अपडेट 156
डर
"प्रीती, अब ये क्या बात करने लगी हो तुम? अर्जुन ने मुझे अपना दोस्त बनाया न और सच कहु तोह हमारा ये दोस्ती का रिश्ता मुझे ज्यादा पसंद है.", आकांक्षा ने अर्जुन के कुछ भी कहने से पहले ये जवाब दिया तोह प्रीती ने पलट कर उसको ध्यान से देखा. चेहरे पर कुछ भी झूठ न था उस प्यारी सी लड़की के.
"सच कहु तोह मैं पहले इस सब में यकीन नहीं करता था. मेरी ज़िन्दगी के वो लक्ष्य जिनके लिए दादा जी मुझ पर इतनी म्हणत कर रहे थे, वही सबकुछ था मेरे लिए. आकांक्षा मेरे साथ पढ़ती भी है ये 10 महीने तक तोह मुझे पता भी नहीं था. पहली बार जब हमारी थोड़ी बात हुई तोह वो इम्तिहान का आखिरी दिन था प्रीती. इस बराबर बैठा मैं सिर्फ इसके भूरे बालो को देखता रहा जैसे ये किसी अपने की याद दिला रहे हो.", अर्जुन ने कार घर ले जाने की जगह धीमी गति से विपरीत दिशा में मदद ली. दोनों हे लड़कियां उसके गभीर चेहरे और लफ्जो पर केंद्रित थी.
"फिर वापसी में तोह अलग सा हे दर्द होने लगा था क्योंकि जिसको याद करने की कोशिश कर रहा था वो कहा होगी और क्या वो मुझे भी याद करती होगी? इन सवालों से सर दुखने लगा तोह मैं खुद से हे भागने लगा. गेट से पहले हे वृक्षों के पास दूर कड़ी आकांक्षा को देख कर भी मैं अनदेखा करने की कोशिश कर रहा था लेकिन कदम इसके करीब चले हे गए. मुझे बस वो दर्द दिखा और उसका कारण मैं खुद. प्यार के बदले मैंने दोस्ती को चुना क्योंकि मैं खुद हे नहीं जानता था की मेरा भविष्य क्या है. एक मासूम दिल को तोड़ने का बोझ मैं अपने ऊपर लेने को तैयार नहीं था और प्यार कबूल नहीं कर सकता था क्यूंकि ऐसे हे सुनहरी भूरे बालो वाली लड़की ज़िन्दगी की शुरुआत से मेरे दिल में बस चुकी थी.", प्रीती इतना सुन्न कर नीचे देखने लगी थी और आकांक्षा आज बड़े ध्यान से उस अर्जुन को देख रही थी जो पहली बार इतना गंभीर और व्यथित था. कार अपनी हे धीमी गति से नए सेक्टर वाली खाली सड़क पर चलने लगी.
"उसके बाद कितने हे दिन हम दोनों की मुलाकात हे न हुई. जब पता लगा के दोनों कितने करीब रहते है तोह मिलना शुरू हुआ. कुछ समय बाद मेरी चाहत भी वापिस आ चुकी थी जहाँ सफर हम दोनों हे थोड़ा कतराते हुए आगे बढ़ा रहे थे. इस दौरान मुझे जिसने खींचा वो था आकांक्षा का गहरा खालीपन और थोड़ी बहोत ख़ुशी की वजह मेरा उस से मिलना. पता भी नहीं चला के इसके अधूरेपन में मैं खुद कब शामिल हो गया. इस बार मैंने प्यार का इजहार किया था प्रीती और उसके बाद मुझे अंशु अपनी जिम्मेवारी लगने लगी जिस वजह से मैंने अंकल आंटी के साथ थोड़ी सख्ती से बात करके इसको समय देने के लिए कहा. अंशु के अकेलेपन के साथ साथ ऐसा करने की दूसरी वजह थी की मैं फैंसला हे नहीं ले प् रहा था की हमारे रिश्ते की मंज़िल भी है या नहीं. फिर अंशु ने जैसे सब जान लिया था और इसको दोस्ती का नाम दे दिया.", अर्जुन ने बात पूरी करने के साथ हे अपनी तरफ का शिक्षा थोड़ा निचे कर दिया. बहार अभी भी हलके बादल छाये थे और ऐसा हे कुछ हाल अर्जुन के मस्तिष्क का भी था. लेकिन इस ख़ामोशी में प्रीती ने मुस्कुराते हुए अर्जुन का गाल चूम कर जैसे कार की भीतर पसरा माहौल भांग कर दिया.
"इसलिए तोह तुमसे मैं इतना प्यार करती हु मेरे buddhu-ram. तुम सबकी परवाह करते हो और सबसे ज्यादा उसकी जो तुम्हे प्यार करता हो. मैं आकांक्षा को तबसे जानती हु जब इसके माँ हमारे घर आते थे पापा को राखी बांधने. बस उस समय हम दोनों की कभी बानी हे नहीं क्योंकि ये नकचढ़ी थी और मैं होती थी तुम्हारे साथ. वैसे ये बहोत मोटी सी थी और खेलने वेलने से दूर हर वक़्त एक हाथ में शीशी और दूसरे में अपने जैसी एक डॉल लिए बिस्टेर पर पसरी रहती थी.", प्रीती की बात सुन्न कर अर्जुन जहाँ अभी भी थोड़ा असहज था वही आकांक्षा के चेहरे पर अलग हे मुस्कराहट छा गयी थी.
"मैं इतनी भी मोटी नहीं थी प्रीती बस ये khel-kood पसंद नहीं था. और ये साहब या तोह तुम्हारे साथ हे चिपके रहते थे या फिर todd-fodd के साथ बस गुस्से में मुँह फुलाए किसी न किसी ने नाराज. पता होता के ये वही अर्जुन है तोह नजदीक भी नहीं आती. वैसे तुम बिलकुल बदल हे गए हो अर्जुन. और ये बदलाव सबको पसंद है.", आकांक्षा की बात पर प्रीती दरवाजा खोल कर हंसती हुई कार से उतर गयी. पिछली सीट से उस छोटे से पिल्लै को लेती वो बहार घांस में टहलने लगी.
"मैं प्रीती के साथ जीवनभर जीने वाला हु अंशु लेकिन सच कहु तोह मैं तुम्हारा दोस्त भी नहीं हु. तुम्हारे साथ रहने मिलने से जो प्यार हुआ है उसको दरकिनार नहीं कर सकता.", अर्जुन ने एक नजर बहार टहलती प्रीती पर करने के बाद पीछे बैठी इस खूबसूरत बिल्लोरी आँखों की स्वामिनी को देखते हुए कहा.
"फैंसले वक़्त भी करता है अर्जुन और मैं प्यार में विश्वास करती हु न की वाडे और फ्यूचर में. फिलहाल 7-8 साल तोह मेरे पास ये आजादी है हे और उसके बाद जहाँ mom-dad कहेंगे वह मेरी शादी. लेकिन पहला प्यार तुम्ही हो और जितना चाहे वक़्त प्रीती को दो, बस महीने में 2-3 बार मुझसे मिल लोगे तोह वही बहुत है मेरे लिए. हाँ ये दोस्ती वाली बात भी गलत नहीं है. तुम बस अकेले में मेरी चाहत हो और सबके सामने मेरे बेस्ट फ्रेंड.", आकांक्षा को इस तरह सबकुछ मानते देख अर्जुन के दिल में चल रही उथल पुथल एक पल में हे शांत हो गयी. टकटकी लगाए वो बस उसको हे देखता रहा. कितने आराम से उसने ये कह दिया था की जीवन में प्रीती को हे हम रखे और उसको दोस्त बन्न कर जीने में भी परेशानी नहीं.
"उमाह.. तुम सचमुच ख़ास हो अंशु, बहोत ख़ास.", अर्जुन ने इस बार प्रीती की परवाह किये बिना हे आकांक्षा के गाल चूम लिए. वो भी सुर्ख गुलाबी होंठो से मुस्कुराती उतने हे प्यार से उसको देख रही थी.
"पता है न मैं साली भी लगती हु तुम्हारी अब? तुम कार घुमा लो, फिर मुझे प्रीती के घर हे रुकना है.", आकांक्षा ने समय का ध्यान करवाया और अर्जुन भी माहौल को समझते हे कार स्टार्ट करके प्रीती के करीब ले चला.
"ड्राइवर, सीधा सामने हे देखो. कार हमको देख कर चलना महंगा पड़ सकता है.", प्रीती भी पिछली सीट पर आकांक्षा की बगल में हे बैठ गयी. अर्जुन ने सर घुमा कर उसकी तरफ देख तोह ये जवाब सुन्न कर झेंपता हुआ आगे देखने लगा.
"जी मेमसाब. वैसे लगता है अब टोपी भी लेनी हे पड़ेगी, ड्राइवर वाली.", अर्जुन की बात पर दोनों हे खूबसूरत बालाएं खिलखिला उठी. दोनों हे एक जैसे अनुपात की और वैसे हे कंधे से कुछ निचे भूरे बालो वाली. अर्जुन पहली बार अपनी दोनों बिल्लियों को एक साथ देख रहा था वो भी पक्के दोस्तों के रूप में. कलयुग है और यहाँ कुछ भी मुमकिन हो सकता है.
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"हाँ तोह नवाब साहब के पास समय हो तोह ये गरीब आपकी आज्ञा से चाँद अल्फाज कह सकता है?", अर्जुन नहाने के बाद अभी निचे आया हे था और बहार बगीचे से पहले हे अपने दादा जी से मुलाकात कर बैठा. पंडित जी चाय से फारिग हो कर अभी अंदर हे चले थे और अर्जुन को देखते हे जैसे कुछ याद आ गया था उन्हें.
"क्या बौ जी. आप ऐसे मैट कहा करो, ाचा नहीं लगता. चलो आपके कमरे में हे बात करते है.", अर्जुन लाड से अपने दादा जी के एकतरफ लगते हुए उनके साथ हो लिया. रामेश्वर जी भी अपने पौटे की मोहब्बत्त देख मुस्कुराते हुए बैठक से होते हुए अपने कमरे में आये तोह वह पहले हे कौशल्या जी, पूर्णिमा जी, शालिनी और रेणुका को बैठे पाया. सभी ने कपडे बदल लिए थे और अब बातें करते हुए थोड़ा आराम हे कर रही थी.
"हम लोग जरा साथ वाले कमरे में हैं कौशल्या.", रामेश्वर जी ने एक नजर सभी को देखने के बाद मेहमान कक्ष का रुख किया तोह अर्जुन भी उनके पीछे हो लिया. शालिनी बुआ के चेहरे पर आयी वो हलकी सी चमक फिर से धूमिल हो गयी. घर आये 2 घंटे हो चुके थे लेकिन जब अर्जुन दिखा भी तोह एक पल में हे ओझल हो गया. सिर्फ रेणुका हे ये देख पायी थी जिसकी पिंडलियों पर हलके हाथो से कौशल्या जी मालिश करते हुए माँ की तरह देखभाल में लगी थी. वही अर्जुन भी थोड़ा सजग हो गया था अपने दादा के यूँ कमरा बंद करने पर.
"आओ, यहाँ बैठो जरा. तुम सोच रहे होंगे के कमरा बंद करके हम क्या बात करने वाले है? बात जरुरी भी है और समय के साथ हालात के हिसाब से हमको ये चर्चा करनी हे चाहिए.", इस कमरे में बिस्टेर दूसरी दिवार से लगा था जिस वजह से साथ वाले कमरे से फांसला अधिक हो जाता. अर्जुन सर हिलता अपने दादा जी के हे करीब एक कुर्सी पर बैठ गया. रामेश्वर जी को अपने पौटे की शारीरिक भाषा और तरीका पसंद आया.
"मैं भी आपके साथ बहोत साड़ी बातें करना चाहता था दादा जी. संजीव भैया ने कहा था के मेरे पंजाब से वापिस आने पर आप हम दोनों के साथ हे बात करेंगे. बस शायद समय का अभाव रहा होगा जिस वजह से इतना वक़्त लग गया. लेकिन भैया?", अर्जुन अभी आगे भी बात करता उस से पहले आँगन वाले दरवाजे को खोल कर संजीव भी अंदर चला आया. जाली और लकड़ी के दोनों दरवाजे बंद करने के बाद संजीव ने एक फाइल अपने दादा जी को देने के साथ दूसरी कुर्सी खिसका कर अर्जुन के करीब हे तशरीफ़ राखी.
"लो, तुम्हारे सारथि भी आ गए वत्स.", रामेश्वर जी ने हँसते हुए वो फाइल खोली और संजीव के हाथो कलम लेते हुए कुछ ख़ास अक्षरों को रेखांकित करना शुरू कर दिया. संजीव भैया को देख अर्जुन भी खुश था.
"तोह तुम सिर्फ एक हादसे की वजह से चारो दिशाए खंगालने लगे और आज उस गुत्थी को सुलझाने से बस एक कदम दूर हो जिसके सामने हम भी नाकाम हे रहे थे. कुछ chhaan-bin कर भी लेते लेकिन फिर ख़ास वजह से अपने आप हे रुकना पड़ा. शायद तब भी सुलझा न पाते.", रामेश्वर जी के मुस्कुराते चेहरे पर एकेका थोड़ी गंभीरता आ गयी.
"आप सुलझा सकते थे दादा जी और मैं ये सब उस हादसे की वजह से नहीं कर रहा जहा मेरी मुलाकात सुशीला बुआ से हुई थी. वजा कुछ और थी लेकिन जिसकी तलाश में निकला था वो रास्ता ये राह भी दिखायेगा, मुझे जरा भी पता न था. परिणाम सोच कर हे मुझे खुद को रोकना पड़ा और मैं अब रुकना चाहता हु.", अर्जुन ने उनकी अपेक्षा के विपरीत अपने हथियार हे गिरा दिए थे और इस वजह से संजीव भैया जैसे नाराज लगे थे अपने छोटे भाई से.
"संजीव, ये जो कह रहा है वो तुम्हे तोह समझना चाहिए बेटे. ये रुकना चाहता है इसका यही मतलब हुआ के अर्जुन खुद को ख़ास तरीके से तैयार कर रहा है. वैसे तुम जानते हो अर्जुन की तुम्हारी तहकीकात में बहोत से गलत नाम भी शामिल है. इतने लोगो पर संदेह जाताना तुम्हारे अंदर काम अनुभव को दर्शाता है. शायद जल्दबाजी में या छोटी मोती बात पर हे तुमने इन्हे अपने संदेह के घेरे में ले लिया.", रामेश्वर जी की हैरानी पर अब दोनों हे भाई एक दूसरे को रहस्यमयी अंदाज में देख रहे थे.
"वैसे हमारे पास पुख्ता सबूत है ज्यादातर के खिलाफ दादा जी. बस आप नाम लीजिये, हम आपको संभावित जानकारी जरूर देंगे.", संजीव के हम दर्शाने पर रामेश्वर जी ने फाइल एक तरफ रख दी. उन्हें संजीव पर पूरा यकीन था और अर्जुन के काम अनुभवी बात भी एक तरह से उनका खुद को हे समझने की कोशिश थी.
"यहाँ जितने प्रमुख नाम है वो सभी हैरानी वाले है. कुछ इस वजह से की तुम दोनों उन के बारे में जान कैसे गए और बाकी सभी तोह अपने हे लोग है जिन पर संदेह करना शायद गलत होगा.", रामेश्वर जी ने इस बार अपने छोटे पौटे की तरफ निगाह की थी अपनी बात कहते हुए.
"लेट में तेल्ल यू ओने थिंग ग्रांडफादर. ठोस हु हर्ट उस अरे मोस्टली फाउंड तो बे आवर डरेस्ट. यहाँ सिर्फ 3 नाम है जिनकी वजह से आप गंभीर है क्योंकि एक संदिग्ध है कृष्ण चाँद शर्मा उर्फ़ कृष्णेश्वर शर्मा, आपके छोटे भाई है जिनसे मैं सही से मिला भी नहीं कभी. एक आपकी बड़ी भाभी और मेरी बड़ी दादी श्रीमती चंद्रो देवी जी है जिन्होंने मुझे भी कभी अलग नहीं समझा और वो तीसरा नाम सबसे बड़े अपराधी का है, लाजवंती देवी पत्नी स्वर्गीय महेन्दर सिंह - स्वर्गीय ईश्वर सिंह और मिस्ट्रेस ऑफ़ कुंवर सारंग. जैसा भैया ने कहा है, सबूत है हमारे पास लेकिन छोटे दादा जी पर संदेह है और बस इस वजह से मैं रुकना चाहता था.", अर्जुन ने इन तीनो नामो के साथ जो खुलासा किया था वो सुन्न कर रामेश्वर जी का वजूद हिल गया. उनके भाई के साथ साथ लाजवंती को सारंग की रखैल कह दिया था अर्जुन ने.
"इस बात को यही ख़तम करते है अर्जुन. बाकी तुमने जो यहाँ मधुलता और सरपंच की बीवी रेशमा का उल्लेख किया है तोह मैं इस से सहमत हु. साथ हे बिंदिया की माँ को भी मैं अपराधी मान सकता हु. अवधेश, लोहान, सोमबीर सिंह के बेटे और बाकी सभी तोह इस दुनिया से जा चुके है. हाँ तहसीलदार रमाकांत भी जैसे मेरी भूलवश यहाँ से निकल गया.", रामेश्वर जी की यही आदत थी की वो अपने बचो पर गुस्सा नहीं करते थे. वो आहात हुए थे अर्जुन के शब्दों से लेकिन वैसी प्रतिक्रिया न दी जो वो किसी बहार वाले को देते.
"ये तस्वीर देखिये बौ जी. जानते है आप इन्हे?", संजीव ने एक 60-65 वर्षीया महिला की पासपोर्ट अकार की तस्वीर अपने दादा जी के सामने की तोह वो बड़े ध्यान से देखने लगे. कुछ पल देखने के बाद उन्होंने वो तस्वीर वापिस की तोह संजीव ने एक shwet-shyaam 5क्ष7 इंच की तस्वीर अपने दादा जी सामने कर दी. रामेश्वर जी तुरंत बिस्टेर से उछाल हे पड़े इस चेहरे को देखते हे.
"अनामिका!.. ये तुम्हे कहा से मिली संजीव? ये मर्डर चुकी है जितना हम जानते है और इसका क्या सम्बन्ध है उस छोटी तस्वीर से?"
"दोनों एक हे है दादा जी. आपने तोह कभी विधवा दमयंती को देखा नहीं लेकिन चलो कुमारी अनामिका को आपने पहचाने में गलती नहीं की.", ये बम अर्जुन ने फोड़ा था अपने दादा जी पर. रामेश्वर जी उस तस्वीर को थाम कर ख़ामोशी से बैठ गए. उनकी नजर बस उस चेहरे में हे खो चुकी थी जैसे.
"वैसे एक कहानी तोह आपकी भी है दादा जी जो शायद यहाँ किसी को पता नहीं. आप आर्मी में शाही कोटा से थे और उसके बाद फिर सीधा पुलिस में. एक साल आप ट्रेनिंग पर रहे थे आर्मी से आने के बाद और उस बीच पंजाब के raaj-pariwar में कुछ उथल पथल मची थी. आप छोटे दादा जी से 5 साल बड़े है लेकिन दोनों की शादी लगभग एक साथ हे हुई. गौर किया आपने कभी इस सब पर?", अर्जुन के अगले खुलासे पर रामेश्वर जी से कुछ कहते हे न बना था. वो तस्वीर एक तरफ रख कर अपने पौटे को ऐसे देख रहे थे जैसे वह कुर्सी पर कोई दूसरी दुनिया का व्यक्ति बैठा हो.
"दादा जी, आपके और कृष्ण दादा जी के बीच शायद एक बहिन भी थी. बस उसके बारे में कुछ पता नहीं लग पाया.", संजीव ने अलग हे पहेली रख दी थी अपने दादा जी के सामने. आज खुद रिटायर्ड और tej-tarraar सप निशब्द था इन दोनों बचो के सामने.
"मेरी शादी कुमारी लक्षिका से होने वाली थी बचो और फ़ौज में इसलिए भेजा गया था की वह से आते हे मैं शाही परिवार में शामिल हो सकू. लेकिन उस से पहले हे एक षड़यंत्र के तहत राजमाता प्रभा देवी, लक्षिका और मेरी बहिन मिनाक्षी, जो राजमाता की बहु थी और रघुबीर सिंह की सगी बहिन उनकी हत्या कर दी गयी. बहोत कुछ हुआ था और उस घुटन से दूर होने के लिए मैं तुम्हारी दादी से विवाह करके इधर चला आया. वैसे इतनी गहरी पड़ताल तुम दोनों कर कैसे गए.? और ये दमयंती हे कुमारी अनामिका है इसका सबूत?", रामेश्वर जी के लहजे में एकाएक भावुकता और नरमी आ चुकी थी. आज जैसे उनके अतीत के बंद कमरे को इन दोनों बचो ने खोल दिया था.
"आपने तोह फिर कभी बिंदिया या शबनम को ाचे से देखा हे नहीं दादा जी. वैसे आप ऐसा कर भी नहीं सकते थे क्योंकि वो गाँव की बहु और फिर उनकी बेटी इतने बरसो बाद आधुनिक अवतार में आपके सामने थी. लेकिन शायद आप वो बात नहीं बता रहे जिसकी वजह से आपने अज्जू चाचा वाला केस रोक हे दिया. मैं भी अटक गया हु रमाकांत और नीलिमा पर. और फिर एक चिंता मुझे कह रही है के अब रुकना हे बेहतर है.", अर्जुन जैसे अपने दादा का मैं खंगाल रहा था इस वक़्त. संजीव ने हे सिखाया था उसको ये पैंतरा जिस से चेहरे के भाव और जवाब समझा जा सके.
"अज्जू के हाथ में शाही कंगन मिला था हमे. वो आज भी हमारे पास है बीटा लेकिन तुम्हारी दादी के वचन ने हमको बाँध दिया था की वह हम कभी पुलिस वाले के रूप में जा कर पूछताछ न करे. मैं वो कंगन दिखा सकता हुआ अगर तुम चाहो तोह. लेकिन तुम खामख्वाह कृष्ण को इस सबमे खींच रहे हो. वैसे अभी तक मैं बड़ी भाभी वाली बात से भी सहमत नहीं हु.", रामेश्वर जी तोह चंद्रो देवी को सबसे बेहतर समझते थे इन दोनों से.
"मान तोह आप ये भी नहीं रहे की आपकी एक बहिन भी थी दादा जी. चलो फिलहाल मैं अर्जुन की बात आगे बढ़ता हु. नीलिमा की माँ raaj-gharane से हे तोह थी और रमाकांत के ख़ास दोस्त सारंग और कृष्ण दादा जी. वैसे इस फोटे में ये गोला छोटे दादा जी पर हे होगा और चाहो तोह आप बाकी सबके नाम भी बता सकते है.", ये वही तस्वीर थी जिस पर एक शख्स के चेहरे पर गोला था लेकिन रामेश्वर जी तोह संजीव की बात पर हे हतप्रभ थे. रमाकांत, सारंग और उनके हे छोटे भाई की दोस्ती को ले कर. संजीव ने अँधेरे में निशाना लगाया था यहाँ क्योंकि ये तोह अर्जुन को भी पता न था.
"सीमा लांघ रहे हो तुम दोनों लेकिन अगर सबूत है तोह आगे बात करो.", रामेश्वर जी मैं हे मैं चाह रहे थे के ये दोनों यही रुक जाए.
"आपको लगता है की हम गलत रस्ते जा रहे है तोह ठीक है दादा जी. हम इस बारे में अब और कोई बात नहीं करेंगे.", यहाँ उनके हिसाब से जवाब दिया था संजीव ने लेकिन अर्जुन जो भरा बैठा था वो चुप न रह सका.
"सुनिए जरा मेरी बात दादा जी. भैया जो भी बोले लेकिन बस आप मेरी सोच सुनिए. मैं खुद हे आगे कुछ नहीं करूँगा. आपको अज्जू चाचा के हाथ में शाही कंगन मिला, नीलिमा जी से प्यार करते थे अज्जू चाचा और उनकी माँ भी शाही परिवार से थी. लाजवंती का अतीत अगर शाही घराने में सेवादार का था तोह आप की नजर पड़ने से रही. कौन विधवा बचे को जनम देती है किसी दूसरे गाँव में जहाँ उनके पति का नाम हे पता न हो किसी को? क्यों सारंग हे उनको ले कर गया और क्यों चंद्रो देवी ने एकदम हे बिंदिया की शादी कबूल करि उनके घर में? कैसे छोटे दादा जी की शादी एकदम हे कर दी गयी और आपकी दुखती राग को जानते हुए सब हुआ? आप ये भी नहीं समझ रहे की रेशम के हाथो अवधेश मिश्रा, तोमर, बिंदिया तक फ़ोन गए लेकिन उस औरत की असलियत क्या थी? लाजवंती को कैसे भूल सकते है जो अब यहाँ नहीं है और न हे रेशमा? सरपंच शायद अब जिन्दा भी न हो क्योंकि वो वह शादी में भी नहीं दिखा. क्यों छोटे दादा जी आज तक इस घर नहीं आये या ये कहु की विनोद चाचा जी से भी आपको नफरत है?", अर्जुन ने खड़े होते हुए इतने सवाल जड़ दिए थे की खुद संजीव भी हैरान था. दरवाजे पर खाने के लिए दस्तक हो चुकी थी जिसके साथ अर्जुन वो फाइल ले कर बहार वाले दरवाजे से निकल चला.
"ये क्या कह गया अभी संजीव?", रामेश्वर जी ने दरवाजे की दस्तक को नजर अंदाज करते हुए बस इतना हे पुछा था. उनका बड़ा पौता थोड़ा हताश दिखा इस सवाल से.
"उसके लिए इस सबमे छोटे दादा जी, सारंग, लाजवंती, चंद्रो देवी और आपकी अनदेखी भी शामिल है दादा जी. आपने शाही कंगन वाली बात बोल कर उसको सही स्थिति का ज्ञान करवा हे दिया. मतलब नीलिमा की माँ वही थी जब अज्जू चाचा की हत्या की गयी और बिंदिया वह भी उन्हें बचा रही थी. जड़े तोह आपके अतीत से हे जुडी है दादा जी लेकिन आप उपस्थित न थे शायद उस घटनाक्रम के वक़्त. अर्जुन को आपने एक नाम बताया जिसको वो ढून्ढ रहा था आपकी सगी बहिन के रूप में. रघुबीर जी इतना बखेड़ा सिर्फ आपके लिए हे करते, एक भाई अपनी बहिन की मृत्यु पर बहोत कुछ कर सकता था लेकिन शायद मिनाक्षी आपकी बहिन थी क्योंकि ये 2 परिवार उस से पहले से भी घनिष्ठ थे. अर्जुन अब आगे काम नहीं करेगा.", संजीव अर्जुन की नाराजगी बहोत ाचे से समझ चूका था और अब उसने वो वजह अपने दादा को भी बता दी थी.
"और कुछ.?"
"हाँ उसके रडार पर खुद शंकर चाचा भी है लेकिन एक अपराधी के तौर पर नहीं. वो उन्हें स्टडी कर रहा है और उनके साथ साथ अर्जुन अपने ननिहाल और दादी जी के पैतृक गाँव की chhaan-bin में भी लगा है. मेरे पास भी विनोद चाचा के खिलाफ कुछ सबूत है लेकिन शायद उतने हे सबूत शंकर चाचा के हाथ लग चुके है. वो काम से बहार जा चुके है उमेद चाचा के साथ. अर्जुन वैसे खुद को कण्ट्रोल कर सकता है.", संजीव ने सभी तस्वीरें उठानी शुरू की तोह रामेश्वर जी ने दमयंती उर्फ़ अनामिका और लक्षिका वाली तसवीरे अपने पास रख ली.
"वो तेज रफ़्तार जा रहा है संजीव. रोक लो कुछ समय अगर रोक सकते हो."
"वो रुक हे तोह गया है दादा जी. एक आप हे हैं जिसको वो दुःख नहीं पंहुचा सकता नहीं तोह कबका वो सारंग के सामने खड़ा होता. अर्जुन को राज्यवर्धन, पुष्पक, इंद्रनील के साथ साथ उनकी बीवी और बचो तक की भी खबर है जो उसने मुझसे भी जाहिर नहीं की. आपने आज जो वह मंदिर में करवाया है वो ये सब पहले हे मुझे बता चूका था की आपको अब ताक़त की जरुरत पड़ेगी. सॉरी, इस से ज्यादा मैं नहीं कह सकता. वो मेरे लिए सबकुछ है और इस शादी के बाद अर्जुन गाँव चला जायेगा जबतक स्कूल नहीं खुलते.", संजीव ने धमाका हे कर दिया था अर्जुन के यहाँ से जाने की बात बता कर. लेकिन अगले जवाब की ऐसी उम्मीद नहीं थी उसको भी. दरवाजा खटखटाना वो व्यक्ति बंद कर चूका था जो भी खाने के लिए बुलाने आया था.
"हम अपने शेर को नाराज नहीं करेंगे संजीव. ये रिवॉल्वर अब पतलून से पाजामे तक साथ रहेगी. रही बात कृष्णेश्वर की तोह मेरे भाई को इस सबसे दूर रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है. लेकिन इन 5 लोगो की तहकीकात मैं खुद करूँगा. अर्जुन शायद अभी भी पूरी बात नहीं बता कर गया."
"उसके निशने पर तोह आप और शंकर चाचा जी भी है. क्योंकि किसी को तोह आपकी खबर रहती हे होगी. वैसे वो पीछे इसलिए हटा है क्योंकि नतीजा पता है उसको. वो यहाँ से चला जायेगा दादाजी. आप 2 साल ताक़त बढ़ाओ और वो स्किट दिल्ली निकल जायेगा. पता नहीं कैसे आप संभालेंगे ये सब और अब तोह मैं भी डरता हु अर्जुन से क्योंकि उसकी पकड़ कहा तक हैं आप सोच भी नहीं सकते."
"कहा तक?", रामेश्वर जी हैरानी से अपना नाम और अपने बेटे का सुन्न कर बस यही कह सके.
"संजय और लोहान तक उसके लिए काम कर रहे. गौर कंस्ट्रक्शन पर भी वो निगाह लगाए बैठा है और इसके साथ साथ सारंग के परिवार के पीछे आपने बेशक दलीप अंकल को लगाया हो लेकिन वो मजबूर करने वाला अर्जुन है वालिए सर को. अर्जुन ख़ामोशी से बैठा इतना बड़ा खेल खेल रहा है जिसमे बस नीलिमा की कमी है. शायद उमेद चाचा भी उसके लिए काम कर रहे है और कम के साथ साथ डॉ सांगवान जी भी. पंजाब कनेक्शन नहीं पता लेकिन वह भी इसने कमाल तोह कुछ किया हे है.", संजीव सब कुछ उस फोल्डर में रखते हुए खड़ा हुआ तोह रामेश्वर जी ने नए रूप के बावजूद एक दरख्वास्त की.
"शादी तक उसको संभाल लो संजीव. मैं इस सारे मामले को अब खुद देखूंगा."
"आप शादी संभल लीजिये दादा जी, उसके बाद अर्जुन जितने यहाँ दिखेगा वो आपका वही नादान सा बैलबुद्धि दिखेगा. वो इन्तजार में है शादी के और कैसे भी कर के आप बस यहाँ किसी को उभरने मैट देना. विनोद चाचा की हरकत अर्जुन सेहन कर गया लेकिन आप नहीं जानते दादा जी की वो थोड़ा अलग है. कुछ भी अगर गलत हुआ घर के सदस्यों के साथ तोह फिर वो सिर्फ ऋतू के रोके रुकेगा. पता नहीं लेकिन अर्जुन एक गलत समय में सिर्फ ऋतू से हे रुकता है. जो भी मेहमान आये हमको यही ध्यान रखना होगा की अर्जुन व्यस्त भी रहे और खली हो तोह ऋतू के करीब.", आज संजीव ने वो बात कह दी थी जो खुद उसको नहीं पता थी लेकिन इसका कारण रामेश्वर जी को पता था.
"वह की सिक्योरिटी 200% कर दूंगा मैं संजीव और रही बात काम की तोह अर्जुन को बस घर हे रहने दो. हाँ अगर बचो के साथ कोई हरकत होती है तोह आये मेहमानो के साथ वो कुछ भी करे गलत नहीं करेगा. आजाद रहने दो और ये फाइल यही छोड़ दो.", रामेश्वर जी बहोत कुछ सोच चुके थे इस अंतराल में लेकिन फिर भी उन्हें उम्मीद नहीं थी की वो किसका सामना कर रहे है. सच सामने आने पर गलत होना स्वाभाविक हे था.
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सभी लोग अपने हिसाब से खाना खा चुके तोह सबसे आखिरी में 10 बजे अब टेबल पर उमेद, शंकर, नरिंदर, राजकुमार और अर्जुन हे थे. समय आज कही ज्यादा हे हो गया था क्योंकि ये सभी लोग अपने पीने के कार्यक्रम में व्यस्त थे वही अर्जुन कुछ और हे मसले में उलझा था जो 10 बजे भोजन के लिए यहाँ आया था.
घर में इस वक़्त बस रेखा जी और उनके साथ ऋतू, बबिता और शालिनी हे जाग रही थी. इन सबको खाना खिलते हुए 30 मिनट लगभग लगे थे और बबिता ने नलके पर हाथ धोते हुए अर्जुन से कुछ कान में कहा और ऊपर सीढ़ियां चढ़ गयी. अर्जुन ने गहरी सांस लेते हुए एक पल बबिता को जाते हुए देखा और उसके भारी नितम्भ देख मुस्कुरा उठा.
"चलो, 10:30 हो गए अब सोने चलते है.", शालिनी बुआ ने सीधा उसको ये बात कही तोह अर्जुन अलग हे तरीके से उन्हें देखने लगा. शालिनी को गलती महसूस हुई तब तक अर्जुन अपनी माँ की तरफ बढ़ चूका था.
"उम्माह.. स्लीप वेल माँ. सुबह मिलते है, दीदी सो रही है आपके पास.", अर्जुन ने जैसे रेखा जी को गाल पर चूमा था वो देखने वाले के लिए बेशक maa-bete का स्पर्श था परन्तु ये दोनों हे जानते थे के यहाँ वो प्रेमी थे. वैसा हे चुम्बन रेखा जी ने किया था और इस वक़्त बाकी लोग जा चुके थे.
"कल रात ऋतू नहीं आएगी. मैं इन्तजार करुँगी.", रेखा ने अपने कमरे में जाने से पहले ये इशारा दिया और अर्जुन हाथ साफ़ करने के बाद शालिनी बुआ की तरफ देखने लगा.
"आप कह रही थी न हम चले? वैसे मेरे बिना भी जा सकती थी.", अर्जुन ने सीढ़ी पर कदम रखते हुए कहा और शालिनी चपलता से उसके करीब आ रुकी.
"नहीं वो बात नहीं है. विनोद की बीवी खर्राटे बहोत लेती इसलिए मैं तुम्हारे कमरे में सोना चाहती थी.", अर्जुन इस बात पर मुस्कुरा भर दिया. उसको बबिता का पता था की वो छत्त पर जरूर आएगी और शालिनी बुआ की नींद बस इन्तजार कर रही है. लेकिन अब नाम 2 लोगो के एक जैसे थे और अनामिका का हाथ हे क्यों उसके छोटे दादा ने माँगा ये बात उसको एकदम से करंट की तरह लगी. भाव साधारण रखता वो अपने कमरे में चला आया.
"बुआ, वैसे सच कहु तोह यहाँ एक नहीं है.", अर्जुन ने आखिरी चाल चली थी शालिनी को दूर करने की और आते हुए वो देख चुके थे की साथ वाला कमरा कितना ठंडा है जहा अनामिका चची सो रही थी अपने बेटे के साथ. देखा नहीं तोह वो ये की संजीव भैया वाले कमरे में विन्नी जाग रही थी सोने का बहाना करके.
"तुम 2 मिनट दो मैं कपडे बदल कर आयी. एक मुझे पसंद नहीं.", अब अर्जुन समझ चूका था के आज रात उसकी चाहत की बगैर हे कुछ होने वाला है. उधर बबिता बोल कर गयी थी, यहाँ विन्नी ने खुद मोर्चा लगाया था और ये शालिनी बुआ जैसे नया हिसाब लिए आ गयी. जाने अब क्या होने वाला था. बस डर ने दस्तक जरूर दे दी थी.