Incest Pyaar - 100 Baar - Page 29 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

भाई अपडेट कल हे पोस्ट करूँगा 2 भाग में. ऐसे अधूरा पोस्ट करना न्याय नहीं होगा
 
अपडेट 151

वचन - 1


"फरीद, बहोत ाचा काम किया है तुमने. हमको नाज है की तुम पर बेटे.", रामेश्वर जी सुबह 7 बजे अपने घर से 40 किलोमीटर दूर इस लाल रंग के सरकारी क्वार्टर में बड़े रौब से खड़े थे. फरीद नाम के इस हट्टे काटते व्यक्ति का कन्धा थपथपाते हुए वो उसको शाबाशी दे रहे थे वही संजीव ऊपर वाली मंजिल की सीढ़ियों से चलता हुआ इनके पास आ खड़ा हुआ.

"सबकुछ आपकी हे दें है अंकल जी. वजीफे के नाम पर आपने हे पढ़ा लिखा कर इस गरीब को आज इंस्पेक्टर बना दिया, नाम और रुतबा दिया है समाज में जिसके लिए जान भी आपके कदमो में वार दू तब भी कर्ज से मुक्त न हो सकूंगा. वैसे थोड़ी सी भी चूक हो जाती तोह.."

"जीवन में यही थोड़ी सी हे चूक का तोह खेल है बीटा और तुमने वही तोह होने नहीं दी. समय का खेल चाँद लम्हो से हे दुनिया पलट देता है. संजीव, बात करने लायक है क्या वो दोनों?", रामेश्वर जी ने वैसे हे फरीद के कंधे पर हाथ रखे हुए अपने पौटे से पूछा.

"हाँ काफी बेहतर है लेकिन नाम नहीं उगल रहे. आप मिल लीजिये, शायद आप पहचानते हो इन्हे.", संजीव के ऐसा कहते हे पंडित जी फरीद को साथ लिए ऊपरी ताल पर बढ़ गए. 15-16 सीढ़ियों के बाद सामने वाले कमरे में हे 2 लोग फर्श पर बैठे थे. हाथ रस्सी से बंधे और गर्दन पीछे वाली खिड़की के लोहे वाले जाल से. वो छह कर हिल नहीं सकते थे लेकिन चेहरे से साफ़ जान पड़ता था की दोनों हे सख्त तबियत के पेशेवर अपराधी है.

"ओह.. गोरा और बशीर इस काम को अंजाम देने आये थे.", अपने सामने इस शक्श को देख कर हे दोनों के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी. 40-45 उम्र के ये दोनों हे व्यक्ति पंडित रामेश्वर शर्मा का चेहरा और वही पोलिसिअ चाल सामने देख खौफजदा हो गए. फरीद और संजीव भी बड़े ध्यान से ये सब देख रहे थे.

"P..Pandit जी..", ये पक्के रंग का खिचड़ी दाढ़ी वाली व्यक्ति बशीर था जिसके शब्द उसका साथ नहीं दे रहे थे.

"हाँ बीटा बशीर, तुम्हारे पंडित जी अभी भी ज़िंदा है. उम्मीद नहीं थी की तुम इतने दिलेर निकलोगे जो हमारी सरहद में फिर से घुसपैठ करने का माद्दा रखोगे. और गोरा, सुना था तुम नामचीन निशानची बन्न गए हो?", एक घुटना मदद कर पंडित जी उनके सामने झुकते हुए गोरा का चेहरा पकड़ कर दाए बाए करके जैसे कुछ देखने लगे. इतने में हे उस व्यक्ति की जांघो के बीच एकाएक गीलापन उभर आया, दहशत से.

"पेशाब निकलवाने वाला काम तोह हमने अभी शुरू भी नहीं किया. बताया था न की अपनी नलकी पर धागा बांध कर रखा करो?", रामेश्वर जी के चेहरे की कुटिल मुस्कान बहोत कुछ बता गयी थी इन दोनों को.

"हमको तोह सुपारी मिली थी पंडित जी, देने वाले का naam-pehchaan तोह हमको बताई नहीं जाती. पता होता की आप अभी तक काम पर है तोह ऐसी गुस्ताखी नहीं करते.", ये बशीर रट्टू तोते की तरह बोल रहा था जिस पर पंडित जी ने कोई ध्यान न दिया. उन्होंने तोह गोरा की पतलून के बटन को खोलने का उपक्रम किया और गोरा के साफ़ सुथरे चेहरे से पसीना टप्प टप्प उसकी हे कमीज पर गिरना शुरू.

"पंडित जी... मुझे नहीं पता.. आप इस मामले में शामिल है.. सुशीला सिंह नाम की औरत की सुपारी मेरे पास कुछ दिन पहले आयी थी.. पहले फ़ोन आया था और फिर पैसे, जो एक औरत दे कर गयी थी 60 बरस की.", गोरा खौफजदा था और सुपारी के नियम तोड़ने में उसको एक पल भी न लगा.

"फ़ोन के बारे में सही से नहीं बताया तुमने गोरा. और ये इतनी बुजुर्ग औरत तुम्हारे तक सीधा पहुंच गयी? तुम जैसे कमीनो से मैं पुराणी पहचान रखता हु तोह ये भी जानता हु की ऐसे वैसे लोगो के लिए तोह तुम काम करते नहीं. अकेली बुजुर्ग औरत इतना पैसा ले कर आये और तुम उसको ऐसे हे जाने दो. गिरगिट से ज्यादा रंग बदलने वाला गोरा...", रामेशर जी की एक सख्त ऊँगली इस व्यक्ति की नाभि पर दबाव बनाने लगी तोह वो कांपने लगा.

"आह्हः.. फ़ोन.. फ़ोन करने वाले ने मेरी पहचान के आदमी का जीकर किया था पंडित जी. बुढ़िया का तोह पूरा हुलिया मैं बता सकता हु, आप चाहो तोह पता लगवा सकते हो चित्र बनवा कर. सच कहते हु इस से ज्यादा कुछ नहीं पता."

"चलो अपने हे जवाब में छिपे उस सवाल का भी जवाब दे दो, मैं और कोई सितम नहीं करूँगा.", पंडित जी का आशय उस पहचान वाले व्यक्ति के नाम से था जिसका जीकर सुपारी देने वाले ने किया था.

"कुमार सारंग. हम उन्हें शिकार के काम ली जाने वाले स्नाइपर मुहैया करवाते है पंडित जी और वो एक बड़ी शक्शियत है राजस्थान में. सुना तोह यहाँ तक है की वो शाही परिवार से है वह के, बड़े व्यापारी होने के साथ. बुढ़िया को भी इस बशीर ने अलवर (राजस्थान) तक पहुंचाया था जहा उसके रिश्तेदार थे कही पास के गाँव में. लेकिन वो रसूख वाली नहीं दिखती थी, साधारण madhyam-vargiya घर से लगती थी.", गोरा के इतने खुलासे पर पंडित जी ने बशीर की तरफ देखा तोह वह सकपका गया. उसके जोड़ीदार ने इतना कुछ उगल दिया था और अब उसका भी नाम जाहिर हो चूका था.

"कुमार सारंग का खुद फ़ोन आया था तुम्हे?"

"नहीं नहीं पंडित जी, वो तोह साल में सिर्फ 3-4 बार हे फ़ोन हे करते है. लेकिन उनके लिए काम करने से हमारा ताल्लुक 50-60 लोगो बन्न गया, जिनके लिए यही हथियार और छोटे मॉटे काम काम करके हमारी कमाई चलती है. उस औरत ने मुझसे बिनती की थी की मैं उसको वह तक छोड़ दू क्योंकि न तोह सुपारी वाले पैसे उसके थे और न उसके पास इतनी दूर जाने का साधन. मुझे दरगाह जाना हे था इसलिए उसको साथ ले गया लेकिन वो अलवर शुरू होने से पहले हे ढाबे पर उतर गयी ये बता कर की भुंडीये (टैम्पो) से वो अपने रिश्तेदार के गाँव चली जाएगी.", बशीर इस बार जो भी कह रहा था वो शॉट प्रतिशत सच हे था.

"जिसने फ़ोन किया था वो आवाज मरदाना थी या जानना, गोरा.?", अब पंडित जी उठ खड़े हुए और गोरा ने उनका हाथ कमर पर लटकी पिस्तौल पर देखते हे तुरंत जवाब दिया.

"जानना थी पंडित जी.. जानना आवाज थी वो भी पतली जैसे आवाज छन् कर आ रही हो."

"फरीद, इस बशीर का एनकाउंटर कर दो और गोरा की स्टेटमेंट दर्ज करके ुचि धाराएं लगा कर कल कोर्ट में पेश कर देना. Antar-rajya मामला है और इस बात का ध्यान रहे कही भी कुमार सारंग का नाम नहीं होना चाहिए. संजीव, स्केच आर्टिस्ट के लिए अपने शहर से ख़ास व्यक्ति को भिजवाओ फरीद के थाने. मुझे इस औरत का सही चित्र चाहिए और इसको प्राथमिकता पर रखना.", बशीर की तोह गांड हे फट गयी थी अपने एनकाउंटर की बात सुन्न कर वही गोरा को तस्सल्ली थी की वो जिन्दा भी रहेगा और शायद 3-4 साल में बहार भी आ जाये पुलिस का सहयोग करने पर.

"ये सरासर गलत है पंडित जी. कानून की हद्द से बहार जा रहे है आप. मेरा एनकाउंटर नहीं कर सकते आप."

"तुम मुझे मेरी हद्द बताओगे? चहु तोह अभी तुम्हारे भेजे में इतना पीतल भर सकता हु की pital-mukhi कहलाओगे मरने पर. हमको नफरत है दोगले व्यक्ति से और तुम वही तोह हो. एक आधी अधूरी बात बता कर तुम समझते हो हमे सच्चाई पता नहीं लगेगी तोह अपनी सोच के साथ तुम ज्यादा देर ज़िंदा नहीं रहने वाले.", रामेश्वर जी इतना कहते हे मुड़ने लगे तोह बशीर जोरो से गिड़गिड़ाने लगा.

"वो.. वो मैंने उस बूढी औरत को एक कमसिन जिस्म के एवज में वह तक पहुंचाया था साहब. शातिर औरत थी वो और मैं भी लालच कर गया. हाथ जोड़ता हु मेरी जान बक्श दीजिये, इस से ज्यादा कुछ भी जानकारी मेरे पास नहीं है.", बशीर के गिड़गिड़ाने पर पंडित जी कुछ देर तक उसके चेहरे को देखते रहे.

"तुमने जानकारी नहीं ली बशीर उस औरत से की वो अकेली कैसे तुम्हारे ठिकाने तक पहुंच गयी? इतना लम्बा सफर तुमने उसके साथ तये किया था तोह बातचीत लाजमी हुई होगी."

"उसने बताया था की इस सुशीला से उसके मालिक का 36 का आंकड़ा है और अब वो भी अपने गाँव को छोड़ कर अपने रिश्तेदार के पास रहने जा रही है. हमारे ठिकाने तक वो नहीं आयी थी साहब, मिलने की जगह क्सक्सक्सक्सक्स बिपास निर्धारति हुआ था. वेशभूषा से तोह वो जमींदारी वाली कोई विधवा हे थी लेकिन उसने ज्यादा बातचीत नहीं की थी पूरे सफर में.", बशीर को अपनी ज़िन्दगी बचने के लिए हर बात को बताना हे ठीक लगा.

"ठीक है बशीर, बाकी हम देखते है. इसको भी दाल दो कोठरी में फरीद और हम अभी थोड़ा जल्दी में है लेकिन स्केच बनते हे मिलने आएंगे.", अब तक 4 सिपाही भी इधर आ चुके थे और फरीद ने संजीव को जाने से पहले जोरदार सलूट मारा. चारो सिपाही भी इन दोनों व्यक्तियों को हथकड़ी पहना कर इनके पीछे हे चल दिए, सरकारी गाडी से थाने ले कर जाने के लिए.

रामेश्वर जी ने संजीव को भी भरपूर शाबाशी दी थी इतनी मुस्तैदी दिखने और फरीद को ऐसे मामले में शामिल करने के लिए. घर पे व्यस्त रह कर भी संजीव अपने काम से दूर नहीं था, यही उसके व्यक्तित्व के सबसे बड़ी खासियत थी. सुशीला सिंह को तोह जैसे भान भी नहीं था के उसके साथ क्या हे होने वाला था जो उनके शुभचिंतको ने समय रहते होने न दिया.

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"बड़ा हे धुआंधार मैच खेला यार कल रात तोह आपने. एक बार तोह लगा था के आज तोह पक्का फंसने वाले है तीनो.", तारा इस वक़्त प्रियंका की बगल में लेती मुस्कुरा रही थी इनके कमरे में. उसकी बातें सुन्न कर प्रियंका का चेहरा शर्म से गहरा लाल हे हो चला था. अभी तक शरीर में वो मीठा दर्द रह रह कर गुदगुदी कर रहा था प्रियंका के.

"कमीनी हो तुम तारा, बड़ी वाली कमीनी. शर्म नहीं आयी तुम्हे वो सब देखते हुए?"

"कहा.. मुझे देखते शर्म आणि चाहिए लेकिन आपको 3-3 बार करते हुए बिलकुल शर्म नहीं आयी. कितना शोर मचा रही थी आप जब अर्जुन आपके इन मॉटे बूट्स के बीच कसरत कर रहा था. सचमुच बड़ा हे तगड़ा सन था यार और उसका वो इतना मोटा डंडा जब तेजी से अंदर बहार हो रहा था, मेरा तोह देख के हे दिल बैठ गया. आपने हिम्मत कैसे दिखाई इतनी?", तारा ने वो guda-maithun वाला दृश्य याद करते हुए प्रियंका का एक मोटा उभर हे सेहला दिया, अनजाने में.

"सीई.. अभी तक ये दुःख रहे है यार. वो तोह इनके पीछे पागल हे हुआ रहा साड़ी रात. चूस चूस के पूरे लाल कर दिए हैं. और जो तू कह रही है न उसका डंडा पीछे लेने वाली बात, सचमुच एक बार तोह जान हे गले तक आ गयी थी लेकिन तारा कुछ भी कह उसका भी अलग हे नशा था. अभी दुःख तोह रहा है लेकिन दिल कर रहा है फिर से करवौ जब भी मौका मिले. वैसे हालत आगे की ज्यादा बुरी है पीछे से. तइस आपस में भी लगने पर करंट सा लगता है. आह्हः.. हैं तोह पूरे हे जादूगर ये लड़का जो इतने आराम और प्यार से सबकुछ कर गया.", प्रियंका का खुद हे अपना हाथ उस सूजी हुई छूट को पतले से गाउन के ऊपर से सेहला गया. तारा भी उत्तेजित हो रही थी ये सब सुन्न कर.

"करवाना तोह मैं भी चाहती हु वह लेकिन उसका तोह अब पहले से भी ज्यादा मोटा हो चूका है. छूट में भी हर बार दुखता तोह पीछे पता नहीं क्या ग़दर मचाएगा. वैसे उसकी बात सही थी की हैवी हिप्स झेल सकते है उसका."

"तेरे तोह और भी सॉफ्ट और शेप में है. बड़े आराम से ले लेगी तू, बस वो कैप (सूपड़ा) एक बार दुखती है अंदर जाते हुए. परसो कर लेना तरय क्योंकि उसके बाद तोह बुआ (मधु) ने भी आ जाना है और बाकी रिश्तेदारों ने भी. चल एक पेनकिलर निकाल के दे इस अलमारी से, फिर उठती हु आधे घंटे तक.", प्रियंका की बा सुन्न कर तारा भी सोच में पड़ गयी. उन्हें दवा और पानी देती वो भी आने वाले दिनों पर विचार कर रही थी.

"यार मुझे नहीं लगता के अब कुछ भी होगा शादी तक. और सच कहु तोह आपकी भी किस्मत ाची है जो कल तुक्का लग गया आइशा के इधर आने से नहीं तोह 100 परसेंट कहती हु विन्नी दीदी ने अर्जुन के साथ सोना था और हम दोनों यहाँ लेती उनकी मस्ती की आवाज सुनती रहती.", तारा की बात गलत भी नहीं थी.

"हाँ सो तोह है लेकिन अर्जुन विन्नी दीदी के साथ इधर करता नहीं वो सब. उनका फर्स्ट टाइम होता और अर्जुन का इतना मोटा पेनिस हालत बिगाड़ देता. यहाँ विन्नी पर दादी के साथ सभी ध्यान देते है. उन्हें पहली बार के लिए उसके साथ पूरा टाइम चाहिए और एकांत भी. वैसे फिगर तोह विन्नी दीदी का भी कमाल है, क्या पता झेल ले लेकिन इतने लोगो की उपस्थिति में वो ऐसा करने से बचेंगी.", तारा ने उनकी बात सुनते हुए टाइम देखा तोह 9 बज चुके थे.

"आप रेस्ट करो थोड़ी देर, मैं जरा निचे छोटी मामी (अनामिका) से मिल लू. वो यहाँ थोड़ा कम्फर्ट महसूस नहीं कर रही नयी होने की वजह से. आती हु आपके पास थोड़ी देर में और कपडे बदल लो कोई भी आ सकता है.", तारा कड़ी हो कर चलने लगी तोह प्रियंका थोड़ी परेशां दिखने लगी.

"टेंशन मैट लो बस पंतय मैट पहनो. ज्यादा सूजन है तोह मैं बर्फ लेती आउंगी.", तारा ने जैसे उनकी परेशानी समझ ली थी और अब प्रियंका के चेहरे पर थोड़ी शर्मीली मुस्कान थी.

"ठीक है नहीं पहनती लेकिन पता नहीं ठीक लगेगा या नहीं."

"वह कोई हाथ लगा कर देखने नहीं. निश्चिंत रहा करो यार और ब्रा भी टाइट लगे तोह माधुरी दीदी की कोई पुराणी ब्रा लेती आउंगी, उनका साइज हे आपके खजाने को आराम से संभल लेगा.", तारा आँख मारती हुई दरवाजा खोल कर निचे चली गयी और प्रियंका ने फिर से अपने आँखें मूँद ली. सचमुच उनका रोम रोम निहाल हो गया था अर्जुन के इतने भरपूर और तगड़े संसर्ग से.

नीचे आने पर तारा ने ये दृश्य देखा तोह एक प्यारी सी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गयी. खुले हॉल में जमीन पर दरी बिछाए अर्जुन लेता था और उसके सीने पर अनामिका चची का वो लगभग 3 महीने का बीटा अर्जुन के साथ खेल रहा था. Gol-matol सा वो बचा हाथ पाँव चलता हुआ खिलखिलाता हुआ लार भी गिरा रहा था. कृष्णा चची अर्जुन के लम्बे घुंगराला बालो में तेल से चम्पी करती हुई अनामिका से भी बात करते हुए इन दोनों के खेल भी ख़ुशी से देख रही थी.

"मामी, ये अर्जुन अभी से बचे खिलने की प्रैक्टिस कर रहा है और आप खुश हो रही हो.", तारा की इस बेबाकी से अर्जुन तोह सन्न हे रह गया लेकिन जब सबको हँसते पाया तोह झेंपते हुए बोल उठा.

"चाची माँ, ये तारा तोह अपने बचो का ध्यान रखेगी नहीं. मां होने का कर्त्तव्य मुझे तोह निभाना हे पड़ेगा, इसलिए अपने इस छोटे भाई के साथ हे प्रैक्टिस कर लू.", अब तारा की बारी थी झेंपने की और इन दोनों की ऐसी बातें सुन्न कर अनामिका के शांत चेहरे पर पहली बार मुस्कराहट आयी थी जिसको अर्जुन ने भी देखा. औसत कद्द की अनामिका गौरवर्ण 28-29 साल की महिला थी जिसका विवाह अपने से 5-6 साल बड़े विनोद के साथ तक़रीबन 6 साल पहले हुआ था. तारा भी इस नटखट से बचे से खेलने के लिए करीब आ बैठी. बाकी घर के लोग अपने अपने कामो में व्यस्त थे.

"अनामिका, तुम पहली बार हे आयी हो न यहाँ? देखो सब चिंता भुला कर यहाँ खुश रहो. तुम मेहमान नहीं हो और सब तुम्हारे हे है यहाँ. और ये मेरा बीटा जो है ये पूरा ख़याल रखेगा अगर कुछ भी जरुरत हो तोह.", कृष्णा चची के ऐसा कहने पर अनामिका पहली बार सुनाई देने लायक आवाज में बोली.

"जी दीदी, हम तोह घर से अपने मायके भी सिर्फ 2 बार हे गए है अभी तक. यहाँ आये तोह हम हैरान रह गए क्योंकि यहाँ वाला घर तोह बिलकुल विपरीत है वह से. हमारा घूंघट बड़ी माँ जी के कहने से पहली बार चेहरा से हटा है. आप सभी लोग ठीक वैसे हे है जैसे परिवार का हम सपना देखते थे.", इस बार अर्जुन ने इस गोलाकार खूबसूरत चेहरे को देखा तोह उसको ये जान कर झटका लगा की उसकी छोटी चची अपने maa-baap के पास भी सिर्फ 2 हे बार गयी है. ऊपर से इतना खुलापन वो पहली बार देख रही थी.

"छोटी चाची जी, अब मैं तोह कभी आपके उधर आया नहीं लेकिन सुन्न कर तोह ऐसा लगता है जैसे आप 50 साल पहले की बात कर रही है.", अर्जुन अभी भी उनके बेटे को खिला रहा था जिसके चेहरे को तारा साफ़ करती हुई अर्जुन की बात पर मुस्कुरा रही थी.

"ऐसा भी नहीं है के हम 50 साल पुराने है लेकिन कितना फरक है एक हे परिवार के दो घरो में ये हमको आज हे पता लगा है. ग्रेजुएशन करने के बाद हम भी कामना करते थे की ऐसा हे परिवार मिले.", अनामिका बात कहते कहते हे रुक गयी थी अपनी बड़ी सास के वह आने पर. कौशल्या जी अब अपने पुराने हे अवतार में लौट आयी थी.

"तेरे बाप ने रिश्ता किया तब मुझे खबर नहीं थी अनामिका. लेकिन तुझको मैंने हे इतने दिन पहले बुलाया है और इस बार तू जब वापिस जायेगी तोह कुछ बंदिशे तुझे नहीं मिलेंगी. देख लिया था मैंने अपने इस पौटे के नामकरण और अभी निमंत्रण देने के वक़्त. मेरे घर में भी उचित बंदिशे है लेकिन वो घर के बहार लागू होती है, यहाँ अपनों के बीच नहीं. अपने maa-baap के सामने हे बेटी घूंघट ले ये पसंद नहीं मुझे, बस सर इसलिए ढकना जरुरी है की रसोई में परेशानी न हो.", कौशल्या जी ने अर्जुन के हाथ से बचा लेते हुए उसकी हे बगल में लिटाते हुए laal-teil से पाँव और हाथो की मालिश शुरू करते हुए कहा. कृष्णा चची का दवा का समय होने पर वो उठी तोह अर्जुन सरक कर तारा की गॉड में सर रखता घूम गया.

"वैसे दादी, आप हे कुछ दिन के लिए चली जाओ न वह गाँव वाले घर. मुझे यकीन है के 2 दिन में आप वह भी सब टाइट कर डौगी.", अर्जुन ने ये बात हँसते हुए मजाक में कही थी. इस बात पर अनामिका के चेहरे पर भी थोड़ी हंसी आयी तोह तारा अपनी नानी के हाथ पर हाथ रखते हुए कुछ इशारा करने लगी.

"हाँ तू तोह मुझे भगा दे यहाँ से. ये नहीं कहता की तेरी चची को हे मैं यहाँ रख लू जिस से वो सभी यहाँ आये तोह उनकी तगड़ी खबर लू. इस बार मैं यही करने वाली हु, देख लियो.", पहली बार अर्जुन ने ऐसा कुछ सुना था. वो उस परिवार के लिए नाराज थी जिसको चेहरे से जाहिर न करते हुए भी वो कुछ हद्द तक बता हे गयी थी.

"नहीं माँ जी, ऐसी भी बात नहीं है.", अनामिका देख रही थी जिस तरह उसकी बड़ी सास उसके बेटे की तसल्ली से मालिश करने के साथ हे उसको प्यार भी दे रही थी. तारा भी बराबर अर्जुन का सर सेहला रही थी जो की सीने पर कोई दुपट्टा तक न लिए थे. वो तोह 9 गज साड़ी और घूंघट से आज हे थोड़ा सा बहार आयी थी.

"तुम अगले 2 हफ्ते यही हो बेटी और जब दिल करे बता देना की कैसी बात है. इसको दूध पीला चुकी हो न?", कौशल्या जी ने ऐसी बात अपने दोहती और पौटे के सामने हे पूछ ली थी जिस पर अनमैकिअ थोड़ा शर्म महसूस करने लगी.

"जी अभी इसका पेट भरा हुआ है.", अनामिका जैसे तैसे इतना हे कह सकीय थी लेकिन नजरे शर्म से जमीन में गढ़ी जा रही थी. कौशल्या जी तोह इतना सुनते हे मुन्ने को उठा कर बहार की तरफ जाने लगी.

"तुम करो बचो से बात, इसको मैं बहार आँगन में ले जा रही हु. इतनी भी उम्र नहीं है के बुधो में बैठो और जितने यहाँ हो इतने सबके साथ रहो.", अपनी बड़ी सास के ऐसा कहने पर अनामिका के दिल को भी ाचा लगा की ये उसकी सास से कितनी अलग है. देखा जाए तोह वो माधुरी से कुछ हे साल बड़ी थी और एक हिसाब से कौशल्या जी के लिए पौती की उम्र की थी.

"वो हम कह रहे थे की आप में से कोई व्यस्त न हो तोह कुछ सामान लेने पास की मार्किट चल सकते है? निकेतन का कुछ जरुरी सामान बड़े जेठ जी बता कर गए थे नहाने और नहाने के बाद का, वो कह रहे थे की बचे के लिए ये सब जरुरी है.", अनामिका की बात सुन्न कर तारा ने झट्ट से हाँ भर दी.

"हाँ तोह मामी इसमें रिक्वेस्ट करने वाली क्या बात है? वैसे भी अभी हम लोग मार्किट जाने हे लगे है, आप साथ हे चलो. बेबी के साथ साथ अगर आपने भी कुछ लेना हो तोह ले लीजियेगा. बड़ी मार्किट में तोह हर चीज मिलती है. ऋतू और विन्नी दीदी अभी प्रीती के घर गयी है और उनके आते हे हम लोग चलते है.", तारा के इस तरह सीधा हे सबके साथ मार्किट चलने के निमंत्रण पर अनामिका थोड़ा दुविधा में पड़ गयी.

"बस निकेतन का हे सामान लेना है. हम इसके साथ आप लोगो के कार्यक्रम में खलल नहीं दाल सकते. करीब के हे किसी मेडिकल तक जाना ठीक रहेगा."

"मैं ले चलता हु आपको छोटी चची, टेंशन मैट लीजिये. लेकिन चलेंगे 11 बजे क्योंकि अभी मैं थोड़ी देर सोने वाला हु. ये सब अभी मार्किट जाएंगी तोह 2-3 बजे तक वापिस आएँगी. जैसा ठीक लगे वैसा कीजिये.", अर्जुन ने खड़े होते तारा के सर पर हलके से हाथ फिराया, धन्यवाद् के रूप में और वो भी मुस्कुराने लगी.

"ठीक है हम आपके हे साथ चलेंगे और निकेतन को भी मालिश के बाद नहलाना है तोह इतना टाइम लग हे जायेगा. मार्किट जाना हुआ तोह हम जरुरत पर हे सोचेंगे.", अनामिका के ऐसा कहने पर तारा के मैं में अलग हे विचार चलने लगे.

'मामी नहीं जानती की वह क्या कर रही है और ये अर्जुन अभी तोह मेडिकल से इनके मुन्ने का सामान दिलाने ले जायेगा लेकिन बाद में ये जाने और क्या क्या लेंगी अगर कुछ देर इसके साथ रही. भगवन बचाये अब इन्हे तोह.', तारा यही सोचती हंस रही थी और अर्जुन चुपचाप अपनी माँ के कमरे में उनके बिस्टेर पर जा लेता. दिन का यही समय था जब 2 कामवाली के साथ बाकी लोग भी अपने अपने काम में व्यस्त थे और फ़िलहाल किसी को भी अर्जुन की ऐसी जरुरत न थी.

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सिखर दोपहरी में रामेश्वर जी आज अपनी बड़ी भाभी के चंद्रो देवी की हवेली पर आँगन में बैठे भोजन कर रहे थे. उनके साथ हे बगल में संजीव और बिजेन्दर के साथ सुशीला, बबिता और स्वयं चंद्रो देवी बैठी थी. सुलतान भी ऊंघता हुआ फर्श पे रामेश्वर जी के चरणों में था.

"भाभी, ऐसा है की अब आपके साथ साथ बेटी सुशीला की जान को भी खतरा है. बिजेन्दर अकेला हर तरफ ध्यान नहीं दे सकता इसलिए मेरी बात मान कर 3-4 लोग अपने यहाँ रखवा लीजिये. मैं भेज दूंगा अपने भरोसे वाले.", पंडित जी के ऐसा कहने पर एक पल को बिजेन्दर का रंग हे उड़द गया था. वही सुशीला बस मुस्कुरा रही थी.

"हंस ले तू लेकिन ये नहीं सोच रही के तेरे काका पे क्या बीत रही होगी तेरी जान का खतरा सोच कर.", चंद्रो देवी के ऐसा कहने पर भी सुशीला पर कुछ असर न हुआ.

"ऐसा है माँ जी मेरे छोरे ने घर में हथियार के लिए मन किया है लेकिन मैं बहार निकलती हु तोह सुलतान के साथ मेरे पास ये रामप्यारी भी हमेशा रहती है. वैसे भी सुशीला सिंह का शरीर इतना छोटा न है के पीतल के 2-3 गोली इसको कमजोर कर दे. हाँ सिक्योरिटी रखनी है तोह ाची बात है, लोगो पे नजर रखनी भी जरुरी है.", सुशीला ने आखिरी लाइन कहते हुए थाली में माखन लगी रोटी रखती मधुलता को देखते हुए कही.

"मुन्नी, पता लगया है के तेरी माँ यहाँ से चली गयी. मिल के भी न गयी तेरे या हमारे से.", ये बात सुनते हे मधुलता के हाथ हलके से काँप गए. चंद्रो देवी से ऐसे सवाल की उसको उम्मीद न थी वो भी पंडित जी के सामने जो बड़े गौर से हर बात पर ध्यान दे रहे थे.

"माँ जी, वो तोह मुझे भी न बता के गयी. कल हे तोह सरपंच की बीवी से पता चला के माँ के घर पे टाला लगा है 4 दिन से. वही बता रही थी की माँ सबकुछ ऋचा के नाम करके तीरथ यात्रा पर चली गयी.", मधुलता फिर से खुद को हर बात से अलग किये थी लेकिन यहाँ जो सामने बैठा था वो न शंकर था और न हे अर्जुन. एक प्रेम आसक्त था और दूसरा बस सबको सही राह पर रखने वाला. रामेश्वर जी दोनों से आगे थे.

"ये सरपंच का क्या चक्कर है भाभी?", सिर्फ एक शब्द पर उन्होंने बाकी बात हे भुला दी. मधुलता चाह कर भी रुक न सकीय वह.

"गोली मार दी थी कमीं को मैंने लेकिन सबको ये लगता है के वो बड़े काम से दिल्ली गया था और उसके बाद वो वापिस नहीं आया.", अब तोह बिजेन्दर की भी फट गयी थी जिस तरह उसकी दादी ने कहा था के उन्होंने हे सरपंच को मारा है. लेकिन आश्चर्य की बात ये थी की रामेश्वर जी ने इसको सहज हे लिया था.

"ये इस सरपंच की बीवी राजस्थान से हे हैं न भाभी? सुना तोह ये भी है के बेड़िया समाज की थी जिसको ये ब्याह लाया था पहली के एक साल बाद मरते हे.", रामेश्वर जी के इस खुलासे पर चंद्रो देवी को झटका लगा था. मतलब गलती तोह चंद्रो देवी से भी हो चुकी थी.

"दिमाग न गया उस तरफ रामेश्वर. लेकिन सच कहु तोह वो भी आज सवेरे से न दिखी है. कल रात जरूर सरपंच के घर एक जीप आयी थी लेकिन अब वह कोई न है. तुम्हारा क्या विचार है.?"

"बिजेन्दर, अपने साथ जरा रेम्बो और संजीव को ले जाओ उनके घर अगर वह टाला लगा हो तोह टॉड भी देना. ये राजस्थान का कनेक्शन जैसे पूरे किस्से में सबसे अलग नजर आ रहा है. सुशीला, इनके घर टेलीफोन लगा है क्या?", रामेश्वर जी के कहते हे बिजेन्दर उठ खड़ा हुआ और सुलतान को तोह कहने की जरुरत हे न पड़ी. संजीव भी तुरंत उनके साथ हो लिया.

"नाना जी, उनके घर फ़ोन तोह कोणी लेकिन वायरलेस जैसा तोह है कुछ. मैंने कई बार देख्या था सरपंचनि को छत्त पे उस से बात करते हुए. वो कही करती के ये मोबाइल फ़ोन है.", अब बबिता की बात पर रामेशर जी का माथा थांनका क्योंकि ये तकनीक बेशक इनके शहरों में नहीं आयी थी लेकिन सेलुलर फ़ोन महानगरों से खरीद कर इनका प्रयोग रेंज वाली जगह किया जा सकता था. लोग सिर्फ इसलिए इनसे बचते थे क्योंकि इसकी कॉल सुन्न ने के 12 रुपये प्रति मिनट और करने के 19 रुपये मिनट लगते थे.

"बबिता, ये बात सबसे ख़ास है जो तुमने बताई है. मुझे उम्मीद हे नहीं थी की इतना गहरा काण्ड भी हो सकता है और भाभी जी आपने जिसको मारा वो सिर्फ छलावा था, पीठ के पीछे कोई और हे खेल गया.", रामेश्वर जी ने खाली प्लेट में हे हाथ धोते हुए सुशीला से टोलिया ले कर हाथ साफ़ किये.

"इसका गाम भी तोह अलवर है काका, आप कहो तोह सही एक बार. संजय यहाँ ला पटकेगा कमीनी को.", सुशीला की बात सुन्न कर चंद्रो देवी जहा हैरत से देख रही थी वही रामेश्वर जी हंसने लगे.

"अलवर तोह कोई 4 दिन पहले हे जा चूका है इसके नाम पर बेटी. अब तोह यहाँ बस सांप निकलने के बाद निशाँ पीटने का काम रह गया.", सुशीला को जैसे ये बात नागवार गुजरी थी और वो एकाएक बोल उठी.

"काका, छोडो सबकुछ और मेरी मानो तोह दमयंती काकी का पता लगाओ. वो दिखी है 25 साल में 3 बार और पिछले 20 साल से वो गायब हे है बेशक उनके नाम की हवा उड़ती है की वो यहाँ आयी, वह गयी. लेकिन देखा भी है किसी ने? आप बताओ के कभी आपने उनके नाम के अलावा कुछ जाना उनके बारे में? लाजवंती की बहिन, मतलब अपनी मुन्नी की मौसी को हे किसी ने नहीं देखा. ये सरपंच और बाकी छलावे दर्जनों होंगे लेकिन एक ऐसा इंसान जो होने के बाद भी नहीं है या कहो के वो था हे नहीं लेकिन था. इसको ढूंढो, सब मिल जायेगा मैं शरत लगा के कहती हु. दमयंती काकी को देखने वालो में से सिर्फ 3 लोग हे ज़िंदा है. इन्दर, लाजवंती और मुन्नी जिनमे से आपका बीटा इतने साल बहार रहा और मुन्नी यहाँ. हमने तोह गाँव में रहते हुए भी कभी दमयंती को नहीं देखा क्योंकि घर से उस वक़्त निकलने की इजाजत नहीं थी और नरसंहार के बाद वो दिखी नहीं.", ये सुशीला ने बम फोड़ा था.

"तुम्हे इतना विश्वास कैसे है सुशीला?", रामेश्वर जी के खुद के कथन में तरावट न थी. ये नाम उनको भी सोने नहीं देता था.

"उनकी बेटी का विवाह हुआ हमारे यहाँ और वो कन्यादान में भी नहीं आयी काका. फिर वो कर्म के साथ हे रही जबतक अज्जू का कतल न हुआ लेकिन उसके बाद वो कहा है? कितने बरस हुए होंगे उनको यहाँ से गए हुए? 24 मेरे ख़याल से लेकिन आपने तोह कभी बहु बेटी के हिसाब से ये सोचा हे नहीं होगा.", आज सचमुच रामेश्वर जी लाजवाब थे इस उल्लेख पर.

"काका, ये भी सुन्न लीजिये की बिंदिया को मैंने हे बहार भेजा था और जिस नाम ने उनकी इंग्लैंड में जमानत ली थी वह दमयंती था. कहो के वो यहाँ थी या इस नाम को बस बनाये रखा गया.? अर्जुन उनके पास पहुंच चूका है ये मैं बता देती हु इसलिए आपने शबनम को छोड़ा है.", अब तोह रामेश्वर जी की रही सही हिम्मत भी जवाब दे चुकी थी. मतलब अर्जुन वह तक पहुंच चूका था जहाँ वो सोच भी नहीं सकते थे.

"मतलब?"

"मुझे नहीं पता काका लेकिन अब अर्जुन चाहता है की वो कुछ भी न करे. इसका एक हे मतलब हुआ की वो आपको दुःख नहीं देना चाहता. खोजबीन बेशक करते रहो पर वो कुछ जान चूका है जिस से सबकी ज़िन्दगी में हलचल हो सकती है.", सुशीला के इतना कहने पर पंडित जी ने एक ठंडी आह भरी पर चंद्रो देवी के चेहरे पर पसीना आ चूका था.

"मतलब वो हर बात की गहराई तक जा चूका है सुशीला?", ये बात चंद्रो देवी ने जैसे तैसे कही थी और अब वो ये भूजल चुकी थी की आज जो रामेश्वर शर्मा यहाँ है वो अलग है.

"हाँ माँ जी वो बहोत कुछ जान चूका है इसलिए घर में खुद को बंद कर लिया है उसने. लेकिन अब वो काका वाला खेल खेलेगा, इन्तजार और शिकार. उसने पहले हे मुझे बता दिया था की मुझ पर हुम्ला होने वाला है. फरीद इंस्पेक्टर को भी अर्जुन ने हे संजीव की मदद से बताया था की मैं किस वक़्त बहार निकलती हु.", अब रामेश्वर जी बस मुस्कुरा रहे थे. इस से एक बात साफ़ थी की वो अपने पौटे से नाराज नहीं थे. वो आज गदगद थे की 2 भाई मिल कर कैसे खेल अकेले हे खेल रहे थे.

"अज्जू वाली बात?", चंद्रो देवी के ऐसा कहते वक़्त मुन्नी भी करीब हे थी.

"उसकी एक कड़ी अर्जुन के हाथ नहीं लगी लेकिन उसके हटने से वो मामला भी समझ लो ठन्डे बास्ते में गया. उसको सुलझाना तोह किसी के बस में नहीं माँ जी और जैसा बबिता कह रही थी तोह मतलब साफ़ है की अर्जुन अब ऐसा कुछ नहीं करेगा.

ये सुन्न कर मुन्नी के चेहरे पर थोड़ी शान्ति छ गयी जैसी चंद्रो देवी के आयी थी. लेकिन रामेश्वर जी को जैसे वो मंजूर न था की उनका बचा एक जगह ृक्क गया हो. अब तोह बस सरपंच की बीवी वाला संदेह साबित होने की देर थे. उन्होंने सोच लिया था की संजीव के साथ अब अर्जुन हे काम करे.

"सारंग यहाँ कब आया था भाभी.?", रामेश्वर जी के इस सवाल पर वह बैठे सभी लोगो के चेरहे पर 12 बज गए. वो अलग बात थी की विचार अलग थे सबके.

"1976 के बाद तोह वो नहीं दिखा यहाँ कभी. क्यों, कुछ उसका भी लेना देना है क्या रामेशवर.?", चंद्रो देवी के ऐसा कहने पर उन्होंने ना में गर्दन हिला दी.

"मेरा लेना देना है भाभी."
 
अपडेट 152

वचन (2)


कुछ अपनों के टूटे सपनो पर

भूले भटके रास्तो पर

विरानो में पसरे सन्नाट्टो पर

अक्सर मैं अफ़सोस करता हु

उन्हें दीखता कठोर हु

उन्हें लगता कमजोर हु

नाराजगी पर कुछ कहता नहीं

बस खुद पर अफ़सोस करता हु


"भाभी, आप लोग हमारे हे साथ घर चलिए, उमेद को काम देखने दीजिये आज.", दोपहर को हे रामेश्वर जी चंद्रो देवी के यहाँ से अब रघुबीर सिंह की हवेली चले आये थे. कुछ वक़्त शालिनी बिटिया और पूर्णिमा जी से इधर उधर की बातें करने के बाद उन्होंने अपने विचार प्रकट किये. उमेद भी कुछ दिनों से काम पर उतना ध्यान नहीं दे पाया था और अभी वो फैक्ट्री देखने गया था.

"हाँ भाई साहब, मैं और शालिनी आपके हे साथ चलते है. राजेश्वरी शाम को आ जाएगी उमेद के साथ. वैसे एक बात पूछ सकती हु?", ये कहते हुए पूर्णिमा जी के चेहरे पर अलग से हे भाव आ गए थे जिनमे थोड़ी प्रशंशा और सवाल साफ़ नजर आ रहे थे.

"आप कबसे इजाजत लेने लगी माँ? चाचा जी को देख नहीं रही कैसे झेंप रहे है.", शालिनी जैसे इन देवर भाभी के बीच मजे ले रही थी.

"तुम सचमुच कब बड़ी होगी मुझे तोह पता नहीं शालू बिटिया. सच हे कहता है उमेद की तुम आजतक वही नटखट गुड़िया हो.", रामेश्वर जी इस लाड़ली बिटिया का सर सहलाते हुए मुस्कुरा उठे.

"आज आप वैसे हे लग रहे है जैसे हमेशा अपने भाई के साथ रहते वक़्त दीखते थे.", अचानक रघुबीर सिंह का जीकर होते हे रामेश्वर जी एक पल के लिए कुछ शांत हो गए. पूर्णिमा जी को लगा की ये जीकर नहीं करना था और कुर्सी से खड़े होते रामेश्वर जी को वो क्षमा स्वरुप देखने लगी. शालिनी की भी हालत कुछ अपनी माँ के हे जैसी हो गयी लेकिन जब अपने चाचा को उस बड़ी तस्वीर के पास खड़े पाया तोह वो दोनों भी खामोश हो गयी.

"भाभी, आज सवेरे आपकी बहिन ने हमको सब कास्मो और वचन से मुक्त कर दिया है. अब बस आप भी मेरे भाई की बगल में मेरे बेटे की तस्वीर लगा दे तोह मुझे अंधेरो में उसको याद नहीं करना पड़ेगा.", रामेष्वर जी बात करते हुए अपने अजीज dost-bhai रघुबीर की तस्वीर को ऐसे सेहला रहे थे जैसे वो सचमुच जीवित हो. उनकी बात सुन्न कर जहा शालिनी का चेहरा सफ़ेद पड़ा वही पूर्णिमा जी के आँखों में ख़ुशी की 2 बूँद चालक आयी.

"मैं भी चाहती हु भाई साहब की अपने बेटे को इस हवेली की हर दिवार पर देखु. ये दिल हे जानता है मेरी हालत जो उसके दूर जाने के बाद उसकी तस्वीर से भी मुझे मरहूम कर दिया गया. कौशल्या ने बिलकुल ठीक किया ऐसा करके और मैं भी जानती हु आप कितना अकेला महसूस करते रहे होंगे इतने साल.", साड़ी के पल्लू से अपनी आँखें साफ़ करती हुई पूर्णिमा जी के लिए तोह जैसे आज दिवाली हो गयी थी.

"चाचा जी, आप क्या करने वाले है अब? ये कौनसा वचन था माँ जिस से चाचा जी बंधे थे और आज अज्जू का जीकर कैसे? मेरे भाई का नाम पिछले कितने हे सालो तक नहीं लिया गया तोह फिर आज क्या जरुरत है वो सब दर्द वापिस लाने की? आज तक मेरी भाई की हत्या का पूरा खुलासा नहीं हुआ फिर क्यों उसकी आत्मा को तड़पा रहे हो आप लोग? शीलू भी एक मासूम सा लड़का था लेकिन उसकी भी यादों को जिस्म के साथ जला दिया गया. चाचा जी, मैं आज भी इस घर में आती हु तोह मेरे कानो में उन दोनों की आवाज गूंजती है लेकिन जैसे यहाँ सभी बेहरे है.", शालिनी को जैसे दौरा हे पड़ गया था और बरसो से दर्द में डूबा उसका दिल फट पड़ा. रामेश्वर जी ने करीब आते हे अपनी इस प्यार बेटी को सीने से लगा लिया.

"हमने बहोत कोशिश की थी बेटी उन गुनहगारों को उनके अंजाम तक पहुंचने की. शंकर, उमेद और इन्दर ने इतनी लाशें बिछा दी थी की अगर हम उनको साफ़ न करवाते तोह जो बचा था वो भी न रहता. मधु और तुम्हे कोई कलाई न मिलती रक्षाबंधन पर अगर हम वैसा न करते तोह. तुम्हे तोह इस हवेली में उनकी आवाज सुनाई देती है लेकिन मेरी बदकिस्मती देखो जो वो मुझे पुकारता भी नहीं. जानता हु की एक तुम्ही थी जिसमे अज्जू के प्राण बास्ते थे लेकिन मुझ पर विश्वास करो शालू, अब तुम्हारा ये चाचा अज्जू के साथ साथ रघुबीर सिंह के उस वनवास का भी हिसाब लेगा उन सबसे जिन्होंने मेरे भाई को इतने दुःख और तकलीफे दी.", रामेश्वर जी के स्पर्श में वही बाप वाला प्रेम था जो हर बेटी को शांत कर सकता था लेकिन चेहरे पर आयी कठोरता कुछ और भी कह रही थी.

"नहीं भाई साहब, अज्जू तक ठीक है. उस से पहले की राख हटा कर उस दबी हुई आग को निकलने की जरुरत नहीं है. आपने भी तोह अपना सर्वस्व त्याग दिया था उनके साथ साथ, फिर क्यों आज उसी रास्ते वापिस जाना चाहते है जहा सिर्फ दुःख हे मिलना है?", पूर्णिमा जी भी अब चिंतित थी लेकिन रामेश्वर जी बस शालिनी को सांत्वना देते रहे. कुछ पल बाद जो उन्होंने कहा वो सुन्न कर पूर्णिमा धम्म से बिस्टेर पर बैठ गयी.

"हम कभी वापिस नहीं गए थे भाभी और न हे उस daulat-rutbe की कोई चाहत थी कभी. लेकिन जो कदम हमारे बेटे की तरफ आये थे, उनका सम्बन्ध वही से है जहा आप हमको जाने से मन कर रही है. हमने तोह त्याग दिया था न, फिर क्यों उन लोगो को चैन नहीं मिला सबकुछ उनके हिसाब से होने के बाद भी? क्यों वो हमारे बचो की जान लेने पर आज तक उतारू है? अब ऐसा और नहीं होगा लेकिन निश्चिन्त रहिये, इस बार आपके और कौशल्या के किसी भी बेटे पर आंच नहीं आने दूंगा.", रामेश्वर जी के इतने सवालो का अब पूर्णिमा के पास तोह कोई जवाब न था और ऐसा कहना की वो किसी बेटे को शामिल नहीं करेंगे वो जरूर दुखदायी लगा.

"आप ये सब इस उम्र में और अकेले करने जा रहे है भाईसाहब? कौशल्या इतनी बेवकूफ है?"

"नहीं भाभी. हम अकेले नहीं है और जो हमारे साथ है वो भी हमे कुछ होने नहीं देंगे. एक अपने नाम का क़र्ज़ उतरने में लगा है और दूसरा तोह इतना पागल है की वो हर उस नजर को ख़तम करना चाहता है जो हमारे परिवार की तरफ गलत विचार से उठी हो.", अपने दोनों हे पौतो के नाम लिए बगैर रामेश्वर जी ने उनका बखान कर दिया था.

"मुझे भी कुछ वक़्त पहले हे पता चला है भाई साहब की अर्जुन 3 साल तक इनके करीब रहा. उस बचे को हर बाला से दूर रखना, आप चाहे जो जी आये वो कीजिये.", पूर्णिमा जी को भी परिवार में अर्जुन की एहमियत पता थी.

"वही लड़का उस अतीत के रस्ते चल निकला है भाभी. शायद हम खुली आँखों से भी अंधकार में रहे लेकिन ये लड़का अज्जू की हे तरह इधर उधर भटकता हुआ उसके करीब आ पंहुचा. आज सवेरे हे उमेद द्वारा कौशल्या को माँ कहने पर वो विचलित हो गयी. अर्जुन और अज्जू हे तोह सबकुछ है उसके लिए. चलिए आप सेवक को बोल कर सामान हमारी कार में रखवाइये, हम जरा पीछे की तरफ चक्कर लगा कर आते है.", रामेश्वर जी ने इतना कह कर बहार का रुख किया तोह शालिनी कुछ सोच कर हे उनके साथ चल दी.

"चाचा जी, मैं कुछ कहना चाहती हु.", शालिनी इस गलियारे में उनके साथ चलती हुई अपना चेहरा साफ़ करते हुए बोली तोह उनके चाचा ने हामी भरी.

"यहाँ हवेली पर भैया ने जो लोग रखे है उनमे से कोई एक शायद बहार का है.", इतना सुन्न कर रामेश्वर जी के बढ़ते कदम वही रुक गए. ये बात कहने को बस किसी के बहार वाला होने की थी लेकिन वो समझ चुके थे शालिनी के ऐसा कहने का मतलब.

"तुमने ये उमेद को बताया था शालू?", वो फिर से कुछ सोच कर आगे चलने लगे जहा किंग का बाड़ा था. शालिनी भी वैसे हे साथ रही.

"पहले तोह मेरा उस तरफ ध्यान नहीं गया था चाचा जी लेकिन आज कुछ ऐसा हुआ जिस से कुछ दिनों में हुई कई घटनाये याद आ गयी."

"ऐसा क्या देखा तुमने और ये कौनसी घटनाये हुई है जिन्हे तुमने बताना जरुरी नहीं समझा? काम से काम अपनी माँ या मुझे तोह बता सकती थी."

"वो हादसे जैसे थी सभी चाचा जी. एक बार किंग बाड़े से निकल कर ऋतू के सामने आ गया था, मुझे वो अपनी गलती लगी थी या फिर बाड़े पर लगी कमजोर चिटकनी की. उसके बाद वह ऊपर से वो गुलाबी पत्थर ठीक इधर आ गिरा था 4 दिन पहले. यहाँ विनीता और आइशा बैठी थी और मैं वह सामने रोमियो के साथ थी. मुझे लगा की बारिश के पानी की वजह से पत्थर निकल गया होगा और दोनों लड़कियां किस्मत से बची. परसो फिर से किंग दिन में खुला घूम रहा था और वो आइशा को नुक्सान पंहुचा सकता है क्योंकि ऐसा का उसके साथ मेलजोल नहीं है. लेकिन आज सवेरे स्विमिंग पूल में कुछ गड़बड़ की गयी थी.", रामेश्वर जी सबकुछ बड़ी शान्ति से सुन्न रहे थे. उनके दिमाग में जाने क्या चल रहा था और इसके साथ हे उन्होंने वो भेड़िया (किंग) आजाद कर दिए.

"कैसी गड़बड़ लगी थी तुम्हे वह? और यहाँ हवेली के अंदर सुरक्षाकर्मी कबसे आने लगे?", वो दैत्याकार बड़ा सा भेड़िया कुत्ता ख़ुशी से कभी रामेशर जी के सीने पर अपने पाँव रखता तोह कभी उछाल कूद कर उनका ध्यान अपनी तरफ करने की कोशिश करता. रामेश्वर जी भी मुस्कुराते हुए उसको थपकने लगे लेकिन एक इशारे से उसको साथ चलने का बोल कर वो इस तरफ से हे हवेली के pravesh-dwar की तरफ बढ़ चले.

"वह तेज़ाब का कनस्तर खाली किया गया था चाचा जी लेकिन जिसने भी ऐसा किया था उसको ये नहीं मालूम था के हर सोमवार पूल खाली किया जाता है. और जब भी भैया यहाँ मौजूद नहीं होते तोह 2-3 लोग हवेली के बहार वाले आँगन, पिछले बाड़े की तरफ और छत्त पर निगरानी करते है. इन सभी घटनाओ के वक़्त भैया घर नहीं थे."

"कोई नयी कामवाली भी राखी है क्या घर के अंदर के kaam-kaaj के लिए?"

"नहीं चाचा जी, माँ ऐसा कभी नहीं करेंगी. वो सिर्फ अपनी 3 भरोसे वाली सेविकाएं हे अंदर के काम पर रखे हुए है. लेकिन हम यहाँ बहार क्यों जा रहे hai",Gate के पास हे 4 बंदूकधारी निजी सुरक्षाकर्मी थे जो उमेद के ख़ास थे.

"ड्यूटी पर कितने लोग है सुनील?", रामेश्वर जी ने इस 6 फ़ीट लम्बे तगड़े व्यक्ति से सीधा सवाल किया. घूमी हुई बड़ी बड़ी मूछ और शरीर एकदम तना हुआ था सुनील का, किसी फौजी की तरह.

"रात के पहरेदार मिला कर 9 लोग है सर. आदेश हो तोह सबको हाजिर करू?", आवाज भी शरीर की तरह जोरदार थी सुनील की.

"अभी तत्काल बुलाओ सभी को. हम मिलना चाहते है.", बाकी तीन लोग तोह किंग को ऐसे ख़ामोशी से घात लगा कर बैठे देख थोड़ा हैरान थे. सुनील तुरंत बहार की तरफ बने 3 क्वार्टर्स की तरफ बढ़ गया. इनके रहने की उचित व्यवस्था थी वह और 3 वक़्त का भोजन भी हवेली से बन कर आता था.2-3 मिनट में हे सुनील के साथ 5 लोग और चले आये जो इस वक़्त साधारण से कपड़ो में थे, अलसाये हुए.

"सुनील, तुम 12 साल से हो यहाँ और ये बाकी चेहरे भी हम ाचे से जानते है. अशोक के साथ जो खड़ा है इसका क्या नाम है?", इतना सुनते हे ये व्यक्ति थोड़ा हैरान हुआ लेकिन खुद को शांत रखने की कोशिश के साथ. अशोक नाम के उस व्यक्ति ने बताये गए आदमी को ब्याह से पकड़ कर सामने लेट हुए परिचय दिया.

"गुलजार सिंह नाम है इसका साहब, शेखावाटी से है ये. फ़ौज में सूबेदार था लेकिन 2 साल पहले घरेलु परिस्थितयो की वजह से purn-avkaash ले लिया था इसने. हमारी जानकारी मौखिक है.", अशोक ने बड़े अदब से हर बात रामेश्वर जी के सामने प्रस्तुत की तोह वो ऊपर से निचे तक इस गुलजार सिंह को देखने लगे. कान में राजस्थानी टोपस, hare-laal बिंदी वाले. कलम गाल के कटाव तक आती हुई और गले में काले धागे के बीच बंधा हरे कपडे का ताबीज.

"गुलजार सिंह, किस रेजिमेंट में सेवा दी है तुमने? और आखिरी समय कहा पर तैनात थे.?"

"राजपुताना राइफल्स साहब. बाड़मेर (बारमेर) बॉर्डर पर आखिरी समय तैनात था.", गुलजार सिंह ने भी सटीक उत्तर दिया था लेकिन शायद वो ये नहीं जानता था जिसके सामने वो खड़ा है वो व्यक्ति बाल की खाल निकाल लेता है.

"1996 में तुम बाड़मेर में बॉर्डर पर तैनात थे? किस बटल्लिआं प्रमुख के निचे थे तुम वह बॉर्डर पर? कर्नल हनीफ या ढिल्लों? कलाई पर अल्लाह को ॐ से ढकने वाला व्यक्ति खुद को फौजी बता रहा है? किंग..", इतने तगड़े खुलासे से गुलजार सिंह की रीढ़ में बर्फ की लहर सी दौड़ गयी और अपने मालिक की गरजदार आवाज सुनते हे ये खूंखार भेड़िया अगले हे पल गुलज़ार को दबोचे हुए उसके सीने पर सवार था. एक और आदेश मिलने पर किंग के 2 इंच लम्बे वो पैने दांत उसकी गर्दन में पेवस्त होने वाले थे.

"गलती हो गयी हुजूर, महारे को पैसा की घणनि लोड थी. आते (यहाँ) पूरी ईमानदारी से 20 महीना काम कियो, बिना शिकायत दिया. पत्र थोड़ा टेम पहला..."

"खामोश. जूथ और मज़बूरी में दिन रात का फरक होता है लेकिन तुम जैसे व्यक्ति सिर्फ छल कर सकते है. सुनील, हवेली में प्रवेश कबसे मिलने लगा है?", अब तोह सुनील की फट गयी थी क्योंकि ये कोई मामूली चूक नहीं थी जिस तरह पंडित जी ने इस घुसपैठिये को दबोचा था.

"जी पिछले महीने से सर, वो भी सिर्फ दिन के वक़्त. इस महीने से इसकी रात की ड्यूटी शुरू हुई है तोह मुझे नहीं पता की ये रात को भी अंदर जाता है."

"ये दिन में भी जाता है और रात में भी. अपनी गलती पर पर्दा दाल कर तुम इसको हे सही साबित करोगे बेटे. हम हर रोज की ड्यूटी से एकता कर कभी कभी छोटी मोती बात या घटना को नजरअंदाज कर देते है. सुरक्षाकर्मी से हे चूक हो जाना, छोटी बात नहीं है. बाँध दो इसको और ज़िंदा रखना अभी. यहाँ से जाने के बाद हम शंकर को भेजते है, वो सच उगलवा लेगा अपने तरीके से. चलो किंग.", कहने की हे देरी थी की सुनील ने किंग के hat-te हे बन्दूक का बट भरपूर गुस्से के साथ गुलजार के पेट में मारा. रामेश्वर जी आराम से दोनों को साथ लिए अंदर चल दिए.

"शंकर साहब जब आएंगे तब आएंगे, इस साले के मुँह पे कपडा बाँध के तबियत से धुलाई करो. बहनचोद ने बरसो की वफ़ादारी पर आज साहब के सामने शर्मिंदा करवाया है. गांड टॉड दो इसकी अंदर ले जा कर, बस ज़िंदा रखना नमक हराम को.", सुनील भयंकर गुस्से में था और वैसी हे हालत में गुस्से से फुफकारते हुए 4 लोग इस namak-haraam को ठोकते बजाते हुए उन्ही क्वार्टर्स की तरफ ले चले.

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आज कितने हे दिनों बाद अर्जुन की रानी के पीछे प्रीती बैठी थी, कंधे पर एक बैग लटकाये जो खली था शायद. 4 बजे भी तेज धुप थी जिस वजह से प्रीती के गोर गुलाबी चेहरे पर आकर्षक काला चस्मा था. गली से बहार निकलते हे वो मोटरसाइकिल रुकवा कर अब दोनों तरफ पाँव करके अर्जुन से सत् कर बैठ गयी.

"दिल धक् धक् कर रहा है मेरा और तुम्हे पता भी है आज पहली बार मैं बिना बताये घर से निकली हु. वैसे हम जा कहा रहे है?", प्रीती से ज्यादा जल्दी तोह अर्जुन को थी जैसे कही पहुंचने की.

"तुम बिना बता कर आयी हो और यहाँ आज पहली बार मैं स्टेडियम के लिए निकल रहा हु लेकिन जा नहीं रहा. वैसे कल सवेरे 4 बजे तक दोनों घर खाली हो जाने है. अभी सुना था मैंने इन्दर चाचा को कहते हुए की 4 बजे घर से निकलेंगे तोह 6 बजे तक मंदिर पहुंचेंगे. वापसी में भी शाम के 4-5 तोह बजने हे वाले है.", अर्जुन के ऐसा कहने पर न चाहते हुए भी प्रीती के चेहरे पर शर्म की लाली छ चुकी थी. उसके नाखून अर्जुन के सीने पर थोड़ा थोड़ा दबने लगे तोह अर्जुन भी जैसे हालत जान कर मुस्कुराने लगे.

"तुम सचमुच बहोत गंदे हो. सब लोग इतने नेक काम के लिए जा रहे है और तुम क्या क्या प्लान बनाये बैठे हो.", प्रीती की बस एक हे तोह चाहत थी, अर्जुन. जिसके पास होने भर से वो खुद को सम्पूर्ण पाती थी. दोनों हे इस लगभग खाली सड़क पर बड़ी मार्किट की तरफ बढ़ रहे थे, एक दूसरे के स्पर्श में डूबे. करीब से गुजराती एस्टीम कार में बैठे शंकर जी के चेहरे पर अलग हे ख़ुशी आ गयी थी इस प्रेमी जोड़े को देख कर. वो वापिस अपने घर जा रहे थे और आज पहली बार था की उनके बेटे ने कोई ध्यान तक न दिया सड़क पर चलते किसी वाहन पर.

"वो सभी नेक काम पर जा रहे है लेकिन मैं भी तोह अपनी ज़िन्दगी के उस ख़ास पल को जीने वाला हु, अपनी जान के साथ. वैसे अगर तुम भी जाना चाहती हो तोह मैं रोकूंगा नहीं.", अर्जुन ने थोड़ा सा सर घूमते हुए प्रीती को चिढ़ाते हुए कहा था लेकिन उसने तोह सरेआम उसका गाल हे चूम लिया.

"तुम कितनी भी कोशिश कर लो शर्मा जी, कल शिकार तोह करके रहूंगी तुम्हारा. 4 बजे से 4 बजे तक अगर तुम्हारी हालत बुरी न कर दी तोह मेरा नाम प्रीती अर्जुन शर्मा नहीं.", अर्जुन की हालत अभी से बुरी हो गयी थी, प्रीती की हिम्मत देख कर. और आज पहली बार प्रीती ने अपना जो पूरा नाम लिया था वो सिर्फ एक पत्नी हे ले सकती थी.

"संभल के रहा करो मेरी बिल्ली, यहाँ हर तरफ बहोत से लोग हमको जानते है. वैसे जो तुम ये 4 से 4 का प्लान बना रही हो तोह इतना बता देता हु की अगर तुम वचन तोड़ने वाली हो तोह ये गलत hoga.",Arjun अभी भी दुविधा में था कुछ.

"तुम सचमुच बैलबुद्धि हे हो, जैसा दादी कहती है. तुमने क्या कहा था के हम फर्स्ट टाइम कब करेंगे?"

"जब मैं तुम्हारी ऊँगली में अंगूठी पहनाउंगा और उसमे अभी वक़्त है जान. कल हमारी पहली ऑफिसियल फुल डे डेट है."

"ये रही अंगूठी और वो गुरूजी खुद मुझे तुम्हारी बहु बोल कर गए है इसको देने के साथ. जानते हो ऐसी हे उन्होंने ऋतू दीदी को भी दी थी.", अब अर्जुन की धड़कन बढ़ चुकी थी ये सुन्न कर.

"Kab..kab दी उन्होंने ये अँगूठिया तुम दोनों को? और उस वक़्त वह कौन कौन था.?"

"उन्होंने ये दादी को दी थी, हम दोनों को पहनाने के लिए. और ऐसा जब हुआ तोह वह थे तोह बहोत से लोग लेकिन जब ऋतू दीदी ने अपनी अंगूठी अलका दीदी को पहननी चाही तोह अलका दीदी ने हे उनको पहना दी ये कहते हुए की वो दोनों तोह एक हे हैं. जानते हो ऐसा उन्होंने दादी और अंकल के सामने कहा था. दादी ने भी अलका दीदी को प्यार दिए था इस बात पर. तुम समझ रहे हो न मैं क्या इशारा कर रही हु? और अब कोई वचन नहीं टूट रहा, सुन्न रहे हो?", अब अर्जुन जवाब देने लायक हे कहा बचा था. उन महाराज ने तोह खुद अर्जुन को निर्वस्त्र कर दिया था बिना किसी को बताये.

"बस यही सुन्न न बाकी था अब. दादी और पापा के सामने हे मेरे नाम की अंगूठी ऋतू दीदी और तुम्हारी ऊँगली में. अभी तोह स्कूल ख़तम नहीं हुआ मेरा, कॉलेज तक तोह तुम दोनों मुझे ज़िंदा हे नहीं रहने डौगी. पर दादी ने अगर ऐसा सवाल किया पापा के सामने तोह मैं क्या कहूंगा? मार हे डालेंगे वो तोह जब उन्हें पता लगेगा की बेटे के बीवी उनकी हे बेटी बनेगी. उस से भी बुरी हालत तोह माँ.. प्रीती माँ कहा थी उस वक़्त?", अर्जुन की अब सचमुच हालत बुरी हो रही थी सब समझते हुए. प्रीती जोरो की हंसती उस से कस के लिपट गयी.

"ओह मेरे बुद्धू बालम. दादी को काम न समझना तुम. उन्होंने ऋतू दीदी और तुम्हारी जोड़ी सदा बानी रहे ऐसा आशीर्वाद दिया था ऋतू दीदी को. और कई बार तोह वो ऐसा भी बोल चुकी है के मैं और ऋतू दीदी हमेशा हे एक दूसरे के साथ रहे, यही उनकी इत्छा है. वह अंकल (शंकर जी) भी मौजूद थे. ाचा छोडो ये सब, जो होगा देखा जायेगा. इस सबमे बहोत टाइम पड़ा है अभी और मैं कॉलेज जाने से पहले हर ट्यूसडे बस तुम्हारे साथ रहने वाली हु.", प्रीती की बात भी सही थी की अब बेकार सोच कर दिमाग की हालत क्यों खराब करनी. घर में वैसे हे रहो जैसे हमेशा से हो, जब टाइम आएगा तोह देखा जायेगा.

"सिर्फ ट्यूसडे हे मेरे साथ रहोगी? मैं तोह ज़िंदगीभर का सोचे बैठा हु लेकिन तुम्हे तोह हफ्ते का एक हे दिन चाहिए. ाचा अब तुम जैसा कहोगी वैसा हे करूँगा, एक तरह से वचन पूरा हो हे गया है.", अर्जुन ने पुल्ल के ऊपर मोटरसाइकिल बढ़ाते हुए रफ़्तार और भी धीमी कर दी. अब दोनों को ाची खासी हवा भी लग रही थी और प्रीती ज्यादा हे खुलकर अर्जुन से चिपक गयी. पीछे से आती 2 मोटरसाइकिल इनके करीब आते हे धीमी हो कर बराबर चलने लगी. दोनों पर हे 2-2 आवारा किस्म के 22-23 साल उम्र वाले लड़के थे जो गहराई से प्रीती का अवलोकन कर रहे थे.

"भाई टोटा (माल) तोह तगड़ा ले रहा है अपने साथ लेकिन लगे है के साड़ी म्हणत देहि (बॉडी) पे लगा दी. इतना गरम माल तेरे से ठंडा न होता तोह बता दे, 4-4 मिल के ऐसा ठंडा करेंगे के चाल बदल जेगी. हाहाहा.", एक हे बार में वो भद्दी सी शकल का युवक अपनी सीमा लांघ गया था और उसके साथ वाले भी जोर जोर से हंसने लगे. अर्जुन ने अपने सीने पर रखा प्रीती का हाथ उलटे हाथ में पकड़ कर चूम लिया.

"ये बॉडी ाले लोंदे खस्सी होव है काले, नीरा टशन मरवा ले इनसे लेकिन ऐसी लोंड़िया इनसे न ठंडी hoti.",Ab ये दूसरी मोटरसाइकिल चलता युवक बोलै तोह प्रीती ने थोड़ा सा कमर उचकते हुए अर्जुन का गाल चूम लिया. सड़क पर अभी भी यातायात naam-matra था और Arjun-Preeti इन लड़को की बात पर ध्यान न देते हुए एक दूसरे से मजे ले रहे थे जिस पर वो चारो लड़के कही ज्यादा हे भड़कने लगे.

"अरे बहनचोद या तोह निरि रांड है बे बंसी. साली.... आह्हः..", बस यही उसने प्रीती के बारे में गलत कह कर अपनी शामत बुलवा ली. बात पूरी भी नहीं हुई थी की 20 की रफ़्तार पर चलती वो कद-100 मोटरसाइकिल एक तरफ जा गिरी. दोनों हे लड़को की चीख जोरदार थी. मोटरसाइकिल 8-10 मीटर घिसडने पर जहा रुकी वह अर्जुन पहले हे अपनी रानी को रोक कर जैसे उनका इन्तजार कर रहा था. दूसरी मोटरसाइकिल से वो बाकी दोनों लड़के फुर्ती से अर्जुन की तरफ लपके लेकिन उस से पहले हे अर्जुन ने आगे बढ़ कर एक की जांग पर लात का भरपूर वार कर दिया. दूसरा, जो इन चारो में सबसे तगड़ा था उसकी ब्याह पकड़ कर मरोड़ते हुए अर्जुन बड़े शांत स्वर में बोलै.

"मजाक और हलकी चुहलबाजी से कोई ऐतराज नहीं है दोस्त लेकिन जहा जुबान हद्द से बहार गयी, चेहरा इस पुल्ल से निचे लटका दूंगा. कुछ ज्यादा हे गर्मी है न तोह चलो निकालो.", ऐसा कहते हुए अर्जुन ने उसका हाथ छोड़ कर आगे धकेल दिया. जिनकी मोटरसाइकिल गिरी थी उनकी हालत कुछ बुरी थी और दोनों के हे ghutne-kohniya बुरी तरह जख्मी हो चुके थे. जिसकी जांघ पर लात का प्रहार हुआ था वो भी दर्द से तड़पता हुआ फुटपाथ पर बैठा था.

"घाना (ज्यादा) जोश है न तेरे में तोह ले फेर.. स्टेडियम में डंका बाजे है रुपेश उर्फ़ काले का.", अभी वो 6 फ़ीट का लड़का पूरी फुर्ती से अर्जुन की तरफ लपका हे थे की उसकी कमर को बाजू लेते हुए अर्जुन ने पूरा शरीर हवा में उठा दिया. प्रीती आराम से कड़ी देख रही थी अर्जुन की नौटंकी. वो जानती थी की ये अभी सिर्फ मजे ले रहा है. काला पूरी कोशिश कर रहा था खुद को छुड़ाने की और कोशिश सफल होने से पहले हे वो पक्की सड़क पर पड़ा था.

"स्टेडियम aaj-kal में हे जाने लगे हो शायद. पूछ लेना किसी से भी वह विकास पहलवान के बारे में, उनका छोटा भाई हु और नाम हैं अर्जुन.", अर्जुन ने आँख मारते हुए करीब जा कर उसका गाल थपथपाया तोह काला दर्द में भी हैरत से उसको देखने लगा.

"तू जानबूझ के महारी कुटाई नहीं कर रहा न?", जोर का तोह पता चल हे चूका था काले को और अर्जुन ने जैसे उसको उठाने के बाद आराम से पटका था इस से साफ़ पता चलता था के वो लड़ना हे नहीं चाहता था.

"पिताजी या भाई फ़ौज में होंगे तुम्हारे और उनमे से कोई भी तुम्हे toota-foota देखेगा तोह हम को ठेस भी पहुंचेगी. Maar-pitaai उनके साथ हे ठीक लगती है दोस्त जो इंसान करम हे गलत करता हो. तुम्हारे दोस्त ने मेरी होने वाली बीवी को अपशब्द कहा तोह नतीजा सामने है. चलो चलता हु, जरुरी काम है मुझे.", अर्जुन अभी आगे हे बढ़ा था के पिछली लाइट पर कड़ी वो पुलिस की जिप्सी इधर आ रुकी.

"ऐ क्या तमाशा लगा रखा है यहाँ?", अब काले की भी फट रही थी क्योंकि बात लड़की की थी और प्रीती के कुछ भी बोलते हे उन चारो की डंडा परेड होने वाली थी.

"कुछ नहीं अंकल जी, वो वाली मोटरसाइकिल स्लिप हो गयी थी और इनकी मोटरसाइकिल से टकरा गयी. उठाने में मदद हे कर रहा था मैं तोह.", अर्जुन के ऐसे जवाब पर प्रीती जहाँ हंस रही थी बाकी सभी हैरान थे उस पोलिसवाले के साथ साथ.

"चुटिया समझा है क्या लड़के? तू इसको उठा कर पटक रहा था बहनचोद. आँख है बटन नहीं, मैंने खुद देखा था इधर आते हुए. मोटरसाइकिल एक हे गिरी थी और इसलिए मैं उधर से आया हु."

"एक तोह तमीज से बात करो अंकल जी. वह लड़की कड़ी है और आप गाली दे रहे हो. दूसरी बात न मैंने कोई रिपोर्ट करि है और न ये लोग आपसे कुछ कह रहे है.", अर्जुन की बात पर वो एक सितारा पुलिस वाला कही ज्यादा हे आग बबूला हो गया. ड्राइवर के सामने हे लड़के ने उसको गर्मी दिखाई थी और ऐसा अपमान ड्यूटी के वक़्त कोई बर्दाश्त नहीं करता.

"चल थाने, तेरी हेकड़ी मैं निकालता हु बहिन.."

"भीषभार सिंह, जुबान को लगाम दो. वर्दी में हो इसलिए इज्जत कर रहा हु लेकिन एक बार और गाली दी तोह यहाँ से सीधा निचे फेंक दूंगा.", अर्जुन का चेहरा हे बदलने लगा था और उसने इस पोलिसवाले की कलाई कस के दबा दी थी. बिशम्भर सिंह भी हलके दर्द से पंजो के भर अपनी एड़ी ऊपर करता खड़ा हो गया था.

"छोड़ दो अर्जुन, ये सही तरीका नहीं है. मां जी का हे थाना है न ये वाला.", प्रीती ने पास आते हे अर्जुन का हाथ थाम लिया. लड़के के 'मां का हे थाना' बोलने पर ड्राइवर भी इस तरफ आ खड़ा हुआ और भिशंभर कलाई मसलता हुआ जबड़े पीस रहा था.

"तेजपाल जी तुम्हरे मां है बिटिया?", ड्राइवर के ऐसा कहते हे अर्जुन ने जवाब दिया.

"पहचान नहीं हो तोह हरेक के साथ ऐसा हे सलूक करते हो क्या अंकल? अगर ऐसी हे बात है तोह मेरे दादा जी का नाम पंडित रामेश्वर शर्मा है और भाई का संजीव शर्मा. चलो प्रीती.", ये 2 नाम दोनों हे पुलिसवालो के दिमाग पर बम की तरह गिरे. उन्हें अब यहाँ से जाता हुआ अर्जुन अपनी वर्दी उतरने का फरमान नजर आ रहा था. भिशंभर भी तुरंत उनके पीछे लपका.

"ए बीटा, भूल हो जाती है रे. धुप में ड्यूटी करते हुए दिमाग की हालत क्या रहती है तुम्हे नहीं पता होगी लेकिन जो हुआ उस पर मिटटी दाल दो."

"जानता हु इसलिए तोह जा रहा हु यहाँ से. बस अपनी भाषा आम लोगो पर संयमित रखियेगा. मेरा पापा तोह वर्दी का भी लिहाज नहीं करते अगर उनकी bahu-beti के लिए कोई गलत कहे. बैठो प्रीती.", अब ये व्यक्ति आगे कुछ कहता उस से पहले हे अर्जुन निकल चला यहाँ से. वो प्रीती के साथ अपना ये कीमती समय ऐसे फिजूल के लफड़ो में बर्बाद नहीं करना चाहता था.

"भारी गलती हो गयी बे मांगेलाल आज. तेजपाल जी तक बात गयी तोह वो मेरी ड्यूटी किसी की सिक्योरिटी में हे लगवा देंगे. और डॉ जल्लाद को कुछ पता लगा तोह वो तोह सचमे बावला आदमी है.", भिशंभर की हालत धोबी के कुत्ते जैसी हो गयी थी.

"जनाब, ये लड़का कुछ नहीं कहने वाला. कहना होता तोह पहले कुछ करता और फिर आप भी हॉस्पिटल में होते. यही है वो जिसने स्टेडियम में छोटी पहलवान और उसके साथियों की खाल उतारी थी. आज तक बिस्टेर पर है वो सारे बदमाश. मैं हे गया था शो साहब के साथ दूसरी गाडी ले कर उस दिन, तभी pehchan-ne की कोशिश कर रहा था. आप निश्चिंत रहो बस.", मांगेराम के ऐसा कहते हे थोड़ी नाराजगी से भिशंभर ने उसको देखा.

"बहनन.. पहले नहीं बता सकता था के लफड़ा किसके साथ कर रहे है? और तुम लोग यही बिस्टेर चाहते हो क्या? दफा हो जाओ सालो यहाँ से.", जैसे हे भिशंभर ने उनकी बातें सुनते चारो लड़को को फटकार लगाई वो तुरंत मोटरॉयचलो पर जा चढ़े. ये जिप्सी चालू थी और आगे बढ़ गयी.

"चोखे बचे रे काले आज तोह हम दोनों. वो पहलवान शायद भाभी जे के गइल था इस खातिर ठंडा था. नहीं तोह छोटी की दुर्गति कारन वाला महारी तोह पतंग बना देवे आरर. काल बालाजी के चाल पढ़िए भाई, मंगलवार है तोह bhool-chook करके प्रसाद चढ़ा देवांगे. या मुसीबत किसी तरह ताली है.", ये वही था जिसकी जांघ पर अर्जुन ने चोट की थी. दूसरी मोटरसीले वालो की हालत बुरी थी लेकिन चुपचाप वो भी साथ हे चल रहे थे.

"व सब छोड़ यो सोच की परिवार कितना तगड़ा होगा इस पहलवान का? मां शो, दादा कोई बड़ी टॉप, बापू घाना तगड़ा बढम्याश और एक भाई भी जो ाची पहोच रखता होवेगा. इस तरह के छोरे हे कामयाब है मेघे भाई, महारा तोह सिस्टम हे गांडू है. बाप फौजी तोह बीटा मौजी. इस बार किस तरिया भी डिग्री पूरी करके अगली साल बैंक के फार्म हे भर दियूंगा. ब्याह भी हो हे जेगा नौकरी लागे बाद.", काले की तोह सोच हे बदल गयी थी.

"दिमाग पे असर हो गया तेरे भी लेकिन ाची बात है के सही असर होया."

"वो चाहता तोह रेल बना सके था भाई अपनी साऱ्या की. उसने तोह इस बात का भी बुरा न मान्य था जड़ हम गर्मी लीकडं की बात केहवा थे. वो देसी मजाक समझे थे लेकिन ऐतराज होया जड़ बात भाभी के बारे में इस बॉलीगाँड ने गलत कही. खुद सोच यार मेरे इस खातिर कोणी मारे के मेरे बाप ने दुःख होवेगा जो फ़ौज में है. निगाह कसूती है जो नम्बरप्लाटे भी देख गया वो मारन से पहले. चाल हंसी मजाक अपनी जगह है लेकिन आइंदा यु गाल बकना बंद किसी तीसरे आदमी ने.", काला बिना कुटाई के हे सुधर चूका था और उसका दोस्त इस से खुस था. वही दोनों प्रेमी युगल सुधीर की दूकान पर उपस्थित थे और अर्जुन बात करके हे इधर आया था जिस से उसके पिता से भेंट न होने पाए.

"सुधीर भाई, सब तैयार है न?", अर्जुन ने हाथ मिलाने के बाद गले लगते हुए अपने दोस्त से सिर्फ इतना हे कहा तोह वो भी मुस्कुरा दिया. प्रीती को आज उसने भाभी कह कर बुलाया था सोफे पर बैठने का कहते हुए.

"हाँ जैसा कहा था वैसे हे तैयार करवाए है सभी कपडे. साड़ी तोह तुमने पहले हे पसंद कर दी थी, इंटरलॉक करवा दी है और भाभी की बाकी ड्रेस भी रेडी है. कुछ और भी खरीदना है तोह बताओ, मैं यही मंगवा दूंगा.", सुधीर ने बात करते हुए हे जूस के लिए छोटू को बोल दिया था. प्रीती अपनी उँगलियों को आपस में फंसती हुई शर्म से नजरे झुकाये थी और अर्जुन मुस्कुरा रहा था अपनी दिलरुबा की हालत पर.

"वो लेडीज सेक्शन में जो दीदी हैं उनके साथ भेज दो जरा इन्हे.", अर्जुन ने यहाँ प्रीती का नाम नहीं लिया था और सुधीर को भी एहसास था की अर्जुन के लिए कितनी ख़ास है प्रीती. तुरंत हे एक लड़की इधर हाजिर हो गयी और आते के साथ हे प्रीती को लिए वापिस एक तरफ चली गयी.

"यार, कुछ ख़ास सामान चाहिए था.", अब अर्जुन दोस्त के सामने हे झिझक रहा था और सुधीर ने इस बार मुस्कुराने की गलती नहीं की.

"भरोसा रखो भाई, तुम मेरे लिए अजीज हो और निस्संकोच बात कह सकते हो."

"सेंटेड कैंडल्स, टूलिप्स और बड़े वाइट टॉवेल्स चाहिए. मुझे नहीं पता के ये कहा मिलेंगे.", अर्जुन इतना कह कर थोड़ा चुप हुआ तोह सुधीर ने काउंटर के भीतर से 2-3 मागज़ीने निकाल कर सोफे के सामने वाले टेबल पर रख दिए. दोनों अगल बगल बैठ चुके थे और अर्जुन अपने इस दोस्त को पैन पलट ते हुए देख रहा था और फिर एक जगह वो रुक गया. इस इंग्लिश मागज़ाइने में घर की अंदरूनी साज सज्जा शानदार तरीके से दर्शायी गयी थी. अभी ग्राहकों का समय नहीं था और दूकान पर काम करने वालो की संख्या उचित भी थी अगर 4-5 ग्राहक सँभालने हो तोह सुधीर तबियत से अर्जुन को समय दे रहा था.

"ये बाथरूम और बैडरूम की सजावट देख भाई. डिम लीगत में सेंटेड अगरबत्ती, ये बाथरूम में सिर्फ कैंडल्स और अलग अलग तरह के ऑयल्स. तू आईडिया ले रहा है न अपने ख़ास कमरे का तोह ये चीजे देख ले. मैं अभी छोटू को पर्ची दे कर मंगवा देता हु जो भी चाहिए."

"यार ये बीएड कहा से मिलेगा?", अर्जुन तोह सबकुछ भूल कर वो शाही बीएड देख रहा था जो साधारण वाले से खासा बड़ा था और लकड़ी का नक्काशीदार काम जोरदार था उस पर. दोनों हे तरफ जालीनुमा सिरहाने के बीच लैंप लगे थे.

"ये तोह फर्नीचर मार्किट से तैयार हो जायेगा और इसके साथ के 12 इंच वाले गद्दे उप्पल से मंगवा दूंगा मैं लेकिन फ़िलहाल तू जो चाहता है वो बता."

"हाँ. सेंटेड कैंडल्स, हर्ब्स वाले अलग अलग आयल, फुल लेंथ के 2 पुरे वाइट टॉवेल्स भारी वाले, और जो भी बेहतरीन फ्लावर्स मिले वो. लेकिन फ्लावर्स ले जाने में दिक्कत होगी. मैं कार भी नहीं लाया हु और कल तक खराब न हो जाये.", अर्जुन की चिंता देख अब सुधीर मुस्कुराया.

"इंतजाम करवा देता हु भाई इसका भी. नहीं होने देते कुछ भी खराब और गाडी की भी जरुरत नहीं. भाई मन है तोह बेहिचक बोलै कर जो भी चाहिए हो. वैसे अगर तू भाभी का बर्थडे प्लान कर रहा है तोह केक के साथ कुछ ऐसा भी दे जिसको वो ज़िंदगीभर अपने साथ रख सके.", सुधीर को जैसे पूरी बात पता नहीं थी और ऐसा करना भी जरुरी था. यहाँ बैडरूम और बाथरूम वाला चक्कर इस मामले से अलग रखा गया था.

"बता भाई क्या दू ऐसा जो वो ज़िंदगीभर साथ रख सके अपने.? मुझे तोह ख़ुशी होगी ऐसा उपहार देने में.", अर्जुन की बात पर सुधीर एक पद उठा कर उसपे अर्जुन दवारा बताया सामान लिखने लगा. यहाँ जूस रख कर छोटू एक गिलास प्रीती की तरफ ले जाने लगा तोह सुधीर ने उसको वापिस उनके हे पास आने का कहा.

"देख भाई अब इसका सही जवाब तोह मैं भी क्या हे दू. लाला की औलाद हु न तोह ब्याह पर हे लुगाई मिलेगी मुझे तोह और पिता जी मेरे है चौकस क्योंकि मैं उनकी एक करोड़ की चाबी हु तोह ishq-vishq अपने नसीब में तोह हैं नहीं लेकिन इतना जरूर कहता हु की भाभी के लिए कुछ भी ऐसा ले जो उनके पास हमेशा रहे. आगे तू सोच भाई क्या देना है. कुछ महंगा देना है तोह पैसे मुझसे उधार ले ले, साल का सबसे ख़ास दिन है उनके लिए.", सुधीर की बात अर्जुन समझ रहा था और हाँ में गर्दन हिलता वो एक बार प्रीती की तरफ देखने लगा जो सिर्फ महिलाओ वाले हिस्से में थी, इनसे दूर.

"पैसे तोह ढेर सारे लेके निकला हु भाई घर से. और बात महंगे सस्ते की तोह बिलकुल नहीं है, ख़ास उपहार की है.", अर्जुन एकाएक कहते कहते रुक सा गया. जैसे उसको समझ आ चूका था के उसने प्रीती को क्या उपहार देना है और वो उसके पास पहले से हे मौजूद भी है.

"थैंक्स भाई, अब ऐसा हे उपहार दूंगा जिसको ये हमेशा खुद के पास रख सकती है.", अर्जुन के इस जवाब पर सुधीर ने सवाल तोह न किया लेकिन पीठ थपथपा दी.

"मतलब पहले से हे कुछ ख़ास है तुम्हारे पास?"

"हाँ बिलकुल है और वो शायद इस दिन के लिए हे संभाल कर रखा था मैंने. अब बस जल्दी से सब taam-jhaam निबटवाओ क्योंकि मैं स्टेडियम का हे बोल कर निकला हु.", अर्जुन के ऐसा कहते हे सुधीर ने एक लड़के को मास्टरनी जी से वो कपडे ले कर आने का कहा जो अर्जुन ने तैयार करवाए थे. यहाँ से सबकुछ लेने के बाद ज्यादातर सामान तो उस खाली पिट्ठू बैग में हे आ गया था और कुछ प्रीती ने हाथो में पकड़ लिया. अगले आधे घंटे थोड़ी बहोत और खरीदी भी की गयी थी प्यार भर मस्ती के साथ साथ. दोनों सवा 6 बजे तक अपने अपने घर आ चुके थे. आज सुधीर ने सचमुच अर्जुन के लिए बहोत काम किये थे और बहार से मंगवाए सामान के पैसे न लेते हुए उसने सिर्फ इतना हे कहा था 'एक भाई का दूसरे भाई को उपहार'

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"तुम्हे ये सब इतना आसान लग रहा था? जिस घर ने तुम्हे नमक दिया, िज्जात्त के साथ रहने की जगह और जरुरत से अधिक पैसे भी तुमने बदले में नमक हरामी भी ऐसी करि जिसकी सजा नहीं है मेरे पास.", हवेली के आखिरी कमरे में गुलजार सिंह के दोनों हाथ कुर्सी की हाथी से बंधे थे और पाँव पाए से. शंकर ठीक सामने कुर्सी रखे बैठा बस उसको घूर हे रहा था, जैसे जमीन पर बैठा किंग. एक तरफ सुनील भी नफरत से भरा इस आदमी को देख रहा था, हाथ में शंकर के औजारों से भरी ट्रे लिए.

"माफ़ कार्डो साहब.", गुलजार की गांड फट चुकी थी क्योंकि ये शक्श बस देख कर उसकी आत्मा को दर्द दे रहा था. कुछ करेगा तोह पता नहीं आगे क्या हो. तभी शंकर ने दांत उखाड़ने वाला स्टील का जमूरा और एक ऑपरेशन ब्लेड उठाते हुए गुलजार की हथेली थाम ली.

"जिसको नुक्सान पहुंचने के लिए तुमने किंग का बाड़ा खोला था वो मेरी जान है कमीने. मेरी बेटी को तू मेरे हे वफादार से मरवाना चाहता था. आज ऊपर बैठा यमराज भी देखेगा की शंकर का जिगरा उस से भी सख्त है.", इसके साथ हे गुलजार की गगनभेदी चीख इस बड़े बंद कमरे में गूँज उठी. वो तबतक चीखता रहा जब तक जमूरे से पकड़ी उसकी 2 उंगलिया हाथ से जुड़ा न हो गयी. चेहरे बर्फ सा ठंडा हो चूका था लेकिन वो लगातार चीखता रहा. जमीन पर गिरी दोनों उंगलिया किंग ने पंजे से एक तरफ खिसका दी. सुनील भी खौफजदा था लेकिन हिम्मत करके उसने एक हाथ से पानी का डब्बा बाल्टी से भरते हुए गुलजार के चेहरे पर उड़ेल दिया.

"फिर तू मेरी दूसरी बेटियों को भी मारने की कोशिश करने लगा. कैसे सोच लिया की तू ये सब कर जायेगा और पकड़ में भी नहीं आएगा?", खून बहती उस जगह पर रूई का एक बड़ा टुकड़ा दबा कर शंकर ने उस ब्लेड से गुलजार की जांघ को 3 इंच काट दिया. गुलजार के चीखने से पहले हे किंग ने गुर्राते हुए उसके सीने पर पंजा रख दिया.

"आह्हः..... मालिक रेहम करो रेहम.. ाःह.. सवाल करने की जगह आप मुझे तड़पा तड़पा कर क्यों मार रहे हो? अल्लाह के लिए बक्श दीजिये. मेरी मजबूरी थी ये सब करने की. उनके कब्जे में मेरी बीवी और बेटी है, जिनके साथ वो मेरे सामने हे नापाक हरकते करते है. मुझे यहाँ भेजने वाले भी वही लोग है और इसके बदले उन्होंने मेरे परिवार का ध्यान रखने के साथ साथ बेटी के निकाह का भी वादा किया था. 10 लाख देने के साथ साथ.", गुलजार बिना पूछे हे सब बकने लगा था और शंकर ने अब दूसरा हाथ अपने कब्जे में ले लिया. पहले वाले से अभी भी एक धार खून फर्श पर रिस रहा था.

"किसने लगवाया था तुम्हे काम पर और कहा रहता है वो.?", जांघ से गिरता खून पतलून के साथ साथ उस कुर्सी को भी भिगो रहा था. गुलजार इस हालत में आधा घंटा भी रहता तोह उसका बचना मुश्किल था. जान बचने के लिए उसकी जुबान पर वो नाम आ हे गया.

"बड़े तहसीलदार साहब है वो रमाकांत नाम है उनका. बहोत ताक़तवर और रसूख वाला परिवार है उनका.. आठ.. मुझे बक्श दो साहब, आप जैसा कहोगे मैं वही करूँगा."

"पूरा ब्यौरा दे मुझे इस रमाकांत का नहीं तोह अगली बार जो नस कटेगी उसको जोड़ने वाला डॉक्टर दुनिया में नहीं है."

"रमाकांत हे नाम है उसका साहब लेकिन सब उसको बड़े तहसीलदार कहते है. उनका सम्बन्ध भी जैसलमेर के राजघराने से है. उन्होंने कहा था की इस परिवार की हर लड़की को मारने पर हे वो मेरी बीवी और बेटी को आजाद करेंगे. 20 महीने बाद हे मुझे अंदर कदम रखने को मिले लेकिन सच कहता हु मैं पेशेवर कातिल नै हु."

"मुझे तुमसे पूरी हमदर्दी है और मैं तुम्हारी मजबूरी समझ रहा है. तभी तोह कहा था के मेरे पास कोई सजा नहीं है जिस से तुम्हारे कर्मो का फैंसला हो सके. ये तहसीलदार को मैं तुम्हारे पास जल्द हे भेजूंगा, वादा करता हु. बीवी बेटी की सुरक्षा भी मैं अपने जिम्मे लेता हु. कुछ दिन इन्तजार करना बस, तहसीलदार की आत्मा खुद तुमसे मिलने आएगी. अब तुम्हारी सजा का फैंसला भगवन खुद हे करेंगे, मैं तोह खुद एक पिता हु इसलिए सही मार्ग पर भेजूंगा तुम्हे.", इतने तगड़े प्रवचन को गुलजार जबतक समझता उसकी गार्डन से गोलाकार तेज फ़व्वार्रा निकल पड़ा. मजाल थी शंकर का हाथ जरा भी कंपा हो या नजर हटी हो. गर्दन अलग करके गुलजार की गॉड में रखता वो इस फड़फड़ाते शरीर को 1 मिनट तक निहारता रहा. किंग भी अब एक तरफ हो गया था इस बहते खून से बचने के लिए.

शंकर का ध्यान टूटा औजार जमीन पर बिखरने की तेज आवाज से जो सुनील के बेहोश होने की वजह से हुआ था. वो बेचारा ये दृश्य देख कर खड़ा न रह सका.

"ये घंटा करेंगे सुरक्षा. इन्हे समझना चाहिए की मेरा काम कितना मुश्किल है और दुःख मुझे भी होता है. किंग, बीटा तू ऐसे हे साफ़ सुथरा रहा कर. अपनी बहिन (ऋतू) के खरोच भी मारी तोह तेरी गांड का भी यही हाल करूँगा जो इसका करा है.", शंकर ऐसे पल में भी मसखरी करते हुए किंग को लिए बहार निकल आया.

"ोये, अंदर से गन्दगी साफ़ करो और जो बेहोश हुआ है उसको कुछ दिन आराम हे करने देना बस. जिसका दिल कमजोर हो वो अपनी माँ न छुड़ाए अंदर जा कर.", शंकर ने थोड़ी हे दूर खड़े 4 सुरक्षाकर्मियों को तेज आवाज में निर्देश देते हुए गलियारे में लगी टूटी पर हाथ धोते हुए कहा तोह वो लोग फुर्ती से कमरे तक आये और अंदर का हाल देख उचित सामान लेने वापिस एक तरफ निकल गए. उन्हें मालूम था की इस लाश को कहा ठिकाने लगाना है. उमेद की काली मेरसेदेज़ भी इधर खुले आँगन में चली आयी थी अब.

"डॉक्टर ये कपड़ो पे खून कैसा लगा है?", उमेद की बात सुन्न कर शंकर ने अपनी सफ़ीद कमीज को वही खोल दिया.

"तेरे एक सिक्योरिटी वाले का ऑपरेशन किया है अभी. देख ले वो आखिरी कमरे में है और बाकी इसको पकड़ा पापा ने था शालिनी के संदेह करने पर. वैसे इसको यहाँ भेजने वाला शक्श सारंग का कोई तहसीलदार रिश्तेदार था."

"रमाकांत?", उमेद बात सुनते हे गुस्से से लाल हो उठा. ऐसे वक़्त पर एक यही इंसान था जो होश नहीं खोता था लेकिन तहसीलदार सुनते हे जैसे शरीर का सारा खून उसकी आँखों में उतर आया.

"शांत रह भाई शांत रह. मैं देख लूंगा ये जो भी है तहसीलदार है, फिर बनता हु मैं इसकी जमीन के कागज़."

"भोले, जानता है ये कौन तहसीलदार है? अगले शहर वाला वो तहसीलदार जिसकी बेटी शालिनी के साथ पढ़ती थी और उसकी अजीज सहेली थी. यहाँ भी सारंग शामिल हो हे गया है. ये मामला जल्द निबटना होगा भोले."

"ठण्ड रख बे गज्जू छज्जू. बाप के पास है ये मामला और उन्होंने हे आर्डर दिया था मुझे इसका हिसाब करने का. चल भाभी को लेके मेरे साथ चल फिर उनसे हे बात करते है इस बारे में. उनके केस को वही लीड करते है और बात अब सारंग से जुडी है तोह अभी हम कुछ नहीं बोलेंगे.", शंकर ने अपने भाई का सर सहलाते हुए उसको ठंडा किया तोह उमेद ने आँखें बंद करते हुए गहरी सांस ली.

"हाँ भाई, सोच समझ कर हे करना पड़ेगा. ये साला तहसीलदार क्यों माँ छुड़वा रहा है अपनी वो भी इतने सालो के बाद? कोई बात नहीं अगर उसकी यही इत्छा है तोह हमको भी वो शिकार करने का तरीका देखने को जल्द हे मिलेगा जो पापा और चाचा करते थे. तू मेरे बुर्शट पहन ले अंदर चल कर, फिर चाय पी कर निकलते है, 7 से ऊपर टाइम हो रहा.", उमेद ऐसे हे शंकर को साथ लिए अपने कक्ष की तरफ बढ़ा तोह किंग भी उनके पीछे हो लिया. बाकी वो चारो लोग मुँह पे कपडा रखे पूरी लगन से सब साफ़ सफाई कर रहे थे. ये लाश भी खेत की जमीन में यूरिया दाल कर दफ़न करनी थी.
 
अगले अपडेट के बाद 3-4 दिन एक हे अपडेट में खपने वाले है दोस्तों. सभी जानते है के शादी ब्याह में कैसे तैयारियां शुरू होती है. 15 को पंजाब से वो 4 अप्सराये टपकेंगी तोह फिर कहानी में मजा आएगा. इस बीच एक अपडेट शंकर शर्मा पर भी रहने वाला है जिसकी लगाम काफी समय बाद अब उनके पिता के हाथ है. शंकर शर्मा की एक वास्तविकता ये भी है की बनाये और समझाए प्लान पर वो अचूक काम कर सकते है.

कोशिश तोह फ़िलहाल हर रोज अपडेट देने की रहेगी लेकिन हो सकता है एक आध दिन सी सावेर हो जाये.
 
aka3829 भाई गज़ब सवाल है रिव्यु के साथ लेकिन पिछले अपडेट पर कुछ कहा नहीं आपने
 
अपडेट 153 (ा)

अंतर्मनन की झलक


विन्नी बहार गली में हे 'ह' को घुमा रही थी ऋचा और ऋतू के साथ जिस वक़्त उमेद और शंकर एक हे कार से यहाँ घर पहुंचे. समय ratri-bhoj का हो हे चूका था और ये लड़कियां भी अब घर में दाखिल होने हे लगी थी. राजेश्वरी जी ने अपनी बिटिया को इतना मसरूफ देख अपने पति की नजर उस तरफ करवाई तोह उमेद भी मुस्कुरा दिया.

"मेरी लाडो तोह जैसे यहाँ आ कर अपने बाप को भूल हे गयी है. कैसी हो ऋचा बिटिया?", अब वो पिल्ला ऋतू के हाथ में था और विन्नी अपने पिता के गले लगने की बजाये माँ से मिलकर शंकर जी से एक तरफ गले लगती हुई बोली.

"आपको बड़ी परवाह होती है मेरी पापा? ये तोह चाचा जी है जिनकी वजह से मुझे यहाँ पारी की तरह ट्रीट किया जाता है, हाँ नहीं तोह.", विन्नी के ऐसी चुहल देख सभी हंसने लगे और फिर वो अपने पिता के सीने से भी जा लगी. इसके बाद जो हुआ उसको देख कर एक पल तोह शंकर जी भी सन्न रह गए. ऋतू ने ऋचा को अपने पिता की तरफ धकेल दिया और वो न चाहते हुए भी उनके सीने से जा लगी.

"दीदी, आप भी मिल लिया करो अपने चाचा जी से. ये हर बेटी को बराबर लाड करते है.", ऋतू की बात सुन्न कर जहा राजेश्वरी जी ने उसका कान खींचते हुए अपने करीब किया वही शंकर जी ने स्नेह से ऋचा के माथे को चूम कर सर सेहला दिया.

"ये शैतान की नानी है देवर जी. अब समझी मैं क्यों विन्नी इसके इतना साथ रहती है. वैसे सबसे प्यारी भी यही है और बात गलत भी नहीं कही. ऋचा अपनों के साथ रहना ाची बात है बेटी.", ऋचा जब अलग हुई तोह वह थोड़ा झेंप रही थी लेकिन ऋतू ने उसको पिल्ला पकड़ते हुए अपने पिता की ब्याह थाम ली.

"हाँ तोह गलत तोह मैं कभी कहती हे नहीं चची. ये ऋचा दीदी माँ के साथ तोह घंटो बातें करती रहती है लेकिन पापा से जाने क्यों हिचकती है? विन्नी दीदी भी तोह हक़ जमती है न, फिर इन्हे भी वही करना चाहिए. क्यों गज्जू चाचा सही बोली न मैं?", ऋतू ने मजे लेते हुए उमेद को गज्जू कहा तोह वो भी हँसते हुए एक तरफ से इस शैतान को अपने साथ चिपकते हुए बोले.

"शैतान की नानी नहीं param-chandaal है ये आफत की पुड़िया. हाँ बेटी, प्रेम का कोई स्वरुप तोह है नहीं और जाहिर करना लाजमी है. ऋचा जहा सब अपने हो वह संकोच नहीं करना. चलो अब यही खड़े रहने का इरादा है?", उमेद के दोनों तरफ विन्नी और ऋतू लगी हुई थी. शंकर जी आगे चले तोह अब ऋचा उनके हे साथ चल पड़ी. राजेश्वरी जी से उनका बैग ऋतू ने हे पकड़ लिया.

"चची, आज आप माँ के पास सोने वाली है. वैसे भी दादी का हुकुम है के सभी लोग 10 से पहले हे सो जाने चाहिए.", ऋतू उन्हें सब बता रही थी और वो भी मुस्कुराती हुई सुन्न रही थी. एक अलग सी कशिश थी राजेश्वरी जी के चेहरे में. इतने बरस ब्याह के होने पर भी चाल एक युवती सी चपल और शरीर भी उतना सांचे में ढला. एक बेटी की माँ होने के बावजूद वो छरहरी काया की स्वामिनी थी, इसका राज शायद सिर्फ उन्ही को पता हो.

"वैसे तुम्हारे छोटे भाई नजर नहीं आ रहे.", राजेश्वरी जी ने जिसका जीकर किया था उसके बारे में सोचते हे विन्नी को अपनी छोटी बहिन पर हे गुस्सा आने लगा था. आइशा की जिद्द ने कल उसको अर्जुन से मिलने तक न दिया.

"हो गए माँ यही कही वो. सभी उसके हे पीछे पड़े रहते है. चलिए आप रेखा चची के कमरे से कपडे बदल कर आ जाइये, मैं खाना लगाती हु आप लोगो को.", विन्नी ने नलके पर हे हाथ धोने के बाद रसोई का रुख किया जहा रेखा जी और ललिता जी चूल्हे पर काम कर रही थी और Rupali-Aarti बहार बैठे लोगो को परोस रही थी. दादा दादी जी का भोजन हो चूका था और वो अपने कमरे में जा चुके थे.

"ऋचा, दादी बुला रही है.", माधुरी दीदी ने ये बात कौशल्या जी के कमरे से निकलते हे सामने कड़ी ऋचा को कही तोह खाने की मेज पर बैठे शंकर जी को हलकी घबराहट होने लगी. वो अपने भाइयों के बीच से अब उठ भी नहीं सकते थे और माँ से बात करना उनके वश में था भी नहीं. ऋचा भी बिना समय गंवाए उधर चल दी. कोई 5 मिनट बाद वो मुस्कुराती हुई बहार निकली, हाथ में एक पैकेट लिए लेकिन इन 5 मिनट में शंकर जी का कंठ सूख चूका था.

"ये क्या है?", ऋतू ने आते के साथ वो पैकेट पकड़ लिया.

"कल मंदिर में पहन ने के लिए ये सलवार कमीज दिया है दादी ने. उन्होंने अर्जुन को भेजा था थोड़ी देर पहले मार्किट, तोह वो ले आया.", ऋचा ने पूरी बात बताई तोह ऋतू जहा खुश हुई वही शंकर जी हैरान थे.

"हाँ, मंदिर में ख़ास पूजा हो तोह अपनी दादी नए वस्त्र सभी बचो को देती है. अब देखना अलका नाराज होने वाली है क्योंकि बस उसका हे सूट रह गया. बहिन जी को कारीगरी करवानी थी न अलग से तोह ले लो मजे.", ऋतू ने थोड़ी दूर कड़ी अलका को चिढ़ाते हुए कहा तोह वो पाँव पटकती हुई अपनी दादी की तरफ चल दी.

"हाहाहा.. ये तुमने अलग आग लगा दी. तुम कल दादी के साथ सभी के कपडे हे लेने गयी थी न? तोह अलका का सूट क्यों नहीं मिला?"

"मैडम ने बाजू पर घुंगरू लगवाने थे और पीठ पर डोरी. मैंने जानबूझ कर टेलर से नार्मल हे बनवा दिया तोह आज सवेरे खुद हे ले गयी थी जब आपके सूट का माप देना था. आपका तोह आ गया लेकिन मुझे नहीं लगता होगा अलका को उसका सूट मिलेगा.", ऋतू इतना बोल कर खुद भी दादा दादी की तरफ चल दी जहा अलका सचमुच रामेश्वर जी की बगल में बैठी नाराजगी दिखा रही थी.

"चलो फिर हम अभी ले चलते है अपनी लक्ष्मी को. मार्किट से जो सूट पसंद हो वो दिलवा देंगे.", पंडित जी अपनी लाड़ली को पुचकार रहे थे और दादी की गॉड में पसरा अर्जुन हंस रहा था.

"वही सूट चाहिए तोह चाहिए और ये सब न इस ऋतू की बची ने किया है, मैं जानती हु. कल हे टेलर को बता देती तोह आज मेरा भी सूट तैयार मिलता लेकिन इसने नहीं बताया.", अब ऋतू की भी हंसी निकल गयी अलका का मायूस चेहरा देख कर और उसके साथ हे दादी भी हंसने लगी.

"तेरा सूट तोह ये पागल कल हे ले आयी थी तैयार करवा के. इसका salwar-kameej तू आज सवेरे दर्जन (टेलर) को पकड़ा आयी क्योंकि उस पर भी तेरी पसंद का काम करवाना था तेरी लाड़ली ने. अब बोल जरा?", जैसे हे कौशल्या जी ने सच बताया अलका झटके से कड़ी हुई और रीता का कान पकड़ने के बाद अपने साथ लगा लिया.

"दादी ये पहले नई बक सकती थी.? मैं मेरे जैसा हे बनवाती इसका सूट. अब कल ये क्या पहनेगी?", अलका को अब ऋतू की चिंता हो गयी और रामेश्वर जी उनका प्यार देख मुस्कुरा पड़े.

"एक बात क्लियर कर दे बीटा लक्ष्मी, तुझे तेरा सूट चाहिए या ऋतू का?"

"दादा जी, इसका नहीं होगा तोह भी मैं नहीं जाने वाली. कह देती हु पहले हे.", अलका के तेवर देख अब कही अर्जुन बोलै.

"संजीव भैया वही है दीदी, थोड़ा सा काम बाकी था और भैया के साथ लकी भैया भी थे तोह वो आते हुए लेते आएंगे ऋतू दीदी का सूट. मैं तोह आपके मजे ले रहा था दादी के साथ मिल kar.",Arjun तुरंत वह से उठ कर दौड़ गया. पीछे कौशल्या जी बड़बड़ाती रही उनको अलका के सामने फंसने के लिए.

"देख लो दादा जी आप अपनी मरस को. ये और इनका लाडला और इस ऋतू को कैसे भूल सकती हु. ये तीनो मिल कर मेरी टांग खींचते रहे इतनी देर से.", अलका और भी कुछ कहती लेकिन उधर से कोमल दीदी की आवाज सुन्न कर ऋतू को साथ पकडे बहार चल दी.

"कौशल्या, ये है उचित जीवन. हमारा भी कभी इतना स्वतंत्र और उन्मुक्त बचपन नहीं रहा लेकिन ख़ुशी है के तुमने अपनी छाया टेल इन सबको बड़ा किया. आजकल तोह एक हे पिता के 2 बचे साथ नहीं रहते और यहाँ टमाटर और गुलाब एक पौधे पर लगे है.", ये बात अपने आप हे उनके मुख से निकल गयी. ऐसा हे तोह अर्जुन ने कहा था एक बार बगीचे में. स्वतः हे वो मुस्कुरा उठे.

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आज घर में जल्द हे ख़ामोशी पसर गयी थी. बैठक में उमेद, शंकर और इन्दर एक साथ बिस्टेर बिछा कर लेट गए थे. संजीव आज अपने दादा के साथ उनके कमरे में सोया था और कौशल्या जी मेहमान कमरे में पूर्णिमा जी के साथ. बाकी सभी अपनी निर्धारित जगह थे सिवाए शालिनी और अनामिका के. छोटे बचे के जागने से बाकी सबको परेशानी न हो इसलिए अनामिका अर्जुन के बगल वाले कमरे में तारा के बिस्टेर पर सोई थी और शालिनी भी मुन्ने के लगाव में अपनी छोटी भाभी के साथ लेट गयी.

आइशा आज विन्नी के पास न रह कर Ritu-Alka के बिस्टेर पर थी और अंदर वाले कमरे में एक हे बिस्टेर पर कोमल, विन्नी और ऋचा. सभी दिन भर की भागदौड़ और कल जल्दी उठने के चक्कर में साढ़े 9 बजे हे नींद के आगोश में जा चुकी थी. पहली बार था की रसोईघर में रेखा जी को एक तरफ करते हुए सारा बर्तन और सफाई का जिम्मा अर्जुन ने ले लिया था.

"रेखा दीदी, बीटा हो तोह ऐसा हो जो माँ को काम हे नहीं करने दे रहा.", एक लम्बा गाउन पहने राजेश्वरी जी रसोई में रेखा जी को बुलाने आयी तोह अर्जुन अबतक काम लगभग निबटा चूका था.

"चची जी, बात ऐसी है की माँ तोह हटेगी नहीं और फिर कल वह आप लोगो को ढेरो काम भी होंगे और सफर भी जल्दी शुरू करना है. कृपया इन्हे अपने साथ ले जाइये, यहाँ सब हो चूका है.", अर्जुन ने कांच के बर्तन सूखा कर एक तरफ रखने के बाद चूल्हे पर माप कर 4 गिलास दूध गरम करने के लिए पतीला रखते हुए कहा.

"अब ये तोह मैं कर देती हु बीटा.", रेखा जी समझ चुकी थी की वो ये दूध क्यों गरम कर रहा है.

"देखो रेखा, जब बीटा इतने प्यार से खुद हाथ बनता रहा हो तोह तुम्हे भी स्वीकार करना चाइये. चलो अब हमे सोना चाहिए, 5 घंटे की नींद मिल जाये तोह पूरा दिन परेशानी नहीं होगी. गूडनिघत अर्जुन.", जाने से पहले अर्जुन के सर पर हाथ फेरती राजेशवरी जी ने स्नेहवश उसका गाल भी चूम लिया था. रेखा ये देख कर मुस्कुराई और फिर ठीक वैसे हे अर्जुन को दुलारने के बाद राजेश्वरी जी के साथ अपने कमरे में चली गयी.

दूध सही तापमान तक गरम करने के बाद अर्जुन ट्रे में 3 गिलास रख कर बैठक की तरफ बढ़ गया.

"पापा, दूध ले लीजिये.", तीनो व्यक्ति अभी लेते हुए हलकी आवाज में बतला हे रहे थे की इस आवाज से उठ कर बैठ गए. ट्रे लिए अर्जुन को देख शंकर जी ने गिलास उठाने के साथ हे 'थैंक यू बीटा' कहा और बाकी दोनों ने भी गिलास ले लिए. कटोरी में रखे 3 कलाकंद के टुकड़ो को देख उमेद ने भी ख़ुशी जाहिर की.

"सच में यार तू है जो दिल की बात सुनता है. अभी मैं तेरे बापू को बोल हे रहा था के दूध के साथ मीठा मिल जाये लेकिन इसका जवाब था के आज मीठा तोह क्या दूध भी नसीब नहीं होने वाला."

"मुझे पता है चाचा जी की आप तीनो हे सोने से पहले मीठा दूध लेते हो. कलाकंद के लिए दादी ने कहा था मुझे. और कुछ चाहिए हो तोह बात दीजिये.", अर्जुन जाने से पहले पूछने लगा तोह नरिंदर जी ने मसखरी करते हुए कहा.

"भाई तू जा कर सो जा नहीं तोह शंकर ने खीर बनाने के लिए बोल देना है. जबसे पता लगा है के कल वह खीर भी बनेगी, तेरा बापू सोने हे नहीं दे रहा.", शंकर जी भी हँसते हुए अपनी भाई को देखने लगे लेकिन एक आवाज से सभी चुप.

"उल्लू दे पत्तो, आप वि नई सोना तेह जेहड़े सुट्टे पाए ने ोहना दी वि नींदार ख़राब कर देनी. हुन्न किस्से दे खनगन (खांसने) दी वि वाज होये, मैं लम्बा पा देना.", ये रामेशर जी थे जो इनकी कछार पचार से नींद में डांटने लगे.

"निकल बीटा तू, थानेदार उठ गया तोह खीर छोड़ हमारी कलाकंद बना देगा.", नरिंदर अब फुसफुसा के बोले तोह अर्जुन हँसता हुआ बहार वाली तरफ से निकल लिया. दरवज्जे पर टाला लगाने के बाद वापिस रसोई से वो एक बड़ा गिलास दूध का लिए वो अपने कमरे की तरफ चल दिया. यहाँ दोनों हे दरवाजे वैसे हे बंद थे जिन्हे खोलने पर अर्जुन को बिस्टेर पर अधलेटी अनामिका चाची दिखी. वो अपने बेटे को थापक रही थी जो शायद अभी सोया था.

"चची ये दूध पी लीजिये, ऐसा दादी का आदेश है. निकेतन सो गया?", अर्जुन की बात सुन्न कर अनामिका की तन्द्रा भांग हुई तोह वो थोड़ा शरमाते हुए अपना ब्लाउज सही करने लगी. अर्जुन ने नजर हटा ली थी आपस में मिलने से पहले.

"तुम कहते हो तोह जगा देती हु तुम्हारे भाई को. लेकिन फिर साड़ी रात तुम्ही संभालना, मुझे परेशां किये बिना. वैसे बड़ी माँ ने आदेश क्यों दिया था दूध के लिए?", आज दिन में अर्जुन के साथ 2 घंटे समय बिताया था अनामिका ने और पहली बार वो किसी पुरुष के साथ इतना सहज हुई थी. लेकिन अभी जो सवाल किया था उस पर अर्जुन मुस्कुराने लगा तोह वो हैरानी से देखने लगी.

"ये भी तोह दूध हे पीटा है न चची. रात को भूख लगी तोह आपका दूध पीना हे काम आएगा.", अर्जुन इतना कह कर जाने लगा तोह लज्ज़ती हुई अनामिका ने धीमी आवाज में कहा.

"बदमाश हो तुम बस लगते नहीं. वैसे 10 मिनट बैठ जाओ, जितने दूध ख़तम करती हु. दिन में 3 घंटे सो चुकी हु खाने के बाद तोह अब नींद नहीं आ रही.", अर्जुन भी ये सुन्न कर बिस्टेर के दूसरी तरफ बैठ गया. और उधर से बाथरूम का दरवाजा खुला तोह शालिनी की छरहरी काया एक काले रंग के बिना ब्याह वाले गाउन में लिपटी प्रकट हुई. बाथरूम की लाइट बुझाने से पहले हे काम रौशनी में बैठे अर्जुन को अंदर का हर कटाव दिख गया था. सकपकाते हुए उसने नजरे बिस्टेर पर गड़ाई तोह अनामिका मंद मंद मुस्कुराने लगी. शालिनी को इसका भान न था के अभी उसने कहा बिजली गिरे है.

"ओहो, तोह बड़े मुन्ना अभी जाग रहे है? कुछ ज्यादा हे व्यस्त रहते हो अर्जुन जो अपनी बुआ से 2 घडी बात भी नहीं कर सकते.", नहाने के बाद जो ये तजा महक शालिनी के जिस्म से उठ रही थी उसने एक पल के लिए तोह अर्जुन का दिमाग हिला दिया था. गहरी सांस लेते हुए खुद को शांत करता वो मुस्कुराया.

"नहीं बुआ ऐसा तोह बिलकुल भी नहीं है. मैं तोह उम्मीद कर रहा था के आप यहाँ फ़ोन करेंगी और मैं आपको लेने के लिए हवेली आऊंगा. और आप आयी भी तोह खुद हे देख लीजिये पिछले 5 घंटो से हमने कितनी बार एक दूसरे को देखा होगा? मुश्किल से 2 बार क्योंकि मैं बहार अंदर के काम कर रहा था और जब भी फ्री हुआ आप किसी न किसी के साथ थी.", अर्जुन के इतना स्पष्ट कहने पर शालिनी बुआ एकटक उसके चेहरे को देखते रही. अचानक हे उन्हें दिन वाली बात याद आयी. अर्जुन का उनके भाई अज्जू के कातिलों का ढूंढ़ने का प्रयास.

"अब जरूर फ़ोन करुँगी मैं तुम्हे अर्जुन. और तुम्हे कोई शिकायत भी नहीं होने दूंगी व्यस्तता को ले कर.", शालिनी और अर्जुन की वार्तालाप के बीच अनामिका दूध ख़तम करके बिस्टेर पर लेट गयी. अर्जुन का भी ध्यान इधर गया तोह वो उठ खड़ा हुआ.

"इन्तजार रहेगा बुआ और फिलहाल तोह आप आराम कीजिये. चची जी और आपने तोह जल्दी उठना है.", अर्जुन उठ कर जाने लगा तोह शालिनी ने धीमी आवाज में कहा.

"तुम भी तोह हमारे साथ हे जा रहे हो न? तुम्हे भी सोना चाहिए."

"मेरे भगवन और धरम अलग है बुआ. पैदा हे मंदिर में हुआ हु तोह फिर बहार कही भटक कर मुझे क्या मिलेगा. किसी चीज की आवश्यकता हो तोह आवाज दे लीजियेगा, मैं इस कमरे में हे हु और कुछ वक़्त तक पढूंगा.", अर्जुन को उसके कमरे में जाता देख शालिनी विचारो में डूब सी गयी.

'शालू तुम मेरा दिल, माँ मेरी भगवन और पापा की प्रतिष्ठा मेरा धरम. तुम्हे अपने पास पाटा हु तोह लगता है मेरी दुनिया हे पूरी हो गयी. तुम दूर होती हो तोह बहार भटकना पड़ता है.', अज्जू द्वारा कही ये बात स्वतः हे जेहन में आ गयी शालिनी के. ये अर्जुन सूरत से वैसा भले न हो लेकिन सीरत वही है. आँखें हलकी नम्म हुई तोह ख़ामोशी से लेट गयी.

"दीदी, आप सो गयी क्या?", अनामिका ने धीमी आवाज में शालिनी को पुकारा तोह वो अपने खयालो से बहार निकली. मैं शांत था उस नाम को बस याद भर करने से. अनामिका से भी बात करने की इत्छा थी शालिनी की इसलिए जवाब दिया.

"नहीं अनामिका, नींद नहीं आ रही दिन में सोने की वजह से. तुम्हारा बीटा कब उठेगा?", शालिनी का जवाब सुन्न कर अनामिका थोड़ा करीब हुई तोह चूड़ियां खनकने की आवाज शालिनी को ठीक नहीं लगी.

"रात में तोह ये ज्यादातर सोया हे रहता है दीदी. उठेगा भी तोह दूध पीने के लिए. नींद मुझे भी नहीं आ रही."

"पहले तोह रात को सोने से पहले ये चूड़ियां उतारने के आदत दाल लो और साथ हे साड़ी की जगह ढीला गाउन पहना करो जिस से तुम्हारा शरीर भी सुकून से रहे और बचे को दूध पिलाने में भी आसानी हो. बाथरूम में टेंगा है एक गाउन, तारा का हे होगा पहन लो. और stann-paan कराती हो तोह ब्रा से भी कुछ समय दुरी रखो.", अनामिका इतने खुले अल्फाज सुन्न कर थोड़ा लाल हो गयी थी शर्म से लेकिन बात सही थी इस बड़ी ननद की.

"जी गाउन तोह हैं मेरे पास, आज हे अर्जुन दिलवा कर लाया था. वो भी कह रहा था की मुझे बचे के साथ थोड़ा सहज हो कर सोना चाहिए. लेकिन उधर वाले घर हमारी सास और इन्हे (विनोद) को पसंद नहीं है."

"ठीक कहा है अर्जुन ने और जाओ कर लो चेंज. जितने यहाँ हो उतने तोह आराम से रहो बाकी मैं चची को बोल दूंगी, वो अपने आप छोटी चची और विनोद को समझा देंगी.", अनामिका ने सावधानी से निचे रखे बैग में से एक नया सूती गाउन निकला और 'ठीक है' बोल कर बाथरूम चली गयी.

'इस अर्जुन की तोह हरकते भी भाई जैसी हे है. छोटी चची न हुई भाभी हो गयी इसकी जो nighty-gown दिलवा रहा है. एक तरह से सही भी है जब अनामिका के बेटे और अर्जुन में फरक 18 साल का है तोह देवर जैसा हे हुआ.', शालिनी इन विचारो में कुछ देर खुद से बातें करती रही और 5 मिनट बाद अनामिका इस gulabi-safed ढीले गाउन में बिस्टेर तक आयी तोह जैसे खुद को छिपाने की कोशिश कर रही थी.

"अजीब लगता है दीदी."

"कमरे में कोई मेला तोह नहीं लगा है जो इतना शर्मा रही हो अनामिका. वैसे भी पूरा शरीर ढाका है तुम्हारा, गले से एड़ी तक. कम्फर्टेबले रहो और अपने जिस्म को सांस लेने दो.", शालिनी ने एक निगाह अनामिका पर की तोह मुस्कुरा उठी. शर्माती सकुचाती हुई ये महिला सचमुच बड़ी भोली और प्यारी थी.

"लग तोह खुला खुला रहा है दीदी लेकिन कोई देख न ले सवेरे. वैसे खाल पर नरम है ये कपडा. जानती हो अर्जुन को बहोत पहचान है हर तरह के कपडे की और वो तोह saaj-sajja पर भी जानकारी राखत है.", अनामिका बताते हुए हे बिस्टेर पर पसर गयी.

"उसकी आधा दर्जन बहने इस घर में, उस से भी ज्यादा होंगी. जब उनके बीच वो अकेला और सबसे छोटा रहेगा तोह ये सब तोह सीखेगा हे. हाँ अगर अंदरूनी वस्त्रो की बात करे तोह कान सेक देना.", शालिनी ने ये बात थोड़ी मस्ती में कही थी लेकिन अनामिका झिझके हुए बोल हे गयी.

"हमको सच में अर्जुन को मारना चाहिए था क्या दीदी ऐसी बात पर? वो दिलवा लाया है कॉटन की ढीली अंगिया (ब्रा), जिस से बाबू (निकेतन) को परेशानी न हो और सीना भी न जकड़े."

"क्या? ये तुम्हे ब्रा भी दिलवा लाया? तुमने कहा था या इसने हे ले कर दिए.?", शालिनी भी चौंक उठी थी लेकिन आवाज बुलंद नहीं की.

"नहीं ये दूकान में अकेले गया और वह लड़की को कुछ बोल कर फिर मुझे अंदर भेज दिया. जब हमने अपने साइज का ले लिया तोह अर्जुन ने वही कहा जो अभी हम आपको बताये. उसने न देखा और न कुछ पुछा.", अनामिका के ऐसे पूरी बात कहने पर शालिनी ने दिमाग शांत किया और फिर अपनी हे सोच पर मुस्कुराने लगी. वक़्त बदल रहा है और ये जानकारी होना कोई बड़ी बात भी न थी.

"तोह तुम दिखाना चाहती थी क्या? हेहेहे", शालिनी की इस टिप्पणी पर अनामिका बुरी तरह झेंप गयी.

"दीदी.. आप पता है क्या कह रही है? न हम ऐसे वैसे है और न हे अर्जुन ने हम वैसी नजर से देखा. हाँ हमे पहली बार अर्जुन के रूप में कोई परवाह करने वाला दिखा है लेकिन औरत है और हर नजर को समझ सकते है."

"हाय.. हर नजर को समझ सकते है.. पागल हो तुम भी अनामिका. अब मजाक भी नहीं कर सकती क्या तुम्हारे साथ. वैसे सच कहु तोह अर्जुन एक बड़ा हे सुलझा हुआ और जिम्मेदार लड़का है. मैं खुद उसके साथ ज्यादा समय नहीं बिता सकीय लेकिन जितना समझा और सुना है, वो उस से कही ज्यादा बेहतर है. वैसे विनोद के साथ तुम्हारी शादी करवाई किसने?", शालिनी की बात और मजाक को समझते हुए अनामिका भी हलके से मुस्कुराने लगी. बचा हल्का सा कुनमुनाया तोह एक पल में हे चैन खोल कर उसने अपना सतांन बेटे के मुँह पर लगा दिया.

"हम तोह पढ़ाई के बाद बैंक या टीचर के इम्तिहान देना चाहते थे दीदी. हमारे पिता जी से मिलने जब ससुर जी आये तोह सब बात छोड़ कर रिश्ते की बात कर दी. हमारे पिता ने तोह बस खानदान देख कर बिना हमारी मर्जी जाने अपनी सहमति दे दी. क्या कर सकते थे शादी करने के सिवा? औरत है न तोह एक घर सांकल (जंजीर) खोल कर दूसरे घर में बाँध दिए गए.", अनामिका का भोलापन और saaf-dil हे बहोत था किसी इंसान को उसको समझने के लिए.

"गलत बात है ये सरासर. हमारी शादी 20 बरस पहले हुई थी लेकिन तब भी हमसे पुछा गया था के शादी करनी है या पढ़ना है. मैं अपने होने वाले पति से 10 मिनट मिली और फिर खुद हे मंजूरी दे दी शादी के लिए. क्या विनोद तुम्हारा पत्नी की तरह ख़याल रखता है? ये भी तोह शादी के 5 साल बाद हुआ है न?", अब जैसी शालिनी ने अनामिका की दुखती राग दबा दी लेकिन अनामिका तोह सहानुभूति दिखने वाले से दिल का हाल कह हे देती थी, जिसके अवसर इस घर में आने से पहले naam-matra रहे होंगे.

"एक तोह ये हमसे 7 साल बड़े है और घर पे आते भी हफ्ते हफ्ते बाद है. घर में कोई भी इन्हे टोकता नहीं है दीदी, शराब में धुत्त हो कर आये तब भी. बचा तोह तभी होता है न जब प्यार हो लेकिन इन्हे अपने हे झमेलों और kaam-dhandho से फुर्सत नहीं. जानते सब है लेकिन बोलता कोई भी नहीं है. साल भर पहले कुछ समय साथ बिताया तोह ये हो गया. अब हम भी खुश है इसके सहारे और वो तोह सीना तान कर घुमते है क्योंकि वारिस मिल गया है मुझसे.", अनामिका की स्थिति बहोत कुछ बयान करती थी.

"मुझे भी खबर है विनोद की अयाशियो की और उसके चरित्र की. चाचा जी इसलिए तोह उसको यहाँ नहीं बुलाते लेकिन तुम्हारे साथ बहोत गलत हुआ. दिल कहता है के जब तुम इतनी ाची हो तोह तुम्हारे साथ और बुरा नहीं होगा. तुम्हारी भी ज़िन्दगी बेहतर होगी. चलो अब तुम आराम करो, साढ़े 10 से ऊपर टाइम हो गया है. मैं बाथरूम हो कर आती हु.", शालिनी ने सोने से पहले बाथरूम का रुख किया तोह अनामिका भी हामी भरते हुए ऐसे हे अपने बेटे को दूध पिलाती आँखे बंद करके लेट गयी.

'अर्जुन, तुम्हे इन्तजार नहीं करवाउंगी.', शालिनी के अंतर्मनन में जो भी था बस इतना जरूर था के आज वो ये बची हुई रात सुकून से जागना चाहती थी
 
बस 30 मिनट्स दो भाई. भोजन के उपरांत अपडेट देता हु
 
अपडेट 153 (बी)

अंतर्मनन और अननत प्रेम (1)


"सोये नहीं अभी तक? 11 बज चुके है.", शालिनी बाथरूम से शायद सीने पर अपनी ब्रा पहन आयी थी निघ्त्य के नीचे से, अर्जुन के कमरे में आने से पहले. अर्जुन को लैंप की रौशनी में पढ़ते देख शायद उसको अपनी सोच पर भी हंसी आयी क्योंकि बाकी कमरे में तोह अन्धकार हे था.

"ये तोह मुझे आपसे कहना चाहिए बुआ. मैं 12-1 बजे तक तोह वैसे भी नहीं सोता. और नींद का क्या है, कभी एक घंटे में पूरी हो जाती है तोह कभी मैं दिन में हे शरीर को आराम दे देता हु. आपको नींद नहीं आ रही?", शालिनी स्टडी टेबल के पास चली आयी थी जैसे देखना चाहती हो के अर्जुन क्या पढाई कर रहा है. ये एक कंप्यूटर से सम्बंधित मोती सी किताब थी जहा अर्जुन पेंसिल से जरुरी वरन के निचे लकीर लगा देता.

"मैं भी निशाचर हे हु समझ लो. सवेरे 5 बजे उठने के बाद नाश्ता कर के 10 बजे सोई थी और 3 बजे उठी. अब तुम घंटे में नींद पूरी कर लेते हो तोह मेरी भी 4-5 घंटे में हो हे जाती है. वैसे कही तुम ध्यान योग तोह नहीं करते कसरत के साथ साथ?", शालिनी को ऐसे खड़े हुए बातें करते देख अर्जुन ने कुर्सी का रुख बिस्टेर की तरफ कर लिया. शालिनी भी समझ कर अर्जुन के बीएड के किनारे बैठ गयी. लैंप की रौशनी में अर्जुन का मुखमण्डल अलग हे दृश्य प्रस्तुत कर रहा था. जैसे घने घुंगराला बालो वाला दिव्या पुरुष अँधेरे में अपना एहसास करवा रहा हो.

"ऐसा तोह सभी करते है बुआ. विचारो के मंथन में हर बात पर ध्यान देना तोह जीव की आदत है बस हम उसको गहराई से नहीं समझते. आपको जो पसंद होता है उसमे डूब जाना हे तोह ध्यान है. हाँ योग अलग बात है जहाँ कुछ नियम और कायदे जरुरी है. वैसे अगर आप कुछ देर जाग रही है तोह क्या हम बातचीत कर सकते है?", शालिनी के यहाँ आने पर भी अर्जुन अनुमति ले रहा था और वही शालिनी इस युवक की समझ और गहराई से प्रभावित हो रही थी. बरसो बाद उसका अंतर्मनन विचलित था, शाम को अपने चाचा से अर्जुन का वर्णन सुन्न ने के बाद और फिर अनामिका की बातों से.

"मैं भी चाहती हु की हमे बात करनी चाहिए. सच कहु तोह मुझे खुद नहीं पता अर्जुन की मैं तुमसे क्या कहूँगी या मेरे यहाँ आने की वजह भी पता नहीं मुझे. लेकिन कुछ सवाल मेरे भी है और ये समझ लो की मैं आशंकित भी हु चिंतित होने के साथ साथ.", शालिनी बिस्टेर पर चौकड़ी लगा कर गॉड में तकिया लिए अब पूरी सहजता से बैठ चुकी थी. आज उसके जीवन में सबकुछ अलग हो रहा था और ये सच भी था के वो ऐसी बिलकुल भी न थी. पिछले 20 बरस उसने अपने ससुराल में ख़ामोशी से बिताये थे एक कुशल बहु, माँ और बीवी के रूप में. उमेद से भी शालिनी की चर्चा सिमित हे होती थी.

"आप अपना चिंतन पहले कर लीजिये बुआ, मेरे पास तोह फिलहाल समय की कोई कमी भी नहीं और न मुझे कोई जल्दी है.", अर्जुन अभी एक टीशर्ट और पाजामे में थे क्योंकि आज कमरा बंद नहीं था और न वो अकेला. शालिनी ने झिझकते हुए अपनी बात शुरू की.

"तुम.. तुम क्या जानते हो ाजजी (अज्जू) के बारे में? जहाँ तक मुझे मालूम है इस नाम को तोह किसी भी परिवार में लिया भी नहीं जाता. ाजजी तोह शंकर भाई की शादी से पहले हे जा चूका था, सबको छोड़ कर. फिर तुम कैसे.. समझ रहे हो न मैं क्या कह रही हु.?", अर्जुन ने कुर्सी से उठ कर पहले बीच का दरवाजा लगाया और वापिस कुर्सी पर बैठ गया. शालिनी ने इस एकांत में गौर किया था की सवा 6 फ़ीट का लड़का कही कही उसके पिता और चाचा से अधिक रोबदार था लेकिन उनके जैसी हे sharirik-bhasha थी.

"जो दिल में रहते है वो किसी को छोड़ कर नहीं जाते बुआ. और मैं उन्हें ढूंढ़ने नहीं निकला था क्योंकि मुझे तोह पता भी नहीं था के कोई शख्स ऐसा भी हमारे परिवार में रहा है. कुछ छोटे मॉटे हादसों की वजह ढून्ढ रहा था और अचानक अपने हे नाम से भेंट हो गयी. मुझे नहीं पता था के मेरा नाम मेरा हे नहीं है.", अर्जुन बताते हुए कुछ रुका तोह शालिनी बस उसको देखे हे जा रही थी. गाल पर आयी वो सीढ़ी जुल्फे फिर से कान के पीछे करती हुई अर्जुन के लफ्जो की प्रतीक्षा कर रही थी.

"अर्जुन सिंह से ऐसे मुलाकात होगी, ये न कभी सोचा था और न एहसास था की और जान ने की चाहत क्या कुछ करवा देगी. क्या आप कोई भी एक ऐसा व्यक्ति बता सकती है जो इतने खूबसूरत हृदय के व्यक्ति का बुरा सोच सकता है? मैं तोह उस नाम के साथ न्याय हे नहीं कर सकता. खैर पता नहीं था न के नामकरण की वजह क्या है तोह उतना दुःख नहीं है मुझे.", अर्जुन अब शालिनी बुआ को देख रहा था. शालिनी को एहसास हुआ के इस बार अर्जुन ने भी कुछ पुछा है.

"न.. नहीं कोई ऐसा इंसान नहीं था जो ाजजी से नफरत करता था. हाँ बहुतो को जलन जरूर थी क्योंकि एक ाजजी हे था जिसको सभी bade-bujurg दिल से अपना मानते थे फिर चाहे वो बाकी लोगो को उतना maan-samman न भी देते हो.", शालिनी खुद की हे बात में उलझ गयी थी.

"जलन करने वाला भी तोह बुरा सोच सकता है न बुआ? 30 सियार मिल कर भी शेर को नहीं घेर सकते क्योंकि एक पंजे से वो परलोक पहुंच जायँगे. अपनी हे मौत को कौन घेरने की कोशिश करेगा? वैसे आप भी बहुत लोगो से व्यथित है और मैं ऐसा कह कर आपका अनादर नहीं कर रहा क्योंकि प्यार एहसास हे ऐसा है.", अर्जुन की बात से शालिनी को ऐसा लगा जैसे पसीने की लकीर उसकी गरदन से रीढ़ तक गुजर गयी हो.

"इतना पता है के जिन्होंने भी ाजजी के साथ धोखा किया उनमे से बहोत लोग बाकी है. हाँ दुःख हो भी क्यों न जब कानून अपना पूरा काम न कर पाया हो, ताक़त होने पर भी हाथ जोड़ दिए गए हो और बदला लेने की जगह राह बदल ली जाए तोह दुःख क्या दिल टूट जाता है. ऐसा अपने हे लोग करे तोह?", शालिनी की आँखों में अश्रु उतर आये तोह एक तरफ रखे साफ़ रुमाल से खुद अर्जुन ने आगे बढ़ते हुए वो सजल नयन साफ़ करते हुए किसी बुजुर्ग की तरह सर और गाल थापक दिया.

"बदला किस से लेना है अगर ये पता हे न हो तोह क्या कर सकते है. चाचा और पापा ने तोह कितनो को हे विधवा कर दिया, अनाथ कर दिया और कितनी हे माये निस्संतान हो गयी. बुआ, छल को समझना ज्यादा जरुरी है पूरा गाँव जला देने से. ऐसा न हो की सत्य आपकी सोच से कही ज्यादा विपरीत और दर्दभरा हो. आप सभी को दोष देती है लेकिन अगर मैं कहु की अर्जुन सिंह की हत्या में आप भी एक वजह थी तोह?", शालिनी के पाँव के निचे से जैसे जमीन हटा दी गयी हो. इस बंद कमरे में एक करारा तमाचा गूँज उठा. थप्पड़ इतना तेज था की खुद शालिनी को अपनी हड्डियों में पीड़ा महसूस हुई पर अर्जुन के चेहरे पर आये हलके दर्द को उसकी मुस्कान ने वापिस धक् दिया.

शालिनी बुरी तरह काँप रही थी और उसकी धड़कन की रफ़्तार इतनी बढ़ चुकी थी जैसे डील सीने से बहार हे निकल आये. गुस्सा और नफरत कुछ हे पल में हवा हो गए जब उसको एहसास हुआ की उसने अभी अभी क्या किया है और वो भी अर्जुन के साथ.

"इसको हे दर्द देना कहते है बुआ. क्रिया भी आपकी, कार्य भी आपका और कष्ट भी खुद को. बरसो बाद भी आप अपने दिल के एहसास बदल नहीं सकती और मैं आपको दोष तोह नहीं दे रहा. मैंने यही कहा न के अर्जुन सिंह की हत्या के पीछे एक वजह आप भी हो सकती हो. नीलिमा और बिंदिया आपकी ख़ास सहेलिया थी न और नीलिमा के हरिदिया में भी आपकी तरह बस अर्जुन सिंह का नाम था.", एक बार फिर से शालिनी की आँखें गीली हो चली थी जो शायद इस रात में कई बार होनी थी.

"तुम ये सब..", वो बस इतना हे कह सकीय थी.

"शांत हो जाओ बुआ, दर्द को जितने बहार हे नहीं आने डौगी तोह प्यार का एहसास कैसे होगा? खुद को जिन्दा रखना भर हे जीना नहीं होता बुआ. आप शायद नीलिमा जितना इजहार न कर सकीय थी क्योंकि भाई के साथ ऐसे रिश्ते की समाज में कल्पना मात्रा से डर लगता है. जानती हो ये बात नीलिमा बेशक न जानती हो पर बिंदिया को पता था. आप गलत नहीं थी लेकिन आपने भी जरूरतमंद की मदद नहीं की. नीलिमा और बिंदिया बहने थी न बुआ?", इस खुलासे से शालिनी रट हुए भी हैरानी से अर्जुन को देखने लगी.

"ये किसी को नहीं पता है और मुझे कसम दी थी उन दोनों ने जब गलती से मुझे पता लग गया था. तुम्हे किसने बताया ये सब?"

"बिंदिया काकी ने. नीलिमा को नहीं पता था के आप भी उनके साथ साथ अज्जू चाचा से प्रेम करती है लेकिन वो दोनों मिलते तोह बिंदिया काकी के वह थे या फिर आपकी मदद से. आप खुद हे सोचो की क्या वो बिंदिया काकी गलत हो सख्त है जो इतना कुछ जानती हो आपके बारे में? आपको मदद करनी चाहिए थी उनकी लेकिन अब हो गया सो हो गया.", शालिनी की उम्मीद से भी कही आगे था अर्जुन और उसकी कही कोई भी बात गलत नहीं थी.

"भाई बहिन के बीच रिश्ते को ये समाज स्वीकार नहीं करता और ाजजी मुझे हमेशा अपना दिल कहता था लेकिन वो वैसी भावना नहीं रखता था जैसी नीलिमा के लिए थी. फिर भी मैं खुश थी और उस जैसा इंसान करीब रहे बस यही चाहत थी मेरी. लेकिन तुम कैसे कह सकते हो की बिंदिया का इसमें कोई हाथ नहीं था? क्या पता उस दिन मैं भी किस्मत से बची थी?"

"ये आप सोचना बुआ क्योंकि हम खुद से झूठ नहीं बोल सकते. आपका अंतर्मनन बेहतर जवाब देगा आपके हर सवाल और संदेह का. रही बात किसी से भी प्रेम की तोह ये रिश्तो की डोर से ऊपर है और आपने कोई गुनाह नहीं किया.", शालिनी की नजरे झुक्क गयी जब अपने से आधी उम्र क्या व्यक्ति प्रेम की सच्चाई का पथ उन्हें सीखा रहा हो.

"फिर भी तुम्हे ये तोह नहीं पता न की ाजजी की हत्या करने वालो में कौन कौन शामिल था और अब जीवित भी होगा?"

"आप नीलिमा का पता दे दीजिये बस, आखिरी नाम तक मैं पहुंच हे जाऊंगा. लेकिन क्या ऐसा करना सही होगा बुआ? अगर बात उतने पर हे नहीं रुकी तोह? इस खोजबीन में कही और किसी को खोना पड़ा तोह क्या होगा बुआ? अतीत के पैन पलटने पर कई बार वास्तविकता से कही ज्यादा बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है.", अर्जुन के ये सवाल अपनी जगह सही थे और शालिनी के पास सही जवाब न था.

"तोह फिर तुम्हे रुक जाना चाहिए अर्जुन. और मेरी इतनी बड़ी गलती के लिए हो सके तोह माफ़ कर देना.", शालिनी उठ कर जाने लगी थी क्योंकि अब हिम्मत हे नहीं थी इस व्यक्ति के सामने बैठने की. थप्पड़ मार कर तोह जैसे खुद को भी कष्ट दे दिया था अर्जुन के साथ.

"कहा न बुआ के ऐसा करके आपने खुदको हे कष्ट दिया है. सबकुछ हमारे अनुसार हे होने लगे तोह हम इंसान कहा रहे? दुःख भी उतना हे कटु सत्य है जितना प्रेम और ये दोनों हे हमारे जीवित होने का प्रमाण है. मैं चाहे खोजबीन करू या न करू लेकिन आपकी खुशियां उजाड़ने वाले को उसकी सजा जरूर मिलेगी. चाचा सिर्फ आपके लिए हे हम नहीं थे. जैसे आपने कहा की उन्हें सभी प्यार करते थे तोह अकेली आप हे दर्द में है ऐसा सोच कर आप बाकी सबको कितना दुःख दे रही होंगी, ये सोचना जरुरी है बुआ. वो सभी आपको भी तोह प्यार करते है.", अर्जुन ने पानी की बोतल से गिलास में थोड़ा पानी दाल कर शालिनी के मुँह से लगाया तोह फिर से अश्रुधारा बह चली. Aatma-glani के भाव अर्जुन भी समझ रहा था.

"सब भूलना आसान नहीं है लेकिन जो आपके पास है उसकी अनदेखी करना कही ज्यादा गलत. आप आराम कीजिये बुआ और कभी मुझे लगा की आप मेरी मदद कर सकती है तोह मैं जरूर आपके पास आऊंगा.", अर्जुन ने जैसे उन्हें कमरे से जाने की हिदायत हे दे दी थी, ऐसा शालिनी को लगा.

"तुम चाहो तोह सजा दे सकते हो मुझे, मुझसे सचमुच बड़ी गलती हुई है.", शालिनी रुकना चाहती थी और खुद हे अपनी गुस्ताखी पर नजरे झुकाये थी. हमेशा सख्त आवरण में लिपटी रहने वाली शालिनी का मेलजोल सिर्फ घर के बड़ो तक सिमित था. बचो के साथ वो कुछ हद्द तक घुलमिल जाती थी लेकिन आज वो आसक्त थी इस लड़के के पास रहने के लिए. वो चाहती थी की अर्जुन आज बस उनसे बातें करता रहे और हर dukh-dard से विमुक्त कर दे उनकी आत्मा को जो जाने कितनी हे यादों की जंजीरो में जकड़ी है. लेकिन क्या वो अधिकार रखती है?

"बुआ, मैं बिलकुल भी गुस्सा नहीं हु. आपकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी और मुझे ाचा लगा के आपने ये मुझ पर जाहिर की बजाये किसी अपने के. शायद ये बात आपको दादा जी या उमेद चाचा जी से सुन्न ने को मिलती तोह आप चाह कर भी रियेक्ट नहीं कर सकती थी. दोनों दादी तोह शायद न ये जान सकती थी और ना आपको कहने की हिम्मत रखती. यही लोग तोह आपके करीब है न? रात ज्यादा हो गयी है और 3 घंटे बाद आपको उठना भी पड़ेगा. आराम कर लीजिये, चाहे तोह इस बिस्टेर पर भी सो सकती है.", अर्जुन ने जब ये कहा की शालिनी के लिए वो उसका अपना नहीं है तोह जैसे एक पल में हे उसका बचा खुचा दिल भी टूटे कांच की तरह बिखर गया. जब तक वो होश संभालती, कमरे में कोई न दिखा.

'मैं उसको अपना नहीं मानती? नहीं मानती तोह मैं इतनी रात को उसके करीब यहाँ क्यों होती?', अंतर्मन की आवाज सुने बिना हे शालिनी ने भीगी आँखों से अपने आप से हे सवाल किया तोह जवाब खुद हे मिल गया.

'हाँ वो गलत तोह नहीं कह रहा था. मेरे लिए तोह वही सब लोग अपने रहे है गुजरे हुए बरसो में. माँ, चाचा जी, चाची और कही कही भैया. लेकिन आज मैं खुद आयी तोह थी चल कर इसके पास.', अर्जुन ने ठीक वैसी हे चोट शालिनी के हम पर की थी जैसी वो कितनो के साथ करती रही होगी. सब उसको दिल से अपना मानते थे लेकिन शालिनी की नजरो में तोह उसका दर्द समझने वाला कोई था हे नहीं घर के बड़ो के सिवा.

एक नजर घडी को देखते हुए वो उठ कड़ी हुई. दिन बदल चूका था और घडी सवा 12 दिखा रही थी. हर कदम फर्श पर रखना ऐसा लग रहा था जैसे वो ताप्ती हुई रेत पर चल रही हो. सबके लिए शालिनी लाड़ली थी और किसी को इजाजत नहीं थी उसको नजरअंदाज करने की, बेशक वो खुद कर सकती थी ऐसा. अगले कमरे में आते हे वह बस चैन से अनामिका सोई दिखी. अर्जुन यहाँ भी नहीं था और न हे अनामिका का बीटा निकेतन.

"ये शायद कपडे गीले होने की वजह से उठ गया था. मैंने बदल दिए है, साफ़ करने के बाद.", शालिनी को बचे की आवाज तक न सुनाई दी थी जैसे अनामिका को. लेकिन अर्जुन के कान इनसे अलग थे और वो बिना किसी को परेशां किये खुद हे बचे को चुप करवा चूका था. अनामिका भी उनींदी से उठने लगी तोह अर्जुन ने बचा उनकी गॉड में रख दिया.

"थैंक यू अर्जुन, शायद आँख ज्यादा गहरी लगी थी.", अनामिका झेंप रही थी और अर्जुन भी समझ गया था की अब बचे को stann-paan की जरुरत है.

"वेलकम चची. आप लोग आराम कीजिये, मैं भी अब सोने हे लगा हु. उठान तोह मुझे भी पड़ेगा सबके साथ. गूडनिघत बुआ.", इस बार वो अपने कमरे में जलते लैंप को बंद करके गहरे अँधेरे में बिस्टेर पर पसर गया. शालिनी किसी उम्मीद से उस ढके हुए दरवाजे को देख रही थी जैसे अर्जुन बुलाये और वो फिर से उसके करीब बैठ कर अपने ज़िंदा होने का एहसास करे. अब ये जैसे मुमकिन न था.

"दीदी आप अभी तक जाग रही थी?", अनामिका ने बचे को दूध पिलाते हुए हे पुछा. वो अब बेटे के साथ लेती हुई थी और शालिनी को सोच में डूबा देखा उनकी तन्द्रा भांग की. शालिनी भी नाउम्मीदी से बिस्टेर पर पसर गयी.

"नींद नहीं आ रही थी तोह अर्जुन से बात करने लगी. अब कुछ देर आराम करना हे बेहतर रहेगा अनामिका.", शालिनी ने न चाहते हुए भी आँखें मूँद ली. आज तोह नींद आँखों से कोसो दूर थी और अर्जुन ने शालिनी के खराब रवैय्ये की सजा न देते हुए भी खुद से दूर करके सजा दे हे दी. हथेली में अभी तक दर्द था और जब मारने वाले के हाथ में दर्द हो तोह चोट खाने वाले पर क्या गुजरी होगी. इतना सोचते हे शालिनी की बंद आँखों से जहर जहर आंसू टपकने लगे. जाने कितनी देर बाद वो रट रट हे थकान से नींद के आगोश में गयी थी.

जहां सन्नाटे में जाने किस वजह से शालिनी एक झटके में उठ कर बिस्टेर पर बैठ गयी. आहात मैं से दुखी हो कर वो घंटा भर मुश्किल से सोई होगी और किसी बुरे ख्वाब को जैसे उसका सोना भी मंजूर न हुआ. चेहरे पर आया हल्का पसीना हाथ से साफ़ करती हुई वो बड़ी सावधानी से उठ कड़ी हुई. शरीर में अभी तक हलकी कंपकंपी सी थी.

वो नंगे पाँव हे बिना आवाज किये उस कमरे में आ कड़ी हुई जहा अर्जुन करवट लिए सो रहा था. उसका दाया गाल बिस्टेर पर था और जहा थप्पड़ लगा था वो ऊपर. धड़कते दिल से शालिनी उसके करीब आ बैठी. मद्दिम रौशनी में बेशक गाल पे छपा वो पंजा साफ़ न दिखा लेकिन होंठो की किनारी के बीच जमा गहरा रंग पूरी कहानी बयान कर गया.

'माफ़ कर दे मुझे अर्जुन मुझे माफ़ कर दे. आज मैंने अपने प्यार के नाम पर हे हाथ उठा कर बहोत हे ज्यादा बड़ी गलती कर दी. मैं स्वार्थी हु जो किसी की परवाह नहीं करती लेकिन तुमने आज मुझे मेरी सचाई दिख कर एहसान किया है. तुम मेरे अपने हो अर्जुन और बहोत बड़ी भूल हुई जो मैं पहले तुम्हारे पास न आयी.', आँखों से गिरता एक आंसू ठीक उस सूख चुके रक्त पर गिरा तोह शालिनी डर से पीछे होने लगी.

"अब सो जाओ न बुआ. आप मेरी अपनी हो और कोई भूल नहीं हुई. यही सोना है तोह यही सो जाओ.", शालिनी जबतक कुछ समझ पाती या जवाब देती अर्जुन की ब्याह उसकी कमर को दबती हुई बिस्टेर पर लिटा चुकी थी. अर्जुन वैसे हे गहरी नींद में था और चेहरे पर कोई भाव नहीं. शालिनी हैरत से उसके हाथ के निचे लेती हुई बस इस शांत चेहरे को देख रही थी.

'ये सपना है? नहीं मैं इसके हे बिस्टेर पर इसके साथ लेती हु.', आगे वो कुछ और सोच पाती उस से पहले हे कमर से ऊपर तिकी कोहनी ने हरकत की. अर्जुन की हथेली शालिनी के कान से ऊपरी हिस्से को थपकते जैसे हर सोच निकलती हुई उसके अंतर्मनन को शांत कर गयी. गेहृ नींद में वो किसी मासूम गुड़िया सी अर्जुन के आगोश में चैन से सो चुकी थी. ये पुराने अर्जुन का एक बेहतर संस्करण था जिसकी डोर से शालिनी खुद बांध चुकी थी.

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इतनी उम्र होने के बावजूद ये तीनो मलंग बहार वाले बाथरूम में एक साथ हे नाहा रहे थे. कोई बाल्टी उड़ेल रहा था और कोई फुहारे के निचे खड़ा ठन्डे पानी का आनंद लेने में व्यस्त था. नरिंदर तोह दातुन (ब्रश) करने के साथ हे दूसरे हाथ से खुद पर पानी उड़ेल रहा था इस दरवाजा खुले बाथरूम के भीतर. तीनो समय बचने के साथ साथ अठखेलिया भी कर रहे थे.

"यार गज्जू, वो बहार अमेरिका में एक बड़े बाथरूम में 8-10 फुहारे भी लगे होते है. एक ऐसा बाथरूम तू उधर हवेली पर बनवा और एक हम दिल्ली के पास वाली कोठी में भी बनवाएंगे. यहाँ तोह मुमकिन नहीं.", शंकर बालो में थोड़ा तेल लगाने के बाद उन्ही हाथो से शरीर की मालिश करते हुए चाहत बताने लगा.

"हाँ यार, उधर तोह फिर स्विमिंग पूल भी बड़े वाला सही रहेगा और बहार निकलते हे आधा दर्जन फुहारे. बियर की चुस्कियां लेते हुए कभी पूल में तोह कभी फुहारों के निचे.", नरिंदर ने ब्रश एक तरफ रखते हुए टोलिया लपेट कर कच्चा बदला और बड़े भाई की तरह बालो के साथ शरीर की थोड़ी मालिश की.

"मैं तोह इस से भी आगे सोच कर बैठा हु इन्दर. स्विमिंग पूल भी sardi-garmi के हिसाब वाला और बाथरूम ऐसे बड़े बड़े बनवाने है जहा टीवी, बाथटब भी jet-pipe वाला और वही एक मालिश वाली आधुनिक टेबल. इंटीरियर की किताबे देखि थी मैंने भोले, विन्नी पढ़ती रहती है न तोह उनमे तोह ऐसी दुनिया है जो एक बार विश्वास हे न हो. सोच लिया है के जो अपना दिल्ली वाला आशियाना बनाएंगे वह सारा काम विन्नी से करवाना है और आटोमेटिक गेट से ले कर परदे भी बटन से खुलने वाले.", उमेद, इन्दर और शंकर को ये नहीं मालूम था के उनके पिता ख़ामोशी से बहार हे आँगन में पाइप लगा कर नाहा रहे हे.

"ोये शेखचिल्ली की औलादो, भगवन के दर्शन जा रहे हो और पहला नाम बियर का उसके बाद दुनिया जहाँ की araam-parasti. बाथरूम से निकलने में कष्ट हो रहा है तोह आटोमेटिक डंडा भिजवाओ अंदर. खोते दे पुत्तर, सावेर होई नई ते यह हैजे वि सपने विखी जांदे है. गप्पी किसे थाह दे.", अंदर तीनो हे एक दूसरे को देख मुँह दबाये हंसने लगे और टोलिया लपेटे चुपचाप बैठक में निकल लिए. 3 बजे से 15 मिनट ऊपर समय हो चूका था और रामेश्वर भी अपने बचो की बातें सुन्न कर अब हँसते हुए उनके हे बाथरूम में चले गए, कपडे बदलने.

"शालिनी को उठा दिया क्या रेखा बिटिया?", यहाँ तोह कौशल्या जी नाहा कर पाठ भी कर चुकी थी और अब अपनी धरम बहिन पूर्णिमा के तैयार होने पर रेखा से चाय लेते हुए बिस्टेर पर बैठी थी. साड़ी व्यवस्थित करती हुई पूर्णिमा जी ने रेखा से अपनी बेटी के लिए पुछा तोह उन्होंने गर्दन हिला दी.

"जी माँ जी मैं भेजती हु तारा को. वो भी तैयार हो चुकी है.", रेखा जी इतना बोल कर वापिस अंदर चली गयी जहा माधुरी अभी बाथरूम से निकली थी और प्रियंका नहाने चली गयी. ऊपर वाले बाथरूम में तोह जो भी होता था उसका यहाँ किसी को पता न था.

"तारा, ऊपर देख जरा तेरी शालिनी मौसी तैयार हो रही है या अभी तक उठी नहीं. अर्जुन को सोने देना अगर नहीं उठा हो तोह. घर से जाते समय उठा देंगे उसको.", रेखा जी ने इतना कहने के साथ हे चाय के कुछ कप लिए और अपने कमरे में चल दी. वह राजेश्वरी जी भी तैयार हो रही थी ललिता जी के साथ और उसके बाद कृष्णा जी को भी उठाना था. तारा अपने साथ विन्नी को लिए ऊपर चल दी.

"कितना अजीब लगता है न यार रात ढाई बजे उठना और फिर ऐसे तैयार होना. मैं तोह कार में भी सो जाउंगी अगर सुकून मिला तोह.", विन्नी नहाने के बाद भी कुछ सुस्त थी और तारा उसके साथ हंसती हुई इधर हॉल कमरे तक चली आयी.

"सो जाना दीदी. वैसे आप इतनी रात तक कोमल दीदी के साथ बातें करती रहोगी तोह नींद की कमी तोह होने हे वाली है. कोमल दीदी को आदत है इस सबकी लेकिन हम सभी 10 बजे से पहले सो चुकी थी. आइशा अभी उठी है और मैं देख कर हैरान हु की उसकी नींद दूध पीने से खुलती है.", अंदर आने पर दोनों के हे रुक गयी. बाथरूम खुला था और बिस्टेर पर अनामिका चची अपने बेटे के साथ सोई हुई थी.

"बुआ, तोह यहाँ नहीं दिख रही.", विन्नी के ऐसा कहते हे तारा कुछ सोच कर उसका हाथ पकडे सीधा अर्जुन के कमरे में दाखिल हो गयी. अब विन्नी का मुँह खुला रह गया और तारा बस थोड़ा हैरान थी क्योंकि दरवाजा खुला था जिसका मतलब कुछ गलत काम तोह नहीं हुआ इधर.

शालिनी बुआ इस वक़्त अर्जुन के सीने पर सर रखे सोई थी और अर्जुन बिस्टेर पर सीधा पसरा था बुआ को अपने साथ लगाए. उसका एक हाथ बुआ के निचे से होता हुआ कमर को थामे था.

"शहहह.. देखो अपनी बुआ को विन्नी दीदी. इसको कहते है चिंतामुक्त नींद और सचमुच इसकी उम्मीद तोह मुझे भी नहीं थी.", ये बात कान में फुसफुसाते हुए तारा ने कही थी और विन्नी का हाथ अभी भी अपने मुँह पर था.

"यार, बात चिंतामुक्त की नहीं है तारा. अर्जुन तोह चल जैसा है वैसा हे रहेगा लेकिन निघ्त्य की हालत तोह देख जरा. थोड़ी सी ऊपर तोह प्राइवेट part हे दिखने लगेंगे.", विन्नी ये कह रही थी और तारा कुछ और देख कर मुस्कुरा रही थी. विन्नी ने नजरो का पीछा किया तोह अर्जुन का वो सख्त और बड़ा उभर शालिनी की जांघ के निचे आधा दबा था.

"आप बहार जाओ दीदी, मैं उठती हु मौसी को. शायद आपको देख कर कम्फर्टेबले न लगे उन्हें. रिलैक्स रहो, बस सो हे रही है और लगता है जैसे उन्हें ऐसी नींद की जरुरत भी थी.", तारा ने समझदारी दिखते हुए विन्नी को बहार भेजा और आहिस्ता से निघ्त्य को थोड़ा निचे करते हुए उजली जांघो को धक् दिया.

"मौसी, साढ़े 3 हो रहे है. उठ जाइये सब इन्तजार कर रहे है.", तारा ने हलके से हिलाते हुए ऐसा कहा था. शालिनी नींद में हे अर्जुन से थोड़ा कस के लिपट गयी लेकिन फिर कुनमुनाते हुए उठी थी ध्यान से हर तरफ देखने लगी. अपनी स्थिति का एहसास होते हे सकपकाती हुई वो कड़ी होने लगी थी और इस चक्कर में कमर पर रखा हाथ उनके एक उभार से ाचे से रगड़ गया.

"हाँ मैं 10 मिनट में आती हु तारा. वो उधर अनामिका के बेटे की वजह से नींद नहीं आयी थी तोह इधर सो गयी. बाथरूम से तैयार हो कर बस मैं थोड़ी देर तक आती हु." तारा ने हलकी मुस्कराहट से सर हिलाया और बहार निकल गयी. बिस्टेर पर बैठ कर शालिनी ने एक बार बहार नजर की जहा अब कोई न था और फिर अर्जुन के चौड़े कसरती बदन को जहा अब टीशर्ट नहीं थी. चेहरे की मासूमियत और सुकून से बंद वो लम्बी पलकों वाली आँखें. शालिनी ने मुस्कुराते हुए झुक कर उसका गाल चूम लिया.

'थैंक यू सो मच. जल्द मिलते है.', शालिनी के खड़े होते हे निघ्त्य के अंदर से वो खुली हुई ब्रा फर्श पर गिरी. अब मुस्कराहट के साथ घेरि शर्म भी छ चुकी थी. जल्दी से ब्रा को हथेली में दबोचे वो बाथरूम में जा घुसी. शरीर पर रोये खड़े हो चुके थे सब याद करते हे.

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घर के बहार 6 गाड़ियां कड़ी थी इस समय और सफारी के पिछले हिस्से में सामान रखने के बाद सभी सदस्य अपनी इत्छा अनुसार अंदर बैठने लगे. छोल साहब की गाडी में पंडित जी के साथ कौशल्या जी, पूर्णिमा जी और माधुरी के साथ आखिरी सीट पर मुकेश और उसकी बीवी पारवती थे. प्रीती एक ढील सफ़ेद पाजामे और ढीली सी इंद्रधुनष की छाप वाली टीशर्ट पहने ऋतू से धीमी आवाज में gutur-gu में व्यस्त थी.

"ये अर्जुन उठा नहीं अभी तक?", नरिंदर जी ने इलो का दरवाजा खोलते हुए एक नजर घर के अंदर की तोह संजीव अपने छोटे भाई को कुछ समझते हुए बहार ला रहा था. अर्जुन सबको najar-andaaj करता अपने दादा के पास आ रुका.

"आप नाराज तोह नहीं है न बाउजी?", गाडी में पंडित जी अभी बैठे नहीं थे और पौटे की बात सुन्न कर गले लगते हुए मुस्कुरा दिए.

"मैं तेरे हर फैंसले पर सिर्फ खुश हे होता हु मेरे बचे. दिल की सुन्न ने वाला कभी गलत नहीं होता और मैं भी तोह तेरी दादी की वजह से जा रहा हु क्योंकि मज़बूरी है. हाहाहा. चल अपना ख़याल रखना और कही जाना हो तोह कश्यप जी को बता देना.", रामेश्वर जी ने सर सहलाते हुए कहा तोह अर्जुन ने भी खुश हो कर उनके लिए दरवाजा खोला.

"छोटे दादू, गाडी आराम से चलना. सबसे जरुरी लोग बस इस गाडी में हे हैं.", अर्जुन ने ऐसा अपनी दादी की तरफ देख कर हँसते हुए कहा था.

"हाँ भाई, थोड़ी घबराहट तोह है लेकिन भाई साहब जितनी नहीं. दोनों घर का ख़याल रखना पीछे से. प्रीती 7 बजे मंजू के घर जायेगी तोह हो सके तोह छोड़ आना.", छोल साहब भी स्टीयरिंग के पीच आ बैठे तोह सबसे पहले इनकी हे गाडी आगे बढ़ी. देखते हे देखते बाकी सभी कार इधर से अपने गंतव्य की तरफ बढ़ने लगी और आखिरी वाली को ले जाने से पहले उमेद जी ने रुक कर अर्जुन को करीब बुलाया.

"कोई शैतानी नहीं और सिर्फ घर पे."

"आपको क्या लगता है चाचा जी मैं घर से कही दूर जाऊंगा. निश्चिंत रहिये और आराम से जाए."

"हाँ पता है मुझे की आजकल मेरा बीटा कहा तक पहुंच रहा है. लेकिन आज अकेले हो तोह कुछ भी ऐसा वैसा नहीं."

"शादी तक इस घर की हद्द में रहूँगा.", ये बात अर्जुन ने बड़ी धीमी आवाज में कही थी और पिछली सीट से देखती शालिनी पर नजर पड़ी तोह वो दूसरी तरफ देखने लगी.

"जानता हु मैं और मैं हमेशा तुम्हारे साथ हु अर्जुन. चलो शाम को मिलते है.", उमेद ने गाडी चालू की तोह अर्जुन ने बाकी सबकी तरफ भी bye का इशारा किया, ख़ास कर शालिनी बुआ को. इसके साथ हे अब यहाँ एक तरफ अर्जुन और कुछ कदम पीछे प्रीती कड़ी थी बस.

"घर बदल लिया जाए डार्लिंग?", अर्जुन की ऐसी बात सुन्न कर प्रीती किसी नवब्याहता की तरह शर्मा रही थी लेकिन अर्जुन के घर के गेट को पकड़ती बस इतना बोल गयी.

"सब मेरी अलमारी में है और एक पैकेट फ्रिज में.", प्रीती दरवाजा बंद करती अंदर दौड़ गयी जैसे वह उसका खजाना पड़ा हो और अर्जुन मुस्कुराता हुआ प्रीती के घर.

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मंजू और मेनका को कार में बैठने के साथ हे संजीव की कार भी रफ़्तार पकड़ती हुई बाकी काफिले के पीछे निकल चली. इस कार में अगली सीट पर अलका और पिछली पर ऋतू थी. वही इनसे आगे दौड़ रही सफारी का स्टीयरिंग नरिंदर जी ने बखूबी थाम रखा था इस हलके अँधेरे और खाली सड़क पर. आरती अपनी पिता की बगल में थी और पिछली सीट पर कृष्णा, रेखा और रोमिला की तिकड़ी. आखिरी हिस्से में ढेर सारा सामान था जो daan-dakshina में प्रयोग होना था.

लेकिन माहौल अलग हे बन्न गया जब शहर से बहार इन्तजार करती बड़ी मेरसेदेज़ इनके साथ चल दी. वह परमवीर सांगवान ने जैसे शंकर को डिपर से कुछ इशारा किया तोह इलो ने तुरंत हे कतार टॉड कर आगे चल रही उमेद की कार के बाद छोल साहब की सिएरा को भी पछाड़ दिया. दोनों कार अब सरपट दौड़ रही थी इस खमोश हाईवे पर और अपने पापा की बगल में बैठी रुपाली जोश से भर उठी.

"पापा, हम हे आगे रहेंगे आप और तेज भगाओ.", रुपाली ने जैसे उत्तेजना में पापा कहा तोह शंकर जी की कार 180 पार करती हुई सड़क से और चिपक कर फिसलने लगी थी. पीछे बैठी रेणुका की तोह सांसें हे अटक गयी लेकिन कोमल ने हाथ पर हाथ रखते हुए उन्हें सहज रहने का इशारा दिया. अनामिका भी चिंतित थी लेकिन वो एक बार पहले भी अपने जेठ जी की ड्राइविंग देख चुकी थी.

"बीटा, वो कार खुद धीरे करेंगे देखती रहो. उसको भी पता है के स्टीयरिंग पर कौन सवार है.", यहाँ एक मिनट में 3 किलोमीटर पार करती ये कार सचमुच छोटे सांगवान की औकात से बहार हो गयी थी पकड़नी. अभी इनका ये सब चल हे रहा था और साईं से उमेद इस कार को पीछे छोड़ता 200 पार करता आगे निकल चला. शंकर जी की कार इस से अधिक नहीं जा सकती थी और कुछ सोच कर वो अब कायदे से 100 पर आ चुके थे.

"पापा. वो तोह रेस में थे हे नहीं.", जैसे हे रुपाली ने ये कहा तोह शंकर जी मुस्कुरा दिए.

"बीटा तुम्हारे चाचा जी का मतलब है मैं अकेला नहीं हु और ये रेस लगाना ठीक नहीं. लेकिन जल्द हे तुम्हे साथ ले चलूँगा और फिर हम तुम्हारे परम चाचा के साथ दिल्ली तक की रेस लगाएंगे.", रुपाली ने भी गौर किया तोह उमेद वाली गाडी भी अब इनकी रफ़्तार पर हे सही लाइन में आगे चल रही थी.

"ठीक है लेकिन आप वैसी गाडी क्यों नहीं लेते?", रुपाली के सवाल में कुछ अलग चाहत नहीं थी बस वो अपने बाप वाली कार की सीमा समझते हुए ऐसा बोली थी.

"मेरी बेटी जिस दिन कॉलेज जाएगी तोह उस से भी ाची कार में खुद जाएगी. मेरी तोह उम्र हो चुकी अब और घर में पहले हे इतनी गाडी है. लेकिन तुम्हारे लिए मैं सबसे ाची कार लूंगा.", कोमल भी अपने पिता की बात सुन्न कर मुस्कुरा रही थी और रेणुका को भी ाचा लग रहा था के उनका ये भाई दिल का कितना ाचा है. थोड़ा गुस्सैल और ज़िद्दी है लेकिन अपनों के साथ नहीं.

"शंकर भैया, राजकुमार भैया की कार नजर नहीं आयी. वो हमारे साथ हे चले थे न?", रेणुका ने बात का रुख घुमाया तोह पिछले शीशे में देखते हुए शंकर जी ने जवाब दिया.

"रेनू, राजू भाई तुम्हारी सरोज भाभी और दलीप भैया को ले कर वही पहुंचेंगे बड़ी गाडी से.", दलीप ने भी नयी सफारी ली थी कुछ दिन पहले.

"पापा, इसका मतलब वह नानी जी भी आएंगे क्या?", कोमल के इस सवाल पर शंकर जी ने हामी भरी.

"हाँ लेकिन सिर्फ तुम्हारे नाना जी और नानी आएंगे राजेश और ममता के साथ. बाकी जाने पर हे पता चलेगा बीटा.", इस तरह की बातें यहाँ चल रही थी वही नरिंदर जी की गाडी में पूरा हंसी मजाक हो रहा था. वो बातों बातों में अपनी रेखा भाभी के साथ साथ रोमिला को भी लपेट लेते और कही कृष्णा जी के साथ रोमिला नरिंदर जी को. शांत समय और हंसी ठिठोली से ये सफर मजेदार हे जा रहा था.

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धीमी आवाज में चलता 'पल पल दिल के पास, तुम रहती हो' और इस बड़े कमरे में फैली बेहतरीन महक, जो ख़ास अगरबत्तियों से आ रही थी बिना धुएं के. उजली सफ़ेद रस्मी चादर और 20 तापमान पर चलता एक कमरे को भरपूर ठंडक प्रदान कर रहे थे.

विशाल बाथरूम के भीतर का नजारा भी कुछ अलग न था जहा चमचमाते बाथटब में गुलाब और मोगरे की बहुतायत थी. इतनी सवेरे घर में जहा पूर्ण अन्धकार था बस यही बाथरूम laal-neeli मोमबत्तियों के प्रकाश से जगमग था. बस ये जगह प्रीती का कमरा न था और साड़ी तैयारियां पूरी करने के बाद अर्जुन आराम से प्रीती के बिस्टेर पर पसर गया.

"उठने के बाद फिर से सोने का इरादा था तोह पहले हे बता देते.", प्रीती जब कमरे में दाखिल हुई तोह वो पहले वाले लिबास में हे थी लेकिन चेहरे और निर्वस्त्र बाहें दर्पण सी चमकती दूसरे घर में की गयी म्हणत बयान करने के लिए बहोत थी.

"ये ड्रेस पहन कर बहार हॉल में मिलना जरा.", अर्जुन फुर्ती से उठ कर प्रीती के सामने आ खड़ा हुआ. बिस्टेर पर एक तरफ वो झीनी सफ़ेद पोषक की तरफ इशारा करता वो बहार जाने लगा लेकिन फिर रुक कर बोलै.

"सिर्फ वही ड्रेस और कुछ भी नहीं जान... उमाहहह.", एक हल्का सा चुम्बन प्रीती के लरजते होंठो पर करता वो कमरे से बहार निकल गया दरवाजा बंद करता हुआ. प्रीती कुछ हैरान थी और उसको कुछ समझ नहीं आ रहा था के अर्जुन कर क्या रहा है. चलती हुई वो इस पोशाक तक आयी तोह मुस्कुरा उठी. लगभग पारदर्शी और कंधे से पतली पत्तियों वाली ये निघ्त्य जैसी ड्रेस कही उत्तेजक थी. एक पल के लिए तोह दिल में अलग सी तरंग उठने लगी इसको बिना अधोवस्त्रो के पहन ने की कल्पना मात्रा से.

'बच्चू, आज तुम्हारा सुबह है तोह खेल तुम्हारा. दोपहर मेरी है बस ये याद रखना. चलो अब मैं भी देखती हु अपने खेल में कितना टिकते हो.', ड्रेस उठाते हे उसके निचे राखी डिब्बी नजर आयी जिसपर लिखा था, 'योर आईज अरे माय ओसियन, अस माइन अरे योर एअर्थ'. डिब्बी के अंदर चांदी सी चमकदार लेकिन अलग धातु की ये पतली चैन के बीच दिल का लॉकेट था, आधा भूरा और आधा नीला.

'उम् .. ी लव यू..", उसको चूमते हुए प्रीती ने एक पल में हे अपने दोनों वस्त्र त्याग दिए. नहाने की हिदायत नहीं थी और सिर्फ वो सफ़ेद घुटनो तक की लम्बाई वाली पोषक पहन कर प्रीती ने नेकलेस मुट्ठी में बंद कर लिया. आईने में खुद को देखते हे शर्म से गुलाबी चेहरा अब लाल हे होने लगा था. ये पोशाक उसके खड़े तीखे चूचक साफ़ दिखा रही थी. जैसे तैसे धड़कन संभालती हुई वो बहार निकली तोह टेबल पर राखी वो गुलाबी वाइन की बोतल सबसे पहले नजर आयी.

'ले चलो मुझे अपनी माँ के कमरे में', अब ये क्या है? ये जांचने के लिए की क्या सचमुच ये वो चीज है जो प्रीती सोच रही थी, उसने ाचे से निरिक्षण किया. अलकोहल कंटेंट 5% देख एक गहरी सांस लेती वो अपनी माँ के कमरे का दरवाजा खोल अंदर दाखिल हुई तोह सफ़ेद रेशमी चादर पर लाल साड़ी, ब्रा, पंतय और ब्लाउज के साथ वैसा हे निर्देश मिला.

'आफ्टर बाथ.', मतलब साफ़ था की अर्जुन बाथरूम में है लेकिन कमरे की ये उत्तेजक महक और इतनी गहरी शांति में बजता संगीत सुन्न कर प्रीती के रोये खड़े होने लगे अगले झटके की कल्पना मात्रा से. लेकिन वो बाथरूम की तरफ बढ़ती उस से पहले हे इस अत्यधिक ठन्डे कमरे में अर्जुन दबे पाँव पीछे से आया और उसको दोनों बाहों में उठा लिया. बोतल कस के पकड़ती प्रीती अपनी neeli-hari आँखें बड़ी बड़ी करती उसको हैरत से देख रही थी. अर्जुन के शरीर पर बस एक झीनी सी निक्कर मात्रा थी.

"ी लव यू मोरे थान माय लाइफ. ये दिन हमारे आने वाले वैवाहिक दिनों के झलक भर है. उमाहहह....", इस बार वाला चुंबन कही गहरा था और प्रीती के तराशे हुए सुडोल लमबे बदन को बाहों में उठाये अर्जुन इस बड़े बाथरूम में चला आया. एक तरफ वो पानी से आधा भरा बड़ा बाथटब, करीब हे स्टूल पर रखे कटे हुए नारंगी, दीपित मोमबत्तिया और मिश्रित इत्र की उत्तेजक महक.

"तुम ज़िंदगीभर ऐसे हे सरप्राइज देते rahoge?",Preeti दुनिया की सबसे आरामदायक जगह पर निश्चिन्त थी. ये प्यार बरसो का था लेकिन आज अर्जुन ने उसको पूर्ण करने का निर्णय ले लिया था.

"नहीं, तुम्हारी हर सुबह मेरी बाहों में होगी बस इतना कह सकता हु.", चलते हुए अर्जुन ने एक कदम टब में रखा और बड़े आराम से प्रीती का शरीर इस तरह रखा के चेहरा सर टिकने की जगह पानी से बहार रहे. एक पल को तोह ठंडक से प्रीती की सांस हे रुकने लगी और दूसरे हे पल बगल में आते अर्जुन ने उसको अपने ऊपर लिटा लिया.

"आह्ह्ह्ह.. तुम ठन्डे पानी का टॉर्चर दे रहे हो.", प्रीती ने भीगे चेहरे को अर्जुन के ऊपर करते हुए कुटिल मुस्कान से कहा.

"जरा खुद को देखो न प्रीती.", वैसे हे मुस्कान अर्जुन के चेहे पर देख प्रीती ने अपने सीने की तरफ देखा तोह वो लगभग निर्वस्त्र थी. दोनों सुडोल उभर ठन्डे पानी की वजह से कही सख्त हो चुके थे और कपडा भीगने से उनका पूर्ण अवलोकन हो रहा था.

"बड़े गंदे हो तुम, सचमूहक. दिमाग कहा कहा चलते हो. जानते हो तुम्हारे साथ मुझे इसकी भी जरुरत नहीं वैसे.", अर्जुन के चेहरे पर लगी एक गुलाब की पट्टी होंठो से उठाते हुए वो बड़ी मादकता से बोली. वो गुलाब जल्द हे एक गहरे चुम्बन के बीच कुचल कर गायब हो गया.

"ये मुट्ठी क्यों बंद है?", अर्जुन के कहते हे प्रीती ने हथेली सामने कर दी. करवट लेती वो टब के भीतर हे अर्जुन के सीने पर पीठ करती लेट सी गयी. दृश्य इतना मादक था जैसे सचमुच यूनान की कोई देवी अपनी अतुलनीय प्रेमी पर लेती हो. दोनों के बेजोड़ जिस्म पानी के भीतर स्पष्ट थे. अपने हाथो से हे प्रीती के गले में लॉकेट पहनते हुए अर्जुन पीछे से उसकी गर्दन चूमने लगा. आज उस कठोर अंग ने प्रीती को वासना से नहीं देखा था.

"आह्हः.. कितना ख़ास होता है न ये एहसास अर्जुन? तुम्हारे साथ जैसे मेरी दुनिया पूरी हो जाती है. आह्हः.. क्या कर रहे हो?", प्रीती उसकी बाहों में कसमसा रही थी और जल्द हे उसको अपने कठोर चुचो पर नारंगी से टपकते रस का एहसास हुआ और उन टुकड़ो को टब में गिरते हुए अर्जुन के हाथो ने दोनों उभर दबोच लिए.

"Dream-drop. ग्रीक कल्चर है न प्रीती? पानी में फल, वाइन, फूल और ऑयल्स. मेरी ख्वाहिश तुमसे जुडी हर चीज है. सम्पूर्ण होना है तोह फिर दोनों की सभ्यता और शैली के समावेश से क्यों नहीं? वैसे भी तुम्हे प्यार करने के हर बहाने साकार करने को तैयार हु मैं.. आज कुछ ज्यादा हे नरम हो तुम.", अर्जुन कहने के साथ साथ प्रीती के कंधे चूमता हुआ एक हाथ से kati-pradesh तक सहलाने लगा. उत्तेजना में प्रीती ने कमर उचकते हुए उस ख़ास उभार के ऊपर अपने ठोस नितम्भ टिकाये तोह अब सिसकारी अर्जुन के मुँह से निकली.

"Let's सी हु इस मोरे ईंटो तैसिंग.. उमाठ.. तुम करो ग्रीक और मैं दिखती हु इंडियन स्टाइल.", अर्जुन कुछ कहता उस से पहले हे प्रीती ने कस के उसके दोनों होंठो को दांतो में दबोच लिया. लम्बे चुम्बन का अंतत बहार बज रही घंटी से हुआ.

"साला अब कौन दुश्मन आ गया? मैं नहीं हिलने वाली.", प्रीती के मुँह से साला सुन्न कर अर्जुन मुस्कुरा दिया. लेकिन उसको पता था ये घंटी किसने बजायी होगी.

"मैं देखता हु, तुम यही रुको."
 
भाई Tony stark आज सही बोल गया और खेल देखना हो तोह अब शंकर का देखना जिसने हिसाब लगाया हुआ था. गौशाला से. काण्ड करेगा और ऐसा की खुद उसको समझ नहीं आएगा क्या कर दिया
 
सबको अपनी शिकायत है यहाँ, घरौंदे लाख उजाड़ कर..

वो पंछी दाल पर आशियाना न बना सके, तुम्हारी चाहत की वजह से..
 
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