अपडेट-3
महल में अमिता अपनी माँ अमरावती के पास बैठी हुई थी,
अमिता- माँ मेरी शादी कब होगी,
अमरावती- तुझे बड़ी जल्दी हो रही ह शादी की,
अमिता- माँ मेरी उम्र हो गई ह, आपकी शादी भी तो जल्दी hi हो गई थी फिर मेरी क्यों नहीं हो रही,
अमरावती- तेरे लायक कोई राजा या राजकुमार नहीं मिल रहा महाराज को,
अमिता- तो मेरा स्वंवर रखवा दीजिये न, मैं खुद पसंद क्र लुंगी,
अमरावती- स्वंवर बस नाम के लिए होता ह, उसमे लड़की के माता पिता hi बताते हैं किसे अपना पति चुनना होता ह, जिद दिन महाराज को तुम्हारे योग्य लड़का मिल जायेगा वो बता देंगे, तब तक तू खुद पैर सयम रखना, अपना खजाना ऐसे hi मत लुटवा देना, अगर तेरे पति को पता चला तेरा कौमार्य भांग हो चुक्का ह तो राजाओ के युद्ध हो जायेंगे और बहुत बदनमी भी होगी,
अमिता- मतलब जब तक पति न मिले मैंने ऐसे hi तड़पती रहूंगी, आप पिता जी से कहिये जल्दी से मेरी शादी करवाए, अगर कुछ उच्च नीच हो गई तो फिर मुझे दोष मत देना,
अमरावती ने अपना माथा पकड़ लिया,
शाम को जब भवर सिंह अमरावती के पास आया तो अमरावती ने सबसे पहले अमिता की शादी की बात की और समझाया की उनकी बेटी अब बहुत बड़ी हो चुकी ह,
भवर सिंह- अमिता hi नहीं बाकि दोनों लड़किया भी अब बड़ी हो चुकी हैं, और काम्य की बेटी भी शादी लायक हो चुकी ह, मैं सोच रहा हु सभी की शादी एक साथ क्र दी जाये, इससे राजय का खर्च भी काम होगा, बार बार खर्चा नहीं करना होगा, मैंने कुछ राजकुमारों और राजाओ को देखा ह शादी के लायक, मैं उन्हें खबर भिजवाता हु, और एक स्वम्वर का आयोजन करता हु,
अमरावती- जब आपने देख hi रखे हैं तो स्वंवर की क्या जरुरत ह,
भवर सिंह- अगर स्वंवर नहीं होगा तो आस पास के ताकतवर राजा नाराज हो जायेंगे, जो हमारे राजय के लिए अच्छा नहीं ह, और उसी के साथ मैं सोच रहा हु की, ऐसा करो तुम पुरे परिवार को बुलवाओ,
अमरावती- आप क्या सोच रहे ह मुझे तो बताइये,
भवर सिंह- पहले सबको सभा में बुलवाओ फिर वही बताता हु,
अमरावती के मन ने शंका आ गई, लेकिन महाराज का आदेश था तो मन्ना hi था, अमृता ने सबके पास खबर भिजवा दी,
कुछ hi समय में पूरा परिवार महाराज के कमरे के बहार सभा करने के लिए एक कमरे में इकठा हो गए, देवदूत वह था hi नहीं, निहारिका एक कोने में कड़ी हो गई,
काम्य- क्या बात ह भैया सबको इस तरह यहाँ बुलाया
भवर सिंह- मैंने कुछ फैसले लिए हैं, और पहला फैसला ये ह की कुछ hi समय में चारो लड़कियों का स्वंवर होगा, और कुछ राजाओ को मैंने चुना हुआ ह उनके बारे में तुम्हे जानकारी मिल जाएगी, तो उन्हें hi चुनना स्वंवर में,
स्वंवर का नाम सुनकर अमिता और सौमित्र के दिल ख़ुशी से झूमने लगे, लेकिन रीवा के मन में हलचल सी हो गई, वो शादी के नाम से hi विचलित हो जाती थी, अक्षरा अभी जीवन को ख़ुशी से जीना छाती थी,
काम्य- भैया इतनी जल्दी शादी का ैस्ले
भवर सिंह- सभी लड़किया जवान हो चुकी हैं, जल्दी नहीं देर हो चुकी ह, इन सबकी शादी तो काफी समय पहले हो जनि छाइये थी लेकिन सही राजा नहीं मिले थे,
सौमित्र- सही सोचा ह आपने,
भवर सिंह- और उसी स्वंवर के बाद मैं युवराज की घोषणा करूँगा,
ये बड़ा धमाका था, सबके कान खड़े हो गए, अमरावती सौमित्र और काम्य तीनो ने चौंक क्र भवर सिंह को देखा,
काम्य- इसकी या जरुरत ह अभी भैया, अभी तो आप राजा हैं, अभी से युवराज क्यों,
अमरावती- महराज सही सोच रहे हैं, युवराज तो होना hi चाहिए,
सूरज ज्वाला और अभिजीत की आँखों में चमक आ गई थी,
सौमित्र- लेकिन युवराज चुना किस तरह जायेगा,
भवर सिंह- ये ह सही सवाल, तुम सच में बहुत समझदार हो सौमित्र,
सौमित्र की तारीफ से काम्य और अमरावती जल भून गई, और सौमित्र ख़ुशी से झूम उठी,
भवर सिंह- तीनो राजकुमारों को कुछ कार्य दिए जायेंगे, प्रतियोगिता करवाई जाएगी, जो भी राजकुमार जीतेगा वही युवराज बनेगा,
भवर सिंह 3 राजकुमार बोलै था और उसके बेटे भी तीन थे, अब काम्य के दिल में दर बैठ गया, वही अमरावती और सौमित्र सूरज और ज्वाला खुश हो गए की अभिजीत तो पहले hi बहार हो गया, और देवदूत को वो आसानी से हरा hi लेंगे, मुकाबला बस सूरज और ज्वाला में hi होगा,
काम्य- भैया फिर तो हमे अपने राजय चले जाना चाइये अब,
भवर सिंह- ऐसा क्यों बोल रही ह बहन
काम्य- आपके तीनो बेटे युवराज की प्रतियोगिता खेलेंगे हम यहाँ देख क्र क्या करेंगे,
भवर सिंह- मेरे तीनो बेटे, नहीं नहीं तुम गलत समझ रही हो, तीसरा राजकुमार देवदूत नहीं अभिजीत ह, देवदूत इस लायक hi नहीं ह की उसे किसी प्रतियोगिता में उतरा जाये, वो मेरा बीटा ह ये मेरा दुर्भाग्य ह, उसे इस राजमहल में रहने दिया जाता ह वही काफी ह,
भवर सिंह की बात से काम्य खुश हो गई लेकिन अमरावती और सौमित्र के चेरे पैर नाराजगी साफ़ दिख रही थी, सूरज और अभिजीत ने भी एक दूसरे को मुस्कुरा कर सहमति जताई लेकिन उस मुस्कराहट ने जलन साफ़ दिख रही थी,
इस सब के बिच निहारिका एक कोने में कड़ी अपनी भीगी हुई आँखों से मुस्कुरा रही थी, उसे दुःख था उसके बेटे का इस परिवार में कोई सम्मान नहीं ह लेकिन ख़ुशी थी की वो इस प्रतियोगिता से दूर रहेगा,
तभी अक्षरा बोली- मां जी देवदूत को मौका तो मिलना चाहिए अपनी क़ाबलियत दिखने का,
भवर सिंह- बेटी तू उसे नहीं जानती, वो तुम सबके लिए ठीक नहीं ह, उसके बारे में ज्यादा मत सोचा कर, और अब तुम लड़किया अपना घूमने फिरने का शोक पूरा कर लो, फिर शादी होकर पिता जैसे तहत नहीं मिलेंगे, इसलिए कल तुम सब पहाड़ो पैर घूम आओ और तीनो राजकुमार भी साथ जायेंगे, वह काफी अच्छा लगेगा तुम सबको,
सभी ख़ुशी से झूम उठे,
वही देवदूत भौमिक के साथ औषधीय ढूंढ रहा था, और उनके बारे में सिख रहा था, देवदूत आगे बढ़ गया तो भौमिक जी ने आवाज लगाई- देव जरा रुको
देवदूत- आपने मुझे देव क्यों कहा, देव सिर्फ मेरी माँ बोलती ह, बाकि कोई नहीं बोलता,
भौमिक- क्यों बोलती हैं वो तुम्हे देव
देवदूत- प्यार से
भौमिक- तो मतलब जो तुम्हे प्यार करते हैं या पसंद करते हैं वो तुम्हे देव बोल सकते हैं न
देवदूत- है बोल तो सकते हैं
भौमिक- तो मैं तुम्हे पसंद करता हु, तुम मेरे बेटे जैसे हो, इसलिए मैंने तुम्हे देव बोलै और अब से मैं तुम्हे देव hi बोलूंगा, तुम और तुम्हारा रूप किसी देवता से काम नहीं ह,
देवदूत- जैसा आप ठीक समझे गुरु जी,
(यहाँ से देवदूत को देव लिखा जायेगा)
भौमिक ने मन में सोचा- कितना भोला ह ये लकड़ा, कोई इसे नापसंद कैसे कर सकता ह, कोई इसे सजा कैसे दे सकता ह, लेकिन बड़े बहिया खुद इससे दूर रहना छाते हैं तो मतलब उन्होंने इसकी कुंडली में देखा होगा, इसलिए महाराज इससे दूर रहते हैं, मुझे इसकी कुंडली को देखना पड़ेगा, ऐसा क्या ह जिस वजह से इसे इतना सेना पद रहा ह,
कुछ समय बाद दोनों वापस आ गए, और भौमिक जी राजगुरु के पास चले गए, राजगुरु घर पैर नहीं थे, तो भौमिक जी देवदूत की कुंडली उठा लाये,
रात्रि में भौमिक जी देव की कुंडली को पढ़ने लगे, लेकिन उसमे कुछ नहीं मिला था एक दम खली थी, भमिक जी ाश्चरायचकित रह गए, राजगुरु जी के पास राजपरिवार के सभी लोगो की कुंडली होती ह और वो भी पूरी तरह से लिखी हुई, लेकिन देव की कुंडली एक दम खली ऐसा कैसे हो सकता था, राजगुरु जी ने देव की कुंडली में कुछ लिखा क्यों नहीं,
भौमिक जी ने अगले दिन राजगुरु से बात करने का विचार किया,
वही राजगुरु का दूसरा भाई सात्विक, अमरत्व की खोज में एक बहुत बड़े तांत्रिक के पास पहुंच गया था, सात्विक अपने दोनों भाइयो की तरह hi काफी विद्वान् था लेकिन उसके अंदर महेत्वकंषा बहुत यदा थी, उसने जो विद्या प्रपात किट hi उससे संतुष्ट नहीं था, वो और भी ज्ञान पाना चाहता था, और जब राजगुरु ने सात्विक को खोज के लिए भेजा तो उसे मौका मिल गया अलग अलग विद्वानों से मिलने का और ज्ञान प्रपात करने का,
सात्विक जिस तांत्रिक के पास पंहुचा वो कहने को तो तांत्रिक था लेकिन उसने अपनी तंत्र विद्या का कभी गलत इस्तेमाल नहीं किया था, हमेशा लोगो की भलाई के लिए hi उसका इस्तेमाल किया था, इसलिए सब उसे सम्मान की नजरो से देखते थे, दूर दूर से लोग उनसे तंत्र विद्या सिखने आते थे, क्योकि संसार में कुछ शमश्याओ का समाधान मंत्रो में होता ह तो कुछ का संधान तंत्र से होता ह,
सात्विक- तंत्र गुरु मैं आपके पास बड़ी आस लेकर आया हु,
तंत्र गुरु- तू जिस आस से आया ह वो इस संसार का सबसे बड़ा राज ह, तू अमरत्व को खोज में आया ह, और अमरत्व कोई ऐसी चीज नहीं ह जो किसी को भी दान में मिल जाये, बड़े बड़े ज्ञानियों ने अमरत्व को पाने की कोशिश की ह लेकिन कोई अमर नहीं हो पाया, महाविद्वान रवां भी अमरत्व पाने गया था लेकिन उसे भी मृत्यु आई, बहुत ऋषि योद्धा हुए जिन्होंने अमरत्व पाने की कोशिश की लेकिन कोई अमर नहीं हुआ,
सात्विक- लेकिन 7 चिरंजीवी तो ह दुनिया में,
तंत्र गुरु – वो किसी महतवपूरण कार्य के लिए धरती पैर रुके हुए हैं, जिस दिन उनका कार्य समापत हो जायेगा वो भी चले जायेंगे, खुद भगवन ने अमरत्व नहीं रखा अपने लिए फिर तुम कैसे प् सकते हो,
सात्विक- कोई तो होगा जो उसके नजदीक पंहुचा होगा,
तंत्र गुरु- तू मेरे पास आया ह तुझे खली हाथ तो नहीं जाने दूंगा, एक जानकरी देता हु,
हर युग में कोई न कोई ऐसा जरूर आता ह जो अमरत्व पाने की कोशिश करता ह, अमरत्व की इच्छा तो सब पाना चाहते हैं लेकिन कोशिश बहुत काम कर पते हैं, उनमे से एक महायोद्धा था जो अमरत्व तक पहुंच गया था, तुझे उसके बारे में जानना होगा, अगर तूने उसके बारे में जान लिया तो शायद तुझे सफलत मिल जाये,
सात्विक- मैं उसके बारे में कैसे जान पाउँगा
तंत्र गुरु- वह तक पहुंचने में तेरी ये विद्या काम नहीं आएगी, तुझे और ज्ञान की जरुरत ह,
सात्विक- मुझे वो विद्या सीखनी ह,
तंत्र गुरु – तंत्र विद्या सिखने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता ह, मंत्र भगवान् के नजदीक ले जाते हैं लेकिन तंत्र शैतान के नजदीक ले जाता ह, अगर तंत्र इंसान पैर हावी हुआ तो बुराई की तरफ चला जायेगा, मैं तांत्रिक हु लेकिन तंत्र को अपने काबू में रखता हु, क्यात ु ऐसा कर पायेगा,
सात्विक- मैं आपको निराश नहीं करूँगा,
गुरु- ठीक ह तो कल से मैं तुझे सिखाऊंगा,
सात्विक खुश हो गया,
अगली सुबह भौमिक जी राजगुरु के पास चल दिए देव के बारे में बात करने के लिए, वही राजमहल में सभी भाई बहन चाट दिए घूमने फिरने, देव औरषदीयो के बारे में पढ़ने लगा, और मंत्रो को सिखने लगा, और सात्विक की तंत्र विद्या शुरू हो गई,
भौमिक जी- भैया मुझे आपसे जरुरी बात करनी ह,
राजगुरु- है भौमिक बताओ क्या हुआ, तुम कल भी आये थे,
भौमिक- मुझे देवदूत के बारे में बात करनी ह, मैंने इसकी कुंडली पढ़ी लेकिन उसमे कुछ भी नहीं लिखा ह,
राजगुरु- तुम्हे उसकी कुंडली पढ़ने की इच्छा क्यों हुई
भौमिक- मैंने उसके मस्तिष्क को पढ़ा लेकिन ज्यादा कुछ पढ़ नहीं पाया, ऐसा लगा जैसे उसकी जीवन रेखा बिलकुल खली ह,
राजगुरु- इसलिए उसकी कुंडली में कुछ नहीं लिखा ह, मैंने बहुत कोशिश कर ली उसके बारे में जानने की लेकिन कितनी भी कोशिश करू कुछ देख hi नहीं पता, सब खली खली नजर आता ह,
भौमिक- फिर आप उसे खुद से दूर क्यों रखते हैं, फिर महाराज उससे नाराज क्यों रहते हैं,
राजगुरु- जब जब मैंने उसकी कुंडली को देखा ह तब तब एक विध्वंश दिखाई दिया ह, मैं उस विध्वंश का कारन समझ नहीं पाया हु, और जब भी देवदूत की कुंडली भवर सिंह के जोड़ क्र देखता हु तो भवर सिंह का विनाश hi दीखता ह, कारन मेरी समझ से बहार ह, लेकिन इतना समझ आता ह ये लड़का भवर सिंह के लिए ठीक नहीं ह, और न hi इसकी माँ, मैंने भवर सिंह को बहुत रोका इस औरत से शादी न करे, लेकिन वो नहीं मन, उसकी सुंदरता में अपना संयम खो बैठा, लेकिन जब से ये लड़का निहारिका के गर्भ में आया तब से hi भवर सिंह का मोह भांग हो गया,
भौमिक के दिमाग में आया ी निहारिका की कुंडली भी देखनी होगी,
भौमिक- भैया मैं पुरे राजपरिवार की कुण्डलिया देखना चाहता हु,
राजगुरु- ठीक ह ले जाना, फ़िलहाल मुझे समझ नहीं आ रहा, महाराज ने ऐसा फैसला लिया ह जो मेरी समझ में नहीं आ रहा,
भौमिक- क्या हुआ ह
राजगुरु- महाराज ने चारो लड़कियों की शादी का विचार किया ह, और उनके लिए लड़के भी देख लिए हैं, स्वंवर की तैयारी शुरू की जाएगी आज से,
भौमिक- इसमें परेशानी क्या ह शादी तो होनी hi ह एक दिन
राजगुरु- तुम सबकी कुंडली पढ़ो और उसमे देखो क्या लिखा, फिर समझ जाओगे मैं क्यों परेशां हु,
भौमिक ने सबकी कुण्डलिया उठाई और अपने घर ले आया,
देव पहाड़ो से औषदीय लेकर आ रहा था तो उसे रस्ते में कस्तूरी और सुगंधा मिल गई,
कस्तूरी- कहा जार हे हो, यहाँ तुम्हे देखने की उम्मीद नहीं थी,
देव- मैं भौमिक जी के पास रुका हुआ कुछ समय के लिए, लेकिन तुम दोनों यहाँ क्या कर रही हो,
कस्तूरी- मैं और सुगंधा उनके पास औषधि लेने आये थे, पिता जी का स्वस्थ्य कुछ ठीक नहीं ह,
देव- बहुत दूर आये हो, ये तो तुम्हे गाओं में भी मिल जाती,
कस्तूरी- गाओं के वेद जी ने hi यहाँ भेजा ह,
देव- अच्छा अच्छा आओ चलो,
कस्तूरी- तुम कब तक रहोगे यहाँ,
देव- अभी तो एक hi दिन हुआ ह 15 दिन रुकना ह,
कस्तूरी- मैं सोच रही थी मैं भी यही रुक जाऊ,
देव- तुम क्या करोगी यहाँ रह क्र
कस्तूरी- तुम्हारे साथ रहूंगी न, तुम्हे भी कोई अपना मिल जायेगा, और मैं भी कुछ सिख जाउंगी
देव- गुरु जी ऐसे किसी को नहीं रखते, मुझे तो महाराज का आदेश मिला था,
कस्तूरी- मेरी मौसी उनके घर के पास hi रहती हैं, मैं उनके पास रुकूंगी,
देव- जैसा तुम्हे ठीक लगे,
वो उनके साथ चल दिया, सुगंधा हमेशा की तरह खामोश और देव को निहारती हुई उनके पीछे चल दी,
भौमिक जी के पास जाकर कस्तूरी ने कुछ बीमारी बताई जिसकी दवा उन्होंने दे दी, कस्तूरी ने सुगंधा को वो दवाई लेकर वापस भेज दिया, सुगंधा का मन नहीं था जाने का लेकिन जाना पड़ा, कस्तूरी अपनी मौसी के घर चली गई,
महल में सबके दिमाग में तूफ़ान मचा हुआ था, अमरावती सौमित्र और काम्य तीनो के दिमाग में भूचाल आया हुआ था, तीनो hi अपने अपने बेटे को युवराज बनाना चाहती थी, लेकिन भवर सिंह ने किसी को ये पता नहीं चलने दिया था की प्रतियोगिता कैसी होंगी,
काम्य ने अपने गुप्तचरों को लगा दिया ताकि महाराज क्या करने वाले हैं उसकी जानकरी मिल जाये, वही अमरावती ने सेना पति को बुलवाया हुआ था, क्योकि प्रतियोगिता की तैयारी तो सेनापति hi करने वाले थे,
अमरावती- सेनापति मुझे जानना ह की महाराज क्या करने वाले हैं,
सेनापति- महारानी ये मैं कैसे बता सकता हु, महाराज का आदेश ह किसी को कोई जानकरी न दी जाये,
अमरावती- ये तुम मुझसे बोल रहे हो,
सेनापति- माफ़ कीजिये महारानी, अगर मैंने महाराज की बात का उलंघन किया तो वो मुझे जान से मरवा देंगे,
अमरावती- ये बात हमारे बिच hi रहेगी,
सेनापति- इसमें मेरा क्या फायदा होगा,
अमरावती- वही जो हमेशा रहता ह,
सेनापति खुश हो गया, और प्रतियोगिता से जुडी साडी बाते अमरावती को बता दी,
वही सौमित्र अपने हुसैन का जादू भवर सिंह पैर चला रही थी, भवर सिंह बिस्टेर पैर लेते हुए थे और सौमित्र नंगी होकर अपनी भरी भरी चूचिया भवर सिंह की छाती पैर रगड़ रही थी,
भवर सिंह- क्या बात ह आज बहुत उतावली हो रही हो,
सौमित्र- क्या करू जब जब आपको नजदीक पति हु खुद को रोक नहीं पति, आपके अंदर ऐसी hi बात ह, हमेशा मुझे दीवाना बना क्र रखते हो,
भवर सिंह- दीवाना तो तुमने बनाया हुआ ह मुझे अपना, कमल का शरीर ह तुम्हारा, इस उम्र में भी इतना कैसा हुआ ह,
सौमित्र- ये सब आपकी वजह से hi ह, आपका प्यार की वजह से hi ये निखार आता ह मुझमे, और आपका ये शैतान हमेशा मुझे बैचैन किये रखता ह,
सौमित्र ने भवर सिंह के 8 इंच लुंड को पकड़ क्र बोलै,
भवर सिंह- न जाने तुम्हे अंदर ऐसी क्या खूबी ह, हम तुम्हारे पास चले आते हैं, वर्ण अमरावती के पास जाये भी महीनो हो जाते हैं,
सौमित्र- और उस कलमुही निहारिका के पास,
भवर सिंह- उसका नाम मत लिया करो हमारे सामने, न जाने हमे उससे शादी hi क्यों की,
सौमित्र ने तुरंत भवर सिंह के लुंड को अपने जीभ से चाट लिया,
भवर सिंह- ये कला हमने सिर्फ तुम्हारे पास hi देखि ह, आज तक ऐसा किसी औरत ने नहीं किया, सब इसे गन्दा मानती ह तुम बड़े प्यार से इसे चुस्ती हो,
सौमित्र- आप का हर अंग हमारे लिए खास ह, और ये hi तो हमे संतोष देता ह इसे तो प्यार करना हमारा कर्त्तव्य ह,
सौमित्र ने भवर सिंह का लुंड चूसना शुरू कर दिया, भवर सिंह मजे में आंखे बंद किये सौमित्र का सर सहलाने लगा, कुछ देर लुंड चूसने के बाद सौमित्र लुंड के उप्पेर बैठ गई और लुंड को छूट में भर क्र उस पैर कूदने लगी, भवर सिंह सौमित्र की गांड को पकड़ क्र उसे लुंड पैर उछलने लगा,
भवर सिंह- तुम्हारे नितम्ब कितने बड़े हैं,
सौमित्र- आपको पसंद ह इसीलिए तो बड़े किये ह मेरे महाराज, लीजिये न मजा अपनी रानी का, देखिये आपकी रानी कैसे आपके लिंग को अपनी योनि में लेकर उसे निचोड़ रही ह,
भवर सिंह ने सौमित्र को निचे लिटाया और उसके उप्पेर आ गया और जोर से धक्के लगाने लगा, सौमित्र ने भवर सिंह को काफी गरम कर दिया था, भवर सिंह भी काफी देर तक चुदाई क्र लेता था उसका कारन था सौमित्र का उसे उत्तेजक औषदीय खिलाना,
दोनों की चुदाई आधे घंटे से जायदा चली जिसमे दोनों एक साथ झड़ने लगे, भवर सिंह ने अपना पूरा रास सौमित्र की योनि में भर दिया,
जब दोनों शांत हुए,
सौमित्र- आपने मेरे अंदर hi अपना वीर्य छोड़ दिया, मैं इस उम्र में फिर से गर्भवती हो गाइट हो,
भवर सिंह- आज तुम्हे बहुत गरम कर दिया था, वैद से दवाई ले लेना,
सौमित्र – कोई बात नहीं मैं ले लुंगी, आप खुश ह न मुझे बस ये hi छाइये
भवर सिंह- असली ख़ुशी तुम hi देती हो मुझे,
सौमित्र- लेकिन आप क्या करते हैं,
भवर सिंह- क्या करता हु
सौमित्र- जब से मैं यहाँ आई हु आपको असली सुख मैंने दिया और आपने युवराज बनाना के लिए चारो लड़को में प्रतियोगिता रख दी, मेरा बीटा ज्वाला आपके लिए जान तक देने को तैयार रहता ह, आप उसके बारे में सोचते hi नहीं,
भवर सिंह- हहहहह तुम इस बात से नाराज हो, अरे हमारा ज्वाला बहुत होनहार ह, वो ये प्रतियोगिता आराम से पर क्र लेगा, और तुम ये तो सोचो राजा के बाद युवराज कोण बनता ह, राजा का बड़ा बीटा और बड़ा बीटा सूरज ह, मैंने तो ज्वाला को मौका दिया ह, ताकि वो अपनी योग्यता साबित करे और युवराज बन जाये, जिससे परिवार में युद्ध न हो,
अगर मैं ऐसा नहीं करता तो सूरज तो खुद hi युवराज बन जाता राजय के नियम के हिसाब से,
भवर सिंह की बात सुनकर सौमित्र खुश हो गई, उसे बहवर सिंह की बात समझ आ गई,
सौमित्र- लेकिन इस प्रतियोगिता में होने क्या वाला ह, आप मुझे तो बता hi सकते हो,
भवर सिंह सौमित्र के जाल में फास गया था और उसने प्रतियोगिता की साडी बाते सौमित्र को बता दी, इधर भवर सिंह सौमित्र को सब बता रहा था वही काम्य के जासूस अपने काम में लगे हुए थे, जहा प्रतियोगिता की तैयारी हो रही थी वह से साडी जानकरी काम्य तक पंहुचा रहे थे, तीनो माये अपने अपने बेटे को युवराज बनाना के लिए अपनी चल चल रही थी, उधर निहारिका बस अपने बेटे की याद में खोयी थी, जब से वो पैदा हुआ पहेली बार निहारिका से दूर गया ह, निहारिका उसके बिना ाहदुरि थी, जब देव उसके पास नहीं होता तो वो बैचैन हो जाती थी,
इधर देव को अपनी माँ से दूर रहना भी अच्छा नहीं लग रहा था, लेकिन सजा तो पूरी करनी hi थी, शाम को देव औषधियों के बारे में पढ़ रहा था तभी कस्तूरी वह आ गई,
कस्तूरी- क्या कर रहे हो,
देव- तुम यहाँ
कस्तूरी- क्यों मैं तुमसे मिलने नहीं आ सकती क्या, मेरा मन नहीं लग रहा था,
देव- यहाँ मन नहीं लगता तो यहाँ आई hi क्यों थी,
कस्तूरी- तुम सच में पागल हो, कुछ नहीं समझते,
देव- क्या नहीं समझता, समझाओ मुझे,
कस्तूरी- तुम जवान हो गए हो क्या तुम्हारे दिल में कुछ नहीं होता,
देव- मेरे दिल में क्या होगा, और क्यों होगा कुछ
कस्तूरी- मेरे दिल में होता ह,
देव- क्या होता ह
कस्तूरी- जब तुम मुझसे दूर होते हो तो दिल बहुत बैचैन होता ह, कुछ अच्छा नहीं लगता, बस तुम्हारे पास आने का मन करता ह, तुहे देख क्र hi दिल को सकूं आता ह, इस दुनिया में बस तुम hi मुझे अपने लगते हो तुम्हारे अलावा किसी और के बारे में सोचने का भी ान नहीं करता,
कस्तूरी की बात से देव थोड़ा कंफ्यूज सा खड़ा था, क्योकि उसके दिल में भी ऐसी hi हलचल थी लेकिन कस्तूरी के लिए नहीं अपनी माँ के लिए,
देव का मन बहुत साफ़ था, उसमे अब तक कोई हवस या सम्भोग के लिए कोई सोच नहीं थी, कस्तूरी उसकी बहुत अच्छी दोस्त थी लेकिन कस्तूरी के दिल में क्या ह वो कभी समझ नहीं पाया,
कस्तूरी और देव बात कर रहे थे तभी भौमिक जी वह आ गए, कस्तूरी भौमिक जी को प्रणाम करके वह से चली गई और देव के दिमाग में हलचल कर गई,
भौमिक जी- क्या हुआ देव, कहा खोये हुए हो,
देव- गुरु जी एक बात पुछु
भौमिक जी- है है पूछो
देव- ये जो कस्तूरी गई ह, ये मेरी दोस्त ह वो बोलती ह उसका दिल मेरे बिना नहीं लगता, मुझसे मिलने के लिए बैचैन रहती ह, ऐसा क्यों होता ह
भौमिक जी मुस्कुराये- क्योकि वो तुमसे प्रेम करती ह, जब लड़की ऐसा बोले तो समझ जाओ तो तुम्हसे बहुत प्रेम करती ह, और तुम्हारे बिना नहीं रह सकती,
इतना बोल क्र भौमिक जी अंदर चले गए, देव और कंफ्यूज हो गया, क्योकि उसके दिमाग में तो बस उसकी माँ hi रहती थी, उसने तो कभी कस्तूरी के बारे में ऐसा सोचा hi नहीं, और यहाँ उसकी माँ भी नहीं थी जो उसे इस बारे में कुछ समझा सके,
रात का खाना खा क्र देव सोने चला गया लेकिन भौमिक जी सबकी कुंडली लेकर बैठ गए, और बड़े धयान से सबकी कुंडली पढ़ने लगे, सभी की कुंडली में कुछ न कुछ खास था लेकिन निहारिका और देव की कुंडली एक जगह आकर बिलकुल खली थी, भौमिक जी ने सभी तरह से कुंडली को पढ़ लिया, भौमिक को राजगुरु से ज्यादा ज्ञान था कुंडली पढ़ने में, लेकिन वो भी निहारिका और देव की कुंडली को ठीक से नहीं समझ पाए, और जब चारो लड़कियों की कुंडली पढ़ी तो चौंक गए,
भौमिक जी खुद से hi- ये कैसे हो सकता ह, ये संभव नहीं ह, संसार में इस वक़्त कोई ऐसा नहीं ह जो इस काबिल हो,
भौमिक जी देव की कुंडली को लेकर चिंतित हो गए, देव की कुंडली में न hi मृत्यु का पता चल रहा थान hi hi उसके आगे के जीवन का, जब किसी भी तरह से देव की कुंडली नहीं समझ आई उसके जीवन के बारे में नहीं पढ़ पाए तब उन्होंने एक hi अनुमान लगाया की देव का जीवन लम्बा नहीं ह, और इस बच्चे ने जीवन में खुद की रक्षा करना तक नहीं सीखा, ये कैसे जियेगा, जिसका पिता hi उसके जीने मरने की परवाह न करता हो उसे कोण बचा पायेगा,
देव के लिए भौमिक जी के दिल में दर्द उभर आया, उन्होंने फैसला क्र लिया की वो खुद देव को सब कुछ सिखाएंगे, केवल औषदीयो के बारे में सिखने से इसकी जान नहीं बचेगी, इसे खुद की रक्षा करना तो सीखना hi होगा, पता नहीं मैं उसे सीखा पाउँगा या नहीं, मात्रा 15 दिन में मैं उसे क्या सीखा सकूंगा,