अपडेट 131
चाहत (1)
अभी ठीक से रात ख़तम भी न हुई थी और सही 4 बजे पूर्णिमा जी की आँख खुल गयी. बाथरूम से पानी चलने की आवाज सुन्न कर उन्होंने अपने बिस्टेर पर देखा तोह वह कौशल्या जी नदारद थी. उन्होंने मुस्कुराते खुद के वस्त्र ठीक किये और अलमारी से अपनी dharam-behan के लिए साड़ी निकलने लगी. इन दोनों में devrani-jethani वाला रिश्ता कभी बना हे न था और वो मायने भी नहीं रखता था जितना प्यार परस्पर था. यहाँ कपडे रखने के बाद वो बहार हॉल की तरफ चल दी जहा उनकी सेविका सो रही थी.
"मीणा बिटिया, थोड़ी देर में तैयार हो जाना.", ये 25-26 वर्षयिया महिला इनकी विश्वासपात्र और ख़ास थी. मीणा भी उनका अभिवादन करने के बाद नहाने धोने के लिए बहार वाले बाथरूम की और चल दी तब तक कौशल्या जी भी कमरे में अपने वस्त्र धारण करने लगी थी. यहाँ आने पर इनका भी दिन थोड़ा जल्दी हे शुरू हो जाता था. वही इनसे पहले उठ कर चाचा भतीजा बाथरूम के कार्य से फारिग हो कर इस खुले मैदान में आ चुके थे.
"चाचा जी, आपको देख कर नहीं लगता के 70 के हो गए हो आप. वैसे घुड़सवारी रहने हे दीजिये, चची जी मेरी हे टांग न टॉड दे.", पंडित जी इस shwet-shyaam घोड़े को सहलाने के साथ साथ उसपर काठी भी कस रहे थे. सबसे ख़ास था के किंग उनके आने के बाद से हे बिना चैन के बस उन्ही के aas-pas घूम रहा था, किसी साधारण कुत्ते की तरह. बस रोमियो को वो रामेश्वर जी के नजदीक नहीं आने दे रहा था.
"बीटा, याद है तुम कितने बरस के थे जब मैंने हे तुम्हे घोड़े पर बैठाया था? 9 साल के और तुम डर रहे थे की कही वो घोड़ी तुम्हे पटक न दे. लेकिन न उसने तुम्हे गिराया और न तुम उस दिन के बाद डरे. यही देख लो तुम्हारा भेड़िया, इसको भी समझ है मैं कौन हु और ये कौन. चलो देखे तुम्हारा विदेशी तेज है या मेरा ये काठियावाड़ी.", उमेद का वो दूसरा घोडा सचमुच कुछ अधिक ऊँचा और चमकदार था इस वाले से. उमेद नजदीक आ कर अपने चाचा की मदद करना चाहता था लेकिन वो तोह देखते हे देखते सवार हो गए इस वाले की पीठ पर.
"मतलब आप कहते हो के ये निगरानी करने वाला बदल इस पैदाइशी दौड़ने वाले नील से तेज है? वापिस यही आना है उस खेत की सरहद से चाचा जी. आधे रस्ते से मात देने वाला हु और फिर आपकी थोड़ जानकारी में इजाफा भी हो जायेगा.", उमेद रेलिंग पर लटके घुटना बचने वाले पद दोनों तरफ बांधते हुए हाथ पाँव खोलने के बाद इस घोड़े की गर्दन थापक कर सवार हो गया. देखने में हे पता लगता था के ये ऊँचा घोडा कितना मजबूत और छरहरा है. लेकिन रामेश्वर जी ने कोई जवाब न देते हुए अपने वाले की लगाम मजबूती से थाम ली. दूसरी मंजिल पर कमरे से शंकर भी उत्सुकता से ये दृश्य देख रहा था.
"Get-Set-Go", उमेद ने जैसे हे दौड़ शुरू की नील अपनी रफ़्तार से सरपट भाग लिया लेकिन 10 गज का फैसला रामेश्वर जी ने आगे बढ़ने न दिया. घास के मैदान से आगे जैसे हे दोनों घोड़े गुड़ाई की हुई जमीन पर आये तोह रामेश्वर जी ने नील और बदल की बीच का फैसला और काम कर दिया. इस तरफ से 800 गज के लगभग लम्बाई थी मैदान की और ये सब डेढ़ मिनट में हे हुआ था.
"फास्टर Neel-Faster.", वापिस मुड़ते हुए उमेद ने अपने विदेशी घोड़े को कही छोटे घेरे में हे घुमाया था और दूसरी तरफ रामेश्वर जी बदल की गर्दन पर झुके उसको अर्धगोलाकार तरीके से घुमा कर दोनों के बीच 50 गज से ज्यादा की दुरी बनाते आगे निकल रहे थे. इस जोताई की गयी जमीन पर ये देसी घोडा बेहतर सिद्ध हुआ था उमेद के नील से और घास वाला मैदान आने पर उमेद ने ये फांसला ख़तम करने में कोई कोशिश न छोड़ी लेकिन अपने घोड़े की लम्बाई जितनी दुरी से वो ये दौड़ हर चूका था.
"मान गए चाचा जी. ये मुमकिन नहीं था और अगर मैदान रेसकोर्स वाला होता तोह बदल कही न टिकता.", उमेद घोड़े से निचे उतर कर अपने चाचा को सावधानी से उतरने लगा. रामेश्वर जी के चेहरे पर पसीना आ चूका था और सांस थोड़ी तेज चल रही थी. नीचे जमीन पर बैठते हुए उन्होंने तोलिये से मुँह पौंछने के बाद 1 मिनट तक बस खुद को दुरुस्त किया. उम्र का असली प्रभाव साफ़ दिख रहा था लेकिन वो फिर भी बेहतर थे अपने समकक्ष व्यक्तियों से.
"बीटा, मैंने भी मैदान देख कर हे दांव खेला था. काठियावाड़ी के खुर्र देखो जरा, ये है तोह रेस वाले हे लेकिन प्रयोग रेगिस्तानी बॉर्डर पर भी होता है इनका. तुम्हारा दूसरा घोडा भी बेहद उम्दा है जो सिर्फ उचित सतह पर हे भाग सकता है लेकिन वह फिर कोई टक्कर हे नहीं. इसको सजा कर मैट रखा करो अस्तबल में, खुला छोडो सुबह शाम और माहौल में ढलने दो. यार अब तोह लग रहा है के सचमुच उम्र हो हे गयी है.", रामेश्वर जी खड़े हुए तोह हवेली की तरफ से शंकर चलता हुआ इधर आ गया.
"ये सब आप दोनों के बस का नहीं है पापा. आप आराम करो और गज्जू तू बस इन्हे खरीद कर शौक पूरा करता रह. कभी दिल करे तोह मेरे पास आ जाना, सीखा दूंगा के ये ghode-khacharr कैसे दौड़ने होते है.", शंकर ने फुर्ती से उमेद वाले घोड़े को पकड़ा और पीठ पर सवार होते हे सामने वाली दोनों टाँगे ऊपर उठवा दी नील की. इतनी कुशलता से एक हे जगह घोडा घूमते हुए शंकर बिना जवाब सुने ले भगा इस घोड़े को. रामेश्वर जी के साथ साथ उमेद की आँखों में भी प्रशंशा थी शंकर के लिए. अब कही लग रहा था के घोड़े को सही घुड़सवार मिला है. जुताई की हुई जगह वो घोडा अब गर्दन टेढ़ी करता भाग रहा था जैसे शंकर ने खुद को दिशा दी हुई थी.
"वाह.. ये भोले न सचमुच दक्ष घुड़सवार है चाचा जी. इतनी उम्र में भी किसी नौजवान जैसी फुर्ती और इसका कॉन्फिडेंस जानवर को मजबूर कर देता है परिणाम देने पर. याद है ये मेले में भी घोडा जीत लाया था शरत लगा कर वह पंजाब में?"
"हाँ भाई, शंकर के शौक उसकी जिद्द की तरह है और उनसे वो कोई ढील नहीं करता. मेरे पिता हमेशा एक साधारण शांत व्यक्ति थे लेकिन उनका एक हे शौक था और वो शंकर ने अपने दादा से हे अपनाया. आगे बनवारी की सोहबत ने शौक को जिद्द बना दिया क्योंकि वो खुद भी सनकी था. बस में दम घुटने का बहाना करके 150 कोस (300 कम) तक वो घोडा लेके निकल पड़ता था. पता नहीं ये लड़का डॉक्टर कैसे बना, हरकते तोह आज भी वही कक्षा 12 वाली है इसकी.", रामेश्वर जी खुलासा करते हुए भी अपने बेटे को हे देख रहे थे जो थोड़ी हे देर में कही का कही निकल गया था.
"ये गया घोडा ले कर क़स्बा घूमने चाचा जी. इसको चैन न मिलने वाला जितने नील उसकी हर बात नहीं समझ लेता. चलो अंदर चल कर चाय पीते है फिर नाहा कर देखते है आज क्या करना है.", उमेद ने किंग को बाड़े में बंद करने के बाद अपने चाचा के साथ हवेली का रुख किया और वैसे हे दोनों अपनी गुफ्तगू करने लगे. 5 बज चुके थे और अब नाहा धो कर सभी ने अपने काम करने थे.
.
.
"उम्म्म.. सोने दे न यार, अभी तोह किया था अब फिर से करने की हिम्मत नहीं है.", 5 बजे बबिता इस बड़े बिस्टेर पर nang-dhadang पसरी थी, चादर के अंदर. रात 3 बजे भी अर्जुन और उसने एक लम्बा संसर्ग गया था और अब जैसे बबिता का अंग अंग टूट रहा था. चादर कई जगह से guth-muth थी और दोनों के हे काम रास की छाप ने 3-4 गहरे निशाँ बना दिए थे उस पर. गुलाबी चुचकों में सूजन आ गयी थी और वैसा हे हाल कुछ छूट और होंठो का भी था. गोर बदन पर अनंत मरदाना निशाँ दाल दिए थे अर्जुन ने और बबिता को तोह इसमें भी मजा हे आया था. अब शरीर घंटे भर से आराम कर रहा था के अक्षरा ने आ कर हिला दिया. अर्जुन नाहा रहा था और इसलिए हे अक्षरा इधर चली आयी थी.
"जीजी, ो बबिता जीजी. उठ जाओ नहीं तोह मुसीबत आ जाएगी. दूसरे घर चल कर आपने वापिस बुआ (सुशीला) के पास भी जाना है घंटे बाद.", अक्षरा ने बबिता को उठते न देख एक चुका हलके से दबा दिया.
"अह्ह्ह.. एक हे रात में ज़िन्दगी बदल दी ऋ मेरी. सोने को भी न मिल रहा अब, तू चाय रख मैं आती हु नाहा के. घर जा के सोऊंगी अब अपनी माँ के पास.", बबिता ने अंगड़ाई ली तोह चादर उन पहाड़ो से सरक कर निचे आ गिरी. अक्षरा का तोह मुँह हे खुला रह गया चुचो की हालत और सूजे हुए निप्पल देख कर.
"आपका तोह बुरा हाल है जीजी."
"डार्लिंग, हाल तोह दिखा नहीं सकती तुझे की कितना बुरा है. रात भर में 3 बार आगे खूंटा ठोका और एक बार पीछे. पता नहीं अब क्या जवाब दूंगी सबको. चल तुझे तोह संतुष्टि हो हे गयी न देख कर.", बबिता शरीर पर चादर लपेट कर कड़ी हो गयी. आज तोह उसकी जाँघे हे समस्या बन गयी थी उसके लिए. इतनी तगड़ी चुदाई से पंजे खोलने पड़ रहे थे.
"ओह्ह्ह.. सचमुच हालत खराब है आपकी जीजी. मेरी मानो तोह पद लगा लो, सवाल ज्यादा नहीं होंगे. वैसे संतुष्टि की जगह आग और भी भड़का दी है आपने मेरी. चाय बनती हु मैं.", अक्षरा ने ाची सलाह दी थी बबिता को और वो भी मुस्कुरा दी. तन्न पर चादर लपेटे हुए वो बाथरूम के दरवाजे पर आयी तोह वो चिटकनी से बंद न था. अंदर घुस कर बबिता ने हे चिटकनी लगाईं और चादर उतार कर हक्क पर टांग दी. अर्जुन गीले बदन हे बबिता से लिपट गया.
"ाःह.. छोडो भी, देखो न क्या हालत है मेरी और तुम फिर से शुरू हो रहे हो.", बबिता ने अपने निप्पल के निचे हाथ रखते हुए अर्जुन का ध्यान करवाया तोह उसने वह पर अपने गीले होंठ रखने के साथ हे छूट को भी सेहला दिया.
"कोई बात नहीं, अब प्यार से ठंडक दे देता हु इन्हे. वैसे सुबह तोह खुद हे इसको अंदर ले कर ऊपर बैठी थी.", अर्जुन का लुंड पीछे से गांड पर चुभता हुआ महसूस करके हे बबिता की आँखें बंद हो गयी.
"उफ्फ्फ.. प्लीज, अभी टाइम नहीं है नहीं तोह फिर ले लेती. और तब नींद में भी मुझे यही दिख रहा था तोह गुस्ताखी कर ली. चलो हटो अब और मुझे तैयार होने दो.", बबिता की ऐसी बातों पर अर्जुन को भी बहोत प्यार आया और साथ हे उतने देखा की वो हर कोशिश करती है उसको खुश रखने की.
"टब में पानी भरा है, थोड़ी देर आराम करो उसमे फिर नाहा कर आ जाना. पैन किलर चाहिए है तोह वो भी ले लेंगे लेकिन पहले कुछ खा लेना.", अर्जुन ने अपनी बात कहने के साथ हे प्यार से बबिता के होंठो को चूमा और सहारा दे कर उस बड़े टब में बैठने में मदद की.
"कोई गोली नहीं लेनी मैंने. अब रात 3 बार सब अंदर हे लिया है तोह मुझे बस अब बचा हे चाहिए. गोली शरीर पर गलत प्रभाव होता है और मुझे तोह ये दर्द सबसे प्यारा लगा. जाओ तैयार हो जाओ, अक्षरा भी उठ गयी है और चाय बना रही है.", एक पल को तोह अर्जुन की धड़कन हे बढ़ गयी अक्षरा का नाम सुन्न कर. अगर उन्होंने कुछ देख लिया या सुना तोह.
"इतना परेशां मत हो. वो बहार वाले कमरे में थी रात और बीच के दोनों कमरे तोह बंद हे थे. जाओ अब बहार.", बबिता के कहने पर अर्जुन टोलिया लपेटे वापिस कमरे में आया तोह बिस्टेर व्यवस्थित था, उसके कपडे एक तरफ कुर्सी पर सही से रखे थे जिन्हे पहनते हुए अर्जुन हर छोटी मोती चीज ध्यान से देख रहा था. कुछ भी निशाँ नहीं थे अब इस कमरे में उन दोनों की rati-krida के लेकिन फ़ोन का हैंडल अलग रखा देख वो उसके पास चला गया. कोई लाइन चालू नहीं देख वो निश्चिन्त हो गया. फ़ोन ठीक से रखने के बाद घडी, पर्स और रुमाल अपनी जगह रख कर वो पिछले आँगन से हे हवेली के अगले हिस्से की और बढ़ गया.
"उठ गए अर्जुन? अरे तुम तोह तैयार भी हो गए हो. चलो यही बैठो मैं noon-ajwain के पराठे बना रही हु, अभी रसोई ाचे से सेट नहीं हुई है न तोह बस यही बनेगा फ़िलहाल तोह.", गुलाबी salwar-kameej में dubli-patli सी अक्षरा उमस गर्मी में परेशां होती नाश्ता बना रही थी. दुपट्टा दरवाजे के हैंडल पर टेंगा था और इन तीनो के अलावा अब ये महिला अर्जुन को दिखी जो दूर कोने में आँगन की सफाई के बाद kooda-karkat एकत्रित कर रही थी. अर्जुन ने प्रेम भाव से रसोई में आते हे अक्षरा के भीगे चेहरे और गले को रुमाल से साफ़ करते हुए कहा.
"आप इतनी म्हणत क्यों कर रही है दीदी? देखो अपनी हालत जरा.", अक्षरा के हाथ पराठा पलटने के साथ हे रुक गए अर्जुन को ऐसे उसका पसीना साफ़ करते देख. अर्जुन ने दूसरी तरफ चल कर वो बड़ी खिड़किया खोल दी जिस से धुआं और गर्मी बहार निकल सके.
"थैंक यू और मेरे लिए ये नयी बात नहीं है. वह तोह रोज हे करती थी लेकिन अब दादी ने कहा है के जितने मेरा एडमिशन चंडीगढ़ नहीं हो जाता इतने मैं बबिता दीदी का ख्याल राखु और उनके हे पास राहु. तुम आये तोह मुझे भी ाचा लगा लेकिन शायद रात तुम भी जल्दी सो गए थे और मुझे भी नींद चढ़ी थी, इसलिए बात नहीं कर सके.", अक्षरा के हाथ जब बेलन को हिलाते पराठा बेलते वक़्त तोह वो कांच की चूड़ियों की खनन खनन होने लगती. अर्जुन का ध्यान भी इधर गया तोह गोरी पतली कलाई में दर्जन गुलाबी चूड़ियां बेहद आकर्षक लग रही थी.
"आप हमारे उधर भी आ जाना, वह हम जितनी देर आप चाहेंगी उतनी देर साथ बातें कर सकते है. वैसे भी आप तोह बड़ी दीदी है और कल पापा ने अनुपमा दीदी की रस्मे की तोह ये रिश्ता और भी पक्का हो गया हमारा.", अक्षरा को ये सुन्न कर इतनी ख़ुशी हुई के वो अर्जुन के सीने लगने से खुद को रोक न सकीय. अब सिर्फ आखिरी पराठा हे तवे पर था और एक पल के लिए अर्जुन भी अक्षरा की इस हरकत से थोड़ा हैरान हुआ लेकिन वो खुश थी, उदास नहीं.
"इतनी बड़ी बात कह कर तुमने मेरा दिन हे बना दिया अर्जुन. अब मेरा भी एक भाई है वो भी मुझसे छोटा.", अक्षरा के ऐसा कहने पर अर्जुन ने भी उसको बाहों में कस लिया लेकिन इतनी dubli-patli पा कर वो चुहल करने से खुद को रोक हे न सका.
"मुझे छोटा बता रही हो आप लेकिन ये क्या है? इतनी कमर तोह 12-13 साल के बचे की होती है और लगता है आपका वजन 40 भी नहीं होगा.", अर्जुन का यु दोनों तरफ से अपनी कमर को मापना अक्षरा को अंदर से अलग हे ख़ुशी दे रहा था. दुविधा जरूर थी लेकिन फ़िलहाल वो बस खुश थी.
"वो सारा doodh-malaai बबिता दीदी हजम कर जाती थी न, तोह मुझे कुछ मिला हे नहीं. अब कोशिश करुँगी लेकिन बता देती हु के शरीर हल्का है पर कमजोर नहीं. पराठा जल गया, तुम बहार बैठो में मैं खाना लगाती हु.", अक्षरा ने तुरंत अलग होते हुए चूल्हे पर ध्यान दिया. पराठा बच गया था जलने से और अर्जुन भी मुस्कुरा रहा था. इस बीच बबिता भी कमरे में तैयार हो गयी थी. सुर्ख लाल सलवार कमीज पहन कर अपने सीने पर दुपट्टा करती वो पूरा श्रृंगार कर रही थी. बिंदी, काजल, सुर्खी, लाल चूड़ियां और भारी झांझर के साथ साथ बबिता ने आज कानो में झुमके भी पहने थे. वो हमेशा इस सबसे दूर हे रही थी लेकिन आज उसको ये सब पसंद आ रहा था. मांग में सिन्दूर भरते हुए चेहरे पर अलग हे मुस्कान आ गयी थी.
'मांग तोह अब जिसके नाम की भी हो लेकिन मेरा तोह सबकुछ अब तू हे है. खागड कही का, उमाह.' शीशे की तरह अपने लाल होंठो से चुम्मा बनती वो तैयार हो कर बहार आयी तोह अर्जुन के गले में निवाला अटक गया. अक्षरा ने भी आँखों से बताया के वो कितनी सुन्दर लग रही है.
"मुँह बंद कर ले, अब बबिता सिंह ऐसे हे रहा करेंगी. ी ऍम मैरिड एंड ा वुमन नाउ.", बबिता ने जिस अदा से ये कहा और उनके हे बीच कुर्सी पर बैठ कर चाय का कप उठा लिया. अर्जुन ने नजरे सही करते हुए नाश्ते पर ध्यान देना बेहतर समझा.
"सचमुच आप गुलाब सी लग रही हो जीजी. मैंने तोह आज हे देखा के आप ये सब करना भी जानती हो और कितना जाँच रहा है सबकुछ आप पर.", बबिता के लिए प्लेट लगते हुए अक्षरा ने तारीफ की और बबिता ने खाना वापिस डब्बे में रख दिया.
"बेबे, चाय पी सकती हु लेकिन अन्न ग्रहण नहीं करना अभी. मंदिर में धोक लगनी है सासु माँ के साथ जा कर और उसके बाद सीधा अपने पीहर.", बबिता ने ना करने का सही कारण दिया तोह अक्षरा को भी बुरा न लगा. इनकी बातें इस हवेली को हे ले कर होती रही जहा बबिता बहोत कुछ समझा रही थी अक्षरा को और वो भी पूछ रही थी की क्या कुछ और होना बाकी है यहाँ. अर्जुन नाश्ते से फारिग हो कर कार का षीषा साफ़ करने लगा था और बबिता उस सेविका को सब समझने के बाद मुख्या कमरों को टाला लगाती हुई अक्षरा को लिए कार के पास आ गयी.
"आप दोनों इस पिछली सीट पर बैठिये, ड्राइवर आगे रहेगा.", जिस अंदाज से अर्जुन ने सर झुका कर दरवाजा खोला था बबिता ने हँसते हुए उसकी पीठ पर चपत लगा दी.
"बस बस, इतने नाटक नहीं. पता है के अगली सीट पर तू किसी को नहीं बिठायेगा और मुझे भी कदर है तेरी बात की. अगला आधा घंटा तुम पकने वाले हो वैसे.", बबिता का मतलब सभी riti-riwajo से था जो होने वाले थे लेकिन अर्जुन ने कार हवेली से बहार निकलते हुए ना में गर्दन हिला दी.
"मैं आराम करने वाला हु और बस आप न जल्दी फारिग होना, पौने 6 हुए है और हमको समय से पहुंचना होगा.", अर्जुन के निकलते हे वो बड़ा दरवाजा बंद कर लिया गया था. और बबिता की बात सही निकली जो अगले आधे घंटे अर्जुन बस इधर से उधर हे होता रहा. लेकिन उसके बाद भी 15 मिनट और लग गए सितारा देवी के पास. यहाँ से विदा लेते हुए साढ़े 6 बजे अर्जुन ने अपना सफर शुरू किया.
"देखो इस तरफ से जाने की जगह कार लेफ्ट साइड मोड़ लो. ये रास्ता सीधा हमारे गाँव की तरफ निकलेगा और न शहर आएगा बीच में और तुम्हारे 20 किलोमीटर भी बचेंगे.", बबिता ने मुख्या सड़क पर आने से पहले हे अर्जुन को ये अलग रास्ता बताया.
"मतलब यहाँ से हम उलटी दिशा में जा कर भी सही जाएंगे?", शीशे में पीछे देखते हुए अर्जुन ने बबिता के बताये रस्ते पर हे कार घुमा दी. बबिता भी आईने में हे सहमति में गर्दन हिला कर बताने लगी.
"यहाँ से तुम्हारा शहर है 25 किलोमीटर और आगे गाँव भी 30 है लेकिन यहाँ से सीधा हम गाँव के दूसरी तरफ निकलेंगे. समझ लो जैसे त्रिभुज (ट्रायंगल) जैसा कुछ लेकिन बस एंटर हम मंदिर वाली तरफ से करेंगे और ये सड़क बिलकुल खाली रहती है. 35 किलोमीटर के बीच 4 गाँव पड़ते है वो भी अंदर.", बबिता पीछे बैठे हुई भी अर्जुन के पास सरक आयी थी. अर्जुन ने मुस्कुराते हुए गाल चूमा और बबिता भी हंसने लगी.
"खाली रहता है से कुछ और मतलब तोह नहीं है न आपका?"
"मतलब है तभी तोह समझा रही हु लेकिन भविष्य के लिए. आज कुछ नहीं करने वाले और हाँ, यहाँ से तुम्हे बहोत कुछ जान ने को मिलने वाला है.", अर्जुन ने इतना सुन्न कर हाँ में गर्दन हिलाई जैसे इन दोनों के बीच बहुत कुछ ऐसा भी था जो किसी और को नहीं पता था. सवेरे का समय और दूर तक घने वृक्षों के बीच ये खाली सड़क. कार की गति बंद शिशु की वजह से इतनी भी पता नहीं लग रही थी लेकिन 100 पर सुई स्थिर थी.
"आपने कहा था के एक ख़ास गाँव भी पड़ता है आपके कसबे के पास. कही वो इस तरफ हे तोह नहीं?"
"सचमुच समझदार हो तुम. हमारे कसबे से 10 किलोमीटर इधर हे वो गाँव है जहा तुम्हारी तलाश से जुड़ा बहोत कुछ मिल सकता है लेकिन दूसरी ख़ास बात है के तुम कसबे में अभी एक हे तरफ से आये हो और ये रास्ता तुम्हे बाकी का एरिया भी दिखा देगा.", बबिता ने और भी विस्तार से इधर से आने का मकसद बताया और बढ़ते सफर में दोनों के बीच बहोत सी बातें होने लगी. जहा कही सड़क से कोई रास्ता निचे उतरता बबिता अर्जुन को वह के बारे में बताने लगती. आगे एक तरफ बड़े स्कूल की ईमारत देखते हुए अर्जुन ने इस बारे में पुछा तोह बबिता मुस्कुराने लगी.
"लड़कियों का नामी स्कूल है ये, हॉस्टल के साथ साथ aas-pas के अमीर घरो की नखरे वाली भी यही पढ़ती है. तुम्हे इसके बारे में बिलकुल नहीं पता था?"
"फिर तोह आप भी शायद यही पढ़ी हो.", अर्जुन ने हँसते हुए एक और बार इस ाचे खासे बड़े स्कूल पर निगाह मारी. लाल ईमारत, घने वृक्ष और सामने वाली दिवार भी कोई आधा किलोमीटर लम्बी थी. जल्द हे कार आगे निकल गयी.
"नखरे वाली बात पर तुमने ऐसा कहा न? कमीने हो तुम पक्के वाले. हाँ मैं इधर हे आती थी पढ़ने और सच कहु तोह यहाँ की लड़कियां लड़कों को भी मात देती है उन मामलो में. और ये है वो गाँव जिसकी मैं बात कर रही थी. मुन्नी काकी और बिंदिया (बिंदु) से जुड़े कुछ राज तुम्हे यही मिलेंगे और शायद उनके मददगार भी.", अर्जुन ने कार धीमी करते हुए ध्यान दिया तोह सड़क किनारे हे 3-4 एक जैसे रंग की पुराणी सी दुकाने थे और उसके आगे टायर बनाने वाला और एक चाय का खोखा. गाँव शायद उस पतली सड़क पर अंदर की तरफ था. उसके मतलब की भी एक दूकान थी लेकिन फिलहाल वो वापिस सड़क देखता आगे हो लिया. 6-7 मिनट तक दोनों कुछ और भी बातें करते रहे और यहाँ सड़क चौराहा सी हो गयी. बीच में बड़ा हाईवे था.
"देख कर ये हाईवे पार करो, आगे अपने कसबे की हद्द शुरू हो जाती है.", बबिता ने हिदायत दी और अर्जुन ने भी दोनों तरफ देखने के बाद कार उस दिशा में हे बढ़ा दी. इतनी बड़ी हवेली देख कर वो कार को 10 की रफ़्तार पर करते बस उसमे हे खो गया. सदका से निचे उतर कर वो हवेली अंदर की तरफ थी, काम से काम 500 गज अंदर.
"वो महल किसका है? लगता है जैसे aas-pas के सब जमीन उनकी हे है.", बबिता अर्जुन की इस बात पर हंसने लगी.
"तुम अपने चाचा के हे घर कभी नहीं गए क्या? मैं तोह बहोत बार गयी हुई हु और सचमुच ये हवेली एक महल हे है. उमेद चाचा इधर हे रहते है. पहले ये क्सक्सक्सक्स खुर्द गाँव होता था. गाँव से आगे खेत फिर गाँव और उसके आगे हमारा गाँव. अब तीनो मिल कर एक बड़ा क़स्बा बन्न चुके है. ये आगे जो इलाका है वो तुम्हारी मुन्नी काकी का पीहर है, पहले गाँव की ढाणी थी ये.", अर्जुन सब बड़े गौर से देख रहा था. उमेद चाचा के साथ वो इतने सालो से जुड़ा था लेकिन वो कभी उनके घर नहीं आया ये ख्याल उसको बड़ा अजीब लग रहा था. कार आराम से चल रही थी और फिर बबिता ने वो एक मंजिला बड़ा सा घर दिखाया जिसके बहार बड़ा पीपल का वृक्ष लगा था.
"तो हे है मुन्नी काकी का घर?"
"सही समझे तुम, यही है उनका घर और अब यहाँ सिर्फ उनकी माँ लाजवंती जी रहती है. फ़िलहाल तोह वो भी अपने पीहर गयी हुई है किसी करीबी की मौत पर.", बबिता भी अर्जुन के साथ ऐसे हे पहेलियाँ बुझथि रहती थी.
"मतलब वो गाँव जो इधर से 10 किलोमीटर था वही पीहर है उनका? मुन्नी काकी का ननिहाल?"
"मेरा घोडा तोह सचमुच बहुत तेज है. इधर ध्यान से, ये रेलवे की लाइन इतने सालो के बाद भी नहीं सुधरी किसी ने. एक हे ट्रैन आती है इधर लेकिन पूरे गाँव का सत्यानाश कर रखा है इसने.", बबिता के कहने के साथ हे अर्जुन ने बड़ी सावधानी से ये खुला हुआ फाटक पार किया. ये लाइन जैसे ठीक किनारे से आ रही थी अगले गाँव से और इधर वो शायद आगे भी इस गाँव के हे किनारे से बहार जा रही थी.
"ट्रैन एक हे आती है सी पटरी पर? बड़ी अजीब बात है?"
"अरे ट्रैन तोह और भी आती है लेकिन उनका समय या तोह बहुत सवेरे का है या बहुत रात का. दोपहर में 3:30 वाली गाडी एक्सप्रेस है.", बबिता कुछ भी वैसे हे नहीं बोलती थी और अर्जुन समझ तोह गया था के ये बात भी ख़ास हे होगी.
"पता करते है फिर उस टाइम का जी और उस गाडी का भी जो 3:30 पर आती है. देखे हमारी बबिता जी की ये पहेली क्या तस्वीर दिखाएगी."
"जानकारी थोड़े पुराने समय से निकलवाना और हो सके तोह 25-26 साल पहले की. पता तोह मुझे भी सही से नहीं है लेकिन वो गाडी अगर तुमने पकड़ ली न अर्जुन तोह समझ लो कितने हे लोग नंगे मिलने वाले है तुम्हे उसके अंदर.", बबिता के चेहरे पर गुस्सा और दर्द देखते हुए अर्जुन ने कार एक तरफ हे रोक दी.
"आप ठीक हो न? इस चेहरे से घर जाएंगी?"
"चल एक चुम्मी दे फिर.", बबिता ने जल्द हे खुद को दुरुस्त कर लिया था और वही नटखट चेहरा अर्जुन को दिखा तोह उसने बिना हिचकिचाए बबिता को चूम लिया.
"हमेशा ऐसे हे रहना आप. गाडी तोह समझ लो किसी भी हाल में पकड़ कर हे रहूँगा मैं लेकिन आपके चेहरे पर दुख नहीं आना चाहिए. मैं समझ सकता हु के कितने साल आपने दर्द और अपनों से अलग गुजरे है लेकिन अब वैसा कुछ नहीं होगा.", अर्जुन ने गाल को सहलाया और आगे से एक तरफ कार मदद दी जहा बबिता ने बताया. ये सड़क अब दूसरी हवेली की तरफ जा रही थी.
"तोह बबिता के साथ आने का फायदा मिला न पूरा तुम्हे?", हवेली के बड़े गेट के बहार पहुंचते हे बबिता ने मुस्कुराते हुए अर्जुन से पुछा
"वो तोह हमेशा हे मिलता है, फिर चाहे एक पल का मिलना हो या ाचे से पूरी रात तक."
"धत्त, पागल कही के. अब आ जाओ छोटे भाई के किरदार में, आशिक़ करो दफा थोड़ी देर.", कार का हॉर्न सुनते हे छोटे किवाड़ से मधुलता ने हे झाँक कर देखा था और इस चमचमाती काली को वो भी पहचान गयी थी, बेशक आज ाची धुल जमा हो गयी थी इसके ऊपर. बड़ा दरवाजा खोला हवेली के सेवक ने और अर्जुन ने भी आराम से कार में आँगन में वृक्ष के निचे कड़ी करते हुए बबिता की तरफ का दरवाजा खोला.
"वाह, मेरी लाड़ली तोह रानी की तरह आ रही है. जग जग जियो बीटा, तुझे परेशानी उठानी पड़ी लेकिन इसमें मैं कुछ कर भी नहीं सकती. सुशीला का अब दूसरा बीटा तोह तू हे है.", चंद्रो देवी दोनों से गले लग कर मिली थी और फिर अर्जुन ने मधुलता के भी पाँव छुए और कार से बबिता का सामान निकल कर आँगन की तरफ आ गया. बिजेन्दर ने सामान लेते हुए अर्जुन को एक तरफ से अपने साथ लगा लिया.
"तुम तोह बड़े तेज हो यार. थोड़ी हे देर पहले तोह फ़ोन किया था मैंने हवेली पर और पता लगा के तुम एक मिनट पहले हे निकले हो."
"भैया वो बबिता दीदी ने हे कहा के जल्दी पहुंचना है.", अर्जुन ने ये बात हंस कर कही लेकिन दूसरे रस्ते वाली बात छुपा कर. गुड्डी काकी पानी ले कर आयी तोह अर्जुन ने उनके भी चरण स्पर्श किये.
"जीते रहो और सदा खुश रहो.", गुड्डी काकी तोह ज्यादा बोलती भी नहीं थी लेकिन अर्जुन उन्हें भी ाचा लगा था. ऋचा के साथ सुशीला सिंह इधर चली आयी तोह सबसे ज्यादा जोश से वही अर्जुन से मिली थी. कास कर गले लगाने के बाद उन्होंने उसका माथा चूम लिया.
"मेरा लायक बचा. आ बैठ मेरे पास, सवेरे सवेरे हे इतनी भागदौड़ करनी पड़ गयी.", बराबर हे राखी कुर्सी पर अर्जुन को उन्होंने बैठा लिया और दुलार करने लगी.
"बस बीटा है दिखे है माँ तन्ने तोह. या छोरी न नजर आयी जो इतनी सवेरे तेरे से हे मिलान आयी है?", बबिता ने नौटंकी से कहा था लेकिन उसको गले लगाया चंद्रो देवी ने.
"कर लेने दे लाड, फेर तोह तू हे है उसके पास. और मेरी लाड़ली तोह एक हे दिन में कितनी बदल गयी, ाचे से जी भर के देखने तोह दे. सुशीला भी इतनी सुन्दर न थी जब वो हवेली आयी थी ब्याह के. बहार न निकलियो तू घर से, कह देती हु.", चंद्रो देवी कही से भी गलत न थी. लाल सलवार कमीज और श्रृंगार के साथ साथ उस असाधारण शरीर पर अर्जुन के प्यार ने कही ज्यादा हे निखार ला दिया था.
"सच कह रही हो माँ आप. लगता हे नहीं ये मेरी वही बबिता है, क्यों बिजेन्दर तूने भी तोह अपनी बहिन को इतने साल देखा. कही से भी ये वैसी दिख रही है?", सुशीला भी निहार रही थी बबिता को, अर्जुन को अपने साथ लगाए हुए. बिजेन्दर कुछ झेंप सा गया था लेकिन माहौल को ठीक करने के मकसद से जो बात कही वो सुन्न कर एक बारी तोह मुन्नी और गुड्डी काकी ने मुँह पर हाथ रख लिया लेकिन बाकी सभी की हंसी छूट गयी.
"मैंने तोह लगया माँ के अर्जुन अपनी दुल्हन लेके आया है यहाँ. वो तोह आवाज सुन्न के पता चला के बबिता दीदी है. सचमुच पूरी कायाकल्प हो गयी और पहले से भी ज्यादा सुन्दर."
"हाहाहा.. देख ले अर्जुन, बिजेन्दर तेरी हे टांग खींच रहा है. वैसे ऋचा ने आज खीर बनाई है स्पेशल अर्जुन के लिए.", चंद्रो देवी ने भी अपनी जगह बैठ कर ये बताया तोह अर्जुन को ध्यान आया के वो तोह ऋचा से मिला हे नहीं. खड़े हो कर नजर पीछे की तोह ऋचा मुस्कुरा रही थी लेकिन एक पल को उसकी भी सांस अटक गयी जब अर्जुन ने ऐसे उसको गले लगा लिया.
"सॉरी दीदी, आप तोह दिखी हे नहीं मुझे. कैसी है आप?", मधुलता भी ये देख रही थी की उसकी बेटी के गाल एक बार लाल कैसे हुए थे और अर्जुन कितने अपनेपन से मिल रहा था ऋचा से.
"मैं ाची हु और अब दीदी की शादी हो गयी है तोह वही अकेलापन हो जायेगा इनके वापिस जाते हे. वैसे एक प्यारी भाभी भी मिल गयी है. तुम बैठो मैं खीर लेके आयी."
"नहीं, आप भी कुछ देर यही बैठिये फिर खीर टिफिन में दाल के दे देना. मैं फ्रिज में रखने के बाद आराम से खाऊंगा घर जा कर.", ऋचा ये सुन्न कर अपनी दादी की बगल में हे बैठ गयी.
"तू अकेला नहीं जा रहा वापिस, तेरे dada-daadi इधर हे आ रहे है अभी. उनको लेके जाना है बीटा तुम्हे, इतने ठंडी लस्सी पी ले.", सुशीला ने अर्जुन को ये बताया और इधर बबिता अनुपमा से मिलने कमरे में चली गयी.
"बुआ, लस्सी नहीं हाँ अगर पिलाना है तोह ठंडा निम्बू पानी पीला दो.", अर्जुन की मांग सुन्न कर अलग हे मुस्कान आ गयी थी चंद्रो देवी और सुशीला के चेहरे पर.
"मैं बना कर लाती हु भाई तेरे लिए, पुदीना दाल कर शिकंजवी.", ऋचा झट्ट उठ कड़ी हुई और रसोई की और चल दी. चंद्रो देवी ने इशारे से लता को भी अपने हे बराबर बैठने को कहा तोह वो सकुचाती हुई निचे बैठने लगी.
"बराबर में आजा मुन्नी, मैं कितनी बार कहु के मुखिया तेरा भतीजा है अब और वैसे भी तू घर की मालकिन की माँ है. आज से तू और गुड्डी सिर्फ चूल्हा देखोगी और साड़ी सफाई काम बनने और उसकी घरवाली देखेंगे. बाकी बिजेन्दर जिनकी जहा ड्यूटी लगाए वह वो लोग करेंगे. तुम लोग कपडे भी नहीं धोने वाली अब से.", चंद्रो देवी की इस बात पर अर्जुन को भी उतनी हे ख़ुशी हुई जितनी बाकी सबको. उमेद भी कार ले कर अंदर आ गया था जहा उसके साथ विन्नी, कौशल्या जी और रामेश्वर जी भी थे. सेवक ने वही एक बड़ी चारपाई लगाने के बाद एक टेबल बीच में रख दी थी. अर्जुन बस मुस्कुरा कर वही बैठा रहा किसी के पास न जा कर.
"लगता है भाभी और सुशीला ने अर्जुन बाँध हे लिया है.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर सुशीला भी हंसने लगी. अब अर्जुन सबसे गले लगा और आखिर में विनीता से कुछ ज्यादा हे ाचे से.
"हाँ हमने हे बाँध लिया तेरा अर्जुन रामेश्वर. उल्टा इसने हे सारे बांध दिए, देख ले तेरे सामने हे है."
"ये तोह सही कहा भाभी आपने, कितने हे समय बाद मैं सबको ऐसे बैठा देख रहा हु. वैसे ये क्या लेके आयी है मेरी बची?", रामेश्वर जी ने ऋचा को वो एक लीटर का लौटा टेबल पर रखते देखा, जिसके बहार बर्फ की वजह से पानी आ गया था. और अर्जुन ने फुर्ती से गिलास के साथ लौटा उठा लिया कुछ भी होने से पहले.
"ये दीदी ने मेरे लिए शिकंजवी बनाई है, दादा जी आप तोह चाय पीते हो और सभी ने खाना खा रखा है तोह ये मेरी है.", ये सुन्न कर अब उमेद सिंह की भी हंसी निकल गयी थी बाकी सभी बड़ो के साथ साथ.
"कर बीटा मौज तू दिल खोल कर. फिर तेरे ऐसी रस्सी बांधूंगी न सारे स्वाद भूल जायेगा.", कौशल्या जी ने मजाक अर्जुन का कान खींचा था लेकिन चंद्रो देवी ने ना में सर हिलाया. यहाँ ये बड़े आपस में बात करने लगे और अर्जुन ने एक गिलास विन्नी को देने के बाद टेबल से दूसरा गिलास बिजेन्दर को थमा दिया. ऋचा कड़ी देख रही थी लेकिन उसको भी अर्जुन ने निराश नहीं किया
"तुम्हारे पास तोह बची नहीं होगी.", ऋचा ने गिलास अर्जुन की तरफ हे रखा तोह उसने लौटा दिखा दिया.
"कांच के 4 गिलास बनते है दीदी इसमें, हमारे वह भी ऐसा लौटा है जिसमे दादा जी पानी पीते है. वैसे सचमुच ाची बनाई है आपने. थकान हे दूर कर दी."
"हाँ ये बात खरी कही अर्जुन ने लेकिन अब ऋचा ये म्हणत रोज करनी पड़ेगी बहिन तुझे. खेत जाऊंगा तोह एक बोतल यही लेके जाया करूँगा साथ अपने.", बिजेन्दर भी दिल से सरल और बड़ा साफ़ व्यक्ति था. इन चारो में अलग हे बातें हो रही थी और 8 बजने हे वाले थे तोह रामेश्वर जी ने इजाजत मांगी.
"अब नहीं रोक सकती क्योंकि मुझे पता है के तुम्हारे बहोत से काम रुक चुके होंगे. समय मिले तोह चक्कर लगते रहना रामेश्वर और कौशल्या अब तोह तुम ये भी नहीं कह सकती के कोई लेके आने वाला नहीं है.", चंद्रो देवी ने कौशल्या जी को गले से लगाया और उमेद को भी. ऋचा अर्जुन को बता रही थी की उसको दीदी ने अंदर बुलाया है. अर्जुन भी बताई जगह चल दिया जहा अगले कमरे से बबिता हे उसका हाथ पकड़ कर एक तरफ ले गयी. एक बार अपने सीने से कास कर लगाने के बाद खुद हे अर्जुन के होंठो को चूम लिया.
"ये यहाँ का नंबर है और निचे वाला मेरी हवेली का. 3 दिन मैं इधर हे हु, मिलने का दिल हो तोह आ जाना और बाकी हम बात कर हे सकते है.", अर्जुन ने भी हामी भरी. दोनों हे अलग हो गए थे क्योंकि अर्जुन को डर था के कोई भी देख सकता है. वो बहार आ गया तोह पिछले दरवाजे से ऋचा बबिता के पास पहुंच गयी.
"वह दीदी, कमाल हे हो आप तोह. इतनी हिम्मत कैसे है आप में?"
"प्यार में बस दिल लगाना होता है ऋचा, ऐसी हिम्मत तोह फिर कुछ भी नहीं जब लोग मरने से हे न डरे. प्यार हो चूका है मुझे इस से लेकिन अब इजहार करना जरुरी नहीं है क्योंकि सम्बन्ध तोह बन्न हे चूका है. इसमें हांसिल क्या और खोना क्या. जितना मिले खुश रहो और बाकी बात बाद में करेंगे. चल दादा से भी मिल लेते है और विनीता को यही रुकवा ले आज.", बबिता भी बहार हे आ गयी जहा सभी जाने लगे थे.
"चाचा, विन्नी को यही छोड़ दो आज. रात को लेके जाना हो तोह ले जाना नहीं तोह सवेरे बिजेन्दर हे छोड़ देगा.", बबिता को देख कर कौशल्या जी खुद चल कर उस तक आयी. गले से लगा कर उन्होंने ढेरो आशीर्वाद दिए बबिता को और उमेद को भी बोल दिया के आज विन्नी यही रुक जाएगी जो खुद भी तैयार थी. अर्जुन अपने दादा दादी को ले कर निकल चला और उमेद चाय पीते हुए कुछ अलग हे khet-khalihaan की बातें कर रहा था अपनी ताई से.
.
.
घर पहुंचते हे अर्जुन ने अपनी दादी के लिए दरवाजा खोला और उनके साथ हे अंदर चला आया. बहुत दिनों के बाद उसको हलकी थकान हो रही थी लेकिन मैं शांत था. प्रियंका दीदी तीनो के लिए पानी ले आयी और संजीव भैया भी इधर आ गए थे दादा जी के कमरे में.
"मैं तोह चला दादी सोने और आप जो भी काम हो 12 बजे के बाद हे करवाना.", अर्जुन की हालत वो भी समझ सकती थी क्योंकि कल शादी में भी उसने काम करवाया था और फिर गाँव जाना और आज इतना सफर तये करना थकने वाला हे काम था.
"हाँ, तू आराम कर ले और तुझे कोई परेशां नहीं करेगा. शाम को दिल करे तोह स्टेडियम चले जाना नहीं तोह जो ठीक लगे वो करना. दोपहर के खाने पर आज संजीव के ससुराल से लोग आने वाले है. ठीक लगे तोह मिल लेना नहीं तोह सोया रहियो.", कौशल्या जी ने तोह आजादी दे दी थी लेकिन पंडित जी इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते थे.
"हाँ 3 घंटे आराम कर ले लेकिन उसके बाद अपने भाई के साथ मार्किट चले जाना क्योंकि मेहमान आएंगे तोह काम करना हे पड़ेगा. स्टेडियम न जाना हो तोह अपनी माँ और बहनो के साथ करीबी लोगो को निमंत्रण पत्र देने के काम निबटा देना. परसो के बाद तोह तुम हिलने नहीं वाले अपने चची माँ के पास से.", अर्जुन इस बात को सुन्न कर प्रसन्न हो गया था.
"हाँ दादा जी, कुछ लोगो को तोह इनविटेशन देने जाना है मुझे और माँ को भी साथ ले हे जाऊंगा. फिर सचमुच मेरा दिल नहीं करने वाला कही जाने का."
"तेरे दिल को मैं समझा दूंगी जो स्टेडियम से छुट्टी की तोह कल से. दूसरे घर में भी बिस्टेर लगने है और ब्याह के घर में ढेरो काम पड़े है जो तू कर या न कर लेकिन तेरा रूटीन खराब हुआ तोह फिर तेरे दादा और तेरा सामान बगीचे में मिलेगा. जा कर थकान उतार अपनी और फिर ठीक 12 बजे यही आ जाना.", अर्जुन लाचारी से अपने दादा को देखने लगा जो खुद भी खामोश थे.
"हाँ अब यही तोह करना है मुझे.", अर्जुन निकलने हे लगा था के फिर से आवाज आयी दादी की.
"चाबी ऋतू के हवाले कर दियो कार की और अगर संजीव ने तुझे कार दी तोह मैं इसको भी तुम दादा पौटे के साथ बहार करुँगी. आप मुस्कुराओ जी, ये 100 पे कार चला के लेके आया है लेकिन कोई कुछ नहीं कहेगा."
"मैडम वो सड़क के हिसाब से तोह चला रहा था, तुम्हारा चाँद 150 पे भगाये तोह शाबाशी देती हो. तू जा बीटा अर्जुन, ये मोहतरमा आज इधर आना नहीं चाहती थी इसलिए भड़क रही है. संजीव बीटा तुम एक बार मल्होत्रा जी के घर चले जाओ, उनसे कहना के फाइल मंगवा ले मैं शाम को मिलने आऊंगा.", रामेश्वर जी ने जूते खोलते हुए सब बताया और उधर अर्जुन अपनी ताई जी और माँ से मिल कर ऊपर ऋतू दीदी के कमरे में चला गया जहा इस वक़्त वो अकेली थी.
"ये रखो चाबी और जगह दो.", अर्जुन ने कुरता उछाल कर एक तरफ रेणका और धम्म से किताब पढ़ती ऋतू की बगल में जा पसरा. चाबी ऋतू के सीने पर रखते हुए अर्जुन ने कस कर उसको भी साथ हे लगा लिया.
"ओह hello, कमरा खुला है और तुम din-dahade मस्ती में लगे हो.", चाबी एक तरफ रखती वो तुरंत कड़ी होती हुई दरवाजा बंद करने लगी. फिर एक नजर औंधे लेते अर्जुन पर डालने के बाद चिटकनी लगा कर खुद हे उसकी ब्याह के नीच आ लेती.
"आमने सामने मुँह करके सोते है न. मैं भी सारा काम करके अभी हे आयी थी ऊपर.", अर्जुन उनकी बात सुन्न कर खुश हो गया. अब दोनों हे एक दूसरे के साथ चिपक गए थे. 2-3 प्यार भरे चुम्बन करने के बाद अर्जुन तुरंत हे सो गया जिस से ऋतू समझ गयी थी की वो सचमुच सोने हे आया था. अकेले सोने का दिल नहीं होगा शायद.
"ी लव यू. चल अब दिन में हे सपने देखते है.", ऋतू ने भी अर्जुन की कमर पर हाथ रखते हुए आँखें बंद कर ली.
.
.
दत्त का परिवार का एक परिचय
सोमनाथ दत्त (55)राधिका के ताऊजी /Vidhayak-Karbori
मिनाक्षी दत्त (50) राधिका के ताईजी /कारोबारी महिला
मोहित दत्त (30) beta/karobar में maa-baap के साथ
विद्या दत्त (29) बहु
निकिता दत्त (27) beti/Naami 5 सितारा होटल की मालकिन
सुभाष चन्दर दत्त (51) राधिका के Pita/Prakhyat दवा कारोबारी
देविका दत्त (47) राधिका की Maa/Karobari महिला
राधिका दत्त (26) beti/Police अधिकारी
अखिल दत्त (24) बीटा/ मनमौजी
बाकी सदस्य समय आने पर सामने आएंगे.
.
.
दोपहर 12 बजे तक पूरे घर को दोनों कामवालियों के साथ रेखा जी और ललिता जी ने चमकवा दिया था और रसोई में कोमल और प्रियंका के साथ रुपाली भी जुट गयी थी. सम्बन्धी खाने पर आ रहे थे तोह हर चीज का उचित ध्यान रखा जा रहा था. कौशल्या जी ने इधर आते हे आँगन में बैठी आरती से अर्जुन को उठाने को कहा और वो भी रसोई में काम देखने लगी. आरती सब तरफ अर्जुन को देखने के बाद कुछ सोच कर ऊपर वाली मंजिल पर पिछले हिस्से में आ गयी. ऋतू का दरवाजा बंद देख दूसरी तरफ से तारा और अपने कमरे में दाखिल होती वो बीच का दरवाजा खोल कर अंदर आयी तोह मुस्कुराने लगी.
ऋतू को यु अर्जुन से लिपटे हुए सोया देख आरती को भी ाचा लग रहा था. दोनों के हे चेहरे एक दूसरे की तरफ थे और ऋतू का एक पाँव अर्जुन के ऊपर. कुछ भी गलत नहीं था वह. पूरे कपडे और सिर्फ आलिंगन में सोये वो प्रेमी कहो या bhai-behan.
"ऋतू, इसको उठा कर निचे भेज दे. दादी बुला रही है के सवा 12 हो गए है. संजीव भैया के ससुराल से लोग 1 बजे आ जायेंगे.", अर्जुन का ख्याल रखते हुए आरती ने सिर्फ ऋतू को हे हिलाया था जो मुस्कुराती हे आँखे खोल कर आरती को देखने लगी.
"चल मैं आयी इसको ले कर.", आरती भी बिना कुछ कहे चली गयी और ऋतू ने अपने नरम होंठो को अर्जुन के होंठो पर रखते हुए ाचे से चूम लिया.
"उठ जा ारु, दादी बुला रही है. रात को साथ सो जायेंगे अगर तेरा इतना हे दिल है तोह.", ऋतू जगाने लगी और अर्जुन ने आराम से उसको अपने साथ कस लिया.
"एक रात सोने से क्या होगा ऋतू, हर रात सोना है मुझे ऐसे हे. पता है मैं सपना देख रहा था."
"शहहह.. बताना मैट अगर वो हम दोनों का था और ाचा भी."
"उम्माह.. पूरा हे करूँगा अब तोह. वैसे आपकी खुशबु सबसे अलग और ख़ास है, मीठी मीठी सी.", अर्जुन ने भी बदले में एक किश करने के बाद खड़े हो कर खुद को व्यवस्थित किया और बाथरूम में चला गया. ऋतू ने तकिये के निचे से अपनी सफ़ेद ब्रा निकल कर पहनी और बालो में रबर लगाने के बाद दरवाजा खोल कर निचे चली गयी. अर्जुन 5 मिनट बाद अपनी दादी के सामने था.
"हो गयी नींद पूरी या और सोना है अभी? ये सामान ले आ जल्दी से, तेरी भाभी का शगुन का है. इधर उधर न चला जईओ, सामान ले कर सीधा वापिस घर."
"हाँ दादी सीधा यही आऊंगा वापिस. वैसे भाभी भी आएँगी क्या?", अर्जुन ने लिस्ट और पैसे लेते हुए पुछा तोह कौशल्या जी ने सर पे हाथ रख लिया.
"बैलबुद्धि है तू भी. अब होने वाली बहु कही खुद आती है क्या शादी का कार्ड देने अपनी ससुराल? चल जल्दी जा और जल्दी वापिस आना. मॉडल टाउन से मिल जायेगा ये सब तुझे.", अर्जुन हँसता हुआ अपनी रानी ले कर निकल चला सामान लाने और कौशल्या जी भी मुस्कुराने लगी. ऋतू के साथ आरती अब बैठक को व्यवस्थित कर रही थी. साफ़ चादर, सोफे के नए कवर और छोटे तकिये रखने के साथ साथ कालीन भी टेबल के निचे बिछा दिया गया था. वही रसोई में भी अब जिम्मेदारी रेखा जी ने संभल ली थी कोमल के साथ. ललिता जी खाने की मेज पर आरती के साथ काम करवाने के बाद कपडे बदलने के लिए अपने कमरे में चली गयी. आज राजकुमार जी भी ाचे से तैयार हो कर घर पे हे थे और संजीव भी shave-cutting करवा कर अब उजले कपडे पहने बार बार घडी देख रहा था.
"आज कुछ ख़ास है क्या?", शंकर जी जैसे हे हॉस्पिटल से वापिस आये तोह उनकी कार की चाबी ले कर संजीव बहार चल दिया और 2 मिनट में हे वापिस आ गया.
"अबे तू मेरी कार कहा कड़ी कर आया और यहाँ सिर्फ ये अर्जुन की दोनों कार हे कड़ी है?"
"वो राधिका के mummy-papa आ रहे है चाचा जी.", संजीव ने झेंपते हुए कहा तोह शंकर जी हंसने लगे.
"साले तू अभी से हमको बहार निकाल रहा है, बीवी आ गयी तोह पता नहीं के शहर में रहने भी देगा या नहीं. चल तेरे लिए तोह जान भी हाजिर है. वैसे ये दोनों कार अंदर क्यों कड़ी है?", शंकर जी तोह पेशे की वजह से हमेशा तैयार हे दीखते थे. संजीव के कंधे पर हाथ रखे वो छाया में आये तोह रुपाली उनके लिए पानी ले आयी.
"हटा तोह वो भी रहा था लेकिन दादी ने कहा के अर्जुन की हर चीज यही रहेगी. Scooter-cycle तक न हिलने दिया आप हे देखलो.", संजीव की बात पर शंकर जी मुस्कुराते हुए मजे लेने लगे.
"देखियो कही कल को कह दे के तू और कोई ले आ, राधिका अर्जुन को पसंद है."
"क्या चाचा जी आप भी. पसंद आएगी तोह ले लेगा वो, मैं नहीं रोकने वाला उसको. वैसे मुझे भी ये आज हे पता चला के वो लोग आ रहे है. दादा जी ने हे बोलै था के आँगन खाली रखना."
"मुझे भी तोह 10 मिनट पहले बुलाया है माँ ने. ले आ गए तेरे रिश्तेदार.", शंकर जी आँगन में खड़े हुए बहार हे देख रहे थे और 2 लम्बी कार इनके घर के सामने आ रुकी. शीशे भी काले थे और ये देखते हे चाचा भतीजा गेट की तरफ चल दिए. ड्राइवर को अगली गाडी अंदर लगाने का कहते हुए शंकर जी भी साथ वापिस गए और संजीव ने दूसरी वाली को बहार छाया में हे लगवा दिया. 2 कार में 5 लोग आये थे, ड्राइवर छोड़ कर.
"कैसे हो शंकर भाई?", अंदर वाली कार में सुभाष जी के साथ देविका जी पहले शंकर जी से हे मिले. ये दंपत्ति हमेशा की तरह शालीन और रौबदार थे. शंकर जी भी दोनों से बड़े प्रेम से मिल कर बाकी लोगो का इन्तजार करने लगे तोह ये 24 वर्षीया gol-matol सा गोरा लड़का इनकी कार से निकला और शंकर जी ने इसके साथ भी हाथ मिलाया.
"और भाई अखिल, कैसे हो यार? लगता है mummy-papa ने ज्यादा हे सख्ती दिखा दी तुम पर."
"अले अंकल पूछो हे मैट. कोल्डड्रिंक पीये एक हफ्ता हो गया है और गेम तोह इस महीने खेलने को भी नहीं मिली. कुछ समझाओ न इन्हे, जब मैंने काम नहीं करना तोह क्यों नहीं पीछा छोड़ देते.", ये इनका लाडला बीटा था अखिल, जो शंकर जी के साथ ाचे से पेश आता था. पिछली बार घर पर नहीं था तोह मिलना नहीं हो पाया.
"इसके साथ तोह इतनी ज्यादती मत किया कीजिये देविका जी. एक हे तोह प्यारा बचा है और टाइम आने पर देख लेना खुद सब संभल लेगा. चलो भाई तुम्हे आज कोल्डड्रिंक हे पिलाते है सबसे पहले.", शंकर जी उसको अपने साथ हे बैठक में ले आये और राजकुमार जी के साथ साथ पंडित जी भी इनसे मुलाकात करते हुए बैठक में आ गए. यहाँ भी अब ठंडक थी वातानुकूलन की वजह से. ऋतू हे ट्रे में paani-cola लेकर आयी थी और आते हे देविका जी ने उसको अपने साथ हे बैठा लिया था. वही बहार वाली कार से 2 युवतिया कुछ समय के बाद निकली. शायद खुद को सुधर रही थी इतनी देर तक. संजीव को देखते हे इस आधुनिक युवती ने गर्मजोशी से हाथ मिलाया
"कैसे हो संजीव? सॉरी यार वेट करवाने के लिए. ये है विद्या भाभी, मोहित भैया की वाइफ. भाभी ये है जीजा जी या जीजू फॉर शार्ट, संजीव शर्मा.", ये रेशमी साड़ी में खिलती गुलाब सी महिला भी रौबीली थी खूबसूरत होने के साथ साथ. लेकिन जिसने संजीव से हाथ मिलाया था वो कुछ ज्यादा हे ख़ास थी. गुलाबी रंगत, छरहरी काया पर हलकी भूर चुस्त जीन्स और एक सफ़ेद कमीज, आधी आस्तीन की. भूरे खुले बाल जो करने से सेट थे, पीठ तक लम्बाई लिए.
"मैं ाचा हु निक्की. नमस्ते भाभी. चलिए सभी आप लोगो का हे इन्तजार कर रहे थे.", संजीव भैया इन्हे ले कर अंदर चले और बाकी सबसे भी परिचय करवाया. सभी ठंडा पीते हुए औपचारिक बातें हे कर रहे थे और निमंत्रण सुभाष जी ने पूरे मान के साथ रामेश्वर जी को सौंप दिया था.
"देविका बीटा, तुम और बहु घर भी देख लो और ऋतू तुम्हे अपनी माँ और ताई जी से भी मिलवा देगी.", कौशल्या जी को निक्की के बारे में कुछ ज्यादा पता नहीं था तोह इतना हे कहा लेकिन निकिता भी साथ कड़ी हो गयी.
"दादी जी, मेरा नाम निकिता है और मैं आपकी बहु की बड़ी बहिन हु. ताऊजी की बेटी और आप न टेंशन हे न लो, मैं अपने आप घर भी देख लुंगी और खुद परिचय दे दूंगी.", कौशल्या जी को भी ऐसे हे बिंदास लोग पसंद आते थे और उन्होंने निक्की के सर पर हाथ फेरते हुए जो दिल करे वो करने का कह दिया.
"ये बड़े भाई साहब की बेटी है और सबसे ज्यादा व्यस्त किसी का जीवन है तोह वो निकिता का हे है माता जी. भाई साहब ने होटल लिया था और वो संभल नहीं प् रहे थे अपने बाकी कारोबार के साथ साथ राजनीती की वजह से. निक्की ने पढाई भी होटल प्रबंधन में की है और 3 साल से यही उसको चला रही, उम्मीद से भी बहोत बेहतर तरीके से. 3 साल में शायद 10 हे छुट्टियां ली हो इस लड़की ने अपने काम से. बचो के साथ बचा होना भी जरुरी है अगर हालत ऐसे हो तब."
"सुभाष, वो इस घर में है तोह मेरी बची हे है बीटा. निश्चिन्त रहो यहाँ तुम्हारी बेटी हमारी बेटी है, बहु तोह वो शायद 30 साल बाद हे बने.", कौशल्या जी के ऐसे कहने पर माहौल खुशनुमा हो गया था.
"शंकर भाई सही कहते है आपके बारे में. देविका ने भी बताया था लेकिन उस दिन के लिए शमा चाहता हु के घर नहीं आ पाया था."
"कोई न बीटा, काम से ऊपर तोह कुछ है हे नहीं. ये 35 साल में 5 महीने हे घर आये होंगे, जबकि साल में 60 अवकाश होते है पुलिस के. परिवार ऐसे हे चलता है और इसमें कुछ गलत नहीं.", कौशल्या जी की बात सुभाष जी को भी उचित लगी और इधर देविका जी अंदर सबसे मिल कर बड़ी खुश हुई थी. इतना मेलजोल और भरा भरा परिवार किसको पसंद ना आये. ललिता जी ने भी उन्हें रेखा के हे कमरे में बैठा लिया था और फिर उनके पास हे रेखा को छोड़ जल्दी आने का कह करो वो चली गयी.
"तुम शंकर भाई की बीवी हो? मतलब सचमुच तुम उनकी वाइफ हो और वो बहार जो तुम्हारे जैसी लड़की थी वो तुम्हारी बेटी है? और ऋतू भी तुम्हारी हे बेटी है?", देविका को ऐसे हैरान देख कर रेखा जी ने बस हाँ में सर हिला दिया.
"हाउ ओल्ड अरे यू? It's ुंबलीवबले."
"बिलीव में, ी ऍम मदर ऑफ़ फोर एंड ी गेस वे बोथ अरे अप्प्रोक्सिमाटेली शामे. यू अरे मोरे वेल मैनटैनेड थान एनीवन विथ ा डॉटर थिस ओल्ड.", यहाँ देविका जी के लिए भी अलग हे झटका था. एक घरेलु खूबसूरत महिला के साथ साथ रेखा जी उतना हे ाचा बोल लेती थी जितना कोई भी ाची शिक्षा लिए व्यक्ति.
"क्या बात है यार. मैं तोह खुद को फिट रखने के लिए जाने क्या क्या उपाए करती फिरती हु चाहे इस चक्कर में कमजोरी हे न आ जाये लेकिन तुम बहोत खूबसूरत हो और फिट भी. मेरा नाम देविका दत्त है, आपकी सम्बन्धी.", उन्होंने हाथ मिलते हुए कहा तोह रेखा जी ने भी उतने हे अपनेपन से स्वागत किया.
"रेखा शर्मा. सॉरी, आप बैठिये मैं कुछ ले कर आती हु आपके लिए.", अभी वो इतना हे कह रही थी की कोमल एक ट्रे में शरबत, काजू नमकीन ले कर आ गयी. देविका जी तोह कोमल से भी बहोत प्रभावित हो रही थी.
"यार सच कहु तोह मुझे अब लगता है के गेन्स बहोत ख़ास है तुम्हारे रेखा. She's रियली ब्यूटीफुल. बीटा तुम क्या करती हो?"
"आंटी अभी ग्रेजुएशन कम्पलीट किया है और ब में एडमिशन लिया है. थैंक यू सो मच.", कोमल इतना कह कर बहार चली गयी थी और ललिता जी इधर इनके साथ शामिल हो गयी. विद्या को भी माधुरी, प्रियंका में बोलने वाले लोग मिल गए थे और रसोई ऋतू रुपाली ने संभल ली थी. अर्जुन घर में आया तोह आरती को बहार से सब सामान दादी को पकड़ने का बोल कर ऊपर दौड़ गया कपडे बदलने.
"ये है संजीव भैया का कमरा, पहले ये हॉस्टल रूम जैसा हे था दीदी. वेइट्स, बुक्स और जाने क्या क्या कबाड़ रहता था लेकिन देखो अब तोह table-chair, मैनटैनेड बीएड, कर्टेंस और एक भी.", ऋतू निकिता को घर दिखा रही थी. यहाँ आने से पहले निक्की ने इन लड़कियों के कमरे, गयम भी देखि थी जो उसको बेहद पसंद आयी थी. वो खुद भी एक आधुनिक के साथ साथ शरीर का ध्यान रखने वाली एक मॉडल सी लड़की थी और ऋतू को साधारण चप्पल में भी अपने से एक इंच ऊँचा और इतना सुन्दर देख प्रभावित थी.
"यार तुम सही हो. साथ मिल कर रहते हो, सभी की प्राइवेसी भी है और जरुरत की हर चीज अपनी जगह पर. यहाँ तोह एक आदमी के पीछे 2 नौकर न हो तोह ऐसा लगता है गलत घर में आ गए. आदत थोड़ी बदलनी पड़ेगी मुझे. वैसे ये भी कमरा है या बस बहार निकलने का दरवाजा.?", ये कमरा अर्जुन का था जिसके बहार दोनों कड़ी थी.
"इधर जो रहता है उसका कोई अत पता नहीं होता. देखते है के ये खाली है या जनाब घर पे है.", ऋतू ने दरवाजा ठेला तोह वो पूरा हे खुल गया. सामने अर्जुन ने जीन्स के ऊपर अभी वो चुस्त नीली टीशर्ट फसाई हे थी और उसके तगड़े शरीर और छुपे चेहरे को निक्की उत्सुकता से देखने लगी लेकिन जल्द हे चेहरे भी सामने आ गया और वो पेट भी छुप गया जहा बड़े बड़े कटाव बने हुए थे. अब अर्जुन हैरान था के ये क्या हो गया है.
"सॉरी, ये भाभी की कजिन सिस्टर है निकिता है. मुझे नहीं पता था के तुम अंदर हे हो.", ऋतू ने हँसते हुए कहा और अर्जुन के परेशां चेहरे को देखने लगी.
"नीस तो मीट यू.", अर्जुन ने इतना हे कहा और बहार वाले रस्ते से हे निचे चला गया.
"बड़ा शर्मीला पहलवान है. संजीव से छोटा लग रहा है चेहरे से तोह लेकिन ये है कौन?", निक्की भी हंस रही थी.
"मेरी माँ का मुन्ना है ये दीदी. ारु. और ये शर्मीला तोह नहीं है बस टाइमिंग थोड़ी गलत हो गयी हमारी. वैसे ये इसका हे कमरा अगर इसने सोना हो तोह. बाकी ये कही भी पाया जा सकता है इस घर में. ख़ास तौर पर संजीव भैया यहाँ हो तोह उनके हे साथ.", ऋतू के साथ साथ सभी बहनो को हिदायत दी थी संजीव भैया ने की वो लोग अर्जुन का पूरा नाम न हे ले. लेकिन ऐसा बड़ो के साथ तोह मुमकिन हे न था. अर्जुन बैठक के अंदर आया तोह संजीव भैया कुछ कहते उस से पहले रामेश्वर जी ने हे परिचय करवा दिया.
"ये है जी मेरा छोटा पौता और शंकर का बीटा अर्जुन. अर्जुन ये है तुम्हारे अंकल और संजीव भैया के father-inlaw.", इस वक़्त सुभाष जी की आँखों में जो चमक अर्जुन को देख कर आयी थी उसका मतलब तोह किसी को भी नहीं पता चला लेकिन शंकर जी के साथ राजकुमार जी भी खुस हुए थे अर्जुन के आने और यु सुभाष जी को पूरी इज्जत के साथ अर्जुन द्वारा मिलने पर.
"चरण स्पर्श अंकल जी. शमा चाहता हु घर के हे काम से थोड़ा बहार था तोह आते हे नहीं मिल पाया आपसे.", अर्जुन के ऐसा कहने पर उन्होंने उसको अपने साथ हे बैठा लिया.
"शंकर भाई, ये क्या बाला है? पंडित जी माफ़ कीजियेगा लेकिन लड़का हमको पसंद आ गया है आपका तोह इसका रिश्ता हमारी भांजी से करवा देंगे तोह बड़ी कृपा होगी.", पहली हे बात ऐसी सुन्न कर जहा अर्जुन हैरान हुआ वही शंकर जी हंसने लगे.
"सुभाषी जी, आपकी भांजी किस कक्षा में है?"
"देखो शंकर भाई, मीनल थोड़ी आधुनिक लड़की है लेकिन पूरी संस्कारी हमारी निक्की और राधिका की तरह. ब पूरा किया है और बहिन उसके लिए उचित लड़का भी देख रही है. आपका परिवार और ऐसा लड़का मैं हाथ से नहीं जाने दे सकता.", अखिल दूसरी तरफ बैठा गौर से सब देख सुन्न रहा था.
"हाहाहा.. ये अभी 18 का है सुभाष जी, जितने लोग यहाँ बैठे है सभी थाने पहुंच जाएंगे अगर इसकी शादी करवाई तोह.", अब बारी सुभाष जी की थी हैरान होने की.
"क्या बात कर रहे हो शंकर भाई? बीटा तुम्हारे पापा मजाक कर रहे है न?"
"अंकल वो सच हे कह रहे है और ऊपर से मैं तोह हु भी इलेवेंथ क्लास में. अर्जुन ने शरमाते हुए ऐसा कहा तोह सुभाष जी भी हंसने लगे.
"पंडित जी, अब मैं खुद शर्मिंदा हु अपनी बात पर. लेकिन सच कहता हु के इसके लिए आपको लड़की नहीं खोजनी पड़ेगी."
"हाँ बीटा, वो ऐसा है के इनकी पौती है प्रीती और अर्जुन के साथ बचपन से रही है. छोल साहब ने तोह मजाक में कहा था के लड़का लड़की ज़िन्दगी भर साथ रहेंगे और हमने ये फैंसला कर हे लिया. आपको शंकर ने सीधा ना इस वजह से भी नहीं किया की आप घर आये है तोह ऐसा ाची बात नहीं के सम्बन्धी को नाराज करे. लेकिन दूसरी बात है रिश्ते की तोह अब उस से बेहतर हो या कोई भी लेकिन ये लड़का बांध चूका है.", छोल जी भी अपने भाई साहब के ऐसे कहने पर खुश थे और सुभाष जी को भी ये साफ़दिली पसंद आयी.
"बीटा, अब तोह हम भी देखना चाहेंगे शंकर भाई की होने वाली बहु को. एक बेटी के लिए इस घर आये है तोह दूसरी को देखना चाहेंगे. हमारे लिए आज से तुम भी दामाद जैसे हे हो क्योंकि मुँह से निकल गया तोह आज से हे प्रीती हमारे लिए बेटी सामान है. छोल साहब गुस्ताखी हो तोह माफ़ कीजियेगा."
"अरे कैसे बात करते है सुभाष आप. बेटी हमेशा मान होती है और ाचा है के आप मेरा भी सर ुचा कर रहे है, एक तरह से हमारे बेटे बन्न रहे है तोह गुस्ताखी कहा हुई. प्रीती भी यही है और आती होगी. देख लीजियेगा.", ये बातें करने लगे तोह अखिल ने इशारे से अर्जुन को अपने बराबर आने को कहा. सामने से हे Ritu-Priyanka के साथ प्रीती भी टेबल पर खाना लगाने आ गयी थी. देविका जी को भी इधर हे बुलवाया गया था लेकिन उन्होंने रेखा और ललिता जी के साथ खाने का फैंसला लिया.
"ये है जी प्रीती, और बीटा ये हैं संजीव के होने वाले ससुर जी.", शंकर जी ने हे परिचय करवाया तोह प्रीती ने दोनों हाथ जोड़ दिए ट्रे रखने के बाद.
"इधर आओ हमारे पास. तुम तोह सचमुच लाखों में एक हो बीटा. मुझे अब लग रहा है के ये अर्जुन के लायक तुमसे बेहतर तोह मैं भी ढून्ढ नहीं सकता था.", प्रीती थी भी तोह ऐसी की देखने वाला पहले आँखों में खो जाता था फिर उसके विलक्षण रूप पर जिसके साथ भारतीय संस्कृति का मिश्रण उसको बेजोड़ बना देता था. प्रीती शर्माने लगी और इधर सुभाष जी ने अपने बटुए से एक चंडी की तस्वीर निकाल कर उसके हाथ पर रख दी.
"दुर्गा उपासक है हम बेटी और तुम्हे यही आशीर्वाद दे सकते है के जीवन में हमेशा श्रेष्ट बनो, nidar-chanchal और स्वामिनी. अर्जुन 49 और तुम 51. इस से बढ़कर तू फ़िलहाल मेरे पास देने के लिए कुछ है नहीं बेटी लेकिन तुम ख़ास हो.", प्रीती ने भी उस चांदी की durga-tasvir को मुट्ठी में बंद कर लिया.
"थैंक यू सो मच अंकल. और बाकी मुझे नहीं पता के मैं क्या कहु.", प्रीती की मुस्कान देख वो भी गदगद हो गए.
"तुम कुछ मत कहो बेटी बस खुश रहो.", उन्होंने सर पर हाथ फेरते हुए कहा और प्रीती अंदर चली गयी. यहाँ सबका ध्यान अखिल पर गया इतने ाचे माहौल और सुभाष जी के ऐसे अपनेपन को देखने के बाद.
"यार तुम बर्गर नहीं खाते क्या? बॉडी ाची बनाई है लेकिन लाइफ में स्वाद भी होना चाहिए. मुझे तोह मैगी, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक बहोत पसंद है. मम्मी अब मन करती है के मैं मोटा हो जाऊंगा.", अखिल पहले हे मोटा था और थोड़ा भोला भी. अर्जुन अब क्या जवाब देता उसकी बात का.
"पसंद तोह मुझे भी है लेकिन महीने में 1-2 बार खा लेता हु. वो दादा जी म्हणत करवाते है तोह करनी पड़ती है."
"यही तोह. बस यही सब ाचा नहीं लगता यार. तुम मेरे घर आना फिर मैं तुम्हे ले कर चलूँगा मार्किट. एक बार में 6 से काम बर्गर कोई नहीं खायेगा, कह देता हु.", अखिल की बात सुन्न कर सभी हंसने लगे तोह वो घूर कर अपने पिता को देखने लगा.
"बीटा तुम अब उसको वो करने को कह रहे हो जो तुम्हे पसंद है. मैं चाहता हु तुम वो करो जे अर्जुन करता है. बताओ अपने छोटे भाई को की तुम कब उठते हो?"
"इसमें क्या बुरी बात है? भाई मैं 2 बजे उठता हु, क्या करू नींद ऐसी हे है मेरी."
"इसमें क्या गलत है अंकल, मैं भी 4 बजे उठता हु."
"बीटा वो दोपहर के 2 बजे उठता है. आज रिक्वेस्ट की थी तब ये 10 बजे उठा वो भी अपनी दीदी के कहने पर. चलो अब खाना खाया जाये फिर, चलना भी है.", खाने का नाम सुनते हे अखिल तोह अर्जुन को भूल हे गया. और अर्जुन उठ कर अपने भैया के पास आ गया.
'ये सचमुच इंसान है?', अर्जुन ने बहोत हे हलकी आवाज में कहा तोह संजीव भैया ने मुश्किल से हंसी रोकी. इन दोनों को छोड़ कर सभी ने अपनी प्लेट लगा ली थी. अखिल बिना कटोरी हे एक प्लेट में पनीर की सब्जी, छोले, सलाद और दही डालने के बाद सबके लिए राखी गरम रोटियों की प्लेट अपने पास करके शुरू हो गया. एक गिलास कोला का भी कोमल दीदी उसके लिए वह रख गयी थी.
'बहार चल मेरी हालत ख़राब हो रही है.', संजीव भैया से कण्ट्रोल नहीं हो रहा था अब. दोनों हे वह से निकल लिए और गेट से इधर आते हे हंसने लगे.
"ओह बाप रे. ये आपका साला है या घटोत्कच? मुझे तोह हैरानी हो रही है के वो सिर्फ खाने की बात करता है और उठने का टाइम 2 बजे."
"हाहाहा. तुम्हारी भाभी यही कह रही थी की अखिल एक बचा हे है लेकिन अब पता लगा के भैंस का बचा है वो. मैं तोह खाना हे नहीं खा सकता उसके सामने बैठ कर. चल अंदर हे चलते है यार, भूख तोह लगी है.", संजीव भैया की बात सुन्न कर अर्जुन को यही करना ठीक लगा. 6 बजे 2 पराठे खाये थे उसने तोह भूख तोह उसको भी लग गयी थी लेकिन अखिल जितनी नहीं. दोनों भाई अनादर आये तोह टेबल पर फ़िलहाल कोई नहीं था.
"अलका हम दोनों का खाना यही लगवा दो.", संजीव भैया के इतना कहते हे टेबल पर 6 प्लेट प्रीती ने हे लगा दी. अर्जुन ने कुछ नहीं कहा लेकिन वो सोच रहा था के अब यहाँ वो लड़की न आ जाये बस. और वैसा हे हुआ.
"तोह ये है तुम्हारा छोटा भाई? यार संजीव सबके बारे में बताया था तुमने लेकिन इसको क्यों छुपा के रखा. भाभी आप भी इधर हे आ जाओ.", निकिता ने विद्या को एक तरफ बैठाया और खुद अर्जुन के पास आ गयी. अर्जुन ने नजरो से हे विद्या का स्वागत किया और उनके बराबर हे माधुरी प्रीती भी बैठ गयी.
"ये ख़ास है तोह इसको मिलने पर हे पता लग्न चाहिए न निक्की. शादी में तोह वैसे भी सबने मिलना हे था.", संजीव के ऐसे छुपाने पर सभी के चेहरे पर मुस्कान थी.
"वैसे तुम तोह संजीव से भी ज्यादा शर्मीले हो यार."
"मैं गॉड में बैठ जाता हु, इसलिए भैया ने नहीं बताया होगा.", अब जो अर्जुन ने कहा तोह निक्की भी हैरान हो गयी लेकिन बाकी सबकी हंसी छूट गयी थी इस बात को सुन्न कर विद्या के साथ साथ.
"वाह. ये टेढ़ी खीर है ननद जी, आप दूर हे रहो. इसलिए हे शायद संजीव जी ने इनके बारे में जीकर नहीं किया होगा.", विद्या भाभी की बात सुन्न कर निक्की ने अर्जुन को गौर से देखा और फिर बाकी सबको.
"तुम न बच्चू अभी मुझे जानते नहीं हो. कभी no man's लैंड पर मिलना फिर देखना के गॉड में बैठती हु या उल्टा लटकती हु.", निक्की ने भी ये शरारत से कहा था और प्रीती हंस रही थी. अर्जुन ने प्रीती की ये अनुमति मिलते हे भैया को भी देखा जो उसको उत्साहित कर रहे थे.
"ऐसा है न आप बस जगह, समय और दिन बता दो. रस्सी भी मैं ले कर आ जाऊंगा, अगर लटकाना चाहो तोह. लेकिन लगता नहीं आपसे रस्सी सम्भलेगी और फिर होगा डबल नुक्सान जो मैं आपके हे ऊपर आ गिरा तोह.", ये द्विअर्थी मजाक इतना भद्दा भी नहीं था जो ऐसे मौको पर कही ज्यादा हो सकता है. लेकिन निक्की ने तोह नजरे से बदल ली.
"अब निक्की ये मैट कहना के क्रेन लेके आणि पड़ेगी? बात दोनों के बीच है तोह तीसरा नहीं आएगा. भाभी भी नहीं और इधर से भी कोई नहीं.", संजीव भैया को सबके साथ शामिल होते देख माधुरी दीदी के साथ प्रियंका दीदी भी खुश हो रही थी. वो टेबल पर सब्जी के बर्तन रखने के साथ साथ इस चुहल का मजा ले रही थी.
"हाँ हाँ क्यों नहीं. इसको तोह होटल के पांचवे माले से निचे लटकाऊँगी मैं और मुझे किसी की हेल्प नहीं चाहिए. निकिता दत्त नाम है मेरा, ऐसी वैसी लड़की नहीं hu.",Sanjiv भैया भी कुछ वैसा हे सोच रहे थे जैसा इस वक़्त प्रीती. दोनों को पता था के मुसीबत मोल ले रही है. मजाक ज्यादा हुआ तोह निक्की का बुरा हाल होने वाला है.
"मंजूर है और मैं खुद हे लटक जाऊंगा बस बात वही है. गॉड में लेके चलना मुझे फिर दसवे से हे लटका देना चाहे."
"बड़े हे दीठ हो यार तुम, गॉड के पीछे हे पड़ गए."
"आपने हे कहा था मैं शर्माता हु. अब बताये क्या बात मानु मैं.", अर्जुन मासूम सा चेहरा बनाते हुए निक्की को देखा तोह एक पल वो भी उन सलेटी आँखों में खो सा गया था और निक्की भी लेकिन दोनों हे टूररत प्लेट में खाना डालने लगे.
"संजीव यार, तुम्हारा घर बहोत ाचा है. मुझे तोह सचमुच बड़ा ाचा लगा यहाँ आ कर. उतनी हे ाची है तुम्हारे सभी बहने.", निक्की ने विषय बदल दिया था लेकिन हालत थोड़ी बुरी थी अंदर से. वही अर्जुन ने प्लेट लगाने के बाद विद्या भाभी की तरफ कर दी और ऐसे हे प्रीती और माधुरी दीदी को देने के बाद अपने भैया के लिए लगाने लगा. प्रीती ने भी एक प्लेट अलग से लगाने के बाद बिना चावल के अर्जुन की तरफ कर दी. निक्की के साथ साथ विद्या भी ये देख रही थी.
"राधिका यही रहने वाली है और तुम दोनों बहनो के साथ बेस्ट फ्रेंड्स भी हो तोह जब दिल करे आ जाना. वैसे इनविटेशन देना गलत हे होगा, तुम्हे तोह फुर्सत मिलने नहीं वाली अपने काम से. आज पता नहीं ये करिश्मा कैसे हो गया. शायद भाभी जी ने कहा होगा."
"भाभी को तोह मैं साथ ले कर आयी हु. दिल्ली पास में है लेकिन होटल संभालना यू क्नोव. न न करते हुए भी कभी कभी 15-16 घंटे तक स्टाफ और सर्विस पर लगाम कसके रखनी पड़ती है. फ़िलहाल सीजन नहीं है तोह थोड़ा फ्री हु. लेकिन अब समय निकला करुँगी क्योंकि बहोत स्ट्रेस ले लिया. मोहित भैया को टाइम नहीं है तोह अब भाभी मेरे साथ देखेंगी सब."
"आपका होटल है दिल्ली में?", अर्जुन ने सलाद निक्की की तरफ बढ़ाया तोह उसको भी ाचा लगा के ये लड़का हर चीज का ख्याल भी रखता है और बातें भी ाची कर लेता है.
"हाँ है तोह सही लेकिन होटल काम आफत है यार. वैसे बड़ी म्हणत से मैंने उसको दिल्ली के टॉप 5 में पंहुचा दिया है वो अलग बात है के 5तह पोजीशन है. होटल क्सक्सक्सक्स और एक 5 स्टार होटल है. कभी दिल्ली आओ तोह सीधा होटल आना और किसी से कुछ नहीं कहना बस बोल देना तुम कौन हो."
"यहाँ तोह मेरी उड़ान ननिहाल से आगे तक नहीं है और आप कह रही हो दिल्ली आने की. ज्यादा से ज्यादा दूर मैं मार्किट हे जाता हु अपने घर से. लेकिन कभी भैया या दादा जी के साथ गया तोह आपसे मिलने और होटल देखने जरूर आऊंगा.", अब निक्की को हैरत हुई थी के ये लड़का दुनिया हे नहीं देखता. उसने संजीव की तरफ नजर की तोह संजीव भैया ने हे बात संभाली.
"ऐसा है न मेरी इन्शुरन्स वाली जॉब की वजह से मैं भी घर नहीं रहता ज्यादा और papa-chacha भी. अर्जुन हे घर संभालता है और यहाँ के सारे काम देखता है. लेकिन ये जल्दी हे दिल्ली भी जायेगा मेरे साथ और बाकी हर जगह जहा इसका दिल करेगा जाने का.", निक्की ने अब सहमति में सर हिलाया जब वजह साफ़ हुई.
"तोह अर्जुन जी, आप खाली समय में क्या करते है?", ये विद्या भाभी ने पुछा था जो माहौल में बेहतर महसूस कर रही थी.
"एक तोह भाभी जी मैं बहोत छोटा हु तोह 'जी' मत लगाए. और दूसरा मेरे पास फ्री टाइम देख कर कोई न कोई मुझे काम में लगा हे देता है. वैसे मैं भी चालाक हु, या तोह कही जा कर सो जाता हु या फिर सामने हे नहीं आता किसी के.", अर्जुन के ऐसे जवाब पर भैया ने उकसे सर पर थपकी लगा दी.
"वाह. मतलब सचमुच इंटेलीजेंट हो तुम. लेकिन जब सामने नहीं आते तोह क्या करते हो?", अब अर्जुन क्या कहता के वो ऐसे समय में किसी के साथ क्या करता है.
"बस यूनिवर्सिटी घूमने चला जाता हु, दोस्तों से मिल लेता हु या फिर खली सड़क पर मोटरसाइकिल चलता हु.", अभी यहाँ ये सब बात कर रहे थे और बहार गेट पर एक और कार आ रुकी. ड्राइवर को हे बहार वाले व्यक्ति ने सन्देश दिया तोह ड्राइवर बैठक में चला गया.
"सर, बहार कोई शास्त्री जी आये है और अर्जुन बाबा को बुलाया है.", ये सुन्न कर रामेश्वर जी अपनी जगह से खड़े हो गए. टेबल से बर्तन जा चुके थे और साफ़ किया जा चूका था.
"हम खुद हे आ रहे है भाई.", रामेश्वर जी को ऐसे बीच में उठते देख सुभाष जी थोड़ा हैरान हुए.
"ये शास्त्री जी?"
"आपने सुना होगा उनके बारे में सुभाष जी, आचार्य हंस उर्फ़ आचार्य प्रमोद शास्त्री जी.", शंकर जी ने नाम लिया तोह सुभाष जी के साथ साथ राजकुमार जी को भी हैरत हुई. छोल साहब ने हां भरते हुए अपने भतीजे की बात की पुष्टि की तोह सुभाष जी भी खड़े होने लगे.
"बैठे रहिये भाई, पापा गए है तोह वो उन्हें अंदर हे ले कर आएंगे. आज हे वो बहार से आये है और शायद आते हे अर्जुन से मिलने चले आये.", शंकर जी ने बताया के वो अर्जुन से मिलने आये है तोह दत्त साहब को और जिज्ञासा हो गयी.
"वो किसी से खुद मिलने भी आते है? और इतना लगाव की बहार से आने के बाद इंसान jet-leg से उबरने की जगह मिलने चले आये. सचमुच आचार्य जी की हे बात कर रहे हो ना आप? देविका के साथ साथ मैं भी उनकी jiwan-shaili का अनुसरण करता हु. 2 बार उनके शिविर में भी गया हु लेकिन व्यक्तिगत भेंट नहीं हुई.", इतने पैसेवाला व्यक्ति और हैरान हो गया जब आचार्य जी नीली जीन्स, बटन वाली टीशर्ट और सांडले पहने कमरे में दाखिल हुए. शंकर जी ने हाथ जोड़ कर उन्हें जगह दी तोह वह कंधे पर हाथ रख कर मुस्कुराते हुए दीवान पर हे बैठ गए.
"यार आप लोगो की महफ़िल खराब करने का उद्देश्य कदापि नहीं था लेकिन अर्जुन के लिए कुछ लाया था और बिना फ़ोन किये चला आया. ऊपर से पंडित जी ने भाभी जी के हाथ की बानी चाय की रिश्वत पेश कर दी तोह अंदर आना पड़ा.", उन्होंने छोल साहब से हाथ मिलते हुए उनका एक हाथ दोनों हाथ में पकड़ कर प्रेम जताया और फिर सुभाषजी की तरफ भी नमस्कार किया.
"हाँ तोह अब देवर जी चाय के हे नाम से अगर आते है तोह मैं 3 बार बनाने को तैयार हु.", कौशल्या जी इधर चली आयी तोह शास्त्री जी ने इन्हे भी भाभी का मान देते हुए हाथ जोड़े.
"सच कहता हु भाभी जी के 10 वर्षो से मैंने चाय नहीं पी थी और जब पी तोह वो आपके हे घर. और प्राण भी यही है के ये नियम ऐसा हे रहे."
"आप बैठो, सभी के लिए मैं चाय ले कर आती हु."
"आप है आचार्य प्रमोद शास्त्री जी और शास्त्री जी ये है सुभाष चन्दर दत्त जी, हमारे जयेष्ठ पौत्र को कन्यदान करने वाले आप हे है.", रामेश्वर जी ने बड़े निराले अंदाज में परिचय दिया तोह शास्त्री जी ने भी हाथ जोड़ दिए.
"सर आपको देखने की लालसा वर्षो से थी लेकिन इस घर में कदम रखते हे जैसे मनोकामना पूरी हो गयी. विएना में भी मिलना नहीं हो पाया था और हृषिकेश में भी नहीं.", सुभाष जी इधर चरण स्पर्श करने लगे तोह उन्होंने खुद हे रोक दिया.
"भाई, पाप का भागी मत बनाओ हमे. एक तोह पहले हे बिना बुलाये हम यहाँ खुद को आमंत्रित कर बैठे है और ऊपर से फ़िलहाल हम पंडित जी के मित्र है.", वो आगे कुछ कहते उस से पहले अर्जुन बेधड़क आता उनके गले लग गया.
"तोह आप अब आ रहे है मिलने? पहले कहा था के एक दिन के लिए बहार जा रहा हु, मैं हिमानी दीदी का एडमिशन करवा दू बस. लेकिन फिर गायब हो गए आप. अब जितने मेरी छुट्टियां है आप भी छुट्टी पर रहेंगे.", अर्जुन को तोह जैसे यहाँ अब कोई दिखा हे न था और वैसे हे स्नेह से आचार्य जी भी उसको देखने के बाद सीने से लगाए कुछ महसूस करने लगे.
"नहीं जाता अब कही भी 15 जुलाई तक. इसलिए बहार गया था के तुम्हे और हिमानी को समय दे सकू. आ तोह मैं सवेरे 9 बजे हे जाता लेकिन भाभी जी ने बताया के तुम सोने लगे हो तोह मैंने इन्तजार करना हे बेहतर समझा. जानते हो हम तुम्हारे लिए क्या ले कर आये है?", आचार्य जी ने जिस भाव से अर्जुन को अपने साथ लगाया हुआ था कमरे में बैठे सभी व्यक्तियों को एहसास हो गया था के इनका रिश्ता बहोत ख़ास है. रामेश्वर जी तोह भली भाँती जानते थे के ये छाया भी अर्जुन को सुरक्षित रखने वाली है.
"ये देखो क्या लाये है लेकिन इसको मैं मेरे घर ले जाने वाली हु.", प्रीती ने वो छोटा सा पिल्ला जो टोकरी में रखा था कमरे में आते हे दिखाया तोह अर्जुन फिर से उनके गले लग गया और रामेश्वर जी ने उस टोकरी को थामते हुए जैसे कुछ जांच की और वैसे हे सुभाष जी ने भी बड़े ध्यान से इस महीने भर के पिल्लै को देखा.
"हाँ अब ये तुम दोनों बचो की जिम्मेवारी है की इसका ाचे से ख़याल रखना. प्रशिक्षण देने के लिए तोह पंडित जी है हे हमारे पास.", प्रीती फिर से वो टोकरी ले कर अंदर चली गयी थी.
"थैंक यू सोऊ मच. मैं इसका पूरा ध्यान रखूँगा."
"बीटा वो रखना भी पड़ेगा तुम्हे और ये आपने सचमुच जैसे मेरी एक समस्या हे हल कर दी शास्त्री जी. ये रॉटवेलर हिंदुस्तानी नहीं है और ख़ास है."
"जी पंडित जी वही मैं भी देख रहा था के ये अलग है. मेरे फार्म पर भी 2 श्वान है इस नेसल के लेकिन ये अलग है."
"सुभाष जी अपने बचे को मैं मिलावट नहीं दे सकता था पहले उपहार स्वरुप. इसने बताया था के एक सुलतान है तोह हमने भी जर्मनी की ये वफादार नेसल चुनन ली. यही देने के लिए मैं आया था और इस से तोह मैं सवेरे 4-5 बजे मिल हे लूंगा. जाओ बीटा अब तुम अंदर बैठो हम यहाँ चाय पी लेते है.", आचार्य जी ने खुद हे माहौल से अर्जुन को बहार किया था क्योंकि यहाँ मेहमान थे उनके पास.
"आचार्य जी कभी इन्दर से भी मिल लीजियेगा. आखिरी बार वो कॉलेज में हे आपसे मिल पाया था और फिर आप यहाँ दिखाई हे नहीं दिए.", शंकर जी की ये बात सुन्न कर रामेश्वर जी भी थोड़ा हैरान थे.
"इन्दर. नरिंदर शर्मा, वो ख़ास है शंकर और अब तोह भाई मैं यही हु तुम्हारे पड़ोस में. नरिंदर से मिल कर मुझे भी ाचा लगेगा और हो सके तोह मुझे उस व्यक्ति से भी मिलवा देना जो उसके साथ हमेशा दीखता था. वो तेजस्वी लड़का था और निर्मल भी. तुम लोग उसको अज्जू बुलाते थे न?", शास्त्री जी ने ये जीकर किया और इधर मेज पर चाय की ट्रे रखती कौशल्या जी के हाथ हलके से हिल गए.
"वो तोह अब मुमकिन नहीं है आचार्य जी. नरिंदर हे बता देगा आपको इस बारे में. खैर हॉस्पिटल तोह आपको आमंत्रित नहीं करना लेकिन कभी घुड़सवारी के लिए टाइम निकल सकते है.", शंकर के ऐसा कहने पर उन्होंने तुरंत हाँ कह दी.
"शनिवार को चलते है भाई, हम लेने आ जायेंगे. तुम घडी देख रहे हो मतलब वापिस ड्यूटी जाना है.", उनके जवाब पर शंकर जी भी प्रसन्न हो गए और सबसे इजाजत ले कर वापिस ड्यूटी पर चल दिए.
"सुभाष जी, आपका जब भी दिल करे आप मिलने आइये और मुझे भी ाचा लगेगा आपके साथ यहाँ पर चाय पीना. Ba-sharat पंडित जी और छोल साहब हमको बगीचे में बैठने की अनुमति दे तोह.", चाय की चुस्की लेते हुए उन्होंने कौशल्या जी की भी तारीफ की जो यही बैठी थी.
"घर की मालकिन मैं हु देवर जी. आप आने वाले बनो बस और इन्हे भी ाचा लगता है के अर्जुन के अलावा आप इस घर को भी अपना समझते है."
"भाभी जी डोर ऐसी बांध चुकी है के लोगो को शिक्षा और सबक सीखने वाला खुद याचक बन गया है. आपने जिस तरह मेरी हिमानी को प्यार दिया है, वो उपकार हे है इस फ़कीर पर. अर्जुन जो है सो है और उसके साथ जुड़ाव जीवन भर रहने वाला है लेकिन आज मैं आपको और पंडित जी के दिए संस्कारो को नमन करने आया हु. मेरी बची अब निर्भीक रहती है घर पर और ये परियां जो आपके घर को स्वर्ग बनाये रखती है वह भी इन्होने सब माहौल जिवंत बना दिया है. आपका हरिणी हु मैं इसके लिए."
"अब वो सिर्फ आपकी कहा रही शास्त्री जी, प्रीती और ऋतू तोह खुद हिमानी से मिलने को तैयार रहती है. कॉलेज में भी कोमल प्रियंका साथ रहेंगी बिटिया के तोह अब आप इस बात के लिए तोह कुछ सोचिये भी मैट. वो हमारी उतनी हे है जितना आपके लिए अर्जुन.", ये बात छोल साहब ने कही थी और इधर अंदर आती देविका जी के साथ साथ निक्की भी इन महानुभाव को देख कर जड़ हो गयी.
"सर, आप योग गुरु आचार्य..
"बेटी सिर्फ अर्जुन का एक और दादा जी कहेंगी तोह उचित रहेगा. तोह आपकी सुपुत्री है पंडित जी के इस खूबसूरत बगीचे का अगला विशेष फूल.? भगवन आपको खुश रहखए और दीर्घायु बनाये.", आचार्य जी ने खड़े हो कर खुद हे उनका स्वागत किया और 3-4 मिनट बाद इजाजत ले कर चले गए. इस बार छोल साहब ने वादा किया था उनके यहाँ पंडित जी के साथ आने का और अर्जुन उनके साथ हे बहार निकल गया. अभी उनकी बातें हुई हे कहा था.
"पड़ती जी, सच कहे तोह हमारा आना सचमुच सफल हो गया. जिन्हे कहा कहा नहीं देखा और मिल न पाए आज वो सामने से मुझे बेटी बोल कर गए है.", देविका जी के तोह चेहरे पर नूर हे आ गया था. निक्की अभी तक हैरान थी लेकिन विद्या को कुछ ख़ास नहीं पता था.
"बेटी, उनका मोह अर्जुन के साथ है और अर्जुन भी उनके साथ आत्मिक तौर पर जुड़ा है. व्यक्ति दिल जुड़ने पर बाहरी आडम्बर और ओहदे से परे हो जाता है. मैं भी पहली बार जानकारी मिलने पर इतना हे हैरान था लेकिन शास्त्री जी ने तोह मेरी धर्मपत्नी को हे भाभी बना कर खुद को मुझसे छोटा कर लिया. प्रेम इंसान को हर सांचे में ढाल देता है किसी तरल की तरह.", रामेश्वर जी भी कुछ कुछ शास्त्री जी की तरह हे बतियाने लगे थे.
"सत्यवचन. मुझे तोह पहले समझ हे नहीं आया था लेकिन फिर अर्जुन और उनका स्नेह देखा था मैं भी लाजवाब हो गया देविका. पता नहीं बेटी के घर अब कितनी चाय पीनी पड़ेगी निकट भविष्य में.", सुभाष जी के कथन पर पंडित जी के साथ साथ छोल साहब भी हंस दिए.
"वैसे अंकल जी, मेरा दिल है के पर्सनली उनसे मिलु. उनकी बुक्स मैं पढ़ती हु और योग को भी फॉलो करती है. मेरी तोह आवाज हे नहीं निकली उन्हें देख कर. वो फिर कब आएंगे?", निक्की की जिज्ञासा का जवाब कौशल्या जी ने दिया.
"अर्जुन ले जायेगा तुम्हे बीटा, मिल लेना जितना दिल करे. हाँ अभी भी दोनों बहार कार में बैठे है लेकिन इस वक़्त तोह शायद वो किसी से न मिले.", कौशलय जी ने अर्जुन का जीकर ाचे से किया था और देविका जी ने उसको देखा भी नहीं था. आचार्य जी चले गए तोह अर्जुन इधर आ गया जिसको देख कर देविका की नजरे वैसे हे गड्ड गयी जैसे सुभाष जी की पहली बार गाड़ी थी.
"नमस्ते आंटी जी.", अर्जुन इतना बोल कर दादी की बगल में जा बैठा.
"ये हैं जी अर्जुन, घर का सबसे छोटा बचा. बीटा ये है तुम्हारी भाभी की माता जी.", कौशल्या जी ने परिचय दिया तोह देविका जी ने भी स्नेहा से उसको देखा.
"तुम्हारे मित्र तोह बीटा उम्र में काफी बड़े है तुमसे.", छेड़ते हुए या बात कही गयी थी लेकिन अर्जुन आज खुश था
"मित्रता तोह उम्र से नहीं होती आंटी जी विचारो से होती है. मेरे सबसे ख़ास मित्र तोह मेरे दादा जी और दादी है, ये कभी कुछ थोपते नहीं मुझे पर लेकिन सही गलत ऐसे सिखाते है जैसे hum-umar समझदार. आचार्य जी भी इनके हे जैसे है बस वो मुझे मुझसे बेहतर बनाने में लगे रहते है. तोह है तोह वो भी दादा जी हे. वैसे आप भी योग करती है न?", अर्जुन ने मित्रता का सबक सीखने के साथ हे सवाल कर लिया.
"हाँ और वह भी लगता है उतना असर नहीं कर रहा क्योंकि सब खुद हे करना पड़ता है. तुम्हारे जैसे मित्र नहीं है हमारे पास."
"हाहाहा. मैं इस पर कुछ नहीं कह सकता. लेकिन आप जब चाहे आचार्य जी से मिल सकती है, वो 15 जुलाई तक तोह मेरे साथ हे है इधर.", अर्जुन के इस निमंत्रण को उन्होंने भी स्वीकार कर लिया.
"शादी के बाद जरूर आएंगे बीटा हम तुमसे मिलने. शायद कुछ ज्ञान पहले तुमसे लेना होगा तभी आचार्य जी से मिलना ठीक रहेगा. उनका व्यक्तिगत जीवन किसी को भी नहीं पता लेकिन तुम उस जीवन में जरूर हो. अभी हमको इजाजत दीजिये, जल्द हे मिलते है शादी के अवसर पर.", सभी उनके साथ हे बहार चल दिए और अखिल कार के अंदर हे सोया पड़ा था एक चला कर.
"मैं इधर हे हु मौसी के घर तोह कल हे वापिस आउंगी चाचा जी.", निक्की अपनी भाभी के साथ कार में जाने से पहले हे ये बता गयी थी और एक इशारा संजीव से भी किया था फ़ोन करने का. जाने से पहले संजीव भैया ने भी कुछ बातें देविकाजी और सुभाष जी से की thi.Wo सभी अर्जुन को गले लगा कर वापिस निकल चले. आमंत्रित करने आये थे और कुछ ख़ास ले कर चले गए. इस सबमे शाम के 4 बज चुके थे और घर में बहोत काम बाकी थी. अर्जुन ने भी अपनी माँ के साथ 4 ख़ास जगह जाना था आज कार्ड देने.
.
.