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Safar-Humsafar (1)
शहर के पुराने हिस्से से निकलते हाईवे पर स्थित था ये प्रख्यात restra-hotel जहा अर्जुन को लिए संजीव भैया इस ख़ास raatri-bhoj पर आये थे. अर्जुन की पिछली कक्षा में रही अंग्रेजी विषय की शिक्षिका अरुणा गोस्वामी निक्की और राधिका की सगी मौसी थी जिनके यहाँ निक्की आज रुकी थी. 3 सितारा होटल के इस रेस्ट्रा में इस वक़्त हल्का संगीत बज रहा था और इस हलकी रौशनी वाले भाग में ये 6 लोग इस ख़ास टेबल पर जमा थे. संजीव ने हे इन सभी को अर्जुन का परिचय दिया था अर्जुन को भी हरेक से अवगत करवाने के बाद वेटर को सभी की इत्छा अनुसार snacks-drinks का आर्डर दिया.
"अर्जुन, अनमोल भैया दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ने के बाद अब प्रख्यात अखबार के एडिटर है. निक्की से तोह तुम परिचित हो अब और ये नीतू है, अनमोल भैया की छोटी सिस्टर जो अभी B.Ed. कर रही है. दोनों के मदर तुम्हारे इंग्लिश के मैडम अरुणा आंटी है.", अर्जुन आज से पहले तोह कभी भी ऐसी जगह अपने भैया के साथ नहीं आया था और ऊपर से सभी लोग एक तरह से परिवार से जुड़ने वाले थे जिन्हे वो आज हे मिल रहा था.
"अर्जुन भाई, संजीव की बातें सीरियसली मत लेना. तुम मेरे दोस्त और मैं तुम्हारा दोस्त. ये है मेरा जीजा. कौन क्या काम करता है क्या नहीं ऐसे बोरिंग टॉपिक के लिए यहाँ नहीं आये हम लोग. बिंदास अपनी बातें करते है, खाने पीने के साथ.", अनमोल के ऐसे कहने पर अर्जुन को थोड़ा ाचा लगा लेकिन बायीं तरफ बैठी निक्की ने कोहनी मारी तोह वह फिर से झेंप गया.
"अनमोल भैया, आपकी बात बिलकुल सही है लेकिन संजीव भैया ने यहाँ आने तक मुझे ये बताया हे नहीं के हम कहा जा रहे है. आप लोगो से फर्स्ट टाइम मिल रहा हु और वो भी गिफ्ट लाये बिना.", अर्जुन की बात सुन्न कर सभी हंसने लगे थे लेकिन निक्की मुस्कुराते हुए भी बस अर्जुन को देख रही थी जो अटपटा जरूर था.
"इस बोतल के लिए ऐसा कह रहा है क्या भाई? ये मैंने मंगवाई थी संजीव से क्योंकि कल किसी को गिफ्ट देनी है और मुझे ये मिल नहीं रही थी. और छोटे भाई उपहार देते नहीं लेते है. मैं तोह विद्या भाभी से हर बार गिफ्ट लेता हु.", अनमोल के कहने पर विद्या भाभी भी मुस्कुराने लगी जो अब दिन से बिलकुल अलग एक ख़ास सलवार कमीज में किसी युवती सी लग रही थी.
"अनमोल देवर होने के साथ साथ छोटा भाई है मेरा अर्जुन जी. सागा भाई नहीं है न मेरा कोई तोह इसने मुझसे ये रिश्ता बना लिया. और नीतू के रूप में छोटी बहिन भी मिल गयी मुझे.", अर्जुन के साथ साथ संजीव भैया को भी बात बहोत ाची लगती थी जान कर. इधर 2 वेटर बड़ी सावधानी से इनकी टेबल पर स्नैक्स के साथ साथ ड्रिंक्स भी रखने लगे. उन्होंने युवक देख कर वो शराब का तीसरा गिलास अर्जुन के सामने रख दिया और तीनो युवतियों के सामने हरे तरल वाला गिलास जिस पर निम्बू लगाया गया था.
"ये मेरा नहीं है.", अर्जुन ने हड़बड़ाते हुए ऐसा कहा तोह निक्की ने मुस्कुराते हुए अपने गिलास के साथ वो गिलास बदल लिया और वेटर ख़ामोशी से सब सामान लगा कर चले गए. अर्जुन असमंजस से निक्की को देख रहा था.
"क्यों लड़कियां ड्रिंक नहीं कर सकती क्या? वैसे भी होटल चलना सीखने के साथ साथ इसकी भी आदत हो गयी है. कभी कभी.", निक्की ने सफाई दी और संजीव भैया ने भी सहमति जताई
"अल्कोहल बुरा नहीं है छोटे है बस एक सीमा से ज्यादा नहीं. वैसे भी सभी 2-2 ड्रिंक हे लेंगे और उसके कुछ देर बाद डिनर करते हे हम चलते है."
"यार तुम तोह ाचे खासे हो अर्जुन, मुझे लगा beer-whiskey जरूर पीते होंगे. तुम भाई ये लेमोनेड लेके बैठे हो.", अनमोल भैया की बात सुन्न कर अर्जुन थोड़ा मुस्कुराया था.
"आप ये सब किस लिए पीते है भैया, एन्जॉय करने के लिए या फिर दिमाग को आराम देने के लिए शायद.", अर्जुन के कथन पर अनमोल के साथ साथ निक्की और संजीव ने भी सहमति जताई और विद्या भाभी के साथ नीतू भी गौर से अर्जुन को देखने लगी जैसे वो कुछ अलग कहने वाला हो
"मैं छोटा हु तोह इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा लेकिन मैं तोह वैसे हे बहोत खुश हु आप लोगो से मिल कर. लाइफ में वही करना चाहिए जो सही लगे और भैया ने कहा था के जिस दिन मैं कॉलेज में जाऊंगा तब ये मुझे अपने साथ बियर पिलायेंगे. ख़ास दिन होगा और मैं ये हमेशा याद रखना चाहता हु.", अर्जुन की बात से जहा अनमोल के चेहरे पर ख़ुशी आयी की दोनों भाई आपस में कितना प्यार रखते है वही निक्की बोल हे पड़ती है.
"ऐसे डेट निकाल कर हर काम करोगे तोह कही ऐसा न हो 29 फेब उस साल हो हे न. ये ज़िन्दगी आज है अर्जुन, अभी है और एक मिनट बाद का भी कुछ पता नहीं."
"लगता तोह नहीं निक्की जी के आप इस बात को वैसे हे समझती है जैसे आपने अभी कहा है. वैसे मैं खुद आज में हे जीता हु लेकिन कुछ सपने सही समय को सौंप कर और बाकी किस्मत पर.", अर्जुन की बात सुन्न कर निक्की को ऐसे जवाब की कटाई उम्मीद न थी. एक घूँट में बाकी जाम ख़तम करती वो टिश्यू से मुँह साफ़ करने लगी. संजीव भैया ने भी 3 पेग और मशरुम टिक्का का आर्डर दिया तोह जाम तुरंत आ गए. इस बीच निक्की बस खामोश थी और अर्जुन भी बाकी सबकी बातें हे सुन्न रहा था. विद्या भाभी तोह यहाँ ाचे से घुलमिल कर बात कर रही थी वही अनमोल भैया भी एक दिलचस्प व्यक्ति थे.
"बस भाई अगला पेग लेने से पहले एक सिग्रत्ते पिलवा दो तोह मजा आ जाये संजीव.", निक्की के चेहरे के भाव सिग्रत्ते लफ्ज़ सुन्न कर थोड़ा अजीब से हो गए थे. वही संजीव भैया भी जैसे ऐसे हे मौके की तलाश में थे. दोनों उठ कर बहार की तरफ निकल गए थे दूसरा गिलास भी खाली करते हुए.
"भाभी मुझे वाशरूम जाना है, आप चलिए मेरे साथ.", नीतू ने हलके से बात कही तोह वो दोनों भी महिला प्रसाधन कक्ष की तरफ चली गयी जो एक तरफ बना था रेस्ट्रा के आखिर में. अब अर्जुन को बात करने का मौका मिल गया था निक्की से अकेले में.
"आप परेशां है? चाहे तोह मैं मुझे बता सकती है, शायद मैं कुछ हेल्प कर सकू."
"तुम नहीं कर सकते मेरी मदद और फिर न जाने तुम मेरे बारे में क्या सोचने लगोगे.", निक्की जैसे उलझन में थी और कुछ चिड़चिड़ी दिख रही थी.
"आपका नजरिया मेरे प्रति क्या होगा या मेरा आपके लिए वो अलग बात है निक्की जी. जरुरी है तोह फ़िलहाल बात करना और यकीन कीजिये मैं कभी इंसान के व्यक्तिगत मूल्यों की तुलना नहीं करता या किसी को क्या पसंद है क्या नहीं. ये सब निजी बात है लेकिन अगर कुछ ऐसा है जो मैं कर सकता हु तोह जरूर करूँगा.", अर्जुन का इतना सरल दिल और गहरी बात सुन्न कर निक्की ने एक तरफ आये अपने रेशमी सीधे बालो को कंधे से पीछे करते हुए एक बार ाचे से उसके चेहरे को देखा और बोली.
"मेरा सिग्रत्ते पीने का दिल है अर्जुन और न वह तुम ला सकते हो और न मैं संजीव या अनमोल से मांग सकती हु. ऊपर से ऐसे खुलेआम पी भी नहीं सकती. अब जो नहीं हो सकता तोह उसके बारे में क्या कहु.", निक्की की बात पर अर्जुन भी हलके से मुस्कुरा दिया. इधर विद्या भाभी के साथ नीतू भी वापिस आ गयी थी और अपनी कुर्सी पर दोनों बैठ चुकी थी. संजीव भैया एक साथ अनमोल भैया भी आ गए थे एक मिनट बाद शायद दोनों ने एक हे सिग्रत्ते सांझी की थी.
"भैया, आप कैमरा भी लेके आये थे न? सभी फोटो तोह बनती हे है पहली बार मिलने की.", अर्जुन के ऐसा कहने पर संजीव भैया ने हाँ में सर तोह हिलाया लेकिन मज़बूरी भी बता दी.
"भाई उसके चारो सेल डेड है और ये अभी पता चल जब मैं अनमोल भैया के साथ उसको चेक कर रहा था."
"देखो अभी आप लोग तोह ek-ek गिलास और लेने वाले है, मैं पिछले चौक से सेल ले आता हु. चाबी दीजिये जरा कार की.", संजीव ने अपने छोटे भाई से कोई सवाल किये बिना चाबी सामने कर दी जो इलो की थी.
"निक्की जी आप आटोमेटिक कार चला लेती है न?", और अब निक्की के चेहरे पर अलग हे चमक आ गयी थी क्योंकि अर्जुन ने उसके लिए रास्ता बना दिया था.
"चलो यार इस बहाने मैं थोड़ा फ्रेश भी हो जाउंगी.", चाबी थामे वो बड़ी अदा से उठ कर अर्जुन के साथ बहार की तरफ चली तोह एक पल के लिए संजीव की नजरे भी उन कैसे हुए नितम्बो पर चली गयी जो जिस्म से चिपकी जीन्स में क़ैद थे लेकिन फिर नजर अगल बगल में की तोह कुछ और जोड़ी आँखे भी निक्की की खूबसूरती को ताड़ती मिली तोह मुस्कुराते हुए वापिस ध्यान अपने गिलास पर लगाया.
"बड़ी हे चालू चीज हो यार तुम तोह. मतलब मुझे लगा था के एक खूबसूरत लड़की की फरमाइश तुम चुटकी में हे पूरी कर डोज लेकिन यहाँ तोह लड़की से हे म्हणत करवा रहे हो.", दोनों कार तक आये तोह अर्जुन ने कार की चाबी वापिस ले ली निक्की से और ड्राइवर साइड के बराबर वाला दरवाजा खोल कर पहले निक्की को बैठाया और स्टीयरिंग पर बैठने के बाद खुद हे कार सावधानी से आगे बढ़ा ली.
"म्हणत नहीं करवा रहा निक्की जी बस ध्यान रख रहा हु के आपका राज बस राज हे रहे. सिग्रत्ते तोह मैं होटल के बहार वाले पनवाड़ी से भी ले आता और फिर ऊपर या कही कोने में जा कर आप पी भी लेती लेकिन वातानुकूलित जगह पर उसकी गंध जरूर आती आपके कपड़ो से. यहाँ आप आराम से कार में बैठिये मैं अभी आया.", अर्जुन ने अँधेरे में हे कार एक खुली सी पार्किंग पर लगाने के बाद इंडिकेटर चालू कर दिए. वो 50 कदम दूर उन छोटी दुकानों की तरफ बढ़ गया. निक्की इधर कार में बैठी अब कही ज्यादा हे अर्जुन के बारे में सोच रही थी. 2 गिलास शराब का असर भी उतना न हुआ था जितना इस लड़के की एक लाइन में दिखाई गयी परवाह ने कर दिया.
"भैया सिग्रत्ते देना एक और एक माचिस भी.", अर्जुन को ये तोह पता हे नहीं था के निक्की कौनसी सिग्रत्ते पीती है और न हे उसने पूछा था. लेकिन दुकानदार उसको देखने लगा.
"कौनसा ब्रांड दू भाई?", अब वो भैया वाली मांगता तोह क्या पता निक्की वो नहीं पीती हो.
"लड़कियां कौनसी सिग्रत्ते पीती है? उनकी अलग सिग्रत्ते तोह नहीं आती कोई?", ये आदमी समझ गया था के अर्जुन किसके लिए ले रहा है और शायद ये खुद धूम्रपान नहीं करता है.
"ये पतली सिग्रत्ते है जो शौकिया पी जाती है इसका नाम मोरे है भाई. और ये विल्स क्लासिक मेंथोल, ये 555 लाइट और ये बेंसोन लाइट है. लड़किया ज्यादातर तोह लाइट हे सिग्रत्ते पीती है.", अर्जुन ने वो बिलकुल सफ़ेद सिग्रत्ते देखि तोह हाथ में उठा ली.
"ये कितने की है भैया?"
"4 रुआपये की और ये लो माचिस. च्लोरमिंट के साथ हो गए पूरे 5 रुपये.", अर्जुन ने पैसे देते हुए वो सफ़ेद सिग्रत्ते सावधानी से पकड़ी और बगल की दूकान से 4 सेल लेने के बाद कार की तरफ आ गया. अब निक्की के चेहरे पर अलग हे चिंता देख वो कुछ हैरान हो गया.
"ये लीजिये और आराम से यही बैठ कर पी लीजिये.", निक्की ने सिग्रत्ते तोह पकड़ ली लेकिन माचिस जैसे उसको भी सही से जलनि नहीं आती थी और अर्जुन ने यहाँ भी मदद करते हुए तिल्ली सिग्रत्ते के सामने की तोह उस लाल रौशनी में निक्की की चमकती आँखें जैसे बहोत कुछ कह गयी.
"बहार खड़े हो सकते है? यहाँ और तोह कोई दिख नहीं रहा. कार में भी स्मेल नहीं आएगी तोह तुम्हे भी दिक्कत नहीं होगी.", अर्जुन इतना सुन्न कर बहार आ गया और अब दोनों हे निक्की वाली तरफ खड़े थे.
"आप मुझे ऐसे क्यों देख रही है दिन से जैसे आप मुझे पहचान रही है या शायद कुछ ढून्ढ रही है मेरे चेहरे में?", अर्जुन की बात ने तोह निक्की को हैरान हे कर दिया था. वो कैसे समझ गया के निक्की उसको पहचान ने की कोशिश कर रही है.
"तुम्हे चाहने लगी हु मैं जबसे देखा है लेकिन अब जिस रिश्ते से तुम सामने आये हो तोह दिल को समझा रही हु के किस्मत ने मेरी ाचे से मारने की ठान राखी है. देखने के बाद बस एक तुम्हारी हे तस्वीर दिल में छपी है और मैं खुश थी की वो अनजान कितना प्यारा और परवाह करने वाला था. तुम सामने आये तोह दिल बैठ गया के आखिर ऐसे हे मिलवाना था किस्मत को मुझे उस लड़के से जिसके सपने मैं देखने लगी थी.", निक्की की बातों ने अर्जुन के होश हे उड़ा दिए थे.
"हम तोह पहले कभी मिले हे नहीं और मैं हर मिलने वाले को याद रखता हु."
"कैसे याद रखते उस भीड़ को अर्जुन जो बस उस मर्द को निहार रही थी जो अपनी बहनो के लिए सरे राह उन भेड़ियों को सबक सीखा रहा था जिनके इरादे गलत थे. मैंने हे उन सरदार इंस्पेक्टर से गवाही देने की बात कही थी पंजाब की उस मार्किट में लेकिन उन्होंने मामले से मुझे दूर हे रहने को कहा. फिर किस्मत ने दूसरी बार मुझे मोडल टाउन में तुम्हारा दीदार करवाया तोह वह एक अलग लड़की थी तुम्हारे पास. कबूतरों को दाना खिलते हुए देख मैं बस दूर से निहार रही थी की अगर प्यार हो तोह किसी ऐसे के साथ जो हर ज़िन्दगी की कदर करता है. आज मैं ड्रिंक नहीं करने वाली थी लेकिन तुमसे मिली तोह लगा के पहले जैसी चल रही थी अब वैसे हे चलने देते है. ये 10 खूबसूरत दिन जिनमे मैं तुम्हारे जैसा बन्न न छह रही थी मेरे लिए यादगार रहेंगे.", इस दौरान निक्की ने सिग्रत्ते का बस एक हे काश लिया था और बाकी हवा ने हे ख़तम कर दी थी. अर्जुन ने वो बचा हुआ टोटा उन खूबसूरत उंगलिया से निकल कर एक तरफ फेंका और निक्की को कार में बैठा दिया. अपनी सीट पर बैठने के बाद भी अर्जुन ने कार चालू नहीं की.
"आपको ाचा क्या लगा? वो पुराणी ज़िन्दगी ये वो 10 दिन जिसमे मेरी एक छवि थी?"
"मुझे तुम ाचे लगे अर्जुन. तुम सबकी तरह नहीं हो जो जिम्मेवारी के बोझ का रोना रट है, अपने स्टेटस या रुतबे का दिखावा करते है. एक तरफ तुम ऐसे इंसान हो जो किसी की िज्जात्त के लिए मौत की परवाह नहीं करते वही दूसरी तरफ तुम हर छोटे से जीव की ज़िन्दगी की भी परवाह करते हो. तुम्हारे घर और परिवार को देखने के बाद मेरी संजीव से भी जब बात हुई तोह उसने भी यही कहा था के इस सबकी वजह बस अर्जुन है. अब बताओ क्या सिर्फ देखने भर से प्यार होना गुनाह है क्या? वो प्यार नहीं वापिस दीखता तोह मैं वैसी हे ज़िन्दगी अपना कर खुश रह सकती थी लेकिन यहाँ तोह जैसे जंजीरे ज्यादा हे कस गयी है.", निक्की भावुक हो कर बोल रही थी और हलकी रौशनी में उसकी आँखों से टिमटिमाते वो 2 मोती अर्जुन की नजरो में आ गए.
"वो 10 दिन अगर साड़ी ज़िन्दगी से प्यारे है तोह उन्हें बरकरार रखिये. एक दोस्त की तरह मैं आपके साथ हु.", अर्जुन ने उन आंसुओ को हटते हुए निक्की को बड़े प्यार से जताया था के वो बस खुश रहे. लेकिन अर्जुन को अपने इतने नजदीक देख कर निक्की की हिम्मत और जकड़न जवाब दे गयी. सब भूल कर वो अपने नरम होंठ अर्जुन से चिपका कर बस उसको महसूस करने लगी थी जैसे ये आखिरी ख़ुशी हो. आँखों से 2 आंसू और बहार निकल आये जो अर्जुन की काले पर गिरे. इस बार उसने हे अपने होंठो को हरकत देते हुए निक्की को प्रतिक्रिया में ाचे से चूम कर बता दिया था के वो भी परवाह करता है इंसान की भावनाओ की. एक मिनट में हे दोनों अलग हुए तोह अब निक्की के आंसू थम्म चुके थे और गीले चेहरे को अर्जुन ने रुमाल से साफ़ कर दिया था. कार चालू हो कर वापिस होटल की तरफ चल रही थी और निक्की शर्म से बस बहार देखती हुई अर्जुन से नजरे चुरा रही थी.
"तुम्हारी दोस्ती कुछ अलग लेवल की नहीं है?", निक्की ने हिम्मत करते हुए बस इतना हे कहा. वो एक बार पाने हे होंठो पर जीभ फिरने के बाद फिर से शर्मा रही थी.
"दोस्त बराबर की होती है निक्की जी. आपने एक कदम बाध्य तोह मैंने भी साथ दिया. लेकिन ये सिग्रत्ते और शराब सेहत के साथ साथ टास्ते भी खराब कर देती hai.",Car को होटल की पार्किंग में अर्जुन ने लगाया और निक्की ने झूठी नाराजगी दिखते उसकी बाजू पर हलके से मुक्का जड़ दिया.
"सचमुच शैतान हो तुम और इसका जीकर किसी से मैट करना नहीं तोह पांचवी मंजिल से निचे लटका दूंगी."
"लेके गॉड में जाना पड़ेगा और वैसे मैं नर्सरी में नहीं हु जो हर बात पूरे घर में बताता घुमु. बस आइंदा कोशिश करना अपने लिए जीने की. कैमरा उठा लीजिये, तस्वीर आपने हे लेनी है.", अर्जुन को अपनी उम्र से कही अधिक परिपक्व पा कर निक्की को अत्यधिक ख़ुशी हुई थी. अंदर जाते हुए उसने अर्जुन की कलाई थाम ली और अर्जुन ने भी कोई आपत्ति न दिखाई. माहौल कही ज्यादा हे ाचा रहा था अगले एक घंटे और विदा लेने से पहले निक्की ने अपना नंबर अर्जुन को देने के साथ हे जल्द मिलने का वादा भी किया. दोनों भाई रात के 11 बजे घर के लिए निकले थे और संजीव भैया रस्ते भर अर्जुन को छेड़ते आये थे. ये दिन भी बीत गया था जैसे हर दिन गुजरता है. अर्जुन आज बेझिजछक अपनी माँ के कमरे में जा चूका था और संजीव भैया ने बैठक में हे अपने चाचा की बगल में बिस्टेर लगते हुए नींद लेना बेहतर समझा.
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सवेरे 4 बजे हे रेखा जी अपना गाउन बंद करते हुए अर्जुन के बाथ के निचे तकिया रखने के बाद बाथरूम में चली गयी. उनका बीटा वही था हमेशा वाला मुन्ना जो उनके सीने से लग कर रात फिर से दूध चूसक्ता हुआ हे गहरी नींद में चला गया था. आज घर में कही ज्यादा हे काम थे सुबह के इस पहर में. छोल साहब और कौशल्या जी के साथ रुपाली, ऋतू और रेखा जी भी कौशल्या जी गाँव जा रहे थे. रामेश्वर जी अपने छोटे भाई के यहाँ राजकुमार जी, ललिता जी, माधुरी और अलका के साथ जाने वाले थे वही शंकर जी भी दिल्ली निकलने वाले थे क्योंकि देर रात को उनके नरिंदर की वापसी थी अमेरिका से और दिन में उन्होंने जरुरी kharid-dari करनी थी. आरती और प्रियंका ने भी ृत्त लगा ली थी की वो उनके साथ हे जाएँगी जिस वजह से रात हे वो धर्मवीर सांगवान जी की मेरसेदेज़ जीप लेते आये थे.
"मैंने चाय बना दी है माँ जी, अर्जुन अभी सामान रख देगा गाडी में जितने आप और पिता जी नाश्ता करेंगे.", नाहा धो कर रेखा जी ने रसोई संभल ली थी और शायद आज पहला अवसर था जब अर्जुन सबसे आखिर में उठ रहा था. 5 बजे तक तोह जैसे सारा घर हे तैयार हो चूका था जब अर्जुन कमरे से बहार आया.
"कोई बताएगा के आज कौनसा त्यौहार है जो मुझे नहीं पता?", अर्जुन के ऐसा कहने पर सबसे पहले दादी ने उसको गले लगाया.
"तुझे बताना भूल गए थे के आज हम कहा जा रहे है. लेकिन इतना पता है के तुम यहाँ पीछे से घर का पूरा ध्यान रखोगे.", इसके साथ हे उन्होंने आज का पूरा कार्यक्रम अर्जुन को बताया तोह वो थोड़ा सा निराश हो गया. रामेश्वर जी भी समझ गए थे के अर्जुन को ाचा नहीं लगा और ऐसा लग्न लाजमी भी था. वो अकेला हे रह जाता था हमेशा घर पर और वही बात कही जाती थी की वो घर का ख़याल रखे.
"ऐसा नहीं है बीटा के हमने तुम्हे जानबूझ कर ये नहीं बताया. कल तुम मिले हे नहीं दोपहर के बाद हमसे. और तुम्हे बुरा लग रहा है तोह तुम मेरे साथ चलो. यहाँ संजीव ध्यान रख ले गए और उसके काम वो फिर कभी कर लेगा.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर नाश्ता करते हुए शंकर जी के हाथ पल भर के लिए रुक गए.
"मुझे बुरा नहीं लगा दादा जी बस इतने सारे लोग चले जाते है तोह डर लगता है और कुछ नहीं.", अर्जुन की ये परवाह रेखा जी के साथ साथ उसके dada-daadi को भी समझ आ गयी थी.
"हाँ अब मेरा बचा बड़ा हो गया और सबकी देखभाल कर सकता है तोह ऐसा लग्न गलत भी नहीं है. लेकिन निश्चिंत रह बीटा और तेरी माँ मेरे साथ जा रही है. तेरे दादा जी भी अकेले थोड़ी है. तुझ पर 2-2 घर की जिम्मेवारी है आज.", अभी वो लोग ऐसे हे अर्जुन से बातें कर रहे थे की प्रीती भी इतनी सुबह तैयार हो कर अपने दादा जी के साथ यहाँ आ गयी थी. वो छोटा सा पिल्ला उसकी गॉड में हे था जिसको लेने की अर्जुन ने कोई कोशिश न की.
"आओ भाई तुम्हारा हे इन्तजार था. वैसे प्रीती बिटिया भी साथ जा रही है ये देख कर ाचा लगा.", रामेश्वर जी अपने नाश्ते से फारिग थे और उन्होंने वो पिल्ला अपने पास लेते हुए उसको फर्श पर रख दिया. कुछ पल वो मासूम ऐसे हे अपनी जगह खड़ा रहा और फिर पूरे आँगन का अवलोकन करने के बाद ऋतू के पास आ रुका. वो भी नीचे बैठ कर उसको दुलारने लगी.
"हाँ भाई साहब, अब ऋतू बिटिया चल रही है तोह प्रीती ये सुन्न कर साथ चलने की जिद्द करने लगी. इस बहाने बचे गाँव भी देख लेंगे और हर्कुलस (पिल्ला) भी इनके साथ खुश रहेगा.", छोल साहब ने Ritu-Preeti के साथ वाली बात कही तोह शंकर जी को जैसे एक मौका मिल गया था शरारत करने का और उन्हें इसका नतीजा पता नहीं था. छोल साहब के लिए कोमल दीदी चाय ले आयी थी और प्रीती ने दादी के कहने पर एक पराठे को गोल करते हुए ऐसे हे खाना शुरू कर दिया.
"प्रीती और ऋतू को ज्यादा हे आदत नहीं है साथ रहने की चाचा जी? कल को प्रीती इस घर में आएगी और ऋतू जायेगी इस घर से फिर दोनों को एडजस्ट करना मुश्किल पड़ेगा.", छोल साहब तोह इस बात पर हंस दिए थे लेकिन पहली बार रामेश्वर जी के चेहरे पर ये अलग से भाव आये और कौशल्या जी फटाक से हे बोल पड़ी बिना जगह और माहौल देखे.
"जो दिल से जुड़े हो न शंकर वो मर्डर कर भी दूर नहीं होते और मैं जितने यहाँ बैठी हु मेरी दोनों बछिया ऐसे हे साथ रहेंगी. तू भी जानता है के तेरी माँ बात की कितनी पक्की है और बच्चों के लिए क्या कुछ कर सकती है.", अब हैरान होने की बारी बहोत से लोगो की थी लेकिन ऋतू के चेहरे पर आयी ख़ुशी देख प्रीती भी नजरे बचते हुए इशारे से इसका राज पूछ रही थी. रसोईघर में कड़ी रेखा जी भी इस बात से थोड़ा चिंतित हो गयी थी की उनकी सास ने ऐसा हे क्यों कहा.
"मजाक हे तोह कर रहा था माँ. मेरे लिए तोह जैसी ऋतू वैसी प्रीती. मेरी हे बेटियां है दोनों और आप तोह ऐसे भड़क गयी जैसे मैंने दोनों को हे अलग करने का विचार बना लिया हो."
"रहने दे तू शंकर, ाचे से जानती हु मैं तुझे. वैसे अब तू परेशां लग रहा है मुझे तोह.", कौशल्या जी के चेहरे पर आयी ये मुस्कान देख सचमुच शंकर ने नजरे झुका ली थी. कहा तोह वो ऊँगली कर रहे थे किसी और तरफ और यहाँ चढ़ गए अपनी माँ के हाथे. साढ़े 5 तक अर्जुन ने दोनों गाड़ियों में जरुरी सामान रख दिया था और अगले 10 मिनट में हे रामेश्वर जी अपने रस्ते और कौशल्या जी अपने पीहर निकल चुके थे. संजीव भैया हे बचे थे घर में जो अभी तक गहरी नींद में सोये हुए थे और किसी ने भी उन्हें उठाया नहीं था. अर्जुन गलियारे से अंदर आया तोह उसके पिता के साथ साथ आरती और प्रियंका दीदी भी तैयार हो कर आँगन में आ चुकी थी.
"तुम्हारे लिए कुछ ले कर आना है दिल्ली से?", शंकर जी ने अपने बेटे की इत्छा jaan-ni चाहि तोह अर्जुन कुछ सोचने के बाद बस ना में गर्दन हिला कर अपनी बहनो को देखने लगा. जैसे उसको उनका जाना भी ाचा नहीं लग रहा था.
"बड़े पापा, इसके लिए मैं अपनी पसंद से ले लुंगी. पंजाब में भी मैंने हे इसकी ड्रेस ली थी तोह दिल्ली से भी पसंद कर लुंगी. अपना ध्यान रखना और घर पे हे रहना.", आरती ने बाकी दोनों बड़ो के सामने हे अर्जुन के सर पर हाथ फेरते हुए बड़े स्नेह से ऐसा कहा तोह अर्जुन मुस्कुरा दिया. ये लोग भी बहार निकल गए तोह अर्जुन मुख्या द्वार बंद करके उस एक कमरे वाली व्यायामशाला में जा घुसा.
'और वेट लाने पड़ेंगे', वो जितना भी वजन मौजूद था उस से सीने की कसरत करता पसीना बहा रहा था आधे घंटे बाद. शरीर की हर मांसपेशी उभर कर फूल चुकी थी लेकिन अर्जुन जैसे किसी और हे धुन में सवार 120 किलो वजन का ये पांचवा सेट लगा था. इस बेखयाली में उसको तारा और कोमल दीदी भी नजर नहीं आयी जो शरीर की लचक वाली कसरत करने के बाद एक दूसरे की मदद कर रही थी फर्श पर मत बिछा कर पेट की कसरत करते हुए.
'तंत्र' की इस आवाज से दोनों लड़कियों का भी ध्यान अर्जुन पे गया जो उमस और इतनी मेहनत करने पर पसीने से भीगा हुआ खड़ा हो कर अपनी गर्दन की अकड़न ठीक कर रहा था. तारा तोह अपलक बस अर्जुन के कटाव और पहली हुई chhati-baahen निहार रही थी. कोमल दीदी के भी अंदर हलचल तोह हुई लेकिन बहार जाहिर न करते हुए उन्होंने हे ख़ामोशी भांग की.
"वेंटिलेशन की प्रॉब्लम है न यहाँ थोड़ी ारु?", अर्जुन इस आवाज से अपनी दीदी को देख कर थोड़ा चौंक गया. नीले रंग की ढीली टीशर्ट और सफ़ेद इलास्टिक वाले पाजामे में कसरत करती वह कैसी लग रही थी ये बताने के लिए जैसे लफ्ज़ हे न थे. वही तारा की छोटी सी निक्कर और बनियान जैसी टीशर्ट भी उसके कामदेवी स्वरुप में इजाफा कर रहे थे.
"हाँ दीदी, वो एक विंडो इस दिवार पर बनवा देता हु मैं मिस्त्री को बोल कर. एग्जॉस्ट फैन लगवा देने से दिक्कत नहीं आएगी. वैसे मैं आज मार्किट से थोड़े और वेइट्स डम्बल लाने का सोच रहा था, आपको कुछ लेना हो तोह साथ चल सकती हो.", अर्जुन ने अपने निर्वस्त्र सीने पर तोलिये से पसीना साफ़ करने के बाद बनियान पहनें ली थी. एक बार फिर वह बेंच पर लेट गया तोह कोमल दीदी की नजर उसकी भुजाओ पर गयी. हर तरफ सिर्फ मजबूत मांसपेशिया उभरी थी और अर्जुन का बनियान पहन न बता रहा था के इस से पहले शायद उसको इन दोनों के आने का पता न लगा.
"मार्किट 1 बजे के बाद चलते है न अर्जुन. मैंने थोड़ा सामान लेना है लेकिन कंपनी से 12:30 तक हे निकल सकुंगी. अगर तुम्हे ठीक लगे तोह.", तारा के ऐसा कहने पर कोमल दीदी ने भी सहमति जताई.
"और तब तक घर के सारे काम भी हो जायेंगे. कामवाली दीदी को भेजने के बाद एक बजे हे चलते है मार्किट. दोपहर में भीड़ भी नहीं होगी और सब आराम से खरीद सकेंगे.", अर्जुन ने 10 बार रोड ऊपर निचे करने के बाद खड़े हो कर शरीर को आराम दिया और पानी का हल्का घूँट लेते हुए हाँ में गर्दन हिला दी.
"ठीक है दीदी. मुझे भी थोड़ा काम है जो मैं नाश्ते के बाद कर लूंगा और फिर 1 बजे चलते है मार्किट. मैं बगीचे में पानी देने के बाद नाहा लेता हु, आप मेरा दूध तैयार कर देना.", अर्जुन इतना बोल कर बहार चला गया तोह कोमल दीदी ने तारा का कान खींचते हुए कहा.
"तू पक्की बेशरम हो रही है तारा. मेरे सामने हे उसको कैसे ताड़ रही थी."
"यार आप भी कमाल हे हो दीदी. आपकी कमर में भी हलचल हो रही थी उसको देखते हुए लेकिन इल्जाम सिर्फ मेरे ऊपर. वैसे सच कहु तोह मेरा दिल कर रहा था के वो इस रोड की जगह मुझे अपने सीने पर बैठा ले. आह्हः.. नाउ ी हैवे थिस फंतासी."
"फंतासी की बची, इधर ध्यान दे तू. बेशरम होती जा रही है हर दिन के साथ. वैसे तूने मार्किट से क्या लेना?", तारा वापिस कोमल दीदी की मदद करने लगी घुटने सीने से लगवाने में. शरीर के वो मादक कटाव इन दोनों हे अप्सराओ में भरपूर थे.
"कुछ भी नहीं लेना लेकिन साथ चलना है. वैसे ऋतू ने कहा था के उसको स्ट्रेटचेब्ले शॉर्ट्स चाहिए अलका जैसे तोह वो भी ले लुंगी और आरती के लिए रनिंग शूज भी. आप क्या लेने वाली हो?", कोमल दीदी अपने आप हे बालनके बनाने लगी तोह तारा ने ट्रेडमिल का रुख करते हुए रनिंग चालू कर दी.
"जो पसंद आएगा वो ले लुंगी बाकी अर्जुन के साथ जा रही हु तोह वो खुद भी पसंद कर लेगा कुछ न कुछ. अब 10 मिनट तू आराम से अकेले रनिंग कर मैं भी नाहा कर रसोई में जाती हु. संजीव भैया को भी चाय चाहिए होगी उठते हे और फिर वो भागने की जल्दी भी करेंगे. ताई जी बता कर गयी है के उन्हें आज जरुरी मीटिंग में जाना है.", कोमल दीदी ने कपड़ो को ठीक करने के बाद अपना मत सही जगह रखते हुए बहार का रुख किया और तारा इत्मीनान से दौड़ पर ध्यान देने लगी.
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निक्की आज जल्दी उठ कर निवाये पानी में निम्बू पीते हुए अपनी हे दुनिया में खोयी थी. पिछले 2 हफ्तों में उसकी बेरंग ज़िन्दगी में जाने क्या क्या हो गया था और कल रात जैसे उसने 27 की उम्र में वो पाया था जिसकी तलाश जाने कबसे थी. लेकिन इस रास्ते की भी मंजिल नहीं थी. विचारो में ऐसे खोये देख नीतू ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया. दोनों हे युवतिया इस वक़्त पारदर्शी से ढीले पाजामे और बिना ब्याह की टीशर्ट में थी. कमरा नीतू का था और दोनों हे जवान थी तोह साफ़ था के इन कपड़ो के भीतर अंतःवस्त्र नदारद थे.
"एक तोह तू कितनी बदल गयी है जो की एक ाचा बदलाव है. दूसरा तेरे जैसी लड़की ऐसे बहार देखते हुए खयालो में है तोह बात ख़ास हे होगी. कल रात भी तूने तीसरा गिलास लेने से मन कर दिया था और मुझे भैया की सिग्रत्ते चुराने को भी नहीं कहा.", नीतू एक हलकी सांवली सी खूबसूरत युवती है जिसको बात करने का भी सलीका था. वही निक्की का चरित्र हमेशा tej-sakht कामकाजी युवती का था जिसको पैसे का घमंड सिर्फ एक आवरण की तरह था लेकिन अंदर से वो बिलकुल खोखली थी. कुछ समय पहले हे शायद वो खुद को नया जीवन देने लगी थी.
"हाँ बात ख़ास हे है डार्लिंग. ये शराब कभी ाची लगी हे नहीं थी बस खुद से भागने का जरिया था. सिग्रत्ते तोह तुझे भी पता है के मैं कैसे पीती थी जो अब मैं हाथ नहीं लगाने वाली. अपने लिए ज़िन्दगी जी भी तोह सही से नहीं जी यार नीतू. अब जरा अपने साथ साथ सभी के लिए जी कर देखते है. बिज़नेस भी जॉब की तरह और लाइफ भी."
"और ये कौन सा जादूगर है जिसने इतना बदल दिया इस खूबसूरत हिटलर को? राधिका भी ये न कर सकीय तोह साफ़ है के कोई लवर मिल हे गया है तुझे."
"ऐसी बात नहीं है के लवर मिला है लेकिन एक सही इंसान मिला है और वो फिर चाहे दोस्त की तरह रहे या जैसे उसका दिल करे, लेकिन aas-pas जरूर रहे. कुणाल याद है तुझे?", निक्की ने जिस लड़के का नाम लिया था शायद उसकी छवि कही ज्यादा काली रही होगी.
"उस कुत्ते को इतनी सवेरे याद क्यों कर रही है तू? इंडिया से नहीं भागता तोह मौसा जी ने उसको मार कर गटर में फेंक देना था.", नीतू के चेहरे पर आये गुस्से को नजरअंदाज करते हुए निक्की ने कांच से बहार आसमान में उड़ते पंछियो को देखा और मुस्कुराते हुए कहने लगी.
"वो मेरे साथ था क्योंकि हमारा परिवार, पैसा, मेरी ख़ूबसूरती और अपने लालच की वजह से. मैंने ट्रस्ट किया था उसपर तोह उसने मेरा हे वीडियो बनाने की प्लानिंग की थी जिसके दम पर वो कुछ भी करता. लेकिन इतने सालो बाद मैंने अब जिसको देखा उसको इन सबकी तोह इत्छा हे नहीं है और जैसे उसके लिए मेरी ख़ूबसूरती भी मायने नहीं रखती. फिर भी एक अनजान होते हुए वो मेरी परवाह वैसे हे करता है जैसे मैं उसके लिए ख़ास हु. हाँ मैं तोह पसंद करने लगी हु उसको लेकिन नीतू वो हमसफ़र नहीं बन्न सकता."
"जिन्हे तू निहार रही है न निक्की, वो पंछी आज साथ है और कितने खुश भी है क्योंकि वो भविष्य का नहीं सोचते और अपनों के साथ है. कल रात तू बड़ा कह रही थी की जो आज है अभी है वही है. आने वाला पल किसने देखा. ेट्स ेट्स... लेकिन अर्जुन को आइना दिखते दिखते तू खुद हे उसको दिल में क़ैद कर गयी. लेकिन मुझे इसमें कोई बुराई नहीं नजर आती यार. अगर उसके कुछ पल के साथ से हे तेरी ज़िन्दगी को एक नया रूप मिलता है तोह ये सौदा घाटे का नहीं है. हैरान मत हो के मैं कैसे जान गयी के वो लड़का अर्जुन है. नशे में संजीव और अनमोल हो सकते है मैं नहीं थी जब तूने उसको किश किया था कार में पर्स ढूंढ़ने के बहाने पर. जब दिल करे तू उसको यहाँ बुला कर मिल सकती है या फिर जहा तेरा दिल कर इस शहर में."
"तू न इसलिए मेरी फवौरीते है नीतू. चल देखते है ये किस्मत इस बार किधर ले जाती है."
"किस्मत नहीं निक्की, सही कदम कहा लेके जा सकते है ये देखना. वो लड़का संजीव का भाई है और इतना दावा कर सकती हु के वो तेरा फायदा नहीं उठाएगा चाहे तू उसको उसे कर ले. तुझे देख कर सभी खुश है निक्की और ये ख़ुशी मायने रखती है न की एक उलझा हुआ भविष्य जिसके बारे में सोच कर अपना वर्तमान डाव पर लगाना बेवकूफी होगा. तुझे फिर से मिलना है क्या अर्जुन से?"
"नहीं यार आज नहीं मिलना. अभी बस तैयार हो कर मैं निकलती हु भाभी के साथ. राधिका से जरूर मिलना है और तू तेरे भी 2 कपडे साथ रख ले. आज वेडनेसडे है तोह सैटरडे मैं वापिस आ जाउंगी तेरे साथ इधर.", निक्की ने खड़े होते हुए एक बार नीतू को अपने आगोश में लिया और फिर बाथरूम में चली गयी.
'बड़े दर्द को ख़तम करने में अगर ढेर सारा प्यार और कुछ दर्द मिले तोह ऐसा कर लेना चाहिए मेरी बहिन. क्या पता शायद वो थोड़ा दर्द भी न मिले जिसकी तकलीफ के बारे में अभी से सोच रहे है.', निक्की के लिए इतना सोचती हुई नीतू भी अलमारी से कपडे निकलने लगी थी. उसको ाचा लग रहा था के निक्की ने कोई दिखावा किये बिना सब कबूला और अब उसको भी अपने साथ ले कर चल रही थी.
Safar-Humsafar (1)
शहर के पुराने हिस्से से निकलते हाईवे पर स्थित था ये प्रख्यात restra-hotel जहा अर्जुन को लिए संजीव भैया इस ख़ास raatri-bhoj पर आये थे. अर्जुन की पिछली कक्षा में रही अंग्रेजी विषय की शिक्षिका अरुणा गोस्वामी निक्की और राधिका की सगी मौसी थी जिनके यहाँ निक्की आज रुकी थी. 3 सितारा होटल के इस रेस्ट्रा में इस वक़्त हल्का संगीत बज रहा था और इस हलकी रौशनी वाले भाग में ये 6 लोग इस ख़ास टेबल पर जमा थे. संजीव ने हे इन सभी को अर्जुन का परिचय दिया था अर्जुन को भी हरेक से अवगत करवाने के बाद वेटर को सभी की इत्छा अनुसार snacks-drinks का आर्डर दिया.
"अर्जुन, अनमोल भैया दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ने के बाद अब प्रख्यात अखबार के एडिटर है. निक्की से तोह तुम परिचित हो अब और ये नीतू है, अनमोल भैया की छोटी सिस्टर जो अभी B.Ed. कर रही है. दोनों के मदर तुम्हारे इंग्लिश के मैडम अरुणा आंटी है.", अर्जुन आज से पहले तोह कभी भी ऐसी जगह अपने भैया के साथ नहीं आया था और ऊपर से सभी लोग एक तरह से परिवार से जुड़ने वाले थे जिन्हे वो आज हे मिल रहा था.
"अर्जुन भाई, संजीव की बातें सीरियसली मत लेना. तुम मेरे दोस्त और मैं तुम्हारा दोस्त. ये है मेरा जीजा. कौन क्या काम करता है क्या नहीं ऐसे बोरिंग टॉपिक के लिए यहाँ नहीं आये हम लोग. बिंदास अपनी बातें करते है, खाने पीने के साथ.", अनमोल के ऐसे कहने पर अर्जुन को थोड़ा ाचा लगा लेकिन बायीं तरफ बैठी निक्की ने कोहनी मारी तोह वह फिर से झेंप गया.
"अनमोल भैया, आपकी बात बिलकुल सही है लेकिन संजीव भैया ने यहाँ आने तक मुझे ये बताया हे नहीं के हम कहा जा रहे है. आप लोगो से फर्स्ट टाइम मिल रहा हु और वो भी गिफ्ट लाये बिना.", अर्जुन की बात सुन्न कर सभी हंसने लगे थे लेकिन निक्की मुस्कुराते हुए भी बस अर्जुन को देख रही थी जो अटपटा जरूर था.
"इस बोतल के लिए ऐसा कह रहा है क्या भाई? ये मैंने मंगवाई थी संजीव से क्योंकि कल किसी को गिफ्ट देनी है और मुझे ये मिल नहीं रही थी. और छोटे भाई उपहार देते नहीं लेते है. मैं तोह विद्या भाभी से हर बार गिफ्ट लेता हु.", अनमोल के कहने पर विद्या भाभी भी मुस्कुराने लगी जो अब दिन से बिलकुल अलग एक ख़ास सलवार कमीज में किसी युवती सी लग रही थी.
"अनमोल देवर होने के साथ साथ छोटा भाई है मेरा अर्जुन जी. सागा भाई नहीं है न मेरा कोई तोह इसने मुझसे ये रिश्ता बना लिया. और नीतू के रूप में छोटी बहिन भी मिल गयी मुझे.", अर्जुन के साथ साथ संजीव भैया को भी बात बहोत ाची लगती थी जान कर. इधर 2 वेटर बड़ी सावधानी से इनकी टेबल पर स्नैक्स के साथ साथ ड्रिंक्स भी रखने लगे. उन्होंने युवक देख कर वो शराब का तीसरा गिलास अर्जुन के सामने रख दिया और तीनो युवतियों के सामने हरे तरल वाला गिलास जिस पर निम्बू लगाया गया था.
"ये मेरा नहीं है.", अर्जुन ने हड़बड़ाते हुए ऐसा कहा तोह निक्की ने मुस्कुराते हुए अपने गिलास के साथ वो गिलास बदल लिया और वेटर ख़ामोशी से सब सामान लगा कर चले गए. अर्जुन असमंजस से निक्की को देख रहा था.
"क्यों लड़कियां ड्रिंक नहीं कर सकती क्या? वैसे भी होटल चलना सीखने के साथ साथ इसकी भी आदत हो गयी है. कभी कभी.", निक्की ने सफाई दी और संजीव भैया ने भी सहमति जताई
"अल्कोहल बुरा नहीं है छोटे है बस एक सीमा से ज्यादा नहीं. वैसे भी सभी 2-2 ड्रिंक हे लेंगे और उसके कुछ देर बाद डिनर करते हे हम चलते है."
"यार तुम तोह ाचे खासे हो अर्जुन, मुझे लगा beer-whiskey जरूर पीते होंगे. तुम भाई ये लेमोनेड लेके बैठे हो.", अनमोल भैया की बात सुन्न कर अर्जुन थोड़ा मुस्कुराया था.
"आप ये सब किस लिए पीते है भैया, एन्जॉय करने के लिए या फिर दिमाग को आराम देने के लिए शायद.", अर्जुन के कथन पर अनमोल के साथ साथ निक्की और संजीव ने भी सहमति जताई और विद्या भाभी के साथ नीतू भी गौर से अर्जुन को देखने लगी जैसे वो कुछ अलग कहने वाला हो
"मैं छोटा हु तोह इस बारे में कुछ नहीं कहूंगा लेकिन मैं तोह वैसे हे बहोत खुश हु आप लोगो से मिल कर. लाइफ में वही करना चाहिए जो सही लगे और भैया ने कहा था के जिस दिन मैं कॉलेज में जाऊंगा तब ये मुझे अपने साथ बियर पिलायेंगे. ख़ास दिन होगा और मैं ये हमेशा याद रखना चाहता हु.", अर्जुन की बात से जहा अनमोल के चेहरे पर ख़ुशी आयी की दोनों भाई आपस में कितना प्यार रखते है वही निक्की बोल हे पड़ती है.
"ऐसे डेट निकाल कर हर काम करोगे तोह कही ऐसा न हो 29 फेब उस साल हो हे न. ये ज़िन्दगी आज है अर्जुन, अभी है और एक मिनट बाद का भी कुछ पता नहीं."
"लगता तोह नहीं निक्की जी के आप इस बात को वैसे हे समझती है जैसे आपने अभी कहा है. वैसे मैं खुद आज में हे जीता हु लेकिन कुछ सपने सही समय को सौंप कर और बाकी किस्मत पर.", अर्जुन की बात सुन्न कर निक्की को ऐसे जवाब की कटाई उम्मीद न थी. एक घूँट में बाकी जाम ख़तम करती वो टिश्यू से मुँह साफ़ करने लगी. संजीव भैया ने भी 3 पेग और मशरुम टिक्का का आर्डर दिया तोह जाम तुरंत आ गए. इस बीच निक्की बस खामोश थी और अर्जुन भी बाकी सबकी बातें हे सुन्न रहा था. विद्या भाभी तोह यहाँ ाचे से घुलमिल कर बात कर रही थी वही अनमोल भैया भी एक दिलचस्प व्यक्ति थे.
"बस भाई अगला पेग लेने से पहले एक सिग्रत्ते पिलवा दो तोह मजा आ जाये संजीव.", निक्की के चेहरे के भाव सिग्रत्ते लफ्ज़ सुन्न कर थोड़ा अजीब से हो गए थे. वही संजीव भैया भी जैसे ऐसे हे मौके की तलाश में थे. दोनों उठ कर बहार की तरफ निकल गए थे दूसरा गिलास भी खाली करते हुए.
"भाभी मुझे वाशरूम जाना है, आप चलिए मेरे साथ.", नीतू ने हलके से बात कही तोह वो दोनों भी महिला प्रसाधन कक्ष की तरफ चली गयी जो एक तरफ बना था रेस्ट्रा के आखिर में. अब अर्जुन को बात करने का मौका मिल गया था निक्की से अकेले में.
"आप परेशां है? चाहे तोह मैं मुझे बता सकती है, शायद मैं कुछ हेल्प कर सकू."
"तुम नहीं कर सकते मेरी मदद और फिर न जाने तुम मेरे बारे में क्या सोचने लगोगे.", निक्की जैसे उलझन में थी और कुछ चिड़चिड़ी दिख रही थी.
"आपका नजरिया मेरे प्रति क्या होगा या मेरा आपके लिए वो अलग बात है निक्की जी. जरुरी है तोह फ़िलहाल बात करना और यकीन कीजिये मैं कभी इंसान के व्यक्तिगत मूल्यों की तुलना नहीं करता या किसी को क्या पसंद है क्या नहीं. ये सब निजी बात है लेकिन अगर कुछ ऐसा है जो मैं कर सकता हु तोह जरूर करूँगा.", अर्जुन का इतना सरल दिल और गहरी बात सुन्न कर निक्की ने एक तरफ आये अपने रेशमी सीधे बालो को कंधे से पीछे करते हुए एक बार ाचे से उसके चेहरे को देखा और बोली.
"मेरा सिग्रत्ते पीने का दिल है अर्जुन और न वह तुम ला सकते हो और न मैं संजीव या अनमोल से मांग सकती हु. ऊपर से ऐसे खुलेआम पी भी नहीं सकती. अब जो नहीं हो सकता तोह उसके बारे में क्या कहु.", निक्की की बात पर अर्जुन भी हलके से मुस्कुरा दिया. इधर विद्या भाभी के साथ नीतू भी वापिस आ गयी थी और अपनी कुर्सी पर दोनों बैठ चुकी थी. संजीव भैया एक साथ अनमोल भैया भी आ गए थे एक मिनट बाद शायद दोनों ने एक हे सिग्रत्ते सांझी की थी.
"भैया, आप कैमरा भी लेके आये थे न? सभी फोटो तोह बनती हे है पहली बार मिलने की.", अर्जुन के ऐसा कहने पर संजीव भैया ने हाँ में सर तोह हिलाया लेकिन मज़बूरी भी बता दी.
"भाई उसके चारो सेल डेड है और ये अभी पता चल जब मैं अनमोल भैया के साथ उसको चेक कर रहा था."
"देखो अभी आप लोग तोह ek-ek गिलास और लेने वाले है, मैं पिछले चौक से सेल ले आता हु. चाबी दीजिये जरा कार की.", संजीव ने अपने छोटे भाई से कोई सवाल किये बिना चाबी सामने कर दी जो इलो की थी.
"निक्की जी आप आटोमेटिक कार चला लेती है न?", और अब निक्की के चेहरे पर अलग हे चमक आ गयी थी क्योंकि अर्जुन ने उसके लिए रास्ता बना दिया था.
"चलो यार इस बहाने मैं थोड़ा फ्रेश भी हो जाउंगी.", चाबी थामे वो बड़ी अदा से उठ कर अर्जुन के साथ बहार की तरफ चली तोह एक पल के लिए संजीव की नजरे भी उन कैसे हुए नितम्बो पर चली गयी जो जिस्म से चिपकी जीन्स में क़ैद थे लेकिन फिर नजर अगल बगल में की तोह कुछ और जोड़ी आँखे भी निक्की की खूबसूरती को ताड़ती मिली तोह मुस्कुराते हुए वापिस ध्यान अपने गिलास पर लगाया.
"बड़ी हे चालू चीज हो यार तुम तोह. मतलब मुझे लगा था के एक खूबसूरत लड़की की फरमाइश तुम चुटकी में हे पूरी कर डोज लेकिन यहाँ तोह लड़की से हे म्हणत करवा रहे हो.", दोनों कार तक आये तोह अर्जुन ने कार की चाबी वापिस ले ली निक्की से और ड्राइवर साइड के बराबर वाला दरवाजा खोल कर पहले निक्की को बैठाया और स्टीयरिंग पर बैठने के बाद खुद हे कार सावधानी से आगे बढ़ा ली.
"म्हणत नहीं करवा रहा निक्की जी बस ध्यान रख रहा हु के आपका राज बस राज हे रहे. सिग्रत्ते तोह मैं होटल के बहार वाले पनवाड़ी से भी ले आता और फिर ऊपर या कही कोने में जा कर आप पी भी लेती लेकिन वातानुकूलित जगह पर उसकी गंध जरूर आती आपके कपड़ो से. यहाँ आप आराम से कार में बैठिये मैं अभी आया.", अर्जुन ने अँधेरे में हे कार एक खुली सी पार्किंग पर लगाने के बाद इंडिकेटर चालू कर दिए. वो 50 कदम दूर उन छोटी दुकानों की तरफ बढ़ गया. निक्की इधर कार में बैठी अब कही ज्यादा हे अर्जुन के बारे में सोच रही थी. 2 गिलास शराब का असर भी उतना न हुआ था जितना इस लड़के की एक लाइन में दिखाई गयी परवाह ने कर दिया.
"भैया सिग्रत्ते देना एक और एक माचिस भी.", अर्जुन को ये तोह पता हे नहीं था के निक्की कौनसी सिग्रत्ते पीती है और न हे उसने पूछा था. लेकिन दुकानदार उसको देखने लगा.
"कौनसा ब्रांड दू भाई?", अब वो भैया वाली मांगता तोह क्या पता निक्की वो नहीं पीती हो.
"लड़कियां कौनसी सिग्रत्ते पीती है? उनकी अलग सिग्रत्ते तोह नहीं आती कोई?", ये आदमी समझ गया था के अर्जुन किसके लिए ले रहा है और शायद ये खुद धूम्रपान नहीं करता है.
"ये पतली सिग्रत्ते है जो शौकिया पी जाती है इसका नाम मोरे है भाई. और ये विल्स क्लासिक मेंथोल, ये 555 लाइट और ये बेंसोन लाइट है. लड़किया ज्यादातर तोह लाइट हे सिग्रत्ते पीती है.", अर्जुन ने वो बिलकुल सफ़ेद सिग्रत्ते देखि तोह हाथ में उठा ली.
"ये कितने की है भैया?"
"4 रुआपये की और ये लो माचिस. च्लोरमिंट के साथ हो गए पूरे 5 रुपये.", अर्जुन ने पैसे देते हुए वो सफ़ेद सिग्रत्ते सावधानी से पकड़ी और बगल की दूकान से 4 सेल लेने के बाद कार की तरफ आ गया. अब निक्की के चेहरे पर अलग हे चिंता देख वो कुछ हैरान हो गया.
"ये लीजिये और आराम से यही बैठ कर पी लीजिये.", निक्की ने सिग्रत्ते तोह पकड़ ली लेकिन माचिस जैसे उसको भी सही से जलनि नहीं आती थी और अर्जुन ने यहाँ भी मदद करते हुए तिल्ली सिग्रत्ते के सामने की तोह उस लाल रौशनी में निक्की की चमकती आँखें जैसे बहोत कुछ कह गयी.
"बहार खड़े हो सकते है? यहाँ और तोह कोई दिख नहीं रहा. कार में भी स्मेल नहीं आएगी तोह तुम्हे भी दिक्कत नहीं होगी.", अर्जुन इतना सुन्न कर बहार आ गया और अब दोनों हे निक्की वाली तरफ खड़े थे.
"आप मुझे ऐसे क्यों देख रही है दिन से जैसे आप मुझे पहचान रही है या शायद कुछ ढून्ढ रही है मेरे चेहरे में?", अर्जुन की बात ने तोह निक्की को हैरान हे कर दिया था. वो कैसे समझ गया के निक्की उसको पहचान ने की कोशिश कर रही है.
"तुम्हे चाहने लगी हु मैं जबसे देखा है लेकिन अब जिस रिश्ते से तुम सामने आये हो तोह दिल को समझा रही हु के किस्मत ने मेरी ाचे से मारने की ठान राखी है. देखने के बाद बस एक तुम्हारी हे तस्वीर दिल में छपी है और मैं खुश थी की वो अनजान कितना प्यारा और परवाह करने वाला था. तुम सामने आये तोह दिल बैठ गया के आखिर ऐसे हे मिलवाना था किस्मत को मुझे उस लड़के से जिसके सपने मैं देखने लगी थी.", निक्की की बातों ने अर्जुन के होश हे उड़ा दिए थे.
"हम तोह पहले कभी मिले हे नहीं और मैं हर मिलने वाले को याद रखता हु."
"कैसे याद रखते उस भीड़ को अर्जुन जो बस उस मर्द को निहार रही थी जो अपनी बहनो के लिए सरे राह उन भेड़ियों को सबक सीखा रहा था जिनके इरादे गलत थे. मैंने हे उन सरदार इंस्पेक्टर से गवाही देने की बात कही थी पंजाब की उस मार्किट में लेकिन उन्होंने मामले से मुझे दूर हे रहने को कहा. फिर किस्मत ने दूसरी बार मुझे मोडल टाउन में तुम्हारा दीदार करवाया तोह वह एक अलग लड़की थी तुम्हारे पास. कबूतरों को दाना खिलते हुए देख मैं बस दूर से निहार रही थी की अगर प्यार हो तोह किसी ऐसे के साथ जो हर ज़िन्दगी की कदर करता है. आज मैं ड्रिंक नहीं करने वाली थी लेकिन तुमसे मिली तोह लगा के पहले जैसी चल रही थी अब वैसे हे चलने देते है. ये 10 खूबसूरत दिन जिनमे मैं तुम्हारे जैसा बन्न न छह रही थी मेरे लिए यादगार रहेंगे.", इस दौरान निक्की ने सिग्रत्ते का बस एक हे काश लिया था और बाकी हवा ने हे ख़तम कर दी थी. अर्जुन ने वो बचा हुआ टोटा उन खूबसूरत उंगलिया से निकल कर एक तरफ फेंका और निक्की को कार में बैठा दिया. अपनी सीट पर बैठने के बाद भी अर्जुन ने कार चालू नहीं की.
"आपको ाचा क्या लगा? वो पुराणी ज़िन्दगी ये वो 10 दिन जिसमे मेरी एक छवि थी?"
"मुझे तुम ाचे लगे अर्जुन. तुम सबकी तरह नहीं हो जो जिम्मेवारी के बोझ का रोना रट है, अपने स्टेटस या रुतबे का दिखावा करते है. एक तरफ तुम ऐसे इंसान हो जो किसी की िज्जात्त के लिए मौत की परवाह नहीं करते वही दूसरी तरफ तुम हर छोटे से जीव की ज़िन्दगी की भी परवाह करते हो. तुम्हारे घर और परिवार को देखने के बाद मेरी संजीव से भी जब बात हुई तोह उसने भी यही कहा था के इस सबकी वजह बस अर्जुन है. अब बताओ क्या सिर्फ देखने भर से प्यार होना गुनाह है क्या? वो प्यार नहीं वापिस दीखता तोह मैं वैसी हे ज़िन्दगी अपना कर खुश रह सकती थी लेकिन यहाँ तोह जैसे जंजीरे ज्यादा हे कस गयी है.", निक्की भावुक हो कर बोल रही थी और हलकी रौशनी में उसकी आँखों से टिमटिमाते वो 2 मोती अर्जुन की नजरो में आ गए.
"वो 10 दिन अगर साड़ी ज़िन्दगी से प्यारे है तोह उन्हें बरकरार रखिये. एक दोस्त की तरह मैं आपके साथ हु.", अर्जुन ने उन आंसुओ को हटते हुए निक्की को बड़े प्यार से जताया था के वो बस खुश रहे. लेकिन अर्जुन को अपने इतने नजदीक देख कर निक्की की हिम्मत और जकड़न जवाब दे गयी. सब भूल कर वो अपने नरम होंठ अर्जुन से चिपका कर बस उसको महसूस करने लगी थी जैसे ये आखिरी ख़ुशी हो. आँखों से 2 आंसू और बहार निकल आये जो अर्जुन की काले पर गिरे. इस बार उसने हे अपने होंठो को हरकत देते हुए निक्की को प्रतिक्रिया में ाचे से चूम कर बता दिया था के वो भी परवाह करता है इंसान की भावनाओ की. एक मिनट में हे दोनों अलग हुए तोह अब निक्की के आंसू थम्म चुके थे और गीले चेहरे को अर्जुन ने रुमाल से साफ़ कर दिया था. कार चालू हो कर वापिस होटल की तरफ चल रही थी और निक्की शर्म से बस बहार देखती हुई अर्जुन से नजरे चुरा रही थी.
"तुम्हारी दोस्ती कुछ अलग लेवल की नहीं है?", निक्की ने हिम्मत करते हुए बस इतना हे कहा. वो एक बार पाने हे होंठो पर जीभ फिरने के बाद फिर से शर्मा रही थी.
"दोस्त बराबर की होती है निक्की जी. आपने एक कदम बाध्य तोह मैंने भी साथ दिया. लेकिन ये सिग्रत्ते और शराब सेहत के साथ साथ टास्ते भी खराब कर देती hai.",Car को होटल की पार्किंग में अर्जुन ने लगाया और निक्की ने झूठी नाराजगी दिखते उसकी बाजू पर हलके से मुक्का जड़ दिया.
"सचमुच शैतान हो तुम और इसका जीकर किसी से मैट करना नहीं तोह पांचवी मंजिल से निचे लटका दूंगी."
"लेके गॉड में जाना पड़ेगा और वैसे मैं नर्सरी में नहीं हु जो हर बात पूरे घर में बताता घुमु. बस आइंदा कोशिश करना अपने लिए जीने की. कैमरा उठा लीजिये, तस्वीर आपने हे लेनी है.", अर्जुन को अपनी उम्र से कही अधिक परिपक्व पा कर निक्की को अत्यधिक ख़ुशी हुई थी. अंदर जाते हुए उसने अर्जुन की कलाई थाम ली और अर्जुन ने भी कोई आपत्ति न दिखाई. माहौल कही ज्यादा हे ाचा रहा था अगले एक घंटे और विदा लेने से पहले निक्की ने अपना नंबर अर्जुन को देने के साथ हे जल्द मिलने का वादा भी किया. दोनों भाई रात के 11 बजे घर के लिए निकले थे और संजीव भैया रस्ते भर अर्जुन को छेड़ते आये थे. ये दिन भी बीत गया था जैसे हर दिन गुजरता है. अर्जुन आज बेझिजछक अपनी माँ के कमरे में जा चूका था और संजीव भैया ने बैठक में हे अपने चाचा की बगल में बिस्टेर लगते हुए नींद लेना बेहतर समझा.
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सवेरे 4 बजे हे रेखा जी अपना गाउन बंद करते हुए अर्जुन के बाथ के निचे तकिया रखने के बाद बाथरूम में चली गयी. उनका बीटा वही था हमेशा वाला मुन्ना जो उनके सीने से लग कर रात फिर से दूध चूसक्ता हुआ हे गहरी नींद में चला गया था. आज घर में कही ज्यादा हे काम थे सुबह के इस पहर में. छोल साहब और कौशल्या जी के साथ रुपाली, ऋतू और रेखा जी भी कौशल्या जी गाँव जा रहे थे. रामेश्वर जी अपने छोटे भाई के यहाँ राजकुमार जी, ललिता जी, माधुरी और अलका के साथ जाने वाले थे वही शंकर जी भी दिल्ली निकलने वाले थे क्योंकि देर रात को उनके नरिंदर की वापसी थी अमेरिका से और दिन में उन्होंने जरुरी kharid-dari करनी थी. आरती और प्रियंका ने भी ृत्त लगा ली थी की वो उनके साथ हे जाएँगी जिस वजह से रात हे वो धर्मवीर सांगवान जी की मेरसेदेज़ जीप लेते आये थे.
"मैंने चाय बना दी है माँ जी, अर्जुन अभी सामान रख देगा गाडी में जितने आप और पिता जी नाश्ता करेंगे.", नाहा धो कर रेखा जी ने रसोई संभल ली थी और शायद आज पहला अवसर था जब अर्जुन सबसे आखिर में उठ रहा था. 5 बजे तक तोह जैसे सारा घर हे तैयार हो चूका था जब अर्जुन कमरे से बहार आया.
"कोई बताएगा के आज कौनसा त्यौहार है जो मुझे नहीं पता?", अर्जुन के ऐसा कहने पर सबसे पहले दादी ने उसको गले लगाया.
"तुझे बताना भूल गए थे के आज हम कहा जा रहे है. लेकिन इतना पता है के तुम यहाँ पीछे से घर का पूरा ध्यान रखोगे.", इसके साथ हे उन्होंने आज का पूरा कार्यक्रम अर्जुन को बताया तोह वो थोड़ा सा निराश हो गया. रामेश्वर जी भी समझ गए थे के अर्जुन को ाचा नहीं लगा और ऐसा लग्न लाजमी भी था. वो अकेला हे रह जाता था हमेशा घर पर और वही बात कही जाती थी की वो घर का ख़याल रखे.
"ऐसा नहीं है बीटा के हमने तुम्हे जानबूझ कर ये नहीं बताया. कल तुम मिले हे नहीं दोपहर के बाद हमसे. और तुम्हे बुरा लग रहा है तोह तुम मेरे साथ चलो. यहाँ संजीव ध्यान रख ले गए और उसके काम वो फिर कभी कर लेगा.", रामेश्वर जी के ऐसा कहने पर नाश्ता करते हुए शंकर जी के हाथ पल भर के लिए रुक गए.
"मुझे बुरा नहीं लगा दादा जी बस इतने सारे लोग चले जाते है तोह डर लगता है और कुछ नहीं.", अर्जुन की ये परवाह रेखा जी के साथ साथ उसके dada-daadi को भी समझ आ गयी थी.
"हाँ अब मेरा बचा बड़ा हो गया और सबकी देखभाल कर सकता है तोह ऐसा लग्न गलत भी नहीं है. लेकिन निश्चिंत रह बीटा और तेरी माँ मेरे साथ जा रही है. तेरे दादा जी भी अकेले थोड़ी है. तुझ पर 2-2 घर की जिम्मेवारी है आज.", अभी वो लोग ऐसे हे अर्जुन से बातें कर रहे थे की प्रीती भी इतनी सुबह तैयार हो कर अपने दादा जी के साथ यहाँ आ गयी थी. वो छोटा सा पिल्ला उसकी गॉड में हे था जिसको लेने की अर्जुन ने कोई कोशिश न की.
"आओ भाई तुम्हारा हे इन्तजार था. वैसे प्रीती बिटिया भी साथ जा रही है ये देख कर ाचा लगा.", रामेश्वर जी अपने नाश्ते से फारिग थे और उन्होंने वो पिल्ला अपने पास लेते हुए उसको फर्श पर रख दिया. कुछ पल वो मासूम ऐसे हे अपनी जगह खड़ा रहा और फिर पूरे आँगन का अवलोकन करने के बाद ऋतू के पास आ रुका. वो भी नीचे बैठ कर उसको दुलारने लगी.
"हाँ भाई साहब, अब ऋतू बिटिया चल रही है तोह प्रीती ये सुन्न कर साथ चलने की जिद्द करने लगी. इस बहाने बचे गाँव भी देख लेंगे और हर्कुलस (पिल्ला) भी इनके साथ खुश रहेगा.", छोल साहब ने Ritu-Preeti के साथ वाली बात कही तोह शंकर जी को जैसे एक मौका मिल गया था शरारत करने का और उन्हें इसका नतीजा पता नहीं था. छोल साहब के लिए कोमल दीदी चाय ले आयी थी और प्रीती ने दादी के कहने पर एक पराठे को गोल करते हुए ऐसे हे खाना शुरू कर दिया.
"प्रीती और ऋतू को ज्यादा हे आदत नहीं है साथ रहने की चाचा जी? कल को प्रीती इस घर में आएगी और ऋतू जायेगी इस घर से फिर दोनों को एडजस्ट करना मुश्किल पड़ेगा.", छोल साहब तोह इस बात पर हंस दिए थे लेकिन पहली बार रामेश्वर जी के चेहरे पर ये अलग से भाव आये और कौशल्या जी फटाक से हे बोल पड़ी बिना जगह और माहौल देखे.
"जो दिल से जुड़े हो न शंकर वो मर्डर कर भी दूर नहीं होते और मैं जितने यहाँ बैठी हु मेरी दोनों बछिया ऐसे हे साथ रहेंगी. तू भी जानता है के तेरी माँ बात की कितनी पक्की है और बच्चों के लिए क्या कुछ कर सकती है.", अब हैरान होने की बारी बहोत से लोगो की थी लेकिन ऋतू के चेहरे पर आयी ख़ुशी देख प्रीती भी नजरे बचते हुए इशारे से इसका राज पूछ रही थी. रसोईघर में कड़ी रेखा जी भी इस बात से थोड़ा चिंतित हो गयी थी की उनकी सास ने ऐसा हे क्यों कहा.
"मजाक हे तोह कर रहा था माँ. मेरे लिए तोह जैसी ऋतू वैसी प्रीती. मेरी हे बेटियां है दोनों और आप तोह ऐसे भड़क गयी जैसे मैंने दोनों को हे अलग करने का विचार बना लिया हो."
"रहने दे तू शंकर, ाचे से जानती हु मैं तुझे. वैसे अब तू परेशां लग रहा है मुझे तोह.", कौशल्या जी के चेहरे पर आयी ये मुस्कान देख सचमुच शंकर ने नजरे झुका ली थी. कहा तोह वो ऊँगली कर रहे थे किसी और तरफ और यहाँ चढ़ गए अपनी माँ के हाथे. साढ़े 5 तक अर्जुन ने दोनों गाड़ियों में जरुरी सामान रख दिया था और अगले 10 मिनट में हे रामेश्वर जी अपने रस्ते और कौशल्या जी अपने पीहर निकल चुके थे. संजीव भैया हे बचे थे घर में जो अभी तक गहरी नींद में सोये हुए थे और किसी ने भी उन्हें उठाया नहीं था. अर्जुन गलियारे से अंदर आया तोह उसके पिता के साथ साथ आरती और प्रियंका दीदी भी तैयार हो कर आँगन में आ चुकी थी.
"तुम्हारे लिए कुछ ले कर आना है दिल्ली से?", शंकर जी ने अपने बेटे की इत्छा jaan-ni चाहि तोह अर्जुन कुछ सोचने के बाद बस ना में गर्दन हिला कर अपनी बहनो को देखने लगा. जैसे उसको उनका जाना भी ाचा नहीं लग रहा था.
"बड़े पापा, इसके लिए मैं अपनी पसंद से ले लुंगी. पंजाब में भी मैंने हे इसकी ड्रेस ली थी तोह दिल्ली से भी पसंद कर लुंगी. अपना ध्यान रखना और घर पे हे रहना.", आरती ने बाकी दोनों बड़ो के सामने हे अर्जुन के सर पर हाथ फेरते हुए बड़े स्नेह से ऐसा कहा तोह अर्जुन मुस्कुरा दिया. ये लोग भी बहार निकल गए तोह अर्जुन मुख्या द्वार बंद करके उस एक कमरे वाली व्यायामशाला में जा घुसा.
'और वेट लाने पड़ेंगे', वो जितना भी वजन मौजूद था उस से सीने की कसरत करता पसीना बहा रहा था आधे घंटे बाद. शरीर की हर मांसपेशी उभर कर फूल चुकी थी लेकिन अर्जुन जैसे किसी और हे धुन में सवार 120 किलो वजन का ये पांचवा सेट लगा था. इस बेखयाली में उसको तारा और कोमल दीदी भी नजर नहीं आयी जो शरीर की लचक वाली कसरत करने के बाद एक दूसरे की मदद कर रही थी फर्श पर मत बिछा कर पेट की कसरत करते हुए.
'तंत्र' की इस आवाज से दोनों लड़कियों का भी ध्यान अर्जुन पे गया जो उमस और इतनी मेहनत करने पर पसीने से भीगा हुआ खड़ा हो कर अपनी गर्दन की अकड़न ठीक कर रहा था. तारा तोह अपलक बस अर्जुन के कटाव और पहली हुई chhati-baahen निहार रही थी. कोमल दीदी के भी अंदर हलचल तोह हुई लेकिन बहार जाहिर न करते हुए उन्होंने हे ख़ामोशी भांग की.
"वेंटिलेशन की प्रॉब्लम है न यहाँ थोड़ी ारु?", अर्जुन इस आवाज से अपनी दीदी को देख कर थोड़ा चौंक गया. नीले रंग की ढीली टीशर्ट और सफ़ेद इलास्टिक वाले पाजामे में कसरत करती वह कैसी लग रही थी ये बताने के लिए जैसे लफ्ज़ हे न थे. वही तारा की छोटी सी निक्कर और बनियान जैसी टीशर्ट भी उसके कामदेवी स्वरुप में इजाफा कर रहे थे.
"हाँ दीदी, वो एक विंडो इस दिवार पर बनवा देता हु मैं मिस्त्री को बोल कर. एग्जॉस्ट फैन लगवा देने से दिक्कत नहीं आएगी. वैसे मैं आज मार्किट से थोड़े और वेइट्स डम्बल लाने का सोच रहा था, आपको कुछ लेना हो तोह साथ चल सकती हो.", अर्जुन ने अपने निर्वस्त्र सीने पर तोलिये से पसीना साफ़ करने के बाद बनियान पहनें ली थी. एक बार फिर वह बेंच पर लेट गया तोह कोमल दीदी की नजर उसकी भुजाओ पर गयी. हर तरफ सिर्फ मजबूत मांसपेशिया उभरी थी और अर्जुन का बनियान पहन न बता रहा था के इस से पहले शायद उसको इन दोनों के आने का पता न लगा.
"मार्किट 1 बजे के बाद चलते है न अर्जुन. मैंने थोड़ा सामान लेना है लेकिन कंपनी से 12:30 तक हे निकल सकुंगी. अगर तुम्हे ठीक लगे तोह.", तारा के ऐसा कहने पर कोमल दीदी ने भी सहमति जताई.
"और तब तक घर के सारे काम भी हो जायेंगे. कामवाली दीदी को भेजने के बाद एक बजे हे चलते है मार्किट. दोपहर में भीड़ भी नहीं होगी और सब आराम से खरीद सकेंगे.", अर्जुन ने 10 बार रोड ऊपर निचे करने के बाद खड़े हो कर शरीर को आराम दिया और पानी का हल्का घूँट लेते हुए हाँ में गर्दन हिला दी.
"ठीक है दीदी. मुझे भी थोड़ा काम है जो मैं नाश्ते के बाद कर लूंगा और फिर 1 बजे चलते है मार्किट. मैं बगीचे में पानी देने के बाद नाहा लेता हु, आप मेरा दूध तैयार कर देना.", अर्जुन इतना बोल कर बहार चला गया तोह कोमल दीदी ने तारा का कान खींचते हुए कहा.
"तू पक्की बेशरम हो रही है तारा. मेरे सामने हे उसको कैसे ताड़ रही थी."
"यार आप भी कमाल हे हो दीदी. आपकी कमर में भी हलचल हो रही थी उसको देखते हुए लेकिन इल्जाम सिर्फ मेरे ऊपर. वैसे सच कहु तोह मेरा दिल कर रहा था के वो इस रोड की जगह मुझे अपने सीने पर बैठा ले. आह्हः.. नाउ ी हैवे थिस फंतासी."
"फंतासी की बची, इधर ध्यान दे तू. बेशरम होती जा रही है हर दिन के साथ. वैसे तूने मार्किट से क्या लेना?", तारा वापिस कोमल दीदी की मदद करने लगी घुटने सीने से लगवाने में. शरीर के वो मादक कटाव इन दोनों हे अप्सराओ में भरपूर थे.
"कुछ भी नहीं लेना लेकिन साथ चलना है. वैसे ऋतू ने कहा था के उसको स्ट्रेटचेब्ले शॉर्ट्स चाहिए अलका जैसे तोह वो भी ले लुंगी और आरती के लिए रनिंग शूज भी. आप क्या लेने वाली हो?", कोमल दीदी अपने आप हे बालनके बनाने लगी तोह तारा ने ट्रेडमिल का रुख करते हुए रनिंग चालू कर दी.
"जो पसंद आएगा वो ले लुंगी बाकी अर्जुन के साथ जा रही हु तोह वो खुद भी पसंद कर लेगा कुछ न कुछ. अब 10 मिनट तू आराम से अकेले रनिंग कर मैं भी नाहा कर रसोई में जाती हु. संजीव भैया को भी चाय चाहिए होगी उठते हे और फिर वो भागने की जल्दी भी करेंगे. ताई जी बता कर गयी है के उन्हें आज जरुरी मीटिंग में जाना है.", कोमल दीदी ने कपड़ो को ठीक करने के बाद अपना मत सही जगह रखते हुए बहार का रुख किया और तारा इत्मीनान से दौड़ पर ध्यान देने लगी.
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निक्की आज जल्दी उठ कर निवाये पानी में निम्बू पीते हुए अपनी हे दुनिया में खोयी थी. पिछले 2 हफ्तों में उसकी बेरंग ज़िन्दगी में जाने क्या क्या हो गया था और कल रात जैसे उसने 27 की उम्र में वो पाया था जिसकी तलाश जाने कबसे थी. लेकिन इस रास्ते की भी मंजिल नहीं थी. विचारो में ऐसे खोये देख नीतू ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया. दोनों हे युवतिया इस वक़्त पारदर्शी से ढीले पाजामे और बिना ब्याह की टीशर्ट में थी. कमरा नीतू का था और दोनों हे जवान थी तोह साफ़ था के इन कपड़ो के भीतर अंतःवस्त्र नदारद थे.
"एक तोह तू कितनी बदल गयी है जो की एक ाचा बदलाव है. दूसरा तेरे जैसी लड़की ऐसे बहार देखते हुए खयालो में है तोह बात ख़ास हे होगी. कल रात भी तूने तीसरा गिलास लेने से मन कर दिया था और मुझे भैया की सिग्रत्ते चुराने को भी नहीं कहा.", नीतू एक हलकी सांवली सी खूबसूरत युवती है जिसको बात करने का भी सलीका था. वही निक्की का चरित्र हमेशा tej-sakht कामकाजी युवती का था जिसको पैसे का घमंड सिर्फ एक आवरण की तरह था लेकिन अंदर से वो बिलकुल खोखली थी. कुछ समय पहले हे शायद वो खुद को नया जीवन देने लगी थी.
"हाँ बात ख़ास हे है डार्लिंग. ये शराब कभी ाची लगी हे नहीं थी बस खुद से भागने का जरिया था. सिग्रत्ते तोह तुझे भी पता है के मैं कैसे पीती थी जो अब मैं हाथ नहीं लगाने वाली. अपने लिए ज़िन्दगी जी भी तोह सही से नहीं जी यार नीतू. अब जरा अपने साथ साथ सभी के लिए जी कर देखते है. बिज़नेस भी जॉब की तरह और लाइफ भी."
"और ये कौन सा जादूगर है जिसने इतना बदल दिया इस खूबसूरत हिटलर को? राधिका भी ये न कर सकीय तोह साफ़ है के कोई लवर मिल हे गया है तुझे."
"ऐसी बात नहीं है के लवर मिला है लेकिन एक सही इंसान मिला है और वो फिर चाहे दोस्त की तरह रहे या जैसे उसका दिल करे, लेकिन aas-pas जरूर रहे. कुणाल याद है तुझे?", निक्की ने जिस लड़के का नाम लिया था शायद उसकी छवि कही ज्यादा काली रही होगी.
"उस कुत्ते को इतनी सवेरे याद क्यों कर रही है तू? इंडिया से नहीं भागता तोह मौसा जी ने उसको मार कर गटर में फेंक देना था.", नीतू के चेहरे पर आये गुस्से को नजरअंदाज करते हुए निक्की ने कांच से बहार आसमान में उड़ते पंछियो को देखा और मुस्कुराते हुए कहने लगी.
"वो मेरे साथ था क्योंकि हमारा परिवार, पैसा, मेरी ख़ूबसूरती और अपने लालच की वजह से. मैंने ट्रस्ट किया था उसपर तोह उसने मेरा हे वीडियो बनाने की प्लानिंग की थी जिसके दम पर वो कुछ भी करता. लेकिन इतने सालो बाद मैंने अब जिसको देखा उसको इन सबकी तोह इत्छा हे नहीं है और जैसे उसके लिए मेरी ख़ूबसूरती भी मायने नहीं रखती. फिर भी एक अनजान होते हुए वो मेरी परवाह वैसे हे करता है जैसे मैं उसके लिए ख़ास हु. हाँ मैं तोह पसंद करने लगी हु उसको लेकिन नीतू वो हमसफ़र नहीं बन्न सकता."
"जिन्हे तू निहार रही है न निक्की, वो पंछी आज साथ है और कितने खुश भी है क्योंकि वो भविष्य का नहीं सोचते और अपनों के साथ है. कल रात तू बड़ा कह रही थी की जो आज है अभी है वही है. आने वाला पल किसने देखा. ेट्स ेट्स... लेकिन अर्जुन को आइना दिखते दिखते तू खुद हे उसको दिल में क़ैद कर गयी. लेकिन मुझे इसमें कोई बुराई नहीं नजर आती यार. अगर उसके कुछ पल के साथ से हे तेरी ज़िन्दगी को एक नया रूप मिलता है तोह ये सौदा घाटे का नहीं है. हैरान मत हो के मैं कैसे जान गयी के वो लड़का अर्जुन है. नशे में संजीव और अनमोल हो सकते है मैं नहीं थी जब तूने उसको किश किया था कार में पर्स ढूंढ़ने के बहाने पर. जब दिल करे तू उसको यहाँ बुला कर मिल सकती है या फिर जहा तेरा दिल कर इस शहर में."
"तू न इसलिए मेरी फवौरीते है नीतू. चल देखते है ये किस्मत इस बार किधर ले जाती है."
"किस्मत नहीं निक्की, सही कदम कहा लेके जा सकते है ये देखना. वो लड़का संजीव का भाई है और इतना दावा कर सकती हु के वो तेरा फायदा नहीं उठाएगा चाहे तू उसको उसे कर ले. तुझे देख कर सभी खुश है निक्की और ये ख़ुशी मायने रखती है न की एक उलझा हुआ भविष्य जिसके बारे में सोच कर अपना वर्तमान डाव पर लगाना बेवकूफी होगा. तुझे फिर से मिलना है क्या अर्जुन से?"
"नहीं यार आज नहीं मिलना. अभी बस तैयार हो कर मैं निकलती हु भाभी के साथ. राधिका से जरूर मिलना है और तू तेरे भी 2 कपडे साथ रख ले. आज वेडनेसडे है तोह सैटरडे मैं वापिस आ जाउंगी तेरे साथ इधर.", निक्की ने खड़े होते हुए एक बार नीतू को अपने आगोश में लिया और फिर बाथरूम में चली गयी.
'बड़े दर्द को ख़तम करने में अगर ढेर सारा प्यार और कुछ दर्द मिले तोह ऐसा कर लेना चाहिए मेरी बहिन. क्या पता शायद वो थोड़ा दर्द भी न मिले जिसकी तकलीफ के बारे में अभी से सोच रहे है.', निक्की के लिए इतना सोचती हुई नीतू भी अलमारी से कपडे निकलने लगी थी. उसको ाचा लग रहा था के निक्की ने कोई दिखावा किये बिना सब कबूला और अब उसको भी अपने साथ ले कर चल रही थी.