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मकसद (1)
"रात को ज्यादा कुछ नहीं आता टीवी पर लेकिन जल्दी सोने की आदत भी नहीं है तोह गाने हे देख लेती हु. वैसे बॉडी बहोत ाची बना राखी है तुमने? हाइट तोह दूर से हे नजर आ जाती है लेकिन शरीर कपड़ो के अंदर रहता है. तोह सिर्फ दूध हे पीते हो अभी तक?", इस बार तोह सोनाली का एकमात्र परिधान बिलकुल केहर ढाने वाला था. घुटनो से भी 4 इंच ऊँचा एक रेशमी गाउन जिसकी पत्तिया अगर समतल पेट पर कासी न होती तोह गोर दूधिया वक्षो की अभी दिखती लकीर के साथ उनका आधा स्वरुप हे सामने होता. कांच के बड़े गिलास में झाग बनाया हुआ दूध लिए वो जिस तरह से प्रकट हुई थी, एक पल को अर्जुन बस देखता हे रह गया. जाने पानी के साथ क्या सुगंध मिला कर नही थी सोनाली, जो पूरा लाउन्ज (हॉल) हे महक उठा.
"काफी बड़ा टीवी है और हमारे शहर से तोह ज्यादा हे चैनल आते होंगे यहाँ. दूध के लिए धन्यवाद सोनाली जी और इसके सिवाए मैं सिर्फ पानी हे पीना ठीक समझता हु. वैसे आपने भी खुद को ाचा मेन्टेन किया है. लगता नहीं की पालक दीदी की जेठानी है आप.", अर्जुन चौड़ी पट्टी की बनियान हे पहने था ऊपर जिस से उसके मजबूत डोले और छाती के कटाव स्पष्ट सामने थे. सोनाली अपने गाली के आगे से बाल पीछे झटक कर उसी नरम सोफे पर आ बैठी जिस पर अर्जुन था. वह एक बिना पीठ वाला लम्बा और नरम सोफे भी था और 2 वैसे हे सोफे जैसे पर ये बैठे हुए थे. एक ख़ास लोशन की शीशी टेबल पर सामने रखने के बाद हथेलिया आपस में हलके से रगड़ कर अपनी गोरी मांसल बाहों पर वो तरल मसलती हुई सोनाली टेलीविज़न देखने का दिखावा करते हुए बात करने लगी.
"मेन्टेन नहीं करूंगी तोह काम कैसे चलेगा? ये दिल्ली है अर्जुन, लोग यहाँ एक कम्पटीशन में हे रहते है. फिर वो चाहे कमाई का हो, घर का या दिखने का. सबकुछ बेहतर चाहिए दूसरे से नहीं तोह जो पास है उसकी कदर नहीं. मुझे तोह लगा था के तुम पार्टीज पसंद करते होंगे और तुम जैसे जवान रईस लड़के तोह दिल्ली के दिसो क्लब्स में दर्जनों लड़कियों की निगाहो में रहते है. गर्लफ्रेंड नहीं बनाई या तुम्हारी तरफ ये सब आज भी मन है?", अब अर्जुन क्या कहता की जो मन है वो भी वो कर चूका है और गर्लफ्रेंड नहीं बल्कि दर्जनों प्रेमिकाए है उसकी. लेकिन क्लब वाली बात सुन्न कर उसके दिमाग में अर्शी का हे अक्स उभर आया. ज़ली ban-thann कर रहने वाली एक आधुनिक थी तोह क्या पता वो इस क्लब के बारे में भी कुछ जानती हो.
"फिलहाल तोह करियर पर हे ध्यान है सोनाली जी लेकिन अब अपने घर से बहार हु और काम तोह परसो हे होना है इसलिए सोच रहा था की कल कोई क्लब हे देखा जाए. एक दोस्त है मेरा दिल्ली में और उसने बताया की यहाँ पर क्सक्सक्सक्स जगह कोई Fire-shot क्लब है जो अपने आप में हे अलग दुनिया है. आपने देखा है वो?", अर्जुन से ये नाम सुन्न कर सोनाली बड़े हे कामुक अंदाज में मुस्कुराते हुए अपने कंधे पर से गाउन ढलकती हुई वह भी लोशन मलने लगे. जाने उसके मैं में क्या चल रहा था पर जो भी था अर्जुन को फिलहाल तोह वो पसंद था. ऐसा करने के दौरान सोनाइल के पुष्ट सतांन का ऊपरी हिस्सा भी नुमाया दिखा जो क्सक्स उम्र की औलाद के बावजूद बेहद सुडोल प्रतीत हुआ.
"दिल्ली में ज्यादातर तोह सिर्फ डिस्को हे है जैसे घुंघरू, झणकार, रौनक और क्लब 90. जिन लोगो ने सिर्फ झुण्ड में नाचना हो, आपस में मस्ती करनी हो वो वही जाते है. वेस्टर्न कल्चर नया नया तोह आने लगा है बोम्बये के बाद यहाँ. लेकिन Fire-shot अलग हे दुनिया है जैसी 5 स्टार होटल्स के तहखानों में भी उतनी बढ़िया नहीं. वह महंगी शराब, तेज संगीत और दिल्ली की सबसे अमीर लड़किया हर शनिवार दिखाई पड़ेंगी. और इतना हे नहीं, बड़ी बड़ी मॉडल्स और कुछ फिल्म स्टार्स भी भी वह अक्सर देखे गए है. कैमरा वाले तोह भीतर कदम भी नहीं रख सकते जैसी सिक्योरिटी रहती है वह. एक बार हे गयी थी लेकिन 10 हजार वसूल भी हुए. अकेले जाने की सोच रहे हो तोह किस्मत के भरोसे रहना. कभी कभी अकेले लड़के बहार हे रह जाते है.. हाहाहा.. और वैसे भी तुम दूध पीने वाले और वो शराब से भरी मस्ती की अलग हे दुनिया.", सोनाली से जानकारी लेते हुए अर्जुन घूँट घूँट दूध पीने के साथ हे मुस्कुरा रहा था. कुछ ज्यादा हे गरम और तेज थी पालक की जेठानी. नौजवान लड़को का बुरा हाल करना जैसे उसकी लिए पुरानी बात थी.
"दूध पीना तोह बस आदत है और सेहत के लिए एक ाची आदत सोनाली जी. वैसे आपके हस्बैंड भी मतलब आपकी तरह हे जीवन खुल कर जीने में यकीन रखते है? जिस जगह आपके हिसाब से युवा लोग और आप जैसी खूबसूरत लड़कियां जाती है वह जाना सबके लिए तोह मुमकिन नहीं. कैसे सेहन किया होगा उन्होंने वह औरो का आपको देखना?"
"मस्का लगा रहे हो लड़की बोल कर? हाहाहा.. मैंने कब कहा के प्रजुल साथ गए थे? वो समय निकलने वाले होते तोह क्लब पब जाने की जरुरत हे कहा पड़ती? सहेली के साथ गयी थी वह और वो भी सिर्फ एक हे बार. तुम जाने के लिए पूछोगे तब भी मैं दोबारा उधर नहीं जाने वाली. सॉरी... कही और का पूछते तोह जरूर विचार कर लेती. वैसे अपनी बहिन से पूछ लो, उसने तोह दिल्ली आने के बाद भी आसपास की मार्किट के सिवा कुछ देखा हे कहा है. जयेश तोह कभी मन नहीं पाया, क्या पता तुम्हारे साथ जाने के लिए राजी हो जाए.", अर्जुन तोह वैसे भी कहा ले जाना चाहता था इस आफत को अपने साथ जब वो खुद वह एक मकसद से जाने वाला था. पर यहाँ खुद हे सोनाली ने उस चर्चा का मौका बना दिया था जिसकी तलाश में अर्जुन इतनी देर से बैठा था. गिलास को टेबल पर रखने के साथ हे अर्जुन ने अपना वो हाथ जो सोनाली की तरफ था, उसके मुलायम गुदाज पत् के ऊपर हे रख दिया. अब बारी सोनाली की थी हैरान होने की.
"वो बहिन है न सोनाली जी और जब पति के साथ न गयी तोह मेरे साथ तोह सवाल हे नहीं उठता. वैसे आपने तोह जैसे पूरी दिल्ली हे घूम राखी है और आप है भी तोह दिल्ली से हे.. क्सक्सक्सक्स में हे तोह आपका घर है, मतलब आपके मम्मी पापा और दूर के मां वही रहते है. गलत कह रहा हु क्या?", अर्जुन का हाथ सरक कर उसकी मखमली जांघो को सहलाने लगा था, वो भी रेशमी वस्त्र के भीतर एक जालीदार पंतय की डोरी तक. जिस तरह से वो एकटक सोनाली की आँखों में देख रहा था, उसके चेहरे के बदलते रंग और शरीर में हलकी हलकी कम्पन्न साफ़ बता रही थी की न वो अर्जुन को रोकने की हालत में थी और न कुछ कहने की. अर्जुन को तोह जवाब चाहिए हे था और उसने हाथ थोड़ा आगे बढ़ाते हुए पंतय से ऊपर उस ढलान पर सरकाया जहा ऊपर नाभि और निचे झीने से वस्त्र में सोनाली की योनि.
"क्या हुआ सोनाली जी? आपकी तोह हंसी और चमक हे गायब हो गयी? कुछ गलत तोह नहीं कह दिया मैंने? इतनी तारीफ के बदले आप 2 शब्द भी नहीं कहेंगी? दूर के मां जी से तोह बहोत कुछ कहती करवाती है आप और मैं इतने करीब हु तब भी ये बेरुखी.", अर्जुन नाभि के किनारे ऊँगली फिराते हुए थोड़ा और करीब खिसक आया. अब वो सोनाली की उखड़ी सांसें भी महसूस कर रहा था कांपते बदन के साथ.
"तुम्हे.. तुम्हे ये.. सब अफवाह है और झूठ. तुम आरोप लगा रहे हो."
"शहहह.. थोड़ा आहिस्ता बोलिये सोनाली जी.. दीवारों के भी कान होते है और कोई यहाँ आ पंहुचा तोह बदनामी आपकी हे होगी. क्या पता इतना ाचा ससुराल भी हाथ से जाता रहे. मेरे सिर्फ 3 सवाल है और उनमे से एक का भी गलत जवाब तोह समझो इस घर में तुम्हारी ये आखिरी रात होगी. हाँ अपने मायके जाने से पहली दूसरी ससुराल में 3-4 साल बिताने पड़ेंगे वो अलग. आराम से बैठो, डरना बाद में.", अर्जुन ने अपना हाथ सोनाली के जिस्म से हटा लिया और कांच के जग से वही उल्टा कर रखे गिलास में पानी भर कर उसके सामने किया.
"पी लो सोनाली जी, गाला बार बार सूखने से ाचा है की पहले हे गीला कर लिया जाए. हाँ.. तोह पहला सवाल है की जब वो दूर का मां आपको स्कूल पूरा करने से पहले हे जवान कर चूका था तोह शादी उस से क्यों नहीं की?", इस बात से साफ़ था की अर्जुन उस व्यक्ति को दबोच चूका है और वो अपना मुँह जल्दी हे खोल गया होगा. सोनाली ने हाथ जोड़ने की नौटंकी करनी चाहि तोह अर्जुन ने अपनी बगल में रखा हुआ स्क्रीन वाला कैमरा चालू करके सोनाली की हे तस्वीर उसके सामने कर दी. वो एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ चिपक कर बैठी थी और उस आदमी का एक हाथ सोनाली की कमर पर और दूसरा उसके चुके को दबाने में लगा था. अब सोनाली ने नजरे झुकाते हुए जवाब देना हे बेहतर समझा.
"उम्र का फरक और ऊपर से वो खुद हे शादी नहीं करना चाहते थे. घरवाले तोह कभी राजी होते नहीं और उनके नाम न दूकान थी और न मकान. भाग कर जाते भी तोह ज़िन्दगी खराब हे होती घरवालों की बदनामी के साथ. बस उसके बाद कॉलेज ख़तम होते हे मेरी शादी प्रजुल से करवा दी गयी जो न बिस्टेर में मुझे खुश कर सकता है और न बिस्टेर से बहार. पैसे से हे ज़िन्दगी में सुकून नहीं मिलता, कोई होना चाहिए जो तुम्हे समझे और प्यार करे. इसलिए मैं रोहन के पैदा होने के बाद उनसे दोबारा मिलने लगी.", अर्जुन ये सुन्न कर फीकी हंसी देते हुए बोलै.
"प्यार और समझने वाला? पैसा सबकुछ नहीं तोह फिर क्यों हर बार उसको थैले में पैसे पकड़ती आ रही हो? आज भी तोह 2 लाख दिए थे. वैसे ये मेरा दूसरा सवाल नहीं है सोनाली जी. आपके अधूरे जवाब के ऊपर सवाल है. और रही बात आपके पति के प्यार की तोह आपका हे दिल नहीं भरता एक पुरुष से. प्रजुल से घरवालों ने शादी नहीं करवाई थी आपकी, बल्कि आपने हे फांसा था उस शरीफ आदमी को अपने प्यार के जाल में इसी मां के कहने पर जो काम के नाम पर लड़कियों की दलाली करता है और जुआ खेलने के लिए वो कमाई काम पड़ती है इसलिए आपसे हर हफ्ते 10 दिन बाद पैसे ऐंठता रहता है. छोडो ये सब be-fijool की बातें सोनाली जी. एक झूठ को मजबूत दिखाने के लिए 50 और बोलने पड़ेंगे लेकिन फायदा तब भी नहीं होने वाला. मुझे आपकी निजी ज़िन्दगी से कोई मतलब नहीं लेकिन यहाँ, इस घर में मेरी बहिन भी है और बात है उसकी ज़िन्दगी की. और इस मामले में मैं जरा सी भी कोताई नहीं बरतने वाला. पहले हे बता देता हु की पुलिस, प्रशाशन, मंत्री और जुर्म करने वाले, सब मेरे पास है. हेकड़ी तोह आपके उस दूर के मां की भी मैंने सिर्फ 2 हे मिनट में निकाल के रख दी थी. आप 30 सेकंड नहीं झेल सकोगी इसलिए अब सीढ़ी तरह बताओ की पालक हे क्यों? इसका जवाब मैं आपके उस मां से मांग सकता था लेकिन वो बेचारा तोह आधी कहानी में हे बेहोश हो गया. अब क्सक्सक्सक्स थाने में है जहा से सुबह कोर्ट में पेश किया जाएगा और बाकी ज़िन्दगी उसकी जेल में हे कटेगी. पालक दीदी हे क्यों?", अर्जुन की सार्ड आवाज के साथ हे अपने आशिक़ का हाल सुन्न कर सोनाली की कनपटी पर पसीना उभर आया, बेशक इस dhawani-badhit कक्ष में ठंडक थी और जिस्म पर वस्त्र भी naam-matra.
"उन्होंने पालक को शादी में हे देख लिया था.. उसके बाद किसी वजह से वो दोबारा इस घर नहीं आ सके पर जब भी मुझसे मिलते तोह दबाव डालते की मैं कैसे भी करके पालक को उनके निचे ले औ. मैं रिस्क नहीं लेना चाहती थी लेकिन उनके पास मेरे भी कुछ वीडियो थे जिसमे मैं उनके हे दोस्त.. तोह मज़बूरी में मैंने.."
"न न सोनाली जी.. ऐसे नहीं.. पूरी बात बताओ की उस दुष्ट का आना इस घर में क्यों बंद हुआ, पालक दीदी को सिर्फ आप तोह अकेली मजबूर नहीं कर सकती थी और सिर्फ उन्हें पाने की हसरत तोह मकसद हो नहीं सकता. हर बात बताओ मुझे और सच बोलने पर मैं तुम्हारे जीवन को नुक्सान नहीं पहुंचने वाला, जुबान देता हु.", अब सोनाली ने खुदसे हे आधा गिलास पानी एक सांस में गले से निचे उतार कर चेहरा गाउन के पल्ले से हे साफ़ किया. ऐसा करने पर उसका एक उभार पूरा हे बेपर्दा हुआ लेकिन इस वक़्त उस जिस्म की चाहत या परवाह दोनों में से किसी को नहीं थी.
"बरात से आते हे मां ने नशे में मेरी ननद की कमर पर हाथ रख दिया था. लोग ज्यादा नहीं था और Palak-Jayesh घर प्रवेश कर चुके थे उस समय. मेरी ननद से वो सेहन नहीं हुआ और उसने मां के थप्पड़ मार दिया, गेट के बहार हे. बात बढ़ने से पहले हे वो चले गए और मैंने भी अपनी ननद के पाँव पकड़ कर उनके किये की माफ़ी मांगते हुए शिकायत न करने के लिए मनवा लिया. फिर भी प्रजुल को इतना जरूर पता चल गया की मां ने नशे में गलती से उनकी बहिन को छू लिया था. उन्होंने अकेले में मुझ पर पहली बार हाथ उठाया था और साफ़ कह दिया था की वो आदमी घर के आसपास भी दिखा तोह जान से मार देंगे. मां को पालक भ चुकी थी और मुझे इस बात से जलन हुई क्योंकि उन्होंने मुझे मेरा आइना दिखा दिया की मैं अब पहले जैसी नहीं रही. पर उन्होंने फिर ये प्लान बनाया की पहले मैं कैसे भी करके पालक को धीरे धीरे करके कमजोर करू और फिर वो उसके साथ हमबिस्तर होने का वीडियो बना लेंगे. मल्होत्रा परिवार कितना अमीर है ये तोह शादी में हे पता चल चूका था इसलिए उस वीडियो के जरिये हम पालक से सौदा करेंगे की वो 2 करोड़ के बदले अपनी आजादी वापिस ले ले. सबसे पहले मैंने पालक से नजदीकियां बढ़ानी शुरू की, हर बात और काम में साथ देना, ज्यादा काम खुद करना, शॉपिंग पर साथ लेके जाना. फिर एक दिन घर में सिर्फ प्रजुल हे थे हम दोनों के सिवा. उस दिन पालक ने मुझसे पानी की बाल्टी मांगी क्योंकि जब वो रसोई में थी तभी मैंने शावर की पिन ऑफ कर दी थी और उसके बाथरूम में टूटी कोई है नहीं जैसे जयेश ने उसको ख़ास तैयार करवाया है. वाशबेसिन और टॉयलेट अलग है. मैंने प्रजुल को बाल्टी के साथ भेज दिया और ये भी बताया की शावर में ऊपर पिन देख लेना लगे हाथ. इधर वो गए और उधर मैं कैमरा ले कर बहार वाले वेंट की तरफ चली गयी. उम्मीद से ज्यादा हे बढ़िया तस्वीरें मिल गयी जिनका प्रिंट निकाल कर मैंने हे वो पालक तक पहुचायी बिना सामने आये.", अर्जुन का सर दुखने लगा था ऐसा षड़यंत्र सुन्न कर. एक औरत कामवासना और अपनी ऐयाशी में इतनी अंधी भी हो सकती है की वो पूरा परिवार हे डाव पर लगा दे? एक मासूम का जीवन हे ख़तम कर दे? मुट्ठी भींचने के बाद उन्हें खोलते हुए उसने खुद को जैसे तैसे शांत किया.
"वो हनीमून वाली तस्वीरें कैसे हाथ लगी? तब तोह ये सब प्लान बना भी नहीं था फिर कैसे वो तस्वीरें मिली? जयेश जी से पूछना पड़ेगा या आप हे ये बताने का कष्ट करेंगी? उनसे पूछने के लिए पहले आपका रूप सामने लाना पड़ेगा और अभी भी ये दूसरा हे सवाल चल रहा है क्योंकि जवाब पूरा नहीं हुआ."
"नहीं.. जयेश को इस बारे में कुछ नहीं पता. वो तोह मुझे अपनी माँ के बराबर सम्मान देता है. मुझे जब भी 50 हजार या लाख रुपये की जरुरत हो तोह वो जरा भी देर नहीं लगता. वो अपने पापा से भी बड़ा बन्न न चाहता है इसलिए रात दिन बिज़नेस को बढ़ने में लगा रहता है. बस वो शादी नहीं करना चाहता था अपनी एकलौती कमी के चलते जो उसने सबसे पहले मुझसे हे सांही की थी जब हम रिश्ते से गहरे दोस्त बन गए. जयेश को अजीब सी आदत है.. वो .. नंगी तासीर देख कर खुद को संतुष्ट करता है. औरत के पहलु में उसका अंग काम नहीं करता. पालक के साथ उसने हनीमून पर पहले चुपके से उसकी नंगी तस्वीरें ली थी और फिर उन्हें देखने के साथ शराब का सहारा ले कर पहली और आखिरी बार सेक्स किया, तब भी आधा अधूरा. तुम पूछो उस से पहले हे बता देती हु की जयेश मेरी मर्जी से मेरी नंगी तस्वीरें कंप्यूटर में दाल कर ऐसा करता आ रहा है पिछले 2-3 साल से. उस से पहले वो किताब देख कर ऐसा करता था. पालक को नहीं पता था की जयेश ने उसकी ऐसी तस्वीरें ली है और जयेश भी अपना राज जाहिर नहीं करना चाहता अपनी बीवी के सामने. उसको यकीन है की पालक एक हे बार करने से माँ बन जायेगी और वैसे भी वो ऐसे मामलो में दिलचस्पी नहीं रखती. ज्यादातर तोह ये लोग साथ हे नहीं सोते और मैंने इस बात का फायदा उठा कर जयेश के कंप्यूटर से हे वो तस्वीरें ले ली जो हनीमून के समय उसने खींची थी.", रट्टू तोते की तरह सोनाली अब हर छोटी से छोटी बात बता रही थी और अर्जुन हैरान था मैं में की पालक का जीवन तोह हर तरफ से अँधेरे में है.
"और उसके बाद पंहुचा दिया उस आदमी के करीब जो इस सब कुकर्म में आपका बड़ा सांझेदार है लेकिन पूरी तरह से खुद खेल की पृष्ठभूमि में.? ये नहीं सोचा की पालक दीदी अगर वो तस्वीर घर में किसी को दिखा देती या कोई देख लेता तोह आपका वो दूर का मां जो आपके दिल में गहरा धंसा है वो पकड़ा जाता? और वो तस्वीरें भी आपने हे खींची थी जैसे उस घटिया इंसान की चाहत होगी दीदी को करीब से देखने की.", अर्जुन ने अब बगल में राखी वो तस्वीर सामने राखी जिसमे बेंच पर पालक की बगल में वही आदमी बैठा था जो सोनाली का मुँह बोलै मां होने के साथ आशिक़ और इस खेल का सूत्रधार था. सोनाली ने न में गर्दन हिलाते हुए बुझे चेहरे से हे जवाब दिया.
"उनके साथ दूसरी लड़की भी थी उस समय और यहाँ वो पालक से चिपक कर तोह नहीं बैठे? ये पार्क जहा है वही मां का घर है तोह सवाल पालक से पुछा जाता की वो वह क्या करने गयी थी. जैसा मैंने बताया की पालक इन मामलो में बहोत कमजोर और डरपोक है, वो इन तस्वीरों को किसी के हाथ नहीं लगने देती. ऐसा होने की सूरत में वो खुद का हे नुक्सान करवाती. अब तुम्हे सबकुछ पता चल चूका है तोह बताओ तुम मेरे साथ क्या करने वाले हो? मैं मेरे बेटे से बहोत प्यार करती हु अर्जुन और ये सब घरवालों के सामने आने की सूरत में मेरा तोह सबकुछ उजड़ेगा पर ये लोग मुझसे मेरा बीटा भी छीन लेंगे. Maa-baap से मेरा रिश्ता उतना मजबूत भी नहीं है अब. तुम चाहो तोह मेरे साथ कुछ भी कर लो, चाहो तोह किसी के भी निचे लिटा दो.. पर मेरा ..", अब ये पहली बार था की सोनाली फर्श पर लुढ़कती हुई अर्जुन के कदमो में गिर चुकी थी. उसकी आंखूं से गिरते गरम आंसू ज्यादा सच्चे थे या उसकी ये साड़ी हरकते ज्यादा बुरी? अर्जुन पीछे हे हट गया.
"न आपसे मेरी इस मामले में कोई बात हुई और न अब आप आइंदा कोई ऐसा घिनोना काम करेंगी. जिस बेटे की दुहाई आप अब दे रही है, उसका वजूद तोह पहले भी था. तब आपने नहीं सोचा की हवस और लालच की आग में आप कितने लोगो को जलाने जा रही है? ये जिस्म देना चाहती है आप मुझे जिसके भीतर की आत्मा तक काली पड़ चुकी है? सोनाली जी, इंसान को इतना भी नहीं गिरना चाहिए की जब अपने हे अक्स से सामना हो तोह नजरे न मिला सको. और मैंने आपके उस मां के साथ क्या किया है ये बस ख़ामोशी से सुन्न लीजियेगा.", अर्जुन ने वो मोबाइल फ़ोन उठा कर पहले से मिलाये हुए नंबर को दबाया और फ़ोन स्पीकर पर कर दिया.
"हाँ बीटा.. सोये नहीं अभी तक?", सामने से ये बड़ी भारी आवाज सुनाई पड़ी और अर्जुन ने भी खुद को सहज करते हुए जवाब दिया.
"न मां जी अभी सोने हे जा रहा था की ध्यान आया आपसे पूछ लू वो कबूतर कैसा है? ज़िंदा रहने लायक तोह नहीं है मां लेकिन आप अपने हाहतो पर और खून मत लगाना."
"अरे बीटा, तुम जान हो संजय चौधरी की.. दिल्ली शहर तोह क्या यहाँ की तिहाड़ जेल में भी कोई माई का लाल मेरे भांजे की आँख में खटका तोह उसका जीवन अटका देंगे. पहले तोह साला होश में हे न आ रहा था. फिर कलाई हे काट दी कमीने की तोह झट्ट उठ कर हल्ला मचने लगा. वो गोदाम के ऊपर एक कमरे से नंगी तस्वीरें, 6 वीडियो कसेट्टी और साढ़े 3 लाख बरामद करवाने के बाद इसकी लुल्ली और जुबान काट दी है हमने जिसकी पट्टी तोह करवा दी लेकिन साला गहरी बेहोशी में चला गया. पहचान के दसप है एक अपने जिन्होंने इसको hatya-dakaiti के जुर्म में 3 और हत्यारो के साथ लपेट लिया है उतना पैसा देने पर. बाकी जेल में अपने लड़को को ये बढ़िया जुगाड़ मिल गया है, उनकी आने वाली सर्दियाँ बढ़िया काटेंगी. वैसे उस छम्कछल्लो का क्या सोचा है अर्जुन बीटा जो इस लांदु से मिलने बगीचे में आयी थी? पेल तोह नहीं दिए?", ये व्यक्ति था सुशीला का धरम भाई और अर्जुन का वो हुकुम का इक्का जिसकी काट तोह स्वयं रामेश्वर जी के पास नहीं थी. संजय का दिल इतना गहरा जुड़ चूका था अर्जुन से की उसके लिए बस अर्जुन हे सर्वोपरि था अब. सुशीला का घर वापिस बसने के साथ बबिता को प्यार देने वाले इस अपने मुँहबोले भांजे के लिए संजय कुछ भी कर सकता था और उसकी जड़े कितनी गहरी थी इसकी प्रशंशा स्वयं रामेश्वर जी करते थे. इंसान बुरा नहीं था लेकिन बुरे के साथ बहोत ज्यादा बुरा था. अब उसकी बात सुन्न कर अर्जुन झेंपते हुए हंसने लगा और वही सोनाली की पंतय पसीने में आगे पीछे से गीली हो गयी इतना विवरण सुन्न कर.
"नाड़े का इतना कच्चा भी नहीं हु मां और अर्जुन प्यार करना जानता है, बदला तोह जिस दिन लेने पर आया फिर पोस्टमॉर्टम की जगह डीएनए ढूंढ़ना पड़ेगा मरने वाले का. वैसे तोह मैंने फिलहाल समझा दिया है उस छमकछल्लो को लेकिन कुछ दिन नजर बनाये रखना चोपड़ा निवास पर. सबूत आपके भी पास है और मेरे भी. मेरी बहिन के चेहरे से मुस्कान हटी तोह दुर्घटना घाटी. रखता हु मां जी, कल क्सक्सक्सक्स मिलते है शाम को 8 बजे.", अर्जुन ने भी मां की देखादेखी सोनाली को छम्मकछल्लो बुलाया तोह वो शर्मिंदा सी नजरे नीची किये खामोश हे रही.
"चल बीटा, भगवन भला करे सबका. किसी को ऐसे दिन क्यों दिखाए की परिवार बिखरे. इंसान का जीवन वैसे हे सरल नहीं और उल्टा ये लालच, लोभ और वासना क्या क्या करवा देती. कल बखत से मिलते है और तेरा बताया सारा सामान लेता आऊंगा. जय बजरंगबली."
"ाचा मां. शुभरात्रि. आप भी आराम करना और मैं भी सोने चला.", अर्जुन ने फ़ोन काटने के बाद सोनाली के सामने हे कैमरा की साड़ी तस्वीरें मिटा दी और वो तस्वीर भी फाड़ कर उसकी हथेली पर रखते हुए कहा.
"गलत काम के बदले गलत करना भी सही नहीं. आप तोह एक औरत, एक पत्नी और एक माँ है सोनाली जी. जिस्म की आग तोह आपसे कही ज्यादा मेरे अंदर है लेकिन उसको बुझाने के लिए मैं लोगो की ज़िन्दगी से खेलना शुरू कर दू? आप जितनी खूबसूरत है, दिल को उसका आधा हे बाण ले तोह ये घर स्वर्ग से काम न होगा. पति समय नहीं देता क्योंकि वो आपको और परिवार को खुशियां देने के लिए jee-todd म्हणत करता है. कभी अपनी अकड़ को काम करने के साथ उनसे पैसो की जगह समय मांगेंगी तोह यक़ीनन वो वैसा करेंगे. बेटे को अपने मजे के लिए बुआ के घर भेजने की जगह खुद भी 2-3 दिन अपनी ननद के पास घूम आओ तोह आपकी सास को भी ाचा लगेगा और ननद भी खुश होगी. ये छोटी छोटी सी बातें हे रिश्ते और परिवार मजबूत करती है. एक आपका वो दूर का मां है जिसने आपको हे नहीं बक्शा और एक ये मेरे मां है जो मेरे बस एक बार कहने मात्रा से उस आदमी को मौत के मुँह तक ले गए. वो आपको भी वही मार देते लेकिन बजरंगबली के भगत है इसलिए छोड़ दिया. आज रात नींद आने में तकलीफ हो तोह दवा ले लीजियेगा लेकिन सोना जरूर जिस से सुबह एक नया सूरज देख सको. जयेश जी को जो ठीक लगता है करने दीजिये और वो आपका निजी मामला है आपसी सहमति से, पर किसी मासूम के जीवन से खिलवाड़ आइंदा मत कीजियेगा. पालक तोह बचपन से हे इतनी मासूम है की वो किसी को भी दुःख दर्द में देख कर खुद दुखी हो जाती है. उसके विश्वास को बरकरार रखना क्योंकि वो आपको दीदी कहती है, शुभरात्रि.", अर्जुन खली कैमरा और फ़ोन उठा कर उस दरवाजे की चिटकनी इस तरफ से खोल कर वापिस बंद करता हुआ पालक के कमरे में दाखिल हुआ, जो लाइट जलाये बिस्टेर पर करवट के बल लेती कुछ लिखने में मगन थी.
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उस एक कमरे और हॉल वाले घर में बहार जितनी ख़ामोशी थी, भीतर उतनी हे गर्मजोशी से बातचीत का दौर चल रहा था. मुस्कान ने उसी कमरे में डबल बीएड के बराबर हे हॉल वाला दीवान खिसका कर जमा लिया था जिस पर वो अपनी माँ और बड़ी बहिन की तरफ करवट लिए लेती ुकि बातिने सुन्न रही थी. कपडे बदलने के बाद अपनी दोनों बेटियों को दूध गरम करके पिलाने के बाद बिंदिया अभी कुछ समय पहले हे नाहा कर सिर्फ एक सफ़ेद गाउन पहने बीएड की पुष्ट से तक लगाए शबनम की बातों पर कभी हंसती तोह कभी उसको मीठी झिड़क लगाने लगती.
"अब आपने खुद हे देखा फिर कैसे इंकार कर सकती है की मुस्की (मुस्कान) अर्जुन को पसंद नहीं करती? हाँ ये मान लेती हु की इनकी गहरी दोस्ती है पर ये तोह ऐसे मन कर रही थी जैसे अर्जुन से इसका कोई वास्ता हे नहीं. वैसे उसकी बगल में मैडम ने मुझे बैठने तक न दिया और वो भी बस आप दोनों को हे देखे जा रहा था. हहहहह.", मुस्कान ने अपने मुँह का आधा भाग चादर से हे धाप लिया ये सुन्न कर जबकि बिंदिया ने भी बेटियों के बीच बरसो बाद मीठी बातचीत में शामिल रहने का मजा जाने न दिया.
"गहरी दोस्ती है तोह इसके हे साथ बैठेगा. मुझसे तोह वो सही से पहली बार तोह मिला था और तुम्हे भी कितना जानता है? वैसे जितना तस्वीर में देखा उस लिहाज तोह कही ज्यादा हैंडसम है वो. जमीर इजाजत भी नहीं देता और वो रिश्ता मुमकिन भी नहीं जो एक नजर में हे मैं मुस्कान के लिए सोच चुकी थी. ाचे लगते है न दोनों एकसाथ? तुम्हारे पापा गर इन्हे साथ देख ले तोह यक़ीनन वो अर्जुन को मांग लेते. मुझे सबसे ज्यादा तोह इस बात की ख़ुशी है की लड़का हर छोटी से छोटी बात का ख़याल रखता है. सो गयी क्या मुस्कान?", बिंदिया ने अपनी बेटी को आवाज दी तोह मुस्कान ने चादर हटा कर ना में सर हिलाया और चेहरे पर वही खूबसूरत हंसी देख शबनम ने भी उसका गाल खींचते हुए बोलै.
"आज इसको नींद नहीं आनेवाली माँ क्योंकि अर्जुन आपके और मेरे लिए हे गिफ्ट लाया और जिसने उसको बुआलया, उसके लिए कुछ नहीं लाया. वैसे आपने उसका गिफ्ट खोल कर देखा भी या बैग में बंद करके रख दिया आपने? मेरे लिए तोह वो wrist-watch लाया है जो सचमुच ख़ास है. सही कहा आपने की वो ख़याल तोह हर छोटी से छोटी बात का रखता है बस मेरी लाड़ली गुड़िया के लिए कुछ नहीं लाया.", शबनम चिढ़ा रही थी पर मुस्कान वैसे हे तकिये पर सर टिकाये उन दोनों को देखती रही.
"मेरे लिए वो बंधेज वाली साड़ी ले कर आया, साथ में बाकी सबकुछ भी तैयार किया हुआ हे है. डोरी वाला ब्लाउज, साया और पायल के साथ एक दर्जन कांच की चूडिया, काजल तक था उस पैकेट में. ऐसा अक्सर बहु को सास देती है इस देश में लेकिन मुझे पसंद आया उसका गिफ्ट. वैसे दुःख तोह हुआ की मेरी छोटी गुड़िया के लिए वो कुछ नहीं लाया लेकिन उसके कहने पर आया, साथ डिनर किया और और कमरे के बहार तक छोड़ के भी गया. चलो कल मैं खुद अपनी गुड़िया को शॉपिंग करवा दूंगी.", बिंदिया को इतने बरस लगे थे अपनी बेटियों के बीच एक माँ और सहेली बन ने में और अपनी माँ के ऐसे बदलाव देख मुस्कान की आँखें हलकी सी नम्म हो उठी जिन्हे देख बिंदिया तुरंत उसके करीब आती गाल सहलाने लगी.
"तुम्हे अचानक क्या हुआ गुड़िया? किसी बात से दुखी हो या तुम्हे ..", अपनी माँ के सीने लगते हुए मुस्कान ने उनकी बात को बीच में हे काट दिया.
"एक कमरे में हम तीनो है अम्मी.. आप पहली बार हमारे साथ है इतने करीब और इस से ज्यादा ख़ुशी का दिन मेरे लिए कोई नहीं. यही वादा किया था मुझसे अर्जुन ने जब पहली बार मैं उसके साथ थी.. वो मेरे साथ खुले आसमा के निचे उतनी सुबह बैठा यही कह रहा था की एक दिन जरूर ऐसा होगा की दीदी मेरा हाथ पकडे होंगी और मेरी अम्मी मेरा सर अपनी गॉड में लिए प्यार लुटायेंगी, वो प्यार जो 20 साल में मुझे उतना नहीं मिला जितना हक़ था मेरा. आप और दीदी कह रही थी की वो मेरे लिए कोई गिफ्ट नहीं लाया.. देखो आप हे जरा इस पल को.. खुदा से मांगी कोई दुआ क़बूल न हुई.. हरीफ़ जिन्हे समझा, वो खुदा से बढ़ कर निकले.", मुस्कान ने अंत में जो पंक्तिया कहने के बाद अपनी माँ के गाल को चूमा तोह बिंदिया की भी आँखों में आंसू उभर आये.. दोनों में इन आंसुओ के साथ कुछ और भी सामान बात थी तोह वो उनकी मुस्कराहट, एक अनमोल मुस्कराहट जो आत्मा से निकली थी. शबनम भी मुस्कान का हाथ अपने दोनों हाथ में लिए उस को गर्व से देखने लगी.
"एहसानमंद हो गए फिर तोह हम आपके hareef-e-khaas के. माफ़ करना मुस्कान, ज़िन्दगी में जो उतार चढ़ाव देखने मिले, अपना आशियाँ उजड़ता अपनी नजरो से देखा और उस से पहले माँ की दुर्दशा ने मुझमे से साड़ी इंसानियत और प्यार महसूस करने वाला दिल छीन हे लिया. सच कहा की जिसको दुश्मन समझ कर हमेशा बदले की भावना राखी, उसने मेरा दामन फिर से paak-saaf करके खुशियों से वापिस भर दिया. तुमसे जटिल बातें करता है वो लेकिन जब समझ आती है तब ढेरो खुशियां देहलीज पर कड़ी मिलती है. इस से बड़ा उपहार तोह हो हे क्या सकता है मेरे लिए की मैं अपनी कोख से हे पैदा हुई बेटी से अब जा कर ru-ba-ru हुई लेकिन तुमने भी बदले में सिर्फ प्यार और सम्मान हे दिया."
"उसने हे सिखाया है अम्मी की दुश्मनी से तोह चाहे दुनिया हे ख़तम कर लो, उसमे सिर्फ अकेलापन और दर्द हे मिलेगा. प्यार.. प्यार बर्बाद दुनिया को भी फिर से बसा सकता है. वैसे हम जरा शब्बो दीदी को ये तोहफा दिखा दे जो उनके साथ साथ आपको भी नजर न हुआ. प्लैटिनम और गोल्ड के बीच रूबी है. जब उसको वापिस निचे ड्राप करने गयी थी तब उसने हे मुझे पहनाया और साथ हे कहा की एक प्रिंसेस का गाला सूना नहीं होना चाहिए. एंड फॉर योर काइंड इनफार्मेशन एलडी, तहत फ्लोरल ड्रेस वास् हिज फर्स्ट प्रेजेंट. गिफ्ट देने में कभी कंजूसी नहीं करता वो, ात लीस्ट मेरे लिए तोह नहीं. अब देख लो अम्मी दीदी को गुस्सा आ रहा है?", मुस्कान अपनी माँ के गले लगे हुए हे शबनम को चिढ़ाने लगी जो अगले हे पल ठहाका मारती हंस दी.
"कहा था न माँ की ये खुदसे हे कबूल कर लेगी की ये अर्जुन से प्यार करती है और वो इसकी हर बात मानता है? मुझे तोह तबसे पता है जब तू उसके लिए मेरे हे खिलाफ हो गयी थी. हाँ तुमने ठीक किया था जो मेरा साथ नहीं दिया. वैसे अब तुमने अम्मी की मुसीबत बढ़ा दी है ये बात कबूल करके.", सचमुच बिंदिया बड़ी गंभीरता से उस लाल हीरे से चमकते नाग को हाथ में ले कर बड़े गौर से देख रही थी जो के खूबसूरत दो रंगी चैन के बीच लॉकेट में ज्यादा मुस्कान के गले में था.
"नहीं.. ऐसे इंसान से प्यार के सिवा कुछ और मुमकिन भी नहीं शबनम. मैं न तोह परेशान हु और न मुझे चिंता है जब मेरी बेटी इतनी समझदार है. ये नाग उसने तुम्हे हे क्यों दिया ये तुम नहीं जानती मुस्कान लेकिन मैं इसको पहचानती हु. ये एक खंजर में था जो शायद महल के किसी ख़ास सदस्य का था लेकिन माँ की संदूक में. वो खंजर माँ के पास था क्योंकि माँ राजकुमारी थी और ये बात सबसे पहले अर्जुन ने हे पता लगाईं. माँ के बाद इस पर मेरा हक़ बनता था और मेरे बाद शबनम का लेकिन उसने ये तुम्हे दिया क्योंकि .. तुम मेरी माँ के हे जैसी हो, saaf-dil और इंसानियत से भरी एक अंतर्मुखी इंसान. मुझे ख़ुशी है की अर्जुन ने ये तुम्हे सौंपा. वैसे दोस्ती से ज्यादा .. मतलब अब मैं तुम्हारी इंग्लैंड वाली माँ की तरह पूछ रही हु. बता सकती हो.. इस बेशरम के तोह 18 की उम्र से हे बॉयफ्रैंड्स रहे है.", बिंदिया अपनी इस प्यारी बिटिया को साथ लिए फिर से बिस्टेर पर आ लेती और अब उसके दोनों तरफ शबनम और मुस्कान लिपटी हुई थी, दीवान खाली.
"मुझे बॉयफ्रैंड्स वाला सिस्टम हे नहीं पसंद अम्मी. एक बार में डायरेक्ट निकाह लेकिन उसके लिए अभी बहोत समय पड़ा है. इन्होने तोह कह दिया की कभी शादी या निकाह कुछ नहीं करने वाली. मैं तोह करुँगी लेकिन 3-4 साल अपने अम्मी अब्बू के सर रहने के बाद. साथ चलेंगे ओपेरा देखने, कंट्रीसाइड दावत, थोड़ा पियानो सेशंस और आप दोनों के साथ दुनिया घूमने. इन्हे रहने देंगे यही दिल्ली में, पढ़ने का शौक पूरा करके राइटर बनेंगी मोहतरमा.", मुस्कान की ख्वाहिशे सुन्न कर बिंदिया भी खुश हुई की बेटी समय अब अपने माता पिता के साथ हे बिताना चाहती है कॉलेज के बाद. लेकिन अर्जुन वाली बात को वो बखूबी ताल गयी थी.
"इसको सिस्टम पसंद नहीं और मैं अब कोई बॉयफ्रेंड बनाने नहीं वाली. ाचा माँ, कल हे हम आपकी मौसी के वह जाने वाले है क्या?", शबनम ने कमरे के लाइट बंद करने के बाद वापिस अपनी माँ से चिपकते हुए पुछा जो मुस्कान के सर को अपनी ब्याह पर टिकाये सर सेहला रही थी.
"देखते है लेकिन कल का अभी कुछ कहना मुश्किल है. हाँ परसो जरूर हम वह होंगे और फिर उनके पास 2 दिन रहने के बाद तीनो वापिस अपने घर. चल अब सो जा तू भी, ये गुड़िया भी सो चुकी है.", बिंदिया अकेली विचारो की दुनिया में जाना चाहती थी. आज अर्जुन से मिलने के बाद उसके अंतर्मनन में भी ढेरो सवाल और ख़याल बने थे जिनके जवाब भी वही दे सकता था लेकिन अब मुलाकात भी किस्मत पर निर्भर थी.
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एक तरफ आज पंडित जी के न होने से उनका घर भी कुछ ज्यादा हे खामोश था तोह उनसे कही दूर घर की मंझली बहु (रेखा) भी सारा दिन अपनी बेटी, भतीजियों और माँ के साथ हंसी ख़ुशी बिताने के बाद अपने कमरे में सुकून से सोने जा चुकी थी. बहोत कुछ घटित हुआ था उधर लेकिन अब सुकून था. तीसरी तरफ राजकुमार जी और नरिंदर ने मिल कर सब काम देख भल लिए थे अपने मित्र विष्णु के 2 दिन बाद होने वाले विवाह के. थकान से चूर राजकुमार जी तोह चैन से सोने चले गए पर नरिंदर खुली छत पर बैठे अपने जीवन का सार याद करते हुए अलग हे दुनिया में था. हरेक इंसान की स्थिति, परिस्थिति और chahat-khayaal भिन्न थे पर इस रात कुछ सुकून में थे और कुछ खयालो में. तारो से भरा गहरा आसमान फीका पड़ने लगा पृथ्वी के निर्धारित गति से और रात कब भोर के पहले पहर में बदल कर बस नाम की रजनी रह गयी.
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"उन्हहहह्म्मं.. सोने दो न bhabhi..umm..", निर्धारित समय अर्जुन की आँखें खुली तोह उसके हिलने मात्रा से ये आवाज सुनाई पड़ी जो उसकी एक ब्याह पर सर टिकाये और एक पाँव उसके ऊपर चढ़ा कर चिपकी सोई पालक की थी. रात दोनों के बीच तकिये की कमजोर सी दिवार कब बिस्टेर से निचे गिरी ये अर्जुन को हे खबर न लगी. दिन भर की bhaag-daud और फिर कुछ समय से नींद की कमी के चलते वो भी गहरा हे सोया था. पालक जैसे अपने घर पे भाभी प्रिय के साथ हे सोने लगी थी कपिल की व्यस्त जीवनशैली और रात में घर न आने की वजह से. यहाँ उसकी भाभी की जगह ये मजबूत युवक था जो अब न हिल सकता था और न पालक को हिला सकता था. नजर घुमा कर मेज पर राखी अलार्म घरी के रेडियम अंक देखे तोह साढ़े 4 हे हुए थे अभी. पालक सिकुड़ती हुई कब उस से चिपक गयी वो यही सोच रहा था की इतने में हे उसका चेहरा अर्जुन के गले और गाल से आ लगा. वो गाउन जो रात में उसके खूबसूरत जिस्म को पूरे ढके थे, अब घुटनो से ऊपर चढ़ा इन दोनों के बदन के बीच फंसा था. अब ये स्थिति कुछ ज्यादा हे नाजुक लगने लगी तोह अर्जुन ने एहतियात से पालक को एक तरफ लुढ़काया और उठने हे लगा था की उसकी बैनियाँ की पट्टी में फंसे पालक के मंगलसूत्र के खींचते हे वो हड़बड़ाती सी उठ बैठी.
"आप नींद में मुझे प्रिय भाभी समझ रही थी. आप सो जाइये, सिर्फ साढ़े 4 हे हुए है अभी. मैं तब तक..", अर्जुन आगे कुछ कहता उस से पहले हे पालक उसके गले लगती वापिस लेट गयी. इस बार न वो गहरी नींद में थी और न ये अनजाने में हुआ. अर्जुन के बाएं तरफ लिपटी वो उसके सीने के दाए हिस्से पर हाथ रखती फिर से मजबूत को तकिया बनाये हुए थी.
"तुम्हे तब तक वैसे हे सोना है जैसे सोये हुए थे, बस थोड़ी देर.. मेरे लिए..", अब यहाँ अर्जुन ने तोह कही दौड़ लगाने या कसरत के लिए जाना नहीं था और जितने प्यार एवं अधिकार से पालक ने कहा, वो कुछ न कहते हुए आराम से आँखें बंद किये वापिस लेट गया. बेशक एक समय था जब वो पालक की बगल में कभी कभार सो जाता था, पर वो बचपन था और पालक महज एक किशोरी. लेकिन आज भी जैसे कुछ ख़ास नहीं बदला था सिवाए इस बात के की अब अर्जुन के करीब पालक थी और बचपन में अर्जुन दुबका सोता था उसकी बगल में. नींद का दूसरा दौर कुछ ज्यादा हे असरदार रहा अर्जुन के लिए. अब आँख खुली तोह परदे के दूसरी तरफ से छान कर आती रौशनी में पूरा कमरा हे रोशन था. दरवाजा खुलने पर बाथरूम से भीगे बालों में टोलिया लपेटे निकली पालक पर हे आँखें स्थिर रह गयी. गहरे रंग का ब्लाउज बगल और सीने के सामने से कुछ ज्यादा हे गहरा था और समतल गोर पेट पर चार आने जितनी नाभि से भी निचे बंधा ब्लाउज के हे रंग का साया पहने मासूमियत और कामुकता का एक अध्भुत्त मिश्रण. बिस्टेर पर पड़ी मेहरून साड़ी को उठाने के लिए वो झुकी और अपनी तरफ टकटकी लगाए देखती उन आँखों से आँखें मिलते हे वो एक प्यारी मुस्कान देती बोल उठी.
"गुड मॉर्निंग.. नींद पूरी हो गयी न?", पालक का ऐसा पूछना और कोई झिझक न देख कर अर्जुन ने तकिया बाहों में भरते हुए हाँ कहा. वो उसको हे देखता रहा जैसे उन दोनों के बीच ये सब बरसो से चलता रहा जबकि सच ये था की आज सिर्फ पहली बार हे वो एक दूसरे के सामने थे.
"मुझे अकेले में नींद नहीं आती और हर वक़्त अजीब सा डर लगता रहता है जैसे इस कमरे के बहार से हे हर वक़्त कोई मुझे देख रहा हो. रात जरा सा भी बुरा ख़याल नहीं आया और मैं अपने समय से एक घंटा देरी से उठी हु.", अर्जुन ये सुन्न कर घरी को देखने लगा जहा 7:30 बज चुके थे. वही पालक को साड़ी पहन ने से पहले हे उसकी चुन्नट बनाते पाया तोह उठ कर बिस्टेर के उस किनारे हे आ बैठा. पालक कुछ हैरानी से उसको देखने लगी जो उस खूबसूरत परिधान को उसके हाथो से ले कर पहले नाभि के करीब एक सीरा खोंसने लगा और फिर पालक को ब्याह से पकड़ कर गोल गोल 3 बार घुमाने के बाद ठीक पहले वाली जगह खड़ा करके साड़ी की 7 बराबर परत लगाने के बाद दोनों हाथो से उसकी साये के भीतर बिना सिलवट लाये सेट करते हुए मेज पर पड़ी पिन लगाने सावधानी से लगाने लगा.
"मैं तोह अपने टाइम पर हे उठा था पहले लेकिन आपने दोबारा ऐसा सुलाया की देखो पूरे 3 घंटे ज्यादा सो गया. अब कभी आपको न तोह इस कमरे में बुरे ख़याल आएंगे और न हे कोई आप पर कभी नज़र रखने का दुस्साहस करेगा. आप ऐसे हे मेरी टीशर्ट अंदर करती थी न जब निक्कर निचे झूलने लगती थी मेरी? साड़ी पहन न उतना मुश्किल नहीं है, बस वस्त्र ज्यादा लम्बा होने से हम थोड़े असहज हो जाते है. हर मुसीबत को टुकड़ो टुकड़ो में टॉड कर दूर किया जाए तोह बताओ क्या मुमकिन नहीं? हम्म्म.. अब देखो जरा खुदको आईने में? मैं तोह कल हे समझ गया था के आपको साड़ी पहन ने में परेशानी होती है जब आपसे अपना पल्लू हे ठीक न किया गया. सलवार कमीज में भी ाची लगती हो आप और मुझे नहीं लगता के आपके saas-sasur कोई मनाही रखते होंगे.", अर्जुन ने पालक के सीने के सामने से कंधे के पीछे तक ऐसे आँचल दिया जैसे अक्सर उसकी ताई ललिता जी रखती थी. ढीला लेकिन अनुशाषित जो जरुरत के हिसाब से ऐसे हे सर पर लिया जा सके. पालक के बदन का निर्वस्त्र भाग तक छुए बिना उसने ये कर दिखाया और खुद को आईने में देखते हुए पालक ने टोलिया सर से खोला तोह भीगी जुल्फे उलझी लत्तो में बदल कर असंख्य सर्पो से झूलती, बलखाती हुई कंधे, पीठ और चेहरे के दोनों तरफ झूल गयी. सादगी में भी ऐसी कामुकता और ऊपर से खुदको साड़ी पहनाने वाले के सामने हे देखना पालक के लिए अलग हे सुखदायी स्थिति बना गया.
"बड़े पहुंचे हुए हो तुम तोह. जो कल तक निक्कर नहीं पहन सकता था आज वो औरत के परिधान की उनसे ज्यादा समझ रखता है. मुझे 15-20 मिनट लग जाते है सिर्फ इस काम में हे. सलवार सूट की मनाही नहीं है लेकिन फिर शादी वाली फील नहीं आती उसमे, चाहे मेरी थोड़ी अजीब सोच कह लो इसको लेकिन अभी यहाँ कम्फर्टेबले नहीं हुई न ज्यादा. कभी कभी पहन लेती हु जब मम्मी पापा नहीं होते घर. वैसे मैंने सुना था की तुम्हारी चॉइस बहोत ाची है लड़कियों के ड्रेस सिलेक्शन के मामले में. मेरी शादी में भी कोमल, ऋतू ने जो कपडे पहने थे वो सब तुम्हारी हे पसंद के थे? हाँ प्रीती की ड्रेस भी काफी खूबसूरत थी.", अर्जुन ने हलके से मुस्कुराते हुए आईने के पास हे राखी काजल की पेंसिल से पालक की गर्दन और कान के पीछे एक बिंदी लगाने के बाद अपना बैग खोलते हुए जवाब दिया.
"बचपन भी तोह आप सबके हे बीच कटा है. इतनी लड़कियों के बीच रहूँगा तोह क्या उन पर ाचा लगेगा और क्या नहीं, पता चल हे जाता है. वैसे रात बताया नहीं आपने की डायरी में ऐसा क्या लिख रही थी जो मुझे देखने तक नहीं दिया?", अर्जुन बैग से टीशर्ट और जीन्स निकालने के बाद वही अपनी बनियान उतार कर बैग में रखता हुआ बात कर रहा था और यही वो पल था जब भीगे खुले बालो में अप्सरा से कड़ी पालक की नजर इस युवक के जिस्म पर हे ठहर गयी. कोई वासना नहीं बस आकर्षण हे था. लेकिन वही सवाल पूछे जाने पर पालक चलती हुई उसके करीब आयी और बैग से वो बनियान वापिस निकाल ली.
"आदत है डायरी लिखने की. जिस दिन कुछ ाचा लगता है, कुछ ख़ास होता है तोह बस लिख लेती हु. तुम बड़े होने के साथ हे जिम्मेदार और काफी शांत इंसान बन गए हो अर्जुन. रात तुम्हारी क्या बात हुई इतनी देर तक सोनाली दीदी से?", अर्जुन पूछना चाहता था की वो उस बनियान का क्या करने वाली है लेकिन फिर समझ हे गया की मैले कपडे धोने के लिए हे उठाये जाते है.
"ाची आदत है. सोनाली जी से तोह बस इधर उधर की हे बातें कर रहा था. दिल्ली के बारे में, उनके परिवार और यहाँ घर की बातें.. वैसे आपको भी कुछ बताना था जो रात बता न सका. पता नहीं कैसे भूल हो गयी?", अर्जुन बैग से ब्रश निकाल कर वही बिस्टेर के किनारे हे बैठ गया. चेहरे पर कुछ अस्पष्ट से भाव आ गए जैसे वो कुछ बताना चाहता हो लेकिन कैसे कहे यही समझ न पाया.
"बताने की जरुरत है क्या? इतना कुछ न मैंने हे उम्मीद की थी और न सोचा था की तुम इतने काबिल हो. अब ज़िन्दगी बचने वाले का एहसान जरूर है लेकिन दिल कह रहा है की ये एक फ़र्ज़ था, एक रिश्ते को सार्थक करता हुआ प्यार जो मैं सोच भी नहीं सकती थी की मुमकिन हो भी सकता है. पापा का हमेशा हे माँ से ये कहना की अर्जुन अब वो लड़का नहीं रहा, अर्जुन ने पंडित जी के मान कही ज्यादा बढ़ा दिया, अर्जुन एक ऐसा हीरा है जिसकी पहचान हमे हे नहीं हुई... फिर तुम एकाएक आते हो उस दुखी टूटी हुई लड़की के पास जो na-ummeed है, हताश है और कही न कही ये सोच बैठी है की अब जबरदस्ती किसी भी तरफ से होगी तोह वो जान दे देगी पर घरवालों के फैंसले ख़ामोशी से मान कर उन्हें और दुखी नहीं करेगी. लगा की तुम बस एक जरिया हो मेरे पापा और माँ का जो मुझे मेरे ससुराल छोड़ने के बाद लौट जाएगा. बोझ जो हो जाती है लड़की शादी के बाद अगर माँ बाप के पास वापिस लौट आये. तुम्हारी कही हर बात मैं सुन्न कर मैं यही सोचती हुई जवाब देती रही की अब क्या फरक पड़ता है. मैं गलत थी अर्जुन.. मेरी सोच गलत थी.. तुम्हे मैं नजरअंदाज नहीं कर रही थी जब तुम अपना बचपन, मेरा तुम्हारे साथ बीता समय और वो सब बता रहे थे जो मेरे खयालो में दूर दूर तक नहीं था.. माफ़ करना बहोत परेशां थी लेकिन एक सफर पे आराम भी था जब सिर्फ हम दोनों हे थे.", पालक बताती गयी और अर्जुन सुनते हुए अपना ब्रश एक तरफ रख कर उसके दोनों हाथ थामे बस उस भोले चेहरे को देखता रहा जिसमे अब सिर्फ प्यार और कृतज्ञता थी. पालक उसके सामने हे मेज पर बैठ कर उसकी गॉड में अपने और उसके हाथो को जुड़े देख डबडबी आँखों से मुस्कुराई जैसे उसने सब कह कर भी न कहा.
"तुमने उस आदमी को.. पता नहीं कैसे लेकिन तुमने इतनी जल्दी हे उस बुरे इंसान को सिर्फ इसलिए ढून्ढ निकला क्योंकि वो मुझे परेशां कर रहा था. मेरा जीवन खराब करने के साथ मुझे मानसिक क्षति पंहुचा रहा था. तुम हमेशा से ऐसे थे अर्जुन, जिसके साथ रहते उस से लड़ते, प्यार करते और हक़ जताते रहते. किसी को कभी दुखी नहीं देख सकते थे... हाँ बहोत गुस्सा आता था तुम्हे अगर कोई तुम्हारी बात नहीं मानता या सुनता था.. और अब भी तुम्हारी वो उम्र नहीं की तुम जान जोखिम में दाल कर ऐसे काम अंजाम दो लेकिन तुमने मेरे माँ पापा की सोच को सार्थक कर दिखाया. मैंने तुम्हारे कैमरा में वो तस्वीर साफ़ साफ़ देखि थी जिसमे पार्क वाला हे आदमी था, दीदी उसको पैसे दे रही थी, बाद में वो बंधा हुआ था किसी जगह और तुम शायद उसको बुरी तरह मार रहे थे. बाथरूम जाने से पहले तुमने मुझे बताया नहीं लेकिन मेरे सामने वो चलता हुआ कैमरा इसलिए हे छोड़ गए थे न की मैं उसको देख सकू.? तुमने मेरी दी हुई तस्वीर में ये कहा था की 'इस आदमी को'. तब मैं नहीं समझी क्योंकि मैं उलझन में थी की ये सब आखिर क्या था. फिर मैं तुम्हारे सोने के बाद उस दिवार को गिरा कर इसलिए तुम्हारे कंधे पर सर रख लेट गयी क्योंकि तुम हो.. जो मुझसे आज भी उतना हे प्यार करता है जितना भूली बिसरि यादों से याद आया. तुम आज भी सोते हुए उतने हे मासूम लगते हो और जरा सा भी नहीं हिलते.", टुकड़ो टुकड़ो में हाल बयान करने के साथ पालक ने वो सब भी बतला दिया जिसको कहने के लिए अर्जुन शब्द ढूंढ़ने में जूता था. और कोई परवाह किये बिना पालक का उसके गले से लग कर खामोश हो जाना एक गहरा विश्वास था जो वापिस लौटा भी तोह इस कदर की जैसे punar-jiwan मिला हो.
"ाहु ाहु.. भाई बहिन के बीच इमोशनल सन डिस्टर्ब करने के लिए सॉरी. ये तुम्हारी कॉफ़ी और अर्जुन के लिए दूध. मम्मी पापा को चाय दे आयी हु और वो लोग भी आते हे होंगे नाश्ते के लिए. अर्जुन से उन्हें भी मिलना है, आखिर उनकी छोटी बहु का इतना लायक भाई पहली बार तोह घर आया है.", दरवाजा हलके से थपकने के बाद हे सोनाली भीतर आयी थी और उन दोनों के लिए मेज पर चाय कॉफ़ी रखने के बाद बस आँखों से हे उसने अर्जुन को शुक्रिया कहा अपना जीवन लौटने के लिए, क्योंकि इतना दयावान हर शक्श तोह नहीं हो सकता.
"आपने भी मेरे लिए जो किया है दीदी, मैं उसका एहसान नहीं उतार सकती. आप सचमुच मेरी बड़ी बहिन है चाहे रिश्ता जो भी हो इस घर में.", पालक के इस कथन पर सोनाली का चेहरा एक पल के लिए बुझा और अर्जुन ने ना में गर्दन हिला कर कुछ भी बताने से मन कर दिया उसको.
"एहसान तुमने किया है जो मुझ जैसी औरत को बहिन का दर्जा दिया और कभी किसी काम तक के हाथ नहीं लगाने दिया. आज से तुम रसोई में नहीं दिखोगी जबतक की मैं घर पे राहु. शादी को वक़्त हे कितना हुआ है तुम्हारी? आज तोह तुम्हे अपने भाई को दिल्ली घूमना चाहिए, रोज रोज तोह वो नहीं आने वाला न? ऐसा भाई किस्मत से भी नहीं मिलता जो बहिन को अपना सबकुछ मानता हो. और मैंने तोह आजतक तुम्हारे लिए कुछ किया नहीं इसलिए अब करने देना. आधे घंटे में नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम में मिलते है.", सोनाली ने जो भी कहा उसमे सिर्फ पालक को यही समझ आया की अर्जुन उस से बस नाम का हे रिश्ता नहीं रखता जो सोनाली तक को पता है. वो जा चुकी थी और पालक फिर से अर्जुन के गले लग कर बचो जैसे बोलने लगी.
"तुम मुझे शॉपिंग लेके जा रहे हो? और कुछ दिन यही रुकोगे मेरे पास?"
"हाँ शॉपिंग तोह जरूर चलेंगे लेकिन कल मुझे जाना होगा. जिस वजह से आप इतनी परेशां थी, वो दूर करने हे तोह आया था जिस से मैं आपको ठीक पहली जैसी पल्ली की तरह देख सकू. माधुरी दीदी मजाक में कहती थी न झल्ली पल्ली.. आप शादी होने के बाद भी बिलकुल वैसी हे हो.. काम से काम आज मेरे साथ तोह वैसी हे हो. अब मैं तैयार होने जाऊ?", अर्जुन ने एक बड़े भाई जैसे पालक की पीठ हलके से थपकते हुए कहा और इसके बाद वो हैरान हे रह गया जब अलग होने से पहले पालक ने एक बार दरवाजे को देखा और फिर उसके होंठो पर होंठ रख कर आँखे मूँद ली. ये चुम्बन भले हे 10-15 सेकंड का था पर ऐसा जैसे पालक ये कब से करना चाहती हो. अर्जुन दुविधा में उसके मासूम चेहरे को देखने लगा तोह इसकी वजह भी पालक ने बताई.
"पहले भी मैंने सिर्फ तुम्हे हे किश की थी अगर तुम्हे याद हो तोह. मैं ऐसे हे प्यार बता सकती हु, काम से काम तुम्हे तोह."
"पहले तोह मातेह और गाल पर हे करती थी आप.", अर्जुन सर झुकाये लड़कियों सा शर्माने लगा क्योंकि कही न कही उसको भी एहसास हुआ था की पालक ने गलत नहीं कहा.
"पल्ली तू मुझे चुम्मी नहीं देगी? मिनी भी तोह मिक्की को देती है.. पालक ने चेहरे से चेहरा लगते हुए जैसे धीमी आवाज में कुछ याद दिलाया तोह बदले में हलके से अर्जुन ने भी उसके होंठो को चूमा और उठ खड़ा हुआ.
"मैं तेरी मम्मी को बोलूंगी तू मुझसे चुम्मी मांगता है. बस एक दूंगी और तू किसी से नहीं कहना?", अर्जुन टोलिया उठा कर बाथरूम में जा घुसा पालक को की नक़ल उतारता जो भीगे चेहरे से भी मुस्कुराये जा रही थी. फिर उठ कर अर्जुन की जीन्स टीशर्ट बीएड पर रखने के बाद वो कमरा ठीक करने लगी. कॉफ़ी पर ध्यान जाते हे खिड़की के करीब कुर्सी रख वो बहार देखती हुई विचारो में खोयी छोटे छोटे घूँट कॉफ़ी के भर्ती जैसे जीवन में haal-filhaal आये बदलाव ध्यान करने लगी. अर्जुन कब बाहर आया और कपडे भी पहन चूका, ये पालक को जैसे दिखाई हे नहीं दिया. दूध का गिलास उठा कर वो पालक के सामने हे दूसरी कुर्सी पर आ बैठा. घुंगराले बाल गीले हो कर चेहरे के सामने और कान के पीछे से गर्दन तक बिखरे थे.
"खुली आँखों से कौनसे सपने देख रही है आप? वो फोटोज संभाले रखना ठीक नहीं है.", अर्जुन की आवाज सुन्न कर पालक का ध्यान गया की उसकी आधी कॉफ़ी कबकी ठंडी हो चुकी है. एक मामूली सी मुस्कराहट देती हुई वो कड़ी हुई और लाकर से वो लिफाफा निकाल कर अर्जुन को पकड़ते हुए कहा.
"जला कर फ्लश कर दो, मैं कप रख के आती हु. फिर मम्मी पापा से भी मिल लेना, नाश्ते के समय.", अर्जुन को हैरत हुई और वो एकटक पालक के शांत चेहरे को देखने लगा क्योंकि इन तस्वीरों में कुछ ऐसी भी थी जिन में पालक पूर्णतया निर्वस्त्र थी. अर्जुन को इस कदर हैरान देख कर अब पालक की मुस्कान कुछ गहरी हो चली.
"यही सोच रहे हो की मैं तुम्हे ये क्यों सौंप रही हु ये जानते हुए भी की इनमे से कुछ ऐसी है जिन्हे मैं भी नहीं देख सकती? इसका जवाब तोह सचमुच मेरे पास भी नहीं है अर्जुन लेकिन मुझे ाचा लगेगा अगर ये तुम खुद करो तोह.", दराज से सिग्रत्ती जलने वाला लाइटर निकाल कर अर्जुन को देते हुए वो उसके पास हे रुक गयी. अर्जुन उन अनकहे लफ्ज़ो को भी सुन्न गया जिनमे पालक ने एक तरह से उसको सर्वोपरि मान लिया था. खिड़की गली की तरफ खुलती थी जिसके दोनों पल्ले खोल कर अर्जुन ने भूरे लिफाफे को बिना खोले हे आग के हवाले कर दिया. छोटी सी आग की लौ chatt-chatt करती हुई आधे लिफाफे तक लम्बी लपटों में बदलने लगी और अर्जुन एक किनारे को थामे hari-neeli और नारंगी लपटों के साथ काले पड़ते उस तस्वीरों के गट्ठर को देखता रहा जो धीरे धीरे फूलने के साथ गली में झाड़ कर गिरने लगा था. पालक के चेहरे पर प्रशंशा के भाव थे और पूरा लिफाफे राख में बदलने के बाद अर्जुन पलटा तोह इस बार पालक ने उसका माथा चूम लिया.
"तुम चाहते तोह देख भी सकते थे लेकिन तुमने एक बार भी खोलने तक की कोशिश नहीं की. दुनिया तुम्हारी जैसी क्यों नहीं है अर्जुन?"
"मैं भी इस दुनिया का हे तोह हिस्सा हु मिस झल्ली जी. उन तस्वीरों से ज्यादा अनमोल और खूबसूरत है ये सुकून और भोला चेहरा जो मुझ पर आज भी विश्वास करता है. चुम्मी करने डौगी?", अब पालक खिलखिला कर हंसने लगी थी क्योंकि अर्जुन ने जो इत्छा जताई उस पल वो ठीक किसी बचे सी नौटंकी कर रहा था.
"तुम्हेर मम्मी से कह दूंगी की ारु चुम्मी मांग रहा था मुझसे. हाहाहा.. उम्माह.. अब बताओ आज का क्या प्लान है?"
"पहले हम कान्नौगत प्लेस चलेंगे, थोड़ा काम और ढेर साडी शॉपिंग करनी है. फिर एक ाची सी जगह लंच और उसके बाद छोटा चेतन देखेंगे. 3 डायमेंशन फिल्म है और अपने शहर तोह देख नहीं पाउँगा. कल बड़ा सा बोर्ड देखा था मैंने जब हम उधर मार्किट रुके थे उस वक़्त. फिर शाम को 7 बजे मुझे कही जरुरी काम से निकलना है और रात को वापिस में देरी हुई तोह होटल में रुकूंगा. हाँ जाने से पहले मिलने आ जाऊंगा आपसे."
"जहा जाना है चले जाना लेकिन रात को वापिस यही आना है. चलो अब पापा जी से भी मिल लो और मुझे लेके जा रहे हो ये बात तुम्ही कहना उनसे. मैं परमिशन नहीं लेने वाली.", पालक की ऐसी बात सुन्न कर अर्जुन ने भी सर पे हाथ रखते हुए जाहिर किया जैसे अब वो हर काम उस से करवाने वाली है. 5 मिनट बाद हे दोनों तैयार हो कर उस साफ़ सुथरे हॉल में थे जहा एक तरफ रसोई और खुले हिस्से में आलिशान बड़ा मेज लगा था 8 कुर्सियों के बीच.
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"ारु पूछ रहा था की दिल्ली से आपके लिए क्या लेना है. मैंने तोह बता दिया की मेरे लिए एक ाचा सा फ्लोरल ड्रेस कनी लेंथ का और अलका ने skin-fit जीन्स के साथ उसकी हे पसंद का टॉप. आरती का हमेशा वाला वही की जो उसको पसंद आये वो ले आये पर 2-3 ाची सी बुक्स जरूर. मैंने वैसे तोह कहा था के माँ को कोई जरुरत तोह नहीं लेकिन कल एक शादी अटेंड करनी है. टाइम से अगर वो अपने घर पहोच जाए तोह संदीप की मम्मी के हाथो भिजवा दे. आंटी तोह 10 बजे तक वह से निकलने का बता रहे थे न?", ऋतू के माथे पर अभी भी खरोच जैसा निशाँ साफ़ जाहिर था एक तरफ. काले रंग की ढीली सी कुर्ती और सफ़ेद सलवार में उसकी ख़ूबसूरती और भी ज्यादा निखार दे रही थी उसके गोर तराशे हुए चेहरे, भूरे लम्बे घूमे हुए रेशमी बालो के साथ. नाश्ता तोह समय से हो हे चूका था सबका और रेखा जी अभी उन कुत्तो को भोजन परोस रही थी उनके बड़े बड़े कटोरो में. आज वो भी सूती सलवार कमीज में हे थी इस खूबूसरत प्रकृति से घिरे आवास में. इनसे कुछ हे दुरी पर अलका और आरती एक बड़े टोकरे में कच्चे आम चुगवा रही थी कुंती से. एक बड़ी सी लाठी के आगे बंधी डराती से अलका बड़े बड़े आम निचे गिरती जो अलका उसको बताती और कुंती उन्हें टोकरे में जमा करती.
"वो वह काम से गया है या ये सब करने के लिए? और तुमने आगे से खुद उसको बता दिया के ये सब लेते आना. कल अगर उसको जल्दी नहीं भी आना होगा न तोह वो 10 से पहले खड़ा होगा संदीप के घर. वैसे सब लोग शादी में होंगे तोह घर पे कौन रहने वाला है?", वही एक तरफ हे सिंचाई के लिए लगे पाइप को चला कर हाथ धोते हुए रेखा जी ने डांटने की जगह ये बात इस लहजे में कही थी की ऋतू को बुरा भी न लगे और अर्जुन तक सन्देश भी जाए की वो काम पर हे ध्यान दे.
"वही रहेगा घर पे क्योंकि आपका लाल जहा ब्रेक लगा देता है उसके बाद उठाये से भी उठने वाला नहीं. और उसका जो भी काम था वो आज रात को हे है. फिलहाल तोह वो पालक दीदी के ससुराल में रुका हुआ जिन्हे मल्होत्रा अंकल ने उसके साथ हे भेज दिया था जब पता लगा की वो काम से दिल्ली जा रहा है. माँ, मैं क्या कह रही थी की ये विष्णु अंकल इन्दर चाचा की आगे के है और अब शादी कर रहे है? मतलब बाउजी और दादी भी उन्हें पुराने जानते है जिस हिसाब से पूरी शादी और रस्मे खुद दादी और बौ जी हे करने वाले है माता पिता की.", ऋतू वही घास पर हे चौकड़ी लगाती हुई बैठ गयी जिसकी बगल में सबसे शरारती झबरैला कुत्ता पसर कर बालो में हाथ फिरवाने लगा. वो हँसते हुए उसकी नौटंकी देखने लगी जिस तरह वो हाथ रुकने पर मुँह रगड़ कर जारी रखने का निर्देश देता था.
"मैंने तोह यही सुना है की जब तेरे चाचा कॉलेज थे तोह विष्णु भाई साहब के संरक्षक तुम्हारे रघुवीर दादा जी हे थे. तुम्हारे बौ जी भी उतना हे प्यार रखते है उनके साथ और ये विष्णु जी की हे मर्जी थी की वो शादी नहीं करना चाहते थे उस समय. अब जिस से हो रही है वो भी कृषि पृष्ठभूमि से है और तुम्हारे विष्णु चाचा ने भी सरोज के बगल वाली जमीन पर खेत और घर तैयार किया है. हाँ अर्जुन को घर हे रुकना पड़ेगा लेकिन अकेले तोह माँ जी घर नहीं रहने देंगी क्योंकि वो लोग तोह अभी दोपहर में निकलने हे वाले है. वैसे रोमिला वही रहेगी रेणुका के पास और प्रीती भी होगी तोह समस्या नहीं होने वाली. बाकी शाम तक तोह हम लोग भी घर हे होंगे. मैं ये सोच रही थी की ड्राइवर का कैसे करना है?", अब माँ की जगह जैसे वही ऋतू की सखी सामें थी और ऋतू इस पर विचार करने लगी. उसकी माँ सबके सामने नहीं आना चाहती थी इस अवतार में और जाना भी सीधा वह गाँव में था जहा शादी होने वाली थी.
"बड़ी माँ.. आप यहाँ से गाँव तक गाडी ले चलिएगा और आगे न हम मेरे पापा को बुला लेंगे. या फिर आप सेहर हे चल पड़ना, माधुरी दीदी की तरफ से किसी ड्राइवर का इंतजाम करवा लेंगे और ललिता ताई जी को भी उधर से हे ले लेंगे न साथ. क्या कहती हो डॉक्टर चश्मिश.?", एक अधपकी ाम्बी मुँह से काट कर उसका पीला खट्टा गूदा मजे से खाती हुई आरती भी धम्म से पसर गयी ऋतू की गॉड में सर रखती हुई. अलका अपने हाथ में पकड़ा हुआ छोटा टोलिया अपनी चची को पकड़ा कर इनकी चर्चा में शामिल हो गयी. कांटा टोकरी भर कच्चे आम ले कर सुनंदा जी के पास चली गयी थी, शायद अचार के लिए ये लोग हरे आम साथ ले जाने वाले थे.
"हाँ इसने करि चची सही बात. कभी कभी दिमाग चलता है हमारी मोटो का. दीदी के घर से तोह कोई जाने वाला है नहीं और माँ से आप अभी बात कर लो कही दादी उन्हें न साथ लेती जाए हमसे पहले. अभी 12 बजे है और बाउजी दिल्ली से निकले थे 9 बजे तोह एक घंटे बाद वो घर होंगे. उसके एक घंटे बाद सभी लोग निकल लेंगे वह से क्योंकि 4 कार जा रही है. पहले तोह तारा, रुपाली और चची रुकने वाली थी लेकिन दादी ने कहा की हम तीनो जब यहाँ से शादी में शामिल होने वाली है तोह बाकी सबने कोई पाप किया है? घर पे हमेशा की तरह मुनीर अंकल रखवाली के लिए रहेंगे रात को और कल तोह अर्जुन पहुंच हे जाएगा. वैसे जल्दी ख़तम नहीं हो गया ये ट्रिप?", अलका के साथ सबको हे जगह कही ज्यादा पसंद आयी थी. दुनिया से दूर, हरा भरा खुला बाग़ जिसके साथ हे झील और आगे घने जंगल के बीच पहाड़ी नदी. महल जैसे आलिशान और आरामदायक कक्ष.. क्या नहीं था यहाँ और सबसे ख़ास था आपस में समय बिताना.
"फिर आ जायेंगे जब ब्रेक मिलेगा. क्यों माँ, आ सकते है न हम यहाँ दोबारा कुछ समय रहने?", ऋतू ने बात तोह यहाँ अर्जुन के बारे करनी थी लेकिन फिलहाल ये मुमकिन न था. आरती आँखें मूंदे खुदसे हे हाँ कहने लगी उसके सवाल पर
"जब सर्दियाँ अपने चरम पर होती है तब यहाँ का नजारा बहोत अलग हे होता है. गर्मियां देख ली है तोह एक बार सर्दियों में भी ट्रिप प्लान करना चाहिए. लेकिन तब बस तुम लोग हे आना, मेरा मुश्किल है. और यहाँ आने के लिए तुम्हे सिर्फ समय निकलना है, परमिशन ले कर ये मत जाहिर करो की मैं इधर की एकलौती मालकिन हु. आजतक इसके कागज़ माँ के हे नाम है जिसमे मैं वारिस भर हु और मेरे नाम ये होने भी नहीं वाली. हाँ ऋतू या कोमल में से किसी एक के हो सकती है. चलो तुम लोग आराम से समय बिताओ यहाँ, मैं कांटा से थोड़ा काम करवा लेती हु. फिर सामान भी पैक करना है क्योंकि सुबह थोड़ा जल्दी निकलना हे ठीक रहेगा.", रेखा जी भी ऋतू से अकेले में हे बातचीत करने का इरादा लिए थी लेकिन वही हालत थी की समय उचित नहीं था. अब यहाँ ये तीन थी और चर्चा भी अर्जुन की हे होने वाली थी.
"तुम्हे क्या लगता है जो दादी ने बताया वो सच है या जैसा ारु दिखाना चाहता है वो?", अलका के इस सवाल पर ऋतू ने हामी भरी और जवाब आज के दिन की सबसे होशियार आरती ने दिया.
"दोनों हे सच नहीं बता रहे जितना मुझे लगा. देखो अर्जुन का दिल्ली जाना हो सकता है काम की वजह से हो लेकिन पालक दीदी जब इतने समय से अपने घर थी और ारु घर पे जितना रुका तोह उस हिसाब से दादी का ये कहना की वो दिल्ली जा रहा था इसलिए पालक को भी लेता गया तोह बात हजम नहीं होती. ारु ने बोलै की उसका काम रात का है और वो ख़तम करने के बाद वो पालक दीदी के यहाँ रात गुजार कर सुबह जल्दी घर के लिए निकल लेगा. दिल्ली में सिर्फ उनके हे घर वो 2 रात? ारु इस मामले में बहोत स्वाभिमानी है और अब उसके पास जब उमेद चाचा जी की गाडी है और मोबाइल फ़ोन भी तोह एक पंथ 3 काज वाला मामला है. पालक दीदी की एक अलग कहानी है, उमेद चाचा भी अलग हे सन में है अर्जुन के साथ और इन सबके बीच दादा जी वह गए वो भी बिंदु आंटी और उनकी दोनों बेटियों के साथ. जबकि उस बड़ी गाडी में ये लोग ारु के साथ आराम से आ सकते थे लेकिन अलग अलग गए. और ऋतू से ारु ने कहा की वो रात डिनर के लिए बिंदु आंटी के पास गया था जबकि दादा जी उधर नहीं थे. अब बताओ मेरी थ्योरी कितनी सही है और कितनी गलत?", आरती के इतने भरपूर विवरण से जहा ालक भौचक्की रह गयी वही ऋतू जोर जोर से हंसने लगी. उसकी ये उन्मुक्त हंसी देख निचे लेती आरती ने हे उसका एक गाल खिंच कर अपनी उँगलियाँ होंठो से लगा ली.
"आज लगता है इसने तेरा झूठा खा लिया अलका. दिमाग चलने लगा है इस मोटो का भी लेकिन बिंदु आंटी वाला मामला बस औपचारिकता है मेरे हिसाब से. मुस्कान ाची लड़की है और अर्जुन की उसके साथ जमती भी बहोत है. डिनर पर बुलाया गया क्योंकि बौ जी को कही जाना था और गाडी उनके साथ गयी. ारु इस बहाने मुस्कान के बुलाने पर बाकी दोनों से भी मिल लिया पर यहाँ सबसे ख़ास बात है ये पालक दीदी वाला मामला. वो मेहँदी वाले दिन भी खामोश थी जबकि प्रिय भाभी को इंटरेस्ट था अर्जुन के बारे में जान ने का. जहा तक मुझे याद है तोह ारु बचपन में अपने घर के सिवा कही जाता था तोह सामने अरोरा अंकल के घर डिम्पी के साथ खेलने या फिर पालक दीदी के यहाँ क्योंकि संजीव भैया का भी उधर हे ज्यादा जाना होता था जिनकी कपिल भैया से जमती थी और ारु फ्रूटी दिप्सी के चस्के के साथ हे पल्ली पल्ली कहता पालक दीदी के भी चिपका रहता था. पालक दीदी की कोई बड़ी समस्या है और मल्होत्रा अंकल के सबसे करीब है अपने दादा जी. प्रीती ने रात बताया था की शाम को मल्होत्रा अंकल बाउजी के साथ अँधेरा होने पर भी पार्क में बैठे थे. परसो शाम को भी वैसा हे सन था तोह मतलब साफ़ है की ये बात इतनी ख़ास है जिसमे खुद बाउजी भी शामिल नहीं हो सकते.. मतलब लड़की वाला मामला और ारु नहीं बता रहा क्योंकि वो दीदी की परवाह करता है. मुझे तोह लगता है अब भी करता है चाहे इनकी बातचीत नहीं होते देखि मैंने जबसे ये घर वापिस लौटा. पर आज रात को.. कुछ ऐसा है जिसके बारे में उसने मुझे भी कोई हिंट नहीं दी. मतलब बौ जी को भी नहीं पता और ये मामला जरूर रिस्की है.", अब ऋतू की हंसी हे गायब हो गयी क्योंकि अर्जुन उस से बात गोल कर गया था. और उसको चिंता में देख आरती वापिस मंदबुद्धि अवतार में जा पहुंची.
"कही वो पालक दीदी को तोह ख़ुशी नहीं देने जा रहा?"
"ओह तू अब चुप कर. एक दिन में तू ब्योमकेश बक्शी नहीं बन्न ने वाली मोटो.. पालक दीदी के साथ ऐसा वैसा अगर हो भी गया तोह वो समस्या तोह नहीं कहलायेगा? वो क्या बोल रही थी की उनके हस्बैंड महीने भर के लिए बहार है. परिवार तोह वही होगा न और शादी को तोह उतना टाइम भी नहीं हुआ जिसमे वो 2 बार घर आ चुकी. इस बार लगभग 2 हफ्ते रही है, लेकिन घर से उतना बहार भी नहीं निकली नहीं तोह वो कोमल के पास तोह आती न ऋतू?" अलका की बात पर ऋतू ने सर हिलाया.
"बौ जी खुद इसमें नहीं पड़े मतलब बात ऐसी है जो खुलनी नहीं चाहिए. पर ये रात को क्या काण्ड करने वाला है? गाँव से ये घर आने का बता कर नहीं निकला और सुबह ये प्रीती के यहाँ से घर गया था कल. रात को हे क्यों निकला? सिर्फ प्रीती वजह होती तोह वही खुद उसको आने के लिए मन कर देती इतनी रात में. वो वह था पार्टी में उमेद चाचा जी की जगह और ऐसे हे निकल गया? मोबाइल फ़ोन कैसे पंहुचा उसके पास? वो पंहुचा तोह पंहुचा इतने पैसे किसने दिए की वो उस जगह शॉपिंग के लिए जा रहा है जिधर हजार 2 हजार में तोह जीन्स भी नहीं मिलती. कोई बड़ा खेल है अलका क्योंकि घर पे ारु की गाडी कड़ी है जो उसको सबसे ज्यादा पसंद है. वो लांसर नहीं लेके गया और .. पक्का वो उमेद चाचा के हे साथ होगा.", अभी ऋतू को शीला देवी वाला प्रकरण याद आने लगा जब पहली बार उसके भाई ने मूर्खता दिखने के साथ अपनी बहादुरी का भी जलवा परिवार के सामने लाया था.
"तेरा कहने का मतलब है की ारु उधर सचमुच कुछ बड़ा हे खेल खेलने वाला है? गाडी तोह चाचा जी ने इसलिए दी है की उसमे अर्जुन सुरक्षित रहे और उधर फ़ोन चलता है तोह संपर्क में रहने के लिए वो भी साथ मिला होगा."
"न अलका.. महंगी गाडी, ारु के पास ढेर सारे पैसे और मोबाइल सिर्फ ख़ास वजह से क्योंकि चाचा उसको कांटेक्ट में रहे हरदम. कहने को तोह चाचा का प्यार हे बहोत है उसके लिए लेकिन अभी सारा बिज़नेस उधर हे बढ़ाया जा रहा है और ऐसे मौके पर ारु का वह ये सब करना मतलब कुछ और हे है. ऐसा मसला होता जहा पर khoon-kharaba होना हो तोह उमेद चाचा खुद हे बहोत थे और उनसे पहले पापा को हे खुजली रहती है."
"जहा जोर की जरुरत नहीं मतलब शांत दिमाग. दिखावा मतलब कोई रसूखदार सामने है. अर्जुन को हे भेजा गया है और वो भी रात में .. यही बस एक पॉइंट पहेली है जिसमे 2 ऑप्शन है ऋतू की या तोह अमीरजादा है जिसके चांस काम है क्योंकि अर्जुन लड़को से ज्यादा जल्दी लड़कियों से दोस्त कर लेता है. दूसरी ऑप्शन है की उसको ऐसी जगह भेजा जाए जहा मिडिल क्लास की एंट्री न हो और काम करने वाला अर्जुन जितना हे शातिर. जोर से ज्यादा तोह उसमे दिमाग है.. मतलब जोर तोह है हे लेकिन दिमाग और सेल्फ कण्ट्रोल कही ज्यादा. यंग है जिसका मतलब वह बड़े लोगो से len-den नहीं. चल जाने दे इस बात को अभी के लिए. गलती से चची तक ये बात चली गयी न तोह हो गया beda-garak. हमारा कुछ नहीं जाना लेकिन वो फंसेगा."
"ऋतू, तेरे पापा का फ़ोन है तेरे लिए. तुम दोनों भी आ जाओ, लंच तैयार है.", रेखा जी ने गेट पर खड़े हे आवाज लगाईं तोह इन्हे समय का अंदाजा हुआ. तीनो हे उठ कर घर की तरफ बढ़ गयी. उधर दिल्ली में अर्जुन के भी फ़ोन की घंटी बजने लगी थी जहा ख़ास नंबर देख कर उसके चेहरे पर आयी चमक हाथ थामे चलती पालक से भी न बची.
मकसद (1)
"रात को ज्यादा कुछ नहीं आता टीवी पर लेकिन जल्दी सोने की आदत भी नहीं है तोह गाने हे देख लेती हु. वैसे बॉडी बहोत ाची बना राखी है तुमने? हाइट तोह दूर से हे नजर आ जाती है लेकिन शरीर कपड़ो के अंदर रहता है. तोह सिर्फ दूध हे पीते हो अभी तक?", इस बार तोह सोनाली का एकमात्र परिधान बिलकुल केहर ढाने वाला था. घुटनो से भी 4 इंच ऊँचा एक रेशमी गाउन जिसकी पत्तिया अगर समतल पेट पर कासी न होती तोह गोर दूधिया वक्षो की अभी दिखती लकीर के साथ उनका आधा स्वरुप हे सामने होता. कांच के बड़े गिलास में झाग बनाया हुआ दूध लिए वो जिस तरह से प्रकट हुई थी, एक पल को अर्जुन बस देखता हे रह गया. जाने पानी के साथ क्या सुगंध मिला कर नही थी सोनाली, जो पूरा लाउन्ज (हॉल) हे महक उठा.
"काफी बड़ा टीवी है और हमारे शहर से तोह ज्यादा हे चैनल आते होंगे यहाँ. दूध के लिए धन्यवाद सोनाली जी और इसके सिवाए मैं सिर्फ पानी हे पीना ठीक समझता हु. वैसे आपने भी खुद को ाचा मेन्टेन किया है. लगता नहीं की पालक दीदी की जेठानी है आप.", अर्जुन चौड़ी पट्टी की बनियान हे पहने था ऊपर जिस से उसके मजबूत डोले और छाती के कटाव स्पष्ट सामने थे. सोनाली अपने गाली के आगे से बाल पीछे झटक कर उसी नरम सोफे पर आ बैठी जिस पर अर्जुन था. वह एक बिना पीठ वाला लम्बा और नरम सोफे भी था और 2 वैसे हे सोफे जैसे पर ये बैठे हुए थे. एक ख़ास लोशन की शीशी टेबल पर सामने रखने के बाद हथेलिया आपस में हलके से रगड़ कर अपनी गोरी मांसल बाहों पर वो तरल मसलती हुई सोनाली टेलीविज़न देखने का दिखावा करते हुए बात करने लगी.
"मेन्टेन नहीं करूंगी तोह काम कैसे चलेगा? ये दिल्ली है अर्जुन, लोग यहाँ एक कम्पटीशन में हे रहते है. फिर वो चाहे कमाई का हो, घर का या दिखने का. सबकुछ बेहतर चाहिए दूसरे से नहीं तोह जो पास है उसकी कदर नहीं. मुझे तोह लगा था के तुम पार्टीज पसंद करते होंगे और तुम जैसे जवान रईस लड़के तोह दिल्ली के दिसो क्लब्स में दर्जनों लड़कियों की निगाहो में रहते है. गर्लफ्रेंड नहीं बनाई या तुम्हारी तरफ ये सब आज भी मन है?", अब अर्जुन क्या कहता की जो मन है वो भी वो कर चूका है और गर्लफ्रेंड नहीं बल्कि दर्जनों प्रेमिकाए है उसकी. लेकिन क्लब वाली बात सुन्न कर उसके दिमाग में अर्शी का हे अक्स उभर आया. ज़ली ban-thann कर रहने वाली एक आधुनिक थी तोह क्या पता वो इस क्लब के बारे में भी कुछ जानती हो.
"फिलहाल तोह करियर पर हे ध्यान है सोनाली जी लेकिन अब अपने घर से बहार हु और काम तोह परसो हे होना है इसलिए सोच रहा था की कल कोई क्लब हे देखा जाए. एक दोस्त है मेरा दिल्ली में और उसने बताया की यहाँ पर क्सक्सक्सक्स जगह कोई Fire-shot क्लब है जो अपने आप में हे अलग दुनिया है. आपने देखा है वो?", अर्जुन से ये नाम सुन्न कर सोनाली बड़े हे कामुक अंदाज में मुस्कुराते हुए अपने कंधे पर से गाउन ढलकती हुई वह भी लोशन मलने लगे. जाने उसके मैं में क्या चल रहा था पर जो भी था अर्जुन को फिलहाल तोह वो पसंद था. ऐसा करने के दौरान सोनाइल के पुष्ट सतांन का ऊपरी हिस्सा भी नुमाया दिखा जो क्सक्स उम्र की औलाद के बावजूद बेहद सुडोल प्रतीत हुआ.
"दिल्ली में ज्यादातर तोह सिर्फ डिस्को हे है जैसे घुंघरू, झणकार, रौनक और क्लब 90. जिन लोगो ने सिर्फ झुण्ड में नाचना हो, आपस में मस्ती करनी हो वो वही जाते है. वेस्टर्न कल्चर नया नया तोह आने लगा है बोम्बये के बाद यहाँ. लेकिन Fire-shot अलग हे दुनिया है जैसी 5 स्टार होटल्स के तहखानों में भी उतनी बढ़िया नहीं. वह महंगी शराब, तेज संगीत और दिल्ली की सबसे अमीर लड़किया हर शनिवार दिखाई पड़ेंगी. और इतना हे नहीं, बड़ी बड़ी मॉडल्स और कुछ फिल्म स्टार्स भी भी वह अक्सर देखे गए है. कैमरा वाले तोह भीतर कदम भी नहीं रख सकते जैसी सिक्योरिटी रहती है वह. एक बार हे गयी थी लेकिन 10 हजार वसूल भी हुए. अकेले जाने की सोच रहे हो तोह किस्मत के भरोसे रहना. कभी कभी अकेले लड़के बहार हे रह जाते है.. हाहाहा.. और वैसे भी तुम दूध पीने वाले और वो शराब से भरी मस्ती की अलग हे दुनिया.", सोनाली से जानकारी लेते हुए अर्जुन घूँट घूँट दूध पीने के साथ हे मुस्कुरा रहा था. कुछ ज्यादा हे गरम और तेज थी पालक की जेठानी. नौजवान लड़को का बुरा हाल करना जैसे उसकी लिए पुरानी बात थी.
"दूध पीना तोह बस आदत है और सेहत के लिए एक ाची आदत सोनाली जी. वैसे आपके हस्बैंड भी मतलब आपकी तरह हे जीवन खुल कर जीने में यकीन रखते है? जिस जगह आपके हिसाब से युवा लोग और आप जैसी खूबसूरत लड़कियां जाती है वह जाना सबके लिए तोह मुमकिन नहीं. कैसे सेहन किया होगा उन्होंने वह औरो का आपको देखना?"
"मस्का लगा रहे हो लड़की बोल कर? हाहाहा.. मैंने कब कहा के प्रजुल साथ गए थे? वो समय निकलने वाले होते तोह क्लब पब जाने की जरुरत हे कहा पड़ती? सहेली के साथ गयी थी वह और वो भी सिर्फ एक हे बार. तुम जाने के लिए पूछोगे तब भी मैं दोबारा उधर नहीं जाने वाली. सॉरी... कही और का पूछते तोह जरूर विचार कर लेती. वैसे अपनी बहिन से पूछ लो, उसने तोह दिल्ली आने के बाद भी आसपास की मार्किट के सिवा कुछ देखा हे कहा है. जयेश तोह कभी मन नहीं पाया, क्या पता तुम्हारे साथ जाने के लिए राजी हो जाए.", अर्जुन तोह वैसे भी कहा ले जाना चाहता था इस आफत को अपने साथ जब वो खुद वह एक मकसद से जाने वाला था. पर यहाँ खुद हे सोनाली ने उस चर्चा का मौका बना दिया था जिसकी तलाश में अर्जुन इतनी देर से बैठा था. गिलास को टेबल पर रखने के साथ हे अर्जुन ने अपना वो हाथ जो सोनाली की तरफ था, उसके मुलायम गुदाज पत् के ऊपर हे रख दिया. अब बारी सोनाली की थी हैरान होने की.
"वो बहिन है न सोनाली जी और जब पति के साथ न गयी तोह मेरे साथ तोह सवाल हे नहीं उठता. वैसे आपने तोह जैसे पूरी दिल्ली हे घूम राखी है और आप है भी तोह दिल्ली से हे.. क्सक्सक्सक्स में हे तोह आपका घर है, मतलब आपके मम्मी पापा और दूर के मां वही रहते है. गलत कह रहा हु क्या?", अर्जुन का हाथ सरक कर उसकी मखमली जांघो को सहलाने लगा था, वो भी रेशमी वस्त्र के भीतर एक जालीदार पंतय की डोरी तक. जिस तरह से वो एकटक सोनाली की आँखों में देख रहा था, उसके चेहरे के बदलते रंग और शरीर में हलकी हलकी कम्पन्न साफ़ बता रही थी की न वो अर्जुन को रोकने की हालत में थी और न कुछ कहने की. अर्जुन को तोह जवाब चाहिए हे था और उसने हाथ थोड़ा आगे बढ़ाते हुए पंतय से ऊपर उस ढलान पर सरकाया जहा ऊपर नाभि और निचे झीने से वस्त्र में सोनाली की योनि.
"क्या हुआ सोनाली जी? आपकी तोह हंसी और चमक हे गायब हो गयी? कुछ गलत तोह नहीं कह दिया मैंने? इतनी तारीफ के बदले आप 2 शब्द भी नहीं कहेंगी? दूर के मां जी से तोह बहोत कुछ कहती करवाती है आप और मैं इतने करीब हु तब भी ये बेरुखी.", अर्जुन नाभि के किनारे ऊँगली फिराते हुए थोड़ा और करीब खिसक आया. अब वो सोनाली की उखड़ी सांसें भी महसूस कर रहा था कांपते बदन के साथ.
"तुम्हे.. तुम्हे ये.. सब अफवाह है और झूठ. तुम आरोप लगा रहे हो."
"शहहह.. थोड़ा आहिस्ता बोलिये सोनाली जी.. दीवारों के भी कान होते है और कोई यहाँ आ पंहुचा तोह बदनामी आपकी हे होगी. क्या पता इतना ाचा ससुराल भी हाथ से जाता रहे. मेरे सिर्फ 3 सवाल है और उनमे से एक का भी गलत जवाब तोह समझो इस घर में तुम्हारी ये आखिरी रात होगी. हाँ अपने मायके जाने से पहली दूसरी ससुराल में 3-4 साल बिताने पड़ेंगे वो अलग. आराम से बैठो, डरना बाद में.", अर्जुन ने अपना हाथ सोनाली के जिस्म से हटा लिया और कांच के जग से वही उल्टा कर रखे गिलास में पानी भर कर उसके सामने किया.
"पी लो सोनाली जी, गाला बार बार सूखने से ाचा है की पहले हे गीला कर लिया जाए. हाँ.. तोह पहला सवाल है की जब वो दूर का मां आपको स्कूल पूरा करने से पहले हे जवान कर चूका था तोह शादी उस से क्यों नहीं की?", इस बात से साफ़ था की अर्जुन उस व्यक्ति को दबोच चूका है और वो अपना मुँह जल्दी हे खोल गया होगा. सोनाली ने हाथ जोड़ने की नौटंकी करनी चाहि तोह अर्जुन ने अपनी बगल में रखा हुआ स्क्रीन वाला कैमरा चालू करके सोनाली की हे तस्वीर उसके सामने कर दी. वो एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ चिपक कर बैठी थी और उस आदमी का एक हाथ सोनाली की कमर पर और दूसरा उसके चुके को दबाने में लगा था. अब सोनाली ने नजरे झुकाते हुए जवाब देना हे बेहतर समझा.
"उम्र का फरक और ऊपर से वो खुद हे शादी नहीं करना चाहते थे. घरवाले तोह कभी राजी होते नहीं और उनके नाम न दूकान थी और न मकान. भाग कर जाते भी तोह ज़िन्दगी खराब हे होती घरवालों की बदनामी के साथ. बस उसके बाद कॉलेज ख़तम होते हे मेरी शादी प्रजुल से करवा दी गयी जो न बिस्टेर में मुझे खुश कर सकता है और न बिस्टेर से बहार. पैसे से हे ज़िन्दगी में सुकून नहीं मिलता, कोई होना चाहिए जो तुम्हे समझे और प्यार करे. इसलिए मैं रोहन के पैदा होने के बाद उनसे दोबारा मिलने लगी.", अर्जुन ये सुन्न कर फीकी हंसी देते हुए बोलै.
"प्यार और समझने वाला? पैसा सबकुछ नहीं तोह फिर क्यों हर बार उसको थैले में पैसे पकड़ती आ रही हो? आज भी तोह 2 लाख दिए थे. वैसे ये मेरा दूसरा सवाल नहीं है सोनाली जी. आपके अधूरे जवाब के ऊपर सवाल है. और रही बात आपके पति के प्यार की तोह आपका हे दिल नहीं भरता एक पुरुष से. प्रजुल से घरवालों ने शादी नहीं करवाई थी आपकी, बल्कि आपने हे फांसा था उस शरीफ आदमी को अपने प्यार के जाल में इसी मां के कहने पर जो काम के नाम पर लड़कियों की दलाली करता है और जुआ खेलने के लिए वो कमाई काम पड़ती है इसलिए आपसे हर हफ्ते 10 दिन बाद पैसे ऐंठता रहता है. छोडो ये सब be-fijool की बातें सोनाली जी. एक झूठ को मजबूत दिखाने के लिए 50 और बोलने पड़ेंगे लेकिन फायदा तब भी नहीं होने वाला. मुझे आपकी निजी ज़िन्दगी से कोई मतलब नहीं लेकिन यहाँ, इस घर में मेरी बहिन भी है और बात है उसकी ज़िन्दगी की. और इस मामले में मैं जरा सी भी कोताई नहीं बरतने वाला. पहले हे बता देता हु की पुलिस, प्रशाशन, मंत्री और जुर्म करने वाले, सब मेरे पास है. हेकड़ी तोह आपके उस दूर के मां की भी मैंने सिर्फ 2 हे मिनट में निकाल के रख दी थी. आप 30 सेकंड नहीं झेल सकोगी इसलिए अब सीढ़ी तरह बताओ की पालक हे क्यों? इसका जवाब मैं आपके उस मां से मांग सकता था लेकिन वो बेचारा तोह आधी कहानी में हे बेहोश हो गया. अब क्सक्सक्सक्स थाने में है जहा से सुबह कोर्ट में पेश किया जाएगा और बाकी ज़िन्दगी उसकी जेल में हे कटेगी. पालक दीदी हे क्यों?", अर्जुन की सार्ड आवाज के साथ हे अपने आशिक़ का हाल सुन्न कर सोनाली की कनपटी पर पसीना उभर आया, बेशक इस dhawani-badhit कक्ष में ठंडक थी और जिस्म पर वस्त्र भी naam-matra.
"उन्होंने पालक को शादी में हे देख लिया था.. उसके बाद किसी वजह से वो दोबारा इस घर नहीं आ सके पर जब भी मुझसे मिलते तोह दबाव डालते की मैं कैसे भी करके पालक को उनके निचे ले औ. मैं रिस्क नहीं लेना चाहती थी लेकिन उनके पास मेरे भी कुछ वीडियो थे जिसमे मैं उनके हे दोस्त.. तोह मज़बूरी में मैंने.."
"न न सोनाली जी.. ऐसे नहीं.. पूरी बात बताओ की उस दुष्ट का आना इस घर में क्यों बंद हुआ, पालक दीदी को सिर्फ आप तोह अकेली मजबूर नहीं कर सकती थी और सिर्फ उन्हें पाने की हसरत तोह मकसद हो नहीं सकता. हर बात बताओ मुझे और सच बोलने पर मैं तुम्हारे जीवन को नुक्सान नहीं पहुंचने वाला, जुबान देता हु.", अब सोनाली ने खुदसे हे आधा गिलास पानी एक सांस में गले से निचे उतार कर चेहरा गाउन के पल्ले से हे साफ़ किया. ऐसा करने पर उसका एक उभार पूरा हे बेपर्दा हुआ लेकिन इस वक़्त उस जिस्म की चाहत या परवाह दोनों में से किसी को नहीं थी.
"बरात से आते हे मां ने नशे में मेरी ननद की कमर पर हाथ रख दिया था. लोग ज्यादा नहीं था और Palak-Jayesh घर प्रवेश कर चुके थे उस समय. मेरी ननद से वो सेहन नहीं हुआ और उसने मां के थप्पड़ मार दिया, गेट के बहार हे. बात बढ़ने से पहले हे वो चले गए और मैंने भी अपनी ननद के पाँव पकड़ कर उनके किये की माफ़ी मांगते हुए शिकायत न करने के लिए मनवा लिया. फिर भी प्रजुल को इतना जरूर पता चल गया की मां ने नशे में गलती से उनकी बहिन को छू लिया था. उन्होंने अकेले में मुझ पर पहली बार हाथ उठाया था और साफ़ कह दिया था की वो आदमी घर के आसपास भी दिखा तोह जान से मार देंगे. मां को पालक भ चुकी थी और मुझे इस बात से जलन हुई क्योंकि उन्होंने मुझे मेरा आइना दिखा दिया की मैं अब पहले जैसी नहीं रही. पर उन्होंने फिर ये प्लान बनाया की पहले मैं कैसे भी करके पालक को धीरे धीरे करके कमजोर करू और फिर वो उसके साथ हमबिस्तर होने का वीडियो बना लेंगे. मल्होत्रा परिवार कितना अमीर है ये तोह शादी में हे पता चल चूका था इसलिए उस वीडियो के जरिये हम पालक से सौदा करेंगे की वो 2 करोड़ के बदले अपनी आजादी वापिस ले ले. सबसे पहले मैंने पालक से नजदीकियां बढ़ानी शुरू की, हर बात और काम में साथ देना, ज्यादा काम खुद करना, शॉपिंग पर साथ लेके जाना. फिर एक दिन घर में सिर्फ प्रजुल हे थे हम दोनों के सिवा. उस दिन पालक ने मुझसे पानी की बाल्टी मांगी क्योंकि जब वो रसोई में थी तभी मैंने शावर की पिन ऑफ कर दी थी और उसके बाथरूम में टूटी कोई है नहीं जैसे जयेश ने उसको ख़ास तैयार करवाया है. वाशबेसिन और टॉयलेट अलग है. मैंने प्रजुल को बाल्टी के साथ भेज दिया और ये भी बताया की शावर में ऊपर पिन देख लेना लगे हाथ. इधर वो गए और उधर मैं कैमरा ले कर बहार वाले वेंट की तरफ चली गयी. उम्मीद से ज्यादा हे बढ़िया तस्वीरें मिल गयी जिनका प्रिंट निकाल कर मैंने हे वो पालक तक पहुचायी बिना सामने आये.", अर्जुन का सर दुखने लगा था ऐसा षड़यंत्र सुन्न कर. एक औरत कामवासना और अपनी ऐयाशी में इतनी अंधी भी हो सकती है की वो पूरा परिवार हे डाव पर लगा दे? एक मासूम का जीवन हे ख़तम कर दे? मुट्ठी भींचने के बाद उन्हें खोलते हुए उसने खुद को जैसे तैसे शांत किया.
"वो हनीमून वाली तस्वीरें कैसे हाथ लगी? तब तोह ये सब प्लान बना भी नहीं था फिर कैसे वो तस्वीरें मिली? जयेश जी से पूछना पड़ेगा या आप हे ये बताने का कष्ट करेंगी? उनसे पूछने के लिए पहले आपका रूप सामने लाना पड़ेगा और अभी भी ये दूसरा हे सवाल चल रहा है क्योंकि जवाब पूरा नहीं हुआ."
"नहीं.. जयेश को इस बारे में कुछ नहीं पता. वो तोह मुझे अपनी माँ के बराबर सम्मान देता है. मुझे जब भी 50 हजार या लाख रुपये की जरुरत हो तोह वो जरा भी देर नहीं लगता. वो अपने पापा से भी बड़ा बन्न न चाहता है इसलिए रात दिन बिज़नेस को बढ़ने में लगा रहता है. बस वो शादी नहीं करना चाहता था अपनी एकलौती कमी के चलते जो उसने सबसे पहले मुझसे हे सांही की थी जब हम रिश्ते से गहरे दोस्त बन गए. जयेश को अजीब सी आदत है.. वो .. नंगी तासीर देख कर खुद को संतुष्ट करता है. औरत के पहलु में उसका अंग काम नहीं करता. पालक के साथ उसने हनीमून पर पहले चुपके से उसकी नंगी तस्वीरें ली थी और फिर उन्हें देखने के साथ शराब का सहारा ले कर पहली और आखिरी बार सेक्स किया, तब भी आधा अधूरा. तुम पूछो उस से पहले हे बता देती हु की जयेश मेरी मर्जी से मेरी नंगी तस्वीरें कंप्यूटर में दाल कर ऐसा करता आ रहा है पिछले 2-3 साल से. उस से पहले वो किताब देख कर ऐसा करता था. पालक को नहीं पता था की जयेश ने उसकी ऐसी तस्वीरें ली है और जयेश भी अपना राज जाहिर नहीं करना चाहता अपनी बीवी के सामने. उसको यकीन है की पालक एक हे बार करने से माँ बन जायेगी और वैसे भी वो ऐसे मामलो में दिलचस्पी नहीं रखती. ज्यादातर तोह ये लोग साथ हे नहीं सोते और मैंने इस बात का फायदा उठा कर जयेश के कंप्यूटर से हे वो तस्वीरें ले ली जो हनीमून के समय उसने खींची थी.", रट्टू तोते की तरह सोनाली अब हर छोटी से छोटी बात बता रही थी और अर्जुन हैरान था मैं में की पालक का जीवन तोह हर तरफ से अँधेरे में है.
"और उसके बाद पंहुचा दिया उस आदमी के करीब जो इस सब कुकर्म में आपका बड़ा सांझेदार है लेकिन पूरी तरह से खुद खेल की पृष्ठभूमि में.? ये नहीं सोचा की पालक दीदी अगर वो तस्वीर घर में किसी को दिखा देती या कोई देख लेता तोह आपका वो दूर का मां जो आपके दिल में गहरा धंसा है वो पकड़ा जाता? और वो तस्वीरें भी आपने हे खींची थी जैसे उस घटिया इंसान की चाहत होगी दीदी को करीब से देखने की.", अर्जुन ने अब बगल में राखी वो तस्वीर सामने राखी जिसमे बेंच पर पालक की बगल में वही आदमी बैठा था जो सोनाली का मुँह बोलै मां होने के साथ आशिक़ और इस खेल का सूत्रधार था. सोनाली ने न में गर्दन हिलाते हुए बुझे चेहरे से हे जवाब दिया.
"उनके साथ दूसरी लड़की भी थी उस समय और यहाँ वो पालक से चिपक कर तोह नहीं बैठे? ये पार्क जहा है वही मां का घर है तोह सवाल पालक से पुछा जाता की वो वह क्या करने गयी थी. जैसा मैंने बताया की पालक इन मामलो में बहोत कमजोर और डरपोक है, वो इन तस्वीरों को किसी के हाथ नहीं लगने देती. ऐसा होने की सूरत में वो खुद का हे नुक्सान करवाती. अब तुम्हे सबकुछ पता चल चूका है तोह बताओ तुम मेरे साथ क्या करने वाले हो? मैं मेरे बेटे से बहोत प्यार करती हु अर्जुन और ये सब घरवालों के सामने आने की सूरत में मेरा तोह सबकुछ उजड़ेगा पर ये लोग मुझसे मेरा बीटा भी छीन लेंगे. Maa-baap से मेरा रिश्ता उतना मजबूत भी नहीं है अब. तुम चाहो तोह मेरे साथ कुछ भी कर लो, चाहो तोह किसी के भी निचे लिटा दो.. पर मेरा ..", अब ये पहली बार था की सोनाली फर्श पर लुढ़कती हुई अर्जुन के कदमो में गिर चुकी थी. उसकी आंखूं से गिरते गरम आंसू ज्यादा सच्चे थे या उसकी ये साड़ी हरकते ज्यादा बुरी? अर्जुन पीछे हे हट गया.
"न आपसे मेरी इस मामले में कोई बात हुई और न अब आप आइंदा कोई ऐसा घिनोना काम करेंगी. जिस बेटे की दुहाई आप अब दे रही है, उसका वजूद तोह पहले भी था. तब आपने नहीं सोचा की हवस और लालच की आग में आप कितने लोगो को जलाने जा रही है? ये जिस्म देना चाहती है आप मुझे जिसके भीतर की आत्मा तक काली पड़ चुकी है? सोनाली जी, इंसान को इतना भी नहीं गिरना चाहिए की जब अपने हे अक्स से सामना हो तोह नजरे न मिला सको. और मैंने आपके उस मां के साथ क्या किया है ये बस ख़ामोशी से सुन्न लीजियेगा.", अर्जुन ने वो मोबाइल फ़ोन उठा कर पहले से मिलाये हुए नंबर को दबाया और फ़ोन स्पीकर पर कर दिया.
"हाँ बीटा.. सोये नहीं अभी तक?", सामने से ये बड़ी भारी आवाज सुनाई पड़ी और अर्जुन ने भी खुद को सहज करते हुए जवाब दिया.
"न मां जी अभी सोने हे जा रहा था की ध्यान आया आपसे पूछ लू वो कबूतर कैसा है? ज़िंदा रहने लायक तोह नहीं है मां लेकिन आप अपने हाहतो पर और खून मत लगाना."
"अरे बीटा, तुम जान हो संजय चौधरी की.. दिल्ली शहर तोह क्या यहाँ की तिहाड़ जेल में भी कोई माई का लाल मेरे भांजे की आँख में खटका तोह उसका जीवन अटका देंगे. पहले तोह साला होश में हे न आ रहा था. फिर कलाई हे काट दी कमीने की तोह झट्ट उठ कर हल्ला मचने लगा. वो गोदाम के ऊपर एक कमरे से नंगी तस्वीरें, 6 वीडियो कसेट्टी और साढ़े 3 लाख बरामद करवाने के बाद इसकी लुल्ली और जुबान काट दी है हमने जिसकी पट्टी तोह करवा दी लेकिन साला गहरी बेहोशी में चला गया. पहचान के दसप है एक अपने जिन्होंने इसको hatya-dakaiti के जुर्म में 3 और हत्यारो के साथ लपेट लिया है उतना पैसा देने पर. बाकी जेल में अपने लड़को को ये बढ़िया जुगाड़ मिल गया है, उनकी आने वाली सर्दियाँ बढ़िया काटेंगी. वैसे उस छम्कछल्लो का क्या सोचा है अर्जुन बीटा जो इस लांदु से मिलने बगीचे में आयी थी? पेल तोह नहीं दिए?", ये व्यक्ति था सुशीला का धरम भाई और अर्जुन का वो हुकुम का इक्का जिसकी काट तोह स्वयं रामेश्वर जी के पास नहीं थी. संजय का दिल इतना गहरा जुड़ चूका था अर्जुन से की उसके लिए बस अर्जुन हे सर्वोपरि था अब. सुशीला का घर वापिस बसने के साथ बबिता को प्यार देने वाले इस अपने मुँहबोले भांजे के लिए संजय कुछ भी कर सकता था और उसकी जड़े कितनी गहरी थी इसकी प्रशंशा स्वयं रामेश्वर जी करते थे. इंसान बुरा नहीं था लेकिन बुरे के साथ बहोत ज्यादा बुरा था. अब उसकी बात सुन्न कर अर्जुन झेंपते हुए हंसने लगा और वही सोनाली की पंतय पसीने में आगे पीछे से गीली हो गयी इतना विवरण सुन्न कर.
"नाड़े का इतना कच्चा भी नहीं हु मां और अर्जुन प्यार करना जानता है, बदला तोह जिस दिन लेने पर आया फिर पोस्टमॉर्टम की जगह डीएनए ढूंढ़ना पड़ेगा मरने वाले का. वैसे तोह मैंने फिलहाल समझा दिया है उस छमकछल्लो को लेकिन कुछ दिन नजर बनाये रखना चोपड़ा निवास पर. सबूत आपके भी पास है और मेरे भी. मेरी बहिन के चेहरे से मुस्कान हटी तोह दुर्घटना घाटी. रखता हु मां जी, कल क्सक्सक्सक्स मिलते है शाम को 8 बजे.", अर्जुन ने भी मां की देखादेखी सोनाली को छम्मकछल्लो बुलाया तोह वो शर्मिंदा सी नजरे नीची किये खामोश हे रही.
"चल बीटा, भगवन भला करे सबका. किसी को ऐसे दिन क्यों दिखाए की परिवार बिखरे. इंसान का जीवन वैसे हे सरल नहीं और उल्टा ये लालच, लोभ और वासना क्या क्या करवा देती. कल बखत से मिलते है और तेरा बताया सारा सामान लेता आऊंगा. जय बजरंगबली."
"ाचा मां. शुभरात्रि. आप भी आराम करना और मैं भी सोने चला.", अर्जुन ने फ़ोन काटने के बाद सोनाली के सामने हे कैमरा की साड़ी तस्वीरें मिटा दी और वो तस्वीर भी फाड़ कर उसकी हथेली पर रखते हुए कहा.
"गलत काम के बदले गलत करना भी सही नहीं. आप तोह एक औरत, एक पत्नी और एक माँ है सोनाली जी. जिस्म की आग तोह आपसे कही ज्यादा मेरे अंदर है लेकिन उसको बुझाने के लिए मैं लोगो की ज़िन्दगी से खेलना शुरू कर दू? आप जितनी खूबसूरत है, दिल को उसका आधा हे बाण ले तोह ये घर स्वर्ग से काम न होगा. पति समय नहीं देता क्योंकि वो आपको और परिवार को खुशियां देने के लिए jee-todd म्हणत करता है. कभी अपनी अकड़ को काम करने के साथ उनसे पैसो की जगह समय मांगेंगी तोह यक़ीनन वो वैसा करेंगे. बेटे को अपने मजे के लिए बुआ के घर भेजने की जगह खुद भी 2-3 दिन अपनी ननद के पास घूम आओ तोह आपकी सास को भी ाचा लगेगा और ननद भी खुश होगी. ये छोटी छोटी सी बातें हे रिश्ते और परिवार मजबूत करती है. एक आपका वो दूर का मां है जिसने आपको हे नहीं बक्शा और एक ये मेरे मां है जो मेरे बस एक बार कहने मात्रा से उस आदमी को मौत के मुँह तक ले गए. वो आपको भी वही मार देते लेकिन बजरंगबली के भगत है इसलिए छोड़ दिया. आज रात नींद आने में तकलीफ हो तोह दवा ले लीजियेगा लेकिन सोना जरूर जिस से सुबह एक नया सूरज देख सको. जयेश जी को जो ठीक लगता है करने दीजिये और वो आपका निजी मामला है आपसी सहमति से, पर किसी मासूम के जीवन से खिलवाड़ आइंदा मत कीजियेगा. पालक तोह बचपन से हे इतनी मासूम है की वो किसी को भी दुःख दर्द में देख कर खुद दुखी हो जाती है. उसके विश्वास को बरकरार रखना क्योंकि वो आपको दीदी कहती है, शुभरात्रि.", अर्जुन खली कैमरा और फ़ोन उठा कर उस दरवाजे की चिटकनी इस तरफ से खोल कर वापिस बंद करता हुआ पालक के कमरे में दाखिल हुआ, जो लाइट जलाये बिस्टेर पर करवट के बल लेती कुछ लिखने में मगन थी.
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उस एक कमरे और हॉल वाले घर में बहार जितनी ख़ामोशी थी, भीतर उतनी हे गर्मजोशी से बातचीत का दौर चल रहा था. मुस्कान ने उसी कमरे में डबल बीएड के बराबर हे हॉल वाला दीवान खिसका कर जमा लिया था जिस पर वो अपनी माँ और बड़ी बहिन की तरफ करवट लिए लेती ुकि बातिने सुन्न रही थी. कपडे बदलने के बाद अपनी दोनों बेटियों को दूध गरम करके पिलाने के बाद बिंदिया अभी कुछ समय पहले हे नाहा कर सिर्फ एक सफ़ेद गाउन पहने बीएड की पुष्ट से तक लगाए शबनम की बातों पर कभी हंसती तोह कभी उसको मीठी झिड़क लगाने लगती.
"अब आपने खुद हे देखा फिर कैसे इंकार कर सकती है की मुस्की (मुस्कान) अर्जुन को पसंद नहीं करती? हाँ ये मान लेती हु की इनकी गहरी दोस्ती है पर ये तोह ऐसे मन कर रही थी जैसे अर्जुन से इसका कोई वास्ता हे नहीं. वैसे उसकी बगल में मैडम ने मुझे बैठने तक न दिया और वो भी बस आप दोनों को हे देखे जा रहा था. हहहहह.", मुस्कान ने अपने मुँह का आधा भाग चादर से हे धाप लिया ये सुन्न कर जबकि बिंदिया ने भी बेटियों के बीच बरसो बाद मीठी बातचीत में शामिल रहने का मजा जाने न दिया.
"गहरी दोस्ती है तोह इसके हे साथ बैठेगा. मुझसे तोह वो सही से पहली बार तोह मिला था और तुम्हे भी कितना जानता है? वैसे जितना तस्वीर में देखा उस लिहाज तोह कही ज्यादा हैंडसम है वो. जमीर इजाजत भी नहीं देता और वो रिश्ता मुमकिन भी नहीं जो एक नजर में हे मैं मुस्कान के लिए सोच चुकी थी. ाचे लगते है न दोनों एकसाथ? तुम्हारे पापा गर इन्हे साथ देख ले तोह यक़ीनन वो अर्जुन को मांग लेते. मुझे सबसे ज्यादा तोह इस बात की ख़ुशी है की लड़का हर छोटी से छोटी बात का ख़याल रखता है. सो गयी क्या मुस्कान?", बिंदिया ने अपनी बेटी को आवाज दी तोह मुस्कान ने चादर हटा कर ना में सर हिलाया और चेहरे पर वही खूबसूरत हंसी देख शबनम ने भी उसका गाल खींचते हुए बोलै.
"आज इसको नींद नहीं आनेवाली माँ क्योंकि अर्जुन आपके और मेरे लिए हे गिफ्ट लाया और जिसने उसको बुआलया, उसके लिए कुछ नहीं लाया. वैसे आपने उसका गिफ्ट खोल कर देखा भी या बैग में बंद करके रख दिया आपने? मेरे लिए तोह वो wrist-watch लाया है जो सचमुच ख़ास है. सही कहा आपने की वो ख़याल तोह हर छोटी से छोटी बात का रखता है बस मेरी लाड़ली गुड़िया के लिए कुछ नहीं लाया.", शबनम चिढ़ा रही थी पर मुस्कान वैसे हे तकिये पर सर टिकाये उन दोनों को देखती रही.
"मेरे लिए वो बंधेज वाली साड़ी ले कर आया, साथ में बाकी सबकुछ भी तैयार किया हुआ हे है. डोरी वाला ब्लाउज, साया और पायल के साथ एक दर्जन कांच की चूडिया, काजल तक था उस पैकेट में. ऐसा अक्सर बहु को सास देती है इस देश में लेकिन मुझे पसंद आया उसका गिफ्ट. वैसे दुःख तोह हुआ की मेरी छोटी गुड़िया के लिए वो कुछ नहीं लाया लेकिन उसके कहने पर आया, साथ डिनर किया और और कमरे के बहार तक छोड़ के भी गया. चलो कल मैं खुद अपनी गुड़िया को शॉपिंग करवा दूंगी.", बिंदिया को इतने बरस लगे थे अपनी बेटियों के बीच एक माँ और सहेली बन ने में और अपनी माँ के ऐसे बदलाव देख मुस्कान की आँखें हलकी सी नम्म हो उठी जिन्हे देख बिंदिया तुरंत उसके करीब आती गाल सहलाने लगी.
"तुम्हे अचानक क्या हुआ गुड़िया? किसी बात से दुखी हो या तुम्हे ..", अपनी माँ के सीने लगते हुए मुस्कान ने उनकी बात को बीच में हे काट दिया.
"एक कमरे में हम तीनो है अम्मी.. आप पहली बार हमारे साथ है इतने करीब और इस से ज्यादा ख़ुशी का दिन मेरे लिए कोई नहीं. यही वादा किया था मुझसे अर्जुन ने जब पहली बार मैं उसके साथ थी.. वो मेरे साथ खुले आसमा के निचे उतनी सुबह बैठा यही कह रहा था की एक दिन जरूर ऐसा होगा की दीदी मेरा हाथ पकडे होंगी और मेरी अम्मी मेरा सर अपनी गॉड में लिए प्यार लुटायेंगी, वो प्यार जो 20 साल में मुझे उतना नहीं मिला जितना हक़ था मेरा. आप और दीदी कह रही थी की वो मेरे लिए कोई गिफ्ट नहीं लाया.. देखो आप हे जरा इस पल को.. खुदा से मांगी कोई दुआ क़बूल न हुई.. हरीफ़ जिन्हे समझा, वो खुदा से बढ़ कर निकले.", मुस्कान ने अंत में जो पंक्तिया कहने के बाद अपनी माँ के गाल को चूमा तोह बिंदिया की भी आँखों में आंसू उभर आये.. दोनों में इन आंसुओ के साथ कुछ और भी सामान बात थी तोह वो उनकी मुस्कराहट, एक अनमोल मुस्कराहट जो आत्मा से निकली थी. शबनम भी मुस्कान का हाथ अपने दोनों हाथ में लिए उस को गर्व से देखने लगी.
"एहसानमंद हो गए फिर तोह हम आपके hareef-e-khaas के. माफ़ करना मुस्कान, ज़िन्दगी में जो उतार चढ़ाव देखने मिले, अपना आशियाँ उजड़ता अपनी नजरो से देखा और उस से पहले माँ की दुर्दशा ने मुझमे से साड़ी इंसानियत और प्यार महसूस करने वाला दिल छीन हे लिया. सच कहा की जिसको दुश्मन समझ कर हमेशा बदले की भावना राखी, उसने मेरा दामन फिर से paak-saaf करके खुशियों से वापिस भर दिया. तुमसे जटिल बातें करता है वो लेकिन जब समझ आती है तब ढेरो खुशियां देहलीज पर कड़ी मिलती है. इस से बड़ा उपहार तोह हो हे क्या सकता है मेरे लिए की मैं अपनी कोख से हे पैदा हुई बेटी से अब जा कर ru-ba-ru हुई लेकिन तुमने भी बदले में सिर्फ प्यार और सम्मान हे दिया."
"उसने हे सिखाया है अम्मी की दुश्मनी से तोह चाहे दुनिया हे ख़तम कर लो, उसमे सिर्फ अकेलापन और दर्द हे मिलेगा. प्यार.. प्यार बर्बाद दुनिया को भी फिर से बसा सकता है. वैसे हम जरा शब्बो दीदी को ये तोहफा दिखा दे जो उनके साथ साथ आपको भी नजर न हुआ. प्लैटिनम और गोल्ड के बीच रूबी है. जब उसको वापिस निचे ड्राप करने गयी थी तब उसने हे मुझे पहनाया और साथ हे कहा की एक प्रिंसेस का गाला सूना नहीं होना चाहिए. एंड फॉर योर काइंड इनफार्मेशन एलडी, तहत फ्लोरल ड्रेस वास् हिज फर्स्ट प्रेजेंट. गिफ्ट देने में कभी कंजूसी नहीं करता वो, ात लीस्ट मेरे लिए तोह नहीं. अब देख लो अम्मी दीदी को गुस्सा आ रहा है?", मुस्कान अपनी माँ के गले लगे हुए हे शबनम को चिढ़ाने लगी जो अगले हे पल ठहाका मारती हंस दी.
"कहा था न माँ की ये खुदसे हे कबूल कर लेगी की ये अर्जुन से प्यार करती है और वो इसकी हर बात मानता है? मुझे तोह तबसे पता है जब तू उसके लिए मेरे हे खिलाफ हो गयी थी. हाँ तुमने ठीक किया था जो मेरा साथ नहीं दिया. वैसे अब तुमने अम्मी की मुसीबत बढ़ा दी है ये बात कबूल करके.", सचमुच बिंदिया बड़ी गंभीरता से उस लाल हीरे से चमकते नाग को हाथ में ले कर बड़े गौर से देख रही थी जो के खूबसूरत दो रंगी चैन के बीच लॉकेट में ज्यादा मुस्कान के गले में था.
"नहीं.. ऐसे इंसान से प्यार के सिवा कुछ और मुमकिन भी नहीं शबनम. मैं न तोह परेशान हु और न मुझे चिंता है जब मेरी बेटी इतनी समझदार है. ये नाग उसने तुम्हे हे क्यों दिया ये तुम नहीं जानती मुस्कान लेकिन मैं इसको पहचानती हु. ये एक खंजर में था जो शायद महल के किसी ख़ास सदस्य का था लेकिन माँ की संदूक में. वो खंजर माँ के पास था क्योंकि माँ राजकुमारी थी और ये बात सबसे पहले अर्जुन ने हे पता लगाईं. माँ के बाद इस पर मेरा हक़ बनता था और मेरे बाद शबनम का लेकिन उसने ये तुम्हे दिया क्योंकि .. तुम मेरी माँ के हे जैसी हो, saaf-dil और इंसानियत से भरी एक अंतर्मुखी इंसान. मुझे ख़ुशी है की अर्जुन ने ये तुम्हे सौंपा. वैसे दोस्ती से ज्यादा .. मतलब अब मैं तुम्हारी इंग्लैंड वाली माँ की तरह पूछ रही हु. बता सकती हो.. इस बेशरम के तोह 18 की उम्र से हे बॉयफ्रैंड्स रहे है.", बिंदिया अपनी इस प्यारी बिटिया को साथ लिए फिर से बिस्टेर पर आ लेती और अब उसके दोनों तरफ शबनम और मुस्कान लिपटी हुई थी, दीवान खाली.
"मुझे बॉयफ्रैंड्स वाला सिस्टम हे नहीं पसंद अम्मी. एक बार में डायरेक्ट निकाह लेकिन उसके लिए अभी बहोत समय पड़ा है. इन्होने तोह कह दिया की कभी शादी या निकाह कुछ नहीं करने वाली. मैं तोह करुँगी लेकिन 3-4 साल अपने अम्मी अब्बू के सर रहने के बाद. साथ चलेंगे ओपेरा देखने, कंट्रीसाइड दावत, थोड़ा पियानो सेशंस और आप दोनों के साथ दुनिया घूमने. इन्हे रहने देंगे यही दिल्ली में, पढ़ने का शौक पूरा करके राइटर बनेंगी मोहतरमा.", मुस्कान की ख्वाहिशे सुन्न कर बिंदिया भी खुश हुई की बेटी समय अब अपने माता पिता के साथ हे बिताना चाहती है कॉलेज के बाद. लेकिन अर्जुन वाली बात को वो बखूबी ताल गयी थी.
"इसको सिस्टम पसंद नहीं और मैं अब कोई बॉयफ्रेंड बनाने नहीं वाली. ाचा माँ, कल हे हम आपकी मौसी के वह जाने वाले है क्या?", शबनम ने कमरे के लाइट बंद करने के बाद वापिस अपनी माँ से चिपकते हुए पुछा जो मुस्कान के सर को अपनी ब्याह पर टिकाये सर सेहला रही थी.
"देखते है लेकिन कल का अभी कुछ कहना मुश्किल है. हाँ परसो जरूर हम वह होंगे और फिर उनके पास 2 दिन रहने के बाद तीनो वापिस अपने घर. चल अब सो जा तू भी, ये गुड़िया भी सो चुकी है.", बिंदिया अकेली विचारो की दुनिया में जाना चाहती थी. आज अर्जुन से मिलने के बाद उसके अंतर्मनन में भी ढेरो सवाल और ख़याल बने थे जिनके जवाब भी वही दे सकता था लेकिन अब मुलाकात भी किस्मत पर निर्भर थी.
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एक तरफ आज पंडित जी के न होने से उनका घर भी कुछ ज्यादा हे खामोश था तोह उनसे कही दूर घर की मंझली बहु (रेखा) भी सारा दिन अपनी बेटी, भतीजियों और माँ के साथ हंसी ख़ुशी बिताने के बाद अपने कमरे में सुकून से सोने जा चुकी थी. बहोत कुछ घटित हुआ था उधर लेकिन अब सुकून था. तीसरी तरफ राजकुमार जी और नरिंदर ने मिल कर सब काम देख भल लिए थे अपने मित्र विष्णु के 2 दिन बाद होने वाले विवाह के. थकान से चूर राजकुमार जी तोह चैन से सोने चले गए पर नरिंदर खुली छत पर बैठे अपने जीवन का सार याद करते हुए अलग हे दुनिया में था. हरेक इंसान की स्थिति, परिस्थिति और chahat-khayaal भिन्न थे पर इस रात कुछ सुकून में थे और कुछ खयालो में. तारो से भरा गहरा आसमान फीका पड़ने लगा पृथ्वी के निर्धारित गति से और रात कब भोर के पहले पहर में बदल कर बस नाम की रजनी रह गयी.
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"उन्हहहह्म्मं.. सोने दो न bhabhi..umm..", निर्धारित समय अर्जुन की आँखें खुली तोह उसके हिलने मात्रा से ये आवाज सुनाई पड़ी जो उसकी एक ब्याह पर सर टिकाये और एक पाँव उसके ऊपर चढ़ा कर चिपकी सोई पालक की थी. रात दोनों के बीच तकिये की कमजोर सी दिवार कब बिस्टेर से निचे गिरी ये अर्जुन को हे खबर न लगी. दिन भर की bhaag-daud और फिर कुछ समय से नींद की कमी के चलते वो भी गहरा हे सोया था. पालक जैसे अपने घर पे भाभी प्रिय के साथ हे सोने लगी थी कपिल की व्यस्त जीवनशैली और रात में घर न आने की वजह से. यहाँ उसकी भाभी की जगह ये मजबूत युवक था जो अब न हिल सकता था और न पालक को हिला सकता था. नजर घुमा कर मेज पर राखी अलार्म घरी के रेडियम अंक देखे तोह साढ़े 4 हे हुए थे अभी. पालक सिकुड़ती हुई कब उस से चिपक गयी वो यही सोच रहा था की इतने में हे उसका चेहरा अर्जुन के गले और गाल से आ लगा. वो गाउन जो रात में उसके खूबसूरत जिस्म को पूरे ढके थे, अब घुटनो से ऊपर चढ़ा इन दोनों के बदन के बीच फंसा था. अब ये स्थिति कुछ ज्यादा हे नाजुक लगने लगी तोह अर्जुन ने एहतियात से पालक को एक तरफ लुढ़काया और उठने हे लगा था की उसकी बैनियाँ की पट्टी में फंसे पालक के मंगलसूत्र के खींचते हे वो हड़बड़ाती सी उठ बैठी.
"आप नींद में मुझे प्रिय भाभी समझ रही थी. आप सो जाइये, सिर्फ साढ़े 4 हे हुए है अभी. मैं तब तक..", अर्जुन आगे कुछ कहता उस से पहले हे पालक उसके गले लगती वापिस लेट गयी. इस बार न वो गहरी नींद में थी और न ये अनजाने में हुआ. अर्जुन के बाएं तरफ लिपटी वो उसके सीने के दाए हिस्से पर हाथ रखती फिर से मजबूत को तकिया बनाये हुए थी.
"तुम्हे तब तक वैसे हे सोना है जैसे सोये हुए थे, बस थोड़ी देर.. मेरे लिए..", अब यहाँ अर्जुन ने तोह कही दौड़ लगाने या कसरत के लिए जाना नहीं था और जितने प्यार एवं अधिकार से पालक ने कहा, वो कुछ न कहते हुए आराम से आँखें बंद किये वापिस लेट गया. बेशक एक समय था जब वो पालक की बगल में कभी कभार सो जाता था, पर वो बचपन था और पालक महज एक किशोरी. लेकिन आज भी जैसे कुछ ख़ास नहीं बदला था सिवाए इस बात के की अब अर्जुन के करीब पालक थी और बचपन में अर्जुन दुबका सोता था उसकी बगल में. नींद का दूसरा दौर कुछ ज्यादा हे असरदार रहा अर्जुन के लिए. अब आँख खुली तोह परदे के दूसरी तरफ से छान कर आती रौशनी में पूरा कमरा हे रोशन था. दरवाजा खुलने पर बाथरूम से भीगे बालों में टोलिया लपेटे निकली पालक पर हे आँखें स्थिर रह गयी. गहरे रंग का ब्लाउज बगल और सीने के सामने से कुछ ज्यादा हे गहरा था और समतल गोर पेट पर चार आने जितनी नाभि से भी निचे बंधा ब्लाउज के हे रंग का साया पहने मासूमियत और कामुकता का एक अध्भुत्त मिश्रण. बिस्टेर पर पड़ी मेहरून साड़ी को उठाने के लिए वो झुकी और अपनी तरफ टकटकी लगाए देखती उन आँखों से आँखें मिलते हे वो एक प्यारी मुस्कान देती बोल उठी.
"गुड मॉर्निंग.. नींद पूरी हो गयी न?", पालक का ऐसा पूछना और कोई झिझक न देख कर अर्जुन ने तकिया बाहों में भरते हुए हाँ कहा. वो उसको हे देखता रहा जैसे उन दोनों के बीच ये सब बरसो से चलता रहा जबकि सच ये था की आज सिर्फ पहली बार हे वो एक दूसरे के सामने थे.
"मुझे अकेले में नींद नहीं आती और हर वक़्त अजीब सा डर लगता रहता है जैसे इस कमरे के बहार से हे हर वक़्त कोई मुझे देख रहा हो. रात जरा सा भी बुरा ख़याल नहीं आया और मैं अपने समय से एक घंटा देरी से उठी हु.", अर्जुन ये सुन्न कर घरी को देखने लगा जहा 7:30 बज चुके थे. वही पालक को साड़ी पहन ने से पहले हे उसकी चुन्नट बनाते पाया तोह उठ कर बिस्टेर के उस किनारे हे आ बैठा. पालक कुछ हैरानी से उसको देखने लगी जो उस खूबसूरत परिधान को उसके हाथो से ले कर पहले नाभि के करीब एक सीरा खोंसने लगा और फिर पालक को ब्याह से पकड़ कर गोल गोल 3 बार घुमाने के बाद ठीक पहले वाली जगह खड़ा करके साड़ी की 7 बराबर परत लगाने के बाद दोनों हाथो से उसकी साये के भीतर बिना सिलवट लाये सेट करते हुए मेज पर पड़ी पिन लगाने सावधानी से लगाने लगा.
"मैं तोह अपने टाइम पर हे उठा था पहले लेकिन आपने दोबारा ऐसा सुलाया की देखो पूरे 3 घंटे ज्यादा सो गया. अब कभी आपको न तोह इस कमरे में बुरे ख़याल आएंगे और न हे कोई आप पर कभी नज़र रखने का दुस्साहस करेगा. आप ऐसे हे मेरी टीशर्ट अंदर करती थी न जब निक्कर निचे झूलने लगती थी मेरी? साड़ी पहन न उतना मुश्किल नहीं है, बस वस्त्र ज्यादा लम्बा होने से हम थोड़े असहज हो जाते है. हर मुसीबत को टुकड़ो टुकड़ो में टॉड कर दूर किया जाए तोह बताओ क्या मुमकिन नहीं? हम्म्म.. अब देखो जरा खुदको आईने में? मैं तोह कल हे समझ गया था के आपको साड़ी पहन ने में परेशानी होती है जब आपसे अपना पल्लू हे ठीक न किया गया. सलवार कमीज में भी ाची लगती हो आप और मुझे नहीं लगता के आपके saas-sasur कोई मनाही रखते होंगे.", अर्जुन ने पालक के सीने के सामने से कंधे के पीछे तक ऐसे आँचल दिया जैसे अक्सर उसकी ताई ललिता जी रखती थी. ढीला लेकिन अनुशाषित जो जरुरत के हिसाब से ऐसे हे सर पर लिया जा सके. पालक के बदन का निर्वस्त्र भाग तक छुए बिना उसने ये कर दिखाया और खुद को आईने में देखते हुए पालक ने टोलिया सर से खोला तोह भीगी जुल्फे उलझी लत्तो में बदल कर असंख्य सर्पो से झूलती, बलखाती हुई कंधे, पीठ और चेहरे के दोनों तरफ झूल गयी. सादगी में भी ऐसी कामुकता और ऊपर से खुदको साड़ी पहनाने वाले के सामने हे देखना पालक के लिए अलग हे सुखदायी स्थिति बना गया.
"बड़े पहुंचे हुए हो तुम तोह. जो कल तक निक्कर नहीं पहन सकता था आज वो औरत के परिधान की उनसे ज्यादा समझ रखता है. मुझे 15-20 मिनट लग जाते है सिर्फ इस काम में हे. सलवार सूट की मनाही नहीं है लेकिन फिर शादी वाली फील नहीं आती उसमे, चाहे मेरी थोड़ी अजीब सोच कह लो इसको लेकिन अभी यहाँ कम्फर्टेबले नहीं हुई न ज्यादा. कभी कभी पहन लेती हु जब मम्मी पापा नहीं होते घर. वैसे मैंने सुना था की तुम्हारी चॉइस बहोत ाची है लड़कियों के ड्रेस सिलेक्शन के मामले में. मेरी शादी में भी कोमल, ऋतू ने जो कपडे पहने थे वो सब तुम्हारी हे पसंद के थे? हाँ प्रीती की ड्रेस भी काफी खूबसूरत थी.", अर्जुन ने हलके से मुस्कुराते हुए आईने के पास हे राखी काजल की पेंसिल से पालक की गर्दन और कान के पीछे एक बिंदी लगाने के बाद अपना बैग खोलते हुए जवाब दिया.
"बचपन भी तोह आप सबके हे बीच कटा है. इतनी लड़कियों के बीच रहूँगा तोह क्या उन पर ाचा लगेगा और क्या नहीं, पता चल हे जाता है. वैसे रात बताया नहीं आपने की डायरी में ऐसा क्या लिख रही थी जो मुझे देखने तक नहीं दिया?", अर्जुन बैग से टीशर्ट और जीन्स निकालने के बाद वही अपनी बनियान उतार कर बैग में रखता हुआ बात कर रहा था और यही वो पल था जब भीगे खुले बालो में अप्सरा से कड़ी पालक की नजर इस युवक के जिस्म पर हे ठहर गयी. कोई वासना नहीं बस आकर्षण हे था. लेकिन वही सवाल पूछे जाने पर पालक चलती हुई उसके करीब आयी और बैग से वो बनियान वापिस निकाल ली.
"आदत है डायरी लिखने की. जिस दिन कुछ ाचा लगता है, कुछ ख़ास होता है तोह बस लिख लेती हु. तुम बड़े होने के साथ हे जिम्मेदार और काफी शांत इंसान बन गए हो अर्जुन. रात तुम्हारी क्या बात हुई इतनी देर तक सोनाली दीदी से?", अर्जुन पूछना चाहता था की वो उस बनियान का क्या करने वाली है लेकिन फिर समझ हे गया की मैले कपडे धोने के लिए हे उठाये जाते है.
"ाची आदत है. सोनाली जी से तोह बस इधर उधर की हे बातें कर रहा था. दिल्ली के बारे में, उनके परिवार और यहाँ घर की बातें.. वैसे आपको भी कुछ बताना था जो रात बता न सका. पता नहीं कैसे भूल हो गयी?", अर्जुन बैग से ब्रश निकाल कर वही बिस्टेर के किनारे हे बैठ गया. चेहरे पर कुछ अस्पष्ट से भाव आ गए जैसे वो कुछ बताना चाहता हो लेकिन कैसे कहे यही समझ न पाया.
"बताने की जरुरत है क्या? इतना कुछ न मैंने हे उम्मीद की थी और न सोचा था की तुम इतने काबिल हो. अब ज़िन्दगी बचने वाले का एहसान जरूर है लेकिन दिल कह रहा है की ये एक फ़र्ज़ था, एक रिश्ते को सार्थक करता हुआ प्यार जो मैं सोच भी नहीं सकती थी की मुमकिन हो भी सकता है. पापा का हमेशा हे माँ से ये कहना की अर्जुन अब वो लड़का नहीं रहा, अर्जुन ने पंडित जी के मान कही ज्यादा बढ़ा दिया, अर्जुन एक ऐसा हीरा है जिसकी पहचान हमे हे नहीं हुई... फिर तुम एकाएक आते हो उस दुखी टूटी हुई लड़की के पास जो na-ummeed है, हताश है और कही न कही ये सोच बैठी है की अब जबरदस्ती किसी भी तरफ से होगी तोह वो जान दे देगी पर घरवालों के फैंसले ख़ामोशी से मान कर उन्हें और दुखी नहीं करेगी. लगा की तुम बस एक जरिया हो मेरे पापा और माँ का जो मुझे मेरे ससुराल छोड़ने के बाद लौट जाएगा. बोझ जो हो जाती है लड़की शादी के बाद अगर माँ बाप के पास वापिस लौट आये. तुम्हारी कही हर बात मैं सुन्न कर मैं यही सोचती हुई जवाब देती रही की अब क्या फरक पड़ता है. मैं गलत थी अर्जुन.. मेरी सोच गलत थी.. तुम्हे मैं नजरअंदाज नहीं कर रही थी जब तुम अपना बचपन, मेरा तुम्हारे साथ बीता समय और वो सब बता रहे थे जो मेरे खयालो में दूर दूर तक नहीं था.. माफ़ करना बहोत परेशां थी लेकिन एक सफर पे आराम भी था जब सिर्फ हम दोनों हे थे.", पालक बताती गयी और अर्जुन सुनते हुए अपना ब्रश एक तरफ रख कर उसके दोनों हाथ थामे बस उस भोले चेहरे को देखता रहा जिसमे अब सिर्फ प्यार और कृतज्ञता थी. पालक उसके सामने हे मेज पर बैठ कर उसकी गॉड में अपने और उसके हाथो को जुड़े देख डबडबी आँखों से मुस्कुराई जैसे उसने सब कह कर भी न कहा.
"तुमने उस आदमी को.. पता नहीं कैसे लेकिन तुमने इतनी जल्दी हे उस बुरे इंसान को सिर्फ इसलिए ढून्ढ निकला क्योंकि वो मुझे परेशां कर रहा था. मेरा जीवन खराब करने के साथ मुझे मानसिक क्षति पंहुचा रहा था. तुम हमेशा से ऐसे थे अर्जुन, जिसके साथ रहते उस से लड़ते, प्यार करते और हक़ जताते रहते. किसी को कभी दुखी नहीं देख सकते थे... हाँ बहोत गुस्सा आता था तुम्हे अगर कोई तुम्हारी बात नहीं मानता या सुनता था.. और अब भी तुम्हारी वो उम्र नहीं की तुम जान जोखिम में दाल कर ऐसे काम अंजाम दो लेकिन तुमने मेरे माँ पापा की सोच को सार्थक कर दिखाया. मैंने तुम्हारे कैमरा में वो तस्वीर साफ़ साफ़ देखि थी जिसमे पार्क वाला हे आदमी था, दीदी उसको पैसे दे रही थी, बाद में वो बंधा हुआ था किसी जगह और तुम शायद उसको बुरी तरह मार रहे थे. बाथरूम जाने से पहले तुमने मुझे बताया नहीं लेकिन मेरे सामने वो चलता हुआ कैमरा इसलिए हे छोड़ गए थे न की मैं उसको देख सकू.? तुमने मेरी दी हुई तस्वीर में ये कहा था की 'इस आदमी को'. तब मैं नहीं समझी क्योंकि मैं उलझन में थी की ये सब आखिर क्या था. फिर मैं तुम्हारे सोने के बाद उस दिवार को गिरा कर इसलिए तुम्हारे कंधे पर सर रख लेट गयी क्योंकि तुम हो.. जो मुझसे आज भी उतना हे प्यार करता है जितना भूली बिसरि यादों से याद आया. तुम आज भी सोते हुए उतने हे मासूम लगते हो और जरा सा भी नहीं हिलते.", टुकड़ो टुकड़ो में हाल बयान करने के साथ पालक ने वो सब भी बतला दिया जिसको कहने के लिए अर्जुन शब्द ढूंढ़ने में जूता था. और कोई परवाह किये बिना पालक का उसके गले से लग कर खामोश हो जाना एक गहरा विश्वास था जो वापिस लौटा भी तोह इस कदर की जैसे punar-jiwan मिला हो.
"ाहु ाहु.. भाई बहिन के बीच इमोशनल सन डिस्टर्ब करने के लिए सॉरी. ये तुम्हारी कॉफ़ी और अर्जुन के लिए दूध. मम्मी पापा को चाय दे आयी हु और वो लोग भी आते हे होंगे नाश्ते के लिए. अर्जुन से उन्हें भी मिलना है, आखिर उनकी छोटी बहु का इतना लायक भाई पहली बार तोह घर आया है.", दरवाजा हलके से थपकने के बाद हे सोनाली भीतर आयी थी और उन दोनों के लिए मेज पर चाय कॉफ़ी रखने के बाद बस आँखों से हे उसने अर्जुन को शुक्रिया कहा अपना जीवन लौटने के लिए, क्योंकि इतना दयावान हर शक्श तोह नहीं हो सकता.
"आपने भी मेरे लिए जो किया है दीदी, मैं उसका एहसान नहीं उतार सकती. आप सचमुच मेरी बड़ी बहिन है चाहे रिश्ता जो भी हो इस घर में.", पालक के इस कथन पर सोनाली का चेहरा एक पल के लिए बुझा और अर्जुन ने ना में गर्दन हिला कर कुछ भी बताने से मन कर दिया उसको.
"एहसान तुमने किया है जो मुझ जैसी औरत को बहिन का दर्जा दिया और कभी किसी काम तक के हाथ नहीं लगाने दिया. आज से तुम रसोई में नहीं दिखोगी जबतक की मैं घर पे राहु. शादी को वक़्त हे कितना हुआ है तुम्हारी? आज तोह तुम्हे अपने भाई को दिल्ली घूमना चाहिए, रोज रोज तोह वो नहीं आने वाला न? ऐसा भाई किस्मत से भी नहीं मिलता जो बहिन को अपना सबकुछ मानता हो. और मैंने तोह आजतक तुम्हारे लिए कुछ किया नहीं इसलिए अब करने देना. आधे घंटे में नाश्ते के लिए डाइनिंग रूम में मिलते है.", सोनाली ने जो भी कहा उसमे सिर्फ पालक को यही समझ आया की अर्जुन उस से बस नाम का हे रिश्ता नहीं रखता जो सोनाली तक को पता है. वो जा चुकी थी और पालक फिर से अर्जुन के गले लग कर बचो जैसे बोलने लगी.
"तुम मुझे शॉपिंग लेके जा रहे हो? और कुछ दिन यही रुकोगे मेरे पास?"
"हाँ शॉपिंग तोह जरूर चलेंगे लेकिन कल मुझे जाना होगा. जिस वजह से आप इतनी परेशां थी, वो दूर करने हे तोह आया था जिस से मैं आपको ठीक पहली जैसी पल्ली की तरह देख सकू. माधुरी दीदी मजाक में कहती थी न झल्ली पल्ली.. आप शादी होने के बाद भी बिलकुल वैसी हे हो.. काम से काम आज मेरे साथ तोह वैसी हे हो. अब मैं तैयार होने जाऊ?", अर्जुन ने एक बड़े भाई जैसे पालक की पीठ हलके से थपकते हुए कहा और इसके बाद वो हैरान हे रह गया जब अलग होने से पहले पालक ने एक बार दरवाजे को देखा और फिर उसके होंठो पर होंठ रख कर आँखे मूँद ली. ये चुम्बन भले हे 10-15 सेकंड का था पर ऐसा जैसे पालक ये कब से करना चाहती हो. अर्जुन दुविधा में उसके मासूम चेहरे को देखने लगा तोह इसकी वजह भी पालक ने बताई.
"पहले भी मैंने सिर्फ तुम्हे हे किश की थी अगर तुम्हे याद हो तोह. मैं ऐसे हे प्यार बता सकती हु, काम से काम तुम्हे तोह."
"पहले तोह मातेह और गाल पर हे करती थी आप.", अर्जुन सर झुकाये लड़कियों सा शर्माने लगा क्योंकि कही न कही उसको भी एहसास हुआ था की पालक ने गलत नहीं कहा.
"पल्ली तू मुझे चुम्मी नहीं देगी? मिनी भी तोह मिक्की को देती है.. पालक ने चेहरे से चेहरा लगते हुए जैसे धीमी आवाज में कुछ याद दिलाया तोह बदले में हलके से अर्जुन ने भी उसके होंठो को चूमा और उठ खड़ा हुआ.
"मैं तेरी मम्मी को बोलूंगी तू मुझसे चुम्मी मांगता है. बस एक दूंगी और तू किसी से नहीं कहना?", अर्जुन टोलिया उठा कर बाथरूम में जा घुसा पालक को की नक़ल उतारता जो भीगे चेहरे से भी मुस्कुराये जा रही थी. फिर उठ कर अर्जुन की जीन्स टीशर्ट बीएड पर रखने के बाद वो कमरा ठीक करने लगी. कॉफ़ी पर ध्यान जाते हे खिड़की के करीब कुर्सी रख वो बहार देखती हुई विचारो में खोयी छोटे छोटे घूँट कॉफ़ी के भर्ती जैसे जीवन में haal-filhaal आये बदलाव ध्यान करने लगी. अर्जुन कब बाहर आया और कपडे भी पहन चूका, ये पालक को जैसे दिखाई हे नहीं दिया. दूध का गिलास उठा कर वो पालक के सामने हे दूसरी कुर्सी पर आ बैठा. घुंगराले बाल गीले हो कर चेहरे के सामने और कान के पीछे से गर्दन तक बिखरे थे.
"खुली आँखों से कौनसे सपने देख रही है आप? वो फोटोज संभाले रखना ठीक नहीं है.", अर्जुन की आवाज सुन्न कर पालक का ध्यान गया की उसकी आधी कॉफ़ी कबकी ठंडी हो चुकी है. एक मामूली सी मुस्कराहट देती हुई वो कड़ी हुई और लाकर से वो लिफाफा निकाल कर अर्जुन को पकड़ते हुए कहा.
"जला कर फ्लश कर दो, मैं कप रख के आती हु. फिर मम्मी पापा से भी मिल लेना, नाश्ते के समय.", अर्जुन को हैरत हुई और वो एकटक पालक के शांत चेहरे को देखने लगा क्योंकि इन तस्वीरों में कुछ ऐसी भी थी जिन में पालक पूर्णतया निर्वस्त्र थी. अर्जुन को इस कदर हैरान देख कर अब पालक की मुस्कान कुछ गहरी हो चली.
"यही सोच रहे हो की मैं तुम्हे ये क्यों सौंप रही हु ये जानते हुए भी की इनमे से कुछ ऐसी है जिन्हे मैं भी नहीं देख सकती? इसका जवाब तोह सचमुच मेरे पास भी नहीं है अर्जुन लेकिन मुझे ाचा लगेगा अगर ये तुम खुद करो तोह.", दराज से सिग्रत्ती जलने वाला लाइटर निकाल कर अर्जुन को देते हुए वो उसके पास हे रुक गयी. अर्जुन उन अनकहे लफ्ज़ो को भी सुन्न गया जिनमे पालक ने एक तरह से उसको सर्वोपरि मान लिया था. खिड़की गली की तरफ खुलती थी जिसके दोनों पल्ले खोल कर अर्जुन ने भूरे लिफाफे को बिना खोले हे आग के हवाले कर दिया. छोटी सी आग की लौ chatt-chatt करती हुई आधे लिफाफे तक लम्बी लपटों में बदलने लगी और अर्जुन एक किनारे को थामे hari-neeli और नारंगी लपटों के साथ काले पड़ते उस तस्वीरों के गट्ठर को देखता रहा जो धीरे धीरे फूलने के साथ गली में झाड़ कर गिरने लगा था. पालक के चेहरे पर प्रशंशा के भाव थे और पूरा लिफाफे राख में बदलने के बाद अर्जुन पलटा तोह इस बार पालक ने उसका माथा चूम लिया.
"तुम चाहते तोह देख भी सकते थे लेकिन तुमने एक बार भी खोलने तक की कोशिश नहीं की. दुनिया तुम्हारी जैसी क्यों नहीं है अर्जुन?"
"मैं भी इस दुनिया का हे तोह हिस्सा हु मिस झल्ली जी. उन तस्वीरों से ज्यादा अनमोल और खूबसूरत है ये सुकून और भोला चेहरा जो मुझ पर आज भी विश्वास करता है. चुम्मी करने डौगी?", अब पालक खिलखिला कर हंसने लगी थी क्योंकि अर्जुन ने जो इत्छा जताई उस पल वो ठीक किसी बचे सी नौटंकी कर रहा था.
"तुम्हेर मम्मी से कह दूंगी की ारु चुम्मी मांग रहा था मुझसे. हाहाहा.. उम्माह.. अब बताओ आज का क्या प्लान है?"
"पहले हम कान्नौगत प्लेस चलेंगे, थोड़ा काम और ढेर साडी शॉपिंग करनी है. फिर एक ाची सी जगह लंच और उसके बाद छोटा चेतन देखेंगे. 3 डायमेंशन फिल्म है और अपने शहर तोह देख नहीं पाउँगा. कल बड़ा सा बोर्ड देखा था मैंने जब हम उधर मार्किट रुके थे उस वक़्त. फिर शाम को 7 बजे मुझे कही जरुरी काम से निकलना है और रात को वापिस में देरी हुई तोह होटल में रुकूंगा. हाँ जाने से पहले मिलने आ जाऊंगा आपसे."
"जहा जाना है चले जाना लेकिन रात को वापिस यही आना है. चलो अब पापा जी से भी मिल लो और मुझे लेके जा रहे हो ये बात तुम्ही कहना उनसे. मैं परमिशन नहीं लेने वाली.", पालक की ऐसी बात सुन्न कर अर्जुन ने भी सर पे हाथ रखते हुए जाहिर किया जैसे अब वो हर काम उस से करवाने वाली है. 5 मिनट बाद हे दोनों तैयार हो कर उस साफ़ सुथरे हॉल में थे जहा एक तरफ रसोई और खुले हिस्से में आलिशान बड़ा मेज लगा था 8 कुर्सियों के बीच.
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"ारु पूछ रहा था की दिल्ली से आपके लिए क्या लेना है. मैंने तोह बता दिया की मेरे लिए एक ाचा सा फ्लोरल ड्रेस कनी लेंथ का और अलका ने skin-fit जीन्स के साथ उसकी हे पसंद का टॉप. आरती का हमेशा वाला वही की जो उसको पसंद आये वो ले आये पर 2-3 ाची सी बुक्स जरूर. मैंने वैसे तोह कहा था के माँ को कोई जरुरत तोह नहीं लेकिन कल एक शादी अटेंड करनी है. टाइम से अगर वो अपने घर पहोच जाए तोह संदीप की मम्मी के हाथो भिजवा दे. आंटी तोह 10 बजे तक वह से निकलने का बता रहे थे न?", ऋतू के माथे पर अभी भी खरोच जैसा निशाँ साफ़ जाहिर था एक तरफ. काले रंग की ढीली सी कुर्ती और सफ़ेद सलवार में उसकी ख़ूबसूरती और भी ज्यादा निखार दे रही थी उसके गोर तराशे हुए चेहरे, भूरे लम्बे घूमे हुए रेशमी बालो के साथ. नाश्ता तोह समय से हो हे चूका था सबका और रेखा जी अभी उन कुत्तो को भोजन परोस रही थी उनके बड़े बड़े कटोरो में. आज वो भी सूती सलवार कमीज में हे थी इस खूबूसरत प्रकृति से घिरे आवास में. इनसे कुछ हे दुरी पर अलका और आरती एक बड़े टोकरे में कच्चे आम चुगवा रही थी कुंती से. एक बड़ी सी लाठी के आगे बंधी डराती से अलका बड़े बड़े आम निचे गिरती जो अलका उसको बताती और कुंती उन्हें टोकरे में जमा करती.
"वो वह काम से गया है या ये सब करने के लिए? और तुमने आगे से खुद उसको बता दिया के ये सब लेते आना. कल अगर उसको जल्दी नहीं भी आना होगा न तोह वो 10 से पहले खड़ा होगा संदीप के घर. वैसे सब लोग शादी में होंगे तोह घर पे कौन रहने वाला है?", वही एक तरफ हे सिंचाई के लिए लगे पाइप को चला कर हाथ धोते हुए रेखा जी ने डांटने की जगह ये बात इस लहजे में कही थी की ऋतू को बुरा भी न लगे और अर्जुन तक सन्देश भी जाए की वो काम पर हे ध्यान दे.
"वही रहेगा घर पे क्योंकि आपका लाल जहा ब्रेक लगा देता है उसके बाद उठाये से भी उठने वाला नहीं. और उसका जो भी काम था वो आज रात को हे है. फिलहाल तोह वो पालक दीदी के ससुराल में रुका हुआ जिन्हे मल्होत्रा अंकल ने उसके साथ हे भेज दिया था जब पता लगा की वो काम से दिल्ली जा रहा है. माँ, मैं क्या कह रही थी की ये विष्णु अंकल इन्दर चाचा की आगे के है और अब शादी कर रहे है? मतलब बाउजी और दादी भी उन्हें पुराने जानते है जिस हिसाब से पूरी शादी और रस्मे खुद दादी और बौ जी हे करने वाले है माता पिता की.", ऋतू वही घास पर हे चौकड़ी लगाती हुई बैठ गयी जिसकी बगल में सबसे शरारती झबरैला कुत्ता पसर कर बालो में हाथ फिरवाने लगा. वो हँसते हुए उसकी नौटंकी देखने लगी जिस तरह वो हाथ रुकने पर मुँह रगड़ कर जारी रखने का निर्देश देता था.
"मैंने तोह यही सुना है की जब तेरे चाचा कॉलेज थे तोह विष्णु भाई साहब के संरक्षक तुम्हारे रघुवीर दादा जी हे थे. तुम्हारे बौ जी भी उतना हे प्यार रखते है उनके साथ और ये विष्णु जी की हे मर्जी थी की वो शादी नहीं करना चाहते थे उस समय. अब जिस से हो रही है वो भी कृषि पृष्ठभूमि से है और तुम्हारे विष्णु चाचा ने भी सरोज के बगल वाली जमीन पर खेत और घर तैयार किया है. हाँ अर्जुन को घर हे रुकना पड़ेगा लेकिन अकेले तोह माँ जी घर नहीं रहने देंगी क्योंकि वो लोग तोह अभी दोपहर में निकलने हे वाले है. वैसे रोमिला वही रहेगी रेणुका के पास और प्रीती भी होगी तोह समस्या नहीं होने वाली. बाकी शाम तक तोह हम लोग भी घर हे होंगे. मैं ये सोच रही थी की ड्राइवर का कैसे करना है?", अब माँ की जगह जैसे वही ऋतू की सखी सामें थी और ऋतू इस पर विचार करने लगी. उसकी माँ सबके सामने नहीं आना चाहती थी इस अवतार में और जाना भी सीधा वह गाँव में था जहा शादी होने वाली थी.
"बड़ी माँ.. आप यहाँ से गाँव तक गाडी ले चलिएगा और आगे न हम मेरे पापा को बुला लेंगे. या फिर आप सेहर हे चल पड़ना, माधुरी दीदी की तरफ से किसी ड्राइवर का इंतजाम करवा लेंगे और ललिता ताई जी को भी उधर से हे ले लेंगे न साथ. क्या कहती हो डॉक्टर चश्मिश.?", एक अधपकी ाम्बी मुँह से काट कर उसका पीला खट्टा गूदा मजे से खाती हुई आरती भी धम्म से पसर गयी ऋतू की गॉड में सर रखती हुई. अलका अपने हाथ में पकड़ा हुआ छोटा टोलिया अपनी चची को पकड़ा कर इनकी चर्चा में शामिल हो गयी. कांटा टोकरी भर कच्चे आम ले कर सुनंदा जी के पास चली गयी थी, शायद अचार के लिए ये लोग हरे आम साथ ले जाने वाले थे.
"हाँ इसने करि चची सही बात. कभी कभी दिमाग चलता है हमारी मोटो का. दीदी के घर से तोह कोई जाने वाला है नहीं और माँ से आप अभी बात कर लो कही दादी उन्हें न साथ लेती जाए हमसे पहले. अभी 12 बजे है और बाउजी दिल्ली से निकले थे 9 बजे तोह एक घंटे बाद वो घर होंगे. उसके एक घंटे बाद सभी लोग निकल लेंगे वह से क्योंकि 4 कार जा रही है. पहले तोह तारा, रुपाली और चची रुकने वाली थी लेकिन दादी ने कहा की हम तीनो जब यहाँ से शादी में शामिल होने वाली है तोह बाकी सबने कोई पाप किया है? घर पे हमेशा की तरह मुनीर अंकल रखवाली के लिए रहेंगे रात को और कल तोह अर्जुन पहुंच हे जाएगा. वैसे जल्दी ख़तम नहीं हो गया ये ट्रिप?", अलका के साथ सबको हे जगह कही ज्यादा पसंद आयी थी. दुनिया से दूर, हरा भरा खुला बाग़ जिसके साथ हे झील और आगे घने जंगल के बीच पहाड़ी नदी. महल जैसे आलिशान और आरामदायक कक्ष.. क्या नहीं था यहाँ और सबसे ख़ास था आपस में समय बिताना.
"फिर आ जायेंगे जब ब्रेक मिलेगा. क्यों माँ, आ सकते है न हम यहाँ दोबारा कुछ समय रहने?", ऋतू ने बात तोह यहाँ अर्जुन के बारे करनी थी लेकिन फिलहाल ये मुमकिन न था. आरती आँखें मूंदे खुदसे हे हाँ कहने लगी उसके सवाल पर
"जब सर्दियाँ अपने चरम पर होती है तब यहाँ का नजारा बहोत अलग हे होता है. गर्मियां देख ली है तोह एक बार सर्दियों में भी ट्रिप प्लान करना चाहिए. लेकिन तब बस तुम लोग हे आना, मेरा मुश्किल है. और यहाँ आने के लिए तुम्हे सिर्फ समय निकलना है, परमिशन ले कर ये मत जाहिर करो की मैं इधर की एकलौती मालकिन हु. आजतक इसके कागज़ माँ के हे नाम है जिसमे मैं वारिस भर हु और मेरे नाम ये होने भी नहीं वाली. हाँ ऋतू या कोमल में से किसी एक के हो सकती है. चलो तुम लोग आराम से समय बिताओ यहाँ, मैं कांटा से थोड़ा काम करवा लेती हु. फिर सामान भी पैक करना है क्योंकि सुबह थोड़ा जल्दी निकलना हे ठीक रहेगा.", रेखा जी भी ऋतू से अकेले में हे बातचीत करने का इरादा लिए थी लेकिन वही हालत थी की समय उचित नहीं था. अब यहाँ ये तीन थी और चर्चा भी अर्जुन की हे होने वाली थी.
"तुम्हे क्या लगता है जो दादी ने बताया वो सच है या जैसा ारु दिखाना चाहता है वो?", अलका के इस सवाल पर ऋतू ने हामी भरी और जवाब आज के दिन की सबसे होशियार आरती ने दिया.
"दोनों हे सच नहीं बता रहे जितना मुझे लगा. देखो अर्जुन का दिल्ली जाना हो सकता है काम की वजह से हो लेकिन पालक दीदी जब इतने समय से अपने घर थी और ारु घर पे जितना रुका तोह उस हिसाब से दादी का ये कहना की वो दिल्ली जा रहा था इसलिए पालक को भी लेता गया तोह बात हजम नहीं होती. ारु ने बोलै की उसका काम रात का है और वो ख़तम करने के बाद वो पालक दीदी के यहाँ रात गुजार कर सुबह जल्दी घर के लिए निकल लेगा. दिल्ली में सिर्फ उनके हे घर वो 2 रात? ारु इस मामले में बहोत स्वाभिमानी है और अब उसके पास जब उमेद चाचा जी की गाडी है और मोबाइल फ़ोन भी तोह एक पंथ 3 काज वाला मामला है. पालक दीदी की एक अलग कहानी है, उमेद चाचा भी अलग हे सन में है अर्जुन के साथ और इन सबके बीच दादा जी वह गए वो भी बिंदु आंटी और उनकी दोनों बेटियों के साथ. जबकि उस बड़ी गाडी में ये लोग ारु के साथ आराम से आ सकते थे लेकिन अलग अलग गए. और ऋतू से ारु ने कहा की वो रात डिनर के लिए बिंदु आंटी के पास गया था जबकि दादा जी उधर नहीं थे. अब बताओ मेरी थ्योरी कितनी सही है और कितनी गलत?", आरती के इतने भरपूर विवरण से जहा ालक भौचक्की रह गयी वही ऋतू जोर जोर से हंसने लगी. उसकी ये उन्मुक्त हंसी देख निचे लेती आरती ने हे उसका एक गाल खिंच कर अपनी उँगलियाँ होंठो से लगा ली.
"आज लगता है इसने तेरा झूठा खा लिया अलका. दिमाग चलने लगा है इस मोटो का भी लेकिन बिंदु आंटी वाला मामला बस औपचारिकता है मेरे हिसाब से. मुस्कान ाची लड़की है और अर्जुन की उसके साथ जमती भी बहोत है. डिनर पर बुलाया गया क्योंकि बौ जी को कही जाना था और गाडी उनके साथ गयी. ारु इस बहाने मुस्कान के बुलाने पर बाकी दोनों से भी मिल लिया पर यहाँ सबसे ख़ास बात है ये पालक दीदी वाला मामला. वो मेहँदी वाले दिन भी खामोश थी जबकि प्रिय भाभी को इंटरेस्ट था अर्जुन के बारे में जान ने का. जहा तक मुझे याद है तोह ारु बचपन में अपने घर के सिवा कही जाता था तोह सामने अरोरा अंकल के घर डिम्पी के साथ खेलने या फिर पालक दीदी के यहाँ क्योंकि संजीव भैया का भी उधर हे ज्यादा जाना होता था जिनकी कपिल भैया से जमती थी और ारु फ्रूटी दिप्सी के चस्के के साथ हे पल्ली पल्ली कहता पालक दीदी के भी चिपका रहता था. पालक दीदी की कोई बड़ी समस्या है और मल्होत्रा अंकल के सबसे करीब है अपने दादा जी. प्रीती ने रात बताया था की शाम को मल्होत्रा अंकल बाउजी के साथ अँधेरा होने पर भी पार्क में बैठे थे. परसो शाम को भी वैसा हे सन था तोह मतलब साफ़ है की ये बात इतनी ख़ास है जिसमे खुद बाउजी भी शामिल नहीं हो सकते.. मतलब लड़की वाला मामला और ारु नहीं बता रहा क्योंकि वो दीदी की परवाह करता है. मुझे तोह लगता है अब भी करता है चाहे इनकी बातचीत नहीं होते देखि मैंने जबसे ये घर वापिस लौटा. पर आज रात को.. कुछ ऐसा है जिसके बारे में उसने मुझे भी कोई हिंट नहीं दी. मतलब बौ जी को भी नहीं पता और ये मामला जरूर रिस्की है.", अब ऋतू की हंसी हे गायब हो गयी क्योंकि अर्जुन उस से बात गोल कर गया था. और उसको चिंता में देख आरती वापिस मंदबुद्धि अवतार में जा पहुंची.
"कही वो पालक दीदी को तोह ख़ुशी नहीं देने जा रहा?"
"ओह तू अब चुप कर. एक दिन में तू ब्योमकेश बक्शी नहीं बन्न ने वाली मोटो.. पालक दीदी के साथ ऐसा वैसा अगर हो भी गया तोह वो समस्या तोह नहीं कहलायेगा? वो क्या बोल रही थी की उनके हस्बैंड महीने भर के लिए बहार है. परिवार तोह वही होगा न और शादी को तोह उतना टाइम भी नहीं हुआ जिसमे वो 2 बार घर आ चुकी. इस बार लगभग 2 हफ्ते रही है, लेकिन घर से उतना बहार भी नहीं निकली नहीं तोह वो कोमल के पास तोह आती न ऋतू?" अलका की बात पर ऋतू ने सर हिलाया.
"बौ जी खुद इसमें नहीं पड़े मतलब बात ऐसी है जो खुलनी नहीं चाहिए. पर ये रात को क्या काण्ड करने वाला है? गाँव से ये घर आने का बता कर नहीं निकला और सुबह ये प्रीती के यहाँ से घर गया था कल. रात को हे क्यों निकला? सिर्फ प्रीती वजह होती तोह वही खुद उसको आने के लिए मन कर देती इतनी रात में. वो वह था पार्टी में उमेद चाचा जी की जगह और ऐसे हे निकल गया? मोबाइल फ़ोन कैसे पंहुचा उसके पास? वो पंहुचा तोह पंहुचा इतने पैसे किसने दिए की वो उस जगह शॉपिंग के लिए जा रहा है जिधर हजार 2 हजार में तोह जीन्स भी नहीं मिलती. कोई बड़ा खेल है अलका क्योंकि घर पे ारु की गाडी कड़ी है जो उसको सबसे ज्यादा पसंद है. वो लांसर नहीं लेके गया और .. पक्का वो उमेद चाचा के हे साथ होगा.", अभी ऋतू को शीला देवी वाला प्रकरण याद आने लगा जब पहली बार उसके भाई ने मूर्खता दिखने के साथ अपनी बहादुरी का भी जलवा परिवार के सामने लाया था.
"तेरा कहने का मतलब है की ारु उधर सचमुच कुछ बड़ा हे खेल खेलने वाला है? गाडी तोह चाचा जी ने इसलिए दी है की उसमे अर्जुन सुरक्षित रहे और उधर फ़ोन चलता है तोह संपर्क में रहने के लिए वो भी साथ मिला होगा."
"न अलका.. महंगी गाडी, ारु के पास ढेर सारे पैसे और मोबाइल सिर्फ ख़ास वजह से क्योंकि चाचा उसको कांटेक्ट में रहे हरदम. कहने को तोह चाचा का प्यार हे बहोत है उसके लिए लेकिन अभी सारा बिज़नेस उधर हे बढ़ाया जा रहा है और ऐसे मौके पर ारु का वह ये सब करना मतलब कुछ और हे है. ऐसा मसला होता जहा पर khoon-kharaba होना हो तोह उमेद चाचा खुद हे बहोत थे और उनसे पहले पापा को हे खुजली रहती है."
"जहा जोर की जरुरत नहीं मतलब शांत दिमाग. दिखावा मतलब कोई रसूखदार सामने है. अर्जुन को हे भेजा गया है और वो भी रात में .. यही बस एक पॉइंट पहेली है जिसमे 2 ऑप्शन है ऋतू की या तोह अमीरजादा है जिसके चांस काम है क्योंकि अर्जुन लड़को से ज्यादा जल्दी लड़कियों से दोस्त कर लेता है. दूसरी ऑप्शन है की उसको ऐसी जगह भेजा जाए जहा मिडिल क्लास की एंट्री न हो और काम करने वाला अर्जुन जितना हे शातिर. जोर से ज्यादा तोह उसमे दिमाग है.. मतलब जोर तोह है हे लेकिन दिमाग और सेल्फ कण्ट्रोल कही ज्यादा. यंग है जिसका मतलब वह बड़े लोगो से len-den नहीं. चल जाने दे इस बात को अभी के लिए. गलती से चची तक ये बात चली गयी न तोह हो गया beda-garak. हमारा कुछ नहीं जाना लेकिन वो फंसेगा."
"ऋतू, तेरे पापा का फ़ोन है तेरे लिए. तुम दोनों भी आ जाओ, लंच तैयार है.", रेखा जी ने गेट पर खड़े हे आवाज लगाईं तोह इन्हे समय का अंदाजा हुआ. तीनो हे उठ कर घर की तरफ बढ़ गयी. उधर दिल्ली में अर्जुन के भी फ़ोन की घंटी बजने लगी थी जहा ख़ास नंबर देख कर उसके चेहरे पर आयी चमक हाथ थामे चलती पालक से भी न बची.