अपडेट 152
वचन (2)
कुछ अपनों के टूटे सपनो पर
भूले भटके रास्तो पर
विरानो में पसरे सन्नाट्टो पर
अक्सर मैं अफ़सोस करता हु
उन्हें दीखता कठोर हु
उन्हें लगता कमजोर हु
नाराजगी पर कुछ कहता नहीं
बस खुद पर अफ़सोस करता हु
"भाभी, आप लोग हमारे हे साथ घर चलिए, उमेद को काम देखने दीजिये आज.", दोपहर को हे रामेश्वर जी चंद्रो देवी के यहाँ से अब रघुबीर सिंह की हवेली चले आये थे. कुछ वक़्त शालिनी बिटिया और पूर्णिमा जी से इधर उधर की बातें करने के बाद उन्होंने अपने विचार प्रकट किये. उमेद भी कुछ दिनों से काम पर उतना ध्यान नहीं दे पाया था और अभी वो फैक्ट्री देखने गया था.
"हाँ भाई साहब, मैं और शालिनी आपके हे साथ चलते है. राजेश्वरी शाम को आ जाएगी उमेद के साथ. वैसे एक बात पूछ सकती हु?", ये कहते हुए पूर्णिमा जी के चेहरे पर अलग से हे भाव आ गए थे जिनमे थोड़ी प्रशंशा और सवाल साफ़ नजर आ रहे थे.
"आप कबसे इजाजत लेने लगी माँ? चाचा जी को देख नहीं रही कैसे झेंप रहे है.", शालिनी जैसे इन देवर भाभी के बीच मजे ले रही थी.
"तुम सचमुच कब बड़ी होगी मुझे तोह पता नहीं शालू बिटिया. सच हे कहता है उमेद की तुम आजतक वही नटखट गुड़िया हो.", रामेश्वर जी इस लाड़ली बिटिया का सर सहलाते हुए मुस्कुरा उठे.
"आज आप वैसे हे लग रहे है जैसे हमेशा अपने भाई के साथ रहते वक़्त दीखते थे.", अचानक रघुबीर सिंह का जीकर होते हे रामेश्वर जी एक पल के लिए कुछ शांत हो गए. पूर्णिमा जी को लगा की ये जीकर नहीं करना था और कुर्सी से खड़े होते रामेश्वर जी को वो क्षमा स्वरुप देखने लगी. शालिनी की भी हालत कुछ अपनी माँ के हे जैसी हो गयी लेकिन जब अपने चाचा को उस बड़ी तस्वीर के पास खड़े पाया तोह वो दोनों भी खामोश हो गयी.
"भाभी, आज सवेरे आपकी बहिन ने हमको सब कास्मो और वचन से मुक्त कर दिया है. अब बस आप भी मेरे भाई की बगल में मेरे बेटे की तस्वीर लगा दे तोह मुझे अंधेरो में उसको याद नहीं करना पड़ेगा.", रामेष्वर जी बात करते हुए अपने अजीज dost-bhai रघुबीर की तस्वीर को ऐसे सेहला रहे थे जैसे वो सचमुच जीवित हो. उनकी बात सुन्न कर जहा शालिनी का चेहरा सफ़ेद पड़ा वही पूर्णिमा जी के आँखों में ख़ुशी की 2 बूँद चालक आयी.
"मैं भी चाहती हु भाई साहब की अपने बेटे को इस हवेली की हर दिवार पर देखु. ये दिल हे जानता है मेरी हालत जो उसके दूर जाने के बाद उसकी तस्वीर से भी मुझे मरहूम कर दिया गया. कौशल्या ने बिलकुल ठीक किया ऐसा करके और मैं भी जानती हु आप कितना अकेला महसूस करते रहे होंगे इतने साल.", साड़ी के पल्लू से अपनी आँखें साफ़ करती हुई पूर्णिमा जी के लिए तोह जैसे आज दिवाली हो गयी थी.
"चाचा जी, आप क्या करने वाले है अब? ये कौनसा वचन था माँ जिस से चाचा जी बंधे थे और आज अज्जू का जीकर कैसे? मेरे भाई का नाम पिछले कितने हे सालो तक नहीं लिया गया तोह फिर आज क्या जरुरत है वो सब दर्द वापिस लाने की? आज तक मेरी भाई की हत्या का पूरा खुलासा नहीं हुआ फिर क्यों उसकी आत्मा को तड़पा रहे हो आप लोग? शीलू भी एक मासूम सा लड़का था लेकिन उसकी भी यादों को जिस्म के साथ जला दिया गया. चाचा जी, मैं आज भी इस घर में आती हु तोह मेरे कानो में उन दोनों की आवाज गूंजती है लेकिन जैसे यहाँ सभी बेहरे है.", शालिनी को जैसे दौरा हे पड़ गया था और बरसो से दर्द में डूबा उसका दिल फट पड़ा. रामेश्वर जी ने करीब आते हे अपनी इस प्यार बेटी को सीने से लगा लिया.
"हमने बहोत कोशिश की थी बेटी उन गुनहगारों को उनके अंजाम तक पहुंचने की. शंकर, उमेद और इन्दर ने इतनी लाशें बिछा दी थी की अगर हम उनको साफ़ न करवाते तोह जो बचा था वो भी न रहता. मधु और तुम्हे कोई कलाई न मिलती रक्षाबंधन पर अगर हम वैसा न करते तोह. तुम्हे तोह इस हवेली में उनकी आवाज सुनाई देती है लेकिन मेरी बदकिस्मती देखो जो वो मुझे पुकारता भी नहीं. जानता हु की एक तुम्ही थी जिसमे अज्जू के प्राण बास्ते थे लेकिन मुझ पर विश्वास करो शालू, अब तुम्हारा ये चाचा अज्जू के साथ साथ रघुबीर सिंह के उस वनवास का भी हिसाब लेगा उन सबसे जिन्होंने मेरे भाई को इतने दुःख और तकलीफे दी.", रामेश्वर जी के स्पर्श में वही बाप वाला प्रेम था जो हर बेटी को शांत कर सकता था लेकिन चेहरे पर आयी कठोरता कुछ और भी कह रही थी.
"नहीं भाई साहब, अज्जू तक ठीक है. उस से पहले की राख हटा कर उस दबी हुई आग को निकलने की जरुरत नहीं है. आपने भी तोह अपना सर्वस्व त्याग दिया था उनके साथ साथ, फिर क्यों आज उसी रास्ते वापिस जाना चाहते है जहा सिर्फ दुःख हे मिलना है?", पूर्णिमा जी भी अब चिंतित थी लेकिन रामेश्वर जी बस शालिनी को सांत्वना देते रहे. कुछ पल बाद जो उन्होंने कहा वो सुन्न कर पूर्णिमा धम्म से बिस्टेर पर बैठ गयी.
"हम कभी वापिस नहीं गए थे भाभी और न हे उस daulat-rutbe की कोई चाहत थी कभी. लेकिन जो कदम हमारे बेटे की तरफ आये थे, उनका सम्बन्ध वही से है जहा आप हमको जाने से मन कर रही है. हमने तोह त्याग दिया था न, फिर क्यों उन लोगो को चैन नहीं मिला सबकुछ उनके हिसाब से होने के बाद भी? क्यों वो हमारे बचो की जान लेने पर आज तक उतारू है? अब ऐसा और नहीं होगा लेकिन निश्चिन्त रहिये, इस बार आपके और कौशल्या के किसी भी बेटे पर आंच नहीं आने दूंगा.", रामेश्वर जी के इतने सवालो का अब पूर्णिमा के पास तोह कोई जवाब न था और ऐसा कहना की वो किसी बेटे को शामिल नहीं करेंगे वो जरूर दुखदायी लगा.
"आप ये सब इस उम्र में और अकेले करने जा रहे है भाईसाहब? कौशल्या इतनी बेवकूफ है?"
"नहीं भाभी. हम अकेले नहीं है और जो हमारे साथ है वो भी हमे कुछ होने नहीं देंगे. एक अपने नाम का क़र्ज़ उतरने में लगा है और दूसरा तोह इतना पागल है की वो हर उस नजर को ख़तम करना चाहता है जो हमारे परिवार की तरफ गलत विचार से उठी हो.", अपने दोनों हे पौतो के नाम लिए बगैर रामेश्वर जी ने उनका बखान कर दिया था.
"मुझे भी कुछ वक़्त पहले हे पता चला है भाई साहब की अर्जुन 3 साल तक इनके करीब रहा. उस बचे को हर बाला से दूर रखना, आप चाहे जो जी आये वो कीजिये.", पूर्णिमा जी को भी परिवार में अर्जुन की एहमियत पता थी.
"वही लड़का उस अतीत के रस्ते चल निकला है भाभी. शायद हम खुली आँखों से भी अंधकार में रहे लेकिन ये लड़का अज्जू की हे तरह इधर उधर भटकता हुआ उसके करीब आ पंहुचा. आज सवेरे हे उमेद द्वारा कौशल्या को माँ कहने पर वो विचलित हो गयी. अर्जुन और अज्जू हे तोह सबकुछ है उसके लिए. चलिए आप सेवक को बोल कर सामान हमारी कार में रखवाइये, हम जरा पीछे की तरफ चक्कर लगा कर आते है.", रामेश्वर जी ने इतना कह कर बहार का रुख किया तोह शालिनी कुछ सोच कर हे उनके साथ चल दी.
"चाचा जी, मैं कुछ कहना चाहती हु.", शालिनी इस गलियारे में उनके साथ चलती हुई अपना चेहरा साफ़ करते हुए बोली तोह उनके चाचा ने हामी भरी.
"यहाँ हवेली पर भैया ने जो लोग रखे है उनमे से कोई एक शायद बहार का है.", इतना सुन्न कर रामेश्वर जी के बढ़ते कदम वही रुक गए. ये बात कहने को बस किसी के बहार वाला होने की थी लेकिन वो समझ चुके थे शालिनी के ऐसा कहने का मतलब.
"तुमने ये उमेद को बताया था शालू?", वो फिर से कुछ सोच कर आगे चलने लगे जहा किंग का बाड़ा था. शालिनी भी वैसे हे साथ रही.
"पहले तोह मेरा उस तरफ ध्यान नहीं गया था चाचा जी लेकिन आज कुछ ऐसा हुआ जिस से कुछ दिनों में हुई कई घटनाये याद आ गयी."
"ऐसा क्या देखा तुमने और ये कौनसी घटनाये हुई है जिन्हे तुमने बताना जरुरी नहीं समझा? काम से काम अपनी माँ या मुझे तोह बता सकती थी."
"वो हादसे जैसे थी सभी चाचा जी. एक बार किंग बाड़े से निकल कर ऋतू के सामने आ गया था, मुझे वो अपनी गलती लगी थी या फिर बाड़े पर लगी कमजोर चिटकनी की. उसके बाद वह ऊपर से वो गुलाबी पत्थर ठीक इधर आ गिरा था 4 दिन पहले. यहाँ विनीता और आइशा बैठी थी और मैं वह सामने रोमियो के साथ थी. मुझे लगा की बारिश के पानी की वजह से पत्थर निकल गया होगा और दोनों लड़कियां किस्मत से बची. परसो फिर से किंग दिन में खुला घूम रहा था और वो आइशा को नुक्सान पंहुचा सकता है क्योंकि ऐसा का उसके साथ मेलजोल नहीं है. लेकिन आज सवेरे स्विमिंग पूल में कुछ गड़बड़ की गयी थी.", रामेश्वर जी सबकुछ बड़ी शान्ति से सुन्न रहे थे. उनके दिमाग में जाने क्या चल रहा था और इसके साथ हे उन्होंने वो भेड़िया (किंग) आजाद कर दिए.
"कैसी गड़बड़ लगी थी तुम्हे वह? और यहाँ हवेली के अंदर सुरक्षाकर्मी कबसे आने लगे?", वो दैत्याकार बड़ा सा भेड़िया कुत्ता ख़ुशी से कभी रामेशर जी के सीने पर अपने पाँव रखता तोह कभी उछाल कूद कर उनका ध्यान अपनी तरफ करने की कोशिश करता. रामेश्वर जी भी मुस्कुराते हुए उसको थपकने लगे लेकिन एक इशारे से उसको साथ चलने का बोल कर वो इस तरफ से हे हवेली के pravesh-dwar की तरफ बढ़ चले.
"वह तेज़ाब का कनस्तर खाली किया गया था चाचा जी लेकिन जिसने भी ऐसा किया था उसको ये नहीं मालूम था के हर सोमवार पूल खाली किया जाता है. और जब भी भैया यहाँ मौजूद नहीं होते तोह 2-3 लोग हवेली के बहार वाले आँगन, पिछले बाड़े की तरफ और छत्त पर निगरानी करते है. इन सभी घटनाओ के वक़्त भैया घर नहीं थे."
"कोई नयी कामवाली भी राखी है क्या घर के अंदर के kaam-kaaj के लिए?"
"नहीं चाचा जी, माँ ऐसा कभी नहीं करेंगी. वो सिर्फ अपनी 3 भरोसे वाली सेविकाएं हे अंदर के काम पर रखे हुए है. लेकिन हम यहाँ बहार क्यों जा रहे hai",Gate के पास हे 4 बंदूकधारी निजी सुरक्षाकर्मी थे जो उमेद के ख़ास थे.
"ड्यूटी पर कितने लोग है सुनील?", रामेश्वर जी ने इस 6 फ़ीट लम्बे तगड़े व्यक्ति से सीधा सवाल किया. घूमी हुई बड़ी बड़ी मूछ और शरीर एकदम तना हुआ था सुनील का, किसी फौजी की तरह.
"रात के पहरेदार मिला कर 9 लोग है सर. आदेश हो तोह सबको हाजिर करू?", आवाज भी शरीर की तरह जोरदार थी सुनील की.
"अभी तत्काल बुलाओ सभी को. हम मिलना चाहते है.", बाकी तीन लोग तोह किंग को ऐसे ख़ामोशी से घात लगा कर बैठे देख थोड़ा हैरान थे. सुनील तुरंत बहार की तरफ बने 3 क्वार्टर्स की तरफ बढ़ गया. इनके रहने की उचित व्यवस्था थी वह और 3 वक़्त का भोजन भी हवेली से बन कर आता था.2-3 मिनट में हे सुनील के साथ 5 लोग और चले आये जो इस वक़्त साधारण से कपड़ो में थे, अलसाये हुए.
"सुनील, तुम 12 साल से हो यहाँ और ये बाकी चेहरे भी हम ाचे से जानते है. अशोक के साथ जो खड़ा है इसका क्या नाम है?", इतना सुनते हे ये व्यक्ति थोड़ा हैरान हुआ लेकिन खुद को शांत रखने की कोशिश के साथ. अशोक नाम के उस व्यक्ति ने बताये गए आदमी को ब्याह से पकड़ कर सामने लेट हुए परिचय दिया.
"गुलजार सिंह नाम है इसका साहब, शेखावाटी से है ये. फ़ौज में सूबेदार था लेकिन 2 साल पहले घरेलु परिस्थितयो की वजह से purn-avkaash ले लिया था इसने. हमारी जानकारी मौखिक है.", अशोक ने बड़े अदब से हर बात रामेश्वर जी के सामने प्रस्तुत की तोह वो ऊपर से निचे तक इस गुलजार सिंह को देखने लगे. कान में राजस्थानी टोपस, hare-laal बिंदी वाले. कलम गाल के कटाव तक आती हुई और गले में काले धागे के बीच बंधा हरे कपडे का ताबीज.
"गुलजार सिंह, किस रेजिमेंट में सेवा दी है तुमने? और आखिरी समय कहा पर तैनात थे.?"
"राजपुताना राइफल्स साहब. बाड़मेर (बारमेर) बॉर्डर पर आखिरी समय तैनात था.", गुलजार सिंह ने भी सटीक उत्तर दिया था लेकिन शायद वो ये नहीं जानता था जिसके सामने वो खड़ा है वो व्यक्ति बाल की खाल निकाल लेता है.
"1996 में तुम बाड़मेर में बॉर्डर पर तैनात थे? किस बटल्लिआं प्रमुख के निचे थे तुम वह बॉर्डर पर? कर्नल हनीफ या ढिल्लों? कलाई पर अल्लाह को ॐ से ढकने वाला व्यक्ति खुद को फौजी बता रहा है? किंग..", इतने तगड़े खुलासे से गुलजार सिंह की रीढ़ में बर्फ की लहर सी दौड़ गयी और अपने मालिक की गरजदार आवाज सुनते हे ये खूंखार भेड़िया अगले हे पल गुलज़ार को दबोचे हुए उसके सीने पर सवार था. एक और आदेश मिलने पर किंग के 2 इंच लम्बे वो पैने दांत उसकी गर्दन में पेवस्त होने वाले थे.
"गलती हो गयी हुजूर, महारे को पैसा की घणनि लोड थी. आते (यहाँ) पूरी ईमानदारी से 20 महीना काम कियो, बिना शिकायत दिया. पत्र थोड़ा टेम पहला..."
"खामोश. जूथ और मज़बूरी में दिन रात का फरक होता है लेकिन तुम जैसे व्यक्ति सिर्फ छल कर सकते है. सुनील, हवेली में प्रवेश कबसे मिलने लगा है?", अब तोह सुनील की फट गयी थी क्योंकि ये कोई मामूली चूक नहीं थी जिस तरह पंडित जी ने इस घुसपैठिये को दबोचा था.
"जी पिछले महीने से सर, वो भी सिर्फ दिन के वक़्त. इस महीने से इसकी रात की ड्यूटी शुरू हुई है तोह मुझे नहीं पता की ये रात को भी अंदर जाता है."
"ये दिन में भी जाता है और रात में भी. अपनी गलती पर पर्दा दाल कर तुम इसको हे सही साबित करोगे बेटे. हम हर रोज की ड्यूटी से एकता कर कभी कभी छोटी मोती बात या घटना को नजरअंदाज कर देते है. सुरक्षाकर्मी से हे चूक हो जाना, छोटी बात नहीं है. बाँध दो इसको और ज़िंदा रखना अभी. यहाँ से जाने के बाद हम शंकर को भेजते है, वो सच उगलवा लेगा अपने तरीके से. चलो किंग.", कहने की हे देरी थी की सुनील ने किंग के hat-te हे बन्दूक का बट भरपूर गुस्से के साथ गुलजार के पेट में मारा. रामेश्वर जी आराम से दोनों को साथ लिए अंदर चल दिए.
"शंकर साहब जब आएंगे तब आएंगे, इस साले के मुँह पे कपडा बाँध के तबियत से धुलाई करो. बहनचोद ने बरसो की वफ़ादारी पर आज साहब के सामने शर्मिंदा करवाया है. गांड टॉड दो इसकी अंदर ले जा कर, बस ज़िंदा रखना नमक हराम को.", सुनील भयंकर गुस्से में था और वैसी हे हालत में गुस्से से फुफकारते हुए 4 लोग इस namak-haraam को ठोकते बजाते हुए उन्ही क्वार्टर्स की तरफ ले चले.
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आज कितने हे दिनों बाद अर्जुन की रानी के पीछे प्रीती बैठी थी, कंधे पर एक बैग लटकाये जो खली था शायद. 4 बजे भी तेज धुप थी जिस वजह से प्रीती के गोर गुलाबी चेहरे पर आकर्षक काला चस्मा था. गली से बहार निकलते हे वो मोटरसाइकिल रुकवा कर अब दोनों तरफ पाँव करके अर्जुन से सत् कर बैठ गयी.
"दिल धक् धक् कर रहा है मेरा और तुम्हे पता भी है आज पहली बार मैं बिना बताये घर से निकली हु. वैसे हम जा कहा रहे है?", प्रीती से ज्यादा जल्दी तोह अर्जुन को थी जैसे कही पहुंचने की.
"तुम बिना बता कर आयी हो और यहाँ आज पहली बार मैं स्टेडियम के लिए निकल रहा हु लेकिन जा नहीं रहा. वैसे कल सवेरे 4 बजे तक दोनों घर खाली हो जाने है. अभी सुना था मैंने इन्दर चाचा को कहते हुए की 4 बजे घर से निकलेंगे तोह 6 बजे तक मंदिर पहुंचेंगे. वापसी में भी शाम के 4-5 तोह बजने हे वाले है.", अर्जुन के ऐसा कहने पर न चाहते हुए भी प्रीती के चेहरे पर शर्म की लाली छ चुकी थी. उसके नाखून अर्जुन के सीने पर थोड़ा थोड़ा दबने लगे तोह अर्जुन भी जैसे हालत जान कर मुस्कुराने लगे.
"तुम सचमुच बहोत गंदे हो. सब लोग इतने नेक काम के लिए जा रहे है और तुम क्या क्या प्लान बनाये बैठे हो.", प्रीती की बस एक हे तोह चाहत थी, अर्जुन. जिसके पास होने भर से वो खुद को सम्पूर्ण पाती थी. दोनों हे इस लगभग खाली सड़क पर बड़ी मार्किट की तरफ बढ़ रहे थे, एक दूसरे के स्पर्श में डूबे. करीब से गुजराती एस्टीम कार में बैठे शंकर जी के चेहरे पर अलग हे ख़ुशी आ गयी थी इस प्रेमी जोड़े को देख कर. वो वापिस अपने घर जा रहे थे और आज पहली बार था की उनके बेटे ने कोई ध्यान तक न दिया सड़क पर चलते किसी वाहन पर.
"वो सभी नेक काम पर जा रहे है लेकिन मैं भी तोह अपनी ज़िन्दगी के उस ख़ास पल को जीने वाला हु, अपनी जान के साथ. वैसे अगर तुम भी जाना चाहती हो तोह मैं रोकूंगा नहीं.", अर्जुन ने थोड़ा सा सर घूमते हुए प्रीती को चिढ़ाते हुए कहा था लेकिन उसने तोह सरेआम उसका गाल हे चूम लिया.
"तुम कितनी भी कोशिश कर लो शर्मा जी, कल शिकार तोह करके रहूंगी तुम्हारा. 4 बजे से 4 बजे तक अगर तुम्हारी हालत बुरी न कर दी तोह मेरा नाम प्रीती अर्जुन शर्मा नहीं.", अर्जुन की हालत अभी से बुरी हो गयी थी, प्रीती की हिम्मत देख कर. और आज पहली बार प्रीती ने अपना जो पूरा नाम लिया था वो सिर्फ एक पत्नी हे ले सकती थी.
"संभल के रहा करो मेरी बिल्ली, यहाँ हर तरफ बहोत से लोग हमको जानते है. वैसे जो तुम ये 4 से 4 का प्लान बना रही हो तोह इतना बता देता हु की अगर तुम वचन तोड़ने वाली हो तोह ये गलत hoga.",Arjun अभी भी दुविधा में था कुछ.
"तुम सचमुच बैलबुद्धि हे हो, जैसा दादी कहती है. तुमने क्या कहा था के हम फर्स्ट टाइम कब करेंगे?"
"जब मैं तुम्हारी ऊँगली में अंगूठी पहनाउंगा और उसमे अभी वक़्त है जान. कल हमारी पहली ऑफिसियल फुल डे डेट है."
"ये रही अंगूठी और वो गुरूजी खुद मुझे तुम्हारी बहु बोल कर गए है इसको देने के साथ. जानते हो ऐसी हे उन्होंने ऋतू दीदी को भी दी थी.", अब अर्जुन की धड़कन बढ़ चुकी थी ये सुन्न कर.
"Kab..kab दी उन्होंने ये अँगूठिया तुम दोनों को? और उस वक़्त वह कौन कौन था.?"
"उन्होंने ये दादी को दी थी, हम दोनों को पहनाने के लिए. और ऐसा जब हुआ तोह वह थे तोह बहोत से लोग लेकिन जब ऋतू दीदी ने अपनी अंगूठी अलका दीदी को पहननी चाही तोह अलका दीदी ने हे उनको पहना दी ये कहते हुए की वो दोनों तोह एक हे हैं. जानते हो ऐसा उन्होंने दादी और अंकल के सामने कहा था. दादी ने भी अलका दीदी को प्यार दिए था इस बात पर. तुम समझ रहे हो न मैं क्या इशारा कर रही हु? और अब कोई वचन नहीं टूट रहा, सुन्न रहे हो?", अब अर्जुन जवाब देने लायक हे कहा बचा था. उन महाराज ने तोह खुद अर्जुन को निर्वस्त्र कर दिया था बिना किसी को बताये.
"बस यही सुन्न न बाकी था अब. दादी और पापा के सामने हे मेरे नाम की अंगूठी ऋतू दीदी और तुम्हारी ऊँगली में. अभी तोह स्कूल ख़तम नहीं हुआ मेरा, कॉलेज तक तोह तुम दोनों मुझे ज़िंदा हे नहीं रहने डौगी. पर दादी ने अगर ऐसा सवाल किया पापा के सामने तोह मैं क्या कहूंगा? मार हे डालेंगे वो तोह जब उन्हें पता लगेगा की बेटे के बीवी उनकी हे बेटी बनेगी. उस से भी बुरी हालत तोह माँ.. प्रीती माँ कहा थी उस वक़्त?", अर्जुन की अब सचमुच हालत बुरी हो रही थी सब समझते हुए. प्रीती जोरो की हंसती उस से कस के लिपट गयी.
"ओह मेरे बुद्धू बालम. दादी को काम न समझना तुम. उन्होंने ऋतू दीदी और तुम्हारी जोड़ी सदा बानी रहे ऐसा आशीर्वाद दिया था ऋतू दीदी को. और कई बार तोह वो ऐसा भी बोल चुकी है के मैं और ऋतू दीदी हमेशा हे एक दूसरे के साथ रहे, यही उनकी इत्छा है. वह अंकल (शंकर जी) भी मौजूद थे. ाचा छोडो ये सब, जो होगा देखा जायेगा. इस सबमे बहोत टाइम पड़ा है अभी और मैं कॉलेज जाने से पहले हर ट्यूसडे बस तुम्हारे साथ रहने वाली हु.", प्रीती की बात भी सही थी की अब बेकार सोच कर दिमाग की हालत क्यों खराब करनी. घर में वैसे हे रहो जैसे हमेशा से हो, जब टाइम आएगा तोह देखा जायेगा.
"सिर्फ ट्यूसडे हे मेरे साथ रहोगी? मैं तोह ज़िंदगीभर का सोचे बैठा हु लेकिन तुम्हे तोह हफ्ते का एक हे दिन चाहिए. ाचा अब तुम जैसा कहोगी वैसा हे करूँगा, एक तरह से वचन पूरा हो हे गया है.", अर्जुन ने पुल्ल के ऊपर मोटरसाइकिल बढ़ाते हुए रफ़्तार और भी धीमी कर दी. अब दोनों को ाची खासी हवा भी लग रही थी और प्रीती ज्यादा हे खुलकर अर्जुन से चिपक गयी. पीछे से आती 2 मोटरसाइकिल इनके करीब आते हे धीमी हो कर बराबर चलने लगी. दोनों पर हे 2-2 आवारा किस्म के 22-23 साल उम्र वाले लड़के थे जो गहराई से प्रीती का अवलोकन कर रहे थे.
"भाई टोटा (माल) तोह तगड़ा ले रहा है अपने साथ लेकिन लगे है के साड़ी म्हणत देहि (बॉडी) पे लगा दी. इतना गरम माल तेरे से ठंडा न होता तोह बता दे, 4-4 मिल के ऐसा ठंडा करेंगे के चाल बदल जेगी. हाहाहा.", एक हे बार में वो भद्दी सी शकल का युवक अपनी सीमा लांघ गया था और उसके साथ वाले भी जोर जोर से हंसने लगे. अर्जुन ने अपने सीने पर रखा प्रीती का हाथ उलटे हाथ में पकड़ कर चूम लिया.
"ये बॉडी ाले लोंदे खस्सी होव है काले, नीरा टशन मरवा ले इनसे लेकिन ऐसी लोंड़िया इनसे न ठंडी hoti.",Ab ये दूसरी मोटरसाइकिल चलता युवक बोलै तोह प्रीती ने थोड़ा सा कमर उचकते हुए अर्जुन का गाल चूम लिया. सड़क पर अभी भी यातायात naam-matra था और Arjun-Preeti इन लड़को की बात पर ध्यान न देते हुए एक दूसरे से मजे ले रहे थे जिस पर वो चारो लड़के कही ज्यादा हे भड़कने लगे.
"अरे बहनचोद या तोह निरि रांड है बे बंसी. साली.... आह्हः..", बस यही उसने प्रीती के बारे में गलत कह कर अपनी शामत बुलवा ली. बात पूरी भी नहीं हुई थी की 20 की रफ़्तार पर चलती वो कद-100 मोटरसाइकिल एक तरफ जा गिरी. दोनों हे लड़को की चीख जोरदार थी. मोटरसाइकिल 8-10 मीटर घिसडने पर जहा रुकी वह अर्जुन पहले हे अपनी रानी को रोक कर जैसे उनका इन्तजार कर रहा था. दूसरी मोटरसाइकिल से वो बाकी दोनों लड़के फुर्ती से अर्जुन की तरफ लपके लेकिन उस से पहले हे अर्जुन ने आगे बढ़ कर एक की जांग पर लात का भरपूर वार कर दिया. दूसरा, जो इन चारो में सबसे तगड़ा था उसकी ब्याह पकड़ कर मरोड़ते हुए अर्जुन बड़े शांत स्वर में बोलै.
"मजाक और हलकी चुहलबाजी से कोई ऐतराज नहीं है दोस्त लेकिन जहा जुबान हद्द से बहार गयी, चेहरा इस पुल्ल से निचे लटका दूंगा. कुछ ज्यादा हे गर्मी है न तोह चलो निकालो.", ऐसा कहते हुए अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ कर आगे धकेल दिया. जिनकी मोटरसाइकिल गिरी थी उनकी हालत कुछ बुरी थी और दोनों के हे ghutne-kohniya बुरी तरह जख्मी हो चुके थे. जिसकी जांघ पर लात का प्रहार हुआ था वो भी दर्द से तड़पता हुआ फुटपाथ पर बैठा था.
"घाना (ज्यादा) जोश है न तेरे में तोह ले फेर.. स्टेडियम में डंका बाजे है रुपेश उर्फ़ काले का.", अभी वो 6 फ़ीट का लड़का पूरी फुर्ती से अर्जुन की तरफ लपका हे थे की उसकी कमर को बाजू लेते हुए अर्जुन ने पूरा शरीर हवा में उठा दिया. प्रीती आराम से कड़ी देख रही थी अर्जुन की नौटंकी. वो जानती थी की ये अभी सिर्फ मजे ले रहा है. काला पूरी कोशिश कर रहा था खुद को छुड़ाने की और कोशिश सफल होने से पहले हे वो पक्की सड़क पर पड़ा था.
"स्टेडियम aaj-kal में हे जाने लगे हो शायद. पूछ लेना किसी से भी वह विकास पहलवान के बारे में, उनका छोटा भाई हु और नाम हैं अर्जुन.", अर्जुन ने आँख मारते हुए करीब जा कर उसका गाल थपथपाया तोह काला दर्द में भी हैरत से उसको देखने लगा.
"तू जानबूझ के महारी कुटाई नहीं कर रहा न?", जोर का तोह पता चल हे चूका था काले को और अर्जुन ने जैसे उसको उठाने के बाद आराम से पटका था इस से साफ़ पता चलता था के वो लड़ना हे नहीं चाहता था.
"पिताजी या भाई फ़ौज में होंगे तुम्हारे और उनमे से कोई भी तुम्हे toota-foota देखेगा तोह हम को ठेस भी पहुंचेगी. Maar-pitaai उनके साथ हे ठीक लगती है दोस्त जो इंसान करम हे गलत करता हो. तुम्हारे दोस्त ने मेरी होने वाली बीवी को अपशब्द कहा तोह नतीजा सामने है. चलो चलता हु, जरुरी काम है मुझे.", अर्जुन अभी आगे हे बढ़ा था के पिछली लाइट पर कड़ी वो पुलिस की जिप्सी इधर आ रुकी.
"ऐ क्या तमाशा लगा रखा है यहाँ?", अब काले की भी फट रही थी क्योंकि बात लड़की की थी और प्रीती के कुछ भी बोलते हे उन चारो की डंडा परेड होने वाली थी.
"कुछ नहीं अंकल जी, वो वाली मोटरसाइकिल स्लिप हो गयी थी और इनकी मोटरसाइकिल से टकरा गयी. उठाने में मदद हे कर रहा था मैं तोह.", अर्जुन के ऐसे जवाब पर प्रीती जहाँ हंस रही थी बाकी सभी हैरान थे उस पोलिसवाले के साथ साथ.
"चुटिया समझा है क्या लड़के? तू इसको उठा कर पटक रहा था बहनचोद. आँख है बटन नहीं, मैंने खुद देखा था इधर आते हुए. मोटरसाइकिल एक हे गिरी थी और इसलिए मैं उधर से आया हु."
"एक तोह तमीज से बात करो अंकल जी. वह लड़की कड़ी है और आप गाली दे रहे हो. दूसरी बात न मैंने कोई रिपोर्ट करि है और न ये लोग आपसे कुछ कह रहे है.", अर्जुन की बात पर वो एक सितारा पुलिस वाला कही ज्यादा हे आग बबूला हो गया. ड्राइवर के सामने हे लड़के ने उसको गर्मी दिखाई थी और ऐसा अपमान ड्यूटी के वक़्त कोई बर्दाश्त नहीं करता.
"चल थाने, तेरी हेकड़ी मैं निकालता हु बहिन.."
"भीषभार सिंह, जुबान को लगाम दो. वर्दी में हो इसलिए इज्जत कर रहा हु लेकिन एक बार और गाली दी तोह यहाँ से सीधा निचे फेंक दूंगा.", अर्जुन का चेहरा हे बदलने लगा था और उसने इस पोलिसवाले की कलाई कस के दबा दी थी. बिशम्भर सिंह भी हलके दर्द से पंजो के भर अपनी एड़ी ऊपर करता खड़ा हो गया था.
"छोड़ दो अर्जुन, ये सही तरीका नहीं है. मां जी का हे थाना है न ये वाला.", प्रीती ने पास आते हे अर्जुन का हाथ थाम लिया. लड़के के 'मां का हे थाना' बोलने पर ड्राइवर भी इस तरफ आ खड़ा हुआ और भिशंभर कलाई मसलता हुआ जबड़े पीस रहा था.
"तेजपाल जी तुम्हरे मां है बिटिया?", ड्राइवर के ऐसा कहते हे अर्जुन ने जवाब दिया.
"पहचान नहीं हो तोह हरेक के साथ ऐसा हे सलूक करते हो क्या अंकल? अगर ऐसी हे बात है तोह मेरे दादा जी का नाम पंडित रामेश्वर शर्मा है और भाई का संजीव शर्मा. चलो प्रीती.", ये 2 नाम दोनों हे पुलिसवालो के दिमाग पर बम की तरह गिरे. उन्हें अब यहाँ से जाता हुआ अर्जुन अपनी वर्दी उतरने का फरमान नजर आ रहा था. भिशंभर भी तुरंत उनके पीछे लपका.
"ए बीटा, भूल हो जाती है रे. धुप में ड्यूटी करते हुए दिमाग की हालत क्या रहती है तुम्हे नहीं पता होगी लेकिन जो हुआ उस पर मिटटी दाल दो."
"जानता हु इसलिए तोह जा रहा हु यहाँ से. बस अपनी भाषा आम लोगो पर संयमित रखियेगा. मेरा पापा तोह वर्दी का भी लिहाज नहीं करते अगर उनकी bahu-beti के लिए कोई गलत कहे. बैठो प्रीती.", अब ये व्यक्ति आगे कुछ कहता उस से पहले हे अर्जुन निकल चला यहाँ से. वो प्रीती के साथ अपना ये कीमती समय ऐसे फिजूल के लफड़ो में बर्बाद नहीं करना चाहता था.
"भारी गलती हो गयी बे मांगेलाल आज. तेजपाल जी तक बात गयी तोह वो मेरी ड्यूटी किसी की सिक्योरिटी में हे लगवा देंगे. और डॉ जल्लाद को कुछ पता लगा तोह वो तोह सचमे बावला आदमी है.", भिशंभर की हालत धोबी के कुत्ते जैसी हो गयी थी.
"जनाब, ये लड़का कुछ नहीं कहने वाला. कहना होता तोह पहले कुछ करता और फिर आप भी हॉस्पिटल में होते. यही है वो जिसने स्टेडियम में छोटी पहलवान और उसके साथियों की खाल उतारी थी. आज तक बिस्टेर पर है वो सारे बदमाश. मैं हे गया था शो साहब के साथ दूसरी गाडी ले कर उस दिन, तभी pehchan-ne की कोशिश कर रहा था. आप निश्चिंत रहो बस.", मांगेराम के ऐसा कहते हे थोड़ी नाराजगी से भिशंभर ने उसको देखा.
"बहनन.. पहले नहीं बता सकता था के लफड़ा किसके साथ कर रहे है? और तुम लोग यही बिस्टेर चाहते हो क्या? दफा हो जाओ सालो यहाँ से.", जैसे हे भिशंभर ने उनकी बातें सुनते चारो लड़को को फटकार लगाई वो तुरंत मोटरॉयचलो पर जा चढ़े. ये जिप्सी चालू थी और आगे बढ़ गयी.
"चोखे बचे रे काले आज तोह हम दोनों. वो पहलवान शायद भाभी जे के गइल था इस खातिर ठंडा था. नहीं तोह छोटी की दुर्गति कारन वाला महारी तोह पतंग बना देवे आरर. काल बालाजी के चाल पढ़िए भाई, मंगलवार है तोह bhool-chook करके प्रसाद चढ़ा देवांगे. या मुसीबत किसी तरह ताली है.", ये वही था जिसकी जांघ पर अर्जुन ने चोट की थी. दूसरी मोटरसीले वालो की हालत बुरी थी लेकिन चुपचाप वो भी साथ हे चल रहे थे.
"व सब छोड़ यो सोच की परिवार कितना तगड़ा होगा इस पहलवान का? मां शो, दादा कोई बड़ी टॉप, बापू घाना तगड़ा बढम्याश और एक भाई भी जो ाची पहोच रखता होवेगा. इस तरह के छोरे हे कामयाब है मेघे भाई, महारा तोह सिस्टम हे गांडू है. बाप फौजी तोह बीटा मौजी. इस बार किस तरिया भी डिग्री पूरी करके अगली साल बैंक के फार्म हे भर दियूंगा. ब्याह भी हो हे जेगा नौकरी लागे बाद.", काले की तोह सोच हे बदल गयी थी.
"दिमाग पे असर हो गया तेरे भी लेकिन ाची बात है के सही असर होया."
"वो चाहता तोह रेल बना सके था भाई अपनी साऱ्या की. उसने तोह इस बात का भी बुरा न मान्य था जड़ हम गर्मी लीकडं की बात केहवा थे. वो देसी मजाक समझे थे लेकिन ऐतराज होया जड़ बात भाभी के बारे में इस बॉलीगाँड ने गलत कही. खुद सोच यार मेरे इस खातिर कोणी मारे के मेरे बाप ने दुःख होवेगा जो फ़ौज में है. निगाह कसूती है जो नम्बरप्लाटे भी देख गया वो मारन से पहले. चाल हंसी मजाक अपनी जगह है लेकिन आइंदा यु गाल बकना बंद किसी तीसरे आदमी ने.", काला बिना कुटाई के हे सुधर चूका था और उसका दोस्त इस से खुस था. वही दोनों प्रेमी युगल सुधीर की दूकान पर उपस्थित थे और अर्जुन बात करके हे इधर आया था जिस से उसके पिता से भेंट न होने पाए.
"सुधीर भाई, सब तैयार है न?", अर्जुन ने हाथ मिलाने के बाद गले लगते हुए अपने दोस्त से सिर्फ इतना हे कहा तोह वो भी मुस्कुरा दिया. प्रीती को आज उसने भाभी कह कर बुलाया था सोफे पर बैठने का कहते हुए.
"हाँ जैसा कहा था वैसे हे तैयार करवाए है सभी कपडे. साड़ी तोह तुमने पहले हे पसंद कर दी थी, इंटरलॉक करवा दी है और भाभी की बाकी ड्रेस भी रेडी है. कुछ और भी खरीदना है तोह बताओ, मैं यही मंगवा दूंगा.", सुधीर ने बात करते हुए हे जूस के लिए छोटू को बोल दिया था. प्रीती अपनी उँगलियों को आपस में फंसती हुई शर्म से नजरे झुकाये थी और अर्जुन मुस्कुरा रहा था अपनी दिलरुबा की हालत पर.
"वो लेडीज सेक्शन में जो दीदी हैं उनके साथ भेज दो जरा इन्हे.", अर्जुन ने यहाँ प्रीती का नाम नहीं लिया था और सुधीर को भी एहसास था की अर्जुन के लिए कितनी ख़ास है प्रीती. तुरंत हे एक लड़की इधर हाजिर हो गयी और आते के साथ हे प्रीती को लिए वापिस एक तरफ चली गयी.
"यार, कुछ ख़ास सामान चाहिए था.", अब अर्जुन दोस्त के सामने हे झिझक रहा था और सुधीर ने इस बार मुस्कुराने की गलती नहीं की.
"भरोसा रखो भाई, तुम मेरे लिए अजीज हो और निस्संकोच बात कह सकते हो."
"सेंटेड कैंडल्स, टूलिप्स और बड़े वाइट टॉवेल्स चाहिए. मुझे नहीं पता के ये कहा मिलेंगे.", अर्जुन इतना कह कर थोड़ा चुप हुआ तोह सुधीर ने काउंटर के भीतर से 2-3 मागज़ीने निकाल कर सोफे के सामने वाले टेबल पर रख दिए. दोनों अगल बगल बैठ चुके थे और अर्जुन अपने इस दोस्त को पैन पलट ते हुए देख रहा था और फिर एक जगह वो रुक गया. इस इंग्लिश मागज़ाइने में घर की अंदरूनी साज सज्जा शानदार तरीके से दर्शायी गयी थी. अभी ग्राहकों का समय नहीं था और दूकान पर काम करने वालो की संख्या उचित भी थी अगर 4-5 ग्राहक सँभालने हो तोह सुधीर तबियत से अर्जुन को समय दे रहा था.
"ये बाथरूम और बैडरूम की सजावट देख भाई. डिम लीगत में सेंटेड अगरबत्ती, ये बाथरूम में सिर्फ कैंडल्स और अलग अलग तरह के ऑयल्स. तू आईडिया ले रहा है न अपने ख़ास कमरे का तोह ये चीजे देख ले. मैं अभी छोटू को पर्ची दे कर मंगवा देता हु जो भी चाहिए."
"यार ये बीएड कहा से मिलेगा?", अर्जुन तोह सबकुछ भूल कर वो शाही बीएड देख रहा था जो साधारण वाले से खासा बड़ा था और लकड़ी का नक्काशीदार काम जोरदार था उस पर. दोनों हे तरफ जालीनुमा सिरहाने के बीच लैंप लगे थे.
"ये तोह फर्नीचर मार्किट से तैयार हो जायेगा और इसके साथ के 12 इंच वाले गद्दे उप्पल से मंगवा दूंगा मैं लेकिन फ़िलहाल तू जो चाहता है वो बता."
"हाँ. सेंटेड कैंडल्स, हर्ब्स वाले अलग अलग आयल, फुल लेंथ के 2 पुरे वाइट टॉवेल्स भारी वाले, और जो भी बेहतरीन फ्लावर्स मिले वो. लेकिन फ्लावर्स ले जाने में दिक्कत होगी. मैं कार भी नहीं लाया हु और कल तक खराब न हो जाये.", अर्जुन की चिंता देख अब सुधीर मुस्कुराया.
"इंतजाम करवा देता हु भाई इसका भी. नहीं होने देते कुछ भी खराब और गाडी की भी जरुरत नहीं. भाई मन है तोह बेहिचक बोलै कर जो भी चाहिए हो. वैसे अगर तू भाभी का बर्थडे प्लान कर रहा है तोह केक के साथ कुछ ऐसा भी दे जिसको वो ज़िंदगीभर अपने साथ रख सके.", सुधीर को जैसे पूरी बात पता नहीं थी और ऐसा करना भी जरुरी था. यहाँ बैडरूम और बाथरूम वाला चक्कर इस मामले से अलग रखा गया था.
"बता भाई क्या दू ऐसा जो वो ज़िंदगीभर साथ रख सके अपने.? मुझे तोह ख़ुशी होगी ऐसा उपहार देने में.", अर्जुन की बात पर सुधीर एक पद उठा कर उसपे अर्जुन दवारा बताया सामान लिखने लगा. यहाँ जूस रख कर छोटू एक गिलास प्रीती की तरफ ले जाने लगा तोह सुधीर ने उसको वापिस उनके हे पास आने का कहा.
"देख भाई अब इसका सही जवाब तोह मैं भी क्या हे दू. लाला की औलाद हु न तोह ब्याह पर हे लुगाई मिलेगी मुझे तोह और पिता जी मेरे है चौकस क्योंकि मैं उनकी एक करोड़ की चाबी हु तोह ishq-vishq अपने नसीब में तोह हैं नहीं लेकिन इतना जरूर कहता हु की भाभी के लिए कुछ भी ऐसा ले जो उनके पास हमेशा रहे. आगे तू सोच भाई क्या देना है. कुछ महंगा देना है तोह पैसे मुझसे उधार ले ले, साल का सबसे ख़ास दिन है उनके लिए.", सुधीर की बात अर्जुन समझ रहा था और हाँ में गर्दन हिलता वो एक बार प्रीती की तरफ देखने लगा जो सिर्फ महिलाओ वाले हिस्से में थी, इनसे दूर.
"पैसे तोह ढेर सारे लेके निकला हु भाई घर से. और बात महंगे सस्ते की तोह बिलकुल नहीं है, ख़ास उपहार की है.", अर्जुन एकाएक कहते कहते रुक सा गया. जैसे उसको समझ आ चूका था के उसने प्रीती को क्या उपहार देना है और वो उसके पास पहले से हे मौजूद भी है.
"थैंक्स भाई, अब ऐसा हे उपहार दूंगा जिसको ये हमेशा खुद के पास रख सकती है.", अर्जुन के इस जवाब पर सुधीर ने सवाल तोह न किया लेकिन पीठ थपथपा दी.
"मतलब पहले से हे कुछ ख़ास है तुम्हारे पास?"
"हाँ बिलकुल है और वो शायद इस दिन के लिए हे संभाल कर रखा था मैंने. अब बस जल्दी से सब taam-jhaam निबटवाओ क्योंकि मैं स्टेडियम का हे बोल कर निकला हु.", अर्जुन के ऐसा कहते हे सुधीर ने एक लड़के को मास्टरनी जी से वो कपडे ले कर आने का कहा जो अर्जुन ने तैयार करवाए थे. यहाँ से सबकुछ लेने के बाद ज्यादातर सामान तो उस खाली पिट्ठू बैग में हे आ गया था और कुछ प्रीती ने हाथो में पकड़ लिया. अगले आधे घंटे थोड़ी बहोत और खरीदी भी की गयी थी प्यार भर मस्ती के साथ साथ. दोनों सवा 6 बजे तक अपने अपने घर आ चुके थे. आज सुधीर ने सचमुच अर्जुन के लिए बहोत काम किये थे और बहार से मंगवाए सामान के पैसे न लेते हुए उसने सिर्फ इतना हे कहा था 'एक भाई का दूसरे भाई को उपहार'
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"तुम्हे ये सब इतना आसान लग रहा था? जिस घर ने तुम्हे नमक दिया, िज्जात्त के साथ रहने की जगह और जरुरत से अधिक पैसे भी तुमने बदले में नमक हरामी भी ऐसी करि जिसकी सजा नहीं है मेरे पास.", हवेली के आखिरी कमरे में गुलजार सिंह के दोनों हाथ कुर्सी की हाथी से बंधे थे और पाँव पाए से. शंकर ठीक सामने कुर्सी रखे बैठा बस उसको घूर हे रहा था, जैसे जमीन पर बैठा किंग. एक तरफ सुनील भी नफरत से भरा इस आदमी को देख रहा था, हाथ में शंकर के औजारों से भरी ट्रे लिए.
"माफ़ कार्डो साहब.", गुलजार की गांड फट चुकी थी क्योंकि ये शक्श बस देख कर उसकी आत्मा को दर्द दे रहा था. कुछ करेगा तोह पता नहीं आगे क्या हो. तभी शंकर ने दांत उखाड़ने वाला स्टील का जमूरा और एक ऑपरेशन ब्लेड उठाते हुए गुलजार की हथेली थाम ली.
"जिसको नुक्सान पहुंचने के लिए तुमने किंग का बाड़ा खोला था वो मेरी जान है कमीने. मेरी बेटी को तू मेरे हे वफादार से मरवाना चाहता था. आज ऊपर बैठा यमराज भी देखेगा की शंकर का जिगरा उस से भी सख्त है.", इसके साथ हे गुलजार की गगनभेदी चीख इस बड़े बंद कमरे में गूँज उठी. वो तबतक चीखता रहा जब तक जमूरे से पकड़ी उसकी 2 उंगलिया हाथ से जुड़ा न हो गयी. चेहरे बर्फ सा ठंडा हो चूका था लेकिन वो लगातार चीखता रहा. जमीन पर गिरी दोनों उंगलिया किंग ने पंजे से एक तरफ खिसका दी. सुनील भी खौफजदा था लेकिन हिम्मत करके उसने एक हाथ से पानी का डब्बा बाल्टी से भरते हुए गुलजार के चेहरे पर उड़ेल दिया.
"फिर तू मेरी दूसरी बेटियों को भी मारने की कोशिश करने लगा. कैसे सोच लिया की तू ये सब कर जायेगा और पकड़ में भी नहीं आएगा?", खून बहती उस जगह पर रूई का एक बड़ा टुकड़ा दबा कर शंकर ने उस ब्लेड से गुलजार की जांघ को 3 इंच काट दिया. गुलजार के चीखने से पहले हे किंग ने गुर्राते हुए उसके सीने पर पंजा रख दिया.
"आह्हः..... मालिक रेहम करो रेहम.. ाःह.. सवाल करने की जगह आप मुझे तड़पा तड़पा कर क्यों मार रहे हो? अल्लाह के लिए बक्श दीजिये. मेरी मजबूरी थी ये सब करने की. उनके कब्जे में मेरी बीवी और बेटी है, जिनके साथ वो मेरे सामने हे नापाक हरकते करते है. मुझे यहाँ भेजने वाले भी वही लोग है और इसके बदले उन्होंने मेरे परिवार का ध्यान रखने के साथ साथ बेटी के निकाह का भी वादा किया था. 10 लाख देने के साथ साथ.", गुलजार बिना पूछे हे सब बकने लगा था और शंकर ने अब दूसरा हाथ अपने कब्जे में ले लिया. पहले वाले से अभी भी एक धार खून फर्श पर रिस रहा था.
"किसने लगवाया था तुम्हे काम पर और कहा रहता है वो.?", जांघ से गिरता खून पतलून के साथ साथ उस कुर्सी को भी भिगो रहा था. गुलजार इस हालत में आधा घंटा भी रहता तोह उसका बचना मुश्किल था. जान बचने के लिए उसकी जुबान पर वो नाम आ हे गया.
"बड़े तहसीलदार साहब है वो रमाकांत नाम है उनका. बहोत ताक़तवर और रसूख वाला परिवार है उनका.. आठ.. मुझे बक्श दो साहब, आप जैसा कहोगे मैं वही करूँगा."
"पूरा ब्यौरा दे मुझे इस रमाकांत का नहीं तोह अगली बार जो नस कटेगी उसको जोड़ने वाला डॉक्टर दुनिया में नहीं है."
"रमाकांत हे नाम है उसका साहब लेकिन सब उसको बड़े तहसीलदार कहते है. उनका सम्बन्ध भी जैसलमेर के राजघराने से है. उन्होंने कहा था की इस परिवार की हर लड़की को मारने पर हे वो मेरी बीवी और बेटी को आजाद करेंगे. 20 महीने बाद हे मुझे अंदर कदम रखने को मिले लेकिन सच कहता हु मैं पेशेवर कातिल नै हु."
"मुझे तुमसे पूरी हमदर्दी है और मैं तुम्हारी मजबूरी समझ रहा है. तभी तोह कहा था के मेरे पास कोई सजा नहीं है जिस से तुम्हारे कर्मो का फैंसला हो सके. ये तहसीलदार को मैं तुम्हारे पास जल्द हे भेजूंगा, वादा करता हु. बीवी बेटी की सुरक्षा भी मैं अपने जिम्मे लेता हु. कुछ दिन इन्तजार करना बस, तहसीलदार की आत्मा खुद तुमसे मिलने आएगी. अब तुम्हारी सजा का फैंसला भगवन खुद हे करेंगे, मैं तोह खुद एक पिता हु इसलिए सही मार्ग पर भेजूंगा तुम्हे.", इतने तगड़े प्रवचन को गुलजार जबतक समझता उसकी गार्डन से गोलाकार तेज फ़व्वार्रा निकल पड़ा. मजाल थी शंकर का हाथ जरा भी कंपा हो या नजर हटी हो. गर्दन अलग करके गुलजार की गॉड में रखता वो इस फड़फड़ाते शरीर को 1 मिनट तक निहारता रहा. किंग भी अब एक तरफ हो गया था इस बहते खून से बचने के लिए.
शंकर का ध्यान टूटा औजार जमीन पर बिखरने की तेज आवाज से जो सुनील के बेहोश होने की वजह से हुआ था. वो बेचारा ये दृश्य देख कर खड़ा न रह सका.
"ये घंटा करेंगे सुरक्षा. इन्हे समझना चाहिए की मेरा काम कितना मुश्किल है और दुःख मुझे भी होता है. किंग, बीटा तू ऐसे हे साफ़ सुथरा रहा कर. अपनी बहिन (ऋतू) के खरोच भी मारी तोह तेरी गांड का भी यही हाल करूँगा जो इसका करा है.", शंकर ऐसे पल में भी मसखरी करते हुए किंग को लिए बहार निकल आया.
"ोये, अंदर से गन्दगी साफ़ करो और जो बेहोश हुआ है उसको कुछ दिन आराम हे करने देना बस. जिसका दिल कमजोर हो वो अपनी माँ न छुड़ाए अंदर जा कर.", शंकर ने थोड़ी हे दूर खड़े 4 सुरक्षाकर्मियों को तेज आवाज में निर्देश देते हुए गलियारे में लगी टूटी पर हाथ धोते हुए कहा तोह वो लोग फुर्ती से कमरे तक आये और अंदर का हाल देख उचित सामान लेने वापिस एक तरफ निकल गए. उन्हें मालूम था की इस लाश को कहा ठिकाने लगाना है. उमेद की काली मेरसेदेज़ भी इधर खुले आँगन में चली आयी थी अब.
"डॉक्टर ये कपड़ो पे खून कैसा लगा है?", उमेद की बात सुन्न कर शंकर ने अपनी सफ़ीद कमीज को वही खोल दिया.
"तेरे एक सिक्योरिटी वाले का ऑपरेशन किया है अभी. देख ले वो आखिरी कमरे में है और बाकी इसको पकड़ा पापा ने था शालिनी के संदेह करने पर. वैसे इसको यहाँ भेजने वाला शक्श सारंग का कोई तहसीलदार रिश्तेदार था."
"रमाकांत?", उमेद बात सुनते हे गुस्से से लाल हो उठा. ऐसे वक़्त पर एक यही इंसान था जो होश नहीं खोता था लेकिन तहसीलदार सुनते हे जैसे शरीर का सारा खून उसकी आँखों में उतर आया.
"शांत रह भाई शांत रह. मैं देख लूंगा ये जो भी है तहसीलदार है, फिर बनता हु मैं इसकी जमीन के कागज़."
"भोले, जानता है ये कौन तहसीलदार है? अगले शहर वाला वो तहसीलदार जिसकी बेटी शालिनी के साथ पढ़ती थी और उसकी अजीज सहेली थी. यहाँ भी सारंग शामिल हो हे गया है. ये मामला जल्द निबटना होगा भोले."
"ठण्ड रख बे गज्जू छज्जू. बाप के पास है ये मामला और उन्होंने हे आर्डर दिया था मुझे इसका हिसाब करने का. चल भाभी को लेके मेरे साथ चल फिर उनसे हे बात करते है इस बारे में. उनके केस को वही लीड करते है और बात अब सारंग से जुडी है तोह अभी हम कुछ नहीं बोलेंगे.", शंकर ने अपने भाई का सर सहलाते हुए उसको ठंडा किया तोह उमेद ने आँखें बंद करते हुए गहरी सांस ली.
"हाँ भाई, सोच समझ कर हे करना पड़ेगा. ये साला तहसीलदार क्यों माँ छुड़वा रहा है अपनी वो भी इतने सालो के बाद? कोई बात नहीं अगर उसकी यही इत्छा है तोह हमको भी वो शिकार करने का तरीका देखने को जल्द हे मिलेगा जो पापा और चाचा करते थे. तू मेरे बुर्शट पहन ले अंदर चल कर, फिर चाय पी कर निकलते है, 7 से ऊपर टाइम हो रहा.", उमेद ऐसे हे शंकर को साथ लिए अपने कक्ष की तरफ बढ़ा तोह किंग भी उनके पीछे हो लिया. बाकी वो चारो लोग मुँह पे कपडा रखे पूरी लगन से सब साफ़ सफाई कर रहे थे. ये लाश भी खेत की जमीन में यूरिया दाल कर दफ़न करनी थी.