मिलकर हमारे आदमियों को धन का लालच देकर प्रतियोगिता के बारे उस देवदूत को पहले से hi सब तो नहीं बता दिया, इसलिए वो जीत रहा ह,
भवर सिंह के दिमाग में चिंता उभरने लगे,
काम्य इतना बोल क्र वह से निकल गई, बहवर सिंह का धयान देव पैर गया जो बड़ी hi शांति से मैदान में खड़ा था, जबकि बाकि तीनो राजकुमारों को बड़ी तकलीफ हो रही थी, निचे गरम राइट पेअर जला रही थी, उप्पेर से कड़ी धुप शरीर जला रही थी, शरीर पैर चीटिया रेंग रही थी, भूक और प्यास से तकलीफ बढ़ रही थी, और शाम होते होते सबसे पहले सूरज ने हार मान ली उसके बाद ज्वाला ने फिर अभिजीत ने, और देव आखिर तक मैदान में खड़ा रहा,
राजगुरु ने देव को विजेता घोषित किया, पूरा राजय अचंभित था, जिसे सबसे कमजोर समझा जा रहा था उसने तीनो राजकुमारों को हरा दिया था, पूरा राजय ख़ुशी से तालिया बजा रहा था, जबकि अमरावती सोमिता और काम्य गुस्से में मरी जा रही थी, बावर सिंह भी चिंतित थे,
रात में चारो राजकुमारों का इलाज किया जा रहा था, देव की हालत भी काफी ख़राब हो गई थी, लेकिन वो सहन क्र रहा था और यही इस प्रतियोगिता का नियम था कोण ज्यादा सहन कर सकता ह,
रात में अमरावती सौमित्र और काम्य के कमरे में भूचाल आया हुआ था, वो चीजे इधर उधर फेंक रही थी,
अमरावती के कमरे में
सूरज- माँ शांत हो जाइये, हमारे पास मौका ह, कल शक्ति प्रदर्शन होगा, और आप जानती ह मुझसे ताकतवर यहाँ कोई नहीं ह,
अमरावती- तू नहीं समझता बेटे, वो देवदूत युवराज नहीं बनना चाहिए,
सूरज- माँ वो युवराज नहीं बनेगा, लेकिन आप इतना परेशां क्यों हो उससे, वो हमारा क्या बिगड़ लेगा,
अमरावती- मैं पिछले 19 सालो से इसी दर में हु की क्या होगा,
सूरज- मैं समझा नहीं माँ
अमरावती- जब जब इस इस महल में किसी लड़के ने जनम लिया ह, मैंने अपने एक प्रोहित से सबकी जनम कुंडली दिखाई ह, और जब ज्वाला पैदा हुआ था तो उसके भाग्य में न युवराज पद ह न hi राजा बनना लिखा था, फिर ये अभिजीत पैदा हुआ तो उसकी कुंडली में भी वही था, लेकिन जब ये देवदूत पैदा हुआ तो प्रोहित जी भी घबरा गए थे, उन्होंने कहा था इसका जनम बहुत hi विशेष कार्य के लिए हुआ ह, इसके भाग्य में राजा बनना लिखा ह, जब ये राजा बनेगा तो इससे बड़ा कोई राजा नहीं हो सकेगा,
सूरज- हम इसे राजा बनने hi नहीं देंगे,
अमरावती- जब यहाँ के राजगुरु ने इसकी कुंडली देखि तो उन्होंने कहा था ये राजा भवर सिंह के लिए जीवन में विध्वंश लाएगा, उनके हिसाब से ये कभी राजा नहीं बनेगा,
सूरज- दो भाग्य कैसे हो सकते हैं,
अमरावती- इन दोनों की बातो में एक खास बात थी,
सूरज- वो क्या
अमरावती- जो भी होगा वो इसकी 18 से 19 साल की उम्र के बिच में होगा,
सूरज- और ये उसी उम्र में ह इस वक़्त,
अमरवती- है
सूरज- आप चिंता मत करो, ये शादी होने दो मैं इसे रस्ते से हटा दूंगा, मैंने सब योजना बनाई हुई हैं,
वही दूसरे कमरे में सौमित्र और ज्वाला भी इसी मुद्दे पैर बात क्र रहे थे,
ज्वाला- मैं इस देवदूत को जान से मार दूंगा,
सौमित्र- इसे मरना hi होगा, वर्ण इसके लिए जो भविष्यवाणी हुई थी वो सच हो जाएगी,
ज्वाला- कोनसी भविष्यवाणी माँ
सौमित्र- मेरे पिता के राजगुरु ने देव के लिए भयव्या वाणी की थी की ये बहुत बड़ा योद्धा बनेगा, इससे जीत पाना नामुमकिन होगा, इसलिए मैंने महाराज को भेला फुसला क्र इसे कभी युद्ध कला hi सिखने नहीं दी, लेकिन ये बिना कुछ सीखे hi प्रतियोगिता जीत रहा ह, उन्होंने कहा था अगर इसे 18 से 19 साल के बिच तक रोक दिया तो ठीक वर्ण ये नहीं रुकेगा,
और हमारे राजगुरु बोलते हैं ह ये महाराज के लिए ठीक नहीं ह,
ज्वाला- मैं इसे कल hi मार दूंगा, इसका अंत निकट आ चुक्का ह, मैं इसे कुछ बनने hi नहीं दूंगा,
इधर काम्य भी इसी उधेड़ बन में लगी हुई थी,
काम्य- अभिजीत अगर तुझे राजा बनना ह तो सबसे पहले इस देव को रस्ते से हटाना होगा,
अभिजीत- माँ उसका दर नहीं ह वो तो डरपोक ह, सूरज और ज्वाला हमारे रस्ते में आएंगे, देव प्रतियोगिता जित क्र भी कुछ नहीं कर सकेगा,
काम्य- तू नहीं जनता बीटा, ये लड़का जैसा दीखता ह वैसा ह नहीं, इसके अंदर कुछ अलग hi ह, हमारे पास एक hi मौका होगा इसे रस्ते से हटाने का, अगर वो मौका हाथ से निकल गया तो सब बर्बाद हो जायेगा
अभिजीत- कैसा मौका
काम्य- जब ये पैदा हुआ था तो मैंने इसकी कुंडली एक तांत्रिक से दिखवाई थी, उसने बताया था की अगर लड़का जिन्दा रहा तो सब कुछ तहस नहस कर देगा, 18 साल से 19 साल के बिच में अगर इसे मार दिया तो ठीक वर्ण इसे कोई नहीं मार पायेगा, इसकी मृत्यु सिर्फ 18 से 19 साल के बिच में हो सकती ह, न उससे पहले और न उसके बाद,
अभिजीत- ऐसा कैसे हो सकता ह, एक इंसान hi तो ह जब चाहो मर दो,
काम्य- मैं पिछले 18 सालो से इसे मरने की कोशिश कर रही हु, इसके खाने में लगातार थोड़ा थोड़ा जहर मिलती आ रही हु ताकि ये बीमार होकर मर जाये और किसी को शक न हो, ये आज तक बीमार भी नहीं पड़ा, मैंने बहुत बार इसे मरने की कोशिश की ह लेकिन मार नहीं पाई, लेकिन अब जो हालत चल रहे हैं उस हिसाब से ऐसा लग रहा ह वो समय आ गया ह, यही समय ह जब इसे मरना सही होगा, वर्ण ये हम सबको तबाह कर देगा,
ऐसी hi चर्चा भवर सिंह और राजगुरु के बिच भी चल रही थी,
भवर सिंह- क्या लगता ह राज गुरु
राजगुरु- महाराज मुझे लगता ह समय आ गया ह,
भवर सिंह- लेकिन मैं ये सब करूँगा कैसे
राजगुरु- कुछ तो करना hi होगा,