Incest Pyaar - 100 Baar - Page 58 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 220

मकसद (1)

"रात को ज्यादा कुछ नहीं आता टीवी पर लेकिन जल्दी सोने की आदत भी नहीं है तोह गाने हे देख लेती हु. वैसे बॉडी बहोत ाची बना राखी है तुमने? हाइट तोह दूर से हे नजर आ जाती है लेकिन शरीर कपड़ो के अंदर रहता है. तोह सिर्फ दूध हे पीते हो अभी तक?", इस बार तोह सोनाली का एकमात्र परिधान बिलकुल केहर ढाने वाला था. घुटनो से भी 4 इंच ऊँचा एक रेशमी गाउन जिसकी पत्तिया अगर समतल पेट पर कासी न होती तोह गोर दूधिया वक्षो की अभी दिखती लकीर के साथ उनका आधा स्वरुप हे सामने होता. कांच के बड़े गिलास में झाग बनाया हुआ दूध लिए वो जिस तरह से प्रकट हुई थी, एक पल को अर्जुन बस देखता हे रह गया. जाने पानी के साथ क्या सुगंध मिला कर नही थी सोनाली, जो पूरा लाउन्ज (हॉल) हे महक उठा.

"काफी बड़ा टीवी है और हमारे शहर से तोह ज्यादा हे चैनल आते होंगे यहाँ. दूध के लिए धन्यवाद सोनाली जी और इसके सिवाए मैं सिर्फ पानी हे पीना ठीक समझता हु. वैसे आपने भी खुद को ाचा मेन्टेन किया है. लगता नहीं की पालक दीदी की जेठानी है आप.", अर्जुन चौड़ी पट्टी की बनियान हे पहने था ऊपर जिस से उसके मजबूत डोले और छाती के कटाव स्पष्ट सामने थे. सोनाली अपने गाली के आगे से बाल पीछे झटक कर उसी नरम सोफे पर आ बैठी जिस पर अर्जुन था. वह एक बिना पीठ वाला लम्बा और नरम सोफे भी था और 2 वैसे हे सोफे जैसे पर ये बैठे हुए थे. एक ख़ास लोशन की शीशी टेबल पर सामने रखने के बाद हथेलिया आपस में हलके से रगड़ कर अपनी गोरी मांसल बाहों पर वो तरल मसलती हुई सोनाली टेलीविज़न देखने का दिखावा करते हुए बात करने लगी.

"मेन्टेन नहीं करूंगी तोह काम कैसे चलेगा? ये दिल्ली है अर्जुन, लोग यहाँ एक कम्पटीशन में हे रहते है. फिर वो चाहे कमाई का हो, घर का या दिखने का. सबकुछ बेहतर चाहिए दूसरे से नहीं तोह जो पास है उसकी कदर नहीं. मुझे तोह लगा था के तुम पार्टीज पसंद करते होंगे और तुम जैसे जवान रईस लड़के तोह दिल्ली के दिसो क्लब्स में दर्जनों लड़कियों की निगाहो में रहते है. गर्लफ्रेंड नहीं बनाई या तुम्हारी तरफ ये सब आज भी मन है?", अब अर्जुन क्या कहता की जो मन है वो भी वो कर चूका है और गर्लफ्रेंड नहीं बल्कि दर्जनों प्रेमिकाए है उसकी. लेकिन क्लब वाली बात सुन्न कर उसके दिमाग में अर्शी का हे अक्स उभर आया. ज़ली ban-thann कर रहने वाली एक आधुनिक थी तोह क्या पता वो इस क्लब के बारे में भी कुछ जानती हो.

"फिलहाल तोह करियर पर हे ध्यान है सोनाली जी लेकिन अब अपने घर से बहार हु और काम तोह परसो हे होना है इसलिए सोच रहा था की कल कोई क्लब हे देखा जाए. एक दोस्त है मेरा दिल्ली में और उसने बताया की यहाँ पर क्सक्सक्सक्स जगह कोई Fire-shot क्लब है जो अपने आप में हे अलग दुनिया है. आपने देखा है वो?", अर्जुन से ये नाम सुन्न कर सोनाली बड़े हे कामुक अंदाज में मुस्कुराते हुए अपने कंधे पर से गाउन ढलकती हुई वह भी लोशन मलने लगे. जाने उसके मैं में क्या चल रहा था पर जो भी था अर्जुन को फिलहाल तोह वो पसंद था. ऐसा करने के दौरान सोनाइल के पुष्ट सतांन का ऊपरी हिस्सा भी नुमाया दिखा जो क्सक्स उम्र की औलाद के बावजूद बेहद सुडोल प्रतीत हुआ.

"दिल्ली में ज्यादातर तोह सिर्फ डिस्को हे है जैसे घुंघरू, झणकार, रौनक और क्लब 90. जिन लोगो ने सिर्फ झुण्ड में नाचना हो, आपस में मस्ती करनी हो वो वही जाते है. वेस्टर्न कल्चर नया नया तोह आने लगा है बोम्बये के बाद यहाँ. लेकिन Fire-shot अलग हे दुनिया है जैसी 5 स्टार होटल्स के तहखानों में भी उतनी बढ़िया नहीं. वह महंगी शराब, तेज संगीत और दिल्ली की सबसे अमीर लड़किया हर शनिवार दिखाई पड़ेंगी. और इतना हे नहीं, बड़ी बड़ी मॉडल्स और कुछ फिल्म स्टार्स भी भी वह अक्सर देखे गए है. कैमरा वाले तोह भीतर कदम भी नहीं रख सकते जैसी सिक्योरिटी रहती है वह. एक बार हे गयी थी लेकिन 10 हजार वसूल भी हुए. अकेले जाने की सोच रहे हो तोह किस्मत के भरोसे रहना. कभी कभी अकेले लड़के बहार हे रह जाते है.. हाहाहा.. और वैसे भी तुम दूध पीने वाले और वो शराब से भरी मस्ती की अलग हे दुनिया.", सोनाली से जानकारी लेते हुए अर्जुन घूँट घूँट दूध पीने के साथ हे मुस्कुरा रहा था. कुछ ज्यादा हे गरम और तेज थी पालक की जेठानी. नौजवान लड़को का बुरा हाल करना जैसे उसकी लिए पुरानी बात थी.

"दूध पीना तोह बस आदत है और सेहत के लिए एक ाची आदत सोनाली जी. वैसे आपके हस्बैंड भी मतलब आपकी तरह हे जीवन खुल कर जीने में यकीन रखते है? जिस जगह आपके हिसाब से युवा लोग और आप जैसी खूबसूरत लड़कियां जाती है वह जाना सबके लिए तोह मुमकिन नहीं. कैसे सेहन किया होगा उन्होंने वह औरो का आपको देखना?"

"मस्का लगा रहे हो लड़की बोल कर? हाहाहा.. मैंने कब कहा के प्रजुल साथ गए थे? वो समय निकलने वाले होते तोह क्लब पब जाने की जरुरत हे कहा पड़ती? सहेली के साथ गयी थी वह और वो भी सिर्फ एक हे बार. तुम जाने के लिए पूछोगे तब भी मैं दोबारा उधर नहीं जाने वाली. सॉरी... कही और का पूछते तोह जरूर विचार कर लेती. वैसे अपनी बहिन से पूछ लो, उसने तोह दिल्ली आने के बाद भी आसपास की मार्किट के सिवा कुछ देखा हे कहा है. जयेश तोह कभी मन नहीं पाया, क्या पता तुम्हारे साथ जाने के लिए राजी हो जाए.", अर्जुन तोह वैसे भी कहा ले जाना चाहता था इस आफत को अपने साथ जब वो खुद वह एक मकसद से जाने वाला था. पर यहाँ खुद हे सोनाली ने उस चर्चा का मौका बना दिया था जिसकी तलाश में अर्जुन इतनी देर से बैठा था. गिलास को टेबल पर रखने के साथ हे अर्जुन ने अपना वो हाथ जो सोनाली की तरफ था, उसके मुलायम गुदाज पत् के ऊपर हे रख दिया. अब बारी सोनाली की थी हैरान होने की.

"वो बहिन है न सोनाली जी और जब पति के साथ न गयी तोह मेरे साथ तोह सवाल हे नहीं उठता. वैसे आपने तोह जैसे पूरी दिल्ली हे घूम राखी है और आप है भी तोह दिल्ली से हे.. क्सक्सक्सक्स में हे तोह आपका घर है, मतलब आपके मम्मी पापा और दूर के मां वही रहते है. गलत कह रहा हु क्या?", अर्जुन का हाथ सरक कर उसकी मखमली जांघो को सहलाने लगा था, वो भी रेशमी वस्त्र के भीतर एक जालीदार पंतय की डोरी तक. जिस तरह से वो एकटक सोनाली की आँखों में देख रहा था, उसके चेहरे के बदलते रंग और शरीर में हलकी हलकी कम्पन्न साफ़ बता रही थी की न वो अर्जुन को रोकने की हालत में थी और न कुछ कहने की. अर्जुन को तोह जवाब चाहिए हे था और उसने हाथ थोड़ा आगे बढ़ाते हुए पंतय से ऊपर उस ढलान पर सरकाया जहा ऊपर नाभि और निचे झीने से वस्त्र में सोनाली की योनि.

"क्या हुआ सोनाली जी? आपकी तोह हंसी और चमक हे गायब हो गयी? कुछ गलत तोह नहीं कह दिया मैंने? इतनी तारीफ के बदले आप 2 शब्द भी नहीं कहेंगी? दूर के मां जी से तोह बहोत कुछ कहती करवाती है आप और मैं इतने करीब हु तब भी ये बेरुखी.", अर्जुन नाभि के किनारे ऊँगली फिराते हुए थोड़ा और करीब खिसक आया. अब वो सोनाली की उखड़ी सांसें भी महसूस कर रहा था कांपते बदन के साथ.

"तुम्हे.. तुम्हे ये.. सब अफवाह है और झूठ. तुम आरोप लगा रहे हो."

"शहहह.. थोड़ा आहिस्ता बोलिये सोनाली जी.. दीवारों के भी कान होते है और कोई यहाँ आ पंहुचा तोह बदनामी आपकी हे होगी. क्या पता इतना ाचा ससुराल भी हाथ से जाता रहे. मेरे सिर्फ 3 सवाल है और उनमे से एक का भी गलत जवाब तोह समझो इस घर में तुम्हारी ये आखिरी रात होगी. हाँ अपने मायके जाने से पहली दूसरी ससुराल में 3-4 साल बिताने पड़ेंगे वो अलग. आराम से बैठो, डरना बाद में.", अर्जुन ने अपना हाथ सोनाली के जिस्म से हटा लिया और कांच के जग से वही उल्टा कर रखे गिलास में पानी भर कर उसके सामने किया.

"पी लो सोनाली जी, गाला बार बार सूखने से ाचा है की पहले हे गीला कर लिया जाए. हाँ.. तोह पहला सवाल है की जब वो दूर का मां आपको स्कूल पूरा करने से पहले हे जवान कर चूका था तोह शादी उस से क्यों नहीं की?", इस बात से साफ़ था की अर्जुन उस व्यक्ति को दबोच चूका है और वो अपना मुँह जल्दी हे खोल गया होगा. सोनाली ने हाथ जोड़ने की नौटंकी करनी चाहि तोह अर्जुन ने अपनी बगल में रखा हुआ स्क्रीन वाला कैमरा चालू करके सोनाली की हे तस्वीर उसके सामने कर दी. वो एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ चिपक कर बैठी थी और उस आदमी का एक हाथ सोनाली की कमर पर और दूसरा उसके चुके को दबाने में लगा था. अब सोनाली ने नजरे झुकाते हुए जवाब देना हे बेहतर समझा.

"उम्र का फरक और ऊपर से वो खुद हे शादी नहीं करना चाहते थे. घरवाले तोह कभी राजी होते नहीं और उनके नाम न दूकान थी और न मकान. भाग कर जाते भी तोह ज़िन्दगी खराब हे होती घरवालों की बदनामी के साथ. बस उसके बाद कॉलेज ख़तम होते हे मेरी शादी प्रजुल से करवा दी गयी जो न बिस्टेर में मुझे खुश कर सकता है और न बिस्टेर से बहार. पैसे से हे ज़िन्दगी में सुकून नहीं मिलता, कोई होना चाहिए जो तुम्हे समझे और प्यार करे. इसलिए मैं रोहन के पैदा होने के बाद उनसे दोबारा मिलने लगी.", अर्जुन ये सुन्न कर फीकी हंसी देते हुए बोलै.

"प्यार और समझने वाला? पैसा सबकुछ नहीं तोह फिर क्यों हर बार उसको थैले में पैसे पकड़ती आ रही हो? आज भी तोह 2 लाख दिए थे. वैसे ये मेरा दूसरा सवाल नहीं है सोनाली जी. आपके अधूरे जवाब के ऊपर सवाल है. और रही बात आपके पति के प्यार की तोह आपका हे दिल नहीं भरता एक पुरुष से. प्रजुल से घरवालों ने शादी नहीं करवाई थी आपकी, बल्कि आपने हे फांसा था उस शरीफ आदमी को अपने प्यार के जाल में इसी मां के कहने पर जो काम के नाम पर लड़कियों की दलाली करता है और जुआ खेलने के लिए वो कमाई काम पड़ती है इसलिए आपसे हर हफ्ते 10 दिन बाद पैसे ऐंठता रहता है. छोडो ये सब be-fijool की बातें सोनाली जी. एक झूठ को मजबूत दिखाने के लिए 50 और बोलने पड़ेंगे लेकिन फायदा तब भी नहीं होने वाला. मुझे आपकी निजी ज़िन्दगी से कोई मतलब नहीं लेकिन यहाँ, इस घर में मेरी बहिन भी है और बात है उसकी ज़िन्दगी की. और इस मामले में मैं जरा सी भी कोताई नहीं बरतने वाला. पहले हे बता देता हु की पुलिस, प्रशाशन, मंत्री और जुर्म करने वाले, सब मेरे पास है. हेकड़ी तोह आपके उस दूर के मां की भी मैंने सिर्फ 2 हे मिनट में निकाल के रख दी थी. आप 30 सेकंड नहीं झेल सकोगी इसलिए अब सीढ़ी तरह बताओ की पालक हे क्यों? इसका जवाब मैं आपके उस मां से मांग सकता था लेकिन वो बेचारा तोह आधी कहानी में हे बेहोश हो गया. अब क्सक्सक्सक्स थाने में है जहा से सुबह कोर्ट में पेश किया जाएगा और बाकी ज़िन्दगी उसकी जेल में हे कटेगी. पालक दीदी हे क्यों?", अर्जुन की सार्ड आवाज के साथ हे अपने आशिक़ का हाल सुन्न कर सोनाली की कनपटी पर पसीना उभर आया, बेशक इस dhawani-badhit कक्ष में ठंडक थी और जिस्म पर वस्त्र भी naam-matra.

"उन्होंने पालक को शादी में हे देख लिया था.. उसके बाद किसी वजह से वो दोबारा इस घर नहीं आ सके पर जब भी मुझसे मिलते तोह दबाव डालते की मैं कैसे भी करके पालक को उनके निचे ले औ. मैं रिस्क नहीं लेना चाहती थी लेकिन उनके पास मेरे भी कुछ वीडियो थे जिसमे मैं उनके हे दोस्त.. तोह मज़बूरी में मैंने.."

"न न सोनाली जी.. ऐसे नहीं.. पूरी बात बताओ की उस दुष्ट का आना इस घर में क्यों बंद हुआ, पालक दीदी को सिर्फ आप तोह अकेली मजबूर नहीं कर सकती थी और सिर्फ उन्हें पाने की हसरत तोह मकसद हो नहीं सकता. हर बात बताओ मुझे और सच बोलने पर मैं तुम्हारे जीवन को नुक्सान नहीं पहुंचने वाला, जुबान देता हु.", अब सोनाली ने खुदसे हे आधा गिलास पानी एक सांस में गले से निचे उतार कर चेहरा गाउन के पल्ले से हे साफ़ किया. ऐसा करने पर उसका एक उभार पूरा हे बेपर्दा हुआ लेकिन इस वक़्त उस जिस्म की चाहत या परवाह दोनों में से किसी को नहीं थी.

"बरात से आते हे मां ने नशे में मेरी ननद की कमर पर हाथ रख दिया था. लोग ज्यादा नहीं था और Palak-Jayesh घर प्रवेश कर चुके थे उस समय. मेरी ननद से वो सेहन नहीं हुआ और उसने मां के थप्पड़ मार दिया, गेट के बहार हे. बात बढ़ने से पहले हे वो चले गए और मैंने भी अपनी ननद के पाँव पकड़ कर उनके किये की माफ़ी मांगते हुए शिकायत न करने के लिए मनवा लिया. फिर भी प्रजुल को इतना जरूर पता चल गया की मां ने नशे में गलती से उनकी बहिन को छू लिया था. उन्होंने अकेले में मुझ पर पहली बार हाथ उठाया था और साफ़ कह दिया था की वो आदमी घर के आसपास भी दिखा तोह जान से मार देंगे. मां को पालक भ चुकी थी और मुझे इस बात से जलन हुई क्योंकि उन्होंने मुझे मेरा आइना दिखा दिया की मैं अब पहले जैसी नहीं रही. पर उन्होंने फिर ये प्लान बनाया की पहले मैं कैसे भी करके पालक को धीरे धीरे करके कमजोर करू और फिर वो उसके साथ हमबिस्तर होने का वीडियो बना लेंगे. मल्होत्रा परिवार कितना अमीर है ये तोह शादी में हे पता चल चूका था इसलिए उस वीडियो के जरिये हम पालक से सौदा करेंगे की वो 2 करोड़ के बदले अपनी आजादी वापिस ले ले. सबसे पहले मैंने पालक से नजदीकियां बढ़ानी शुरू की, हर बात और काम में साथ देना, ज्यादा काम खुद करना, शॉपिंग पर साथ लेके जाना. फिर एक दिन घर में सिर्फ प्रजुल हे थे हम दोनों के सिवा. उस दिन पालक ने मुझसे पानी की बाल्टी मांगी क्योंकि जब वो रसोई में थी तभी मैंने शावर की पिन ऑफ कर दी थी और उसके बाथरूम में टूटी कोई है नहीं जैसे जयेश ने उसको ख़ास तैयार करवाया है. वाशबेसिन और टॉयलेट अलग है. मैंने प्रजुल को बाल्टी के साथ भेज दिया और ये भी बताया की शावर में ऊपर पिन देख लेना लगे हाथ. इधर वो गए और उधर मैं कैमरा ले कर बहार वाले वेंट की तरफ चली गयी. उम्मीद से ज्यादा हे बढ़िया तस्वीरें मिल गयी जिनका प्रिंट निकाल कर मैंने हे वो पालक तक पहुचायी बिना सामने आये.", अर्जुन का सर दुखने लगा था ऐसा षड़यंत्र सुन्न कर. एक औरत कामवासना और अपनी ऐयाशी में इतनी अंधी भी हो सकती है की वो पूरा परिवार हे डाव पर लगा दे? एक मासूम का जीवन हे ख़तम कर दे? मुट्ठी भींचने के बाद उन्हें खोलते हुए उसने खुद को जैसे तैसे शांत किया.

"वो हनीमून वाली तस्वीरें कैसे हाथ लगी? तब तोह ये सब प्लान बना भी नहीं था फिर कैसे वो तस्वीरें मिली? जयेश जी से पूछना पड़ेगा या आप हे ये बताने का कष्ट करेंगी? उनसे पूछने के लिए पहले आपका रूप सामने लाना पड़ेगा और अभी भी ये दूसरा हे सवाल चल रहा है क्योंकि जवाब पूरा नहीं हुआ."

"नहीं.. जयेश को इस बारे में कुछ नहीं पता. वो तोह मुझे अपनी माँ के बराबर सम्मान देता है. मुझे जब भी 50 हजार या लाख रुपये की जरुरत हो तोह वो जरा भी देर नहीं लगता. वो अपने पापा से भी बड़ा बन्न न चाहता है इसलिए रात दिन बिज़नेस को बढ़ने में लगा रहता है. बस वो शादी नहीं करना चाहता था अपनी एकलौती कमी के चलते जो उसने सबसे पहले मुझसे हे सांही की थी जब हम रिश्ते से गहरे दोस्त बन गए. जयेश को अजीब सी आदत है.. वो .. नंगी तासीर देख कर खुद को संतुष्ट करता है. औरत के पहलु में उसका अंग काम नहीं करता. पालक के साथ उसने हनीमून पर पहले चुपके से उसकी नंगी तस्वीरें ली थी और फिर उन्हें देखने के साथ शराब का सहारा ले कर पहली और आखिरी बार सेक्स किया, तब भी आधा अधूरा. तुम पूछो उस से पहले हे बता देती हु की जयेश मेरी मर्जी से मेरी नंगी तस्वीरें कंप्यूटर में दाल कर ऐसा करता आ रहा है पिछले 2-3 साल से. उस से पहले वो किताब देख कर ऐसा करता था. पालक को नहीं पता था की जयेश ने उसकी ऐसी तस्वीरें ली है और जयेश भी अपना राज जाहिर नहीं करना चाहता अपनी बीवी के सामने. उसको यकीन है की पालक एक हे बार करने से माँ बन जायेगी और वैसे भी वो ऐसे मामलो में दिलचस्पी नहीं रखती. ज्यादातर तोह ये लोग साथ हे नहीं सोते और मैंने इस बात का फायदा उठा कर जयेश के कंप्यूटर से हे वो तस्वीरें ले ली जो हनीमून के समय उसने खींची थी.", रट्टू तोते की तरह सोनाली अब हर छोटी से छोटी बात बता रही थी और अर्जुन हैरान था मैं में की पालक का जीवन तोह हर तरफ से अँधेरे में है.

"और उसके बाद पंहुचा दिया उस आदमी के करीब जो इस सब कुकर्म में आपका बड़ा सांझेदार है लेकिन पूरी तरह से खुद खेल की पृष्ठभूमि में.? ये नहीं सोचा की पालक दीदी अगर वो तस्वीर घर में किसी को दिखा देती या कोई देख लेता तोह आपका वो दूर का मां जो आपके दिल में गहरा धंसा है वो पकड़ा जाता? और वो तस्वीरें भी आपने हे खींची थी जैसे उस घटिया इंसान की चाहत होगी दीदी को करीब से देखने की.", अर्जुन ने अब बगल में राखी वो तस्वीर सामने राखी जिसमे बेंच पर पालक की बगल में वही आदमी बैठा था जो सोनाली का मुँह बोलै मां होने के साथ आशिक़ और इस खेल का सूत्रधार था. सोनाली ने न में गर्दन हिलाते हुए बुझे चेहरे से हे जवाब दिया.

"उनके साथ दूसरी लड़की भी थी उस समय और यहाँ वो पालक से चिपक कर तोह नहीं बैठे? ये पार्क जहा है वही मां का घर है तोह सवाल पालक से पुछा जाता की वो वह क्या करने गयी थी. जैसा मैंने बताया की पालक इन मामलो में बहोत कमजोर और डरपोक है, वो इन तस्वीरों को किसी के हाथ नहीं लगने देती. ऐसा होने की सूरत में वो खुद का हे नुक्सान करवाती. अब तुम्हे सबकुछ पता चल चूका है तोह बताओ तुम मेरे साथ क्या करने वाले हो? मैं मेरे बेटे से बहोत प्यार करती हु अर्जुन और ये सब घरवालों के सामने आने की सूरत में मेरा तोह सबकुछ उजड़ेगा पर ये लोग मुझसे मेरा बीटा भी छीन लेंगे. Maa-baap से मेरा रिश्ता उतना मजबूत भी नहीं है अब. तुम चाहो तोह मेरे साथ कुछ भी कर लो, चाहो तोह किसी के भी निचे लिटा दो.. पर मेरा ..", अब ये पहली बार था की सोनाली फर्श पर लुढ़कती हुई अर्जुन के कदमो में गिर चुकी थी. उसकी आंखूं से गिरते गरम आंसू ज्यादा सच्चे थे या उसकी ये साड़ी हरकते ज्यादा बुरी? अर्जुन पीछे हे हट गया.

"न आपसे मेरी इस मामले में कोई बात हुई और न अब आप आइंदा कोई ऐसा घिनोना काम करेंगी. जिस बेटे की दुहाई आप अब दे रही है, उसका वजूद तोह पहले भी था. तब आपने नहीं सोचा की हवस और लालच की आग में आप कितने लोगो को जलाने जा रही है? ये जिस्म देना चाहती है आप मुझे जिसके भीतर की आत्मा तक काली पड़ चुकी है? सोनाली जी, इंसान को इतना भी नहीं गिरना चाहिए की जब अपने हे अक्स से सामना हो तोह नजरे न मिला सको. और मैंने आपके उस मां के साथ क्या किया है ये बस ख़ामोशी से सुन्न लीजियेगा.", अर्जुन ने वो मोबाइल फ़ोन उठा कर पहले से मिलाये हुए नंबर को दबाया और फ़ोन स्पीकर पर कर दिया.

"हाँ बीटा.. सोये नहीं अभी तक?", सामने से ये बड़ी भारी आवाज सुनाई पड़ी और अर्जुन ने भी खुद को सहज करते हुए जवाब दिया.

"न मां जी अभी सोने हे जा रहा था की ध्यान आया आपसे पूछ लू वो कबूतर कैसा है? ज़िंदा रहने लायक तोह नहीं है मां लेकिन आप अपने हाहतो पर और खून मत लगाना."

"अरे बीटा, तुम जान हो संजय चौधरी की.. दिल्ली शहर तोह क्या यहाँ की तिहाड़ जेल में भी कोई माई का लाल मेरे भांजे की आँख में खटका तोह उसका जीवन अटका देंगे. पहले तोह साला होश में हे न आ रहा था. फिर कलाई हे काट दी कमीने की तोह झट्ट उठ कर हल्ला मचने लगा. वो गोदाम के ऊपर एक कमरे से नंगी तस्वीरें, 6 वीडियो कसेट्टी और साढ़े 3 लाख बरामद करवाने के बाद इसकी लुल्ली और जुबान काट दी है हमने जिसकी पट्टी तोह करवा दी लेकिन साला गहरी बेहोशी में चला गया. पहचान के दसप है एक अपने जिन्होंने इसको hatya-dakaiti के जुर्म में 3 और हत्यारो के साथ लपेट लिया है उतना पैसा देने पर. बाकी जेल में अपने लड़को को ये बढ़िया जुगाड़ मिल गया है, उनकी आने वाली सर्दियाँ बढ़िया काटेंगी. वैसे उस छम्कछल्लो का क्या सोचा है अर्जुन बीटा जो इस लांदु से मिलने बगीचे में आयी थी? पेल तोह नहीं दिए?", ये व्यक्ति था सुशीला का धरम भाई और अर्जुन का वो हुकुम का इक्का जिसकी काट तोह स्वयं रामेश्वर जी के पास नहीं थी. संजय का दिल इतना गहरा जुड़ चूका था अर्जुन से की उसके लिए बस अर्जुन हे सर्वोपरि था अब. सुशीला का घर वापिस बसने के साथ बबिता को प्यार देने वाले इस अपने मुँहबोले भांजे के लिए संजय कुछ भी कर सकता था और उसकी जड़े कितनी गहरी थी इसकी प्रशंशा स्वयं रामेश्वर जी करते थे. इंसान बुरा नहीं था लेकिन बुरे के साथ बहोत ज्यादा बुरा था. अब उसकी बात सुन्न कर अर्जुन झेंपते हुए हंसने लगा और वही सोनाली की पंतय पसीने में आगे पीछे से गीली हो गयी इतना विवरण सुन्न कर.

"नाड़े का इतना कच्चा भी नहीं हु मां और अर्जुन प्यार करना जानता है, बदला तोह जिस दिन लेने पर आया फिर पोस्टमॉर्टम की जगह डीएनए ढूंढ़ना पड़ेगा मरने वाले का. वैसे तोह मैंने फिलहाल समझा दिया है उस छमकछल्लो को लेकिन कुछ दिन नजर बनाये रखना चोपड़ा निवास पर. सबूत आपके भी पास है और मेरे भी. मेरी बहिन के चेहरे से मुस्कान हटी तोह दुर्घटना घाटी. रखता हु मां जी, कल क्सक्सक्सक्स मिलते है शाम को 8 बजे.", अर्जुन ने भी मां की देखादेखी सोनाली को छम्मकछल्लो बुलाया तोह वो शर्मिंदा सी नजरे नीची किये खामोश हे रही.

"चल बीटा, भगवन भला करे सबका. किसी को ऐसे दिन क्यों दिखाए की परिवार बिखरे. इंसान का जीवन वैसे हे सरल नहीं और उल्टा ये लालच, लोभ और वासना क्या क्या करवा देती. कल बखत से मिलते है और तेरा बताया सारा सामान लेता आऊंगा. जय बजरंगबली."

"ाचा मां. शुभरात्रि. आप भी आराम करना और मैं भी सोने चला.", अर्जुन ने फ़ोन काटने के बाद सोनाली के सामने हे कैमरा की साड़ी तस्वीरें मिटा दी और वो तस्वीर भी फाड़ कर उसकी हथेली पर रखते हुए कहा.

"गलत काम के बदले गलत करना भी सही नहीं. आप तोह एक औरत, एक पत्नी और एक माँ है सोनाली जी. जिस्म की आग तोह आपसे कही ज्यादा मेरे अंदर है लेकिन उसको बुझाने के लिए मैं लोगो की ज़िन्दगी से खेलना शुरू कर दू? आप जितनी खूबसूरत है, दिल को उसका आधा हे बाण ले तोह ये घर स्वर्ग से काम न होगा. पति समय नहीं देता क्योंकि वो आपको और परिवार को खुशियां देने के लिए jee-todd म्हणत करता है. कभी अपनी अकड़ को काम करने के साथ उनसे पैसो की जगह समय मांगेंगी तोह यक़ीनन वो वैसा करेंगे. बेटे को अपने मजे के लिए बुआ के घर भेजने की जगह खुद भी 2-3 दिन अपनी ननद के पास घूम आओ तोह आपकी सास को भी ाचा लगेगा और ननद भी खुश होगी. ये छोटी छोटी सी बातें हे रिश्ते और परिवार मजबूत करती है. एक आपका वो दूर का मां है जिसने आपको हे नहीं बक्शा और एक ये मेरे मां है जो मेरे बस एक बार कहने मात्रा से उस आदमी को मौत के मुँह तक ले गए. वो आपको भी वही मार देते लेकिन बजरंगबली के भगत है इसलिए छोड़ दिया. आज रात नींद आने में तकलीफ हो तोह दवा ले लीजियेगा लेकिन सोना जरूर जिस से सुबह एक नया सूरज देख सको. जयेश जी को जो ठीक लगता है करने दीजिये और वो आपका निजी मामला है आपसी सहमति से, पर किसी मासूम के जीवन से खिलवाड़ आइंदा मत कीजियेगा. पालक तोह बचपन से हे इतनी मासूम है की वो किसी को भी दुःख दर्द में देख कर खुद दुखी हो जाती है. उसके विश्वास को बरकरार रखना क्योंकि वो आपको दीदी कहती है, शुभरात्रि.", अर्जुन खली कैमरा और फ़ोन उठा कर उस दरवाजे की चिटकनी इस तरफ से खोल कर वापिस बंद करता हुआ पालक के कमरे में दाखिल हुआ, जो लाइट जलाये बिस्टेर पर करवट के बल लेती कुछ लिखने में मगन थी.

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उस एक कमरे और हॉल वाले घर में बहार जितनी ख़ामोशी थी, भीतर उतनी हे गर्मजोशी से बातचीत का दौर चल रहा था. मुस्कान ने उसी कमरे में डबल बीएड के बराबर हे हॉल वाला दीवान खिसका कर जमा लिया था जिस पर वो अपनी माँ और बड़ी बहिन की तरफ करवट लिए लेती ुकि बातिने सुन्न रही थी. कपडे बदलने के बाद अपनी दोनों बेटियों को दूध गरम करके पिलाने के बाद बिंदिया अभी कुछ समय पहले हे नाहा कर सिर्फ एक सफ़ेद गाउन पहने बीएड की पुष्ट से तक लगाए शबनम की बातों पर कभी हंसती तोह कभी उसको मीठी झिड़क लगाने लगती.

"अब आपने खुद हे देखा फिर कैसे इंकार कर सकती है की मुस्की (मुस्कान) अर्जुन को पसंद नहीं करती? हाँ ये मान लेती हु की इनकी गहरी दोस्ती है पर ये तोह ऐसे मन कर रही थी जैसे अर्जुन से इसका कोई वास्ता हे नहीं. वैसे उसकी बगल में मैडम ने मुझे बैठने तक न दिया और वो भी बस आप दोनों को हे देखे जा रहा था. हहहहह.", मुस्कान ने अपने मुँह का आधा भाग चादर से हे धाप लिया ये सुन्न कर जबकि बिंदिया ने भी बेटियों के बीच बरसो बाद मीठी बातचीत में शामिल रहने का मजा जाने न दिया.

"गहरी दोस्ती है तोह इसके हे साथ बैठेगा. मुझसे तोह वो सही से पहली बार तोह मिला था और तुम्हे भी कितना जानता है? वैसे जितना तस्वीर में देखा उस लिहाज तोह कही ज्यादा हैंडसम है वो. जमीर इजाजत भी नहीं देता और वो रिश्ता मुमकिन भी नहीं जो एक नजर में हे मैं मुस्कान के लिए सोच चुकी थी. ाचे लगते है न दोनों एकसाथ? तुम्हारे पापा गर इन्हे साथ देख ले तोह यक़ीनन वो अर्जुन को मांग लेते. मुझे सबसे ज्यादा तोह इस बात की ख़ुशी है की लड़का हर छोटी से छोटी बात का ख़याल रखता है. सो गयी क्या मुस्कान?", बिंदिया ने अपनी बेटी को आवाज दी तोह मुस्कान ने चादर हटा कर ना में सर हिलाया और चेहरे पर वही खूबसूरत हंसी देख शबनम ने भी उसका गाल खींचते हुए बोलै.

"आज इसको नींद नहीं आनेवाली माँ क्योंकि अर्जुन आपके और मेरे लिए हे गिफ्ट लाया और जिसने उसको बुआलया, उसके लिए कुछ नहीं लाया. वैसे आपने उसका गिफ्ट खोल कर देखा भी या बैग में बंद करके रख दिया आपने? मेरे लिए तोह वो wrist-watch लाया है जो सचमुच ख़ास है. सही कहा आपने की वो ख़याल तोह हर छोटी से छोटी बात का रखता है बस मेरी लाड़ली गुड़िया के लिए कुछ नहीं लाया.", शबनम चिढ़ा रही थी पर मुस्कान वैसे हे तकिये पर सर टिकाये उन दोनों को देखती रही.

"मेरे लिए वो बंधेज वाली साड़ी ले कर आया, साथ में बाकी सबकुछ भी तैयार किया हुआ हे है. डोरी वाला ब्लाउज, साया और पायल के साथ एक दर्जन कांच की चूडिया, काजल तक था उस पैकेट में. ऐसा अक्सर बहु को सास देती है इस देश में लेकिन मुझे पसंद आया उसका गिफ्ट. वैसे दुःख तोह हुआ की मेरी छोटी गुड़िया के लिए वो कुछ नहीं लाया लेकिन उसके कहने पर आया, साथ डिनर किया और और कमरे के बहार तक छोड़ के भी गया. चलो कल मैं खुद अपनी गुड़िया को शॉपिंग करवा दूंगी.", बिंदिया को इतने बरस लगे थे अपनी बेटियों के बीच एक माँ और सहेली बन ने में और अपनी माँ के ऐसे बदलाव देख मुस्कान की आँखें हलकी सी नम्म हो उठी जिन्हे देख बिंदिया तुरंत उसके करीब आती गाल सहलाने लगी.

"तुम्हे अचानक क्या हुआ गुड़िया? किसी बात से दुखी हो या तुम्हे ..", अपनी माँ के सीने लगते हुए मुस्कान ने उनकी बात को बीच में हे काट दिया.

"एक कमरे में हम तीनो है अम्मी.. आप पहली बार हमारे साथ है इतने करीब और इस से ज्यादा ख़ुशी का दिन मेरे लिए कोई नहीं. यही वादा किया था मुझसे अर्जुन ने जब पहली बार मैं उसके साथ थी.. वो मेरे साथ खुले आसमा के निचे उतनी सुबह बैठा यही कह रहा था की एक दिन जरूर ऐसा होगा की दीदी मेरा हाथ पकडे होंगी और मेरी अम्मी मेरा सर अपनी गॉड में लिए प्यार लुटायेंगी, वो प्यार जो 20 साल में मुझे उतना नहीं मिला जितना हक़ था मेरा. आप और दीदी कह रही थी की वो मेरे लिए कोई गिफ्ट नहीं लाया.. देखो आप हे जरा इस पल को.. खुदा से मांगी कोई दुआ क़बूल न हुई.. हरीफ़ जिन्हे समझा, वो खुदा से बढ़ कर निकले.", मुस्कान ने अंत में जो पंक्तिया कहने के बाद अपनी माँ के गाल को चूमा तोह बिंदिया की भी आँखों में आंसू उभर आये.. दोनों में इन आंसुओ के साथ कुछ और भी सामान बात थी तोह वो उनकी मुस्कराहट, एक अनमोल मुस्कराहट जो आत्मा से निकली थी. शबनम भी मुस्कान का हाथ अपने दोनों हाथ में लिए उस को गर्व से देखने लगी.

"एहसानमंद हो गए फिर तोह हम आपके hareef-e-khaas के. माफ़ करना मुस्कान, ज़िन्दगी में जो उतार चढ़ाव देखने मिले, अपना आशियाँ उजड़ता अपनी नजरो से देखा और उस से पहले माँ की दुर्दशा ने मुझमे से साड़ी इंसानियत और प्यार महसूस करने वाला दिल छीन हे लिया. सच कहा की जिसको दुश्मन समझ कर हमेशा बदले की भावना राखी, उसने मेरा दामन फिर से paak-saaf करके खुशियों से वापिस भर दिया. तुमसे जटिल बातें करता है वो लेकिन जब समझ आती है तब ढेरो खुशियां देहलीज पर कड़ी मिलती है. इस से बड़ा उपहार तोह हो हे क्या सकता है मेरे लिए की मैं अपनी कोख से हे पैदा हुई बेटी से अब जा कर ru-ba-ru हुई लेकिन तुमने भी बदले में सिर्फ प्यार और सम्मान हे दिया."

"उसने हे सिखाया है अम्मी की दुश्मनी से तोह चाहे दुनिया हे ख़तम कर लो, उसमे सिर्फ अकेलापन और दर्द हे मिलेगा. प्यार.. प्यार बर्बाद दुनिया को भी फिर से बसा सकता है. वैसे हम जरा शब्बो दीदी को ये तोहफा दिखा दे जो उनके साथ साथ आपको भी नजर न हुआ. प्लैटिनम और गोल्ड के बीच रूबी है. जब उसको वापिस निचे ड्राप करने गयी थी तब उसने हे मुझे पहनाया और साथ हे कहा की एक प्रिंसेस का गाला सूना नहीं होना चाहिए. एंड फॉर योर काइंड इनफार्मेशन एलडी, तहत फ्लोरल ड्रेस वास् हिज फर्स्ट प्रेजेंट. गिफ्ट देने में कभी कंजूसी नहीं करता वो, ात लीस्ट मेरे लिए तोह नहीं. अब देख लो अम्मी दीदी को गुस्सा आ रहा है?", मुस्कान अपनी माँ के गले लगे हुए हे शबनम को चिढ़ाने लगी जो अगले हे पल ठहाका मारती हंस दी.

"कहा था न माँ की ये खुदसे हे कबूल कर लेगी की ये अर्जुन से प्यार करती है और वो इसकी हर बात मानता है? मुझे तोह तबसे पता है जब तू उसके लिए मेरे हे खिलाफ हो गयी थी. हाँ तुमने ठीक किया था जो मेरा साथ नहीं दिया. वैसे अब तुमने अम्मी की मुसीबत बढ़ा दी है ये बात कबूल करके.", सचमुच बिंदिया बड़ी गंभीरता से उस लाल हीरे से चमकते नाग को हाथ में ले कर बड़े गौर से देख रही थी जो के खूबसूरत दो रंगी चैन के बीच लॉकेट में ज्यादा मुस्कान के गले में था.

"नहीं.. ऐसे इंसान से प्यार के सिवा कुछ और मुमकिन भी नहीं शबनम. मैं न तोह परेशान हु और न मुझे चिंता है जब मेरी बेटी इतनी समझदार है. ये नाग उसने तुम्हे हे क्यों दिया ये तुम नहीं जानती मुस्कान लेकिन मैं इसको पहचानती हु. ये एक खंजर में था जो शायद महल के किसी ख़ास सदस्य का था लेकिन माँ की संदूक में. वो खंजर माँ के पास था क्योंकि माँ राजकुमारी थी और ये बात सबसे पहले अर्जुन ने हे पता लगाईं. माँ के बाद इस पर मेरा हक़ बनता था और मेरे बाद शबनम का लेकिन उसने ये तुम्हे दिया क्योंकि .. तुम मेरी माँ के हे जैसी हो, saaf-dil और इंसानियत से भरी एक अंतर्मुखी इंसान. मुझे ख़ुशी है की अर्जुन ने ये तुम्हे सौंपा. वैसे दोस्ती से ज्यादा .. मतलब अब मैं तुम्हारी इंग्लैंड वाली माँ की तरह पूछ रही हु. बता सकती हो.. इस बेशरम के तोह 18 की उम्र से हे बॉयफ्रैंड्स रहे है.", बिंदिया अपनी इस प्यारी बिटिया को साथ लिए फिर से बिस्टेर पर आ लेती और अब उसके दोनों तरफ शबनम और मुस्कान लिपटी हुई थी, दीवान खाली.

"मुझे बॉयफ्रैंड्स वाला सिस्टम हे नहीं पसंद अम्मी. एक बार में डायरेक्ट निकाह लेकिन उसके लिए अभी बहोत समय पड़ा है. इन्होने तोह कह दिया की कभी शादी या निकाह कुछ नहीं करने वाली. मैं तोह करुँगी लेकिन 3-4 साल अपने अम्मी अब्बू के सर रहने के बाद. साथ चलेंगे ओपेरा देखने, कंट्रीसाइड दावत, थोड़ा पियानो सेशंस और आप दोनों के साथ दुनिया घूमने. इन्हे रहने देंगे यही दिल्ली में, पढ़ने का शौक पूरा करके राइटर बनेंगी मोहतरमा.", मुस्कान की ख्वाहिशे सुन्न कर बिंदिया भी खुश हुई की बेटी समय अब अपने माता पिता के साथ हे बिताना चाहती है कॉलेज के बाद. लेकिन अर्जुन वाली बात को वो बखूबी ताल गयी थी.

"इसको सिस्टम पसंद नहीं और मैं अब कोई बॉयफ्रेंड बनाने नहीं वाली. ाचा माँ, कल हे हम आपकी मौसी के वह जाने वाले है क्या?", शबनम ने कमरे के लाइट बंद करने के बाद वापिस अपनी माँ से चिपकते हुए पुछा जो मुस्कान के सर को अपनी ब्याह पर टिकाये सर सेहला रही थी.

"देखते है लेकिन कल का अभी कुछ कहना मुश्किल है. हाँ परसो जरूर हम वह होंगे और फिर उनके पास 2 दिन रहने के बाद तीनो वापिस अपने घर. चल अब सो जा तू भी, ये गुड़िया भी सो चुकी है.", बिंदिया अकेली विचारो की दुनिया में जाना चाहती थी. आज अर्जुन से मिलने के बाद उसके अंतर्मनन में भी ढेरो सवाल और ख़याल बने थे जिनके जवाब भी वही दे सकता था लेकिन अब मुलाकात भी किस्मत पर निर्भर थी.

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एक तरफ आज पंडित जी के न होने से उनका घर भी कुछ ज्यादा हे खामोश था तोह उनसे कही दूर घर की मंझली बहु (रेखा) भी सारा दिन अपनी बेटी, भतीजियों और माँ के साथ हंसी ख़ुशी बिताने के बाद अपने कमरे में सुकून से सोने जा चुकी थी. बहोत कुछ घटित हुआ था उधर लेकिन अब सुकून था. तीसरी तरफ राजकुमार जी और नरिंदर ने मिल कर सब काम देख भल लिए थे अपने मित्र विष्णु के 2 दिन बाद होने वाले विवाह के. थकान से चूर राजकुमार जी तोह चैन से सोने चले गए पर नरिंदर खुली छत पर बैठे अपने जीवन का सार याद करते हुए अलग हे दुनिया में था. हरेक इंसान की स्थिति, परिस्थिति और chahat-khayaal भिन्न थे पर इस रात कुछ सुकून में थे और कुछ खयालो में. तारो से भरा गहरा आसमान फीका पड़ने लगा पृथ्वी के निर्धारित गति से और रात कब भोर के पहले पहर में बदल कर बस नाम की रजनी रह गयी.

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"उन्हहहह्म्मं.. सोने दो न bhabhi..umm..", निर्धारित समय अर्जुन की आँखें खुली तोह उसके हिलने मात्रा से ये आवाज सुनाई पड़ी जो उसकी एक ब्याह पर सर टिकाये और एक पाँव उसके ऊपर चढ़ा कर चिपकी सोई पालक की थी. रात दोनों के बीच तकिये की कमजोर सी दिवार कब बिस्टेर से निचे गिरी ये अर्जुन को हे खबर न लगी. दिन भर की bhaag-daud और फिर कुछ समय से नींद की कमी के चलते वो भी गहरा हे सोया था. पालक जैसे अपने घर पे भाभी प्रिय के साथ हे सोने लगी थी कपिल की व्यस्त जीवनशैली और रात में घर न आने की वजह से. यहाँ उसकी भाभी की जगह ये मजबूत युवक था जो अब न हिल सकता था और न पालक को हिला सकता था. नजर घुमा कर मेज पर राखी अलार्म घरी के रेडियम अंक देखे तोह साढ़े 4 हे हुए थे अभी. पालक सिकुड़ती हुई कब उस से चिपक गयी वो यही सोच रहा था की इतने में हे उसका चेहरा अर्जुन के गले और गाल से आ लगा. वो गाउन जो रात में उसके खूबसूरत जिस्म को पूरे ढके थे, अब घुटनो से ऊपर चढ़ा इन दोनों के बदन के बीच फंसा था. अब ये स्थिति कुछ ज्यादा हे नाजुक लगने लगी तोह अर्जुन ने एहतियात से पालक को एक तरफ लुढ़काया और उठने हे लगा था की उसकी बैनियाँ की पट्टी में फंसे पालक के मंगलसूत्र के खींचते हे वो हड़बड़ाती सी उठ बैठी.

"आप नींद में मुझे प्रिय भाभी समझ रही थी. आप सो जाइये, सिर्फ साढ़े 4 हे हुए है अभी. मैं तब तक..", अर्जुन आगे कुछ कहता उस से पहले हे पालक उसके गले लगती वापिस लेट गयी. इस बार न वो गहरी नींद में थी और न ये अनजाने में हुआ. अर्जुन के बाएं तरफ लिपटी वो उसके सीने के दाए हिस्से पर हाथ रखती फिर से मजबूत को तकिया बनाये हुए थी.

"तुम्हे तब तक वैसे हे सोना है जैसे सोये हुए थे, बस थोड़ी देर.. मेरे लिए..", अब यहाँ अर्जुन ने तोह कही दौड़ लगाने या कसरत के लिए जाना नहीं था और जितने प्यार एवं अधिकार से पालक ने कहा, वो कुछ न कहते हुए आराम से आँखें बंद किये वापिस लेट गया. बेशक एक समय था जब वो पालक की बगल में कभी कभार सो जाता था, पर वो बचपन था और पालक महज एक किशोरी. लेकिन आज भी जैसे कुछ ख़ास नहीं बदला था सिवाए इस बात के की अब अर्जुन के करीब पालक थी और बचपन में अर्जुन दुबका सोता था उसकी बगल में. नींद का दूसरा दौर कुछ ज्यादा हे असरदार रहा अर्जुन के लिए. अब आँख खुली तोह परदे के दूसरी तरफ से छान कर आती रौशनी में पूरा कमरा हे रोशन था. दरवाजा खुलने पर बाथरूम से भीगे बालों में टोलिया लपेटे निकली पालक पर हे आँखें स्थिर रह गयी. गहरे रंग का ब्लाउज बगल और सीने के सामने से कुछ ज्यादा हे गहरा था और समतल गोर पेट पर चार आने जितनी नाभि से भी निचे बंधा ब्लाउज के हे रंग का साया पहने मासूमियत और कामुकता का एक अध्भुत्त मिश्रण. बिस्टेर पर पड़ी मेहरून साड़ी को उठाने के लिए वो झुकी और अपनी तरफ टकटकी लगाए देखती उन आँखों से आँखें मिलते हे वो एक प्यारी मुस्कान देती बोल उठी.

"गुड मॉर्निंग.. नींद पूरी हो गयी न?", पालक का ऐसा पूछना और कोई झिझक न देख कर अर्जुन ने तकिया बाहों में भरते हुए हाँ कहा. वो उसको हे देखता रहा जैसे उन दोनों के बीच ये सब बरसो से चलता रहा जबकि सच ये था की आज सिर्फ पहली बार हे वो एक दूसरे के सामने थे.

"मुझे अकेले में नींद नहीं आती और हर वक़्त अजीब सा डर लगता रहता है जैसे इस कमरे के बहार से हे हर वक़्त कोई मुझे देख रहा हो. रात जरा सा भी बुरा ख़याल नहीं आया और मैं अपने समय से एक घंटा देरी से उठी हु.", अर्जुन ये सुन्न कर घरी को देखने लगा जहा 7:30 बज चुके थे. वही पालक को साड़ी पहन ने से पहले हे उसकी चुन्नट बनाते पाया तोह उठ कर बिस्टेर के उस किनारे हे आ बैठा. पालक कुछ हैरानी से उसको देखने लगी जो उस खूबसूरत परिधान को उसके हाथो से ले कर पहले नाभि के करीब एक सीरा खोंसने लगा और फिर पालक को ब्याह से पकड़ कर गोल गोल 3 बार घुमाने के बाद ठीक पहले वाली जगह खड़ा करके साड़ी की 7 बराबर परत लगाने के बाद दोनों हाथो से उसकी साये के भीतर बिना सिलवट लाये सेट करते हुए मेज पर पड़ी पिन लगाने सावधानी से लगाने लगा.

"मैं तोह अपने टाइम पर हे उठा था पहले लेकिन आपने दोबारा ऐसा सुलाया की देखो पूरे 3 घंटे ज्यादा सो गया. अब कभी आपको न तोह इस कमरे में बुरे ख़याल आएंगे और न हे कोई आप पर कभी नज़र रखने का दुस्साहस करेगा. आप ऐसे हे मेरी टीशर्ट अंदर करती थी न जब निक्कर निचे झूलने लगती थी मेरी? साड़ी पहन न उतना मुश्किल नहीं है, बस वस्त्र ज्यादा लम्बा होने से हम थोड़े असहज हो जाते है. हर मुसीबत को टुकड़ो टुकड़ो में टॉड कर दूर किया जाए तोह बताओ क्या मुमकिन नहीं? हम्म्म.. अब देखो जरा खुदको आईने में? मैं तोह कल हे समझ गया था के आपको साड़ी पहन ने में परेशानी होती है जब आपसे अपना पल्लू हे ठीक न किया गया. सलवार कमीज में भी ाची लगती हो आप और मुझे नहीं लगता के आपके saas-sasur कोई मनाही रखते होंगे.", अर्जुन ने पालक के सीने के सामने से कंधे के पीछे तक ऐसे आँचल दिया जैसे अक्सर उसकी ताई ललिता जी रखती थी. ढीला लेकिन अनुशाषित जो जरुरत के हिसाब से ऐसे हे सर पर लिया जा सके. पालक के बदन का निर्वस्त्र भाग तक छुए बिना उसने ये कर दिखाया और खुद को आईने में देखते हुए पालक ने टोलिया सर से खोला तोह भीगी जुल्फे उलझी लत्तो में बदल कर असंख्य सर्पो से झूलती, बलखाती हुई कंधे, पीठ और चेहरे के दोनों तरफ झूल गयी. सादगी में भी ऐसी कामुकता और ऊपर से खुदको साड़ी पहनाने वाले के सामने हे देखना पालक के लिए अलग हे सुखदायी स्थिति बना गया.

"बड़े पहुंचे हुए हो तुम तोह. जो कल तक निक्कर नहीं पहन सकता था आज वो औरत के परिधान की उनसे ज्यादा समझ रखता है. मुझे 15-20 मिनट लग जाते है सिर्फ इस काम में हे. सलवार सूट की मनाही नहीं है लेकिन फिर शादी वाली फील नहीं आती उसमे, चाहे मेरी थोड़ी अजीब सोच कह लो इसको लेकिन अभी यहाँ कम्फर्टेबले नहीं हुई न ज्यादा. कभी कभी पहन लेती हु जब मम्मी पापा नहीं होते घर. वैसे मैंने सुना था की तुम्हारी चॉइस बहोत ाची है लड़कियों के ड्रेस सिलेक्शन के मामले में. मेरी शादी में भी कोमल, ऋतू ने जो कपडे पहने थे वो सब तुम्हारी हे पसंद के थे? हाँ प्रीती की ड्रेस भी काफी खूबसूरत थी.", अर्जुन ने हलके से मुस्कुराते हुए आईने के पास हे राखी काजल की पेंसिल से पालक की गर्दन और कान के पीछे एक बिंदी लगाने के बाद अपना बैग खोलते हुए जवाब दिया.

"बचपन भी तोह आप सबके हे बीच कटा है. इतनी लड़कियों के बीच रहूँगा तोह क्या उन पर ाचा लगेगा और क्या नहीं, पता चल हे जाता है. वैसे रात बताया नहीं आपने की डायरी में ऐसा क्या लिख रही थी जो मुझे देखने तक नहीं दिया?", अर्जुन बैग से टीशर्ट और जीन्स निकालने के बाद वही अपनी बनियान उतार कर बैग में रखता हुआ बात कर रहा था और यही वो पल था जब भीगे खुले बालो में अप्सरा से कड़ी पालक की नजर इस युवक के जिस्म पर हे ठहर गयी. कोई वासना नहीं बस आकर्षण हे था. लेकिन वही सवाल पूछे जाने पर पालक चलती हुई उसके करीब आयी और बैग से वो बनियान वापिस निकाल ली.

"आदत है डायरी लिखने की. जिस दिन कुछ ाचा लगता है, कुछ ख़ास होता है तोह बस लिख लेती हु. तुम बड़े होने के साथ हे जिम्मेदार और काफी शांत इंसान बन गए हो अर्जुन. रात तुम्हारी क्या बात हुई इतनी देर तक सोनाली दीदी से?", अर्जुन पूछना चाहता था की वो उस बनियान का क्या करने वाली है लेकिन फिर समझ हे गया की मैले कपडे धोने के लिए हे उठाये जाते है.

"ाची आदत है. सोनाली जी से तोह बस इधर उधर की हे बातें कर रहा था. दिल्ली के बारे में, उनके परिवार और यहाँ घर की बातें.. वैसे आपको भी कुछ बताना था जो रात बता न सका. पता नहीं कैसे भूल हो गयी?", अर्जुन बैग से ब्रश निकाल कर वही बिस्टेर के किनारे हे बैठ गया. चेहरे पर कुछ अस्पष्ट से भाव आ गए जैसे वो कुछ बताना चाहता हो लेकिन कैसे कहे यही समझ न पाया.

"बताने की जरुरत है क्या? इतना कुछ न मैंने हे उम्मीद की थी और न सोचा था की तुम इतने काबिल हो. अब ज़िन्दगी बचने वाले का एहसान जरूर है लेकिन दिल कह रहा है की ये एक फ़र्ज़ था, एक रिश्ते को सार्थक करता हुआ प्यार जो मैं सोच भी नहीं सकती थी की मुमकिन हो भी सकता है. पापा का हमेशा हे माँ से ये कहना की अर्जुन अब वो लड़का नहीं रहा, अर्जुन ने पंडित जी के मान कही ज्यादा बढ़ा दिया, अर्जुन एक ऐसा हीरा है जिसकी पहचान हमे हे नहीं हुई... फिर तुम एकाएक आते हो उस दुखी टूटी हुई लड़की के पास जो na-ummeed है, हताश है और कही न कही ये सोच बैठी है की अब जबरदस्ती किसी भी तरफ से होगी तोह वो जान दे देगी पर घरवालों के फैंसले ख़ामोशी से मान कर उन्हें और दुखी नहीं करेगी. लगा की तुम बस एक जरिया हो मेरे पापा और माँ का जो मुझे मेरे ससुराल छोड़ने के बाद लौट जाएगा. बोझ जो हो जाती है लड़की शादी के बाद अगर माँ बाप के पास वापिस लौट आये. तुम्हारी कही हर बात मैं सुन्न कर मैं यही सोचती हुई जवाब देती रही की अब क्या फरक पड़ता है. मैं गलत थी अर्जुन.. मेरी सोच गलत थी.. तुम्हे मैं नजरअंदाज नहीं कर रही थी जब तुम अपना बचपन, मेरा तुम्हारे साथ बीता समय और वो सब बता रहे थे जो मेरे खयालो में दूर दूर तक नहीं था.. माफ़ करना बहोत परेशां थी लेकिन एक सफर पे आराम भी था जब सिर्फ हम दोनों हे थे.", पालक बताती गयी और अर्जुन सुनते हुए अपना ब्रश एक तरफ रख कर उसके दोनों हाथ थामे बस उस भोले चेहरे को देखता रहा जिसमे अब सिर्फ प्यार और कृतज्ञता थी. पालक उसके सामने हे मेज पर बैठ कर उसकी गॉड में अपने और उसके हाथो को जुड़े देख डबडबी आँखों से मुस्कुराई जैसे उसने सब कह कर भी न कहा.

"तुमने उस आदमी को.. पता नहीं कैसे लेकिन तुमने इतनी जल्दी हे उस बुरे इंसान को सिर्फ इसलिए ढून्ढ निकला क्योंकि वो मुझे परेशां कर रहा था. मेरा जीवन खराब करने के साथ मुझे मानसिक क्षति पंहुचा रहा था. तुम हमेशा से ऐसे थे अर्जुन, जिसके साथ रहते उस से लड़ते, प्यार करते और हक़ जताते रहते. किसी को कभी दुखी नहीं देख सकते थे... हाँ बहोत गुस्सा आता था तुम्हे अगर कोई तुम्हारी बात नहीं मानता या सुनता था.. और अब भी तुम्हारी वो उम्र नहीं की तुम जान जोखिम में दाल कर ऐसे काम अंजाम दो लेकिन तुमने मेरे माँ पापा की सोच को सार्थक कर दिखाया. मैंने तुम्हारे कैमरा में वो तस्वीर साफ़ साफ़ देखि थी जिसमे पार्क वाला हे आदमी था, दीदी उसको पैसे दे रही थी, बाद में वो बंधा हुआ था किसी जगह और तुम शायद उसको बुरी तरह मार रहे थे. बाथरूम जाने से पहले तुमने मुझे बताया नहीं लेकिन मेरे सामने वो चलता हुआ कैमरा इसलिए हे छोड़ गए थे न की मैं उसको देख सकू.? तुमने मेरी दी हुई तस्वीर में ये कहा था की 'इस आदमी को'. तब मैं नहीं समझी क्योंकि मैं उलझन में थी की ये सब आखिर क्या था. फिर मैं तुम्हारे सोने के बाद उस दिवार को गिरा कर इसलिए तुम्हारे कंधे पर सर रख लेट गयी क्योंकि तुम हो.. जो मुझसे आज भी उतना हे प्यार करता है जितना भूली बिसरि यादों से याद आया. तुम आज भी सोते हुए उतने हे मासूम लगते हो और जरा सा भी नहीं हिलते.", टुकड़ो टुकड़ो में हाल बयान करने के साथ पालक ने वो सब भी बतला दिया जिसको कहने के लिए अर्जुन शब्द ढूंढ़ने में जूता था. और कोई परवाह किये बिना पालक का उसके गले से लग कर खामोश हो जाना एक गहरा विश्वास था जो वापिस लौटा भी तोह इस कदर की जैसे punar-jiwan मिला हो.

"ाहु ाहु.. भाई बहिन के बीच इमोशनल सन डिस्टर्ब करने के लिए सॉरी. ये तुम्हारी कॉफ़ी और अर्जुन के लिए दूध. मम्मी पापा को चाय दे आयी हु और वो लोग भी आते हे होंगे नाश्ते के लिए. अर्जुन से उन्हें भी मिलना है, आखिर उनकी छोटी बहु का इतना लायक भाई पहली बार तोह घर आया है.", दरवाजा हलके से थपकने के बाद हे सोनाली भीतर आयी थी और उन दोनों के लिए मेज पर चाय कॉफ़ी रखने के बाद बस आँखों से हे उसने अर्जुन को शुक्रिया कहा अपना जीवन लौटने के लिए, क्योंकि इतना दयावान हर शक्श तोह नहीं हो सकता.

"आपने भी मेरे लिए जो किया है दीदी, मैं उसका एहसान नहीं उतार सकती. आप सचमुच मेरी बड़ी बहिन है चाहे रिश्ता जो भी हो इस घर में.", पालक के इस कथन पर सोनाली का चेहरा एक पल के लिए बुझा और अर्जुन ने ना में गर्दन हिला कर कुछ भी बताने से मन कर दिया उसको.

"एहसान तुमने किया है जो मुझ जैसी औरत को बहिन का दर्जा दिया और कभी किसी काम तक के हाथ नहीं लगाने दिया. आज से तुम रसोई में नहीं दिखोगी जबतक की मैं घर पे राहु. शादी को वक़्त हे कितना हुआ है तुम्हारी? आज तोह तुम्हे अपने भाई को दिल्ली घूमना चाहिए, रोज रोज तोह वो नहीं आने वाला न? ऐसा भाई किस्मत से भी नहीं मिलता जो बहिन को अपना सबकुछ मानता हो. और मैंने तोह आजतक तुम्हारे लिए कुछ किया नहीं इसलिए अब करने देना. आधे घंटे में नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम में मिलते है.", सोनाली ने जो भी कहा उसमे सिर्फ पालक को यही समझ आया की अर्जुन उस से बस नाम का हे रिश्ता नहीं रखता जो सोनाली तक को पता है. वो जा चुकी थी और पालक फिर से अर्जुन के गले लग कर बचो जैसे बोलने लगी.

"तुम मुझे शॉपिंग लेके जा रहे हो? और कुछ दिन यही रुकोगे मेरे पास?"

"हाँ शॉपिंग तोह जरूर चलेंगे लेकिन कल मुझे जाना होगा. जिस वजह से आप इतनी परेशां थी, वो दूर करने हे तोह आया था जिस से मैं आपको ठीक पहली जैसी पल्ली की तरह देख सकू. माधुरी दीदी मजाक में कहती थी न झल्ली पल्ली.. आप शादी होने के बाद भी बिलकुल वैसी हे हो.. काम से काम आज मेरे साथ तोह वैसी हे हो. अब मैं तैयार होने जाऊ?", अर्जुन ने एक बड़े भाई जैसे पालक की पीठ हलके से थपकते हुए कहा और इसके बाद वो हैरान हे रह गया जब अलग होने से पहले पालक ने एक बार दरवाजे को देखा और फिर उसके होंठो पर होंठ रख कर आँखे मूँद ली. ये चुम्बन भले हे 10-15 सेकंड का था पर ऐसा जैसे पालक ये कब से करना चाहती हो. अर्जुन दुविधा में उसके मासूम चेहरे को देखने लगा तोह इसकी वजह भी पालक ने बताई.

"पहले भी मैंने सिर्फ तुम्हे हे किश की थी अगर तुम्हे याद हो तोह. मैं ऐसे हे प्यार बता सकती हु, काम से काम तुम्हे तोह."

"पहले तोह मातेह और गाल पर हे करती थी आप.", अर्जुन सर झुकाये लड़कियों सा शर्माने लगा क्योंकि कही न कही उसको भी एहसास हुआ था की पालक ने गलत नहीं कहा.

"पल्ली तू मुझे चुम्मी नहीं देगी? मिनी भी तोह मिक्की को देती है.. पालक ने चेहरे से चेहरा लगते हुए जैसे धीमी आवाज में कुछ याद दिलाया तोह बदले में हलके से अर्जुन ने भी उसके होंठो को चूमा और उठ खड़ा हुआ.

"मैं तेरी मम्मी को बोलूंगी तू मुझसे चुम्मी मांगता है. बस एक दूंगी और तू किसी से नहीं कहना?", अर्जुन टोलिया उठा कर बाथरूम में जा घुसा पालक को की नक़ल उतारता जो भीगे चेहरे से भी मुस्कुराये जा रही थी. फिर उठ कर अर्जुन की जीन्स टीशर्ट बीएड पर रखने के बाद वो कमरा ठीक करने लगी. कॉफ़ी पर ध्यान जाते हे खिड़की के करीब कुर्सी रख वो बहार देखती हुई विचारो में खोयी छोटे छोटे घूँट कॉफ़ी के भर्ती जैसे जीवन में haal-filhaal आये बदलाव ध्यान करने लगी. अर्जुन कब बाहर आया और कपडे भी पहन चूका, ये पालक को जैसे दिखाई हे नहीं दिया. दूध का गिलास उठा कर वो पालक के सामने हे दूसरी कुर्सी पर आ बैठा. घुंगराले बाल गीले हो कर चेहरे के सामने और कान के पीछे से गर्दन तक बिखरे थे.

"खुली आँखों से कौनसे सपने देख रही है आप? वो फोटोज संभाले रखना ठीक नहीं है.", अर्जुन की आवाज सुन्न कर पालक का ध्यान गया की उसकी आधी कॉफ़ी कबकी ठंडी हो चुकी है. एक मामूली सी मुस्कराहट देती हुई वो कड़ी हुई और लाकर से वो लिफाफा निकाल कर अर्जुन को पकड़ते हुए कहा.

"जला कर फ्लश कर दो, मैं कप रख के आती हु. फिर मम्मी पापा से भी मिल लेना, नाश्ते के समय.", अर्जुन को हैरत हुई और वो एकटक पालक के शांत चेहरे को देखने लगा क्योंकि इन तस्वीरों में कुछ ऐसी भी थी जिन में पालक पूर्णतया निर्वस्त्र थी. अर्जुन को इस कदर हैरान देख कर अब पालक की मुस्कान कुछ गहरी हो चली.

"यही सोच रहे हो की मैं तुम्हे ये क्यों सौंप रही हु ये जानते हुए भी की इनमे से कुछ ऐसी है जिन्हे मैं भी नहीं देख सकती? इसका जवाब तोह सचमुच मेरे पास भी नहीं है अर्जुन लेकिन मुझे ाचा लगेगा अगर ये तुम खुद करो तोह.", दराज से सिग्रत्ती जलने वाला लाइटर निकाल कर अर्जुन को देते हुए वो उसके पास हे रुक गयी. अर्जुन उन अनकहे लफ्ज़ो को भी सुन्न गया जिनमे पालक ने एक तरह से उसको सर्वोपरि मान लिया था. खिड़की गली की तरफ खुलती थी जिसके दोनों पल्ले खोल कर अर्जुन ने भूरे लिफाफे को बिना खोले हे आग के हवाले कर दिया. छोटी सी आग की लौ chatt-chatt करती हुई आधे लिफाफे तक लम्बी लपटों में बदलने लगी और अर्जुन एक किनारे को थामे hari-neeli और नारंगी लपटों के साथ काले पड़ते उस तस्वीरों के गट्ठर को देखता रहा जो धीरे धीरे फूलने के साथ गली में झाड़ कर गिरने लगा था. पालक के चेहरे पर प्रशंशा के भाव थे और पूरा लिफाफे राख में बदलने के बाद अर्जुन पलटा तोह इस बार पालक ने उसका माथा चूम लिया.

"तुम चाहते तोह देख भी सकते थे लेकिन तुमने एक बार भी खोलने तक की कोशिश नहीं की. दुनिया तुम्हारी जैसी क्यों नहीं है अर्जुन?"

"मैं भी इस दुनिया का हे तोह हिस्सा हु मिस झल्ली जी. उन तस्वीरों से ज्यादा अनमोल और खूबसूरत है ये सुकून और भोला चेहरा जो मुझ पर आज भी विश्वास करता है. चुम्मी करने डौगी?", अब पालक खिलखिला कर हंसने लगी थी क्योंकि अर्जुन ने जो इत्छा जताई उस पल वो ठीक किसी बचे सी नौटंकी कर रहा था.

"तुम्हेर मम्मी से कह दूंगी की ारु चुम्मी मांग रहा था मुझसे. हाहाहा.. उम्माह.. अब बताओ आज का क्या प्लान है?"

"पहले हम कान्नौगत प्लेस चलेंगे, थोड़ा काम और ढेर साडी शॉपिंग करनी है. फिर एक ाची सी जगह लंच और उसके बाद छोटा चेतन देखेंगे. 3 डायमेंशन फिल्म है और अपने शहर तोह देख नहीं पाउँगा. कल बड़ा सा बोर्ड देखा था मैंने जब हम उधर मार्किट रुके थे उस वक़्त. फिर शाम को 7 बजे मुझे कही जरुरी काम से निकलना है और रात को वापिस में देरी हुई तोह होटल में रुकूंगा. हाँ जाने से पहले मिलने आ जाऊंगा आपसे."

"जहा जाना है चले जाना लेकिन रात को वापिस यही आना है. चलो अब पापा जी से भी मिल लो और मुझे लेके जा रहे हो ये बात तुम्ही कहना उनसे. मैं परमिशन नहीं लेने वाली.", पालक की ऐसी बात सुन्न कर अर्जुन ने भी सर पे हाथ रखते हुए जाहिर किया जैसे अब वो हर काम उस से करवाने वाली है. 5 मिनट बाद हे दोनों तैयार हो कर उस साफ़ सुथरे हॉल में थे जहा एक तरफ रसोई और खुले हिस्से में आलिशान बड़ा मेज लगा था 8 कुर्सियों के बीच.

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"ारु पूछ रहा था की दिल्ली से आपके लिए क्या लेना है. मैंने तोह बता दिया की मेरे लिए एक ाचा सा फ्लोरल ड्रेस कनी लेंथ का और अलका ने skin-fit जीन्स के साथ उसकी हे पसंद का टॉप. आरती का हमेशा वाला वही की जो उसको पसंद आये वो ले आये पर 2-3 ाची सी बुक्स जरूर. मैंने वैसे तोह कहा था के माँ को कोई जरुरत तोह नहीं लेकिन कल एक शादी अटेंड करनी है. टाइम से अगर वो अपने घर पहोच जाए तोह संदीप की मम्मी के हाथो भिजवा दे. आंटी तोह 10 बजे तक वह से निकलने का बता रहे थे न?", ऋतू के माथे पर अभी भी खरोच जैसा निशाँ साफ़ जाहिर था एक तरफ. काले रंग की ढीली सी कुर्ती और सफ़ेद सलवार में उसकी ख़ूबसूरती और भी ज्यादा निखार दे रही थी उसके गोर तराशे हुए चेहरे, भूरे लम्बे घूमे हुए रेशमी बालो के साथ. नाश्ता तोह समय से हो हे चूका था सबका और रेखा जी अभी उन कुत्तो को भोजन परोस रही थी उनके बड़े बड़े कटोरो में. आज वो भी सूती सलवार कमीज में हे थी इस खूबूसरत प्रकृति से घिरे आवास में. इनसे कुछ हे दुरी पर अलका और आरती एक बड़े टोकरे में कच्चे आम चुगवा रही थी कुंती से. एक बड़ी सी लाठी के आगे बंधी डराती से अलका बड़े बड़े आम निचे गिरती जो अलका उसको बताती और कुंती उन्हें टोकरे में जमा करती.

"वो वह काम से गया है या ये सब करने के लिए? और तुमने आगे से खुद उसको बता दिया के ये सब लेते आना. कल अगर उसको जल्दी नहीं भी आना होगा न तोह वो 10 से पहले खड़ा होगा संदीप के घर. वैसे सब लोग शादी में होंगे तोह घर पे कौन रहने वाला है?", वही एक तरफ हे सिंचाई के लिए लगे पाइप को चला कर हाथ धोते हुए रेखा जी ने डांटने की जगह ये बात इस लहजे में कही थी की ऋतू को बुरा भी न लगे और अर्जुन तक सन्देश भी जाए की वो काम पर हे ध्यान दे.

"वही रहेगा घर पे क्योंकि आपका लाल जहा ब्रेक लगा देता है उसके बाद उठाये से भी उठने वाला नहीं. और उसका जो भी काम था वो आज रात को हे है. फिलहाल तोह वो पालक दीदी के ससुराल में रुका हुआ जिन्हे मल्होत्रा अंकल ने उसके साथ हे भेज दिया था जब पता लगा की वो काम से दिल्ली जा रहा है. माँ, मैं क्या कह रही थी की ये विष्णु अंकल इन्दर चाचा की आगे के है और अब शादी कर रहे है? मतलब बाउजी और दादी भी उन्हें पुराने जानते है जिस हिसाब से पूरी शादी और रस्मे खुद दादी और बौ जी हे करने वाले है माता पिता की.", ऋतू वही घास पर हे चौकड़ी लगाती हुई बैठ गयी जिसकी बगल में सबसे शरारती झबरैला कुत्ता पसर कर बालो में हाथ फिरवाने लगा. वो हँसते हुए उसकी नौटंकी देखने लगी जिस तरह वो हाथ रुकने पर मुँह रगड़ कर जारी रखने का निर्देश देता था.

"मैंने तोह यही सुना है की जब तेरे चाचा कॉलेज थे तोह विष्णु भाई साहब के संरक्षक तुम्हारे रघुवीर दादा जी हे थे. तुम्हारे बौ जी भी उतना हे प्यार रखते है उनके साथ और ये विष्णु जी की हे मर्जी थी की वो शादी नहीं करना चाहते थे उस समय. अब जिस से हो रही है वो भी कृषि पृष्ठभूमि से है और तुम्हारे विष्णु चाचा ने भी सरोज के बगल वाली जमीन पर खेत और घर तैयार किया है. हाँ अर्जुन को घर हे रुकना पड़ेगा लेकिन अकेले तोह माँ जी घर नहीं रहने देंगी क्योंकि वो लोग तोह अभी दोपहर में निकलने हे वाले है. वैसे रोमिला वही रहेगी रेणुका के पास और प्रीती भी होगी तोह समस्या नहीं होने वाली. बाकी शाम तक तोह हम लोग भी घर हे होंगे. मैं ये सोच रही थी की ड्राइवर का कैसे करना है?", अब माँ की जगह जैसे वही ऋतू की सखी सामें थी और ऋतू इस पर विचार करने लगी. उसकी माँ सबके सामने नहीं आना चाहती थी इस अवतार में और जाना भी सीधा वह गाँव में था जहा शादी होने वाली थी.

"बड़ी माँ.. आप यहाँ से गाँव तक गाडी ले चलिएगा और आगे न हम मेरे पापा को बुला लेंगे. या फिर आप सेहर हे चल पड़ना, माधुरी दीदी की तरफ से किसी ड्राइवर का इंतजाम करवा लेंगे और ललिता ताई जी को भी उधर से हे ले लेंगे न साथ. क्या कहती हो डॉक्टर चश्मिश.?", एक अधपकी ाम्बी मुँह से काट कर उसका पीला खट्टा गूदा मजे से खाती हुई आरती भी धम्म से पसर गयी ऋतू की गॉड में सर रखती हुई. अलका अपने हाथ में पकड़ा हुआ छोटा टोलिया अपनी चची को पकड़ा कर इनकी चर्चा में शामिल हो गयी. कांटा टोकरी भर कच्चे आम ले कर सुनंदा जी के पास चली गयी थी, शायद अचार के लिए ये लोग हरे आम साथ ले जाने वाले थे.

"हाँ इसने करि चची सही बात. कभी कभी दिमाग चलता है हमारी मोटो का. दीदी के घर से तोह कोई जाने वाला है नहीं और माँ से आप अभी बात कर लो कही दादी उन्हें न साथ लेती जाए हमसे पहले. अभी 12 बजे है और बाउजी दिल्ली से निकले थे 9 बजे तोह एक घंटे बाद वो घर होंगे. उसके एक घंटे बाद सभी लोग निकल लेंगे वह से क्योंकि 4 कार जा रही है. पहले तोह तारा, रुपाली और चची रुकने वाली थी लेकिन दादी ने कहा की हम तीनो जब यहाँ से शादी में शामिल होने वाली है तोह बाकी सबने कोई पाप किया है? घर पे हमेशा की तरह मुनीर अंकल रखवाली के लिए रहेंगे रात को और कल तोह अर्जुन पहुंच हे जाएगा. वैसे जल्दी ख़तम नहीं हो गया ये ट्रिप?", अलका के साथ सबको हे जगह कही ज्यादा पसंद आयी थी. दुनिया से दूर, हरा भरा खुला बाग़ जिसके साथ हे झील और आगे घने जंगल के बीच पहाड़ी नदी. महल जैसे आलिशान और आरामदायक कक्ष.. क्या नहीं था यहाँ और सबसे ख़ास था आपस में समय बिताना.

"फिर आ जायेंगे जब ब्रेक मिलेगा. क्यों माँ, आ सकते है न हम यहाँ दोबारा कुछ समय रहने?", ऋतू ने बात तोह यहाँ अर्जुन के बारे करनी थी लेकिन फिलहाल ये मुमकिन न था. आरती आँखें मूंदे खुदसे हे हाँ कहने लगी उसके सवाल पर

"जब सर्दियाँ अपने चरम पर होती है तब यहाँ का नजारा बहोत अलग हे होता है. गर्मियां देख ली है तोह एक बार सर्दियों में भी ट्रिप प्लान करना चाहिए. लेकिन तब बस तुम लोग हे आना, मेरा मुश्किल है. और यहाँ आने के लिए तुम्हे सिर्फ समय निकलना है, परमिशन ले कर ये मत जाहिर करो की मैं इधर की एकलौती मालकिन हु. आजतक इसके कागज़ माँ के हे नाम है जिसमे मैं वारिस भर हु और मेरे नाम ये होने भी नहीं वाली. हाँ ऋतू या कोमल में से किसी एक के हो सकती है. चलो तुम लोग आराम से समय बिताओ यहाँ, मैं कांटा से थोड़ा काम करवा लेती हु. फिर सामान भी पैक करना है क्योंकि सुबह थोड़ा जल्दी निकलना हे ठीक रहेगा.", रेखा जी भी ऋतू से अकेले में हे बातचीत करने का इरादा लिए थी लेकिन वही हालत थी की समय उचित नहीं था. अब यहाँ ये तीन थी और चर्चा भी अर्जुन की हे होने वाली थी.

"तुम्हे क्या लगता है जो दादी ने बताया वो सच है या जैसा ारु दिखाना चाहता है वो?", अलका के इस सवाल पर ऋतू ने हामी भरी और जवाब आज के दिन की सबसे होशियार आरती ने दिया.

"दोनों हे सच नहीं बता रहे जितना मुझे लगा. देखो अर्जुन का दिल्ली जाना हो सकता है काम की वजह से हो लेकिन पालक दीदी जब इतने समय से अपने घर थी और ारु घर पे जितना रुका तोह उस हिसाब से दादी का ये कहना की वो दिल्ली जा रहा था इसलिए पालक को भी लेता गया तोह बात हजम नहीं होती. ारु ने बोलै की उसका काम रात का है और वो ख़तम करने के बाद वो पालक दीदी के यहाँ रात गुजार कर सुबह जल्दी घर के लिए निकल लेगा. दिल्ली में सिर्फ उनके हे घर वो 2 रात? ारु इस मामले में बहोत स्वाभिमानी है और अब उसके पास जब उमेद चाचा जी की गाडी है और मोबाइल फ़ोन भी तोह एक पंथ 3 काज वाला मामला है. पालक दीदी की एक अलग कहानी है, उमेद चाचा भी अलग हे सन में है अर्जुन के साथ और इन सबके बीच दादा जी वह गए वो भी बिंदु आंटी और उनकी दोनों बेटियों के साथ. जबकि उस बड़ी गाडी में ये लोग ारु के साथ आराम से आ सकते थे लेकिन अलग अलग गए. और ऋतू से ारु ने कहा की वो रात डिनर के लिए बिंदु आंटी के पास गया था जबकि दादा जी उधर नहीं थे. अब बताओ मेरी थ्योरी कितनी सही है और कितनी गलत?", आरती के इतने भरपूर विवरण से जहा ालक भौचक्की रह गयी वही ऋतू जोर जोर से हंसने लगी. उसकी ये उन्मुक्त हंसी देख निचे लेती आरती ने हे उसका एक गाल खिंच कर अपनी उँगलियाँ होंठो से लगा ली.

"आज लगता है इसने तेरा झूठा खा लिया अलका. दिमाग चलने लगा है इस मोटो का भी लेकिन बिंदु आंटी वाला मामला बस औपचारिकता है मेरे हिसाब से. मुस्कान ाची लड़की है और अर्जुन की उसके साथ जमती भी बहोत है. डिनर पर बुलाया गया क्योंकि बौ जी को कही जाना था और गाडी उनके साथ गयी. ारु इस बहाने मुस्कान के बुलाने पर बाकी दोनों से भी मिल लिया पर यहाँ सबसे ख़ास बात है ये पालक दीदी वाला मामला. वो मेहँदी वाले दिन भी खामोश थी जबकि प्रिय भाभी को इंटरेस्ट था अर्जुन के बारे में जान ने का. जहा तक मुझे याद है तोह ारु बचपन में अपने घर के सिवा कही जाता था तोह सामने अरोरा अंकल के घर डिम्पी के साथ खेलने या फिर पालक दीदी के यहाँ क्योंकि संजीव भैया का भी उधर हे ज्यादा जाना होता था जिनकी कपिल भैया से जमती थी और ारु फ्रूटी दिप्सी के चस्के के साथ हे पल्ली पल्ली कहता पालक दीदी के भी चिपका रहता था. पालक दीदी की कोई बड़ी समस्या है और मल्होत्रा अंकल के सबसे करीब है अपने दादा जी. प्रीती ने रात बताया था की शाम को मल्होत्रा अंकल बाउजी के साथ अँधेरा होने पर भी पार्क में बैठे थे. परसो शाम को भी वैसा हे सन था तोह मतलब साफ़ है की ये बात इतनी ख़ास है जिसमे खुद बाउजी भी शामिल नहीं हो सकते.. मतलब लड़की वाला मामला और ारु नहीं बता रहा क्योंकि वो दीदी की परवाह करता है. मुझे तोह लगता है अब भी करता है चाहे इनकी बातचीत नहीं होते देखि मैंने जबसे ये घर वापिस लौटा. पर आज रात को.. कुछ ऐसा है जिसके बारे में उसने मुझे भी कोई हिंट नहीं दी. मतलब बौ जी को भी नहीं पता और ये मामला जरूर रिस्की है.", अब ऋतू की हंसी हे गायब हो गयी क्योंकि अर्जुन उस से बात गोल कर गया था. और उसको चिंता में देख आरती वापिस मंदबुद्धि अवतार में जा पहुंची.

"कही वो पालक दीदी को तोह ख़ुशी नहीं देने जा रहा?"

"ओह तू अब चुप कर. एक दिन में तू ब्योमकेश बक्शी नहीं बन्न ने वाली मोटो.. पालक दीदी के साथ ऐसा वैसा अगर हो भी गया तोह वो समस्या तोह नहीं कहलायेगा? वो क्या बोल रही थी की उनके हस्बैंड महीने भर के लिए बहार है. परिवार तोह वही होगा न और शादी को तोह उतना टाइम भी नहीं हुआ जिसमे वो 2 बार घर आ चुकी. इस बार लगभग 2 हफ्ते रही है, लेकिन घर से उतना बहार भी नहीं निकली नहीं तोह वो कोमल के पास तोह आती न ऋतू?" अलका की बात पर ऋतू ने सर हिलाया.

"बौ जी खुद इसमें नहीं पड़े मतलब बात ऐसी है जो खुलनी नहीं चाहिए. पर ये रात को क्या काण्ड करने वाला है? गाँव से ये घर आने का बता कर नहीं निकला और सुबह ये प्रीती के यहाँ से घर गया था कल. रात को हे क्यों निकला? सिर्फ प्रीती वजह होती तोह वही खुद उसको आने के लिए मन कर देती इतनी रात में. वो वह था पार्टी में उमेद चाचा जी की जगह और ऐसे हे निकल गया? मोबाइल फ़ोन कैसे पंहुचा उसके पास? वो पंहुचा तोह पंहुचा इतने पैसे किसने दिए की वो उस जगह शॉपिंग के लिए जा रहा है जिधर हजार 2 हजार में तोह जीन्स भी नहीं मिलती. कोई बड़ा खेल है अलका क्योंकि घर पे ारु की गाडी कड़ी है जो उसको सबसे ज्यादा पसंद है. वो लांसर नहीं लेके गया और .. पक्का वो उमेद चाचा के हे साथ होगा.", अभी ऋतू को शीला देवी वाला प्रकरण याद आने लगा जब पहली बार उसके भाई ने मूर्खता दिखने के साथ अपनी बहादुरी का भी जलवा परिवार के सामने लाया था.

"तेरा कहने का मतलब है की ारु उधर सचमुच कुछ बड़ा हे खेल खेलने वाला है? गाडी तोह चाचा जी ने इसलिए दी है की उसमे अर्जुन सुरक्षित रहे और उधर फ़ोन चलता है तोह संपर्क में रहने के लिए वो भी साथ मिला होगा."

"न अलका.. महंगी गाडी, ारु के पास ढेर सारे पैसे और मोबाइल सिर्फ ख़ास वजह से क्योंकि चाचा उसको कांटेक्ट में रहे हरदम. कहने को तोह चाचा का प्यार हे बहोत है उसके लिए लेकिन अभी सारा बिज़नेस उधर हे बढ़ाया जा रहा है और ऐसे मौके पर ारु का वह ये सब करना मतलब कुछ और हे है. ऐसा मसला होता जहा पर khoon-kharaba होना हो तोह उमेद चाचा खुद हे बहोत थे और उनसे पहले पापा को हे खुजली रहती है."

"जहा जोर की जरुरत नहीं मतलब शांत दिमाग. दिखावा मतलब कोई रसूखदार सामने है. अर्जुन को हे भेजा गया है और वो भी रात में .. यही बस एक पॉइंट पहेली है जिसमे 2 ऑप्शन है ऋतू की या तोह अमीरजादा है जिसके चांस काम है क्योंकि अर्जुन लड़को से ज्यादा जल्दी लड़कियों से दोस्त कर लेता है. दूसरी ऑप्शन है की उसको ऐसी जगह भेजा जाए जहा मिडिल क्लास की एंट्री न हो और काम करने वाला अर्जुन जितना हे शातिर. जोर से ज्यादा तोह उसमे दिमाग है.. मतलब जोर तोह है हे लेकिन दिमाग और सेल्फ कण्ट्रोल कही ज्यादा. यंग है जिसका मतलब वह बड़े लोगो से len-den नहीं. चल जाने दे इस बात को अभी के लिए. गलती से चची तक ये बात चली गयी न तोह हो गया beda-garak. हमारा कुछ नहीं जाना लेकिन वो फंसेगा."

"ऋतू, तेरे पापा का फ़ोन है तेरे लिए. तुम दोनों भी आ जाओ, लंच तैयार है.", रेखा जी ने गेट पर खड़े हे आवाज लगाईं तोह इन्हे समय का अंदाजा हुआ. तीनो हे उठ कर घर की तरफ बढ़ गयी. उधर दिल्ली में अर्जुन के भी फ़ोन की घंटी बजने लगी थी जहा ख़ास नंबर देख कर उसके चेहरे पर आयी चमक हाथ थामे चलती पालक से भी न बची.
 
दोबारा तिनके जोड़ना भी मुनासिब न हुआ..

वो सीख अब झाड़ू को पसंद हे नहीं..
 
अपडेट 25 को दूंगा दोस्तों और जो ये मर्दानगी, अपडेट का वादा और नहीं देना.. सीज़.. बंद करो भाई बेफिज़ूल अपनी ताक़त जाया करना. मैं तोह जब जुलाई में ब्रेक लेने वाला था तभी प्लान चल रहा था की थोड़ा बिज़नेस और घर ग्रहस्थी पर ध्यान दू. नवंबर तक मैं कहानी से ब्रेक लेने वाला था लेकिन फिर यहाँ जो भाई बंधू है उनका लगाव थोड़ा भरी पड़ गया जो छुट्टियों में भी मैं इधर लिखता रहा.

पर नहीं हमे तोह कूल ढूढे बन न है और एनिग्मा को हे लपेट लो जिस से माहौल हे गरमा जाए.. अरे भाई जिस दिन अपडेट न आये तोह थोड़ा बहार घूम आया करो. 2-3 पौधे लगाओ, दोस्तों से बातचीत करो, शिकवे शिकायत भी निकालो दिल से. मेरे तरफ भी दर्जनों समस्या है लेकिन मैं सबके साथ तालमेल बनाये रखना चाहता हु. और ये Harpreet2658 भाई के तोह 😡 इमोजी बता रहे जैसे मैंने इन्हे राखी बंधवा दी हो इनकी क्रश से.

रिलैक्स करो यार थोड़ा. प्रोब्लेम्स सबको आती है और यक़ीनन मेरे से ज्यादा होंगी भी आप में से किसी के पास लेकिन फिलहाल थोड़ा फसा हुआ हु. 2 दिन बाद मिलते है अर्शी का अपडेट ख़तम करने के लिए. फिर मैंने बाकी काम जल्द पूरा करना है.

शुभरात्रि और अपना ध्यान रखो भाइयों. मेरा गुस्सा कही और निकालोगे उस से ाचा डीएम में गालियां भेज दो. मैं यहाँ पब्लिक भी नहीं करूँगा आप लोगो को भड़ास.

🙏🌱💚
 
ओह भाई लोग शांति बनाये रखो. क्यों बेवजह बन भुगतना? ऐसा है की स्टोरी टाइम पे अपडेट होती रहेगी. आप लोग हे न रहे तोह मैं क्या यहाँ मोड्स को कहानी सुनाऊंगा.? कोई भी इधर स्पैम या टेप, वीसीआर, डीवीडी, किताब का सकाम नहीं करेगा.. 99.99% से निवेदन है की वो स्टोरी पढ़े, रिव्यु दे और सवाल पूछे.

मैं यहाँ आप लोगो के लिए स्टोरी लिख रहा हु और जो सवाल फोरम से बहार के है वो बहार हे पूछ लो भाई. 🤦
 
अपडेट 220

मकसद (2)

"ऐसा किसका फ़ोन था जो तुम्हे मुझे यहाँ अकेले छोड़ कर जाना पड़ा? और अब मुझमे हिम्मत नहीं है ज्यादा चलने की. शॉपिंग से हे थका दिया.", घर से साड़ी में निकली पालक इस वक़्त एक चुस्त सलेटी जीन्स जो उसके जिस्म पर खाल सी चिपकी हुई पालक के हर कटाव को नुमाया करती थी और ऊपर एक बिना ब्याह का ढीला सा सफ़ेद टॉप पहने किसी कॉलेज जाती युवती से भी कही ज्यादा आकर्षक और जवान दिख रही थी. हाथ में मानगो ice-cream शेक का आधा भरा गिलास पकडे वो अर्जुन को ठीक वैसे हे निहारती लगी जैसे कोई प्रेमिका मुद्दत बाद अपने प्रेमी को सामने देख रही हो.

"आपको तोह कल सुबह से साथ लिए हुए हु और अभी तक आप खुदको अकेला बोल रही है. चाचा जी का फ़ोन था और उन्हें मैंने ये नहीं बताया था की मैं किसी के साथ हु. वही शाम को जो मीटिंग है उसकी डिटेल्स ले रहे थे. और आपसे ये milk-shake हे ख़तम नहीं हुआ अभी तक? चलो बैग्स गाडी में रखता हु, इतने आप ये फिनिश कर लो.", अर्जुन ने उस ice-cream पार्लर के सामने हे कड़ी अपनी काली गाडी की तरफ बढ़ते हुए कहा, दोनों हाथो में ढेरो बैग उठाये. पालक भी उस से कदम मिलती हुई यहाँ आ कड़ी हुई. दोनों के हे चेहरों पर गहरे रंग के धुप के चश्मे उनका गोरा रंग ज्यादा निखार रहे थे.

"तुम तोह चले जाओगे कल..", पालक ने थोड़ा रूठने वाले लहजे में कहने के साथ गाडी का पिछले दरवाजा खोलते हुए अर्जुन की मदद करनी चाही जिसके परिणाम स्वरुप उसकी मजबूत ब्याह पालक के कठोर उभरे हुए सीने से ाची खासी रगड़ खाती नीली. अर्जुन ने जाहिर न होने दिया और वही पालक को इस से कोई फरक हे न पड़ा जो अभी भी अर्जुन की बगल में सत् कर कड़ी थी.

"मैं आज भी जा सकता था लेकिन आपने कहा की रात रुक जाऊ तोह मैंने आपकी बात मान भी ली. दिल्ली मेरा घर नहीं न? लेकिन जब भी कभी फुर्सत मिलने पर यहाँ आना होगा तोह आपसे जरूर मिलने आया करूँगा..", पालक ने बैग जँचाते अर्जुन को ये कहते हुए करीब से देखा जो मिलने आने वाली बात कहते हुए उसके चेहरे को सहलाने के साथ हे दरवाजा बंद करके घरी में समय देखने लगा. पालक ने अब मुँह बनाते हुए उसकी कलाई को थाम कर वापिस मार्किट की तरफ बढ़ते हुए कहा.

"और नहीं तोह क्या? आना हे पड़ेगा तुम्हे नहीं तोह कौनसा मुझसे दूर रहते हो.. एक घर हे तोह बीच में है वह.. कान नहीं खिंच दूंगी उधर आ कर. वैसे तुम्हारे कहने पर मैंने jeans-top पहन तोह लिया लेकिन लोग कैसे घूर घूर कर देख रहे है.", पालक अभी भी जैसे अर्जुन को खींचे ले जा रही थी और वो हँसता हुआ उसके साथ आराम से पतंग सा बंधा हुआ इस डोर से जुड़ा रहा.

"वो घूर नहीं रहे.. देख रहे है की कैसी गर्लफ्रेंड है जो sare-aam अपने बॉयफ्रेंड को धमकाने के साथ ऐसे ले जा रही है जैसे उसको किसी और लड़की से डर हो.. धीरे चलो न प्लीज...", अर्जुन द्वारा ऐसा सम्बोधन सुन्न कर पालक ने आंखें तरेर कर देखा और हलके से उसकी पीठ पर धौल लगते हुए चहकती सी बोली.

"लेके जाउंगी.. अगर ऐसी हे बात है तोह फिर. हाँ और ये ड्रेस भी तुमने हे पहनाई है, फिर नखरे भी झेलो. फिल्म के लिए लेट नहीं हो रहे अब?", अर्जुन अगल बगल में देखने के बाद वापिस पालक पर आया जो आज जितनी खिली खिली दिख रही थी, गुजरे हुए दिन में यही चेहरा बोझिल सा था. कल वो साड़ी में सिमटी हुई सेहमी और उलझी हुई nav-byaahta के वेश में थी और आज किसी आजाद तितली सी अपनी हे रौ में उड़ती मचलती हुई, खिले हुए रंगो से सजी. सामने हे वो सिनेमा था जहा छोटा चेतन 3डी नामक पिक्चर लगी थी और टिकट के लिए उतनी भीड़ भी नहीं.

"वैसे कपडे ाचे लग रहे है लेकिन ये मैंने नहीं पहनाये. बस मेरी पसंद के थे.. आह्हः.."

"तुम.. कितने गंदे हो गए हो तुम बड़े होने के बाद..", अर्जुन की बात का मतलब समझते हुए भी पालक की मुस्कान में कही कमी न आयी बल्कि वो अब शोखी से बाल झटकती हुई वैसे हे उसका हाथ थामे सिनेमा में टिकट काउंटर की तरफ चली आयी. हाँ इस बीच एक और बार अर्जुन की पीठ पर उसका मुक्का लग चूका था और वो उस जगह को मसलते हुए एकटक बस पालक और उसकी मनमानी देखता रहा.

"2 टिकट्स प्लीज.. और सेण्टर रौ के कार्नर की देना, बालकनी वाली. लाओ पर्स ढीला करो.", खिड़की के दूसरी तरफ खड़े युवक को बड़े रौब से आदेश देती पालक ने इसके साथ हे अर्जुन का बटुआ ले कर उसमे से 500 का नोट आगे बढ़ा दिया. यही लड़की कुछ वक़्त पहले तक न कुछ खरीदना चाहती थी और न अर्जुन के पैसे लगवाना उसको पसंद था.

"मम, सबसे आखिरी लाइन की कार्नर सीट है और एंट्री पर हे 3डी ग्लासेज ले लीजियेगा. फ़ूड कोर्ट पर पॉपकॉर्न बॉक्स के साथ कोला फ्री है.", सीट का चुनाव और पालक द्वारा अपने तथाकथित प्रेमी की हालत देखते हुए युवक रहस्यमयी मुस्कान के साथ 2 टिकट और बाकी रुपये पकड़ता हुआ बोलै. दोनों उस जेल से द्वार पर पहुंचे जहा उनसे आगे नाम मात्रा के युवक, जवान जोड़े हे दाखिल हुए थे. अजीब से फ्रेम वाले 2 चश्मे उन देता हुआ सिनेमा कर्मचारी जैसे महानगर में जवान जोड़ो से बेहतर वाकिफ था और बिना कोई प्रतिक्रिया दिए उन्हें भीतर भेज दिया.

"कितना अँधेरा है न अभी से? जानते हो आखिरी बार मैंने सिनेमा में फिल्म कब देखि थी?", भीतर निर्देशित राह पर दोनों पूर्ववत हे आगे बढ़ते हुए सबसे आखिर में जा पहुंचे जहा से वो बड़ी स्क्रीन ठीक उनके सामने थी, जिसको रोशन होने में कुछ वक़्त था. पालक को इस कदर उत्साहित देख अर्जुन ने पहले उसको बैठने की जगह दी और फिर उसकी हे बगल में नरम सोफे सी कुर्सी में जा धंसा.

"पहले तोह हर शुक्रवार और शनिवार को फिल्म के लिए ऐसे उत्सुक रहती थी जैसे वह आप आने वाली हो. दिल्ली आने के बाद जयेश जी ने एक फिल्म भी नहीं दिखाई आपको?"

"हँ.. शादी के बाद तोह सब तुम्हे बता हे दिया मैंने. उनके पास घर आने का हे वक़्त नहीं तोह साथ रहना हे बड़ी बात. वैसे आखिरी बार सिनेमा देखने 4 साल पहले गयी थी और वो भी अकेली नहीं बल्कि मेरी मम्मी के साथ साथ तुम्हारी ताई जी, माधुरी, अलका, कोमल और ऋतू भी थी. हम आपके है कौन लगी थी क्सक्सक्सक्स सिनेमा में अपने शहर. मुझे न बड़े परदे पर फिल्म देखने में अलग हे मजा आता है फिर चाहे वो कैसी भी फिल्म हो.", अब तोह पालक और भी आराम से अर्जुन का हाथ थाम कर उसकी तरफ चेहरा किये कुछ ज्यादा हे खुश थी. अर्जुन अपने दिमाग को रोके हुए सब सेह रहा था बिना विरोध जबकि उसका हाथ पालक के सीने से कुछ निचे मखमली पेट पर वो लड़की खुद दबाये बैठी थी.

"मैंने 3 साल पहले देखि थी, राज मंदिर में जब स्कूल टूर पर हमारी क्लास गयी थी. हाँ मैं आपकी तरह हर फिल्म बड़े परदे पर नहीं देख सकता..", और अर्जुन ने दोबारा द्विअर्थी बात करके पालक को झेंपने पर मजबूर कर दिया. लेकिन उसकी खुदकी हे नजर एक जगह जा चिपकी जब वो बड़ा पर्दा रोशन हुआ. हॉल में अगर 500 सीट थी तोह लोग मुश्किल से 70-75 और उनमे भी अधिकतर सबसे आगे वाली तरफ बैठे थे जैसे उन्हें पता हो की पिछली सीट पर फिल्म देखने तोह लोग आते नहीं. इनसे 2 कतार आगे हे बायीं तरफ के किनारे बैठा जोड़ा मुँह से मुँह जोड़े इस सार्वजनिक एकांत का आनंद लूटने में ऐसा लगा था की उन्हें किसी की परवाह हे नहीं थी. परदे पर रंग बदलते तोह अर्जुन को भी उनकी हरकते कभी स्पष्ट तोह कभी धुंदली सी दिखने लगती.

"तुमने मुझे समझ क्या रखा है जो इतनी देर से ऐसे मजाक कर रहे हो..? मैं गन्दी फिल्मे नहीं देखती.. हाँ कह देती हु.. उधर.. हाय.. ये लोग..", अब अपनी सफाई देते हुए पालक ने भी उस तरफ देखा तोह कुछ हे वक़्त में उसको वो दृश्य नजर आया जिसने अर्जुन को हे मूरत बना दिया था. बड़े परदे के हॉल में यही तोह चूक हो जाती है ऐसे प्रेमी जोड़ो से जो सामने वाले से तोह बचे रहते है क्योंकि पीछे कोई नहीं देखता लेकिन जो उनके पीछे हो वो तोह परदे से गिरती रौशनी में ये सब आसानी से देख सकते है. यही अब पालक देख रही थी हैरानी से और अर्जुन माहौल को समझते हुए अब परदे पर ध्यान देने लगा. उसने पालक का भी हाथ हलके से हिला कर ध्यान भांग किया जो सिमट कर अब अर्जुन के और भी करीब हो गयी. जाने उसको क्या डर था या ये सब अजीब लगता था. इतना तोह जरूर था की पालक को कामकला और अंतरंग पालो से असहजता थी.

"शायद यहाँ के होटल महंगे है और हर इंसान पार्क जैसी जगह का रिस्क नहीं लेता. थोड़ा अजीब है लेकिन आप तोह जैसे डर हे गयी. अब आप एक औरत बन चुकी है और जयेश जी के साथ ये शहर भी उन्मुक्त है. इसके हिसाब से नहीं ढल सकते तोह विरोध करना भी गलत हे होगा. फिल्म शुरू हो गयी है.", अर्जुन ने धीमी आवाज में बात करने के साथ हे उन अजीब से चश्मों से आँखें धक् ली. पालक अब उसको क्या जवाब देती की वो औरत बानी है या लड़की और औरत के बीच किसी राह पर भटकी हुई गुमनाम है. वो हंसी और चुलबुलापन अचानक से कही खो सा गया था लेकिन वो अब अर्जुन की ब्याह पर हथेली लपेटे उसके कंधे पर सर रखे परदे को देखती रही. हर दृश्य इतना जीवंत था जैसे किरदार परदे से बहार निकल आये हो. पर उसको देखने में सिर्फ अर्जुन हे मसरूफ था और पालक अपने विचारो के अंतर्द्वंद में अंदर डूबती गयी.

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"अंकल ऐसा टेढ़ा काम मेरे से तोह न होगा. मैं होटल डिस्को में तोह खूब गयी हु पर कभी अमीर होने की ऐसी नौटंकी न की जिसमे जान का भी खतरा हो. और आप तोह मुझे एक लड़के के आगे पीछे घूमने का काम दे रहे हो वो भी Fire-Shot जैसी जगह पर जहा जाने कितने हे ameer-raees और एक से बढ़ कर एक लोग आते है.", ये कोई 22-23 बरस की आधुनिक सी दिखती युवती थी लेकिन जुबान से कुछ अलग हे जाहिर होता था. एक छोटे से फार्महाउस की छायादार जगह पर 2 कुर्सियों पर आमने सामने बैठे ये दो हे लोग थे. दूसरा इंसान था संजय, किसी shwet-shyaam चलचित्र के अधेड़ रईस और रौबदार व्यक्तित्व वाला प्रभावी इंसान.

"ऐसा है रागिनी बिटिया के इस काम के लिए लड़कियां तोह ढेरो है मेरे पास और वो तोह झट्ट त्यार भी हो जानी उस जगह का नाम सुन्न कर. लेकिन तेरी बात उनसे अलग है और बदले में पूरा 25 हजार मिलेंगे. अब तेरे पास नौकरी भी नहीं है क्योंकि जहा भी तुझे लगवाओ, तेरा गुस्सा सबकुछ खा जाता. शौक तेरे ऐसे बढे हुए जैसे अमरबेल, ख़तम न होते शुरू होने के बाद. रात 10:30 पे तू उस क्लब में घुसेगी वो भी महंगी गाडी, बढ़िया फिल्मी पोषक पहने और जो खर्चा भीतर करेगी वो बोनस. हाँ जो मुद्दे की बात है वो ये है की तूने लड़के एक से एक देखे होंगे पर कोई तेरी टक्कर का न मिला आजतक. ये मेरा भांजा है और अभी लिख के दे दू की तू पानी भर्ती लगे इसके सामने. मैं तोह सोचु था के चल तेरा 2 महीने का इंतजाम हो जे, बढ़िया रहेगी. मेरे भांजे की एक प्रेमिका तोह 5 सितारा होटल की मालकिन है और वो तोह उसको हे ले जाने वाला था पर मामला ऐसा है की इसमें जो लड़की शामिल हो, वो कुछ दिन नजर न आये. अब तुम्हे नहीं करना तोह कोई बात नहीं, इस से आधे पैसो में ढेरो तैयार बैठी है.", पतली टहनियों से बने उस मेज पर से पानी का गिलास उठा कर संजय ने घूँट भरी और उसकी विस्तार से बताई पूरी बात सुन्न कर रागिनी की बड़ी बड़ी आँखें अलग हे चमक उठी. छरहरे सांवले शरीर की रागिनी का पहरावा भी काम नहीं था. कानो में बड़े बड़े रंगीन बाले, ढीले गले का बिना ब्याह वाला झालर सा टॉप और जीन्स की चुस्त निक्कर में उसका baal-viheen चिकना सुत्वा जिस्म अलग हे छटा बिखेर रहा था.

"पहले न बोली अंकल ये पैसे वाली बात? 25 हजार और क्लब का खर्चा भी माफ़ होने के बदले तोह मैं आपका भांजा अपनी गॉड में बैठा लुंगी. अब जरा पूरा किस्सा समझा दो और जब इतना कर रहे हो तोह ड्रेस के पैसे न खरचवाने वाली मैं आपसे. एक बढ़िया party-wear तोह आज तक संभाले राखी है मैंने. 8 हजार की ली थी लेकिन मौका न मिला और कंगाली तोह आपके सामने हे है. खतरा ज्यादा न हो बस.", अब संजय चौधरी दबी मुस्कराहट देते हुए रागिनी के लिए कोला खोल कर उसमे बर्फ की 2 डाली डालने के बाद उसको पकड़ते हुए बताने लगा.

"खतरा तोह सड़क पर पैदल चलने में भी है और बिस्टेर पर सोने में भी. बिना खतरे के कोई ज़िन्दगी है क्या लाड़ली? हाँ पर तुझे खतरा मोल न लेना. 10:30 पे तू क्लब जायेगी, थोड़ा झूमेगी और अपने वो rang-birange जाम उतने हे पीने है जितने तुझे पूरे होश में रख सके. तेरी गलती से किसी और की जान जरूर जोखिम में पड़ सकती है. 11 बजे मेरा भांजा वह दाखिल होगा, जिस से तुझे मैं पहले हे मिला दूंगा लेकिन बातचीत क्लब में हे होगी जिस से नाटक असली लगे. तू उसको रिझाएगी और ये मेरे समझने से बेहतर तू खुद हे कर सकती है. असली मुद्दा है की वो तुझे घास नहीं देगा जिसके बदले तू उसका गाल चूम कर दोबारा कोशिश करना और फिर पाँव पटकती हुई अपनी महंगी गाडी में बैठ निकल जाना. उसका ड्राइवर मैं हे रहूँगा और तुझे तेरे पैसे दे कर घर छोड़ दूंगा. आधा घंटा तू अपनी मौज करेगी और 15 मिनट मेरे भांजे के सामने. फिर न तू उसको जानती और न वो तुझे. बस इतने काम के बदले लगभग 30 हजार. जैसा बताया है इसमें थोड़ा सा भी अपनी तरफ से बदलाव करने की गलती न करना बिटिया वर्ण पैसे तोह जाएंगे हे बदले में तेरे सर के ऊपर मेरा हाथ भी न रहने वाला.", सब सुनती हुई ये सांवली सी कामुक कन्या सर हिलती गयी लेकिन आखिरी बात पर थोड़ा हैरानी से देखने लगी संजय को.

"अंकल मैं 15 की थी तब आपने गॉड लिया था और आज 24 की हो गयी लेकिन आपने आज से पहले इतनी बड़ी बात न कही कभी. जितना मैं जानती हु ये भांजा आजकल में हे पैदा हुआ है और उसके लिए आप मुझे ऐसा बोल रहे हो? ज्यादा लाडला न हो गया ये कल का बना भांजा.", रागिनी के तुनकने पर संजय भी बदले में हँसते हुए बोलै.

"लाडला तोह वो अब बना है बिटिया लेकिन भांजा वो आज या कल न बना. जब पैदा हुआ था तभी से रिश्ता है जो अब इतना गहरा है की एक बार को तोह मैं दिल्ली के शहसवारो की नींद हराम कर दू. जा तू तैयार हो ले अपने फ्लैट पे, एक घंटे बाद लेने आता हु तुझे. एक घंटा मतलब एक और ध्यान रखियो की इस बार मैं कह रहा हु की तू जितनी बिंदास और रईसी का नक़ाब ओढ़ सकती है, तैयार हो और जलवे ऐसे की नकचढ़ी रीसियों की रईसी फीकी लगे.", संजय ने इशारे से अपने एक बंदूकधारी को करीब बुलाते हुए रागिनी को आदेश दिया जिस पर वो अब कही खुल कर मुस्कुराई. वो लम्बा चौड़ा व्यक्ति अदब से वह आ रुका.

"बिटिया को इसके घर ले जाओ और बड़ी गाडी से जाना. एक घंटे बाद मैं उधर हे आने वाला हु, अपनी लंगर ले कर. सबको बोल दो के काले शीशे वाली तीनो गाडी एक साथ निकलेंगी और सब अपनी वर्दी पहन ले.", स्नजय के ऐसे हुकुम की सर हिला कर स्वीकृति देता वो व्यक्ति रागिनी के साथ हे निकल चला. मेज पर रखा फ़ोन भी सही समय पर बजा जब संजय अकेला रह गया था. एक बार उभरे नंबर और फिर जाते हुए उन दोनों को देख कर उसने हरा बटन दबा दिया.

"हाँ जीजी, के ज्ञान?", दूसरी तरफ सुशीला थी संयोग से और उसके सामने संजय जैसे तहजीब की अलग हे चादर ओढ़ लेता था. दुनिया में बस एक सुशीला हे थी जिसके सामने वो झुकता था और उस से कही ज्यादा अपनी बड़ी बहिन से प्रेम था संजय को. 48 बरस राखी बंधवाई थी पैदा होने से अब तक और वही एक इंसान थी जो उसके करम की बजाये साफ़दिली और सही के साथ चलने को तवज्जो देती थी.

"ज्ञान तोह तू रेहान हे दे भगोड़े.. कत्थे (कहा) खड़ा खोदे बैठा से?"

"हाहाहा.. घनी भडकन का दिखावा करे है लेकिन मैं केहवे से के तू भोत खुश से जीजी. मैं आड़े हे दिल्ली अपने फार्महाउस पे सु, तू तेरी सुना. बिजेन्दर और बबिता बिटिया के ज्ञान? सुखशांति से?", यहाँ संजय भी जैसे अपनी इस बड़ी बहिन को गहराई से जानता था चाहे रिश्ता सागा न सही लेकिन चचेरे bhai-behno में इन दोनों की हे आपस में सबसे गहरी जमती थी. उसकी बात सुन्न कर सुशीला ने भी हंसी का बांध खोल दिया.''

"जमा ढीठ से.. हाहाहा.. काल फ़ोन लगाया था तेरा लेकिन बंद आवे था नहीं तोह पहले हे खबर दे देती. तू दोनो बालक (बचो) कानि नाना बनेगा. बबिता का तोह थोड़ा बेरा था पर ेब पक्का हो गया के महीना हो लिया. बिजेन्दर की घरवाली का भी काल जी मिचलावे था आरर टेस्ट में पेट से होने के पुष्टि हो गयी. ेब तलाक (तक) मैंने यु बात किसे से न बताई क्यूंकि सबसे पहला तन्ने बेरा होना जरुरी है. बबिता ने लेके आयी थी आज आरर अनुपमा ने छोड़ के आयी हु उसकी दादी धोरे.", ये खबर सुन्न कर संजय तोह जैसे ख़ुशी में उछाल हे उठा. वो किसी बचे की तरह कुलांचे भर रहा था और उसके जोश को सुन्न कर सुशीला हंसती हुई दोहरी हे हो गयी.

"कुंण है माँ.? संजय मां से के? ओह मां.. दत्त जा.. के ज्ञान से तेरे? कड़े भांजी से भी बतला लिया कर या मेरा ब्याह होये पाछे तू सरक लिया?", बबिता की खरी बात सुन्न कर एक पल में हे संजय वापिस कुर्सी पर आ बैठा, पर वो अभी भी खुश था.

"जी खुश कर दिया रे लाडो तेरी माँ ने ऐसी खबर सुना के.. तेरा बालक पक्का छोरा हे होवेगा आरर जमा मेरे जीजा बर्गा खागड (सांड). बिज्जू का भी जान के ख़ुशी हुई के वो बाप बनेगा आरर जीजी दादी लेकिन तेरी सुन्न के दिल ने ठंडक पड़ गयी बबिता.", अब सुशीला तोह जानती थी की उसकी बेटी की कोख हरी करने वाला शक्श कौन है पर बबिता को ये चुभा क्योंकि उसने खुद हे अपने मां से अर्जुन के ख़ास होने की पुष्टि की थी बेशक अंतरंग सम्बन्ध वो बयान न कर सकती थी.

"बापू पे तोह कटाई न जाता मां आरर मैं चहु भी कोणी के वो ऐसा बने. हाँ तेरी खागड ाली बात पे तोह इतना कहूँगी की छोरा होया तोह उसकी टक्कर में बस उसका बाप हे होवेगा जो मेरे बापू से तोह हर मायने में ऊपर से. तू कद्द तक रंदा रावेगा? ले आ कोई मामी, उम्र तोह थोड़ी बाकी से तेरी.", बबिता के ऐसे जवाब पर संजय तोह स्तब्ध सा रह गया लेकिन सुशीला अपनी बेटी के सर पे चपत लगाती हुई हंसती हुई 5 मिनट का इशारा दे कर आँगन में चली गयी.

"मैं तोह भगत आदमी सु बिटिया पर तन्ने गोलू इतना भय के तू उसकी तुलना में अपने बापू ने घात समझे है? बलद (बैल) की नाद (गर्दन) जूड़े से खिंच के निचे बिठा दिया करते जीजा. सवा 6 कद्द था उनका जिसका नतीजा तू और बिजेन्दर हो. मैंने तोह अपने भांजा भांजी बरगी औलाद न दिखी और बिजेन्दर से कमतर गोलू तन्ने इतना ख़ास लाग्या.?", अब बबिता खिलखिला उठी ये सुन्न कर और फिर एकदम हे उसका भरा भरा गोरा मुखड़ा हल्का गुलाबी हो चला उस नाम को बस याद करने भर से.

"गोलू न टिकता उसके सामने मां आरर तू केहवे है न के बापू जेवड़ी घायल के बलद निचे बैठा दिया करता... अर्जुन एकला समार दे भाई और गोलू बर्ज 15-16.. सुदर्शन लावे (के पास) तोह कोई न लागे करता पर वो भाई आज फेर चालान फिरन सीखें लाग रहा. इंसान अपने आप टी काबू में राखे है इसका मतबल यु कोणी के वो घात से. तू तोह अर्जुन के ाचे संपर्क में है फेर भी भूल गया के तेरी भांजी का एकलौता प्यार आजतक तोह वही से आरर ाँ वाले टेम में महारी औलाद शामिल होगी. गोलू बढ़िया इंसान है और मैंने पसंद करे है इस खातिर ब्याह कर लिया. चाहत तोह जो बन गयी सो बन गयी.. मकसद थोड़ी से जो बदल जे गए? किस्मत बढ़िया होई तोह तू भी उसके जलवे देख लेगा आरर कड़े गलती कर बैठ्या तोह जिसने तू जेवड़ी बंधी बलद समझे है वही अर्जुन मिनट में दिल्ली जयपुर बराबर कर देवेगा..", संजय तोह स्वयं हे अर्जुन को पसंद करता था उसके निर्मल और मिलनसार स्वभाव की वजह से. लेकिन सुदर्शन वाली बात तोह उस से भी छुपा कर राखी गयी जिसको सुन्न कर उसके माथे पर बल पड़ गए और अपनी भांजी का ये स्वीकारना की उसकी चाहत सिर्फ एक हे है और वो अर्जुन. सुशीला भी सूखे कपडे वही ला कर समेटने लगी. बहार अँधेरा हो चूका था और चंद्रो देवी आँगन में अपनी बाकी दोनों बहने के पास जा चुकी थी अपने कक्ष से निकल कर.

"के केहवे है बेटी तू? और इस तरिया बोले है जैसे बहादुरी का काम करिया हो.. जीजी काट देगी तन्ने बेशक अर्जुन ने सिर्फ फटकारे.."

"कर ले बात अपनी जीजी से.. उसने तोह ेब ज्यादा हे लाड ाँ लाग गया क्योंकि जोड़ी उसने हे ख़ास लगे है मेरी और उस बावले अर्जुन की.. ले माँ.. मैं चाली दादी धोरे.", बबिता संजय को हतप्रभ छोड़ फ़ोन सुशीला को देती हुई निकल गयी बहार जहा सुलतान संग खेलना उसको ज्यादा उचित लगा.

"सब सुनो थी आरर या बात बबिता ने भी तन्ने हे बताई है संजय क्यूंकि किसी और ने पता कोणी लेकिन तेरे कान में होनी जरुरी है. मैंने स्वीकार है क्योंकि दोनो राजी थे आरर वो ख़याल करना भी जाने है बबिता का. कोई न जानता आरर गोलू खुश है अपनी औलाद का सुन्न के. वैसे भी तू खुद जाने है तेरी भांजी ने जो ठान लिया सो ठान लिया. तू सुना तेरी कोई बात हुई के अर्जुन से? शंकर के गहरा भी गयी थी तोह बेरा लाग्या के वो दिल्ली गया होया. सोच्या के तन्ने बैरा होगा.", अब माँ और बेटी को हे जब सबकुछ स्वीकार था तोह संजय ने बात को खींचना उचित न समझा लेकिन कही न कही वो असहज सा महसूस करने लगा था के वो kam-umar लड़का इतना प्रभाव बना गया की अनैतिक सम्बन्ध तक एक माँ को स्वीकार थे अपनी बेटी संग.

"न जीजी.. मैं तोह आप थोड़ा व्यस्त था पुराने केस आरर तारीख करके. दिल्ली से बहार जाना फिलहाल तोह मन है पर दिल्ली रह के भी मैं ख़ास बहार न निकलता. अर्जुन किसे के साथ आया होगा जिस करके बात न करि उसने. जे फ़ोन आया तोह मिल लूंगा. वैसे बिजेन्दर का मामला तोह साफ़ से?", अब शंका जाहिर करि तोह सुशीला ने हँसते हुए उसकी खिंचाई कर दी.

"हाहाहा.. बावले.. बड़ा भाई है वो अर्जुन का आरर अनुपमा का हमेशा से प्यार तेरा बिज्जू हे है. अर्जुन तोह अपनी भाभी गइल ज्यादा मजाक भी न करता. हर आदमी लंगोट का कच्चा न होता संजय.. वो रिश्ते बिगड़े होये जोड़ सके है, तोड़ने के काम न करता. बिजेन्दर का भी प्यार बहोत है अपने छोटे भाई से. चाल तू भी थोड़ा आराम कर ले, मैं भी चूल्हा देख लू थोड़ा. तेरा चक्कर लागे तोह हवेली हे आ जाइये, बालक खुश होवेंगे के मां मिलान आया."

"जी जीजी.. ेब तोह 3-3 ख़ुशी सुना दी तोह आना बने हे है. वैसे मैंने कोणी बेरा था के यु लाडला (अर्जुन) दिमाग के साथ साथ सोच से भी ज्यादा तगड़ा है. मजबूत दिल तोह है और तगड़ा भी लेकिन समीकरण बदल से दिए इसने तोह. चाल राम राम.. भगवन सदा खुश रखे परिवार ने.", संजय अपनी जगह से उठा तोह कुछ नजर हे न आ रहा था, शायद बिजली चली गयी थी या बत्तियां जलने वाले चौकीदार ने गौर न किया.

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साड़ी में लिपटी हुई पालक दरवाजे पर ृक्क कर अर्जुन को एक और बार निहारने के बाद वापिस भीतर चली गयी. दोनों हाथो में आधा दर्जन कपड़ो के बैग थे और चेहरे पर अलग हे नूर. उसका स्वागत सोनाली ने हे किया था और हाथ हिला कर अर्जुन को विदा भी किया जो शिक्षा निचे करे अभी भी पालक को हे देख रहा था. मुस्कुराते हुए जवाब दे कर वो यहाँ से आगे बढ़ चला, घरी पर पूरी नजर रखे. आज का लगभग पूरा हे दिन उसने पालक को दिया था जिसके कारण वो इतनी खुश और खिली हुई थी. खामोश गलियों से निकलता हुआ वो अपनी मंज़िल पर पहुंचने के लिए चकाचोंध सड़क पर आ पंहुचा. हर तरफ तेज रफ़्तार वाहन और भीड़ का हुजूम जैसे सबको अपनी मंज़िल पर पहुंचने की जल्दी हो. इन लोगो के लिए रोजमर्रा की जीवनशैली थी पर अर्जुन इन्हे देख कर फीकी मुस्कान देता अपने सेहर को याद करने लगा. वह न भीड़ थी और न ऐसा व्यस्त जीवन. एक सेक्टर से दूसरे के बीच अक्सर खामोश सड़के और सिवाए मुख्या मार्किट के हर जगह खुला वातावरण. बड़ी हे सहज और साफ़ ज़िन्दगी थी उसके शहर में और ज्यादातर लोग आपस में एक दूसरे को जान ने वाले.

"कहा पहुंचे भांजे? मैं ठिकाने पर पहुंच चूका हु और सब तैयारी भी हो चुकी.", चलती गाडी में फ़ोन उठाने का दिल नहीं था इसलिए पार्किंग लाइट जला कर अर्जुन ने फ़ोन उठाया. ये संजय मां हे थे दूसरी तरफ.

"क्सक्सक्सक्स जगह हु मां जी अभी और यहाँ से 10 किलोमीटर आने में 15 मिनट भी लग सकते है और 20 भी. वैसे भी ज्यादा समय नहीं है और आपने जब तयारी कर हे दी तोह मुझे क्या जांच करनी? बस आपकी ये पहचान वाली थोड़ी समझदारी दिखाए उतना हे काफी है. आता हु.", अर्जुन ने इतनी सी बात करने के बाद वापिस गाडी अपने रस्ते बढ़ा दी. कही लालबत्ती पर पीसीआर कड़ी थी तोह कही सड़क किनारे एक से बढ़कर एक पहरावे में चहलकदमी करती खूबसूरत बलाये नजर आती. गाडी यहाँ कुछ धीमी थी और इस चौक पर रुकते हे उसकी नजर बगल वाली गाडी पर पड़ी. वही 4 चले वाली महंगी कार जिसके आगे भी एक बड़ी गाडी थी और पीछे भी. जिस मंज़िल पर वो पहुंचने वाला था उसका मकसद हे बगल में देख वो गहरे शिशु से हे उस बाला को देखने लगा जो उलटी तरफ वाले स्टीयरिंग की इस कार में बैठी किसी गाने की धुन्न पर हिल रही थी. 2 लोगो के बैठने के लिए बानी ये विदेशी कार जितनी आकर्षक थी उस से कही ज्यादा तोह उसकी मालकिन थी. अभी वो कुछ देर और देख पता की बत्ती हरी होते हे वो गाड़ियां हवा से बातें करती हुई ऐसे निकली जैसे उन्हें न पुलिस से वास्ता हो न नियम से कोई लेना देना.

'ओह बाप रे.. आग से चलती है क्या ये गाड़ियां..? चलो ये भी झेल लेते है.', समय 9 से ऊपर था और गाडी आगे बढ़ाते हुए अर्जुन अब सिर्फ सामने नजर किये था. कही बहुमंज़िला इमारते, रोशन बड़े बड़े होटल और कही laal-batti वाली गाड़ियों का गुजरना. लाल बत्ती वाली गाडी ने जन्नत का चेहरा हे दिखा दिया और एक बार फिर से एक दिलकश मुस्कान उसके चेहरे पर बन उठी.

'मिलता हु तुमसे भी जल्दी हे जानू जी. इस बार आपको ाचे से सताऊंगा..", अर्जुन ने अगला चौक पार किया हे था की एक तरफ से 4 बड़ी गाड़ियों ने उसके आगे पीछे कतार हे बना ली. उसकी ऊँची काली गाडी अब अपने आप में हे जैसे ख़ास हो चली ऐसी अनोखी सुरक्षा में. पीछे वाली गाडी ने 2 बार बत्ती झपकाई तोह आईने में उसके ड्राइवर को देख अर्जुन ने भी हाथ हिलाया. ये उसके उमेद चाचा का भिजवाया काफिला था. अगले 20 मिनट ये काफिला ऐसे हे उसके आगे पीछे रहा जबतक ये लोग मुख्या रस्ते से उस तरफ न मदद चुअल जिधर अर्जुन ने उन्हें इशारा दिया था इंडिकेटर से. चारो गाड़ियों से एक भी व्यक्ति न निचे उतरा और अर्जुन भी एक घंटे बाद बहार निकला तोह पहरावे के साथ हे उसकी chaal-dhaal भी बदल चुकी थी. महंगे विदेशी जूते, बाल ऐसे सँवारे हुए जैसे ख़ास कारीगरी की हो और घुटनो से हलकी उधड़ी हुई जीन्स के साथ जिस्म के ऊपरी हिस्से पर आधी ब्याह का सफ़ेद आसमानी ख़ास कमीज. कलाई पर आकर्षक और बेशकीमती घरी पहने वो एक बार फिर से गाडी में सवार हो चला. बदन से उठती ख़ास परफ्यूम की महक ने गाडी को हे भर दिया. अब मंज़िल थी Fire-Shot नामक वो क्लब जो अपने आप में अलग दुनिया था. आगे चलती 2 सफ़ेद लम्बी कार और ठीक वैसी हे पीछे. जल्द हे ये लोग अपने ठिकाने आ पहुंचे जहा भरी पूरी चकाचोंध मार्किट लांघने के बाद एकाएक निर्जन से हिस्से के बाद उम्मीद से भी लम्बी चौड़ी पार्किंग और एक बड़े नीले चमकते बोर्ड के बीच laal-narangi अक्षरों से अंकित था 'Fire-Shot'. महंगी गाड़ियों के साथ ढेरो देसी विदेशी मोटरसाइकिल तक अपने निर्धारित क्षेत्र में खामोश खड़े दिखे. Laal-safed रंगीन छड़ी लिए क्लब के सुरक्षा कर्मी जहा लोगो को गाडी लगाने की जगह दिखा रहे थे वही walkie-talkie लिए घूम रहे सफ़ेद कमीज और काली पतलून पहने ख़ास अंगरक्षक हर किसी पर नजर रखे थे और उनकी नजर रुकी भी तोह इस करो के काफिले पर जो मालिकाना स्थान पर आ रुका.

'आ गया कोई मंत्री का लौंडा. ऐ रोबिए, देख जरा कौन नवाब आया है.', ये चौड़े कंधे वाला 6 फुट ऊँचा लेकिन आकर्षक चेहरे मोहरे वाला व्यक्ति जैसे सुरक्षा प्रमुख था और वो अपनी मालकिन की गाडी के बराबर आ रुकी उस काली गाडी को देख तुरंत हरकत में आया. उसके कहने भर से 2 लोग अर्जुन की गाडी की तरफ लपके जिन्हे उमेद के ख़ास ने हाथ से वही रुकने का निर्देश देने के बाद अर्जुन के लिए दरवाजा खोला. अपने से भी लम्बा और तगड़ा युवक देख कर दोनों पलट कर अपने प्रमुख को देखने लगे और गाडी का दरवाजा बंद करके अर्जुन अपना चस्मा घूमता हुआ सीधा नीचे जाती सीढ़ियों पर बढ़ गया.

"यहाँ गाडी कड़ी करना मन है दोस्त फिर चाहे कोई मंत्री की औलाद हो या खुद मंत्री. मेरा नाम रसूल है और यहाँ की सुरक्षा प्रमुख मैं हु. वो गाडी जिसका रास्ता तुम्हारे मालिक ने बंद किया है वो हमारी मैडम की कार है. इसको यहाँ से चलता करो और चाहो तोह उस तरफ मैं कड़ी करवा देता हु. मैडम की नजर कैमरा से बहार भी रहती है और उन्हें जरा भी पसंद नहीं की कोई उनकी मर्जी बिना ऐसा कुछ करे जिस से वो नाराज हो.", शारीरिक भाषा से रसूल सीधा अकड़ कर खड़ा था और उसके अगल बगल हे 6 लोग आ पहुंचे जो उसकी टीम से थे.

"हमारे ये छोटे बाबा है न इन्हे तोह अपनी गाडी के हाथ लगाने वाला हे कोई पसंद नहीं. तुम्हारी मैडम कुछ कहे तोह बात करवा देना दोस्त. हम अपनी गाड़ियां हटा लेते है इधर से लेकिन बाबा की गाडी जहा है वही रहेगी जबतक वो खुद इसको न हटाए. वो पिस्तौल का होल्स्टर ढीला है जिसमे क्सक्स 09 ठीक से समां नहीं रही. गाड़ियां सामने लगाओ बे.", अपने आदमियों को थोड़ा ऊँची आवाज में चारो कार वह से हटाने का आदेश दे कर ये तोह ऐसे निकला जैसे उसको भी किसी की परवाह न हो. रसूल ने गौर किया तोह सभी कार के नंबर 0404 हे थे, उस काली वाली के भी. जबड़े भींच कर वो कुछ बोलता उस से पहले रोबिए ने हे गुस्सा शांत करने की कोशिश की अपने बॉस का.

"बॉस, लफड़ा नहीं करने का इनके साथ. सैटरडे नाईट मैडम बिजी होंगी और कोई मोती पार्टी है तोह बेवजह क्लब का नाम आएगा कल अखबार में. साले 8 है और सबके पास अपने जैसे लाइसेंस वाला असला. वैसे ये पहला अमीरजादा नजर आया जो अपने सिक्योरिटी वालो से हे तगड़ा है.", रोबिए की बात पर भी रसूल उन्हें हे घूर रहा था जो अब अपनी अपनी कार एक कतार में क्लब के सामने इनसे उचित दुरी पर कड़ी करके लोहे की ग्रिल पर जा बैठे थे. सभी चौकस थे और ऐसे हे हट्टे काटते जैसी सामने वाले.

"तू नहीं जानता बे मैडम मुझे कितना मानती है. उन्हें बहार सड़क पे चलता कोई देख ले तोह मैं खाल खिंच लेता हु उसकी और 3 को तोह ऊपर भी पंहुचा चूका जो खुद को तीसमार खान समझते थे अपने बड़े बाप की वजह से. इन सबको पेलने में मुझे एक मिनट नहीं लगेगा पर ये बहार के है और इनकी जानकारी भी नहीं. क्या पता जानकार हो मैडम के. फ़ोन का इन्तजार करते है उसके बाद देखेंगे इनका क्या करना है.", इन सबसे दूर अँधेरे में गाडी रोके बैठा संजय सबकुछ देख कर बस मुस्कुरा रहा था जबकि क्लब के भीतर तोह हाल इस से उलट गरम और रंगीन था.

द्वार पर खड़े तगड़ी डीलडोल वाले व्यक्ति को पैसे दे कर भीतर पंहुचा अर्जुन चेहरे पर कोई हैरानी लाये बिना कानफोड़ू संगीत पर थिरकते हुए लोगो से कुछ दुरी पर उस मयखाने के सामने लगे लाल चमकते सोफे पर जा बैठा. अँधेरे में घूमती लाल, नीली, हरी रोशनियों के बीच अनगिनत जवान लड़के लड़कियां ठुमक रहे थे. कुछ जोड़े गोल ऊँची मेज पर बैठे जाम टकराते हुए सिग्रत्ते के काश भी लगाए जा रहे थे और शराब के उस 20 फ़ीट लम्बे काउंटर पर आधा दर्जन खूबसूरत फिरंगी लड़कियां आर्डर लेती उन्हें अपने ख़ास अंदाज में कभी बोतल उछाल कर तोह कभी जाम के ऊपर आग लगा के पेश करती. रौशनी से चमकता वो स्टेज कभी जगमग होता कभी कला.. जिसके बहार भी लोग कमर हिलाते हुए लिपट कर नाच रहे थे या लड़कियां आपस में हे हाथ पाँव हिलाती हुई थिरक कर जोश दिखती रही.

"वोउल्ड यू लिखे तो हैवे सम स्कॉच यौंगमान?", ये एक खूबसूरत सी अधेड़ महिला थी जो न्यास हे अर्जुन की बगल में आ बैठी. जिस्म पर एक हे परिधान था जो जांघो पर आते हे समाप्त और गले से एक तिहाई गुब्बारे जैसी बड़ी चूचियां बहार निकल कर जैसे अर्जुन से मिलने को आतुर हो. पसीने में भी ख़ास परफ्यूम की गंध और चेहरे की चमक ऐसी जैसे वो नवयौवना हो.

"No थैंक यू.. ी don't ड्रिंक. बूत ी मस्ट एक्सेप्ट तहत यू अरे किते चार्मिंग.", अर्जुन द्वारा इंकार के साथ तारीफ करना और उसकी तरफ घूम कर बैठना हे इस महिला को भ गया.

"हाहाहा.. तुम यंग लोगो को मेरे जैसी बूढी भी ाची दिखती है? वैसे तुम्हे पहले नहीं देखा यहाँ और मैं हर सैटरडे यही होती हु. ड्रिंक नहीं करते और डांस करने की जगह ऐसे अकेले बैठे हो."

"सुना है इधर के मॉकटेल्स बहोत फेमस है. और आप सबको हे पसनद आएँगी. देखिये वह वो लड़का आपको हे देख रहा है.", उस युवक को इधर देखता प् कर अर्जुन ने जैसे हे ये बात बताई वो महिला खिलखिलाती हुई उठ कड़ी हुई.

"सॉरी.. भूल गयी थी की मेरा बीटा साथ आया हुआ है. जेलस फील नहीं करवाना चाहती उसको. हैवे ा नीस टाइम.", अर्जुन ने भी सर हिलाते हुए विदा कहा और यहाँ से उठ कर काउंटर के सामने वाली मेज पर जा बैठा. वो इस जगह का भूगोल देख रहा था लेकिन इस तरह से जैसे किसी को ये नजर ना आये. काउंटर पर कड़ी खूबसूरत बाला से अपनी कही मोचतेल बनवाते हुए वो सर ऐसे हिला रहा था जैसे उसने अर्शी को कार में बैठे हिलाते देखा था. टिप में 500 के 4 नोट उस हरी आँखों वाली सुंदरी को देने के साथ ठन्डे मीठे पेय की चुस्की लेता वो झूमता रहा और तभी एक 6 इंच की काली स्कर्ट और ब्रा से कुछ लम्बा टॉप पहने थिरकती हुई ये खूबसूरत बाला अर्जुन के सामने आ कड़ी हुई. गिलास को उसके हाथ से ले कर बड़ी अदा से उसका हाथ पकडे वो उसको अपने साथ हे उस रोशन अँधेरे में ले चली जहा बाकी हुजूम दुनिया से बेपरवाह बस थिरक रहा था, नशे और संगीत में चूर. कुछ वक़्त के लिए जैसे अब अर्जुन ओझल हे हो चूका था.

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"ये ब्लैक मेरे से जो उतरा था उसको जानते हो रसूल?", क्लब के हे किसी हिस्से में इस आलिशान ऑफिस जैसी जगह पर नरम सोफे पर अधलेटी सी ये अनोखी और खूबसूरत हसीना दरवाजे से भीतर बुलवाये गए अपने suraksha-pramukh से बड़ी हे नरमी से पूछ रही थी. आज उसके बालो का रंग कुछ नीला और कला था, लाल की जगह. चमड़े की स्कर्ट और बिना ब्याह की ढीली से कमीज जिसके ऊपर के 3 बटन खोले वो आराम से सोफे की पुष्ट पर सर टिकाये अपने गोर पाँव आपस में उलझाए थी.

"जी मैडम पता नहीं वो कौन है लेकिन मेरे मन करने के बावजूद उसके साथ आये सिक्योरिटी वालो ने उस लड़के की गाडी हटाने से इंकार कर दिया. बाकी 4 मेरसेदेज़ तोह उन्होंने सामने की तरफ सलीके से लगा भी दी लेकिन उनका कहना है की बाबा की गाडी को सिर्फ वही हाथ लगा सकते है. आप कहे तोह मैं.."

"नहीं.. जब करना चाहिए था तभी ठीक रहता. दम बाद में दिखने से वो बदला ज्यादा लगता है और उसका मतलब हुआ की एक बार तुम हार चुके हो जो बदला लेने आये. अंदर वो आया तोह काउंटर पर उसने बिना एंट्री रेट पूछे ाचे पैसे पकड़ाए और ये देखो जरा बार पर उसने एक 400 वाली ड्रिंक के 5 गुना ज्यादा पैसे दिए. शैली से कहो जरा रिझाये इस कबूतर को जो बाप के पैसो पर ज्यादा हे उछाल रहा है. वैसे तुम्हे लड़का कैसा लगा? बड़े गौर से देख रहे थे तुम उसको जब वो तुम्हे किनारे करता हुआ अंदर चला आया?", रसूल अपनी मैडम की मीठी झिड़कियों से शर्मसार हे हो चला लेकिन अर्शी सहाये ने उसकी बेइज्जत्ती भी नहीं की थी.

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(अर्शी सहाये)

"कहना तोह गलत लगेगा मैडम लेकिन आपको देखना चाहिए था इस लड़के को. वो जो फोरि saaj-sajja करके यहाँ अमीर लड़कियां देखने आते है न, ये उनके जैसा तोह कही से भी नहीं है. वो गाडी से उतरने के साथ अंदर भी ऐसे आया जैसे यहाँ का मालिक हो. सिक्योरिटी पे भी चारो गाड़ियां एक हे नंबर की और शामे मॉडल है मेरसेदेज़ का. आप मिलना चाहे तोह मैं सन्देश पहुचौ?", अपनी मालकिन को खड़े होते देख रसूल ने नजरे हे झुका ली. समतल जिस्म के बावजूद अर्शी के कटोरे से गोल स्टैनो की खाई बेपर्दा जो थी और स्कर्ट के भीतर शायद हे दूसरा वस्त्र हो. फीकी सी मुस्कान देती हुई अर्शी खुद हे उस टेलीविज़न की तरफ बढ़ गयी जो नाचने वाले हिस्से पर टिका था. एक लड़की अर्जुन का हाथ पकडे कुछ कह रही थी और उसके बाद होंठो को चूमने लगी तोह लड़के ने हाथ दोनों चेहरों के बीच रख दिया. पाँव पटकती हुई वो लड़की (रागिनी) झल्ला कर कुछ बोलती हुई बहार निकल गयी.

"दिलचस्प इंसान है और इसके मसल्स तोह देखो रसूल... तुम्हारी गर्दन तोह ये आराम से मरोड़ सकता है अगर थोड़ा भी लड़ना जानता हो जो की लगता नहीं इसको देख कर. चमकती चीज हीरा होती तोह कांच आसमान में लगते. शैली से कहो की वो इसको यहाँ ले कर आये. देखे जरा इसकी जेब हे भारी है या हाथ भी. तुम बस मेरे फ़ोन का इन्तजार करना और अगर टिल में तेल न दिखा तोह जैसे हमेशा करते हो वैसे हे इसके साथ इसके वेटर्स भी हटा देना.", घूमने वाली आलिशान कुर्सी पर बैठ कर अपनी उलझी जुल्फों में उँगलियाँ फिराती हुई अर्शी एकटक अर्जुन को हे देखे जा रही थी जो कमीज के 2 बटन खोल कर पानी के घूँट भरते हुए दोबारा सर हिलता हुआ संगीत का मजे लेते हुए उस स्टेज पर उड़ते धुंए के बीच नाचने वालो को हे निहार रहा था. रसूल बिना आवाज दरवाजा बंद किये जा चूका था.

'एक घंटे में 3 लड़कियां और 2 लेडीज.. नॉट ा बाद स्कोर कैसानोवा.. बूत ी डाउट यू.. यू किन्दा लॅक मनलिनेस्स.. उम्म्म .. रोल रोल.. ahaahannn..ahhaann..', कैमरा से वो रसूल को भी देखती रही कोई गीत गुनगुनाती हुई. वही हरी आँखों वाली लड़की एक तरफ कोने में रसूल के चेहरे के करीब कान किये उसका सन्देश सुन्न रही थी. रसूल के ओझल होते हे वो भीड़ को लांघ कर अर्जुन से कुछ कहने लगी जो हैरान सा सब सुन्न ने की कोशिश करता दिखा. दूसरी बार लड़की ने ठीक रसूल वाले अंदाज में उस kaan-fodu संगीत को ध्यान रखते हुए अपनी बात कही और वो दोनों लोग एक अलग दिशा में बढ़ गए. अब वो भी कैमरा में नहीं थे.

"वेलकम शुगर बेबी.. वेलकम तो अर्शी Sahaye's नेस्ट.. कहा के राजकुमार हो? शैली, लीव उस फॉर ा व्हिले एंड पूत तहत दो नॉट डिस्टर्ब सिग्न आउटसाइड माय दूर." , अब यहाँ अर्जुन मेहमान न दर्शाते हुए खुदसे हे उस सोफे पर जा पसरा जिस पर अर्शी कुछ समय पहले पसरी हुई थी. शैली अपनी मैडम का आदेश पालन करती हुई दरवाजे के बहार वही सन्देश टांगती हुई वापिस काउंटर की तरफ चली गयी. इस कक्ष में न शोर था और न गर्मी. अर्जुन एक नजर इस हसीना को देखने के बाद सोफे को सहलाते हुए बोलै.

"नीस नाम.. अर्शी.. नाचने नाचने के सिवा और क्या करती हो अपने इस घोंसले में? सुरक्षा तोह ऐसी है जैसे कोहिनूर लंदन से सीधा यहाँ ला छुपाया हो..", अर्जुन को दोनों हाथ सोफे के सिरहाने पसरे बैठा देख अर्शी ने भी गोल घूमने वाली कुर्सी का रुख उसके करीब हे कर दिया. सुघड़ गोरी टांगें और दमकता बदन बहोत जगह से नुमाया था लेकिन देखने वाला बस उस चेहरे का आंकलन तक न करता लगा.

"घोंसला? ये मेरी खुदकी प्रॉपर्टी है, तुम्हारी तरह बाप के पैसो पर ऐसा नहीं करती. सिक्योरिटी रखने की वजह मेरा बिज़नेस और मेरे डैड है. नहीं तोह तुम जैसे अनगिनत इस कमरे में उलटे टांग चुकी हु जिन्हे अपनी मर्दानगी और ताक़त पर जरुरत से ज्यादा हे भरोसा था. अपने पालतू कुत्तो को साथ लाये हो और गाडी भी वह कड़ी की है जहा किसी को हक़ नहीं? वैसे निचे से भी तुम बेढंगे हे लगते हो क्योंकि लड़कियों में तुम्हे इंटरेस्ट नहीं और सुना है बॉडी बनाने वाले लड़के पसंद करते है.", अर्शी के तीखे बाण सुन्न कर भी अर्जुन मुस्कुराता हुआ उसको देखता रहा. वो भी इस मुस्कान को देख ज्यादा हे भड़क उठी.

"बाप के पैसे तोह मुझे भी पसंद नहीं मेरी तोतापरी. बाकी हर लड़की के सामने लेट जाऊ तोह तुम में और मुझ में फरक हे क्या रहेगा? सुना था के इस क्लब में 2 चीज बहोत मशहूर है. यहाँ का बार और दज.. खुद को भी लिखवा लो तोह तीन हो जाएंगी. कैसे याद किया इस नाचीज को? 2 बार ड्रिंक बनवाये लेकिन दोनों बार बीच में हे छोड़ने पड़े.", अर्जुन की ऐसी जलीकटी सुन्न कर अर्शी का चेहरा जरूर तमतमाया पर वो कही न कही प्रभावित भी थी उसकी दिलेरी से.

"मुझे पसंद नहीं कोई मेरी हे जगह मुझसे सवाल करे. ड्रिंक्स वास्ते नहीं होंगे तुम्हारे. स्कॉच, माल्ट, बियर.. जो चाहो.."

"फ़िलहाल तोह वही मॉकटेल जो तुम्हारी खूबसूरत bar-bala ने बना कर दी थी 2 बार. शराब और नियम मान ने वाली लड़कियों से अपने को ख़ास लगाव नहीं. वैसे बताया नहीं मुझे बुलाने की ख़ास वजह. वो कार वाली बात तोह जाने दो क्योंकि तुम्हे भी पसंद है मेरा तुम्हारे पीछे खड़े होना.. ाची लग रही है न दोनों?", द्विअर्थी बात सुन्न कर अर्शी ने आँखें तरेर कर एक बार कैमरा से दोनों गाड़ियां और फिर अर्जुन का चेहरा देखा जो मुस्कुराये जा रहा था.

"तुम कौन हो?"

"पता कर लो मैं कौन हु. दिल आ गया है तोह बहोत म्हणत करनी पड़ेगी मिस तोतापरी और घोंसले में म्हणत नहीं अंडे दिए जाते है. मेरा मतलब है की कभी बहार दुनिया में निकलोगी तोह पता चलेगा न की हर इंसान तुम्हारी पहुंच में नहीं है.", अर्जुन जैसे हे उठा, अर्शी भी तुरंत उठ कर उसके सामने कड़ी हो गयी. गुस्सा उस ऊँची नाक पर कही ज्यादा था क्योंकि अर्जुन बार बार उस पर तंज किये जा रहा था.

"क्या तोतापरी तोतापरी लगा रखा है? और तुम मेरी जगह हो तोह जवाब देना हे पड़ेगा नहीं toh...ummmmmm...", और वो तुनक कर उसका कालर पकड़ हे चुकी थी की दो मजबूत हाथो ने उसके उभरे हुए सख्त कूल्हों को दबोच कर ऐसे करीब खिंचा की अर्शी को सँभालने का मौका तक न मिला. इसके बाद उसके शहद से मीठे और गुलाबी होंठ नरम गीली क़ैद में जा फंसे जिन्हे वही शक्श चूस रहा था जिसको मर्दानगी के सबक बताने की इत्छा थी अर्शी की. मचलने की कोशिश दम तोड़ती गयी कूल्हों के निर्वस्त्र हिस्से पर फिरते हाथो और लगातार होंठो के रसपान से. जमीन से ऊपर उठी वो जैसे अर्जुन के हाथो में झूला लेने बैठी हो और जब आँखें खुली तोह वो युवक कमरे से जा चूका था.

"Hello.. रसूल.. वो लड़का बहार निकले तोह जाने नहीं देना. लेकिन बहार निकले तभी.. एक काम करो.. उसकी गाडी के तीनो तरफ अपनी गाड़ियां कड़ी कर दो... नहीं.. कुछ नहीं हुआ लेकिन उसकी अकड़ मैं खुद हे काम करुँगी.. अभी वो क्लब में हे है.. काउंटर पर.", अर्शी हैरान थी और अपने होंठो को हाथ से पौंछती हुई वो टेलीविज़न में उसी युवक को देख रही थी जो मुस्कुराते हुए फिर से शैली को नया ड्रिंक बनाने का बोल रहा था.

'रास्कल.. कमीना.. तू नहीं बचेगा.. उफ़... ऐसे जानवर जैसे.. किश किया.. उम्.. तुझे इस घोंसले.. सहित.. क्लब के बीच हे सबक सिखाती हु तुझे.. अर्शी सहाये ऐसे नहीं जाने देगी इतनी बड़ी गुस्ताखी पर.. या तोह लाश हे जायेगी या पाँव में गिरेगा.. नहीं.. मारूंगी नहीं..', वो खुद हे उलझन में थी क्योंकि बात कहते कहते वो अपने हाथ पर लगी लार पर हे होंठ रख बैठी पर गुस्सा भरा था जिसकी गाज अब अर्जुन पर गिरनी निश्चित हो चली थी. बहार उसकी गाडी को गहरा जा चूका था लेकिन उसके सुरक्षाकर्मी अभी भी आराम से ग्रिल पर बैठे दिखे.
 
अपडेट 110

बेचैन कौन


पंडित परिवार के लिए भी आज का दिन काफी व्यस्त रहा था. रामेश्वर जी अपने दोनों बेटो (राजकुमार और शंकर) और अपनी अर्धांगिनी के साथ स्वर्गीय राममेहर सिंह के घर गए थे. शंकर जी ने भी सब gile-shikve परे रख कर परिवार के बड़ो से लेकर बचो तक से प्यार और इजत्त से बात की थी. गाँव में रहकर हे उन्होंने चंडीगढ़ की यूनिवर्सिटी में अक्षरा के एडमिशन की बात भी तये कर ली थी, ऋचा खुद हे 10 दिन बाद अक्षरा को साथ ले जाने वाली थी.

मुश्किल वक़्त भी आया था जब गाँव से निकल कर सभी सुशीला देवी से मिलने हॉस्पिटल पहुंचे. इस हॉस्पिटल में हे अब शंकर जी की नियुक्ति हुई थी लेकिन कार्यभार वह 3 दिन बाद सँभालने वाले थे. बिजेन्दर इस समय में शंकर जी के साथ हे था और बाकी सब पीछे. इस प्राइवेट कमरे में दाखिल होते हे बिस्टेर पर प्लास्टर के साथ लेती सुशीला पर शंकर जी की नजर पड़ी तोह कुछ पल वह बस ठिठक हे गए. हाथ पर भी पट्टी बंधी थी, चेहरे और माथ पर भी टाँके आये थे. जिस सुशीला को उन्होंने पहली बार सोमबीर सिंह के घर देखा था वह एक अल्हड़ जवान थी, शंकर जी की ख़ास दोस्त उस घर में ब्याह के आने से भी पहले. अब यहाँ जैसे बस एक ज़िंदा लाश उनके सामने थी.

"शंकर, मिल ले बीटा. देख सुशीला रो रही है.", कौशल्या जी के ऐसा कहने पर रामेश्वर जी ने हे अपनी धर्मपत्नी को पीछे किआ.

"इनको अकेले में बात करने दो कौशल्या, उधर चंद्रो भाभी भी जांच करवाने के लिए अगले कमरे में आई हुई है, परम के पास. शंकर ने हे उन्हें यहाँ बुलवाया था.", बिजेन्दर, ऋचा, राजकुमार जी और बबिता को भी उनके साथ लिए वह अगले बड़े कमरे की और चल दिए.

"सुशीला तू ऐसी बिलकुल ाची नहीं लगती. वह हर बात पर भड़कने वाली और छोरो के गाल लाल करती सुशीला ज्यादा पसंद है मुझे.", शंकर जी बंद कमरे में सुशीला के बराबर बैठ गए, उसका सलामत हाथ पकड़ कर. सुशीला की आँखों से निरंतर पानी बह रहा था.

"तू भी तोह हाथ पकड़ के हांडे (घूमा) करता मेरा. ब्याह पाछे तेरा बदलना सेहन कोणी होया मेरे से. माफ़ करदे शंकर, जड़बुद्धि हु न थोड़ी लेकिन सब बर्बाद कर दिए मैंने इस चक्कर में.", दूसरा हाथ उठाने की कोशिश में चेहरे पर दर्द आते देख शंकर जी ने प्यार से वह हाथ भी थाम लिए.

"छोटा हु तेरे से आरर तू जड़ आज तक नई झुकी तोह या गलती ेब न कर बेबे (सिस्टर). टक्कर तोह जोरदार चाली कुछ भी कह.", शंकर ने सुशीला की आँखें साफ़ करते हुए सामने आये थोड़े बाल ठीक से पीछे करते हुए कहा.

"कुणसी टक्कर की बात करे है तू? आड़े बिस्टेर पर पड़े बाद मोटी अकाल में बात घुसी के क्यों तन्ने रोग कात्या था मेरे baap-sasur, खसम, देवर आरर भाई का. तेरी जगह मैं भी होती तोह जमा शामे तो शामे करती. उमेद के भाई मारे गए, पंडत चाचा के गोली लागि, Bhawani-Mohar मधु ने उठान लागे थे, मेरा ससुर शीला आरर भवानी के कहे में आ के 4 परिवार मितान लाग्या था, तन्ने के गलत किआ?", सुशीला ने हे शंकर का हाथ थाम के सवाल पुछा.

"तू मैंने प्यार करे थी, मैं लता ने. मैं कड़े भी तेरे बारे में यु न सोच सक्या सुशीला. के बेरा था के बचपन से तू मैंने छोटा भाई समझ के उतना प्यार कोणी करे जितना कुछ और समझ के करे है. गलती तोह या भी घनी बड़ी होगी."

"मान लिए के अंधी थी मैं आरर कोणी देख सकीय तेरा मुन्नी गइल प्रेम. सबकी ज़िन्दगी बर्बाद करते होये भी मैं तन्ने बर्बाद करने में लगी रही. न तेरा कुछ उखाड़ सकीय उल्टा तू हर बार मैंने ज़िंदा राख के और गुस्सा दिलाई गया. ेब तोह भगवन बस अपने धोरे बुला ले बस. थाप तोह मैं सोमबीर आरर मेरे baap-bhai के मारूंगी, उजाड़ के सत्यानाश कर दिए सारा कुनबा.", सुशीला के चेहरे पर दुःख और गुस्सा उभर रहा था.

"बेबे, तन्ने हाथ लगान से पहले मरना ठीक है मेरा. बाप के पीछे बाप कात्या क्यंकि एक तोह मरना था. मेरी माँ मेरे स्यामि सफ़ेद लट्टे (कपडे) पहन ले तोह मैं किसा मरद? तेरे स्यामि है के महारे घर के पहले बचे बिजेन्दर बबिता हे थे आरर है. कड़े मैंने उनका बुरा किआ? रघुबीर काका का परिवार ख़तम करते होये जिन्हाने कोणी सोची उनके जान का मैंने कोई दुःख कोन्या बस तेरा गुनेहगार हु. ेब यु सब फेर बतला लिए मोटी, तेरी छोरी का ब्याह मांडना है आरर बिजेन्दर तोह मैंने ससुर बनान के पाछे है. चाल कड़ी हो ताई (चंद्रो देवी) बुलावे है.", शंकर ने बड़े ध्यान से और मजबूती सी सुशीला को व्हीलचेयर पर बिठा लिए. इतनी भरी थी लेकिन शंकर के लिए मुश्किल न हुई.

"सास हैं मेरी, मैं कोणी नजर मिला सकती शंकर."

"तू ठण्ड राख. दिमाग तेरे में पहला हे घात है जो बिंदु बरगी कबूतरी तेरा फ्यूज उड़ा के इस्तेमाल करती रही. ताई ने सब बेरा है.", शंकर आराम से व्हीलचेयर ठेलता सुशीला को बहार ले आया.

"तेरा भी जानती है क्या वह?", सुशीला ने गलियारे में आते हे कहा और शंकर जी बिना कोई जवाब दिए बस मुस्कुरा दिए.

"तू न बूढ़ा कोणी हों लाग रहा. दत्त जा खागड (सांड) हर गली में बछड़े देने बंद कर दे.", सुशीला ने झूटी नाराजगी दिखते हुए कहा.

"चाल मिल ले तेरी सास ते.", शंकर के इतना कहते हे सुशीला के जिस्म में सिहरन होने लगी. वह कैसे सामना करेगी उस औरत का जिसको सुशीला ने न सिर्फ दर्द हे दिए बल्कि अपने वंश से भी दूर रखा. कैसे जवाब दे पायेगी उन सवालों का जो चंद्रो देवी के दिल में इतने सालो से होंगे. चंद्रो देवी की आवाज कही भी सुशीला से कम् न थी और वह मजबूत बूढी मुखिया एक सख्त जान थी.

"यु के दुर्गति बना दी मेरी बहु की शंकर? मैंने तोह बताया था के सुशीला के बस थोड़ी बहोत चोट है.", चंद्रो देवी के जिस्म पर अभी भी दवा लगी हुई थी लेकिन वह चलने लगी थी. और परमवीर सांगवान के पास से उठती वह सीधा सुशीला के पास आ कड़ी हुई. सर पे सहलाते हुए वह भी टांको की वजह से पट्टी देख वह शंकर पर हे भड़क पड़ी.

"मैंने न मारी तै, इसका भाई जाते जाते रक्षाबंधन का गिफ्ट दे गया इसने. जिस गाडी में या बैठी थी व उड़ा दी थी मोहर ने. मैंने हे दोष देती रहियो हर बात का.", शंकर के ऐसा कहते हे चंद्रो देवी ने उसका कान मरोड़ दिए.

"क्यों न दू? तेरे घर के धोरे रही इतने साल और हालत देख इसकी. खैर तोह ले सके था. मैंने या पहली बार में हे पसंद आगि थी, जम्मा मेरे बरगी आरर ेब देख."

"ताई ले जा इसने अपने घर आरर सुधर लिए हालत. या तोह सबकी हालत खराब कारन में लगी थी.", शंकर जी अभी तक कड़ी भाषा हे बोल रहे थे और बाकी सब बस इन तीनो को देखते हुए खामोश बैठे रहे.

"लेके जान कहती हे आई हु. कुछ न कहिये इसने, भोली है या गुस्सा बेशक करती हो. आग लगान ाली तोह तेरे आरर मेरे देवर के भी हाथ ना आ ऋ, बिंदु ने काट दे इसने कुछ न कहिये. आरर तू रोना बंद कर सुशीला.", चंद्रो देवी के इतना कहने पर शंकर जी मुस्कुरा उठे, सुशीला को दिल जो हल्का कर दिए था उन्होंने चंद्रो देवी के हे मुँह से ये सुनवा कर की सारा काण्ड बिंदु उर्फ़ बिंदिया का हे रचा हुआ था.

"माँ, गलती तोह भरी होइ मेरे से.", सुबकते हुए सुशीला बस गिरने हे लगी थी की रामेश्वर जी ने अपनी बड़ी भाभी के साथ हे उसको लपक लिए.

"बेटी भाभी ठीक कह रही है. पता है लोग उस मजबूत और भोले इंसान का हे प्रयोग करते हैं अपने स्वार्थ के लिए जो गुस्सा होने पर soch-samajh नहीं सकता. तुम तोह बचपन से हे वैसी हो. अनजाने में साथ देना सिर्फ तुम्हरी गलती नहीं है, मैं और बाकि सब भी जिम्मेवार है."

"अर्जुन तोह गलती नहीं करता.", सुशीला ने रट हुए ये नाम लिए और सबकी धड़कन थम्म गयी.

"वह भी गलतियां करता है. सुदर्शन, बिजेन्दर गवाह है. भोला और नादान वह भी है और झगड़ा कर बैठ ता इस चक्कर में.", रामेश्वर जी ने ये बात फोरि तौर पर हे कही सुशीला का दिल रखने के लिए.

"रामेश्वर, गलत बात है. सुशीला अर्जुन न करता गलती क्योंकि उसको नहीं पता सब कुछ. रही सुदर्शन और बिजेन्दर की बात तोह भाई है ये, बीच में न पदों कोई तोह ज्यादा ठीक. बिजेन्दर चाल तेरी माँ का सामान ऋचा के साथ गाडी में धरवा दे. ब्याह दोनो bhai-behan का थारे दादी के घर में होवेगा. तू काल बाकी सामान छोड़ जाइये हवेली बाकी मोहर की तेहरवी पे बात करुँगी. शंकर, तू घर कोणी आवे?", चंद्रो देवी ने सबको thok-baja दिए था एक हे बार में.

"जीजी, आप चलो पहले अपने देवर के घर.", कौशल्या जी ने अपनी बात राखी.

"फायदा कोणी ाँ का, लाडला तोह है कोणी घर. चल परसु आउंगी मैं जे शंकर लें आया तोह. ऋचा की बात भी करनी है फेर, माधुरी का ब्याह होये बाद रामेश्वर हवेली पे दावत याद रखियो.", और सभी इधर से बहार चलने लगे.

"आपने कहा है वैसा हे होगा. फ़िलहाल तोह आप आराम करो और उमेद शाम को हवेली आएगा आपके पास.", निचे सब कुछ उस बड़ी गाडी में व्यवस्थित करने के बाद शंकर जी ने चंद्रो देवी, सुशीला और ऋचा से विदा ली. बिजेन्दर भी पंडित जी, कौशल्या जी और शंकर का आशीर्वाद लेने के बाद गाँव निकल गया. राजकुमार जी परम के साथ धीमी आवाज में थोड़ी दूर हे खड़े बातें कर रहे थे. यहाँ आने के बाद उन्हें भी चस्का पड़ जाता था छोटे सांगवान और गुलाटी के साथ महफ़िल ज़माने का. सब करते करते शाम के 5 बजे वह अपने घर वापिस आये थे.

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सफर के दौरान अर्जुन बस सोया हे रहा और सबने बस यही सोचा के वह आराम नहीं कर पाया होगा. 7 बजे वह निकले थे पंजाब से और खाली सड़क पर बिना रुके दीपक ने सफर 3 घंटे में हे पूरा कर दिए था. वैसे भी वह एक दक्ष ड्राइवर था अपने विभाग में, ऊपर से यातायात न के बराबर होने से गाडी सरपट दौड़ती अपनी मंजिल पर आ रुकी थी.

"मैं सामान रखवाता हु गुड़िया, तुम दोनों अंदर चलो.", लकी ने कार की डिक्की खोलते हुए 4 बड़े बैग आराम से एक तरफ रखे लेकिन प्रियंका और आरती अंदर नहीं गयी.

"आप अकेले ये सब मत करिये भैया, हम ले चलते है आपके साथ.", प्रियंका दीदी ने बैग उठाने के लिए हाथ बढ़ाया हे था और इधर दीपक ने तुरंत 2 बैग थाम लिए.

"बहना, बड़े भाइयो के होते ये सब करने की कोई जरुरत नहीं. रस्ते में ब्रेक न लेने के लिए सॉरी, आप लोगो को समय पर पहुंचना जरुरी था. लेकिन आप दोनों अंदर चलिए हम सामान बैठक में रख देते है.", ऐसे हक़ से कहने और छोटी बहिन पुकारने पर वह दोनों भी धन्यवाद करती उनके आगे आगे अंदर चल दी. बैठक का दरवाजा उनके आने से पहले हे शंकर जी ने खोल दिए था, जो इधर बैठे समाचार देख रहे थे. हैरानी की बात थी के इस समय वह घर पर मौजूद थे.

"कैसा रहा सफर? कोमल भैया के लिए पानी ले आओ.", दीपक और लकी से हाथ मिला कर मिलने के बाद उन्होंने अपने दोनों लाड़ली बेटियों को गले लगते हुए पुछा.

"बड़े पापा, बहोत हेक्टिक था. आप चलते तोह आराम से हे आते.", आरती ने ये बात कही तोह सोफे पर बैठे दीपक और लकी हैरत से देखने लगे.

"बीटा इन दोनों का मतलब है 3-4 दिन में आते. तुम्हे तोह इनके साथ मैंने भी परेशां किआ है.", शंकर जी ने आरती को अपने से हे लगाए हुए कहा तोह आरती मुस्कुराने लगी.

"चाचा वह बात करनी थी आपसे. कल समय होगा आपके पास?", दीपक ने ऐसा कहा तोह शंकर जी ने हामी भर दी.

"वैसे सामान तुम लोग लाये हो तोह वह नवाब साहब कहा है?", उन्हें अर्जुन दिखाई नहीं दिए था.

"ओह्ह.. वह तोह कार में हे सो रहा है बड़े पापा. सॉरी उठाना हे याद नहीं रहा.", आरती बहार जाने लगी तोह शंकर जी ने रोक लिए.

"ाची बात है, थोड़ी देर बंद कार में रहने दो. तुम दोनों अंदर जाओ और कपडे बदल कर फ्रेश हो जाओ पहले. तुम्हारे इन्तजार में तुम्हारी बहनो ने भी खाना नहीं खाया है. अपने भैया का भी लगवा देना.", शंकर जी ने उन्हें जाने दिए और खुद सोफे पर Lucky-Deepak के सामने बैठ गए. कोमल दीदी पानी दे कर पहले हे जा चुकी थी.

"चाचा पंडित जी वाली सभी फाइल के साथ आपकी दोनों भी मिल गयी हैं. कार में हे राखी है, यहाँ लाना ठीक नहीं लगा. और प्लीज खाने के लिए मन कर देना.", लकी ने अनिच्छा जताई अपनी बात पूरी करने के बाद. शंकर जी ने दीपक की तरफ देखा तोह उसने भी मन कर दिए. एक बार और उन्होंने कोमल को बुला कर दोनों के भोजन का मन कर दिए.

"पता है एक अभी पव्वा लगाएगा और दूसरा सेर भर दूध पीयेगा. ाची बात है. वैसे कोई दिक्कत तोह नहीं हुई, मैंने पहले हे उन्हें खबर दे दी थी.", शंकर जी बात करते हुए कोई नाम नहीं ले रहे थे.

"बाकी सब तोह आराम से हे हो गया था. पूरी सपोर्ट मिली पंडित जी के नाम से और जहा नहीं मिली उधर आपका नाम बहोत था. ये दसप था कोई ##### एरिया का, टेढ़ा आदमी है थोड़ा. पीछे किसी का तगड़ा हाथ है, राजनितिक व्यक्ति का. साफ़ मन कर दिए था उनसे एक बार और गेस्ट हाउस तक भी उसने नजर रखवाने की कोशिश की थी.", दीपक ने जहा परेशानी आई थी वह बता दिए.

"उसकी अलग कहानी है दीपक और उस से बस यही काम था हमको. कभी कुछ लगा तोह विचार करेंगे उस बारे में फ़िलहाल तोह बस ये 2 लोग गंगा किनारे लगाने है और समय आने पर आखिरी. वैसे दुष्यंत का मामला ाचे से हैंडल किआ तुमने.", शंकर जी ने शाबाशी दी तोह दोनों खुश हो गए.

"थोड़ी प्रैक्टिस करवा दीजिये कभी अपने वाली भी, संजीव तोह शेर बन्न चूका है पूरा."

"जल्दी चलते है काम पर, सीख लेना जितना मुझे आता है. बाकी अभी जाते हुए मुझे #### रोड पर छोड़ देना. भाई गुलाटी के फार्महाउस है तोह 2 घडी उन सबके साथ बिता कर आ जाउंगी. कल अपने हे ठिकाने मिलेंगे और बाकी बात रस्ते में करते है.", शंकर जी के इतना कहते हे दोनों ख़ुशी ख़ुशी खड़े हो गए. शंकर जी ने उनके साथ जाने से पहले अपनी माँ को जाने के बारे में बताया और बहार कड़ी कार में बैठ गए. अर्जुन का यहाँ namo-nishan न था.

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इधर सबके अंदर जाते हे अर्जुन तुरंत उठ खड़ा हुआ था. आराम से कार का दरवाजा वापिस बंद करता वह छोल साहब के घर से बहार निकलती प्रीती को लपक कर खली प्लाट में दिवार के साथ अँधेरे जा छिपा. प्रीती को समझ भी नहीं आया था के एकाएक ये क्या हो गया. मुँह दबाये अर्जुन उसको बाज की तरह झपट्टा मार कर यहाँ कब ले आया. उन हैरत से भरी बड़ी बड़ी आँखों को देखते हुए अर्जुन ने हाथ हटाया और प्रीती के गुस्सा करने से पहले हे उसके होंठो को मुँह में भर लिए. पाँव के नीचे ताज़ी मिटटी बता रही थी जैसे वह aaj-kal में हे समतल किआ गया हो. अर्जुन के ऐसे खुलेआम पागलपांड दिखने और किसी की नजरो में आने के डर से प्रीती घबरा रही थी लेकिन अर्जुन की तड़प महसूस होते हे उसके भी हाथ अर्जुन की पीठ पर कस गए.

"आठ.. ये सब क्या था? जंगली कही के? फांस्वा कर मानोगे क्या?", प्रीती अभी भी उसको खुद से चिपकाये मंद आवाज में झाड़ रही थी.

"पता है तुम्हारे लिए इतना बेचैन था के वह से निकलते हे आँखें बंद कर ली थी. यही दुआ कर रहा था के तुम घर के बहार मिल जाओ बस, अंदर तोह दोनों घर में मैं तुम्हे अकेले मिल नहीं पाउँगा.", अर्जुन ने इस बार जैसे उसको अपने सीने से लगाया प्रीती शांत हो गयी.

"और मैं नहीं दिखती तब? जिनके साथ आये हो वही तुम्हे अंदर ले जाते तोह? बोलो बोलो, लगाओ अपना दिमाग."

"मैं सीधा तुम्हारे कमरे में हे आने वाला था फिर. लेकिन मैंने आरती दीदी को कह दिए था के सबको अंदर ले जाना मुझे उठाये बिना. मेरा दिल कर रहा है तुम्हारे साथ रहने का.", अर्जुन ने प्रीती के बाल पीछे करते हुए उनकी महक साँसों में भर ली.

"अभी तुम्हे भी अंदर जाना होगा और मुझे भी. दिन में तुम्हारे घर मिलते है न."

"दिन में नहीं.", अर्जुन ने प्रीती से थोड़ा दूर होते हे जवाब दिए.

"ठीक है मैं 1 बजे बहार आउंगी अभी सवा 10 हुए है. लेकिन अगर दोनों फंसे तोह देख लेना. फंसना पक्का है ये तोह मुझे लग हे रहा है."

"तुम बहार आना और मैं तुम्हारा इधर इन्तजार करता मिलूंगा."

"यहाँ गली में मिलने वाले हो?"

"नहीं हम मेरे कमरे में चलेंगे. बहार से हे तोह रास्ता है."

"कोई बात नहीं, फंस गए तोह घर में 2 की जगह 3 शादियां हो जाएँगी. ज्यादा प्यार का भूत चढ़ा है न तोह आज दिखती हु तुम्हे. पीछे मैट हटना और कोई बहाना भी नहीं. मैं वापिस मेरे घर के अंदर नहीं जाने वाली अगर तुम नहीं आये तोह. और जो हरकत थोड़ी देर पहले तुमने की थी न गुंडों वाली, उसका हिसाब भी लुंगी.", प्रीती उसकी गिरफ्त से निकलती अपने घर में जा घुसी. गली इस वक़्त सुनसान हे थी और अर्जुन यही अँधेरे में कुछ देर खड़ा गहरी सांसें लेने लगा. 5 मिनट बाद सावधानी से वह घर में दाखिल हो गया. बैठक से आती आवाज नजरअंदाज करता हुआ गलियारे से पार सीधा अपनी माँ के कमरे में चला आया.

"ोये, मुझे देख कर भी अनदेखा कर दिए.", ऋतू दीदी ने अंदर आते हे उसको पीछे से पकड़ लिए.

"रसोई में सब लोग थे इसलिए इधर आ गया, पता था के आप जरूर आओगी.", अर्जुन ने उनका एक हाथ पकड़ कर उन्हें सामने कर लिए. कुछ पल बस वह उन्हें देखता रहा और फिर उनके सीने से लग कर जैसे दिल को ठंडक देने लगा.

"तुम ठीक हो न?", ऋतू दीदी ने भी उसको बाँहों में कस्ते हुए जैसे बेचैनी को महसूस कर लिए था. अर्जुन आँखें बंद किये वैसे हे चिपका रहा.

"सबसे मिल कर ऊपर वाले कमरे में आ. मैं मेरे बाथरूम में कपडे रख रही हु, खाना भी साथ हे खाएंगे.", ऋतू दीदी ने उसका सर सहलाने के बाद खुद से अलग किआ और उसको साथ लिए बहार आ गयी. अर्जुन dada-daadi से मिलने के बाद बाकी सबसे भेंट करने के बाद अपनी माँ के पास कुछ पल खड़ा रहा, जो कुछ बरतन धोने के बाद हाथ पांच रही थी.

"आ गया मेरा बचा? तू 2 दिन दूर क्या रहा देख कैसी हालत हो गयी है.", स्नेह से अर्जुन का मैथ चूमने के बाद उन्होंने भी अपने लादले को सीने से लगा लिए.

"ऐसा कुछ नहीं है माँ बस आपको लग रहा है. पापा अंदर नहीं थे अब."

"हाँ कोमल ने बताया के वह अभी गए है तेरे ताऊजी को लेने. उनका ट्रांसफर भी इधर हे हो गया है अब.", माँ की बात सुन्न कर अर्जुन के चेहरे पर पहली बार ख़ुशी आई थी लेकिन रेखा जी संतुष्ट नहीं थी.

"जा ऋतू तेरे कपडे बाथरूम में रखने गयी है. इन सबने भी खाना नहीं खाया है तोह ये शुरू करने वाली है. मैं तेरी ताई जी अभी थोड़ी देर तक खाएंगे, तू और ऋतू जब कहोगे मैं परोस दूंगी. दिन में बात करेंगे हम.", रेखा जी ने माथे को चूम कर अर्जुन से कहा तोह जाने से पहले वह ललिता जी के गाल चूम कर बहार भाग गया. मधु बुआ लड़कियों के लिए थाली लेने अंदर आई थी जो ये देख कर हंसने लगी.

"हंस ले तू भी, मेरा लल्ला है तोह मुझसे हे प्यार करेगा न.", ललिता जी की चुहल का जवाब देना सही नहीं था. जाने वह आगे क्या हे बोल देती, मधु बुआ वैसे हे हंसती बहार चली गयी.

"माँ लल्ला आपका न थोड़ी देर पहले तोह बुझा बुझा सा घर में आया था और अब देखो कैसे फिर से पंख लग गए.", अलका की आधी बात बहुत कुछ कह रही थी जो सबको समझ नहीं आया था सिवाए रेखा जी के और कोमल दीदी के. इधर अर्जुन ऊपर इस पिछले हिस्से में दाखिल हुआ तोह Tara/Aarti के कमरे में अँधेरा था लेकिन Alka-Ritu दीदी के कमरे में बस जीरो की लाइट जल रही थी, ऐरकण्डीशनर के साथ. बाथरूम की तरफ बढ़ते हुए कुछ सोच कर अर्जुन ने दरवाजे की चिटकनी लगा दी.

"खड़ा क्यों है.?", अंदर ढीले पाजामे टीशर्ट में ऋतू दीदी पहले हे कड़ी थी जिसका आभास अर्जुन को हो गया था.

"सब घर पे हे हैं दीदी."

"सब खाना खाने लगे है और कोई आधे घंटे से पहले यहाँ नहीं आने वाला. हम नाहा रहे है बस.", दीदी ने हाथ पकड़ कर उसको कपड़ो के साथ हे फुहारे के निचे खड़ा कर दिए. फुहारा चलते हुए वह भी अर्जुन की पीठ से चिपक गयी.

"कौन थी वह? या जो तुझे इतना बेचैन कर गया ऐसा क्या हुआ तेरे साथ वह.?", अर्जुन आँखें बंद किये इस पानी को और जिस्म से जुडी अपनी धड़कन को महसूस करने लगा. फिर चुप्पी तोड़ता हुआ वह सामने से उन्हें सीने से लगा कर होंठो को पीने लगा, जबतक दोनों की बेचैनी ख़तम न हो गयी हो.

"ज़ुबैदा नाम बताया उन्होंने और मुझे अपना भाई कहा था. जानती हो वह कुछ अलग थी जो जाने कैसे एक नजर में हे मेरे दिमाग में जा घुसी. उन्होंने फिर मुझे मुझसे हे मिलवा दिए ऋतू. मैं तुम्हारे साथ सुरक्षित रहता हु और बहार ढाका हुआ. उन्होंने पहली मुलाकात में हे मुझे अतीत दिखा दिए, अनजाने में हे सही लेकिन मैंने उनके सामने खुद को निर्वस्त्र पाया, अंदर से. उनके अंदर कुछ अलग था और जो दर्द की परिभाषा या ज्ञान उन्हें है मुझे नहीं लगता के वैसा कोई और होगा तुम्हारे सिवा. हम दोनों तोह एक हे है न?", अर्जुन ने गालो को थामते हुए उस भीगते चेहरे से सवाल किआ सबकुछ बताते हुए. यहाँ वह उन्हें दीदी नहीं कह रहा था.

"अपने से बड़ा दर्द दिखाई दिए है न अर्जुन? ख़तम कर दो फिर उसको. आज़ादी पाने वाला हे तोह अपने दर्द उस से सांझे करता है जो मुक्ति दिला सके. सबमे उतना सामर्थ्य नहीं होता. ज़ुबैदा ने भाई कहा है न तुम्हे, फिर बेचैन क्यों हो?"

"यही हुनर है मेरी बीवी में, ये घबराती नहीं है मेरी तरह. उमाठ.", इस बार होंठो को चूमने में शरारत भरा प्यार था.

"दोनों में से एक को तोह बैलेंस बनाना हे होगा. तुम कहते हो न संतुलन, वही करना पड़ता है. और पता है मैंने तुम्हे बहोत मिस किआ कल और आज. पापा से भी ढंग से बात नै कर पाई मैं.", ऋतू दीदी उसके गले लगी शिकायत कर रही थी.

"और कभी मैं बहुत दूर चला गया तोह?", अर्जुन ने चुहल करते हुए पाजामे के ऊपर से हे दोनों गोल नितम्ब दबाते हुए ऋतू दीदी को करीब कर लिए.

"टाँगे टॉड कर रख दूंगी कभी ऐसा सोचा भी तोह. प्रीती एक्सेप्शन है बस.", ऋतू दीदी की गीली आँखों में गुस्सा देख कर अर्जुन ने उन्हें गॉड में उठा लिए.

"यही तोह मैं चाहता हु की टाँगे टॉड देना. फिर बीएड पे रहूँगा और तुम और मैं.."

"गंदे कही के बस यही सूझता है तुम्हे. पहले शादी कर लो, मैं खुद तुम्हे सोने नहीं दूंगी जबतक एक तुम्हारे जैसा बैलबुद्धि पैदा नहीं हो जाता.", ऋतू दीदी इस बंद बाथरूम में खुल अर्जुन से मस्ती कर रही थी.

"फिर उसके बाद एक और फिर एक और.."

"बस बस. एक हे बाबा हाँ लेकिन उसके बाद भी मैं हर रात तुम्हे प्यार करुँगी, सोये हुए भी.", दीदी ने सर झुकाते हुए दोनों के गीले होंठ आपस में मिला दिए. वह उन्हें ऊपर उठाये हुए हे इस आत्मिक जुड़ाव में डूबने लगा था. ऋतू थी हे ऐसी जो पल में हे अर्जुन के खालीपन को निरस्त करती अपने प्यार और देखभाल से भर देती थी. ज्यादा भीगने से उन्होंने निचे उतर कर अपने कपडे खोलने शुरू किये तोह अर्जुन दिवार से तक लगाए उस दूधिया जिस्म को बेपर्दा होते देखने लगा. नीली ब्रा और निचे कोई पंतय न थी. गोरी योनि का बंद चीरा और हलकी सूजन देख अर्जुन घुटने पर बैठ गया. ध्यान से देखने पर उसको माजरा समझते देर न लगी. सीने पर भी हलके निशान थे और चूचक शायद अब बेहतर हो गए थे.

"ये सब मेरी वजह से हुआ न?"

"मजा आया था न? इतनी देर बाद करते है न तोह थोड़ा बहोत हो जाता है. परेशां मत होना अब मैं ठीक हु पूरी तरह से. जरा अपनी टीशर्ट अलग करना.", दीदी के इतना कहते हे अर्जुन ने भी कपडे खोल दिए. पीठ पर नाखून से हुए जख्मो पर अब परत आ चुकी थी. बाकी सब हालत ठीक थी. कुछ सोच कर उसकी कलाई देखि तोह वह भी टांको के निशान न थे बस महीन से 6 बिंदिया बानी हुई थी.

"दोनों के जख्म जल्दी भर जाते है न.", दीदी इतना कहते हुए निर्वस्त्र हे उस से चिपक गयी.

"अभी नए बनाने का वक़्त नहीं है. दिल तोह मेरा भी करता है एक प्यारी सी गुड़िया पैदा कर दू, वह कॉलेज के बाद हे मुमकिन होगा.", अर्जुन ने दोनों गोर गोल स्तनों को हलके से दबाते हुए अपनी इत्छा जताई.

"होना लड़का हे है मेरी जान, जोर लगा लो जितना भी."

"जोर लगाने से हे तोह होगा जो होगा, लेकिन लड़की होगी.", अर्जुन ने उरोजों को वैसे हे हलके हलके दबाते हुए गर्दन पर होंठ रख दिए.

"आठ.. दूर हटो. अभी कुछ नहीं हो रहा है. पहले पढाई ख़तम करो अपनी और काम देख लेना. मेरे घर वाले बेरोजगार के साथ शादी नहीं करवाने वाले.", ऋतू दीदी ने टोलिया पकड़ते हुए कहा तोह एक सिरा अर्जुन ने थाम लिए.

"बेरोजगार हे पल्ले आएगा बा तुम्हारे, देख लेना.", आधे तोलिये से खुद को साफ़ करता वह बिलकुल करीब था.

"मुझे मंजूर है बस प्यार दुगना चाहिए बदले में.", आधे तोलिये से ऋतू दीदी अपना गीला बदन साफ़ कर रही थी. दोनों एक दूसरे को हे देख रहे थे और फिर से होंठो को चूसने लगे. अब एक दूसरे का शरीर साफ़ करते वह जल्द हे टोलिया निचे गिरा कर मिलान हे करने वाले थे.

'Thak-thak'

"बहार जाने दो अब. मर्डर गयी मैं.", ऋतू दीदी ने टोलिया लपेटा और दरवाजे से आती आवाज का जवाब देने लगी. 2-3 मिनट बाद हे अंदर टोलिया दे कर वह वापिस कमरे में चली गयी. अर्जुन भी 5 मिनट बाद बहार आ चूका था.

"कौन था.?"

"कोमल दीदी, बात करने के लिए आने वाली है वह. खाना लेने गयी है हम दोनों का.", आईने के सामने बाल सूखती ऋतू दीदी को देख कर अर्जुन फिर से उनके पीछे आ खड़ा हुआ. कितनी हसीं थी वह और जब जब अकेले में अर्जुन उनके करीब होता वह कोशिश करने पर भी उनसे दूर न हो पता था.

"आने दो उन्हें. वह भी वही बात करने वाली है जो आपने पूछी है.", उनके पतले नरम पेट को टीशर्ट के ऊपर से हे बाहों के घेरे में लेते हुए वह आईने में उनके लम्बे गीले बाल और प्यारे मुस्कुराते चेहे को हे देख रहा था.

"हाँ, वह हम दोनों को देख कर हे सब समझ जाती है. वैसे तुम में शर्म ख़तम होती जा रही है.", अर्जुन का हाथ रेंग कर टीशर्ट के अंदर से उनके मखमली सपाट पेट को सहलाने लगा तोह ऋतू दीदी हाथ रुक गए थे बाल ठीक करते करते.

"पहले कब मैंने शर्म करि?"

"पहले तोह हर वक़्त दीदी दीदी की ृत्त लगी रहती थी और हाथ भी पूछ कर लगते थे."

"पहले दीदी भी थी और प्यार भी. अब साथ में बीवी भी हो मेरी और जान भी हो.", अर्जुन ने थोड़ा हाथ ऊपर किआ तोह अंदर दोनों सुडोल चुके खुले थे लेकिन ऋतू दीदी पल में हे अलग हो गयी.

"दीदी आ गयी.", ऋतू दीदी के इतना कहते हे दरवाजा खुला और सामने खाना लिए कोमल दीदी कड़ी थी और ऋतू दीदी मुस्कुरा रही थी अर्जुन की हालत पर. झेंपता हुआ वह बिस्टेर पर एक तरफ बैठ गया ऋतू दीदी का टोलिया जाएंगे पर रखते हुए.

"टोलिया सूखने दाल दे ऋतू.", कोमल दीदी ने इतना कहा तोह अर्जुन ने मन कर दिए.

"वह पजामा सफ़ेद है न इसलिए टोलिया रखा है कही खाने का दाग न लग जाये.", उसकी बात पर कोमल दीदी की भी हंसी छूट गई ऋतू के हे साथ और अर्जुन झेंपते हुए निचे देखने लगा.

"ाचा ठीक है ठीक है. कपडे तोह तुझे हे धोने होते है जैसे? चल आज पहले हे देरी हो चुकी है आजा खाना कहते है.", ऋतू दीदी भी कोमल दीदी के कहने पर बराबर बैठ गयी थी और कोमल दीदी ने हे पहला निवाला अर्जुन को खिलाया. उनके लिए तोह कभी कभी ये दोनों बचो जैसे हे थे. ऋतू को उन्होंने चम्मच से दही खिलते हुए अर्जुन से बात शुरू की.

"वैसे अब बता के तू माँ से मिलने से पहले परेशां क्यों था? वैसे तोह सही सलामत हे लग रहा है.", कोमल दीदी का इन दोनों को हे पता था के वह जान जाएँगी और पक्का बात करने के लिए हे यहाँ आई है.

"अर्जुन को वह कोई प्यार करने वाला मिला है दीदी.", ऋतू दीदी ने गंभीरता से कहा लेकिन अर्जुन उन्हें हैरत से देखने लगा.

"मतलब?"

"कोई ऐसा जिसको अर्जुन के खुश चेहरे के पीछे दफ़न दर्द महसूस हो गया. पता नहीं कोनसा दर्द लेकिन मुझे लगता है हमारा प्यार भी अर्जुन के लिए बहोत नहीं है, शायद.", अर्जुन ने निवाला प्लेट में वापिस हे रख दिए ऋतू दीदी की बात सुन्न कर.

"तुझे अपने प्यार पर विशवास नहीं है क्या ऋतू?", कोमल दीदी ने भी हाथो को आराम देते हे खाना बंद कर दिए.

"ये तोह अर्जुन से पूछिए आप. अगर कोई परेशां है और अर्जुन के साथ अपना दुःख बांटने के लिए बात करना चाहे तोह क्या अर्जुन का जरुरी है के प्यार की जगह सामने दर्द रख देना? जरुरी है के उस टूटे हुए इंसान से ज़िन्दगी का गम हे लेना जबकि ये इसको भी पता है के अतीत सबका होता है लेकिन अपनी लगाम हम खुद हे किसी को पकड़ा दे तोह सिवाए दर्द के कुछ नहीं मिलने वाला. इस भटकते खाली बदल को भरने के लिए कितना वर्षा रुपी प्यार उसमे उड़ेला, उस खाली आसमान में सबने अपने सपने इसके नाम करते हुए वह इंद्रधनुष इसको दिए जिस से ये कभी स्याह (ब्लैक) सपने तक न देखे. तोह कैसे अर्जुन ऐसा कर सकता है की एक दुखी दिल की तड़प काम करने की जगह अपना अक्स भी उसके साथ साथ स्याह कर दे?", ऋतू दीदी के स्वर में कोई गुस्सा न था और जो सवाल थे वह अर्जुन की आत्मा को प्रतिदित करने की जगह उसकी भारी गलतियां बता रहे थे.

"ये उतना परिपक्व नहीं है ऋतू. दर्द से जुड़ जाना भी कुछ वैसा हे है जैसा उसको ख़तम करने की कोशिश. कभी कभी जब एक अकेला दर्द को न संभाल पाए तोह उसके सामने अपना दर्द रखना भी जरुरी है, जिस से दोनों में कुछ साँझा हो सके. दर्द से भी दर्द ख़तम होता है अगर प्यार के लिए वह जगह न हो. समय उस दर्द को खाली करके जो प्यार भरता है वह सबसे सर्वश्रेस्थ होता है. तूने भी तोह यही किआ था न? इसकी याद में खुद को दर्द देती रही, आने के बाद भी इसकी तरफ न जा कर घंटो रात में रो को खुद को प्रताड़ित किआ. फिर क्या हुआ? अब तुम देखो जरा खुद को, एक पल इस से जुड़ा नहीं हो सकती हो.", कोमल दीदी ने भी इस कथन के दौरान अर्जुन को सिर्फ एक हे बार देखा था. अर्जुन का तोह मैं हे ग्लानिभाव से ऊपर तक भर्र आया था. उसने सचमुच हे एक ऐसी पहल कर दी ज़ुबैदा के सामने जिसमे उसकी पीड़ा को काम करने की जगह अर्जुन ने आधे में हे अपना दर्द जाहिर कर दिए था, कार वाली पेंटिंग के साथ अपना संपर्क बना कर.

"गलती हो गयी दीदी. ऋतू दीदी ठीक कह रही है, मैं उस अतीत में गया हु क्यों जबकि सच तोह यही है के मेरी ज़िन्दगी भगवन खुद भी ऐसी नहीं लिख सकता था जितनी आप लोगो के प्यार ने बना दी है. मुझे वह से खाली आना चाहिए था लेकिन सच कहता हु उस तहखाने से कमरे में सभी दीवारों पर बस दर्द, अँधेरा और अकेलापन था. मैं घिर गया था जैसे.", अर्जुन की आँखों से 2 बूंदे टपक कर प्लेट में जा गिरी. अनजाने में हे सही लेकिन ऋतू दीदी की बातों से पता चल गया था के अर्जुन का बोझिल होना उन्हें कितनी तकलीफ दे गया था. बाथरूम में वह सिर्फ उसकी प्रेमिका थी लेकिन यहाँ वह बड़ी बहिन भी थी जो अर्जुन के लिए इस घर से टकरा सकती थी. अर्जुन जिस मुसीबत का सामना नहीं कर सकता था ऋतू दीदी वह भी खुलकर दत्त सकती थी और यही उनका प्रेम अर्जुन पर हावी था.

"ऋतू मदद करेगी तेरी और जब भी उनसे मिले (ज़ुबैदा), इस बार पहल खुद करना जिस से दर्द के क्षण आ हे न सके."

"वह आर्टिस्ट है और शायद उनका जुड़ाव वह दर्द के साथ कही गहरा हो चूका है.", अर्जुन ने जवाब दिए तोह कोमल दीदी ने चुन्नी से हे उसका चेहरा साफ़ किआ. ऋतू तोह बात सुन्न कर हे उठ कड़ी हुई. वह उस बंद कमरे का दरवाजा खोलती अंदर दाखिल हुई तोह कोमल दीदी के चेहरे पर घबराहट आ गयी थी. ये कमरा अर्जुन और कोमल दीदी का हे था लेकिन वह अकेला उधर कभी गया हे नहीं था.

"दर्द से जुड़ाव हर आर्टिस्ट का होता है अर्जुन. िफ़ यू अरे वुंडेड, कवर आईटी एंड हील योरसेल्फ.", ऋतू दीदी ने एक फाइल उसके सामने कर दी. कोमल दीदी बस खामोश हो चुकी थी. अर्जुन ने दीदी के हाथ में राखी फाइल को खोला तोह पहले हे पैन पर ये रंगीन चित्र था जिसमे ये अर्जुन हे था बचपन का. उसके पीछे सिर्फ काली धुंधली परछाई जो वह जानता था के कोमल दीदी हे है. एक बार सामने दीदी को देखने के बाद अर्जुन ने अगला पन्ना देखा और इस बार वह बस जम्म हे गया था उस चित्र पे.

8-9 साल की ये खूबसूरत लड़की बंद दरवाजे पर पीठ लगाए बस रो रही थी. तस्वीर में सिर्फ ये दरवाजा, वह रोटी हुई छोटी सी लड़की और के दूर जाती हुई वह गाडी थी. अर्जुन की थम्म चुकी अश्रुधारा ये देख कर फिर से शुरू हो गयी. ऋतू दीदी हे तोह थी वह जो उसके जाते देख सबसे ज्यादा रोई थी. अगला पन्ना किसी स्याह पेंसिल से चित्रित था और इधर खाने की मेज खाली और वह बस बंद बर्तन सजे थे, जो कह रहे थे की घर में कोई भी खाने को तैयार नहीं था. अर्जुन अब दोनों में से किसी को न देखता बस इस फाइल के पैन पलट कर हर तस्वीर, उसमे वर्णित pyaar-dard और बनाने वाली की अध्भुत्त कला को जिवंत महसूस कर रहा था.

"ये जिस दिन मैं यहाँ वापिस आया था, हमेशा के लिए.", अर्जुन ने रट हुए हे इस चित्र को उन दोनों के सामने किआ. गलियारे से चिप्प कर ये लड़की घर में प्रवेश करते इस लड़के को चोरी चिप्पे निहार रही थी. इतने बड़े चित्र में घर के भूगोल के सिवा बस यही दोनों थे.

"हाँ.", कोमल दीदी ने चेहरे पर मुस्कान लाते हुए कहा और ऋतू की भीगी पलके शर्म से झुक गयी.

"इसमें मेरे साथ दादा जी, दादी और ताऊ जी भी थे. घर का आँगन इतना खाली तोह नै होता.", अर्जुन ने मासूमियत से सवाल किआ. वह अपनी आँखें साफ़ किये बस इस लड़की को देख रहा था.

"जो होने चाहिए वही तोह है. तेरे सामने तोह माधुरी दीदी और संजीव भैया भी थे उधर. लेकिन कहानी तोह तेरी हैं न.", कोमल दीदी ने प्लेट एक तरफ रख दी थी और वह थोड़ा पास खिसक आई. अर्जुन ने अगले पैन को देखा तोह न चाहते हुए भी उसके चेहरे पर शर्म आ गयी थी. इस पैन पर जहा एक माँ अपने छोटे बचे को दूध पीला रही थी, वही 2 लड़किया एक दरजे में झाँक रही थी और साथ हे तीसरा दृश्य भी इस पैन में था जहा लड़का इस लड़की को चूम रहा था.

"ये समझ नहीं आया.", अर्जुन ने झेंपते हुए कहा तोह कोमल दीदी मुस्कुराने लगी. ऋतू दीदी उनका हाथ पकड़ कर दबती हुई अर्जुन को रोकने का इशारा करने लगी लेकिन कोमल दीदी ने मन कर दिए. अर्जुन ने अगला पन्ना पलटा तोह 17क्ष14 इंच के इस कागज़ पर अध्भुत्त चित्र था. इस से पहले तोह जहा सिर्फ कहानी के किरदार से उकेरे गए थे जिन्हे कोई जानकार हे समझ सकता था लेकिन ये बड़ी म्हणत से तैयार किआ सजीव चित्र था. रंगो से जैसे hu-b-hu तस्वीर बना दी गयी हो जैसे. लेकिन ऐसा कैसे मुमकिन था करना?

ये अर्जुन और ऋतू हे थे, साक्षात्. अर्जुन ने इस चमकदार चित्र पर ऊँगली फिरै तोह ऋतू अपनी बड़ी बहिन से हाथ छुड़ा कर उठने की कोशिश करने लगी. थोड़ी सी जमीन पाँव के निचे दर्शायी गयी थी जहा अर्जुन खड़ा था और उसकी कमर पर पाँव लपेटे ऋतू आँखें बंद किये अर्जुन को चूम रही थी. शरीर का हर विश्लेषण पूरी गहराई से किआ गया था और उतना हे गहरा दृश्य था उन दोनों के आत्मिक क्षणों में दिखने वाले भावो का.

"10 दिन में ये छोटी सी पेंटिंग पूरी हुई थी. बस सवाल मैट करना और इस से आगे अभी कुछ नहीं देखना.", कोमल दीदी ने झट्ट से वह फाइल लेते हुए ऋतू को थमाई और अब अर्जुन को देखने लगी.

"दर्द से सफर कहा तक आ पंहुचा?"

"प्यार तक.", अर्जुन ने संक्षिप्त सा उत्तर दिए.

"इसलिए ऋतू ने तुमसे वही कहा के दोनों में से एक को तोह संतुलन बनाना पड़ेगा. आइंदा माफ़ी मैट मांगना.", कोमल दीदी उसके माथे को चूम कर बहार चली गयी और अर्जुन ने तुरंत दरवाजा बंद करते हुए उस कमरे का रुख किआ जहा ऋतू दीदी गयी थी लेकिन वह भी उस कमरे को बंद करती बहार निकल हे आई थी. अर्जुन ने वही दरवाजे से सताते हुए अपने होंठ उनसे जोड़ दिए और बाहें कमर में लपेट ली. जिस शिद्दत से वह उन्हें चूम रहा था वह पर्याप्त थी बताने के लिए की आज ऋतू का उसके लिए प्रेम कही ज्यादा था.

"बस करो अब नहीं तोह दीदी से शिकायत कर दूंगी.", अर्जुन के सीने पर हाथ रखती वह जिस अदा से अर्जुन को देख रही थी उसमे जवाब से विपरीत भाव थे.

"वैसे शादी के बाद रिश्ता क्या होगा?", अर्जुन फिर से गाडी वही ले आया था जहा थोड़ी देर पहले अटकी थी.

"वह बड़ी दीदी हे रहने वाली है. तुम नहीं जानते उन्हें और फ़िलहाल कोई shaadi-vaadi नहीं. प्रीती से प्लान बनाये बैठे हो तोह जा कर आराम कर लो थोड़ा. साढ़े 11 से ऊपर समय हो गया है.", ऋतू दीदी को सब पता रहता है और प्रीती जैसे उनसे कुछ चिपटी हे नहीं थी लेकिन उसने बताया कब?

"सोचो मैट, बाकी सब फ़िलहाल उधर फिल्म देख रहे है और मैं भी चलती हु.", जाते हुए ऋतू दीदी ने अर्जुन के गाल को चूमा और बहार निकल गयी. घर के काम करने के लिए 2 बाई रख ली गयी थी जो सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक काम करती थी इसलिए ज्यादातर सदस्यों के पास अब भरपूर समय था.

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यहाँ गुलाटी के फार्महाउस पर 12 बजे अलग हे नजारा चल रहा था. तबादले की ख़ुशी की महफ़िल जरा देरी से शुरू हुई थी और सांगवान ने अपने परिचित अंदाज में 2 विदेशी अप्सरा इस ख़ास रात को रंगीन करने के लिए मंगवाई थी. दुनिया की नजर में सफेदपोश, मेहनती और अपने बूते काबिल डॉक्टर बन्न ने वाले ये लोग यहाँ हमाम में नंगे हे थे. गुलाटी की गॉड में बैठी ये 6 फ़ीट लम्बी नीली आँखों वाली रूसी युवती जरुरत से ज्यादा हे दुबली लेकिन ज्यादा हे जवान थी. गुलाटी उसके साथ अपना जाम बाँट रहा था और बीच में कभी उसके सुर्ख होंठो को चूमता तोह कभी उस 6 इंच की स्कर्ट में हाथ दाल कर छूट को मसल देता.

"ये भाई कहा पे है? 15 मिनट हो गए बाथरूम गए.", शंकर जी भी सामने बैठे जाम पी रहे थे और उनके कहते हे सांगवान के साथ राजकुमार जी इधर हे आते दिखे. सांगवान का हाथ उस दूसरी रूसी लड़की की कमर में था जो सिर्फ वक्षो पर एक ब्रा पहने थी लेकिन नीचे से अल्फ नंगी अपनी दूधिया लम्बी टाँगे दिखा रही थी. नजदीक आते आते उसकी गुलाबी छूट भी दिखने लगी जहा गीलापन बता रहा था के वह क्या करके आई है.

"शंकर यार राजू भाई तोह इसको फर्श पे लिटाये हे पेल रहे थे. देख जरा क्या हालत करदी मेरी कबूतरी की. डार्लिंग अरे यू okay?", सांगवान हँसता हुआ बराबर आ बैठा और गॉड में वह सुंदरी. राजकुमार जी भी मुस्कुराते हुए अपने पाजामे के सामने वाले भाग को ठीक करने के बाद गोल टेबल पर पड़ा अपना गिलास उठा कर चुसकने लगे.

"I'm मोरे थान बेटर डार्लिंग. हे वास् बिट वाइल्ड बूत I'm साइबेरियन. उमाठ.", रुस्सियन सुंदरी बता रही थी की वह खुश है और राजकुमार जी को उसने आराम से झेल लिए था. दोनों एक दूसरे के होंठो का रसस्वादन करने लगे तोह राजकुमार जी ने हे चर्चा शुरू की.

"तू खाली कैसे है शंकर? ये एक नंबर लड़की है तरय कर के देख भाई."

"आपने कर ली न तरय तोह एक हे बात है.", शंकर जी ने भी हँसते हुए जवाब दिए और दोनों ने जाम भिड़ा लिए.

"जाट तू राजू भाई को ले कर अंदर जा, छोटी डॉक्टरनी इतना के सामने न आती.", गुलाटी की बात को समझ कर दोनों वापिस खड़े हो गए.

"राजू भाई आप दूसरी भी साथ ले चलो, बालकनी चुदाई में बदल बदल के इन रंडियो का शिकार करते है. साइबेरिया की शेरनी साली.", सांगवान के कहते हे गुलाटी ने वह दूसरी रुस्सियन बाला को भी उनके साथ जाने को कहा तोह ये चारो लोग फार्महाउस में बानी कोटि के ऊपरी भाग में चल दिए. वह से भी ये घास का बगीचा पूरा दीखता था. अगले 10 मिनट में हे ये खूबसूरत युवती अंदर बने छोटे हॉस्पिटल से निकल कर इनकी तरफ आ गयी. ये पीले कमीज और सफ़ेद सलवार में आकर्षक युवती डॉ लवलीन थी, जो शायद किसी ख़ास मरीज का इलाज कर रही थी अतिरिक्त समय में.

"हो गया ऑपरेट लवलीन?", मेहुल गुलाटी ने एक साफ़ गिलास में जाम बनाने के साथ हे उन दोनों के बीच कुर्सी खिसकते हुए लवलीन को बैठने के इशारे के साथ हे सवाल किआ.

"जी सर ख़ास मुश्किल नहीं आई लेकिन...

"लेकिन क्या लोवी?", इस बार शंकर जी ने जाम उठा कर लवलीन की तरफ बढ़ाया तोह उसने शरमाते हुए वह पकड़ लिए. नजरे झुकाये वह जैसे खुद को मजबूत कर रही थी. गुलाटी मुस्कुरा रहा था ये देख कर. टेबल पर रखे एक पैकेट से 500 की गद्दी बहार निकल कर इस खूबसूरत डॉक्टर के सामने रख दी जिसको देख वह थोड़ा चौंक उठी.

"सर ये?"

"तुमने ऑपरेट किआ तोह ये उसकी पेमेंट है लोवी. तुम्हारा हिस्सा.", शंकर जी ने उसका एक हाथ अपने पंजे में लेते हुए प्यार से उंगलियों के बीच उंगलिया फंसा ली. लवलीन ने एक सांस में हे पूरा गिलास गले से नीचे उतारने के बाद शंकर की आँखों में देखा. जाम एक बार में पीने से आँखों में थोड़ा पानी आ गया था और चेहरे पर लाली.

"आप इतना ख्याल क्यों रखते हो मेरा?", लवलीन ने शंकर जी का हाथ अपनी तरफ करते हुए मजबूती से वैसे हे उंगलिया फसाये पुछा.

"तुम भी तोह शिकायत का मौका नहीं देती.", शंकर जी ने दोनों के लिए ek-ek जाम बनाया और उधर गुलाटी आराम से थोड़ी दुरी पर बैठा सिग्रत्ते के साथ शराब का मजा लेता इन दोनों को देख रहा था. इस बार लवलीन ने दिलेरी दिखते हुए एक जाम उठा कर खुद शंकर जी के होंठो से लगाया और कुर्सी से उनकी गॉड में हे आ बैठी. उसके घने कंधे से नीचे तक लम्बे बाल और वह प्यारा चेहरा सचमुच अलग हे ऊष्मा देते थे लवलीन को. और शंकर जी की किस्मत जो अपने से 20 साल छोटी इस जवान लड़की के सान्निध्य में थे.

"मैं आपको हमेशा खुश देखना चाहती हु और मुझे ाचा लगता है जब आप करीब होते हो.", उसके बाद एक घूँट लेती वह आँखें बंद करके शंकर जी के होंठो से जा लगी. गिलास एक तरफ रखते हुए शंकर जी ने असली खेल शुरू कर दिए जिसमे लवलीन को कही कोई ऐतराज़ न हुआ. पीला कमीज उतारने में उसने खुद हे मदद दी और एक सफ़ेद खूबसूरत ब्रा में उनके सीने से लगी वह बस उन्हें choom-chaat रही थी. जल्द हे ब्रा की पट्टी भी खुल गयी तोह मॉटे मॉटे दूध बेपर्दा सामने आ गए. गुलाटी इस मंद रौशनी में ये नजारा देख अपने अंग को पतलून के ऊपर से हे सहलाने लगा. लवलीन इन दोनों की ज़िन्दगी में आई सभी nurse-doctor में से अगर सर्वोच्च नहीं भी थी तोह उनमे से एक जरूर थी.

'माल तोह ये है साली. जाट और राजू भाई तोह सफ़ेद नाले में बेकार पागल हो रहे है और मजे बहनचोद शंकर के है. चलो इस जन्नत में मेरा भी नंबर है.", गुलाटी मैं में खुस था और इधर लवलीन ने दूसरा जाम खाली करने के बाद सलवार भी उतार दी थी. शंकर जी का सख्त लुंड अपने मादक होंठो से गीला करती वह उसपर धीरे धीरे बैठती अपना एक सतांन उनके मुँह में भरने लगी.

"आठ.. डॉक्टर... थिस इस थिक.. आईटी फीलस सो गुड इनसाइड.. उम्म्म ी लव यू...", उसका अंदाज बता रहा था के शंकर के साथ लवलीन की ये कोई पहली रात न थी और लवलीन को गहरा प्यार हो चूका था शंकर से जो उसके ऐसे बेबाक प्यार करने पर साफ़ पता चल रहा था. दोनों पाँव जमीन पर रखे वह खुद हे अपने गोर मॉटे नितम्ब उठती उस मजबूत लुंड पर होली होली ऊपर निचे हो रही थी. शंकर उसके होंठो को चूसता दोनों चुचो को भी सकती से मसल रहा था.

"ओह्ह्ह.. गॉडडडड.. I'm दोने.. आअह्ह्ह्ह..", कोई 5-6 मिनट में हे वह झाड़ कर शंकर से लिपट गयी लेकिन लुंड अंदर दबाये हुए.

"मेरा नहीं हुआ अभी."

"ी क्नोव, ये एक्ससिटेमेंट थी न जो 9 दिन बाद हम मिले है उसकी तोह जल्दी हो गया. आपको शिकायत का मौका नहीं देने वाली मैं.", शंकर जी की भी सिसकी निकल गयी जब इतना कहते हे लवलीन ने लुंड को छूट में कस्ते हुए चक्की की तरफ कूल्हे हिलाये. लेकिन गुलाटी से जैसे सबर न हुआ और वह लवलीन की चिकनी पीठ चूमने की गलती कर गया. अगले हे पल वह लड़की अपने कदमो पर कड़ी कभी शंकर को तोह कभी गुलाटी को घूरने लगी. दोनों कुछ बोलते उस से पहले हे जमीन से सलवार पहनती लवलीन हे बोल पड़ी.

"सॉरी मेहुल सर, I'm नॉट ओने ऑफ़ ठोस गर्ल्स हु यू बोथ डिकेड टुगेदर. डॉ शंकर से मैं प्यार करती हु तोह ये अगर सड़क पर भी नंगा करेंगे तोह मैं तैयार हु लेकिन मेरे जिस्म पर इनके सिवा किसी का अधिकार नहीं है. सॉरी डॉक्टर, ी गेस थिस इस नॉट आउट प्राइवेट प्लेस. होप ी didn't रुइनेड योर कम्फर्ट यूनियन.", बिना ब्रा के हे लवलीन ने ऊपर कमीज पहनी और bra-paise वही छोड़ कर एक तरफ कड़ी अपनी मारुती 800 की तरफ चलने लगी.

"सॉरी डॉक्टर लवलीन. मैं एक्साइट हो गया था. Don't स्पोइल योर मूड एंड कंटिन्यू व्हाट यू वेरे दोंग विथ शंकर. I'm गोइंग इनसाइड."

"It's ऑलराइट सर. मैंने आपकी पार्टी खराब कर दी है लेकिन आगे से ऐसी गलती नहीं होगी.", ठिठक कर लवलीन ने गुलाटी को विनम्रता से जवाब दिए तोह शंकर जी भी हाथ में ब्रा और पैसे लिए उसके पास आ पहुंचे.

"मेरी गलती है लोवी. मेहुल ऐसा नहीं है और उसको हम दोनों के बारे में अंदाजा नहीं था. कोई बात नहीं हम फिर बात करेंगे.", ब्रा और पैसे पकड़ते हुए शंकर जी ने गाल चूमा तोह वह सिर्फ ब्रा ले कर चल दी. जाने से पहले आँख मार गयी थी जैसे कोई आपसी इशारा किआ हो. कार के जाते हे गुलाटी ने शंकर से माफ़ी मांगी.

"तू पागल है यार? ये तेरे साथ भी करेगी लेकिन ऐसे नहीं. चल 1-1 जाम लेते है फिर घर भी जाना है. वैसे माल पसंद आया न?"

"साले ये माल हे ऐसा था के सबर नहीं हुआ यार लेकिन मेरी वजह से तेरा काम अधूरा रह गया.", गुलाटी ने जाम बनाते हुए दुःख प्रकट किआ.

"तू टेंशन न ले मेरे भाई और वैसे पीछे से वह अभी तक कोरी है, तेरे लिए.", शंकर जी ने हँसते हुए गुलाटी की जांघ पर थपकी मारी.

"तेरा कुछ नहीं हुआ वही चिंता है."

"घर में तेरी भाभी है, वह तबियत से म्हणत करेगी. जवानी उसकी भी अभी तक बाकी है.", शंकर जी इतने नशे में नहीं थे लेकिन अपनी हे बीवी का उल्लेख करते हुए कोई हिचक न हुई.

"रेखा भाभी मेन्टेन है अभी तक यार. मेरे वाली का तोह मुँह भी ढीला हो चूका बाकी सबकुछ ढीला होने के बाद. पता नहीं कोनसी खुराक लेती है वह जो आजतक जवान पड़ी है.", गुलाटी ने इस बार एक घूँट में हे आधा जाम खली कर दिए था.

"पूछ के देखूंगा क्या पता तेरे वाली के सब टाइट हो जाये. वैसे बड़ा जोश आ गया रेखा का जीकर होते हे?"

"न ऐसी बात नहीं है भाई, रिश्ता अपनी जगह है और वही सचाई है. बाकी सुन्दर है तोह तारीफ हे करूँगा.", गुलाटी का अनुसरण करते हुए शंकर ने भी आधा जाम खली कर दिए.

"लता के साथ जो सुकून मिलता है न वह तेरी भाभी के साथ भी नहीं मिलता. ाची औरत है रेखा जो परिवार, बचो के साथ हे उलझी रहती है. कुछ कहती नहीं सामने से."

"मधुलता कहा कुछ मांगती है? और रेखा भाभी की ऐसी हालत हमारी जीवनशैली की वजह से हे तोह है."

"लता मांगती है भाई, वह अपना हक़ भी जताती है और हर महीने 2 बार मुझे उस से मिलने जाना पड़ता है नहीं तोह वह खुद आ जाती है. लेकिन अब वह भी कैसे आ पायेगी?", शहर बदलने की ये एक चिंता वाली बात थी शंकर के जेहन में जो सामने आ गयी.

"हाँ शंकर. और लता का सामना रेखा से होगा तब? शादी में जैसा तूने बताया तोह बड़ी भाभी का aana-jana तोह पक्का रहेगा. क्या करेगा ऐसे में तू?", गुलाटी का ये सवाल तीक्ष्ण था, सूई की तरह.

"लता के बारे में बताया न के वह हक़ लेना जानती है. कही वह मेरे करीब आ गयी उस मौके पर तोह परेशानी हो सकती है लेकिन रेखा कुछ नहीं कहेगी जितना मैं जानता हु.", शंकर जी की सोच देख कर गुलाटी ख़ामोशी से बाद देखता रहा और फिर अपने होंठ खोले.

"वह परिवार है शंकर, कुछ भी ऐसा वैसा मत करना जिस से रेखा के प्रति लापरवाही महंगी पड़े. पंडित जी की बहु रेखा है और अगर इस बीच कुछ ऐसा वैसा हुआ जो तेरे दिमाग में चल रहा है तोह मैं लिख के देता हु अर्जुन तेरा काल बन्न जायेगा. सांगवान चाचा ने कहा था न के गलती से कुछ भी ऐसा वैसा मैट करना के उस लड़के को किसी राज की भनक लगे. तेरा बीटा जरूर है लेकिन हर बीटा अपनी माँ के लिए क्या कर गुजरता है वह तू मेरे से ज्यादा बेहतर जानता है. बड़ी भाभी को उनका स्थान उनके घर में देना, ऋचा की शादी में देना और किस्मत ाची रही जैसा की अर्जुन को देखते हुए मुझे लगता है के होगी हे तोह तेरे रिश्ते को तेरे परिवार में सहमति अर्जुन दिलवा देगा. मर्द में न यही प्रॉब्लम होती है जो औरत ऊँगली पर नचाये उसकी कदर और जो चुपचाप हर जिम्मेवारी निभाए उसकी गांड मार लो.", गुलाटी की ऐसी तीखी बातें और नाराजगी शंकर जी के भी दिमाग में सटीक जा बैठी.

"बचा लिए दोस्त तूने, मैं तोह यही सोच रहा था के लता घर आई तोह मैं उसको पहली पत्नी का स्थान देने की कोशिश करूँगा. लेकिन भूल गया था के मैं उस परिवार का सदस्य हु. रेखा मेरी बीवी होने से पहले उस घर की bahu-beti है, माँ है 4 बचो की. उसके साथ ऐसा करना सबसे बड़ा पाप होता."

"पाप हम ढेरो करते है दोस्त. घर से बहार और ये दोनों भी आ गए शायद लड़किया आराम करेंगी थोड़ा. तुझे रुकना है?"

"नहीं मैं और भाई जा रहे है बस, पहले हे बहुत देर हो चुकी है.", शंकर ने समय पर नजर डाली तोह पौने 2 बजने वाले थे. मतलब घर पहुंचने में 2 हो हे जाने थे. राजकुमार जी को साथ लिए वह दोनों से मिल कर घर के लिए निकल चले. नशा दोनों को हे था लेकिन शंकर जी को आदत थी इस सबकी वही राजकुमार जी को ऐसे हे रहना ाचा लगने लगा था. वह तोह चलते हुए भी जाने क्या क्या बोल रहे थे.

"शंकर यार तेरी भाभी, किसी काम की हे नहीं है. ललिता दिल की ाची है लेकिन उसका बदन फ़ैल गया है और नखरे पूछ हे मैट. जाते हे नींद आ जाती है उसके पास और न उसका दिल करता है मुझे खुश करने का."

"कोई बात नहीं भाई. उम्र हो जाती है तोह ऐसा हे होता है औरत के साथ. लेकिन आप तोह घर से उधर भी मस्ती करते हो और मौका यहाँ मेरे साथ भी मिल जाता है.", गाडी में गाने चलते हुए वह मुस्कुरा रहे थे अपने बड़े भाई की बात सुन्न कर. और उन्हें भी मालूम था के राजकुमार जी को जवान लड़कियों का चस्का लग चूका है तोह अब उनकी भाभी कहा पसंद आने लगी उन्हें. जैसे वह खुद भी थे, रेखा उनकी जिम्मेवारी थी और कोई हल न होने पर शरीर को आराम देने वाली आखिरी औरत.

"सच कहा यार शंकर तूने. ये फिरंगन जो नशा करती है वह तोह कोई कुंवारी भी न देगी. हाँ लेकिन देसी भी घर की भैंस से ाची हे है.", ऐसे हे दोनों अपनी बातें करते घर आ पहुंचे. समय 2 से कुछ मिनट ऊपर हे हो चूका था. दरवाजा खोलने अर्जुन हे आया जो अभी बस एक निक्कर में था और शरीर पर थोड़ा पसीना.

"जेंटलमैन, सोये नहीं अभी तक?", शंकर जी ने गाडी कड़ी करने के बाद दरवाजा के टाला लगते अर्जुन पर ाचे से नजर घुमाई. दतियाकर सा उसका शरीर उन्हें भी ाचा लगा था. उनका भाई नरिंदर कही न ठहरता अर्जुन के इस फौलाद से जिस्म के सामने लेकिन मासूम चेहरा बताता था के ये लड़का जल्लाद नहीं है.

"पापा, पढ़ रहा था और गेट बंद था तोह आप बेल्ल बजाते इसलिए इन्तजार भी कर रहा था. मैं चलता हु. गूडनिघत पापा, गूडनिघत ताऊजी.", अर्जुन बहार वाली सीढ़ी से जल्द ऊपर हो लिए और दोनों भाई गलियरे से होते हुए अपने अपने कमरे की तरफ बढ़ चले. राजकुमार जी तोह घुस गए अपने कमरे में लेकिन शंकर जी के अरमान Ritu-Rupali ने ध्वस्त कर दिए. आज उनकी बीवी भी आहात से न उठी थी जो दोनों बेटियों को aaju-baju लिए गहरी नींद में थी.

'साली जाग हे जाती तोह बाथरूम में हे ठंडा कर लेता. कोई बात नहीं मधु की नाराजगी भी दूर कर देता हु आज.', शंकर जी को अब नशा हो रहा था, शायद शराब हे ऐसी थी जो देरी से चढ़ती हो और कार में वातानुकूलन ने भी अपना असर दिखा दिए था. ऊपर से जिस्म की आग कुछ सोचने भी न दे रही थी. संभल कर ये भीतर आँगन वाली सीढिया चढ़ते वह दूसरी मंजिल वाले ड्राइंग हॉल के बहार वाले दरवाजे तक आ खड़े हुए. जाली का दरवाजा बंद न था लेकिन आगे लकड़ी वाले पर अंदर से चिटकनी लगी थी. कोशिश करते हुए ख़ास तरीके से ऊँगली से ये khatt-khatt करने के बाद वह खड़े रहे.

'अर्जुन तोह उधर सो रहा है दरवाजा बंद कर के. अब कौन आ गया?', मधु बुआ का नींद उचट गयी थी क्योंकि रेणुका अभी अभी बाथरूम गयी थी. तुरंत उठ कर दरवाजा खोला तोह सामने अपने भाई शंकर को खड़ा देख चौंक गयी.

"मधु, प्यार करना है."

"श.. यहाँ रेणुका भी है शंकर, तुम छत्त पर चलो मैं 5 मिनट में आती हु.", मधु के चेहरे पर खौफ के साथ चिंता भी उभर आई थी. शंकर ने जाने से पहले एक उभार दबा दिए.

"अंदर कुछ नहीं है. मतलब.."

"शंकर ऊपर जाओ मैं आती हु.", धीमी लेकिन सख्त आवाज में मधु ने इतना कहा तोह शंकर जी कान पर हाथ रखते चले गए ऊपर छत्त पर.

'बस इसलिए मुझे इसका तबादला आखर रहा था. बहनचोद अपनी गर्मी निकालनी हो तोह दरवाजे आ खड़ा हुआ लेकिन इतने दिन में एक बार नहीं पूछा के मैं ठीक भी हु. अर्जुन काम से काम ध्यान तोह रखता है मेरा.', बड़बड़ाती हुई वह अंदर आई और रेणुका से पहले हे आँखें बंद करके सोने का नाटक करने लगी. जल्द हे रेणुका बाथरूम से आने के बाद गहरी नींद में वापिस चली गयी. उसके साथ ऐसा हे था जो मधु जान गयी थी इतने दिनों में. नींद में जाने के लिए रेणुका को 2 मिनट न लगते थे लेकिन साथ वाले कमरे में जो हलचल थी वह मधु को भी न पता था.

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आज अर्जुन ने रेणुका बुआ को अकेले में बता दिए था के प्रीती से वह रात में मिलने वाला है इसलिए वह अपने कमरे में रहेगा और कमरा बंद रखेगा. रेणुका बुआ को थोड़ी हैरानी हुई थी की ये सब कैसे होगा और कही वह दोनों कुछ ऐसा वैसा तोह नहीं करने वाले. लेकिन अर्जुन ने आश्वस्त किआ था के बस वह समय बिताना चाहता है इसलिए ek-dedh घंटे उसके साथ रहेगा. ठीक 1 बजे अर्जुन प्रीती को लेकर इस कमरे में घुस आया था. वह भी इस सबमे एक रोमांच महसूस करती खुश भी थी और सावधान भी.

"हम कर क्या रहे है ऐसे?"

"प्यार. चोरी चोरी. बस तेज मैट बोलना और बोल भी लोगी तोह वह लोग नहीं उठने वाली.", अर्जुन ने कमरे में आते हे प्रीती को बाहों में कस लिए था. प्रीती तोह हमेशा तैयार हे रहती थी अर्जुन के लिए. जल्द हे दोनों उस बड़े बिस्टेर पर एक दूसरे को मसलते हुए जीभ की लड़ाई लड़ने लगे.

"गंदे कही के. ऐसा वैसा कुछ मैट करना पहले कह देती हु.", प्रीती ने वह ढीली रेशमी कमीज उतारते हुए दोनों सख्त उरोज खुद हे बेपर्दा कर दिए. अर्जुन ने भी सीना निर्वस्त्र किआ और फिर से उसको बाहों में लिए होंठो को चूसने लगा. प्रीती उसके सीने पर लेती उसके लिंग को भी अपने यौवन से रगड़ रही थी.

"एक तोह खुद इन्हे सामने रख देती हो ऊपर से कहती हो कुछ करना हे नहीं. इन्होंहे बहोत तड़पाया है तुम्हारी तरह.", एक अनार को हाथ में पकड़ कर मसलते हुए अर्जुन तीखे निप्पल को अंगूठे से रगड़ता हुआ सख्त करने लगा.

"आह.. आराम से बाबा. मुँह में लो इन्हे, ाचा लगता है.", प्रीती तोह सामने से हे उसको न्योता दे रही थी. चेहरे के ऊपर झुकती वह खुद को भी अर्जुन के मॉटे सुपडे पर सही से टिकती हुई अपनी गर्मी दिखने लगी. अर्जुन जल्द हे इस जन्नत से मजे में हवा में उड़ता प्रीती की रेशमी निक्कर में हाथ डाले दोनों सख्त और गोल कूल्हों को निचे लुंड की तरफ दबाने लगा.

"उम्म्म.. हुआ क्या है तुम्हे? पहले तोह बेचैन थे और अब शैतान बन चुके हो. निप्पल दुखता है.. आठ.. आराम से न जान.. उम्म्म्म इसको भी निकालो बहार.", अर्जुन ने वह गीला उभर मुँह से निकलते हुए ना में गर्दन हिलाई.

"जिसको जरुरत है वह अपना काम करे. मैं बिजी हु डार्लिंग.", अर्जुन ने दूसरे चुके को पकड़ कर मुँह में लिए तोह प्रीती ने हाथ से उसकी गोलिया पकड़ ली. अर्जुन के होंठ वही ृक्क गए.

"निकलते हो या फायर कर दू?"

"रुक रुक.. निकलता हु.. तुम सचमुच बिल्ली हे हो, हर वक़्त रॉब मारने वाली.", अर्जुन ने निक्कर को नीचे खिसकाया तोह प्रीती ने भी अपना दूसरा वस्त्र बराबर में रख दिए.

"मुझे न मेरा ये बड़ा चूहा बहोत पसंद है, बस बात माने आराम से. नहीं तोह पंजा गलत जगह लग गया तोह मेरे किसी काम के नहीं रहोगे. और मैं होश में न राहु तब भी अंदर मैट करना.", प्रीती ने अर्जुन की कमर के दोनों तरफ अपने चिकने पाँव करते हुए बैठने से पहले चेताया और अर्जुन ने हाथ बढ़ा कर वह बंद गुलाबी छूट हथेली से सेहला दी.

"होश में मैं नहीं रहता जब तुम सवार होती हो. और ये लगा लो.", अर्जुन ने वैसी हे धीमी आवाज में लोशन की बोतल देते हुए प्रीती से कहा तोह इस बार उसने ना में गर्दन हिला दी.

"ओरिजिनल लुबे ओनली.", मुस्कुराती हुई वह उस से लिपट गयी. सचमुच योनि की दरार में ऐसी चिकनाई थी जो 2 बार की रगड़ से अर्जुन को मजा दे गयी. हलकी मस्ती करते दोनों कोई जल्दबाजी नहीं दिखा रहे थे थोड़ी देर पहले की तरह. प्रीती अर्जुन के पूरे चेहरे को चूमती हुई बस दोनों के अंग आपस में रगड़ रही थी. अर्जुन उसकी पीठ और कूल्हे सहलाता बस उसके साथ ये बहुमूल्य पल बिता रहा था.

"ाचा बताओ न क्या बताने वाले थे?", प्रीती ने अर्जुन की दोनों छाती पर अपने पंजे टिकते हुए अर्जुन से सवाल किआ. वह अभी भी अपनी नरम योनि को उस दहकते डंडे पर लंबवत घिस रही थी.

"एक तोह तुम्हे बिना कहे हे पता चल जाता है के मैं कुछ बताने वाला था."

"तुम्हारी तड़प न सेक्स वाली तोह होती नहीं है क्योंकि ये तोह कभी भी कर सकते हो, मैं रोकने वाली नहीं और वैसे भी मैं खुद हे चाहती हु की एक बार फिजिकल जल्दी हो जाये."

"पागल हो क्या?"

"बाबा, जहा तुम दबा रहे हो वह से. ी क्नोव तुम इधर सिर्फ शादी के बाद हे करोगे लेकिन मुझे तुम्हारे साथ बाकी कोई प्रॉब्लम नहीं है. Oral-anal में लेकिन मेक आईटी स्पेशल. वह छोडो बस बात बताओ.. आठ.. तुम हिलो मत.", सूपड़ा गलती से छूट के मुहाने लगा तोह प्रीती ने अर्जुन की छाती नीचे दबा दी.

"ाचा ाचा सुनो. मैं पंजाब गया था न तोह कल तोह कुछ नहीं हुआ था ऐसा जो अजीब लगता लेकिन आने से थोड़ी देर पहले कुछ अजीब हुआ. आह्हः.. तुम जोर मत लगो वह.", प्रीती ने मस्ती में लुंड को थोड़ा तेज भींच लिए था और वह मुस्कुरा रही थी अर्जुन की हालत पर.

"ाचा ाचा बोलो वह लड़की कौन थी."

"चुप भी किआ करो कभी तोह. इतना हे पता है तोह ठीक है फिर नहीं बताता.", अर्जुन ने हलके पसीने से चिकने हुए दोनों उभर थाम लिए. उन्हें ख़ामोशी से सहलाते हुए वह आँखें बंद किया प्रीती की मादकता का लुत्फ़ लेने लगा.

"ाचा बोलो नहीं डिस्टर्ब करती.. उम्म्म्म.. और जंगली मैट बनो फिर रोना पड़ेगा.", चुचो पर ज्यादा दबाव देते हे अर्जुन को चेतवानी से कहा.

"सच कहु मैंने अगर कोई असाधारण इंसान लाइफ में देखा है तोह वह कोमल दीदी, ऋतू, तुम और आचार्य जी हे हो."

"तुम मंजू को भूल रहे हो.", प्रीती ने टोकते हुए बीच में कहा. छूट की रगड़ एक पल के रोक दी थी उसने.

"मेरी माँ, ध्यान से सुना जो कहा मैंने?"

"मंजू भी ख़ास है, हर लिहाज से."

"हाँ मंजू ख़ास है और मेरी बीवी भी है. ठीक है.", अर्जुन चुप्प हो गया तोह प्रीती ने खिलखिलाते हुए उसके होंठो को प्यार से चूम लिए.

"गुस्सा मेरे साथ हे आता है तुम्हे. छेड़ रही थी अब बोलो."

"देखो प्रीती मंजू ख़ास है लेकिन उसका जीकर हमारे समय में नहीं करना और उसके पास मैं तुम्हारा जीकर कर सकता हु क्योंकि तुम पहला प्यार हो मेरा और वह जानती है. बात हो रही थी असाधारण की, ख़ास की नहीं. ऐसे तोह ख़ास माँ भी है, दादा जी भी है और संजीव भैया अलका दीदी भी है. लेकिन मैंने आरती दीदी की ये सहेली देखि जो दुनिया से अलग थी. मतलब कई बार सिर्फ शब्द काम नहीं करते."

"तुम्हे एक और बार प्यार हो गया?"

"बिलकुल नहीं. ऐसा होता तोह ऋतू दीदी तुम्हे बता चुकी होती और मैं तुमसे नजरे न मिला पता."

"फिर ठीक है. उमाठ.. मेरा प्यारा मुन्ना.", प्रीती नौटंकी करती भी शिद्दत से उसके होंठो को चूमते हुए बोली. अर्जुन भी मुस्कुराने लगा उसकी हरकत देख कर.

"एक ख़ास एनर्जी होती है किसी किसी इंसान में, मैंने इसके बारे में पढ़ा था. और वह मैंने फील किआ इस लड़की को देखते हे. लेकिन वह वैसी हे जो किसी भी इंसान पर भरोसा न करे, जबतक शायद ये ख़ास तरंग न मिले उसके साथ. वैसा कुछ तुम्हारे साथ भी है बस तुम डर्टी नहीं हो और हावी हो सकती हो उस इंसान पर जो करीब है तुम्हारे."

"तुम इतना कुछ ऑब्सेर्वे करते रहते हो? थोड़ा बेमतलब सा है लेकिन सुन्न कर ाचा लगा."

"प्रीती, मैं super-human वाली बात नहीं कर रहा. ये ऐसा कुछ है जैसा सिक्स्थ सेंस या थोड़ा सा अलग. तुम मुझे महसूस कर लेती हो न? आचार्य जी तोह पढ़ हे लेते है मुझे. दीदी के सामने मैं नंगा हे हु और ऋतू वह वह तोह जाने कैसे लेकिन अंदर हे है."

"क्योंकि तुम इन लोगो से लिमिट से कही ज्यादा जुड़े हुए हो अर्जुन."

"हाँ मान लिए लेकिन जो मैं कहना चाहता हु वह समझो. मैं कुछ नहीं करूँगा पर ये तुम कर सकती हो. अफसाना यहाँ शादी में आएगी और कोशिश करना उसके पास आने की. तुम कर सकती हो क्योंकि मेरा दिल कहता है."

"चलो अगर ये जरुरी है तोह पागलपन थोड़ा और कर लेते है लेकिन नाम ाचा है अफसाना. और दिखने में कैसी है?"

"देखा हे कहा मैंने? आँखें ऐसी है के जैसे कह रही हो के दूर रहो."

"हाहाहा.. मतलब इस लड़की ने मजनू को दूर भगा दिए?"

"धीरे हंसो, फंसवाओगी क्या? ऐसा भी नहीं है के कुछ गलत कहा हो लेकिन उसमे कुछ तोह अलग है."

"सच सच बताओ."

"कहते है सपने बताने से वह पूरे नहीं होते.", अर्जुन ने शरारत से दोनों उरोज पकड़ कर प्रीती को अपने ऊपर खींच लिए. वह भी ख़ुशी ख़ुशी उसने सीने लगी लेती रही.

"ऐसी बात है तोह नहीं पूछती क्योंकि मुझे पता है तुम्हारी शादी बस मुझसे हे होगी और मैं तुम्हारी जान ज़िन्दगी भर नहीं छोड़ने वाली.", प्रीती ने कास कर वह मोटा डंडा दबा लिए.

"आठ.. तुमसे हे बाकी है. और तुम बहोत हो जान लेने को.", अर्जुन ने करवट लेते हुए अपने बराबर हे प्रीती को लिटा लिए. दोनों हलकी मस्ती करते एक दूसरे को सहलाते हुए चूम लेते बीच बीच में.

"वैसे अगर वह ख़ास बन्न गयी तोह?"

"ऐसा सपने में भी नहीं होगा प्रीती. ख़ास तोह अब कोई और होगा हे नहीं हमारे बचो के सिवा.", अर्जुन ने ये बात उसको अपने दिल से लगते हुए कही.

"ऐसा करना के एक बेबी के बाद ऋतू दीदी को बिजी कर देना. मुझे हर साल चाहिए."

"मार खाओगी तुम उलटी सीधी बातें करती हो. एक हमारी गुड़िया, एक ऋतू की और एक अलका दीदी की. तुम लोगो के पास हो गए न 3."

"मंजू का भी तोह होगा. सॉरी."

"वह भी होगा लेकिन मेरी तीन लाइफ लाइन यही है बस.", अर्जुन ने दिल पर पत्थर रखते हुए जैसे ये कहा था. उसने कभी इतना भविष्य के बारे में न सोचा था न कोई बात की थी.

"ाचा इस अफसाना का क्या करना है?"

"करना क्या है? हमारी मेहमान होगी तोह ध्यान रखना है लेकिन मैं चाहता हु तुम उसको दोस्त बनाओ. कुछ लोग खुद को जानते नहीं और अगर जानते है तोह शायद डर कर रहते है. मैं उस ख़ास इंसान को आजाद देखना चाहता हु बस.", अर्जुन इतना कह पाया था के गाडी की आवाज से तुरंत निक्कर पहन कर उठ गया.

"आराम से लेती रहना, पापा होंगे और मैं गेट खोल कर 2 मिनट में वापिस आया. फिर घर छोड़ देता हु.", अर्जुन ने गाल चूमते हुए कहा और प्रीती निर्वस्त्र हे बिस्टेर पर फ़ैल कर लेट गयी. जाने का जैसे इरादा हे न था और नीचे अर्जुन अपना काम करके तुरंत वापिस आ गया.

"चलो सही टाइम है जाने का.", अर्जुन ने प्रीती को उठने को कहा तोह वह अपनी बाहें फैलाती उसको बुलाने लगी.

"एक बार प्यार करते है न थोड़ा, मैं यही सो जाउंगी. बोल दूंगी जल्दी वाक पर चली गयी थी."

"वाह. नाईट ड्रेस में तुम घर से बहार हो और वाक का बहाना? जल्दी पहनो फिर स्पेशल डे भी सेलिब्रेट करेंगे. उमाह.", उसके नरम होंठो को चूम कर अर्जुन ने खुद हे वस्त्र पहनाये और सावधानी से उसको लिए बहार आ गया. टाला सिर्फ अडया था जो आहिस्ता से खोल कर वह प्रीती के घर के सामने आ खड़ा हुआ.

"घोडा बनो.", प्रीती की बात सुन्न कर अर्जुन सर झुककये उकडू बैठा और वह दिवार पर जा चढ़ी.

"मोटी होती जा रही हो हर दिन के साथ."

"मुझे ये निक्कर टाइट करनी है डार्लिंग. चलो दफा हो. उमाह गूडनिघत.", दिवार के पर से अर्जुन के होंठो को चूम कर वह इस दरवाजे से हे अंदर चली गयी जो हमेशा हे बंद रहता था लेकिन यही पहला कमरा प्रीती का था. अर्जुन गहरी सांस लेता हुआ धीमे कदमो से घर में दाखिल होता हुआ टाला लगा कर अपने कमरे में चला आया. लेकिन ये फुसफुसाहट सी आवाज सुन्न कर बुआ और अपने बीच का दरवाजा खोलने से पहले कान साथ लगा लिए.

'ये क्या माजरा है? कौन होगा अब कमरे में? रेणुका तोह ऐसे बुआ से बात नहीं करेगी.', अर्जुन ने दरवाजे से हाथ हटते हुए कुछ पल इन्तजार किआ तोह आवाज आणि बंद हो गयी. और फिर बाथरूम का दरवाज खुला जिसका मतलब वह कोई था तोह बात कौन कर रहा था?

'पापा!', इतना सोचते हे वह दबे पाँव कमरे से निकल चला ये देखने की माजरा क्या है ये. पापा ने शराब पी हुई थी जो उनके करीब आते हे उसको पता चल गया था. माँ के पास नहीं गए क्योंकि वह तोह माँ ने खुद दीदी को बुला कर सुलाया था. बुला कर सुलाया था? पीने के बाद पापा दादा जी के कमरे में नहीं जायेंगे तोह बची छत या बैठक. और बुआ मतलब वह कुछ और हे करने वाले है. अर्जुन जानता था के ये हरकत किसी के सामने आई तोह बड़ा फसाद हो सकता है. फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर वह इसका हल सोच रहा था और वह बस यही था के बुआ को रोका जाये अगर वह कमरे में हे है. अर्जुन ने चपलता से लम्बे डेग भरते हुए बुआ के कमरे तक की दुरी सेकंड के हिसाब से तये कर ली थी लेकिन किस्मत खराब थी. यहाँ बहार से कुण्डी लगा कर वह ऊपर जा चुकी थी.

'बुआ, आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था.', हताश सा वह बेआवाज सीढ़ियों से ऊपर जाने लगा और 4 सीढ़ी पहले हे दिवार से सत् कर चाँद की रौशनी में सामने के भाग को देखने लगा. शंकर जी मधु के दोनों हाथ थामे खड़े थे और वह धीमी आवाज में कुछ कह रही थी जैसे. कुछ देर बाद शंकर जी उस अकेले गद्दे पर सीधा लेट गए और मधु बुआ दूसरी तरफ से उनकी कमर के पास बैठ वह अंग निकलने लगी जिसकी गर्मी शंकर जी को यहाँ तक ले आई थी. हाथ चला कर हिलाते हुए सीढ़ियों की तरफ भी देख रही थी.

"चुदाई नहीं करने देनी तोह न सही, मुँह में ले कर तोह करोगी? या पीछे करू?", शंकर जी की ये आवाज अर्जुन के कानो तक आ पहुंची थी और वह देख रहा था उसके पापा कैसे बुआ का सर नीचे झुका रहे है लेकिन बुआ जैसे उनका साथ नहीं दे रही थी. जैसे तैसे उन्होंने मुँह में लिए लेकिन तुरंत दूर हट गयी.

"किसी और की चुदाई करने के बाद इसको साफ़ कर लेना चाहिए था. हवस हे भरी रहती है न हलक में 2 घूँट जाते हुए?", बुआ ने धीमी आवाज में रोष जताया और गुस्से में एक तरफ थूकने के बाद हाथ से हे हिलने लगी.

"तेरे पास आता हे क्यों अगर वह साली अपना काम पूरा कर जाती तोह. आज बड़ा बुरा लगा तुम्हे इसका स्वाद, पहले तोह बिना कहे मुँह लगा लेती थी.", शंकर जी का तंज सुन्न कर बुआ कुछ भी न बोली लेकिन एक बार सामने सीढ़ियों में देख कर वह लुंड को थूक से चिकना करने के बाद फिर से हाथ से हिलने लगी. शंकर जी के हाथ गाउन के ऊपर से हे उनके मॉटे दूध दबाने लगे जिसकी मधु ने कोई परवाह न की. वह कोई बात किये बिना बस अपने काम में लगी रही.

"घोड़ी बन्न जा क्यों थक्क रही है मधु, 5 मिनट में फारिग हो जाऊंगा मैं.", शंकर जी जैसे मन रहे थे लेकिन मधु ने लुंड को हिलने के साथ हे गोलियों को भी सहलाना शुरू कर दिए. अगले 3-4 मिनट में हे शंकर जी की ये धीमी हुंकार निकल गयी और उन्होंने बेदर्दी से मधु का वह बड़ा उभर जैसे मरोड़ हे दिए. अपनी कलाई मुँह में लेती वह चीखने से तोह खुद को रोक गयी लेकिन आँखों से बहते आंसू न रोक पायी. चुपचाप कड़ी होती वह टंकी पर लगे नल से हाथ धोने के बाद बिना वापिस मुड़े सीढिया उतरती चली गयी थी. अर्जुन उनसे पहले उनके कमरे में बिस्टेर के किनारे बैठा था.

"देख लिए तोह तू भी नंबर लगा ले अपना.", बुआ की बात सुन्न कर अर्जुन बिना कुछ कहे संजीव भैया के कमरे में चला गया. उसके पापा ने जो भी किआ था वह कही से भी प्यार न था, जबरदस्ती हे थी जिसमे सामने वाला शामिल न था. और कौन थी वह जो उनके साथ थी क्योंकि ताऊजी भी तोह साथ हे गए थे. अर्जुन ने मन किआ था खुदको की वह इस सबसे दूर रहेगा लेकिन शंकर जी संतुलन नहीं बना प् रहे थे जिस से बड़ी मुसीबत होना तये था निकट भविष्य में. संजीव भैया की अलमारी से जलन ख़तम करनी वाली जेल की तुबे निकल कर वह मधु बुआ की सिरहाने आ बैठा. वह अभी तक आंसू बहा रही थी लेकिन बेआवाज.

"आप उन्हें मन कर रही थी?", अर्जुन को अपने सीने के सामने लगी चैन खोलते देख मधु ने कोई भाव न दिखाया. दाया उभर पूरा बहार निकल कर अर्जुन ने उस मद्दिम रौशनी में भी दरिंदगी का निशाँ देख लिए था. कांपते हाथ से वह तुबे से जेल निकल कर उस समूचे सतांन पर लैंप लगाने लगा. जितना मुमकिन था अर्जुन उतने काम दबाव के साथ सावधानी से उस चिकने मांस के गोले की मालिश करने लगा. मधु बुआ ने उसका हाथ पकड़ लिए था रट हुए हे.

"सॉरी तुझे बेवजह bhala-bura कहने के लिए. तू हे एक है जो हमेशा मेरी परवाह पहले करता है.", मधु बुआ धीमी आवाज में अर्जुन का हाथ थामे अपनी गलती की माफ़ी मांग रही थी.

"आप सिर्फ प्यार करने के लिए हे बानी हो बुआ. मेरे पापा की जगह कोई भी और इंसान वह होता तोह मैं हाथ शरीर से अलग कर देता लेकिन अब मैं क्या करता आप दोनों के बीच? ऊपर से वह नशे में थे तोह बात हे बिगड़ जाती अगर गलती से भी सामने आ जाता तोह.", अर्जुन फिर से उनके सतांन की हलके हाथो से मालिश करते हुए आराम पहुंचने लगा.

"मेरी हे गलती है न जो अबोध समय से हे उसके आकर्षण में बांध गयी. लेकिन आज मैंने कह दिए था के अब इस शरीर और दिल पर उसका कोई हक़ नहीं है. आखिरी बार हाथ लगाने दिए और अब के बाद वह करीब नहीं आएगा. तू इस सबको दिल पर लेना अर्जुन, शंकर के साथ मैं भी उतनी हे जिम्मेवार हु. न आइंदा वह मेरे पास आएगा और न मैं उसको आने दूंगी. चल यहाँ एक में आराम नहीं मिलेगा और रेणुका भी है. दूसरे कमरे में आज मेरे साथ सो जा, अगर बुरा न लगे तोह.", अर्जुन ने इस बार उन्हें पाँव पर खड़े न होने दिए. आराम से गॉड में शरीर उठाये वह बुआ को ले कर संजीव भैया के बिस्टेर पर आ गया.

"मैं भी आज अकेला नहीं सोना चाहता बुआ.", अर्जुन ने बराबर लेट कर उन्हें सीने से लगा लिए.

"आज बस अपने से लगा के चैन से सुला दे अर्जुन.", बुआ के इतना कहते हे अर्जुन ने उनके मॉटे आकर्षक होंठो को तन्मयता से चूमते हुए एक हाथ पीठ पर रखते हुए सहलाना शुरू किआ. बुआ का सर उसकी दूसरी बाजू पर टिका था और सब दर्द भूलती वह भी अर्जुन के होंठ चूमती कमर पे रखा हाथ अपने उसी दुखते उभर पर रखने लगी.

"ये दुःख रहा है बुआ?"

"थोड़ा दर्द है अर्जुन. मैं गाउन उतार दू?", अर्जुन ने सीधे हो कर खुद हे बुआ का जिस्म आजाद कर दिए गाउन की जकड से. दोनों के निर्वस्त्र सीने आपस में चिपकते हे सुकून मिला मधु को और अर्जुन के पाँव पर पाँव रखती वह उसकी ब्याह पर सर टिकाये सोने की कोशिश करने लगी.

"आपने मेरे लिए इतना कर दिए बुआ, मैं भी वादा करता हु अबसे आपको दुःख नहीं होने दूंगा. पापा को कुछ नहीं कहूंगा लेकिन वह आपसे माफ़ी जरूर मांगेंगे एक दिन.", अर्जुन ने उस खूबसूरत चेहरे पर सुकून देख कर माथा चूम लिए.

"मुझे तुम पर पूरा भरोसा है अर्जुन, बस अतीत की सुधरने के चक्कर में वर्तमान और भविष्य डाव पर मत लगा देना. प्रेमिका नहीं माँ के हिसाब से कह रही हु. दोनों हे स्वरुप में इस आत्मा पर अब तुम्हारा हे हक़ है अर्जुन."

"ऐसा हे होगा. आप बस अब आराम कीजिये आप, प्यार का दिल करे तोह उठने के बाद कर लेना.", अर्जुन सर सहलाते हुए उन्हें सुलाने लगा और मधु बुआ उस छाडे सुरक्षित जिस्म के अंदर सुरक्षित सो गयी. इस सबमे 3 से ऊपर का समय हो चला था और सफर में सोने की वजह से अर्जुन सोने की जगह बस सोच रहा था के आगे उसको क्या करना है. शंकर जी को ऐसे बांधना होगा के वह चक्र से निकल न सके और साथ हे उनकी वह जड़े काटनी होंगी जिनके नशे में वह अपनी हद्द पार करने से भी नहीं चूकते. और शुरुवात होगी डॉ धर्मवीर सांगवान से.

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शंकर जी की आँख खुली तोह सर हल्का दुःख रहा था. खुली छत पर वह अकेले हे सोये हुए थे और सिकुड़ा हुआ लिंग आजाद बहार था. प्यास इतनी ज्यादा थी की वह पानी की बोतल पूरी हलक से उतरने के बाद भी शरीर से सेक निकल रहा था. भारी आँखों से समय देखा तोह 5 बजने को थे. बीती रात को याद करते हुए आँखें बंद की तोह गुलाटी के फार्महाउस पर दारू पीना, रुस्सियन लड़कियों के साथ ऊपर मस्ती और फिर लवलीन के साथ अधूरा मिलान तक सब याद रहा. उसके बाद.. अर्जुन ने घर खोला था.. ये बात याद आते हे वह अतिरिक्त नशा भी याद आ गया. राजकुमार ने वह रुस्सियन की दी हुई सिग्रत्ती सुलगाई थी यूनिवर्सिटी पार करते हुए लेकिन 2 काश के बाद बाकी सिर्फ उन्होंने अकेले पी ली थी.

'अर्जुन के बाद मैं कमरे में गया था, रेखा बचो के साथ सो रही थी. फिर मधु के कमरे में... ये क्या हो गया हो माँ.. वह तोह रेणुका भी सोती है. मतलब मधु के साथ जो किआ वह सच था, सपना नहीं?", शंकर जी तुरंत उठ खड़े हुए. सारा नशा और खुमारी काफूर हो गयी थी सब याद आते हे. अर्जुन को गाडी सीखने का भी वादा किआ था उन्होंने रेखा से और अब 5 बज चुके थे. शंकर जी भी अपने पिता की तरह जल्दी उठने वालो में थे लेकिन कल रात वह अपने हे घर में बड़ी भारी गलती कर चुके थे. टंकी से हे मुँह हाथ धो कर वह तुरंत निचे आँगन में आये तोह रेखा जी ने उनकी चाय तैयार राखी थी.

"जी आप चाय ले लीजिये मैं कपडे रखती हु."

"अर्जुन की कार की चाबी देना रेखा और उसको बुला दो अगर वह घर में हे है. नहीं तोह पार्क से मैं ले लूंगा उसको.", शंकर जी की हालत देख रेखा हैरान थी.

"वह बहार है पिता जी के साथ.", शंकर जी ने गहरी सांस ली ये सोच कर की अर्जुन उनके पिता के पास बहार बैठा है. कप उठा कर वह गलियारे से बहार निकल कर इस तरफ आये तोह कौशल्या जी इस आँगन में कड़ी थी और 70 की उम्र के बावजूद पंडित रामेश्वर शर्मा उस नीली लम्बी कार को पिछले गियर में दाल कर जिस सफाई से घुमा कर सीधा करते अर्जुन को पुकार रहे थे शंकर जी बस अपनी माँ को देखते रह गए. रामेश्वर जी ने आखिरी बार गाडी दसप बन्न ने के बाद चलाई थी, वह 10 साल से रिटायर थे लेकिन एक आधुनिक कार को घूमते हुए वह वैसे हे दिख रहे थे जैसा आखिरी बार एक मुजरिम का पीछा करते दिखे हो.

"देख जरा ये बुढ़ापे में फिरोज खान बन्न रहे है और तू यहाँ खड़ा है.", कौशल्या जी के ऐसा कहते हे शंकर जी पर घडो पानी गिर गया. वह उन्हें रोक नहीं सकता था और जानता था के उनके पिता ने अगर कार का स्टीयरिंग थमा है तोह वजह बड़ी हे होगी.

"आप तोह संभल सकती थी माँ. पापा आटोमेटिक कार और इतने साल बाद?"

"बाप को बचे पैदा करने मत सीखा शंकर. अर्जुन 4 बजे से उनके साथ था और वह इस कार की चाबी लेने पहली बार बहु की चौखट तक खुद चले गए. तू समझ अब जो भी समझना है. पंडित रामेश्वर शर्मा ने तुझे गॉड में लेके 10 की उम्र में गाडी सिखाई थी. आज जो बगल में बैठा है वह 10 का नहीं है और गाडी सीखने तोह वह गया नहीं.", कौशल्या जी की चेतावनी रही सही हिम्मत टॉड गयी थी शंकर की. अर्जुन कही से भी वह शक्श नहीं था जो दूसरा मौका देता. रेखा ने एक बार कुछ माँगा और वह दे न सके. बाप खुद बुढ़ापे में गाडी लेकर निकल गए. यहाँ शंकर की बिसात खतरे में थी और भागना मज़बूरी. खेल बचने के लिए पीछे हटना हे पड़ेगा नहीं तोह मौका अर्जुन हांसिल कर हे लेगा.
 
अपडेट 112

वक़्त और बदलाव (2)


घर से कार लेकर शंकर जी निकल तोह आये लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा था के कहा जाए. काम कुछ जरुरी थे और कुछ जहा उनका होना हे बहोत था. उनके पिता ने भी इंग्लैंड वाली बात को नकार दिए था फ़िलहाल के समय को देख कर. उजले दिन में गुलाटी और सांगवान के साथ भी रहना बेमतलब हे था. कार एक पीसीओ के बहार रोक कर अपने साले राजेश को हे फ़ोन मिला लिए. लेकिन वह तोह खुद नदारद था.

'दीपक से फाइल तोह ले ली लेकिन शादी से पहले ये पंजाब जाना नामुमकिन है.', कार में आँखें बंद किये वह आराम से सोच विचार कर रहे थे की उनकी तन्द्रा इस कांच पर होती khat-khat से भांग हो गयी. एक पल तोह हल्का गुस्सा आया लेकिन बहार maile-kuchle कपड़ो में लिपटी ये महिला और उसके साथ खड़ा 7-8 साल का उसका बचा देख कर शिक्षा निचे कर दिए.

"बाबू जी, मेरा बचा भूखा है. 1 रूपया दे दो बिस्कुट खा लेगा.", उस औरत और बचे को देख कर शंकर ने पहले अपना पर्स उठाया फिर कुछ सोच कर वापिस निचे रख दिए. गाडी का हॉर्न 2 बार मारने पर सामने पेड़ के निचे chole-poodi बनता रेहड़ी वाला गमछे से मुँह साफ़ करके उनके करीब आ गया.

"जी साहब.", एक बार उसने इस औरत को घृणा से देखा और फिर शंकर जी से पूछने लगा.

"दोनों को भरपेट खिला देना और वैसे बिलकुल मत देखना जैसे अभी देखा है.", 100 रुपये का नोट उस रेहड़ी वाले को थमते हुए शंकर जी ने चेतावनी भी दे दी थी और वह झेंपता हुआ हाथ जोड़ कर अपनी जगह चल दिए.

"जाओ और आराम से अपने बेटे के साथ भोजन करो बहिन. बाकी पैसे रख लेना या और खाना ले लेना, बाद के लिए.", शंकर जी ने चाबी घूमते हुए कार चालू की और उस औरत ने विनम्रता से हाथ जोड़ दिए.

"भगवन आपका भला करे बाबू जी. मेरे बेटे ने कल से हे कुछ नहीं खाया था, मैं तोह माँ हु रह सकती हु जैसे तैसे. भगवन आपको लम्बी उम्र दे.", बात पूरी होने से पहले हे शंकर जी ने गाडी पीछे करते हुए उस बड़ी पार्किंग से घुमा ली. अब जैसे उन्हें अपनी मंज़िल पता थी और कार का पंजा पूरी तरह दबाते हुए वह जैसे इस मशीन का औकात जान न चाहते थे. बिपास पल में हे पीछे छूट चूका था और इस खाली सड़क पर सिखर दोपहर ये नीली इलो कार 160 के पार जाती जैसे इसको चलने वाले की गुलाम हे थी. क़स्बा शुरू होने से पहले हे रफ़्तार काम हो चुकी थी, सड़क पर चहल पहल का अंदेशा था शंकर जी को और इसके बाद गाडी सोमबीर सिंह के गाँव में दाखिल हो चुकी थी.

"आपने नयी गाडी ली और मुझसे तिलक भी नहीं करवाया?", आँगन में गाडी आते हे ये ऋचा हे थी जो कार से शंकर जी के उतारते हे उनके गले लग गयी थी. आँगन में दोनों के सिवा बस मल्टी हे थी जो ये बड़ा किवाड़ (दूर) बंद कर रही थी जो शंकर के लिए खोला था उन्होंने.

"कर ले तिलक तू, कोण रोक रहा है तुझे? नमस्ते भाभी.", शंकर ने मल्टी को आवाज से हे अभिवादन करते हुए अपनी बड़ी बेटी को साथ लगाए रखा.

"Ram-ram देवर जी. माँ जी सो रही है अभी सुशीला के कमरे में. खाना धार (बना) दू?", मल्टी उर्फ़ गुड्डी ने मटके का ठंडा पानी गिलास में भर कर देते हुए कहा. ऋचा अभी भी एक तरफ से शंकर जी को जकड़े कड़ी थी, किसी छोटी बची की तरह.

"आप आराम करो भाभी, लता बना देगी जब मुझे भूख होगी. आप ठीक हो?", शंकर जी ने गिलास ऊपर करके हे पानी पी लिए था और वापिस गिलास पकड़ते हुए उनका हलचल भी पूछ लिए.

"हाँ सब कुशल मंगल है. वो सुदर्शन की खबर मिली थी 2 दिन पहले. कह रहे थे के सफदरजंग में डॉक्टर अरोरा है जो माहिर है ऐसे मरीजों के. एक हे है मेरा तोह देवर जी, माँ जी के सामने तोह मैं क्या हे कहु. गलती हो गयी, सजा भी मिल गयी लेकिन मेरा बीटा है और आपका भतीजा. न इलाज होता तोह घर हे लिया lao.",Baat कहते कहते मल्टी का हल्का गाला रुंध गया.

"भाभी परेशां मत होना मैं ये बात भी करने आया था यहाँ. डॉक्टर अरोरा के पास उसकी फाइल भिजवा दी थी कल अंकल ने और जल्द हे उनकी निगरानी में सुदर्शन का इलाज शुरू हो जायेगा. इस बार जब वह घर आये तोह बाँध देना खूंटे से, सुधर जायेगा. पहले तोह लग रहा था के हालत सही होने में 8-10 महीने तक लग सकते है, अब शायद 4 महीने के बाद वह दुरुस्त हो जाये.", शंकर जी यहाँ बात कर रहे थे उधर मधुलता कमरे के सामने गलियारे में कड़ी इन तीनो को देख रही थी.

"मुझे पता था देवर जी कोई और उसकी चिंता करे न करे आप जरूर देखोगे."

"मेरा भतीजा है भाभी वह. और कही न कही गलती मेरी भी है.", शंकर जी के नजरअंदाज करने पर अब वह मधुलता नहीं कड़ी थी, शायद कमरे में जा चुकी थी. लेकिन वह मालती से वैसे हे बात करने लगे.

"पापा, लड़ाई उन दोनों में हुई तोह आपकी क्या गलती. वह भाई है तोह झगड़ पड़े.", ऋचा अब शंकर जी से कार की चाबी लेने के बाद चले को गौर से देख रही थी. उसको ये बड़ा सुन्दर लगा था.

"तुम अफसर bann-ne वाली हो और ऐसी दलीले देना छोडो. भाई है ये उन दोनों को नहीं पता था और मामूली झगड़ा नहीं हुआ उन दोनों के बीच.", शंकर जी यही बात किसी और को कहते तोह आवाज गूँज रही होती लेकिन ऋचा के सामने बस नरमी से हे काम चलना पड़ा.

"हो गया सो हो गया देवर जी. रस्ते पर तोह गलत हे चल रहा था वह. अर्जुन से तोह कोई शिकवा नहीं बस इस बार ये घर आ जाये तोह मैं khet-khalihaan संभलवा दूंगी उसको. लड़की कोई मिली तोह ठीक नहीं तोह जय राम जी की. आप भी मेरी वजह से यही घाम (धुप) में खड़े हो, अंदर बैठो मैं लस्सी लेके आती हु."

"अंदर हे जा रहा हु भाभी, आप आराम करो और समय मिलने पर में ले जाऊंगा आपको सुदर्शन से मिलवाने. चल बदमाश अब तू बता यहाँ आँगन में क्या कर रही थी.?", वह ऋचा को लिए एक तरफ से इमारत के पहले कमरे की तरफ बढे तोह ऋचा बोली.

"ये आपकी गाडी नहीं है न पापा? और मैं छत्त पर गयी थी जब आपकी गाडी पिछली सड़क से दौड़ती आ रही थी, गाँव में अब ऐसे कोई कार नहीं चलता तोह मैं समझ गयी के आप हे होंगे. नीचे आई तोह ताई ने दरवाजा खोल दिए था मेरे से पहले. वैसे चटख रंग की गाडी ाची लगती है आप पे.", ऋचा ने अंदर आते हे बिस्टेर पर पड़ी कटी हुई सब्जी, अखबार और दुपट्टा उठा कर एक तरफ मेज पर रखा और चादर झड़ने के बाद एक तरफ हो गयी.

"अर्जुन की है और उसको चलनी नहीं आती अभी. कड़ी थी तोह ले आया, वैसे चंडीगढ़ कब जाना है वापिस?", गोल तकिये पर कमर टिकते हुए शंकर जी ने जूते पाँव से हे खोल कर एक तरफ रखे और बिस्टेर पर सही से तक लगा कर बैठ गए.

"कब आई हु मैं? जुलाई में जाना है और आप से ये पूछने लगे. वैसे अर्जुन जल्दी हे बड़ा हो गया.", अभी ऋचा बात कह हे रही थी की अंदर से ट्रे में एक कप लिए मधुलता आ कड़ी हुई.

"तेरे बाप को बस तू बड़ी होती नहीं दिख रही. दुनिया ख़तम हो जाएगी तब भी ये जवान रहेंगे और तू इनकी doodh-moohi बची. 2 हफ्ते पहले बात करने लगे थे लेकिन फेर अमेरिका जा बैठे. तारीख याद है कुछ डॉक्टर साहब?", सर के आगे अभी भी हाका पल्लू था और आवाज में तंज होने के बावजूद स्वर नरमी भरा और धीमा. शंकर जी के साथ ऋचा के चेहरे पर भी हंसी आ गयी.

"ये अब काली चाय लाइ होगी. जिस दिन इसका पारा गरम हो तोह सुबह दूध वाली चाय, दोपहर में काली और रात को तोह पूछ हे मैट."

"बात बनानी आसान है, बैठने से हे काम हो जाता है. हंस लो मिल के दोनों baap-beti इस चारदीवारी में. घर के बहार तुम्हारे पापा तुम्हारे चाचा और मेरे देवर. लड़की जरुरत से ज्यादा पढ़ गयी, उम्र हो गयी लेकिन कोई विचार नई."

"इधर बैठ लता, तेरा गुस्सा जायज़ है. लेकिन जितना मैं यहाँ आता हु शायद उतना हे उस घर में जाता रहा हु. शादी की चिंता बेवजह है तुम्हारी, बेटी जब होनहार और काबिल हो तोह लड़के वाले खुद आएंगे न देखने? मेरी नजर में भी है एक लड़का बस इसकी अगले साल जोइनिंग हो जाने दे और मैं ताई को बोल के तुझे भी चंडीगढ़ शिफ्ट करवा दूंगा.", मधुलता बीएड के दूसरे किनारे थोड़ी दूर बैठी थी और ऋचा ने ट्रे में देखा तोह काली चाय हे थी.

"तेरे पापा के लिए खाना दाल दे उठके, कोई एक काम कर लिए कर घर का. हर वक़्त फ़ोन, टीवी और तेरी दादी.", मधुलता ने इतना कहा और ऋचा उठ कड़ी हुई.

"अपने आप खिला देना आप, मैं चली सोने. आये आपसे मिलने है तोह ये बहाने मैट हे दो के मैं क्या करती हु और क्या नहीं. हर टाइम शांत रहती है लेकिन पापा दिखे नहीं के कुकर की सीटी बज जाती है, गर्मी से.", ऋचा शंकर जी की तरफ आँख मार कर बहार दौड़ गयी.

"दत्त जा मैं बताऊ तन्ने. हर टाइम बस masti-majaak. भेज लो चंडीगढ़, चढ़ेगी किसी दिन चाँद तुम्हे भी और मुझे भी.", ट्रे को एक तरफ रखने लगी हे थी की शंकर जी ने कप उठा लिए.

"चंदा (आपस में प्यार का नाम) तू न गुस्सा करना कम् कर दे अब. बप की शिकायत होने लगी तोह अलग समस्या हो जनि है. मुझे याद था के महीने का आखिरी दिन है और इस बार तेरा समय नहीं दे पाया था.", दूसरे हाथ को मधुलता के हाथ पर रखते हुए शंकर जी ने सहलाया और कप को मुँह की तरफ ले जाने लगे.

"छोड़ो ये चाय. सिग्रत्ती पी के पहले हे फेफड़े जला रखे है अब और कलेजा फूंक लो. बातें करवा लो बस baap-beti से लेकिन 2 दिन छोड़ के 28 दिन मैं यहाँ बस बेजुबान सी रहती हु. अब तुम्हारे साथ भी न बोलू तोह क्या करू? पिछली बार आये तोह लगा मेरे लिए आये हो, माँ से बात करके फेर गायब.", मधुलता ने कप लेना चाहा तोह शंकर जी ने उस दूसरे हाथ से पकड़ी कलाई अपनी तरफ खींच ली. मधुलता सीधा सीने से जा लगी.

"शर्म करो थोड़ी शंकर, घर में सब है और तुम्हारी हरकते वही कॉलेज वाली.", मधुलता अलग न होती बस सीने को सेहला रही थी. कप अब बिस्टेर के एक तरफ लकड़ी पर रखा था.

"हाँ मैं कॉलेज में हु और तुम जो मोटर पे ना आने पे मरने की धमकी देती थी वह? तब दिन में कर्फ्यू रहता था न?", शंकर ने वह माथे के सामने से पल्लू हटते हुए उन बड़ी काली आँखों को देखा और फिर थिरकते हुए होंठो को चूम लिए. मधुलता ने तुरंत हे आँखें बंद कर ली थी.

"दरवाजा बंद करने दो, सब सो रहे है लेकिन फिर भी.", शर्माती हुई लता दबे पाँव दोनों तरफ से दरवाजा बंद करके अब आराम से शंकर जी की बगल में आ लेती. सर पे ओढ़नी, सीने पर कैसा पारम्परिक ब्लाउज जैसा कमीज, सामने बटन लगा और गहरे हरे रंग का घाघरा पहने वह अब शंकर के आगोश में बस उस ख़ास चेहरे को देख रही थी जिसके लिए इतना इन्तजार रहता था.

"सच कहु तोह अब मेरा जी नहीं लगता यहाँ शंकर. या तोह अपने घर बता हे दो नहीं तोह यहाँ से अलग कही घर ले दो. घुटन होती है हर वक़्त और ये विधवा का वस्त्र अब सेहन नहीं होता.", लता शंकर के सीने को सहलाती हुई अपने दिल का हाल बयान कर रही थी. शंकर भी निचले हाथ से पीठ सहलाता दूसरे को उस गोर गाल पर रखे थे.

"ताई और maa-papa को पता है लता हमारे बारे में लेकिन जानती हो के वह और भी कितने लोग है? ऋचा जैसी मेरी 2 बेटी है, मेरा एक लड़का है और रेखा भी तोह है. उन सबसे जुड़े लोगो को मैं क्या जवाब दूंगा? लेकिन मेरे लिए तुम हे मेरा प्यार और पहली पत्नी हो, ऋचा पहली बेटी. फिर भी तुम अगर चाहती हो के यहाँ नहीं रहना तोह मैं ताई से कैसे भी करके बात करता हु. ऋचा और तुम्हारे लिए एक घर देख लेते है फिर.", शंकर ने अपना पहलु बताया तोह लता उस चौड़े सीने पर खिसकती हुई थोड़ा ऊपर आ गयी.

"होने को तोह हो सकता है अगर समझदारी दिखाओ. बचे सब कर सकते है शंकर और मुझे भी बड़ा परिवार मिल सकता है.", लता ने चेहरा शंकर के ऊपर करते हुए खुदसे हे उसके होंठो को मुँह में ले लिए. शंकर ने भी घाघरे के पास कमर को पकड़ कर अब लता को पूरी तरह अपने ऊपर लिटा लिए था. जल्द हे इस लम्बे चुम्बन के साथ शंकर के हाथ उन नरम कूल्हों को दबाने लगे थे. घाघरा भी हर गुजरते क्षण के साथ baal-vihini गोरी पिंडलियों से ऊपर उठता चिकनी भाई जांघो तक आ पंहुचा. दोनों के चेहरे अलग हुए तोह शंकर के चेहरे पर सुकून और लता की आँखों में चमक थी.

"तुम्हे इतना यकीन कैसे है के ऐसा भी हो सकता है? मैं तोह खुद सोच रहा था के शादी में कोशिश करके तुम्हारे बारे में घर बता दू लेकिन गुलाटी ने कहा के ऐसा करना बड़ी गलती होगी और उसकी बात एक तरह से उचित हे थी.", लता इतना सुन्न कर थोड़ी ऊपर उठ गयी. शंकर की कमीज के बटन अपने हाथो से खोलती वह मुस्कुरा रही थी. चौड़ी छाती पर वह काले बाल उजागर होते होते लता ने अपनी कमर भी शंकर के उभर के नजदीक खिसका लिए.

"कोमल और ऋचा में नजदीकियां है शंकर. और जितना मुझे पता है वह अर्जुन हे एक ऐसा बचा है जो समझदार और भोला है. उसको सबके हक़ की फ़िक्र रहती है न तोह क्या वह अपनी बड़ी माँ के लिए कुछ न करेगा?", बात सुन्न कर शंकर जी ने आँखें मूँद ली थी. किस धर्मसंकट में दाल रही थी लता उन्हें.

"चंदा कोई भी ऐसी बात उसके साथ नहीं करेगा. वह तुमसे जुडी हर बात खंगालने लग गया तोह लेने के देने पड़ जायेंगे. लेकिन मैं कोशिश करूँगा ऋचा को उसका हक़ मिले और मैं तुम्हारी ज़िन्दगी को बेहतर बना सकू.", शंकर के इतना कहने पर लता ने भी इस वक़्त बात को खींचना ठीक नहीं समझा. खुद हे शंकर के हाथ अपने सीने पर रखती वह निचे झुकने लगी.

"महीने में ये 2 दिन तोह पूरे दिए करो. आह्हः..", ये सिसकारी का निकलना तुरंत हो गया जैसे हे शंकर ने दोनों उभर पंजो से दबाये. लता के वापिस ऊपर होते हे उस कासी हुई कमीज के 4 बटन खोल कर के मांसल चुका बहार निकलते हुए शंकर ने वह भूरा निप्पल मसलने के बाद मुँह में भर लिए. लता कसमसाती सी अपनी कमर को शंकर की पतलून के पहले हुए हिस्से पर रगड़ने लगी. अब बातें काम करते हुए दोनों हे शरीर को ज्यादा हरकत देने लगे थे. ऊपर झुके हुए लता ने पतलून की ज़िप खोलनी चाही तोह शंकर ने खुदसे हे बटन ढीला करते हुए निचे के दोनों वस्त्र सरका दिए. वह सख्त पहला हुआ लिंग बहार निकलते हे घाघरे के भीतर गायब हो गया.

"आठ.. तू आज भी वैसा हे करती है चंदा. आराम से मेरी जान, टूट जायेगा तोह तेरा हे नुक्सान है.", शंकर जी की ये सिसकारी बता गयी थी की लता उस लुंड से ाचे से खेलना जानती है. अब कमीज से दोनों चुके बहार निकल आये थे और अपने मालिक के हाथो में पूरा प्यार लेते चूचक तान रहे थे.

"तुम चुप रहोगे thoda..aahh.. ये ऊँगली अगर और करीब आई तोह औजार सचमुच टॉड दूंगी..", शंकर जी ने घाघरे में हाथ घुसते हुए भारी कूल्हों की दरार में उंगलिया चलाई हे थी की तुरंत निकल ली. इधर लता ने वैसे हे खुद को थोड़ा उचकते हुए जैसे दोनों ख़ास अंगो का संपर्क करवाया और मस्त होती पूरा लिंग अंदर निगल गयी. एक पल रूकती फिर वह वापिस शंकर के सीने पर अपने चुके रगड़ती हिलने लगी. कभी शंकर के गाल तोह कभी गले को चूमती kaat-ti लता इस मिलान की बागडोर खुद थामे मादक चुदाई कर रही थी. मूक सिसकारियां बस उस मादक चेहरे से झलक रही थी.

"शर्म करो आठ.. एक तोह सब खुद हे करती हो.. आठ. ऊपर से 27 साल में आज तक वह कुछ करने न दिए तुमने. चंदा मेरा तोह ख़याल कर thoda..aahh.. आराम से मेरी जान.. ", जैसे हर बार पूरा लुंड अंदर लेते हुए लता एक पल के लिए छूट से लुंड को कस लेती थी. दोनों के बीच ये कमाल का तालमेल था. शेर सा शंकर हर शिकार पर भारी रहता था और इधर उसकी नब्ज़ लता के हाथ थी.

"शर्म, करुँगी मैं. 27 साल से तुमने वह हर काम किआ है मेरे साथ जो पति करता है. कुंवारापन तोह कॉलेज के पहले दिन हे ख़तम कर दिए था, जाने मेरा जन्मदिन का इन्तजार कर रहे थे तुम जो ऐसा तोहफा दिए. और उसके बाद से लेके आज तक तुम्हारी चंदा ने सामने से तुम्हे सुख दिए. आठ.. बुड़के मैट मार शंकर, नोच लुंगी मैं. आठ.. सुहागरात के बिना विवाह पूरा न होता शंकर, उस दिन तुम कर लेना अपने दिल की जिस दिन ससुराल में कपडे उतरोगे. निकाल मुँह से आह्ह्ह्ह..", इधर जोश जोश में शंकर ने एक चुका काट खाया तोह लता ने नाखून गदा दिए थे सीने में. लेकिन दूसरे के साथ भी वैसा हे हो गया. लता दर्द में भी मुस्कुरा रही थी.

"एक तू है जो इतने सालो में भी मैं पूरी न पा सका लेकिन कोई मलाल नई है सिवाए .. आठ.. चंदा उम्..", शंकर ने इस बार लता को कस के सीने से चिपका लिए. वह भी बेसुध होती धीरे धीरे झटके खाती हुई शांत हो गयी थी. दोनों एक साथ हे स्खलित हो कर अब सांसें दुरुस्त कर रहे थे.

"मलाल भी ख़तम कर लेना शंकर. सोचेगा तोह रास्ता मिल जायेगा नहीं तोह जी तोह मैं वैसे भी रही हु और तू भी जितना खुश है मुझे पता है. बगावत जवान करते है जो तुमसे न हुई, अब ससुर जी की जगह तुम आ चुके हो तोह वैसे हे सोच लो. यहाँ से जाने के बाद मेरी नस खुलवा देना, अपना तोह प्यार भर देते हो मेरा पता नहीं चलता. 3 बजे उठा दूंगी, आराम करो.", जैसे हे लता अलग हुई, वीर्य से लिसड़ा लिंग एक तरफ लटक गया. तुरंत कपडे से उसको पांच कर अंदर करते हुए लता ने हे पतलून चढ़ाई और खुद को सही करते हुए फिर से घूंघट लेती वह अगले कमरे में चली गयी. इस म्हणत के बाद शंकर की भी आँख जल्द हे लग गयी थी.

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बबिता अब एक गहरी नींद में जा चुकी थी लेकिन अर्जुन बिस्टेर से खड़ा हुआ तोह अंगड़ाई लेते हुए एक नजर उस विलक्षण युवती को जी भर के देखने के बाद मुस्कुराता हुआ बाथरूम में घुस गया. कमरे में ठंडक के बावजूद शरीर पर पसीना और चिपचिप थी. कुछ सोच कर अर्जुन उस बड़े धातु के टब का भी नल खोल देता है. इधर फुहारे से अपना बदन साफ़ करता बस वह यही सोच रहा था के बबिता जैसी युवती भी संभव हो सकती है क्या.

वह शरीर से विशाल थी लेकिन कही से भी बेडोल नहीं थी. पहला नाम ज़ेहन में माधुरी दीदी का हे आया बबिता के जिस्म की तुलना करने पर. ऊपर और निचे अगर 8-10 इंच का घेराव बढ़ा दिए जाये तोह वह माधुरी दीदी का हे बड़ा प्रतिरूप थी. आज ये वक़्त था के माधुरी दीदी अर्जुन का बराबर साथ देती थी बेशक जब से ये कुछ बदलाव अर्जुन में आये थे उसने दीदी के साथ ऐसा संसर्ग नहीं किआ था. ऊपर से बबिता के मजबूत शरीर की ये नर्माहट कही जानलेवा थी. पहली बार अर्जुन दिल के साथ साथ उस मर्द की तरह सोच रहा था जिसने औरत के जिस्म का आकर्षण महसूस किआ था. लुंड में हल्का हल्का तनाव आते हे अर्जुन ने सर के ऊपर पानी उडेलन शुरू कर दिए.

'शांत. होता है ये सब इस उम्र में. वह ख़ास तोह है हे उसमे कैसा संदेह. लेकिन बबिता दिल की भी बड़ी ाची और प्यारी है.', अर्जुन खुद हे बबिता के हर पहलु की तारीफ करता खुद को साफ़ और ठंडा करने के बाद पहले से हे अंदर रखे तोलिये से खुद को पांच कर बाथरूम में अपने मतलब का सामान देखने लगा. उस 8 फ़ीट लम्बे और ढाई फ़ीट ऊँचे टब को भरने में अभी कोई 20 मिनट तोह लगने हे वाले थे. यहाँ उसको ये साफ़ फिटकरी, खुसबूदार तेल और पानी का जग मिल गया था. टोलिया लिए वह कमरे में दाखिल हुआ तोह बबिता को ऐसे सोये देख उस पर उतना हे प्यार आया जितनी वह अर्जुन को पसंद आई थी.

'सचमुच आसान नहीं होगा इनके साथ करना. ये अपने वाली पे आ जाये तोह किसी औसत लड़के की तोह जान हे ले ले.', सुडोल जांघो के बीच छूट के होंठ इतनी चुदाई के बाद भी उस मांसल जगह बस लकीर से दिख रहे थे. वीर्य अभी तक ऊपर लगा था जो जाएंगे तक बेहटा आया था. टोलिया गीला करके अर्जुन ने सावधानी से वह जगह साफ़ की तोह बबिता के जिस्म में कोई ख़ास हरकत न हुई. अब वह निश्चिन्त हो कर उस 5 इंच की लकीर के दोनों तरफ प्यार से सफाई करने लगा. हिम्मत करके फांके खोलने पर अंदर उसका वीर्य भरा मिला.

'छूट तक जाने से पहले हे आधा इंच पहली हुई है. सचमुच अलग हे है ये.', यहाँ उसने ऊँगली से सफाई की तोह वह मामूली सा जख्म नजर आ गया जो उसके लुंड की मोटाई ने दिए था. एक चुदाई में हे बबिता की छूट खिल गयी थी. फिटकरी को गीले तोलिये पर मलने के बाद फिर से सब साफ़ करके अर्जुन ने उन गोर खरबूजों का रुख किआ.

'44 बताया था साइज इनका. हद्द है इनकी तोह, इतने बड़े बड़े लेकिन सचमुच दिल नहीं भरता. लाल पड़ गए मेरी वजह से, गोरी भी है तोह निशान जल्दी बन्न गए.', वह तेल दोनों हथेलियों पर चुपड़ कर अर्जुन ने एक लयबद्ध तरीके से एक सतांन की मालिश करनी शुरू की और बबिता ने आँख खोल दी. लेकिन बस मुस्कुरा कर वह अर्जुन को देखती रही. किनारो से लेकर चूचक तक वह इस वजनी चुके को आराम दे रहा था. साथ हे ऐसा करने से चूचक अकड़ कर खड़ा हो गया. अगले चुके को भी 5 मिनट तक सहलाते हुए सुख दे कर चिकना किआ और उन्हें साफ़ करने के लिए टोलिया उठाने लगा.

"रेहान दे रे. बहोत सुख दे दिए तन्ने, ेब मेरी बारी है.", बबिता ने बराबर बैठ कर अर्जुन को चूमते हुए एक हाथ से उसका वह विकराल लिंग थाम लिए. वह उसके अकार, फुलावट और सख्ती को जांचती हुई मुस्कुरा रही थी. अर्जुन बस देख रहा था और बबिता ने तेल अपने हाथ पर गिरते हुए हलके हाथ से जड़ की तरफ से सुपडे तक मालिश करनी शुरू की. उसके मॉटे बोब्बे कही कही से थिरकने लगते, इस हलकी गतिविधि से हे.

"तन्ने (तुम्हे) बेरा है मैं कान्वेंट से पढ़ी हु. लड़का लड़की के मिलान का भी पता है आरर गाँव में तोह प्रैक्टिकल देखन ने भी मिल जाया करे है. मैं 19 की थी उस बख्त (समय) जड़ एक सहेली ने मैंने लुची (सेक्सी) किताब दिखाई थी. तू तोह स्कूल जान हे लगया होगा उस टेम. व किताब बस ऐसी थी की कोई छोरी (लड़की) देख ले तोह चुदाई के लिए पागल हो जे. मैंने सबर किआ लेकिन तस्वीर तोह दिमाग में चा गयी. लुंड देख लिए था, ladka-ladki के करे है पता चाल गया था.", बात कहती कहती वह एक पल रुकी और अर्जुन के हाथ पर थोड़ा तेल गिरा कर हाथ छूट के ऊपर रख दिए. अर्जुन समझ गया.

"फिर क्या हुआ?"

"मैं दिल की भोत मजबूत सु, उस टेम भी थी. रोक लिए लेकिन नॉलेज हो गयी थी. फेर आड़े (यहाँ) गाम में एक भाभी आया करती hansan-bolan, मेरी ाची सहेली बन्न गयी वह 4 साल पहले की बात. दिन में उसके घर कोई था नई और उसने दिखा दी नीली फिल्म (पोर्न movie/Blue फिल्म). 1 घंटा बस बुरा हाल था अर्जुन लेकिन मैंने सवाल उठ गए फिल्म देखे बाद. भाभी तोह अपने पति से सेक्स करे हे थी तोह पूछ लिए के सबके इतने बड़े बड़े होये करे है (लुंड) ार उसका जवाब था यु फिल्म बनान वाले स्पेशल होव है. हिंदुस्तानी तोह 6 ांगल (ऊँगली) से 8-9 तक. कोई हद्द 10-11 की लम्बाई लेजे है लेकिन बीतते भर के लुंड दुर्लभ है. भाभी ने फेर या बात भी कही के मेरा शरीर बीतते से ऊपर का लुंड हे खुश कर सके है लेकिन मुमकिन कोन्या.", अर्जुन बात सुनते हुए छूट के बहार ाचे से मालिश कर रहा था. और अब दूसरे हाथ से एक उभर को सहलाने में बबिता भी राजी थी.

"उस दिन के बाद मैंने सोच लिए था के चुदाई के बारे में सोचना हे कोणी. जो लिख्या होवेगा मिलेगा. लेकिन किस्मत देख, तेरा तोह उस फिल्म में देखे लुंड से भी बड़ा है. नींद में भी छूट कुलबुलावे थी की आज के कर लिए यु.", इतनी मालिश से तोह लुंड अपनी औकात से भी ज्यादा हे बड़ा हो चूका था. बबिता भी उस बड़े कुकुरमुत्ते (मशरुम) से सुपडे को निहार रही थी.

"तोह इस से पहले असली नहीं देखा कभी?"

"अरे एक बार देख लिए तोह फेर नजर आ हे जाये करे है. लेकिन आज तक बस भाभी की बात सही थी. 2-3 जोड़े चुदाई करते देखे khet-khalihaan में लेकिन सबके नार्मल. आज चुदाई के वक़्त यो पकड़ के समझ गयी थी के तेरा ख़ास है. ेब देख्या तोह हैरान सु, अंदर लिए किस तरिया मैंने. लेकिन दुमदार है."

"अभी फिर से लोगी आप, क्योंकि आप भी ख़ास हो ये मैंने जान लिए है. और मेरा दिल है के बाथरूम में करते है.", अर्जुन ने अब दोनों बोब्बे सहलाते हुए बबिता से नजरे मिले.

"तेरा गिफ्ट दे दू, रेतुर्न. फेर जहा मर्जी कर लिओ बबिता न नहीं करती. और जी न कहे कर, बबिता बहोत है अकेले में.", अर्जुन को पीठ के बल बिस्टेर पर लिटटी वह कुशलता से उसके ऊपर आ गयी. पहाड़ से चुत्तड़ ऊपर उठाये बबिता ने अपने गुब्बारों के बीच अर्जुन का मूसल दबाते हुए एक अदा से हवाई चुम्बन दिए अपने होंठो का.

"आह.. ये कहा से सीखा.?", नरम कैसे हुए चुचो की रगड़ लुंड पर होते हे अर्जुन मदहोश हो गया.

"टाइम बदल गया है अर्जुन जी. फिल्म देखि थी मैंने और उसमे सबसे सेक्सी सन 2 हे थे. एक तोह मैं करके दिखा रही हु दूसरा तू करिये.", बबिता ने चुचो से बहार निकलते मॉटे सुपडे पर लार गिरते हुए उसको और गीला कर दिए. अपने हे खरबूजे दबती हुई वह उनके बीच लुंड को भरपूर चिकनाई से रगड़ रही थी. देखते हे देखते सूपड़ा गोल होंठो से जा लगा. बबिता ने एक पल रुक कर बस अर्जुन को देखा और अगले हे पल आँखे मूंदे वह निप्पल मसलती उसका लाल सूपड़ा जीभ से चाटने लगी. जल्द हे होंठ खोलते हुए अपने मुँह में सूपड़ा भर कर वह कुछ पल रुक गई.

"आह्हः.. दांत नहीं.", अर्जुन के इतना कहते हे बबिता ने दोहरा वॉर शुरू कर दिए. सूपड़ा मुँह के अंदर और बाकी लुंड चुचो के बीच. 5 मिनट बाद वह अलग हुई तोह लुंड भयंकर दिख रहा था. हरी नस्से उभरी हुई और सुपडे से जड़ तक लार का गीलापन.

"आय मजा मेरी जान? चल दिखा तेरा बाथरूम."

"रुको.", अर्जुन बिस्टेर से निचे उतरा और एक हाथ बबिता के गर्दन के निचे और दूसरा कूल्हों के करते हुए आराम से उठाये अंदर ले आया. बबिता बस उसको निहार रही थी, आँखों से प्रशंशा करती हुई उसकी ताक़त की. अंदर टब भरा हुआ था जिसका नल बंद करने से पहले अर्जुन ने बबिता को एक तरफ खड़ा कर दिए.

"इसमें करेगा? पानी बहार हम अंदर.", बबिता हंसने लगी तोह अर्जुन भी उसके साथ खुश हो गया.

"वह सब बाद में. पहले एक पाँव यहाँ रखो.", टब के बराबर हे पत्थर को तराश कर बनाया ये 2 फ़ीट ऊँचा गोल स्टूल दिखते हुए अर्जुन ने बबिता का एक पाँव उसके ऊपर रखवा दिए. ऐसे करते हे शरीर दिवार के साथ और छूट उभर कर बहार निकल आई.

"के करेगा? आह्हः.. सत्यानाश.. आह्हः..", अर्जुन नीचे बैठ कर छूट फैलते हे चूसने लगा और बबिता सिसकती हुई अपने बोब्बे मसलने के साथ उसका सर भी छूट पर दबाने लगी. 2-3 मिनट बाद हे वह सीधा खड़ा हुआ तोह बबिता कांप रही थी. अर्जुन ने अपने अकड़े हुए लुंड को करीब करते हुए बबिता का मुँह अपने होंठो से बंद कर दिए. लुंड दबाव बनता एक इंच अंदर हुआ और उसके पीछे से अर्जुन की कमर ने जोर लगा दिए. 'कच' से आधा लुंड उस संकरे रस्ते में जा फंसा. होंठो को छोड़ कर अर्जुन ने वह मोटा दूध पकड़ते हुए निप्पल मुँह में ले लिए. बबिता दर्द सेहती दिवार पर लगे पाइप को पकडे थी.

"आह्हः.. अर्जुन तू कोणी माने रे. आज घर जाऊँगा या शमशान.. aahh..bas बस..", मस्ती में अर्जुन ने बबिता की कमर अपनी तरफ खींचते हुए उसके हलके झांटो को अपने पेडू से चिपका दिए. समूचा लुंड बबिता के अंदर और उसके मॉटे ुबहार अर्जुन के सीने में. वह तड़प रही थी लेकिन अर्जुन को और जोर से चिपकये बस उसका अपनी नरम गुफा में महसूस करती सिसक रही थी.

"बबिता, तुम मेरा पूरा लुंड ऐसे हे ले सकती थी या फिर टाँगे फ़ैलाने पर जो ज्यादा दर्द देता. अंदर से तुम भी एक नार्मल लड़की सी टाइट हे हो.", अब वह दोनों कूल्हों को मसलते हुए बबिता को नारिसुख देने लगा था. हर धक्का बबिता को अपने गर्भ पे ठोकर मारता लग रहा था. चुके तोह पहले अभ्यास से हे सख्त हो कर अकड़ चुके थे जो अर्जुन के सीने से दबते हुए और गर्मी बढ़ा रहे थे. 7-8 मिनट में हे पूरा लुंड अंदर बहार करते हुए अर्जुन ने बबिता को घुटनो पर ला दिए था. झड़ती हुई वह फर्श पर हाथ टिकाये लम्बी सांसें ले रही थी. छूट अंदर से फड़कती हुई जैसे उसका बरसो से बंद पानी बहार गिरती जिस्म को हल्का कर रही थी.

"घोडा है तू पूरा. यो ेब तक खड़ा है, थके कोणी के?", बबिता ने चेहरा ऊपर करके उस चुतरस से भीगे लुंड को देखा तोह अपनी हालत पर तरस आने लगा.

"अब यही लेट जाओ.", फर्श पर हे उसका जिस्म फैलते हुए अर्जुन फिर जड़ तक अंदर समां गया. इस बार वह बस चुदाई के साथ उन दोनों निप्पल को चूस चूस का फूलने में लगा रहा. बबिता haye-haye करती उसके कूल्हों पर नाखून गदति रही.

"डांगर (जानवर), इनमे दूध koni.aahhh.. फाड़ दी तोह गोलू के करेगा? वैसे तू हे बीज भर दे.. आठ.. बेरा न गोलू कर भी सकेगा या आड़े में रह जाये.", बबिता भी 2 बार झड़ने के बाद पागल होती उसके साथ लगी रही. आज बड़े बाथरूम का उपयोग सही से हुआ था. Fach-fach की आवाज छूट के अतरिक्त पानी से बाथरूम को भी गूंजा रही थी, कॉमर्स पूरी हवा में भर चूका था इनके मिलान का. आखिरी धक्को पर बबिता की चीखे निकलने लगी लेकिन न उसने अर्जुन को रोका और न छोड़ा.

"आह्ह्ह्ह...", इस बार अर्जुन का चरम भीषण था, बबिता के लायक. दोनों टाँगे ऊपर उठाये वह बबिता की छूट पूरी फैलता समूचा लुंड अंदर तेल कर खाली होने लगे. चेहरा लाल हो चूका था, बाजू ऐसे जैसे 200 किलो वजन से अभ्यास किआ हो. दोनों एकदूसरे से चिपक कर ठन्डे होने लगे.

"मार दिए रे तूने तोह. ऐसा कोण करे है? लात टूट जाती थोड़ा और पीछे करता आह्हः.. गोलू ने तेरा गिफ्ट दे हे दिए ब्याह से पहले. आठ.. जानवर. उम्मम्मम्म", दोनों हाथो में उसका चेहरा लेती वह जोश से अर्जुन को चूमने लगी. कुछ देर बाद जैसे तैसे पानी में पहोच कर वह शांत हुए और हलकी छेड़छाड़ करते एक दूसरे के शरीर से खेलते रहे.

"जब इनमे दूध आएगा तोह मैं पक्का मिलने आऊंगा."

"पिलाऊंगी दूध. मेरा बचा पीयेगा.", बबिता ने अपने भरी भरकम चुके अर्जुन के सीने से लगते हुए मस्ती में कहा

"पीने नहीं आऊंगा, देखने है के ये कितने बड़े होंगे तब. अभी एक दोनों हाथो में आधा आता है."

"तू पी लिओ रे, और जब दिल करे मेरे पे चढ़ जइयो. मैंने भी तू पसंद है और तेरा साथ भी. बालक जड़ होवेगा तब होवेगा, तू दिल करे आ जाया करियो.", अब बबिता ने प्यार से कुछ देर अर्जुन को चूमा और दोनों अलग हो गए.

"और बचा मेरा हुआ तोह?"

"तेरे बाप के भी है हमारे घर में. फरक कोणी किआ कड़े और तेरा होवेगा तोह थोड़ा तेरे जैसा थोड़ा मेरे जैसा. देखिये एहसा झोटा 21 गाम में न मिलने वाला. बाकी दिन ठीक है मेरा, हो सके है जे तेरा बीज मजबूत होया."

"पता नहीं बीज का तोह लेकिन बता देता हु के थोड़ा बहोत काबिल जरूर हु. अब यही बैठे रहना है या निकलना भी है.?", अर्जुन ने एक उभर को दबाते हुए पुछा.

"आअह्ह्ह... पहले हे मेरी माँ गाल काढ़ती रहे है के मैं चुन्नी कोणी लू, बोब्बे दुख के कपडे भी कोने पहन सकू. बस कर. तू जा मैं आराम करू हु. फेर सांझ ने जाउंगी.", बबिता के इतना कहने पर अर्जुन ने एक बार छूट को पानी के अंदर से हे सहलाया और होंठो को चूम कर टोलिया लिए अंदर आ गया.

"बबिता, चादर जरूर बदल देना."

"हाँ, ेब संभल के रखनी पड़ेगी. तू ध्यान से जाइये, धीरे. मेरे ब्याह पे जरूर आना है."

"वह तोह मैं आने हे वाला हु."

"गिफ्ट दूंगी रे बावले, जो तन्ने आज दिए है उसके बदले में तेरी पसंद का गिफ्ट.", बबिता की हंसी सुन्न कर अर्जुन भी कपडे पहन कर सब ठीक करता हुआ बहार निकल चला.

" बावला है लेकिन मर्द बावला न होया तोह मर्द कोणी. आह्हः.. फाड़ दिए निगोड़ी देरी जिद्द ने.", मुँह बनती बबिता अपनी छूट को साफ़ करने लगी. 3 बज गए थे अर्जुन को यहाँ से निकलते निकलते.

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शंकर की आँख खुली तोह समय 3 से ऊपर हो चला था. एक बार कमरे को ाचे से देखने के बाद करवट ली तोह अब वह साथ वाले कमरे का दरवाजा खुला हुआ था. ऋचा उधर अपनी माँ की मदद कर रही थी कपडे तेह लगवाने में. लता की नजर अपनी तरफ देखते शंकर पर तुरंत हे चली गयी. पल्लू चेहरे पर करते हुए अपनी बेटी से कहा.

"पापा को पानी दे जरा, मैं खाना लेके आती हु.", समेटे हुए कपडे एक तरफ करती मधुलता उस कमरे से हे बहार निकल गयी और साथ हे ऋचा भी. शंकर जी ने इस कमरे में हे एक तरफ बने बाथरूम में चेहरा ठन्डे पानी से धोया और हालत दुरुस्त करके वापिस आये तोह ऋचा के पीछे हे चंद्रो देवी भी चली आई.

"कब आया था? किसी ने बताया भी नहीं के तू आया है.", बिस्टेर पर वह बैठते हुए उस सूती पतले कपडे से अपना जला हुआ हिस्सा सही से ढंकती हुई शंकर से पूछने लगी.

"थोड़ी देर पहले हे आया था ताई. आप सोई हुई थी और दोपहर की वजह से मैं भी सो गया था. अब जख्मो में जलन तोह नहीं है.?", शंकर जी ने आशीर्वाद लेने के बाद बगल में हे बैठते हुए कहा.

"न कोई जलन नहीं. क्रीम बढ़िया है जो डॉक्टर ने दी है. बस झंझट का काम है और इतने दिन से घर हस्पताल (हॉसिपिटल) के बीच हे ज़िन्दगी रह गयी है बस. गाँव का कुछ पता नहीं और मुआ ज़िले (सरपंच) भी कुछ बताने न आया इतने दिन से.", ताई के ऐसा कहने पर शंकर को कुछ याद आ गया. इशारे से ऋचा को बहार जाने को कहा तोह वह लड़की भी बिना सवाल किये कमरे से निकल गयी.

"कब आया था आखिरी बार ये सरपंच? और जहा तक मुझे पता है सरपंच तोह आपने हे बनाया है न इसको?", चंद्रो देवी धान से शंकर को देखने लगी.

"कुछ मामला गड़बड़ है के शंकर? साफ़ साफ़ बता."

"शबनम से मिला था आज मैं. इस घर की खबर आपका सरपंच हे उसके पास पहुंचा रहा था, जाने कैसे तार भिड़ाये लेकिन शबनम झूठ नहीं बोल रही थी. और आप हे सोचो के जो हर काम आपसे पूछ के करता हो वह इतने दिन से नहीं आया. एक दिवार है न इस घर की और सरपंच की?", चंद्रो देवी के जख्मी शरीर में भी सिहरन उठ गयी ऐसी बात सुन्न कर. इधर मधुलता गोल ऊँचे किनारे वाली थाली में गरम रोटी और कढ़ी लेकर अंदर आई तोह अपनी सास को देख कर जड़ हो गयी.

"रख दे रोटी और मेरी चा (चाय) भी लय दे. पता कोणी के शंकर ने कढ़ी में कितना घी घालना होव है?", मधुलता ने बड़ी कटोरी को देखा तोह उसमे हिसाब से घी डाला हुआ था.

"जी माँ जी मैं और लय देती हु. ध्यान न रहा.", मधुलता जाने लगी तोह सास की आवाज से ठिठक गयी.

"बुरा न माने कर, बूढी हो गयी हु मैं ेब. घर में पड़े पड़े दिमाग खराब हो हे जावे है. तू शांतु (हवेली का maali-rakhwala) ने बोल जरा ज़िले के घर संदेसा देके आवे. कह देगा दादी ने खड़े पाँव बुलाया है. ऋचा ने भीतर भेज दिए, सुशीला अकेली है.", चंद्रो देवी के इतना सब कहने का जवाब छोटा सा हे मिला.

"जी माँ जी.", और इधर शंकर जी ने खाने पर ध्यान दिए. मधुलता के पास आने पर हे जैसे वह इत्मीनान से खाना खाते थे, बिस्टेर पर बैठ कर. चंद्रो देवी बस देख रही थी.

"ताई क्या सोच रही हो? और ज़िले को एकदम से क्यों बुला लिए आपने?", सुशीला के पास जाने से पहले ऋचा लस्सी का लोटा रख गयी थी उनके पास और कढ़ी में और देसी घी भी दाल दिए था. चाय का गिलास हाथ में पकडे चंद्रो देवी सहजता से हे बोली.

"बात शबनम की कोणी शंकर, वह सच कहे है के झूठ. जिस दिन मेरे साथ दुर्घटना होई थी ज़िले ने मुन्नी (मह्दुलाता) के हाथ संदेसा दिए था के भत्ते पे काम कोणी हो रहा, मजदूर गायब थे जब वह चक्कर लगा के आया. मैं या बात भूल गयी थी. ऋचा ने कहा भी था के शांतु या गोपी ने ले जाऊ लेकिन आदत कोणी जावे. चली गयी ेक्लि.", वह बात कहती हुई चुप हुई मधुलता को पालते में गरम रोटी लिए देख कर. चंद्रो देवी ने खुद हे बिना हाथ लगाए प्लेट से रोटी शंकर की थाली में सरका दी.

"मुन्नी, बैठक में बिल्लो घने टेम से तंगी हुई है. कपडा लेती आइये उसके साथ."

"जी. ज़िले भाई साहब भी आ गए है माँ जी."

"बिठा आँगन में उसने, चाल छोड़. आड़े हे भेज दे, तू बिल्लो ने पकड़ा दे जरा.", अब मधुलता के घूंघट से भी गाल पर पसीना दिखने लगा था. शंकर जी ने ये सब ध्यान से देखा लेकिन खामोश हे रहे. सरपंच को संदेसा देने के बाद लता अपनी सास का बताया सामान लेने चली गयी.

"Ram-Ram दादी. आज तोह बड़ी हस्ती गाम में आई होई है, इस खातिर आपने याद किआ इस गरीब ने. नमस्कार शंकर भाई.", ये 6 फ़ीट ऊँचा कोई अधेड़ सा लम्बी मूंछो वाला व्यक्ति देखने में हे कोई सरपंच लग रहा था. चेहरे से तोह वह खुश हे दिख रहा था लेकिन अंदरूनी तौर पर पता नहीं.

"मुद्दा ले ले ज़िले, घने दिन दिखया कोणी तोह मैंने सोच्या आप हे बुला लू. बेरा न अपनी बुद्धि से किस बात पे नाराज बैठ्या हो. शंकर भी केहवे था के गाम की बहोत तरक्की होगी. सरपंच से मिलवाओ, शाबाशी देनी है.", चंद्रो देवी के बात सुन्न कर ये घाघ सा व्यक्ति दांत निपोरता मुस्कुराने लगा.

"जी आपने जिम्मेवारी लायक समझया या बड़ी बात है. ाँ का तोह ऐसा है के गाम के काम, खेत में जीरी (राइस), एक लड़के का बिज़नेस (बिज़नेस) और दूसरे की विदेश की पढाई के काम भोत है जी. किम्मे (कोई) टेम मिले है तोह शहर भी मला साहब तक चक्कर लग जाया करे है. थोड़े समय में हे इस गरीब की कदर अपना शो आरर तहसीलदार भी कारन लगे है.", ये बात सरपंच ने शंकर की तरफ नजर मारने के बाद चंद्रो देवी से कही थी शंकर जी को ठसक लगी, खाना खाते हुए. जैसे हंसी हे आ गई हो और रोकने की कोशिश में ऐसा हो गया.

"ले लस्सी पी तू आरर जल्दबाजी न करे कर रोटी खाते. ज़िले आज अपना नाम बना चुक्या है, काम तोह मेरे करवा हे देगा.", इधर मधुलता जो चीज ले कर अंदर आई थी वह देख कर शंकर जी हैरत में पड़ गए. लकड़ी के घुमबावदार चमकीले हाथे वाली ये 2 नाली वाली बन्दूक सोमबीर सिंह की थी. ज़िले ने भी एक नजर बन्दूक को देखा और फिर kapde-salaai से चंद्रो देवी को उस नलकी की सफाई करते हुए.

"हाँ तोह सब आपके लिए हे है जी. सब आपका दिया होया है तोह काम आपके हे करवाऊंगा. भाई का लड़का भी 30 हजारी में बड़े वकील के पास काम सीखे है जी तोह ेब आपने कही बहार देखन की जरुरत न पड़ेगी. दूसरे तोह मज़बूरी देख फायदा उठावेंगी काम के बदले, मैं तोह आपका अपना हु."

"देख शंकर यु है सच्चा हितेषी. कोई लालच नई कोई मांग नई ज़िले के दिल में. मेरा काम कारवां खातिर हमेशा तैयार. तू तोह मतलब से आवे है मेरे धोरे, आग लगे हफ्ता हो गया खबर आज लें आया.", चंद्रो देवी को किसी ने नज़र का चस्मा लगाए न देखा था कभी जो सबूत था उनके तंदरुस्त जीवन का. दोनों नाली शंकर की तरफ करती वह अंदर देख रही थी की ाचे से साफ़ हुई है या नहीं.

"फ़िक्र करनी जरुरी है जी. तू हे बता शंकर इस घर में छोटी तोह ना हों के बराबर है, रविंदर ज़िन्दगी भर दूसरा के रेहम पे रोटी खावेगा बेचारा. 3 विधवा महिला, एक जवान लड़की कोई काम बहार के आदमी ने कहती सुथरी न लगती. दादी भी तोह मुश्किल से बची लेकिन उम्र तोह हे गयी है.", शंकर जी का पारा चढ़ने लगा था अब लेकिन चंद्रो देवी को मुस्कुराते देख बस थाली बिस्टेर से निचे रख दी और ज़िले सिंह ज्यादा हे फ़ैल गया था चंद्रो देवी की प्रतिक्रिया देख कर. और चंद्रो देवी ने वह दोनों नलकी बंद करते हुए बस इतना हे जवाब दिए.

"यु मेरा बीटा है ज़िले. घर का अगला मुखिया जितने बिजेन्दर समझदार नई हो जाता. तेरे बर्ज (जैसे) की यु इस खातिर सुन्न गया क्योंकि मैं बैठी हु आरर फ़िलहाल फैंसले मैं हे करुँगी. तेरे दादा ने मेरी raam-raam कह दिए.", और जैसे कोई धमाका सा हुआ इस कमरे में. दिवाली का बड़ा बम फूटने जैसा धमाका. ज़िले सिंह का सर तरबूज की तरह फट कर एक चौथाई तोह कमरे में हे बिखर गया था. शरीर फर्श पर गिरते हे लहू सीमेंट की चिकनी सतह पर फैलने लगा. शंकर की कमीज तक खून उड़ता आया था और इधर चंद्रो देवी ने वह दोनाली बराबर आ कड़ी हुई लता को पकड़ा दी कपडे से हठी साफ़ करते हुए. शांतु और गोपी के साथ ऋचा भी इधर आने लगी तोह मधुलता ने उस मासूम लड़की को अंदर भेज दिए.

"दोनो खड़े के देखो हो? साफ़ करो या गंदगी आरर चारा कॉटन खेत में जाओ तोह भत्ते में फेंक आइओ. टेम भी हो गया है. गोपी तेरी लुगाई ने बोल कमरे में कपडा मारेगी, दिवार भी खराब कर गया डेढ़.", आज्ञा का तुरंत पालन हुआ और दोनों हे आदमी मुस्तैदी से उस लाश को पहले दरवाजे से निकल कर हवेली के पिछले हिस्से में ले गए. शंकर को होश आया तोह वह बस अपनी ताई को देखने लगा.

"के बात, पसंद न आया अपनी ताई का पुराण रूप? आज भी मेरे फैंसले सीधे और साफ़ होव है. तेरे बारे में ज्यादा बोल गया इस खातिर मुँह पे गोली मारनी पड़ी, निशाना मेरा दिल पे भी उतना हे चोखा है. ऐ मुन्नी, चा ले आ 2 कप, फेर शंकर ने भी काम hai.Byaah वाला घर है शहर में, देवर मेरा अकेला कितना काम करेगा?", चंद्रो देवी की आवाज से मधुलता काम में लग गयी और शंकर जी भी कमरे में सफाई होते देख चंद्रो देवी के साथ आँगन की और चल दिए.

"ताई, निशाना तोह मुझे पता है लेकिन अब इसके परिवार और गाँव में क्या माहौल होगा?", चारपाई पे ताई के बैठने के बाद शंकर ने भी बैठते हुए पुछा.

"दिल्ली गया आरर वापिस कोन्या आया, 30 हजारी बतावे था न वह. टेंशन न लिया कर तू, गाम मेरा है आरर मैं जड़ तक ज़िंदा हु मेरा रहेगा. भत्ते में भी खून न दिए था इस बारी, बढ़िया होया ऊँची भेंट लगेगी तोह ईंट भी चोखी होवेंगी.", अब ऋचा भी एक तरफ से सुशीला को व्हीलचेयर पे इधर ले आई थी. सुशीला का हाल पूछने के बाद शंकर ने आगे बात करि. ऋचा अपने बाप की बगल में थी इस वक़्त.

"मैं भी यही करने वाला था थोड़ी देर बाद लेकिन सावधानी से. कुछ भी बात हुई तोह मेरा नाम ले देना ताई, संभल लूंगा मैं."

"तू तेरी बलूंगड़ी ने संभल, इतनी देर होगी बेरा न के मांगे है जो कह न सकती.", चंद्रो देवी ने शंकर का ध्यान ऋचा की तरफ करवाया तोह सुशीला भी मुस्कुराने लगी ऋचा को झेंपते देख. शंकर ने हँसते हुए इस मासूम सी लड़की को अपने साथ कस लिए.

"बोल अब तोह तेरी दादी भी कह रही है. क्या चाहिए मेरी पारी को?"

"सुशीला कानि (की तरफ) के देखे है, उसने भी बेरा है यो तेरा बाप है ार तू इसकी लाड़ली. और शंकर का aade(yaha) के खजाना दबा है, तेरे खातिर आवे है.", चंद्रो देवी ने भी शंकर की बात में साथ देते हुए ऋचा को अपनी तरफ से आजादी दे दी.

"दादी, वह घर में शादी है तोह मैं कब जा सकती हु उधर? सॉरी अगर गलत बात कह दी हो तोह, बस दिल था इसलिए कह दिए.", झेंपते हुए बात ख़तम करके ऋचा ने शर्मिंदगी से नजरे नीची की तोह चंद्रो देवी ने देख लिए था मधुलता को घूरते हुए वह चाय रखने से पहले.

"आँख मैंने दिखा तू, बालक है और सबका दिल करे है khushi-utsav में शामिल हों का. ऋचा, जड़ तेरा बाप लें आवे चली जाइये, इस मुन्नी ने मैं देख लुंगी."

"माँ जी मेरा वह मतलब नहीं था. ये अकेली और फिर उधर उन सबके बीच.", मुन्नी उर्फ़ मधुलता ने बेटी की वजह से आज सवाल कर लिए था.

"वह परिवार पूरा परिवार है इसका ध्यान रखने के लिए लता. और मैं तोह खुद ये बात करने हे वाला था के परसो ताई के साथ ऋचा उधर आ जाएगी. शीला तै और पूर्णिमा काकी (उमेद सिंह की माता जी) भी परसो सुबह घर पे आने वाली है, Bijender-Babita का न्योता भरने. 5 दिन बाद तोह इस घर में भी शादी है फिर बिजेन्दर के इधर आते हे रिच्स 20 दिन वही रहेगी, मेरे साथ. कल उमेद के साथ मैं सवेरे चक्कर लगा जाऊंगा यहाँ और हलवाई बिठा देंगे.", शंकर जी ने पूरी बात बताई तोह मुन्नी थोड़ी दुरी पर स्टूल पे जा बैठी. इधर सब चाय पीने लगे तोह ऋचा को इतना लाड करते देख सुशीला ने जुबान खोली.

"चिपक ले जितना चिपकना है. फेर तू भी अगले घर जावेगी. तेरा नंबर नजदीक है."

"मैं कही नई जा रही ताई. ट्रेनिंग के बाद बस नौकरी और पापा.", शंकर जी ने लाड़ली की बात सुन्न कर सर पे हाथ फेर दिए.

"घर जमाई ले आऊंगा अपनी लाडो के लिए, किसी के घर भेजने से ाचा."

"यु न कह दिए शंकर के अर्जुन गइल फेरे लगवा देगा.", सुशीला की ऐसी बात पर सबकी हंसी छूट गयी थी सिवाए मधुलता और शंकर जी के. शंकर जी जहा झेंप गए वही मधुलता अंदर से थोड़ी नाराज हो गयी.

"भाई है वह मेरा."

"तेरी ताई मजे ले रही है. वह ऐसे हे बोलती है तुमने ज्यादा समय नहीं बिताया न अभी. और अर्जुन का रिश्ता हो चूका है सुशीला, अपने छोल चाचा की पौती है प्रीती. ाची लड़की है और बचपन के दोस्त है दोनों, बड़ो ने मजाक में कहा था लेकिन फिर दोनों परिवारों ने यही करना बेहतर समझा. अभी 18 पार किये तोह 6-7 साल उसकी तरफ कोई देखने वाला नहीं."

"कुछ भी कह शंकर, बबिता उसकी हाँ (बराबर) की होती तोह मैंने लड़का उठवा लेना था मेरी बेटी खातिर. भाग तगड़े है तेरे जो ऐसा लड़का दिए, माँ आप तोह मिली होगी?", सुशीला ने बात का रुख चंद्रो देवी की तरफ किआ तोह चाय का खली गिलास ट्रे में रखते हुए उन्होंने जवाब दिए.

"एक नजर में दिल में उतर गया था मेरी. ऊपर से सुदर्शन वाला किस्सा लेकिन छोरा न मासूम है सुशीला. शहरी कोणी, नखरे वाला किसे थानेदार के कपूत बर्गा. सलाह मेरी भी तेरे जैसी थी, फेर थाम में से किसे की कोई इतनी छोटी छोरी भी कोणी आरर ेब बेरा लगया के रिश्ता हो चुक्या है तोह कोई फायदा कोणी था रिक्स लें का.", आखिरी बात सुन्न कर कही मधुलता के चेहरे पर दबी हुई हंसी आई और बाकी सब खुल कर हंस हे रहे थे.

"वैसे इसका अकेले का तोह वह है भी कोणी, या भी सुन्न ले. नरिंदर ने दे आया था यो जड़ अर्जुन 8 महीने का था. उसने लुगाई के साथ हे अर्जुन इसके धोरे भेज दिए था. 4-5 महीने बाद कृष्णा सम्भली तोह रेखा ने आप हे कह दिए के अर्जुन पे उन दोनुआ का बराबर अधिकार है. बहोत मुश्किल तेह बच्या था अर्जुन भी कृष्णा के जाए बाद, दूध बदल गया फेर बेरा नई और के होया था लेकिन ज़िन्दगी जीनी थी तोह समझ ले पैदा होते के साथ वह लड़ता आया है. बिरले होये करे है ऐसे सपूत जो बाद में दूसरे लोग की ज़िन्दगी संवार दे. मुन्नी आरर गुड्डी भी जे उस से मिलेंगी तोह वह ओप्रा कोणी करेगा, यकीन से कहु मैं. फेर इनका जी भी न लगेगा आड़े.", अतीत में कहा चली गयी थी चंद्रो देवी की खुद शंकर को हे हाथ रख कर उन्हें रोकना पड़ा.

"चलता हु ताई, और अर्जुन वैसे भी पूरे परिवार का हे है. मैं तोह तड़ीपार कपूत हु थानेदार का. सवेरे मिलूंगा और तू तेरी taai-daadi का ख्याल रखे कर. फिर शॉपिंग लेके चलूँगा अपनी पारी को.", उठने से पहले ऋचा के गाल को चूम कर उन्होंने ताई का आशीर्वाद लिए और नजरो से लता को अलविदा कहते हुए कार की तरफ चल दिए.

"पापा, बिना चाबी के तोह कार चलने से रही.", पीछे हे ऋचा चाबी हिलती उनके पास आ कड़ी हुई और शंकर जी मुस्कुरा दिए उसकी हरकत पर.

"ला दे फिर?"

"नेग कहा हैं? छोटे भाई से तोह लेने से रही, आपको हे देना पड़ेगा.", इधर मधुलता ये सुन्न कर उनकी तरफ आने लगी तोह चंद्रो देवी ने रोक लिए. शंकर जी ने हँसते हुए अपना बटुआ हे ऋचा के हाथ पर रखते हुए कहा.

"तेरी मर्जी है, सब तेरा हे तोह है.", ऋचा ने पैसे से भरे पर्स को खोलते हुए उस पारदर्शी जेब पर नजर डाली तोह वह ऋतू के बचपन की तस्वीर थी. हाथ लगाती वह जैसे कुछ महसूस करना चाहती थी.

"तेरी इसके पीछे है.", शंकर जी के इतना कहते हे ऋचा ने ऊँगली अंदर करते हुए ऋतू की तस्वीर बहार निकली तोह सचमुच ये दूसरी तस्वीर ऋचा की हे थी और साथ हे कागज भी. ऋचा द्वारा लिखी पहली चिट्ठी जिसमे लिखावट बता रही थी की शायद वह तब 7-8 साल की रही होगी. ऋचा अपने बाप से कस कर लिपट गयी, नम्म आँखों से.

"ी लव यू पापा. यू अरे थे बेस्ट डैड एंड मोस्ट प्रेसियस. ये मेरे 8तह बर्थडे पर मैंने लिखी थी, आपने आजतक इसको अपने पास रखा हुआ है?"

"एक तेरा और एक ऋतू का हे बर्थडे तोह याद रहता है मुझे. किस्मत देख मेरी दोनों परियां 1 जुलाई को हे पैदा हुई बस 5 साल के फरक से. यू अरे माय प्रिंसेस डार्लिंग.", शंकर जी ने भी उसको सीने से लगाने के बाद माथा चूम कर खुद रुमाल से चेहरा साफ़ किआ.

"वह मुझे लेहंगा लेना है और ढेर सारे कपडे. फॉर 20 डेज, 20 ड्रेसेस.", सबकुछ पर्स में वापिस सही से रखते हुए ऋचा ने लाड से अपनी ज़िद्द बताई.

"तेरी शादी अगले साल करूँगा बीटा, अभी क्यों लेना है?"

"जाओ आप, मैं बात हे नहीं करती. यहाँ ये salwar-kameej, कॉलेज में यूनिफार्म और अब ट्रेनिंग पे भी सब वैसा हे. कुछ नहीं चाहिए मुझे.", ऋचा रूठ कर जाने लगी तोह शंकर जी ने जाने न दिए.

"तेरे लिए 20 नहीं 50 ड्रेस ले लिओ और लेहंगा तोह मैं वैसे भी दिल्ली लेने जाऊंगा हे. बिजेन्दर की शादी की शॉपिंग परसो कर लिओ, बाकी तू घर आएगी तोह अर्जुन या संजीव में से कोई ले जायेगा तुझे मार्किट. दूकान खरीद लेना लेकिन पापा से गुस्सा नहीं करना.", शंकर जी ने पल में हे उसको मन लिए था.

"एक ऐसा पेंडंट चाहिए मुझे, छोटा सा. चैन है मेरे पास सोने की लेकिन उसमे ऐसा मोरपंख डालना है.", ये नयी डिमांड सुन्न कर मधुलता रुक न सकीय अपनी जगह.

"पायजेब, पेंडंट, कड़े जो भी मेरी बेटी को चाहिए वह मिलेगा. तेरी माँ घूर रही है अब, मैं चलता हु.", शंकर जी ने गाल थपथपा कर चाबी ली और एक बार खुद भी वह चला देख कर गाडी में बैठ गए. ऐसा पेंडंट उन्होंने घर में भी कही देखा था. पीछे हे चंद्रो देवी भी उठ कड़ी हुई थी अपने नौकरो को गाडी में सरपंच की लाश लकड़ी, उपलों के बीच बोरी में लपेटे ले जाते देख.

"ऐ मुन्नी, चल तेरा गुस्सा हो गया हो तोह मेरे मलहम लगा दे. और अपने बाप से नई कहेगी तोह किस से कहेगी? शंकर जैसा भी हो, इसका एकतरफा करता है और ज़िन्दगी भर करेगा. ऋचा चेक बना डीओ फेर तड़के कोई लिकद्वा ल्यायेगा बैंक से पैसे. पौती के शगन भी करने है, पौता तोह सार लेगा लेकिन बबिता टेंटुआ पकड़ के मर्जी का लेके जाएगी.", चंद्रो देवी की बात सुन्न कर ऋचा अपनी माँ को ठेंगा दिखती उनकी तरफ दौड़ गयी. सुशीला हंस रही थी मुन्नी की हालत पर

"देख लो जीजी, घर में बस एक मैं हे हु जिसके बस में कुछ नहीं."

"देख्या तोह कोणी मुन्नी पर पलंग हाल्ने के आवाज सुनी जरूर थी. शंकर सबसे ज्यादा खुश तोह तन्ने करके गया है. बलूंगड़ी की माँ बिलाव खा के बुखी. वाह मेरी बेबस बेचारी. तू न बदली आज तक, बस कमरा बदल गया थाम दोनुआ का. चारे वाले खंडहर से ेब प्राइवेट रूम. ग्रेट.", सुशीला की बात सुन्न कर मुन्नी के कदम जैसे मिटटी में हे जम्म गए, थोड़ी हे दूर बैठी गुड्डी भी हंस रही थी सुशीला के बिंदास लहजे को देख कर.

"वो तोह.."

"सुशीला जीजी, मुन्नी नहीं लता नाम है इसका या फेर चंदा, इन प्राइवेट रूम.", गुड्डी की इस अतिरिक्त चुहल से मुन्नी जहा पानी पानी हो रही थी वही सुशीला को नयी छेड़ मिल गयी थी.

"ओहो चंदा. गुड्डी, एक बात तोह है. मुन्नी ने देख के लागे कोणी के या इतनी उम्र की हो गयी होगी. के राज है इसका.?", मुन्नी चुपचाप एक तरफ बर्तन धोने हे बैठ गयी थी शर्म से खड़ा न रहा जा सका.

"जीजी, खुराक.", गुड्डी ने बस इतना जवाब दिए.

"खुराक? मेरी खुराक तोह इस से दुगनी है. लेकिन मेरी चमक जा चुकी आरर या सोने बरगी निखरी पड़ी है."

"जीजी, वाह खुराक शंकर जी हे दे सकते है.", अब मुन्नी ने झूठे गुस्से में दोनों की तरफ देखा और शकल ऐसी के जैसे अभी रो देंगी.

"गुस्सा क्यों होव है चंदा. तेरी खुराक तन्ने मुबारक. महारी कोई सुखी रेहनी है तोह ेब के कर सका है. क्यों गुड्डी?"

"जीजी, आप न बेशक एक्सीडेंट करके कमजोर दिखो हो. एक बार ठीक हो जाओ फेर कहियो के मैं सुनहरी दिखू हु के आप. टूबवेल पे टेम तोह आपके ाँ का सेट करे करते लोग, बस देख के जी भरण वाले. स्कूल के आरर कॉलेज वाले के, बाकी शंकर कोनसा आड़े रेहवे है. महीने में 2 घंटे आरर फेर बाकी सब यु आपके स्यामि है. Pashu-chulhe के काम सेहत ठीक रखे है लेकिन उतनी कोणी जितनी आपकी है.", मुन्नी ने नरमी से सुशीला से बात कही तोह सुशीला ने मजाक बंद कर दिए.

"ज़िन्दगी 2 तरह इंसान जी सके है मुन्नी. आज इसके साथ चलो या फेर कल इसकी बुराई करो. जो है उसमे खुश रह, काल शिकायत न होगी पीछे मदद के देखन पर.", सुशीला ने बड़ी गंभीर बात कह दी थी जैसे उसको अपने गुजरे हुए वक़्त में खुद से हे शिकायत रही हो.

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क्रमश
 
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