Incest Pyaar - 100 Baar - Page 25 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 133

Safar-Humsafar (1)


शहर के पुराने हिस्से से निकलते हाईवे पर स्थित था ये प्रख्यात restra-hotel जहा अर्जुन को लिए संजीव भैया इस ख़ास raatri-bhoj पर आये थे. अर्जुन की पिछली कक्षा में रही अंग्रेजी विषय की शिक्षिका अरुणा गोस्वामी निक्की और राधिका की सगी मौसी थी जिनके यहाँ निक्की आज रुकी थी. 3 सितारा होटल के इस रेस्ट्रा में इस वक़्त हल्का संगीत बज रहा था और इस हलकी रौशनी वाले भाग में ये 6 लोग इस ख़ास टेबल पर जमा थे. संजीव ने हे इन सभी को अर्जुन का परिचय दिया था अर्जुन को भी हरेक से अवगत करवाने के बाद वेटर को सभी की इत्छा अनुसार snacks-drinks का आर्डर दिया.

"अर्जुन, अनमोल भैया दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ने के बाद अब प्रख्यात अखबार के एडिटर है. निक्की से तोह तुम परिचित हो अब और ये नीतू है, अनमोल भैया की छोटी सिस्टर जो अभी B.Ed. कर रही है. दोनों के मदर तुम्हारे इंग्लिश के मैडम अरुणा आंटी है.", अर्जुन आज से पहले तोह कभी भी ऐसी जगह अपने भैया के साथ नहीं आया था और ऊपर से सभी लोग एक तरह से परिवार से जुड़ने वाले थे जिन्हे वो आज हे मिल रहा था.

"अर्जुन भाई, संजीव की बातें सीरियसली मत लेना. तुम मेरे दोस्त और मैं तुम्हारा दोस्त. ये है मेरा जीजा. कौन क्या काम करता है क्या नहीं ऐसे बोरिंग टॉपिक के लिए यहाँ नहीं आये हम लोग. बिंदास अपनी बातें करते है, खाने पीने के साथ.", अनमोल के ऐसे कहने पर अर्जुन को थोड़ा ाचा लगा लेकिन बायीं तरफ बैठी निक्की ने कोहनी मारी तोह वह फिर से झेंप गया.

"अनमोल भैया, आपकी बात बिलकुल सही है लेकिन संजीव भैया ने यहाँ आने तक मुझे ये बताया हे नहीं के हम कहा जा रहे है. आप लोगो से फर्स्ट टाइम मिल रहा हु और वो भी गिफ्ट लाये बिना.", अर्जुन की बात सुन्न कर सभी हंसने लगे थे लेकिन निक्की मुस्कुराते हुए भी बस अर्जुन को देख रही थी जो अटपटा जरूर था.

"इस बोतल के लिए ऐसा कह रहा है क्या भाई? ये मैंने मंगवाई थी संजीव से क्योंकि कल किसी को गिफ्ट देनी है और मुझे ये मिल नहीं रही थी. और छोटे भाई उपहार देते नहीं लेते है. मैं तोह विद्या भाभी से हर बार गिफ्ट लेता हु.", अनमोल के कहने पर विद्या भाभी भी मुस्कुराने लगी जो अब दिन से बिलकुल अलग एक ख़ास सलवार कमीज में किसी युवती सी लग रही थी.

"अनमोल देवर होने के साथ साथ छोटा भाई है मेरा अर्जुन जी. सागा भाई नहीं है न मेरा कोई तोह इसने मुझसे ये रिश्ता बना लिया. और नीतू के रूप में छोटी बहिन भी मिल गयी मुझे.", अर्जुन के साथ साथ संजीव भैया को भी बात बहोत ाची लगती थी जान कर. इधर 2 वेटर बड़ी सावधानी से इनकी टेबल पर स्नैक्स के साथ साथ ड्रिंक्स भी रखने लगे. उन्होंने युवक देख कर वो शराब का तीसरा गिलास अर्जुन के सामने रख दिया और तीनो युवतियों के सामने हरे तरल वाला गिलास जिस पर निम्बू लगाया गया था.

"ये मेरा नहीं है.", अर्जुन ने हड़बड़ाते हुए ऐसा कहा तोह निक्की ने मुस्कुराते हुए अपने गिलास के साथ वो गिलास बदल लिया और वेटर ख़ामोशी से सब सामान लगा कर चले गए. अर्जुन असमंजस से निक्की को देख रहा था.

"क्यों लड़कियां ड्रिंक नहीं कर सकती क्या? वैसे भी होटल चलना सीखने के साथ साथ इसकी भी आदत हो गयी है. कभी कभी.", निक्की ने सफाई दी और संजीव भैया ने भी सहमति जताई

"अल्कोहल बुरा नहीं है छोटे है बस एक सीमा से ज्यादा नहीं. वैसे भी सभी 2-2 ड्रिंक हे लेंगे और उसके कुछ देर बाद डिनर करते हे हम चलते है."

"यार तुम तोह ाचे खासे हो अर्जुन, मुझे लगा beer-whiskey जरूर पीते होंगे. तुम भाई ये लेमोनेड लेके बैठे हो.", अनमोल भैया की बात सुन्न कर अर्जुन थोड़ा मुस्कुराया था.

"आप ये सब किस लिए पीते है भैया, एन्जॉय करने के लिए या फिर दिमाग को आराम देने के लिए शायद.", अर्जुन के कथन पर अनमोल के साथ साथ निक्की और संजीव ने भी सहमति जताई और विद्या भाभी के साथ नीतू भी गौर से अर्जुन को देखने लगी जैसे वो कुछ अलग कहने वाला हो

"मैं छोटा हु तोह इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा लेकिन मैं तोह वैसे हे बहोत खुश हु आप लोगो से मिल कर. लाइफ में वही करना चाहिए जो सही लगे और भैया ने कहा था के जिस दिन मैं कॉलेज में जाऊंगा तब ये मुझे अपने साथ बियर पिलायेंगे. ख़ास दिन होगा और मैं ये हमेशा याद रखना चाहता हु.", अर्जुन की बात से जहा अनमोल के चेहरे पर ख़ुशी आयी की दोनों भाई आपस में कितना प्यार रखते है वही निक्की बोल हे पड़ती है.

"ऐसे डेट निकाल कर हर काम करोगे तोह कही ऐसा न हो 29 फेब उस साल हो हे न. ये ज़िन्दगी आज है अर्जुन, अभी है और एक मिनट बाद का भी कुछ पता नहीं."

"लगता तोह नहीं निक्की जी के आप इस बात को वैसे हे समझती है जैसे आपने अभी कहा है. वैसे मैं खुद आज में हे जीता हु लेकिन कुछ सपने सही समय को सौंप कर और बाकी किस्मत पर.", अर्जुन की बात सुन्न कर निक्की को ऐसे जवाब की कटाई उम्मीद न थी. एक घूँट में बाकी जाम ख़तम करती वो टिश्यू से मुँह साफ़ करने लगी. संजीव भैया ने भी 3 पेग और मशरुम टिक्का का आर्डर दिया तोह जाम तुरंत आ गए. इस बीच निक्की बस खामोश थी और अर्जुन भी बाकी सबकी बातें हे सुन्न रहा था. विद्या भाभी तोह यहाँ ाचे से घुलमिल कर बात कर रही थी वही अनमोल भैया भी एक दिलचस्प व्यक्ति थे.

"बस भाई अगला पेग लेने से पहले एक सिग्रत्ते पिलवा दो तोह मजा आ जाये संजीव.", निक्की के चेहरे के भाव सिग्रत्ते लफ्ज़ सुन्न कर थोड़ा अजीब से हो गए थे. वही संजीव भैया भी जैसे ऐसे हे मौके की तलाश में थे. दोनों उठ कर बहार की तरफ निकल गए थे दूसरा गिलास भी खाली करते हुए.

"भाभी मुझे वाशरूम जाना है, आप चलिए मेरे साथ.", नीतू ने हलके से बात कही तोह वो दोनों भी महिला प्रसाधन कक्ष की तरफ चली गयी जो एक तरफ बना था रेस्ट्रा के आखिर में. अब अर्जुन को बात करने का मौका मिल गया था निक्की से अकेले में.

"आप परेशां है? चाहे तोह मैं मुझे बता सकती है, शायद मैं कुछ हेल्प कर सकू."

"तुम नहीं कर सकते मेरी मदद और फिर न जाने तुम मेरे बारे में क्या सोचने लगोगे.", निक्की जैसे उलझन में थी और कुछ चिड़चिड़ी दिख रही थी.

"आपका नजरिया मेरे प्रति क्या होगा या मेरा आपके लिए वो अलग बात है निक्की जी. जरुरी है तोह फ़िलहाल बात करना और यकीन कीजिये मैं कभी इंसान के व्यक्तिगत मूल्यों की तुलना नहीं करता या किसी को क्या पसंद है क्या नहीं. ये सब निजी बात है लेकिन अगर कुछ ऐसा है जो मैं कर सकता हु तोह जरूर करूँगा.", अर्जुन का इतना सरल दिल और गहरी बात सुन्न कर निक्की ने एक तरफ आये अपने रेशमी सीधे बालो को कंधे से पीछे करते हुए एक बार ाचे से उसके चेहरे को देखा और बोली.

"मेरा सिग्रत्ते पीने का दिल है अर्जुन और न वह तुम ला सकते हो और न मैं संजीव या अनमोल से मांग सकती हु. ऊपर से ऐसे खुलेआम पी भी नहीं सकती. अब जो नहीं हो सकता तोह उसके बारे में क्या कहु.", निक्की की बात पर अर्जुन भी हलके से मुस्कुरा दिया. इधर विद्या भाभी के साथ नीतू भी वापिस आ गयी थी और अपनी कुर्सी पर दोनों बैठ चुकी थी. संजीव भैया एक साथ अनमोल भैया भी आ गए थे एक मिनट बाद शायद दोनों ने एक हे सिग्रत्ते सांझी की थी.

"भैया, आप कैमरा भी लेके आये थे न? सभी फोटो तोह बनती हे है पहली बार मिलने की.", अर्जुन के ऐसा कहने पर संजीव भैया ने हाँ में सर तोह हिलाया लेकिन मज़बूरी भी बता दी.

"भाई उसके चारो सेल डेड है और ये अभी पता चल जब मैं अनमोल भैया के साथ उसको चेक कर रहा था."

"देखो अभी आप लोग तोह ek-ek गिलास और लेने वाले है, मैं पिछले चौक से सेल ले आता हु. चाबी दीजिये जरा कार की.", संजीव ने अपने छोटे भाई से कोई सवाल किये बिना चाबी सामने कर दी जो इलो की थी.

"निक्की जी आप आटोमेटिक कार चला लेती है न?", और अब निक्की के चेहरे पर अलग हे चमक आ गयी थी क्योंकि अर्जुन ने उसके लिए रास्ता बना दिया था.

"चलो यार इस बहाने मैं थोड़ा फ्रेश भी हो जाउंगी.", चाबी थामे वो बड़ी अदा से उठ कर अर्जुन के साथ बहार की तरफ चली तोह एक पल के लिए संजीव की नजरे भी उन कैसे हुए नितम्बो पर चली गयी जो जिस्म से चिपकी जीन्स में क़ैद थे लेकिन फिर नजर अगल बगल में की तोह कुछ और जोड़ी आँखे भी निक्की की खूबसूरती को ताड़ती मिली तोह मुस्कुराते हुए वापिस ध्यान अपने गिलास पर लगाया.

"बड़ी हे चालू चीज हो यार तुम तोह. मतलब मुझे लगा था के एक खूबसूरत लड़की की फरमाइश तुम चुटकी में हे पूरी कर डोज लेकिन यहाँ तोह लड़की से हे म्हणत करवा रहे हो.", दोनों कार तक आये तोह अर्जुन ने कार की चाबी वापिस ले ली निक्की से और ड्राइवर साइड के बराबर वाला दरवाजा खोल कर पहले निक्की को बैठाया और स्टीयरिंग पर बैठने के बाद खुद हे कार सावधानी से आगे बढ़ा ली.

"म्हणत नहीं करवा रहा निक्की जी बस ध्यान रख रहा हु के आपका राज बस राज हे रहे. सिग्रत्ते तोह मैं होटल के बहार वाले पनवाड़ी से भी ले आता और फिर ऊपर या कही कोने में जा कर आप पी भी लेती लेकिन वातानुकूलित जगह पर उसकी गंध जरूर आती आपके कपड़ो से. यहाँ आप आराम से कार में बैठिये मैं अभी आया.", अर्जुन ने अँधेरे में हे कार एक खुली सी पार्किंग पर लगाने के बाद इंडिकेटर चालू कर दिए. वो 50 कदम दूर उन छोटी दुकानों की तरफ बढ़ गया. निक्की इधर कार में बैठी अब कही ज्यादा हे अर्जुन के बारे में सोच रही थी. 2 गिलास शराब का असर भी उतना न हुआ था जितना इस लड़के की एक लाइन में दिखाई गयी परवाह ने कर दिया.

"भैया सिग्रत्ते देना एक और एक माचिस भी.", अर्जुन को ये तोह पता हे नहीं था के निक्की कौनसी सिग्रत्ते पीती है और न हे उसने पूछा था. लेकिन दुकानदार उसको देखने लगा.

"कौनसा ब्रांड दू भाई?", अब वो भैया वाली मांगता तोह क्या पता निक्की वो नहीं पीती हो.

"लड़कियां कौनसी सिग्रत्ते पीती है? उनकी अलग सिग्रत्ते तोह नहीं आती कोई?", ये आदमी समझ गया था के अर्जुन किसके लिए ले रहा है और शायद ये खुद धूम्रपान नहीं करता है.

"ये पतली सिग्रत्ते है जो शौकिया पी जाती है इसका नाम मोरे है भाई. और ये विल्स क्लासिक मेंथोल, ये 555 लाइट और ये बेंसोन लाइट है. लड़किया ज्यादातर तोह लाइट हे सिग्रत्ते पीती है.", अर्जुन ने वो बिलकुल सफ़ेद सिग्रत्ते देखि तोह हाथ में उठा ली.

"ये कितने की है भैया?"

"4 रुआपये की और ये लो माचिस. च्लोरमिंट के साथ हो गए पूरे 5 रुपये.", अर्जुन ने पैसे देते हुए वो सफ़ेद सिग्रत्ते सावधानी से पकड़ी और बगल की दूकान से 4 सेल लेने के बाद कार की तरफ आ गया. अब निक्की के चेहरे पर अलग हे चिंता देख वो कुछ हैरान हो गया.

"ये लीजिये और आराम से यही बैठ कर पी लीजिये.", निक्की ने सिग्रत्ते तोह पकड़ ली लेकिन माचिस जैसे उसको भी सही से जलनि नहीं आती थी और अर्जुन ने यहाँ भी मदद करते हुए तिल्ली सिग्रत्ते के सामने की तोह उस लाल रौशनी में निक्की की चमकती आँखें जैसे बहोत कुछ कह गयी.

"बहार खड़े हो सकते है? यहाँ और तोह कोई दिख नहीं रहा. कार में भी स्मेल नहीं आएगी तोह तुम्हे भी दिक्कत नहीं होगी.", अर्जुन इतना सुन्न कर बहार आ गया और अब दोनों हे निक्की वाली तरफ खड़े थे.

"आप मुझे ऐसे क्यों देख रही है दिन से जैसे आप मुझे पहचान रही है या शायद कुछ ढून्ढ रही है मेरे चेहरे में?", अर्जुन की बात ने तोह निक्की को हैरान हे कर दिया था. वो कैसे समझ गया के निक्की उसको पहचान ने की कोशिश कर रही है.

"तुम्हे चाहने लगी हु मैं जबसे देखा है लेकिन अब जिस रिश्ते से तुम सामने आये हो तोह दिल को समझा रही हु के किस्मत ने मेरी ाचे से मारने की ठान राखी है. देखने के बाद बस एक तुम्हारी हे तस्वीर दिल में छपी है और मैं खुश थी की वो अनजान कितना प्यारा और परवाह करने वाला था. तुम सामने आये तोह दिल बैठ गया के आखिर ऐसे हे मिलवाना था किस्मत को मुझे उस लड़के से जिसके सपने मैं देखने लगी थी.", निक्की की बातों ने अर्जुन के होश हे उड़ा दिए थे.

"हम तोह पहले कभी मिले हे नहीं और मैं हर मिलने वाले को याद रखता हु."

"कैसे याद रखते उस भीड़ को अर्जुन जो बस उस मर्द को निहार रही थी जो अपनी बहनो के लिए सरे राह उन भेड़ियों को सबक सीखा रहा था जिनके इरादे गलत थे. मैंने हे उन सरदार इंस्पेक्टर से गवाही देने की बात कही थी पंजाब की उस मार्किट में लेकिन उन्होंने मामले से मुझे दूर हे रहने को कहा. फिर किस्मत ने दूसरी बार मुझे मोडल टाउन में तुम्हारा दीदार करवाया तोह वह एक अलग लड़की थी तुम्हारे पास. कबूतरों को दाना खिलते हुए देख मैं बस दूर से निहार रही थी की अगर प्यार हो तोह किसी ऐसे के साथ जो हर ज़िन्दगी की कदर करता है. आज मैं ड्रिंक नहीं करने वाली थी लेकिन तुमसे मिली तोह लगा के पहले जैसी चल रही थी अब वैसे हे चलने देते है. ये 10 खूबसूरत दिन जिनमे मैं तुम्हारे जैसा बन्न न छह रही थी मेरे लिए यादगार रहेंगे.", इस दौरान निक्की ने सिग्रत्ते का बस एक हे काश लिया था और बाकी हवा ने हे ख़तम कर दी थी. अर्जुन ने वो बचा हुआ टोटा उन खूबसूरत उंगलिया से निकल कर एक तरफ फेंका और निक्की को कार में बैठा दिया. अपनी सीट पर बैठने के बाद भी अर्जुन ने कार चालू नहीं की.

"आपको ाचा क्या लगा? वो पुराणी ज़िन्दगी ये वो 10 दिन जिसमे मेरी एक छवि थी?"

"मुझे तुम ाचे लगे अर्जुन. तुम सबकी तरह नहीं हो जो जिम्मेवारी के बोझ का रोना रट है, अपने स्टेटस या रुतबे का दिखावा करते है. एक तरफ तुम ऐसे इंसान हो जो किसी की िज्जात्त के लिए मौत की परवाह नहीं करते वही दूसरी तरफ तुम हर छोटे से जीव की ज़िन्दगी की भी परवाह करते हो. तुम्हारे घर और परिवार को देखने के बाद मेरी संजीव से भी जब बात हुई तोह उसने भी यही कहा था के इस सबकी वजह बस अर्जुन है. अब बताओ क्या सिर्फ देखने भर से प्यार होना गुनाह है क्या? वो प्यार नहीं वापिस दीखता तोह मैं वैसी हे ज़िन्दगी अपना कर खुश रह सकती थी लेकिन यहाँ तोह जैसे जंजीरे ज्यादा हे कस गयी है.", निक्की भावुक हो कर बोल रही थी और हलकी रौशनी में उसकी आँखों से टिमटिमाते वो 2 मोती अर्जुन की नजरो में आ गए.

"वो 10 दिन अगर साड़ी ज़िन्दगी से प्यारे है तोह उन्हें बरकरार रखिये. एक दोस्त की तरह मैं आपके साथ हु.", अर्जुन ने उन आंसुओ को हटते हुए निक्की को बड़े प्यार से जताया था के वो बस खुश रहे. लेकिन अर्जुन को अपने इतने नजदीक देख कर निक्की की हिम्मत और जकड़न जवाब दे गयी. सब भूल कर वो अपने नरम होंठ अर्जुन से चिपका कर बस उसको महसूस करने लगी थी जैसे ये आखिरी ख़ुशी हो. आँखों से 2 आंसू और बहार निकल आये जो अर्जुन की काले पर गिरे. इस बार उसने हे अपने होंठो को हरकत देते हुए निक्की को प्रतिक्रिया में ाचे से चूम कर बता दिया था के वो भी परवाह करता है इंसान की भावनाओ की. एक मिनट में हे दोनों अलग हुए तोह अब निक्की के आंसू थम्म चुके थे और गीले चेहरे को अर्जुन ने रुमाल से साफ़ कर दिया था. कार चालू हो कर वापिस होटल की तरफ चल रही थी और निक्की शर्म से बस बहार देखती हुई अर्जुन से नजरे चुरा रही थी.

"तुम्हारी दोस्ती कुछ अलग लेवल की नहीं है?", निक्की ने हिम्मत करते हुए बस इतना हे कहा. वो एक बार पाने हे होंठो पर जीभ फिरने के बाद फिर से शर्मा रही थी.

"दोस्त बराबर की होती है निक्की जी. आपने एक कदम बाध्य तोह मैंने भी साथ दिया. लेकिन ये सिग्रत्ते और शराब सेहत के साथ साथ टास्ते भी खराब कर देती hai.",Car को होटल की पार्किंग में अर्जुन ने लगाया और निक्की ने झूठी नाराजगी दिखते उसकी बाजू पर हलके से मुक्का जड़ दिया.

"सचमुच शैतान हो तुम और इसका जीकर किसी से मैट करना नहीं तोह पांचवी मंजिल से निचे लटका दूंगी."

"लेके गॉड में जाना पड़ेगा और वैसे मैं नर्सरी में नहीं हु जो हर बात पूरे घर में बताता घुमु. बस आइंदा कोशिश करना अपने लिए जीने की. कैमरा उठा लीजिये, तस्वीर आपने हे लेनी है.", अर्जुन को अपनी उम्र से कही अधिक परिपक्व पा कर निक्की को अत्यधिक ख़ुशी हुई थी. अंदर जाते हुए उसने अर्जुन की कलाई थाम ली और अर्जुन ने भी कोई आपत्ति न दिखाई. माहौल कही ज्यादा हे ाचा रहा था अगले एक घंटे और विदा लेने से पहले निक्की ने अपना नंबर अर्जुन को देने के साथ हे जल्द मिलने का वादा भी किया. दोनों भाई रात के 11 बजे घर के लिए निकले थे और संजीव भैया रस्ते भर अर्जुन को छेड़ते आये थे. ये दिन भी बीत गया था जैसे हर दिन गुजरता है. अर्जुन आज बेझिजछक अपनी माँ के कमरे में जा चूका था और संजीव भैया ने बैठक में हे अपने चाचा की बगल में बिस्टेर लगते हुए नींद लेना बेहतर समझा.

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सवेरे 4 बजे हे रेखा जी अपना गाउन बंद करते हुए अर्जुन के बाथ के निचे तकिया रखने के बाद बाथरूम में चली गयी. उनका बीटा वही था हमेशा वाला मुन्ना जो उनके सीने से लग कर रात फिर से दूध चूसक्ता हुआ हे गहरी नींद में चला गया था. आज घर में कही ज्यादा हे काम थे सुबह के इस पहर में. छोल साहब और कौशल्या जी के साथ रुपाली, ऋतू और रेखा जी भी कौशल्या जी गाँव जा रहे थे. रामेश्वर जी अपने छोटे भाई के यहाँ राजकुमार जी, ललिता जी, माधुरी और अलका के साथ जाने वाले थे वही शंकर जी भी दिल्ली निकलने वाले थे क्योंकि देर रात को उनके नरिंदर की वापसी थी अमेरिका से और दिन में उन्होंने जरुरी kharid-dari करनी थी. आरती और प्रियंका ने भी ृत्त लगा ली थी की वो उनके साथ हे जाएँगी जिस वजह से रात हे वो धर्मवीर सांगवान जी की मेरसेदेज़ जीप लेते आये थे.

"मैंने चाय बना दी है माँ जी, अर्जुन अभी सामान रख देगा गाडी में जितने आप और पिता जी नाश्ता करेंगे.", नाहा धो कर रेखा जी ने रसोई संभल ली थी और शायद आज पहला अवसर था जब अर्जुन सबसे आखिर में उठ रहा था. 5 बजे तक तोह जैसे सारा घर हे तैयार हो चूका था जब अर्जुन कमरे से बहार आया.

"कोई बताएगा के आज कौनसा त्यौहार है जो मुझे नहीं पता?", अर्जुन के ऐसा कहने पर सबसे पहले दादी ने उसको गले लगाया.

"तुझे बताना भूल गए थे के आज हम कहा जा रहे है. लेकिन इतना पता है के तुम यहाँ पीछे से घर का पूरा ध्यान रखोगे.", इसके साथ हे उन्होंने आज का पूरा कार्यक्रम अर्जुन को बताया तोह वो थोड़ा सा निराश हो गया. रामेश्वर जी भी समझ गए थे के अर्जुन को ाचा नहीं लगा और ऐसा लग्न लाजमी भी था. वो अकेला हे रह जाता था हमेशा घर पर और वही बात कही जाती थी की वो घर का ख़याल रखे.

"ऐसा नहीं है बीटा के हमने तुम्हे जानबूझ कर ये नहीं बताया. कल तुम मिले हे नहीं दोपहर के बाद हमसे. और तुम्हे बुरा लग रहा है तोह तुम मेरे साथ चलो. यहाँ संजीव ध्यान रख ले गए और उसके काम वो फिर कभी कर लेगा.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर नाश्ता करते हुए शंकर जी के हाथ पल भर के लिए रुक गए.

"मुझे बुरा नहीं लगा दादा जी बस इतने सारे लोग चले जाते है तोह डर लगता है और कुछ नहीं.", अर्जुन की ये परवाह रेखा जी के साथ साथ उसके dada-daadi को भी समझ आ गयी थी.

"हाँ अब मेरा बचा बड़ा हो गया और सबकी देखभाल कर सकता है तोह ऐसा लग्न गलत भी नहीं है. लेकिन निश्चिंत रह बीटा और तेरी माँ मेरे साथ जा रही है. तेरे दादा जी भी अकेले थोड़ी है. तुझ पर 2-2 घर की जिम्मेवारी है आज.", अभी वो लोग ऐसे हे अर्जुन से बातें कर रहे थे की प्रीती भी इतनी सुबह तैयार हो कर अपने दादा जी के साथ यहाँ आ गयी थी. वो छोटा सा पिल्ला उसकी गॉड में हे था जिसको लेने की अर्जुन ने कोई कोशिश न की.

"आओ भाई तुम्हारा हे इन्तजार था. वैसे प्रीती बिटिया भी साथ जा रही है ये देख कर ाचा लगा.", रामेश्वर जी अपने नाश्ते से फारिग थे और उन्होंने वो पिल्ला अपने पास लेते हुए उसको फर्श पर रख दिया. कुछ पल वो मासूम ऐसे हे अपनी जगह खड़ा रहा और फिर पूरे आँगन का अवलोकन करने के बाद ऋतू के पास आ रुका. वो भी नीचे बैठ कर उसको दुलारने लगी.

"हाँ भाई साहब, अब ऋतू बिटिया चल रही है तोह प्रीती ये सुन्न कर साथ चलने की जिद्द करने लगी. इस बहाने बचे गाँव भी देख लेंगे और हर्कुलस (पिल्ला) भी इनके साथ खुश रहेगा.", छोल साहब ने Ritu-Preeti के साथ वाली बात कही तोह शंकर जी को जैसे एक मौका मिल गया था शरारत करने का और उन्हें इसका नतीजा पता नहीं था. छोल साहब के लिए कोमल दीदी चाय ले आयी थी और प्रीती ने दादी के कहने पर एक पराठे को गोल करते हुए ऐसे हे खाना शुरू कर दिया.

"प्रीती और ऋतू को ज्यादा हे आदत नहीं है साथ रहने की चाचा जी? कल को प्रीती इस घर में आएगी और ऋतू जायेगी इस घर से फिर दोनों को एडजस्ट करना मुश्किल पड़ेगा.", छोल साहब तोह इस बात पर हंस दिए थे लेकिन पहली बार रामेश्वर जी के चेहरे पर ये अलग से भाव आये और कौशल्या जी फटाक से हे बोल पड़ी बिना जगह और माहौल देखे.

"जो दिल से जुड़े हो न शंकर वो मर्डर कर भी दूर नहीं होते और मैं जितने यहाँ बैठी हु मेरी दोनों बछिया ऐसे हे साथ रहेंगी. तू भी जानता है के तेरी माँ बात की कितनी पक्की है और बच्चों के लिए क्या कुछ कर सकती है.", अब हैरान होने की बारी बहोत से लोगो की थी लेकिन ऋतू के चेहरे पर आयी ख़ुशी देख प्रीती भी नजरे बचते हुए इशारे से इसका राज पूछ रही थी. रसोईघर में कड़ी रेखा जी भी इस बात से थोड़ा चिंतित हो गयी थी की उनकी सास ने ऐसा हे क्यों कहा.

"मजाक हे तोह कर रहा था माँ. मेरे लिए तोह जैसी ऋतू वैसी प्रीती. मेरी हे बेटियां है दोनों और आप तोह ऐसे भड़क गयी जैसे मैंने दोनों को हे अलग करने का विचार बना लिया हो."

"रहने दे तू शंकर, ाचे से जानती हु मैं तुझे. वैसे अब तू परेशां लग रहा है मुझे तोह.", कौशल्या जी के चेहरे पर आयी ये मुस्कान देख सचमुच शंकर ने नजरे झुका ली थी. कहा तोह वो ऊँगली कर रहे थे किसी और तरफ और यहाँ चढ़ गए अपनी माँ के हाथे. साढ़े 5 तक अर्जुन ने दोनों गाड़ियों में जरुरी सामान रख दिया था और अगले 10 मिनट में हे रामेश्वर जी अपने रस्ते और कौशल्या जी अपने पीहर निकल चुके थे. संजीव भैया हे बचे थे घर में जो अभी तक गहरी नींद में सोये हुए थे और किसी ने भी उन्हें उठाया नहीं था. अर्जुन गलियारे से अंदर आया तोह उसके पिता के साथ साथ आरती और प्रियंका दीदी भी तैयार हो कर आँगन में आ चुकी थी.

"तुम्हारे लिए कुछ ले कर आना है दिल्ली से?", शंकर जी ने अपने बेटे की इत्छा jaan-ni चाहि तोह अर्जुन कुछ सोचने के बाद बस ना में गर्दन हिला कर अपनी बहनो को देखने लगा. जैसे उसको उनका जाना भी ाचा नहीं लग रहा था.

"बड़े पापा, इसके लिए मैं अपनी पसंद से ले लुंगी. पंजाब में भी मैंने हे इसकी ड्रेस ली थी तोह दिल्ली से भी पसंद कर लुंगी. अपना ध्यान रखना और घर पे हे रहना.", आरती ने बाकी दोनों बड़ो के सामने हे अर्जुन के सर पर हाथ फेरते हुए बड़े स्नेह से ऐसा कहा तोह अर्जुन मुस्कुरा दिया. ये लोग भी बहार निकल गए तोह अर्जुन मुख्या द्वार बंद करके उस एक कमरे वाली व्यायामशाला में जा घुसा.

'और वेट लाने पड़ेंगे', वो जितना भी वजन मौजूद था उस से सीने की कसरत करता पसीना बहा रहा था आधे घंटे बाद. शरीर की हर मांसपेशी उभर कर फूल चुकी थी लेकिन अर्जुन जैसे किसी और हे धुन में सवार 120 किलो वजन का ये पांचवा सेट लगा था. इस बेखयाली में उसको तारा और कोमल दीदी भी नजर नहीं आयी जो शरीर की लचक वाली कसरत करने के बाद एक दूसरे की मदद कर रही थी फर्श पर मत बिछा कर पेट की कसरत करते हुए.

'तंत्र' की इस आवाज से दोनों लड़कियों का भी ध्यान अर्जुन पे गया जो उमस और इतनी मेहनत करने पर पसीने से भीगा हुआ खड़ा हो कर अपनी गर्दन की अकड़न ठीक कर रहा था. तारा तोह अपलक बस अर्जुन के कटाव और पहली हुई chhati-baahen निहार रही थी. कोमल दीदी के भी अंदर हलचल तोह हुई लेकिन बहार जाहिर न करते हुए उन्होंने हे ख़ामोशी भांग की.

"वेंटिलेशन की प्रॉब्लम है न यहाँ थोड़ी ारु?", अर्जुन इस आवाज से अपनी दीदी को देख कर थोड़ा चौंक गया. नीले रंग की ढीली टीशर्ट और सफ़ेद इलास्टिक वाले पाजामे में कसरत करती वह कैसी लग रही थी ये बताने के लिए जैसे लफ्ज़ हे न थे. वही तारा की छोटी सी निक्कर और बनियान जैसी टीशर्ट भी उसके कामदेवी स्वरुप में इजाफा कर रहे थे.

"हाँ दीदी, वो एक विंडो इस दिवार पर बनवा देता हु मैं मिस्त्री को बोल कर. एग्जॉस्ट फैन लगवा देने से दिक्कत नहीं आएगी. वैसे मैं आज मार्किट से थोड़े और वेइट्स डम्बल लाने का सोच रहा था, आपको कुछ लेना हो तोह साथ चल सकती हो.", अर्जुन ने अपने निर्वस्त्र सीने पर तोलिये से पसीना साफ़ करने के बाद बनियान पहनें ली थी. एक बार फिर वह बेंच पर लेट गया तोह कोमल दीदी की नजर उसकी भुजाओ पर गयी. हर तरफ सिर्फ मजबूत मांसपेशिया उभरी थी और अर्जुन का बनियान पहन न बता रहा था के इस से पहले शायद उसको इन दोनों के आने का पता न लगा.

"मार्किट 1 बजे के बाद चलते है न अर्जुन. मैंने थोड़ा सामान लेना है लेकिन कंपनी से 12:30 तक हे निकल सकुंगी. अगर तुम्हे ठीक लगे तोह.", तारा के ऐसा कहने पर कोमल दीदी ने भी सहमति जताई.

"और तब तक घर के सारे काम भी हो जायेंगे. कामवाली दीदी को भेजने के बाद एक बजे हे चलते है मार्किट. दोपहर में भीड़ भी नहीं होगी और सब आराम से खरीद सकेंगे.", अर्जुन ने 10 बार रोड ऊपर निचे करने के बाद खड़े हो कर शरीर को आराम दिया और पानी का हल्का घूँट लेते हुए हाँ में गर्दन हिला दी.

"ठीक है दीदी. मुझे भी थोड़ा काम है जो मैं नाश्ते के बाद कर लूंगा और फिर 1 बजे चलते है मार्किट. मैं बगीचे में पानी देने के बाद नाहा लेता हु, आप मेरा दूध तैयार कर देना.", अर्जुन इतना बोल कर बहार चला गया तोह कोमल दीदी ने तारा का कान खींचते हुए कहा.

"तू पक्की बेशरम हो रही है तारा. मेरे सामने हे उसको कैसे ताड़ रही थी."

"यार आप भी कमाल हे हो दीदी. आपकी कमर में भी हलचल हो रही थी उसको देखते हुए लेकिन इल्जाम सिर्फ मेरे ऊपर. वैसे सच कहु तोह मेरा दिल कर रहा था के वो इस रोड की जगह मुझे अपने सीने पर बैठा ले. आह्हः.. नाउ ी हैवे थिस फंतासी."

"फंतासी की बची, इधर ध्यान दे तू. बेशरम होती जा रही है हर दिन के साथ. वैसे तूने मार्किट से क्या लेना?", तारा वापिस कोमल दीदी की मदद करने लगी घुटने सीने से लगवाने में. शरीर के वो मादक कटाव इन दोनों हे अप्सराओ में भरपूर थे.

"कुछ भी नहीं लेना लेकिन साथ चलना है. वैसे ऋतू ने कहा था के उसको स्ट्रेटचेब्ले शॉर्ट्स चाहिए अलका जैसे तोह वो भी ले लुंगी और आरती के लिए रनिंग शूज भी. आप क्या लेने वाली हो?", कोमल दीदी अपने आप हे बालनके बनाने लगी तोह तारा ने ट्रेडमिल का रुख करते हुए रनिंग चालू कर दी.

"जो पसंद आएगा वो ले लुंगी बाकी अर्जुन के साथ जा रही हु तोह वो खुद भी पसंद कर लेगा कुछ न कुछ. अब 10 मिनट तू आराम से अकेले रनिंग कर मैं भी नाहा कर रसोई में जाती हु. संजीव भैया को भी चाय चाहिए होगी उठते हे और फिर वो भागने की जल्दी भी करेंगे. ताई जी बता कर गयी है के उन्हें आज जरुरी मीटिंग में जाना है.", कोमल दीदी ने कपड़ो को ठीक करने के बाद अपना मत सही जगह रखते हुए बहार का रुख किया और तारा इत्मीनान से दौड़ पर ध्यान देने लगी.

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निक्की आज जल्दी उठ कर निवाये पानी में निम्बू पीते हुए अपनी हे दुनिया में खोयी थी. पिछले 2 हफ्तों में उसकी बेरंग ज़िन्दगी में जाने क्या क्या हो गया था और कल रात जैसे उसने 27 की उम्र में वो पाया था जिसकी तलाश जाने कबसे थी. लेकिन इस रास्ते की भी मंजिल नहीं थी. विचारो में ऐसे खोये देख नीतू ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया. दोनों हे युवतिया इस वक़्त पारदर्शी से ढीले पाजामे और बिना ब्याह की टीशर्ट में थी. कमरा नीतू का था और दोनों हे जवान थी तोह साफ़ था के इन कपड़ो के भीतर अंतःवस्त्र नदारद थे.

"एक तोह तू कितनी बदल गयी है जो की एक ाचा बदलाव है. दूसरा तेरे जैसी लड़की ऐसे बहार देखते हुए खयालो में है तोह बात ख़ास हे होगी. कल रात भी तूने तीसरा गिलास लेने से मन कर दिया था और मुझे भैया की सिग्रत्ते चुराने को भी नहीं कहा.", नीतू एक हलकी सांवली सी खूबसूरत युवती है जिसको बात करने का भी सलीका था. वही निक्की का चरित्र हमेशा tej-sakht कामकाजी युवती का था जिसको पैसे का घमंड सिर्फ एक आवरण की तरह था लेकिन अंदर से वो बिलकुल खोखली थी. कुछ समय पहले हे शायद वो खुद को नया जीवन देने लगी थी.

"हाँ बात ख़ास हे है डार्लिंग. ये शराब कभी ाची लगी हे नहीं थी बस खुद से भागने का जरिया था. सिग्रत्ते तोह तुझे भी पता है के मैं कैसे पीती थी जो अब मैं हाथ नहीं लगाने वाली. अपने लिए ज़िन्दगी जी भी तोह सही से नहीं जी यार नीतू. अब जरा अपने साथ साथ सभी के लिए जी कर देखते है. बिज़नेस भी जॉब की तरह और लाइफ भी."

"और ये कौन सा जादूगर है जिसने इतना बदल दिया इस खूबसूरत हिटलर को? राधिका भी ये न कर सकीय तोह साफ़ है के कोई लवर मिल हे गया है तुझे."

"ऐसी बात नहीं है के लवर मिला है लेकिन एक सही इंसान मिला है और वो फिर चाहे दोस्त की तरह रहे या जैसे उसका दिल करे, लेकिन aas-pas जरूर रहे. कुणाल याद है तुझे?", निक्की ने जिस लड़के का नाम लिया था शायद उसकी छवि कही ज्यादा काली रही होगी.

"उस कुत्ते को इतनी सवेरे याद क्यों कर रही है तू? इंडिया से नहीं भागता तोह मौसा जी ने उसको मार कर गटर में फेंक देना था.", नीतू के चेहरे पर आये गुस्से को नजरअंदाज करते हुए निक्की ने कांच से बहार आसमान में उड़ते पंछियो को देखा और मुस्कुराते हुए कहने लगी.

"वो मेरे साथ था क्योंकि हमारा परिवार, पैसा, मेरी ख़ूबसूरती और अपने लालच की वजह से. मैंने ट्रस्ट किया था उसपर तोह उसने मेरा हे वीडियो बनाने की प्लानिंग की थी जिसके दम पर वो कुछ भी करता. लेकिन इतने सालो बाद मैंने अब जिसको देखा उसको इन सबकी तोह इत्छा हे नहीं है और जैसे उसके लिए मेरी ख़ूबसूरती भी मायने नहीं रखती. फिर भी एक अनजान होते हुए वो मेरी परवाह वैसे हे करता है जैसे मैं उसके लिए ख़ास हु. हाँ मैं तोह पसंद करने लगी हु उसको लेकिन नीतू वो हमसफ़र नहीं बन्न सकता."

"जिन्हे तू निहार रही है न निक्की, वो पंछी आज साथ है और कितने खुश भी है क्योंकि वो भविष्य का नहीं सोचते और अपनों के साथ है. कल रात तू बड़ा कह रही थी की जो आज है अभी है वही है. आने वाला पल किसने देखा. ेट्स ेट्स... लेकिन अर्जुन को आइना दिखते दिखते तू खुद हे उसको दिल में क़ैद कर गयी. लेकिन मुझे इसमें कोई बुराई नहीं नजर आती यार. अगर उसके कुछ पल के साथ से हे तेरी ज़िन्दगी को एक नया रूप मिलता है तोह ये सौदा घाटे का नहीं है. हैरान मत हो के मैं कैसे जान गयी के वो लड़का अर्जुन है. नशे में संजीव और अनमोल हो सकते है मैं नहीं थी जब तूने उसको किश किया था कार में पर्स ढूंढ़ने के बहाने पर. जब दिल करे तू उसको यहाँ बुला कर मिल सकती है या फिर जहा तेरा दिल कर इस शहर में."

"तू न इसलिए मेरी फवौरीते है नीतू. चल देखते है ये किस्मत इस बार किधर ले जाती है."

"किस्मत नहीं निक्की, सही कदम कहा लेके जा सकते है ये देखना. वो लड़का संजीव का भाई है और इतना दावा कर सकती हु के वो तेरा फायदा नहीं उठाएगा चाहे तू उसको उसे कर ले. तुझे देख कर सभी खुश है निक्की और ये ख़ुशी मायने रखती है न की एक उलझा हुआ भविष्य जिसके बारे में सोच कर अपना वर्तमान डाव पर लगाना बेवकूफी होगा. तुझे फिर से मिलना है क्या अर्जुन से?"

"नहीं यार आज नहीं मिलना. अभी बस तैयार हो कर मैं निकलती हु भाभी के साथ. राधिका से जरूर मिलना है और तू तेरे भी 2 कपडे साथ रख ले. आज वेडनेसडे है तोह सैटरडे मैं वापिस आ जाउंगी तेरे साथ इधर.", निक्की ने खड़े होते हुए एक बार नीतू को अपने आगोश में लिया और फिर बाथरूम में चली गयी.

'बड़े दर्द को ख़तम करने में अगर ढेर सारा प्यार और कुछ दर्द मिले तोह ऐसा कर लेना चाहिए मेरी बहिन. क्या पता शायद वो थोड़ा दर्द भी न मिले जिसकी तकलीफ के बारे में अभी से सोच रहे है.', निक्की के लिए इतना सोचती हुई नीतू भी अलमारी से कपडे निकलने लगी थी. उसको ाचा लग रहा था के निक्की ने कोई दिखावा किये बिना सब कबूला और अब उसको भी अपने साथ ले कर चल रही थी.
 
अपडेट 134

Safar-Humsafar (2)


घर में सिर्फ 4 हे लोग थे और सभी 8 बजे तक नाश्ते की टेबल पर थे. संजीव अपनी हे सोच में खोया था और अर्जुन इत्मीनान से पराठे और मक्खन का स्वाद लेता हुआ सामने बैठी अपनी दोनों हे बहनो को बीच बीच में निहार लेता. तारा ऑफिस के लिए समय पर हे तैयार हो जाती थी और बिना किसी मेकअप के भी उसका जलवा कही काम नहीं लगता था. कोमल दीदी हमेशा की तरह सलवार कमीज पहने थी और ख़ामोशी से बस नाश्ते पर हे केंद्रित.

"कोई परेशानी है क्या भैया आपको?", तारा के उठते हे अर्जुन ने सवाल किया तोह संजीव भैया वर्तमान में वापिस आये. कोमल दीदी भी अब प्लेट ले कर रसोई में जा चुकी थी और काम करने वाली दोनों महिलाओ के आने पर उन्हें सब समझने में लगी थी.

"यार ऐसी कोई बात नहीं. बस वैसे हे कुछ सोच रहा था.", चाय ठंडी हो चुकी थी और ये कोमल दीदी ने भी भांप लिया था. भैया के सामने से कप उठा कर वो गरम करने ले गयी और अर्जुन लस्सी का एक घूँट लेने के बाद हलके से मुस्कुराया.

"क्या पता आपका छोटा भाई कुछ मदद कर दे आपकी."

"शबनम याद है?", संजीव भैया ने बहुत हे धीमी आवाज में कहा तोह जो सिर्फ अर्जुन को हे सुनाई दे इतनी धीमी.

"ाचे से. लेकिन आप उस वजह से क्यों परेशां है. वो सही जगह है और शायद बहुत कुछ बताया भी हो उसने.", अर्जुन भी नाम न लेते हुए वैसी हे आवाज में बात करने लगा था जैसी भैया कर रहे थे.

"उसने डॉ दांग का हे उसे करके उन लोगो का हे इलाज करवा दिया जो उसके लिए मुसीबत बन्न सकते थे. ये बात जरा देर से समझ आयी और इतने में सभी निशाँ साफ़ हो चुके है. लोकेशन भी लीक है उसके रहने की और एक तरह से कोई जानकारी भी नहीं मिली है अभी तक.", संजीव भैया साफ़ न कहते हुए बता हे गए के एक तरह से शबनम उनके पास होते हुए भी वो नाकाम रहे है.

"ऐसा है भैया के हर इंसान को दर्द दे कर तोडा तोह जा सकता है लेकिन जरुरी नहीं के वो दर्द शारीरिक हो या आत्मिक. क्या लगता है वो अकेले जब घर से इतनी दूर ये सब कर सकती है और आप डरा धमका कर सब जान लेंगे?", अर्जुन को ये मामूली जानकारी अपने चाचा से हे मिली थी और वो जानता था के उसको शामिल नहीं किया जायेगा.

"चल तू मेरे साथ बहार चल.", भैया ने वो पराठा गोल करते हुए उठाया और अर्जुन ने लस्सी ख़तम करते हुए उनका हे रुख किया. कोमल दीदी को बता कर दोनों हे भाई स्कूटर पर घर से निकल लिए. संजीव पीछे बैठा पराठे को थोड़ा थोड़ा खाते हुए अर्जुन को रास्ता समझने लगा. 10 मिनट बाद हे दोनों इस 3 मंज़िला साधारण से हॉस्पिटल के बहार थे. गार्ड कही से भी साधारण नहीं था जो गेट पर खड़ा था. संजीव को देखते हे अदब से सलाम किया और एक तरफ हो गया.

"वाह. कोई सोच भी नहीं सकता के ऐसी जगह आप लोगो ने उसको रखा है. वैसे ये हॉस्पिटल है किसका?", अर्जुन ने अंदर भी 2 मजबूत से सुरक्षाकर्मी देख लिए थे जो हॉस्पिटल की वर्दी में थे. संजीव भी जान रहा था के अर्जुन की नजर कही ज्यादा हे तेज है और वो शायद हर चीज बड़े गौर से देख रहा है.

"अंकल का हे है और फिलहाल बस ग्राउंड और फर्स्ट फ्लोर पर हे पेशेंट्स का इलाज किया जाता है. एक तरह का मुफ्त हॉस्पिटल हे है सांगवान अंकल का लेकिन 2ंद फ्लोर पर कोई अल्लोवेद नहीं है. उसको भी कल हे यहाँ शिफ्ट किया है.", यहाँ कोई लिफ्ट नहीं थी और दूसरी मंजिल पर जाने के लिए तोह सिर्फ संकरी सी सीढिया जिनके बहार हे दरवाजे पर टाला लगा था. संजीव ने हे टाला खोल कर पहले अर्जुन को आगे किया और फिर खुद दरवाजा अंदर से बंद करते हुए ऊपर चल दिए.

"आप कमरा बता दीजिये और 10 मिनट बाद हे अंदर आइयेगा.", यहाँ भी गलियारे में एक सुरक्षाकर्मी कुर्सी पर बैठा था. अर्जुन ने एक तरफ राखी खाने की प्लेट और पानी की बोतल देखते हुए समझ लिया था के ताले की और भी चाबियाँ है. और संजीव भैया ने फ़िक्र के साथ सबसे आखिरी कमरे की तरफ इशारा किया.

"देख वो कही ज्यादा हे शातिर है छोटे. कुछ भी उसके हाथ लगा तोह तुझ पर हुम्ला कर सकती है या.."

"आप उसको समझ नहीं रहे है भैया. मरना होता तोह वो लड़की बिजली के तार से भी आत्महत्या कर लेती या किसी भी औजार से. भागना वो भी नहीं चाहती क्योंकि काम से काम वो इधर सुरक्षित है. मुझे नुक्सान कैसे पंहुचा सकती है जब मैंने हे उसको बचाया है? सिग्गट फूंकिए आप और मैं जरा मिलता हु इन मैडम जी से.", अर्जुन ने देखा की भैया डिब्बी निकाल चुके है तोह हँसता हुआ वो उस कमरे की तरफ बढ़ गया. बहार से सिर्फ सांकल हे लगी थी और उसको खोलते हे अर्जुन ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया.

"खाली हाथ तोह मुझसे कोई भी मिलने नहीं आया जब से क़ैद किया है. तुम कोई aujaar-hathiyaar नहीं लाये टॉर्चर करने के लिए?", शबनम बस एक नीले चोगे में थी जैसा बड़े हॉस्पिटल में मरीजों को अक्सर पहनाया जाता है. चेहरा और शरीर बता रहा था के उसका पूरा ख़याल रखा गया है. खूबसूरत तोह वो भी थी चाहे मुस्कान से थोड़ी काम लेकिन एक अलग हे कशिश थी उसके चेहरे पर.

"मिलने आया हु आपसे और सॉरी एकदम हे आना हुआ इसलिए फूल नहीं ला सका. ाचा लगा देख कर की आप बेहतर है अब.", इस कमरे में 2 खिड़किया थी जिनपर लोहे का जंगला और उसके बाद शीशा लगा था. पर्याप्त रौशनी और एक नरम बिस्टेर जिसके पास रखे स्टूल पर कुछ किताबे पड़ी थी. अर्जुन शबनम की कमर के पास हे बैठ गया, पाँव निचे लटकते हुए. खाली प्लेट और कांच के गिलास में धक् कर रखा जूस बता रहा था जैसे नाश्ता दिया जा चूका है.

"हाँ ख़याल तोह रखेंगे हे तुम्हारे baap-chacha की भतीजी जो हु. और उन्हें जरुरत है मेरी तोह मार भी नहीं सकते. वैसे तुम भी ाचे लड़के हो लेकिन एक न एक दिन तुम्हे भी मरना हे होगा.", शबनम जो भी बोल रही थी अर्जुन बस मुस्कुरा रहा था सुन्न कर. वो वैसे हे प्यार से उसकी आँखों को देखता रहा और हिलते होंठो को जब वो बोल रही थी. शबनम ने एकाएक आँखे झुका ली अर्जुन की नजर समझते हे. बिस्टेर पर तक लगाए वो लेती जरूर थी पर अलग हे बेचैनी होने लगी थी अब.

"दिल में तोह मैं हे हु आपके और ऊपर से जान बचने वाला भी. खैर सभी ने एक दिन तोह मरना हे है लेकिन मैं आपको नहीं मरने दूंगा. मुस्कान ने कहा था की उसकी दीदी जैसी भी है लेकिन वो मुस्कान की चिंता करती है. अगर मैं कभी उनसे मिला तोह ये मैसेज जरूर दू की वो वापिस आपके साथ अपने घर जाना चाहती है और अपनी बड़ी बहिन के साथ एक ाची ज़िन्दगी जीने का अपना सपना पूरा करना चाहती है.", अर्जुन ने वो गिलास उठा कर शबनम के होंठो से लगाया तोह शबनम ने नजरे ऊपर करते हुए अर्जुन के शांत चेहरे को देखा जिनमे कही कोई फरेब या झूठ न था. वो सचमुच परवाह कर रहा था चाहे ज्यादा मुस्कान की हे सही. एक छोटी सी घूँट लेते हुए शबनम ने होंठ हटाए तोह अर्जुन ने भी गिलास थोड़ा पीछे कर लिया.

"नार्मल लाइफ कभी थी हे नहीं तोह आगे कैसे उम्मीद की जा सकती है? मेरी माँ गलत नहीं है अर्जुन चाहे बदला लेने के लिए सभी हद्द पार कर दी हो उन्होंने. मैं भी इस सब में उनके लिए एक मोहरे की तरह हे हु क्योंकि वो हर कीमत पर तुम्हारे पापा और चाचा को बर्बाद करना चाहती है जैसे तुम्हारे घरवालों ने मेरी नानी, मेरी माँ और नानी के परिवार को किया था. सच कहु तोह सबसे ज्यादा दुःख मुझे इस बात से हुआ था जब उन्होंने तुम्हे मारने का हुकुम दिया था. मुझे तुम पसंद आये थे और तुम्हारे बारे में जानकार और ज्यादा बुरा लग रहा था की ऐसा करना पड़ेगा."

"सष्ठ.. बिंदिया काकी जो है वो ख़ास शातिर नहीं है और अतीत में जो हुआ उसके लिए हम आने वाले भविष्य को भी अंधकार में नहीं भर सकते. आपको क्या लगता है के वो इंग्लैंड में भी सेफ है? उन्हें वह कोई नुक्सान नहीं पंहुचा सकता? यहाँ ाकि मदद करने का ढोंग करने वाली लता काकी बेशक बिंदिया काकी से दिल से जुडी है लेकिन ये बदले और नफरत के खेल में कही बड़ी खिलाडी वही है और उनके खिलाफ कोई सबूत नहीं है. बस बिंदिया काकी के कंधे पर हर बार बन्दूक रख के चलाई जा रही है. रही बात आपके रहनुमा श्री अवधेश मिश्रा जी की तोह वह भी आपके लिए इरादे नेक नहीं रखते. मैं ज्यादा अतीत के बारे में तोह नहीं जानता लेकिन इतना पता है के बिंदिया काकी, मधुलता काकी और आपकी ननिहाल से कुछ लोग एक नेटवर्क की तरह काम करते है जिस से मधुलता काकी को कभी भी अपराधी नहीं मन जायेगा. आज की बात करे तोह मैं ये खुनी शतरंज का खेल सिर्फ एक दिन में ख़तम कर सकता हु और मेरा परिवार सलामत रहेगा.", शबनम का चेहरा सफ़ेद पड़ चूका था इतना सब सुन्न कर. ये बात किसी को भी नहीं पता थी की यहाँ शबनम के साथ कौन लोग दे रहे है.

"रौच्दले फार्म और मेनचेस्टर वाले विला के अलावा आपकी माता जी हर शनिवार की रात को ##### बिल्डिंग के अपार्टमेंट नंबर 1704 में पायी जाती है. अनुभव मिश्रा का आशियाना है न वो? तुम्हारे साथ हे बॉम्बे और फिर आगे दिल्ली भी तोह आयी थी बिंदिया काकी उर्फ़ फरज़ाना मिर्ज़ा. जो छुप रहा है असल में वही बेनक़ाब है और जो सामने है उसके बारे में किसी को कुछ पता हे नहीं. लीजिये एक घूँट पी लीजिये, सूखे होंठ मुझे भी पसंद नहीं.", अर्जुन ने जो गहरा वार किया था वो बहोत था शबनम को तोड़ने के लिए. सफ़ेद चेहरे पर अब परेशानी और डर आ चूका था.

"तुम.. तुम इतना कुछ कैसे जानते हो?", शबनम के चेहरे पर आज जो डर था वो पहले की तरह कोई दिखावा न था. शरीर के अंदर झुरझुरी दौड़ रही थी और वो एकमात्र कपडा भी जैसे काट रहा था. दरवाजे पर दस्तक होते हे अर्जुन ने शबनम के सूखे होंटो पर एक चुम्बन जड़ दिया.

"मैं हर बात जान कर रहूँगा लेकिन आइंदा मेरी माँ बेचैन हुई तोह इस बार फरज़ाना बेगम वापिस मैनचेस्टर नहीं जा पायेगी.", शबनम पहले हे खौफ में थी और अर्जुन ने ऐसे चूम कर साबित कर दिया था के वो कितना गंभीर और तैयार है. कमरे के अंदर आते हे संजीव भैया ने एक कुर्सी खींच कर शबनम के पास रख ली.

"तुम कुछ बताना चाहोगी?"

"अवधेश मिश्रा सही आदमी है जिस से तुम्हे सवाल करना चाहिए मर संजीव. और अगर वो भी जवाब न दे पाए तोह इस कहानी की शुरुवात तक जाना.", शबनम इतना तोह समझ चुकी थी की अर्जुन जो भी जानता है वो किसी को इसमें शामिल नहीं कर रहा. लेकिन भारी तोह वो उसके सामने अकेला हे पड़ गया था जब भीम और शीला के साथ साथ खुद सुशीला सिंह ने उसको घेरा था. संजीव सिर्फ ड्यूटी कर रहा था लेकिन अर्जुन जैसे कुछ और हे करने में लगा था.

"अब तुम अवधेश मिश्रा को मरवाना चाहती हो ताराचंद और उस मला की तरह? तुम्हारे तोह तीनो हे यार थे और काम निकलने के बाद क्या सही चाल से 2 का तो नरक का पत्ता कटवा दिया और मिश्रा को ऐसा फांस्वा दिया जिस से वो अब कभी अपनी हद्द से बहार नहीं निकले. यहाँ तुम्हारी मदद कौन कर रहा है मुझे सिर्फ वो आदमी चाहिए.", संजीव ने जज्बाती होते हुए शबनम की कलाई पकड़ ली थी लेकिन शबनम के चेहरे पर कुछ ख़ास असर न दिखा इस जोर का.

"मैं तोह खुद तुम्हारी क़ैद में हु और रही बात मेरे यारो की तोह वो मेरा पर्सनल मामला है. कहो तोह तुम्हारे भी ऊपर आ जाती हु, मर्दानगी दिखा देना कितनी है.", शबनम की मुस्कराहट जैसे संजीव को और गुस्सा दिला रही थी. अर्जुन बस एक तरफ खड़ा देख रहा था ये सब.

"मर्दानगी देखने के बाद हे जवाब डौगी?"

"ऐसी बात है तोह खुद को साबित कर दो और मैं एक नाम बता दूंगी जिसने मेरी मदद की है, सामने से या पीछे से.", शबनम का खेल संजीव नहीं समझ रहा था लेकिन अर्जुन सब समझ गया था के वो करने वाली है.

"मेरे भैया तुम्हे खुश नहीं करने वाले कितनी भी कोशिश कर लो. और तुम नाम भी वही बताओगी जो पहुंच में न हो. भैया, हम चलते है और इसको वापिस डिपोर्ट करना हे बेहतर रहेंगे. मर्डर चार्जेज के साथ. ब्रिटिश कानून के सामने मिर्ज़ा ज्यादा से ज्यादा इतना कर सकेगा के वो अपनी इस नाजायज़ बेटी से हफ्ते में 2 बार मिल ले. चलिए.", अर्जुन के इतना कहते हे शबनम अवाक सी उसकी तरफ देखने लगी थी और संजीव भी एकके ठंडा हो कर उठ खड़ा हुआ.

"मुझे यहाँ बंद रख कर भी तुम्हे कुछ हांसिल नहीं होने वाला और वह भेज कर भी. जो करना है करो लेकिन होनी हो कर रहेगी.", शबनम की बात सुन्न कर संजीव ने पलट कर देखा और उधर अर्जुन ने एक हवाई चुम्बन उछाल दिया था उसकी तरफ. बिना आगे कुछ कहे दोनों हे बहार जा चुके थे. शबनम भी उनके बहार जाते हे टूट गयी. अर्जुन कुछ बड़ा कर रहा था और यहाँ बंद रह कर वो कुछ भी रोक नहीं सकती थी.

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"तू शायद सबसे ज्यादा जानकारी रखता है छोटे लेकिन बता नहीं raha.",Sanjiv भैया अब खुद स्कूटर चला रहे थे.

"मेरे पास सबूत नहीं है और दादा जी ने हाथ बांध रखे है भैया. अधूरी जानकारी देना कही ज्यादा गलत होगा लेकिन इतना जरूर कहूंगा की हमको सही जानकारी नहीं है इस सबकी. पहले बात पूरी पता चले तभी कुछ कर सकते है. कही ऐसा न हो की खुदाई खजाने की करने लगे और वह कंकाल हांसिल हो.", अर्जुन की बात सुन्न कर संजीव का भी मैं व्यथित हो गया था. लग तोह उसको भी रहा था के ये खेल आज का नहीं है और शबनम को तोह शायद बचपन से हे ख़ास तैयार किया गया था.

"चल देखते है के ये राज कहा तक लेके जायेंगे और तू मुझे कभी पोलिसवाले मत समझना मेरे भाई. जहा जरुरत हो वह तू मुझे शामिल कर सकता है.", संजीव ने अपने छोटे भाई को हे अपना सबकुछ मान रखा था और अर्जुन भी बड़े भाई को एक आदर्श व्यक्ति की तरह देखता था.

"फ़िलहाल तोह आप जरा शादी की तरफ ध्यान दीजिये, समय आने पर मैं आपकी हे मदद करूँगा क्योंकि केस आपका है और मैं आजाद नहीं हु.", दोनों हे मोडल टाउन वाले पनवाड़ी पर आ रुके. दोनों भाई हे nimbu-soda पीने के िट्छुक थे फ़िलहाल. घडी में 10 बजने 20 मिनट थे और दोनों हे अपने अपने विचारो में गम थे.

"यार तेरे साथ निक्की सन बना रही है और तूने मुझे बताया भी नहीं.", संजीव भैया की ऐसी बात पर अर्जुन थोड़ा झेंप सा गया था.

"कुछ भी नहीं है भैया वो बस थोड़ा दोस्ती जैसा हे है और ऊपर से मिले भी तोह कल हे थे."

"लगता नहीं के वो तुझसे कल पहली बार हे मिली थी. सच कहु तोह तेरी भाभी से ज्यादा नकचढ़ी और गुस्सैल निक्की हे है लेकिन अब वो बिलकुल भी वैसी नहीं दिखी. कार में तूने कोई जादू तोह नहीं कर दिया था?", अपने भैया को ऐसे मुस्कुराते देख अर्जुन भी हंस दिया.

"रात भी बताया था न आपको की वो सचमुच एक ाची लड़की है. उनके साथ मेरा कुछ aisa-waisa नहीं है भैया और ड्रिंक करने के बाद उन्होंने वैसे हे गाल पर किश कर दिया था."

"बच्चू, तू लाख कोशिश कर ले लेकिन सच कुछ और हे है. वो तुझे पहले से जानती है जितना मैं समझता हु और लड़को से दूर रहने वाली निक्की सामने से तेरे होंठो को चूम गयी वो भी पर्स ढूंढ़ने के बहाने. बच के रहना बीटा तुम्हारी भाभी न खड़ूस अफसर है और निक्की उसकी जान.", संजीव भैया अर्जुन के मजे ले रहे थे और वो भी रात को देख गए थे जो बाकी सभी से छिपा रह गया था.

"जब कुछ वैसा है हे नहीं तोह मैं क्या कहु? और भाभी उनकी जान है तोह आपकी जान मैं हु.", अर्जुन ने भी हँसते हुए बता दिया था के वो भी काम नहीं है.

"जो भी हो वो ध्यान से और उसको हे पहल करने देना छोटे."

"आपका भाई पहल करता हे नहीं भैया. लेकिन जो होगा वो आपको पता लग हे जायेगा. वैसे 10 बजने वाले है भैया और हमको घर चलना चाहिए.", अर्जुन के याद दिलाने पर भैया को भी ध्यान आ गया के वह सिर्फ कोमल अकेली है.

"हाँ भाई चल फिर मैंने भी ऑफिस जाना है और 7 बजे तक हे आऊंगा वापिस. इतने ध्यान रखना घर का.", गिलास वापिस देने के बाद दोनों हे घर की तरफ चल दिए. अर्जुन का जरुरी काम भी जल्द शुरू होने वाला था.

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ये नीली विदेशी कार भी शंकर जी की कार के बराबर चल रही थी पिछले 2 घंटे से. अंदर बैठे 2 युवक बस आरती और प्रियंका को हे ताड़ रहे थे. दोनों कार 130 से ऊपर थी और शंकर जी खुद को काबू किये बस सामने नजर रखने की कोशिश कर रहे थे. लकड़ी भी रसूखवाले हे थे जो इतनी महंगी गाडी और विप नंबर प्लेट के साथ बेहिचक इनके बराबर चल रहे थे.

कार चला रहे लड़के ने उनके बराबर गाडी करते हुए आरती की तरफ बेशर्मी से हवाई चुम्बन उछाला तोह उस मासूम लड़की का चेहरा गुस्से में लाल हे हो गया.

"बड़े पापा, इन्हे टक्कर मार दो. ऐसे लोगो का तोह सड़क पर आना हे गुनाह है.", आरती के गुस्से और उन लड़को की हरकत देख कर शंकर जी को भी बहोत बुरा लगा था. बात उनके हिसाब से अभी तक फिर युवको की शरारत वाली थी इसलिए वो थोड़ा खामोश हे रहे.

"ड्रिंक कर राखी है बीटा उन्होंने और वो जो कर रहे है उन्हें पता नहीं है. ध्यान मैट दो इन पर.", शंकर जी ने पंजा दबाते हुए गाडी 150 के पार हे कर दी जैसे वो उक्त गए थे उन लड़को से. वो लड़के भी काम न थे और ऊपर से बियर का सुरूर. गाडी उनकी भी बराबर आ गयी और इस बार दूसरे वाले ने वो भद्दा सा इशारा किया जिसमे एक हाथ की उंगलियों को गोल करते हुए दूसरे हाथ की ऊँगली को अंदर करते हुए उसने जैसे चुदाई की हे पेशकश कर दी थी.

"तेरी माँ की साले. बड़े पापा, आप कुछ कहेंगे इन्हे? अर्जुन इन्हे ज़िंदा गाड़ देता 2 घंटे पहले हे.", आरती की बात ने जाने क्या असर किया था शंकर जी पर जो वो जल्द हे कार को रोक कर नीचे उतर गए. वो नीली कार भी उनके आगे जा रुकी और शंकर जी उसकी तरफ बढ़ गए. यहाँ आरती कार में न रुकी और डैशबोर्ड में रखा वो पेचकस निकल कर कर के दूसरी तरफ आ कड़ी हुई.

"माल टकड़ा है अंकल, लाख रुपये दूंगा एक घंटे के अगर निचे कर दे तोह.", ये युवक अमीरी की घमंड में इतनी बड़ी बात तोह कह गया शिक्षा उतार कर लेकिन राष्ट्रीय स्तर के मुक्केबाज रह चुके शंकर ने सामने के 4 दांत एक प्रहार में हे उसके मुँह में बिखेर दिए. अपने दोस्त की चीख सुन्न कर ये थोड़ा तगड़ा युवक जैसे हे दरवाजा खोल कर बहार आया तोह दरवाजे को पकडे उसकी हथली के बीच वो हरा पेचकस इतनी ताक़त से अंदर घुसा जो दरवाजे की चादर में पेवस्त हो चूका था.

"तेरी माँ न कही ओह कारन वास्ते जेहड़ा इशारा तू कर रहा से maai-yehva. तेरा न जाता हे ला देना सी मैं कजरा लेकिन प्रायः नहीं हैगा नाल मेरा.", वो लड़का चीख रहा था और हथेली में aar-par हुआ पेचकस जो दर्द दे रहा था उस से ज्यादा आरती की अगली हरकत ने कर दिखाया. भरे उजाले में और चलती सड़क पर हे आरती ने उसके अंडकोष पर घुटने का जोरदार प्रहार कर दिया. शंकर जी जब तक समझते इतने में आरती ने कार की चाबी उनके बराबर से आते हुए निकली और अपनी गाडी की तरफ बढ़ गयी. यहाँ 3-4 गाड़ियां रुकी तोह जरूर लेकिन लड़की को देख कर कोई भी इधर न आया. वो दोनों हे लड़के बेबसी से कार में पसरे हुए थे और शंकर जी अपनी कार को चालू करते अपने सफर मेबढ गए.

"तुम तोह ऋतू से भी ज्यादा खतरनाक हो पारी. मैं तोह सोचता था के हमेशा चुपचाप रहने वाली मेरी बेटी नरमदिल होगी.", शंकर जी को भी अंदर हे अंदर थोड़ी तकलीफ जरूर हुई थी और यही लड़के उनके हाथे सही समय चढ़े होते तोह वो एक एक ऊँगली काट कर उनके हे मुँह में दाल देते. न जगह सही थी और न हे ये समय. उन्हें ये भी डर था के कही लड़को के पास asla-hathiyar न हो क्योंकि 2 लड़किया भी साथ थी.

"ऋतू होती तोह वो जिन्दा नहीं होता बड़े पापा. उसने हे सिखाया है के सही समय पर हर चीज एक हथियार है और उसको कैसे उसे कर सकते है. पापा या माँ से मैट कहना बस.", आरती ने चेहरे के ऊपर रुमाल रखते हुए गर्दन सीट पर टिका दी. उसके हाथ पर लगे खून की छींटे बता रहे थे की ये लड़की बिलकुल वैसी नहीं है जैसी दिखती है और शंकर जी तोह आज इस चंडिका का रूप देख कर बस खामोश हे रह गए थे लेकिन प्रियंका बस मुस्कुरा रही थी.

"पिंकी, ये लड़की ऐसी भी हो सकती है आज हे पता लगा मुझे बीटा.", प्रियंका भी माहौल को देख बोलना हे ठीक समझी.

"बड़े पापा एक बार अर्जुन ने कहा था के कोई तुम्हे लड़की समझ कर गुस्ताखी करे तोह बता देना 9 दिन पूजा जाने वाले देवी का हर अवतार हमेशा हे भारी पड़ा है. वो ऋतू और तारा को बहोत कुछ सिखाता रहता है और आरती अलका इन दोनों से हे सख्ती है. थर्मोकोल पर प्रैक्टिस करके और थोड़ा एक्सरसाइज करते हुए. मैंने भी पहली बार हे देख है के आरती ऐसा कुछ भी कर सकती है."

"पता नहीं वो लड़का क्या सीखा रहा है लेकिन जो भी है मेरी बेटियां अगर मजबूत बन्न रही है तोह ये ाचा हे है. वैसे ये सब कानून की नजर में गलत है और मैं दोनों को देख लेता आराम से.", शंकर जी के साथ उनकी बड़ी भतीजी ने बहस न करते हुए बात ख़तम करना हे ठीक समझा.

"वो गुस्सा थी बड़े पापा तोह हो गया जो होना था. हर सफर सीढ़ी सड़क सा आसान कहा होता है."

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घर से दोनों हे कामवाली बहार भेजने के बाद अर्जुन ने मुख्या द्वार बंद कर दिया था. अभी दिन के 11 बज रहे थे और उसके पास पर्याप्त समय था अपना जरुरी काम करने के लिए. कोमल दीदी अपने कमरे में अकेली थी और पूरा घर खाली. वो कपडे तेह लगाती हुई अलमारी में रख रही थी लेकिन एकाएक चौंक उठी. उनके दोनों ठोस उभार जकड़ते हुए अर्जुन उनकी पीठ से चिपक चूका था.

"ी रियली मिस्ड यू ा लोट. पता है आपसे तोह मिलना भी chaand-chakor सा हो गया है दीदी.", ढीले कमीज में भी तोह बड़े और सख्त उरोज पूरे कैसे हुए थे जिन्हे अर्जुन ने हथेलियों में दबोच लिया था. और ये करने वाला अर्जुन जानकार कोमल ने भी चैन की सांस ली. गर्दन पर घूम रहे अर्जुन के होंठ एक अलग आग लगा रहे थे.

"आह्ह्ह्ह.. तुझे चकोर बनाने की गलती मैं भूल कर भी नहीं कर सकती ारु.", दोनों हे उरोज ख़ास तरीके से सहलाते हुए अर्जुन अब उनके गोर गाल चूम रहा था. कोमल दीदी ने भी उसका साथ देते हुए अर्जुन के हाथो को अपने सीने पर दबा लिया. जल्द हे दोनों बिस्टेर पर थे और कमीज के ऊपर से हे उनके मांसल स्टैनो को दबाते हुए अर्जुन उन गुलाबी होंठो को पी रहा था. आज दोनों हे बेफिक्र थे और कोई जल्दी भी न थी. जल्द हे दोनों आदमजात अवस्था में थे और उन गुलाबी दानो पर अर्जुन की कारीगरी बता रही थी की कोमल दीदी कितनी उत्तेजित हो चुकी है. सरकता हुआ वो कमर से निचे आया तोह हलके बालो के बाद वो गुलाबी चीरा देख वही नाक लगते हुए रुक गया.

"आप मेरे लिए चाँद हे है दीदी. वो चाँद जो मेरा है लेकिन मेरा नहीं होगा.", इस लम्हे में भी अर्जुन ने एक सचाई बता दी थी और उसकी जीभ ने अपना काम करते हुए छूट के उस चिहरे को चाटना शुरू कर दिया. ऊपर उभरा वो दाना आज कही दिख रहा था अर्जुन की मेहनत से. जल्द हे शहद छत्ते से टपक कर उसके होंठो से अंदर समां गया और दोनों चुचो को मसलता हुआ अर्जुन छूट के और अंदर जीभ धकेलने लगा.

"आअह्ह्ह्ह.. माहहह.. कुछ कर ारु.. प्लीज... ", अब बर्दाश्त से बहार हो रही कोमल भी जल्द से जल्द समागम करना चाहती थी. अर्जुन ने इतना कभी न तड़पाया था लेकिन वो बदस्तर छूट को गीला करता रहा. कोमल के हाथो में जोर से अर्जुन का सर पकड़ कर ऊपर खींचा तोह लहराता हुआ वो बड़ा औजार एक पल के लिए नजरो में आ गया.

"भाई, मैं हर रोज चाहती हु की तू मेरे पास रहे. ये लालच मैं कर नहीं सकती चाह कर भी. aahhhh...uuffff...", सूपड़ा छूट पर लगते हे लज्जत सी महसूस हुई लेकिन अंदर उतारते हे होंठ कस कर बंद हो गए. छूट अभी तक इस मोटाई को सँभालने में सखशाम न हुई थी. गोरी जांघो पर अर्जुन के फिरते हाथो ने बता दिया था के इन्हे ऊपर उठा ले. होंठो को मुँह में भरते हे अर्जुन ने कमर आगे चला दी.

"आठ.. ड्डडीईडी.. आप भी जानती है के आपका और मेरा प्यार किसी को समझ नहीं आएगा लेकिन ये तड़प कही ज्यादा है.", 4 इंच लुंड ने अपनी जगह बनाई और इधर कोमल ने खुद हे कूल्हे ऊपर उठा लिए. वो जड़ तक अर्जुन को अंदर सम्माहित कर चुकी थी सिर्फ एक दर्द भरी आह के साथ.

"तू तोह मेरा हे है रे.. आह्हः.. बस ाचा लगेगा जब तुझे ऋतू के साथ देखूंगी.. आठ.. तुम दोनों के बचे और परिवार... मा... बस यही सपना है ारु मेरा..", जल्द हे कमरे में thapp-thapp की आवाज गूंजने लगी थी. अर्जुन उन चिकनी जांघो को उठाये बड़े हे प्यार से इस चुदाई को अंजाम दे रहा था. अगले 20 मिनट तक बस दोनों बेतहाशा एक दूसरे को चूम रहे थे और इस hayaat-e-khaas पल को जीते हुए एक दूसरे को प्यार करते रहे. वो मूसल हर औरत को दर्द दे सकता था लेकिन यहाँ जैसे वो दूसरे स्थान पर था. पहला तोह इन दोनों का प्यार और एक दूसरे के लिए जुड़ाव था.

"आप भी मेरी हे है और ऋतू के साथ मेरी शादी आपके सामने हे होगी.. आह्ह्ह्हह.. लेकिन लालच मुझे भी है.. आह्ह्ह्ह.", अर्जुन उस गीली सुरंग में लगातार अंदर बहार हो रहा था. गुलाबी फांके कासी हुई थी उस मॉटे लिंग पर जो लेना हरेक के बस का नहीं था. दोनों के होंठ रह रह कर एक दूसरे से भीड़ जाते वही ऐसे बेजोड़ चुके एक पल भी अर्जुन के हाथो से अलग न हुए.

"उफ़... जिस dinn.aaa.. तू ऋतू का हाथ थामेगा मेरा गिफ्ट वही होगा... जो तू हमेशा चाहता है.", कोमल दीदी की बात अर्जुन भी समझ गया था. धक्के और भी गहरे होने लगे थे उन भरी कूल्हों के बीच इस रेशमी चिकनी छूट के अंदर. लुंड फूल कर अपनी औकात पर आया तोह कोमल ने खुद हे उसको जकड लिया. इतना वीर्य वो सही समाया पर अंदर लेती तोह निश्चित हे माँ बन्न जाती. अर्जुन को आराम देने की जगह वह उसको बाथरूम में हे ले चली. अगली चुदाई पहले से भी लम्बी चली थी फुआहरे के निचे लेकिन इस सफर में अर्जुन को बहोत कुछ बता गयी थी कोमल. अब बाकी थी तोह शालिनी या विनीता में से एक जो हर कड़ी को पूरा करती.

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"मुझे एक बार अर्जुन से मिलना हे पड़ेगा ऋचा. उसकी जान को खतरा है क्योंकि उस पागल ने सही जगह हाथ मार दिया है. तेरे पापा को बुला या फिर विन्नी को बोल के अर्जुन उसको लेने आये.", बबिता ने जैसे हे ये कहा वह आ कर रुकी सुशीला के चेहरे पर भी खौफ छा गया.

"दीदी, क्या हुआ? आप इतना टेंशन में क्यों हो?", ऋचा का भी चेहरा सार्ड हो चूका था बबिता के ऐसा कहने पर.

"बिंदु का भाई कल रात मारा गया और उधर से मुस्कान का भी फ़ोन आया था की उसकी माँ अर्जुन के खिलाफ साजिश कर रही है. शादी में अर्जुन पर हुम्ला हो सकता है."

"बबिता, इस बार मैं देखती हु ये मामला. जान जाए लेकिन अगर बिंदिया ने कुछ भी किया तोह वो देखेगी सुशीला सिंह eent-eent कैसे बजती है. इस लाजवंती और दमयंती की माँ भी कबर से निकाल कर जला दूंगी अगर मेरे बेटे पर आंच भी आयी तोह. कह दे अर्जुन को की वो निश्चिन्त रहे और तेरे भाई को बोल दे वो अपना काम करे बस. गुलाबो एक मेरे पास भी है और इस बार मैं सुशीला सिंह सामने है फिर चाहे शंकर हे क्यों न ढाल बने इन रंडियों की लेकिन अब अगर कुछ हुआ तोह उसका भी दिल मेरी जूती के निचे होगा.", सुशीला अपने पाँव पर कड़ी हो कर जैसे दहाडी थी ऋचा की फट के 4 हो गयी थी. आज उसने देखा था वो रूप जिसके बारे में अक्सर उसकी दादी बोलती थी की सुशीला इस घर की जांबाज है.

"माँ ये बात हमारे में हे रहने दे. तू बीच में आयी तोह और भी लोग होंगे. अर्जुन के साथ मैं हु और ऋचा, अक्षरा, कोमल और विनीता भी है."

"बबिता, जिस खेल का न पता हो वो खेलना नहीं चाहिए. बात यही ख़तम करने के लिए मुझे हे आना होगा. जड़ तक अर्जुन पहुंच गया तोह वो होगा जो मेरे चाचा ने भी नहीं चाहा होगा. तू अर्जुन को कुछ मत बता, मैं करती हु इलाज इस हरमन का. साली मेरे बचे पर आँख रखेगी.", सुशीला वही व्हीलचेयर छोड़ कर बैठक की तरफ चल दी जहा फ़ोन था.

"तेरी माँ तोह गयी ऋचा और साथ में शायद दादी भी.", बबिता की बात सुन्न कर ऋचा वही बैठ गयी थी. सुशीला ताई का ये रूप तोह आज हे देखने मिला था उसको.
 
किसी भी भाई को अपडेट न मिलने का दुःख है और मेरे अनुपस्सतीत होने पर आपत्ति है तोह मैं इस बात को ाचे से समझता हु और शमा चाहता हु.

हाथ पर लगी चोट मेरे लिए मायने नहीं रखती दोस्तों. कटी ऊँगली के बावजूद मैंने काम किया है. फ़िलहाल मेरे साथ कुछ समस्या है जिसकी वजह से परिवार परेशां है. यूरिक एसिड, पल्मोनरी ब्लॉकेज के साथ हे मुझे एक पाँव में भी दिक्कत रहने लगी है थोड़ी. इन सभी के बारे में 2 दिन के मेडिकल टेस्ट्स से पता चला है. हालत ठीक है लेकिन परिवार चिंता करता है चाहे आप जैसे मर्जी रहे.

आप लोगो को परेशां करना मुझे ज्यादा दुःख देता है लेकिन मेरे बीवी बचे दरकिनार करना भी गलत होगा. इंटरनेट पर हर वक़्त नहीं होता इसलिए 1196 पेज से 1211 तक कुछ पता नहीं लगा.

अपना ध्यान रखिये और मुस्कुराते रहिये. शुभरात्रि और ढेर सारा प्यार

एनिग्मा
 
देखो भाई अपडेट पोस्ट करूँगा मध्यरात्रि के बाद. मेरी हालत समझो थोड़ी सी. कल रात से सुबह 5 बजे तक लिखने के बाद सो गया था और आज लैपटॉप शब्द मुँह पर लाया भी नहीं. बचे बीवी सो जाये मैं अपडेट पोस्ट कर दूंगा
 
इंतज़ार करो भाई थोड़ी देर. सबके सोने के बाद मैं भी पोस्ट कर हे दूंगा. हाँ निराश नहीं करूँगा लेकिन जिसको नींद आ रही हो वो सुबह पढ़ लेना
 
अपडेट 135

Safar-Humsafar (3)

नहाने के बाद अर्जुन ऊपर कमरे में अकेला बैठा कुछ काम कर रहा था और कोमल दीदी भी तैयार होने के बाद इधर हे आ गयी. अर्जुन को इतना मसरूफ देख वो भी चलती हुई उसके बराबर आ बैठी. 6-7 सफ़ेद पन्नो पर जैसे बहोत से नाम लिखे थे और ये कोई पारिवारिक ब्यौरा था हर पैन पर अलग परिवार का. एक पैन को कोमल दीदी ने उठा कर गौर से देखा तोह वो भी थोड़ा हैरान रह गयी.

"यहाँ तुमने मधुलता, बिंदिया और चंद्रो देवी के नामो के सामने क्वेश्चन मार्क क्यों लगाया है ारु? और तुमने सभी के पति के नाम की जगह बस 'मृत' लिखा है लेकिन यहाँ पापा का नाम मधुलता के पति की जगह?", अर्जुन का ध्यान अब दीदी पर गया तोह उसने वो पन्ना उनकी तरफ बढ़ा दिया जिस पर वो काम कर रहा था. कोमल दीदी वो भी देखने लगी.

"देखिये दीदी मुझे पास्ट के बारे में शायद 10 प्रतिशत भी नहीं पता लेकिन बात कही ज्यादा हे बड़ी है जो शायद आपके या बाकी किसी भी bhai-behan के पैदा होने से भी पहले की होगी. ये बिंदिया और मधुलता काकी जो है इनकी माँ सगी बहने है और ये बात शायद सही से किसी को भी नहीं पता. दमयंती और लाजवंती नाम है उनके और बात इस से ज्यादा बड़ी ये है की मधुलता काकी की माँ जो है इनकी शादी पति के मरने के 2 साल बाद हे छोटे भाई के साथ कर दी गयी थी. वो मौत किसी को नहीं पता और बबिता ने बताया था के मधुलता काकी और बिंदिया काकी की शादी एक हे मंडप में हुई थी और 2 सेज भाइयो के साथ. बड़ी दादी जी घर की मुखिया रही है इतने साल तक और उन्हें क्या कुछ भी नहीं पता होगा इन दोनों के बारे में? और पापा काम से काम 2 दिन वह रहते है मधुलता काकी के साथ और ऋचा के कॉलेज डिटेल्स में वो ऋचा शर्मा d/o शंकर शर्मा है.", ये नए वाले कागज़ पर ढेरो प्रश्न चिन्ह थे और यहाँ Bindu-Munni के बारे में जितनी जानकारी अर्जुन जूता चूका था वो लिखी थी.

"तुम जानते भी हो तुम मौत से खेल रहे हो ारु? दादा जी ने तुम्हे इस सबसे दूर रहने के लिए कहा है लेकिन मुझे लगता है के तुम्हे समझ नहीं आ रहा. ये अगर ऐसे चल रहा है तोह शायद बड़ो के फैंसले जरूर रहे होंगे इस सबके पीछे. तुम्हे आज के लोगो की जानकारी चाहिए थी और वो मेरे साथ साथ तुम्हे बहोत से लोगो ने दी है. तुम पास्ट में जाने की गलती मैट करो भाई.", कोमल दीदी ने एक कागज़ पर अपने भाई का नाम लिखा देखा तोह वो उसको उठा कर गौर से बाकी नाम भी पढ़ने लगी.

"मैं अपनी सीमा जानता हु दीदी और मैं किसी भी मामले में नहीं पड़ने वाला. वैसे ये नाम मुझे भी कुछ हे दिन पहले पता चला था लेकिन बताया किसी ने भी नहीं इस बारे में. अर्जुन सिंह मेरे चाचा हे थे जिनकी मौत का राज पूरी तरह आज तक नहीं पता चला. कोई इनका नाम नहीं लेता कभी भी और इतने सालो में दादा जी ने भी मुझे ये नहीं बताया. अज्जू नाम से मुझे भी इनके पापा बुलाते थे और तब वो जो भी बातें करते थे मेरे साथ लेकिन आज मुझे वो समझ आ रही है.", अर्जुन के जवाब ने जैसे कोमल दीदी को बर्फ सा ठंडा कर दिया था.

"करने क्या वाले हो तुम?"

"अगर ये नाम मैंने किसी के भी सामने लिया तोह 100 सवाल मुझ से हे हो जायेंगे दीदी. अर्जुन सिंह जी की मृत्यु जब हुई तोह उस समय हे बहोत साड़ी घटनाये हुई थी. अगर मेरा सोचना सही है तोह ये सब इशारा करता है किसी पुराने बदले और कही ज्यादा हे बड़े षड़यंत्र का. सभी परिवारों में कोई न कोई मारा गया था सिवाए हमारे और देख जाए तोह हमारा परिवार एक तरह से उमेद चाचा जी के परिवार के साथ साँझा रहा है मतलब ये 2 परिवार एक हे है. लेकिन बड़ी दादी और बबिता दीदी के नानी वाले परिवार में कोई भी मेल पर्सन नहीं है पापा लोगो की जनरेशन वाला. अजीब है न?", अर्जुन सचमुच इस अनजान सफर पर कही दूर तक पहुंच चूका था लेकिन अब कोमल दीदी ने भी फैंसला कर लिया था के वो अपने भाई के साथ hum-kadam रहेंगी. उसकी म्हणत और जिज्ञासा बेफिजूल तोह बिलकुल नहीं होगी.

"इसके बारे में तोह उमेद चाचा के घर से हे कुछ पता चल सकता है और मुझे लगता है इसलिए हे तुझे उनके घर नहीं जाने दिया जाता ारु. वैसे मेनका ने भी बहोत कुछ बताया हे होगा तुम्हे. लेकिन तुम बिंदु और लता आंटी के पीछे क्यों पड़े हो?"

"इन दोनों को विधवा होना भी जैसे बुरा नहीं लगा दीदी. और ऋचा ने जब बताया था की उसके मां के हे सम्बन्ध माँ और नानी के साथ रहे है तोह ऐसा लगता है के अनहोनी की शुरुआत उनके हे परिवार से हुई थी. वैसे ये भी बबिता ने बताया क्योंकि ऋचा मुझसे तोह ये सब नहीं कहेगी लेकिन बबिता को उन्होंने बताया था ये सब जब उसके मां ने उस पर नियत खराब की थी.", अर्जुन इस पल में इतना गंभीर था जैसे कभी रामेश्वर जी किसी गुत्थी को सुलझाते हुए होते थे. मेनका का जीकर तक नहीं किया था उसने अभी.

"चल एक और बात मैं बता देती हु तुझे शायद तेरे काम आये. दलीप मौसा जी को पुलिस में नौकरी उनके पिता की मौत होने पर मिली थी. उन्होंने म्हणत से इम्तिहान देने के बाद सीड को चुना लेकिन कभी बात जाहिर न होने दी. वो सभी के लिए बस जमीन bechne-kharidne वाले व्यापारी और शौकिया जमींदार है. उनके पिता की मौत दादा जी को बचते हुए हुई थी भाई. वैसे अब तुम्हे विन्नी की मदद लेनी चाहिए.", कोमल दीदी की बात सुन्न कर अर्जुन को मौसा के लिए थोड़ी हैरत तोह हुई थी लेकिन विन्नी वाली बात पर उसने ना में सर हिला दिया.

"विन्नी दीदी इसमें मदद नहीं कर पाएंगी क्योंकि वो भी 24 साल की हे है और कोई इंसान राज को राज रख सकता है तोह वो उमेद चाचा जी है. वो कभी बात नहीं बताते लेकिन जानकारी लेना उन्हें कही ज्यादा पसंद है. पूर्णिमा दादी जी बिलकुल अपनी दादी जैसी है तोह उनका भी मुँह नहीं खुलेगा और न हे राजेस्वरी चची जी इस बारे में मदद कर सकेंगी.", अर्जुन के जवाब पर कोमल दीदी थोड़ी आशंकित सी हुई.

"वैसे तू विन्नी दीदी के तेरे पास आने से डर रहा है तोह ये दिल से निकल दे. उनका भी तेरे पर पूरा हक़ है और मुझे बुरा नहीं लगेगा.", अर्जुन को ये सुन्न कर ाचा तोह लगा लेकिन उसने जवाब अलग हे दिया.

"शालिनी बुआ. मेरे ख़याल से वही एक व्यक्ति है जो मुझे कुछ जानकारी दे सकती है लेकिन उनका स्वभाव और दिमाग थोड़ा जटिल है. और अगर आप ध्यान देंगी तोह वही एक है जो सबसे दुरी बनाये रखती है. मेरे पीछे से वो यहाँ कितनी बार आयी होंगी दीदी?"

"8 साल में सिर्फ एक बार और वो भी किसी सरकारी काम की वजह से दादा जी के पास थोड़ी हे देर के लिए. अलबत्ता दादा जी और दादी वह जाते रहे है मिलने के लिए और मधु बुआ भी. लेकिन जितना मैं समझती हु ये बहोत मुश्किल होने वाला है. शालिनी बुआ किसी से भी ज्यादा बात नहीं करती सिवाए इन तीनो के."

"अब करेंगी दीदी. वो जरूर करेंगी अब मुझसे बात.", अर्जुन ने इतना कहा था और बहार वाला गेट खुलने की आवाज से पता चल गया था के तारा घर आ गयी है. अर्जुन ने तुरंत हे वो सभी पैन सही से व्यवस्थित करने के बाद स्टडी टेबल के अंदर ख़ास अंदाज में छुपा दिए.

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दिल्ली पहुंचने पर जहा शंकर जी की गाडी रुकी थी वही पर उन्हें उमेद सिंह पहले से इन्तजार करते मिले. ये जगह थोड़ी व्यस्त और chehal-pehal वाली मार्किट थी और शायद सबकुछ पहले से हे निर्णीत था. उमेद यहाँ अपनी बेटी विन्नी और भांजी आइशा को साथ लिए आये थे.

"वाओ. थिस इस सरप्राइज.", आरती के ऐसा कहने पर बाकी सब भी मुस्कुराने लगे थे. विन्नी दीदी दोनों से हे गले लग कर मिली और हलके khaan-paan के बाद एक सुरक्षाकर्मी जो शायद ड्राइवर भी था, उसके साथ हे चारो लड़कियों को यहाँ मार्किट में kharid-dari की इजाजत देते हुए दोनों लोग शनकर जी वाली गाडी में हे काम से निकल गए. उन्होंने पहले हे बता दिया था के उन्हें आराम करना हो तोह वही बगल वाले एक उचित होटल में रुकने का प्रबंध किया गया है.

"रात को करम सिंह मारा गया भोले. शराब पीते हुए उसका किसी से झगड़ा हुआ था और वो अकेला था. तेरे अंदाज में हे उसको मारा गया है.", ये व्यक्ति हे तोह बिंदु का भाई था जिसकी जानकारी उमेद ने ये बड़ी कार चलते हुए अपने dharam-bhai को दी थी.

"मेरे अंदाज से तेरा क्या मतलब है गज्जू? और करम सिंह तोह ladaai-jhagde वाला व्यक्ति नहीं था फिर उसकी मौत कैसे?", शंकर की पेशानी पर भी चिंता छा गयी थी. आज दिन हे अजीब सा था उनके लिए.

"भोले उसका शरीर ऐसे काटा गया था जैसे पेट से लेके गले तक किसी ने ऑपरेशन कर दिया हो. हाथ कलाई के पास से काट कर टेबल पर रखा था. मतलब साफ़ है के जिसने भी मारा है वो झगड़ा करने नहीं बस उसको मारने हे आया था. लेकिन एक बात और पता लगी है के एक काली इलो कार देखि गयी थी वह. और ये सिर्फ टायर बनाने वाली खेमे ने देखा जिसने पुलिस को भी कुछ नहीं बताया. तेरी वाली तोह नीली है लेकिन क्या पता वो अँधेरे में काली दिखती हो."

"न गज्जू, कल रात संजीव के पास वो गाडी थी और वो डिनर पर अर्जुन के साथ बहार गया था. मतलब अपने हे शहर में था और वो सोया भी मेरे हे पास था. लेकिन ऐसी निर्ममता तोह कोई डॉक्टर या सनकी हे दिखा सकता है. और अब शायद ये खबर बिंदु तक भी जाए."

"जा चुकी होगी अब तक तोह मेरे भाई. उसका भाई मारा गया है और जिसने भी ऐसा किया है उस से साफ़ है की वो तेरे और बिंदु के बीच की रंजिश को हवा दे कर और भड़का रहा है. अब सचमुच संभल कर हे रहना पड़ेगा क्योंकि ये औरत अपनी पहुंच से बहार भी है और इसके साथ कौन कौन है ये हम जान नहीं सके.", उमेद की चिंता अपनी जगह जायज़ थी और शंकर भी सिग्गट की डिब्बी अपने भाई की तरफ बढ़ाते हुए जहां सोच में डूब गया.

"वैसे इस मिश्रा मादरचोद का क्या चक्कर है यार? ये साला बिंदु के साथ क्यों है अब तक? हरामजादा कोई बड़ा पंगवा करवा कर हे मानेगा और फिर मेरा बाप मेरी गांड मार लेगा अगर मैंने इसकी गर्दन उतार कर रख दी तोह.", शंकर ने विषय बदला लेकिन अब उमेद के चेहरे पर हंसी आ गयी थी.

"अवधेश अब नजर नहीं आएगा तुम्हे कुछ समय तक. मेरी बात हुई थी उस से आज सवेरे और मैंने वार्निंग भी दे दी थी की अब शादी तक उसने कुछ भी किया तोह घर में घुस कर मारूंगा लेकिन जानते हो उस बाहुबली ने क्या जवाब दिया?", उमेद के ऐसे एकाएक सवाल पर शंकर ने हैरानी में नजर घुमाई तोह वो बस मुस्कुरा रहा था. कार laal-batti पर रुकी थी अभी.

"क्या बोलै वो हरामी?"

"वो कहता के उसके परिवार को हम लोग बीच में न लाये और वो हर्जाना देने को तैयार है जो भी तुम चाहो. मिश्रा की बहिन को कल हे किसी ने दिल्ली में 2 घंटे के लिए अगवा कर लिया था और वो अब थोड़ा डर रहा है. भोले, दिल्ली में किसकी हिम्मत हो सकती है जो इस आदमी से पन्गा ले? गजेंदर भल्ला या फिर रौनकलाल हे 2 लोग है जो हमसे भी तगड़े है और मिश्रा से भी. वो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि फ़िलहाल दोनों हे यहाँ अपनी राजनीति चमका रहे है. और तू अगर फिर से कोई अपशब्द बोलै तोह जलती सिग्गट गांड में दाल दूंगा.", काश लगाने के बाद उमेद ने dhumarpan-dandika शंकर के हवाले की तोह वो भी थोड़ी सोच में पड़ा लम्बा सत्ता खींचने लगा.

"ये झंझट क्या चल रहा है यार गज्जू? समझ से बहार है के एकदम हे सब लफड़े कैसे शुरू हो गए और रौनकलाल पापा का दोस्त है तोह उस से हम बात भी नहीं कर सकते. वही ये भल्ला एक तरह से मालिक हे है अपने एरिया का और वो बात करने से पहले हे गोली चला देता है. बिंदु को इन्दर हमेशा पसंद था लेकिन वो इसके साथ साथ अभिनव के साथ भी जुडी थी. इस चक्कर में साला अवधेश और उसका बाप बीच में आ गए और अब ये कौन है जो दिल्ली में उसको हे चुनौती दे रहा है? बिंदु की जेड तोह समझ से हे बहार हो गयी है मेरी. भुप्पी भी कह रहा था के वो उस पीसीओ तक पहुंच गया है जहा से फ़ोन हुए लेकिन इधर कर्मा (करम सिंह) मारा गया.", शंकर के पास जैसे सीढ़ी बात हे नहीं थी कुछ करने के लिए. मैं अशांत था और खुद को ठीक रखना भी जरुरी था.

"तू लोगो को समझ नहीं रहा और मैं बीच में इसलिए नहीं बोलता की तू सुनेगा नहीं. एक तेरे लिए जैसे सबसे बढ़कर है और दूसरे से तू जरुरत की हे बात करता है. मेरी मान तोह तुझे लता और अर्जुन को समझना चाहिए. दिन में तू 3 फ़ोन लता को करता है हर रोज और सबसे ज्यादा अनदेखी अगर तूने किसी की की है तोह वो है तेरा हे बीटा अर्जुन. तू आजतक नहीं समझा के तू सही में क्या चाहता है और जो तू चाहता है तूने वो पूरा नहीं किया मेरे भाई. मुझे तोह बस वही एक डर है के कल को जिसको तू प्रतिद्वंदी समझ रहा है और उसने हे तुझे सही रास्ता दिखने की कोशिश की तोह उसका अंजाम क्या होगा. रेखा भाभी के लिए तू एक पल भी वैसे न सोच पाया और वही दूसरी तरफ तू इस बात से डरता है के अर्जुन अगर तेरे सच तक पहुंच गया तोह क्या होगा. भोले, मैं को शांत कर और फिर देख की सबसे ज्यादा जवाब सिर्फ तेरे पास हे मिलेंगे किसी से भी.", उमेद ने चुटकी बजाते हुए सिग्गट की राख झाडी और फिर से अपने दोस्त को थमा दी.

"देख यार तुझे भी पता है के लता ने सब सहते हुए भी मुझसे प्यार बरकरार रखा और आज भी वो मेरे लिए एक कमरे में विवाहित औरत रहती है. उसकी खुशियां और गुजरी ज़िन्दगी देख कर मैं उसको दुःख नहीं देना चाहता. कभी कभी शक हुआ भी के वो और ताई शायद कही इन घटनाओ के लिए जिम्मेवार है पर बदले में मुझे तोह बस प्यार और अपनापन हे मिला. और अर्जुन कोई उतना भी जेम्स बांड नहीं है के वो हमसे भी आगे सोच या जान सके. मैं तोह खुद चाहता हु के वो सवाल करे लेकिन उसकी जुबान haal-chaal से ज्यादा आगे जाती नहीं. ताक़त है, समझदार है और परिवार का ख़याल ाचे से रख रहा है वो तोह उसके पास इतना समय हे कहा के वो इन झंझटो में पड़े. बिंदु की बेटी मेरे पास है और अब निश्चिन्त रह. अर्जुन मेरा बीटा है और लता मेरी बीवी."

"स्वयं छुटियम तथ्य जगत छुटियम. तेरे लवडे लग जायेंगे बे भोले और तू देखता रह जायेगा. बिंदु को शबनम की परवाह नहीं है, अवधेश को है. बिंदु बहार बैठी है लेकिन उसको सबकुछ पता जो तू समझ नहीं रहा. बबिता के साथ अर्जुन था और वो लड़की शायद सबसे ज्यादा जानती है इतिहास के बाजरे में. अर्जुन है रामेश्वर जी का पौता और वो उनकी तरह हे टीम बना कर काम करता है चाहे सामने न आये. रेखा भाभी जो है वो एक उचित स्त्री है जिसने तेरे लिए कितने हे बलिदान दिए और अर्जुन है उनकी जीने की वजह. अवधेश मिश्रा को धमक्वाया होगा कौशल्या चची जी ने क्योंकि चाचा जी ऐसा काम नहीं करने वाले लेकिन भजन मां उनके साले है और बहिन के लिए वो रौनकलाल उनकी हे पार्टी से है. जिसको तू बचा समझ रहा है न भोले, वो आज की तारीख में शांत रह कर भी सब काम कर रहा है.", अब कही शंकर के दिमाग में बत्ती जाली और दोनों हे मेहरौली फार्म्स वाली सड़क पर चल दिए.

"अब्बे यार. मतलब वो मुस्कान से ले कर सबका उसे कर रहा था मुझे हिंट देने के लिए? इसकी माँ की आँख. ये सांगवान चाचा तक पहुंच गया था और माँ भी इसकी हर बात मानती है गज्जू. कही ये अतीत में तोह नहीं?"

"न न.. वह तक सिर्फ इसको बबिता लेके जा सकती है लेकिन वो लड़की बोलती नहीं ज्यादा. लेकिन मेनका और दलीप की बेटी के साथ इसका गहरा है कुछ. अगर ये गौशाला तक पहुंच सकता है तोह तूने खुद हे इसको कम् आँका है भोले. ये जानता है वर्तमान में सभी की हैसियत लेकिन अगर ये अतीत में जाता तोह अज्जू वाला जीकर कही न कही जरूर करता. फिर इसकी क्षमता हमारे सामने जरूर आती क्योंकि वो चाचा जी का लाडला था और तेरा भी.", अब उमेद भी थोड़ा चिंतित था जैसे खुद को दिलासा दे रहा हो.

"बबिता जानती थी अज्जू को और रघुबीर चाचा भी तोह मिले थे अर्जुन से. वो अगर तेरे कहे मुताबिक पापा जैसा है तोह मतलब वह अब खुद नहीं खेलेगा. ओह बहनचोद या काण्ड हे हो गया गज्जू क्योंकि ये लड़का 2 दिन इन्दर के घर रहा था.", शंकर की सभी इन्द्रिय देर से हे जागृत हुई थी.

"कहा था न के वो time-bomb जैसा है. यहाँ अब पूरी टीम लगा दे तेरी और मेरी भी, गलती से कोई भी दुर्घटना नहीं होनी चाहिए. बिंदु का भी वार नहीं पता लग्न चाहिए उसको भोले और अगर तू कुछ भी समझता है तोह मुझे बता देना. अज्जू को तोह मैंने यादों से मिटा दिया लेकिन इसको मैं नहीं रोकने वाला. साथ देना हे पड़ेगा मरते दम तक.", उमेद का dridh-nishchaya शंकर को भी पता था.

"यार ये इन्दर आ जाए उसके बाद कृष्णा भाभी की देखरेख में अर्जुन व्यस्त हो जायेगा. तू प्लान ा पर हे काम करता रह चाचा के साथ मिल कर मैं इन्दर के साथ दलीप और राजेश को ले कर साड़ी साफ़ सफाई कर दूंगा.", इस बड़े फार्महाउस पर कार अंदर लाते हुए शंकर कुछ शांत रहने की कोशिश कर रहा था.

"उसको और शामिल कर ले तू भोले. वो बात हे कहा करता है, लाश बना के तुझसे हे पूछेगा की ये कौन था.", उमेद जैसे कही बेहतर जानता था नरिंदर को.

"वो सारंग से बात करना चाहता है गज्जू और मिश्रा के पास तेरे साथ वही जाने वाला है.", शंकर ने सामने एक सिक्योरिटी वाले को आता देख गाडी रोक दी थी. वो अपनी जगह पहुंच चुके थे और ये व्यक्ति उन्हें ba-ijjatt लेने हे आया था.

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उधर दिल्ली में सभी लड़कियां शॉपिंग के बाद अपने होटल के कमरे में आराम कर रही थी और शाम के 7 बज चुके थे. वही अपने घर पर अर्जुन भी आज दिनभर की म्हणत के बाद ाचे से स्टेडियम और चारुल के साथ समय बिताने के बाद अब अपने कमरे में आराम कर रहा था. संजीव भैया से उसकी बात हो गयी थी की वो 9 बजे तक आ पाएंगे और तबतक वो घर का ध्यान रखे. कोमल दीदी पड़ोस में चली गयी थी रेणुका बुआ के पास और इस समय का लाभ उठाते हुए तारा चपलता से अर्जुन के कमरे में दाखिल हो गयी.

"यु मुहब्बत में सोना हमने काम कर दिया, हरजाई मेरा शायद सपनो से मुहब्बत कर बैठा.", इस शायरी में तारा ने दिल की बात कही थी और अर्जुन ने भी मुस्कुराते हुए बाहें खोल दी.

"गर यु इल्जाम लगा है तोह इल्तेजा रहेगी, मेरे सपने भी अब तुमसे अलग तोह नहीं.", अर्जुन ने पहली बार हे ऐसा जवाब दिया था और तारा निक्कर टीशर्ट में सीधा उसके ऊपर जा लिपटी. ये मधुर पल और इतनी तस्सली पहले कभी मिली थी लेकिन आज जैसे वो भी इस प्यार को ाचे से पाना चाहती थी. लरजते होंठो से अर्जुन को चूमती तारा ने जल्द हे एक हाथ उसके पाजामे के अंदर दाल दिया. उस मूसल की सख्ती बता रही थी की तारा के लिए अर्जुन भी बराबर तैयार है.

"आज मैं तुम्हे खुश करुँगी मेरी जान. सोच कर आयी थी की वही बाथरूम वाला 15-20 मिनट का खेल खेले लेकिन सच कहु तोह तुम बस प्यार करने के लिए बने हो.", तारा ने इतना कहने के साथ हे अपने 36 के चिकने कूल्हों से वो निक्कर हटा दी. कामदेवी से तारा शरीर के मामले में सबसे सर्वोच्च थी बेशक सुंदरता में ऋतू उस से आगे हो पर जिस्मानी गठन की तुलना संदेहास्पद थी. अर्जुन भी उन तराशे हुए नरम कूल्हों को मसलने लगा और जल्द हे दोनों के होंठो से आगे अब जीभ का सफर चल पड़ा. सांस टूटने तक दोनों ऐसे हे jivha-kreeda करते रहे और उसके बाद तारा की टीशर्ट alag-thalag पड़ी थी और अर्जुन बस उन अर्धगोलाकार नारियल से सख्त लेकिन मांसल चुचो को घूर रहा था. निप्पल सूई की नोक से कड़े थे जिन्हे अर्जुन की म्हणत ने पहले से बड़ा कर दिया था.

"ये मेरा है और वो तुम्हारी.", तारा ने जैसे अपने शरीर को 270 डिग्री घूमते हुए अपने कूल्हे अर्जुन की तरफ किये और वो भीषण लाल सूपड़ा थमा तोह अर्जुन भी कुछ समझ न पाया. इस उजाले में तारा का baal-vihin फूली हुई छूट और वो गुलाबी भूरा गुदाद्वार उसके सामने था. तारा ने झट्ट से उस मशरूम से सुपडे को चूमते हुए होंठो में भर लिया. स्वचालित सा अर्जुन भी उन मोटी फांको के सम्मोहन में खिंचा चला सा उन्हें सूंघने के बाद मुँह में भर बैठा. मखमली सी कोरी छूट सिहर हे उठी थी अपने प्रेमी के इस स्पर्श से. गुलाबी फैंको के बीच में उभरी हुई पत्तियां अर्जुन चूसक रहा था और वैसे हे तारा भी मदमस्त होती आधे से ज्यादा लिंग मुँह में भर्ती हुई टर्र करने लगी.

"आह्हः.. आराम से करो.. आठ. हो गया है मेरा.", तारा की छूट की खटास अर्जुन को मिल चुकी थी और वो भी हिचकोले खाती हुई अलग हो गयी. जड़ से उस बिलात से ऊपर के लुंड को पकड़ती हुई वो इतराती हुई ऊपर आयी तोह अर्जुन भी एक पल के लिए उस चमकते चेहरे को निहारने हे लगा था. तारा सचमुच अलग हे थी लेकिन वो उतनी हे आक्रामक भी थी जैसे उसकी माँ. लुंड छूट के मुहाने टिकती हुई वो जैसे निचे बैठ रही थी एक पल के लिए भी नजरे अर्जुन से अलग न हुई.

"आअह्ह्ह्ह.. उफ्फफ्फ्फ़.. तेरा या डंडा छोटा कर दे यार.. माँ.. फ़क.. it's हूजे.", जड़ तक लुंड अंदर लेने के बाद वो खुद हे अर्जुन पर झुकती हुई उसको चूमने लगी थी. इतनी मखमली लेकिन सख्त गिरफ्त में क़ैद लुंड भी उछलने लगा था. अर्जुन दोनों चुचो को मेस्टा हुआ निचे से धक्के देने लगा तोह तारा ने भी बराबर साथ दिया.

"तारा, तुम पागल हे हो.. आठ.. इतना कण्ट्रोल तोह मुझे कोई नहीं कर सकता.. आठ.. "

"तुम एक बेलगाम घोड़े हो.. आह्हः.. जो सिर्फ ऐसी हे घोड़ी के काबू आता है. बूत ी स्टिल फील सुब्मिस्सिवे.. माँ... आईटी इस हिटिंग माय स्तोमच."

"जब वह डालूंगा तब क्या करोगी? तुम्हारी ये बड़ी मस्त है यार.", अर्जुन ने गांड के बंद छेड़ में ऊँगली फँसाई और तारा की सांस अटक गयी. छूट पहले हे इस लुंड ने फैला दी थी और अब अर्जुन इस दूसरे छेड़ पर आसक्त था. रेशमी छूट बड़ी नजाकत से इस मॉटे तगड़े लुंड को झेल रही थी लेकिन गांड शायद ऐसा वॉर नहीं झेल सकती थी.

"वह तब डालना जब मोहल्ला हे खली हो... आअह्ह्ह.. छूट तोह एडजस्ट कर लेती है यार.. उम्म्म्म.. लेकिन वह लुब्रिकेशन नहीं होती.. ये साला तोह वृस्त से भी मोटा है.. आठ.. पी लो इन्हे उम्म्म्म..", अर्जुन ने तीखे गुलाबी निप्पल दबोच कर चूसने शुरू कर दिए और वो जानता था की उसका लुंड तारा गांड में ले नहीं पायेगी. छूट में भी चुदाई के 3 बार होने पर हे वो पूरा ले पायी थी.

"नहीं करता अभी मैं कुछ.. It's हीवेनली हेरे.. आह्हः.. जैसे तारा छूट को टाइट और ढीला करती अर्जुन को मजा दे रही थी वो भी पागल हो रहा था. 36 के मॉटे चुके इतनी चुदाई के बावजूद सख्त और चिकने थे. उनसे होंठ हटाने का जैसे दिल हे न था. लाल चीरा अब बुरी तरह लुंड से लिप्त जैसे खो चूका था और वो दृश्य कोई पहली बार देखता तोह यही सोचता की अर्जुन ने रास्ता खुद बनाया होगा. Thapp-thapp की तेज आवाज के साथ तारा पूरा जिस्म लुंड पर पटक रही थी. Gol-matol कूल्हे हर धक्के पर अपना एहसास करा रहे थे.

"घोड़ी हे बन jao..aah.",Arjun ने जैसे हे लुंड बहार निकलते हुए तारा को निर्देश दिया वो स्खलित होने के बावजूद मुस्कुराती हुई उसके लुंड पर झुक गयी. दोनों के रस से सरोबार वो 9 इंच का लुंड शायद अब एक प्यारा अंग था उसके लिए. मुँह में भर कर एक बार चूसते हुए वह खुद हे लुंड अपनी छेड़ पर लगाती हुई अपने दूसरे हाथ से अर्जुन का एक हाथ अपने चुके पर रखती हुई बोली.

"कास के मारना और इन्हे तोह अब 38 का हे करना है तुम्हे. ब्रा लेने में भी मजा आना चाहिए.. उफ़... आराम से बाबा. ाःह", अर्जुन ने एक हे झटके में छूट की गहराई माप दी थी और वो अब दोनों चुचो को मसलता पूरी रफ़्तार से तारा की चुदाई कर रहा था. भूरा गुलाबी गांड का बंद छेड़ और उसकी सिलवट उसको अपने पास बुलाने लगी तोह कूल्हों को फैलते हुए आज पहली बार अर्जुन ने होंठ वह टिका दिए.

"ऊऊफफफफफ.. मैट करो यार. ी वांट तहत ताऊ.... ", तारा ने धक्के रुकने के साथ हे गांड के उस छेड़ पर अर्जुन को महसूस करते हे पानी छोड़ दिया था. अर्जुन ने भी वापिस धक्के मारते हुए सटासट चुदाई चालू कर दी. अब वो एक अलग हे नशे में था जिसका विवरण उसके पास भी नहीं था. यहाँ तारा को अपनी बच्चेदानी फटने का दर लग रहा था इस आकस्मिक लुंड के अकार बदलने पर. छूट रिसने के बावजूद अब धक्के झेल नहीं प् रही थी. चुके तोह अकड़ कर बाद दूध हे निकल देते और 30 मिनट की लम्बी चुदाई के बाद अर्जुन के वीर्य को गर्भ पर महसूस करते हे वो उछलते हुई एक तरफ जा कड़ी हुई. शरीर कांप रहा था और फर्श पर तारा के मूत्र की बूंदे उछलने लगी. दिवार पर हाथ रखती वो बाथरूम में दौड़ गयी और पीछे हे अर्जुन भी.

"आअह्ह्ह्ह. कमीने क्या कर दिया ये तुमने.. आठ..", बाथरूम के फर्श पर बैठने के बावजूद वो पेशाब करते हुए सखलन से भी परेशां हो रही थी. 10 मिनट बाद वो व्यवस्थित हुई तोह अर्जुन की बाहों में खुद को प् कर निढाल हो गई. दोनों अब पानी के निचे थे और तारा को बड़े प्यार से सहलाते हुए अर्जुन ने ाचे से नहलाया था. आज वो पहली बार 8 बजे हे सो चुकी थी और अर्जुन कमरे की सफाई करने के बाद बैठक में जा चूका था निचे. भैया क आने के बाद वो भी 10 बजे सो चूका था. आज पहली बार अर्जुन खुद से हे आराम देना चाहता था खुद को और संजीव भैया ने भी यही जरुरी समझा.
 
अपडेट 136

Upar-Niche (1)


'Tringgg-tringgg' की ये आवाज सुन्न कर संजीव ने टेलीविज़न की आवाज बंद की और अपने छोटे भाई को सोया देख कर फ़ोन का हैंडल उठा लिया. नंबर से पता चल गया था के ये दादा जी हे गाँव से फ़ोन कर रहे है.

"जी बाउजी.", आहिस्ता से संजीव ने इतना कहा तोह रामेश्वर जी भी दूसरी तरफ मुस्कुरा दिए.

"क्या हो रहा है भाई और तुम्हारा मुन्ना राजा घर नहीं है क्या?"

"नहीं अर्जुन तोह सो गया है बाउजी और मैं भी उसके पास हे बैठक में समाचार देख रहा था. आप इतनी रात को जाग रहे है?", घडी में साढ़े 10 हो रहे थे और संजीव भी जानता था के गाँव में इस वक़्त सभी सो चुके होते है.

"हाँ जरुरी बात करनी थी तुमसे और मुझे लगा यही सही वक़्त होगा. और ये इतनी जल्दी कैसे सो गया आज?", रामेश्वर जी जहा बैठे थे वह उनके aas-pas कोई न था और दरवाजा अंदर से बंद था.

"दिन में आराम नहीं किया था इसने और फिर शाम को स्टेडियम भी गया था तोह थोड़ी देर गेम खेलने के बाद हे सो गया. आप कहिये क्या जरुरी बात है, यहाँ कोई नहीं है तोह निश्चिंत रहिये.", संजीव भैया ने एक नजर अर्जुन पर डाली जो तकिया हाथ के निचे दबाये मजे से सपनो की दुनिया में था.

"मुझे पता है बीटा के वह कोई नहीं है और अर्जुन के होने पर भी मुझे दिक्कत नहीं. तुम कल सवेरे 7 बजे हॉस्पिटल जाओगे और वह बिट्टू (अर्जुन के बड़े मां) मिलेगा. वो शबनम के कागजात देंगे और तुम्हे उन पर शबनम के हस्ताक्षर करवाने है. एक बयान भी लिखा मिलेगा उन कागजो में और वह शबनम के साथ साथ गवां के तौर पर अर्जुन और एक डॉक्टर के दस्तखत भी करवा लेना.", रामेश्वर जी जो भी बता रहे थे संजीव ख़ामोशी से सुन्न रहा था. उसको भी कौतहूल हो रहा था के ये क्या हो रहा है.

"वो बयान सिग्न करने से मन करेगी तोह क्या करेंगे बाउजी?"

"वो ऐसा नहीं करेगी बीटा. शबनम को आजादी प्यारी है और वो भी एक सुरक्षा के साथ. बस उसको एक छोटे जुर्म की सजा ये मिल रही है के वो कुछ साल तक इंडिया नहीं आ सकेगी. मैं उस लड़की को किसी संगीन जुर्म का अपराधी नहीं बना रहा हु बस वापिस देश भेज रहा हु पासपोर्ट ससपेंड करवा कर. और जानकारी के लिए बता देता हु की मेरी बात शबनम से हो चुकी है इस बारे में और उसने अपनी माँ को भी बता दिया है के हम उसको सुरक्षित वापिस भेज रहे है. अर्जुन को याद से साथ ले जाना अपने. रखता हु और मैं परसो वापिस आ पाउँगा क्योंकि कल सवेरे तुम्हारी दादी भी इधर हे आ रही है.", रामेश्वर जी ने सूचित किया तोह संजीव सर खुजाते हुए बस 'जी' बोल सका.

'साला ये एकदम क्या हो गया? चाचा तोह कह रहे थे की शबनम को अभी टॉर्चर करना है और अगर वापिस भी भेजते तोह मर्डर चार्जेज के साथ. ये अपने थानेदार जी ने क्या कर दिया एकदम', संजीव असमंजस में फिर से फ़ोन को देखने लगा लेकिन अपने चाचा को फ़ोन करके बताने का ख्याल मैं से तुरंत निकाल दिया.

'देखते है ये माजरा क्या है. ये खेल कही न कही इस पागल ने हे न खेल दिया हो और थानेदार जी इसकी बातों में आ गए.', वो अर्जुन के बराबर आ लेते और जैसे हे भाई के हाथ पर हाथ रखते हुए बड़बड़ा रहे थे अर्जुन भी नींद में बोल उठा.

"खेल नहीं खेलता मैं. उम्म्म्म.. सोने दो न प्लीज.", संजीव भैया की तोह गांड हे फट गयी थी एक बार लेकिन वो लड़का अब अपने भाई के ऊपर एक हाथ रखे सो रहा था.

'बहनचोद, एक बार तोह लगा कही ये मैं हे न पढ़ना सीख गया हो. कुछ भी सोचता हु मैं भी.', अपनी हे सोच पर संजीव मुस्कुराया लेकिन वो देख न सका की एक मुस्कान अर्जुन के होंठो पर भी थी. दोनों भाई जल्द हे नींद में जा चुके थे.

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शंकर और उमेद ने होटल में बात करते हुए सभी जानकारी ले ली थी. चारो लड़कियां अब कमरों में आराम कर रही थी भोजन से फारिग हो कर और ये दोनों 11 बजे हे एयरपोर्ट की तरफ चल दिए. यहाँ बहोत से काम निबटाये थे इन्होने दिन भर में और गाडी की डिक्की आधी भर चुकी थी ख़ास कपड़ो और सामान से. सफर जिम्मेवारी वाला था इसलिए अभी तक दोनों ने शराब से दुरी बना राखी थी.

"भल्ला भी मेरे साथ काम करने को तैयार हो गया है भोले और अपनी जगह भी देने की पेशकश कर दी है उसने. तुझे क्या लगता है वो सही व्यापारी है?", कार अब शंकर के हाथ में थी और दिल्ली की सड़के इस वक़्त तक रोशन थी जहा जवान लड़के लड़किया हर तरफ दिख रहे थे.

"वो तुझे मिला कर अपनी हे ताक़त बढ़ा रहा है गज्जू. देखा न कैसे मुनाफे पर 60 प्रतिशत तुझे दे दिया लेकिन हिस्सेदारी 51 उसकी और 49 तेरी. और सही कहु तोह उसकी दहशत से ज्यादा बड़ा लोगो का उस पर विश्वास है. भल्ला गलत काम को सही तरीके से करता है कागज पत्र के साथ. बस अब तू रौनकलाल वाली बात पर ध्यान दे.", सिग्गट की तालाब थी लेकिन कार में न पीने की वजह भी. जल्द हे कार आबादी से दूर आ गयी थी जहा जंगल जैसे माहौल में एक तरफ गाडी रोकते हुए दोनों हे बहार निकल आये. यहाँ से havai-adda भी 2-3 किलोमीटर हे था.

"यार उनके साथ काम करना जाँच नहीं रहा और ना भी नहीं कर सकता. तू समझ रहा है न इसकी वजह वो बिट्टू की ससुराल वाले है. लेकिन भल्ला के साथ काम करना है तोह रौनकलाल के साथ भी जुड़ना हे होगा. तेरी जमीन पर नजर सुरेश गौर की भी है और अब वही रौनकलाल भी चाहता है. मुझे ये ठीक नहीं लग रहा भाई."

"माँ छुड़ाए वो साला सुरेश और जमीन मेरी नहीं है तेरी हे है. तू कर रौनकलाल के साथ काम लेकिन सामने चेहरा रखेंगे राजेश का. उसके हे तोह कनेक्शन है इन सबसे और रौनकलाल भी समझेगा क्योंकि वो भी चंदा लेता है इन कमीनो से तोह पन्गा नहीं करेगा. वैसे सुरेश की लुगाई बहोत रसभरी है गज्जू. आह्हः..", पेशाब करते हुए शंकर ने ऐसा कहा तोह उमेद भी ठहाका लगाने लगा. कार से बिसलेरी की बोतल निकल कर दोनों ने हे हाथ धोये और सिग्गट की डिब्बी अब शंकर के हाथ में थी.

"तू सच में वही देसी मुर्गा है कमीने. हर मुर्गी के ऊपर चढ़ने की ठरक तेरी इतने सालो में भी नहीं काम हो रही. मौका मिले तोह कसार निकाल लियो, वैसे भी साले की भी आगे साली है वो. तेरा पूरा हक़ है उस पर.", उमेद अब कार से पीठ टिकाये खड़ा था और शंकर अँधेरे में हे काश लगते हुए मुस्कुरा रहा था. सिग्गट ने जल्द हे दूसरे होंठो को महसूस किया और शंकर अपनी कहने लगा.

"यार गज्जू वैसे तू ज़िन्दगी भर एक के हे साथ रहा और मैं कभी एक पर न रुक सका. हम दोनों भाई है लेकिन तुझे अजीब नहीं लगता ये देख कर.?"

"इन्दर भी तोह हमेशा एक के हे साथ रहा है भोले और बात एक या अनेक वाली नहीं है मेरे भाई. मेरी लुगाई ने कभी मुझे भटकने हे नहीं दिया और सच कहु तोह मैंने न कॉलेज में कभी प्यार किया था और न बहार. सीधा शादी हे हो गयी और राजेश्वरी ने भी मेरा साथ हर कदम पर दिया. तुझे क्या लगता है के 21 साल का वो झंडू मेडी (अपने लिए) इतना समझदार बन्न सकता था? राजेश्वरी ने हे घर को संभाला, मुझे व्यापार सिखाया और प्रेरित किया की मैं papa-chacha जैसा बनु. चाचा जी और पापा बेशक विख्यात रहे शंकर और उनकी धाक कही ज्यादा हे थी जिसके बराबर हम नहीं पहुंच सकते लेकिन इसके पीछे वजह रही की उन्हें संभाला हमारी माओ ने. वो दोनों हे अपने जीवनसाथी के सिवा कही बहार नजर न आये. सोमबीर ताऊजी की ठरक 20 गाँव तक मशहूर थी. और तू वैसे भी डॉक्टर आदमी है, तेरा चलता है नए नए ऑपरेशन करना.", उमेद ने हँसते हुए अपने दिल की बात कही तोह एक पल के लिए शंकर को भी एहसास हुआ था की सचमुच रघुबीर जी और पंडित जी के जीवन में कभी कोई बाहरी स्त्री नहीं आयी थी. यहाँ तक की वो लोग तोह हर बात अपनी बीवी से करते रहे.

"यार अज्जू भी किसी से प्यार करता था न?", एकाएक शंकर के मुँह से बस निकल गया ये नाम लेकिन उमेद मुस्कुरा दिया.

"हाँ लेकिन वो कौन थी ये पता नहीं चला कभी. उसकी साइकिल कौनसा एक गाँव में टिकती थी यार भोले और कॉलेज में वो इस सबसे हमेशा दूर हे रहा. आज कैसे याद आ गयी तुझे उसके प्यार की?"

"वैसे हे यार. उसने कहा था के जब मेरी शादी होगी तोह वो मुझे अपने प्यार से मिलवाएगा. खैर तेरी भी बात सही है के वो 20 किलोमीटर तक तोह साइकिल पर हे घुमाई करता फिरता था लेकिन उसकी साइकिल का भी एक नाम होता था.", अब सिग्गट ख़तम हुई तोह दोनों वापिस गाडी में बैठ गए.

"हाहाहा. साइकिल नीलम कंपनी की थी और वो उसको नीला बुलाता था. कही भी कोई स्टीकर न था उसकी साइकिल पर और मुझे भी वो अपनी साइकिल नहीं देता था चलने के लिए. सही दिन थे यार भोले और अब देख ज़िन्दगी कहा से कहा आ चुकी है."

"हाँ यार पहले सोचते थे की जल्द बड़े हो जाए और अब लगता है के बड़े हुए हे क्यों. और सच कहु तोह हम सबमे से ज़िन्दगी को सही ढंग से जीने वाला हे साथ न रहा. अज्जू गली मोहल्ले में हे लड़कियों के साथ गिट्टे खेलने बैठ जाता था और दिल करता तोह सोमबीर ताऊजी की पगड़ी पहन कर पंचायत में भी. उस जैसा सचमुच कोई न था और आज तक मुझे दुःख है के जब वो सबको इतना प्यारा था तोह Fateh-Sundi ने ऐसा क्यों किया था.?"

"चल छोड़ इस सबको और देख समय हो गया है इन्दर और भाभी के आने का. अज्जू वह ऊपर भी उन सबकी तसल्ली से मार रहा होगा.", उमेद ने इतनी बड़ी बात को भी मजाक में उड़ाते हुए अपने कदम प्रतीक्षा स्थान की और बढ़ा दिए. शंकर भी तुरंत उस तरफ चल दिया. जल्द हे ट्राली से सामान धकेलते हुए सामने से नरिंदर आता दिखा और हैरत वाली बात थी की कृष्णा जी खुद चल कर आ रही थी. वो उजली सफ़ेद से नारी पहले सी कमजोर तोह थी लेकिन चेहरे पर अब आकर्षण लौट आया था. जोश में शंकर ने तोह इन्दर को बाहों में भरते हुए ऊपर हे उठा लिया था वही उमेद से कृष्णा जी हाथ मिला कर मिली थी एक तरफ गले लगते हुए.

"अरे बस कर भोलेनाथ, लोग देख रहे है और अब हम 15 साल के नहीं है.", नरिंदर ने भी कदम जमीन पर रखने के बाद कास कर भाई को बाहों में भर लिया था. फिर ऐसे हे उमेद और नरिंदर पूरे जोश में मिले थे.

"ये ताड़ का पेड़ अभी भी बड़ा हो रहा है क्या भाई? साला एयरपोर्ट पर अँगरेज़ भी इतना लम्बा नहीं दिख रहा जितना ये है.", वो अपनी बात कह रहा था और शंकर ट्राली लिए कार की तरफ चल दिया, कृष्णा के साथ साथ.

"भोले को तेरी बड़ी कमी खाल रही थी इन्दर और वो बेचैन था आज सारा दिन. वैसे भाभी में फरक है पहले से?", दोनों पीछे चलने लगे थे और एक अटैची अब उमेद के हाथ में था.

"हाँ इसने फ़ोन पर बताया था के यहाँ कुछ चल रहा है. अब वैसे भी मैं घर पे हे रहने वाला हु और इस शादी के बाद तेरे साथ हे धंदा करना है. तू सुना भाई घर के क्या हाल है? तुझसे मिलना भी आजकल मुश्किल हे है.", दोनों जबतक कार में आये तोह शंकर ने पिछली सीट को थोड़ा और आरामदेह बना कर कृष्णा जी को बैठा दिया था. आखिरी हिस्से में सारा सामान रखने के बाद अब वो ड्राइवर सीट पर थे. नरिंदर भी अपनी बीवी के बगल में बैठे और उमेद शंकर की बगल में.

"सही कहा इन्दर. दिल्ली और ##### में नया बिज़नेस चालू कर रहे है और तेरी तरफ से भोले ने पहले हे 33 करोड़ (नरोत्तम से लूटा पैसा) लगा दिए है. मैं अकेला हे साफ़ सफाई में लगा था और अब तू आ गया है तोह जमीन जल्द हे खाली हो जाएगी.", उमेद की बात सुन्न कर शंकर मुस्कुरा रहा था लेकिन नरिंदर को इस बारे में कुछ नहीं पता था. कृष्णा जी एक की ठंडक और आरामदायक सीट की वजह से आँखे मूँद चुकी थी.

"ये क्या बोल रहा है शंकर? वैसे मेरा भी बड़ा दिल कर रहा है के अब कुछ म्हणत करू, दिमाग में तेल दालु और शरीर की जकड़न दूर करू. मेरे लायक काम तोह है न तुम दोनों के पास?"

"सिर्फ हम दोनों हे नहीं राजेश, दलीप, भुप्पी भी तैयार है लेकिन तुम उमेद के साथ काम करोगे और मैं दलीप के साथ. भुप्पी और राजेश को फिलहाल व्यस्त किया हुआ है लेकिन तुम्हे मजा जरूर आएगा इस गज्जू के साथ.", शंकर ने खाली सड़क देख कर गति बढ़ा दी थी जो इस गाडी पर कोई प्रभाव न डालते हुए माहौल को बनाये थी.

"हाँ मजा तोह आएगा लेकिन साथ साथ इस भोले को भी बाँध के रखना है. दिमाग अमेरिका में था और अब वापिस आया है तोह कही ज्यादा हे न चला दे. वैसे भाभी के लिए क्या हिदायत दी गयी है?", उमेद अभी सब बात नहीं करना चाहता था तोह विषय सही जगह घुमा दिया.

"कृष्णा अब ठीक है और शरीर की कमजोरी उतनी नहीं है. थोड़ा गर्मी से बचाव रखना है वो भी ख़ास नहीं लेकिन डाइट बदल दी गयी है और दवाई एक महीना चलेंगी. वह सचमुच हर छोटी से छोटी चीज का ध्यान रखा गया था यार और कृष्णा ने भी पूरी हिम्मत दिखाई. अर्जुन का फ़ोन हर दूसरे दिन आता था और उसके बाद ये ज्यादा खुश रहती थी. आज भी रस्ते भर ये कहती आयी है के अबसे बस अर्जुन के हे साथ रहेगी घर पे और रेखा भाभी के बगल वाला कमरा इसका. अब इनके बीच में तोह मैं भी नहीं पड़ सकता लेकिन सचमुच उमेद मेरी बीवी ने अगर हिम्मत दिखाई है तोह वजह सिर्फ और सिर्फ अर्जुन और रेखा भाभी है.", नरिंदर ने खुद हे एक छोटा सा तकिया कृष्णा के हाथ के निचे रखते हुए प्यार से अपनी बीवी को निहारा. वही उमेद को ख़ुशी थी ये जान कर और शंकर हमेशा की तरह एक उलझन में. ख़ुशी उन्हें भी थी की उनका बीटा और बीवी इतने समर्पित रहे है कृष्णा के प्रति लेकिन खुद पर थोड़ा बुरा भी लगा.

"रिश्ते में बेशक दोनों jethani-devrani है इन्दर लेकिन ब्याह से पहले तोह कृष्णा भाभी हे रेखा भाभी की मार्गदर्शक और बड़ी बहिन रही है. अर्जुन भी साँझा है दोनों का और इसमें कभी 2 राये नहीं के रेखा भाभी अर्जुन को भी वार सकती है कृष्णा भाभी के लिए. अब इन्हे सही माहौल मिलेगा और अर्जुन उचित देखभाल कर सकता है."

"हाँ वो काबिल भी है और कृष्णा जैसा हे है कही कही से. किताबे, बागवानी, ज्ञान और dard-prem को समझने वाला. मैं निश्चिंत रहूँगा जो सबसे बड़ी बात है. वैसे अभी का कुछ प्रोग्राम है या हम घर जा रहे है?"

"न रे इतनी रात में घर नहीं जाना. Aarti-Priyanka के साथ विन्नी और आइशा भी होटल पर है. भाभी आराम करेगी और हम एक कमरे में अपना काम. सवेरे चलेंगे वापिस जब तू कहेगा और इस गज्जू को अगर कुछ परेशानी न हो तोह.", शंकर ने कार एक तरफ पार्किंग में लगाई और सभी इस 3 सितारा होटल आ गए थे. कृष्णा जी की मदद करते हुए शंकर जी हे आगे चल दिए और एक कपड़ो का बैग लिए नरिंदर उमेद के साथ उनके पीछे. रात के 2 बज चुके थे और केलिन्डर की तारीख बदल कर 7 मई हो गयी थी.

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रात 11 बजे कही और भी कुछ लोग जाग रहे थे. दत्त निवास में राधिका अपने आलिशान कमरे में निकिता उर्फ़ निक्की के साथ बैठी हुई अपने तराशे हुए नाखून पर गुलाबी nail-polish लगाती हुई बातें भी कर रही थी और निक्की एक जांघो तक की निक्कर और ढीली टीशर्ट में बिस्टेर से तक लगाए अपने भूरे बालो को जुड़ा बना कर मुस्कुरा रही थी. नीतू अपनी मौसी के साथ सो चुकी थी तोह अब बस यही दोनों थी इस बंद कमरे में.

"तोह छम्कछल्लो न तुम कुछ बता रही हो न पूछ रही हो. बस जब भी अकेले में मिलती हु तोह स्माइल करने लगती हो. ऐसा क्या हाथ लग गया जो मुझसे भी प्यारा हो गया तुम्हे?", राधिका रूई से उंगलियों के किनारे पर लगी पोलिश हटती हुई आँखे नचा कर निक्की पर तंज कस रही थी.

"तुझसे प्यारा तोह मेरे लिए कोई भी नहीं है यार. और सच कहु तोह मैं भी नहीं जानती के ये सही हो रहा है या गलत लेकिन ाचा इतना लग रहा है के उस फीलिंग को बताया नै जा सकता. तुम और संजीव kissing-vissing करते हो क्या?", इस जवाब के बाद ऐसे सवाल की उम्मीद तोह राधिका को भी न थी लेकिन गाल थोड़े लाल हो गए थे उसके. गोरी चिट्टी राधिका की टक्कर में हे उसकी ये बड़ी बहिन और सहेली निक्की भी कही काम आकर्षक न थी. शायद वो 20 हे थी राधिका से नजाकत की वजह से.

"तोह नहीं करना चाहिए क्या? और इसका क्या मतलब हुआ मेरे सवाल से?"

"बता न यार फिर मैं भी बताउंगी सबकुछ. कैसा लगता है जब तुम दोनों किश करते हो? देख मैंने कुणाल को हे किश किया था अपनी लाइफ में सबसे पहले लेकिन वो कभी मुझे फील नहीं हुआ था. तुझे कैसा फील होता है जब संजीव तेरे होंठो को चूमता है.?", निक्की ने इस बार जानबूझ कर 'चूमना' और होंठ लफ्ज़ प्रयोग किये थे.

"वो शर्माता है लेकिन हम दोनों हे वक़्त मिलने पर ाचे से किसिंग जरूर करते है. उसकी मजबूत पकड़ और जैसे वो नजाकत से होंठो को होंठो से सहलाता है तोह मैं बहकने लग जाती हु. लेकिन मैंने उसको कभी इधर उधर टच नहीं करने दिए सिर्फ एक बार उसने ये पकड़ लिया था और हफ्ता नाराज रही थी मैं.", राधिका ने अपने एक सुडोल सतांन की तरह इशारा करते हुए कहा और nail-polish बंद करके एक तरफ रखती वो भी निक्की के करीब आ बैठी. दोनों के चेहरों पर हलकी लाली आ गयी थी.

"तेरी नाराजगी झूठी थी न? ाचा तोह लगा हे होगा जब उसने ये टाइट बॉल पकड़ी होंगी?"

"धत्त.. कुछ भी बोलती है यार तू निक्की. अजीब लगा था मुझे लेकिन वो एहसास ाचा भी था. नाराज इस बात से हुई थी की हम गाडी में थे और दिन का समय था. अब तू बता के तेरा क्या चल रहा है और इतनी कन्फूसिओं क्यों है तुझे.?"

"कन्फूसिओं अब नहीं है डार्लिंग बस यही सोच रही थी की उसका साथ कितने समय का होगा? तू जानती है संजीव का छोटा भाई मैंने पहली बार पंजाब में देखा था कुछ समय पहले और वो ऐसा नजारा था के मेरी जगह कोई भी होता तोह फ़िदा हो जाता उस गबरू पर. सवा 6 फ़ीट ऊँचा, गबरू हुनक जो अकेला 3 बदमाशों की ऐसी धुनाई कर रहा था के भीड़ भी waah-waah कर रही थी. शकल इतनी मासूम लेकिन गुस्सा और deel-dol भयंकर. पुलिस ने भी केस वैसे नहीं किया था उस वक़्त. मैं चली गयी थी वह से क्योंकि वो अपने 3 बहनो के साथ था.", निक्की ने जैसा बखान किया था राधिका भी सोच में पड़ गयी के शायद संजीव ने अपने भाई का जीकर इसलिए नहीं किया होगा क्योंकि वो ऐसा हे आवारा सांड होगा.

"तोह एक आवारा सांड से पहली नजर का प्यार हो गया तुझे? बताओ दिल्ली की बिज़नेस वुमन को देसी गबरू पसंद आया जो पुलिस का भी मिसयूज करता है अपने दादा की पहुंच की वजह से?", निक्की को ये बात बुरी तोह लगी लेकिन गुस्से की जगह वो बड़े प्यार से राधिका को सच बताने लगी.

"वो लड़के बदमाश थे और अर्जुन की कौसिन्स के साथ गलत काम करने वाले थे. शायद किडनेपिंग और रपे का प्लान था उनका. वो अकेला लड़का उन लोगो से भीड़ गया घर की िज्जात्त के लिए और तुम ये राये बना रही हो? अगले दिन वही अर्जुन शाम से पहले के उजाले में मुझे कबूतरों को दाना खिलता दिखा, कटोरो में पानी भरता हुआ जिस से उन बेजुबानो को गर्मी में दिक्कत न हो. उस वक़्त जो सुकून मैंने उसके चेहरे पर देखा तोह हिम्मत हे नहीं हुई के उसके पास चली जाऊ. और पहले से हे एक लड़की उस पर मंडरा रही थी. बाद में पता लगा के वो उसकी दीदी की सहेली थी जो खुद भी खूबसूरत थी.", अब राधिका को बुरा लगा था अपने कथन पर.

"सॉरी यार ये इमोशंस न मिक्स हो हे जाते है जॉब और पर्सनल लाइफ में. मतलब वो लड़का बहोत केयरिंग और इमोशनल है. ऐसा हे एक लड़का शायद मैंने भी कभी देखा था. तोह तेरा दिल अपने से 8-9 साल छोटे लड़के पर आया वो भी जो तेरी बहिन के पति का भाई है? कमाल हे है यार तू भी और किस्मत भी.", राधिका ने मजे लेते हुए कह तोह दिया लेकिन निक्की थोड़ा खुल कर बोल गयी जिस से दोनों को हे झेंपना पड़ा.

"फ़िलहाल तोह उसने मुझे दोस्त बनाया है और मैं खुश हु फ्रेंड्स विथ बेनिफिट्स जैसे रिलेशनशिप में. रही बात छोटे या बड़े की तोह तूने कहा न के संजीव का मजबूत जिस्म तोह जरा अर्जुन को भी परख लेना. जैसे वह होंठ चूसता हुआ जीभ से कलाकारी करता है तोह शरीर से आत्मा भी साथ निकलने लगती है. गले लगकर मिली थी मैं उस से तोह उफ्फ्फ.. बता नहीं सकती क्या असर हुआ था मेरे इन पर. रात इन्हे आजाद रखने पर भी ये अकड़ते रहे.", अपने सुडोल चुचो के बारे में बता कर निक्की खामोश हो गयी. तारीफ करते हुए वो लफ्ज़ो पर नियंत्रण न रख सकीय थी.

"पहली बार में हे किसिंग और हुग? वाह. तुम दोनों नेक्स्ट टाइम में बाकी सबकुछ मैट कर लेना. शादी वह मेरी होने वाली है लेकिन लगता है मजे तुम लेने वाली हो.", राधिका के अंदर थोड़ी उथल पुथल मच गयी थी.

"अब तोह सब हो कर हे रहेगा जानेमन. 27 की हो चुकी हु और अभी नहीं तोह फिर कभी नहीं. 9 बजे मैंने उसको हे फ़ोन किया था बताने के लिए की saturday-sunday में से किसी एक दिन फ्री रहे. नीतू को छोड़ने जाउंगी तोह अर्जुन का पूरा चेकउप करके हे आउंगी.", राधिका इतनी बेबाकी पर हैरान थी बेशक वो एक आधुनिक परिवार था लेकिन उनकी जेड और पुश्तैनी संस्कार सख्त थे.

"सीरियसली?"

"Let's सी क्या होता है और मैं सच कहु तोह कोई प्लान नहीं है की क्या होगा. ये सब छोड़ और जरा ये बता के चाचा चची का क्या सिस्टम है? बहोत समय से मैंने ये नोट किया है के वो कमरे भी अलग किये हुए है और काम तोह कितने हे सालो से अलग अलग सँभालते है. तुझे तोह ये बात मुझसे पहले देख लेनी चाहिए थी.", अब राधिका के मुस्कुराते चेहरे पर गंभीर भाव आ गए थे निक्की की बात सुन्न कर. उसका अवलोकन कही से भी गलत न था और इस विषय में तोह खुद राधिका भी अपनी माँ देविका से थोड़ी बात कर चुकी थी.

"हाँ यार मैंने भी ये नोट किया था और माँ से थोड़ा पूछा भी लेकिन लगता है के बात कुछ और है क्योंकि माँ के भाव बदल गए थे जब मैंने डैड के किसी और से सम्बन्ध की आशंका जताई. वो रात को कभी 1 या फिर 2 बजे भी आते है और बहोत काम हे दोनों एकसाथ समय बिताते है. चल छोड़ इस सबको जो होगा देखा जायेगा. वैसे ये तेरा अर्जुन Yog-guru का ख़ास चेला निकला जो बड़ी हैरत वाली बात है.", राधिका ने भी maa-baap के विषय को टालना हे बेहतर समझा था.

"चेला नहीं है वो उनका ये समझ ले. दोनों dada-paute के साथ साथ गहरे हे दोस्त भी है जैसे उनके दिल एक जैसे हे हो. ी फेल्ट तहत इम्मेडिएटली एंड it's किते स्ट्रेंज. वो वर्ल्ड फेमस है और उनकी पर्सनल लाइफ किसी को नहीं पता लेकिन अर्जुन उनकी लाइफ का एक ख़ास व्यक्ति है. मुझे भी मिलवाने वाला है वो उनसे जब मैं वह जाउंगी. लेकिन कुछ भी कह राधिका वो लड़का न ज़िन्दगी को कही बेहतर समझता है. इतना बेहतर की एक आध्यात्मिक और योग गुरु भी उस से प्रेरित हे दिखा."

"ऐसा क्या? देखते है फिर देवर जी को और जाने वो कितना समझते है ज़िन्दगी के बारे में. लेकिन फ़िलहाल तोह यार तू कल मेरे साथ दिल्ली चलना, शॉपिंग करने के साथ साथ तेरे होटल की भी सेवा का मजा लेते है.", राधिका ने वो ऊपर ओढ़ने वाला लिहाफ खोलते हुए दोनों के शरीर पर डाला और एक का तापमान काम करने के बाद बत्ती बुझा दी.

"गूडनिघत रिड्स (राधिका का प्यार का नाम)

"गूडनिघत बेब."

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सवेरे 5 बजे हे अर्जुन और आचार्य जी नंगे पाँव घास पर टहल रहे थे. आज हिमानी भी इधर आयी थी लेकिन वो हलके कदमो से उस पटरी पर दौड़ लगाती अब खुद पर म्हणत करने लगी थी. पड़ोस वाली एक लड़की भी हिमानी की दोस्त बन्न चुकी थी जो हमउम्र थी और आज उसके साथ हे इधर आयी थी. दोनों साथ में बैडमिंटन भी लेकर आयी थी जिस से हिमानी अपने नाना जी और अर्जुन के बीच प्रभाव न दाल सके.

"तुम्हारी चिंता ये है की कही सच की तलाश में तुम कुछ गलत हे न खोज निकालो जिस से कई लोगो के जीवन पर बुरा प्रभाव न पड़े? वैसे ये तलाश 'सच' की जगह राज या रहस्य कहो तोह बेहतर होगी.", आचार्य जी का mukh-mandal तोह हमेशा हे अर्जुन के करीब होने पर अधिक प्रकाशित रहता था और आज वो खुश भी थे.

"हाँ राज या षड़यंत्र हे कहना ठीक है. मैं भी मानता हु के किसी के लिए जो बात गलत हो वो शायद दूसरे के लिए सही हो. Sach-jhooth का तोह पैमाना हे दुविधा वाला है. और दादा जी मेरी सोच कह रही है के इसका सचमुच बहोत गहरा प्रभाव पड़ सकता है कई लोगो पर. लेकिन जाने क्यों मुझे ऐसा लग रहा है के अगर मैं ऐसा नहीं करूँगा तोह गलतिया होती रहेंगी, संकट बना रहेगा और हो सकता है कुछ बड़ा न घट्ट जाये.", अब आचार्य जी के भी चेहरे पर गंभीरता आ गयी थी. अर्जुन को वो समझते थे और अगर वो ऐसी बात कह रहा है तोह मतलब साफ़ था के ये गंभीर मामला है.

"बीटा, तुमसे तोह मैं भी बहोत कुछ सीखता हु और यही तोह होना चाहिए. लेकिन अगर मैं ये कहु की शाष्टो में भी लिखा है के मकसद की बिना जीवन नहीं है तोह इसका क्या मतलब हुआ? या ऐसा मान लो की वृक्ष काटने भी एक मज़बूरी है किसी की और लगाना सबके लिए jiwan-daayni. तोह कौनसा मकसद सही होगा तुम्हारी नजर में?"

"वो काटना सिर्फ कुछ लोगो को जीवन दे सकता है और लगाना सबको इस पर्यावरण के साथ. तोह बेहतर तोह जीवन देना हे होता है न दादा जी?"

"अब तुम जो करने की सोच रहे हो वो वैसा हे है मेरे बचे. एक उजाड़ जंगल में नए पौधे लगाना और बचे हुआ को स्वस्थ करना सबसे उचित क्रिया है. हो सकता है कुछ दीमक लगे वृक्ष तुम्हे गिराने पड़े और जमीन को भी उर्वरक देने पड़े लेकिन इस से सभी को यथोचित जीवन भी मिलेगा. तुम खोज नहीं रहे हो, तुम ठीक करना चाहता हो ठीक वैसे हे जैसे तुम्हारे पिता बीमारी का पता लगा कर कभी दवा देते है तोह कभी एक हाथ काट कर उस व्यक्ति के जीवन को बचा लेते है.", सचमुच इनके उदहारण निराले हे थे और यही तोह खासियत थी की वो अर्जुन को पहचानते थे.

"आपको कैसे यकीन है के जो मैं करने लगा हु उसमे मेरी मंशा सबको बचने की हे है? क्या पता वह कुछ खतरा निकल आये."

"हाहाहा.. मेरे बचे तुम न जीवन दे सकते हो ले नहीं सकते और मैंने तोह खुद हे कहा के दीमक भी मिलेगी. षड़यंत्र जो होते है वो उतने जटिल नहीं होते जितना दीखते है या समय के अंतराल पर कुछ कड़ियाँ गायब प्रतीत होती है. वो सबकुछ उसकी क्रमांक में रहता है लेकिन कभी कभी कुछ हिस्से डब्ब जाते है तोह रास्ता सही से समझ नहीं आता. कभी bhool-bhulayia देखा है?"

"मज़े? हाँ बहोत ाचे से देखा भी है और मैं रस्ते बनाने में ठीक थक भी हु. लेकिन आपका मंतव्य क्या है bhool-bhulayia से?", अर्जुन और आचार्य जी आज पार्क के दूसरे हिस्से तक चले आये थे जहा अमूमन इस वक़्त ऊँचे वृक्षों पर चमगादड़ उलटे लटके होते थे.

"तुम उसमे एक जगह से प्रवेश करते हो लेकिन आखिरी छोर पर पहुंचने के रस्ते तोह कई दीखते है लेकिन सही वाला एक लगता है. हाँ उस सही रस्ते पर भी उन कई रास्तो से कुछ गलियां मिलती भी है किसी तिराहे या चौराहे पर और जब कही ऐसा हे किसी राज को ढूंढ़ने में सही रास्ता न मिले तोह उन चौराहो, दूसरे रास्तो को भूलना नहीं चाहिए. और राज तक जाने के लिए इन सभी रास्तो की खबर जरूर रखना. कभी कभी वापिस आने के लिए वो सही रास्ता भी अड़चन बन्न जाता है. लोग देख लेते है जाते हुए और वो तैयार होते है क्योंकि जाने वाला वापिस तोह आएगा हे. पहेली तभी हल होती है जब सारे रस्ते तुम्हारी पकड़ में हो.", अर्जुन उनकी हर बात को समझ रहा था और वो कही भी गलत न थे. अगर उसको अपने अज्जू चाचा की मौत के राज तक जाना था तोह ये मुमकिन था के khoj-bin में दोस्तों के साथ दुश्मन भी मिल सकते थे और उसको अब कोई जल्दबाजी नहीं करनी थी.

"समय लेना हे पड़ेगा दादा जी इस जंगल को पहले बहार से समझने के लिए. दीमक के बिल जहा होते है वह नाग अक्सर पाए जाते है. ये रहस्य ऐसे नहीं सुलझने वाला था जैसे मैं कोशिश कर रहा था. आप सही कहते है के नए पौधे लगाने से पहले वही सब करना होगा और ये bhool-bhulayia टीम के साथ खेलना पड़ेगा. सभी रास्तो पर एक सही टीम और एक दूसरे से जुडी हुई.", अर्जुन को अब कोमल दीदी की भी बात समझ आ गयी थी की जल्दबाजी मैट कर और बस वैसे हे रह जैसे दादाजी चाहते है. जानकारी तोह टुकड़ो टुकड़ो में मिल हे जानी है der-saver लेकिन दुश्मनो का नहीं पता.

"बीटा ऐसा लगता है के तुम थोड़ा बहोत जंगल में घूम कर आये हो. कही अलाव जलाकर राख को खुला तोह नहीं छोड़ आये? पीछे हटना सही होता है अगर रास्ता कठिन दिखे लेकिन निशाँ भी नहीं छोड़ने चाहिए जिस से वह सब मुस्तैद न हो जाये."

"वो राख मैं संभल लूंगा दादा जी. उतनी भी दूर नहीं गया हु अभी और इतना पता है के यहाँ पर जो लोग दिखे थे वो पहल नहीं करेंगे क्योंकि jaan-pehchan तोह हो हे गयी है. उन्हें ाचा हे लगेगा की मैं वापिस चला गया.", अर्जुन के उत्तर से शायद आचार्य जी पूरी तरह प्रभावित न हुए. वो नजर ऊपर उठाये उन लटके हुए चमगादड़ो को देखने लगे तोह अर्जुन ने भी वही नजर लग ली.

"जानते हो ये उलटे क्यों लटकते है?"

"जी. इनके पंजे सक्षम है लेकिन पाँव उस अनुपात में नहीं की वो शरीर को सीधा संभल सके. कुदरत ने इन्हे खामिया देने के साथ साथ खूबिया भी दी है.", अर्जुन भी उन्हें निहार हे रहा था.

"तुम्हारी खामिया भी कुछ ऐसी हे है मेरे बचे. तुम समझ रहे हो के jaan-pehchan हो गयी है तोह वो भी निश्चिन्त हो जायेंगे लेकिन तुम्हे बखूबी पता है के अगर वह तुम्हारी मुलाकात किसी एक भी गलत व्यक्ति से हुई है तोह अब जंगल में उनकी पकड़ मजबूत हो चुकी होगी. उन्हें उलझाओ और आगे से मुझे ऐसे जवाब मैट देना जो खुद तुम सही नहीं समझते.", आचार्य जी की मुस्कान का अर्थ समझते हुए अर्जुन भी हंस दिया.

"उलझा दिया है दादा जी और ऐसा उलझाया है के अब वो सभी आपस में हे व्यस्त रहेंगे. उनके दिल में ऐसी छवि भी बना दी है के मैं वापिस जा रहा हु क्योंकि मैं कमजोर हु. देखते है उनकी फूट क्या रंग लाती है."

"हाहाहा.. सचमुच हे तुम चक्रव्यूह तोड़ने के साथ साथ बनाना भी जानते हो. मतलब रडार तुम्हारे पास भी है?"

"नक्शा, औजार और सही लोगो का साथ भी है दादा जी."

"मतलब तुमने रहस्य में जानबूझ कर उपस्थिति दिखाई और सभी को चौकन्ना करने के बाद उन्हें एक दूसरे से अवगत करवा दिया? मुझे तोह यही लग रहा है.", अर्जुन ने बाजरे की थैली उनके हाथ से लेते हुए कदम वापिस पुराणी जगह बढ़ा दिए. उसने हे तोह मुस्कान और बबिता के साथ मिल कर सुशीला बुआ तक ये बात पहुंचे थी. बिंदु तक भी शबनम के रिहा होने की बात खुद शबनम से पहुंचे जिस से वो भी उलझ जाए और सांगवान दादा जी ने भी अपने काबिल व्यक्ति से करम सिंह साफ़ करवा दिया था. इस सबमे उलझने वाले तोह अब बहोत लोग थे लेकिन अवधेश मिश्रा को सबसे बड़ी मात मिली. और कही भी अर्जुन सामने न था लेकिन वो कामयाब हो रहा था.

"गहरे ख़याल बता रहे है के तुम शांत हो और ये मुस्कान कह रही है के अब हमको अपने दोस्तों से मिल लेना चाहिए.", आचार्य जी ने भी मुट्ठी भर बाजरा लेते हुए पक्षियों पर ध्यान दिया और अर्जुन भी दाना छिड़कने लगा. आज भी वो mor-morni, कुछ टूटते और ढेर सारे kabutar-fakhta एकत्रित थे. उन्हें भी ाचा लगता था इन हाथो से दाना लेना और अब वो भयभीत भी नहीं होते थे.

"प्रेम और विश्वास हे तोह सबसे बड़े औजार है दादा जी. इनसे किसी को मारा नहीं जाता लेकिन गलत को सही रस्ते पर जरूर लाया जा सकता है. विश्वास बनाने में वक़्त तोह लगता हे है लेकिन मैं इसको बरकरार रखना सीख रहा हु. आप और बड़े दादा जी ने मेरा सही ध्यान रखा है और मैं ये हमेशा महसूस करता हु की ऐसे बरगद के वृक्ष जाने कैसे मेरे नसीब में आये जिनकी छाया टेल मैं अपने आप को कभी भटका हुआ, अकेला या कमजोर महसूस नहीं करता. आप लोग हे तोह प्यार और विश्वास का उचित उदहारण है.", आचार्य जी ने एक हे बार में सारे दाने उछाल कर अर्जुन को अपने साथ लगा लिया.

"मेरी जमा पूँजी कुछ नहीं है दोस्त लेकिन तुम्हे देख कर लगता है के मैं ऐसा हे ban-na चाहता था. ये जीवन जिसमे सभी सामान हो, सबके लिए बस प्रेम हो और प्रतिउत्तर में भी उतना हे प्रेम विश्वास मिलना दुर्लभ है. मेरा जब भी अंतिम समय हो तुम मेरे करीब होना मेरे बचे.", अर्जुन ने उनके मुख पर पहली बार हाथ रखा था. उसको ऐसा करना आचार्य जी के प्रति अपमान लगता था लेकिन आज वो ये शब्द सुन्न न पाया.

"अगर मैं भी ऐसा हे कुछ कहु तोह?"

"नहीं नहीं मेरे बचे. लालच करने लगा हु न थोड़ा इंसान बन्न हे जाता हु. तुम्हे कुछ हुआ तोह मैं सेहन भी नहीं कर पाउँगा. आज मैं वैरागी नहीं रहना चाहता क्योंकि तुम मुझे प्रेरित करते हो अपनों के साथ रहने के लिए, तुम्हारे साथ रहने के लिए. निसंकोच अधिकार जाताना अगर वो षड़यंत्र तुमसे हल न हो तोह. तुम्हारा ये दादा ऊँगली पकड़ कर साथ चलेगा.", आचार्य जी के लफ्ज़ फूट हे गए उनके मुख से. वो इस बचे से be-inteha प्यार करने लगे थे और ये जुड़ाव उनकी दिनचर्या को सही प्रभावित कर रहा था.

"15 जुलाई के बाद दिवाली से कुछ पहले तक आप अपने सभी काम वैसे हे करेंगे दादा जी. उसके बाद मैं आपके साथ एक हफ्ते के लिए पहाड़ो पर चलूँगा. और मुझे पता है के आप हमेशा मेरे साथ है लेकिन मेरे लिए अपने आप को धूमिल मैट कीजिये. वादा कीजिये के अब आप ऐसा हे करेंगे. मैं भी वादा करता हु के जब जब आप यहाँ होंगे मैं हर रोज आपसे मिलूंगा लेकिन आपसे जो हजारो लोग जुड़े है उनका भी प्यार बरकरार रखना जरुरी है.", अर्जुन उनका हाथ थाम कर आगे बढ़ने लगा तोह वो भी इस prem-dor से बंधे साथ हो लिए.

"अवश्य. और तुम भी वादा करो की मेरे पास आने में कभी झिझक महसूस नहीं करोगे. जब भी कोई परेशानी हो तोह इस बूढ़े को भी मौका देना थोड़ा. तुम्हारा जीवन सरल नहीं है लेकिन मैं हमेशा तुम्हारे साथ हु."

"मेरे साथ भी हो आप नाना जी. और आज तोह आप दोनों को मैं दिखाई भी नहीं दी पूरे डेढ़ घंटे.", हिमानी चहकती हुई इधर आयी तोह अर्जुन भी मुस्कुरा दिया.

"आपके साथ सभी है चाहे दादा जी इधर हो या नहीं. वैसे ाचा लगा के आप भी बहार आने लगी है.", अर्जुन का अभिप्राय समझ कर हिमानी भी खुश हो रही थी. तीनो हे पार्क से बहार चले आये तोह अर्जुन ने चरण स्पर्श करने के बाद साइकिल उठाई और दिन में मिलने का बोल कर अपने रस्ते चल दिया.

"ये लड़का सबके लिए सामान प्यार भावना रखता है हिमानी और मुझे डर लगता है इसके लिए की कही इस हीरे की रौशनी पर गलत नजर न पड़ जाये किसी की. दिलेर भी है और होशियार भी लेकिन हद्द से ज्यादा परवाह करना भी मुसीबत बन्न जाता है. भगवन मेरे बचो को सुरक्षित रखे.", हिमानी के सर पर हाथ फेरते हुए वो आशीर्वाद अर्जुन को दे रहे थे. हिमानी भी सर हिला रही थी उनकी बात सुन्न कर.

"अर्जुन सचमुच ाचा लड़का है दादा जी. वो आपके हे जैसा है कही न कही."

"हम दोनों एक जैसे है बस 50-55 साल का फरक है दोनों में. हाहाहा.. चलो आज जॉय को नहलाते है चल कर.", सड़क पार दोनों हे घर की तरफ बढ़ गए और अर्जुन भी सही समय पर वापिस लौट आया था.

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शबनम आज बेहद खूबसूरत लग रही थी पूरे सलवार कमीज में और चेहरा ऐसा खिला था जैसे लाल गुलाब हो. एक पल के लिए तोह संजीव भैया भी ठिठक गए थे ये अवतार देख कर इस लड़की का. तेजपाल जी निचे हे रुक गए थे और यहाँ ऊपर सिर्फ अर्जुन हे आया था अपने भैया के साथ जो अभी तक दरवाजे पर खड़ा बस मुस्कुरा रहा था.

"तुम्हे पता है न मैं यहाँ क्यों आया हु?", संजीव भैया किसी अफसर की तरह हे कड़क कमीज और पतलून के साथ चमचमाते काले चमड़े के जूते पहने बेहद रोबीले लग रहे थे. आज अर्जुन भी देख रहा था के उसके भैया कितने जांचते है और उनकी ये चाल कितनी कमाल की लगती है.

"जी. आप मुझे यहाँ से डिपोर्ट कर रहे है वापिस मेरे घर इंग्लैंड. मैं कंसेंट सिग्न करने के लिए रेडी हु लेकिन एक बार पढ़ लू तोह बेहतर रहेगा.", शबनम की आवाज में भी आज कोई द्वेष या गुस्सा न था. वो कल हैरान थी लेकिन आज खुश होने के साथ साथ अंदर से थोड़ी गमगीन भी.

"बिलकुल. ये सभी डाक्यूमेंट्स सिग्न कर दीजिये और ये रहा आपका टिकट, पासपोर्ट और कुछ पैसे.", संजीव भैया ने एक पूरी फाइल के साथ साथ एक महिला पर्स भी शबनम को पकड़ा दिया था जो यहाँ आते वक़्त उन्होंने तारा से लिया था.

"थैंक यू सो मच. वैसे मेरा बहोत सा सामान अलग अलग जगह है लेकिन वो इतना जरुरी नहीं है. मुझे यहाँ से दिल्ली तक पहुंचने की कोई उचित व्यवस्था जरूर की गयी होगी."

"हाँ, पुलिस सुरक्षा में हे सीढ़ी फ्लाइट तक पहुंचाया जायेगा और लंदन पहुंचते हे पासपोर्ट जब्त हो जायेगा. आशा करता हु की सहयोग करेंगी जिस से किसी को भी कोई परेशानी न हो.", संजीव भैया ने अपनी ऊपर वाली जेब से पेन निकल कर शबनम की तरफ बढ़ाया.

"मैं ऐसा कर भी नहीं सकती क्योंकि सजा देने की जगह मुझे इतने आराम से रखा गया पूरी सुरक्षा के साथ और अब वापिस मेरे घर हे पहुंचाया जा रहा है तोह मैं विश्वासघात नहीं करने वाली. थैंक यू सो मच अफसर संजीव एंड ी विल कीप थिस सीक्रेट विथ माइसेल्फ ओनली. इजाजत हो तोह कुछ वक़्त मैं ये डाक्यूमेंट्स अकेले पढ़ सकती हु? अर्जुन से भी मुझे कुछ जरुरी बात करनी है जो शायद आपके हे काम आये.", शबनम ने बता दिया था के वो संजीव की असली पहचान जान गयी है पर होंठ बंद हे रहेंगे.

"जितना समय चाहिए ले लीजिये और अर्जुन तुम मुझे बुला लेना बात होने के बाद. मैं निचे हे हु लेकिन सादे 8 बजे कार शबनम को लेने आ जाएगी. तबतक सभी कागज पढ़ कर सिग्न हो जाए.", संजीव भैया तुरंत हे बहार निकल गए अर्जुन की पीठ पर एक थपकी देते हुए. उनके सीढ़ियों से निचे जाते हे अर्जुन ने दरवाजा बंद कर दिया. शबनम के चेहरे पर अब हलकी शर्म छ गयी थी और बिस्टेर पर बेटी वह अपनी जाँघे मजबूती से समेटने लगी थी.

"थैंक यू सो मच. सच कहती हु की मैंने तुम्हारे साथ सिर्फ बुरा हे किया था लेकिन तुमने मेरी ज़िन्दगी बचने के साथ साथ हर मुसीबत से भी मुझे बचा लिया. मुझे यकीन था की मर्डर चार्ज लगने पर पूरी ज़िन्दगी मैं जेल में रहने वाली हु. उस वक़्त भी मैं तुम्हारे लिए बुरा हे सोचती रही पर तुमने तोह जैसे मुझे गलत साबित करने का मकसद हे बना रखा है. ये एहसान मैं कभी नहीं उतार सकती तुम्हारा."

"गलत साबित? सही तोह साबित किया था मैंने अभी 3 घंटे पहले. तुम पसंद करती हो मुझे और मैं कभी भी तुमसे नाराज नहीं था. वैसे सूट पूरा फिट आया है तुम्हे.", अर्जुन बगल में जा बैठा तोह शबनम एकटक उसके चेहरे को देखने लगी. धीरे धीरे दोनों के चेहरे करीब आये और उसका सर थामती हुई शबनम खुद हे अपने गरम नरम होंठो को अर्जुन के मुँह से लगाती हुई एक कशिश से उसको चूमने लगी. किसी तीसरे के लिए ये दृश्य चौंकाने वाला हो सकता था लेकिन ये दोनों हे जानते थे की वो क्या कर रहे है. शबनम का ये धन्यवाद् का तरीका अभी शुरू हे हुआ था. सांस उखड़नी लगी तोह वो हिलते सीने के साथ फिर से अर्जुन को निहारने लगी थी. मॉटे चुके चुस्त कमीज में हिलते हुए बता रहे थे की शबनम किस कदर अर्जुन के लिए उत्तेजित है.

"मुझे कभी ये एहसास नहीं हुआ के कोई इंसान इतना भी पॉजिटिव हो सकता है की मारने वाले से भी प्यार करे और उसकी जिंदगी को बेहतर बनाये. शरीर तोह जाने कितनो ने हे भोगा अर्जुन जिसमे मैं खुद भी शामिल थी. मुझे अपना जिस्म बस एक चाबी लगता था मर्द की तिजोरी खोलने वाली लेकिन तुम बिलकुल भी वैसे नहीं हो.", शबनम की आँखों में जाने कितने हे सालो बाद ये असली आंसू थे जिनमे बहोत कुछ था लेकिन नफरत नहीं थी.

"मैंने मुस्कान से वादा किया था की उसकी दीदी को कुछ नहीं होने दूंगा. वो कहती थी की दीदी कभी पीछे नहीं हटेगी चाहे वो मर्डर हे क्यों न जाए. ाचा लगा की मुस्कान का दिल जीत गया सोच के आगे. तुम्हे बस अपनी ज़िन्दगी को सही से समझना होगा शबनम. औंस की बूँद रेगिस्तान में जीवन देती है, उसको शबनम हे कहते है न? तुम्हारी माँ के पास जितनी भी बड़ी वजह क्यों न हो लेकिन क्या वो उनके बचो के जीवन और खुशियों से भी बढ़ कर हो सकती है? अब तुम्हे उन्हें समझाना होगा बजाये की उनके कहे चलने के. रही बात के तुमसे गलत हुआ या सही तोह मैं भी जानता हु के हाथ तोह बहोत से लोगो के खराब हुए है.", अर्जुन ने चेहरे पर आयी दोनों बुँदे साफ़ करते हुए गाल को सहलाया और बंद आँखों को चूम लिया. अब शबनम के शरीर में कम्पन्न न थी.

"मैं अगर तुम्हारे काम न आ सकीय तोह कभी भी बीच में भी नहीं आउंगी अर्जुन. वह मेरे पापा भी है जिन्हे मेरी परवाह है लेकिन उन्हें कुछ पता नहीं है. तुम चाहते तोह उन तक सच्चाई पंहुचा सकते थे और माँ ने भी कह दिया की वो बस मुझे वापिस चाहती है."

"कितनी बार बताओगी ये सब? कागज सिग्न करो फिर हम चलते है.", अर्जुन के ऐसा कहते हुए शबनम ने निशान लगी हर जगह बिना पढ़े हे हस्ताक्षर कर दिए. अर्जुन का मैं भी शांत था और वो भी चाहता था की पुराणी रंजिश में ये नयी पीढ़ी न बर्बाद हो. बहार निकलने से पहले शबनम ने 2-3 बार कास के अर्जुन को चूमा था और एक बार ाचे से गले मिल कर वो उसके साथ हे निचे चल दी. अर्जुन जिस तरह उसका हाथ थामे था शबनम को आज पहली बार बुरा लग रहा था के वो क्यों अर्जुन से वैसे मिली जैसा वो कभी चाहती नहीं थी. निचे उसके लिए एक और झटका इन्तजार कर रहा था मुस्कान के रूप में. अर्जुन ने फाइल संजीव भैया को बधाई तोह वो भी मुस्कुरा दिए.

"थैंक यू सो मच. और तुम खुश रहना मुस्कान.", शबनम ने ये आखिरी बात कही थी उस सफ़ेद अम्बस्सडोर कार में पिछली सीट पर बैठने से पहले. मुस्कान की आँखों में भी कुछ आंसू थे जिन्हे खुद हे साफ़ करती हुई वो आँखों से हे अर्जुन को धयनयवाद कर रही थी.

"हॉस्टल हो आ गयी हो?", अर्जुन ने इतना हे पुछा तोह मुस्कान ने हां में सर हिला दिया.

"जल्द हे मिलता हु क्योंकि अभी जाना होगा.", अर्जुन की स्थिति भी मुस्कान समझती थी और सबसे अलग होने की वजह से हे वो इतनी बात कर प् रहे थे.

"इन्तजार रहेगा मुझे तुम्हारा.", मुस्कान ने हाथ हिलाते हुए विदा ली और अपनी सहेली की स्कूटी के पीछे बैठ कर चली गयी. बिट्टू मां भी अब यहाँ से जा चुके थे लेकिन संजीव भैया मुस्कुराते हुए उसके पास आ खड़े हुए.

"ये शबनम तूने हे खिलाई है न? और वो सूट शायद तारा या माधुरी का था.", संजीव भैया भी शातिर थे लेकिन अर्जुन काम पहले हे कर जाता था.

"आया था मैं सुबह 4 बजे इस से मिलने. जैसा आप सोच रहे है वैसा तोह कुछ नहीं हुआ लेकिन बहोत सी बातें जरूर पता चली भैया. रात को इस बारे में आराम से चर्चा करेंगे. और सच कहु तोह आज अपने भैया को देख कर बहोत ाचा लग रहा है."

"साले तू कुछ ज्यादा हे तेज हो गया है. इस लड़की को पकड़ने के लिए कितनी मशक्कत की थी लेकिन देख वो कैसे आजाद हो कर गयी है. तूने थानेदार को क्या पाठ पढ़ाया ये तोह बता दे जो उन्होंने भी सीधा मुझे ये करने का आदेश सुना दिया?", संजीव भैया ने इलो का दरवाजा खोला तोह अर्जुन भी बगल में आ बैठा.

"पता है भैया बिंदिया काकी के साथ भी कुछ तोह गलत हुआ हे है. वो हुम्ला करे या साजिश लेकिन अगर शबनम को नयी और साफ़ ज़िन्दगी मिलती है तोह काम से काम कुछ तोह ाचा होगा. जो घटनाये अतीत में हुई है उनसे हमारा आज प्रभावित नहीं होना चाहिए.", अर्जुन जाने क्यों अपनी हे कही बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रख प् रहा था. उसको लग रहा था के जिस प्रभाव से वो सबको दूर करना चाहता है वो खुद उस पर हावी हो रहा है.

"छोटे मैं भी तेरी बात से सहमत हु लेकिन क्या तुझे यकीन है के इस से सबकुछ रुक जायेगा? क्या ये सिर्फ एक सीढ़ी रंजिश का मामला है जो इतने साल होने पर भी बरक़रार है और लोग सब कुशल होने का बस दिखावा कर रहे है? मैं तेरा सिर्फ बड़ा भाई हे नहीं हु, हंसाया भी हु और तेरा कवच भी. लेकिन शायद तू मुझसे सवाल नहीं कर रहा और क्या पता मैं तेरे कुछ जवाब दे सकू.", संजीव भैया ने कार यहाँ से निकल कर कुछ आगे हे एक सुनसान मैदान में कड़ी कर दी. वो खुद सामने से अर्जुन को कह रहे थे की आज वो उसके सवाल जान न चाहते है.

"भैया मैं बेचैन हु जबसे कुछ घटनाये हुई है. आपके ऊपर उस दिन जो हुम्ला हुआ था आप उन लोगो के बारे में कितना जानते है? मुझे हे क्यों मरना चाहते थे वो लोग और कृष्णा चची का भी कुछ अतीत है क्या?", अर्जुन के सवाल बेशक कही बड़े थे लेकिन संजीव को उम्मीद तोह इस से भी बड़े सवालो की थी. हरे रंग की वो टॉफ़ी निकल कर मुँह में डालते हुए संजीव ने एक पल के लिए गर्दन को daaye-baaye हिलाया और फिर सामने देखते हुए कहना शुरू किया.

"तुझे यहाँ से भेजने वाले चाचा जी नहीं थे बेशक वो तुझे दूर करना चाहते थे लेकिन मुझे वजह नहीं पता. शायद कोई वजह होगी जो सिर्फ वो जानते हो लेकिन तुझे बोर्डिंग भेजा क्योंकि तू बड़ा हो रहा था. एक बार मंदिर के बहार तुझ पर हुम्ला हुआ था या ये कहु के तुझे मारने की कोशिश की गयी थी लेकिन तब रेखा चची ने वो वार खुद पर ले लिया था. दूसरी बार ये कुछ हादसे जैसा था और एक गाडी अनियंत्रित हो कर ऋतू के स्कूल के बहार तुम दोनों से थोड़ी पहले हे एक सांड से टकरा गयी जो जाने कहा से आ गया था लेकिन वह भी तुझे हे मारने की कोशिश थी. ऐसा और भी कुछ हुआ होगा लेकिन मुझे ये 2 घटनाये याद है.", अर्जुन हैरानी से सब सुन्न रहा था और ये सब उसको जरा भी मालूम न था.

"फिर एक दिन तोह कुछ ज्यादा हे हो गया था. तू सर्दियों के समय हलकी धुप में बहार आँगन में सो रहा था और तेज़ाब की बोतल किसी दूधवाले ने फेंक कर मारी थी जो शाल के विरक्ष से टकराई लेकिन तू बच गया. उस दिन छोल अंकल ने वो आदमी सेक्टर की मार्किट में दिन दिहाड़े मार दिया था जिस वजह से उन पर केस भी हो गया था. लेकिन उसके बाद दादा जी ने शंकर चाचा की बात मान ली पर तुझे उस बोर्डिंग में भेजा जहा तेरी सुरक्षा पूरी हो और तुझसे मिलने कोई न आ सके. सोच रहा होगा के मैं ये क्या जवाब दे रहा हु.?", संजीव भैया के चेहरे के भाव बता रहे थे उनमे दर्द भरा हुआ है लेकिन वो कोशिश कर रहे थे खुद को मजबूत रखने की.

"हाँ. मैं ये सब नहीं जानता था और पापा ने मुझे बोर्डिंग भेजा था मुझे ये पता था.", अर्जुन अधीर था और आज वो सब सुन्न न चाहता था.

"कृष्णा चची का बीटा बीमारी से नहीं गुजरा था और शायद तुझे ये पूरी बात पता भी न हो लेकिन जब नैतिक 4 महीने का था तोह पोलियो की दवा देने की जगह उसको ज़हर दे दिया था नर्स ने. वो नर्स कभी नहीं मिली और चची इसको झेल न पायी. लेकिन तेरे रूप में उनका दर्द कुछ काम हुआ लेकिन जाने क्या हुआ के वो कुछ साल पहले फिर से अवसाद में रहने लगी. वो कुछ जान गयी है जो बर्दाश्त नहीं कर प् रही लेकिन अब फिर से वो तेरी जिम्मेवारी बन ने वाली है."

"वो माँ हे तोह मेरी भैया लेकिन मुझे नहीं पता था के उनका बीटा रंजिश का शिकार हुआ था. और कोई कैसे मार सकता है एक 4 महीने के बचे को भैया? ये किसी इंसान का काम नहीं हो सकता. एक नर्स के रूप में वो कैसी महिला होगी जो नवजात की हत्या कर दे?", अर्जुन की आँखें बता रही थी की वो बहोत दर्द में है और किसी भी समय बिफर सकता है.

"छोटे तू पूछ रहा था न उस दिन वो हुम्ला मेरे पर क्यों हुआ था? वो हुम्ला सुशीला और शबनम पर हुआ था लेकिन मोहर सिंह ने ऐसा किया था सारंग कुमार के कहने पर. ये बिंदिया सिंह, अवधेश मिश्रा, मधुलता, ताराचंद, चंदरभान, दुष्यंत और तोमर जैसे लोग चालाक और ताक़तवर थे या है लेकिन अपने दादा जी के आसपास भी नहीं है. लेकिन इन सबसे ऊपर है सारंग या समझ ले की सारंग हे है जो अपने थानेदार जी की टक्कर का व्यक्ति है.."

"सारंग? ये नाम मैंने भी कही सुना है भैया लेकिन उस से पहले एक सवाल है."

"पूछ?"

"अर्जुन चाचा जी की मौत कैसे हुई थी ये आप जानते है?"

"नहीं छोटे इस बारे में कभी मुझे कुछ पता नहीं लगा. अर्जुन चाचा की हत्या हुई थी और केस बंद हो गया था क्योंकि जिन पर इल्जाम था वो सभी मारे गए थे. केस रुकवाने वाले हमारे दादा जी हे थे. लेकिन मेरा दिल कहता है वो गुथी सुलझी नहीं और उस केस की फाइल डिपार्टमेंट में कही नहीं है. तू अगर कहे तोह हम दोनों इस पर काम कर सकते है लेकिन वादा करना होगा की तू लफड़े नहीं करेगा कोई.", संजीव भैया भी अर्जुन की तरह बहोत कुछ जानते थे या शायद उस से भी ज्यादा.

"उस मामले तक सीधा नहीं पंहुचा जा सकता भैया. किसी के सामने इस नाम का जीकर नहीं कर सकते लेकिन चुनिंदा लोग है जो इस से वाकिफ होंगे. मधुलता काकी, बिंदिया काकी और मेरा दिल कहता है जैसे शालिनी बुआ भी कुछ जानती है इस बारे में. बबिता ने कहा था के उस दिन कुछ षड़यंत्र बनाया गया था उनके papa-chacha और मां ने जिसमे मधुलता काकी को शामिल किया गया था. वो लोग अर्जुन सिंह की जगह मारना मधुलता काकी और पापा को चाहते थे पर कुछ गड़बड़ हो गयी थी. भूरे काका जो गुड्डी काकी के हस्बैंड थे उन्हें ये सब पता लग गया था और उन्होंने रोकने की कोशिश भी की थी. लेकिन तब तक देर हो गयी और फिर पापा की जगह अर्जुन चाचा मारे गए. मधुलता काकी बेहोश मिली थी और इल्जाम ऐसा था के अर्जुन चाचा उन्हें बेहला कर गलत काम करने ले कर गए थे. आपको क्या लगता है ये कहानी कितनी सही और कितनी गलत है?", अब बारी संजीव भैया की थी चिंता करने की. अर्जुन इस मामले में उनसे कही ज्यादा हे जानकारी जुटाए था.

"25 साल पहले तोह समझ ले मैं पैदा हे हुआ था छोटे. बबिता भी 7 साल की रही होगी तोह उसको सबकुछ समझ नहीं आ सकता. मतलब ये है के भूरे काका सही आदमी थे जैसा मेरे पापा भी कहते रहे है. तू जानता है उस हादसे के बाद मेरे पापा टूट गए थे क्योंकि उनका एक हे दोस्त था जो बेवजह मारा गया. भूरे काका की तस्वीर तोह अपने यहाँ भी उनकी एल्बम में है. किया धरा तोह सिर्फ इन्ही लोगो का नहीं है, मामला ज्यादा हे संगीन है. एक हिसाब में हर बात रखते है."

"जी आप शुरू करो और मैं देखता हु मुझे कितना पता है.", अर्जुन ने दरवाजा खोल लिया था बेचैनी की वजह से.

"शंकर चाचा शादी करना चाहते थे मधुलता से. लेकिन उसकी शादी हुई सुरेंदर सिंह से और इसके बाद चाचा सब भूल कर पढाई में जुट गए. और इधर माहौल शांत हो गया."

"ठीक. वैसे मुझे नहीं पता के शादी क्यों नहीं हुई.", अर्जुन ने अपनी बात बीच में जोड़ दी.

"किसी को नहीं पता छोटे और हम ये पूछ नहीं सकते. फिर अर्जुन सिंह की हत्या जिसकी जांच रुकवा दी गयी लेकिन शुरुवाती जांच में हे दादा जी पर गोली चली थी सोमबीर सिंह की तरफ से. वह एक और व्यक्ति मारा गया था जो दलीप मौसा के पिता थे. तू कह रहा है के मधुलता भी शामिल थी इस सबमे तोह सपोर्ट उसको भी कही और से जरूर मिल रही होगी. अर्जुन सिंह की हत्या हो और रघुबीर दादा जी खाल न खिंचवा दे ऐसा मुमकिन न था. बाद में 2 बड़ी घटनाये हुई जिनमे सोमबीर सिंह और राममेहर के परिवार के सभी मर्द मारे गए सिवाए मोहर सिंह के."

"हम्म्म्म.. शीला देवी भी एक खिलाडी थी ये याद रखना भैया. और बबिता ने कहा था के मोहर सिंह 2 बार जेल गया था शायद इसलिए हे बचा हो."

"मान लिया की वो बच गया इस तरह लेकिन फिर चाचा और हमारे परिवार का बाकी सभी से समझौता हो गया जो बड़ी बात है. मुझे ये समझ नहीं आया लेकिन चल मान लिया हो गया. नरिंदर और शंकर चाचा की शादी एकसाथ हुई और नरिंदर चाचा को घर छोड़ना पड़ा. ये भी हैरत वाली बात है. इसके बाद एक और समझौता हुआ था जो मुझे सुशीला काकी से पता लगा जिसमे बहोत सरे लोग थे मधुलता के पिता, दादा जी, शंकर चाचा, कुछ और पांच और चंद्रो देवी के साथ साथ उमेद सिंह भी. दादा जी तब किस बात पर झुक गए जो उन्होंने शंकर चाचा के अनैतिक रिश्ते को स्वीकार कर लिया मधुलता के साथ? रेखा चची घर की बहु बन चुकी थी उस समय. छोटे तू कहता है न की तुझे शक मधुलता और बिंदिया पर है तोह बेशक वो लोग वैसी हे हो लेकिन यहाँ मेरी सुई अटक रही है चंद्रो देवी और लाजवंती पर.", अर्जुन भैया की इस सोच को कटाई गलत साबित नहीं करना चाहता था क्योंकि उनके पास जरूर इसकी वजह होगी.

"पापा ने ऐसा किया हे क्यों भैया? और क्या ये बात माँ को पता होगी? जानता मैं भी हु की उनके सम्बन्ध है मधुलता काकी के साथ लेकिन इसमें दादा जी शामिल होंगे ये नहीं पता था. और पापा कैसे उन्हें निचा दिखा सकते है इतने लोगो के बीच ये रिश्ता स्वीकार करके.? मेरी माँ तोह कभी सवाल हे नहीं करती भैया.", अर्जुन को तीस लगी तोह 2 बातो से. दादा जी के सम्मान को ठेस और उसकी माँ के हक़ को लोगो की मौजदगी में किसी और को देने पर. व्यक्ति खुद उसका पिता. अब संजीव भी अपने भाई को क्या जवाब देता वो तोह बेचारा खुद हे बचपन खो कर अपने दादा के सपने को पूरा करने में लगा था.

"छोटे स्वार्थ जो है वो एक कड़वा सच है मेरे भाई. वो औरत चाचा का पहला प्यार रही थी और जब वही प्यार खोने के बाद फिर से मिलने की आस दिख जाए तोह इंसान दुनिया भुला कर उसको पाने में लग जाता है. क्योंकि पहली बार शायद वो नाकामी का दर्द सेह पाया होगा लेकिन दूसरा अवसर दिल पर कही गहरी चोट मारता है. चाचा भी तोह इंसान हे है न. हाँ रेखा चची ने बस परिवार को हे अपना सबकुछ मान लिया और सवाल वो इंसान कभी भी नहीं करता जिसको जवाब चाहिए हो. खैर अभी जज्बात अंदर कर और आगे समझ.", कहने को तोह संजीव भैया ने कह दिया के लेकिन अर्जुन के दिल में आज कई गहरे वार हो चुके थे और वो बस खुद को जैसे तैसे रोकने की कोशिश कर रहा था. ये बात भैया जल्द हे जान गए और सब भूल कर उन्होंने अर्जुन का चेहरा अपने सीने से लगा लिया.

"न मेरे भाई न. तू कमजोर नहीं है और इसलिए हे मैं आज तेरे साथ हर बात करना चाहता हु. मुझे पता है की तू सबकी परवाह करता है और रेखा चची तेरे लिए सबसे ऊपर है. भावनाये होना बुरा नहीं है मुन्ना बस उन्हें संभल कर रखना जरुरी है. रेखा चची अगर इस घर की बहु न बनती तोह पंडित रामेश्वर जी का संसार उजाड़ जाता मेरे भाई. उनका बलिदान तू अभी नहीं समझेगा और तेरे प्यार को मुझ से ाचा कोई नहीं जान सकता. दादी ने उन्हें जबरदस्ती माँगा था क्योंकि चची में सबसे ख़ास बात थी परिवार का महत्व और कोई लालच नहीं. मेरी माँ बेशक घर की बड़ी बहु है लेकिन मुझे अफसर बनाने वाली रेखा चची है. उन्होंने हे तुझे इस काबिल बनाया है की तू कभी टूटे न और जिन घटनाओ से सब डरते थे उनका सामना अर्जुन खुलकर करे. अगर तू हे कमजोर पड़ जायेगा तोह दादा जी के कंधे झुक जायेंगे मेरे भाई, उनके कंधे झुक गए तोह मैं भी खुद को माफ़ नहीं कर पाउँगा.", अर्जुन बेशक खामोश था लेकिन उसकी आँखों से बहते तरल ने संजीव भैया का सीना गीला कर दिया था.

"मैं यहाँ रहना हे नहीं चाहता भैया. मैं नहीं रहना चाहता यहाँ. ऐसे किसी sach-jhooth को नहीं खोजना जिसमे मैं खुद को हे भूल जाऊ. आप घर से दूर रहे, मैं भी यहाँ नहीं था और पापा, वो ये क्यों नहीं समझे की वो किसके साथ समझौता कर रहे है. उमेद चाचा को भी अब बोलना हे पड़ेगा अगर मैं यहाँ रहा तोह. इसलिए बस इसलिए मैं अब दूर रहना चाहता हु इस सबसे भैया. नादानी में कोई ऐसी हद्द पार हो गयी तोह दादा जी कंधे झुकने की जगह कही बड़ी बात हो जाएगी.", अर्जुन का ध्यान, योग, चिंतन आज सब विफल हो गया था अपने दादा जी की अनजानी मज़बूरी सुन्न कर. माँ को तोह वो अपना भगवन मानता हे था लेकिन उसके दादा जी तोह पहले शिक्षक और मित्र थे उसके.

"बस तू शांत हो जा मेरा भाई और जितने मैं तेरे पास हु तुझे कोई हद्द पार नहीं करने दूंगा. सामना करना होगा तोह वो मैं करूँगा लेकिन तू हमेशा इस घर का ऐसे हे ख्याल रखना. तेरे जाने से तोह हालत बदतर हो जाएगी मुन्ना और सभी फिर से अपने अपने कमरों में बंद हो जायँगे. दादा जी से ज्यादा अपनी दादी तेरे लिए जीना चाहती है. कृष्णा चची को भी तोह तेरी जरुरत है और कितने सालो बाद रेखा चची भी खुश रहने लगी है. घर की लड़कियां एक आजाद जीवन जी रही है क्योंकि उन्हें पता है के अर्जुन के होते हुए उन्हें परेशानी नहीं होगी. पहले तोह उन्हें डर की वजह से कॉलेज भी अकेले जाने की इजाजत न थी. तू घर संभल और बाकी सब मेरे पर छोड़ दे. जल्द हे तेरी भाभी भी आने वाली है तोह डबल सपोर्ट मिलेगी तुझे. बाकी गुत्थी बाद में सुलझाएंगे.", कार चालू करने से पहले भैया ने अर्जुन को रुमाल दिया और समय देखा तोह 9 बजने वाले थे.

"दादा जी कल वापिस आएंगे न भैया?"

"हाँ. सभी कल हे वापिस आएंगे छोटे और अब तू गलती से भी उनसे सवाल नहीं करेगा. जानता हु के तुझे दुःख उनकी गर्दन झुकने से हुआ है और चची के बारे में जान कर. लेकिन सारा गुस्सा स्टेडियम में निकलना या फिर तुझे मल्टी के पास ले चालू?", संजीव भैया ने जैसे हे 'मल्टी' का जीकर किया तोह अर्जुन के बुझे हुए चेहरे पर भी एक छोटी सी हंसी आ गयी थी.

"देख तेरे चेहरे की चमक. इतनी खास भी नहीं थी वो लेकिन तेरे पास तोह पहले से हे स्वर्ग की अप्सराये है. नाश्ते के बाद चले जाना कही घूमने. जज्बात हे बहार आ जाये तोह ये आपकी कमजोरी भी हो सकती है. इसका ध्यान रखना छोटे क्योंकि जीवन में शरीर ताक़तवर हो या न हो लेकिन अगर दिमाग शांत, सोच सही और दिल पर नियंत्रण है न तोह हठी को भी लाठी पर नचाया जा सकता है और हालात को बदला भी जा सकता है.", अब उन्होंने सचमुच एक काबिल अफसर और बड़े भाई वाली बात कही थी. अर्जुन को भी आचार्य जी का ध्यान आ गया था ये सुन्न कर.

"दर्द होंठो पर हे आ गया तोह शिकायत गलत है. चेहरे से मालूम चला तोह इंसान गलत है. दिल में दबा लिया तोह प्यार गलत है.", अर्जुन ने अनजाने में हे ये अल्फाज दोहरा दिए तोह संजीव भैया भी मुस्कुरा दिए. दोनों हे भाई घर के करीब आ गए थे.

"जानता हुए भी गलती करता है तू. सुधर जा छोटे. वैसे आज तोह तूने कह दिया की तुझे यहाँ से दूर जाना है, फिर कभी ये बात जुबान पर मत लाना. समझना के आज तुमने क्या कहा था. मैं भी छुट्टी का इन्तजार इसलिए करता था की घर पे मेरा भाई है. यहाँ सब तेरे हे है और जो अभी बहार है उन्हें मैं समझा दूंगा और तू मेरे साथ रहेगा. आज हम दोनों पार्टनर बने है अगर याद हो तोह.", उनका मतलब शबनम वाले केस से था और जो गहरी बातें दोनों ने सांझी की थी.

"हमेशा आपके साथ रहूँगा.", कार बहार हे कड़ी करके दोनों भाई अंदर चल दिए थे.

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क्रमश
 
जारी.

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बबिता अभी अपने मायके हे थी और उसके सामने हे अनुपमा अभी वापिस आ गयी थी. विकास को जरुरी काम था इसलिए वो haal-chal जान कर हे वापिस चला गया था और बिजेन्दर तोह अपनी बीवी को देखते हे खेत जाने की जगह वापिस कमरे में आ गया.

"देख ले ये टोटा मैना ऋचा. लुगाई आयी वापिस और भाई साहब वापिस कमरे में.", बबिता के ऐसा कहने पर नाश्ता करती ऋचा भी शर्म से हंसने लगी. दूसरी तरफ आँगन में सुशीला सिंह अपने हाथो से हे सुल्तान को रोटी खिला रही थी जैसे वो सचमुच एक बचा हे हो. अपनी लड़कियों की बात सुन्न कर वो भी मंद मंद मुस्कुरा रही थी.

"इनका टाइम है दीदी तोह करने दो जो करे.", अभी वो यही बात कर रहे थे की बिजेन्दर होंठ साफ़ करता हुआ मोटरसाइकिल के पीछे थैला टांग कर घर से बहार निकल गया.

"मुँह मीठा करने गया था बस. समझदार है मेरा भाई.", बबिता भी ऋचा की बगल में बैठ गयी तोह दोनों के चेहरे पर हंसी आ गयी थी. इधर लता काकी ने बबिता के सामने नाश्ता रखा हे था और ऋचा बोल उठी.

"मुस्कान का फ़ोन आया था अभी दीदी. वो कह रही थी की शबनम को रिहा करके वापिस इंग्लैंड भेज दिया है. हर केस से नाम साफ़ करके और जाने से पहले वो मुस्कान से गीले शिकवे दूर भी करके गयी है.", इतना सुन्न कर लता काकी हैरान हुई सो हुई सुशीला भी पलट कर इन दोनों को देखने लगी.

"अर्जुन हे तोह गवाह था काण्ड का, क्यों माँ सही कहु मैं?", बबिता ने जैसे कहना चाहा की अर्जुन ने हे गावै नहीं दी होगी.

"हहहह.. हां अर्जुन हे गवाह था. इसका मतलब अर्जुन ने शबनम का साथ दिया? सब जानते हुए भी वो उस चांडाल का साथ कैसे दे सकता है?", दूध का कटोरा सुलतान के सामने रखती वो भी हाथ धो कर उधर हे आ गयी. लता काकी इस लकड़ी के टेबल पर दिखावे के लिए सफाई करती सब सुन्न रही थी.

"माँ भूल मैट के उसने तेरे खिलाफ भी कुछ न कहा था. शबनम को भी मौका दिया होगा कुछ सोच कर. ऊपर से छोटे दादा की मंजूरी भी तोह होगी. मुस्कान पक्की दोस्त है अर्जुन की और वो अगर अपनी बहिन की ज़िन्दगी चाहती होगी तोह अर्जुन दोस्ती निभाएगा. बाकी अब बिंदिया काकी के सुर बिगड़ेंगे या सुधर सके है ये तोह पता नहीं.", बबिता ने साफ़ साफ़ लता काकी की बहिन का नाम हे ले दिया था और गुड्डी काकी ने सुशीला और लता के चाय के कप इधर हे रख दिए.

"बिंदु तोह खुश हे होगी इस बात से बबिता. ाचा काम किया है अर्जुन ने जो नफरत और बदले की जगह प्यार और समझदारी दिखाई.", ये बात किसी और ने कही होती तोह बात अलग थी लेकिन मधुलता के मुँह से ऐसा सुन्न कर ऋचा को भी ठसका लगा.

"हाँ बिंदु खुश होगी इस बात से मुन्नी लेकिन अर्जुन ने ये करके कुछ और भी दिखा दिया है. ताक़तवर हे माफ़ कर सकता है और अगर शबनम ने मुस्कान से गीले शिकवे दूर किये है तोह मतलब वो अर्जुन को भी सबकुछ बता गयी होगी. प्यार से तोह वो लड़का बिना बोले हे सब उगलवा लेता है.", सुशीला सिंह ज्यादा दिमाग लगाने वालो में से नहीं थी लेकिन ये बात सटीक कही थी की ऐसा करके अर्जुन ने साबित तोह यही किया था की उसको फरक नहीं पड़ता.

"बदले की भावना में तोह इंसान सही गलत कहा सोचता है सुशीला जीजी. वो लड़का अपने पिता जैसा बिलकुल भी नहीं है. मैं ज्यादा नहीं जानती उसके बारे में लेकिन वो ठन्डे दिमाग वाला समझदार लड़का है. पहली बार ब्याह में हे तोह मिला था लेकिन उसको देख कर ऐसे नहीं लगा के वो पराया है. मालती काकी कह के बुलाया था उसने मुझे.", गुड्डी काकी सचमुच हे भोली थी और उन्हें भी बोलता देख कर बबिता के होंठ लम्बे हो गए.

"आये हाय मेरी मालती काकी. कही गले लग के तोह न मिला वो तुझसे काकी?", बबिता के बिंदास कहने पर गुड्डी काकी भी 'धत्त' कहती मुस्कुराने लगी थी. सुशीला को देख कर ाचा लगा था के ये औरत भी कितने समय बाद ऐसे बोल रही थी.

"माफ़ी भी मांगी थी की अपने बड़े भाई पर उसने हाथ उठाया और वो सुदर्शन से मिल कर भी आया था. जब सुदर्शन को छुट्टी मिलेगी तोह अर्जुन खुद उसके साथ यहाँ आएगा. सुशीला जीजी, खुद हे सोचो की उसकी शिक्षा में कितना फरक है न जो गलत के साथ भी हमदर्दी रखता है."

"न न गुड्डी. उसकी शिक्षा अलग नहीं बस उसको सिखाया गया है के हालात प्यार से बदले जा सकते है. सबने यही देखा के उसने बिजेन्दर की कुटाई करि, सुदर्शन के साथ झगड़ा हुआ या फिर मेरे और शिला वाले मामले को हे देख ले. हर तरफ वजह क्या थी? प्यार हे तोह था जिसके लिए वो अनजान लोगो से भीड़ गया. आज वो बिजेन्दर, ऋचा या तेरे मेरे लिए ऐसा कर सकता है. और भगवन न करे मेरे बचे पर कोई आंच आये लेकिन उसका मेरे साथ रिश्ता bua-bhatije का है. सुशीला सिंह ज़िन्दगी मिलने के बदले ज़िन्दगी दे भी सकती है अगर बात उस पर आयी तोह."

"माँ दत्त (रुक) जा. तेरी बूढी जान का कोई फायदा नहीं और मानु हु के तेरे रिश्तेदार daaku-lootere भी है लेकिन वो छोटे दादा की परछाई में चले है और एक हे है. उसके खरोच आयी तोह समझौते न होने वाले, कर्फ्यू लगवा देंगे पंडित जी. बाकी मैंने मिलवा दिया था संजय मां से उसने वह नानके में. ब्याह में तोह बुलाया न था तन्ने तोह वही लिफाफा दें आया था और मैंने बता दिया था के अर्जुन हे जिसने तेरी जान बचाई थी.", बबिता के ऐसे खुलासे पर सुशीला को थोड़ी ख़ुशी तोह हुई की ये काम उसने ाचा किया.

"जीजी, संजय भाई साहब तोह जेल में थे न?", माधलता बहार से ठीक थी लेकिन अंदर उसके भी पसीना आ चूका था.

"काम हे जेल में बैठ के करे है तोह जेल में हे रहेगा. लेकिन अंदर बहार की rok-tok न है संजय और उसके आदमियों को. मोहर के चक्कर में मैंने किनारा कर रखा था लेकिन बात होती रही है मेरी. दिल्ली से जयपुर तक तगड़ा हिसाब है उसका और अब जान गया के वो लड़का मेरा हिमायती है तोह अर्जुन की हर मदद करेगा. ब्याह में तोह इसलिए न बुलाया था कही चाचा (पंडित जी) एनकाउंटर न करवा दे उसका. चल ाची बात है के बबिता की वजह से अर्जुन ने भी एक और मां मिल गया. मैं जरा माँ के पास हो के आयी.", सुशीला ने पतले बांस की लाठी का सहारा लिया और एक तरफ चल दी. मधुलता को आज जोरदार जकड़न महसूस हो रही थी इतना सब जान कर. वही ऋचा और बबिता ने अनुपमा के कमरे का रुख कर लिया.

"गुड्डी जीजी तुम्हे जरा भी बुरा न लगता के इतना सब तुम्हारे साथ हो गया और तुम्हारी कही गलती हे नहीं? अर्जुन तोह चलो पछतावा कर गया जो वैसे भी वह सिखाया हे जाता है लेकिन सुशीला जीजी, मेरे और बिंदिया के पास फिर भी जीने के मकसद है, थोड़ी खुशियां है लेकिन आपके साथ बहोत नाइंसाफी हुई है.", मधुलता को कुछ और न सूझा तोह वो इस भोली भली जेठानी से हे गिला करने बैठ गयी.

"कैसी शिकायत मुन्नी? पति ने ाचा प्यार दिया और इस परिवार ने कभी मुझे अपशब्द न कहे. तुम्हारे जेठ जी जैसे भी थे लेकिन उन्होंने हमेशा यही कहा था के उनकी माँ के साथ मैं मरते दम तक राहु. सुदर्शन का ध्यान न रख पायी क्योंकि वो शुरू से हे अलग था लेकिन ज़िन्दगी से मैं कोई लालच नहीं रखती. मुझे तोह उस maan-samman की भी उम्मीद न थी जो वो लड़का और माँ जी ने दिया. करम का बोझ सबको धोना पड़ता है.", गुड्डी काकी इतना कह कर सभी बर्तन उठती हुई टंकी की तरफ चली गयी.

'अरे करमजलों सबके सब पानी से भरे हो. और ये कमीना क्या खेल खेल रहा है अब जो शबनम को सीधा हे बहार भेज दिया.? कर्मा भी गया और अब वो इन्दर आ जायेगा तोह हो गया taam-jham बंद. बुढ़िया वाले हिसाब से हे चलना पड़ेगा वक़्त के आगे.', मैं में बड़बड़ाती हुई मधुलता भी पिछले आँगन की तरफ चल दी जहा कामवाली कपडे धो रही थी.

"ऐ छंइया, तू बड़ी तेज निकली. बिना कहानी बताये भाग गयी अपने घर.", बबिता ने यहाँ हाथ पकड़ रखा था अनुपमा का और दूसरी तरफ ऋचा बैठी थी इस बंद कमरे में. अनुपमा का चेहरे खिला खिला लग रहा था इस वक़्त.

"जीजी, थैंक यू. वो तोह जाने की जल्दी थी तोह बता न सकीय लेकिन आपके कहे बाद इन्होने बहोत प्यार से कहानी सुनाई."

"कहानी सुनाई?", ऋचा बीच में हे बोल पड़ी.

"वो इन्होने प्यारी बातें करते हुए सबकुछ आराम से किया न ऋचा जीजी.", अनुपमा कभी शर्माती नहीं थी लेकिन आज जैसे उसको समझ आ चूका था के अंतरंग पल क्या होते है.

"आये हाय मेरी लाडो के गाल लाल हो रहे है. जरा कहानी समझा तोह सही मेरी जान. कल को ऋचा को भी तोह पता होना चाहिए.", बबिता भी खुराफाती थी और यही अनुपमा फंस गयी.

"हाँ ये बात भी है जीजी. उस दिन आपके कहे बाद मैं अंदर आयी तोह इन्होने बहोत सार चुम्मी ली मेरी और साथ हे बब्ले (बूब्स) अलग तरह से दबाये थे कोई 10 मिनट. क्या बताऊ बबिता जीजी जब नंगा करके घुंडी पीने लगे तोह तीती (छूट) गीली हे हो गयी. इतनी तोह कभी अक्षरा के करने से न हुई थी.", ऋचा बड़े गौर से सुन्न रही थी.

"फिर क्या हुआ भाभी?", उत्सुकता में ऋचा बोल उठी और बबिता के चेहरे पर कमीनी हंसी आ गयी.

"बता रही हु न जीजी. इन्होने अपने भी कपडे हटाए और फेर बहोत गन्दा काम किया."

"तेरी तीती चूम ली?", बबिता ने जैसे हे ये कहा अनुपमा ने सर हिला दिया.

"लेकिन गुदगुदी और मजा बहोत आया था जब वो वह मुँह लगा रहे थे. फिर झटके लगने लगे तोह इन्होने गुल्ले (लुंड) पर क्रीम लगा कर आराम से अंदर दाल दिया. खून नई निकला जीजी और इन्होने झटका भी जोर का न मारा पहली बार जैसे. थोड़ा दर्द तोह हुआ लेकिन बाद में बब्ले मसलते हुए ाचे से चुदाई करि. हाँ वो माल बता रहे थे जो उनके गुल्ले से निकला सफ़ेद सफ़ेद, सारा अंदर भर दिया. बोल रहे थे के मैं जल्दी माँ बनु और सासु जी को पौती दू एक. अभी भी बोल के गए है के दोपहर में 3 बजे आएंगे.", बबिता को सचमुच बेहद ख़ुशी थी की उसके भाई ने समझदारी दिखाई और अनुपमा भी पहले से बेहतर महसूस कर रही थी.

"भाभी आप न भैया से पढ़ना भी शुरू करो थोड़ा बहोत. मुझे ाचा लगा के आप दोनों अब एक दूसरे से जुड़ गए हो लेकिन जो आप लोगो ने किया उसको सेक्स कहते है. ये ब्रैस्ट या बूब्स है, ये वागिना है और उनका जो आपके अंदर गया था वो पेनिस है.", ऋचा जहा समझदारी दिखा रही थी वही बबिता हंस रही थी.

"ऋचा जीजी कुछ भी कहती हो आप तोह. अक्षरा ने बताया के बब्ले को चुकी भी बोल सकते है और तीती को छूट और गुल्ले को लुंड भी. हमने जो किया वो चुदाई होती है. ये भी ऐसा हे बोल रहे थे लेकिन मुझे तोह वही पसंद है जो मैं बोलती हु.", मासूमियत से अनुपमा ने कहा और बबिता ने उसका गाल चूम लिया.

"हाँ ऋचा, अनुपमा सही बोल रही है. लेकिन खली टाइम में तू थोड़ा पढ़ना भी शुरू कर मेरी लाडो. बिजेन्दर से न सही तोह ऋचा तोह है इधर. चल तू आराम कर फेर तेरा खसम तेरी कसरत करवाएगा.", बबिता इतना बोल कर बैठक की तरफ चली गयी और ऋचा कुछ देर वही अनुपमा के पास बैठ गयी.

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नाश्ते के बाद संजीव भैया ने बताया था की शंकर जी दोपहर 3 बजे तक वापिस आ जायेंगे. उन्हें कुछ जरुरी काम था जिस वजह से वो बता कर बहार चले गए. अब घर में अर्जुन फिर से अकेला था क्योंकि सामने से सरोज भाभी और रोमिला जी भी इधर कोमल दीदी के पास आ गए थे. कुछ सोच कर वो भी दीदी को जल्द आने का बता कर प्रीती के हे घर चला आया. मुकेश घर के पिछले हिस्से में बगीचे का काम कर रहा था और उसकी बीवी पारवती भी वही थी. रसोई से ये अर्जुन को नजर आ चूका था लेकिन रेणुका न हॉल में दिखी न रसोई में. उत्सुकतावश वो उस कमरे की तरफ बढ़ गया जहा रेणुका हो सकती थी.

बिस्टेर पर साफ़ कपडे रखे देख अर्जुन समझ गया की वो बाथरूम में नाहा रही होंगी. दरवाजा बंद करके वो वही जा लेता लेकिन तुरंत बाथरूम से रेणुका एक सफ़ेद गाउन में बहार निकल आयी. चेहरे पर थोड़ी हैरानी थी लेकिन उतनी हे ख़ुशी.

"ये कही गलती से तोह रास्ता नहीं भूल गए आप?"

"दरवाजा खुला रख कर नहाने चली गयी आप?", अर्जुन ने ये बात हलकी चिंता से कही थी लेकिन रेणुका के चेहरे पर हंसी आ गयी.

"पूरे पति वाले हे अंदाज है जनाब के. नहाने नहीं गयी थी क्योंकि वो मैं 5 बजे हे नाहा चुकी हु. कपडे निकल कर रखे थे और बदलने के बाद उधर हे आने वाली थी.", अर्जुन ने देख रहा था की उस रेशमी कपडे के अंदर दो मटर के दाने उभर आये थे. मतलब रेणुका बस उसको देखने से हे गरम हो चुकी थी और अंदर ब्रा नहीं थी. शरीर भी भरने लगा था और एक अलग हे चमक बता रही थी की ख्याल ाचे से रखा गया है.

"ऐसे हे देखते रहोगे क्या?", दोनों अभी तक अपनी अपनी जगह हे थे और अर्जुन बस इस सुंदरी के जिस्म का जहां अवलोकन कर रहा था. जवाब देने से पहले हे उसने अपनी टीशर्ट निकल कर एक तरफ रख दी. रौशनी में वो मजबूत जिस्म और हर एक कटाव रेणुका के सामने थे. अब कदम खुद हे अर्जुन की तरफ बढ़ गए.

"हालत पता है क्या है मेरी? घर खली हो तोह मुश्किल और सब हो तोह वैसे हे दूर से देख कर रहना पड़ता है. आपको कहा भी था के मेरे साथ बहार हे चल पदों.", अर्जुन ने अपनी गॉड में रेणुका को बैठते हुए कहा और हाथ गर्दन से फिरते हुए एक उभार पर आ रुके. ये सचमुच कुछ बड़ा और सख्त महसूस हो रहा था. रेणुका की आँखे बस स्पर्श से हे बंद हो गयी थी.

"आपकी साली कहु या सास, जो भी समझो लेकिन वो अकेला कहा छोड़ती है मुझे. आठ आराम से बाबा. देख रहे हो मेरी हालत.?", रेणुका ने हलकी तल्खी से कहा तोह उन पतले होंठो को अर्जुन ने अपने मुँह में जकड लिया. अर्जुन को भान था की रेणुका भी उसके साथ थोड़ा उन्मुक्त प्यार करना चाहती है जैसा मधु बुआ ने समझाया था. इसलिए वो आज रौशनी में हे उनके पास आ गया था. दोनों के आधार इतने दिनों की तड़प से कही ज्यादा हे उलझने लगे. रेणुका की आवश्यकता और तड़प कही ज्यादा थी अर्जुन से. सख्त गोलों पर उभरे हुए निप्पल भी बता रहे थे की kaam-jwar कितना अधिक है.

"आअह्ह्ह्ह.. अभी से काम हो गया मेरा.", शर्माती हुई रेणुका पीछे हटने लगी थी इस हलके स्खलन से लेकिन चेहरा बता रहा था के वो खुश है. अर्जुन ने भी कास के पकड़ते हुए अपने सीने से वो मांसल छाती चिपका ली. ठोस कंधारी अनार से रेणुका के सतांन अब महसूस कर रहे थे अर्जुन के मजबूत सीने को.

"आज काम तभी होगा जब हम दोनों का एक साथ होगा. तब तक भूल जाइये की मैं आपको पीछे हटने दूंगा.", पीछे लगी गाउन की चैन कमर तक थी जिसको खोलकर अर्जुन ने वो पहले से अधिक उन्नत हो चुके गोर उभार दबोच लिए. दोनों हे चुचो को पकड़ने का अंदाज इस बार ख़ास था अर्जुन का. हमेशा से नरमी दिखने वाला अर्जुन, आज ाचे से उन पर दबाव बनाये था. निप्पल इस दौरान अंगूठे से रगड़ते हुए उसने एक मुँह में भर लिया. रेणुका का धीरज जवाब दे गया था अब. अर्जुन के चेहरे को अपने सीने पर दबती वो उसकी गॉड में दोनों तरफ पाँव किये बैठी थी. कूल्हों का कटाव लटके हुए कपड़ो से बता रहा था की अंदर पंतय भी नदारद है.

"उफ़.. बहोत मिस किया है मैंने ये प्यार.. आह्हः.. आज अपनी रेणुका को जैसे चाहो वैसे प्यार करो अर्जुन. उम्म्म..", एक हाथ से बाकी का जिस्म भी कपडे की क़ैद से आजाद करते हुए अर्जुन ने वो सुत्वा जिस्म निर्वस्त्र कर दिया था. कठै निप्पल से निचे अब वो पेट और भी गदरा गया था और नाभि गहरी. मांसल गोरी जांघो के बीच हलके हलके बालो का एक छोटा सा त्रिकोण बता रहा था के यहाँ अर्जुन की कुछ अनदेखी रहने लगी है. हथेली को छूट की फांको पर टिकते हुए अर्जुन ने जो सहलाना शुरू किया, गुलाबी फांके आंसू बहाने लगी.

"कुछ ज्यादा हे टेम्परेचर है आज यहाँ का. देखो गरम पानी बहा रही है.", अर्जुन ने एक के बाद एक करते हुए 2 उंगलिया अंदर बहार करनी शुरू की तोह रेणुका की आहे माहौल को भरने लगी थी. पूरी कस कर अंदर बहार होती उंगलिया भी सुखद एहसास दे रही थी और साथ हे अंदर जमा चिकनाई बहार आती हुई ये कॉमर्स की महक से उत्तेजना बढ़ने लगी.

"इस्स्स्सस्स.. पागल कर रहे ho....aahhh.. आराम से आह्ह्ह्ह..", रेणुका के चुके कही ज्यादा हे तन्न गए थे जब ऊपरी धड़ पीछे गिरने लगा. अर्जुन ने भी तकलीफ न देते हुए उन्हें नरम बिस्टेर पर लिटाया और ungli-chodan के साथ हे एक सतांन का भरपूर मर्दन करते हुए पूरा शरीर हे जागृत कर दिया था रेणुका का. एक नजर उस ras-bahati योनि पर करते हुए वो भी बराबर आ लेता. गले से ले कर गाल तक अर्जुन के होंठ जो आग भड़का रहे थे वो जैसे हद्द से ज्यादा हो चुकी थी. ट्रैक पाजामे के ऊपर से हे अर्जुन का सख्त लुंड अब रेणुका की गिरफ्त में था.

"ऐसे हे बराबर साथ देना चाहिए. उम्म्म..", दोनों एक दूसरे के होंठो को चबाने हे लगे थे और रेणुका ने बात मानते हुए अब पाजामे के अंदर से हे वो मूसल थाम लिया था. अपने नाजुक हाथो से लुंड मुठियाती हुई वो धीरे धीरे अर्जुन के ऊपर आ चुकी थी. यहाँ एक और करतब दिखते हुए रेणुका ने अर्जुन का पजामा पाँव के अंगूठे से पूरा निचे खिसकाया और ठीक उस फूले हुए मॉटे सुपडे के ऊपर आ गयी.

"आज शिकायत नहीं होगी patidev..uff....aahhhhh.. बहोत ज्यादा हे मोटा hai...lekin आह्हः.. पूरा jayega.aa..", सचमुच रेणुका ने हिम्मत दिखाई थी. 9 इंच की पूरी लम्बाई और वो असाधारण मोटाई जांघो के बीच उन गुलाबी होंठो में समां चुकी थी. चेहरे पर कसावट थी और अर्जुन जल्द हे रेणुका को अपने ऊपर गिरा लिया. कूल्हों की तरफ ये अद्भुत नजारा था जहा लचीली छूट बुरी तरह फैली हुई उस मॉटे लुंड पर चिपकी थी. चुतरस इतना अधिक न होता तोह हलकी चीख पक्का सुनाई देती.

"तोह आज आप घुड़सवारी करने के मूड में है? कुछ ज्यादा हे गरम माहौल है.. आअह्ह्ह्ह..", रेणुका ने अर्जुन की बात को बीच में हे काट दिया छूट से लुंड को जकड़ते हुए एक बार 2-3 इंच आगे पीछे करते हुए. यहाँ इनकी ये धीमी चुदाई शुरू हुई और उधर परदे के थोड़े से खुले हिस्से से झांकती रोमिला के शरीर का रोया रोया खड़ा हो गया था. वो पिछले 15 मिनट से इस दूसरे गलियारे से कड़ी हुई इनकी रासलीला देख रही थी. Poorn-nirvastra उनका भावी दामाद और उसका ऐसा हथियार उनकी बेटी जगह बुआ की छूट को फैलाये अंदर बहार हो रहा था. एक पल जहा चेहरे पर हैरत और गुस्सा आया था वही अब उत्तेजना और kaam-nasha छ चूका था.

"उफ़.. घुड़सवारी नहीं बस ऐसी मालिश का इरादा है. यहाँ वो सब मुमकिन नहीं है अर्जुन.. आह्हः.. थोड़ी से ज्यादा तेज आवाज और ..उम्म्म.. बात बिगड़ जाएगी.. आठ..", यहाँ बहार घंटी बजी और अब तीन लोगो को होश आया था के स्थिति क्या है. रेणुका दूसरा स्खलन ले चुकी थी लेकिन अर्जुन वैसे हे अकड़े लिंग के साथ पजामा और टीशर्ट पहन कर खड़ा हो गया. रेणुका ने भी समझदारी दिखते हुए बाथरूम का रुख किया और अर्जुन बहार निकल गया.

"पेपर का बिल है भैया जी.", ये अख़बार वाले से अर्जुन की सबसे बुरी मुलाकात थी. और उसके पीछे हे मुकेश भी बहार आ गया था लेकिन रोमिला कुछ सोच कर वह से हट गई.
 
पहला अपडेट तोह ऊपर निचे रहने वाला हैं दोस्तों. अर्जुन खेल बिगड़ने के बाद हे कृष्णा की तक पहुंचेगा. उनमाफ है, गुस्सा भी और खुद पर लानत भी. जब तक शांत नहीं होगा वो वापिस नहीं जायेगा. फ़िलहाल मैं एक दृश्य लिख रहा हु मंजू और अर्जुन का.

इसके बाद प्रेम, सवाल और फिर स्टेडियम. अर्जुन घर जायेगा तोह रूटीन ख़तम करके.

अब सवाल भुला कर जिज्ञासा लिए होगा लेकिन चची माँ के लिए तोहफे के साथ. रोमिला को तोह मौका मिल चूका है बस ये देखिएगा की बाकी सबके साथ अर्जुन क्या खेल खेलेगा.
 
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