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"तुम्हे पता भी है तुम्हारी एक नादानी की वजह से आज तुम्हारे साथ क्या हो सकता था?", मंजू के मुँह पर पानी मारने के बावजूद उसको होश 20-25 मिनट बाद आया. कुछ पल आँखें बस धुंदला सा देख प् रही थी और अलका ने जब गीले रुमाल से उसका चेहरा फिर से साफ़ किया तोह मंजू को अपनी स्थिति का भान हुआ. सर हल्का सा भारी हो रहा था और उसकी बगल में अलका बड़े प्यार से उसको हे निहार रही थी. अर्जुन के शब्दों से वो एक पल खामोश डिकी और उसके बाद जहर जहर उसकी आँखों से आंसू बह निकले.
"शांत हो जाओ, मंजू.. शांत. जब तक अर्जुन है, तब तक तुम्हारे साथ कुछ भी बुरा नहीं हो सकता. भगवन भी नहीं चाहता की तुम्हे कोई दुःख मिले. अब रोना बंद करो और अर्जुन को बताओ ये सब हुआ कैसे.", अलका ने के बार फिर से मंजू का चेहरा साफ़ किया और पानी की बोतल होंठो से लगा दी. कुछ समय लगा मंजू को सहज होने में और फिर बड़ी मुश्किल से उसने बोलै शुरू किया.
"वो मेनका दीदी आज स्कूटी से गयी थी सेण्टर क्योंकि कार का टायर पंक्चर था. उन्होंने मुझे कहा भी था की वो मुझे तुम्हारे घर छोड़ देती है लेकिन मैंने सोचा सरदार जी के गैराज फ़ोन करके पहले कार बनवा लू. फिर प्रीती या ऋतू को बुला लुंगी साथ ले जाने के लिए. गैराज फ़ोन किया तोह अंकल जी ने भी कहा के वो 15 मिनट में लड़का भेज देंगे. 10 मिनट बाद 2 लोग आये जब घर की बेल्ल बजने पर मैंने गेट खोल कर देखा. मुझे लगा वो लोग गैराज से होंगे और मैंने उन्हें कार का टायर बदलने का बोल दिया. जब एक ने पानी के लिए कहा तोह मैं बस वापिस जाने के लिए मुड़ी हे थी और फिर कुछ याद नहीं.", मंजू की आँखें एक बार फिर नम्म होने लगी तोह अलका ने उसको अपने सीने से लगा लिया. अर्जुन भी ऐसा करना चाहता था लेकिन फिलहाल कुछ और ज्यादा जरुरी था उसके लिए.
"वैसे एक बात तोह बताओ मंजू, क्या हमारे घर से पापा या चाचा तुमसे मिलने आये थे क्या पिछले 2-3 दिन में?", अर्जुन को कुछ खटक रहा था और वो संतुष्ट नहीं था आज जो भी हुआ उस घटनाक्रम से. मंजुए ने उसकी तरफ देखते हुए स्वाभाविक तरीके से हाँ में गर्दन हिला दी.
"वो मौसी (रेखा) ने नरिंदर अंकल के हाथ कपडे भिजवाए थे वह मंदिर जाने के लिए. तुम शायद उस वक़्त घर नहीं थे और अंकल के साथ कोई विनोद अंकल भी आये थे. परोसो से पहले वाले दिन शाम की बात है ये. तुम्हे क्या उन अंकल पर शक है अर्जुन? वैसे भी वो पहले तोह अजीब तरह से देख रहे थे मुझे.", मंजू ने जैसा देखा वही बयान कर दिया था और अर्जुन फिर से सोच में पड़ गया. उसको ये बात हजम नहीं हो रही थी की उन्होंने मंजू को हे क्यों चुना? हाँ इसका घर यहाँ सुनसान सेक्टर में है और गली में मुश्किल से 4 हे घर बने हुए था और सबसे पहले वाला ये घर होने से इस काम को अंजाम देना इतना मुश्किल भी नहीं था पेशवर व्यक्ति के लिए.
"पहले देख रहे थे से क्या मतलब? बाद में क्या बात हुई थी और क्या चाचा अंदर भी आये थे घर में?", अर्जुन अपने चाचा को ाचे से जानता था की वो बचो से एक सामान प्यार करते है और मंजू से उनका सिर्फ एक रिश्ता तोह था नहीं.
"मेनका दीदी ने जिद्द करके उन्हें शरबत के लिए अंदर बुला लिया था क्यूंकि पिछली बार वो आरती को बहार से हे छोड़ कर चले गए थे. नरिंदर अंकल ने दीदी का परिचय अपनी छोटी बहिन के तौर पर दिया था और मेरा कुछ अलग.", मंजू भी कहते कहते कुछ सोचने लगी थी.
"क्या रिश्ता बताया उन्होंने?"
"पहले तोह यही कहा के ये मेरे लिए बिलकुल Aarti-Ritu जैसी है. फिर कहा के मैं राजेश मां की बिज़नेस पार्टनर हु और दलीप सिंह की बेटी. उसके बाद दूसरे अंकल ने मुझे उस नजर से नहीं देखा था जिस तरह वो गेट पर घूर रहे थे. बस कुछ पढाई और मेनका दीदी की बारे में बात की. घर पे और कौन रहता है जैसी नार्मल बात."
"धत्त तेरे की. ये नार्मल बात लगती है तुम्हे की एक आदमी तुम्हारी दिनचर्या के बारे में पहली मुलाकात में हे पूछ रहा है. मतलब उसको ये भी मालूम हो गया होगा की मेनका किस टाइम सेण्टर पर जाती है और कैसे जाती है. वो स्कूटी से गयी तोह समझ लो वो बच गयी मंजू. क्योंकि जिस तरह से तुम्हारा किडनैप किया गया है इसका मतलब है तुम पर कल से हे नजर राखी जा रही थी. हो सकता है वो तुम्हारे साथ मेनका को भी किडनैप कर लेते अगर उन्हें उस से प्रॉब्लम होने लगती. लेकिन वो निकल गयी तोह उनके लिए तुम्हे काबू करना कोई बड़ी बात नहीं थी. उनकी जगह मैं होता तोह कार के शीशे भी उसके रंग की तरह काले उसे करता. वैसे भी मुझे तुम दिखाई नहीं दी थी बस वो पाँव दिखे जिन्हे बाँध रखा था और उस कार का इतनी तेज स्पीड पर चलना. अब तुम ये बात किसी ने नहीं कहोगी, किसी से भी मतलब ऋतू दीदी से भी नहीं. अलका दीदी, जरा इसको गेट तक छोड़ देना. मंजू, शादी तक अबसे पूरा दिन तुम यही रहोगी और रात में वह पर कोई भी 2 बहने तुम्हारे साथ रहा करेंगी. छोटी सी भी बात को अनदेखा किया तोह सोच लेना.", अर्जुन ने जिस तरह से हिदायते देने के बाद घुड़की दी थी, पहली बार मंजू के चेहरे पर शर्म और मुस्कराहट डिकी. अलका ने सहारा देते हुए कार से निकलने में मदद की तोह मंजू ने हाँ में सर हिलाया.
"अलका, मैं चली जाउंगी. शायद तुम दोनों मार्किट के लिए निकले होंगे और मेरी वजह से देरी हो गयी.", मंजू अब बेहतर थी और उसकी बात सुन्न कर अलका मुस्कुराती हुई उसको हाथ हिला कर वापिस कार की अगली सीट पर जा बैठी. इस बीच कोई और भी था जिसने इन दोनों को ऊपर वाले कमरे से देख लिया जाते हुए.
"तोह अब क्या इरादा है मेरे मजनू?", अलका ने अर्जुन का मैं हल्का करने के इरादे से ऐसा कहा तोह अब तक अर्जुन भी बेहतर हो चूका था. उसके चेहरे पर फिर वही मुस्कराहट छा गयी.
"मंजू हमारे घर, सेण्टर के बाद मेनका भी इधर तोह हम दोनों उनके घर. समझ लो किडनैप की गहरी छानबीन करनी है.", अर्जुन के 'गहरी छानबीन' का मतलब अलका ाचे से समझ रही थी. कार को दूसरे रस्ते से घूमते हुए अर्जुन अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चला. बबिता के साथ रात को तगड़ा मिलान करने के बावजूद उसको सुकून न था और अलका की तोह चाहत हे यही रहती थी की कब वो कुछ पल एकांत के अपने इस आशिक़ के साथ गुजरे.
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"अब सब फाइनल है तोह तुम परेशां क्यों हो विनोद? वैसे भी वो लोग मेरे भी साले हे हैं जैसे तुम तोह रिश्ते का वजन भारी रहेगा हे.", आँखों पर नजर का चस्मा लगाए ये अधेड़ व्यक्ति पूरा घाघ जान पड़ता था. विनोद अभी अपने इस बड़े जीजा के साथ उसके हे दफ्तर में बैठा था और मेज पर कुछ कागजो के साथ साथ जमीन के दस्तावेज रखे थे.
"जीजा ऐसा है की पैसे तोह हम 20 करोड़ लगा हे रहे है लेकिन राजेश जो है वो थोड़ा सनकी आदमी है. उसके साथ दलीप भी होगा जो बिलकुल उसके जैसा हे है और कही आपकी 51% वाली बात पर मसला न हो जाये. बात तोह आपकी ठीक है की हमारा कद्द एक इंच ऊपर हे रहना चाहिए लेकिन गरमा गर्मी न हो जाए. वैसे भी वो 2 लड़कियों वाले मामले में मुझे धमकी दे चूका है और यहाँ शर्त भी यही राखी है की मेरा भविष्य में किसी भी लड़की से चक्कर सुन्न ने में नहीं आना चाहिए.", विनोद ने अपनी परेशानी की वजह बताई तोह पप शर्मा भी एक पल को सोचने का नाटक करने लगा.
"हँ.. तोह तुम क्या चाहते हो वो बताओ?"
"मैं.. मैं सोच रहा था के जब जमीन पर परमिशन मिल जाए तोह हम होटल पर पूरा अधिकार हे कर ले.", विनोद ने अपनी गन्दी मंशा बताई तोह पप शर्मा के चेहरे पर भी कुटिल मुस्कान आ गयी.
"हाहाहा.. मतलब तुम अपने हे बड़े भाई के साथ देगा करने की सोच रहे हो?"
"न जीजा न. ऐसा मैं थोड़ी न करूँगा. ये होगा इक़बाल भाई की मदद से और इसमें शंकर का क्या लेना देना जब वो व्यापारी आदमी हे नहीं. उसको तोह अपने काम से मतलब है. यहाँ डील राजेश और हमारे बीच में होने वाली है. वो लोग यहाँ आएंगे तोह सबसे पहले उन्हें अपनी राजनीतिक और दहशतगर्दी वाली ताक़त बिना ज्यादा कुछ कहे दिखानी है. वैसे भी वो लोग इस जगह आ रहे है और मैं तोह एक तरह से मध्यस्थ वाली भूमिका में हु. पहले हमारा लोकल रुतबा दिखेगा और फिर कॉन्ट्रैक्ट सिग्न होगा."
"तुम क्या सोच कर बैठे हो विनोद? पूरी बात बताओ मुझे क्योंकि ऐसा लग रहा है जैसे तुम उन्हें किसी और तरह भी दबाने वाले हो.", शर्मा घाघ होने के साथ कुछ समझदार भी था या फिर वो अपने साले को ाचे से समझता था.
"ऐसा है जीजा की एक बार डील फाइनल हो जाये कल, फिर उसके बाद इक़बाल भाई राजेश और दलीप से नया करार करेंगे. मैं भी जानता हु की आपको भी अब इक़बाल से छुटकारा चाहिए लेकिन काम ऐसे होगा की इक़बाल भाई भी रस्ते से हट जायेगा और राजेश ये 5 सितारा होटल भी हमको चुपचाप सौंप देगा.", विनोद की इतनी खतरनाक बात सुन्न कर शर्मा ने कांच वाला दरवाजा चाबी से बंद करने के बाद आधी बोतल पानी की एक सांस में जातक ली.
"बहनचोद तू आग से खेलने की बात कर रहा है. इक़बाल चुटिया नहीं है के वो कुछ टट्टू से व्यापारियों के हाथो चढ़ जाए. मान लिया की मेरे लिए भी ये साला बवासीर हो चूका है पर हम इस से छुटकारा नहीं पा सकते. वो हमारी सुरक्षा संभालता है विनोद और हर आपराधिक काम को अपने ऊपर लेता है. ये होटल जमीन से हमको घंटा मुनाफा नहीं होता अगर इक़बाल नशे और jism-faroshi के काम में हमारा संरक्षक नहीं हो. हाँ अब उस कमीने को 40% देना मुझे भी अखरता है पर हम दोनों के लिए 60% बहोत है."
"अब हमको उसकी जरुरत नहीं रहेगा जीजा. मेरे पास अब अपने हे लोग है जो सुरक्षा भी देंगे और कमीशन भी 10%. आप नशा सम्भालो और मैं ये लड़कियां देखूंगा. राजेश की बिज़नेस पार्टनर जो दलीप की बेटी भी है वो अब मेरे कब्जे में है और अगले 1 महीने तक इस बात की खबर किसी को नहीं होगी. आपने भी जुबान खोली तोह..", विनोद ने अपने बड़े जीजा को हे साफ़ साफ़ धमकी दे दी थी मंजू के बारे में अगर उसने मुँह खोला तोह.
"बहनचोद, सही बता क्या करने वाला है तू?"
"गिल हमारे लिए काम करने को तैयार है जीजा. कल मीटिंग में कैसे भी करके बस हमको ऐसा दिखाना है के लड़कियों वाला धंदा इक़बाल संभालता है. उधर वो लड़की गायब है इसका जीकर नहीं करना फ़िलहाल. फिर कुछ सबूत इक़बाल के पास चिपकाने है और एक फ़ोन इक़बाल के अंदाज में राजेश और दलीप के पास जाएगा. होटल में राजेश वाला हिस्सा इक़बाल के नाम और बदले में वो उनकी बेटी वापिस कर देगा. अब 2 ताक़तवर लोगो में घमासान होगा तोह एक का मरना निश्चित है. इक़बाल मारा गया तोह वैसे भी हमको 30% का मुनाफा हे होगा और बच भी गया तोह लड़की उसके फार्महाउस से बरामद होगी जिधर मैं खुद पुलिस भिजवाऊंगा. ऐसा करने से होटल का 51 की जगह 100 हे अपना समझो. मतलब मैं मेरे बड़े भाई और राजेश की नजर में बिलकुल साफ़ और उनका अपना हो जाऊंगा. थोड़ा तुम भी ड्रामा कर देना की इक़बाल की ताक़त की वजह से हम उस से डब्ब के रहते थे और उसके इरादे ऐसे होंगे ये हमको भी मालूम न था. जब पता लगा तोह खुद पुलिस बुलवा दी.", विनोद की बातें सुन्न कर शर्मा का तोह दिमाग हे चक्र गया था. वो तोह खुद को सबसे अकल्मन्द समझता था लेकिन एक मूरख को maha-murakh के रूप में अपने से बड़ा बुद्धिमान दिख जाये तोह ये कोई बड़ी बात हे नहीं.
सच तोह ये था की विनोद के पतन की तारीख तोह खुद उसने तये कर ली थी ये होटल वाला सौदा मंजूर करते हे. जो लोग उसके पास कल आने वाले थे वो इन सभी को ठिकाने लगाने के मकसद से हे आ रहे थे जिसकी वजह jism-faroshi, गाँव की भोली लड़कियों का शोषण और hotel-farm पर पार्टी की आड़ में नशे की महफिले करवाने जैसे इनके घिनोने काम था. मंजू पर भी समय से पहले हे हाथ दाल कर विनोद ने अपनी maha-moorakhta का साफ़ प्रदर्शन किया था और उन्हें इसकी भनक तक न थी की आगे उनके साथ क्या होने वाला है और कौन कौन इनके साथ क्या क्या करेगा.
"दिमाग तोह सही लगाया है तुमने विनोद और निश्चिंत रहो मैं तोह तुम्हे अपना सबकुछ मानता हु. जो भी कर रहे हो वो हम दोनों के लिए हे कर रहे हो तोह मैं पीछे नहीं हटूंगा. वैसे रमन (विनोद का दूसरा जीजा) के लिए भी कुछ सोचो. बेचारा कब तक मैनेजर जैसी ज़िन्दगी जीता रहेगा? मेरा ऑफर तोह वो मान नहीं रहा, तुम बात करके देखो.", शर्मा ने माहौल को हल्का करने के अंदाज में ऐसा कहा था और विनोद उठ खड़ा हुआ.
"चलो पहले आप लंच करवा दो जरा दीदी के हाथो का बना गरमा गरम. फिर रमन जीजा को भी कुछ ढंग का काम देते है. वैसे भी रौशनी (रमन की बीवी) दीदी से ज्यादा चिंता मुझे अंजलि (विनोद की भांजी) बिटिया की रहती है. वैसे अभी घर पे कौन कौन होगा?", विनोद के साथ हे पप शर्मा भी उठ कर दफ्तर से बहार आ गया. एक बार फिर से दरवाजे पर टाला लगाने के बाद दोनों बगल वाले घर की तरफ बढ़ चले.
"तेरी दीदी का तोह मैं क्या हे कहु विनोद. वो और उसके saas-bahu वाले ड्रामा हे चलते रहते है 24 घंटे. हाँ आँचल (पप शर्मा की बेटी) के लिए रिश्ता ढून्ढ रहे है अब और तेरी नजर में कोई ढंग का कारोबारी लड़का हो तोह मां होने का फ़र्ज़ निभाओ.", पप शर्मा के भी सिर्फ एक हे औलाद थी जो बा करने के बाद अब कंप्यूटर का कोर्स कर रही थी. 23 साल की आँचल पंजाब में पाली बढ़ी होने से एक गदराई हुई tej-tarraar लड़की थी. दोनों जीजा साला घर में दाखिल हुए तोह उम्मीद की मुताबिक रौशनी शर्मा हॉल में सोफे पर बैठी टेलीविज़न पर अपनी पसंद का कार्यक्रम देख रही थी. 45 साल की दामिनी भी मांसल शरीर की मालकिन थी. सीना कही से भी 40-42 से काम न होगा और उतना हे जानलेवा भरी भरकम पिछवाड़ा. ज्यादा काम न करने की वजह से हल्का उभरा पेट भी इस औरत पर जंचता था.
"अरे, तू कब आया बिनोदि? आ बैठ यहाँ मेरे पास और जी आप अगर इसके साथ हे थे तोह बता नहीं सकते थे की ये भी आ रहा है.? मैं मेरे लाडले के लिए खीर हे बना देती.", विनोद को अपने गले से लगते हुए दामिनी ने शिकायती लहजे में कहा तोह सिंगल सोफे पर बैठते हुए शर्मा ने हँसते हुए जवाब दिया.
"भगवान, आखिरी बार रसोई में कब गयी थी तुम्हे याद भी है? वैसे हम दोनों ने हे बहार जाना था लेकिन पार्टी का फ़ोन नहीं आया इसलिए घर चले आये खाना खाने. तैयार है या समय लगेगा?"
"नमस्ते मां. ये लीजिये पानी और पापा खाना तैयार है आप लोग टेबल पर बैठिये मैं लगवाती हु.", आँचल ट्रे में पानी लिए अपने मां के सामने थोड़ा झुकी तोह बिना दुपट्टे के उसके कमीज से झांकते उन दूधिया उभारो की गहरी घाटी विनोद को ाचे से दिखी. बगल में बैठी दामिनी ने ये भांप लिया लेकिन फ़िलहाल कुछ न कहा क्यूंकि बेटी को तोह मां के इरादों का पता भी न था.
"जाओ जी आप हाथ मुँह धो लो.", दामिनी ने अपनी बेटी के जाते हे अपने पति से कहा तोह शर्मा अंदर की तरफ चल दिया. उसके कमरे में हे बाथरूम था और उसके जाते हे दामिनी ने दबी हुई आवाज में विनोद को लताड़ा.
"मां है तू उसका लेकिन शायद तू हर जवान लड़की को देख कर रिश्ते भूल जाता है.", विनोद के चेहरे पर पहले तोह थोड़ी शर्मिंदगी सी आयी लेकिन तुरंत बड़ी ढिठाई से बोल उठा.
"दीदी, मां हु इसलिए तोह सिर्फ देख रहा था. आप तोह जीजा से ब्याही होते हुए भी इक़बाल का हर तीसरे दिन लेती हो. देख लेना जितनी जवानी आँचल पर आ रही है न तोह हफ्ते महीने में ये किसी न किसी के बिस्टेर पर मिलने वाली है. मैंने भी सुना था वह फार्महाउस पर जब इक़बाल ने आपने आँचल की दिलवाने के बदले डायमंड का हार देने का ऑफर दिया था. उसको तोह आपने कहा था के सोच कर बताउंगी.", विनोद द्वारा अपना हे cheer-haran होते देख दामिनी ने पैंतरा बदला.
"तेरे जीजा यही थे विनोद और आँचल ऐसी वैसी नहीं है. इक़बाल के कहने के बाद जब मैंने इसके सामने उसकी कुछ तारीफ करनी शुरू की तोह जानता है इसने क्या किया?", दामिनी ने सही किया था शिक्षिका की नौकरी छोड़ कर. ऐसी निर्लज्ज कोई महिला शिक्षिका हो भी कैसे सकती है.
"क्या किया था जरा मैं भी तोह सुनु? वैसे मुझे तोह लगा था के आपने अब तक इसका टांका खुलवा दिया होगा.", दोनों को पता था के आँचल को अभी कुछ टाइम और लगेगा इतने लोगो के लिए खाना परोसने में क्योंकि वो अभी भी रसोई में रोटी बना रही थी.
"मेरे मुँह पर पांचो उंगलियां छाप दी थी इसने और बोलै के अगर खुद रंडी हु तोह इसका मतलब ये नहीं की सभी मेरी जैसी होंगी. वो दिन है और आज का दिन, हमारी ठीक से बात न हुई. इसने तोह यहाँ तक कह दिया के इसको मेरे और शंकर के बारे में भी मालूम है. बस इसलिए तुझे रोक रही थी.", दामिनी कुछ खामोश हुई तोह विनोद सोच में पड़ गया.
"ये जीजा की बेटी नहीं है न? झूठ मैट बोलना दीदी, ब्याह से पहले से हे शंकर भैया तुम्हारी ले रहे थे? बाबू (निकेतन) के नामकरण के समय भी तुम चारे वाले कमरे में थी शंकर भैया के साथ, मैंने खुद देखा था तुम्हे.", विनोद के स्वर में इतनी नाराजगी देख दामिनी ने पलके झपका दी.
"हाँ. उसने मुझे गोपाल के साथ देख लिया था जब मैं पहली बार शादी से पहले इस चक्कर में पड़ी थी. गोपाल तोह किसी की आवाज से डर कर भाग गया था लेकिन शंकर ने मेरा चेहरा देखे बिना हे मुझे पेल दिया था. उसके बाद हम दोनों की मर्जी से ये सब एक महीने तक चलता रहा. फिर शादी हो गयी और 8 महीने बाद आँचल.", दामिनी के इतने बड़े खुलासे से विनोद की झांटे सुलग गयी. वो हैरत से अपनी बड़ी बहिन को बस घूरे जा रहा था. खुल कर कुछ बोल नहीं सकता था क्योंकि घर में जीजा और भांजी मौजूद थे. इतने में हे फ़ोन की घंटी ghan-ghanai तोह अंदर वाले कमरे में मौजूद पप शर्मा ने हे बात की.
"आँचल, तुम्हारे सेण्टर से फ़ोन था मैडम का. वो तुम्हारा कोई टेस्ट है 2 बजे आज.", शर्मा ने कपडे बदल लिए थे और जैसे हे अपनी बेटी को ये सुचना दी वो भी रसोई से तुरंत बहार निकल आयी.
"एक काम कीजिये पापा, मैं 2 मिनट में हे कपडे बदल कर आती हु आप प्लीज मुझे सेण्टर छोड़ दीजिये.", आँचल ने जाने से पहले टेबल पर खाने का सामान परोस दिया था और शर्मा ने भी बिना किसी hil-hujjat के अपनी प्लेट में 2 रोटी और सब्जी रखने के साथ निगलना शुरू कर दिया. ये दोनों bhai-behan दिखने के लिए इधर उधर की बातें कर रहे थे पर विनोद का आज मौका मिल चूका था अपनी बहिन से खुल कर बात करने का. अगले 10 मिनट में हे घर में बस यही दोनों बचे थे. जाने से पहले शर्मा ने बता दिया था के उसको भी कचहरी में कुछ काम है तोह वो आँचल को अपने साथ हे लेता आएगा.
"आपने ऐसा क्यों किया दीदी? और वो शंकर भैया बड़ी दलीले देते है परिवार और िज्जात्त की लेकिन उन्होंने अपनी हे बहिन के साथ ये सब कर डाला.? एक तरह तोह आँचल का जीकर करने पर आप मुझे रिश्ते की दुहाई दे रही थी और इतने सालो से आपका खुद का चक्कर अपने भाई से चल रहा है. मान लिया इक़बाल के साथ आपका जिस्मानी सम्बन्ध जीजा की कमजोरी या किसी और वजह से हो पर ये सब करके आपने ठीक नहीं किया.", विनोद भड़क रहा था.
"मुँह मैट खुलवा तू मेरा विनोद. जानबूझ कर जो तू मेरे सोये होने पर वो सब हरकते करता था क्या मुझे पता नहीं चलता था? रौशनी के साथ तोह तू इतना आगे बढ़ गया था की उस दिन पापा खेत से वापिस न आये होते तोह तू तोह चढ़ हे गया था उसके ऊपर. कितनी लड़कियों के साथ तूने वहशीपना किया क्या मुझे खबर नहीं.? शंकर ने जो किया था वो एक लड़की के साथ उसकी मर्जी से किया और जब चेहरे देखा तोह वो शर्मिंदा था. लेकिन उसकी मर्दानगी की वजह से मैंने हे रिश्ता आगे बरकरार रखा. और तू ये कमजोर लड़कियों के साथ हे ऐसा क्यों करता है पता है? तू औरत को ठंडा हे नहीं कर सकता इसलिए बस गाँव की भोली भली लड़कियों को ताक़त से दबाया और अपनी हवस पूरी करके निकल लिया अपने रास्ते. एक औरत बता जो तेरी दीवानी हो? जो खुद से कहे के विनोद तू सच्चा मर्द है?", दामिनी के इस तरह भड़कने से विनोद बगले झाँकने लगा. वो अवसादग्रस्त ऐसा भेड़िया था जो सिर्फ लड़की के कौमार्य भेदन से हे खुश होता था. शायद उनकी तकलीफ देख वो अपनी तकलीफ काम करने वाला दरिंदा था.
रौशनी दीदी वाली बात अलग है लेकिन आपने ठीक नहीं किया."
"हाँ मैंने नहीं किया ठीक और अब कुछ हो भी नहीं सकता. मैं कुछ बदल नहीं सकती और न मैं चाहती हु के ऐसा कुछ हो.", दोनों का हे खाना ठंडा हो रहा था लेकिन अब भूख बची हे नहीं थी. दामिनी को अपने भाई की हैवानियत और कुकर्मो पर गुस्सा था और विनोद व्यथित था की उसकी बहिन सामने से खुद शंकर के साथ रिश्ता बनाने की हामी भर चुकी थी.
"ठीक है फिर अगर ऐसा है तोह हम तीनो हे गलत हुए. लेकिन शंकर भैया ने आपसे सम्बन्ध बनाये तोह इसका खामियाजा उन्हें भी भुगतना होगा. मैं आँचल को भी अपने बिस्टेर पर लाऊंगा और उनकी होनेवाली बहु को भी. इस बार कोई जबरदस्ती नहीं करूँगा लेकिन ये दोनों लड़कियां ऐसा करने पर मजबूर हो जाएँगी. देखती रहना बस आप.", कहने को तोह विनोद गुस्से में इतनी बड़ी बात कह गया लेकिन दामिनी दांत निकाल कर हंसने लगी अपने भाई की बात सुन्न कर.
"तेरी बीवी कहा बिनोदिये? रही बात आँचल की तोह वो तेरे हाथ आने नहीं वाली और शंकर भैया की बहु तक पहुंचने के लिए तुझे ताऊजी से हो कर गुजरना होगा. पहले तोह खेतो से घर तक तुझे छड़ी से लाल करते लाये थे और इस बार कोई गलती की तोह उनके शहर से हमारा शहर बहोत दूर है. रस्ते में हे दम टॉड देगा. अपनी बीवी की चिंता कर जिसको माँ बनाने में हे तुझे 5 साल लग गए और अगर वो वह किसी मर्द के निचे आ गयी तोह 9 महीने बाद तू फिर से बाप बन्न जायेगा.", दामिनी ने अपने भरी कूल्हे सोफे से उठाते हुए टेबल का रुख किया और विनोद गुस्से से भरा बिना आगे कोई बात किये घर से निकल चला. उसकी बड़ी बहिन ने जिस तरह उसकी बेइज्जत्ती की थी उस से विनोद के आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी थी. अपने गुस्से को वो सिर्फ दारु या लड़की से हे ठंडा कर सकता था लेकिन आज कोई शिकार न था इसलिए होटल में शराब का सहारा हे मुमकिन लगा.
'माँ की छूट इन सबकी. साले सभी की गांड फाड़ूंगा और ये देखते रह जाएंगे इनके साथ हुआ क्या. पहले तोह साली वो कुटिया छुड़ेगी कल रात. दलीप की लोंड़िया से ले कर शंकर की हर बेटी की छूट न सड़क पर नीलाम की तोह मैं भी अपने बाप का नहीं.', विनोद बड़बड़ाता हुआ कार में होटल की तरफ निकल लिया. उसको शायद अंदाजा भी नहीं था के आने वाले 2 दिन में उसके साथ क्या कुछ होने वाला है. शायद उसको अपने असली बाप का नाम भी पता चल जाए.
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मंजूबाला के घर में तोह साड़ी दुनिया से कुछ अलग हे खेल जारी थी इस समय पर. हलकी फुलकी chhed-chhaad जो बहार हॉल से शुरू हुई थी, जल्द हे घेरि होने लगी. अलका को सुडोल लम्बी टांगो को ठीक कूल्हों के निचे से बाहों के घेरे में लेते हुए अर्जुन मेनका के कमरे में आ रुका. उसका चेहरा अलका के लाल कैसे हुए कमीज के ऊपर उन मॉटे उभारो के बीच दबा गरम सांसें छोड़ रहा था.
"उम्म्म्म.. बेदर्दी कितना तड़पते हो अपनी लवर को? आठ.. आज देखो मैं तुम्हारी क्या हालत करने वाली हु.", अलका ने बिस्टेर पर गिरने के साथ हे अर्जुन को भी अपने ऊपर खींच लिया. लम्बे बालो में बंधा लाल रबर तोह बहार टेबल पर हे उतार फेंका था अर्जुन ने. अलका के कमर से निचे तक लम्बे बाल बिस्टेर पर उसके निचे फैले अलग हे आभा प्रकट कर रहे थे. उन गहरी आँखों के सामने चेहरे किये अर्जुन बड़े ध्यान से अलका की शिकायत उसके चेहरे से पढ़ रहा था.
एक लमस सी उन गुलाबी होंठो पर थी और दीवानगी उन आँखों में जो अर्जुन को अपना खाविंद तक मान कर उसपे खुद को निसार कर चुकी थी. अर्जुन इस ख़ूबसूरती के जादू से बहार निकलता उस से पहले हे अलका का जादू उस पर गहरा हो गया. आज अर्जुन के साथ उलटी गंगा बही थी और उसको खुद मालूम न चला के वो कब बिस्टेर पर पीठ के बल आ लेता. मजे की इन्तहा से आँखें बंद होती चली गयी जब अलका के होंठो ने अपना रास अर्जुन को पिलाना शुरू किया. रेशमी कमीज के दोनों तरफ अलका की कमर मजबूती से थामे वो बस दुनिया के अंतत तक इस लम्हे में रहने को तैयार लगा. ये शुरुआत से गहरा चुम्बन अब कही ज्यादा हे गहरा और उत्तेजक होने लगा. दोनों हाथ से अर्जुन का चेहरा पकडे हुए अलका उस पर हावी होती जा रही थी. आज जैसे अर्जुन तड़पती प्रेमिका और उस से कही ज्यादा भूखा प्रेमी अलका थी.
"उफ़.. मारने का इरादा है क्या जान? आह्हः..", अर्जुन के निचले होंठ पर अलका की मीठी लार के साथ खुद उसका खून उभर आया था लेकिन तगड़े नशे में प्रतीत होती अलका जैसे इस लहू को देख अलग हे जोश से भर उठी. अपने होंठो पर जीभ फिरती हुई वो एक बार फिर से अर्जुन के होंठो पर टूट पड़ी. बस इस बार वो जानवर की जगह बेहद उत्तेजक अंदाज में उसके होंठो पर जीभ फिरती, कभी मुँह में अपनी जीभ की नोक घुमा कर उसके दांतो से जुंग लड़ती हुई आखिर में जैसे अर्जुन को ऑक्सीजन हे देने लगी. अर्जुन इतना मादक चुम्बन सेहन न कर सका और उस लाल कमीज को झटके से ऊपर की तरफ खींच दिया.
"आठ.. लाख कोशिश कर लो बच्चू, आज नहीं बचने वाले. ये सूट जोर से नहीं दिमाग से खुलेगा. जानवर कही के.", अलका खुद उसके सीने से ऊपर होती हुई अपने कढ़ाईदार लाल कमीज की चैन पीछे से खोल कर थोड़ी मेहनत से जिस्म का ऊपर हिस्सा नुमाया करती हुई अर्जुन को जैसे परेशान कर रही थी. निचे सिर्फ लाल ब्रा में क़ैद उसके वो ख़ास उभार जिन पर अलका ने खासी म्हणत की थी, अलग हे केहर बरपा रहे थे. सीने से निचे बिलकुल अंदर की तरफ धंसा गोरा सुत्वा पेट और वो 26-27 की कमर. अर्जुन के पास कोई अल्फाज न था इस तराशे हुए जिस्म के लिए.
"ओह अलका.. तुम सचमुच जानलेवा हो. इतना भी कोई खुद को कैसे निखार सकता है?", अर्जुन ने लरजते हाथों से उसके चिकने पेट को सहलाते हुए हाथ ऊपर ले जा कर जैसे हे एक उभर को पकड़ा, ब्रा उसके पंजे में आ गयी. अलका पीछे से हुक खोल चुकी थी और अब मंजर और भी dil-faroz था. सच्चे मोटी से अकार के दोनों गुलाबी निप्पल अकड़ कर सीधे खड़े थे. गोर वक्षो पर आया गुलाबीपन स्वाभाविक शरीर गुणवत्ता नुकमाया करता लगा.
"इसशहहह.. इसको निखारने वाला हे ये सवाल कर रहा है? उम्.. बस अभी तुम इन्हे कुछ नहीं करोगे ारु, जो करुँगी वो मैं.", अर्जुन का हाथ अपने मॉटे चुके से हटा कर अलका बिस्टेर पर एक तरफ पलट गयी. अर्जुन के जिस्म पर फांसी टीशर्ट निकालने के साथ हे अलका ने बेल्ट और चैन खोलकर जीन्स भी निचे सरकाई तोह अंडरवियर से 3 इंच बहार निकला वो दहकता सूपड़ा देख बिल्ली सी झपटी.
"उफ़.. आराम से..", अलका का ये रूप देख अर्जुन उठना चाहता था लेकिन एक हाथ के लम्बे नाखून उसके सीने पर दबाव बनाते हुए उसको वापिस लेटने पर मजबूर कर गए. अलका एक हाथ से वो छोटा सा निप्पल कुरेदने के साथ दूसरे में अब वो पूरा 9 इंच का बांस सा मोटा औजार निपुणता से थामे थे. उसकी मजबूत पकड़ बता रही थी की आज अर्जुन ने जो कहा था वैसा अलका हे उसके साथ करने वाली थी. बाजी पलट कर इतना तोह साबित कर हे दिया था के अब तक अर्जुन अपने चाहने वाली का ये रूप देख न पाया था.
"पहले भी तरय किया था लेकिन सॉरी तब साथ न दे सकीय थी. आज कोई शिकायत नहीं होने दूंगी तुम्हे और न इसको जो अपने आपको जाने क्या समझता है. देखो अब कैसे मासूम बना हुआ है और जब आजाद होता है तोह ये तक नहीं देखता के सामने वाला दर्द में है या मजे में.", अलका अर्जुन के लुंड से बातें करती हुई उसके सुपडे पर तर्जनी ऊँगली के नाखून से हलकी रगड़ देने लगी. ये बिलकुल नया एहसास था उसके लिए और मजे से अर्जुन की सिसकारी छूट गयी. लुंड जैसे फटने की हालत में होता हुआ अपने प्रचंड रूप में आया और कुछ समझने से पहले आधा हिस्सा अलका के गरम और गीले मुँह में उतर गया.
"उफ़.. अलका...", अर्जुन के पेट की सभी मांसपेशिया जकड सी गयी थी. मुखमैथुन और वो भी इतने बड़े लुंड का अभी तक कोई भी पूरी तरह न कर पायी थी. अलका का आज वाला अंदाज सबसे अलग था. वो इस तरह से उसके ऊपर झुकी थी जिस से मुँह और गाला एक सिधाई में हो. 8-10 बार आधा लिंग आगे पीछे करने के बाद अलका ने रुक कर एक गहरी सांस लेते हुए अर्जुन को आँख मारी और अगले हे पल उसके कंठ में बहार से भी उस मॉटे लुंड का उभर नजर आने लगा. मुँह बुरी तरह से फ़ैल कर लुंड की जड़ से चिपका था और अर्जुन के जबड़े कस कर भींच गए.
"ओह्ह्ह्ह.. अलका ये क्या कर रही हो जान.. ? उम्म्म.. ", अर्जुन नशे में खुद हे अलका का सर सहलाने लगा और ये लचकदार खूबसूरत बाला अपने मुँह को एक लयबद्ध तरीके से ऊपर निचे करने लग पड़ी. हर बार गले में उस मॉटे सुपडे की दस्तक पर सांस लेने में कठिनाई होती पर अलका ने जाहिर न किया. अर्जुन के बड़े अंडकोष भी लार से पूरी तरह सन्न गए. लुंड पर तोह चिकनाई की बरसात ने बाढ़ का रूप अख्तियार कर लिया था और अलका ने लुंड की अकड़न में इजाफा महसूस किया तोह तुरंत अलग हो गयी.
गहरी सांसें लेती हुई वो अर्जुन को ख़ास हंसी से देख रही थी. अर्जुन अपने चरम से बस एक मिनट दूर था और अलका ने जैसे उसका सुकून छीन लिया. लेकिन अगले हे पल अर्जुन के चेहरे पर फिर से वही सुकून लौट आया जब अलका ने अपनी सलवार और लाल पंतय निकल कर वो दुर्लभ फूले हुए नितम्भ अर्जुन के चेहरे की दोनों तरफ पेश किये.
"जानती हु की तुम्हारी आँखें इन्हे सबसे ज्यादा पसंद करती है. चलो तुम अपना प्यार दिखाओ मैं अपने दिल की करती हु.", अलका ने कामसूत्र की वो प्रमुख उनहत्तर (69) वाली मुद्रा बनाते हुए लम्बी चिकनी टाँगे मोड़ते हुए अपना महकता यौवन अर्जुन के चेहरे पर टिका दिया. उसकी मुट्ठी में एक बार फिर से अर्जुन का वो विकराल मूसल था जिसपर अलका की लम्बी उँगलियाँ भी पूरा घेरा बना पाने में असमर्थ थी. मुँह में दर्द होने के बावजूद अलका ने एक बार फिर से उस गुलाबी सुपडे से इश्क़ जाताना शुरू कर दिया.
इस बार ये पहले की तरह प्रबल न होते हुए बेहद कामुक था. कभी सुपडे को चूमती तोह कभी उसको होंठो में दबा कर लार से भीगोंगे लगती. हाथ निरंतर ऊपर निचे हिलाते हुई वो पूरे लुंड को प्यार करने में लगी थी. एकाएक एक मदद्भरी सिसकारी अलका के होंठो से निकली और अपनी छूट को अर्जुन द्वारा चूसे जाने पर वो साखळीत होने लगी. ये इतनी देर से रोके हुए बाँध का दिवार देहना अर्जुन के लिए भी मजेदार रहा. वो निरंतर अलका के गुलाबी यौवन पर जीभ, होंठो से कलाकारी करता एक एक कतरे को निचोड़ने लगा. 69 की मुद्रा अब एक तरफ से विभाजित हो गयी थी.
"आह्हः.. ऐसे हे अर्जुन.. ऐसे हे प्यार से उम्म्म्म.. आह्ह्ह्ह..", अलका से अब और तपिश न सहते बानी तोह वो बिस्टेर पर लुढ़क गयी. अर्जुन सहज भाव से घूम कर उसके ऊपर आ गया.
"स्टैमिना तोह ाचा है तुम्हारा और एक बार तोह लगा था के तुम जीत गयी.", अर्जुन ने एक हाथ से अलका की चिकनी टांग फैलते हुए दूसरे हाथ से चिकना सतांन पकड़ कर दबाते हुए कहा तोह अलका बोझिल नजरो से मुस्कुराई.
"इसमें हार जीत नहीं होती अर्जुन. समर्पण होता है और सिर्फ समर्पण. तुम्हारा होने वाला था इसलिए मैं अलग हुई. अब तुम बिना कुछ और कहे अपनी अलका को बस प्यार करो.", अलका ने अर्जुन को निरुत्तर करते हुए खुद हे अपने यौवन द्वार पर उसका अकड़ा हुआ गीला सूपड़ा भिड़ा दिया.
"ी लव अलका.", अर्जुन ने झुकते हुए कोई करारा धक्का न लगाया और बस होंठो से होंठ मिलते हुए दोनों के कॉमर्स की चिकनाहट का प्रयोग करते हुए बड़े प्यार से अलका की छूट को खोलने का उपक्रम किया. एक बार के लिए अलका के जिस्म में दर्द की भीषण लहरें उठी और उसने खुद हे कमर उचकाते हुए अपनी छूट को अर्जुन के मूसल की जड़ से चिपका दिए. एक भीषण दर्द को सेहन करती वो उस से चिपक कर आने वाले सुखद समय का इंजतार करने लगी.
"पागल कही की.. aahhh..",Arjun को जबतक पता लगा तबतक काम हो चूका था.
"अरे, ये ऐसी हे तोह है और जानती है तुम्हारे पेनिस को. आअह्ह्ह.. अब बस रुकना नहीं क्योंकि ये राउंड लम्बा नहीं चलने वाला.", अलका के कहने का मतलब अर्जुन समझ रहा था लेकिन शायद वो इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता था. दोनों बेजोड़ मॉटे और सख्त चुचो को हथेली में पकड़ कर दबाते हुए अर्जुन ने आधा लुंड बहार निकला तोह औंस की बूंदे बहती अलका की कासी हुई छूट का गुलाबी हिस्सा भी लुंड के साथ बहार आता दिखा. अलका के कूल्हों की वो गहरी दरार के मुहाने से गलबी गांड का छेड़ भी कॉमर्स से भीगा बंद छोटे से फूल सा था.
"आह्हः.. ऐसे हे जान.. ये सचमुच बहोत बड़ा है.. aahh..",Arjun को सर सहलाती हुई अलका खुद हे अपने चुके चुसाई के साथ ये मजबूत घर्षण छूट में झेलती हुई कसमसाने लगी. लम्बी टाँगे अर्जुन की कमर पर लपेटे वो जड़ तक उस मॉटे मूसल को अंदर लेती हुई खुल कर आहें भरने लगी. एकांत घर जो अंदर से बंद था, एकदम सही जगह थी पूर्ण मिलान की. न कोई रोकटोक और न खुद को रोकने की जेहमत.
"उम्म्म.. सचमुच अलका, तुम बहोत ख़ास हो.. आठ.. हर बार ऐसा लगता है के तुम्हारे साथ ये पहली बार hai...ummm", एक निप्पल को चूस चूस कर अर्जुन ने लाल करने के बाद दूसरे वाले को मुँह में भर लिया. कमर निरंतर उस फूली हुई baal-vihin गोरी छूट का हुलिया दुरुस्त कर रही थी. हर गहरी धक्के से ठप्प की आवाज उन मॉटे कूल्हों से निकलती और अलका ने जैसे हे गुदाद्वार के भीतर जाती ऊँगली महसूस की, वो खुल कर झड़ने लगी.
"एआईईईई.. मर्डर गयी यार.. आह्हः. वह ऐसा क्या बटन है .. आह्ह्ह्ह.. उम्म्म..", अर्जुन तुरंत धक्के लगाना रोकक कर एक ऊँगली से वो टाइट गुलाबी गुदाद्वार ढीला करने लग पड़ा. ये सही समय था जब छूट से निकलता कॉमर्स इस कैसे हुए छेड़ को चिकना कर रहा था. एक ऊँगली अंदर उतारने के साथ हे अर्जुन ने अलका के होंठ चूमते हुए दूसरी वाली भी तिरछी करते हुए उसमे समाहित कर दी. सचमुच अलका के कूल्हों की तरह गुदाद्वार भी लचीला था जो इतनी मोटी 2 उँगलियाँ अंदर लील गया. दर्द जरूर हुआ लेकिन पल भर के लिए.
"उफ़... मतलब पहले हे राउंड में बैकडोर को भी खोलने वाले हो? आह्हः.."
"तुमने हे कहा था न के मुझे ये सबसे प्यारे लगते है? सच कहु तोह तुम किसी यूरोपियन मॉडल से भी ज्यादा बेहतर हो अलका. ऐसे हिप्स किसी के भी नहीं है. उमाहहह..", अर्जुन अपनी बात कहने के साथ फिर से हलके धक्के लगते हुए अलका की छूट को सुकून और लुंड से भरने में जुट गया. एक हाथ चुचो को मसल रहा था और दूसरा निरंतर उन मादक कूल्हों के बीच उस कैसे हुए गांड के छल्ले को ढीला करता रहा. अलका के जिस्म पर चौतरफा हमले भी स्वर्ग सा मजा दे रहे थे.
"आह्हः.. आ जाओ अपनी फवौरीते जगह.. आह्हः..", मॉटे चुके निरंतर मर्दन से लाल हो चुके थे और निप्पल फूल कर दोगे मॉटे. अर्जुन अलका की बात सुन्न कर अलग हुआ तोह वही मीठा दर्द छूट में भर गया जरुरत से ज्यादा हे बड़े सुपडे के बहार निकलते हे.
"आह्हः.. ऐसे हे करोगे?", अलका ने अर्जुन की इत्छा पूछते हुए अपनी छूट पर हथेली राखी और आँखें मजे से बंद कर ली. अर्जुन को अलका पर इतना प्यार आ रहा था के एक पल को उसने अपनी इत्छा त्यागने का इरादा बनाते हुए बिस्टेर पर अलका की बगल में करवट ले ली. लम्बे बालो को संवारता हुआ वो उसके गाल पर होंठ रखे बस प्यार जताने लगा. अलका ने भी इस प्यारभरे एहसास से अर्जुन की तरफ चेहरा किया और उसकी मंशा जान कर होंठो पर हलके से चुम्बन जड़ दिया.
"रहने दो न अलका, हम आगे हे करते है.", अर्जुन ने खुद पर अलका को सवार होते देख रोकना चाहा.
"मुझे भी मजा आता है और तुम वह पहले भी कर चुके हो. एक बार तोह एक हे रात में 3 बार. उफ़.. दर्द सिर्फ ये मोटा मशरुम जैसा part अंदर जाते हुए होता है.. आठ", अर्जुन की मजे की इन्तहा हो चुकी थी अलका की हिम्मत और फिर अपने लुंड को उस गरम कैसे हुए छेड़ में धंसते हुए महसूस करके. इतने मॉटे मूसल को हर गांड नहीं झेल सकती थी लेकिन अलका सबसे अलग जो थी इस मामले में.
"आठ.. इधर आओ..", अर्जुन ने अलका को बाहों में भर लिया जब आधे से ज्यादा लुंड वो अंदर ले चुकी. गांड का वो चवन्नी से भी छोटा सा गुलाबी बंद छेड़ बुरी तरह उस मूसल को जकड़े था. और जल्द हे अलका की कमर अर्जुन के धक्को के बराबर हिलने लगी. मजबूत छाती से रगड़ते उसके मॉटे चुचो भी हर धक्के से आनंदति होने लगे. अलका अब खुल कर तेज आहें ले रही थी. हर धक्के के साथ वो 'ी लव यू' उम्म्म्म 'मेरी जान' और तेज और तेज की आवाजें निकलती हुई एक तरह से अर्जुन पर फिर से हावी हो गयी.
"ी लव यू अलका.. aahhh..mera होने वाला है आह्ह्ह्ह..", अर्जुन ने मजबूती से दोनों फूले हुए कूल्हों को दबोचते हुए दुमदार धक्के लगाने लगा था. लुंड भी इतनी घातक और कासी हुई चुदाई से बुरी तरह लाल पड़ने लगा. नसों में जब तूफानी उबाल भरने लगा तोह अलका का जिस्म भी मस्ती से अकड़ने लगा.
"ोुह्ह्ह्ह.. अर्जुनंनं.. मैं भी आइइइइइ. ... माहहहह...", गरम वीर्य की बौछार ने जो सिकाई करनी शुरू की, अलका भी अर्जुन के पेट के निचले हिस्से पर रगड़ खाती छूट से सुनेहरा कॉमर्स बरसाने लगी. ये वाला सखलन उसका अर्जुन के सामान हे चला. शरीर एक दूसरे से बुरी तरह लिपट चुके थे और अर्जुन ने भी लुंड बहार निकलने की जेहमत न करि. उस 1 मिनट पहले रोके सखलन के बावजूद अर्जुन ने दोनों छेड़ो की 30 मिनट तक ाची चुदाई करि थी. गांड से लुंड निकलने पर दोनों के चरम में रुकावट आना लाजमी था. अगले आधे घंटे अलका उसके ऊपर ऐसे हे आराम करती रही, आँख लगने के साथ. एक पल के लिए शरीर ने झटका खाया था जब वो मूसल नरम हो कर बहार निकला. अभी तोह इनके पास डेढ़ घंटे से अधिक समय बाकी था और अलका की दूसरी बार वाली हसरत अर्जुन बाथरूम में पूरी करने वाला था.
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"शालिनी, तुम्हे क्या हुआ है? सुबह से देख रही हु की खामोश हो और जबसे वापिस आये है तुम अपने कमरे से बहार नहीं निकली?", ये हवेली में राजेश्वर जी थी जो अपनी ननद को खाने के लिए बुलाने आयी थी. बेशक दोपहर के 3 बज चुके थे और आज देरी हो गयी थी लेकिन शालिनी का यु सबसे अलग और अकेले रहना राजेश्वरी को व्यथित कर रहा था.
"नहीं भाभी मैं तोह बिलकुल ठीक हु बस रात नींद पूरी नहीं हुई और फिर सफर. आपको तोह पता हे है के नाश्ते के बाद मुझे सफर करना पसंद नहीं. इसलिए बस आराम कर रही थी और मैं ठीक हु.", शालिनी ने एक झूठी मुस्कान देते हुए बिस्टेर छोड़ा और अलमारी से सलवार कमीज निकालने लगी, घर पर पहन ने के लिए. राजेश्वर बड़े ध्यान से देख रही थी अपनी ननद को. सलवार कमीज का ढेर लगा था अलमारी में लेकिन शालिनी को कभी उन वस्त्रो में किसी ने देखा नहीं था. शादी के बाद से हे वो सिर्फ साड़ी और रात में सोने के वक़्त पूरी लम्बाई का गाउन हे पहनती थी. ये सब उसने बस सिल्वा लिए थे और पिछले 20 वर्षो में इनकी गिनती में इजाफा होता रहा पर अलमारी में बंद हे रहे.
"क्या बात ननद रानी, एक तरफ तोह आप सारा दिन सबसे अलग थलग रही और अब दूसरा झटका दे रही हो ये सलवार कमीज को अलमारी से निकाल कर.", शालिनी इस बार स्वाभाविक रूप से मुस्कुराई जैसे वो अब कुछ सोच चुकी थी.
"ऐसा है भाभी की अब मैं हु अपनी माँ के घर, आइंदा ये saree-varee नहीं पहन ने वाली मैं यहाँ घर में. जो कम्फर्टेबले है वही pehan-na ठीक और ये साड़ी से तोह ज्यादा हे ठीक है. आप खाना लगवाओ, मैं नाहा कर आती हु 5 मिनट में.", शालिनी जवाब देने के साथ हे बाथरूम में चली गयी, पीछे अपनी भाभी को हैरत में छोड़ के.
'ये कौनसा जादू हुआ है? सब बोलते रहे के सूट पहना करो तोह बस सिलवाती रही और आज इसको याद आया के ये अपनी माँ के घर है? माँ जी को बताना पड़ेगा की शालिनी का संतुलन हिल गया है.', राजेश्वरी सोचने के साथ हे हंसती हुई कमरे से बहार चली गयी लेकिन अंदर इस आलिशान बाथरूम में साड़ी खोलने के बाद सिर्फ सफ़ेद ब्रा और पंतय में कड़ी शालिनी खुद को आईने में निहार रही थी. 40 पार होने के बावजूद वो किसी नवब्याहता सी थी और समतल पेट के साथ कासी हुई छाती और उतना हे बहार को निकला हुआ पृष्ठ भाग. लम्बाई तोह जैसे इस घर को वरदान हे थी और विन्नी के सामान शालिनी भी 5'7" की लम्बाई और खूबसूरत काया की मालकिन थी.
'पागल कर हे दिया न मुझे? सुबह से खुद को देखने से बच रही हु और तुम्हारे होंठो का ये निशाँ आग लगा रहा है. िस्स्सस्स.. गलती मेरी हे है लेकिन ऐसी गलती हर बार होगी जब जब तुम मेरे पास होंगे. सॉरी लेकिन कल जरूर कुछ वक़्त तुम्हारे साथ रहूंगी.', शालिनी के उन ठोस उभारो के ऊपर एक नीला निशाँ बना था जैसे वह किसी ने गहरा स्पर्श दिया हो होंठो से. एक पल में हे वो दोनों अंगवस्त्र फर्श पर पड़े थे और शालिनी अपने कैसे हुए बदन की नुमाइश सी करती 5 कदम दूर उस फुहारे के निचे जा कड़ी हुई. सामने योनि पर बालो का साया था जिस पर हाथ फिरते हे वो होंठ टेढ़े करके खुद से हे कहने लगी.
'तुम्हे भी जाना होगा अब. मुझे ाचा नहीं लगा जब उसका हाथ यहाँ था और तुम बीच में आ गए... आह्हः.. सचमुच तुम वही हो जिस से मैं बचपन से प्यार करती आयी हु. आह्हः.. बस आज के लिए इतना हे बाकी जब तुम मिलोगे तब तुम्हारी शालू पूरी तुम्हारी.', शालिनी ने भीगा बदन तोलिये से लपेटा और आईने के सामने कड़ी हो कर अपने जिस्म को देख कर पौंछने लगी. पिछली रात उसने खुद हे अर्जुन के जिस्म पर खुद को ुधा दिया था. बस सीने पर एक गहरे चुम्बन और छूट पर अनजानी रगड़ से हे शालिनी का वजूद हिल गया था. लेकिन अब वो पीछे हटने वाली नहीं थी. उसने सोच लिया था के झूठ के आवरण से वो अब बहार हे रहेगी.
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नया रूप (1)
"तुम्हे पता भी है तुम्हारी एक नादानी की वजह से आज तुम्हारे साथ क्या हो सकता था?", मंजू के मुँह पर पानी मारने के बावजूद उसको होश 20-25 मिनट बाद आया. कुछ पल आँखें बस धुंदला सा देख प् रही थी और अलका ने जब गीले रुमाल से उसका चेहरा फिर से साफ़ किया तोह मंजू को अपनी स्थिति का भान हुआ. सर हल्का सा भारी हो रहा था और उसकी बगल में अलका बड़े प्यार से उसको हे निहार रही थी. अर्जुन के शब्दों से वो एक पल खामोश डिकी और उसके बाद जहर जहर उसकी आँखों से आंसू बह निकले.
"शांत हो जाओ, मंजू.. शांत. जब तक अर्जुन है, तब तक तुम्हारे साथ कुछ भी बुरा नहीं हो सकता. भगवन भी नहीं चाहता की तुम्हे कोई दुःख मिले. अब रोना बंद करो और अर्जुन को बताओ ये सब हुआ कैसे.", अलका ने के बार फिर से मंजू का चेहरा साफ़ किया और पानी की बोतल होंठो से लगा दी. कुछ समय लगा मंजू को सहज होने में और फिर बड़ी मुश्किल से उसने बोलै शुरू किया.
"वो मेनका दीदी आज स्कूटी से गयी थी सेण्टर क्योंकि कार का टायर पंक्चर था. उन्होंने मुझे कहा भी था की वो मुझे तुम्हारे घर छोड़ देती है लेकिन मैंने सोचा सरदार जी के गैराज फ़ोन करके पहले कार बनवा लू. फिर प्रीती या ऋतू को बुला लुंगी साथ ले जाने के लिए. गैराज फ़ोन किया तोह अंकल जी ने भी कहा के वो 15 मिनट में लड़का भेज देंगे. 10 मिनट बाद 2 लोग आये जब घर की बेल्ल बजने पर मैंने गेट खोल कर देखा. मुझे लगा वो लोग गैराज से होंगे और मैंने उन्हें कार का टायर बदलने का बोल दिया. जब एक ने पानी के लिए कहा तोह मैं बस वापिस जाने के लिए मुड़ी हे थी और फिर कुछ याद नहीं.", मंजू की आँखें एक बार फिर नम्म होने लगी तोह अलका ने उसको अपने सीने से लगा लिया. अर्जुन भी ऐसा करना चाहता था लेकिन फिलहाल कुछ और ज्यादा जरुरी था उसके लिए.
"वैसे एक बात तोह बताओ मंजू, क्या हमारे घर से पापा या चाचा तुमसे मिलने आये थे क्या पिछले 2-3 दिन में?", अर्जुन को कुछ खटक रहा था और वो संतुष्ट नहीं था आज जो भी हुआ उस घटनाक्रम से. मंजुए ने उसकी तरफ देखते हुए स्वाभाविक तरीके से हाँ में गर्दन हिला दी.
"वो मौसी (रेखा) ने नरिंदर अंकल के हाथ कपडे भिजवाए थे वह मंदिर जाने के लिए. तुम शायद उस वक़्त घर नहीं थे और अंकल के साथ कोई विनोद अंकल भी आये थे. परोसो से पहले वाले दिन शाम की बात है ये. तुम्हे क्या उन अंकल पर शक है अर्जुन? वैसे भी वो पहले तोह अजीब तरह से देख रहे थे मुझे.", मंजू ने जैसा देखा वही बयान कर दिया था और अर्जुन फिर से सोच में पड़ गया. उसको ये बात हजम नहीं हो रही थी की उन्होंने मंजू को हे क्यों चुना? हाँ इसका घर यहाँ सुनसान सेक्टर में है और गली में मुश्किल से 4 हे घर बने हुए था और सबसे पहले वाला ये घर होने से इस काम को अंजाम देना इतना मुश्किल भी नहीं था पेशवर व्यक्ति के लिए.
"पहले देख रहे थे से क्या मतलब? बाद में क्या बात हुई थी और क्या चाचा अंदर भी आये थे घर में?", अर्जुन अपने चाचा को ाचे से जानता था की वो बचो से एक सामान प्यार करते है और मंजू से उनका सिर्फ एक रिश्ता तोह था नहीं.
"मेनका दीदी ने जिद्द करके उन्हें शरबत के लिए अंदर बुला लिया था क्यूंकि पिछली बार वो आरती को बहार से हे छोड़ कर चले गए थे. नरिंदर अंकल ने दीदी का परिचय अपनी छोटी बहिन के तौर पर दिया था और मेरा कुछ अलग.", मंजू भी कहते कहते कुछ सोचने लगी थी.
"क्या रिश्ता बताया उन्होंने?"
"पहले तोह यही कहा के ये मेरे लिए बिलकुल Aarti-Ritu जैसी है. फिर कहा के मैं राजेश मां की बिज़नेस पार्टनर हु और दलीप सिंह की बेटी. उसके बाद दूसरे अंकल ने मुझे उस नजर से नहीं देखा था जिस तरह वो गेट पर घूर रहे थे. बस कुछ पढाई और मेनका दीदी की बारे में बात की. घर पे और कौन रहता है जैसी नार्मल बात."
"धत्त तेरे की. ये नार्मल बात लगती है तुम्हे की एक आदमी तुम्हारी दिनचर्या के बारे में पहली मुलाकात में हे पूछ रहा है. मतलब उसको ये भी मालूम हो गया होगा की मेनका किस टाइम सेण्टर पर जाती है और कैसे जाती है. वो स्कूटी से गयी तोह समझ लो वो बच गयी मंजू. क्योंकि जिस तरह से तुम्हारा किडनैप किया गया है इसका मतलब है तुम पर कल से हे नजर राखी जा रही थी. हो सकता है वो तुम्हारे साथ मेनका को भी किडनैप कर लेते अगर उन्हें उस से प्रॉब्लम होने लगती. लेकिन वो निकल गयी तोह उनके लिए तुम्हे काबू करना कोई बड़ी बात नहीं थी. उनकी जगह मैं होता तोह कार के शीशे भी उसके रंग की तरह काले उसे करता. वैसे भी मुझे तुम दिखाई नहीं दी थी बस वो पाँव दिखे जिन्हे बाँध रखा था और उस कार का इतनी तेज स्पीड पर चलना. अब तुम ये बात किसी ने नहीं कहोगी, किसी से भी मतलब ऋतू दीदी से भी नहीं. अलका दीदी, जरा इसको गेट तक छोड़ देना. मंजू, शादी तक अबसे पूरा दिन तुम यही रहोगी और रात में वह पर कोई भी 2 बहने तुम्हारे साथ रहा करेंगी. छोटी सी भी बात को अनदेखा किया तोह सोच लेना.", अर्जुन ने जिस तरह से हिदायते देने के बाद घुड़की दी थी, पहली बार मंजू के चेहरे पर शर्म और मुस्कराहट डिकी. अलका ने सहारा देते हुए कार से निकलने में मदद की तोह मंजू ने हाँ में सर हिलाया.
"अलका, मैं चली जाउंगी. शायद तुम दोनों मार्किट के लिए निकले होंगे और मेरी वजह से देरी हो गयी.", मंजू अब बेहतर थी और उसकी बात सुन्न कर अलका मुस्कुराती हुई उसको हाथ हिला कर वापिस कार की अगली सीट पर जा बैठी. इस बीच कोई और भी था जिसने इन दोनों को ऊपर वाले कमरे से देख लिया जाते हुए.
"तोह अब क्या इरादा है मेरे मजनू?", अलका ने अर्जुन का मैं हल्का करने के इरादे से ऐसा कहा तोह अब तक अर्जुन भी बेहतर हो चूका था. उसके चेहरे पर फिर वही मुस्कराहट छा गयी.
"मंजू हमारे घर, सेण्टर के बाद मेनका भी इधर तोह हम दोनों उनके घर. समझ लो किडनैप की गहरी छानबीन करनी है.", अर्जुन के 'गहरी छानबीन' का मतलब अलका ाचे से समझ रही थी. कार को दूसरे रस्ते से घूमते हुए अर्जुन अपनी मंजिल की तरफ बढ़ चला. बबिता के साथ रात को तगड़ा मिलान करने के बावजूद उसको सुकून न था और अलका की तोह चाहत हे यही रहती थी की कब वो कुछ पल एकांत के अपने इस आशिक़ के साथ गुजरे.
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"अब सब फाइनल है तोह तुम परेशां क्यों हो विनोद? वैसे भी वो लोग मेरे भी साले हे हैं जैसे तुम तोह रिश्ते का वजन भारी रहेगा हे.", आँखों पर नजर का चस्मा लगाए ये अधेड़ व्यक्ति पूरा घाघ जान पड़ता था. विनोद अभी अपने इस बड़े जीजा के साथ उसके हे दफ्तर में बैठा था और मेज पर कुछ कागजो के साथ साथ जमीन के दस्तावेज रखे थे.
"जीजा ऐसा है की पैसे तोह हम 20 करोड़ लगा हे रहे है लेकिन राजेश जो है वो थोड़ा सनकी आदमी है. उसके साथ दलीप भी होगा जो बिलकुल उसके जैसा हे है और कही आपकी 51% वाली बात पर मसला न हो जाये. बात तोह आपकी ठीक है की हमारा कद्द एक इंच ऊपर हे रहना चाहिए लेकिन गरमा गर्मी न हो जाए. वैसे भी वो 2 लड़कियों वाले मामले में मुझे धमकी दे चूका है और यहाँ शर्त भी यही राखी है की मेरा भविष्य में किसी भी लड़की से चक्कर सुन्न ने में नहीं आना चाहिए.", विनोद ने अपनी परेशानी की वजह बताई तोह पप शर्मा भी एक पल को सोचने का नाटक करने लगा.
"हँ.. तोह तुम क्या चाहते हो वो बताओ?"
"मैं.. मैं सोच रहा था के जब जमीन पर परमिशन मिल जाए तोह हम होटल पर पूरा अधिकार हे कर ले.", विनोद ने अपनी गन्दी मंशा बताई तोह पप शर्मा के चेहरे पर भी कुटिल मुस्कान आ गयी.
"हाहाहा.. मतलब तुम अपने हे बड़े भाई के साथ देगा करने की सोच रहे हो?"
"न जीजा न. ऐसा मैं थोड़ी न करूँगा. ये होगा इक़बाल भाई की मदद से और इसमें शंकर का क्या लेना देना जब वो व्यापारी आदमी हे नहीं. उसको तोह अपने काम से मतलब है. यहाँ डील राजेश और हमारे बीच में होने वाली है. वो लोग यहाँ आएंगे तोह सबसे पहले उन्हें अपनी राजनीतिक और दहशतगर्दी वाली ताक़त बिना ज्यादा कुछ कहे दिखानी है. वैसे भी वो लोग इस जगह आ रहे है और मैं तोह एक तरह से मध्यस्थ वाली भूमिका में हु. पहले हमारा लोकल रुतबा दिखेगा और फिर कॉन्ट्रैक्ट सिग्न होगा."
"तुम क्या सोच कर बैठे हो विनोद? पूरी बात बताओ मुझे क्योंकि ऐसा लग रहा है जैसे तुम उन्हें किसी और तरह भी दबाने वाले हो.", शर्मा घाघ होने के साथ कुछ समझदार भी था या फिर वो अपने साले को ाचे से समझता था.
"ऐसा है जीजा की एक बार डील फाइनल हो जाये कल, फिर उसके बाद इक़बाल भाई राजेश और दलीप से नया करार करेंगे. मैं भी जानता हु की आपको भी अब इक़बाल से छुटकारा चाहिए लेकिन काम ऐसे होगा की इक़बाल भाई भी रस्ते से हट जायेगा और राजेश ये 5 सितारा होटल भी हमको चुपचाप सौंप देगा.", विनोद की इतनी खतरनाक बात सुन्न कर शर्मा ने कांच वाला दरवाजा चाबी से बंद करने के बाद आधी बोतल पानी की एक सांस में जातक ली.
"बहनचोद तू आग से खेलने की बात कर रहा है. इक़बाल चुटिया नहीं है के वो कुछ टट्टू से व्यापारियों के हाथो चढ़ जाए. मान लिया की मेरे लिए भी ये साला बवासीर हो चूका है पर हम इस से छुटकारा नहीं पा सकते. वो हमारी सुरक्षा संभालता है विनोद और हर आपराधिक काम को अपने ऊपर लेता है. ये होटल जमीन से हमको घंटा मुनाफा नहीं होता अगर इक़बाल नशे और jism-faroshi के काम में हमारा संरक्षक नहीं हो. हाँ अब उस कमीने को 40% देना मुझे भी अखरता है पर हम दोनों के लिए 60% बहोत है."
"अब हमको उसकी जरुरत नहीं रहेगा जीजा. मेरे पास अब अपने हे लोग है जो सुरक्षा भी देंगे और कमीशन भी 10%. आप नशा सम्भालो और मैं ये लड़कियां देखूंगा. राजेश की बिज़नेस पार्टनर जो दलीप की बेटी भी है वो अब मेरे कब्जे में है और अगले 1 महीने तक इस बात की खबर किसी को नहीं होगी. आपने भी जुबान खोली तोह..", विनोद ने अपने बड़े जीजा को हे साफ़ साफ़ धमकी दे दी थी मंजू के बारे में अगर उसने मुँह खोला तोह.
"बहनचोद, सही बता क्या करने वाला है तू?"
"गिल हमारे लिए काम करने को तैयार है जीजा. कल मीटिंग में कैसे भी करके बस हमको ऐसा दिखाना है के लड़कियों वाला धंदा इक़बाल संभालता है. उधर वो लड़की गायब है इसका जीकर नहीं करना फ़िलहाल. फिर कुछ सबूत इक़बाल के पास चिपकाने है और एक फ़ोन इक़बाल के अंदाज में राजेश और दलीप के पास जाएगा. होटल में राजेश वाला हिस्सा इक़बाल के नाम और बदले में वो उनकी बेटी वापिस कर देगा. अब 2 ताक़तवर लोगो में घमासान होगा तोह एक का मरना निश्चित है. इक़बाल मारा गया तोह वैसे भी हमको 30% का मुनाफा हे होगा और बच भी गया तोह लड़की उसके फार्महाउस से बरामद होगी जिधर मैं खुद पुलिस भिजवाऊंगा. ऐसा करने से होटल का 51 की जगह 100 हे अपना समझो. मतलब मैं मेरे बड़े भाई और राजेश की नजर में बिलकुल साफ़ और उनका अपना हो जाऊंगा. थोड़ा तुम भी ड्रामा कर देना की इक़बाल की ताक़त की वजह से हम उस से डब्ब के रहते थे और उसके इरादे ऐसे होंगे ये हमको भी मालूम न था. जब पता लगा तोह खुद पुलिस बुलवा दी.", विनोद की बातें सुन्न कर शर्मा का तोह दिमाग हे चक्र गया था. वो तोह खुद को सबसे अकल्मन्द समझता था लेकिन एक मूरख को maha-murakh के रूप में अपने से बड़ा बुद्धिमान दिख जाये तोह ये कोई बड़ी बात हे नहीं.
सच तोह ये था की विनोद के पतन की तारीख तोह खुद उसने तये कर ली थी ये होटल वाला सौदा मंजूर करते हे. जो लोग उसके पास कल आने वाले थे वो इन सभी को ठिकाने लगाने के मकसद से हे आ रहे थे जिसकी वजह jism-faroshi, गाँव की भोली लड़कियों का शोषण और hotel-farm पर पार्टी की आड़ में नशे की महफिले करवाने जैसे इनके घिनोने काम था. मंजू पर भी समय से पहले हे हाथ दाल कर विनोद ने अपनी maha-moorakhta का साफ़ प्रदर्शन किया था और उन्हें इसकी भनक तक न थी की आगे उनके साथ क्या होने वाला है और कौन कौन इनके साथ क्या क्या करेगा.
"दिमाग तोह सही लगाया है तुमने विनोद और निश्चिंत रहो मैं तोह तुम्हे अपना सबकुछ मानता हु. जो भी कर रहे हो वो हम दोनों के लिए हे कर रहे हो तोह मैं पीछे नहीं हटूंगा. वैसे रमन (विनोद का दूसरा जीजा) के लिए भी कुछ सोचो. बेचारा कब तक मैनेजर जैसी ज़िन्दगी जीता रहेगा? मेरा ऑफर तोह वो मान नहीं रहा, तुम बात करके देखो.", शर्मा ने माहौल को हल्का करने के अंदाज में ऐसा कहा था और विनोद उठ खड़ा हुआ.
"चलो पहले आप लंच करवा दो जरा दीदी के हाथो का बना गरमा गरम. फिर रमन जीजा को भी कुछ ढंग का काम देते है. वैसे भी रौशनी (रमन की बीवी) दीदी से ज्यादा चिंता मुझे अंजलि (विनोद की भांजी) बिटिया की रहती है. वैसे अभी घर पे कौन कौन होगा?", विनोद के साथ हे पप शर्मा भी उठ कर दफ्तर से बहार आ गया. एक बार फिर से दरवाजे पर टाला लगाने के बाद दोनों बगल वाले घर की तरफ बढ़ चले.
"तेरी दीदी का तोह मैं क्या हे कहु विनोद. वो और उसके saas-bahu वाले ड्रामा हे चलते रहते है 24 घंटे. हाँ आँचल (पप शर्मा की बेटी) के लिए रिश्ता ढून्ढ रहे है अब और तेरी नजर में कोई ढंग का कारोबारी लड़का हो तोह मां होने का फ़र्ज़ निभाओ.", पप शर्मा के भी सिर्फ एक हे औलाद थी जो बा करने के बाद अब कंप्यूटर का कोर्स कर रही थी. 23 साल की आँचल पंजाब में पाली बढ़ी होने से एक गदराई हुई tej-tarraar लड़की थी. दोनों जीजा साला घर में दाखिल हुए तोह उम्मीद की मुताबिक रौशनी शर्मा हॉल में सोफे पर बैठी टेलीविज़न पर अपनी पसंद का कार्यक्रम देख रही थी. 45 साल की दामिनी भी मांसल शरीर की मालकिन थी. सीना कही से भी 40-42 से काम न होगा और उतना हे जानलेवा भरी भरकम पिछवाड़ा. ज्यादा काम न करने की वजह से हल्का उभरा पेट भी इस औरत पर जंचता था.
"अरे, तू कब आया बिनोदि? आ बैठ यहाँ मेरे पास और जी आप अगर इसके साथ हे थे तोह बता नहीं सकते थे की ये भी आ रहा है.? मैं मेरे लाडले के लिए खीर हे बना देती.", विनोद को अपने गले से लगते हुए दामिनी ने शिकायती लहजे में कहा तोह सिंगल सोफे पर बैठते हुए शर्मा ने हँसते हुए जवाब दिया.
"भगवान, आखिरी बार रसोई में कब गयी थी तुम्हे याद भी है? वैसे हम दोनों ने हे बहार जाना था लेकिन पार्टी का फ़ोन नहीं आया इसलिए घर चले आये खाना खाने. तैयार है या समय लगेगा?"
"नमस्ते मां. ये लीजिये पानी और पापा खाना तैयार है आप लोग टेबल पर बैठिये मैं लगवाती हु.", आँचल ट्रे में पानी लिए अपने मां के सामने थोड़ा झुकी तोह बिना दुपट्टे के उसके कमीज से झांकते उन दूधिया उभारो की गहरी घाटी विनोद को ाचे से दिखी. बगल में बैठी दामिनी ने ये भांप लिया लेकिन फ़िलहाल कुछ न कहा क्यूंकि बेटी को तोह मां के इरादों का पता भी न था.
"जाओ जी आप हाथ मुँह धो लो.", दामिनी ने अपनी बेटी के जाते हे अपने पति से कहा तोह शर्मा अंदर की तरफ चल दिया. उसके कमरे में हे बाथरूम था और उसके जाते हे दामिनी ने दबी हुई आवाज में विनोद को लताड़ा.
"मां है तू उसका लेकिन शायद तू हर जवान लड़की को देख कर रिश्ते भूल जाता है.", विनोद के चेहरे पर पहले तोह थोड़ी शर्मिंदगी सी आयी लेकिन तुरंत बड़ी ढिठाई से बोल उठा.
"दीदी, मां हु इसलिए तोह सिर्फ देख रहा था. आप तोह जीजा से ब्याही होते हुए भी इक़बाल का हर तीसरे दिन लेती हो. देख लेना जितनी जवानी आँचल पर आ रही है न तोह हफ्ते महीने में ये किसी न किसी के बिस्टेर पर मिलने वाली है. मैंने भी सुना था वह फार्महाउस पर जब इक़बाल ने आपने आँचल की दिलवाने के बदले डायमंड का हार देने का ऑफर दिया था. उसको तोह आपने कहा था के सोच कर बताउंगी.", विनोद द्वारा अपना हे cheer-haran होते देख दामिनी ने पैंतरा बदला.
"तेरे जीजा यही थे विनोद और आँचल ऐसी वैसी नहीं है. इक़बाल के कहने के बाद जब मैंने इसके सामने उसकी कुछ तारीफ करनी शुरू की तोह जानता है इसने क्या किया?", दामिनी ने सही किया था शिक्षिका की नौकरी छोड़ कर. ऐसी निर्लज्ज कोई महिला शिक्षिका हो भी कैसे सकती है.
"क्या किया था जरा मैं भी तोह सुनु? वैसे मुझे तोह लगा था के आपने अब तक इसका टांका खुलवा दिया होगा.", दोनों को पता था के आँचल को अभी कुछ टाइम और लगेगा इतने लोगो के लिए खाना परोसने में क्योंकि वो अभी भी रसोई में रोटी बना रही थी.
"मेरे मुँह पर पांचो उंगलियां छाप दी थी इसने और बोलै के अगर खुद रंडी हु तोह इसका मतलब ये नहीं की सभी मेरी जैसी होंगी. वो दिन है और आज का दिन, हमारी ठीक से बात न हुई. इसने तोह यहाँ तक कह दिया के इसको मेरे और शंकर के बारे में भी मालूम है. बस इसलिए तुझे रोक रही थी.", दामिनी कुछ खामोश हुई तोह विनोद सोच में पड़ गया.
"ये जीजा की बेटी नहीं है न? झूठ मैट बोलना दीदी, ब्याह से पहले से हे शंकर भैया तुम्हारी ले रहे थे? बाबू (निकेतन) के नामकरण के समय भी तुम चारे वाले कमरे में थी शंकर भैया के साथ, मैंने खुद देखा था तुम्हे.", विनोद के स्वर में इतनी नाराजगी देख दामिनी ने पलके झपका दी.
"हाँ. उसने मुझे गोपाल के साथ देख लिया था जब मैं पहली बार शादी से पहले इस चक्कर में पड़ी थी. गोपाल तोह किसी की आवाज से डर कर भाग गया था लेकिन शंकर ने मेरा चेहरा देखे बिना हे मुझे पेल दिया था. उसके बाद हम दोनों की मर्जी से ये सब एक महीने तक चलता रहा. फिर शादी हो गयी और 8 महीने बाद आँचल.", दामिनी के इतने बड़े खुलासे से विनोद की झांटे सुलग गयी. वो हैरत से अपनी बड़ी बहिन को बस घूरे जा रहा था. खुल कर कुछ बोल नहीं सकता था क्योंकि घर में जीजा और भांजी मौजूद थे. इतने में हे फ़ोन की घंटी ghan-ghanai तोह अंदर वाले कमरे में मौजूद पप शर्मा ने हे बात की.
"आँचल, तुम्हारे सेण्टर से फ़ोन था मैडम का. वो तुम्हारा कोई टेस्ट है 2 बजे आज.", शर्मा ने कपडे बदल लिए थे और जैसे हे अपनी बेटी को ये सुचना दी वो भी रसोई से तुरंत बहार निकल आयी.
"एक काम कीजिये पापा, मैं 2 मिनट में हे कपडे बदल कर आती हु आप प्लीज मुझे सेण्टर छोड़ दीजिये.", आँचल ने जाने से पहले टेबल पर खाने का सामान परोस दिया था और शर्मा ने भी बिना किसी hil-hujjat के अपनी प्लेट में 2 रोटी और सब्जी रखने के साथ निगलना शुरू कर दिया. ये दोनों bhai-behan दिखने के लिए इधर उधर की बातें कर रहे थे पर विनोद का आज मौका मिल चूका था अपनी बहिन से खुल कर बात करने का. अगले 10 मिनट में हे घर में बस यही दोनों बचे थे. जाने से पहले शर्मा ने बता दिया था के उसको भी कचहरी में कुछ काम है तोह वो आँचल को अपने साथ हे लेता आएगा.
"आपने ऐसा क्यों किया दीदी? और वो शंकर भैया बड़ी दलीले देते है परिवार और िज्जात्त की लेकिन उन्होंने अपनी हे बहिन के साथ ये सब कर डाला.? एक तरह तोह आँचल का जीकर करने पर आप मुझे रिश्ते की दुहाई दे रही थी और इतने सालो से आपका खुद का चक्कर अपने भाई से चल रहा है. मान लिया इक़बाल के साथ आपका जिस्मानी सम्बन्ध जीजा की कमजोरी या किसी और वजह से हो पर ये सब करके आपने ठीक नहीं किया.", विनोद भड़क रहा था.
"मुँह मैट खुलवा तू मेरा विनोद. जानबूझ कर जो तू मेरे सोये होने पर वो सब हरकते करता था क्या मुझे पता नहीं चलता था? रौशनी के साथ तोह तू इतना आगे बढ़ गया था की उस दिन पापा खेत से वापिस न आये होते तोह तू तोह चढ़ हे गया था उसके ऊपर. कितनी लड़कियों के साथ तूने वहशीपना किया क्या मुझे खबर नहीं.? शंकर ने जो किया था वो एक लड़की के साथ उसकी मर्जी से किया और जब चेहरे देखा तोह वो शर्मिंदा था. लेकिन उसकी मर्दानगी की वजह से मैंने हे रिश्ता आगे बरकरार रखा. और तू ये कमजोर लड़कियों के साथ हे ऐसा क्यों करता है पता है? तू औरत को ठंडा हे नहीं कर सकता इसलिए बस गाँव की भोली भली लड़कियों को ताक़त से दबाया और अपनी हवस पूरी करके निकल लिया अपने रास्ते. एक औरत बता जो तेरी दीवानी हो? जो खुद से कहे के विनोद तू सच्चा मर्द है?", दामिनी के इस तरह भड़कने से विनोद बगले झाँकने लगा. वो अवसादग्रस्त ऐसा भेड़िया था जो सिर्फ लड़की के कौमार्य भेदन से हे खुश होता था. शायद उनकी तकलीफ देख वो अपनी तकलीफ काम करने वाला दरिंदा था.
रौशनी दीदी वाली बात अलग है लेकिन आपने ठीक नहीं किया."
"हाँ मैंने नहीं किया ठीक और अब कुछ हो भी नहीं सकता. मैं कुछ बदल नहीं सकती और न मैं चाहती हु के ऐसा कुछ हो.", दोनों का हे खाना ठंडा हो रहा था लेकिन अब भूख बची हे नहीं थी. दामिनी को अपने भाई की हैवानियत और कुकर्मो पर गुस्सा था और विनोद व्यथित था की उसकी बहिन सामने से खुद शंकर के साथ रिश्ता बनाने की हामी भर चुकी थी.
"ठीक है फिर अगर ऐसा है तोह हम तीनो हे गलत हुए. लेकिन शंकर भैया ने आपसे सम्बन्ध बनाये तोह इसका खामियाजा उन्हें भी भुगतना होगा. मैं आँचल को भी अपने बिस्टेर पर लाऊंगा और उनकी होनेवाली बहु को भी. इस बार कोई जबरदस्ती नहीं करूँगा लेकिन ये दोनों लड़कियां ऐसा करने पर मजबूर हो जाएँगी. देखती रहना बस आप.", कहने को तोह विनोद गुस्से में इतनी बड़ी बात कह गया लेकिन दामिनी दांत निकाल कर हंसने लगी अपने भाई की बात सुन्न कर.
"तेरी बीवी कहा बिनोदिये? रही बात आँचल की तोह वो तेरे हाथ आने नहीं वाली और शंकर भैया की बहु तक पहुंचने के लिए तुझे ताऊजी से हो कर गुजरना होगा. पहले तोह खेतो से घर तक तुझे छड़ी से लाल करते लाये थे और इस बार कोई गलती की तोह उनके शहर से हमारा शहर बहोत दूर है. रस्ते में हे दम टॉड देगा. अपनी बीवी की चिंता कर जिसको माँ बनाने में हे तुझे 5 साल लग गए और अगर वो वह किसी मर्द के निचे आ गयी तोह 9 महीने बाद तू फिर से बाप बन्न जायेगा.", दामिनी ने अपने भरी कूल्हे सोफे से उठाते हुए टेबल का रुख किया और विनोद गुस्से से भरा बिना आगे कोई बात किये घर से निकल चला. उसकी बड़ी बहिन ने जिस तरह उसकी बेइज्जत्ती की थी उस से विनोद के आत्मसम्मान को गहरी ठेस लगी थी. अपने गुस्से को वो सिर्फ दारु या लड़की से हे ठंडा कर सकता था लेकिन आज कोई शिकार न था इसलिए होटल में शराब का सहारा हे मुमकिन लगा.
'माँ की छूट इन सबकी. साले सभी की गांड फाड़ूंगा और ये देखते रह जाएंगे इनके साथ हुआ क्या. पहले तोह साली वो कुटिया छुड़ेगी कल रात. दलीप की लोंड़िया से ले कर शंकर की हर बेटी की छूट न सड़क पर नीलाम की तोह मैं भी अपने बाप का नहीं.', विनोद बड़बड़ाता हुआ कार में होटल की तरफ निकल लिया. उसको शायद अंदाजा भी नहीं था के आने वाले 2 दिन में उसके साथ क्या कुछ होने वाला है. शायद उसको अपने असली बाप का नाम भी पता चल जाए.
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मंजूबाला के घर में तोह साड़ी दुनिया से कुछ अलग हे खेल जारी थी इस समय पर. हलकी फुलकी chhed-chhaad जो बहार हॉल से शुरू हुई थी, जल्द हे घेरि होने लगी. अलका को सुडोल लम्बी टांगो को ठीक कूल्हों के निचे से बाहों के घेरे में लेते हुए अर्जुन मेनका के कमरे में आ रुका. उसका चेहरा अलका के लाल कैसे हुए कमीज के ऊपर उन मॉटे उभारो के बीच दबा गरम सांसें छोड़ रहा था.
"उम्म्म्म.. बेदर्दी कितना तड़पते हो अपनी लवर को? आठ.. आज देखो मैं तुम्हारी क्या हालत करने वाली हु.", अलका ने बिस्टेर पर गिरने के साथ हे अर्जुन को भी अपने ऊपर खींच लिया. लम्बे बालो में बंधा लाल रबर तोह बहार टेबल पर हे उतार फेंका था अर्जुन ने. अलका के कमर से निचे तक लम्बे बाल बिस्टेर पर उसके निचे फैले अलग हे आभा प्रकट कर रहे थे. उन गहरी आँखों के सामने चेहरे किये अर्जुन बड़े ध्यान से अलका की शिकायत उसके चेहरे से पढ़ रहा था.
एक लमस सी उन गुलाबी होंठो पर थी और दीवानगी उन आँखों में जो अर्जुन को अपना खाविंद तक मान कर उसपे खुद को निसार कर चुकी थी. अर्जुन इस ख़ूबसूरती के जादू से बहार निकलता उस से पहले हे अलका का जादू उस पर गहरा हो गया. आज अर्जुन के साथ उलटी गंगा बही थी और उसको खुद मालूम न चला के वो कब बिस्टेर पर पीठ के बल आ लेता. मजे की इन्तहा से आँखें बंद होती चली गयी जब अलका के होंठो ने अपना रास अर्जुन को पिलाना शुरू किया. रेशमी कमीज के दोनों तरफ अलका की कमर मजबूती से थामे वो बस दुनिया के अंतत तक इस लम्हे में रहने को तैयार लगा. ये शुरुआत से गहरा चुम्बन अब कही ज्यादा हे गहरा और उत्तेजक होने लगा. दोनों हाथ से अर्जुन का चेहरा पकडे हुए अलका उस पर हावी होती जा रही थी. आज जैसे अर्जुन तड़पती प्रेमिका और उस से कही ज्यादा भूखा प्रेमी अलका थी.
"उफ़.. मारने का इरादा है क्या जान? आह्हः..", अर्जुन के निचले होंठ पर अलका की मीठी लार के साथ खुद उसका खून उभर आया था लेकिन तगड़े नशे में प्रतीत होती अलका जैसे इस लहू को देख अलग हे जोश से भर उठी. अपने होंठो पर जीभ फिरती हुई वो एक बार फिर से अर्जुन के होंठो पर टूट पड़ी. बस इस बार वो जानवर की जगह बेहद उत्तेजक अंदाज में उसके होंठो पर जीभ फिरती, कभी मुँह में अपनी जीभ की नोक घुमा कर उसके दांतो से जुंग लड़ती हुई आखिर में जैसे अर्जुन को ऑक्सीजन हे देने लगी. अर्जुन इतना मादक चुम्बन सेहन न कर सका और उस लाल कमीज को झटके से ऊपर की तरफ खींच दिया.
"आठ.. लाख कोशिश कर लो बच्चू, आज नहीं बचने वाले. ये सूट जोर से नहीं दिमाग से खुलेगा. जानवर कही के.", अलका खुद उसके सीने से ऊपर होती हुई अपने कढ़ाईदार लाल कमीज की चैन पीछे से खोल कर थोड़ी मेहनत से जिस्म का ऊपर हिस्सा नुमाया करती हुई अर्जुन को जैसे परेशान कर रही थी. निचे सिर्फ लाल ब्रा में क़ैद उसके वो ख़ास उभार जिन पर अलका ने खासी म्हणत की थी, अलग हे केहर बरपा रहे थे. सीने से निचे बिलकुल अंदर की तरफ धंसा गोरा सुत्वा पेट और वो 26-27 की कमर. अर्जुन के पास कोई अल्फाज न था इस तराशे हुए जिस्म के लिए.
"ओह अलका.. तुम सचमुच जानलेवा हो. इतना भी कोई खुद को कैसे निखार सकता है?", अर्जुन ने लरजते हाथों से उसके चिकने पेट को सहलाते हुए हाथ ऊपर ले जा कर जैसे हे एक उभर को पकड़ा, ब्रा उसके पंजे में आ गयी. अलका पीछे से हुक खोल चुकी थी और अब मंजर और भी dil-faroz था. सच्चे मोटी से अकार के दोनों गुलाबी निप्पल अकड़ कर सीधे खड़े थे. गोर वक्षो पर आया गुलाबीपन स्वाभाविक शरीर गुणवत्ता नुकमाया करता लगा.
"इसशहहह.. इसको निखारने वाला हे ये सवाल कर रहा है? उम्.. बस अभी तुम इन्हे कुछ नहीं करोगे ारु, जो करुँगी वो मैं.", अर्जुन का हाथ अपने मॉटे चुके से हटा कर अलका बिस्टेर पर एक तरफ पलट गयी. अर्जुन के जिस्म पर फांसी टीशर्ट निकालने के साथ हे अलका ने बेल्ट और चैन खोलकर जीन्स भी निचे सरकाई तोह अंडरवियर से 3 इंच बहार निकला वो दहकता सूपड़ा देख बिल्ली सी झपटी.
"उफ़.. आराम से..", अलका का ये रूप देख अर्जुन उठना चाहता था लेकिन एक हाथ के लम्बे नाखून उसके सीने पर दबाव बनाते हुए उसको वापिस लेटने पर मजबूर कर गए. अलका एक हाथ से वो छोटा सा निप्पल कुरेदने के साथ दूसरे में अब वो पूरा 9 इंच का बांस सा मोटा औजार निपुणता से थामे थे. उसकी मजबूत पकड़ बता रही थी की आज अर्जुन ने जो कहा था वैसा अलका हे उसके साथ करने वाली थी. बाजी पलट कर इतना तोह साबित कर हे दिया था के अब तक अर्जुन अपने चाहने वाली का ये रूप देख न पाया था.
"पहले भी तरय किया था लेकिन सॉरी तब साथ न दे सकीय थी. आज कोई शिकायत नहीं होने दूंगी तुम्हे और न इसको जो अपने आपको जाने क्या समझता है. देखो अब कैसे मासूम बना हुआ है और जब आजाद होता है तोह ये तक नहीं देखता के सामने वाला दर्द में है या मजे में.", अलका अर्जुन के लुंड से बातें करती हुई उसके सुपडे पर तर्जनी ऊँगली के नाखून से हलकी रगड़ देने लगी. ये बिलकुल नया एहसास था उसके लिए और मजे से अर्जुन की सिसकारी छूट गयी. लुंड जैसे फटने की हालत में होता हुआ अपने प्रचंड रूप में आया और कुछ समझने से पहले आधा हिस्सा अलका के गरम और गीले मुँह में उतर गया.
"उफ़.. अलका...", अर्जुन के पेट की सभी मांसपेशिया जकड सी गयी थी. मुखमैथुन और वो भी इतने बड़े लुंड का अभी तक कोई भी पूरी तरह न कर पायी थी. अलका का आज वाला अंदाज सबसे अलग था. वो इस तरह से उसके ऊपर झुकी थी जिस से मुँह और गाला एक सिधाई में हो. 8-10 बार आधा लिंग आगे पीछे करने के बाद अलका ने रुक कर एक गहरी सांस लेते हुए अर्जुन को आँख मारी और अगले हे पल उसके कंठ में बहार से भी उस मॉटे लुंड का उभर नजर आने लगा. मुँह बुरी तरह से फ़ैल कर लुंड की जड़ से चिपका था और अर्जुन के जबड़े कस कर भींच गए.
"ओह्ह्ह्ह.. अलका ये क्या कर रही हो जान.. ? उम्म्म.. ", अर्जुन नशे में खुद हे अलका का सर सहलाने लगा और ये लचकदार खूबसूरत बाला अपने मुँह को एक लयबद्ध तरीके से ऊपर निचे करने लग पड़ी. हर बार गले में उस मॉटे सुपडे की दस्तक पर सांस लेने में कठिनाई होती पर अलका ने जाहिर न किया. अर्जुन के बड़े अंडकोष भी लार से पूरी तरह सन्न गए. लुंड पर तोह चिकनाई की बरसात ने बाढ़ का रूप अख्तियार कर लिया था और अलका ने लुंड की अकड़न में इजाफा महसूस किया तोह तुरंत अलग हो गयी.
गहरी सांसें लेती हुई वो अर्जुन को ख़ास हंसी से देख रही थी. अर्जुन अपने चरम से बस एक मिनट दूर था और अलका ने जैसे उसका सुकून छीन लिया. लेकिन अगले हे पल अर्जुन के चेहरे पर फिर से वही सुकून लौट आया जब अलका ने अपनी सलवार और लाल पंतय निकल कर वो दुर्लभ फूले हुए नितम्भ अर्जुन के चेहरे की दोनों तरफ पेश किये.
"जानती हु की तुम्हारी आँखें इन्हे सबसे ज्यादा पसंद करती है. चलो तुम अपना प्यार दिखाओ मैं अपने दिल की करती हु.", अलका ने कामसूत्र की वो प्रमुख उनहत्तर (69) वाली मुद्रा बनाते हुए लम्बी चिकनी टाँगे मोड़ते हुए अपना महकता यौवन अर्जुन के चेहरे पर टिका दिया. उसकी मुट्ठी में एक बार फिर से अर्जुन का वो विकराल मूसल था जिसपर अलका की लम्बी उँगलियाँ भी पूरा घेरा बना पाने में असमर्थ थी. मुँह में दर्द होने के बावजूद अलका ने एक बार फिर से उस गुलाबी सुपडे से इश्क़ जाताना शुरू कर दिया.
इस बार ये पहले की तरह प्रबल न होते हुए बेहद कामुक था. कभी सुपडे को चूमती तोह कभी उसको होंठो में दबा कर लार से भीगोंगे लगती. हाथ निरंतर ऊपर निचे हिलाते हुई वो पूरे लुंड को प्यार करने में लगी थी. एकाएक एक मदद्भरी सिसकारी अलका के होंठो से निकली और अपनी छूट को अर्जुन द्वारा चूसे जाने पर वो साखळीत होने लगी. ये इतनी देर से रोके हुए बाँध का दिवार देहना अर्जुन के लिए भी मजेदार रहा. वो निरंतर अलका के गुलाबी यौवन पर जीभ, होंठो से कलाकारी करता एक एक कतरे को निचोड़ने लगा. 69 की मुद्रा अब एक तरफ से विभाजित हो गयी थी.
"आह्हः.. ऐसे हे अर्जुन.. ऐसे हे प्यार से उम्म्म्म.. आह्ह्ह्ह..", अलका से अब और तपिश न सहते बानी तोह वो बिस्टेर पर लुढ़क गयी. अर्जुन सहज भाव से घूम कर उसके ऊपर आ गया.
"स्टैमिना तोह ाचा है तुम्हारा और एक बार तोह लगा था के तुम जीत गयी.", अर्जुन ने एक हाथ से अलका की चिकनी टांग फैलते हुए दूसरे हाथ से चिकना सतांन पकड़ कर दबाते हुए कहा तोह अलका बोझिल नजरो से मुस्कुराई.
"इसमें हार जीत नहीं होती अर्जुन. समर्पण होता है और सिर्फ समर्पण. तुम्हारा होने वाला था इसलिए मैं अलग हुई. अब तुम बिना कुछ और कहे अपनी अलका को बस प्यार करो.", अलका ने अर्जुन को निरुत्तर करते हुए खुद हे अपने यौवन द्वार पर उसका अकड़ा हुआ गीला सूपड़ा भिड़ा दिया.
"ी लव अलका.", अर्जुन ने झुकते हुए कोई करारा धक्का न लगाया और बस होंठो से होंठ मिलते हुए दोनों के कॉमर्स की चिकनाहट का प्रयोग करते हुए बड़े प्यार से अलका की छूट को खोलने का उपक्रम किया. एक बार के लिए अलका के जिस्म में दर्द की भीषण लहरें उठी और उसने खुद हे कमर उचकाते हुए अपनी छूट को अर्जुन के मूसल की जड़ से चिपका दिए. एक भीषण दर्द को सेहन करती वो उस से चिपक कर आने वाले सुखद समय का इंजतार करने लगी.
"पागल कही की.. aahhh..",Arjun को जबतक पता लगा तबतक काम हो चूका था.
"अरे, ये ऐसी हे तोह है और जानती है तुम्हारे पेनिस को. आअह्ह्ह.. अब बस रुकना नहीं क्योंकि ये राउंड लम्बा नहीं चलने वाला.", अलका के कहने का मतलब अर्जुन समझ रहा था लेकिन शायद वो इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखता था. दोनों बेजोड़ मॉटे और सख्त चुचो को हथेली में पकड़ कर दबाते हुए अर्जुन ने आधा लुंड बहार निकला तोह औंस की बूंदे बहती अलका की कासी हुई छूट का गुलाबी हिस्सा भी लुंड के साथ बहार आता दिखा. अलका के कूल्हों की वो गहरी दरार के मुहाने से गलबी गांड का छेड़ भी कॉमर्स से भीगा बंद छोटे से फूल सा था.
"आह्हः.. ऐसे हे जान.. ये सचमुच बहोत बड़ा है.. aahh..",Arjun को सर सहलाती हुई अलका खुद हे अपने चुके चुसाई के साथ ये मजबूत घर्षण छूट में झेलती हुई कसमसाने लगी. लम्बी टाँगे अर्जुन की कमर पर लपेटे वो जड़ तक उस मॉटे मूसल को अंदर लेती हुई खुल कर आहें भरने लगी. एकांत घर जो अंदर से बंद था, एकदम सही जगह थी पूर्ण मिलान की. न कोई रोकटोक और न खुद को रोकने की जेहमत.
"उम्म्म.. सचमुच अलका, तुम बहोत ख़ास हो.. आठ.. हर बार ऐसा लगता है के तुम्हारे साथ ये पहली बार hai...ummm", एक निप्पल को चूस चूस कर अर्जुन ने लाल करने के बाद दूसरे वाले को मुँह में भर लिया. कमर निरंतर उस फूली हुई baal-vihin गोरी छूट का हुलिया दुरुस्त कर रही थी. हर गहरी धक्के से ठप्प की आवाज उन मॉटे कूल्हों से निकलती और अलका ने जैसे हे गुदाद्वार के भीतर जाती ऊँगली महसूस की, वो खुल कर झड़ने लगी.
"एआईईईई.. मर्डर गयी यार.. आह्हः. वह ऐसा क्या बटन है .. आह्ह्ह्ह.. उम्म्म..", अर्जुन तुरंत धक्के लगाना रोकक कर एक ऊँगली से वो टाइट गुलाबी गुदाद्वार ढीला करने लग पड़ा. ये सही समय था जब छूट से निकलता कॉमर्स इस कैसे हुए छेड़ को चिकना कर रहा था. एक ऊँगली अंदर उतारने के साथ हे अर्जुन ने अलका के होंठ चूमते हुए दूसरी वाली भी तिरछी करते हुए उसमे समाहित कर दी. सचमुच अलका के कूल्हों की तरह गुदाद्वार भी लचीला था जो इतनी मोटी 2 उँगलियाँ अंदर लील गया. दर्द जरूर हुआ लेकिन पल भर के लिए.
"उफ़... मतलब पहले हे राउंड में बैकडोर को भी खोलने वाले हो? आह्हः.."
"तुमने हे कहा था न के मुझे ये सबसे प्यारे लगते है? सच कहु तोह तुम किसी यूरोपियन मॉडल से भी ज्यादा बेहतर हो अलका. ऐसे हिप्स किसी के भी नहीं है. उमाहहह..", अर्जुन अपनी बात कहने के साथ फिर से हलके धक्के लगते हुए अलका की छूट को सुकून और लुंड से भरने में जुट गया. एक हाथ चुचो को मसल रहा था और दूसरा निरंतर उन मादक कूल्हों के बीच उस कैसे हुए गांड के छल्ले को ढीला करता रहा. अलका के जिस्म पर चौतरफा हमले भी स्वर्ग सा मजा दे रहे थे.
"आह्हः.. आ जाओ अपनी फवौरीते जगह.. आह्हः..", मॉटे चुके निरंतर मर्दन से लाल हो चुके थे और निप्पल फूल कर दोगे मॉटे. अर्जुन अलका की बात सुन्न कर अलग हुआ तोह वही मीठा दर्द छूट में भर गया जरुरत से ज्यादा हे बड़े सुपडे के बहार निकलते हे.
"आह्हः.. ऐसे हे करोगे?", अलका ने अर्जुन की इत्छा पूछते हुए अपनी छूट पर हथेली राखी और आँखें मजे से बंद कर ली. अर्जुन को अलका पर इतना प्यार आ रहा था के एक पल को उसने अपनी इत्छा त्यागने का इरादा बनाते हुए बिस्टेर पर अलका की बगल में करवट ले ली. लम्बे बालो को संवारता हुआ वो उसके गाल पर होंठ रखे बस प्यार जताने लगा. अलका ने भी इस प्यारभरे एहसास से अर्जुन की तरफ चेहरा किया और उसकी मंशा जान कर होंठो पर हलके से चुम्बन जड़ दिया.
"रहने दो न अलका, हम आगे हे करते है.", अर्जुन ने खुद पर अलका को सवार होते देख रोकना चाहा.
"मुझे भी मजा आता है और तुम वह पहले भी कर चुके हो. एक बार तोह एक हे रात में 3 बार. उफ़.. दर्द सिर्फ ये मोटा मशरुम जैसा part अंदर जाते हुए होता है.. आठ", अर्जुन की मजे की इन्तहा हो चुकी थी अलका की हिम्मत और फिर अपने लुंड को उस गरम कैसे हुए छेड़ में धंसते हुए महसूस करके. इतने मॉटे मूसल को हर गांड नहीं झेल सकती थी लेकिन अलका सबसे अलग जो थी इस मामले में.
"आठ.. इधर आओ..", अर्जुन ने अलका को बाहों में भर लिया जब आधे से ज्यादा लुंड वो अंदर ले चुकी. गांड का वो चवन्नी से भी छोटा सा गुलाबी बंद छेड़ बुरी तरह उस मूसल को जकड़े था. और जल्द हे अलका की कमर अर्जुन के धक्को के बराबर हिलने लगी. मजबूत छाती से रगड़ते उसके मॉटे चुचो भी हर धक्के से आनंदति होने लगे. अलका अब खुल कर तेज आहें ले रही थी. हर धक्के के साथ वो 'ी लव यू' उम्म्म्म 'मेरी जान' और तेज और तेज की आवाजें निकलती हुई एक तरह से अर्जुन पर फिर से हावी हो गयी.
"ी लव यू अलका.. aahhh..mera होने वाला है आह्ह्ह्ह..", अर्जुन ने मजबूती से दोनों फूले हुए कूल्हों को दबोचते हुए दुमदार धक्के लगाने लगा था. लुंड भी इतनी घातक और कासी हुई चुदाई से बुरी तरह लाल पड़ने लगा. नसों में जब तूफानी उबाल भरने लगा तोह अलका का जिस्म भी मस्ती से अकड़ने लगा.
"ोुह्ह्ह्ह.. अर्जुनंनं.. मैं भी आइइइइइ. ... माहहहह...", गरम वीर्य की बौछार ने जो सिकाई करनी शुरू की, अलका भी अर्जुन के पेट के निचले हिस्से पर रगड़ खाती छूट से सुनेहरा कॉमर्स बरसाने लगी. ये वाला सखलन उसका अर्जुन के सामान हे चला. शरीर एक दूसरे से बुरी तरह लिपट चुके थे और अर्जुन ने भी लुंड बहार निकलने की जेहमत न करि. उस 1 मिनट पहले रोके सखलन के बावजूद अर्जुन ने दोनों छेड़ो की 30 मिनट तक ाची चुदाई करि थी. गांड से लुंड निकलने पर दोनों के चरम में रुकावट आना लाजमी था. अगले आधे घंटे अलका उसके ऊपर ऐसे हे आराम करती रही, आँख लगने के साथ. एक पल के लिए शरीर ने झटका खाया था जब वो मूसल नरम हो कर बहार निकला. अभी तोह इनके पास डेढ़ घंटे से अधिक समय बाकी था और अलका की दूसरी बार वाली हसरत अर्जुन बाथरूम में पूरी करने वाला था.
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"शालिनी, तुम्हे क्या हुआ है? सुबह से देख रही हु की खामोश हो और जबसे वापिस आये है तुम अपने कमरे से बहार नहीं निकली?", ये हवेली में राजेश्वर जी थी जो अपनी ननद को खाने के लिए बुलाने आयी थी. बेशक दोपहर के 3 बज चुके थे और आज देरी हो गयी थी लेकिन शालिनी का यु सबसे अलग और अकेले रहना राजेश्वरी को व्यथित कर रहा था.
"नहीं भाभी मैं तोह बिलकुल ठीक हु बस रात नींद पूरी नहीं हुई और फिर सफर. आपको तोह पता हे है के नाश्ते के बाद मुझे सफर करना पसंद नहीं. इसलिए बस आराम कर रही थी और मैं ठीक हु.", शालिनी ने एक झूठी मुस्कान देते हुए बिस्टेर छोड़ा और अलमारी से सलवार कमीज निकालने लगी, घर पर पहन ने के लिए. राजेश्वर बड़े ध्यान से देख रही थी अपनी ननद को. सलवार कमीज का ढेर लगा था अलमारी में लेकिन शालिनी को कभी उन वस्त्रो में किसी ने देखा नहीं था. शादी के बाद से हे वो सिर्फ साड़ी और रात में सोने के वक़्त पूरी लम्बाई का गाउन हे पहनती थी. ये सब उसने बस सिल्वा लिए थे और पिछले 20 वर्षो में इनकी गिनती में इजाफा होता रहा पर अलमारी में बंद हे रहे.
"क्या बात ननद रानी, एक तरफ तोह आप सारा दिन सबसे अलग थलग रही और अब दूसरा झटका दे रही हो ये सलवार कमीज को अलमारी से निकाल कर.", शालिनी इस बार स्वाभाविक रूप से मुस्कुराई जैसे वो अब कुछ सोच चुकी थी.
"ऐसा है भाभी की अब मैं हु अपनी माँ के घर, आइंदा ये saree-varee नहीं पहन ने वाली मैं यहाँ घर में. जो कम्फर्टेबले है वही pehan-na ठीक और ये साड़ी से तोह ज्यादा हे ठीक है. आप खाना लगवाओ, मैं नाहा कर आती हु 5 मिनट में.", शालिनी जवाब देने के साथ हे बाथरूम में चली गयी, पीछे अपनी भाभी को हैरत में छोड़ के.
'ये कौनसा जादू हुआ है? सब बोलते रहे के सूट पहना करो तोह बस सिलवाती रही और आज इसको याद आया के ये अपनी माँ के घर है? माँ जी को बताना पड़ेगा की शालिनी का संतुलन हिल गया है.', राजेश्वरी सोचने के साथ हे हंसती हुई कमरे से बहार चली गयी लेकिन अंदर इस आलिशान बाथरूम में साड़ी खोलने के बाद सिर्फ सफ़ेद ब्रा और पंतय में कड़ी शालिनी खुद को आईने में निहार रही थी. 40 पार होने के बावजूद वो किसी नवब्याहता सी थी और समतल पेट के साथ कासी हुई छाती और उतना हे बहार को निकला हुआ पृष्ठ भाग. लम्बाई तोह जैसे इस घर को वरदान हे थी और विन्नी के सामान शालिनी भी 5'7" की लम्बाई और खूबसूरत काया की मालकिन थी.
'पागल कर हे दिया न मुझे? सुबह से खुद को देखने से बच रही हु और तुम्हारे होंठो का ये निशाँ आग लगा रहा है. िस्स्सस्स.. गलती मेरी हे है लेकिन ऐसी गलती हर बार होगी जब जब तुम मेरे पास होंगे. सॉरी लेकिन कल जरूर कुछ वक़्त तुम्हारे साथ रहूंगी.', शालिनी के उन ठोस उभारो के ऊपर एक नीला निशाँ बना था जैसे वह किसी ने गहरा स्पर्श दिया हो होंठो से. एक पल में हे वो दोनों अंगवस्त्र फर्श पर पड़े थे और शालिनी अपने कैसे हुए बदन की नुमाइश सी करती 5 कदम दूर उस फुहारे के निचे जा कड़ी हुई. सामने योनि पर बालो का साया था जिस पर हाथ फिरते हे वो होंठ टेढ़े करके खुद से हे कहने लगी.
'तुम्हे भी जाना होगा अब. मुझे ाचा नहीं लगा जब उसका हाथ यहाँ था और तुम बीच में आ गए... आह्हः.. सचमुच तुम वही हो जिस से मैं बचपन से प्यार करती आयी हु. आह्हः.. बस आज के लिए इतना हे बाकी जब तुम मिलोगे तब तुम्हारी शालू पूरी तुम्हारी.', शालिनी ने भीगा बदन तोलिये से लपेटा और आईने के सामने कड़ी हो कर अपने जिस्म को देख कर पौंछने लगी. पिछली रात उसने खुद हे अर्जुन के जिस्म पर खुद को ुधा दिया था. बस सीने पर एक गहरे चुम्बन और छूट पर अनजानी रगड़ से हे शालिनी का वजूद हिल गया था. लेकिन अब वो पीछे हटने वाली नहीं थी. उसने सोच लिया था के झूठ के आवरण से वो अब बहार हे रहेगी.
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