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हल्दी और ज़ख्म
लाडो रोवे मैट न
दिल तोड़े मैट न
तुम्हे जाना है..
वह जेठ मिले, जेठानी मिले
वह मिले सभी परिवार..
रे अब छोड़ लड़कपन पीहर का..
लाडो रोवे मैट न
दिल तोड़े मैट न
तुम्हे जाना है..
वह पति मिले, वह प्यार मिले
वह मिले घर संसार..
रे अब छोड़ लड़कपन पीहर का..
पिछले आँगन में शामियाने की छाव में ये लोकगीत शुरू हुए थे और घर की महिलाओ के साथ साथ aas-pados की stree-ladkiyan भी शामिल थी. नयी पीढ़ी जहा कोरस में हंसती हुई गीतों का आनंद ले रही थी वही riti-riwajo से परिचित महिलाएं माधुरी को लकड़ी के पात पर बैठने के साथ हे पूरे उत्साह से हल्दी रसम में जुट गयी.
"दीदी, आपकी तरफ तोह ये रसम ब्याह से पहले दिन नहीं होती?", श्रीमती मल्होत्रा जी ने ख़ुशी में शामिल हुए हे ये सवाल कौशल्या जी से किया. रस्मे तोह मधु ने शुरू करनी थी क्योंकि घर में भाभी तोह अभी थी नहीं. मधु, रेणुका, रूचि सबसे आगे माधुरी के पास बैठी हुई हल्दी में सरसो का तेल और पानी मिला कर घोल तैयार करती हुई अलग बतिया रही थी.
"वो बाटना भी लगेगा जिस दिन ब्याह है उस दिन सवेरे. मेरी तोह माँ थी नहीं जब ब्याह हुआ और इनकी (रामेश्वर जी) माँ जी ने ब्याह से पहले जो रिवाज समझाए वही मैंने आज तक बरकरार रखे है.", कौशल्या जी अपने आँगन में सभी के बीच खासी उत्साहित थी और विचारो का आदान प्रदान यहाँ भी वैसा हे था जैसे हर mele-mulakaat में अक्सर होता है.
"कौशल्या बहिन जी, मैं तोह कहती हु ये रस्मे 2 दिन और पहले शुरू कर देते आप. हाहाहा.. देखो तोह सही बचो को कितना आनंद उठा रहे है. वैसे 5 दिन की रस्मो का रिवाज अब तोह घरानो में हे बचा है. पहले तोह 11-11 दिन पहले हे लोकगीत और ढोलकी शुरू हो जाती थी ब्याह के घर में और आज तोह सुबह हल्दी, दोपहर में मेहंदी फिर सीधा रात को शादी. ाचा है काम से काम आपने तोह ये फटफटी वाला रास्ता नहीं अपनाया.", यशोदा सांगवान जी भी पूरी तरह शामिल दिखी इस विवाह पूर्व पर्व में और वो देख रही थी कैसे मरीना भी सलवार कमीज में घूंगट निकल कर मस्ती कर रही थी कोमल और विन्नी के साथ. ललिता जी लाल बंधेज की साड़ी में स्वयं मन्दाकिनी को मात देती लगी. गौरवर्ण ललिता जी पर लाल रंग काले से भी कही ज्यादा फबता था बेशक उम्र 50 के नजदीक लेकिन आज भी सुघड़, हंसमुख और खूबसूरत थी वो.
"कौशल्या क्या कहेगी यशोदा? इसके तोह पीहर में रिवाज 3 दिन में निबटे लेकिन ब्याह के आयी तोह सास ने 10 दिन मुँह दिखाई की लूट मचाई थी. हाँ और भाई साहब (रामेश्वर जी) को तोह सौभाग्य 11 दिन बाद मिला था अपनी बीवी को देखने का. वैसे कौशल्या की तोह बनती भी थी इतनी भारी मुँह दिखाई.", इस माहौल में कौशल्या जी को फंसा था उनकी अभिन्न सहेली और behan-samaan पूर्णिमा जी ने. उनकी बात सुन्न कर पहली बार किसी ने कौशल्या जी को शरमाते हुए देखा और वो नजरे झुकाती हुई पूर्णिमा के घुटने पर झूठा थप्पड़ मारने लगी.
"वाह.. ये तोह आपने बहोत हे राज की बात बताई दादी. हमारी थानेदारनी जी के तोह जलवे थे अपने टाइम पर इसका मतलब?", ऋतू कब इधर चली आयी थी किसी का ध्यान न गया लेकिन उसने ये चर्चा सुन्न ली थी और अपनी दादी की बगल में लिपट कर जो बात उसने मस्ती में कही उस पर बाकी सभी वृद्धा कहकहा लगाने लगी. दूसरी तरफ से इन्हे घेरा था सुनंदा जी ने, जिन्हे ऋतू हे अंदर लेके आयी थी.
"ऋतू बिटिया पुराणी बात न भी करे तोह ये जलवे तोह तब भी बरकरार थे जब तेरी माँ का ब्याह हुआ था. ऐसे न हमारी संधान जी चेहरे पर गुस्सा लिए रहती है. इनके साथ फाग खेलने की हिम्मत मैंने तोह किसी में न देखि आजतक. दिल सबका करता था लेकिन जितने भी रिश्ते में देवर लगते है किसी की मजाल जो पाँव छू कर गाल में गुलाल के सिवा पानी की एक बूँद छुवा दे.", सुनन्दा जी ने सभी को प्रणाम करने के बाद देवकी, कौशल्या जी, पूर्णिमा जी और यशोदा जी से गले लग कर मुलाकात की. आज वो भी आसमानी रंग की साड़ी में jawaan-adhed सभी को मात दे रही थी. सुनंदा जी का भी अलग हे सम्मोहन था और व्यक्तित्व Kaushalya-Purnima जी के समकक्ष.
"इसके साथ तोह होली जो खेल गया वो खेल गया सुनंदा लेकिन चर्चे तोह तेरे भी काम नहीं सुने मैंने. संधान तुम बाद में बानी लेकिन korde-haudi का खेल तोह थानेदार जी के साथ तेरा खुद कौशल्या ने बताया था मुझे.", पूर्णिमा जी ने एक और राज की बात खोली थी और ऋतू अपने मुँह पर हाथ रखे अपनी daadi-naani को देखने लगी जो अब थोड़ा खुल कर हंसने लगी थी.
"हाँ तोह न खेलती क्या? वही थानेदार जी 25 साल आपके साथ खेले और मेरे साथ 4 बार में हे किस्सा बन्न गया? वैसे सभी को बहोत बधाई हो हल्दी की. ये जॉन, हल्दी और मौली मेरी तरफ से आपके लिए कौशल्या जी.", अपनी दादी के साथ समय भी आयी थी और उसके हाथ से चंडी की थाली ले कर सुनंदा जी ने कौशल्या जी को बड़े आदर से सौंपी. ऋतू का तोह बड़ा दिल था ये किस्से सुन्न ने का लेकिन माहौल हल्दी का था तोह बड़े बखूबी जानते थे की कैसे बचो को अपनी बातो से दूर रखा जाए.
"ये तोह नहीं कहूँगी की इसकी जरुरत नहीं थी लेकिन सबसे जरुरी था तुम्हारा आना. अपने हाथ से हे हल्दी मिलवा दो सुनंदा, धुलवा मैं दूंगी या कहो तोह थानेदार जी को कहु?", अंत में भी कौशल्या जी ने अपनी संधान को लपेट हे लिया था जिस पर सुनंदा जी की वो शर्म से भरी मुस्कराहट बेहद प्यारी दिखी. एक खुशाल परिवार में ाची जीविका से कही ज्यादा बेहतर है सबका आपस में इतना प्यार, सम्मान और मनचाहे hansi-majaak जो परस्पर दिल को पसंद हो. उम्र एक मिथ है जो इन बुजुर्ग महिलाओ ने हमेशा हे दर्शाया था जब कभी ये एकत्र रही.
"गुड्डी, जा बेटी देख chai-paani का क्या इंतजाम है? इतने रिश्तेदार और मेहमान है लेकिन वो कामवाली भी नजर न आ रही और हलवाई वाले लड़के भी न दिख रहे.", देवकी जी ने पहली बार कुछ समझदारी की बात कही थी और आज तोह वो भी खुश दिखी. वजह थी कौशल्या जी का उन्हें देवरानी होने पर रेशम की साड़ी, गले का हार और 2 कड़े देना. कौशल्या जी ने खुद ऐसा नियम बनाया था की जब भी उनके परिवार में कोई विवाह अवसर हो तोह अपनी देवरानी को छोटी बहिन का नेग दे कर हे पहली रसम शुरू की जाए.
"जी दादी जी मैं देखती हु और लड़को को मैंने हे मन किया है इधर आने से. अलका, चल मेरे साथ.", अलका सीढ़ियों पे हिमांशु के साथ कड़ी उसको तस्वीरें लेने में लगाए थी. हिमांशु किसी भी मेहमान से ज्यादा घुलने मिलने की जगह या तोह अपने पिता या फिर आना नाना के साथ हे रहता. जबसे कैमरा हाथ लगा था, उसको अब इधर उधर घूमना भी बहाने लगा.
"यार तू काम करवाएगी अब?", अलका की लम्बाई कुछ ज्यादा हे लगती थी जब वो ऐसे चुस्त सलवार कमीज पहन लेती थी. लम्बी छोटी सीढ़ियों से उतारते वक़्त हे नागिन सी लहराती हुई उसके नितम्ब सेहला गयी. रेखा के साथ रोमिला अभी माधुरी के बाल सही कर रही थी और सलवार घुटनो से ऊपर. लेकिन अलका को इतने गौर से देख कर जाने क्या चमक आयी थी उसकी आँखों में और एक गहरी मुस्कान. प्रशंशा के साथ साथ बहोत कुछ था उसके चेहरे पर लेकिन गलत कुछ नहीं.
"काम तोह करना हे पड़ेगा मैडम. अंदर वह लेडीज के साथ साथ सभी लड़कियां है और ये वेटर लोग मुझे कही से भी ऐसे नहीं लग रहे जिन्हे गैलरी से आगे जाना देना चाहिए. कामवाली दीदी ऊपर के दोनों हिस्से साफ़ करने में लगी है तोह chai-paani हम दे तोह ठीक रहेगा.", ऋतू ने बहार आने के साथ हे अपना दुपट्टा सलीके से ले लिया था, जैसा अक्सर अफसाना या कोमल दीदी करके रखती थी.
"हाँ ये भी ठीक है लेकिन मैंने ये ड्रेस इसलिए नहीं पहनी थी.", बगीचे के पास आते आते अलका ने मुँह टेढ़ा करते हुए बचकाना चेहरा बनाया तोह दोनों हे हंसने लगी.
"कमीनी, तेरी इस ड्रेस ने जो केहर मचाया हुआ न उसका असर लड़को पे तोह छोड़ लड़कियों पे भी हो रहा है. रोमिला आंटी तोह शायद तुझे नजरो में हे खा चुकी. यही रुक, मैं पानी की ट्रे तुझे इधर हे ला कर देती हु.", प्रीती ने हँसते हुए अलका को घर से बहार आने से हे रोक दिया था. गुलाबी कमीज और सफ़ेद चिपकी हुई सलवार में अलका के शरीर का हर अंग पूर्ण कटाव के साथ दर्शित थी. सही मायने में अलका थी भी कुदरत की अनुपम जिवंत कृति.
"भैया, एक ट्रे में पानी के गिलास रख दीजिये और दूसरी में चाय के कप. हाँ जितने आये उतने रख दे, मैं खुद ले जाउंगी.", सभी को नाश्ता करवाने के बाद असगर और उसके साथी भी भोजन से फारिग हो कर बड़े पतीले में चाय बना चुके थे. बैठक की तरफ बैरे सेवा में लगे थे और अंदर के लिए उन्हें ऋतू ने स्पष्ट मन कर दिया था. बड़ी ट्रे में 15-16 गिलास एक व्यक्ति ने पानी के रख दिए थे और दूसरी में कप सजाने के साथ असगर खुद हे चाय बड़ी नजाकत से भरने लगा.
"बिटिया, आप कहे तोह हम भिजवा देते है. 2 ट्रे मुश्किल होगा लेकर जाना और मेरे पास ये 2 लड़के अभी खली हे है.", असगर ने शिष्टाचार से हे कहा था जिस पर अगली मधुर आवाज प्रीती की सुनाई दी.
"अंकल जी, 3 लोग 2 ट्रे आराम से ले कर जा सकते है. वैसे तीसरी ट्रे में नमकीन और मिठाई लगवा दीजिये.", प्रीती ठीक वैसे हे अंदाज में प्रकट हुई थी जैसा उसको ऋतू ने बनाया था इन गुजरे दिनों में. सफ़ेद सलवार कमीज और उसके ऊपर सतरंगी दुपट्टा. कलाई में दर्जनभर चूड़ियां और माथे पर छोटी सी लाल बिंदी. हमेशा खुले रहने वाले bhoore-badami बाल अब सलीके से एक रबर में बंधे थे. ऋतू उसको देख कर मुस्कुराई और उसके साथ कड़ी आकांक्षा को देख कर बड़े प्यार से अपने संग लगा लिया. आकांक्षा अपने chir-parichit अंदाज में थी, घुटने से 6 इंच निचे की लम्बाई तक की फूलो वाली फ्रॉक और naam-matra सी सज्जा के साथ. असगर ने भी इन बच्चियों को स्नेह से एक नजर देखा और फिर ध्यान दिया उस लड़के पर जिसको यहाँ सेवा में लगाया गया था.
"ओह लाला, तनिक 2 प्लेट लगाओ. एक में काजू बर्फी और दूसरे में दाल के समोसे. हाथ थोड़ा तेज और नजर काम पर.", फटाफट उसकी बात का अनुसरण हुआ और ये तीनो हे लड़कियां ट्रे उठा कर आगे बढ़ चली. अलका अब नदारद थी जो की होना हे था जब घर में इतने लोग आये हुए हो तोह. लेकिन इन तीनो के घर में जाते हे एक 'चटाक' की ाची खासी आवाज गूंजी और असगर बड़ी सख्त नजरो से उस युवक को घूर रहा था जिस से अभी अभी उसने 2 प्लेट लगवाई थी. वो युवक अपने गाल पर हाथ रखे बड़े आश्चर्य और दर्द से असगर को देख रहा था.
"देखो बीटा एक बात कान खोल कर सुन्न लो. जब घर से बहार काम के लिए निकले हो तोह भलाई इसमें हे है की दिल लगा कर अपना काम करो और aas-pas क्या है कौन है इस पर नजर नहीं. वो मालिक है जिन्होंने हमे काम दिया और हम सेवक है जो उनकी मेहरबानी से ghar-pariwar को रोटी खिला रहे है. बिटिया समझदार है जो तुम जैसे को मेहमानो की खातिर में नहीं लगवाया लेकिन तुम हो बेगैरत जो नजरो से हे namak-haraami दिखा रहे हो.", अभी तक असगर के 4-5 लोग भी काम छोड़ कर थोड़ा नजदीक आ खड़े हुए थे. युवक जैसे कुछ उद्दण्ड हे था, उम्र का वही गरम खून.
"तुम हो हलवाई उस्ताद जी और हम है होटल की तरफ से. पहली बात तोह हमने किसी का हाथ नहीं पकड़ा, दूसरा की देखने पर कोई पाबन्दी नहीं है और अब कान खोल कर सुन्न लो मेरी बात. कैंप में रहता हु और एक मिनट नहीं लगेगा तुम्हारे साथ इन चलो को ठिकाने लगाने में.", असगर उसके जोश को देख फीकी मुस्कान दिखता लड़के के कंधे पर हाथ रखते हुए बोलै. उसके साथी असगर से कुछ कहना चाहते थे लेकिन उसने उन्हें नजरो से हे मन कर दिया.
"या तोह काम कर लो बीटा या फिर बदमाशी. लेकिन जो भी करो अपने गूदे के दम पर करो. अब यहाँ से तित्तर हो जाओ इस से पहले की ब्राह्मण परिवार में मैं खाना लकड़ी की जगह तुम्हारे जिस्म को चूल्हे में लगा कर पकौ.", असगर sakht-jaan व्यक्ति था और उतना हे mridu-bhashi एक दिल का नरम इंसान भी. लड़का गुस्से में जाने के लिए पलटा हे था.
"और ये जब तुम्हारे पहचान वाले आ जाये तोह अकेले आ जाना मुझे बुलाने के लिए. इस घर के नजदीक कोई तमाशा नहीं चाहिए.", असगर ने तोह साफ़ साफ़ कह दिया था के वो जिन्हे चाहे बुला ले लेकिन मुलाकात विवाह वाले घर से कुछ दूर हे होगी.
"आ रहा हु और फिर माफ़ी न मंगवाई तोह नाम बदल देना. लेकिन तुम्हारी तबियत से तुड़ाई करने के बाद.", युवक अपना गाल सहलाता हुआ पैदल हे निकल लिया. असगर अपनी गलती के लिए ऊपर वाले से माफ़ी मांग कर मुस्कुराता हुआ काम में वापिस जुट गया. ऐसे अनिगिनत हादसे वो जीवन में देख चूका था जहा जोशीले लेकिन भटके हुए नौजवान गलतियां करने के बाद भी बदतमीजी करते थे.
घर के अंदर वही geet-ullaas का माहौल था जो अब कही बेहतर होता जा रहा था. पड़ोस वाली सरोज भाभी और मल्होत्रा जी की बेटी अब माधुरी के चेहरे पर हल्दी लेप रही थी और इस बीच हंसी मजाक भी जोरो पर था. विन्नी के साथ प्रियंका आगे आयी हल्दी लगाने तोह सरोज भाभी ने चुहल मस्ती में बाटी कही.
"बस आज माधुरी के लगा कर खुश हो लो तुम दोनों. ये हल्दी जब तुम्हे लगेगी न विन्नी तब समझ आएगा बकरी को इतना सजाया क्यों जाता है.", एक पल तोह सबको हे लगा था की ये बहोत बड़ी बात हे कह दी भाभी ने लेकिन ललिता जी ने तोह नहले पर दहला बहोत पहले हे सीख लिए था. कौशल्या जी कुछ कहती भी क्या इन बचो के बीच. बस मुस्कुरा दी.
"सरोज ने लगवाई थी हल्दी और आज बकरी से गाये बन्न गयी. सरोज, तू कहे तोह एक बार और लगवा दू तेरे हल्दी. विन्नी का देखा जाएगा जब लगेगी तब लगेगी, तेरा निखार जरुरी है.", सरोज के तोह शर्म से हाथ हे काँप गए इस निखार वाली बात पर और दबे मुँह सभी हंस रहे थे.
"ललिता भाभी, पहले ये तोह पक्का कर लो सरोज की जमीन पर हल्दी टिकेगी या तैयार करना पड़ेगा. हाँ सरोज, तू हे बता दे जरा.", मधु ने जो चुकहल की थी उस से कृष्णा जी की भी हंसी न रुकी क्योंकि ये द्विअर्थी संवाद बस यही लोग समझ सकती थी. सरोज तोह शर्माती हुई अपनी नामधारी सरोज मौसी और रेखा जी की बगल में जा बैठी.
"वह क्या लुक रही है ऋ? उस सरोज की छोरी ने भी इधर से हे हल्दी लगवाई है. बुलाओ हल्दी लगाने वाले को.", ये सब बात इतनी धीमी हो रही थी की बस आसपास के गिने चुनो को हे सुनाई दी. अब तोह रेखा जी भी शर्माने लगी थी अपनी जेठानी की बात पर. सरोज मौसी ने भी मुँह पर हाथ रख लिया था और एक नजर अपने से दूर कड़ी मंजू को देखा जो रुपाली के साथ किसी चर्चा में लगी थी.
"देखो ये आप लोगो का मजाक तोह हमारी समझ में आ नहीं रहा. ऐसी बात करो जो पता तोह चले. हल्दी, जमीन क्या है ये सब?", विन्नी की बात पर बाकी सभी ने मुस्कुरा कर एक दूसरे को देखा और ये मजाक यही रोक दिया. एक बार फिर से गीत और रिवाज जारी हुए. पुराने सलवार कमीज में बैठाई हुई माधुरी के घुटनो, बाहों, गर्दन और चेहरे पर सभी ने हल्दी लगाईं थी. संजीव के तोह ये रसम विवाह वाले हे दिन करनी थी जिसके लिए सरोज भाभी को पहले हे बताया जा चूका था.
"कोई अर्जुन को भी बुलाओ, उसकी बहिन है बड़ी.", कौशल्या जी ने जब देखा की अब रुपाली और ऋतू का क्रम आ चूका है तोह ध्यान आया के अर्जुन तोह यहाँ आया हे नहीं.
"ारु बैठक में है दादी, नाना जी और दादा जी के पास.", ऋतू ने माधुरी दीदी की पिंडलियों पर लेप लगते हुए जवाब दिए.
"जा रेनू, बुला दे जरा उसको भी.", कौशल्या जे ने अपने करीब हे कड़ी रेणुका से कहा तोह वो तुरंत हे उधर की तरफ चल दी. लेकिन कौशल्या जी के तोह जैसे मैं में कुछ और हे चल रहा था और वो मुस्कुरा रही थी.
"ओह छोरियों, पता है न उस बैलबुद्धि के साथ क्या करना है? सबके बीच आ तोह रहा है लेकिन पीला हो कर वापिस न गया तोह तुम सबकी खैर नहीं.", अर्जुन के लिए खुद दादी ने ऐसा कहा तोह सभी हैरत से उन्हें देखने लगी और जवाब ललिता जी ने दिया.
"ये भी शगुन है जिसमे लड़की के छोटे भाई को ऐसे हल्दी रंगने का मतलब है की बहिन के जीवन के साथ उसका भी एक अटूट रिश्ता बन्न जाता है जब विवाह हो रहा हो. ये भाई का हे कर्त्तव्य है की अब वो पहली बार खुद हे अपनी बड़ी बहिन को उसके ससुराल छोड़ कर आये और जब भी lana-lejana हो तोह ये जिम्मेवारी उस छोटे भाई की हे रहेगी. हाँ अगर अर्जुन इस हल्दी से अगर बच गया न तोह समझ लेना तुम सब फ़ैल हो.", ललिता जी ने इस masti-majaak के पीछे एक गहरी बात भी कह सुनाई थी. सभी लड़कियां जुट गयी उस तगड़े घोड़े पर नकेल डालने में. इधर अर्जुन मुस्कुराता हुआ आया तोह स्वागत हुआ कटीले बानो से.
"आया कपूत अपनी बहिन की रसम में..
न खोज न खबर, फिर मलंग जग भर में..
बननी देख ले ये तेरा ख़याल कैसे रखेगा..
कल ब्याह के तू ससुराल चली जायेगी..
अपनी बहिन भुला के लुगाई ले आएगा..
देरी से आया कपूत, अपनी बहिन की रसम में.."
अर्जुन तोह ये गीत सुन्न कर हे हैरान था और बाकी सभी मंद मंद मुस्कुरा रहे थे उसकी हालत पर.
"दादी, मुझे यहाँ क्यों बुलाया? आप तोह कह रही थी की यहाँ सिर्फ लेडीज हे रहेंगी.", अर्जुन इस घेरे के पहले हे रुक कर कौशल्या जी से पूछने लगा. 15-16 औरतो का झुण्ड और फिर उसके आगे ढोलक बजती हुई रूचि जो हंस भी रही थी मधु के साथ साथ. जहा माधुरी सबसे आगे और बीच में बैठी थी उसके ird-gird तैयारी के साथ बाकी सभी लड़किआं खामोश हे रही. सीढ़ियों पर बैठी Jasleen-Gurdeep भी मजा ले रहे थी इस सबका.
"अरे तोह मर्दो को मन किया था न लेकिन तू तोह घर सबसे छोटा है और हल्दी तेरे हाथ से भी लगेगी तेरी बहिन के. जा के आशीर्वाद ले माधुरी का और तेरी ताई का. फिर हल्दी लगा."
"ताई जी के भी लागू?", अर्जुन ने एक बार अपनी खिली हुई ललिता ताई को देखा और फिर अपनी दादी से जो सवाल किया तोह सभी हंसने लगे.
"ओह बैलबुद्धि. ताई तेरी behan-bhabhi नहीं है जो उसके हल्दी लगाएगा. आशीर्वाद ले उसका और फिर माधुरी के हल्दी लगनी है.", अर्जुन को जब रेणुका अंदर लेके आयी थी तभी संजीव को मामला संगीन लगा. वो जाली वाले दरवाजे के उस पार से ये सब देख रहा था. अर्जुन इन सभी को लांघ कर मुस्कुराता हुआ ताई के करीब आया और झुक कर आशीवार्द लेने हे लगा था की भैया की आवाज सुनाई दी.
"छोटे तुरंत निकल वह से.", अर्जुन को तोह कुछ समझ हे नहीं आया और उसके झुकते हे मधु बुआ ने सरसों के तेल की भरी गड़वी उसके सफ़ेद कुर्ते पर उलट दी. रुचिता ने उस तरल के ऊपर पूरी थाली सूखी हल्दी की और जबतक अर्जुन कुछ समझता दोनों बुआ ने उसके लिपाई कर दी थी उसके बाल समेत.
"ये क्या है?", अर्जुन इधर उधर देख कर भोचक्का से पूछ रहा था. लेकिन ललिता जी के दोनों हाथ से आशीर्वाद की जगह मुठी भर भर के हल्दी ने उसके चेहरे को पॉट दिया जो गर्दन से सीने तक गया. और इस से पहले की वो हिलता या निकलने की कोशिश करता 2 बुआ ने उसको बगल से घेरा और पीछे से जाने कितने हे हाथ उसको तसल्ल्ली से haldi-teil में रंगते हे चले गए.
"अभी भी बोल रहा हु वह से निकल ले अर्जुन.", हंस तोह संजीव भी रहा था उस पीले रंग के मुजससम्मे को देख कर लेकिन जैसे उसको पता था की अभी बहोत कुछ होने वाला है. सरोज भाभी ने थोड़ा नखरे से कहा.
"छोड़ो आंटी जी मेरे देवर को. ऐसे थोड़ी न करते है इतने ाचे लड़के के साथ. देखो ऐसे करते है हल्दी लड़की के भाई की.", सभी हंसती हुई दूर हुई थी और अर्जुन को भी लगा था के शायद सरोज भाभी उसको बचा रही है लेकिन उन्होंने तोह हल्दी, तेल और पानी का घोल उसके पाजामे के अंदर तक उड़ेल दिया. चेहरे से पाँव तक अब वो हल्दी तेल में सना था जिसकी लाजवाब तस्वीरें हिमांशु ने कैमरा में क़ैद कर ली थी.
"दादी... देखो अब इन सबकी क्या हालत करता हु.", अर्जुन किसी छोटे बचे की तरह गुस्सा हुआ था क्योंकि ये सब उस अकेले के साथ इतने लोगो ने क्या था, धोखे से.
"अरे.. आप तोह इतने में हे रोने लगे मुन्ना. कल को तोह तुम्हारे नाम के साथ साला जुड़ेगा, तुम्हारी लुगाई आएगी तोह वो भी साली बनेगी. तब भी गुस्सा करोगे? अब ये अकड़ दिखानी बंद कर दो देवर जी. एक बहिन के लिए भाई का ऐसा समर्पण होना चाहिए जिस से वो कभी आहात न हो. और हमने तोह सिर्फ हल्दी लगाईं है, कपडे थोड़ी उतार दिए.", सरोज भाभी ने मजे मजे में हे अर्जुन को व्यंग के साथ एक सच्चाई से परिचित करवा दिया था. उसके चेहरे पर भी चमक आ गयी कुछ सोच कर.
"सही कहा भाभी जी आपने. और दादी जी सॉरी.", अर्जुन की माफ़ी भी हँसते हुए देख कौशल्या जी को आभास हो गया था के ये जरूर कुछ ऐसा करने वाला है जिसकी किसी को खबर नहीं. और अर्जुन ने अपने चेहरे, गर्दन पर लगी हल्दी ाचे से उतार कर सरोज भाभी के चेहरा पर पॉट दी. अभी मधु बुआ कुछ समझती उस से पहले हे उनके भी गाल सरसों के तेल और हल्दी से पीले हो चुके थे. ऐसा हे अर्जुन ने पीछे हैट रही रुचिता के साथ किया और फिर तुरंत फुर्ती से माधुरी के पीछे जा खड़ा हुआ.
"बहनो के साथ हल्दी नहीं खेल सकता लेकिन जिन्होंने फंसाया उन्हें तोह सबक सीखा हे सख्त हु.", पूर्णिमा जी भी उसकी हरकत देख गदगद हो गयी. अब भी सभी लोग हंस रहे थे लेकिन इस बार शकल उतरी थी अर्जुन की जगह उन तीनो की.
"माँ, यु छोरा मेरे हाथ चढ़ गया तोह रेल बना दूंगी मैं इसकी. अर्जुन बीटा दत्त जा तू, मैं बताऊ देख तन्ने.", रुचिता को इस मस्ती में झूठा गुस्सा करते देख अर्जुन ने रसम वाली थाली उठा ली जिसमे ढेर सारा लेप बचा हुआ था.
"बुआ, तन्ने मैंने छोडो और जो अगर आप पास भी आयी न तोह आपके कपड़ो के साथ साथ बाल भी पीले कर दूंगा. डॉक्टर दादी जी, फिर आप मैट कहना मुझे कुछ.", अर्जुन ने यशोदा जी को चेताया जो हंस रही थी इनका हुड़दंग देख कर.
"माँ ने के पूछे है? तू हाथ तोह चढ़ फेर देख या थाली कड़े कड़े रगडूंगी.", रुचिता भी आगे बढ़ने में हिचक रही थी लेकिन अर्जुन को सिर्फ उस पर नजर रखने की तगड़ी कीमत चुकानी पड़ी. मरीना कब फर्श पे घुटनो के बल बैठती हुई ठीक अर्जुन के करीब आ गयी उसको पता न लगा लेकिन बाकी सभी मुँह पर हाथ रखे अर्जुन के साथ होने वाली घटना का सोच हे हंस रहे थे.
"बुइ.. थिस इस नॉट राइट.. युक...", मरीना ने थाली को अपने ऊपर हे खींच लिया था जिस से सारा घोल उसके चेरे से होता हुआ सलवार कमीज तक को भिगो गया.
"हाहाहा.. ये जयचंद वाले काम करोगी मरीना तोह ऐसा हे होगा.", अर्जुन के ऐसा कहते हे रुचिता बुआ भी गाला फाड़ के हंसने लगी. सभी का वैसा हे हाल था और मरीना पाँव पटकती हुई अपनी बुआ की तरफ बढ़ी तोह उन्होंने भी उसको रोक दिया.
"न न मेरी लाडो. पहले न तू कपडे बदल ले जे मेरे गले लग के रोना है तोह. ांनी भाभी, देख ले इसके खातिर भी ेब कोई जाट या रुस्सियन. हल्दी ले गयी या तोह अर्जुन से.", माहौल जितना खुशनुमा अभी हुआ था इसकी उम्मीद तोह खुद कौशल्या जी को भी नहीं थी. यहाँ कोई किसी से नाराज होने वाला था हे नहीं. हंसी ख़ुशी से भरे इस पल में फिर अर्जुन ने भी उतने हे प्रेम से अपनी बड़ी बहिन के चरणों और चेहरे पर थोड़ी हल्दी लगा कर इस रसम को पूरा किया. कुछ और गीति गाये गए थे जिनके बाद माधुरी नहाने गयी और अर्जुन भी ऊपर वाले अपनी तरफ के बाथरूम में चल दिया. आँगन की सफाई में तुरंत काम वाली बाई लगा दी गयी थी और बहार अब दोपहर के खाने का समय होने हे लगा था.
"देख ये सही मौका है तेरे पास. जा और कर ले प्यार ारु के साथ. वैसे भी उसको जरुरत है और तुझे भी.", ऋतू ने बड़े हे धीमे स्वर में अलका से कहा था. लड़कियां अपने हिस्से की तरफ या फिर बहार वाले आँगन में भोजन के लिए जाने लगी थी. ये दोनों हे इधर आँगन में एक तरफ कड़ी थी.
"पागल है क्या यार तू? गलती से कोई भी उधर आ गया न तोह. ऊपर से संजीव भैया भी घर पे मौजूद है.", अलका का दिल तोह ऋतू की बात सुन्न कर हे खुशो हो गया था लेकिन डर अपनी जगह सही था.
"चिंता क्यों करती है? भैया अभी एक घंटे से पहले तोह फ्री नहीं होने वाले क्योंकि लकी भैया आये हुए है और ये सभी अब लंच करेंगी और उसके बाद कपडे बदल कर आराम. अर्जुन ने हे कहा था मुझे की वो तुझे उस से मिलने के लिए भेजे. बाकी इस तरफ से कुण्डी लगा लियो अंदर से. मैं तेरे साथ हे लंच करुँगी."
"दिल तोह तेरा भी है. फिर मैं क्यों?", अलका के प्रश्न पर ऋतू ने अपने माथे पर हाथ रख लिए.
"तू जा न यार. वो मैं आज रात उसके हे पास रहने वाली हु लेकिन तू अभी जा.", अलका इतना सुन्न कर हिरणी की तरह कुलांचे भर्ती हुई सीधा उधर दौड़ गयी जिधर अर्जुन गया था. टेबल के पास कड़ी प्रीती ने बोहेन उचका कर ऋतू को इशारा दिया तोह ऋतू ने शर्म से नजरे झुका ली और उसकी हे तरफ चल दी.
"आपका भी पता नहीं चलता कुछ. वैसे सही किया जो अलका दीदी को कहा.", प्रीती की बात पर ऋतू ने सवालिया नजरो से देखा जैसे पूछ रही हो की इसका क्या मतलब हुआ.
"वो मेरी मामी फुल लट्टू है ारु पे और देख लेना मेरी माँ उन्हें अर्जुन के साथ शाम को मार्किट भेजने वाली है.", प्रीती की बात सुन्न कर ऋतू को चिंता होने लगी थी.
"ये रोमिला आंटी का भी दिमाग हिल गया है यार. मुझे तोह समझ भी नहीं आ रहा के वो ऐसा कर हे क्यों रही है."
"क्यों का तोह मुझे भी नहीं पता लेकिन आप कैसे भी करके अर्जुन को बिजी कर दो. अर्जुन ने एक बार कहा था के अलीशा मामी बहोत सुन्दर लगी उसको. और वो एक मातुरे लेडी है तोह अर्जुन का क्या हो सकता है आप समझ सकती हो.", ऋतू ने हामी भरी जैसे वो समझ रही हो.
"तुमने ऐसा क्यों कहा की अलका को भेज कर सही किया?"
"उन्हें मेरी माँ बड़ा नोटिस कर रही थी. देख लेना वो जरूर पूछने वाली है अलका के बारे में और जहा तक मेरा दिमाग कहता है वो उनकी पेंटिंग बनाने वाली है. मतलब पता नहीं उनकी ये क्या फंतासी है?", प्रीती की पूरी बात समझ आ गयी थी ऋतू को.
"ठरकी है रोमिला आंटी, सीधा बोल न. मुझे भी पता है लेकिन विन्नी दीदी की तोह उन्होंने राजकुमारी वाली पेंटिंग बनाई थी."
"हाँ तोह वो खुश करने के लिए बना दी होगी या फिर प्रोजेक्ट होगा. लेकिन आप अगर अभी मेरे साथ चलो तोह मैं दिखती हु उनके वो कैनवास जो हमारे कभी हाथ हे नहीं लगे थे. मरीना की माँ तक की नुदे पेंटिंग है उनके पास.", ऋतू अलग हे तरह मुस्कुराई ये सुन्न कर और प्रीती के गाल लाल हो गए थे.
"तू भी न काम नहीं है कुछ. चल अभी तोह हमको यही रुकना पड़ेगा और अगर तू चाहे तोह लंच कर ले इतने. आकांक्षा और अफसाना तेरा इन्तजार कर रही होंगी. मैं जरा चौकीदारी कर लू उन दोनों की.", ऋतू की बात सुन्न कर प्रीती भी हंसने लगी. उसको भी यही ठीक लगा की आकांक्षा और अफसाना को व्यस्त हे रखा जाए. उधर ऊपर वाले बाथरूम में दरवाजा हलके से बजने पर अर्जुन ने एहतियात से खुद को ढकते हुए दरवाजा खोला तोह आँखें चुंधियाँ गयी. अलका पूर्णतया निर्वस्त्र ऐसे कड़ी थी जैसे शेरनी शिकार से पहले जंगली सांड को निहार रही हो.
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"होनी को कौन ताल सकता है कुमार? ऊपर से कुमारी अनामिका में जीने की आस हे नहीं थी. तुमने कितनी सेवा की चाहे रो रिश्ता रखने लायक थी या नहीं लेकिन एक भाई का सही फ़र्ज़ तुमने फिर भी निभाया.", महल के इस बड़े से आँगन में हुक्के सजे थे और हर तरफ दीवान, मुद्दे पर 8-9 करीबी लोग बैठे थे और सारंग इस व्यक्ति की बात सुन्न कर कुछ खामोश हे रहा. ये 70 बरस के आसपास का हलकी तोंद वाला व्यक्ति था सारंग का बड़ा जीजा रमाकांत सिंह, तहसीलदार. सफ़ेद कुर्ते और धोती में वो अकेला उस दीवान पर बैठा शिद्दत से हुक्का गुदगुदाते हुए अपने विचार रखने लगा.
"जीजा जी, हमने जो किया वो कभी एक भाई नहीं कर सकता और आप ये सबसे बेहतर जानते है. तब जोश कही और था और परवाह तोह आज तक हम किसी की नहीं करते लेकिन गलतियां अनगिनत हुई उस वक़्त.", सारंग हुक्के की जगह सिग्गट के काश लगा रहा था. एक मेहरी सभी के सामने चाय रखने के बाद अंदर चली गयी. बाकी जो भी व्यक्ति यहाँ बैठे थे वो या तोह रमाकांत की तरफ से उनके मित्र थे या सारंग के. वो सभी इनसे कुछ दुरी पर अपनी हे चर्चा में लगे थे, अलग हुक्के के साथ.
"ऐसा तोह नहीं कुमार की उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद तुम पछतावा कर रहे हो? जो नियम तोड़ेगा वो बहार या सजा का हक़दार होगा. हम तोह यहाँ इसलिए आये है की तुम्हे शौक है और वो घराने में जन्मी थी जहा के हम दामाद है. हमारी तरफ कुछ ऐसा हो तोह नौबत इतनी नहीं आती. मौके पर हे फैंसला और सजा. चलो जो हुआ सो हुआ, अब आगे क्या करना है इस पर विचार करो.", रमाकांत की बात गलत थी और सारंग रिश्ते की कदर करता था जैसा जीवन भर करते आया था. लेकिन ये शौक का समाया था जहा ऐसी बातें रमाकांत को करनी नहीं चाहिए थी.
"नियामत तोह अतीत में भी ढेरो टूटे है जीजा जी और आप भी तोह उनकी जड़ में आये थे. क्या फैंसला हुआ और किसको सजा मिली?", सारंग ने ये बात बड़े हे नरम लहजे में कही थी लेकिन रामकांत कुछ पल खामोश हो गया. फिर एक गहरी सांस भरते हुए उसने झूठी हंसी से कहा.
"रघुबीर ने भुगति तोह थी वो भयानक सजा. 2-2 बार भुगति और मान लेते है की इसमें हमने नीलिमा को खोया लेकिन वो हमारे हाथ लग जाती तोह ज़िंदा उसको भी दफना देते.", रामकांत के ऐसे तेवर अगर कोई बहार व्यक्ति देख लेता तोह सेहम जाता. एक बाप अपनी खुद की बेटी को मारने की बात सोच भी कैसे सकता था.
"रघुबीर सिंह को हम भी नहीं गिरा पाए थे जीजा और वो सजा तोह कही से भी सजा नहीं लगती जिसमे एक युवक अनगिनत लाशें गिरा दे. वो युवक असाधारण था, हमारा गिरेबान पकड़ने वाले किसी शक्श के लिए ये खुद हम कह रहे है की वो अर्जुन सिंह सचमुच असाधारण था जीजा जी. जिस बेटी को आप दफ़नाने की बात कर रहे है, उसकी हे वजह से शायद हम और आप जीवित है. उस योद्धा ने बलिदान दिया था, बलिदान. हम आज भी रघुबीर सिंह के परिवार को नेस्तोनाबूद करना चाहते है और पंडित रामेश्वर जी के भी परिवार के हर वारिस को मिटाना चाहते है लेकिन इसका खेद रहेगा की हमे मात देने वाले से हमारी कभी दूसरी मुलाकात न हो सकीय.", सारंग की बात पर रामकांत पलभर के लिए झेंपा लेकिन फिर कुटिलता से मुस्कुरा दिया
"शेर का शिकार कैसे भी हो कुमार, शिकार तोह हुआ हे. उसके बाद बस मलाल रहा तोह वो रघुबीर सिंह का रहा. उसका गरूर तोड़ने में नाकामयाब हुए तोह वजह बस तुम्हारा पीछे हटना था. नीलिमा को हम खयालो से निकाल चुके है और अर्जुन सिंह के जाने से रघुबीर असहाये था जिसके घुटने टिकवाने की चाहत पूरी न हुई.", रमाकांत ने चाय का कप उठाने से पहले वही रखे जग से पानी जातक कर कुल्ला करके अंगोछे से मुँह साफ़ किया और चाय सुड़कने लगा.
"वो समय हमे भी याद है जीजा जी और पंजाब के राजघराने की खटपट, पंडित रामेश्वर जी की दखल से हम उतने मजबूत नहीं थे. वह टकराव हो जाता तोह शायद वो दोनों दुनिया से रुखसत हो सकते थे लेकिन वजूद हमारा भी न रहता. नील उतना योग्य नहीं था और पुष्पक स्कूल का विद्यार्थी था. और कही मुठभेड़ में वो बच जाते तोह शायद हम हे raaj-gharane में पूरी तरह दोषी साबित हो जाते. अब हम सक्षम है लेकिन रघुबीर सिंह नहीं है.", सारंग को मलाल था लेकिन ये पूरी तरह सत्य भी नहीं था के वो उतना सक्षम है या नहीं.
"रामेश्वर तोह है लेकिन तुम्हे अब व्यापार और रसूख ने बाँध कर लाचार कर दिया है."
"हमारी पहल से पुष्पक खिलाफ हो जाएगा जीजा जी. उसने ये स्पष्ट कहा था की जो सीमा लंगेघा वो दूसरे की तरफ चला जाएगा. इंद्रनील ने दहशत फैलाई है, राज अब उसको जारी रख सकता है लेकिन संगठन और बाहुबल में ये दोनों हे पुष्पक के सामान नहीं है. हम बस प्रतीक्षा कर रहे है की बस एक बार उनकी तरफ से पहल हो जाए और मेरा ये शेर फिर हमारी तरफ से लड़ेगा."
"एक राजा हो कर तुम साधारण परिवार से टकराने में हिचक रहे हो कुमार. ऐसा क्या है उस रामेश्वर के पास? रिटायर्ड पोलिसवाले जिसके पिता तुम्हारे हे पिता के मुंशी थे. या फिर रघुबीर सिंह का वो बीटा जो जैसे तैसे परिवार बचा रहा है अपना?"
"आप जानते है हम आज इस घराने के वारिस क्यों है? बात साधारण की है तोह देख रहे है की हम उन्हें आज भी 'जी' लगाए बिना सम्बोधित नहीं करते.?", सारंग हल्का सा तैश में आ चूका था जिस पर रमाकांत गौर करने लगा.
"क्या वजह है? यही की वो कभी तुम्हारे साथ बड़े भाई की तरह रहा है या साथ शिकार किया, खेले कूड़े. कृष्णेश्वर तोह आज भी तुम्हारे हे करीब है जिसके पास मुंशी की वो साड़ी संपत्ति है.", सारंग ने इतना सुन्न कर एक बार गहरी सांस भरी.
"उस घराने में असली वारिस है पंडित रामेश्वर शर्मा जी. महारानी प्रभा देवी, उनकी बहु के साथ साथ कुमारी लक्षिका की हत्या के अपराध से हमे विमुक्त करने की सजा थी हम ख़ामोशी से वो घरना छोड़ कर निकल जाए.", ये सच जैसे कभी किसी को मालूम हे न था और रमाकांत की आँखें हे फ़ैल गयी.
"वो राजा है?"
"नहीं, उन्होंने खुद को संरक्षाक मान लिया लेकिन राजमाता के अधिकार से वो कभी भी मालिक बन्न सकते है. कृष्णेश्वर भी सिर्फ उस जमीन का मालिक है जो मुंशी जी को मिली थी और दोनों भाई के बीच बराबर बाँट दी गयी थी.", सारंग अतीत की ये बात कह कर खामोश सा हो गया. कुछ पल रमाकांत भी सोचता रहा की ये रामेश्वर शर्मा कैसा इंसान है.
"फिर भी मालिक तोह नहीं बनाया जा सकता ऐसे किसी को?"
"कुमारी लक्षिका विवाहित थी उनसे जिसका तकाजा हमे नहीं था. वो जब 13 बरस की थी तभी उनके लिए पंडित रामेश्वर जी को रोक लिया गया था. फ़ौज से इसलिए हे वापिस बुलवाया गया था की एक बार उनका विवाह सार्वजनिक किया जाए और शाही तरीके से धूम धाम से पंडित रामेश्वर जी को भावी राजा घोषित किया जा सके. हम नासमझ थे उस समय और जोश में वो सब कर गए जो कभी भी नहीं होना चाहिए था. बस आजतक ये नहीं पता चला की वो ऐसे ख़ामोशी से कैसे विवाहित थे.", सारंग के चेहरे पर दुःख के भाव आये और पल में हे गायब भी हो गए.
"तहकीकात करवाओ फिर तोह कुमार. वैसे यही वजह थी जिस से तुम रामेश्वर से नफरत करते हो?"
"हाहाहा.. इस सबका तोह कभी जीकर भी नहीं हमारे बीच. मुझे बड़ी ख़ुशी होने लगी थी ये सोच सोच कर की जब उन्हें पता लगेगा की उनकी बीवी का कातिल मैं हु तोह वो बदला लेने आएंगे और फिर मैं उन्हें दिखाऊंगा की उन्होंने कितनी बड़ी गलती की थी कुमार सारंग पर हाथ उठा कर."
"ये जीकर तोह तुमने आजतक हमसे नहीं किया?", यहाँ ये दोनों भूल गए थे की एक शौक सभा चल रही है जिसमे खुद सारंग की हे बहिन का संस्कार कुछ समय पहले हुआ है. लेकिन आज जैसे सारंग अपने दर्द को बहार निकलने की ठान चूका था.
"रघुबीर सिंह को जब अपमानित किया था न जीजा जी तबतक मामला सही था. अगले दिन पंडित रामेश्वर जी ने वो किया था जिसका दर्द हमारे दिल में नासूर बन्न कर हर पल उभरता है. उनके वो शब्द की राजा रामेश्वर तुम्हे हुकुम देता है की अगर आइंदा उनकी रियासत में मैंने कदम भी रखा तोह कुत्ते का पत्ता मेरे गले में होगा और उनकी जूती मेरे सर पे. किसी ने भी कुमार सारंग के चेहरे को बिंजा इजाजत छुआ तक नहीं लेकिन पंडित... रेश्वर ने हमारे चेहरे को लहूलुहान कर दिया था.. जीजा वो तोहमत और जलालत आजतक हमारे दिल में किसी फांस की तरह चुबती है. एक कुमार को गिरेबान से घसीट कर उसने मुझे सरहद के इस पार भेज दिया. हम 100 हत्या करे या 1000 लेकिन उनकी सजा भी इतनी बड़ी नहीं जितनी रामेश्वर ने मुझे दी.", सारङग के नथुने फूल चुके थे और कनपटी से पसीना रिस्ता हुआ उसका उग्र गुस्सा साफ़ बयां कर रहा था. इस गर्जना को सुन्न कर एक बार तोह वह बैठे वो लोग भी सेहम गए जिन्हे पहले इनकी बात सुनाई तक न दे रही थी. कुमारी लतिका भी इस तरफ के दरवाजे आ कड़ी हुई तोह एकाएक सारंग बर्फ सा ठंडा पड़ गया.
"आप यहाँ से जाए कुमारी लतिका.", सारंग शांत हो गया था और बेटी भी कुछ कहे बिना वापिस चली गयी.
"हमे माफ़ करना हमारे व्यवहार के लिए जीजा. अब तोह आप जान गए होंगे की पंडित रामेश्वर जी कौन है? हाँ उन्होंने कुछ समय पहले राजपरिवार का वो ghosna-patra बदलवा कर सबकुछ उन्हें हे सौंप दिया सिवाए कुछ जमीनों के. लेकिन फिर भी वो साधारण नहीं है. उनके तीन में से 2 बेटे तोह उस वक़्त भी सनकी हत्यारे थे और आज बड़े ओहदे पे होने के बाद भी उनकी मारकाट जारी है. वह हमारी दखल नहीं और इधर उनकी दखल नहीं. जब नियम टूटेगा तोह परहाह भी करेंगे. चलिए भोजन का समय हो गया है, हाथ मुँह धुलवा देते है.", सारंग अतीत को याद करने के बाद अंदर से असहज हो चूका था और रमाकांत हैरान था की कोई इतना बड़ा raaj-paat कैसे त्याग सकता है. क्यों रामेश्वर शर्मा ने सबकुछ जान ने पर भी सारंग से बदला न लिया? इन्ही विचारो के साथ ये लोग दूसरी तरफ चल दिए जहा भोजन व्यवस्था थी.
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उस गुलाबी कमनीय काया को गॉड में लिए अर्जुन हॉल कमरे के हे बड़े बिस्टेर तक चला आया. नहाने के समय halki-fulky प्यार भरी मस्ती ने ऐसा असर दिखाया था की अलका के कंधारी अनार से बड़े और सख्त चुचो के गुलाबी निप्पल कड़क हो कर सुई से तन्न चुके थे. एक अलौकिक सा असाधारण खूबसूरत जिस्म जिस से स्वयं कामदेवी भी ईर्ष्या करे, उतने हे बेजोड़ और purn-kataav लिए मांसल जिस्म के मालिक की गॉड में था.
"तुम्हे मेरी याद भी आती है? याद है इस कमरे में हे तुम कैसे मुझे स्मूच करते थे जब भी मौका मिलता था? हर ड्रेस की तारीफ करते थे और बर्थडे पे भी सबसे पहले अपने पास आने की ज़िद्द की थी..", अलका को बड़े हे प्यार से उस नरम बिस्टेर पर लिटा कर अर्जुन भी बगल में लेता उसके जिस्म की वो कस्तूरी से ज्यादा मादक गंध साँसों में समेटने लगा. गोल सुडोल स्टैनो से निचे 3-3 पसलिया भरपूर नुमाया थी अलका की. पेट कुछ अंदर की तरफ और उतनी हे रेशमी गुलाबी त्वचा. लम्बी सुडोल टांगो के बीच हलके हलके रोये बता रहे थे के अब वो उतना ध्यान नहीं रख रही जितना अर्जुन के लिए पहले रखती थी.
"मैं वो पल नहीं आने देना चाहता जब तुम्हे लगे की मेरा दिल भर गया है. दिल कभी नहीं भरता अलका बस ऐसे लगातार मिलान से कुछ समय की विरक्ति दोनों में हो सकती है. अब जो पहले गर्लफ्रेंड थी वो कुछ ज्यादा हो चुकी है. मेरी तारीफ करना तुम्हे हे भारी पड़ेगा.", अर्जुन ने एक उभार को सहलाने के साथ साथ लम्बी सुराही सी गर्दन से बाल हटते हुए अपने होंठ टिका दिए. इस स्पर्श मात्रा से अलका की एक सुदल टांग अर्जुन के ऊपर आ गयी. सिसकारी लेती हुई वो पूरी तरह तैयार थी लेकिन अर्जुन जैसे अभी सतना चाहता था उसको. थोड़े अतिरिक्त दबाव से एक उभर को दबाते हुए वो गुलाबी चूचक उमेठा तोह अलका धनुषाकार सी बिस्टेर से कमर उठाने लगी. जांघ के जोड़ो के बीच 3 इंच की सुर्ख लकीर और पहले हुए लैब लालायित थे एक गहरे मिलान के लिए.
"आह्ह्ह्हह.. थोड़ा आराम से दबाओ इन्हे.. उम्मम्मम", उत्तेजित हो कर वो खुद हे अर्जुन को अपने ऊपर लाने लगी जो मुश्किल काम था. बाथरूम में पहले हे अर्जुन ने उसके दोनों उभार चूस चूस कर सख्त कर दिए थे और अब जैसे वो उनकी सख्ती कुछ नरम करने में लगा था. दिल में अलग सा डर भी था की इस घर में ढेरो लोग है और इस बीच वो अमर्यादित kaam-krida में लिप्त.
"ऋतू से मैंने खुद हे कहा था के वो तुम्हे मेरे पास आने को कहे. अभी भी लगता है मैं तुम्हारी अनदेखी कर रहा हु?", अर्जुन थोड़ा उचक कर अलका के चेहरे पर आया तोह वो मस्ती में गर्दन ना में हिलती हुई उसके सर को झुका कर तन्मयता से होंठो को पीने लगी. अलका चुम्बन में अब जैसे अर्जुन से आगे हो चली थी जो खुद अर्जुन ने मेहसुस किया जब उसकी जिव्हा की जड़ तक अपने होंठो में भर कर अलका ने सम्पूर्ण मुखरास निचोड़ लिया. किसी कुल्फी की तरफ वो पूरी जीभ को एक सिरे से जोड़ तक अपने दांतो में दबा कर पीने के साथ निचले हाथ से अर्जुन के vajra-ling को कास के दबती हुई तैयार करने लगी.
"उम्मम्मम्म.. ज्यादा टाइम नहीं है.. और तुम जल्दी जल्दी फ्री भी नहीं hote...aahh..", अलका के कथन पर अर्जुन झेंपता हुआ सा उसकी टांगो के बीच आ बैठा. दोनों टाँगे घुटने मोड अलका ने पाँव बिस्टेर पर टिकाये थे. अब तोह उसको अर्जुन से रत्तीभर शर्म न थी क्योंकि दिल से वही उसका सर्वोसर्वा था. अर्जुन को भी उतना हे प्रेम था बस खुद को रोके रखना कोई मज़बूरी. इस पल में वो आँखें मूंदे अलका की चिकनी जांघो को ऐसे सहलाने लगा जैसे वो इनका स्पर्श अपने साथ मफूज रखना चाहता हो. महीनो की कसरत और भरपूर देखभाल ने हे अलका को इस हुस्न की मालकिन बनाया था.
"टाइम वास्ते कर रहे हो तुम.", अलका को मजा आ रहा था लेकिन अर्जुन ने आग इतनी भड़का दी थी की उसने अपनी एक ऊँगली से खुद हे योनि पटल सेहला दिया.
"हाथ हटाओ तो सही.", अर्जुन का चेहरा अपनी जांघो के बीच झुकते देख अलका ने नजरे घुमा ली. उसके मुख से जल्द हे ये मादक सिसकारी निकली और अर्जुन ने मजबूती से दोनों टाँगे फैला कर उठाते हुए उस रसभरे kaam-kund को होंठो में भर लिया. अलका की योनि का बाहरी रंग भी जिस्म से एकसार था और ये समानता जैसे प्रीती के सिवा अर्जुन की बहनो में हे थी. योनि शांत होने की जगह कही ज्यादा जलने लगी अर्जुन की जिव्हा और होंठो की चुसाई से. अलका का चेहरा लाल हो कर पसीने से गीला होने लगा था और अर्जुन का लिंग भी अकड़ता हु ऐंठने लगा.
"तैयार हो न?", अर्जुन के हटने के बाद भी अलका को ऐसा लग रहा था के वो अभी तक उसकी छूट पे होंठ लगाए है. आवाज सुन्न कर जैसे तन्द्रा भाग हुई और लम्बी सांसें लेती हुई वो अर्जुन को एक कशिश से देख रही थी जैसे धन्यवाद कर रही हो.
"पता है फिर भी पूछ रहे हो?"
"आउच... stupid..aahhh..", अर्जुन तोह पहले हे सूपड़ा योनि पर टिका चूका था. अलका के जवाब देते हे वो उसके ऊपर झुकता चला गया. रेशम सी मुलायम और भीगी छूती की दीवारों ने ये तगड़ा लुंड पहले भी झेला था पर इसकी अभ्यस्त जरा भी न हुई थी. मांसपेशिया बुरी तरह फैलती चली गयी और एक पल तोह ऐसा आया जब अलका ने दर्द से खुद हे अर्जुन की छाती पर अपना हाथ रखते हुए रुकने को कहा. अभी भी एक तिहाई लुंड बहार था.
"माँ... आराम से नहीं कर सकते.. उफ़.. कमीनी ऋतू.. इसलिए ाःह... मुझे पहले करने को कहा..?", अर्जुन ने बिना मुस्कुराये बड़े हे प्यार से अलका का चेहरा सहलाते हुए कहा.
"झटका तोह मारा हे नहीं क्योंकि ज्यादा दर्द होता. तभी तोह मैंने पहले वो तैयार की थी जिसके लिए तुम मन भी करती रही. ऋतू को भी ऐसे हे दर्द होता है शुरू में. अभी ठीक हो जाएगा, उमाहहह..", अर्जुन ने छाती से हाथ हटने के बाद अलका के होंठो को कस के चूमते हुए अगले धक्के में उसकी बच्चेदानी तक की सुरंग माप दी. वो चटपटा रही थी लेकिन अर्जुन के होंठो ने वो शोर जज्ब कर लिया. कुछ देर पहले जो योनि लकीर सी थी अब वो बुरी तरह फैला हुआ एक रबर सा प्रतीत हो रही जिसने उस अत्यधिक मॉटे लिंग को कस कर जकड़ा हुआ था. अलका के दोनों उभर मसलते हुए अर्जुन ने कुछ हे समय में उसको शांत कर दिया.
"उफ़.. सचमुच घोड़े हो.. जाने क्या सोच कर तुमसे प्यार कर बैठी मैं? अब शुरू में धक्के तेज लगाए तोह गर्दन नोच लुंगी, कह देती hu.",Alka को अपने पेट तक वो मूसल ाचे से पता चल रहा था. अर्जुन भी उसकी बात मान कर बड़े आराम से थोड़ा हे लिंग बहार निकल कर अंदर करने लगा. योनि जल्द हे अभ्यस्त हुई और दोनों एक दूसरे को बेतहाशा चूमते हुए बराबर कमर हिलने लगे. उस चौड़े सीने के निचे अपने उभारो के दबने का यही आनंद अलका ने जाने कबसे महसूस न किया था. अर्जुन जब भी उसके साथ मिलान करता था, कोई हिस्सा अधूरा नहीं छोड़ा था. अलका का दूसरा सखलन जोरदार था और इस पल में अर्जुन के कूल्हों पर उसके नाखुनो ने भरपर वॉर किया.
"आह्हः.. क्या करती हो yaar..Waha तोह नहीं मारो..", अर्जुन ने झटके से लुंड बहार खिंचा तोह दर्द अलका को भी हुआ.
"ये तोह छोटा सा नेल लगा है तुम्हारे. जब तुम इतना बड़ा ये डंडा अंदर डालते हो tab..uff.. आज जाओ अब अपने फवौरीते स्टाइल पे, नखरे छोड़ कर.", ये उचित प्रेमिका थी जो अर्जुन पर हुकुम चलने के साथ साथ उसका ख़याल भी रख रही थी. अलका के गोलाकार कूल्हे भी उसको विशेष्ता थे. पानी से भरे गुब्बारों से लचीले और पूर्णतया गोल. दोनों तरह चुम्बन करने के बाद अर्जुन ने एक झटके में हे घोड़ी बानी अलका की नीव हिला दी.
"आअह्ह्ह्ह.. मा.. जालिम्पॉङ बंद करो.. उफ़.. ये बूब्ड जोर से दबाये न तोह देख लेना..", अलका अभी तैयार भी न थी और अर्जुन ने सरपट धक्के जड़ने शुरू कर दिए. इस मुद्रा में भी अलका के मॉटे उभरा जरा भी झूले न थे जिन्हे पकड़ कर अर्जुन पूरी मस्ती में अलका की कासी हुई छूट को निरंतर रौंदने लगा.
"आअह्ह्ह तुमने कहा था के मैं.. आह.. जल्दी आउट नहीं होता.. उम्.. और किसको करते देखा तुमने.. ? आह्ह्ह्ह..", अर्जुन की इस बात पर दर्द और मस्ती से भरी अलका भी मुस्कुराने लगी.
"उम्.. इतना.. मरे क्यों जा रहे हो? आअह्ह्ह.. फाड़ना बंद करो न.. "
"वैसे हे पूछ रहा हु.. उम्म्म.. और कल से एक्ससिटेड हु मैं तोह रुकने का दिल नहीं कर रहा..", पहले हे मरीना ने हालत खराब कर दी थी और अब समय भी काम था. अर्जुन पीछे से उस चिकनी पीठ पर झुका अलका के गाल चूमते हुए गहरे धक्के लगा रहा था. Patt-patt की बहार आवाज के साथ योनिरस की वजह से fach-fach की हलकी ध्वनि भी साफ़ गूँज रही थी. अलका के लम्बे बाल दूसरी तरफ से बिस्टेर पर गिरे झूल रहे थे और दोनों के जिस्म पसीने में तरोबर.
"उम्.. देखि नहीं.. आह्हः.. सुना था मैंने वो भी 3-4 से.. सबके जवाब 10 मिनट थे ज्यादा से ज्यादा.. उफ़.. और सभी ने अपने bhai-bhabhi या रिश्तेदार को हे छुप कर देखा था सेक्स करते हुए... उम्म्म.. जो मैंने फिल्म देखि थी.. आह्हः. बस उसमे हे 20 मिनट का सेक्स सन था.. उफ़.. वैसे एक बात बताओ..", अलका ने अपने अगले सखलन को झेलने के साथ हे अर्जुन के लुंड पर कसाव बढ़ा दिया था. अर्जुन भी गर्मी से भरा नजदीक हे था लेकिन अभी वो अलका के साथ कुछ और पल रुकना चाहता था.
"आठ.. हाँ पूछो..", अर्जुन ने थोड़ा और जोर से अलका के अनार दबाये तोह उसकी हलकी से चीख निकल गयी.
"मरवाओगे तुम.. आठ.. मेरी आवाज इस कमरे से जा सकती है bahar..aahh.. मैं पूछ रही थी की तुमने विन्नी दीदी को मन क्यों किया?", अलका के इतने स्पष्ट सवाल पर अर्जुन जहा का तहा रुक गया. उसको ये उम्मीद न थी की विन्नी दीदी वाली बात अलका उस से पूछ लेगी.
"बस उनके साथ दिल नहीं था ऐसा करने का."
"तुम एक तोह लगे रहो और दूसरी बात झूठ तोह बोलो हे मैट.. मैं मन थोड़ी कर रही हु बस इतना कह रही हु की कल तुम्हारे पास सही टाइम है.. आह्हः.. ऐसे हे बस.. होने वाली हु मैं..", अलका की आँखें बंद होने लगी थी अब और ऊपर से अर्जुन का वजन धोना अलग म्हणत.
"कल ऐसा क्या है?", अर्जुन भी हांफने लगा था जैसे नजदीक हो.
"उम्माह.. बहार निकाल लेना होने से pehle..aahhhhh.. कल सभी लड़कियों के लिए पार्लर वाली आएँगी तोह तुम निकल सकते हो. उफ़.. ", अलका जैसे हे झड़ने के बाद औंधे मुँह गिरी अर्जुन ने भी अपना बहार निकाल कर हाथ से हिलाते हुए उसकी पीठ पर हे सारा सफ़ेद लावा उड़ेल दिया. थक्क कर वो अलका की बगल में हे बिस्टेर पर लेता गहरी सांसें ले रहा था.
"ले कर कहा जाऊंगा.. आह्ह्ह्ह..", अलका कुछ शांत थी और अर्जुन का सवाल सुन्न कर कड़ी होती हुई बाथरूम की और चल दी.
"मंजू के घर.. और अब जल्दी से खुद को भी साफ़ कर लो.", अलका की बात पर अर्जुन भी धीमे कदमो से बाथरूम में चला आया. अलका बड़े गौर से अपनी योनि को देख रही थी. चलते वक़्त हल्का सा हे दर्द था लेकिन जांघो में मीठी जलन. योनि पर पानी की ठंडी फुहार डालने के बाद पीठ को साफ़ करके वो शरीर पौंछने लगी. अर्जुन ने भी शरीर को फुहारे के निचे कुछ आराम दिया और अलका को देखने लगा. बालो निचोड़ती हुई वो कमाल लग रही थी. आईने से उसने भी अर्जुन की नजरो को देखा तोह पलट कर उसके होंठो को चूमने लगी.
"बस करो अब. और जो कहा है वो ध्यान रखना. कल सभी लेडीज और लड़कियां बिजी रहेंगी, परसो भी. तोह टाइम से दोनों जा सकते हो और वो हमारे से बड़ी भी है और समझदार भी. हक़ तोह बराबर हे है अगर देखा जाए तोह. हाँ, अब अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लेना. मैं जा रही हु त्यार होने के बाद.", अलका बाथरूम से बहार चली आयी जहा उसके अंगवस्त्र और बाकी कपडे रखे थे. जितने वो त्यार हुई उस से पहले हे अर्जुन अपने कमरे में जा चूका था.
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"ऐसा है रामेश्वर, मेरा अब दिल है के बाकी जीवन थोड़ा अलग बिताऊं. सुकून से और इस ghar-pariwar वालो झमेलों से दूर.", बैठक में चंद्रो देवी दीवान पर आसीन थी और उनके हे करीब बैठे थे पंडित जी. एक तरफ सोफे पर शंकर के मां हंसमुख उर्फ़ बिल्लू थे जिनके साथ छोल साहब और शंकर बैठे थे और सामने राजकुमार जी, अशोक और नरिंदर. उमेद बहार था सांगवान जी और आचार्य जी के साथ किसी काम से.
"ऐसा क्या विचार बना भाभी एकदम से?", पंडित जी भी थोड़ा हैरान थे ये सुन्न कर.
"वकील से मिल के आयी हु यहाँ आने से पहले. और 4 बराबर हिस्से कर दिए साड़ी जमीन के हवेली छोड़ के. अब बिंदु तोह रही नई यहाँ और कल को ऋचा का भी ब्याह हो जाना है. गुड्डी चाहे है सुदर्शन को एक नयी जगह बढ़िया माहौल दिया जाए. जमीन और भत्ते बिजेन्दर संभाल रहा है जो बाकी तीनो को भी बराबर हिस्सा देता रहेगा. और मैं थोड़ा दूर रहना चाहती हु इस सबसे. तेरी जानकारी में कोई ऐसी जगह हो जहा शांति हो, ठीक जमीन हो तोह मैं वह चली जाऊ.", चंद्रो देवी ने अपनी बात खुल कर बताई तोह यहाँ बैठे लोगो में से सबसे पहले हैरान शंकर हे हुआ.
"ताई, आपके पास thik-thaak पैसा है और जीवन की जानकारी है. कोई anaath-aashram ले लो हिमाचल या उत्तरांचल में. अपने रहने की जगह जैसी चाहो वैसे तैयार कर लेना और गरीब अनाथ बचे दूसरी तरफ रहेंगे, पढ़ेंगे तोह आपकी छाया में उनका भी भविष्य बनेगा. सरकारी मामले पापा देख लेंगे और कहो तोह मैं भी आपका साथ देने को त्यार हु.", नरिंदर ने एक हे बात बोली थी और चंद्रो देवी ठुड्डी पे हाथ रखती बड़े गौर से उसको देखने लगी. बाकी सभी खामोश रहे और रामेश्वर जी ने भी सर हिला कर सहमति दिखाई.
"तेरी बात 16 आने सही है इन्दर बीटा. बचे हो, उनके खेलने पढ़ने के साधन हो तोह मैंने भी ाचा लगेगा वह रह कर उनकी देखभाल करना. और जब मर्डर गयी फेर कौन देखेगा वो सब?"
"मैं देखूंगा फेर ताई और ऐसे मामलो में ट्रस्ट बनाई जाती है जिसमे सभी तरह के लोग होते है. वैसे तोह आप मरती न अभी अगले 10-15 साल लेकिन इंसान को सुकून तभी मिलता है जब वो किसी को बेहतर जीवन जीने में मदद करे. भविष्य बनाये उनका और आप भी एक आत्मीयता महसूस करे उन सबके साथ जिनका बेचारो का कोई नहीं. जगह तोह पापा चुटकियों में दिलवा देंगे, हैं न पापा?", नरिंदर बोले हे जा रहा था और उसने ध्यान भी न दिया की शंकर उसको रुकने का इशारा कर रहा था.
"हाँ, बाप तोह तेरा पूरे भारत का पटवारी लगा है न.? लेकिन अगर भाभी आप सहमत होती हो तोह ये सब देखा जा सकता. लेकिन अकेले रहना और वो भी बढ़ती उम्र में थोड़ा मुश्किल रहता है. काम से काम 5-6 महीने तोह इस सबमे भी लग जाएंगे.", रामेश्वर जी ने अपनी इत्छा बताते हुए बाकी वर्णन भी दिया.
"जमा अकेली न रह रही है मैं रामेश्वर. गुड्डी रहेगी मेरे साथ और सुदर्शन का भी जीवन सुधारना है. इतने समय में वो भी चलने फिरने लगेगा, शबनम को भी उसकी जायदाद सौंप दूंगी और फेर जाउंगी तोह सबके विवाद ख़तम करके हे जाउंगी. मुन्नी का तोह गाँव में रहना danva-dol है लेकिन सुशीला हवेली में हे रहेगी और बिजेन्दर अपने baap-dada की जमीन से दूर न रहने वाला. जगह देख और किसी पहचान के आदमी को लगा इस सबमे. मैं इन्दर की बात से सहमत हु और सबकुछ ऐसा हे करना है जैसे इसने कहा.", चंद्रो देवी ने तोह निर्णय हे बना लिया था.
"ठीक है भाभी फेर ऐसे हे सही. ये विवाह से फारिग होने के बाद मैं खुद इन्दर के साथ पता करता हु आपके लिए उचित जगह. सुदर्शन बचो में रहेगा तोह सकरात्मक विकास करेगा. वैसे भी अब वो बेहतर है लेकिन माहौल सदा और शांत मिलेगा तोह स्वयं निर्माण में केंद्रित रहेगा. खैर कोई विवाद है तोह साँझा कर सकती हो आप? या मैं मिलने उधर आ जाऊंगा.", रामेश्वर जी ने अब ये बात पोलिसिअ लहजे में कही थी.
"21 का ब्याह है और 23-24 को टाइम लगे तोह आ जाना. विवाद तोह कोई नहीं और कोई करके तोह देखे जरा फिर चंद्रो देवी अपने तरीके से समझाएगी. ले बबिता बिटिया भी आ गयी. आजा मेरी लाडो.", चंद्रो देवी के चेहरे पर एकदम से हे ख़ुशी छ गयी थी बबिता को अंदर आते देख. वो भी अपनी दादी से गले लग कर मिली और फिर रामेश्वर जी के चरण स्पर्श करने लगी तोह उन्होंने रोक कर आशीर्वाद दिया.
"बेटियां पाँव के हाथ नहीं लगाती. और तुम्हारे पतिदेव अब बेहतर है?", आज गहरे लाल सलवार सूट में बबिता पूरे श्रृंगार के साथ थी, मांग भैर हुई और नाक में बाली. उसकी काया से तोह साधारण व्यक्ति वैसे हे प्रभावित हो कर दूर से आहें भरता रहे.
"सब ठीक है नाना लेकिन आप बताओ मेरी दादी के चुगली करे है आड़े बैठी?", बबिता ने मुस्कुरा कर अपनी दादी की मजे लेते हुए रामेशवर जी को नाना कहा तोह नरिंदर को भी ठसका लगा ये सुनते हे. वो मंद मंद हंस रहा था और बबिता सबको हाथ जोड़ कर मुस्कुराती हुई फिर नरिंदर जी को देख हंसने हे लगी.
"तेरे नाना कबसे हो गए मेरे पापा?"
"जड़ से मेरी माँ अर्जुन की बुआ बानी और मेरे ब्याह के रिवाज आपका बड़े भाई साहब श्रीमान शंकर मां ने किये. ेब आपने मैं चाचा कहु के मां, यु आप डीडे कर लो.", बबिता तगड़ी हे mooh-fatt थी और उसकी ख़ुशी देख नरिंदर जी भी खुश हुए.
"तेरा तोह मैं मां हे ठीक फेर. न्यू बता तू ेक्लि किस तरिया आयी अपने पीहर.?", नरिंदर जी भी उतनी हे बागड़ी में बोले और बबिता अपनी दादी की बगल में बैठती हुई कोमल से पानी लेते हुए बोली.
"पीहर से लेके जाए करे है मां लेकिन आज तोह मैं बस विकास भाई और मुस्कान गइल आयी हु तोह उलटी जाउंगी थोड़ी हाँ में. परसु आउंगी फेर ब्याह के बाद जाउंगी. नाना आपने बताया कोणी के मेरी दादी के चुगली करे थी?", बबिता को तोह जैसे जानकारी लेनी हे थी.
"ताई तोह घर छोड़ के जा रही है. बोले थी के मेरी लाडो घर से गयी ेब मेरा जी न लाग्दा. ओर्फनेज होम खोलन का विचार है दूर कही. बता तेरे के विचार है.?", यहाँ फिर से माहौल में जैसे बस यही 2 लोग बातें करने लगे और बाकी सब या तोह मुस्कुराते दिखे या अपनी हे धीमी बात में.
"यु कार्य ने दादी चोखा काम. मेरा भी कंट्रीब्यूशन रावेगा इसमें लेकिन जे कल ने तू मर्डर गयी तोह बेरा किस तरिया चलेगा?", बबिता ने जितनी गंभीरता से बात कही थी रामेश्वर जी ने हलके से उसके चपत लगा दी.
"शुभ शुभ बोलै कर बेटी. कुछ भी बोलित है और इतना तोह सुशीला की जुबान न चलती थी उसके टाइम. चल अब तू अंदर जा कौशल्या के पास और बाकी सबसे मिल."
"सुशीला की जुबान के टेम होर था नाना. व एक घर की थी और मैं 3-3 की हु. ाचा दादी जे मेरे से पहले जावे तोह मिल लिए और मैं गयी तोह बता के कोणी जॉन.", बबिता गिलास वही टेबल पर रखती हुई धड़ल्ले से अंदर की तरफ चली गयी.
"ताई, ये लड़की तोह मेरी भी समझ से बहार है. एक तोह मेरे जितनी लम्बी ऊपर से जुबान सुशीला से भी. वो बेचारा तोह ब्याह करके शायद इसलिए ठीक न हो रहा के इसको सेहन कैसे करेगा.", नरिंदर ने बबिता को जाने के बाद लपेटा था और शंकर समझ चूका था.
"एक बार उसके सामने बोलियों, फेर तू अगली बार न मजे लेने वाला. वैसे ताई आपको मुस्कान से तोह मिलना चाहिए.", शंकर ने ये नाम अनजाने हे लिया और चंद्रो देवी ने हामी भरी भी
"हाँ बीटा सही कहा. शबनम न आ सकती तोह इस बेटी को हे सौंप दूंगी. बहने तोह हैं हे दोनों सगी.", एकदम से नरिंदर के हृदय में पीड़ा सी उठी जिसको बहार न आने दिया.
"ये मुस्कान कौन है शंकर? और शबनम तोह इंग्लैंड में नहीं रह रही?"
"ये भी इंग्लैंड में रहती है इन्दर बीटा लेकिन कॉलेज है इसका अभी इधर. पूरा हो गया तोह वापिस चली जायेगी या फेर बबिता के साथ हे रहेगी जबतक चाहे. अभी भी उसके साथ हे है बस कभी कभी यूनिवर्सिटी आती है विकास के साथ गाँव से. रुक मैं मिलवाती हु. मधु बिटिया, मुस्कान होगी तोह बुलाइयो.", इधर से कौशल्या जी के कमरे में बात करती मधु पर उनकी नजर पड़ी तोह उसको हे आवाज दे दी. शायद बबिता और मुस्कान इधर हे थी जो मुस्कान तुरंत हे थोड़ी सेहमी सी दरवाजे पर आ रुकी. उसने वही से सबको नमस्ते की जैसे मैं में झिझक हो.
"मेरी प्यार बिटिया अपने हे घर में सेहमी क्यों है? इधर आओ.", रामेश्वर जी ने बड़े हे स्नेह से उसको बुलाया था और मुस्कान भी अपने नाम के हिसाब से एक दबी हुई मुस्कान और बहोत साड़ी बेचैनी लिए उनके करीब आ गयी. चंद्रो देवी ने सर सहलाते हुए अपना परिचय दिया जिन्हे वो जानती थी. रामेश्वर जी तोह पहले भी 2-3 बार मुलाकात कर चुके थे और शंकर जी से भी वो परिचित थी.
"नमस्ते अंकल.", सभी से नजरो और हाथ से अभिवादन करके वो अपनी तरफ कुछ हैरत से देख रहे नरिंदर जी को हे देखने लगी.
"नमस्ते बीटा. तोह तुम्हारा नाम है मुस्कान मिर्ज़ा? मिल कर ख़ुशी हुई."
"जी मुझे भी."
"यहाँ कबसे हो बीटा आप?", ये तीसरा शख्स था जिसके साथ लगातार इन्दर हे बात कर रहे थे.
"लास्ट ईयर से हु अंकल और अभी कॉलेज का फर्स्ट ईयर कम्पलीट हुआ है. यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में हे रहती हु पर अभी वकेशंस है तोह बबिता दीदी के पास उनके वह. मैंने आपको कही देखा है अंकल.", मुस्कान की आखिरी बात सुन्न कर नरिंदर जी मुस्कुरा भर दिए.
"तुम्हारा जब दिल करे तुम यहाँ भी आ सकती हो रहने के लिए. गाँव से पास तोह ये घर भी है. घर में और किसी को जानती हो?", मुस्कान ने बड़े हे मासूम तरह से गर्दन हिलाई थी और उसकी हाँ देख कर नरिंदर जी ने भी गर्दन हिला कर हे पूछा किसको.
"अर्जुन को, कोमल दीदी को, शंकर अंकल को, दादा जी को..
"बस बस बीटा. बहोत है बहोत है. सभी प्रमुख लोगो को जानती हो और बाकी सबसे हम खुद मिलवा देंगे. और ये अर्जुन भी आ गया. नवाब साहब, घर में तुम्हारी पहचान के मेहमान आये हो तोह थोड़ा बहोत मिल लिया करो. और इस संजीव से इतना चिपकना बंद कर दो भाई, इसकी भी शादी होने वाली है.", नरिंदर कुछ हल्का महसूस करने लगे थे और संजीव मुस्कान से हाथ मिला कर मिला. अर्जुन की वजह से दोनों की पहचान भी ाची थी अब.
"अभी तोह मैंने और भैया ने सुना था के आप मुस्कान को कह रहे थे की ये घर उसका भी है. फिर ये मेहमान कैसे हु? बताओ दादा जी ab.",Arjun ने अनजाने हे सबको लपेटने वाले नरिंदर जी को हे लपेट लिया था. सभी हंसने लगे और अर्जुन मुस्कान के साथ अंदर की तरफ चल दिया.
"वो बहार आप सभी को खाने के लिए उमेद चाचा जी और आचार्य जी बुला रहे है.", संजीव ने जानकारी दी तोह उसके चाचा, फूफा और पापा उठ कर बहार हे चल दिए.
"सतीश, तेरा ड्राइवर बुलवा दे मुझे छोड़ने के लिए.", चंद्रो देवी भी उठ कड़ी हुई.
"आप तोह रुको भाभी शाम तक."
"न रामेश्वर, सबसे मिल ली और ाचे से खाना भी खा लिया. तेरे साथ सुख दुःख बतला के मैं हल्का हो गया तोह अब बस हवेली चालू. शादी पे आउंगी अब तोह.", अगले कमरे में वो अपनी रिश्ते की सभी देवरानियों से मिलने लगी थी और संजीव छोल साहब के ड्राइवर को गाडी लाने के लिए बुलाने चल दिया.
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"ये तोह चलता फिरता पहाड़ है यार ऋतू?", अलका तोह हैरान थी अपने सामने बबिता को आज ाचे से देख कर. वो सबसे हंसी ख़ुशी मिल रही थी. रेखा जी और ललिता जी ने तोह बबिता को ब्याह कर पीहर आयी बेटी जैसा दुलार दिया था. वही अलका की बात सुन्न कर ऋतू ने एक गहरी सांस भरी
"अपने kishan-kanhaiya ने इस पहाड़ की सुरंग भी खोद दी है. ऋचा से पता लगा था के ये दीदी प्रेग्नेंट है और इनके पतिदेव के गोली लगी है जबकि शादी हुए महीना नहीं हुआ.", अलका के तोह होश हे उड़द गए ये जान कर.
"तुझे ऋचा ने कहा ये सब?"
"नहीं मुझसे थोड़ी ने वो ऐसी बात करेगी. विन्नी दीदी और वो जब कोमल दीदी के कमरे में सोई थी तब आपस में विन्नी दीदी के ख़याली पुलाव मैंने बाथरूम एक अंदर से सुने थे. ऋचा कह रही थी कही अर्जुन ने उनके साथ किया और वो बबिता दीदी की तरह पेट से हो गयी तोह? अब ये अपना ारु पता नहीं कहा कहा अकाउंट खोले बैठा है?", इधर इनके करीब से हे अर्जुन और मुस्कान आये तोह उसने इन दोनों से मुस्कान को मिलवाया जो बड़ी सहजता से हे मुस्कुरा कर Alka-Ritu से मिली. बबिता आदतन अर्जुन से कास के गले लगी तोह अलका के मुँह से निकल हे गया.
"बी गॉड, तू सही कह रही थी."
"क्या सही कह रही थी अलका? मैंने कुछ बोलै क्या जो मुझे हे नहीं पता लगा.?", मुस्कान का बुद्धि प्रदर्शन देख ऋतू खुद को हंसने से न रोक सकीय.
"तुम भी बहोत प्यारी हो यार. मतलब मैंने ऐसा कहा था के मुस्कान बहोत सुन्दर है तोह तुमसे मिल कर अलका ने वही कहा के मैं सच कह रहे थी.", अब मुस्कान फिर से शर्माने लगी थी और जब अर्जुन इनके पास से गुजरा तोह उसकी नजरो के पीछे Alka-Ritu की भी नजरे गयी. दोनों में हे फिर से हैरानी वाला इशारा हुआ.
"मुस्कान, माँ और चची से भी मिल लो यार.", ऋतू ने उसका ध्यान बाकी सबकी तरफ करवाया तोह वो झेंपती हुई सी कृष्णा जी की तरफ चल दी.
"ये भी गयी.", ऋतू ने अजीब से सूरत बनाते हुए कहा और फिर मुस्कुराने लगी जैसे अलका कर रही थी.
"अब तू गलत है ऋतू. ये पहले हे जा चुकी है डार्लिंग.", बबिता के मामले में अलका हैरान थी और यहाँ मुस्कान वाले में ऋतू.
"सचमुच."
"बिलकुल. कोमल दीदी को भी पता है और शायद बबिता को भी.", ऋतू इतना सुन्न कर उस कमरे की तरफ चल दी जहा पहले वो रहती थी और अब कृष्णा चची.
"आजा, आराम हे कर ले थोड़ा.", उसने कमरा खाली देख अलका को भी बुला लिया. ये इनके लिए सही समय था अपनी ख़ास बातें करने का.
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"रात का सन तोह संजीव कुछ सोच के बना लेता मेरे भाई. ये चाचा लोग वह होंगे तोह...", विकास थोड़ा आशंकित था शराब पार्टी को ले कर और उसकी बगल में हे अर्जुन था जिसके कंधे पर विकास का हाथ रखा था.
"उनके साथ पीने में ज्यादा मजा आएगा भाई. और टेंशन की बात हे नहीं है क्योंकि उनकी महफ़िल अलग हॉल में लगेगी 1-2 पेग के बाद और हम सबकी अलग. वैसे बिजेन्दर का फ़ोन आया था की तू जा रहा है उसको लेने और अंदर सुना है बबिता दीदी ने वापिस भी जाना है.", संजीव ने उसको भरोसा दिलाया तोह अर्जुन बड़े गौर से सब सुन्न रहा था.
"नजरो की तोह शर्म है हे भाई क्योंकि खिलाडी आदमी पीटा नहीं और जब थोड़ी चढ़ा ले तोह फिर ट्रेक्टर की आवाज पे भी झूमना शुरू. ये छोटे उस्ताद भी चलेंगे क्या?", अर्जुन का नाम लेते हे वो संजीव की तरफ आशा से देखने लगा.
"न न.. इसको ले गए तोह फिर हो गयी पार्टी. जूते मिलेंगे सुबह हमारे थानेदार से. पता जिस दिन कॉलेज जाने लगेगा उस से पहले दिन ऐसी हे पार्टी रखूँगा मैं इसके लिए.", निराश होते अर्जुन के चेहरे पर ख़ुशी आ गयी थी ये सुन्न कर. संजीव का प्यार अपने इस भाई के लिए सर्वोपरि थी.
"ये बात भी ठीक लेकिन मैंने तोह सुना है ऐसी पारी में कुछ काण्ड भी होते है. देखियो भाई मेरी शादी होने वाली है और इस सबसे तोह 10 कोस दूर हे सही."
"मेरी भी शादी हे होने वाली है विकास और वैसा कुछ नहीं होने वाला. हाँ पंडितो की इस पार्टी में मेनू जरूर थोड़ा machli-murge वाला होगा क्योंकि ज्यादातर लोगो को वही पसंद है मेरे सिवा. अब पहले वो समस्या हल कर जो पूछी थी.", संजीव ने बबिता का जीकर बिना नाम लिए किया.
"हम्म्म. मुस्कान तोह कह रही थी वो दोनों हॉस्टल रुक जाएंगी लेकिन जीजी बोल रही की 5 बजे हे वापिस निकलना है. गोलू अब बेहतर है और उसको अकेला न छोड़ने वाली बबिता. कोई बात नई मैं चला जाऊंगा और फिर उधर से हे बिजेन्दर को लिया लाऊंगा."
"अर्जुन तू चला जइयो उन्हें छोड़ने और बिजेन्दर को मैं इधर हे बुला लेता हु. रात शराब के बाद कोई कार नहीं चलाएगा. विकास की जरुरत पड़ेगी उधर और मैं इसके हे साथ चला जाऊंगा.", संजीव जैसे बहोत कुछ तैयारी किये बैठा था. अर्जुन तोह मन कर नहीं सकता था कभी.
"हाँ चला जाऊंगा भैया. आधे घंटे का तोह सफर है और टाइम से मैं वापिस. आप निश्चिंत हे रहो.", विकास भी खुश था संजीव की समझदारी और परवाह देख कर.
"चल भाई फेर rotti-tuk टॉड लेते है, इतने अर्जुन उन्हें बता देगा. ठीक है छोटे भाई?"
"हाँ आप निश्चिंत रहिये. मेरे लिए कोई ज्यादा बड़ा काम नहीं.", अब उसको बबिता या मुस्कान में से एक तोह मिलनी तये हे थी. मुस्कान ने तोह साफ़ साफ़ कह भी दिया था के आज वो हॉस्टल रहने वाली है लेकिन अब प्रोग्राम गाँव का बन्न चूका था. गोलू के वह होने से बबिता का मौका काम था पर वो मुस्कान का तोह कुछ करवा हे सकती थी. बाकी किस्मत मेहरबान रही तोह क्या पता कुछ भी हो जाए.
हल्दी और ज़ख्म
लाडो रोवे मैट न
दिल तोड़े मैट न
तुम्हे जाना है..
वह जेठ मिले, जेठानी मिले
वह मिले सभी परिवार..
रे अब छोड़ लड़कपन पीहर का..
लाडो रोवे मैट न
दिल तोड़े मैट न
तुम्हे जाना है..
वह पति मिले, वह प्यार मिले
वह मिले घर संसार..
रे अब छोड़ लड़कपन पीहर का..
पिछले आँगन में शामियाने की छाव में ये लोकगीत शुरू हुए थे और घर की महिलाओ के साथ साथ aas-pados की stree-ladkiyan भी शामिल थी. नयी पीढ़ी जहा कोरस में हंसती हुई गीतों का आनंद ले रही थी वही riti-riwajo से परिचित महिलाएं माधुरी को लकड़ी के पात पर बैठने के साथ हे पूरे उत्साह से हल्दी रसम में जुट गयी.
"दीदी, आपकी तरफ तोह ये रसम ब्याह से पहले दिन नहीं होती?", श्रीमती मल्होत्रा जी ने ख़ुशी में शामिल हुए हे ये सवाल कौशल्या जी से किया. रस्मे तोह मधु ने शुरू करनी थी क्योंकि घर में भाभी तोह अभी थी नहीं. मधु, रेणुका, रूचि सबसे आगे माधुरी के पास बैठी हुई हल्दी में सरसो का तेल और पानी मिला कर घोल तैयार करती हुई अलग बतिया रही थी.
"वो बाटना भी लगेगा जिस दिन ब्याह है उस दिन सवेरे. मेरी तोह माँ थी नहीं जब ब्याह हुआ और इनकी (रामेश्वर जी) माँ जी ने ब्याह से पहले जो रिवाज समझाए वही मैंने आज तक बरकरार रखे है.", कौशल्या जी अपने आँगन में सभी के बीच खासी उत्साहित थी और विचारो का आदान प्रदान यहाँ भी वैसा हे था जैसे हर mele-mulakaat में अक्सर होता है.
"कौशल्या बहिन जी, मैं तोह कहती हु ये रस्मे 2 दिन और पहले शुरू कर देते आप. हाहाहा.. देखो तोह सही बचो को कितना आनंद उठा रहे है. वैसे 5 दिन की रस्मो का रिवाज अब तोह घरानो में हे बचा है. पहले तोह 11-11 दिन पहले हे लोकगीत और ढोलकी शुरू हो जाती थी ब्याह के घर में और आज तोह सुबह हल्दी, दोपहर में मेहंदी फिर सीधा रात को शादी. ाचा है काम से काम आपने तोह ये फटफटी वाला रास्ता नहीं अपनाया.", यशोदा सांगवान जी भी पूरी तरह शामिल दिखी इस विवाह पूर्व पर्व में और वो देख रही थी कैसे मरीना भी सलवार कमीज में घूंगट निकल कर मस्ती कर रही थी कोमल और विन्नी के साथ. ललिता जी लाल बंधेज की साड़ी में स्वयं मन्दाकिनी को मात देती लगी. गौरवर्ण ललिता जी पर लाल रंग काले से भी कही ज्यादा फबता था बेशक उम्र 50 के नजदीक लेकिन आज भी सुघड़, हंसमुख और खूबसूरत थी वो.
"कौशल्या क्या कहेगी यशोदा? इसके तोह पीहर में रिवाज 3 दिन में निबटे लेकिन ब्याह के आयी तोह सास ने 10 दिन मुँह दिखाई की लूट मचाई थी. हाँ और भाई साहब (रामेश्वर जी) को तोह सौभाग्य 11 दिन बाद मिला था अपनी बीवी को देखने का. वैसे कौशल्या की तोह बनती भी थी इतनी भारी मुँह दिखाई.", इस माहौल में कौशल्या जी को फंसा था उनकी अभिन्न सहेली और behan-samaan पूर्णिमा जी ने. उनकी बात सुन्न कर पहली बार किसी ने कौशल्या जी को शरमाते हुए देखा और वो नजरे झुकाती हुई पूर्णिमा के घुटने पर झूठा थप्पड़ मारने लगी.
"वाह.. ये तोह आपने बहोत हे राज की बात बताई दादी. हमारी थानेदारनी जी के तोह जलवे थे अपने टाइम पर इसका मतलब?", ऋतू कब इधर चली आयी थी किसी का ध्यान न गया लेकिन उसने ये चर्चा सुन्न ली थी और अपनी दादी की बगल में लिपट कर जो बात उसने मस्ती में कही उस पर बाकी सभी वृद्धा कहकहा लगाने लगी. दूसरी तरफ से इन्हे घेरा था सुनंदा जी ने, जिन्हे ऋतू हे अंदर लेके आयी थी.
"ऋतू बिटिया पुराणी बात न भी करे तोह ये जलवे तोह तब भी बरकरार थे जब तेरी माँ का ब्याह हुआ था. ऐसे न हमारी संधान जी चेहरे पर गुस्सा लिए रहती है. इनके साथ फाग खेलने की हिम्मत मैंने तोह किसी में न देखि आजतक. दिल सबका करता था लेकिन जितने भी रिश्ते में देवर लगते है किसी की मजाल जो पाँव छू कर गाल में गुलाल के सिवा पानी की एक बूँद छुवा दे.", सुनन्दा जी ने सभी को प्रणाम करने के बाद देवकी, कौशल्या जी, पूर्णिमा जी और यशोदा जी से गले लग कर मुलाकात की. आज वो भी आसमानी रंग की साड़ी में jawaan-adhed सभी को मात दे रही थी. सुनंदा जी का भी अलग हे सम्मोहन था और व्यक्तित्व Kaushalya-Purnima जी के समकक्ष.
"इसके साथ तोह होली जो खेल गया वो खेल गया सुनंदा लेकिन चर्चे तोह तेरे भी काम नहीं सुने मैंने. संधान तुम बाद में बानी लेकिन korde-haudi का खेल तोह थानेदार जी के साथ तेरा खुद कौशल्या ने बताया था मुझे.", पूर्णिमा जी ने एक और राज की बात खोली थी और ऋतू अपने मुँह पर हाथ रखे अपनी daadi-naani को देखने लगी जो अब थोड़ा खुल कर हंसने लगी थी.
"हाँ तोह न खेलती क्या? वही थानेदार जी 25 साल आपके साथ खेले और मेरे साथ 4 बार में हे किस्सा बन्न गया? वैसे सभी को बहोत बधाई हो हल्दी की. ये जॉन, हल्दी और मौली मेरी तरफ से आपके लिए कौशल्या जी.", अपनी दादी के साथ समय भी आयी थी और उसके हाथ से चंडी की थाली ले कर सुनंदा जी ने कौशल्या जी को बड़े आदर से सौंपी. ऋतू का तोह बड़ा दिल था ये किस्से सुन्न ने का लेकिन माहौल हल्दी का था तोह बड़े बखूबी जानते थे की कैसे बचो को अपनी बातो से दूर रखा जाए.
"ये तोह नहीं कहूँगी की इसकी जरुरत नहीं थी लेकिन सबसे जरुरी था तुम्हारा आना. अपने हाथ से हे हल्दी मिलवा दो सुनंदा, धुलवा मैं दूंगी या कहो तोह थानेदार जी को कहु?", अंत में भी कौशल्या जी ने अपनी संधान को लपेट हे लिया था जिस पर सुनंदा जी की वो शर्म से भरी मुस्कराहट बेहद प्यारी दिखी. एक खुशाल परिवार में ाची जीविका से कही ज्यादा बेहतर है सबका आपस में इतना प्यार, सम्मान और मनचाहे hansi-majaak जो परस्पर दिल को पसंद हो. उम्र एक मिथ है जो इन बुजुर्ग महिलाओ ने हमेशा हे दर्शाया था जब कभी ये एकत्र रही.
"गुड्डी, जा बेटी देख chai-paani का क्या इंतजाम है? इतने रिश्तेदार और मेहमान है लेकिन वो कामवाली भी नजर न आ रही और हलवाई वाले लड़के भी न दिख रहे.", देवकी जी ने पहली बार कुछ समझदारी की बात कही थी और आज तोह वो भी खुश दिखी. वजह थी कौशल्या जी का उन्हें देवरानी होने पर रेशम की साड़ी, गले का हार और 2 कड़े देना. कौशल्या जी ने खुद ऐसा नियम बनाया था की जब भी उनके परिवार में कोई विवाह अवसर हो तोह अपनी देवरानी को छोटी बहिन का नेग दे कर हे पहली रसम शुरू की जाए.
"जी दादी जी मैं देखती हु और लड़को को मैंने हे मन किया है इधर आने से. अलका, चल मेरे साथ.", अलका सीढ़ियों पे हिमांशु के साथ कड़ी उसको तस्वीरें लेने में लगाए थी. हिमांशु किसी भी मेहमान से ज्यादा घुलने मिलने की जगह या तोह अपने पिता या फिर आना नाना के साथ हे रहता. जबसे कैमरा हाथ लगा था, उसको अब इधर उधर घूमना भी बहाने लगा.
"यार तू काम करवाएगी अब?", अलका की लम्बाई कुछ ज्यादा हे लगती थी जब वो ऐसे चुस्त सलवार कमीज पहन लेती थी. लम्बी छोटी सीढ़ियों से उतारते वक़्त हे नागिन सी लहराती हुई उसके नितम्ब सेहला गयी. रेखा के साथ रोमिला अभी माधुरी के बाल सही कर रही थी और सलवार घुटनो से ऊपर. लेकिन अलका को इतने गौर से देख कर जाने क्या चमक आयी थी उसकी आँखों में और एक गहरी मुस्कान. प्रशंशा के साथ साथ बहोत कुछ था उसके चेहरे पर लेकिन गलत कुछ नहीं.
"काम तोह करना हे पड़ेगा मैडम. अंदर वह लेडीज के साथ साथ सभी लड़कियां है और ये वेटर लोग मुझे कही से भी ऐसे नहीं लग रहे जिन्हे गैलरी से आगे जाना देना चाहिए. कामवाली दीदी ऊपर के दोनों हिस्से साफ़ करने में लगी है तोह chai-paani हम दे तोह ठीक रहेगा.", ऋतू ने बहार आने के साथ हे अपना दुपट्टा सलीके से ले लिया था, जैसा अक्सर अफसाना या कोमल दीदी करके रखती थी.
"हाँ ये भी ठीक है लेकिन मैंने ये ड्रेस इसलिए नहीं पहनी थी.", बगीचे के पास आते आते अलका ने मुँह टेढ़ा करते हुए बचकाना चेहरा बनाया तोह दोनों हे हंसने लगी.
"कमीनी, तेरी इस ड्रेस ने जो केहर मचाया हुआ न उसका असर लड़को पे तोह छोड़ लड़कियों पे भी हो रहा है. रोमिला आंटी तोह शायद तुझे नजरो में हे खा चुकी. यही रुक, मैं पानी की ट्रे तुझे इधर हे ला कर देती हु.", प्रीती ने हँसते हुए अलका को घर से बहार आने से हे रोक दिया था. गुलाबी कमीज और सफ़ेद चिपकी हुई सलवार में अलका के शरीर का हर अंग पूर्ण कटाव के साथ दर्शित थी. सही मायने में अलका थी भी कुदरत की अनुपम जिवंत कृति.
"भैया, एक ट्रे में पानी के गिलास रख दीजिये और दूसरी में चाय के कप. हाँ जितने आये उतने रख दे, मैं खुद ले जाउंगी.", सभी को नाश्ता करवाने के बाद असगर और उसके साथी भी भोजन से फारिग हो कर बड़े पतीले में चाय बना चुके थे. बैठक की तरफ बैरे सेवा में लगे थे और अंदर के लिए उन्हें ऋतू ने स्पष्ट मन कर दिया था. बड़ी ट्रे में 15-16 गिलास एक व्यक्ति ने पानी के रख दिए थे और दूसरी में कप सजाने के साथ असगर खुद हे चाय बड़ी नजाकत से भरने लगा.
"बिटिया, आप कहे तोह हम भिजवा देते है. 2 ट्रे मुश्किल होगा लेकर जाना और मेरे पास ये 2 लड़के अभी खली हे है.", असगर ने शिष्टाचार से हे कहा था जिस पर अगली मधुर आवाज प्रीती की सुनाई दी.
"अंकल जी, 3 लोग 2 ट्रे आराम से ले कर जा सकते है. वैसे तीसरी ट्रे में नमकीन और मिठाई लगवा दीजिये.", प्रीती ठीक वैसे हे अंदाज में प्रकट हुई थी जैसा उसको ऋतू ने बनाया था इन गुजरे दिनों में. सफ़ेद सलवार कमीज और उसके ऊपर सतरंगी दुपट्टा. कलाई में दर्जनभर चूड़ियां और माथे पर छोटी सी लाल बिंदी. हमेशा खुले रहने वाले bhoore-badami बाल अब सलीके से एक रबर में बंधे थे. ऋतू उसको देख कर मुस्कुराई और उसके साथ कड़ी आकांक्षा को देख कर बड़े प्यार से अपने संग लगा लिया. आकांक्षा अपने chir-parichit अंदाज में थी, घुटने से 6 इंच निचे की लम्बाई तक की फूलो वाली फ्रॉक और naam-matra सी सज्जा के साथ. असगर ने भी इन बच्चियों को स्नेह से एक नजर देखा और फिर ध्यान दिया उस लड़के पर जिसको यहाँ सेवा में लगाया गया था.
"ओह लाला, तनिक 2 प्लेट लगाओ. एक में काजू बर्फी और दूसरे में दाल के समोसे. हाथ थोड़ा तेज और नजर काम पर.", फटाफट उसकी बात का अनुसरण हुआ और ये तीनो हे लड़कियां ट्रे उठा कर आगे बढ़ चली. अलका अब नदारद थी जो की होना हे था जब घर में इतने लोग आये हुए हो तोह. लेकिन इन तीनो के घर में जाते हे एक 'चटाक' की ाची खासी आवाज गूंजी और असगर बड़ी सख्त नजरो से उस युवक को घूर रहा था जिस से अभी अभी उसने 2 प्लेट लगवाई थी. वो युवक अपने गाल पर हाथ रखे बड़े आश्चर्य और दर्द से असगर को देख रहा था.
"देखो बीटा एक बात कान खोल कर सुन्न लो. जब घर से बहार काम के लिए निकले हो तोह भलाई इसमें हे है की दिल लगा कर अपना काम करो और aas-pas क्या है कौन है इस पर नजर नहीं. वो मालिक है जिन्होंने हमे काम दिया और हम सेवक है जो उनकी मेहरबानी से ghar-pariwar को रोटी खिला रहे है. बिटिया समझदार है जो तुम जैसे को मेहमानो की खातिर में नहीं लगवाया लेकिन तुम हो बेगैरत जो नजरो से हे namak-haraami दिखा रहे हो.", अभी तक असगर के 4-5 लोग भी काम छोड़ कर थोड़ा नजदीक आ खड़े हुए थे. युवक जैसे कुछ उद्दण्ड हे था, उम्र का वही गरम खून.
"तुम हो हलवाई उस्ताद जी और हम है होटल की तरफ से. पहली बात तोह हमने किसी का हाथ नहीं पकड़ा, दूसरा की देखने पर कोई पाबन्दी नहीं है और अब कान खोल कर सुन्न लो मेरी बात. कैंप में रहता हु और एक मिनट नहीं लगेगा तुम्हारे साथ इन चलो को ठिकाने लगाने में.", असगर उसके जोश को देख फीकी मुस्कान दिखता लड़के के कंधे पर हाथ रखते हुए बोलै. उसके साथी असगर से कुछ कहना चाहते थे लेकिन उसने उन्हें नजरो से हे मन कर दिया.
"या तोह काम कर लो बीटा या फिर बदमाशी. लेकिन जो भी करो अपने गूदे के दम पर करो. अब यहाँ से तित्तर हो जाओ इस से पहले की ब्राह्मण परिवार में मैं खाना लकड़ी की जगह तुम्हारे जिस्म को चूल्हे में लगा कर पकौ.", असगर sakht-jaan व्यक्ति था और उतना हे mridu-bhashi एक दिल का नरम इंसान भी. लड़का गुस्से में जाने के लिए पलटा हे था.
"और ये जब तुम्हारे पहचान वाले आ जाये तोह अकेले आ जाना मुझे बुलाने के लिए. इस घर के नजदीक कोई तमाशा नहीं चाहिए.", असगर ने तोह साफ़ साफ़ कह दिया था के वो जिन्हे चाहे बुला ले लेकिन मुलाकात विवाह वाले घर से कुछ दूर हे होगी.
"आ रहा हु और फिर माफ़ी न मंगवाई तोह नाम बदल देना. लेकिन तुम्हारी तबियत से तुड़ाई करने के बाद.", युवक अपना गाल सहलाता हुआ पैदल हे निकल लिया. असगर अपनी गलती के लिए ऊपर वाले से माफ़ी मांग कर मुस्कुराता हुआ काम में वापिस जुट गया. ऐसे अनिगिनत हादसे वो जीवन में देख चूका था जहा जोशीले लेकिन भटके हुए नौजवान गलतियां करने के बाद भी बदतमीजी करते थे.
घर के अंदर वही geet-ullaas का माहौल था जो अब कही बेहतर होता जा रहा था. पड़ोस वाली सरोज भाभी और मल्होत्रा जी की बेटी अब माधुरी के चेहरे पर हल्दी लेप रही थी और इस बीच हंसी मजाक भी जोरो पर था. विन्नी के साथ प्रियंका आगे आयी हल्दी लगाने तोह सरोज भाभी ने चुहल मस्ती में बाटी कही.
"बस आज माधुरी के लगा कर खुश हो लो तुम दोनों. ये हल्दी जब तुम्हे लगेगी न विन्नी तब समझ आएगा बकरी को इतना सजाया क्यों जाता है.", एक पल तोह सबको हे लगा था की ये बहोत बड़ी बात हे कह दी भाभी ने लेकिन ललिता जी ने तोह नहले पर दहला बहोत पहले हे सीख लिए था. कौशल्या जी कुछ कहती भी क्या इन बचो के बीच. बस मुस्कुरा दी.
"सरोज ने लगवाई थी हल्दी और आज बकरी से गाये बन्न गयी. सरोज, तू कहे तोह एक बार और लगवा दू तेरे हल्दी. विन्नी का देखा जाएगा जब लगेगी तब लगेगी, तेरा निखार जरुरी है.", सरोज के तोह शर्म से हाथ हे काँप गए इस निखार वाली बात पर और दबे मुँह सभी हंस रहे थे.
"ललिता भाभी, पहले ये तोह पक्का कर लो सरोज की जमीन पर हल्दी टिकेगी या तैयार करना पड़ेगा. हाँ सरोज, तू हे बता दे जरा.", मधु ने जो चुकहल की थी उस से कृष्णा जी की भी हंसी न रुकी क्योंकि ये द्विअर्थी संवाद बस यही लोग समझ सकती थी. सरोज तोह शर्माती हुई अपनी नामधारी सरोज मौसी और रेखा जी की बगल में जा बैठी.
"वह क्या लुक रही है ऋ? उस सरोज की छोरी ने भी इधर से हे हल्दी लगवाई है. बुलाओ हल्दी लगाने वाले को.", ये सब बात इतनी धीमी हो रही थी की बस आसपास के गिने चुनो को हे सुनाई दी. अब तोह रेखा जी भी शर्माने लगी थी अपनी जेठानी की बात पर. सरोज मौसी ने भी मुँह पर हाथ रख लिया था और एक नजर अपने से दूर कड़ी मंजू को देखा जो रुपाली के साथ किसी चर्चा में लगी थी.
"देखो ये आप लोगो का मजाक तोह हमारी समझ में आ नहीं रहा. ऐसी बात करो जो पता तोह चले. हल्दी, जमीन क्या है ये सब?", विन्नी की बात पर बाकी सभी ने मुस्कुरा कर एक दूसरे को देखा और ये मजाक यही रोक दिया. एक बार फिर से गीत और रिवाज जारी हुए. पुराने सलवार कमीज में बैठाई हुई माधुरी के घुटनो, बाहों, गर्दन और चेहरे पर सभी ने हल्दी लगाईं थी. संजीव के तोह ये रसम विवाह वाले हे दिन करनी थी जिसके लिए सरोज भाभी को पहले हे बताया जा चूका था.
"कोई अर्जुन को भी बुलाओ, उसकी बहिन है बड़ी.", कौशल्या जी ने जब देखा की अब रुपाली और ऋतू का क्रम आ चूका है तोह ध्यान आया के अर्जुन तोह यहाँ आया हे नहीं.
"ारु बैठक में है दादी, नाना जी और दादा जी के पास.", ऋतू ने माधुरी दीदी की पिंडलियों पर लेप लगते हुए जवाब दिए.
"जा रेनू, बुला दे जरा उसको भी.", कौशल्या जे ने अपने करीब हे कड़ी रेणुका से कहा तोह वो तुरंत हे उधर की तरफ चल दी. लेकिन कौशल्या जी के तोह जैसे मैं में कुछ और हे चल रहा था और वो मुस्कुरा रही थी.
"ओह छोरियों, पता है न उस बैलबुद्धि के साथ क्या करना है? सबके बीच आ तोह रहा है लेकिन पीला हो कर वापिस न गया तोह तुम सबकी खैर नहीं.", अर्जुन के लिए खुद दादी ने ऐसा कहा तोह सभी हैरत से उन्हें देखने लगी और जवाब ललिता जी ने दिया.
"ये भी शगुन है जिसमे लड़की के छोटे भाई को ऐसे हल्दी रंगने का मतलब है की बहिन के जीवन के साथ उसका भी एक अटूट रिश्ता बन्न जाता है जब विवाह हो रहा हो. ये भाई का हे कर्त्तव्य है की अब वो पहली बार खुद हे अपनी बड़ी बहिन को उसके ससुराल छोड़ कर आये और जब भी lana-lejana हो तोह ये जिम्मेवारी उस छोटे भाई की हे रहेगी. हाँ अगर अर्जुन इस हल्दी से अगर बच गया न तोह समझ लेना तुम सब फ़ैल हो.", ललिता जी ने इस masti-majaak के पीछे एक गहरी बात भी कह सुनाई थी. सभी लड़कियां जुट गयी उस तगड़े घोड़े पर नकेल डालने में. इधर अर्जुन मुस्कुराता हुआ आया तोह स्वागत हुआ कटीले बानो से.
"आया कपूत अपनी बहिन की रसम में..
न खोज न खबर, फिर मलंग जग भर में..
बननी देख ले ये तेरा ख़याल कैसे रखेगा..
कल ब्याह के तू ससुराल चली जायेगी..
अपनी बहिन भुला के लुगाई ले आएगा..
देरी से आया कपूत, अपनी बहिन की रसम में.."
अर्जुन तोह ये गीत सुन्न कर हे हैरान था और बाकी सभी मंद मंद मुस्कुरा रहे थे उसकी हालत पर.
"दादी, मुझे यहाँ क्यों बुलाया? आप तोह कह रही थी की यहाँ सिर्फ लेडीज हे रहेंगी.", अर्जुन इस घेरे के पहले हे रुक कर कौशल्या जी से पूछने लगा. 15-16 औरतो का झुण्ड और फिर उसके आगे ढोलक बजती हुई रूचि जो हंस भी रही थी मधु के साथ साथ. जहा माधुरी सबसे आगे और बीच में बैठी थी उसके ird-gird तैयारी के साथ बाकी सभी लड़किआं खामोश हे रही. सीढ़ियों पर बैठी Jasleen-Gurdeep भी मजा ले रहे थी इस सबका.
"अरे तोह मर्दो को मन किया था न लेकिन तू तोह घर सबसे छोटा है और हल्दी तेरे हाथ से भी लगेगी तेरी बहिन के. जा के आशीर्वाद ले माधुरी का और तेरी ताई का. फिर हल्दी लगा."
"ताई जी के भी लागू?", अर्जुन ने एक बार अपनी खिली हुई ललिता ताई को देखा और फिर अपनी दादी से जो सवाल किया तोह सभी हंसने लगे.
"ओह बैलबुद्धि. ताई तेरी behan-bhabhi नहीं है जो उसके हल्दी लगाएगा. आशीर्वाद ले उसका और फिर माधुरी के हल्दी लगनी है.", अर्जुन को जब रेणुका अंदर लेके आयी थी तभी संजीव को मामला संगीन लगा. वो जाली वाले दरवाजे के उस पार से ये सब देख रहा था. अर्जुन इन सभी को लांघ कर मुस्कुराता हुआ ताई के करीब आया और झुक कर आशीवार्द लेने हे लगा था की भैया की आवाज सुनाई दी.
"छोटे तुरंत निकल वह से.", अर्जुन को तोह कुछ समझ हे नहीं आया और उसके झुकते हे मधु बुआ ने सरसों के तेल की भरी गड़वी उसके सफ़ेद कुर्ते पर उलट दी. रुचिता ने उस तरल के ऊपर पूरी थाली सूखी हल्दी की और जबतक अर्जुन कुछ समझता दोनों बुआ ने उसके लिपाई कर दी थी उसके बाल समेत.
"ये क्या है?", अर्जुन इधर उधर देख कर भोचक्का से पूछ रहा था. लेकिन ललिता जी के दोनों हाथ से आशीर्वाद की जगह मुठी भर भर के हल्दी ने उसके चेहरे को पॉट दिया जो गर्दन से सीने तक गया. और इस से पहले की वो हिलता या निकलने की कोशिश करता 2 बुआ ने उसको बगल से घेरा और पीछे से जाने कितने हे हाथ उसको तसल्ल्ली से haldi-teil में रंगते हे चले गए.
"अभी भी बोल रहा हु वह से निकल ले अर्जुन.", हंस तोह संजीव भी रहा था उस पीले रंग के मुजससम्मे को देख कर लेकिन जैसे उसको पता था की अभी बहोत कुछ होने वाला है. सरोज भाभी ने थोड़ा नखरे से कहा.
"छोड़ो आंटी जी मेरे देवर को. ऐसे थोड़ी न करते है इतने ाचे लड़के के साथ. देखो ऐसे करते है हल्दी लड़की के भाई की.", सभी हंसती हुई दूर हुई थी और अर्जुन को भी लगा था के शायद सरोज भाभी उसको बचा रही है लेकिन उन्होंने तोह हल्दी, तेल और पानी का घोल उसके पाजामे के अंदर तक उड़ेल दिया. चेहरे से पाँव तक अब वो हल्दी तेल में सना था जिसकी लाजवाब तस्वीरें हिमांशु ने कैमरा में क़ैद कर ली थी.
"दादी... देखो अब इन सबकी क्या हालत करता हु.", अर्जुन किसी छोटे बचे की तरह गुस्सा हुआ था क्योंकि ये सब उस अकेले के साथ इतने लोगो ने क्या था, धोखे से.
"अरे.. आप तोह इतने में हे रोने लगे मुन्ना. कल को तोह तुम्हारे नाम के साथ साला जुड़ेगा, तुम्हारी लुगाई आएगी तोह वो भी साली बनेगी. तब भी गुस्सा करोगे? अब ये अकड़ दिखानी बंद कर दो देवर जी. एक बहिन के लिए भाई का ऐसा समर्पण होना चाहिए जिस से वो कभी आहात न हो. और हमने तोह सिर्फ हल्दी लगाईं है, कपडे थोड़ी उतार दिए.", सरोज भाभी ने मजे मजे में हे अर्जुन को व्यंग के साथ एक सच्चाई से परिचित करवा दिया था. उसके चेहरे पर भी चमक आ गयी कुछ सोच कर.
"सही कहा भाभी जी आपने. और दादी जी सॉरी.", अर्जुन की माफ़ी भी हँसते हुए देख कौशल्या जी को आभास हो गया था के ये जरूर कुछ ऐसा करने वाला है जिसकी किसी को खबर नहीं. और अर्जुन ने अपने चेहरे, गर्दन पर लगी हल्दी ाचे से उतार कर सरोज भाभी के चेहरा पर पॉट दी. अभी मधु बुआ कुछ समझती उस से पहले हे उनके भी गाल सरसों के तेल और हल्दी से पीले हो चुके थे. ऐसा हे अर्जुन ने पीछे हैट रही रुचिता के साथ किया और फिर तुरंत फुर्ती से माधुरी के पीछे जा खड़ा हुआ.
"बहनो के साथ हल्दी नहीं खेल सकता लेकिन जिन्होंने फंसाया उन्हें तोह सबक सीखा हे सख्त हु.", पूर्णिमा जी भी उसकी हरकत देख गदगद हो गयी. अब भी सभी लोग हंस रहे थे लेकिन इस बार शकल उतरी थी अर्जुन की जगह उन तीनो की.
"माँ, यु छोरा मेरे हाथ चढ़ गया तोह रेल बना दूंगी मैं इसकी. अर्जुन बीटा दत्त जा तू, मैं बताऊ देख तन्ने.", रुचिता को इस मस्ती में झूठा गुस्सा करते देख अर्जुन ने रसम वाली थाली उठा ली जिसमे ढेर सारा लेप बचा हुआ था.
"बुआ, तन्ने मैंने छोडो और जो अगर आप पास भी आयी न तोह आपके कपड़ो के साथ साथ बाल भी पीले कर दूंगा. डॉक्टर दादी जी, फिर आप मैट कहना मुझे कुछ.", अर्जुन ने यशोदा जी को चेताया जो हंस रही थी इनका हुड़दंग देख कर.
"माँ ने के पूछे है? तू हाथ तोह चढ़ फेर देख या थाली कड़े कड़े रगडूंगी.", रुचिता भी आगे बढ़ने में हिचक रही थी लेकिन अर्जुन को सिर्फ उस पर नजर रखने की तगड़ी कीमत चुकानी पड़ी. मरीना कब फर्श पे घुटनो के बल बैठती हुई ठीक अर्जुन के करीब आ गयी उसको पता न लगा लेकिन बाकी सभी मुँह पर हाथ रखे अर्जुन के साथ होने वाली घटना का सोच हे हंस रहे थे.
"बुइ.. थिस इस नॉट राइट.. युक...", मरीना ने थाली को अपने ऊपर हे खींच लिया था जिस से सारा घोल उसके चेरे से होता हुआ सलवार कमीज तक को भिगो गया.
"हाहाहा.. ये जयचंद वाले काम करोगी मरीना तोह ऐसा हे होगा.", अर्जुन के ऐसा कहते हे रुचिता बुआ भी गाला फाड़ के हंसने लगी. सभी का वैसा हे हाल था और मरीना पाँव पटकती हुई अपनी बुआ की तरफ बढ़ी तोह उन्होंने भी उसको रोक दिया.
"न न मेरी लाडो. पहले न तू कपडे बदल ले जे मेरे गले लग के रोना है तोह. ांनी भाभी, देख ले इसके खातिर भी ेब कोई जाट या रुस्सियन. हल्दी ले गयी या तोह अर्जुन से.", माहौल जितना खुशनुमा अभी हुआ था इसकी उम्मीद तोह खुद कौशल्या जी को भी नहीं थी. यहाँ कोई किसी से नाराज होने वाला था हे नहीं. हंसी ख़ुशी से भरे इस पल में फिर अर्जुन ने भी उतने हे प्रेम से अपनी बड़ी बहिन के चरणों और चेहरे पर थोड़ी हल्दी लगा कर इस रसम को पूरा किया. कुछ और गीति गाये गए थे जिनके बाद माधुरी नहाने गयी और अर्जुन भी ऊपर वाले अपनी तरफ के बाथरूम में चल दिया. आँगन की सफाई में तुरंत काम वाली बाई लगा दी गयी थी और बहार अब दोपहर के खाने का समय होने हे लगा था.
"देख ये सही मौका है तेरे पास. जा और कर ले प्यार ारु के साथ. वैसे भी उसको जरुरत है और तुझे भी.", ऋतू ने बड़े हे धीमे स्वर में अलका से कहा था. लड़कियां अपने हिस्से की तरफ या फिर बहार वाले आँगन में भोजन के लिए जाने लगी थी. ये दोनों हे इधर आँगन में एक तरफ कड़ी थी.
"पागल है क्या यार तू? गलती से कोई भी उधर आ गया न तोह. ऊपर से संजीव भैया भी घर पे मौजूद है.", अलका का दिल तोह ऋतू की बात सुन्न कर हे खुशो हो गया था लेकिन डर अपनी जगह सही था.
"चिंता क्यों करती है? भैया अभी एक घंटे से पहले तोह फ्री नहीं होने वाले क्योंकि लकी भैया आये हुए है और ये सभी अब लंच करेंगी और उसके बाद कपडे बदल कर आराम. अर्जुन ने हे कहा था मुझे की वो तुझे उस से मिलने के लिए भेजे. बाकी इस तरफ से कुण्डी लगा लियो अंदर से. मैं तेरे साथ हे लंच करुँगी."
"दिल तोह तेरा भी है. फिर मैं क्यों?", अलका के प्रश्न पर ऋतू ने अपने माथे पर हाथ रख लिए.
"तू जा न यार. वो मैं आज रात उसके हे पास रहने वाली हु लेकिन तू अभी जा.", अलका इतना सुन्न कर हिरणी की तरह कुलांचे भर्ती हुई सीधा उधर दौड़ गयी जिधर अर्जुन गया था. टेबल के पास कड़ी प्रीती ने बोहेन उचका कर ऋतू को इशारा दिया तोह ऋतू ने शर्म से नजरे झुका ली और उसकी हे तरफ चल दी.
"आपका भी पता नहीं चलता कुछ. वैसे सही किया जो अलका दीदी को कहा.", प्रीती की बात पर ऋतू ने सवालिया नजरो से देखा जैसे पूछ रही हो की इसका क्या मतलब हुआ.
"वो मेरी मामी फुल लट्टू है ारु पे और देख लेना मेरी माँ उन्हें अर्जुन के साथ शाम को मार्किट भेजने वाली है.", प्रीती की बात सुन्न कर ऋतू को चिंता होने लगी थी.
"ये रोमिला आंटी का भी दिमाग हिल गया है यार. मुझे तोह समझ भी नहीं आ रहा के वो ऐसा कर हे क्यों रही है."
"क्यों का तोह मुझे भी नहीं पता लेकिन आप कैसे भी करके अर्जुन को बिजी कर दो. अर्जुन ने एक बार कहा था के अलीशा मामी बहोत सुन्दर लगी उसको. और वो एक मातुरे लेडी है तोह अर्जुन का क्या हो सकता है आप समझ सकती हो.", ऋतू ने हामी भरी जैसे वो समझ रही हो.
"तुमने ऐसा क्यों कहा की अलका को भेज कर सही किया?"
"उन्हें मेरी माँ बड़ा नोटिस कर रही थी. देख लेना वो जरूर पूछने वाली है अलका के बारे में और जहा तक मेरा दिमाग कहता है वो उनकी पेंटिंग बनाने वाली है. मतलब पता नहीं उनकी ये क्या फंतासी है?", प्रीती की पूरी बात समझ आ गयी थी ऋतू को.
"ठरकी है रोमिला आंटी, सीधा बोल न. मुझे भी पता है लेकिन विन्नी दीदी की तोह उन्होंने राजकुमारी वाली पेंटिंग बनाई थी."
"हाँ तोह वो खुश करने के लिए बना दी होगी या फिर प्रोजेक्ट होगा. लेकिन आप अगर अभी मेरे साथ चलो तोह मैं दिखती हु उनके वो कैनवास जो हमारे कभी हाथ हे नहीं लगे थे. मरीना की माँ तक की नुदे पेंटिंग है उनके पास.", ऋतू अलग हे तरह मुस्कुराई ये सुन्न कर और प्रीती के गाल लाल हो गए थे.
"तू भी न काम नहीं है कुछ. चल अभी तोह हमको यही रुकना पड़ेगा और अगर तू चाहे तोह लंच कर ले इतने. आकांक्षा और अफसाना तेरा इन्तजार कर रही होंगी. मैं जरा चौकीदारी कर लू उन दोनों की.", ऋतू की बात सुन्न कर प्रीती भी हंसने लगी. उसको भी यही ठीक लगा की आकांक्षा और अफसाना को व्यस्त हे रखा जाए. उधर ऊपर वाले बाथरूम में दरवाजा हलके से बजने पर अर्जुन ने एहतियात से खुद को ढकते हुए दरवाजा खोला तोह आँखें चुंधियाँ गयी. अलका पूर्णतया निर्वस्त्र ऐसे कड़ी थी जैसे शेरनी शिकार से पहले जंगली सांड को निहार रही हो.
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"होनी को कौन ताल सकता है कुमार? ऊपर से कुमारी अनामिका में जीने की आस हे नहीं थी. तुमने कितनी सेवा की चाहे रो रिश्ता रखने लायक थी या नहीं लेकिन एक भाई का सही फ़र्ज़ तुमने फिर भी निभाया.", महल के इस बड़े से आँगन में हुक्के सजे थे और हर तरफ दीवान, मुद्दे पर 8-9 करीबी लोग बैठे थे और सारंग इस व्यक्ति की बात सुन्न कर कुछ खामोश हे रहा. ये 70 बरस के आसपास का हलकी तोंद वाला व्यक्ति था सारंग का बड़ा जीजा रमाकांत सिंह, तहसीलदार. सफ़ेद कुर्ते और धोती में वो अकेला उस दीवान पर बैठा शिद्दत से हुक्का गुदगुदाते हुए अपने विचार रखने लगा.
"जीजा जी, हमने जो किया वो कभी एक भाई नहीं कर सकता और आप ये सबसे बेहतर जानते है. तब जोश कही और था और परवाह तोह आज तक हम किसी की नहीं करते लेकिन गलतियां अनगिनत हुई उस वक़्त.", सारंग हुक्के की जगह सिग्गट के काश लगा रहा था. एक मेहरी सभी के सामने चाय रखने के बाद अंदर चली गयी. बाकी जो भी व्यक्ति यहाँ बैठे थे वो या तोह रमाकांत की तरफ से उनके मित्र थे या सारंग के. वो सभी इनसे कुछ दुरी पर अपनी हे चर्चा में लगे थे, अलग हुक्के के साथ.
"ऐसा तोह नहीं कुमार की उम्र के इस पड़ाव पर आने के बाद तुम पछतावा कर रहे हो? जो नियम तोड़ेगा वो बहार या सजा का हक़दार होगा. हम तोह यहाँ इसलिए आये है की तुम्हे शौक है और वो घराने में जन्मी थी जहा के हम दामाद है. हमारी तरफ कुछ ऐसा हो तोह नौबत इतनी नहीं आती. मौके पर हे फैंसला और सजा. चलो जो हुआ सो हुआ, अब आगे क्या करना है इस पर विचार करो.", रमाकांत की बात गलत थी और सारंग रिश्ते की कदर करता था जैसा जीवन भर करते आया था. लेकिन ये शौक का समाया था जहा ऐसी बातें रमाकांत को करनी नहीं चाहिए थी.
"नियामत तोह अतीत में भी ढेरो टूटे है जीजा जी और आप भी तोह उनकी जड़ में आये थे. क्या फैंसला हुआ और किसको सजा मिली?", सारंग ने ये बात बड़े हे नरम लहजे में कही थी लेकिन रामकांत कुछ पल खामोश हो गया. फिर एक गहरी सांस भरते हुए उसने झूठी हंसी से कहा.
"रघुबीर ने भुगति तोह थी वो भयानक सजा. 2-2 बार भुगति और मान लेते है की इसमें हमने नीलिमा को खोया लेकिन वो हमारे हाथ लग जाती तोह ज़िंदा उसको भी दफना देते.", रामकांत के ऐसे तेवर अगर कोई बहार व्यक्ति देख लेता तोह सेहम जाता. एक बाप अपनी खुद की बेटी को मारने की बात सोच भी कैसे सकता था.
"रघुबीर सिंह को हम भी नहीं गिरा पाए थे जीजा और वो सजा तोह कही से भी सजा नहीं लगती जिसमे एक युवक अनगिनत लाशें गिरा दे. वो युवक असाधारण था, हमारा गिरेबान पकड़ने वाले किसी शक्श के लिए ये खुद हम कह रहे है की वो अर्जुन सिंह सचमुच असाधारण था जीजा जी. जिस बेटी को आप दफ़नाने की बात कर रहे है, उसकी हे वजह से शायद हम और आप जीवित है. उस योद्धा ने बलिदान दिया था, बलिदान. हम आज भी रघुबीर सिंह के परिवार को नेस्तोनाबूद करना चाहते है और पंडित रामेश्वर जी के भी परिवार के हर वारिस को मिटाना चाहते है लेकिन इसका खेद रहेगा की हमे मात देने वाले से हमारी कभी दूसरी मुलाकात न हो सकीय.", सारंग की बात पर रामकांत पलभर के लिए झेंपा लेकिन फिर कुटिलता से मुस्कुरा दिया
"शेर का शिकार कैसे भी हो कुमार, शिकार तोह हुआ हे. उसके बाद बस मलाल रहा तोह वो रघुबीर सिंह का रहा. उसका गरूर तोड़ने में नाकामयाब हुए तोह वजह बस तुम्हारा पीछे हटना था. नीलिमा को हम खयालो से निकाल चुके है और अर्जुन सिंह के जाने से रघुबीर असहाये था जिसके घुटने टिकवाने की चाहत पूरी न हुई.", रमाकांत ने चाय का कप उठाने से पहले वही रखे जग से पानी जातक कर कुल्ला करके अंगोछे से मुँह साफ़ किया और चाय सुड़कने लगा.
"वो समय हमे भी याद है जीजा जी और पंजाब के राजघराने की खटपट, पंडित रामेश्वर जी की दखल से हम उतने मजबूत नहीं थे. वह टकराव हो जाता तोह शायद वो दोनों दुनिया से रुखसत हो सकते थे लेकिन वजूद हमारा भी न रहता. नील उतना योग्य नहीं था और पुष्पक स्कूल का विद्यार्थी था. और कही मुठभेड़ में वो बच जाते तोह शायद हम हे raaj-gharane में पूरी तरह दोषी साबित हो जाते. अब हम सक्षम है लेकिन रघुबीर सिंह नहीं है.", सारंग को मलाल था लेकिन ये पूरी तरह सत्य भी नहीं था के वो उतना सक्षम है या नहीं.
"रामेश्वर तोह है लेकिन तुम्हे अब व्यापार और रसूख ने बाँध कर लाचार कर दिया है."
"हमारी पहल से पुष्पक खिलाफ हो जाएगा जीजा जी. उसने ये स्पष्ट कहा था की जो सीमा लंगेघा वो दूसरे की तरफ चला जाएगा. इंद्रनील ने दहशत फैलाई है, राज अब उसको जारी रख सकता है लेकिन संगठन और बाहुबल में ये दोनों हे पुष्पक के सामान नहीं है. हम बस प्रतीक्षा कर रहे है की बस एक बार उनकी तरफ से पहल हो जाए और मेरा ये शेर फिर हमारी तरफ से लड़ेगा."
"एक राजा हो कर तुम साधारण परिवार से टकराने में हिचक रहे हो कुमार. ऐसा क्या है उस रामेश्वर के पास? रिटायर्ड पोलिसवाले जिसके पिता तुम्हारे हे पिता के मुंशी थे. या फिर रघुबीर सिंह का वो बीटा जो जैसे तैसे परिवार बचा रहा है अपना?"
"आप जानते है हम आज इस घराने के वारिस क्यों है? बात साधारण की है तोह देख रहे है की हम उन्हें आज भी 'जी' लगाए बिना सम्बोधित नहीं करते.?", सारंग हल्का सा तैश में आ चूका था जिस पर रमाकांत गौर करने लगा.
"क्या वजह है? यही की वो कभी तुम्हारे साथ बड़े भाई की तरह रहा है या साथ शिकार किया, खेले कूड़े. कृष्णेश्वर तोह आज भी तुम्हारे हे करीब है जिसके पास मुंशी की वो साड़ी संपत्ति है.", सारंग ने इतना सुन्न कर एक बार गहरी सांस भरी.
"उस घराने में असली वारिस है पंडित रामेश्वर शर्मा जी. महारानी प्रभा देवी, उनकी बहु के साथ साथ कुमारी लक्षिका की हत्या के अपराध से हमे विमुक्त करने की सजा थी हम ख़ामोशी से वो घरना छोड़ कर निकल जाए.", ये सच जैसे कभी किसी को मालूम हे न था और रमाकांत की आँखें हे फ़ैल गयी.
"वो राजा है?"
"नहीं, उन्होंने खुद को संरक्षाक मान लिया लेकिन राजमाता के अधिकार से वो कभी भी मालिक बन्न सकते है. कृष्णेश्वर भी सिर्फ उस जमीन का मालिक है जो मुंशी जी को मिली थी और दोनों भाई के बीच बराबर बाँट दी गयी थी.", सारंग अतीत की ये बात कह कर खामोश सा हो गया. कुछ पल रमाकांत भी सोचता रहा की ये रामेश्वर शर्मा कैसा इंसान है.
"फिर भी मालिक तोह नहीं बनाया जा सकता ऐसे किसी को?"
"कुमारी लक्षिका विवाहित थी उनसे जिसका तकाजा हमे नहीं था. वो जब 13 बरस की थी तभी उनके लिए पंडित रामेश्वर जी को रोक लिया गया था. फ़ौज से इसलिए हे वापिस बुलवाया गया था की एक बार उनका विवाह सार्वजनिक किया जाए और शाही तरीके से धूम धाम से पंडित रामेश्वर जी को भावी राजा घोषित किया जा सके. हम नासमझ थे उस समय और जोश में वो सब कर गए जो कभी भी नहीं होना चाहिए था. बस आजतक ये नहीं पता चला की वो ऐसे ख़ामोशी से कैसे विवाहित थे.", सारंग के चेहरे पर दुःख के भाव आये और पल में हे गायब भी हो गए.
"तहकीकात करवाओ फिर तोह कुमार. वैसे यही वजह थी जिस से तुम रामेश्वर से नफरत करते हो?"
"हाहाहा.. इस सबका तोह कभी जीकर भी नहीं हमारे बीच. मुझे बड़ी ख़ुशी होने लगी थी ये सोच सोच कर की जब उन्हें पता लगेगा की उनकी बीवी का कातिल मैं हु तोह वो बदला लेने आएंगे और फिर मैं उन्हें दिखाऊंगा की उन्होंने कितनी बड़ी गलती की थी कुमार सारंग पर हाथ उठा कर."
"ये जीकर तोह तुमने आजतक हमसे नहीं किया?", यहाँ ये दोनों भूल गए थे की एक शौक सभा चल रही है जिसमे खुद सारंग की हे बहिन का संस्कार कुछ समय पहले हुआ है. लेकिन आज जैसे सारंग अपने दर्द को बहार निकलने की ठान चूका था.
"रघुबीर सिंह को जब अपमानित किया था न जीजा जी तबतक मामला सही था. अगले दिन पंडित रामेश्वर जी ने वो किया था जिसका दर्द हमारे दिल में नासूर बन्न कर हर पल उभरता है. उनके वो शब्द की राजा रामेश्वर तुम्हे हुकुम देता है की अगर आइंदा उनकी रियासत में मैंने कदम भी रखा तोह कुत्ते का पत्ता मेरे गले में होगा और उनकी जूती मेरे सर पे. किसी ने भी कुमार सारंग के चेहरे को बिंजा इजाजत छुआ तक नहीं लेकिन पंडित... रेश्वर ने हमारे चेहरे को लहूलुहान कर दिया था.. जीजा वो तोहमत और जलालत आजतक हमारे दिल में किसी फांस की तरह चुबती है. एक कुमार को गिरेबान से घसीट कर उसने मुझे सरहद के इस पार भेज दिया. हम 100 हत्या करे या 1000 लेकिन उनकी सजा भी इतनी बड़ी नहीं जितनी रामेश्वर ने मुझे दी.", सारङग के नथुने फूल चुके थे और कनपटी से पसीना रिस्ता हुआ उसका उग्र गुस्सा साफ़ बयां कर रहा था. इस गर्जना को सुन्न कर एक बार तोह वह बैठे वो लोग भी सेहम गए जिन्हे पहले इनकी बात सुनाई तक न दे रही थी. कुमारी लतिका भी इस तरफ के दरवाजे आ कड़ी हुई तोह एकाएक सारंग बर्फ सा ठंडा पड़ गया.
"आप यहाँ से जाए कुमारी लतिका.", सारंग शांत हो गया था और बेटी भी कुछ कहे बिना वापिस चली गयी.
"हमे माफ़ करना हमारे व्यवहार के लिए जीजा. अब तोह आप जान गए होंगे की पंडित रामेश्वर जी कौन है? हाँ उन्होंने कुछ समय पहले राजपरिवार का वो ghosna-patra बदलवा कर सबकुछ उन्हें हे सौंप दिया सिवाए कुछ जमीनों के. लेकिन फिर भी वो साधारण नहीं है. उनके तीन में से 2 बेटे तोह उस वक़्त भी सनकी हत्यारे थे और आज बड़े ओहदे पे होने के बाद भी उनकी मारकाट जारी है. वह हमारी दखल नहीं और इधर उनकी दखल नहीं. जब नियम टूटेगा तोह परहाह भी करेंगे. चलिए भोजन का समय हो गया है, हाथ मुँह धुलवा देते है.", सारंग अतीत को याद करने के बाद अंदर से असहज हो चूका था और रमाकांत हैरान था की कोई इतना बड़ा raaj-paat कैसे त्याग सकता है. क्यों रामेश्वर शर्मा ने सबकुछ जान ने पर भी सारंग से बदला न लिया? इन्ही विचारो के साथ ये लोग दूसरी तरफ चल दिए जहा भोजन व्यवस्था थी.
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उस गुलाबी कमनीय काया को गॉड में लिए अर्जुन हॉल कमरे के हे बड़े बिस्टेर तक चला आया. नहाने के समय halki-fulky प्यार भरी मस्ती ने ऐसा असर दिखाया था की अलका के कंधारी अनार से बड़े और सख्त चुचो के गुलाबी निप्पल कड़क हो कर सुई से तन्न चुके थे. एक अलौकिक सा असाधारण खूबसूरत जिस्म जिस से स्वयं कामदेवी भी ईर्ष्या करे, उतने हे बेजोड़ और purn-kataav लिए मांसल जिस्म के मालिक की गॉड में था.
"तुम्हे मेरी याद भी आती है? याद है इस कमरे में हे तुम कैसे मुझे स्मूच करते थे जब भी मौका मिलता था? हर ड्रेस की तारीफ करते थे और बर्थडे पे भी सबसे पहले अपने पास आने की ज़िद्द की थी..", अलका को बड़े हे प्यार से उस नरम बिस्टेर पर लिटा कर अर्जुन भी बगल में लेता उसके जिस्म की वो कस्तूरी से ज्यादा मादक गंध साँसों में समेटने लगा. गोल सुडोल स्टैनो से निचे 3-3 पसलिया भरपूर नुमाया थी अलका की. पेट कुछ अंदर की तरफ और उतनी हे रेशमी गुलाबी त्वचा. लम्बी सुडोल टांगो के बीच हलके हलके रोये बता रहे थे के अब वो उतना ध्यान नहीं रख रही जितना अर्जुन के लिए पहले रखती थी.
"मैं वो पल नहीं आने देना चाहता जब तुम्हे लगे की मेरा दिल भर गया है. दिल कभी नहीं भरता अलका बस ऐसे लगातार मिलान से कुछ समय की विरक्ति दोनों में हो सकती है. अब जो पहले गर्लफ्रेंड थी वो कुछ ज्यादा हो चुकी है. मेरी तारीफ करना तुम्हे हे भारी पड़ेगा.", अर्जुन ने एक उभार को सहलाने के साथ साथ लम्बी सुराही सी गर्दन से बाल हटते हुए अपने होंठ टिका दिए. इस स्पर्श मात्रा से अलका की एक सुदल टांग अर्जुन के ऊपर आ गयी. सिसकारी लेती हुई वो पूरी तरह तैयार थी लेकिन अर्जुन जैसे अभी सतना चाहता था उसको. थोड़े अतिरिक्त दबाव से एक उभर को दबाते हुए वो गुलाबी चूचक उमेठा तोह अलका धनुषाकार सी बिस्टेर से कमर उठाने लगी. जांघ के जोड़ो के बीच 3 इंच की सुर्ख लकीर और पहले हुए लैब लालायित थे एक गहरे मिलान के लिए.
"आह्ह्ह्हह.. थोड़ा आराम से दबाओ इन्हे.. उम्मम्मम", उत्तेजित हो कर वो खुद हे अर्जुन को अपने ऊपर लाने लगी जो मुश्किल काम था. बाथरूम में पहले हे अर्जुन ने उसके दोनों उभार चूस चूस कर सख्त कर दिए थे और अब जैसे वो उनकी सख्ती कुछ नरम करने में लगा था. दिल में अलग सा डर भी था की इस घर में ढेरो लोग है और इस बीच वो अमर्यादित kaam-krida में लिप्त.
"ऋतू से मैंने खुद हे कहा था के वो तुम्हे मेरे पास आने को कहे. अभी भी लगता है मैं तुम्हारी अनदेखी कर रहा हु?", अर्जुन थोड़ा उचक कर अलका के चेहरे पर आया तोह वो मस्ती में गर्दन ना में हिलती हुई उसके सर को झुका कर तन्मयता से होंठो को पीने लगी. अलका चुम्बन में अब जैसे अर्जुन से आगे हो चली थी जो खुद अर्जुन ने मेहसुस किया जब उसकी जिव्हा की जड़ तक अपने होंठो में भर कर अलका ने सम्पूर्ण मुखरास निचोड़ लिया. किसी कुल्फी की तरफ वो पूरी जीभ को एक सिरे से जोड़ तक अपने दांतो में दबा कर पीने के साथ निचले हाथ से अर्जुन के vajra-ling को कास के दबती हुई तैयार करने लगी.
"उम्मम्मम्म.. ज्यादा टाइम नहीं है.. और तुम जल्दी जल्दी फ्री भी नहीं hote...aahh..", अलका के कथन पर अर्जुन झेंपता हुआ सा उसकी टांगो के बीच आ बैठा. दोनों टाँगे घुटने मोड अलका ने पाँव बिस्टेर पर टिकाये थे. अब तोह उसको अर्जुन से रत्तीभर शर्म न थी क्योंकि दिल से वही उसका सर्वोसर्वा था. अर्जुन को भी उतना हे प्रेम था बस खुद को रोके रखना कोई मज़बूरी. इस पल में वो आँखें मूंदे अलका की चिकनी जांघो को ऐसे सहलाने लगा जैसे वो इनका स्पर्श अपने साथ मफूज रखना चाहता हो. महीनो की कसरत और भरपूर देखभाल ने हे अलका को इस हुस्न की मालकिन बनाया था.
"टाइम वास्ते कर रहे हो तुम.", अलका को मजा आ रहा था लेकिन अर्जुन ने आग इतनी भड़का दी थी की उसने अपनी एक ऊँगली से खुद हे योनि पटल सेहला दिया.
"हाथ हटाओ तो सही.", अर्जुन का चेहरा अपनी जांघो के बीच झुकते देख अलका ने नजरे घुमा ली. उसके मुख से जल्द हे ये मादक सिसकारी निकली और अर्जुन ने मजबूती से दोनों टाँगे फैला कर उठाते हुए उस रसभरे kaam-kund को होंठो में भर लिया. अलका की योनि का बाहरी रंग भी जिस्म से एकसार था और ये समानता जैसे प्रीती के सिवा अर्जुन की बहनो में हे थी. योनि शांत होने की जगह कही ज्यादा जलने लगी अर्जुन की जिव्हा और होंठो की चुसाई से. अलका का चेहरा लाल हो कर पसीने से गीला होने लगा था और अर्जुन का लिंग भी अकड़ता हु ऐंठने लगा.
"तैयार हो न?", अर्जुन के हटने के बाद भी अलका को ऐसा लग रहा था के वो अभी तक उसकी छूट पे होंठ लगाए है. आवाज सुन्न कर जैसे तन्द्रा भाग हुई और लम्बी सांसें लेती हुई वो अर्जुन को एक कशिश से देख रही थी जैसे धन्यवाद कर रही हो.
"पता है फिर भी पूछ रहे हो?"
"आउच... stupid..aahhh..", अर्जुन तोह पहले हे सूपड़ा योनि पर टिका चूका था. अलका के जवाब देते हे वो उसके ऊपर झुकता चला गया. रेशम सी मुलायम और भीगी छूती की दीवारों ने ये तगड़ा लुंड पहले भी झेला था पर इसकी अभ्यस्त जरा भी न हुई थी. मांसपेशिया बुरी तरह फैलती चली गयी और एक पल तोह ऐसा आया जब अलका ने दर्द से खुद हे अर्जुन की छाती पर अपना हाथ रखते हुए रुकने को कहा. अभी भी एक तिहाई लुंड बहार था.
"माँ... आराम से नहीं कर सकते.. उफ़.. कमीनी ऋतू.. इसलिए ाःह... मुझे पहले करने को कहा..?", अर्जुन ने बिना मुस्कुराये बड़े हे प्यार से अलका का चेहरा सहलाते हुए कहा.
"झटका तोह मारा हे नहीं क्योंकि ज्यादा दर्द होता. तभी तोह मैंने पहले वो तैयार की थी जिसके लिए तुम मन भी करती रही. ऋतू को भी ऐसे हे दर्द होता है शुरू में. अभी ठीक हो जाएगा, उमाहहह..", अर्जुन ने छाती से हाथ हटने के बाद अलका के होंठो को कस के चूमते हुए अगले धक्के में उसकी बच्चेदानी तक की सुरंग माप दी. वो चटपटा रही थी लेकिन अर्जुन के होंठो ने वो शोर जज्ब कर लिया. कुछ देर पहले जो योनि लकीर सी थी अब वो बुरी तरह फैला हुआ एक रबर सा प्रतीत हो रही जिसने उस अत्यधिक मॉटे लिंग को कस कर जकड़ा हुआ था. अलका के दोनों उभर मसलते हुए अर्जुन ने कुछ हे समय में उसको शांत कर दिया.
"उफ़.. सचमुच घोड़े हो.. जाने क्या सोच कर तुमसे प्यार कर बैठी मैं? अब शुरू में धक्के तेज लगाए तोह गर्दन नोच लुंगी, कह देती hu.",Alka को अपने पेट तक वो मूसल ाचे से पता चल रहा था. अर्जुन भी उसकी बात मान कर बड़े आराम से थोड़ा हे लिंग बहार निकल कर अंदर करने लगा. योनि जल्द हे अभ्यस्त हुई और दोनों एक दूसरे को बेतहाशा चूमते हुए बराबर कमर हिलने लगे. उस चौड़े सीने के निचे अपने उभारो के दबने का यही आनंद अलका ने जाने कबसे महसूस न किया था. अर्जुन जब भी उसके साथ मिलान करता था, कोई हिस्सा अधूरा नहीं छोड़ा था. अलका का दूसरा सखलन जोरदार था और इस पल में अर्जुन के कूल्हों पर उसके नाखुनो ने भरपर वॉर किया.
"आह्हः.. क्या करती हो yaar..Waha तोह नहीं मारो..", अर्जुन ने झटके से लुंड बहार खिंचा तोह दर्द अलका को भी हुआ.
"ये तोह छोटा सा नेल लगा है तुम्हारे. जब तुम इतना बड़ा ये डंडा अंदर डालते हो tab..uff.. आज जाओ अब अपने फवौरीते स्टाइल पे, नखरे छोड़ कर.", ये उचित प्रेमिका थी जो अर्जुन पर हुकुम चलने के साथ साथ उसका ख़याल भी रख रही थी. अलका के गोलाकार कूल्हे भी उसको विशेष्ता थे. पानी से भरे गुब्बारों से लचीले और पूर्णतया गोल. दोनों तरह चुम्बन करने के बाद अर्जुन ने एक झटके में हे घोड़ी बानी अलका की नीव हिला दी.
"आअह्ह्ह्ह.. मा.. जालिम्पॉङ बंद करो.. उफ़.. ये बूब्ड जोर से दबाये न तोह देख लेना..", अलका अभी तैयार भी न थी और अर्जुन ने सरपट धक्के जड़ने शुरू कर दिए. इस मुद्रा में भी अलका के मॉटे उभरा जरा भी झूले न थे जिन्हे पकड़ कर अर्जुन पूरी मस्ती में अलका की कासी हुई छूट को निरंतर रौंदने लगा.
"आअह्ह्ह तुमने कहा था के मैं.. आह.. जल्दी आउट नहीं होता.. उम्.. और किसको करते देखा तुमने.. ? आह्ह्ह्ह..", अर्जुन की इस बात पर दर्द और मस्ती से भरी अलका भी मुस्कुराने लगी.
"उम्.. इतना.. मरे क्यों जा रहे हो? आअह्ह्ह.. फाड़ना बंद करो न.. "
"वैसे हे पूछ रहा हु.. उम्म्म.. और कल से एक्ससिटेड हु मैं तोह रुकने का दिल नहीं कर रहा..", पहले हे मरीना ने हालत खराब कर दी थी और अब समय भी काम था. अर्जुन पीछे से उस चिकनी पीठ पर झुका अलका के गाल चूमते हुए गहरे धक्के लगा रहा था. Patt-patt की बहार आवाज के साथ योनिरस की वजह से fach-fach की हलकी ध्वनि भी साफ़ गूँज रही थी. अलका के लम्बे बाल दूसरी तरफ से बिस्टेर पर गिरे झूल रहे थे और दोनों के जिस्म पसीने में तरोबर.
"उम्.. देखि नहीं.. आह्हः.. सुना था मैंने वो भी 3-4 से.. सबके जवाब 10 मिनट थे ज्यादा से ज्यादा.. उफ़.. और सभी ने अपने bhai-bhabhi या रिश्तेदार को हे छुप कर देखा था सेक्स करते हुए... उम्म्म.. जो मैंने फिल्म देखि थी.. आह्हः. बस उसमे हे 20 मिनट का सेक्स सन था.. उफ़.. वैसे एक बात बताओ..", अलका ने अपने अगले सखलन को झेलने के साथ हे अर्जुन के लुंड पर कसाव बढ़ा दिया था. अर्जुन भी गर्मी से भरा नजदीक हे था लेकिन अभी वो अलका के साथ कुछ और पल रुकना चाहता था.
"आठ.. हाँ पूछो..", अर्जुन ने थोड़ा और जोर से अलका के अनार दबाये तोह उसकी हलकी से चीख निकल गयी.
"मरवाओगे तुम.. आठ.. मेरी आवाज इस कमरे से जा सकती है bahar..aahh.. मैं पूछ रही थी की तुमने विन्नी दीदी को मन क्यों किया?", अलका के इतने स्पष्ट सवाल पर अर्जुन जहा का तहा रुक गया. उसको ये उम्मीद न थी की विन्नी दीदी वाली बात अलका उस से पूछ लेगी.
"बस उनके साथ दिल नहीं था ऐसा करने का."
"तुम एक तोह लगे रहो और दूसरी बात झूठ तोह बोलो हे मैट.. मैं मन थोड़ी कर रही हु बस इतना कह रही हु की कल तुम्हारे पास सही टाइम है.. आह्हः.. ऐसे हे बस.. होने वाली हु मैं..", अलका की आँखें बंद होने लगी थी अब और ऊपर से अर्जुन का वजन धोना अलग म्हणत.
"कल ऐसा क्या है?", अर्जुन भी हांफने लगा था जैसे नजदीक हो.
"उम्माह.. बहार निकाल लेना होने से pehle..aahhhhh.. कल सभी लड़कियों के लिए पार्लर वाली आएँगी तोह तुम निकल सकते हो. उफ़.. ", अलका जैसे हे झड़ने के बाद औंधे मुँह गिरी अर्जुन ने भी अपना बहार निकाल कर हाथ से हिलाते हुए उसकी पीठ पर हे सारा सफ़ेद लावा उड़ेल दिया. थक्क कर वो अलका की बगल में हे बिस्टेर पर लेता गहरी सांसें ले रहा था.
"ले कर कहा जाऊंगा.. आह्ह्ह्ह..", अलका कुछ शांत थी और अर्जुन का सवाल सुन्न कर कड़ी होती हुई बाथरूम की और चल दी.
"मंजू के घर.. और अब जल्दी से खुद को भी साफ़ कर लो.", अलका की बात पर अर्जुन भी धीमे कदमो से बाथरूम में चला आया. अलका बड़े गौर से अपनी योनि को देख रही थी. चलते वक़्त हल्का सा हे दर्द था लेकिन जांघो में मीठी जलन. योनि पर पानी की ठंडी फुहार डालने के बाद पीठ को साफ़ करके वो शरीर पौंछने लगी. अर्जुन ने भी शरीर को फुहारे के निचे कुछ आराम दिया और अलका को देखने लगा. बालो निचोड़ती हुई वो कमाल लग रही थी. आईने से उसने भी अर्जुन की नजरो को देखा तोह पलट कर उसके होंठो को चूमने लगी.
"बस करो अब. और जो कहा है वो ध्यान रखना. कल सभी लेडीज और लड़कियां बिजी रहेंगी, परसो भी. तोह टाइम से दोनों जा सकते हो और वो हमारे से बड़ी भी है और समझदार भी. हक़ तोह बराबर हे है अगर देखा जाए तोह. हाँ, अब अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लेना. मैं जा रही हु त्यार होने के बाद.", अलका बाथरूम से बहार चली आयी जहा उसके अंगवस्त्र और बाकी कपडे रखे थे. जितने वो त्यार हुई उस से पहले हे अर्जुन अपने कमरे में जा चूका था.
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"ऐसा है रामेश्वर, मेरा अब दिल है के बाकी जीवन थोड़ा अलग बिताऊं. सुकून से और इस ghar-pariwar वालो झमेलों से दूर.", बैठक में चंद्रो देवी दीवान पर आसीन थी और उनके हे करीब बैठे थे पंडित जी. एक तरफ सोफे पर शंकर के मां हंसमुख उर्फ़ बिल्लू थे जिनके साथ छोल साहब और शंकर बैठे थे और सामने राजकुमार जी, अशोक और नरिंदर. उमेद बहार था सांगवान जी और आचार्य जी के साथ किसी काम से.
"ऐसा क्या विचार बना भाभी एकदम से?", पंडित जी भी थोड़ा हैरान थे ये सुन्न कर.
"वकील से मिल के आयी हु यहाँ आने से पहले. और 4 बराबर हिस्से कर दिए साड़ी जमीन के हवेली छोड़ के. अब बिंदु तोह रही नई यहाँ और कल को ऋचा का भी ब्याह हो जाना है. गुड्डी चाहे है सुदर्शन को एक नयी जगह बढ़िया माहौल दिया जाए. जमीन और भत्ते बिजेन्दर संभाल रहा है जो बाकी तीनो को भी बराबर हिस्सा देता रहेगा. और मैं थोड़ा दूर रहना चाहती हु इस सबसे. तेरी जानकारी में कोई ऐसी जगह हो जहा शांति हो, ठीक जमीन हो तोह मैं वह चली जाऊ.", चंद्रो देवी ने अपनी बात खुल कर बताई तोह यहाँ बैठे लोगो में से सबसे पहले हैरान शंकर हे हुआ.
"ताई, आपके पास thik-thaak पैसा है और जीवन की जानकारी है. कोई anaath-aashram ले लो हिमाचल या उत्तरांचल में. अपने रहने की जगह जैसी चाहो वैसे तैयार कर लेना और गरीब अनाथ बचे दूसरी तरफ रहेंगे, पढ़ेंगे तोह आपकी छाया में उनका भी भविष्य बनेगा. सरकारी मामले पापा देख लेंगे और कहो तोह मैं भी आपका साथ देने को त्यार हु.", नरिंदर ने एक हे बात बोली थी और चंद्रो देवी ठुड्डी पे हाथ रखती बड़े गौर से उसको देखने लगी. बाकी सभी खामोश रहे और रामेश्वर जी ने भी सर हिला कर सहमति दिखाई.
"तेरी बात 16 आने सही है इन्दर बीटा. बचे हो, उनके खेलने पढ़ने के साधन हो तोह मैंने भी ाचा लगेगा वह रह कर उनकी देखभाल करना. और जब मर्डर गयी फेर कौन देखेगा वो सब?"
"मैं देखूंगा फेर ताई और ऐसे मामलो में ट्रस्ट बनाई जाती है जिसमे सभी तरह के लोग होते है. वैसे तोह आप मरती न अभी अगले 10-15 साल लेकिन इंसान को सुकून तभी मिलता है जब वो किसी को बेहतर जीवन जीने में मदद करे. भविष्य बनाये उनका और आप भी एक आत्मीयता महसूस करे उन सबके साथ जिनका बेचारो का कोई नहीं. जगह तोह पापा चुटकियों में दिलवा देंगे, हैं न पापा?", नरिंदर बोले हे जा रहा था और उसने ध्यान भी न दिया की शंकर उसको रुकने का इशारा कर रहा था.
"हाँ, बाप तोह तेरा पूरे भारत का पटवारी लगा है न.? लेकिन अगर भाभी आप सहमत होती हो तोह ये सब देखा जा सकता. लेकिन अकेले रहना और वो भी बढ़ती उम्र में थोड़ा मुश्किल रहता है. काम से काम 5-6 महीने तोह इस सबमे भी लग जाएंगे.", रामेश्वर जी ने अपनी इत्छा बताते हुए बाकी वर्णन भी दिया.
"जमा अकेली न रह रही है मैं रामेश्वर. गुड्डी रहेगी मेरे साथ और सुदर्शन का भी जीवन सुधारना है. इतने समय में वो भी चलने फिरने लगेगा, शबनम को भी उसकी जायदाद सौंप दूंगी और फेर जाउंगी तोह सबके विवाद ख़तम करके हे जाउंगी. मुन्नी का तोह गाँव में रहना danva-dol है लेकिन सुशीला हवेली में हे रहेगी और बिजेन्दर अपने baap-dada की जमीन से दूर न रहने वाला. जगह देख और किसी पहचान के आदमी को लगा इस सबमे. मैं इन्दर की बात से सहमत हु और सबकुछ ऐसा हे करना है जैसे इसने कहा.", चंद्रो देवी ने तोह निर्णय हे बना लिया था.
"ठीक है भाभी फेर ऐसे हे सही. ये विवाह से फारिग होने के बाद मैं खुद इन्दर के साथ पता करता हु आपके लिए उचित जगह. सुदर्शन बचो में रहेगा तोह सकरात्मक विकास करेगा. वैसे भी अब वो बेहतर है लेकिन माहौल सदा और शांत मिलेगा तोह स्वयं निर्माण में केंद्रित रहेगा. खैर कोई विवाद है तोह साँझा कर सकती हो आप? या मैं मिलने उधर आ जाऊंगा.", रामेश्वर जी ने अब ये बात पोलिसिअ लहजे में कही थी.
"21 का ब्याह है और 23-24 को टाइम लगे तोह आ जाना. विवाद तोह कोई नहीं और कोई करके तोह देखे जरा फिर चंद्रो देवी अपने तरीके से समझाएगी. ले बबिता बिटिया भी आ गयी. आजा मेरी लाडो.", चंद्रो देवी के चेहरे पर एकदम से हे ख़ुशी छ गयी थी बबिता को अंदर आते देख. वो भी अपनी दादी से गले लग कर मिली और फिर रामेश्वर जी के चरण स्पर्श करने लगी तोह उन्होंने रोक कर आशीर्वाद दिया.
"बेटियां पाँव के हाथ नहीं लगाती. और तुम्हारे पतिदेव अब बेहतर है?", आज गहरे लाल सलवार सूट में बबिता पूरे श्रृंगार के साथ थी, मांग भैर हुई और नाक में बाली. उसकी काया से तोह साधारण व्यक्ति वैसे हे प्रभावित हो कर दूर से आहें भरता रहे.
"सब ठीक है नाना लेकिन आप बताओ मेरी दादी के चुगली करे है आड़े बैठी?", बबिता ने मुस्कुरा कर अपनी दादी की मजे लेते हुए रामेशवर जी को नाना कहा तोह नरिंदर को भी ठसका लगा ये सुनते हे. वो मंद मंद हंस रहा था और बबिता सबको हाथ जोड़ कर मुस्कुराती हुई फिर नरिंदर जी को देख हंसने हे लगी.
"तेरे नाना कबसे हो गए मेरे पापा?"
"जड़ से मेरी माँ अर्जुन की बुआ बानी और मेरे ब्याह के रिवाज आपका बड़े भाई साहब श्रीमान शंकर मां ने किये. ेब आपने मैं चाचा कहु के मां, यु आप डीडे कर लो.", बबिता तगड़ी हे mooh-fatt थी और उसकी ख़ुशी देख नरिंदर जी भी खुश हुए.
"तेरा तोह मैं मां हे ठीक फेर. न्यू बता तू ेक्लि किस तरिया आयी अपने पीहर.?", नरिंदर जी भी उतनी हे बागड़ी में बोले और बबिता अपनी दादी की बगल में बैठती हुई कोमल से पानी लेते हुए बोली.
"पीहर से लेके जाए करे है मां लेकिन आज तोह मैं बस विकास भाई और मुस्कान गइल आयी हु तोह उलटी जाउंगी थोड़ी हाँ में. परसु आउंगी फेर ब्याह के बाद जाउंगी. नाना आपने बताया कोणी के मेरी दादी के चुगली करे थी?", बबिता को तोह जैसे जानकारी लेनी हे थी.
"ताई तोह घर छोड़ के जा रही है. बोले थी के मेरी लाडो घर से गयी ेब मेरा जी न लाग्दा. ओर्फनेज होम खोलन का विचार है दूर कही. बता तेरे के विचार है.?", यहाँ फिर से माहौल में जैसे बस यही 2 लोग बातें करने लगे और बाकी सब या तोह मुस्कुराते दिखे या अपनी हे धीमी बात में.
"यु कार्य ने दादी चोखा काम. मेरा भी कंट्रीब्यूशन रावेगा इसमें लेकिन जे कल ने तू मर्डर गयी तोह बेरा किस तरिया चलेगा?", बबिता ने जितनी गंभीरता से बात कही थी रामेश्वर जी ने हलके से उसके चपत लगा दी.
"शुभ शुभ बोलै कर बेटी. कुछ भी बोलित है और इतना तोह सुशीला की जुबान न चलती थी उसके टाइम. चल अब तू अंदर जा कौशल्या के पास और बाकी सबसे मिल."
"सुशीला की जुबान के टेम होर था नाना. व एक घर की थी और मैं 3-3 की हु. ाचा दादी जे मेरे से पहले जावे तोह मिल लिए और मैं गयी तोह बता के कोणी जॉन.", बबिता गिलास वही टेबल पर रखती हुई धड़ल्ले से अंदर की तरफ चली गयी.
"ताई, ये लड़की तोह मेरी भी समझ से बहार है. एक तोह मेरे जितनी लम्बी ऊपर से जुबान सुशीला से भी. वो बेचारा तोह ब्याह करके शायद इसलिए ठीक न हो रहा के इसको सेहन कैसे करेगा.", नरिंदर ने बबिता को जाने के बाद लपेटा था और शंकर समझ चूका था.
"एक बार उसके सामने बोलियों, फेर तू अगली बार न मजे लेने वाला. वैसे ताई आपको मुस्कान से तोह मिलना चाहिए.", शंकर ने ये नाम अनजाने हे लिया और चंद्रो देवी ने हामी भरी भी
"हाँ बीटा सही कहा. शबनम न आ सकती तोह इस बेटी को हे सौंप दूंगी. बहने तोह हैं हे दोनों सगी.", एकदम से नरिंदर के हृदय में पीड़ा सी उठी जिसको बहार न आने दिया.
"ये मुस्कान कौन है शंकर? और शबनम तोह इंग्लैंड में नहीं रह रही?"
"ये भी इंग्लैंड में रहती है इन्दर बीटा लेकिन कॉलेज है इसका अभी इधर. पूरा हो गया तोह वापिस चली जायेगी या फेर बबिता के साथ हे रहेगी जबतक चाहे. अभी भी उसके साथ हे है बस कभी कभी यूनिवर्सिटी आती है विकास के साथ गाँव से. रुक मैं मिलवाती हु. मधु बिटिया, मुस्कान होगी तोह बुलाइयो.", इधर से कौशल्या जी के कमरे में बात करती मधु पर उनकी नजर पड़ी तोह उसको हे आवाज दे दी. शायद बबिता और मुस्कान इधर हे थी जो मुस्कान तुरंत हे थोड़ी सेहमी सी दरवाजे पर आ रुकी. उसने वही से सबको नमस्ते की जैसे मैं में झिझक हो.
"मेरी प्यार बिटिया अपने हे घर में सेहमी क्यों है? इधर आओ.", रामेश्वर जी ने बड़े हे स्नेह से उसको बुलाया था और मुस्कान भी अपने नाम के हिसाब से एक दबी हुई मुस्कान और बहोत साड़ी बेचैनी लिए उनके करीब आ गयी. चंद्रो देवी ने सर सहलाते हुए अपना परिचय दिया जिन्हे वो जानती थी. रामेश्वर जी तोह पहले भी 2-3 बार मुलाकात कर चुके थे और शंकर जी से भी वो परिचित थी.
"नमस्ते अंकल.", सभी से नजरो और हाथ से अभिवादन करके वो अपनी तरफ कुछ हैरत से देख रहे नरिंदर जी को हे देखने लगी.
"नमस्ते बीटा. तोह तुम्हारा नाम है मुस्कान मिर्ज़ा? मिल कर ख़ुशी हुई."
"जी मुझे भी."
"यहाँ कबसे हो बीटा आप?", ये तीसरा शख्स था जिसके साथ लगातार इन्दर हे बात कर रहे थे.
"लास्ट ईयर से हु अंकल और अभी कॉलेज का फर्स्ट ईयर कम्पलीट हुआ है. यूनिवर्सिटी के हॉस्टल में हे रहती हु पर अभी वकेशंस है तोह बबिता दीदी के पास उनके वह. मैंने आपको कही देखा है अंकल.", मुस्कान की आखिरी बात सुन्न कर नरिंदर जी मुस्कुरा भर दिए.
"तुम्हारा जब दिल करे तुम यहाँ भी आ सकती हो रहने के लिए. गाँव से पास तोह ये घर भी है. घर में और किसी को जानती हो?", मुस्कान ने बड़े हे मासूम तरह से गर्दन हिलाई थी और उसकी हाँ देख कर नरिंदर जी ने भी गर्दन हिला कर हे पूछा किसको.
"अर्जुन को, कोमल दीदी को, शंकर अंकल को, दादा जी को..
"बस बस बीटा. बहोत है बहोत है. सभी प्रमुख लोगो को जानती हो और बाकी सबसे हम खुद मिलवा देंगे. और ये अर्जुन भी आ गया. नवाब साहब, घर में तुम्हारी पहचान के मेहमान आये हो तोह थोड़ा बहोत मिल लिया करो. और इस संजीव से इतना चिपकना बंद कर दो भाई, इसकी भी शादी होने वाली है.", नरिंदर कुछ हल्का महसूस करने लगे थे और संजीव मुस्कान से हाथ मिला कर मिला. अर्जुन की वजह से दोनों की पहचान भी ाची थी अब.
"अभी तोह मैंने और भैया ने सुना था के आप मुस्कान को कह रहे थे की ये घर उसका भी है. फिर ये मेहमान कैसे हु? बताओ दादा जी ab.",Arjun ने अनजाने हे सबको लपेटने वाले नरिंदर जी को हे लपेट लिया था. सभी हंसने लगे और अर्जुन मुस्कान के साथ अंदर की तरफ चल दिया.
"वो बहार आप सभी को खाने के लिए उमेद चाचा जी और आचार्य जी बुला रहे है.", संजीव ने जानकारी दी तोह उसके चाचा, फूफा और पापा उठ कर बहार हे चल दिए.
"सतीश, तेरा ड्राइवर बुलवा दे मुझे छोड़ने के लिए.", चंद्रो देवी भी उठ कड़ी हुई.
"आप तोह रुको भाभी शाम तक."
"न रामेश्वर, सबसे मिल ली और ाचे से खाना भी खा लिया. तेरे साथ सुख दुःख बतला के मैं हल्का हो गया तोह अब बस हवेली चालू. शादी पे आउंगी अब तोह.", अगले कमरे में वो अपनी रिश्ते की सभी देवरानियों से मिलने लगी थी और संजीव छोल साहब के ड्राइवर को गाडी लाने के लिए बुलाने चल दिया.
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"ये तोह चलता फिरता पहाड़ है यार ऋतू?", अलका तोह हैरान थी अपने सामने बबिता को आज ाचे से देख कर. वो सबसे हंसी ख़ुशी मिल रही थी. रेखा जी और ललिता जी ने तोह बबिता को ब्याह कर पीहर आयी बेटी जैसा दुलार दिया था. वही अलका की बात सुन्न कर ऋतू ने एक गहरी सांस भरी
"अपने kishan-kanhaiya ने इस पहाड़ की सुरंग भी खोद दी है. ऋचा से पता लगा था के ये दीदी प्रेग्नेंट है और इनके पतिदेव के गोली लगी है जबकि शादी हुए महीना नहीं हुआ.", अलका के तोह होश हे उड़द गए ये जान कर.
"तुझे ऋचा ने कहा ये सब?"
"नहीं मुझसे थोड़ी ने वो ऐसी बात करेगी. विन्नी दीदी और वो जब कोमल दीदी के कमरे में सोई थी तब आपस में विन्नी दीदी के ख़याली पुलाव मैंने बाथरूम एक अंदर से सुने थे. ऋचा कह रही थी कही अर्जुन ने उनके साथ किया और वो बबिता दीदी की तरह पेट से हो गयी तोह? अब ये अपना ारु पता नहीं कहा कहा अकाउंट खोले बैठा है?", इधर इनके करीब से हे अर्जुन और मुस्कान आये तोह उसने इन दोनों से मुस्कान को मिलवाया जो बड़ी सहजता से हे मुस्कुरा कर Alka-Ritu से मिली. बबिता आदतन अर्जुन से कास के गले लगी तोह अलका के मुँह से निकल हे गया.
"बी गॉड, तू सही कह रही थी."
"क्या सही कह रही थी अलका? मैंने कुछ बोलै क्या जो मुझे हे नहीं पता लगा.?", मुस्कान का बुद्धि प्रदर्शन देख ऋतू खुद को हंसने से न रोक सकीय.
"तुम भी बहोत प्यारी हो यार. मतलब मैंने ऐसा कहा था के मुस्कान बहोत सुन्दर है तोह तुमसे मिल कर अलका ने वही कहा के मैं सच कह रहे थी.", अब मुस्कान फिर से शर्माने लगी थी और जब अर्जुन इनके पास से गुजरा तोह उसकी नजरो के पीछे Alka-Ritu की भी नजरे गयी. दोनों में हे फिर से हैरानी वाला इशारा हुआ.
"मुस्कान, माँ और चची से भी मिल लो यार.", ऋतू ने उसका ध्यान बाकी सबकी तरफ करवाया तोह वो झेंपती हुई सी कृष्णा जी की तरफ चल दी.
"ये भी गयी.", ऋतू ने अजीब से सूरत बनाते हुए कहा और फिर मुस्कुराने लगी जैसे अलका कर रही थी.
"अब तू गलत है ऋतू. ये पहले हे जा चुकी है डार्लिंग.", बबिता के मामले में अलका हैरान थी और यहाँ मुस्कान वाले में ऋतू.
"सचमुच."
"बिलकुल. कोमल दीदी को भी पता है और शायद बबिता को भी.", ऋतू इतना सुन्न कर उस कमरे की तरफ चल दी जहा पहले वो रहती थी और अब कृष्णा चची.
"आजा, आराम हे कर ले थोड़ा.", उसने कमरा खाली देख अलका को भी बुला लिया. ये इनके लिए सही समय था अपनी ख़ास बातें करने का.
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"रात का सन तोह संजीव कुछ सोच के बना लेता मेरे भाई. ये चाचा लोग वह होंगे तोह...", विकास थोड़ा आशंकित था शराब पार्टी को ले कर और उसकी बगल में हे अर्जुन था जिसके कंधे पर विकास का हाथ रखा था.
"उनके साथ पीने में ज्यादा मजा आएगा भाई. और टेंशन की बात हे नहीं है क्योंकि उनकी महफ़िल अलग हॉल में लगेगी 1-2 पेग के बाद और हम सबकी अलग. वैसे बिजेन्दर का फ़ोन आया था की तू जा रहा है उसको लेने और अंदर सुना है बबिता दीदी ने वापिस भी जाना है.", संजीव ने उसको भरोसा दिलाया तोह अर्जुन बड़े गौर से सब सुन्न रहा था.
"नजरो की तोह शर्म है हे भाई क्योंकि खिलाडी आदमी पीटा नहीं और जब थोड़ी चढ़ा ले तोह फिर ट्रेक्टर की आवाज पे भी झूमना शुरू. ये छोटे उस्ताद भी चलेंगे क्या?", अर्जुन का नाम लेते हे वो संजीव की तरफ आशा से देखने लगा.
"न न.. इसको ले गए तोह फिर हो गयी पार्टी. जूते मिलेंगे सुबह हमारे थानेदार से. पता जिस दिन कॉलेज जाने लगेगा उस से पहले दिन ऐसी हे पार्टी रखूँगा मैं इसके लिए.", निराश होते अर्जुन के चेहरे पर ख़ुशी आ गयी थी ये सुन्न कर. संजीव का प्यार अपने इस भाई के लिए सर्वोपरि थी.
"ये बात भी ठीक लेकिन मैंने तोह सुना है ऐसी पारी में कुछ काण्ड भी होते है. देखियो भाई मेरी शादी होने वाली है और इस सबसे तोह 10 कोस दूर हे सही."
"मेरी भी शादी हे होने वाली है विकास और वैसा कुछ नहीं होने वाला. हाँ पंडितो की इस पार्टी में मेनू जरूर थोड़ा machli-murge वाला होगा क्योंकि ज्यादातर लोगो को वही पसंद है मेरे सिवा. अब पहले वो समस्या हल कर जो पूछी थी.", संजीव ने बबिता का जीकर बिना नाम लिए किया.
"हम्म्म. मुस्कान तोह कह रही थी वो दोनों हॉस्टल रुक जाएंगी लेकिन जीजी बोल रही की 5 बजे हे वापिस निकलना है. गोलू अब बेहतर है और उसको अकेला न छोड़ने वाली बबिता. कोई बात नई मैं चला जाऊंगा और फिर उधर से हे बिजेन्दर को लिया लाऊंगा."
"अर्जुन तू चला जइयो उन्हें छोड़ने और बिजेन्दर को मैं इधर हे बुला लेता हु. रात शराब के बाद कोई कार नहीं चलाएगा. विकास की जरुरत पड़ेगी उधर और मैं इसके हे साथ चला जाऊंगा.", संजीव जैसे बहोत कुछ तैयारी किये बैठा था. अर्जुन तोह मन कर नहीं सकता था कभी.
"हाँ चला जाऊंगा भैया. आधे घंटे का तोह सफर है और टाइम से मैं वापिस. आप निश्चिंत हे रहो.", विकास भी खुश था संजीव की समझदारी और परवाह देख कर.
"चल भाई फेर rotti-tuk टॉड लेते है, इतने अर्जुन उन्हें बता देगा. ठीक है छोटे भाई?"
"हाँ आप निश्चिंत रहिये. मेरे लिए कोई ज्यादा बड़ा काम नहीं.", अब उसको बबिता या मुस्कान में से एक तोह मिलनी तये हे थी. मुस्कान ने तोह साफ़ साफ़ कह भी दिया था के आज वो हॉस्टल रहने वाली है लेकिन अब प्रोग्राम गाँव का बन्न चूका था. गोलू के वह होने से बबिता का मौका काम था पर वो मुस्कान का तोह कुछ करवा हे सकती थी. बाकी किस्मत मेहरबान रही तोह क्या पता कुछ भी हो जाए.

