Incest Pyaar - 100 Baar - Page 40 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

दोस्तों एक समस्या आ कड़ी हुई है और जिसकी वजह से क्लीन वर्शन हे किताब का रूप ले सकेगा. बाकी अगर किसी के पास समाधान हो तोह जरूर बताइएगा.

मैं कंटेंट एडिटर के साथ मीटिंग कर रहा था और जब बात आयी की प्यार 💯 बार का एक वर्शन बिलकुल भी मॉडिफाई न कर के किताब बनवाई जाए ऑनलाइन सेल के लिए तोह इसमें कोई जोखिम तोह नहीं?

जवाब ये मिला जो इस व्यक्ति ने एक मिनट में हे सामने दिखा दिया:

"सेक्शन 67 बी लिस्ट्स डाउन सर्टेन एक्सेप्शन तो थे प्रोविशंस ऑफ़ सेक्शन 67 एंड 67 ा. थुश, उनलेस ा टेक्स्ट इस फॉर पब्लिक गुड ऑफ़ क्रिएटिंग अवेयरनेस, सेक्स एजुकेशन ेट्स. आईटी केस अंडर अम्बित ऑफ़ पोर्नोग्राफी. “सेक्स स्टोरीज” इवन िफ़ फुल्ली टेक्सटुअल विल स्टिल फॉल अंडर थे केटेगरी ऑफ़ पोर्नोग्राफी एंड शॉल बे ट्राइड थे शामे वे.

सो, थेइर पब्लिकेशन एंड ट्रांसमिशन, इस ा पुनिशाबले ओफ्फेंस. होवेवेर, अस एस्प्लेनेड अबोवे थेइर कोन्सुम्प्शन इन प्राइवेट सेटिंग इस लीगल. "

इनका कहना है की सिर्फ 2 हे समाधान है इस मामले में.

1) खुद की वेबसाइट हो और खुद हे इसका प्रचार और बिक्री देखि जाए. लेकिन इसमें भी एक समस्या है. कही कस्टमर हे शिकायत न कर दे.

2) इसको देश से बहार से हे ऑनलाइन उपलब्ध करवाया जाए.

किसी भी भाई के पास अगर कोई हल हो या विचार रखना चाहता हो तोह जरूर बताये. मैसेज भी कर सकते है.

हाँ सरल संस्करण किताब के रूप में बिना विवाद आएगा, हिंदी और हिंगलिश में.
 
अपडेट 184 (1)

Vivaah-Purva

"अब ये अर्जुन कहा रह गया पंडित जी? मुझे हे आये एक घंटा हो गया लेकिन ये साहब तोह लगता है विवाह का दारोमदार जैसे अपने हे कंधे पे लिए है.", आचार्य जी भी इस घर के विवाह सम्बंधित kaam-kaaj देखने के बाद पंडित जी से चर्चा में लगे थे. मेहमानो की ाची खासी भीड़ थी बैठक, बहार वाले आँगन और घर के भीतर. इस दौरान खुद राजकुमार जी सबके chai-paani का कार्य बहार असगर की तरफ संभल रहे थे. भीतर वाला आँगन कही ज्यादा हे बड़ा था और डाइनिंग टेबल वाली जगह भी खाली करके कूलर और शामियाना लगवा कर इसको करीब 50-60 लोगो के लिए दुरुस्त किया जा चूका था.

"शास्त्री जी, गया तोह वो संजीव के सरकारी दोस्तों को होटल छोड़ने था. लेकिन जहा तक मुझे उसका पता है वो जरूर विवाह स्थल की तैयारी देखने चला गया होगा. उमेद और परम संगीत कार्यक्रम का जायजा लेने के लिए कम्युनिटी सेण्टर गए है और दामाद भी उनके हे साथ है. वैसे आपने तोह खुद हमको कर्जदार बना दिया.", रामेश्वर जी बात करते हुए अपने छोटे भाई को भी देख रहे थे जो बैठक से बहार आँगन में साफ़ दिखाई पड़ रहे थे हुक्का गुदगुदाते. कृष्णेश्वर को तोह जैसे गाँव से आये सरपंच धनीराम, महल शर्मा और हंसमुख में पक्के जोड़ीदार मिल गए थे इस शौक के.

"मुरीद हम है भाई साहब आपके और कर्ज़दार वाली बात कह कर पराया मैट कीजिये. वैसे मेरा बीटा विशेष भी उत्साहित है शाम के लिए इसलिए आज दिन में वो कल तक के अपने काम निबटने में लगा है. हिमानी का तोह अब जैसे उस घर में दिल हे नहीं लगता. या फिर अगर उसने बहार न निकलना हो तोह इस घर की परियां वह बुला लेती है. हाँ.. ये भेंट स्वीकार कीजिये मेरी तरफ से. विवाह वाले दिन तोह जब आप हे दान कर रहे हो तोह मैं ऐसा करने की गुस्ताखी नहीं कर सकता इसलिए आज हे एक छोटे भाई की तरफ से ये तुच्छ सी भेंट.", आचार्य जी ने अपने खोये के रंग से कुर्ते की जेब से निकाल कर एक गुलाबी कागज़ की पुड़िया और एक सुनहरे कागज में लिपटी डिब्बी उनके सामने कर दी. पंडित जी जैसे वो लेने से हिचकिचा रहे थे और तभी कौशल्या जी संजीव को लिए उधर आ पधारी. संजीव इस वक़्त आधी ब्याह की सफ़ेद कमीज और सफ़ेद पायजामे में था.

"हाँ तोह भाई साहब, जो आपका हक़ है वो तोह हम मन नहीं कर सकते लेकिन मैं बड़ी भाभी हु और देवर अगर कुछ देगा तोह बदले उसको भी लेना पड़ता है.", संजीव के सर के ऊपर से कुछ हरे नोट वारने के बाद कौशल्या जी ने एक गुलाबी चुन्नी, पगड़ी और वो रुपये शास्त्री जी की तरफ बढ़ाये. अपनी जगह से उठ कर शास्त्री जी ने भी वो लेने से पहले दोनों हाथ जोड़े और पगड़ी माथे से लगाने के बाद झुक कर जैसे आशीर्वाद लिया.

"इस से बढ़ा उपहार तोह जैसे इस प्रमोद ने कभी पाया हे न होगा भाभी जी. माँ के हाथ से तागड़ी और बड़ी भाभी के हाथ से पगड़ी ये एहसास करवाती है के आपके ऊपर एक ममतामयी चाय बरकरार है. वैसे मुझसे पहला हक़ ये किसी और का है.", शास्त्री जी के चेहरे के भाव ऐसे थे की आँखों के किनारे कभी भी तरल हो सकते थे. उनकी बात सुन्न कर कौशल्या जी और पडित जी से पहले संजीव ने उनके पाँव छू कर कहा.

"आप एक शिक्षक है और दादी जी ने हे ये सिखाया था की एक शिक्षक से ऊपर स्थान किसी का भी नहीं हो सकता. मुझे भी ाचा लगेगा अगर dada-daadi जी के साथ आप भी मेरा हल्दी तिलक करे.", संजीव की बात पूरी होने के साथ हे कौशल्या जी ने मुस्कुराते हुए उसके कंधे पर सफ़ेद अंगोछा फैला कर दाल दिया. पंडित जी ने अपने पौटे के मस्तक पर वो गीली हल्दी का तिलक किया और गुलाबी कागज खोल कर उसमे लिपटी सुनहरी चैन गले में पहना दी. उसी थाली से शास्त्री जी ने भी तिलक किया आशीर्वाद देने के साथ साथ. अब तक छोल साहब, कृष्णेश्वर जी के साथ कुछ और गणमान्य लोग भी आ चुके थे जिन्होंने यही सब दोहराया. सबसे मंगल कामनाये ग्रहण करके संजीव अपनी दादी के साथ बैठक से भीतर वाले आँगन की तरफ जा चूका था.

"ऐसे न चलेगा पंडित जी. अकेले शास्त्री जी के हाथ में पगड़ी और हमारे हाथ में चाय? न जी, अब तोह फैंसला यही होगा.", मल्होत्रा जी की बात सुन्न कर सभी हंसने लगे थे और आदतन पंडित जी ने भी मस्ती भरा जवाब दे दिया.

"हाँ हाँ क्यों नहीं मल्होत्रा साहब लेकिन मुझे नहीं लगता भाभी जी आपको दूसरा विवाह करने देंगी. हाहाहा..", अब झेंपने की बारी मल्होत्रा जी की थी फिर भी हंसी बरकरार रखे थे.

"उसका कोई फायदा भी न होने वाला जी अब तोह. अपने मल्होत्रा जी ने थोड़े दिन पहले तोह पगड़ी पहनी थी, बहोत भरी खर्चा हुआ था उसमे. आप फिर से एक पगड़ी पहना दो..", कश्यप जी भी कहा पीछे रहते जब बात आपस में हो रही हो. यहाँ चर्चा जारी थी की बहार गलियारे में लकी किसी को हिदायत देता सुनाई पड़ा.

"ओह भाई, तुझे 9 बजे का बोलै था और अब 10 बजे रहे है. चल अब अंदर चलते हे सारा तामझाम जांचा. एक भी दृश्य कैमरा और वीडियो से चूका न तोह फिर सोच लियो.", उसके साथ साथ ये 2 लोग थे जो एक बड़ा वीडियो रिकॉर्डर और कैमरा लिए थे. मधु जी का बीटा हिमांशु भी उनके हे साथ ख़ुशी ख़ुशी चल रहा था. जैसे वो उनके साथ रह कर इस काम की बारीकी सीखना चाहता हो.

अंदर तोह माहौल हे बहोत हरा भरा था. घर परिवार की हर महिला और लड़की के साथ साथ aas-pados की औरते, लड़कियां और दूर दराज से आये मेहमान भरे हुए थे. सांगवान, कश्यप, मल्होत्रा, संजीव का ननिहाल, मधु जी की ससुराल वाले, Rekha-Krishna जी के मायकेवाले, पंजाब से आये हुए लोग इत्याद के साथ साथ और भी ढेरो लोग थे.

आज तोह सरोज कश्यप के साथ साथ मल्होत्रा जी की बहु जो संजीव की भाभी लगती थी, उन्होंने ाची खासी खिंचाई कर राखी थी संजीव की. दोहरा अर्थ वाले मजाक के साथ साथ उनके हाथ भी संजीव की बाहें और गर्दन पर हल्दी उबटन रगड़ रहे थे. लेकिन एक बात कबीले तारीफ़ थी की इस सबका संजीव जरा भी बुरा ना मानकर उनके साथ हे सिमित मजाक भी कर रहा था.

"देख लो चची, अपना संजीव न बिलकुल माधुरी के उलट हे है. सब कहते थे की माधुरी बहोत बोलती है और संजीव बेचारा गौ आदमी है. माधुरी तोह हल्दी पे मुँह लटकाये थी और ये हमारे शशि कपूर साहब तोह अपने भाभियों के हाथो का ज्यादा हे मजा ले रहे. शादी के बाद या तोह बाकी घरवले कही घूमने चले जाना नहीं तोह काम से काम संजीव और इसकी दुल्हनिया को हफ्ते 10 दिन भेज देना.", सरोज भाभी का मजाक और उनका दिल से खिलखिला कर हंसना सभी को भ रहा था और बस यही पल था जब संजीव भी शर्म से सर झुकाने लगा.

"अरे न बीटा तू न घबरा इन बिल्लियों से. तेरी बुआ है तेरे साथ. और सुन्न लो तुम दोनों, कान खोल कर. संजीव बहोत हे ाचा बचा है जो सबका ख्याल रखता है.", मधु बुआ ने हल्दी उसके सर पे मलते हुए इतने गंभीर अंदाज में कहा था के एक पल के लिए तोह बाकी औरते geet-dholak बंद करके यही देखने लगी कही मधु इन दोनों युवतियों की मरम्मत हे न कर दे. संजीव के चेहरे पर कुछ चमक आयी लेकिन वो तुरंत गायब भी हो गयी जब मधु बुआ ने आगे कहा.

"इसने तोह पलंग भी ऐसा मजबूत और भरी बनवाया है के साथ वाले कमरे तक आवाज न जाए.. तुम परेशां करने की बात करती हो..", ललिता जी, जो खुद महारथी थी वो भी जोरो से हँसते हुए इधर आयी और Madhu-Sanjiv के सर से 500-500 वार कर संजीव की दोनों भाभियों को देती हुई बोली.

"वैसे देवर को तजुर्बा है या नहीं ये तोह पूछ लेती तुम Saroj-Priya? अब तुम्हारा देवर है तोह ये तुम्ही कर सकती हो.", अपनी माँ ललिता जी का भी ऐसा अवतार देख संजीव शर्म से गदा जा रहा था लेकिन इस बार उसके साथ Saroj-Priya भाभी भी थी ऐसी हालत में. रुचिता ने मुँह में ऊँगली दाल कर मवाली तरीके से जो सीटी बजाई तोह घर की लड़कियों के साथ साथ बाकी औरते भी ये देख हंसने के साथ साथ जोश बढ़ने लगी.

"अरे ये भी कोई बात हुई ललिता? इनको बोल के थोड़ी थोड़ी हल्दी लगाए तेरे लल्ला के, अगले की लाली भी अपने घर से हल्दी में निखार के आने वाली है. कही ये न हो के अगले दिन चादर सफ़ेद से संत्री हो जाए.", श्रीमती मल्होत्रा जी ने तोह जो बात कही थी उसका टॉड जैसे हे किसी के पास होता. कइयों को तोह यही समझ नहीं आया के पीली क्यों नहीं कहा. लेकिन बड़ी और समझदार महिलाये समझ चुकी थी की पीले में लाल मिलने से नारंगी हे बनता है.

"अनुपमा बिटिया, जाओ और अपने देवर का शगुन करो.", भीतर वाले कमरे से चंद्रो देवी को लिए छोल साहब आये थे जो वही से फिर वापिस भी लौट गए. इनके साथ आयी थी सुशीला, गुड्डी, मधुलता और हवेली की नयी बहु एवं बिजेन्दर की ब्याहता अनुपमा. कौशल्या जी के साथ साथ पूर्णिमा जी ने भी चंद्रो देवी का स्वागत किया और फिर ऋचा अपनी जगह से उठ कर इनकी तरफ लपकी. तबतक कौशल्या जी ने हे अनुपमा को कोमल के साथ संजीव की तरफ भिजवा दिया था.

"सुशीला बेटी, तुम तोह मिली हे हो ललिता, राजेश्वरी, कृष्णा और रेखा से. मल्टी (गुड्डी) और मधुलता, ये इस घर की बहुएं है और ललिता के हे बेटे और बेटी की शादी कल एक हे मंडप में हो रही है. ाचा लगा के इस अवसर पर सोमबीर भाई साहब का परिवार शामिल हुआ.", अपनी बहुओं से इनका परिचय करवाते हुए कौशल्या जी के कंधे कुछ ऊँचे थे जिसका भान चंद्रो देवी के साथ साथ खुद मधुलता को भी हो चूका था. चंद्रो देवी ने तोह मुस्कुराते हुए सभी को आशीर्वाद दिया लेकिन मधुलता बड़े हे गौर से रेखा को देखने के बाद एक कदम पीछे हो गयी.

"थानेदारनी, तेरे तोह ये बाद में लगे है. मेरे पहले है तेरे से तोह आती क्यों न? पूर्णिमा तू कोई दवा खा रही है या रामेश्वर की नजरो ने जवाब बना दिया.?", यहाँ तोह चंद्रो देवी ने अलग हे हास्यरस भर दिया था. फिर सभी को लांघ कर वो खुद आगे गयी और माधुरी को भी संजीव के करीब बैठने के बाद वस्त्र, गहने, मिष्टान आदि भेंट करने के साथ साथ वो सभी रिवाज किये जो एक दादी अपने पौता पौती के विवाह समय करती है. चंद्रो देवी की बगल में कड़ी सुशीला ने इसमें पूरा साथ दिया था जैसे अगली मुखिया वही हो लेकिन ऐसी उसकी कोई चाहत हे न थी.

"माँ, आप इनसे तोह मिलो. ये रेखा चची है और चची जी ये मेरी मम्मी है मधुलता.", इधर ऋचा ने एक बार फिर से अपनी का परिचय करवाया था और इस बार कोमल भी यहाँ करीब थी जिसने अपनी माँ की तरह मधुलता के सामने हाथ जोड़ कर पूरा सम्मान दिया.

"नमस्ते. मेरी बेटी ने बहोत बताया था तुम्हारे बारे में.", मधुलता ने सम्बोधन में तुम्हारा प्रयोग किया लेकिन रेखा और कोमल ने इसका जरा भी बुरा ना मानते हुए जवाब में मुस्कुरा कर सर हिला दिया.

"अब बेटियां तोह कहा फरक करती है मधुलता जी? बस आपसे मुलाकात नहीं हुई थी लेकिन ऋचा के साथ समय बिता कर इतना तोह पता चल हे गया है के आपने बहोत ाचे से इसका पालन किया है. बहोत हे हंसमुख और प्यारी लड़की है ये. हमारे घर इस पल में शामिल होने के लिए आपका बहोत धन्यवाद. लीजिये, ठंडा पीजिये. आप अभी सफर से आयी है और बहार गर्मी भी अधिक है.", रेखा ने ट्रे से खुद हे गिलास उठा कर मधुलता को शरबत पेश किया तोह वो जैसे चाह कर भी मन न कर सकीय. इसके बाद रेखा ने उस लड़के को सभी को शरबत देना का निर्देश दिया और मधुलता के साथ हे सबसे आखिर में दरी पे विराजमान हो गयी. सामने का माहौल वही था जैसा होना चाहिए. दोनों भाई बहनो के शगुन किये जा रहे थे और फोटोग्राफर tasvire-video में व्यस्त रहे.

"तोह तुम्हारे 3 बचे है रेखा?", मधुलता ने सामने देखते हुए बातचीत शुरू की. Geet-dholak का प्रभाव यहाँ पिछली तरफ इतना न था.

"जी. कोमल से तोह आप मिल हे ली है. ऋतू और अर्जुन आपके उधर आये थे तब मुलाकात हुई होगी आपकी. फ़िलहाल तोह ऋतू अपने पापा के साथ मार्किट गयी है और अर्जुन बहार के काम में लगा होगा. आपकी एक हे संतान है?", इस बार जैसे मधुलता के दिल में हलकी सी फांस चुभी जब रेखा ने उसकी एक संतान का अंदेशा जताया. लेकिन चेहरे पर फीकी मुस्कान दिखते हुए उसने जवाब दिया.

"एक बीटा भी है मेरा लेकिन जैसे ऊपरवाला ज्यादा खुशिया नहीं देना चाहता था इसलिए वो मानसिक रूप से अपरिपक्व है. 25 का होने के बावजूद जैसे वो 5 का हे है. सभी की किस्मत तुम्हारे जैसी तोह नहीं होती?", मधुलता शगुन नहीं कर सकती थी क्योंकि उनके रिवाज के मुताबिक विधवा ऐसे मांगलिक कार्यक्रम, जो घर से बहार हो उसमे प्रत्यक्ष शामिल नहीं हो सकती थी. और रेखा को अपनी बातों से उकसाने की हरकत वो इस व्यस्त माहौल में कर हे चुकी थी.

"जान कर दुःख हुआ की आपके बेटे का जीवन सरल नहीं है लेकिन इसमें किस्मत की कोई भूमिका नहीं है मधुलता जी. और वर्तमान चिकित्सा के साथ सही देख रेख होने पर कुछ हद्द तक ये दुष्प्रभाव सही किया भी सकता है. भगवन में आस्था रखिये, वो जरूर भला करेगा.", रेखा ने किसी भी बात को दिल पे न लिया था और जिस तरह से सहानुभूति वश उसने मधुलता का हाथ दबा कर ये बात कही थी इसके आगे मधुलता से कुछ कहते न बना.

"माँ, पापा बुला रहे है बहार आपको. Hello, नमस्ते आंटी जी. कैसी है आप? बबिता दीदी भी आ गयी है और पापा से मिल कर अंदर आती हे होंगी. माँ आप उठो तोह सही फिर पापा ने फार्महाउस जाना है तैयारी देखने.", ये ऋतू थी जो एक बड़ा सा प्लास्टिक का बैग लिए हिरणी की तरह मचलती सी आयी थी और मधुलता से मिलने के बाद अपनी माँ को उठा कर बहार भेजने लगी. रेखा जी भी मधुलता को अभी आने का बोल कर उठ गयी.

"मैं तोह ठीक हु ऋतू बिटिया, लेकिन शायद तुमने शादी की खरीदी अभी तक नहीं की थी. तोह तुम्हारे पापा तुम्हे मार्किट लेके गए थे?"

"ये मेरे लिए नहीं है आंटी जी, संजीव भैया के लिए है. उन्होंने शादी की ड्रेस तोह ले ली थी लेकिन संगीत की उन्हें याद हे नहीं थी. तोह इस तरह से पापा के तरफ से उनके लिए ये गिफ्ट लिया इसलिए उनको हे साथ लेके गयी थी. ऋचा दीदी, आप उठो जरा और मेरे साथ ऊपर चलो. ोये अलका, चल आजा और देख ले तेरा सामान.", ऋतू ने ज्यादा भाव न देते हुए मधुलता की बगल से हे ऋचा को हाथ खिंच कर उठाया और आगे कड़ी अलका को ऊपर आने का कहा. अलका के साथ हे आरती, तारा और बाकी हमउम्र लड़कियां भी इधर से निकल चली. प्रीती के साथ अभी भी अफसाना और आकांक्षा थी जो कड़ी हुई तोह फोटोग्राफर ने इन तीनो की एक स्वाभाविक तस्वीर क़ैद कर ली.

"ये वाली तस्वीर मैं पर्सनली आपसे लूंगा भैया.", अर्जुन यहाँ आने के साथ हे सबसे पहले कैमरा वाले की तरफ लपका. सफ़ेद सलवार कमीज के ऊपर इंद्रधनुषी दुपट्टा लिए प्रीती को देखते हे जैसे वो इसका चित्र दिमाग में बैठा चूका था.

"ोये तू भाई के शगन वाले टाइम भी घर से बहार भटकता फिर रहा? चल जल्दी इधर आ.", कौशल्या जी ने तोह उसको कैमरा वाले का जवाब तक न सुन्न ने दिया. सुबह पहने धुले हुए कपडे अब ऐसे हो चुके थे जैसे अर्जुन पल्लेदारी करके लौटा हो. और भी कई जोड़ी निगाहे अर्जुन पर हे तिकी थी जो दादी के एक बार कहने भर से उनकी तरफ चल दिया. सभी बैठे हुए लोगो को हाथ जोड़ता वो ठीक अपने भाई के बगल आ खड़ा हुआ. सुशीला जी से गले लगने के बाद उसने भी संजीव भैया के हल्दी लगाईं दोनों गाल पर.

"दादी, शादी की जगह भी बहोत काम था और ये तोह ाचा हुआ के मैं उस तरफ चला गया. घर पे तोह आप सभी लोग हो हे लेकिन जहा सबसे जरुरी काम होने है वो जगह भी तोह तैयार होनी chahiye.",Arjun अब संजीव भैया और माधुरी दीदी के बीच हे बैठ चूका था. इस बीच तस्वीरें भी होती रही और यहाँ से वो सभी चेहरों को भी ध्यान से देखता रहा. संजीव ने भी अपने छोटे भाई के सर पे हाथ फिरते हुए मूक आभार जताया.

"देख कौशल्या, इस छोरे को ऊँची आवाज में न दबड़काया कर. ये साधा हुआ है और अपनी जिम्मेवारियां ाचे से जानता है. ले बबिता, आजा लाडो और दे आशीर्वाद संजीव को.", बबिता उस सूती कैसे हुए सलवार कमीज में भरपूर कामदेवी हे लग रही थी लेकिन मासूम चेहरे और बिना अतिरिक्त साज सज्जा के. अर्जुन से नजरे चार होते हे मुस्कान चेहरे पर फ़ैल गयी.

"दादी, तू कहे तोह इस अर्जुन के भी बाटना रगड़ दू? देख किस तरिया खुश होव है जैसे इसका हे ब्याह हो काल.", बबिता ने समझदारी दिखते हुए ऐसा हे जताया जैसे अर्जुन के प्रति उसका बस उन्मुक्त व्यवहार हे है. इस सबके बीच हे विवाह के लिए निश्चित किये पुजारी जी भी आ पधारे जो राजकुमार जी के संग थे. दोनों भाई बहनो के सिवा अब बाकी लोग अपनी अपनी जगह आ चुके थे. अर्जुन purva-vat हे उन दोनों के बीच बैठा हुआ संजीव भैया के कान में khusar-phusar करने में लगा था और वो उसको नजरो से चुप रहने का कह रहे थे.

"यजमान, sarv-pratham तोह आप दोनों को हे ढेरो शुभकामनाये. और इस मंगल अवसर पर शामिल होने वाले हर व्यक्ति को भी. हल्दी का शगुन अपनी हे एक ख़ास मेहता रखता है. हल्दी सूचक है रोग हरने, पवित्रता एवं मंगलमयता का. इसलिए इसको दांपत्य जीवन में कदम रखने से purv-divas पर आशीर्वाद और अपनेपन के स्वरुप भेंट किया जाता है. आप अपने नए जीवन सफर पर निरोगी, कांतिवान और समृद्धि के साथ कदम रखे.", पुजारी जी सभी को इस शगुन का महत्व बताने के साथ हे संजीव के मस्तक पर durva-gangajal के छींटे गिराने लगे. यही उन्होंने फिर माधुरी के साथ किया.

"जहाँ मेहंदी एक ब्याहता के लिए 16 श्रृंगार में से एक है वही ये सूचक है परिपक्वता का, हल्दी से होने वाले ग्रीष्म की तपिश को काम करने के बाद शरीर को चलित रखने का. मेहंदी भेंट की जाती है सम्बन्धी की तरफ से, ननिहाल की तरफ से और अगर किसी सन्दर्भ में ऐसा न हो पाए तोह भाभी, बुआ और मौसी इसका उपहार दे सकते है. कुमार संजीव, आप शेयर स्नान के बाद ये रसम करेंगे. कुमारी माधुरी, आप अपनी सुविधा अनुसार इस मेहंदी से 16 श्रृंगार की शुरुआत करेंगी. प्रभु नारायण आप दोनों बचो पर कृपा बनाये रखे.", पुजारी जी ने ढेरो श्रृंगार के सामान जो छोटी छोटी डिब्बिया में थे और संजीव माधुरी के लिए अलग अलग थे, वो उनको सुपुर्द किये. जो उनके हाथो से ललिता जी और राजकुमार जी ने अपने पास लिए. ये स्पष्ट था की नहाने के बाद अब इनको ढेरो और रस्मे निभानी थी, अधिकतर माधुरी को क्योंकि वो युवती थी.

"और कोई ध्यान रखने योग्य बात पंडित जी?", राजकुमार जी ने हाथ जोड़ कर पुछा.

"यजमान, बाकी तोह आपके विचार और नियम जो भी आप करते है, वही कीजिये. विवाह से पहले बचे बस अकेले घर के देहलीज से बहार न निकले. बिटिया ने नए वस्त्र आज ग्रहण नहीं करने जैसा आप जानते हे है. Harsh-ullas और मंगल समय में पवित्र विचारो के साथ आप जितनी चाहे और जो भी रस्मे करनी है कर सकते है. आपकी 2 संताने एक हे मंडप में अपना अपना दांपत्य जीवन शुरू करेंगी इसलिए हो सके तोह दोनों बचे अगर 2 घर में रहे तोह हितकर रहेगा.", ये तोह अलग हे हिदायत दे डाली थी इन पुजारी जी ने.

"आपके कहने का तात्पर्य पंडित जी?", अब पूर्णिमा जी ने सवाल किया था क्योंकि कौशल्या जी से चंद्रो देवी कुछ पूछताछ में लगी थी.

"ऐसा करना अनिवार्य तोह नहीं है माता जी लेकिन एक हे मंडप में घर के 2 बचो का विवाह होने जा रहा हो, जो विपरीत लिंग (सेक्स) से हो तोह उत्तम यही रहता है की विवाह से पहले वाली रात अलग अलग घर में ठहराया जाये. एक हे दिन अगर आप putri-daan कर रहे हो और पुत्री घर में शामिल भी करे तोह इस से भार अधिक होता है. अगर 2 घर नहीं है तोह .."

"नहीं पंडित जी ऐसी कोई बात नहीं है. बात सिर्फ रात की हे है तोह हमको कोई आपत्ति नहीं. हमारा एक घर पीछे हे है जहा बचे हे रुके हुए है. संजीव वही पर अर्जुन के साथ रात गुजार लेगा.", कौशल्या जी जैसे सबकुछ सुन्न चुकी थी और उन्होंने इसका हल भी तुरंत कर दिया.

"अति उत्तम. अब आप बचो को स्नान के बाद साफ़ वस्त्र धारण करने का बोल सकती है. बाकी रस्मे सब घरवाले हे करेंगे. कल विवाह सम्बन्धी कुछ जरुरी चर्चा करनी है हमे शर्मा जी से तोह इजाजत दीजिये.", पंडित जी ने दोनों बचो को आशीर्वाद देने के साथ हे सभी को प्रणाम किया और राजकुमार जी के साथ बैठक की तरफ चल दिए. अर्जुन खुश था की आज रात उसके भैया उसके साथ हे सोने वाले है. लेकिन जाने कितनो का दिल टूटा होगा जो इसका लाभ उठाना चाहता थे.

क्रमश..
 
अपडेट 184 (2)

Vivaah-Purva

संजीव की होने वाली बीवी राधिका के परिवार का संक्षिप्त परिचय.

सोमनाथ दत्त (55)राधिका के ताऊजी /Vidhayak-Karbori

मिनाक्षी दत्त (50) राधिका के ताईजी /कारोबारी महिला

मोहित दत्त (30) beta/karobar में maa-baap के साथ

विद्या दत्त (29) बहु

निकिता दत्त (27) beti/Naami 5 सितारा होटल की मालकिन

सुभाष चन्दर दत्त (51) राधिका के Pita/Prakhyat दवा कारोबारी

देविका दत्त (47) राधिका की Maa/Karobari महिला

राधिका दत्त (26) beti/Police अधिकारी

अखिल दत्त (24) बीटा/ मनमौजी

उर्वशी गौर - देविका दत्त की behan/Radhika की छोटी मौसी

सुरेश गौर - सुभाष दत्त का सहधू और राजेश शर्मा (अर्जुन के मां) का साला.

पीहू गौर (19) - Suresh-Urvashi की एकलौती संतान और राधिका की मौसेरी बहिन

पार्थिव वशिष्ट - (44) देविका और उर्वशी का भाई. राधिका के मां

माला वशिष्ठ - (39) पार्थिव की पत्नी और राधिका की मामी



जहाँ पंडित जी के परिवार में mehandi-haldi की रसम उनके घर पे हे हो रही थी, सेज सम्बन्धियों के बीच वही दत्त परिवार ने अपनी बिटिया की इन सब रस्मो के लिए क्सक्सक्सक्स शहर से बहार अपने बड़े फार्महाउस को चुना था. दिल्ली मार्ग पर थोड़ा अंदर की तरफ स्थित उनका ये विशाल फार्महाउस जितना हराभरा था उतनी हे बेहतरीन इमारत ठीक बीच में बानी थी. कई एकड़ में फैला हुआ फार्महाउस लगभग 100 से ज्यादा लोगो की chehal-pehal का गवाह था. आम, धाक, आंवले, शीशम, पॉपुलर और नीम जैसे वृक्षों का गंतत्व इतना अधिक था की बाहरी की गर्मी से जैसे ये जगह अछोटी हे थी.

घुमावदार सड़क जो पठार से बानी थी, उसका फैलाव लगभर हर तरफ था. इस पर हे चल कर करीब 30 कार एक निर्धारित जगह बड़े हे करने से कड़ी की गयी थी और आलिशान ईमारत से पहले हे टेनिस और बैडमिंटन के कोर्ट बने थे, जो फ़िलहाल निष्प्राण से थे. नीली टाइल से बना एक बहोत हे लम्बा चौड़ा तरणताल ठीक ईमारत की बगल में था लेकिन कोर्ट की तरह शांत न हो कर ये फिलहाल chatri-table आदि से सजाया जा रहा था.

सुभाष जी ने बेशक ये फार्महाउस एक आरामगाह की तरह बनाया था लेकिन समय समय पर इसमें बदलाव करते रहने से ये एक आलिशान संपत्ति का रूप ले चूका था. एक हजार गज से ऊपर रकबे में बानी 2 मंजिला ईमारत में 5 सितारा होटल जैसा वातावरण था और यही पर मधुर संगीत के साथ साथ सभी लोग राधिका की मेहंदी रसम का लुत्फ़ उठा रहे थे. दर्जनों खाने के स्टाल, उतने हे बैरे जो लोगो को thanda-garam के साथ साथ chaat-pakwaan आदि पंहुचा रहे थे.

"बड़े पापा, इसकी क्या जरुरत थी? देखिये मेरे लिए सबसे जरुरी था आपका आना और पहले हे आपने बहोत कुछ गिफ्ट कर दिया है तोह अब ये क्यों?", सोमनाथ दत्त जो इस परिवार के मुखिया सी हैसियत रखते थे, चाहे घर अलग अलग शहरों था, उन्होंने अंदर प्रवेश करते के साथ सबसे पहली मुलाक़ात अपनी भतीजी से हे की थी. राधिका एक आलिशान से गद्दे पर 2 मेहंदी लगाने वाली युवतियों के बीच बैठी किसी अप्सरा सी लग रही थी. उसके ird-gird उसकी कुछ सहेलियां और रिश्ते की बहने भी बड़े चाव से मेहंदी लगवाती दिखी. सोमनाथ जी ने किसी और से भेंट किये बिना सबसे पहले राधिका को हे 5-6 गहनों के डिब्बे सुपुर्द किये और एक थाली भर के नोट. अब तक सुभाष जी के साथ उनकी धर्मपत्नी देविका जी और सोमनाथ जी की बीवी मिनाक्षी भी मुस्कुराती हुई यहाँ आ चुकी थी.

"हम काम से समझौता कर सकते है बिटिया लेकिन तुम्हारे ख़ास पल में हे अगर हम शामिल न हो तोह फिर बड़े पापा कैसे कहलायेंगे? और ये गिफ्ट नहीं है, प्यार है जो आजकल के सुनार डिब्बों में बंद कर देते है. हाँ ये थाली में शगुन है जो हमारी बिटिया अपने हाथो से देवी माँ के मंदिर का पहला दान देंगी.", सोमनाथ बेशक राजनीति में एक मजबूत हस्ती था लेकिन गाहे बगाहे वो पारिवारिक shagal-mele में भी शामिल हो जाता था. आज तोह उसकी एकलौती भतीजी की रसम थी जिसका ख़ास महत्व था.

"मंदिर? अब कौनसे मंदिर में जाना है हमने बड़े पापा?", राधिका के गाल पर आये बालो को निक्की ने हे मुस्कुराते हुए पीछे किया और वो भी सुन्न ने लगी थी की उसके पिता जी क्या कह रहे है. आमंत्रित मेहमान तोह उपहार आदि देने के बाद कही बिज़नेस की चर्चा में लगे थे तोह कही महिलाये अपने किस्सों में उलझी थी. इस सबके बीच एक बात सामान थी के हरेक व्यक्ति खाने का भरपूर लुत्फ़ ले रहा था. लड़की वाले थे और अगले दिन विवाह, जिस वजह से ये कार्यक्रम दिन में हे रखा गया था और सिर्फ ख़ास ख़ास लोग हे आमंत्रित थे.

"बिटिया, मंदिर में जाना नहीं है. मंदिर बनवाना है और हम ये ऐसा इस लिए कर रहे है क्योंकि मन्नत मांगी थी. जब भी घर की कोई बेटी ब्याह कर जायेगी तोह हम देवी माँ के नाम से आश्रम और मंदिर का निर्माण करवाएंगे. जितने यहाँ थाली में है उतने की पर्ची मैं सुभाष (राधिका के पिता) की जेब से भी वह लगवाउँगा. हाहाहा..", एक सुरक्षाकर्मी बहोत बड़ा laal-safed गुलाब का गुलदस्ता लिए इनके करीब आ खड़ा हुआ तोह सोमनाथ ने वो अपने हाथो से अपने छोटे भाई और उसकी बीवी की तरफ बढ़ाया.

"भाई साहब.", सुभाष जी ने बस इतना हे कहा था के सोमनाथ ने ना में गर्दन हिला कर वही उनकी बात काट दी.

"101 फूल है सुभाष और सभी जीवित. आज के दिन की याद में ये सभी इस फार्महाउस के उद्यान में लगवा दो भाई. हमारी क्यारी का सबसे खूबसूरत फूल तोह हमारी दोनों बेटियां है लेकिन इन्हे पानी देते आता रहूँगा यही सोच कर की इनका सम्बन्ध हमारी राधिका बिटिया से है. मिनाक्षी तुम विद्या बहु को बुलवा कर उसके मेहंदी लगवाओ. देविका, बिज़नेस के मसले तोह चलते हे रहने है लेकिन ये दिन आज है और सिर्फ आज.", सोमनाथ विचारो से बेशक एक कट्टर व्यक्ति था और राजनीतिक मुनाफे के लिए जातीय विचार रखता था पर उसका riti-riwajo में अटूट विश्वास था. अपने भाई की बीवी को भी जैसे इशारा कर दिया था के घर में हर ब्याहत के भी मेहंदी लगेगी है.

"जी जेठ जी. आइये दीदी और निक्की तुम भी आ जाओ विद्या बिटिया को ले कर.", देविका मेहमानो के देखरेख करना चाहती थी लेकिन अब उसको भी जैसे पुरुषो से अलग करके एक जगह हे सिमित कर दिया था.

"हाँ तोह सुभाष, गर्मी इतनी है और तुमने यार यहाँ व्हिस्की चलवा राखी है?"

"भाई साहब सभी करीब दोस्त और पार्टनर्स है. छुट्टी के साथ साथ बेटी के फंक्शन में शामिल हो रहे है..."

"अरे भाई तुम हो निरे हे झंडू. गर्मी का मतलब तोह यही हुआ न के ठंडी बियर वीर मंगवाओ भाई, उसके बाद खाने पीने का इंतजाम देखते है. ये दिल्ली वाले सिंगला कैटरर्स है न?", अब सुभाष जी भी हंस दिए थे अपने बड़े भाई के ऐसे मस्ती भर मजाक पर. इतने गंभीर माहौल के बाद जैसे इसकी कल्पना न थी उन्हें और इसके साथ हे आज्ञा का तुरंत पालन हुआ. घुमते टहलते हुए सोमनाथ का परिचय खुद सुभाष जी सभी से करवा रहे थे. सिक्योरिटी वालो को यहाँ से बहार करके खाने पीने का आदेश दे दिया गया था.

"ए मुन्ना.. अरे तुम तोह बड़े टाइम बाद नजर आये.", सुरेश गौर ने इन्हे देखते हे राह बदलने की सोची थी लेकिन देर से. तब तक सोमनाथ ने उसको देख कर पहचान लिया था और आवाज भी ऐसे दी की पूरे हाल में सबको सुनाई पड़ी. अपनी बीवी उर्वशी और बेटी पीहू के साथ वो झूठी मुस्कान लिए इधर आ चला.

"पाए लागू भाई साहब.", खिसियाता सो वो इतना हे बोल पाया था और उर्वशी अपने जीजा सुभाष को नमस्ते करती हुई हंस कर एक तरफ हो गयी. उसकी बेटी पीहू के भी सर पे हाथ फिरते हुए सोमनाथ ने आशीर्वाद देने के साथ कहा.

"जग जग जियो अपने पिता का खून पियो. हमारी गुड़िया रानी तोह सचमुच बड़ी हो गयी है. वो उधर देखो तुम्हारी राधिका और निकिता दीदी के मेहंदी लग रही है, चलो इन प्यारे प्यारे हाथो पे तुम भी लगवाओ. लगाओगी न?", सोमनाथ जी का कहने का अंदाज हे इतना निराला था के पीहू के साथ साथ सुभाष जी भी हंसने लगे.

"जी दद्दा जी. फिर मैं लगवाने के बाद सबसे पहले आपको दिखाउंगी.", पीहू इतना कह कर हाथ हिलती हुई वही चल दी जहा बाकी सभी थी.

"मद साहब नहीं आये सुरेश बाबू?", अब थोड़ा गंभीर लहजे में सोमनाथ ने कहा था और एक चुस्की लेते हुए उनकी आँखें बड़े ध्यान से सुरेश को देख रही थी.

"जी पापा बॉम्बे से चले है थोड़ी देर पहले. वैसे आप आने वाले थे पापा से मिलने?", सुरेश की तरफ खुद हे सुभाष जी ने बियर का गिलास बढ़ाया जिसके पीछे खुद सोमनाथ जी की मर्जी थी. ठंडा गिलास पकड़ते हे जैसे सुरेश थोड़ा सहज हुआ.

"वो काम उनसे नहीं होगा सुरेश क्योंकि मैं उन्हें ाचे से जानता हु. कलेक्टर रेट से 50 गुना ऊपर दाम देने को तैयार हु लेकिन तुमसे जमीन का वो छोटा सा टुकड़ा नहीं निकलवाया गया? हम जमीन और इस से जुड़े कारोबार में दखल नहीं रखते और यही वजह है की तुम्हारे कारोबार को हमेशा समर्थन दिया है. उसके मालिक मोतीलाल को मरे भी कितने हे साल हो चुके है, कागज़ निकलवाए थे हमने भी 5 साल पहले. कब्जे वाला केस होता तोह हम तुम्हे कहते भी न लेकिन इतने बड़े व्यवसायी हो, bhu-maafiya की तरह और ये काम नहीं हो रहा.", सोमनाथ बात करते करते अपने भाई और सुरेश को हॉल से कुछ बहार ले आया था. सुभाष जी भी बड़े गौर से सुन्न रहे थे इस मसले को. सुरेश से तोह कुछ कहते हे न बन प् रहा था.

"मैं कुछ मदद कर सकता हु भाई साहब? रिलेशन तोह मेरे भी है कुछ हुडा और ददा में अगर जमीन इन दोनों में से किसी एक के दायरे में आती है तोह.", सुभाष जी के कहते के साथ हे सुरेश ने जवाब दिया.

"भाई साहब, क्सक्सक्सक्स में मैंने वो 40 एकड़ जमीन 2 दिन में आपके लिए तैयार करवा दी थी क्योंकि वह मेरे साथ प्रशाशन भी था और पैसे का जोर भी. ये डेढ़ एकड़ का टुकड़ा न प्रशाशन दिला सकता है और न पैसा. आप मुझ पर जो मर्जी पेनल्टी लगा दीजिये, पार्टी फण्ड में 5-6 करोड़ तोह मैं अभी दे देता हु लेकिन उस जमीन के मामले से खुद पापा ने मुझे दूर रहने को कहा है जबसे उसके नए मालिक का पता लगा है.", सुरेश ने इसके बाद एक सांस में हे बाकी बची बियर खली की और अगला गिलास बैरे से ले लिया.

"कौन है ये नया मालिक और किसी के मरने के बाद ऐसे कैसे कोई दवा थोक सकता है? हम तोह खुद सर्कार में है यहाँ भी और राजस्थान में भी. भजन भाई साहब तक बातचीत है हमारी बेशक शेखावत जी के माध्यम से लेकिन कई बार लम्बी मुलाकात भी हुई है. नए मालिक को जानते हो तुम?"

"भाई साहब, मोतीलाल शर्मा पिता था रामेश्वर शर्मा के और वारिस की जगह उन्हें उस जमीन का care-taker हे दिखाया गया था. पावर ऑफ़ अटॉर्नी उनके पास थी और अब उसका मालिक है उनका पौता अर्जुन शर्मा. ये रामेश्वर शर्मा वही है जिनके परिवार में राधिका जा रही है और अर्जुन उसका देवर होगा कल से.", सुरेश ने दांत पीसते हुए जब ये बात कही तोह सोमनाथ के चेहरे पर अलग हे चमक आ गयी.

"वाह रे किस्मत. दिए टेल अँधेरा वाली बात हो गयी. वैसे एक बात तोह मान नई पड़ेगी की वो परिवार दौलत में हमसे और तुमसे कही काम होगा लेकिन जहाँ बात ताक़त, रसूख और प्रशाशन सहयोग की होती है तोह उनका कोई टॉड नहीं. वो शंकर.. डॉ शंकर हे हैं न पंडित रामेश्वर जी का बीटा?" , सोमनाथ जी ने जिस तरह अपने छोटे भाई की तरफ देखते हुए ये नाम लिया था तत्काल उन्होंने हाँ में गर्दन हिला दी.

"छोटा मुँह और बड़ी बात भाई साहब लेकिन अगर मामला शंकर भाई से जुड़ा है तोह बात बिना मध्यस्त के हे की जाए तोह बेहतर रहेगा. मैं उनके बेटे से भी मिला हु जिसका नाम सुरेश ने लिया. अर्जुन शंकर भाई का हे बीटा है. एक बार तोह मैंने उसको अपनी दिया बिटिया के लिए मांगने का भी विचार बनाया था. आप शादी के बाद खुद हे मुलाकात कर लीजियेगा शंकर भाई से.", सुभाष जी ने इस दौरान दूर से हे अपने आते हुए मेहमानो का अभिवादन किया. सुरेश भी सर हिला रहा था.

"हाँ यही ठीक रहेगा भाई. वैसे भी शेर के साथ सीढ़ी बात के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं होता. चलो काम से काम सुरेश तुमने आधा काम तोह किया. सुभाष तुम जरा बाकी मेहमानो का जायजा लो, मेरे भी कुछ पहचान वाले आ रहे है तोह मैं उन्हें समय देता हु. सुरेश, तुमने ाचा काम किया.", सोमनाथ वही गिलास लिए आगे बढ़ गए लेकिन सुरेश के चेहरे पर नाखुशी साफ़ झलक रही थी. वो भी अपना सा मुँह लिए एक पहचान वाले व्यवसायी की तरफ चल दिया जबकि सुभाष जी बस मुस्कुराते रहे. जैसे उन्हें पता था की शेर से सीढ़ी मुलाकात भी शेर हे कर सकता है और एक नेता अक्सर यही चूक करता है.

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"तुम तोह अपने ससुराल में सभी को जानती होगी राधिका?", मेहंदी के शतान पर अब कई आसान लग चुके थे. सभी महिलाये कटे हुए फलो, चाट और ठन्डे का लुत्फ़ लेती हुई बातों के साथ साथ मेहंदी भी लगवा रही थी. यहाँ राधिका की दोनों बाहें कोहनी तक गहरी मेहंदी से सजी थी और अब उसके खूबसूरत पेरो पर ये दोहराया जा रहा था. उसके करीब इस वक़्त उर्वशी, निक्की और राधिका की 2 सहेलियां थी. हर युवती आधुनिक होने के साथ साथ गौरवर्ण और किसी अप्सरा हे थी. पैसे की चमक दमक के साथ हर तरह का ऐश्वर्या जो था इनके यहाँ. उर्वशी की बात सुन्न कर राधिका ने आँखे नचाहते हुए हाँ में सर हिलाया.

"अब ससुराल में जो है उन्हें तोह जान न जरुरी हे होगा मौसी. वैसे मेरे से पहले तोह शायद आप हे परिचित होंगी वह से. संजीव की चची के मायके में हे तोह आपकी ननद विवाहित है न?", राधिका के बात सुन्न कर निक्की की भी दिलचस्पी बढ़ी और वो थोड़ा करीब आ बैठी जैसे ये गुफ्तगू राजदार होने वाले हो.

"हाँ वो पूजा दीदी की शादी रेखा जी के बड़े भैया से हो राखी है न. लेकिन मैं ज्यादा किसी को नहीं जानती सिवाए रेखा दीदी, उनके हस्बैंड और बेटे अर्जुन के. हस्बैंड और बेटे से तोह मिली भी सिर्फ 2 हे बार हु. लेकिन परिवार के बारे में बहोत सुना है. वैसे तुम्हारी मेहंदी हद्द से ज्यादा सुन्दर लगी है राधिका. फोटो तोह बनती है इसकी.", उर्वशी हंसमुख महिला थी और बड़े घराने की बहु होने का कुछ प्रभाव छोड़ कर वो जिंदादिल घुलने मिलने वाली महिला थी.

"मौसी, यहाँ हर तरफ ये कैमरा वाले घूम तोह रहे है. अभी अभी 2-3 फोटो निकाले है आपके पीछे खड़े फोटोग्राफर ने. हाँ तोह आपने क्या सुना है उनके परिवार में और ये अर्जुन ारु एक हे इंसान है न?", राधिका सब भुला कर बड़े ध्यान से अपनी मौसी को देखने लगी. उसकी सहेलियां भी इस चर्चा का हिस्सा बन्न ने लगी जब लड़के का जीकर हुआ.

"हाँ वो उसके घर का नाम है ारु और सच कहु तोह तुम दिया के बराबर होती तोह पक्का अर्जुन पर marr-mitt जाती.. हाहाहा.. मजाक कर रही हु क्योंकि हम दोस्त भी है. रेखा दीदी जैसे दिल की बड़ी ाची है वैसे हे उनका बीटा भी है. और सचमुच हैंडसम भी बहोत है वो. तुम नहीं मिली?", राधिका ने तोह स्पष्ट ना हे कर दी.

"क्या वो लड़का सचमुच इतना हैंडसम है आंटी? और राधिका तूने बताया नहीं की तेरा देवर भी है जिसकी तारीफ उसको न जान ने वाले भी कर रहे है? थोड़ी देर पहले यही नाम तोह तेरे पापा ले रहे थे जब मैं इधर आ रही थी. अर्जुन!", ये राधिका की आधुनिक सहेली थी जो सफ़ेद फ्रॉक सूट में किसी पारी सी दिख रही थी. निक्की तोह उसको ऐसे घूरने लगी जैसी खा हे जायेगी.

"वो तेरे टाइप का नहीं है अर्शी. शरीफ सा काम उम्र लड़का है, स्कूल गोइंग.", निक्की ने खुलासा किया तोह राधिका की भानवे चढ़ गयी.

"ओहो, मतलब मुझे छोड़ कर सभी को पता है उसके बारे में. और मौसी आपने तोह परिवार के बारे में आगे बताया भी नहीं.", राधिका ने फिर से उर्वशी पर ध्यान किया जो मुस्कुरा रही थी.

"अपने हे घर में सुना है मैंने तेरे ससुराल के बारे में. पापा (ससुर) खुद कहते है की वो घर अपने आप में एक मिसाल है और उस घर का हर व्यक्ति समाज में योगदान देने वाला जो हर किसी की सहयता करता है. सुना तोह ये भी है की लोग जैसे अपनी पहोच का बखान करते है वही ये बड़ी शक्शीयते श रामेश्वर जी से सलाह करती अक्सर नजर आती है. संस्कार के साथ साथ शिक्षा और हरेक व्यक्ति को अपने फैंसले रखने की प्राथमिकता है उधर. कुल मिला के मैंने सिर्फ और सिर्फ ाचा हे सुना है वह के बारे में. हाँ अर्शी, अर्जुन को देखने से कही भी ये नहीं लगेगा के वो एक 18-19 साल का लड़का है. जीजा जी (सुभाष जी) से भी आधा फुट ऊँचा होगा और जैसी किसी कहानी से निकल कर कोई योद्धा सामने आ खड़ा हो.", उर्वशी ने आँख मारते हुए राधिका की सहेली से ऐसा कहा था जो अब और जान ने को उत्सुक हो रही थी लेकिन देविका जी, जो पीछे कड़ी अभी अभी की बात सुन्न रही थी उन्होंने अपनी बहिन को वह से चलने को कहा.

"उर्वशी, मेरे साथ चल जरा. दोनों एक एक हाथ पर हीना लगवाते है. दूसरे से काम भी करने पड़ेंगे और मैंने कुछ बातें भी करनी है.", देविका जी के ऐसा करने पर राधिका रोकती रही लेकिन उसकी माँ ने धैर्य रखने का इशारा दिया और चली गयी.

"हहह.. और निक्की की बची अब सच सच बता सबकुछ.", राधिका ने बिना लाग लपेट का कहा था.

"I've ा हूजे क्रश ों हिम. हे don't गेट एंग्री. दोस्त है बस और हाँ मैंने जिसके बारे में तुझे बताया था वो यही है. लेकिन बस दोस्ती तक हे है. बाकी कल मिलने हे वाली और साथ रहेगी हे. अर्शी, तेरी दाल नहीं गलने वाली राधिका के देवर के साथ. बहोत पहुंची हुई चीज है वो और उसका रिश्ता भी पहले से हो चूका है. चल वो फोटोग्राफर बुला रहा है तुझे तेरे मेहंदी शूट के लिए.", राधिका कुछ कहती उस से पहले निक्की ने सभी बातों पर विराम लगते हुए उसको उठने का कहा. ये भी एक नया शौक चढ़ा था अमीरो को जिसमे हर रसम की अलग फोटोग्राफी की जाने लगी थी. राधिका के साथ उसकी सहेलियां भी चल दी, उसके गाउन को घुटने तक ऊपर उठाये. अब देविका जी की तरफ वैसी हे चर्चा चालू थी.

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घर के बहार वाले आँगन में इस वक़्त हुसैन साहब उमेद और नरिंदर से किसी चर्चा में व्यस्त थे. उनके पास बराबर हे कुर्सी पर वालिए जी और दलीप जी भी विराजमान थे जैसे कुछ मजेदार बातें जारी हो. सबके चेहरे पर मुस्कान थी और हाथो में ठंडा शरबत. गलियारे से ज़ुबैदा एक सुर्ख लाल कमीज और चुस्त सफ़ेद सलवार पहने बहार निकली तोह आते के साथ उसने नरिंदर जी से सवाल किया.

"नरिंदर चाचा जी, ये अर्जुन कहा होगा? अंदर दिखा था लेकिन फिर जाने कहा गायब हो गया?", सभी को हाथ जोड़ नमस्ते करती हुई ज़ुबैदा नजरो से अर्जुन को हे ढून्ढ रही थी. पहली बार था की उसने सर से ओढ़ कर सफ़ेद दुपट्टा गले में लिया हुआ था. अक्सर वो अपने हिसाब से हे रहती थी लेकिन यहाँ के माहौल को देख वो वैसे हे ढलने की कोशिश में थी.

"ज़ूबी बिटिया, तुम्हे वो दिखे तोह पकड़ कर इधर हे ले आना. मैंने भी अंदर जाते हे देखा था और काम से आवाज भी लगाईं लेकिन पता नहीं कहा गायब हो गया?", नरिंदर जी प्यार से उसको ज़ूबी हे बुलाते थे और ज़ुबैदा भी उनके सामने जैसे कोई औपचारिकता न करती.

"ऐसा क्या काम पड़ गया हमारी शहजादी को अर्जुन मियां से? अरे हमे तोह अपनी दूसरी गुड़िया को देख कर हैरत हो रही है. हमेशा डुबकी रहने वाली ाफसु भी कुछ देर पहले यहाँ से हंसती खेलती जा रही थी. इन्दर भाई, उसको तोह कुछ दिन यही रख लो और ये अर्जुन मेरे वह भेजो. हमारी बेगम तक हमसे दुआ सलाम करने की जगह भतीजे के साथ गप्पे लड़ा रही थी.", हुसैन जी ने ये बात कहने के साथ सीढ़ियों की तरफ नजर की तोह मुँह से बस इतना हे निकला 'masha-allah'

अर्जुन एक आधी ब्याह की चुस्त सफ़ेद कमीज, जो शायद तगड़े शरीर की वजह से चुस्त हे लग रही थी और कासी हुई नीली जीन्स पहने इनकी हे तरफ चला आया. गीले घुंगराले बाल बता रहे थे की वो अभी नाहा कर हे आया है और कुण्डल हिलते हुए उनकी लम्बाई का खुलासा कर रहे थे.

"कैसे हो अंकल? नमस्ते चाचा जी.", वालिए साहब को पीछे से गले लगाने के बाद उसने हुसैन साहब को प्रणाम किया और फिर दलीप जी को भी. उमेद जी ने तोह अर्जुन की कमर में हाथ दाल कर उसको अपनी गॉड में हे बैठा लिया था. उनके लिए तोह ये लड़का अभी भी उनका मुन्ना हे था.

"हुसैन साहब, सिर्फ आपकी बेगम हे नहीं. साहब ने तोह हमारी सरदारनी भी हमसे जुड़ा करदी है. जब ये आ जाये तोह हमारी कदर हे नहीं रहती. लेकिन मेरा शेर पुत्र है हे प्यार के लायक.", वालिए जी ने उसका गाल खिंच कर वैसे हे लाड जताया.

"मेरी तोह मैं बताऊंगा भी नहीं आप लोगो को. लेकिन है मेरा भी ये अजीज बीटा. मौसी से मिला या नहीं?", ये दलीप जी थे और अर्जुन ने उमेद जी की गॉड में बैठे हुए हे जवाब दिया.

"आप लोगो को आजादी दिलवा देता हु ये क्या काम है चाचा जी? पीठ पीछे यही तोह कहते रहते हो की मैं तोह अपनी वाली से परेशां हो गया.."

"हट बदमाश कही का.. चल खड़ा हो और ये जो कड़ी घूर रही है पहले इस से मिल ले.", नरिंदर जी ने पीठ पर ढोल जमाते हुए अर्जुन को खड़ा करके ज़ुबैदा की तरफ ध्यान करवाया तोह वो तुरंत गंभीर हो गया.

"मैंने कहा था न के 12 बजे मार्किट चलना है. देखो 12:30 हो चुके है और मुझे नहीं लगता के तुम मेरी हेल्प करने वाले हो.", ज़ुबैदा सचमुच थोड़ी गुस्सा थी और अर्जुन ने कान पकड़ कर अपनी कार की तरफ दौड़ लगा दी.

"मैं कार निकल रहा हु, आपने कुछ सामान लेके चलना है तोह ले लीजिये.", यहाँ अर्जुन अपनी काली लांसर की तरफ आया तोह उसके पीछे अशोक जी की कार कड़ी थी और वह चाभी भी नदारद थी. वो परेशां होता अभी इधर उधर हे देख रहा था की अपने पिता को अपनी तरफ आते देखा. जो शायद हाथ धोने जा रहे थे.

"तेरे 12 क्यों बजे हुए है?"

"पापा, वो फूफा जी ने कार यहाँ कड़ी कर दी और मेरी ऐसे निकल नहीं सकती. दीदी को मार्किट लेके जाना है.", अर्जुन ने ज़ुबैदा की तरफ देखते हुए कहा और शंकर जी ने हँसते हुए एक कार की चाभी उसकी तरफ बढ़ा दी.

"ऐसे टाइम में तेरी कार घर के अंदर क्यों कड़ी की है? तू ये ले जा और अपनी वाली की चाभी मुझे दे. मैं इन दोनों को बहार निकलवाता हु.", शंकर जी ने फोर्ड की चाभी दी थी और अर्जुन ने थैंक यू कहने के साथ हे ज़ुबैदा को चलने का कहा.

"पर्स है तेरी जेब में?", अब इस सवाल पर अर्जुन के पाँव वही रुक गए थे और वो अपने मुस्कुराते हुए पिता को देख झेंप गया जिनके हाथ में उसका पर्स था. शंकर जी देख रहे थे की आज भी वह Rekha-Krishna की हे तस्वीर थी.

"सॉरी पापा, वो कार में हे रह गया था.", अर्जुन ने पर्स पकड़ते हुए जवाब दिया.

"कोई बात नहीं मैं समझ सकता हु. जब भी काम ज्यादा हो तोह वही वक़्त होता है सावधान रहने का. आराम से जाना और मार्किट में टाइम लगे तोह दीदी को लंच करवा के लाना. फ़िलहाल घर में ज्यादा काम नहीं है और बाकी सब यहाँ है काम देखने के लिए.", शंकर जी ने बात कहते हुए अपने हाथ पे बंधी वो भूरे चमड़े की स्विस मेड घडी अपने बेटे की कलाई पर बांध दी. अर्जुन भोचक्का सा देख रहा था के ये क्या है. ये घडी तोह शंकर जी को इतनी अजीज थी की कभी किसी को हाथ तक लगाने न देते थे.

"जो बात मैंने अभी कही है वो अगर समझ ना आये तोह इस घडी को ध्यान में रखना. जब काम सेकण्ड्स का हो तोह पहले तैयारी में घंटे लगाना ताकि चूक न हो और अगर काम घंटे का हो तोह हर सेकंड की एहमियत समझना. ये कर लिया तोह छोटी मोती भूल नहीं होंगी. वैसे ये तुम पर ज्यादा जाँच रही है, मुझे मेटल वाली लेनी चाहिए.", शंकर जी ने ज्यादा न रोकते हुए अर्जुन की ब्याह थपकाइ और फिर हाथ धोने बाथरूम में चले गए. अर्जुन धन्यवाद न कह सका.

"चलो भी मिस्टर, मैं सब ले आयी हु.", अब तक ज़ुबैदा अपना पर्स लिए गेट पे आ कड़ी हुई थी. अर्जुन भी उसकी तरफ बढ़ा था ये मदहोश करने वाली गुलाब सी सुगंध जैसे साँसों में समां गयी. इन दोनों के सामने रोमिला आ प्रकट हुई. सफ़ेद ढीली सी बिना ब्याह की कुर्ती और पिंडलियों से निचे तक लम्बाई वाली आरामदायक स्कर्ट में. खुले महकते बाल और naam-matra सा मेकअप किये वो किसी भी स्वपनसुन्दरी पर भारी थी.

"अर्जुन बीटा, अपनी आंटी को भी मार्किट ले जाओ. इन्हे भी अपने कपडे उठाने है वह से.", ये रेखा जी भी साथ हे थी जिनकी बात अर्जुन कभी ताल न सकता था.

"मैं विवान के साथ चली जाउंगी रेखा. बचो तुम लोग जाओ, मुझे वह काफी टाइम लग सकता है.", रोमिला ने इंकार किया तोह ज़ुबैदा बोलने से रुक न सकीय.

"नहीं आंटी जी, मुझे भी कंपनी मिल जाएगी. आप भी साथ हे चलिए.", अब रोमिला ने आगे कुछ न कहा और वो नीली फोर्ड की पिछली सीट पर आ बैठी. अर्जुन ड्राइवर सीट पर बैठने से पहले ज़ुबैदा के लिए दरवाजा खोल कर उसको बैठा चूका था. और इन तीनो को जाते हुए एक तरफ रेखा जी और प्रीती देख रहे थे वही छोल साहब के घर के बहार से विवान भी. रोमिला ने घर पे तैयार होते हुए भी अपने पति से बात न की थी लेकिन कुछ ऐसा भी न कहा था जिस से दिल दुखे.

इधर शंकर जी बाथरूम से हाथ धो कर बहार निकले तोह अपनी बीवी के साथ प्रीती को देख कर मुस्कुरा दिए. प्रीती भी तार से टोलिया उठा कर उनकी हे तरफ चल दी और रेखा जी घर के भीतर.

"मेरी बेटी तोह हर बात का ख़याल रखने लगी है अभी से. वैसे मैं नाराज हु tumse.",Shankar जी उसके हाथो से टोलिया ले कर हाथ मुँह साफ़ करते हुए बोले.

"वो क्यों भला अंकल?", विवान भी घर में दाखिल हो रहे थे और शंकर जी को देख गर्मजोशी से मिले.

"आप तोह जैसे उम्र को दरकिनार किये बैठे हो भैया. और क्या बातें हो रही है मेरी इस पारी के साथ?"

"कमरे में बंद रहने वाले बूढ़े होते है काका जी और ये तुम्हारी पारी न पहले मेरी बेटी है. वैसे होने वाली बहु भी. तू सुबह आया और अब उठ रहा है? ये चेहरे पे सफेदी नहीं खून की कमी हो गयी है. थोड़ा ध्यान रखा कर अपना और अपने टाइम टेबल का. प्रीती बीटा, तुम्हारी आंटी से कहो के aam-panna भिजवा दे.", प्रीती का सर सेहला कर उसको अंदर भेजते हुए वो विवान पूरी को साथ लिए वही चल दिए जहा उनके भाई बंधू बैठे थे. प्रीती अब उतना शर्माती नहीं थी ऐसे सम्बोधन पर लेकिन अपने पिता के सामने ये लफ्ज़ सुन्न कर वो गुलाबी होती हुई दौड़ गयी.

"क्या बताऊ शंकर भैया, बहार न संसाधनों की आदत लग जाती है. लाइफ उतनी प्रैक्टिकल नहीं रहती और बस यही वजह है आदत बिगड़ने की. कैसे हो इन्दर भैया.? Hello उमेद भाई.", अब तक 2 और कुर्सियां यहाँ लग चुकी थी जिन पर ये दोनों बैठे और विवान बैठने से पहले सभी से गले लग कर मिला था.

"तोह फिर क्यों पागल हो रहा है अमेरिका में? यहाँ क्या कमी है और अगर बिज़नेस हे शुरू करना है तोह इधर कर ले. काम से काम परिवार तोह साथ होगा.", शंकर ने समझने के हिसाब से ऐसा कहा था लेकिन बैठक से बहार निकलते रामेश्वर जी ने जैसे ये बात सुन्न ली थी. वो अभी धर्मपाल जी और कृष्णेश्वर को साथ लिए विवाह स्थल की तैयारी देखने निकल रहे थे. उनकी मुलाकात भी निर्धारित थी निर्मल सिंह और कपूर के साथ.

"हाँ तू इसको भी इधर हे बुला ले. वैसे विवान तेरे कान मैं आ कर खींचता हु.", विवान तुरंत उठ कर उनके चरण स्पर्श करके गले मिला.

"ओह ताऊ जी, कान भी इधर हे है और मैं भी. आप जितना चाहे खिंच लेना बाकी मेरी ताई मेरे साथ है. कैसी हो ताई जी.?", बैठक से कौशल्या जी भी पंडित जी का रुमाल और नजर का चस्मा लिए बहार आयी तोह वो भी अपने भतीजे से बड़े प्यार से मिली. नजर उतारने के बाद उन्होंने हे अपनी पति को जवाब दिया.

"हाँ मैं भी देखु तेरे कान खींचने वालो को. लो जी, अपने कान पे ये चस्मा चढ़ा लेना क्योंकि जरुरत पड़ेगी जब कागज पढोगे. तू चल मेरे साथ विवान और इन गप्पियों को लगाने दे अपनी महफ़िल.", कौशल्या जी हमेशा से ऐसे हे तोह रहती थी. बाकी सभी हंस दिए थे सिवाए रामेश्वर जी के. फिर आखिर में वो भी मुस्कुराते हुए बहार निकल चले.

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"तुमसे हेल्प चाहिए थी अर्जुन.", मार्किट में ज़ुबैदा को उसके मतलब की दुकान पर छोड़ कर अर्जुन रोमिला के साथ उस तरफ जा रहा था जहा रोमिला ने कपडे बन्न ने के लिए दिए थे. ऐसे एकांत में रोमिला ने गंभीर आवाज में चर्चा शुरू की. दोनों की हे आँखों पे धुप के गहरे चश्मे थे.

"आपको तोह बस कह देना चाहिए आंटी. आप जानती है मैं कभी भी मन नहीं करूँगा सिवाए एक काम के."

"तुम अभी तक वही अटके हुए हो? और वो मैं खुद कर लुंगी तुम्हारे साथ क्योंकि हक़ है मेरा. ये थोड़ी सीरियस बात है बीटा.", रोमिला ने जैसे हे बीटा कहा तोह अर्जुन की रफ़्तार काम हो गयी. अब वो बड़े ध्यान से रोमिला को देख रहा था जिसके चेहे पर नजरे ढकी होने के बावजूद अथाह दर्द के भाव थे जिन्हे चाह कर भी वो छुपा न सकीय.

"आप बस कहिये और मैं वो हर काम करने को तैयार हु जिस से आपके दिल का दर्द काम हो सके.", अर्जुन ने इस बार पैदल चलते हुए रोमिला का हाथ अपने हाथ में थाम लिया था.

"तुमसे मुझे बहोत पहले हे बात कर लेनी चाहिए थी अर्जुन लेकिन मुझे लगा था के सबकुछ ठीक हो जायेगा वक़्त के साथ. पर मैं गलत थी."

"ये प्रीती से जुडी है?"

"हाँ क्योंकि प्रीती मेरी और विवान की बेटी जो है. पता नहीं तुम इसको कैसे समझोगे या मेरे बारे में क्या राये अख्तियार करोगे लेकिन मैं एक असफल पत्नी हु और इस से बहोत कुछ खराब हो सकता है भविष्य में.", रोमिला बात कहने के साथ घेरि सांस भर कर जैसे हिम्मत जूता रही थी.

"मैं समझ चूका है आप कहा बोल रही है. लेकिन उसमे आप गलत नहीं हो सकती, किसी भी सूरत में आप गलत नहीं है. गलती अंकल और अलीशा आंटी से हुई है और जहाँ तक मैं समझ रहा हु ये गलती अभी भी हो रही है. रेणुका बुआ से मेरी थोड़ी हे देर पहले इस बारे में बात हुई थी. घर में सिर्फ आप हे नहीं गयी थी उस वक़्त, वो भी अपने कमरे में थी जब ये दोहराया गया लेकिन उन्होंने इसकी भनक नहीं लगने दी. और मुझसे कहा की मैं आपकी मदद करू. आप निश्चिन्त रहिये आंटी और शाम को संगीत में जरा मेरा साथ देना. अलीशा आंटी को विवान अंकल की नजरो में अगर खोल कर न रख दिया तोह मेरा नाम भी अर्जुन शंकर शर्मा नहीं. हो सकता इस तरह से उनकी नजरो में मैं गलत हो जाऊ लेकिन आपके और प्रीती पर उस आग को नहीं जाने दूंगा जिस से भविष्य पर संकट मंडराए.", रोमिला भौचक्की सी अपना तनाव भूल कर बस अर्जुन को हे घूरे जा रही थी. जिस बात को ले कर वो खुद इतने तनाव में थी अर्जुन पहले से हे उसके समाधान पर लग चूका था.

"तुम जोखिम ले रहे हो अर्जुन. कोई और हल भी हो सकता है इस प्रॉब्लम का. विवान ने अगर ये सेहन न किय तोह?"

"उन्हें करना हे होगा. वो एक जिम्मेवार पिता है और उस से पहले उन्हें साबित करना होगा की वो आपके पति है. आप दोनों ने प्यार किया था आंटी और अगर प्यार का अंजाम रिश्ता बनाने के बाद बिखरना है तोह फिर प्यार का वजूद कभी था हे नहीं. रास्ते से भटके हुए को वापिस लाया जा सकता है लेकिन जो जान बूझ कर वापिस ना आना चाहे उसको अलीशा कहते है.", अर्जुन ने चस्मा उतार कर आँख मारते हुए कहा तोह रोमिला के खूबसूरत चेहरे पर भी अब निराशा की जगह मुस्कान थी.

"वैसे मैं फिर भी हक़ ले कर रहूंगी."

"वो प्रीती डीडे करेगी आंटी. हाँ आप उस से न जुडी होती तोह शायद पहल मैं हे कर देता लेकिन इस रिश्ते में मेरी डोर प्रीती के हाथ है. चलिए आप यहाँ अपने कपडे चेक करवाए मैं वापसी में आपको लेने आता हु. ज़ुबैदा दीदी अकेली कही परेशां न हो जाए.", अर्जुन ने रोमिला को उसके गंतव्य पर पहुंचने के साथ हे वापसी का रुख किया. अर्जुन के भाव बता रहे थे के वो जैसे अलीशा के साथ ऐसी हे मुलाकात करने को आतुर था. ऋतू, प्रीती और अलका ने तोह अपनी अपनी तरह से पहले हे अलीशा का वर्णन तफ्सील से कर दिया था. आखिरी कील रेणुका बुआ ने जड़ दी थी कुछ समय पहले और अब अर्जुन के पास सिवाए मछली की आँख भेदने के दूसरा कोई लक्ष्य न था, शाम के कार्यक्रम में.
 
क्लास लगेगी भाई और 10:30 बजे करीब
 
अपडेट 185

विद्रोही

"देख भाई गज्जू, अब शादी कल है तोह मेहमानो की आवभगत तोह हमको हे करनी पड़ेगी. सभी लोग तोह संगीत कार्यक्रम पे आने नहीं वाले और हमने भी यही प्लान किया था के जितना हो सके इसको सिमित लोगो में हे किया जाए. इसलिए मुझे तोह एक बार छोल अंकल के होटल पे सब taam-jhaam देखने होंगे. वह भी डिमांड होंगी और सांगवान वाले फार्महाउस पे कुछ डॉक्टर दोस्त रुकवाए है मैंने और वह इन्दर के भी कुछ मेहमान है.", यहाँ फ़िलहाल शादी में आये मेहमानो के आराम और सुविधा की चर्चा जारी थी और शंकर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा.

"हाँ तोह ये जरुरी भी है लेकिन अभी भी बहोत से काम बाकी है भोले. वालिए जी के साथ धर्मपाल भाई और दलीप भाई इधर का देख लेंगे, इतने मैं कम्युनिटी सेण्टर पर अपने सिक्योरिटी वाले और ड्राइवर लगा देता हु. अब घर की लेडीज तोह शायद हे किसी मेहमान पर ध्यान दे क्योंकि उन्हें तोह अपनी rang-putaai से फुर्सत नहीं मिलने वाली. वैसे बार तोह छत पर हे लगवाया है न इन्दर?", उमेद की बात पर वालिए जी के साथ दलीप सिंह ने भी सहमति दे दी. नरिंदर ने भी हाँ करके बता दिया था के इंतजाम घरवालों की नजर से अलग हे किया है.

"चलो ये भी ठीक है और 2 कार जरा एक्स्ट्रा रखनी पड़ेंगी. ऐसा न हो के मौके पर जाने या आने में कोई छोट जाए.", शंकर ने आम का पाना ट्रे से उठाते हुए प्रीती का आँखों से शुक्रिया किया.

"प्रीती बिटिया, जरा अपनी बहनो से चर्चा कर लो और फिर देखो के वो लोग ड्राइवर के साथ जाएंगी या कोई है जो कार जानता है.", नरिंदर जी ने यही पर एक काम पूरा करने की कोशिश की. प्रीती भी जैसे इसके लिए तैयार हे थी जैसे उन लोगो में इस बात का फैंसला हो चूका हो.

"वो तारा दीदी ने कहा था के 7 लोग सफारी में आ जायेंगे उनको मिला कर और 3-4 लोग अर्जुन की कार से. पर अर्जुन से अभी कन्फर्म नहीं किया है क्योंकि वो शायद बिजी हो सकता है.", प्रीती की बात ख़तम होते हे शंकर जी ने लांसर की चाबी प्रीती की तरफ बढ़ा दी. जिसको लेते हुए वो सोच में पड़ गयी क्योंकि ये चाबी तोह सिर्फ अर्जुन के पास और ज्यादा से ज्यादा ऋतू हे रखती थी.

"सोचो मैट और इसको अपने पास हे रखो. अन्नू बिटिया या मेनका चला लेगी. काम से काम अब तुम्हे निर्भर नहीं रहना किसी पे. अर्जुन के पास मोटरसाइकिल है अगर वो कही व्यस्त हुआ तोह. नहीं तोह कोई भी गाडी ले जायेगा वो वह.", शंकर जी ने तोह बात हे मुका दी थी लेकिन प्रीती को संकोच करते देख वो मुस्कुरा दिए.

"ये भी तुम्हारी हे है बीटा और ऐसा तोह नहीं की इसको अर्जुन के सिवा कोई चला नहीं सकता. जानता हु की उसने आजतक अपनी ये कार किसी को दी नहीं. लेकिन किसी ने मांगी भी तोह नहीं और वो इसका बुरा नहीं मानेगा. चाहो तोह सफारी कोई और चला लेगा."

"नहीं नहीं अंकल वो बात नहीं है. मेरा मतलब था के अर्जुन मोटरसाइकिल पे..."

"अभी से इतना सोचने लगी हो? हाहाहा.. तुम लोग बस अब किसी पे निर्भर मैट रहना. 12 लोग ऐसे मैनेज हो जाओगे और 4-5 आरती की सहेली वाली कार में. बाकी सबकी जिम्मेवारी उनके pati-devar या भाई अपने आप लेंगे. क्यों भाई इन्दर?", शंकर जी ने हँसते हुए जैसे ये बात कही प्रीती भी मुस्कुराती हुई अंदर दौड़ गयी. बाकी सब भी ऐसे पल में खुश भी थे और चेहरे पर परिचित मुस्कराहट भी.

"ए लड़की, थोड़ा तोह देख लिया कर या आँखों में कुछ फरक है.", ये आवाज कर्कश और भरपूर गुस्से से भरी थी चाहे उतनी ऊँची न सही. प्रीती गलियारे से अंदर हे भागी थी की डाइनिंग वाली तरफ से एकाएक सामने आयी मधुलता से हल्का सा टकरा गयी. स्पर्श कुछ ज्यादा न था लेकिन मधुलता जैसे डरने की वजह से अपना आप खो गयी. प्रीती को सेहमा हुआ अपने सामने खड़ा देख जैसे वो चुप न रह सकीय लेकिन ये आवाज कुछ हद तक भीतर वाले आँगन और यहाँ बैठे पुरुषो को जरूर सुनाई दे गयी थी.

"सॉरी आंटी जी. I'm एक्सट्रेमेली सॉरी. आप एकदम से हे इस तरफ से आ गयी.. आपको लगी तोह नहीं?", प्रीती ने जैसे हे हाथ जोड़े कार की चाभी निचे जा गिरी. बहार भी काली लांसर की too-too की आवाज 2 बार गूंजी.

"बस ले दे कर यही तोह आता है सबके. सॉरी बोल देना.. बस.. घरवालों ने नहीं सिखाया होगा की किसी के घर जाते है तोह वह कैसे naap-tol कर कदम रखने चाहिए.", अब तक मालती (गुड्डी) भी इस तरफ आ चुकी थी और उसके पीछे रेखा जी के साथ रूचि भी. लेकिन मधुलता की बात सुन्न कर उन neeli-hari आँखों के किनारो से लुढ़कते मोती बता रहे थे की प्रीती किस कदर आहात हुई है.

"माफ़ कर दीजिये आंटी जी. मैंने जानबूझ कर नहीं किया.. ", उसकी हिचकियाँ बस वही काबू कर रही थी और अगर अभी कोई प्रीती को अपने सीने से लगा लेता तोह यकीनन उसका रुदन चरम पर पहुंच जाना था. ज्यादातर लोग या तोह खाने में व्यस्त थे या फिर मेहमानो के साथ कमरे में. लेकिन रेखा सधी चाल से ठीक उन दोनों के बीच आ कड़ी हुई. प्रीती को अपने साथ लगाने के बाद उन्होंने हे मधुलता से कहा.

"बची है मधुलता जी और बचे ऐसे अवसर पर अक्सर हे थोड़ा ज्यादा हे खुश रहते है. प्रीती की तरफ से मैं माफ़ी मांगती हु. आप मेहमान है और आपको कष्ट हो तोह ये हमे ाचा नहीं लगेगा.", रेखा जी की बात ख़तम होने तक मधुलता भी नजरे झुका चुकी थी और ऋचा की सहनशक्ति भी जवाब दे गयी.

"माँ, ये सब क्या है? आप छोटी सी हे बात पर .. सॉरी प्रीती, सॉरी आंटी जी. बात इतनी बड़ी भी नहीं थी की आपको सॉरी बोलना पड़े. घर में चहल पहल हो तोह ऐसा हर तरफ होता हे रहता है. चलो प्रीती तुम मेरे साथ चलो.", ऋचा आगे किसी से भी नजरे मिलाये बिना प्रीती को लगभग खींचते हुए हे ऊपर की और चल दी. लेकिन इस दृश्य को 2 और आँखों ने देखा था जो स्वयं शंकर शर्मा की थी. अपनी बीवी को अपनी प्रेमिका से माफ़ी देख जैसे उन्हें ठेस पहुंची थी और मुद्दा कुछ भी न था. आखिर प्रीती कोई गैर तोह न थी लेकिन इस वक़्त उन्हें भी महिलाओ के बीच कुछ कहना ठीक न लगा.

"रेखा, जरा बड़ी भाभी को बुलाना. उनके पीहर से मेहमान आये है.", शंकर जी इसके बाद वापिस मदद गए.

"माफ़ी की बात नहीं है रेखा. बस हमारी तरफ बचो को थोड़ा दायरे में रखा जाता है और मुझे भी पता नहीं था के वो लड़की घर में कुछ ज्यादा हे महत्व रखती है. खैर, तुमसे मिल कर ाचा लगा. कल शादी में मुलाकात होगी.", मधुलता इतना कह कर मालती के साथ बहार की तरफ चल दी और उनके पीछे हे ललिता जी. बिजेन्दर और अनुपमा ने फ़िलहाल यही रहना था इसलिए बस यही लोग चंद्रो देवी के साथ गाँव वापिस जा रहे थे. रेखा ने भी हाथ जोड़ कर मुस्कान के साथ हे विदा किया था इन्हे लेकिन इसके बाद वो सीधा अपने कमरे की और चल दी. प्रीती को ऋचा वही लेके गयी थी.

"वो लड़की मेरी बहु बन्न ने वाली है और उस से पहले वो इस घर की सबसे छोटी बेटी है लता. मानता हु तुम्हे कुछ ठेस पहुंची भी होगी लेकिन बचो के साथ तुम्हे थोड़ा तोह लचीला रहना चाहिए. अपना ध्यान रखना.", घर के बहार ड्राइवर कार लिए तैयार था और सबसे आखिर में बैठने जा रही मधुलता को दबे स्वर में शंकर जी ने स्वयं हे चेता दिया था के अपने रवैय्ये में कुछ बदलाव जरूर लाये.

"तोह यही समझ लो के अपना मान कर हे दांत दिया. बात यही ख़तम."

"मैं भी यही कह रहा हु लता. बात बस यही ख़तम हो जाए. ाचा ताई, आप निश्चिंत हो कर जाए. बचे आज यही रहेंगे और ड्राइवर हवेली हे रुकेगा. सुशीला, सेहरा तू हे करेगी तोह थोड़ा समय से निकल लेना कल.", शंकर ने यहाँ भी स्पष्ट कर दिया था के बड़ी होने का फ़र्ज़ सुशीला ने हे ऐडा करना है. जो मुस्कुराती हुई हाथ हिला कर अगली सीट पर जा बैठी.

"चिंता न करे. मधु ने पहले हे बता दिया था मैंने जब राजू से बात हो रही थी रोटी पे. चाल तू काम देख तेरे दोस्त आये लागे है.", सचमुच गुलाटी, भुप्पी और सांगवान एक हे कार में यहाँ आ पहुंचे थे. शंकर भी इन्हे हाथ हिला कर अपने मित्रो की तरफ हो लिया. इनकी कार चल चुकी थी.

"गुड्डी, के होया था?", कार के चलते हे चंद्रो देवी ने सबसे पहले यही पुछा. गुड्डी उनकी बगल में थी और गुड्डी के इस तरफ मुन्नी खिड़की के पास.

"कुछ न हुआ माँ जी. बस वो एक बची गलियारे में थोड़ा मुन्नी से टकरा गयी थी. ीनता कुछ न होया और मुन्नी ने बेरा न था के वो शंकर भाई की हों वाली बहु है.", गुड्डी ज्यादातर चुप हे रहती थी लेकिन सवाल के जवाब तोह उसको भी देने हे पड़ते थे.

"मुन्नी, बीटा थोड़ा सा सामाजिक होना सीख. एक लुगाई की बेइज्जत्ती पे महाभारत हो चुकी है और जान गयी न के व भी अर्जुन की लुगाई थी ार या भी अर्जुन की है. बालक तोह न्यू हे खेले कूड़े करे, बुरा न मान्य करते. आपने मूड ठीक रखिये ेब.", चंद्रो देवी ने आदत से विपरीत बहोत हे नरमी से अपनी बहु को समझाया था.

"जे घुटे था मेरा वह माँ जी तोह जब निकलन लागे व छोरी आ भिड़ी. बस फेर बेरा न चल्या. मैंने बात जड़ी ख़तम कर दी थी लेकिन शंकर की बहु उस छोरी खातिर हाथ जोड़ गयी या कुछ जांची कोणी. ऐसी लुगाई हो तोह फेर .."

"मुन्नी, इस से आगे एक भी बात न कहिये. देख बेबे (बहिन) जो सामने से हाथ जोड़े है वो बात ने रोकना चाहवे है और हाथ अक्सर ताक़तवर हे जोड़े करे है. क्योंकि ताक़त से नुक्सार का सिर्फ उसने हे अंदाजा होव है. हम मेहमान थे इसलिए मान मिला और वो लड़की घर की हों वाली बहु तोह रेखा ने साफ़ पता है के उसके ऊपर बात आयी तोह मामला बिगड़ सके है. शंकर ने तोह आज तक तेरे से कड़े हाथ न करि लेकिन वो भी समझा के गया. दिल पे न लिए कोई भी बात और रेखा सबकी इजत्त करे है तोह तू चाहे उसने नाम से बुला लेकिन थोड़ा प्यार से. समझदार और पढ़ी लिखी है तू, सुन्दर भी. वैसे हे रहा कर, ाचा लगेगा.", सुशीला ने पानी की बोतल का ढककर खोल कर हँसते हुए वो मुन्नी की तरफ बधाई तोह पहले थोड़ा नखरे लेकिन बाद में छोटी सी मुस्कान के साथ उसने वो बोतल ले कर होंठो से लगा ली.

"समझदार तोह है बस कड़े कड़े इसके तार हिल जे है.", इस बार ये बात गुड्डी ने कही थी और बाकी दोनों के चेहरे पर हंसी आ गयी.

"मेरी या गूंगी भी बोलना जाने है. चाल पहला सुदर्शन से मिल लेवा फेर घर की और.", चंद्रो देवी ने अब ड्राइवर को आगे का रास्ता बताना शुरू किया तोह वो भी उस तरफ हे चल दिया जहा वो चाहती थी.

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"ऐसे क्या देख रहे हो? वैसे तोह तुम्हारे पास 2 पल न निकले मुझसे बात करने के और वह हर चीज खुद पसंद करके दिलवा रहे थे. और इन नजरो को काबू में रखा करो मिस्टर.", अर्जुन ने ज़ुबैदा को हर वो चीज दिलवा दी थी जो वो चाहती थी लेकिन उसके साथ साथ अपनी तरफ से भी श्रृंगार का बहुत कुछ. ज़ुबैदा की उम्मीद से आधे समय में हे अर्जुन ने वो सब दिलवा दिया था और अब दोनों लोग रेस्ट्रा में एक कोने की टेबल पकड़ कर अपने आर्डर की प्रतीक्षा कर रहे थे. अर्जुन बड़े ध्यान से ज़ुबैदा की ख़ूबसूरती को अपने जेहन में संजो रहा था और उसकी बात सुन्न कर थोड़ा सा झेंपते हुए बोलै.

"आप न वाकई किसी बहते पानी सी हो. हर कुछ आप के ऊपर सूट करता है. मैं यही देख रहा था के इस से पहले मैंने जो देखा था वो सच था ये अब जो सामने है वो. फिर पानी की प्रकृति ध्यान आ गयी और ऊपर से आप आर्टिस्ट हो ये याद नहीं था. वैसे हमारा शहर उतना भी बड़ा नहीं है जितना आपका लेकिन शायद जो भी लिया है उस से काम चल जायेगा.", ज़ुबैदा के चेहरे पर सुर्ख मुस्कान आ चुकी थी अर्जुन द्वारा दिए सम्बोधन से.

"हाँ काम तोह चल हे जाएगा और मुझे नहीं पता था के तुम भी आर्टिस्ट हो. मतलब मुझे क्या पहन न चाहिए ये मैं कल से सोच रही थी लेकिन तुमने जैसे तस्वीर पहले हे बना राखी थी. ाचा टास्ते है तुम्हारा चाहे थोड़ा सा ट्रेडिशनल हे सही. लेकिन तुमने अभी तक मेरी बात का जवाब नहीं दिया. क्या देख रहे थे?"

"आपको बताया तोह अभी. बस यही देख रहा था और रही बात ट्रेडिशनल वाली तोह जो इंसान बेमतलब की सामाजिक नीतियों से परे हो वही तोह असली इंसान होता है. हाँ मैं ये भी देख रहा था के आप इतनी सुन्दर है.. मेरा मतलब मुझे ये पता है लेकिन आज आप ज्यादा सुन्दर लग रही है.", अर्जुन खुद हे खिसिया गया अपनी बात कहते हुए और इस बीच बैरा ज़ुबैदा के लिए चने भठूरे और अर्जुन के लिए एक लस्सी का गिलास ले आया था. ज़ुबैदा ने भी हलकी शर्म और मुस्कान के साथ वो बड़ी सी प्लेट आगे खिसका कर दोनों के दरमियान कर ली.

"तुम जरुरत से ज्यादा हे चालू हो मिस्टर. मैं तुमसे 5 साल बड़ी हु और तुम खुल्लमखुला मुझ पर हे लाइन मार रहे हो? अफ़सा होती तोह मान भी लेती और वैसे तुम तोह बंधे नहीं हुए उस प्यारी सी फिरंगन के साथ.? वो बाला की खूबसूरत है. देख के हे लगता है लंगूर के हाथ अंगूर लग गया हो.", इशारे से हे ज़ुबैदा ने अर्जुन को अपने साथ खाने को कहा और वो मन न कर सका. बस उसकी बात सुन्न कर कुछ पल खामोश रहा और भठूरे का एक निवाला टॉड कर उसको हे देखने लगा.

"अरे इतना नर्वस होने की जरुरत नहीं है. मैं टांग खिंच रही हु तुम्हारी और हम दोनों दोस्त है तोह ये सब नार्मल समझो. बिलकुल उल्लू हे हो तुम.", ज़ुबैदा ने अपने हाथ से हे निवाला अर्जुन के मुँह के सामने कर दिया. अर्जुन ने हाँ कहने के साथ वही निवाला ज़ुबैदा की तरफ वापिस करने के बाद अपने हाथ वाला चने में भिगो कर खाने का उपक्रम किया.

"अगर हमने ये सब किया न तोह वो दोस्ती वाली बात बहोत पीछे रह जायेगी, दुनिया की नजरो में. देखो जरा आपकी राइट साइड में वो दोनों लड़के और उनके आगे वाली टेबल पर बैठा वो जोड़ा हमको हे देख रहा है. लेकिन आपने ये तोह सच हे कहा के मैं प्रीती के साथ बंधा हुआ हु. मुझे खुद को शायद एक हद्द में रखना चाहिए.", एक खली गिलास में आधी लस्सी उड़ेल कर वो गिलास ज़ुबैदा की तरफ बढ़ा कर अर्जुन ने फिर से खाने पर ध्यान किया. अब ज़ुबैदा कुछ पल खामोश रहने के बाद बोली.

"बेवकूफ हो तुम और उतने हे अपने आप में उलझे हुए. कभी इस तरह सोचा है की अगर कोई तुमसे निस्वार्थ प्यार करे तोह तुम उसका दिल तोड़ोगे या फिर उसको तसल्ली डोज? अर्जुन, दायरे में रह कर सिवाए एक सिमित दुनिया के कुछ हांसिल नहीं होता. अपने प्यार पर विश्वास रखो और जो तुमसे जुड़े उन्हें अपने साथ रखो. हर इंसान कुछ पाने की चाहत नहीं रखता. वो बस समय या भावनाये प्रकट करके बदले में कभी कभी एक कन्धा चाहता है. कभी कभी ये सब परिवार, प्यार या उस दोस्त से नहीं मिल सकता जिसकी सोच और रिश्ते की सीमा सिमित हो. ा बाउंड पर्सन इस मोरे लिखे ा डेड ओने बूत थे ओनली डिफरेंस इस तहत हे शताय॑ष अबोवे थे कॉफिन एंड थे डेड ओने इनसाइड आईटी. लेकिन दोनों का दायरा बस कबर तक हे तोह है.", ज़ुबैदा तोह अर्जुन से भी जटिल थी लेकिन उसका नजरिया कही ज्यादा विस्तार लिया हुआ. अर्जुन इतनी गहरी बात सुन्न ने के बाद इतना हे कह सका.

"थैंक यू. पता नहीं लेकिन मैं समझता हु की आप जैसे दुनिया को जिस नजर से देखती है वो विद्रोही होने के बावजूद कही बेहतर है."

"हाहाहा.. विद्रोही मतलब रिबेल..! लेकिन अगर हम ऐसे न हो तोह क्या हम सही ज़िन्दगी जी सकते है? मुझे सवाल करने की आदत थी बचपन से और जब मुझे जवाब नहीं मिलते थे तोह मैंने खुद हे उन्हें ढूंढ़ना शुरू किया. परेशानिया हुई अर्जुन और कई बार तोह ऐसे लम्हात आये जिनमे जैसे मेरा सबकुछ हे दांव पर लगने वाला था. पर मैंने खुदको बदला नहीं और इसका नतीजा ये निकला की मेरे आसपास का माहौल मेरे हिसाब से ढला और अगर ऐसा नहीं हुआ तोह उन्हें मैंने तवज्जो न दी. तुम अपना समाज हो और इसको किसी और के लिए मत बदलना, बेहतर करना बस. रही बात प्यार, रिश्ते और ऐसे हे मसलो की तोह जो तुम्हारा है वो तुम्हे समझेगा और जो नहीं है उसके साथ बुढ़ापा गुजार लो लेकिन अतीत में bayaar-e-ishq न होगा.", अपनी आधी अधूरी उर्दू पर वो खुद हे खिलखिला कर हंसने लगी थी. होंटो से लस्सी की एक बूँद ठुड्डी की तरफ रफ़्तार पकड़ती उस से पहले हे अर्जुन ने वो अपनी ऊँगली से हटा दी. ज़ुबैदा इस स्पर्श से एक पल के लिए शांत हुई पर फिर से मुस्कुरा दी.

"मैं समाज हु, मेरा खुद का समाज. हाँ यही तोह हु मैं. मैं आपके हे जैसा हु लेकिन थोड़ा दायरों में रहना भी पड़ता है."

"उतना जरुरी भी है बाबा. जो किसी को नुक्सान न दे वो काम मैट करना बस. बाकी अगर कोई तुम्हे मजबूर करे बदलने के लिए तोह समझ लो वो तुम्हे नहीं जानता. ाचा अब हमको चलना चाहिए यहाँ से. जिन लोगो का तुम वास्ता दे रहे थे वो बड़े ध्यान से देख रहे है हमे. पक्का दिमाग में ड्राइंग बना ली होगी इन्होने की हम दोनों वही है जो लग रहे है. हेहेहे..", ज़ुबैदा ने टिश्यू से हाथ साफ़ करने की कोशिश की तोह अर्जुन ने रोक लिया.

"खाना प्लेट में नहीं बचना चाहिए. बस थोड़ा हे बाकी है और ख़तम करके चलते है. जिसको जो सोचना है सोचने दो, फरक नहीं पड़ता.", और अब अर्जुन ने खुद हे ज़ुबैदा को अपने हाथो से खिलाया. और ये उसको पसंद भी आया.

"हम्म.. बस इस से ज्यादा इजहार मैट करना नहीं तोह मैंने तुम्हे मन न कर सकुंगी. वैसे भी लगभग दुल्हन का लिबास तोह दिला हे चुके हो और कही ...", ज़ुबैदा ने बात बीच में छोड़ कर जो हंसना शुरू किया अर्जुन तोह बस उस बेदाग से चाँद को देखता हे रहा. कितनी बेफिक्र लेकिन संजीदा थी ज़ुबैदा. और जीवन के प्रति उसकी सोच विद्रोही तोह कटाई न थी. वो जीवन का सार किसी भी कथित rishi-muni या समाजसेवी से बेहतर जानती थी.

"मिस्टर, अब चले या ऐसे हे देखते रहोगे? और तुम हो बहोत चालू.", ज़ुबैदा ने आँख दबाते हुए अर्जुन को झेंपने पर मजबूर कर दिया था.

"अब लगता है के आपके साथ पहले हे टाइम बिता लेना चाइये था. और सचमुच हमे थोड़ा ज्यादा हे टाइम लग गया, रोमिला आंटी इन्तजार कर रही होंगी."

"सासु माँ बोलो बचे सासु माँ. ये आंटी वॉन्टी नहीं चलता यहाँ इंडिया में. और रही बात टाइम न बिता पाने की तोह टेंशन न लो. ाचे से बिताएंगे और जल्द हे. फिलहाल तोह उन्हें ले लेते है, गर्मी में लाल हे हो चुकी होंगी वो तोह."

"वैसे रोमिला आंटी भी एक ाची आर्टिस्ट है. ाची से मतलब आपको उनका काम जरूर देखना चाहिए.", अर्जुन ने बहार आने के बाद कार में बैठते हे वातानुकूलन चालू किया और ज़ुबैदा के आते हे कार आगे बढ़ा दी.

"फिर तोह वापसी में मैं उनके साथ हे बैठने वाली हो. िफ़ यू don't मंद ड्राइविंग अलोन हेरे.", ज़ुबैदा को ये जानकार हैरानी हुई थी और चित्रकारी उसका जूनून हे थी.

"हाँ इसलिए तोह बताया मैंने. वैसे आपने ये नहीं बताया के हम जल्दी हे कैसे मिलने वाले है?", कार वही आ रुकी थी जहा अर्जुन ने रोमिला को छोड़ा था. रोमिला भी जैसे कार को देख दूकान से बहार हे आने लगी. उसके हाथ में 2 बड़े बैग थे जिस वजह से अर्जुन बहार निकलने लगा लेकिन रोमिला ने इशारे से अंदर हे रहने को कहा. ज़ुबैदा निचे उतर कर जवाब देती हुई रोमिला की तरफ हे चल दी.

"पंजाब जो आ रहे हो तुम 24 को. मैं वही आउंगी तुमसे मिलने.", और अर्जुन बस देखता रहा. अब 2-2 खूबसूरत विद्रोही उसकी हे तरफ आ रही थी, हाथो में बैग लिए. विशिष्ट, खूबसूरत और संकीर्ण समाज को धत्ता बताने वाली 2 चित्रकार.
 
अपडेट कल और परसो दूंगा दोस्तों. माफ़ी चाहता हु लेकिन फ़िलहाल आर्ट मैटेरियल्स उठाने कसौली आया हुआ हु. 13 से 25 मार्च तक बहार रहूँगा लेकिन उपदटेस तब भी नहीं रुकेंगे. बस आज तक के लिए इजाजत दीजियेगा इसकी पूर्ती कल और परसो के अपडेट से हो जाएगी. 🙏
 
अपडेट 186

Pratyaksh-Apratyaksh

रुपाली घर के बहार हे कड़ी जैसे अर्जुन की प्रतीक्षा हे कर रही थी. घर के सभी लोग अपने अपने कार्यो में व्यस्त थे और ऐसा होना लाजमी भी था क्योंकि घर में 2-2 शादियां थी वो भी अगले हे दिन. ढेरो मेहमान आये थे और उनकी aav-bhagat करने के साथ हे सभी को अपनी अपनी तैयारियां भी देखनी थी. अर्जुन जैसे हे गली में पंहुचा तोह कार लगाने तक की जगह न दिखी. मल्होत्रा जी के घर के सामने हे कार रोक कर वो अभी सामान निकाल हे रहा था की रुपाली उसकी बगल में आ कड़ी हुई.

"तुम्हे अंदर बैठक में बुला रहे है. कितनी हे देर से इन्तजार कर रही हु तुम्हारा लेकिन लगता है तुम्हारी शॉपिंग कल भी ख़तम नहीं होगी.", रुपाली ने गौर नहीं किया था के कार की पिछली सीट पर भी 2 लोग है और दोनों तरफ से दरवाजे खुलने पर उसको अपनी गलती का एहसास हुआ. ज़ुबैदा ने हँसते हुए एक बैग उसकी तरफ बढ़ाया और अर्जुन कार की चाबी रोमिला को देता हुआ घर की तरफ बढ़ गया.

"आंटी, आप हे रख लीजियेगा ये चाबी. मैं बाद में ले लूंगा. रुपाली दीदी थोड़ी हेल्प कर देना आंटी और दीदी की.", और इतना बोल कर हे वो चलता हुआ अपने घर में चला आया. अभी तक मेहमानो की ाची खासी चहल पहल थी. उसके ननिहाल से भी लोग आये हुए थे और वालिए आंटी जी भी अन्नू के साथ उसके सामने से हे अंदर की तरफ गयी थी. अर्जुन एक सरसरी नजर हर तरफ डालने के बाद जैसे हे बैठक में पंहुचा, कदम वही ठिठक गए. दिन में अक्सर ऐसे समय पर खुले रहने वाले दरवाजे बंद थे और उन्हें खोलने के साथ हे सबसे पहले उसकी नजर मिली उस बेइंतेहा खूबसूरत लेकिन इस समय उदास से चेहरे पर. साक्षात् बिंदु उर्फ़ बिंदिया वह बैठी थी और उसके बगल में सर ढके शबनम लेकिन उनकी निगाह अर्जुन पर पड़ने से पहले हे मुस्कान ने अपने नाम स्वरुप एक दिलकश मुस्कान के साथ जैसे उसका स्वागत किया.

"नमस्ते चची.", अर्जुन ने आगे बढ़ कर अपनी दादी की बगल में बैठी बिंदिया के सामने झुक कर जिस सम्मान के साथ मुलाकात की थी उसको देख कर जहा बिंदिया थोड़ा सेहम सा गयी वही सामने की तरफ बैठे रामेश्वर जी के चेहरे पर ख़ुशी थी. यहाँ अभी कुछ और लोग भी थे जीने अर्जुन के चाचा नरिंदर जी, छोल साहब और िग कपूर थे. अलका यहाँ सभी के लिए chai-nashta रखने के बाद मुस्कान को अपने साथ हे ले गयी.

"नमस्ते अर्जुन. शायद अभी भी मुझे ऐसी भेंट की कल्पना नहीं थी.", रुके हुए से लफ्जो में बिंदिया इतना कहते कहते थोड़ा शर्मिंदा महसूस कर रही थी और अर्जुन ने ये भांप कर शबनम को एक तरफ करते हुए उन दोनों के बीच हे जगह बना ली.

"आप जो भी कल्पना करे लेकिन सच तोह यही है न के आपके लिए मैं कोई अनजान नहीं. और अगर आपको अभी भी ऐसा लगता है की सबकुछ ठीक नहीं हुआ तोह मैं आपकी मदद को एहसान मान लेता हु.", यहाँ अर्जुन ने ये बात वह इंग्लैंड में अन्नू वालिए की मदद के सन्दर्भ में कहा था. और उसकी बात बिंदिया के अलावा बहोत और भी लोग सुन्न रहे थे. इस बार बिंदिया ने अपना चेहरा बगल में बैठे इस युवक पर करने के साथ कुछ पल उसको देखा और फिर बड़े स्नेह से एक हाथ अर्जुन के गाल से फिरते हुए सर पे ले आयी.

"तुमसे बेहतर और कौन समझ सकता है मेरी हालत. माफ़ करना इतने साल बाद भी कुछ जख्म भरने में समय लगता हे है. और एहसानमंद तोह मैं और मेरी दोनों बेटियां तुम्हारे है की तुमने न सिर्फ वो सब रोक दिया बल्कि शबनम के साथ साथ मुझे भी जीवन का सही दृष्टिकोण दिखाया. अंकल (पंडित जी) जी से तोह माफ़ी मांग ली है लेकिन तुम्हे क्या कहु?", बिंदिया की आँखों से आंसू लुढ़क कर निचे गिरने लगे. लेकिन चेहरे पर अब दर्द न था बस कुछ था जिसको सिर्फ अर्जुन हे समझ रहा था या फिर कौशल्या जी.

"इसको तोह तू बीटा हे कह बिंदु और ये तेरे अंकल जी न हमेशा एक हे बात कहते थे की अगर इन्हे फिर कभी भगवन ने मौका दिया तोह वो तुझसे माफ़ी मांग कर तेरे हर दर्द को दूर करने की पूरी कोशिश करेंगे. अनजाने हे तेरा और तेरी माँ जीवन बर्बाद हुआ और ये भी सच है की इसके बारे में मुझे या मेरे बचो को कोई जानकारी नहीं थी. तेरे अंकल की मजबूरी थी जो मुझे अभी पता चली है और बाकी मैं अब जान हे लुंगी. बहोत आंसू बहा लिए अब इन्हे बचा के रख. 2-2 बेटियां हैं और उनकी बारी में इनकी जरुरत पड़ेगी.", कौशल्या जी ने पानी का गिलास आगे बढ़ाया तबतक अर्जुन उस चेहरे से आंसू साफ़ कर चूका था.

"ये आपकी और शबनम की बाकी फाइल्स है मरस बिंदिया और आपके ऊपर लगे सभी चार्जेज तत्काल रूप से ख़तम कर दिए गए, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष. लेकिन बाकी जो लोग शामिल थे उन पर सिस्टम अपनी कारवाही जारी रखेगा. उस से आपको कोई परेशानी नहीं आएगी इसका ऐतबार रखिये. अब मैं चलता हु पंडित जी, कल विवाह पर हे मिलते है. ाचा भाभी जी, और कोई सेवा हो तोह जरूर कहियेगा.", िग कपूर ने वो हरे और नीले रंग की 2 फाइल वही शबनम के सामने करने के बाद इजाजत चाहि और पंडित जी से हाथ मिला कर निकल गए. उन फाइल को शबनम ने हे रामेश्वर जी को थमा दिया और यही वो पल था जब नरिंदर जी की नजरे शबनम से मिली.

"अब अगर तुम चाहो तोह शबनम का दाखिला भी इधर हे करवा सकती हो लेकिन मुझे लगता है की तुम्हे भी इसका साथ चाहिए होगा वह. तुम्हारी माँ के संस्कार में तोह शामिल नहीं हो सका लेकिन पिंटू के साथ हरिद्वार जरूर जाऊंगा. तुम्हे रुकना चाहिए कल तक के लिए.", रामेश्वर जी ने दीवान पर दोनों फाइल रखने के बाद बिंदिया से आगे की चर्चा शुरू की तोह बिंदिया का ध्यान अभी भी अर्जुन पर हे थे.

"ले जा इसको अपने साथ अगर तुझे ये इतना पसंद आया हो. लेकिन तेरे अंकल की भी सुन्न ले.", कौशल्या जी ने हिलाते हुए कहा था और बिंदिया शरमीना होती हुंह हे कह पायी.

"जी साथ ले जाने वाली तोह बात हे नहीं है. दिल में सबसे बड़ी चाहत यही थी की बस एक बार मैं उस इंसान से जरूर मिलु जिसका दिल सिर्फ देना जानता है चाहे बदले में दुःख मिले हो. वैसे भी निस्वार्थ दिल किसी एक का नहो होता आंटी जी तोह ले जाना बेकार हे है. बस इस से इतनी गुजारिश है की मुस्कान से मिलता रहे चाहे महीने में एक बार हे मुमकिन हो. वो बहोत मानती है इसको और अर्जुन में उसने हे सबसे पहले वो इंसान देखा था जो बदले में यकीन नहीं रखता. हाँ बदलाव में जरूर रखता है और आज मैं यहाँ बैठी हु इस से बड़ा उदहारण क्या होगा?"

"रहने दो चची मैंने इतना भी कुछ नहीं किया. और मुस्कान की चिंता आप न हे कीजिये. खुद दादा जी ने ये जिम्मेवारी ले राखी है अब तोह. हाँ आपने शादी वाला जवाब नहीं दिया.", अर्जुन ने अब अपने आसपास ध्यान दिया और शबनम को अपनी तरफ देखता पा वो मुस्कुरा दिया.

"नहीं बीटा अभी मुमकिन नहीं है लेकिन वादा करती हु बहोत जल्द मिलने आउंगी. अंकल रात की हे फ्लाइट है वापसी की और सबकुछ एकदम से हुआ था इसलिए अभी थोड़ा समय चाहिए. आपका कभी भी इंग्लैंड आने का विचार बने या वह कैसा भी काम हो, सबसे पहले आप मुझसे हे बात कीजियेगा.", बिंदिया की बात ख़तम होते हे कौशल्या जी ने अपने पति के साथ हामी भरते हुए चाय का कप पकड़ाया. शबनम ने भी चाय ले ली थी और वो गौर कर रही थी की बीच बीच में नरिंदर जी उसको हे देख रहे थे. इतनी देर से वह बैठे होने के बावजूद वो अभी तक कुछ नहीं बोले थे लेकिन अब उनका भी मुँह खुला.

"मेरा एक सवाल है अगर पापा आपको कोई प्रॉब्लम न हो? बिंदिया तुम चाहो तोह जवाब दे सकती हो और न चाहो तो अतीत से वापिस तोह कुछ आने वाला नहीं.", नरिंदर जी की बात सुन्न कर कौशल्या जी को तोह थोड़ा झटका लगा लेकिन जिस से जवाब चाहिए था उसने हाँ में सर हिला दिया और खुद पंडित जी ने जैसे आज्ञा दे दी थी. अर्जुन अभी भी वही था और शायद यही वजह थी कौशल्या जी के चौंकने की.

"18 साल पहले एक घटना हुई थी जिसको अंजाम देने वाली नर्स आज तक नहीं मिली. तुम्हारे पास कोई जवाब है?", बिंदिया इस सवाल पर फीकी मुस्कान देती हुई बड़ी गहराई से सवाल करने वाले को देख रही थी जैसे उसको ये नरिंदर दुनिया का सबसे बेवकूफ इंसान नजर आ रहा हो.

"सबसे पहले तोह बता देना चाहूंगी आपको की मुझे भी दुःख हुआ था उस हादसे का जान कर. दूसरी बात वो जगह शायद मुझसे बेहतर आपके जानकार की थी और वह जो भी लोग थे उनमे से हे कोई शामिल होगा. और जितना मुझे पता है शंकर जी की नजरो से फिर भी कोई एक बार बच निकले लेकिन आपकी, आपकी से मुमकिन नहीं. फिर से तलाश कीजिये मर नरिंदर, जब कभी चोट से हमारे दिल को पीड़ा होती है हम अनजाने हे बाकी शहर जला देते है लेकिन छोटी छोटी बातें नजरअंदाज करने वाले भी हम हे होते है. अब तोह काफी समय गुजर चूका है, दिल में तपिश भी नहीं होगी. फिर से जांच कीजिये, इंदरजीत जो हैं.", बिंदिया ने अपने कहने के अंदाज पर तुरंत हे कौशल्या जी से माफ़ी मांग ली और खड़े हो कर जाने की आज्ञा भी.

"तुम यहाँ तक टैक्सी से आयी हो बिटिया?", रामेश्वर जी के सवाल पर शबनम ने सर हिलाया.

"पुष्पक राजगढ़ तक छोड़ गया था और आगे वही से टैक्सी करवा दी थी अंकल जी. वैसे ये बेहतर है किसी को परेशां करने से."

"सतीश, भाई इनका सामान अपनी किसी भी गाडी में रखवाओ. ये अर्जुन खुद हे रख देगा और मुकेश को बोलो की वो इन्हे न सिर्फ एयरपोर्ट छोड़ कर बल्कि विदा करके भी आये.", रामेश्वर जी जबतक हिदायत देते तब तक मुस्कान भी इधर आ चुकी थी जिसके हाथ में ललिता जी की तरफ से दिया गया एक बड़ा सा बैग भी था. कपडे, मिठाई इत्यादि का. बिंदिया मन करती रही लेकिन कौशल्या जी के प्यार से मन करने से मान भी गयी. टैक्सी ड्राइवर का हिसाब करने के पैसे भी खुद उन्होंने हे अर्जुन को दिए.

"भाई साहब मैं अमरीक को भेज देता हु, घर की ड्यूटी के लिए बुलवाया था और अर्जुन बीटा सिएरा में सामान रखवा दो बिंदिया का.", छोल साहब ने भी उतनी हे जल्दी कमान अपने हाथ ले ली. अर्जुन अभी शबनम के साथ बहार जा हे रहा था की बिंदिया मुँह धोने अलका के साथ बाथरूम की तरफ गयी तोह नरिंदर जी थोड़ा आगे चल कर वही रुक गए.

"तुमसे तोह बात भी नहीं कर सकीय और अब वापिस भी जाना है.", शबनम अर्जुन को गाडी से बैग निकाल कर छोल साहब वाली कार में रखते हुए देख रही थी. दोनों के बीच अभी बात शुरू हुई थी इतने समय में.

"मैं भी चाहता था की आपके साथ ाची मुलाकात हो. खैर अभी माहौल नहीं है तोह इसका मतलब ये तोह नहीं की फिर बात नहीं होगी. वैसे विकास भैया ने बताया था के आप लोग आएंगे लेकिन टाइम उन्हें भी नहीं पता था.", पिछली सीट के निचे एक बैग रखने के बाद दूसरा बैग सीट के ऊपर सही से रख कर अर्जुन ने दरवाजा बंद किया तोह शबनम उसके गले हे लग गयी. वो दोनों गली में हे तोह खड़े थे और ऐसे एकदम से शबनम के गले लगने पर कुछ पल तोह अर्जुन को समझ हे न आया के क्या हो रहा है. लेकिन वो फिर समझ गया था के इंसान आखिर भावनाओ को ऐसे हे तोह प्रकट करता है. शबनम की पीठ थापक कर वो अलग हुआ तोह वो नजरे झुकाये उसका शुक्रिया अदा कर रही थी.

"नानी की तेहरवी पर पापा भी आएंगे अर्जुन. फिर तुमसे जरूर मिलूंगी."

"मैं शायद पंजाब होऊंगा तबतक लेकिन आप बता देना जब वापिस आ जाओ. मिल तोह सकते हे है.", और इधर छोल साहब भी अमरीक को लिए आ चुके थे.

"बिटिया अपनी माँ को भी बुला लो. फिर 4 घंटे तोह जाने में भी लगेंगे.", छोल साहब की आवाज सुन्न कर शबनम अपनी माँ को बुलाने चल दी और छोल साहब अर्जुन से बातचीत में लग गए. अक्सर ऐसा हे करते थे वो.

"वो मैं क्या कह रहा था बिंदु?", इधर नरिंदर जी नजरे झुकाये हुए जैसे कुछ बड़ी बात कहना चाहते थे और उनके हाथो टोलिया ले कर चेहरा साफ़ करती हुई बिंदिया भी इधर उधर देख रही थी जैसे उसको भी अनहोनी बात की शंका हो.

"बोलो इन्दर जो भी कहना है."

"वो.. मैं कह रहा था.. वो.."

"बोल दो इन्दर जो भी कहना चाहते हो. फिर बात हो न हो पता नहीं."

"शबनम का ख़याल रखना. मेरी वजह से तुमने शायद उसको हे वो सब करने के लिए चुना था. माफ़ कर देना लेकिन सच तुम्हे भी पता है. अगर तुम्हे वही चाहत थी तोह काम से काम उसको संभालना चाहिए था. शंकर भी माफ़ी मांग लेगा तुमसे जब सच पता चलेगा बस तुम ये ध्यान रखना की ज़िन्दगी में raqeeb-gunehgaar जो भी हो बस बचे बीच नहीं आने चाहिए. मेरा दिल करता है की उसको अपने सीने से लगा लू और बताऊ की वो कौन है. बस डरता हु की उसके बाद हजारो सवालों का सामना कैसे करूँगा. माफ़ कर देना.. "

"हाँ इन्हे माफ़ कर देना बिंदिया लेकिन इसमें आप दोनों की गलती नहीं है. आपकी तोह बिलकुल भी नहीं और मेरे पति ने जीवन में कभी कोई गलत काम नहीं किया. इन्हे मुझसे प्यार था और आज भी करते है. लेकिन आजतक वो एक कागज़ इन्होने हजारो बार पढ़ा और मैंने हर बार इनके चेहरे पर अलग अलग हे भाव देखे. कुछ एकसार था तोह ये की इनकी एक बेटी और भी है जिसको ये अपने सीने से लगा नहीं सकते.", कृष्णा जी ने तोह बिंदिया के जवाब देने से पहले हे अपने पति का हाथ थाम कर वो बात कह दी थी जो शायद हे कोई पत्नी कहने की हिम्मत रखती. लेकिन दोनों पति पत्नी एक दूसरे को उतने हे स्नेह से देख रहे थे जैसे उनमे कभी कोई राज था हे नहीं.

"तुम्हे बुरा नहीं लगा था कृष्णा?"

"किस बात से? इनकी बेटी की जानकारी होने पर? आपका इनके प्रति ऐसा प्रेम जान कर जिसमे पाने की चाहत हे नहीं? या फिर खुद को प्रताड़ित महसूस करके? तीनो हे बातों ने मुझे झकझोर के रख दिया था और नौबत ये थी की मुझे जीने की इत्छा तक न रही लेकिन ये इंदरजीत जो है इन्होने फिर से अपनी तपस्या दिखा कर मुझे हांसिल कर लिया. प्यार करना गलत नहीं है बिंदिया जी तोह आपको कैसे गलत कहु. बाकी मैं तोह इन्दर से इतना हे कहूँगी की आपको शबनम से गले मिलने में परहेज नहीं करना चाहिए. हाँ अब सबकी दुनिया अपनी अपनी गृहस्थी में निर्धारित है तोह इसका सम्मान जरूर कीजियेगा patidev.",Krishna जी इतना कहती हुई हाथ जोड़ कर वापिस अंदर चली गयी लेकिन इनसे कुछ हे दुरी पर कड़ी शबनम की आँखों में इतना पानी था जिसका हिसाब इन दोनों के पास न था.

"तोह आपको क्या कहु मैं?"

"फ़िलहाल तोह अंकल हे ठीक है और बाकी तुम्हारी मर्जी. हाँ अपनी माँ के सामने तोह पापा मैट कह देना और वैसे किसी के भी सामने मैट कहना. तुम्हे नहीं पता शबनम, जब तुम्हारी माँ ने मुझे बताया था.. छोडो वो सब और बस खुश रहना. मैं आऊंगा तुमसे मिलने और तुम्हारे पापा से भी. बिंदिया, ये शायद तुम्हे बुलाने हे आयी थी.", नरिंदर जी बिना बिंदिया की तरफ देखे शबनम के कंधे पर हाथ रखे हुए उसको लिए ऐसे बहार चले आये जैसे वो उसके कोई करीबी दोस्त या बरसो से जानकार रहे हो. अंदर हे अंदर शबनम भी इस स्पर्श को वैसा हे महसूस कर प् रही थी जैसा उसको आजतक कभी मिला हे न हो लेकिन चाहत हर वक़्त.

"Bye प.. और यहाँ कोई नहीं है.", शबनम ने गीली आँखों के साथ हे एक बार नरिंदर जी को देखा और तुरंत आगे चल कर गाडी में बैठ गयी. बिंदिया के साथ बहार कौशल्या जी भी आयी थी तोह नरिंदर जी तुरंत असगर के तम्बू की तरफ जा खड़े हुए. आज जैसे वो चैन की नींद सो सकते थे जो बरसो से नसीब न हुई थी. बिंदिया ने तोह एक बार भी उनकी तरफ न देखा लेकिन अर्जुन के माथे को चूमना वो नहीं भुली.

"अपना ख़याल रखना चची. इस मुस्कान को वैसे भी इंग्लैंड पसंद नहीं.", अर्जुन ने माहौल को थोड़ा मजाक का रुख देते हुए पहली बार मुस्कान से शरारत करते हुए उसके बाल बिखेरते हुए ऐसा कहा जिस पर तुरंत दादी की हलकी दांत भी पड़ी. मुस्कान खुश थी और माँ के साथ अपनी बड़ी बहिन से गले मिल कर वो तब तक यहाँ कड़ी रही जब तक कार आँखों से ओझल न हो गयी.

"अब तुम यही रहने वाली हो कुछ दिन. मेरे साथ और इस शैतान के कान खींच दिया करो नहीं तोह सर चढ़ जायेगा तुम्हारे.", मुस्कान को लिए कौशल्या जी वही कड़ी थी और जाने क्यों उन्होंने इस बची के साथ कुछ अलग सा एहसास पाया था.

"वैसे मुझे तोह विकास भैया के साथ यहाँ रात में आना हे था. लेकिन कल भी आपके पास हे रुक जाउंगी शादी जाने तक."

"उसके बाद भी जब तक मैं न कहु. परसो घर खाली हो जायेगा तोह मैं तेरे से ढेरो बात करुँगी.", कौशल्या जी ने अपने साथ लगते हुए कहा था और उन्हें बड़ा ाचा लग रहा था मुस्कान को जान कर.

"ठीक है लेकिन फिर आप मेरे साथ वह हवेली चलेंगी मुझे छोड़ने."

"हाँ क्यों नहीं चलूंगी. आ अब तुझे मैं कुछ देती हु, तेरे लिए लिया था मैंने. सुना है तुम्हे सबसे ज्यादा प्यारे तुम्हारे पिता है? मैं भी अपने पिता जी की लाड़ली थी."

"आपको ये सब अर्जुन ने बताया न दादी?"

"नहीं. तेरी डायरी ने जो तू पिछली बार बैग के साथ हे भूल गयी थी बैठक में. माफ़ करना तुम्हारी इजाजत के बिना पढ़ ली. इंग्लिश पढ़ने में उतना मजा तोह नहीं आता लेकिन तुम ाचा लिखती हो.", डायरी वाली बात सुन्न कर मुस्कान एक पल जहा हैरान हुई वही खुश भी.

"कोई बात नहीं आप पढ़ सकती हो. मैंने सोचा था के मोटरसाइकिल से गाँव जाते हुए हे कही बैग गिर गया होगा. वैसे कपड़ो से ज्यादा जरुरी तोह डायरी हे थी और अब आपके पास है तोह मतलब अब टेंशन नहीं. वैसे आपने पूरी पढ़ ली?"

"नहीं 2 कविताये हे पढ़ी थी और बीच बीच में तेरे दादा जी से अर्थ पूछने पड़े मुझे. फिर एक कविता तोह उन्होंने हे पूरी पढ़ कर सुनाई मुझे और उन्हें भी शायद थोड़ा दुःख हुआ लेकिन फिर ाचा भी लगा के ऐसी समझदार बेटियां भी होती है. चल थोड़ी देर यहाँ मेरे कमरे में हे आराम कर ले फिर शाम को समय नहीं मिलने वाला.", कौशल्या जी जिस अधिकार से मुस्कान को अपने साथ लिए जा रही थी ये जैसे स्वतः हे इन दोनों को एक मजबूत अदृश्य तार से जोड़ता था. प्यार का और एक दूसरे के लिए आदर का और उसमे उम्र कोई बढ़ा न थी.

"मतलब आप भी अपने पापा की दुनिया हे थी, हैं न?"

"बिलकुल."

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शाम अक्सर थोड़ा देरी से हे होती है ग्रीष्म हरितु में लेकिन दिनभर की bhaag-daud और मेहमान रिश्तेदारों के बीच जैसे समय पंख लगा कर उड़द रहा था. फिलहाल तोह पंडित जी के घर में सिर्फ पारिवारिक सदस्य और करीबी रिश्तेदार हे थे क्योंकि बाकी सभी अपने अपने ठिकाने जा चुके थे रात को संगीत कार्यक्रम में शामिल होने से पहले तैयार होने के लिए.

यहाँ भी हर कमरे में घर की बहुएं, बेटियां और उनके बचे सजने सँवारने में हे व्यस्त थे. ललिता जी की तरफ जहाँ उनकी भाभी उनके साथ थी वही कृष्णा जी के कमरे में रेणुका, मधु और शालिनी त्यार हो रही थी. पार्लर से बुलवाई गयी लड़कियां फ़िलहाल माधुरी को तैयार करने में लगी थी लेकिन उनकी सेवा प्रियंका, विनीता के साथ ऋचा भी लेती दिखी. हर रंग जैसे आज इस घर की ख़ूबसूरती पर फब्ब रहा था और ऐसा हे दृश्य था कुछ रेखा के कमरे में जहा राजेश्वरी ने वही साड़ी बदन पर लपेटी थी जो उमेद खासतौर पे दिल्ली से लेके आया था अपनी अर्धांगिनी के लिए. राजेश्वरी को तैयार होने में मदद करने के साथ साथ कोमल अपनी माँ की साड़ी भी सलीके से सेट करके जाने हे लगी थी.

"कोमल बीटा, मेरी भी हेल्प तुम्हे हे करनी है. मुझे साड़ी के बारे में सिर्फ उतना हे पता है जितना तुम्हारी माँ ने सिखाया और पहनाया. ऊपर से इतने लम्बे कपडे को बांधना तोह मेरे बस का काम नहीं.", रोमिला अंदर आते के साथ हे कुर्सी पर जा बैठी. कोमल ने मुँह में बकसुआ रखे हे मुस्कुरा कर इशारा दिया के वो तैयार है.

"माँ, ये आपकी साड़ी हो गयी और अब आप अपने बाल ठीक करो तबतक मैं रोमिला आंटी को तैयार करती हु.", कोमल ने साड़ी और ब्लाउज को कंधे के पास बक्सुए से जोड़ कर पल्लू घुमा कर अपनी माँ के दूसरे कंधे पर किया और अलग हो गयी. अब तक रोमिला ने भी आदतन जिस्म से टॉप और स्कर्ट हटा कर बैग खोल लिया था. स्कर्ट निकलने से पहले वो बदन पर कपडा लपेट चुकी थी और पेटीकोट उठा कर स्टोर की तरफ बढ़ गयी. राजेश्वरी गौर से देख रही थी उस अध्भुत गौरवर्ण जिस्म को जिस पर काली ब्रा पल भर में हे उसके दिमाग में छाप चुकी थी.

"ये रोमिला सचमुच अपने देश के हिसाब से 10 साल आगे हे है रेखा. वैसे उतनी हे खूबसूरत जितनी बिंदास है."

"हैं.. वो थोड़ा बहार का असर बरक़रार रहेगा हे लेकिन आदत धीरे धीरे बदल रही है. पहली बार तोह जैसा ऊपर देखा वैसा हे निचे था.", रेखा ने बड़ी धीमी आवाज में जवाब दिया था क्योंकि कमरे में कोमल भी थी जो इस वक़्त अलमारी से रोमिला के कपडे निकल रही थी. काली साड़ी, ब्लाउज और उसके अनुसार हे बाकी सभी चीजे.

"हाहाहा.. देखना कही तेरे बहकावे..

"शठ.. ऐसा बिलकुल नहीं है. और ये उस मामले में बहोत ज्यादा हे पारम्परिक सोच वाली है. बात करके देखना इस से तोह जान जाओगी की अंदर से बिलकुल वैसी हे है जैसी तुम या मैं. कोमल, तेरी आंटी को मैं तैयार करती हु बीटा. तू खुद भी तैयार हो जा अपने कमरे में जा कर. अलका, रुपाली को भी कह देना नहीं तोह सबसे आखिर में वही रह जाएँगी. और ये ऋतू कहा है?", रेखा ने अपनी बेटी से कपडे लेने के साथ हे उसको तैयार होने का निर्देश दिया.

"माँ, अलका तोह तभी रेडी होगी जब ऋतू होगी. और रुपाली पिछले घर हे है तारा, गुरदीप के साथ. स्वाति भी वही गयी थी ज़ुबैदा और जसलीन को ले कर. हाँ ऋतू और प्रीती नहीं दिखाई दी. शायद बबिता दीदी के साथ हो. आप कर देंगी रोमिला आंटी को रेडी?"

"हाँ मैं कर दूंगी मेरी बची. तू अब जा और तेरे पापा के आने से पहले तैयार हो जा. ऋतू शायद बबिता को हे तैयार कर रही होगी प्रीती के घर. आइशा बोल कर गयी थी की प्रीती की तरफ जा रही है मतलब वो सब उधर हे होंगे. हाँ, एक बार अनामिका चची से पूछ लेना उसको कुछ चाहिए हो तोह. बचे के साथ मुश्किल न हो कही. वैसे तोह दामिनी दीदी है उनके साथ.", इधर रोमिला भी पेटीकोट बाँध कर बहार आ चुकी थी और कोमल ने हामी भरने के बाद बहार आ कर दरवाजा फिर से लगा दिया. आँगन में हे मुलाकात आँचल से हुई जो थोड़ी परेशां सी दिखी.

"आपको कुछ चाहिए क्या आँचल?"

"कोमल, वो मेरा बैग बगल वाले कमरे में था लेकिन अभी तोह वह टाला लगा हुआ है. माँ और मामी (अनामिका) तैयार हो भी गयी है लेकिन मेरे कपडे कैसे निकलू.?", आँचल का मतलब था अर्जुन के कमरे से.

"ारु के कमरे में इधर से टाला? वह तोह शालिनी बुआ ठहरी हुई है. मैं अभी पता करती हु वो बगल वाले कमरे में हे है.", कोमल ने कृष्णा चची के कमरे में जाते हे काम की बात करि. शालिनी बुआ ने भी ताले की बात से इंकार किया तोह कोमल कुछ सोच कर आँचल को लिए बहार की तरफ से ऊपर वाली मंजिल की और बढ़ गयी. यहाँ सिर्फ दरवज्जे आपस में सटे थे और जैसे हे दरवाजा धकेला तोह बिस्टेर पे पप शर्मा, रमन शर्मा, विनोद के साथ उनके हे अज्ञात दोस्त को बैठे पाया. कोमल को वह सामने देख एक बार तोह विनोद के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी थी और बगल में आँचल भी साथ है ये पप शर्मा ने भी देख लिया था. पानी जैसी रंगहीन बोतल को तुरंत बिस्टेर के निचे रखता विनोद उठ खड़ा हुआ. बीच में 4 गिलास अभी भी ज्यों के त्यों थे.

"अंदर आने से पहले दरवाजा खटकना तोह चाहिए था बेटी."

"चाचा जी, कमरे में उस तरफ से टाला आपने लगाया था? और आपको मालूम है यहाँ शालिनी बुआ के साथ रेणुका बुआ भी रुकी हुई है?"

"मां थोड़ी देर पहले आप बगल वाले कमरे में इसलिए हे आये थे? और पापा आपको भी यही कमरा मिला बैठने के लिए?", ये स्वर आँचल का था जिस पर तीन लोगो के पास तोह कोई जवाब न था पर वो अज्ञात सा शक्श खुद को बोलने से रोक न पाया.

"क्या पहाड़ टूट पड़ा कोई अगर शान्ति से कमरा बंद करके बैठ गए? बचो को जुबान नहीं लड़नी चाहिए."

"नवीन, तू मत बोल भाई. बीटा, हम तोह बस इसलिए यहाँ बैठे थे की बाकी हर तरफ लोग आ जा रहे थे. पता होता की शालिनी इधर रुकी है तोह अपनी बैठक कही और लगते. विनोद, सामान पैक कर अपना और वही पैलेस में चल कर बैठते है.", पप शर्मा ने आनन् फानन में हे सभी नमकीन, भुजिया इत्यादि एक प्लास्टिक की पन्नी में भरी और विनोद ने भी गिलास गट्टे के बक्से में रखने के बाद वो बोतल अपने पाजामे के अंदर छुपा ली. ये चरों बहार निकलने लगे थी की कोमल ने हाथ सामने कर दिया.

"ताले की चाबी चाचा जी.", शर्मिंदा सा होते विनोद ने जेब से चाबी निकाल कर कोमल के हाथ में रखते हुए कहा.

"बेटी इस बात को यही तक रखना. ताऊ जी खामख्वाह शादी ब्याह में भी सुनाने से नहीं हटेंगे.", विनोद के चेहरे पर आयी शर्मिंदगी देख कोमल ने बस हामी भरी और अंदर आते हे बिस्टेर साफ़ करने लगी. आँचल भी अपने पिता और मां की हरकत से आहात थी लेकिन फिलहाल वो अलमारी से अपना बैग निकलने लगी. इस दौरान कोमल की नजर बिस्टेर से फर्श पर गिरे उस छोटे से कागज पर पड़ी.

'ये क्या लिखा है? स, ु, न... और गोले में ा के निचे ताऊ जी.. ये लोग आखिर कुछ तोह ऐसा कर रहे थे जो ठीक नहीं है लेकिन अर्जुन के कमरे में हे क्यों?", कोमल ने वो पर्ची मुट्ठी में क़ैद करने के साथ हे अब बड़े ध्यान से हर जगह को देखना शुरू कर दिया. उसका दिल कह रहा था के यहाँ जो भी लोग थे वो कुछ तोह ऐसा कर रहे थे जो ठीक नहीं था. और पानी से भरी कटोरी जिसमे एक सिग्रत्ते का टुकड़ा भी पड़ा था कागज के साथ वो कोमल के हाथ आ गया.

'स्वाति, क्सक्सक्सक्स कॉलेज..", और बाकी कागज जैसे जलने की वजह से पानी में घुल हे चूका था. कोमल का दिमाग घूम चूका था और उसने आँचल के निकलते हे वो पहले वाली पर्ची ध्यान से देखि.

"शंकर, उमेद, नरिंदर.. ा मतलब अर्जुन जो इन तीनो के साथ हे जुड़ा है. विनोद चाचा के ताऊ जी मतलब दादा जी.. सुना था के वो ठीक इंसान नहीं है लेकिन यहाँ जैसे बहोत कुछ हो रहा है और टाला लगाने के मतलब भी यही होगा. पापा से बात करना.. नहीं नहीं ऋतू हे बात करेगी.", अपने आप से हे सभी अटकले लगाती हुई कोमल अब एक पल और न रुकी इस कमरे में लेकिन जैसे किस्मत खराब थी की सीढ़ियों से निचे आते हे सामने ऋतू को अपने पिता से हे बात करते पाया.

"लो पापा दीदी भी आ गयी. दीदी, पापा के कपडे ला दो न माँ के कमरे से. मैंने तैयार होने पिछले घर जाना है और अलका मेरी हे वेट कर रही है. वैसे आप ारु के कमरे में गयी थी.?", ऋतू इस वक़्त बस एक ढीले से पाजामे और लम्बी टीशर्ट में हे थे काम करने की वजह से. शंकर जी भी अभी अभी लौटे थे जो बड़े गौर से अपनी बड़ी बेटी का चेहरा पढ़ने की कोशिश करते लगे.

"कोई बात है क्या कोमल?"

"मैं आपके कपडे लेके आयी पापा. आपसे मैं पैलेस में हे बात करती हु.", कोमल ने इसके आगे कुछ न कहा लेकिन शंकर जी जान गए थे की कुछ तोह बात जरूर है और कोमल के आने से पहले उधर से हे आँचल निकली थी कपड़ो का बैग लिए.

"ये भी अजीब लड़की है. ाचा तू चल तैयार हो जा मेरी चश्मिश, मैं भी नाहा के कपडे बदल लू. जाने का देख लेना तुम लोग. अर्जुन की कार और सफारी तुम्हारे हे हवाले है. बस तुम लड़कियां देख लेना अपना बाकी सभी को मैं और तुम्हारे चाचा लोग ले जाएंगे.", तार के ऊपर से टोलिया उठा कर शंकर जी बाथरूम की तरफ बढ़ लिए लेकिन ऋतू जैसे अब कुछ कुछ असहज महसूस कर रही थी.

"ऐ अलका, ये कोमल दीदी की बात कुछ समझ नहीं आयी."

"चल न पहले तैयार हो जाए फिर इधर आ कर कर लेंगे उनसे बात.", अलका हाथ खींचती हुई ऋतू को लिए पिछले घर की और चल दी. दोनों पैदल हे जा रही थी और इस बार अलका की नजर ने वही लोग देखे जो अर्जुन के कमरे में कोमल को दिखे थे लेकिन इस बड़ी जीपनुमा गाडी में उन चारो के साथ 3 और लोग थे.

"ये विनोद चाचा के दोस्त देख कैसे कैसे है ऋतू? अजीब से और ये घर में आये भी नहीं थे."

"अलका वो आदमी जो सबसे आखिर में बैठा है वही तोह हमारी घर से निकला था थोड़ी देर पहले विनोद चाचा और दोनों फूफा के साथ. ये लोग घर में कहा था?", ऋतू की शंका कुछ बढ़ सी गयी थी और अलका से बेहतर उसको कौन जान सकता था.

"टेंशन मैट ले जान. इस ठरकी चाचा पर मेरी नजर बहोत पहले से है और अगर ये कुछ भी ऐसा वैसा सोच रहा है न तोह बस सोचता हे रह जाएगा. अर्जुन के सामने जीकर मत करना फिलहाल.", अलका जैसे बहोत कुछ जान चुकी थी विनोद के बारे में और इन दिनों ऋतू के साथ उसकी गहरी चर्चा हो न सकीय थी घर के ऐसे व्यस्त माहौल में. लेकिन जैसे अब होने हे वाली थी कुछ समय में.

"ठरकी से याद आया, आज तोह वह संगीत में बहोत से लोग आने वाले है. थोड़ा ध्यान रखना कही ऐसा न हो की कोई ऊंच नीच हो जाए किसी मेहमान लड़की के साथ. तुझे तोह पता हे है के मैंने खुद हे भुगता हुआ है कुछ महीने पहले मल्होत्रा अंकल की बेटी वाली शादी में.", ऋतू थोड़ा संजीदा हो गयी थी और अलका उसका कन्धा थपकती हुई बराबर कदम मिलते हुए बोली.

"वो ऋतू बस उस दिन तक हे थी मेरी जान. इस ऋतू के सामने अगर ऐसा वैसा कुछ हुआ तोह मैं जानती हु ये ाचे ाचे को नानी याद दिला सकती है. वैसे एक पते की बात बताऊ?", अलका की बात सुन्न कर ऋतू के मासूम से चेहरे पर परिचित मुस्कराहट आ चुकी थी.

"हाँ तोह अगर मैं ना भी कहूँगी तोह क्या तू बताने से हटेगी? बोल और थोड़ा तेज चल. वह महाभारत चल रही होगी और जाने आज ये लड़कियां क्या बिजलियाँ गिराने वाली है.", ऋतू की बात अलका के पल्ले पड़ चुकी थी जिस पर वह हंसती हुई थोड़ा तेज चलने लगी. छरहरी और लम्बे कद की ये दोनों अप्सरा सरीखी लड़कियां ज़िंदादिल होने के साथ हे हर पहलु पर ऐसे हे विचार रखती थी एक दूसरे के साथ.

"मंजू वाले मामले में अपराधी और कोई नहीं ये विनोद चाचा हे था. इसने हे मंजू को किडनैप करवाने की कोशिश की थी और लगभग कर हे लिया था. अर्जुन ने वैसा होने न दिया और सबसे पहले वही जान गया था की विनोद चाचा की असलियत क्या है. बस किसी वजह से वो उन्हें सजा नहीं देना चाहता. और एक बात जो मैंने महसूस की है वो ये है की अनामिका चची की लाइफ भी बहोत हद्द तक घुटन से भरी है और वो अर्जुन को एक देवर या भाई की तरह ज्यादा देखती है. अपना अर्जुन तोह है हे सबके दिल को समझने वाला पर वो कर क्या रहा है ये समझ से बहार है मेरे. तेरा क्या कहना है?"

"वो गाँव जा रहा है जबकि उसको ये बात ाचे से पता है की उसके पीछे यहाँ किसी का दिल नहीं लगने वाला, खासकर के दादा जी का. हम तोह चल आपस में हे रेहनते है लेकिन दादा जी और maa-chachi का दिन नहीं पूरा होता अर्जुन के बिना. और पहले तोह दादा जी कभी चाहते हे नहीं थे की वो उधर जाए पर अब वो कुछ बोले तक नहीं. अर्जुन और विनोद चाचा कल रात भी एकसाथ हे इस तरफ आये थे और उसके बाद विन्नी दीदी को छोड़ कर कुछ देर तक वो अकेले हे कही गए भी थे. अगर अर्जुन इस ठरकी चाचा को पहचान चूका है तोह फिर वो कुछ बड़ा करने की सोच रहा है जिसके लिए वो जड़े खोदनी गाँव से हे शुरू करेगा. दादा जी को दुःख न पहुंचे इसलिए वो जरूर ये सब वैसे हे करेगा जैसा हम में से कोई नहीं करता.", ऋतू ने ध्यान दिया तोह घर के अंदर सभी लड़कियों की आवाजे आ रही थी जिसका मतलब था के वो थोड़ा और बात कर सकती है.

"हम कैसे करते है और वो अलग कैसे करेगा? तू इस जगह मुझसे थोड़ी ज्यादा बेटर है क्योंकि चाहे हम दोनों प्यार उस से बराबर करती है लेकिन उसको समझना तेरे बस की हे बात है. वो जानबूझ कर मुझे ऐसे दिखता है की जैसे सबकुछ चोरी छिपे कर रहा हो लेकिन उसका मकसद होता है मेरी नजरो में जान बूझ कर आना. तोह तेरी बात थोड़ी समझ में तोह आयी है के वो पहले हे सॉफ्ट वार्निंग दे देता है लेकिन समझना न समझना ये सामने वाले के हाथ है. तोह अब तुझे क्या लगता है की वो क्या करने वाला है?", अलका की बात से इत्तेफ़ाक़ रखते हुए ऋतू ने आगे बताना जारी किया.

"डार्लिंग, ऐसा है की मुन्ना प्यारे अब पहले वाले नहीं रहे जो अपना गुस्सा या प्यार एकदम दिखा देता था. अनामिका चची और उनके बेटे के साथ रह कर हे अर्जुन कुछ ऐसा करना चाहता है जिस से विनोद चाचा को एहसास हो वो गलत है. नहीं तोह मंजू वाला किस्सा तोह दूर की बात, जब इस ठरकी चाचा ने मेरे मोटरसाइकिल वाला तार छेड़ा था ारु उनको तभी लपेट लेता पर उसने ऐसा नहीं किया. अब वो गाँव जाएगा और उसके बाद बाकी छुट्टियां वही रहने वाला है. मतलब ारु दादा जी का हे काम कर रहा है. एक संयुक्त परिवार जिसमे कोई भी गलत न हो. दादी ने एक बार कहा भी था के दादा जी हमेशा वह खुश रहते थे जहा उनके पिता जी और माँ रहते थे. उन्हें आज भी इस घर से ज्यादा अपनापन वह महसूस होता है लेकिन अब दादा जी की ज़िन्दगी हम लोग है. ारु शायद ... नहीं यकीनन वही करने की कोशिश करेगा. चल अब बहोत बातें हो गयी. अंदर चलते है और देखे इन सबने क्या गुल खिलाये है. आधे घंटे में पहुंचना भी है, 7:30 हो गए."

"हाँ संजीव भैया तोह तैयार भी हो चुके थे जब हम घर से निकले. आज जरा मेहमानो को हे ठुमके लगाने देंगे, हम कल म्हणत करेंगे. हेहेहे.", अलका ने चलते हुए ऋतू के कूल्हों पर चटाक से थप्पड़ जमाया तोह वो भी आउच करती हुई फिर हंसने लगी. इतना तोह साफ़ हो गया था इनकी चर्चा से की अर्जुन इस परिवार में महाभारत को होने से रोकने वाला वीर था न की हर गलत सोच वाले व्यक्ति का संहार करने वाला. अब संगीत कार्यक्रम शुरू होने वाला था कुछ हे अंतराल बाद और कही न कही mel-jol के अलावा वह बहोत कुछ होने वाला था. बिजलियाँ गिरना भी निश्चित था जब इतनी खूबसूरती वह झिलमिलाने वाली हो लेकिन देखना था के पंडित रामेश्वर शर्मा के pauta-pauti के संगीत समारोह में कोई गुस्ताखी करेगा या माहौल हमेशा की तरह गरिमापूर्ण और पारिवारिक रहने वाला है.
 
काबिले गौर था चाँद का यु अमावस में छुप जाना,

यकीनन कुछ लम्हात उसको भी चाहिए फैंसले के लिए...!!
 




संगदिल से खयालो में अक्सर मैं खुदको ऐसा देखता हु.

आशिक़ हु तोह क्या फरक पड़ता है ख़याल में कैसे रहता हु.
 
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