Incest Pyaar - 100 Baar - Page 13 - SexBaba
  • From this section you can read all the hindi sex stories in hindi font. These are collected from the various sources which make your cock rock hard in the night. All are having the collections of like maa beta, devar bhabhi, indian aunty, college girl. All these are the amazing chudai stories for you guys in these forum.

    If You are unable to access the site then try to access the site via VPN Try these are vpn App Click Here

Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 78

मिलान


सुबह 6 बजे के करीब नर्स अर्जुन को देखने आई तोह सामने का दृश्य देख कर मुस्कुराती हुई वापिस हे चली गई लेकिन उसके बाद अंदर आई प्रीती के चेहरे पर अलग हे चमक आ गई थी. अर्जुन बिलकुल सीधा लेता था और उसके ऊपर पाँव चढ़ाये छाती पर सर रखे बेसुध सी लिपटी ऋतू.

"बिटिया यहाँ क्यों कड़ी है? अब लेने आये अर्जुन को तोह अंदर तोह चल.", कौशल्या जी की आवाज सुनते हे प्रीती के चेहरे पर एक डर चा गया लेकिन अंदर ऋतू झट्ट कड़ी होती दूसरे बिस्टेर पर बैठ गई.

"ऋतू बीटा, अपने भाई को उठा. हमने बात कर ली है बहार और उन्होंने कह दिए के अर्जुन को ले जा सकते है. उन्हें रिपोर्ट में कुछ भी नहीं मिला.", उनकी बात सुनते वक़्त भी ऋतू के चेहरे पर ऐसी शर्म थी जैसे सुहागरात की अगली सुबह कमरे में सास आने पर दुल्हन के होती है.

"जी दादी. आप अंदर आ जाइये, इतने मैं सामान भी इकट्ठा कर लेती हु.", ऋतू ने अर्जुन को उठाने से पहले जरुरी सामान एक तरफ किआ. कौशल्या जी भी समझ गई की ऋतू उठाने से रही अर्जुन को.

"कुम्भकरण, उठ जा अब. कुछ हुआ है नहीं और बिस्टेर टॉड रहा है.", अर्जुन अपनी दादी की बात सुनता बिस्टेर पर हे ऊपर उठा और उन्हें बाँहों में ले लिए.

"मेरी प्यारी दादी. तोह आपसे घर रुका नहीं गया जो खुद आ गई.", अर्जुन लाड से उनको बोलै तोह वह भी हंसने लगी.

"सुधर जा तू कपूत. बहोत परेशान किआ है तूने सबको. और सबसे ज्यादा इन दोनों को.", अब अर्जुन उनकी बात पर झेंपता सा बिस्टेर से उठा और एक तरफ रखा अपना pajama-tshirt उठाते हुए बाथरूम में चला गया.

"प्रीती बीटा, ये सामान तू पकड़ ले. और ऋतू, अपने भाई को ले आना बहार. मैं तेरे दादाजी के पास हे चलती हु.", उनके जाते हे प्रीती ने शरारत से ऋतू दीदी को देखा.

"आप दोनों तोह यहाँ भी."

"क्या यहाँ भी? और जब तुझे दिख हे गया था तोह आवाज नहीं लगा सकती थी. पागल, बच गए दादी की आवाज सुनाई न देती तोह आज हे घर निकला हो जाना tha.",Ritu अब प्रीती के गले लग गई थी.

"वैसे सच में क्या सन था दीदी. कैमरा होता तोह पका फोटो ले लेती. कैसे आप लेती हुई थी और उसका हाथ कहा पर था.", प्रीती धीरे बोल रही थी साथ हे हंस भी रही थी.

"तू घर चल फिर तू हे मुझे करके दिखाना के कैसा सन था.", आँख मरती हुई ऋतू अब प्रीती के मजे लेने लगी

"चलो. मैं तोह तैयार हे हु. शायद आगे के सन भी दिखा दूंगी, जितना आप देख सको.", प्रीती जैसे अब बदल हे गई थी. शर्मा तोह रही थी लेकिन अब जैसे वह अर्जुन के साथ कुछ भी छुपाना नहीं चाहती थी.

"अरे मेरी जान, बड़ी जल्दी समझ आ गया तुझे प्यार करना."

"और क्या दीदी, अब क्यों पीछे हटना. कल हे हॉस्पिटल में सबको आपने ये जो बोल दिए था के मैं उसकी बीवी हु.", प्रीती इठलाती हुई बोली और अर्जुन को बहार आया देख चुप हो गई.

"ाचा मैं दादी के पास चली, तू इसको ले आ.", ऋतू जल्दी से भाग गई और अब प्रीती अकेले में अर्जुन के पास कड़ी बेचैन होने लगे.

"तोह कैसे चलना चाहोगी? गॉड में या पीठ पर?", प्रीती जबतक उसकी बात समझती अर्जुन ने कंधे के नीचे से पकड़ते हुए प्रीती को उठा कर सीने से लगा लिए.

"प्लीज छोड़ो पागल. दादी आ जाएगी.", प्रीती के चेहरे पर हल्का डर लेकिन अंदर हे वह खुश थी अर्जुन को पहले की तरह देख कर.

"दादी ने हे तोह कहा था के मैं बहार चली. अब यहाँ तोह कोई नहीं है.", घर से नाहा कर इधर आई प्रीती के बदन की खुशबु लेते हुए अर्जुन अपना चेहरा उसकी गर्दन और सीने के करीब करके खड़ा था. प्रीती की साँसे तेज हो गई और आँखें बंद.

"ाचा चलो.", अर्जुन ने उसकी हालत देखते हुए कहा और नंगे पाँव हे प्रीती के साथ बहार आ गया. यहाँ सभी खड़े उसकी हे राह देख रहे थे. छोल साहब ने अर्जुन को गले से लगाया और अपने साथ लिए गाडी तक आ गए.

"सतीश, इन्होने पैसे क्यों नहीं लिए हमसे?", गाडी में बैठते हे कौशल्या जी ने पहला सवाल किआ. अर्जुन भी ये सुनकर अपनी दादी की तरफ देखने लगा. जो पीछे वाली सीट पर बैठी थी रामेश्वर जी के साथ. प्रीती और ऋतू सबसे आखिरी हिस्से में आमने सामने थी.

"भाभी शुक्र मनाओ के हॉस्पिटल सही सलामत है. आप नहीं थी उस वक़्त जब शंकर ने इस हॉस्पिटल के मैनेजर का गाल लाल कर दिए था. सारा हॉस्पिटल हे एक मिनट बाद उधर जमा हो गया था. जिसने अभी आपके पाँव छुए वही मालिक है इसका और अपने शंकर से थोड़ी दोस्ती है.", छोल साहब की बात सुनकर अर्जुन खुद को रोक न पाया.

"अब पापा ने उन्हें मारा क्यों था?"

"तुझे जब लेके आये थे तब तारा ने गाडी वह लगा दी थी जहा रास्ता है अंदर जाने का, रिसेप्शन के बहार. फिर तेरा इलाज अपने दोस्त डॉक्टर से करवाया, िक में पहले ऋतू और बाद में प्रीती भी अंदर आ गई थी. ये सब ऐसी जगह पर सख्त मन है. गाडी पार्किंग में, ट्रीटमेंट के समय कोई भी िक में नहीं, 2 से ज्यादा विजिटर होस्पिअल में नहीं और ऐसे हॉस्पिटल के डॉक्टर हटा देना तोह बिलकुल नहीं. लेकिन अब बात शंकर के परिवार की है तोह तारा भी सही, और िक तोह फिर ड्राइंग रूम हुआ जहा सभी बचे बैठ के अंताक्षरी खेलेंगे.", छोल साहब की बात पर सभी हंस दिए, रामेश्वर जी को छोड़ कर.

"सतीश, मेरी समझ से तोह वह बहार हे है. हर वक़्त हाथ में खारिश लिए घूमता रहता है और तुझे उसका ये करना बड़ा पसंद है. वैसे तू अकेला नहीं है उसका हितेषी.", रामेश्वर जी तल्खी से बोले और कौशल्या जी ने कोहनी लगते हुए उन्हें चुप रहने का इशारा किआ.

"हाँ तोह मेरी भाभी से पूछ लो की परिवार जरुरी है या ऐसे अनपढ़ मैनेजर जिन्हे जरा भी समझ नहीं दुनियादारी और परिवार की. शंकर के जिम्मेदार बचा है और सबसे बड़ी बात के वह अपने परिवार की ख़ुशी के लिए कोई हद्द नहीं देखता. समंदर सा बिलकुल.", छोल साहब गाडी चलते हुए पिछले शीशे में भी देख रहे थे.

"बिलकुल सही बात है. मेरा बीटा घर से बहार रहता है लेकिन वह इसलिए रहता है जिस से घर की परेशनी भी बहार हे रह सके. और कोई तेरे भाई साहब से पूछे के उन्हें अगर उसका ऐसा करना बुरा लगता है तोह उसको rokte-tokte नहीं? 500 तनख्वाह थी इनकी तब उसको 200 देते थे और मुझे pariwar-baaki बचो के लिए 200. ऊपर से जो भी कहते रहे लेकिन श्री रामेश्वरम की चाय में हे शंकर रहते है.", अब सच में रामेश्वर जी निरुत्तर थे लेकिन चुप रहना भी ठीक नहीं था. बचे इन तीनो की बातें बड़े ध्यान से सुन्न रहे थे.

"उसकी काबिलियत पर मुझे कभी संदेह नहीं हुआ. अगर उसके पेशे की हे बात करू तोह उसको शायद अपने काम से इतना लगाव है जितना मुझे भी नहीं था शायद. जितने वह अपनी ड्यूटी पर रहता है तोह मरीज हे उसके लिए सबकुछ है, फिर रात हो जाये या अगला दिन. लेकिन जब उसको कोई समस्या अपने mareej-hospital से बहार दूर करनी हो फिर उसका तरीका जो है वह न मुझे पहले पसंद था और ना आज. कर मैं सचमुच कुछ नहीं सकता क्योंकि इधर भी उसका हाथ इतनी सफाई से चलता है जैसे ऑपरेशन के वक़्त. साथ वाली नस को पता नहीं चलता के बराबर में किसी ने सर्जरी भी कर दी है."

"भाई साहब उसमे सीखने की लगन थी. सर्जरी पढाई से और सफाई उसने आपके माहौल में सीख ली."

"इस मुद्दे का तोह कोई अंतत है नहीं सतीश. और ये बचे भी बोरियत महसूस करने लगे होंगे. फिर कभी करेंगे इस मुद्दे पर बात.", रामेश्वर जी ने हथियार दाल दिए थे और बाकी दोनों मुस्कुरा रहे थे.

"चल मेरे शेर, अब ध्यान से उतर और अंदर चल के कोमल को बोल 3 चाय बनाये अपने हाथ की.", घर के सामने गाडी रोकते हुए छोल साहब ने कहा और बाकी सभी भी अपनी तरफ के दरवाजे खोलते हुए बहार निकल आये.

.

.

अगले 10 मिनट तक तोह सभी अर्जुन को गले लगते, चूमते हुए मिलते रहे. रेखा जी और कोमल दीदी के तोह आंसू भी निकल आये थे लेकिन उसको सही सलामत देख कर ख़ुशी की वजह से. फिर कोमल दीदी चाय बनाने चली गई और अर्जुन अपनी माँ को साथ लिए उनके कमरे में आ गया.

"अगर मैंने आज के बाद तेरे चेहरे पर शिकन भी देखि तोह फिर तेरा बिस्टेर यही लगवा दूंगी, मेरे कमरे में.", रेखा ने थोड़ी दांत और प्यार से कहा लेकिन अर्जुन उनका गाल चूम कर शरारत से बोलै.

"जब पापा आएंगे फिर तोह बहार निकलोगी."

"अब भी मस्ती सूझ रही है तुझे? जा पहले साथ वाले कमरे में प्रियंका और आरती से मिल ले. वो दोनों बेचारी तोह कल से इतना दरी हुई है के रात तक बहार भी नहीं निकली थी. एक बार मिल ले उनसे.", अर्जुन को भी ध्यान आया था के उसने अपनी इन दोनों बहनो को देखा हे नहीं था. वो जल्दी से उठ कर माधुरी दीदी वाले कमरे में गया जहा प्रियंका दीदी करवट लिए सो रही थी और आरती अपनी डायरी में चुपचाप कुछ लिख रही थी.

"भाव..", आरती के पीछे आकर अर्जुन ने जैसे हे डराया वह सीधा उसके गले लग गई. अर्जुन को कुछ पल बाद महसूस हुआ अपने कंधे पर गिरता गरम पानी.

"दीदी, अरे क्या हुआ आपको? देखो मैं बिलकुल ठीक हु और आपके पास हु.", आरती अलग न हुई लेकिन प्रियंका दीदी ने खड़े हो कर साइड से अर्जुन को बाहों में ले लिए.

"इतनी हिम्मत नहीं हैं हम दोनों बहनो में मेरे भाई. तुझे लगा होगा के हम दोनों तुझसे मिलने नहीं आई लेकिन हर पल बस हम तेरे घर आने की दुआ मांग रही थी. दिल कुछ ज्यादा हे कमजोर है हमारा.", अर्जुन भी दोनों की जरुरत से तेज चलती धड़कन महसूस कर प् रहा था. प्रियंका और आरती ने हर रोज अपनी माँ के दर्द को देखा था और सिर्फ इस वजह से हे नरिंदर ने अपनी दोनों बेटियों को यहाँ भेज दिए था जिस से वह हर समय घबराई दरी न रहे.

"बहोत हिम्मत है आप दोनों में. और आप दोनों आओ मेरे साथ बहार, जोरो की भूख लगी है मुझे. आप बनोगी और आरती दीदी खिलाएंगी.", अर्जुन उनके चेहरे साफ़ करता अपने साथ जबरदस्ती बहार ले आया. ललिता जी ने भी उन्हें गले लगते हुए प्यार से समझते हुए अपने पास बिठाया लेकिन अर्जुन अपने साथ आरती को खाने की मेज तक ले आया.

"दीदी, स्कूल जा रही हो?", रूपाली तैयार हो कर वही बैठी थी. अर्जुन की बात पर वह मुस्कुरा दी.

"तेरी एप्लीकेशन दी हुई है मेरी नहीं. और फ़िक्र मत कर, घर आने के बाद तुझे पढ़ा भी दूंगी.", रुपाली की बात पर अर्जुन इधर उधर देखने लगा.

"मैं बीमार हु तोह अभी पढाई नहीं कर सकता. मंडे से करेंगे न.", अर्जुन की ऐसी हरकत पर आरती के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आ गई. अर्जुन ये देख कर हे खुस हो गया था और रुपाली को भी समझ आ गया के वह क्यों नौटंकी कर रहा है.

"वैसे तू ज्यादा हे बीमार नहीं है जो इतनी सुबह हे पराठे खाने बैठ गया.", ऋतू उसका कान पकड़ती हुई बोली और सामने से हे कौशल्या जी आ गई.

"अब मेरे लाल ने पूरा एक दिन खाना नहीं खाया तोह वह कमी पूरी करेगा हे. चल मेरे बचे जल्दी से खाना खा के तैयार हो जा और स्कूल चल.", दादी की बात पर अर्जुन को छोड़ कर सब हंसने लगे.

"आप भी सबके साथ मिल गई दादी? मैं आपसे बात नहीं करूँगा.", अर्जुन प्लेट एक तरफ करते हुए झूठा गुस्सा दिखने लगा तोह एक साथ उस पराठे पर तीन हाथ लगे और तीनो ने एक एक गरै उसके सामने कर दी.

"तू ऐसे हे ाचा लगता है मेरे लाल. देख घर फिर से घर हो गया.", पहले कौशल्या जी ने खिलाया फिर आरती दीदी ने और आखिरी में पीछे कड़ी ऋतू दीदी ने. अर्जुन भी ये देख कर खुश था. अगले हे पल भरे हुए मुँह में रुपाली दीदी ने भी एक निवाला प्यार से ठूंस दिए.

"उम्म्म.. बस करो भाई. पूरा पराठा मुँह में भर दिए. सब मिले हुए है यहाँ तोह.", अर्जुन फूले हुए मुँह से अजीब आवाज में बोलै और कौशल्या जी उसकी नजर उतरती रसोईघर में चाय लेने चली गई. रुपाली भी जाती हुई हाथ हिला कर अर्जुन को bye बोल कर गलियारे से निकल गई.

"प्रीती तू भी बैठ और ये ले कॉफ़ी.", अलका दीदी ने 4 कप कॉफ़ी टेबल पर रखते हुए प्रीती को अपने साथ बिठाया और Aarti-Ritu को भी उनके कप दे दिए.

"वैसे इन दोनों के हाथ से भी खा ले ारु. सबने खिलाया तोह इन गरीब पर भी कृपा कर दे.", ऋतू की बात प्रीती के तोह समझ न आई लेकिन अलका ने एक निवाला टॉड कर अर्जुन के मुँह के सामने किआ. अर्जुन जैसे हे खाने लगा अलका ने वह अपने मुँह में दाल लिए.

"ये गरीब भूखी है मालकिन.", आँख मरते हुए अलका ने ऋतू से कहा और अर्जुन इन दोनों की मिलीभगत देख रहा था. फिर जैसे हे प्रीती की तरफ देखा तोह उसने शरमाते हुए नजरे झुका ली.

"और ये? लगता है इन्हे साहब अपने हाथ से खुद खिलाएंगे.", अब अर्जुन भी इशारा समझ गया था ऋतू दीदी का और एक निवाला टॉड कर उसने प्रीती की तरफ बढ़ाया. जो की वह वापिस अपने हे मुँह में डालने वाला था. लेकिन अलका ने उसका हाथ वही पकड़ लिए और प्रीती ने हलके से दांत चुभते हुए निवाला मुँह में ले लिए.

"आउच. यहाँ तोह मैं हे हलाल हो रहा हु. मुझे लगा था के आप मेरे साथ हो. मैं नहीं बात करता आप लोगो से. मेरी माँ हे खिलाएगी मुझे.", अर्जुन पाँव पटकता हुआ रसोईघर में दौड़ गया और ऋतू अलका दीदी से हवा में ताली मारती हंसने लगी.

यही तोह होता है परिवार.. छोटी छोटी अनगिनत खुशियां जहा हर क्षण मिलती है, सब एक दूसरे के साथ हर स्थिति में खड़े रहते है.. साथ मिलकर खुशियां मानते है और दुःख की घडी में एक दूसरे के साथ जुड़ कर खड़े रहते है. ज़िन्दगी कितनी खुशियां समेटे है ये बस एक लक्ष्य के पीछे भागने भर से नहीं पता चलता. लक्ष्य पाने का असली मजा है ऐसे एक दूसरे के साथ रहते हुए हंसी खुसी हर पल को जीना. रूठना, मानना, हंसना और हँसाना. और रामेश्वर जी का ये परिवार बिलकुल आदर्श परिवार था.

.

.

"पापा, अब कैसा है अर्जुन? घर ले आये उसको?", पंडित जी के घर से चाय पीने के बाद छोल साहब और प्रीती घर आ गए थे. और कुछ हे देर में शिमला से रेणुका ने फ़ोन करके हलचल पूछने के बाद अर्जुन के बारे में पुछा.

"वह अब ठीक है रेणुका. अभी आधे घंटे पहले हे लेकर आये है उसको.", छोल साहब आराम से हे बात कर रहे थे लेकिन फ़ोन बुआ का है ये पता चलते हे प्रीती अपने कमरे में चली गई.

"रखती हु पापा. बस हलचल पूछने के लिए हे फ़ोन किआ था. आप भी समय से खाना खा लीजियेगा.", रेणुका से जब खुद को और संभाला नहीं गया तोह इतना कहते हे फ़ोन काट कर वह कुर्सी पर बैठी रोने लगी. दिल में फिर से दर्द तेज हो गया था और अर्जुन.. अर्जुन के साथ उसने कैसे ये कर दिए. जो उस से इतना प्यार करता है, इज़्ज़त्त देता है. लेकिन साथ हे प्रीती, जिसने सबकुछ किआ सिर्फ उन्हें खुश रखने के लिए. खिड़की बहार पहाड़ दिख रहे थे लेकिन इस पल तोह जैसे रेणुका का दिल इनसे भी बड़े पहाड़ से भोझ और दर्द के नीचे दबा था. आंसू बहते हुए जमीन पर गिरने लगे थे.

फिर चेहरा साफ़ करती वह अपने आप से हे कहने लगी, "अर्जुन मैंने तुम्हारे दिल को समझा है. मैं हे स्वार्थी हो गई थी लेकिन मैं जानती हु तुम अपनी रेणुका को माफ़ कर डोज. फिर चाहे तुम मुझे प्यार करो या सजा दो, मैं तुम्हारी याद और हमारे बचे के साथ पूरी ज़िन्दगी जी लुंगी"

.

.

अर्जुन नहाने धोने के बाद किताबे उठा कर अपने दादाजी के पास हे उनकी बैठक में पढ़ने लग गया. रामेश्वर जी ने एक बार उसको देखा और फिर मुस्कुराते हुए वह भी अखबार पढ़ने में लीं हो गया. ऋतू ने पूरे घर में अर्जुन को ढूंढा और फिर वह भी बैठक में आ गई जहा वह अपना सर खुजाता हुआ कोई सवाल हल करने में लगा था. रामेश्वर जी ने ऋतू को देखा जो बड़े गौर से अर्जुन की कॉपी में लिखा हुआ पढ़ रही थी.

"जब नहीं समझ आ रहा तोह गलत क्यों कर रहा है? इधर दे पेन और ध्यान से समझ. आर्गेनिक केमिस्ट्री इजी है अगर तू स्ट्रक्चर में कंफ्यूज न हो तोह. एक पेज पूरा खराब किये बैठा है और अभी भी लगा हुआ है.", ऋतू ने थोड़ा गंभीर आवाज में कहा था और साथ हे अर्जुन के कान के पीछे चपत लगा दी. अर्जुन भी चुप था और रामेश्वर जी एक पल उन्हें देखने के बाद वापिस अखबार में नजर डाले सुन्न रहे थे.

"ये कम्पलीट स्ट्रक्चर है. अब इसको ब्रेक करते है.. ऐसे.. अब ये और .. अगले 15 मिनट तक ऋतू बोलती रही और कॉपी में लिखते हुए अर्जुन को समझती रही. इस समय वह कही से भी उसकी लाड़ली बहिन नहीं लग रही थी. फिर नजर का चस्मा थोड़ा सा ठीक करते हुए कुछ सवाल बना कर अर्जुन को दिए और उन्हें हल करने का बोल कर वह से चल दी. "15 मिनट में ये तीनो करके रखना. मैं नाहा कर आई तब तक."

"बाप रे, पूरी हिटलर है ये. स्कूल हे चला जाता इस से तोह ाचा.", अर्जुन की बात पर रामेश्वर जी मुस्कुरा रहे थे और उन्हें ख़ुशी थी की ऋतू इतना ध्यान देती है अर्जुन की हर चीज पर. कौशल्या जी अब खली समय में इधर आ गई थी और अर्जुन को पढ़ते देख उसके सर पर हलकी चम्पी करने लगी. काम को भूल कर वह भी आँखें मूंदे मजे लेने लगा. अपने बताये समय पर ऋतू दरवाजे पे कड़ी ये देख रही थी और इस बार जो अर्जुन का कान खींचा तोह अर्जुन की साडी मस्ती फुर्र हो गई.

"सुधर जा रे सुधर जा.", ऋतू ने तल्खी से कहा तोह कान मसलता अर्जुन कॉपी के पैन उन्हें दिखता दूसरे हाथ से अपना कान सेहला रहा था.

"और ये आखिरी वाला? ये गलत कहा हो गया?", ऋतू वापिस बैठ गई उसके बराबर और कौशल्या जी ऊपर दीवान पर बैठी चुपचाप देखने लगी इन दोनों को.

"जो स्ट्रक्चर दिए है वह तोह किताब में है हे नहीं और आपने अभी तक मुझे सेकंड ईयर की किताब कहा दी है, वह तोह आप हे पढ़ रही हो.", ये सुनके रामेश्वर जी का माथा थांनका. ये दोनों कोनसी क्लास की पढाई कर रहे है.

"ाचा पहले यही प्रैक्टिस कर ले, गर्मी की छुट्टियों में पढ़ना वह. हाँ ये शायद सेकंड ईयर वाली से हे है.", ऋतू ने एक आखिरी सवाल उसके देने के बाद उस किताब के कुछ पैन पलट कर देखे, जैसे वह संतुष्ट होना चाहती हो.

"ऋतू बीटा, दिखाना जरा ये किताब?", रामेश्वर जी ने उत्सुकता को संभालना उचित न समझा और किताब मांग हे ली. और ऋतू ने अपने दादाजी को किताब पकड़ा दी.

"ये तुम्हारी पिछली क्लास की किताब पढ़ रहा है?"

"दादाजी, अपनी तोह ये सिलेबस पहले हे मेरी पुराणी किताबे पढ़के पूरा कर चूका. और फर्स्ट ईयर की ये किताब मैंने इसलिए इसको दी थी क्योंकि 'आर्गेनिक केमिस्ट्री' में एक तोह ये थोड़ा कमजोर है और ऊपर से बड़ी क्लास में ये सब्जेक्ट ज्यादा कुछ चेंज नहीं होता. और खली बैठा रहने से ek-aadh घंटा एक्स्ट्रा पढ़ ले तोह फिर टूशन की जरुरत हे नहीं होने वाली अगली क्लास में.", ऋतू का सुलझा हुआ जवाब सुनकर रामेश्वर जी गदगद हो गए और अपनी पौती के सर पर प्यार से हाथ फेरते हुए बस हमेशा वाली बात कही, "ाची बात है. तुम लोग खूब पढ़ो और भगवन तुम्हे हमेशा खुश रखे."

.

.

"अर्जुन चल उठ, तुझे छोल अंकल के घर बुलाया है.", अर्जुन इस वक़्त अकेला हे बैठा था इस समाया और टेलेविज़न पर चैनल बदल रहा था जब अलका दीदी ने कमरे में आते हे उस से कहा. एक पल को अर्जुन उनके घर जाने का सोच के थोड़ा असहज हुआ फिर जैसे हे कुछ याद आते उठ खड़ा हुआ.

"ठीक है जाट हु.", वही बहार वाले दरवाजे से वह इतना कहता निकल गया.

"देख ले क्या क्या करना पड़ रहा है ऋतू, और अब भी कुछ न हुआ तोह वह जाने.", दरवाजे के पीछे हे कड़ी मुस्कुराती हुई ऋतू से अलका ने कहा तोह वह अपना हाथ उसकी कमर में डालती फिल्मी स्टाइल में बोली.

"प्यार करने वालो को मिलाने से बढ़कर दुनिया में कोई बड़ा काम नहीं है मेरी जान.", आँख दबती वह उसको साथ हे वापिस अपने कमरे की और चल दी.

.

.

अपनी हे धुन में अर्जुन सीधा उनके घर के अंदर आ गया लेकिन यहाँ तोह पूरी ख़ामोशी थी. उसने ध्यान भी नहीं दिए था के बहार गाडी नहीं कड़ी थी. लेकिन आज तोह रसोईघर में पारवती भी उसको नहीं दिखी. जिस दरवाजे से वह अंदर आया था उसके बंद होते हे पीछे देखा तोह प्रीती वह पीठ लगाए कड़ी उसको हे देख रही थी.

"ये सब?", अर्जुन ने इधर उधर देखते हुए प्रीती से इतना हे कहा. उसको थोड़ा डर था के ये पागल क्या कर रही है और कही पारवती ने देख लिए तोह.

"बहोत मार लिए अपने मैं को बस अब और नहीं. जो होगा देखा जायेगा", प्रीती ने पूरी अदा से अर्जुन की आँखों में देखते हुए कहा और नंगे पाँव हे उसकी तरफ चल कर आते हे खड़े खड़े अपनी बाहों का हार अर्जुन के गले में दाल लिए. दरवाजा बंद होने और यहाँ कोई लाइट नहीं जलने से हल्का अँधेरा था और ऐसे मादक माहौल में लम्बी चिकनी टाँगे घुटनो तक बेपर्दा उस एक मात्रा फ्रॉक में.

"घर में..", अर्जुन की बात पूरी होती उस से पहले प्रीती ने उसके होंठो पर ऊँगली रखते हुए अर्जुन के गाल से गाल सत्ता कर सरगोशी की, "कोई नहीं है अगल 2-3 घंटे, सिर्फ मैं हु.", और होंठो से अर्जुन के कान की लौ को चूम लिए. पाँव की उंगलियों के भर कड़ी प्रीती की लम्बी टांगो से ऊपर एक भरपूर आकर लेते ठोस कूल्हों पर स्वतः हे अर्जुन का हाथ पहुंच गया.

"तुम्हारे इरादे ठीक नहीं है. और अगर..

"कुछ अगर मगर नहीं. तुम बहोत बोलते हो.", गुलाबी भरे हुए होंठ अर्जुन के मुँह पर लगाती वह उसकी जुबान बंद कर चुकी थी. अर्जुन ने इस शेरनी के सामने हथियार डालते हे साथ देने में हे भलाई समझी लेकिन शायद उसको अंजाम पता नहीं था.

"उम्मंहहह... आह्ह्हम्म्म", बुरी तरह अर्जुन के होंठो को मुँह में भर कर चूसती प्रीती सच में हे किसी शेरनी की तरह इस तगड़े शिकार को अपने काबू में किये थी. उन्माद और उत्तेजना में अर्जुन सिर्फ प्रीती को थामे उन भरपूर चिकने लेकिन कसरती कूल्हों और मुलायम जांघो पर हाथ फिरता सबकुछ प्रीती के हवाले किये था. थोड़ा सा जोर लगा कर प्रीती ने अपनी कमर उचकाई तोह अर्जुन मदहोशी में भी समझ गया. कूल्हों के नीचे अपने पंजे लगता वह उसकी मदद करने लगा. कमर पर टाँगे कैंची सी बंद करती वह किसी जोंक सी लिपट चुकी थी और अर्जुन वैसे हे उसको उठाये अंदाजन कमरे की तरफ चल दिए. सिर्फ एक पल के लिए प्रीती अपने बिस्टेर पर अर्जुन के नीचे पड़ी चूम रही थी.

"श.. ाचे बचे की तरह नीचे आओ.", उसकी बात मानता वह बिना सवाल किये अब वह प्रीती के नीचे और प्रीती उसकी कमर पर घुटने मदद कर गर्दन चूमती हुई नीचे की तरफ होंठ ला रही थी..

"इसकी कोई जरुरत नहीं है यहाँ.", छाती से ऊपर तक खिसकी अर्जुन की टीशर्ट अगर वह खुद हे नहीं उतरता तोह उसका फटना निर्धारित था.. ाचे से अपने हाथ उसके चौड़े सीने पर घूमते हुए प्रीती एक एक इंच का जायजा ले रही थी. जैसे हे उसके होंठो के बीच अर्जुन का दया निप्पल आया, मजे की अधिकता से अर्जुन की मुट्ठी बिस्टेर पर कास गई. हिम्मत करते हुए उसने फिर से हाथ प्रीती के कूल्हों पर रखे हे थे की प्रीती ने उसके निप्पल पर दांत गदा दिए.

"शठ.. पागल हो गई हो.?", अर्जुन ने बदले में एक तेज सीत्कार करते हुए हे उसके कूल्हे, जहा अब फ्रॉक का कपडा नहीं था को जोर से मुट्ठी में भर लिए. लेकिन प्रीती जैसे उनमे से दूध निकल के हे रुकने वाली थी. अपने होश संभालता अर्जुन इस सब से बचने की जुगत भिड़ने लगा था. कुछ और न समझ में आया तोह उंगलिया बहार को निकले कूल्हों की दरार में दाल दी. गरम मुलायम फैंको के बीच बस कपडे की पतली कतरन का कवच हे बढ़ा था लेकिन अर्जुन के हाथ अपने खजाने के पास महसूस करते हे प्रीती ने काम आसान करते हुए अपनी कमर थोड़ी ऊपर उठा ली.

"इस से आगे... इस से आगे गड़बड़ हो जाएगी.", प्रीती को उसकी ये चेतावनी जैसे सुनाई नहीं दे रही थी. नशीली आँखों से अर्जुन को देख कर अगले हे पल उसने वह safed-gulabi फ्रॉक शरीर से अलग करके एक तरफ उछाल दी. पतली गुलाबी डोरी वाली ब्रा में क़ैद प्रीती के यौवन अर्जुन की नजरो के सामने थे. लहराती चिकनी पीठ और सीने से नीचे अंदर को धंसी मांसल कमर जहा ख़तम हो रही थी वही एकाएक बहार को निकले कूल्हे.

"वही देखना है मुझे.", अरजणु के जो दोनों निप्पल कड़े हो चुके थे इतनी चूसै की वजह से उनपर जीभ फिरती हुई वह वापिस ऊपर की तरफ जाने लगी. बस इस बार वह अपनी पत्थर सी ठोस और फूली छातियाँ भी उसके सीने से रगड़ती जा रही थी. अर्जुन के ख्वाब से भी बहार था ये सब और प्रीती हर पल जैसे हावी होती जा रही थी.

"बहोत हुआ.", अर्जुन ने ब्रा का क्लिप खोल कर अलग करते हे प्रीती को अपने नीचे ले लिए. वह बेपरवाह से मुस्कुराती हुई जैसे इसके लिए भी तैयार थी.

"रोक कौन रहा है? सब तुम्हारा हे तोह है", खुद हे उसने दोनों kaam-shikhar बेपर्दा करते हुए अर्जुन को खुला न्योता दे दिए. जरुरत से ज्यादा कसाव लिए प्रीती के दोनों उभर यहाँ भी जैसे अर्जुन को चुनौती दे रहे थे. सचमुच अनुपम शरीर था प्रीती का जिसकी गर्मी अर्जुन ने आज महसूस की थी. दोनों उभारो को मुट्ठी में पकड़ते हुए अर्जुन ने एक लाल उभरी हुई चीर्य को मुँह में लिए और हलके हलके चूसने लगा. ट्रैक पाजामे में उभरे उसके सख्त लुंड पर प्रीती का यौनकुंड नीचे से लिप्त अपना दबाव बनाने लगा था. अर्जुन की कमर में टाँगे लपेटे वह नीचे से हे अपने कूल्हे हिलती अर्जुन को मजे से दोहरा किये जा रही थी. दोनों चुचो पर अपना दम दिखने के बाद अर्जुन प्रीती का चेहरा चूम कर एक पल के लिए अलग हो कर बिस्टेर से नीचे खड़ा हुआ.

बिस्टेर पर नागिन सी बलखाये लेती प्रीती का हुस्न अर्जुन को एक सम्मोहन में क़ैद कर रहा था. खुद को निर्वस्त्र करता वह भी सम्मोहित सा उसके जलवानशीं हुस्न के ऊपर आते हुए झुक गया. मुँह से एक उत्तेजक सिसकी निकल गई अर्जुन के जैसे हे 3/4 फुट लम्बे उसके अजगर को प्रीती ने अपनी नरम लम्बी उँगलियों में नीचे हाथ बढ़ाते हुए पकड़ लिए. सुर्ख रक्तिम होंटो के पीने के सिवा अर्जुन के पास और विकल्प नहीं था.

बड़े कमरे में प्रीती के हे नरम बिस्टेर पर एक दूसरे का तबियत से रास पीते हुए दोनों अलग हे जुंग लड़ रहे थे. तीखे निप्पल जिस्म में तीर सा वॉर कर रहे थे लेकिन इसका अलग हे असर हो रहा था अर्जुन के पूरे जिस्म पर. रोये खड़े हो चुके थे और रीढ़ की हड्डी से लेकर पाँव तक एक करंट का एहसास दौड़ रहा था. प्रीती का चेहरा दोनों के जिस्म की गर्मी और इस जोश की वजह से लाल भभूका हो चूका था.

अपनी लम्बी उंगलिया सुपडे से निचे आगे पीछे करती वह अर्जुन को उसकी सभी सीमाओं से परे ले जा चुकी थी जहा अर्जुन के वश में कुछ नहीं रहा था. दोनों बहे पीठ पर लपेटती वह बड़ी कुशलता से अर्जुन को palat-ti एक बार फिर उसके ऊपर आ चुकी थी. इस प्यार के dwand-yudh में प्रीती ने अर्जुन को एक और बार चित्त करते हुए दोनों तरफ पांव करके खड़े होकर अपना वह आखिरी वस्त्र भी बड़ी मादक अदा से अलग करते हुए अर्जुन का रक्तचाप थोड़ा और बढ़ा दिए था. अर्जुन की सोच से कही ज्यादा हे उभरे हुए कूल्हों की खाई भी वैसी गहराई लिए थे लेकिन नजर जब उस ख़ास भाग पर पड़ी तोह वह बेताबी में उठने हे लगा था लेकिन उठ न सका. सीने पर अपना गोरा मुलायम पाँव रखती प्रीती ने उसको वापिस बिस्टेर से चिपका दिए. ये अबतक का सबसे बेहतरीन हुस्न था जिसको प्रीती ने कड़ी म्हणत से तापा कर कुंदन बनाया था और आज तक खुद की आँखों से भी छुपाये रखा था.

"एफ्रोडाइट." अर्जुन जैसे गुलाम हो गया था उस शरीर का जो उसकी आँखों के सामने बेपर्दा था. हलके पसीने से दमकता प्रीती का शरीर एक पैमाना लगने लगा था अगर सुंदरता को आंकने की बात हो. ठोस उभार नेव्तोन का सिद्धांत ठुकरा चुके था, उनसे नीचे तराशा हुआ कैसा पेट और गोल नाभि, बमुश्किल 28 की पतली कमर और फिर 34 के कूल्हों से नीचे बाकी शरीर सी हे खूबसूरत चिकनी जाएंगे.

अर्जुन के लिंग की तरफ चेहरा करती वह उसके सीने से थोड़ा नीचे बैठ कर कुछ पल बस उस असाधारण से फड़कते अंग को देखने लगी. जो अपनी पूरी औकात पर आ चूका था. धीरे धीरे किसी कुशल सर्प पकड़ने वाले की तरह उसकी तरफ बढ़ती प्रीती ने जड़ से इस गरम डंडे को पकड़ते हुए अपना मुँह करीब कर लिए.

"आठ..", अर्जुन सिसक उठा जब प्रीती की जीब सुपडे के निचले हिस्से से होती हुई उसके agra-bhag से छलकती छोटी सी बूँद तक फिसलती गई. हरी नस्से उभरी हुई उसके लुंड को भयानक दिखा रही थी लेकिन प्रीती बिलकुल निश्चिंत सी कभी गीले होंठ तोह कभी अपनी जीभ लगाती अर्जुन के संयंम की परकाष्ठा देख रही थी. अब एक हे उपाए थे अर्जुन के पास सबकुछ अपने हाथ में लेने का. दोनों बाजुओं से प्रीती की जांघो को पीछे खिसकते हुए अर्जुन ने जांघो के बीच चिप्पे मधुकुन्द पर मुँह लगा दिए. अपनी धड़कन को काबू करता वह आँखें बंद किये कस्तूरी सी महक वाले छेड़ के बहार की फांको को वैसे हे चूमने चूसने लगा जैसे प्रीती ने आज उसके होंठो को चूमा था.

"सीईई.. उम्म्म्म." प्रीती की पकड़ उसके लुंड पर और मजबूत हो गई थी और साथ हे जांघो का कसाव चेहरे पर. हिम्मत न हारती वह अर्जुन के सुपडे के बराबर मुँह खोलती पूरा गुलाबी हिस्सा मुँह में भरते हुए अर्जुन को भी वही सुख देने लगी थी जो उसको अर्जुन से मिल रहा था.

इधर अर्जुन की जीभ ने उसके छेड़ को ाचे से टटोलते हुए थोड़ा अंदर प्रवेश किआ, प्रीती ने शरीर ढीला छोड़ दिए. छूट ने रोका हुआ बांध टॉड दिए था लेकिन जब तक वह अलग होती मुँह में फूले हुए सुपडे ने भी गरम पानी फेंकना शुरू कर दिए. दोनों उस क्षण में शांत अपनी जगह रुके रहे...

"आह्हः..", अर्जुन ने जैसे हे ये सिसकारी ली, प्रीती उछलती हुई बाथरूम का दरवाजा बंद करती अंदर जा चुकी थी. अर्जुन के रस की एक भी बूँद अर्जुन के जिस्म पर नहीं गिरी थी. लेकिन वह बेखबर सा आँखें बंद किये वैसे हे पड़ा रहा. कोई 1 मिनट बाद हे प्रीती अपनी जन्मअवस्था में हे उसके शरीर से अमरबेल सी लिपट गई.

"ये सब सपना था?", अर्जुन ने उसकी नंगी पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा.

"हम्म..", प्रीती ने उसकी बात सुनकर सिर्फ इतना कहा और इस बार बड़े हे प्यार से उसके ऊपर लेट कर होंठो पर एक गीला चुम्बन दे दिए.

"तुमने कोई प्रैक्टिस की थी ये सब करने से पहले?", अर्जुन अपने चेहरे के ऊपर झुके उस खूबसूरत चेहरे को देख रहा था. अब वह हलकी शर्म और ढेर सारा प्यार था.

"रोज रात को, सपने में. और आज सीधा फाइनल", प्रीती अर्जुन की नाक पर जीभ से छेड़छाड़ कर रही थी. अब अर्जुन भी बेहतर था और उसके नंगे चुत्तड़ो को हलके हलके दबा रहा था.

"मैंने उम्मीद नहीं की थी इसकी. और वह भी ये की तुम मुझे काबू कर लोगी.", अर्जुन के स्वर में भी प्यार और प्रशंशा थी, अपनी होने वाली बीवी के लिए.

"वह इसलिए क्योंकि बाकी बाद के लिए. मुझे सब करना है लेकिन विथाउट प्रसौतिओं एंड एवरीथिंग इनसाइड.", नीचे खिसक कर वह उसके सीने पर सर रखे लेट गई थी. और अर्जुन उसकी बात का मतलब समझने के बाद खुद शर्मा रहा था.

"और कुछ हो गया तोह.?"

"तभी तोह कहा है. मुझे वही चाहिए और उस से पहले अंदर नहीं. यही तोह तुमने भी कहा था, याद है?"

"हाँ. और मैं दूसरी बात से भी सहमत हु.", साइड से निकले एक दूध को प्यार से सहलाते हुए अर्जुन बोलै और प्रीती की हलकी सी सिसकी चूत गई.

"ससस.. क्या करते हो. मुझे बस ऐसे लेटने दो न.", उसका हाथ पकड़ कर अपनी पीठ पर रखती प्रीती आज खुद को अर्जुन की बाहों में पा कर जैसे खुद को सबसे खुशकिस्मत मान रही थी, पूरी दुनिया में.

"वैसे तुम्हारा फिगर खराब नहीं हो जायेगा इतने बचो से.", अर्जुन उसको छेड़ रहा था लेकिन वह मुस्कुरा रही थी.

"ग्रीस में 4-5 बचे होना नार्मल है. वैसे भी म्हणत से बॉडी बेटर होती है खराब नहीं.", प्रीती अपनी उंगलिया अर्जुन की ब्याह पर फिर रही थी.

"यहाँ तोह मैंने ऐसा कोई नहीं देखा, 1 बचा हुआ नहीं और लड़की से सीधा आंटी.", अर्जुन हँसते हुए बोलै तोह प्रीती उसके गाल पर चपत लगती हुई सीने पर थोड़ी रखे उसको देखने लगी.

"यहाँ लड़की को इतर हाफ नहीं बोलते न. और किचन, बचे, कपडे बस यही काम होते है. ग्रीस में 2 हे काम है, फार्मिंग और टूरिज्म. और फॅमिली के सभी एडल्ट्स काम करते है. हेल्थी एक्टिव लाइफस्टाइल का एक एक्साम्प्ले तोह मंडे दिखा दूंगी मैं.", प्रीती ने एक अदा से कहा तोह अर्जुन के भी चेहरे पर चमक आ गई.

"तुम्हारी माँ मंडे आ रही है?"

"तभी तोह दादू पारवती दीदी और मुकेश भैया को लेकर बहार सामान लेने गए है. दादू को एक महीने से पता था लेकिन मुझे उन्होंने आज तुम्हारे घर से आने के बाद हे बताया.", प्रीती की बात सुनकर अर्जुन का मुस्कुराता चेहरा एकदम शांत हो गया.

"क्या सोचने लगे तुम एकदम?", प्रीती सचमुच जैसे उसकी धड़कन समझ जाती थी.

"कुछ नहीं. जैसा तुमने ग्रीस के बारे में बताया, अगर तुम्हारी माँ ने मुझे नापसंद करते हुए वही किसी लड़के को तुम्हारे लिए पसंद किआ तोह क्या होगा?"

"क्या फ़ालतू सोचने लगे? ये उन्हें पहले से पता है के तुम कौन हो. और जोएल की मैरिज वह ग्रीक लड़की से हे करेंगी जो उन्होंने हमारी बात पक्की होने के बाद डैड से कह दिए था. लेकिन वह अब तुमसे मिलेंगी जरूर, जैसे उनके यहाँ होता. फर्स्ट फॉर्मल मीटिंग विथ केक, फ्लावर्स एंड वाइन.", प्रीती ने आँख मरते हुए कहा और कड़ी होने लगी लेकिन अर्जुन ने पीछे से पकड़ कर अब उसको अपनी गॉड में बिठा लिए.

"फ्लावर्स तोह मेरे पास स्पेशल है उनके लिए, केक भी ले आऊंगा लेकिन वाइन की जगह अगर मैं कुछ और लाया तोह रेज्क्ट तोह नहीं कर देंगी?", दोनों उभर मुट्ठी में लेता वह उसके गाल चूम रहा था. नीचे उसका लिंग हलकी फुलावट लेता प्रीती के कूल्हों के बीच दबा था.

"तुम कुछ नहीं भी लाओगे तब भी मैं संभल लुंगी. बस ये जो नीचे खड़ा हो रहा है इसको तुम सम्भालो.", हंसती हुई वह उसकी गिरफ्त से निकल कर शीशे के सामने कड़ी हो कर ब्रा और पंतय पहन कर बाल ठीक करने लगी. बिस्टेर पर तक लगाए अर्जुन बस उसके हुस्न को देखने में खोया रहा.

"ओह मिस्टर मजनू, ऐसे हे नंगे रहना है क्या? 2 घंटे हो गए है हमे यहाँ. कपडे पहन लो.", फ्रॉक उठाने वह बिस्टेर पर झुकी तोह अर्जुन ने फिर से उसको खींच लिए.

"दिल नहीं है अब तुमसे अलग होने का.", कमर को पकड़ कर वह एक बार फिर उसके होंठो को पीने लगा और प्रीती भी उसका साथ देती चेहरा थामे अपनी जीभ उसकी जीभ से भिड़ने लगी. दोनों कुछ देर एक दूसरे को चूसने के बाद अलग हुए तोह अर्जुन भी कपडे पहन कर बाथरूम में चला गया.

.

.

"ये आ गया अर्जुन. घर पे आजकल पाँव नहीं टिकते इसके जब देखो यहाँ वह घूमता रहता है.", अर्जुन अभी पिछले आँगन में आया हे था के अलका दीदी की बात सुनकर ठिठक गया. खाने की टेबल पर इस वक़्त दादी के बराबर में ये जाना पहचाना चेहरा था और साथ हे रुपाली दीदी और माधुरी दीदी बैठे थे.

"नमस्ते.", सामने बैठी कश्यप जी की बहु सरोज को हाथ जोड़ कर अर्जुन बोलै तोह उनके चेहरे पर एक मोहक मुस्कान आ गई. प्रतिउत्तर में सिर्फ सर हिला दिया सरोज ने.

"अब कैसे हो तुम? मैं तुम्हारा हे पता लेने आई थी. कल तुम्हारे भैया ने बताया था के तबियत ज्यादा खराब हो गई थी तुम्हारी.", एक bhari-poori नवब्याहता थी सरोज, 24-25 साल के आसपास, साफ़ रंगत और थोड़ा भरा हुआ चेहरा और शरीर. सबसे ख़ास उसकी आँखें जो शायद होंठो से ज्यादा बात करती थी. और भरे भरे होंठ.

"इधर बैठ जा जब भाभी बात करने आई है तोह.", कौशल्या जी ने अपने परिचित अंदाज में कहा तोह सकपकाता हुआ वह उनके सामने हे बैठ गया, रुपाली दीदी की बगल में.

"जी मैं बिलकुल ठीक हु. और भैया को मेरी तरफ से थैंक यू जरूर बोल दीजियेगा. ऋतू दीदी ने बताया के कैसे उन्होंने मुझे कमरे से गाडी तक पहुंचाया.", अर्जुन अब थोड़ा शर्मा रहा था क्योंकि जब भी सरोज भाभी उसको देखती तोह उनकी आँखों का अलग हे संवाद चल रहा था.

"वह तोह जब तुमसे मिले तोह खुद बोल देना. वैसे ाचा लगा देख कर के जल्दी ठीक हो गए हो. फिर से तोह नहीं अँधेरे में घर से जाना शुरू कर डोज.?", सरोज भाभी की बात पर अब अर्जुन क्या कहता के वह भी उन्हें सुबह देख चूका है उसको देखते हुए.

"अरे सरोज, वह तोह अब इसका नियम बना हुआ है. तेरे दादाजी के कहने पर हे चलता है. वैसे अनिल उतनी हे सुअभ निकलता है न?", यहाँ जवाब कौशल्या जी ने दिए साथ हे सवाल भी कर लिए. एक पल के लिए सरोज भाभी शांत हुई फिर वैसे हे बोलने लगी.

"हाँ अब उनके पास 2-3 शहरों की सप्लाई रहती है और फिर वापिस समय से घर आने के चक्कर में 4-5 बजे निकल जाते है. अब पापा ने समझाया है तोह इस हफ्ते से वह 2 दिन बहार रहा करेंगे और 2 दिन घर. नहीं तोह सेहत पर भी असर होने लगा है अभी से."

"तेरे खाना लागू ारु?", कोमल दीदी की आवाज पर अर्जुन ने बिना सोचे समझे हे बोल दिए.

"प्रीती ने खिला कर भेजा है दीदी.", और सभी नजरे उसके चेहरे पर टिक गई. अर्जुन को समझ आया के वह क्या बोल गया है तब तक देर हो चुकी थी.

"शाबाश. मतलब अबसे दोपहर का खाना तेरा बनाना बंद कर देते है.", ये फिर अलका दीदी ने उसकी टांग खींचनी शुरू कर दी थी. और बाकी सभी दीदी या तोह हंस रही थी या उसको घूर.

"प्रीती?", सरोज भाभी ने दादी की तरफ देखते हुए कहा, जो खुद भी मुस्कुरा रही थी.

"अरे होने वाली बहु है हमारी. वैसे सही कहु तोह इस घर की सबसे छोटी बेटी है वह लेकिन गलती से इस निकम्मे के पल्ले बांध दी है.", कौशल्या जी भी अपनी लाड़ली पोतियों के साथ हो गई थी.

"ओह तोह जनाब स्कूल की उम्र में हे ये सब.", भाभी की बात सुनकर अर्जुन उठ कर जाने लगा तोह कौशल्या जी की आवाज सुनते हे रुक गया.

"भाभी मजाक देवर से नहीं करेगी तोह जेठ से करेगी? संजीव वाली आने दे फिर तू भाग भी नई सकेगा. चल बैठ थोड़ी देर यहाँ और घर छोड़ के आइओ.", अर्जुन तोह सन्न रह गया के दादी ये क्या बोल गई.

"ाचा बैठ रहा हु दादी. वह तोह वैसे हे कुछ काम था मुझे."

"हाँ पता है मुझे. चलो तुम लोग बातें करो मैं चली अपने कमरे में. और तेरी भाभी यहाँ इसलिए भी आई थी के इनकी डिश की तार देख आ एक बार. भैया और अंकल है नहीं घर, दिश्वाला फ़ोन नहीं उठा रहा. यहाँ से भी मिला के देख लिए.", अर्जुन हामी भरते हुए गर्दन हिला कर अलका दीदी को घूरने लगा, दादी के जाते हे.

"वैसे क्या खिलाया आज स्पेशल?", अलका दीदी और ऋतू दीदी भी दादी के जाते हे वही बैठ गई. ऋतू के सवाल ने फिर से अर्जुन को मुख्या केंद्र बना दिए था सबकी नजरो का.

"वह आएगी तोह खुद हे पूछ लेना. खाना तोह खाना होता है.", अर्जुन झेंपते हुए कहने लगा. अब उसकी शर्म आ रही थी इनके बीच बैठने में.

"स्पेशल खाने की उम्र तोह नहीं लगती अभी तुम्हारी?", उनकी ऐसी बात सुनकर अर्जुन ने एक बार हर तरफ देखा और वह सिर्फ उसकी बड़ी बहने हे थी. माँ, ललिता जी अपने कमरे में जा चुकी थी.

"खाने का उम्र से क्या मतलब?", अर्जुन ने उनकी तरफ एक नजर डालते हुए पुछा.

"न कोई उम्र नहीं होती वैसे. चलो मैं चलती हुई माधुरी. आप सबसे मिलकर भी ाचा लगा. कभी सामने भी आया करो.", सरोज भाभी ने सबसे मिलते हुए कहा और अर्जुन उनके पीछे हे चल दिए. डिश की तार ठीक करने.

और 10 मिनट बाद हे वापिस अपने घर आ चूका था. अपने कमरे में आ कर लेता हे था के बगल में अलका दीदी भी आ लेती.

"हाँ तोह फिर मिला स्पेशल खाना? और भाभी की तार जोड़ दी क्या?", उनकी दोनों बातें सुनते हे अर्जुन मुस्कुरा दिए.

"खाना खा लिए था और भाभी के टेलीविज़न की तार बस स्विच में ढीली हो गई थी. मैंने लगा दी."

"मुझे तोह लगा था के वह दूसरा हे कनेक्शन करवाने वाली है. बड़ी जल्दी आ गया.", अलका दीदी उसके मजे ले रही थी.

"ाचा अब सोने दो थोड़ी देर.", अर्जुन ने उन्हें बाँहों में भरा तोह अलका दीदी भी प्यार से किश करने के बाद वैसे हे लेट गई. दोनों हे एक दूसरे की बाँहों में सुखद एहसास में थे. तक़रीबन 5 बजे कोमल दीदी ने अर्जुन को उठाया तोह वह अकेला हे था. सामने अपनी प्यारी दीदी को देख कर खुश हो गया.

"ारु, चल उठ जा भाई. बहोत देर से सो रहा है और आज स्टेडियम भी नहीं गया तू.", गाल पर हाथ फेरती वह उसको छोटे बचे की तरह प्यार कर रही थी.

"हाँ दीदी, कभी कभी तोह एक ब्रेक लेना हे चाहिए.", उनकी गॉड में सर रख के वह लेट गया और कोमल दीदी वैसे हे उसका सर सहलाती हुई उसको बस देखे जा रही थी.

"आप कुछ बोल नहीं रही? वैसे तोह आप कभी भी नहीं बोलती लेकिन मेरे साथ तोह बात कर हे सकती हो न दीदी."

"तेरे साथ बात करने के लिए तोह मुझे कुछ कहना हे नहीं पड़ता बस तुझे जी भर के देख लेने से बात हो जाती है.", प्यारी सी मुस्कान देती वह वैसे हे अर्जुन को गॉड में लिटाये रही.

"सच में आपका दिल नहीं करता मुझसे बात करने का?", अर्जुन ने नजरे उनके चेहरे पर करते हुए कहा तोह जवाब में कोमल दीदी ने आज पहली बार खुदसे उसके ऊपर झुकते हुए छोटा सा किश कर दिए.

"क्या कहु मैं भाई, मुझे इतना प्यार बिना मांगे हे मिला और मांग कर मैं इस प्यार को जाय नही करना चाहती.", कोमल दीदी इतना कहने के बाद चुपचाप कमरे से निकल गई लेकिन अर्जुन के दिल में कई सवाल छोड़ कर.

पानी के नीचे कुछ देर खड़ा होने के बाद वह सही से तैयार होने के बाद फिजिक्स की किताब हाथ में लिए नीचे आया जहा पहले से हे कोमल दीदी उसके लिए दूध और लड्डू रखे हुए थी टेबल पर. अर्जुन के आते हे वह वापिस रसोईघर में चली गई. अपने पास हे ताई जी और माँ को देख वह भी दूध ख़तम करने के बाद जल्दी आने का बोल कर बुलेट ले कर चल दिए, टूशन पढ़ने.

.

.

"हाँ पापा, कैसे हो आप?", रामेश्वर जी ने घंटी बजते हे फ़ोन उठाया तोह सामने से आती खनकती आवाज सुनते हे मुस्कुरा दिए.

"मेरी लाडो को आज अपने बाप की याद आ हे गई. मैं ठीक हु बीटा तुम सुनाओ कैसी हो? अशोक जी और हमारा शहजादा कैसे है?", रामेश्वर जी ने अपने दामाद और नाती का हालचाल पुछा तोह कौशल्या जी भी बराबर आ बैठी.

"सब ठीक है और आपका शहजादा बोर्डिंग में है. ये कल हे गए है अपने काम के सिलसिले में जर्मनी, 2 हफ्ते के लिए. मुझे भी ले जा रहे थे लेकिन मैंने मन कर दिए. कल सुबह पहुंच रही हु आपके पास. ये इंडिया आएंगे तभी आप लोगो से मिलने के बाद मुझे साथ ले चलेंगे. इतने मैं आपके हे पास रहने वाली हु.", मधु शर्मा की ख़ुशी से भरी आवाज रामेश्वर जी को भी प्रसन्न कर रही थी.

"तेरा हे घर है मेरी बिटिया तोह तुझे बताने की जरुरत थोड़ी है. ले तेरी माँ बैठी है कान लगाए इतनी देर से. करदे इसका भी दिल हल्का.", अगले 5 मिनट दोनों maa-beti कितनी हे बातें करती रही और फ़ोन रखने के साथ हे कौशल्या जी थोड़ा चिंतित हो गई.

"आपको क्या हुआ थानेदारनी जी. अभी तोह खुश थी इतना और एकदम से परेशां हो गई."

"ख़ुशी तोह हुई की बिटिया आ रही है लेकिन चिंता भी वही के ये आपकी राजकुमारी आ तोह रही है लेकिन बाकी सबकी शामत आती दिख रही मुझे. अब बाथरूम से लेकर खाने तक में कमिया निकालनी शुरू और नया एक लगवाना पड़ेगा वह अलग.", कौशल्या जी ने अपनी चिंता जाहिर की तोह पंडित जी एक पल सोचने के बाद बोले

"तारा के कमरे में हे सोयेगी वह. और ऊपर टेलीविज़न है हे. रही बात उसके खाने पीने की तोह कोमल से बात करना वही बनाये मधु के लिए. बाकी अब समय के साथ समझदार तोह हुई होगी. परेशां मत हो.", पंडित जी की बात पर थोड़ी रहत मिली लेकिन फिर भी वह बहार चल दी सबको पूरा घर ाचे से ठीक करने के लिए.

.

.

घर के बहार एक तरफ मोटरसाइकिल कड़ी करने के बाद अर्जुन ने घंटी बजे और प्रतीक्षा करने लगा. नीली जीन्स और सफ़ेद सूती शर्ट पहने, लम्बे बाल एकदम ाचे से संभाले हुए वह एक नजर कलाई पर बंधी घडी पर डालने के बाद सामने अंदर का दरवाजा खोल कर उसकी तरफ आती अन्नू को देखने लगा. 3/4 कला जम्पर और मेहरून ढीला सा कमर तक का टॉप पहने वह खिली खिली उसके सामने आ कड़ी हुई. दरवाजा खोल कर अंदर आने का बोल वह उसको साथ लिए अंदर ड्राइंग रूम में कड़ी हुई.

"बैठो यहाँ. क्या लोगे?", अर्जुन को एक सोफे पर बिठाने के बाद उसने पुछा और जवाब में अर्जुन ने किताब सामने टेबल पर रखते हुए कहा.

"कुछ भी नहीं. घर से आ रहा हु दूध पी कर. सोचा फिजिक्स पढ़ लेता हु नहीं तोह क्या पता फिर से क्लास से बहार न जाना पड़े.", अर्जुन की बात सुनते हे वह मुस्कुरा दी.

"मुझमे तोह इतनी हिम्मत नहीं है.", अभी वह इतना हे बोली थी की 46-47 साल की सलवार कमीज पहने ये सभ्य सी महिला अंदर से चलती हुई इधर आ गई. अर्जुन ने शिष्टाचार से उन्हें खड़े हो कर नमस्ते की तोह उन्होंने भी मुस्कुराते हुए जवाब दिए.

"अन्नू मैं तेरे पापा दे ऑन तोह पहले आ जाना. अपने हैप्पी दे घर पथ है तह चली स. जे दिल करे तह आ जावी, माथा टेकन." उनकी माता जी पंजाबी में बात कर रही थी. और अर्जुन ध्यान से सुन रहा था के वह कहना क्या छह रही है. पंजाबी समझ लेता था वह लेकिन ये थोड़ा तेज बोल रही थी

"ओह मम्मी जी तुस्सी जाओ. मैं नहीं जाना path-vath ते. चंगा भला पता है तुहानू. जे पापा आ गए तह मई बना दवंगी ौहना वास्ते चा.", अन्नू ने भी वैसे हे जवाब दिए.

"वेख पट, कुड़ी न पानी गरम नई करना ौंदा नाल तेरे सामने चा दी गाल कर रही है. ओह बीटा मैं भी झल्ली हु जो तुम्हारे साथ पंजाबी बोलने लगी. मंद मत करना. आप लोगो बातें करो मैं चलती हु. अगली बार बैठूंगी साथ अभी चलती हु.", उन्होंने अर्जुन से मुस्कुराते हुए कहा. हंसमुख महिला थी जैसे अमूमन पढ़ीलिखी पंजाबी महिला होती है.

"कोई गल्ल नई आंटी जी. तुस्सी पंजाबी वच गाल कर सकदे हो. मेरे वास्ते बोलना थोड़ा जा मुश्किल ऐ पर समझ चंगी तरिया लेना है.", अर्जुन ने जब साफ़ पंजाबी में बात की तोह आंटी ठुड्डी पर हाथ रखती उसको देखने लगी.

"ऐ तह चंगी गाल है पट. एक था कुड़ी ने पहली वरि मुंडा घरे सदया नाल हैगा वि गबरू. रब खुश रखे. चंगा लगेया मिल के बीटा जी. फेर मिलदे है.", उनकी बात पर जिस तरह अन्नू शरमाई अर्जुन को समझ तोह नहीं आया लेकिन जवाब में उसने भी हाथ जोड़ दिए. आंटी जी सर पे चुन्नी सही करने के बाद बहार चले गए.

"अब बताओ जरा ये क्या था? उन्होंने जो समझा वह शायद गलत समझा न. और तुमने कुछ बोलै भी नहीं.", अर्जुन मुस्कुराती अन्नू से बोलै तोह वह जाली वाले दरवाजे की चिटकनी लगाने के बाद बराबर आ बैठी.

"आराम से बाबा. मम्मी के हिसाब से तुम मेरे दोस्त हो और कुछ नहीं. और पहली बार उन्होंने मेरा कोई मेल फ्रेंड देखा तोह उन्हें ाचा लगा. इसलिए मैंने ज्यादा बात को नहीं खींचा. क्योंकि घर पर टूशन जैसा कुछ पॉसिबल नहीं और देखने से तुम लगते नहीं हो स्कूल के. अगली बार इसकी हेल्प मत लेना.", किताब उसको दिखते हुए अन्नू ने एक तरफ राखी और अर्जुन की बाजु पकड़ते हुए सत् गई.

"बाप रे. ये टीचर खतरनाक है. घर में स्टूडेंट को दोस्त बता के मिलवा रही है. कल को श्रीमान वालिए जी रिश्ता लेके घर आ गए तोह मैं घर से बहार. और उन्हें ये पता लगेगा के मैं ग्याहरवी में पढता हु तोह तुम्हारी करा देंगे शादी किसी दाढ़ी वाले सरदारजी से.", अर्जुन हँसते हुए बोलै तोह अन्नू ने चूंटी काट ली उसकी कमर पर.

"दिमाग काम चलाओ. स्टूडेंट नहीं हो मेरे, याद रखना स्कूल के बहार स्टूडेंट नहीं हो."

"फिर क्या हु?", अर्जुन ने शरारत से देखा.

"मैं बात नहीं करती तुमसे , जाओ.", नखरा दिखती अन्नू पीछे हुई तोह उसकी गोरी कमर दिखने लगी, टॉप सरकने से. जो पहले अर्जुन ने देखि और उसकी नजर का पीछा करते हे अन्नू ने.

"शर्म नहीं आती क्या?", नजरे झुकाती वह दूसरी तरफ देखने लगी.

"मैं तोह बहार से हे तुम्हे देख रहा था. सुन्दर हो तोह देखूंगा हे.", अर्जुन ने तारीफ करते हुए कहा.

"मैं वो बात नहीं कर रही. तुम्हारी नजरे, उनकी बात कर रही हु. पहले मेनका के उधर और अब यहाँ."

"कल हॉस्पिटल वाला भूल गई शायद, नरम वाला.", अर्जुन जैसे सोच के बैठा था परेशां करने का.

"ऐसे नहीं मानोगे.", अन्नू मुस्कुराती हुई मारने के लिए ऊपर हुई तोह अर्जुन ने कलाई पकड़ते हुए अपने चेहरे के सामने उसको कर लिए. अन्नू की धड़कन उसके ऐसे पकड़ने से हे भाड़ गई थी और अब तोह दोनों के चेहरे 2 इंच दूर थे. आँखें बंद करती वह खुद को ढीला छोड़ उसके होंठो पर होंठ लगती उसकी बाहों में आ गई. एक मिनट के किश के बाद अर्जुन ने चेहरा पीछे किआ तोह बंद आँखों पर लम्बी पलके और हलके हिलते मॉटे होंठ, खूसूरत चेहरा और अन्नू की तेज चलती सांसें. धीरे से अन्नू ने आँखें खोली और उठ कर अंदर चली गई. अर्जुन बस देखता रहा.

"अब यही बैठे रहोगे? ये ड्राइंग रूम है मेहमानो के लिए. हम मेरे कमरे में बैठेंगे.", अन्नू उसका हाथ पकड़ कर उठती हुई साथ लिए अंदर की तरफ चल दी. ड्राइंग हॉल में तीन कमरों के दरवाजे थे और ये सबसे अंदर की तरफ वाला था. कमरे के देखते हे अर्जुन समझ गया के ये maa-baap के एकलौती लाड़ली बेटी है. पूरे बीएड के सिरहाने 7-8 अलग टेडी बेयर, एक स्टडी टेबल, एक कंप्यूटर, एक तरफ की पूरी दिवार पर काले रंग की लकड़ी की 4 अलमारी जो जमीन से छत्त तक थी बड़े आईने के साथ. बाथरूम से पहले हे अलग जगह शायद ड्रेसिंग के लिए और अनगिनत किताबे सलीके से दिवार पर लगी 3 लकड़ी की रैक में.

"बड़ा प्यार से संभल कर रखा है हर चीज को और उतना हे सुन्दर कमरा है तुम्हारा.", दिवार पर एक कौन में टंगे गिटार को देखते हुए अर्जुन ने कहा.

"मेरे भाई का है वह.", अन्नू थोड़ा भावुक हो गई ये कहते हुए. अर्जुन ने हैरानी से देखा तोह फिर मुस्कुराती हुई बोली.

"बुद्धू ऐसा वैसा कुछ नहीं, जस्सी सॉरी जसपाल इंग्लैंड में सेटल्ड है. मेरे से 4 साल बड़ा है मेरा भाई लेकिन पढ़ने गया था और वही पक्का हो गया. मम्मी के तोह सरे अरमान धरे रह गए मेहंदी, हल्दी, संगीत के लेकिन पापा खुश है. कहते है 'गोरी नाल मूंदे ने व्याह कित्ता है", अब अन्नू पहले जैसी हे मुस्कुरा रही थी.

"वैसे पहली बार कोई इस कमरे में आया है और सबसे ाची बात है के वह तुम हो.", सामने से अर्जुन के गले लगती वह कुछ देर ऐसे हे कड़ी रही और अर्जुन भी उसको सीने से लगे बाहों में भर के खड़ा रहा. उसको ये देख कर ाचा लगा था के अन्नू एक साफदिल और भावुक लड़की है.

"अब वह नरम सा फिर महसूस हो रहा है.", अर्जुन ने जब देखा के वह अलग हे नहीं हो रही तोह फिर से छेड़ते हुए कहा.

"ी लव यू ा लोट. रेपल्य मत देना. बस ऐसे हे रहना सदा. तुम मुझे बहोत ाचे से समझते हो. उम्मम्माह्ह्ह.", उसका गाल चूम कर वह अब उसको अपने बीएड पर लेकर बैठ गई थी.

"तुम्हे डर नहीं लगता मेरे साथ अकेले में?", अर्जुन तक लगाए किनारे की तरफ बैठा था और उसका हाथ अपने हाथ में लिए अन्नू अंदर की तरफ.

"इस से ज्यादा सिक्योर मैंने पहले कभी फील हे नहीं किआ. और तुम ये बोले क्यों वैसे.? इतनी कमजोर नहीं हु मैं जो तुम कुछ भी कर लो. सरदारनी हु.", आँखें बड़ी करती वह अर्जुन को घूरते हुए कहने लगी.

"पता है पता है कितनी बहादुर हो. मैं कल हे रिजाइन कर दूंगी.. बला बला बला .. इत्ते मॉटे मॉटे आंसू निकलने वाली सरदारनी.", अर्जुन परसो शाम वाली उसकी नक़ल करते हुए चिढ़ाने लगा तोह अन्नू उसको मारने का नाटक करती गॉड में हे आ बैठी.

"नक़ल करते हो मेरी. गंदे कही के."

"अब देखो खुद आ कर मेरे ऊपर गिरेगी तोह खतरा तोह है हे. फिर ये जो चिपक जाती हो तब दिमाग काम करना बंद कर देता है.", अर्जुन की गॉड में बैठी वह सीने से लग गई थी. और अर्जुन की शरारत से भरी बातें सुनते हुए गाल लाल हो चुके थे.

"हर टाइम यही सूझता है क्या तुम्हे? दिमाग बंद नहीं ज्यादा चलने लगता है तुम्हारा.", अन्नू का दिल भी तेजी से धड़क रहा था लेकिन ऐसे अर्जुन की गॉड में उस से चिपक कर बैठना अलग हे सुख दे रहा था.

"हर टाइम नहीं. जब तुम मेरे गले से लगती हो या मैं जब ये देख लेता हु.", नंगी कमर पर अर्जुन हाथ रखते हुए बोलै तोह अन्नू की सांस अटक गई. इस जगह पहला स्पर्श था ये किसी लड़के का. वह थोड़ा और कसक चिपक गई थी. नंगी मुलायम बाहों पर रौंगटे खड़े हो गए थे अर्जुन की इस च्वहाण से. और अब तोह उसके दोनों हाथ अन्नू की मुलायम कमर को पकडे थे, टॉप के अंदर से.

"प्लीज कमर से नीचे मत जाना. I'm नॉट रेडी येत.", अन्नू ने लड़खड़ती आवाज में बेचैनी से कहा तोह अर्जुन ने मुस्कुराते हुए आराम से उसको साथ में लिटा दिए.

"मैं गले से भी नीचे नहीं जा रहा हु. वह तोह इसलिए तुम्हे पकड़ा क्योंकि किनारे पर बैठा था. गिर न जाये हम.", अर्जुन की ऐसी बात सुनते हे शर्म से आँखें बंद कर ली अन्नू ने. लेकिन उसकी हिलती चट्टियां बता रही थी की वह अर्जुन को रोकती नहीं अगर वह इन्हे बेपर्दा भी कर देता.

"एक बार वैसे हे किश कर सकते हो जैसे फर्स्ट टाइम किआ था. वैसे हे खुदसे लगा कर. मैं उस एहसास को महसूस करना चाहती हु अर्जुन, ज़िन्दगी का सबसे खास एहसास था वह.", अन्नू बिस्टेर पर अभी भी वैसे हे लेती थी, आँखें बंद किये. अर्जुन भी उसकी बात सुनकर उसके ऊपर आ गया लेकिन कमर से खुद को दूर रखते हुए उसने अन्नू को दोनों होंठो को मुँह में भर लिए. इस बार वह भी तैयार थी और भरपूर साथ दे रही थी होंठो को पीने में. कब ये किश और गहरा हो गया दोनों अनजान थे. अर्जुन की जीभ कभी अन्नू अपने मुँह में भर लेती कभी वह उसका रास पीने लग जाता. अर्जुन के चौड़े सीने से दबते उभर थोड़ा सख्त होने लगे तोह अन्नू ने उसको पूरा अपने ऊपर खींचते हुए पीठ पर नाख़ून गाड़ने शुरू कर दिए.

"इस से आगे नहीं अन्नू. बस इस से आगे नहीं.", अर्जुन उसके ऊपर से लुढ़क कर एक तरफ हो गया. दोनों हे गहरी सांसें ले रहे थे. अन्नू अभी भी आँखें बंद किये थी. कुछ सँभालने के बाद उसने आँखें खोल कर अर्जुन को देखा और साथ में लेट गई.

"जो मुझे कहना चाहिए था वह तुम क्यों कह रहे थे.?"

"अन्नू, अगर हमने ये लाइन क्रॉस कर ली तोह फिर पीछे हटने में दोनों फ़ैल हो जायेंगे. और मैं तुम्हारी आत्मा के साथ कोई खिलवाड़ नहीं करना चाहता. तुम्हे मुझ पर यकीन है, भरोसा है और प्यार भी लेकिन मैंने पहले भी कहा था के हमारे भविष्य के बारे में हम खुद नहीं जानते. और तुम मेरे लिए शारीरिक जरुरत तोह नहीं.", प्यार से उसके सर को सहलाते हुए अर्जुन छत्त की तरफ देख रहा था. अन्नू की आँखों से अपने आप हे बूंदे छलकती बिस्टेर पर गिरने लगी.

"ऐ.. अब क्या हुआ? मेरी बात का बुरा लगा तोह I'm रियली सॉरी अन्नू. लेकिन मुझसे गलती हो जाती तोह बाद में पछताने से ाचा है वह गलती नहीं होने देना."

"बुद्धू मैं खुश हु की तुम इतने समझदार हो. लेकिन जो बात तुम अब भी नहीं समझ रहे वह ये है के मैं तुम्हे प्यार करती हु. हमारा भविष्य क्या होगा वह कल का भी नहीं पता लेकिन जितने है इतने मैं तुम्हारी हु. मेरी लाइफ में पहले तुम्ही हो और रहोगे. शादी मैं भी अपने पापा की मर्जी से हे करुँगी लेकिन मेरे दिल में हमेशा तुम रहोगे. प्यार में सिर्फ 2 दिल होते है, गलतियां भूल या पछतावा नहीं. नाउ किश में बिफोर ी स्टार्ट क्राइंग अगेन..", उसको फिर से अपने ऊपर करती अन्नू अब बड़ी नजाकत से और हौले हौले अर्जुन को चूम रही थी. खुद हे हाथ अर्जुन की छाती पर फिरती वह मैं हे मैं उसकी मर्दानगी पर मरी जा रही थी. ऐसा शरीर शायद टेलीविज़न पर हे देखा था उसने.

"एक विश पूरी करोगे मेरी?", अन्नू किश ख़तम करने के बाद गॉड में तकिया लगाए बैठी अर्जुन को देख रही थी. उसके चेहरे की मासूमियत देख अर्जुन ने हँसते हुए हां में सर हिला दिए.

"मुझे तुम्हे बिना टीशर्ट के देखना है. प्लीज के बार.", अर्जुन ने हँसते हुए अपनी शर्ट के बटन एक एक कर के खोले और उतार कर हाथ में पकड़ ली. अन्नू अपनी ऊँगली दांत में दबती उसको ध्यान से देख रही थी.

"ये असली में तुम ऐसे ho?Baap रे. तुम्हारी चिस्ती और शोल्डर कितने बड़े है. टीशर्ट में जब देखा था तभी से मेरे मैं में था के अंदर से कैसे होंगे तुम.", अन्नू करीब आ कर कड़ी हो गई. बड़ी सावधानी से उसने अर्जुन की चौड़ी छाती की फाडियों पर हाथ रखा तोह जैसे हल्का करंट लगा.

"पूरे मसल्स बना रखे है तुमने किसी वुफ फाइटर जैसे.", अर्जुन ने जल्दी से शर्ट पहनी तोह वह रूठने का नाटक करने लगी.

"बहोत देख लिए. अब बस."

"गलत बात है. मैं देख हे रही थी न कुछ कर थोड़ी रही थी."

"और यही मैं कहु तोह?", अर्जुन ने इतना हे कहा.

"है तोह कोनसी बड़ी बात .. ऐ पागल कही के मैं लड़की हु.", जब अन्नू को समझ आया के वह क्या करने लगी है तोह हाथ वही रुक गए टॉप तबतक आधा ऊपर हो चूका था. और अर्जुन का हाथ उसके निर्वस्त्र पेट पर. जो नरम मुलायम सा था.

"ऐ.. गलत बात hai..",Sharam से आँखें बंद कर ली थी अन्नू ने लेकिन टॉप उतना ऊपर उठाये थी अबतक

"अभी तोह सिर्फ पेट पर हाथ रखा है. तुम मेरे जहा रख रही थी वह रखा तोह क्या हाल होगा."

"रख लो. मन नहीं करुँगी.", उसके इतना कहते हे अर्जुन ने एक उभर पर हाथ रख लिए. अन्नू ने झट्ट आँखें खोल ली और अगले हे पल शरमाते हुए जमीन में देखने लगी.

"हटा लो प्लीज.", अन्नू ने कहा तोह अर्जुन ने वैसे हे हाथ हटा लिए.

"इसलिए पसंद हो मुझे. तुम 2 मिनट बैठो मैं अभी आ रही हु.", थोड़ा सँभालने के बाद वह अर्जुन को बीएड पर बैठने का बोलकर बाथरूम चली गई. वापिस आई तोह पजामा चेंज था और चेहरा धोया हुआ.

अर्जुन उसको देख कर मुस्कुराने लगा जो उसको समझ नहीं आया.

"ऐसे क्या देख रहे हो?", अन्नू ने गले में बाहे डालते हुए कहा

"यही की सिर्फ हाथ लगाने से तुम्हे कपडे बदलने पद गए.", अर्जुन की मुस्कान का राज उसको अब पता लगा था.

"की गंदे कही के. ऐसे बात नहीं करते."

"चलो इसको तुम कैसे कहती?"

"किसको?"

"यही जो तुम्हे ओर्गास्म हुआ अभी उसको."

"धत्त पागल. अब इतनी देर से किश कर रहे थे और इधर उधर टच हो रहा था तोह हो गया. अब छोड़ो ये सब. गन्दी बातें हे करना.", अन्नू शर्मा रही थी

"तुम कर सकती है और मैं बात भी नहीं कर सकता.?"

"मार खानी है तोह बोल दो.", अर्जुन ने हाँ कहा तोह अन्नू ने गाल पर काट लिए.

"आउच. बिल्ली हो. चलो बाबा, अब मैं चलता हु बहोत देर हो गई. फिर कभी आऊंगा.", अर्जुन खड़ा होने लगा क्योंकि 7 बजने में 15 मिनट थे. और उसके खड़े होते हे अन्नू फिर से उसके गले लग गई.

"मत जाओ न. फिर तुमने पता नहीं कब आना है."

"जब तुम कहो तब आ जाऊंगा लेकिन अभी जाना पड़ेगा.", उसके चेहरे के सामने से बालो को आज अर्जुन ने कान के पीछे किआ जैसा वह खुद करती थी.

"कल आओगे फिर? सैटरडे है और स्कूल बंद है कल."

"तुम कितने बजे उठती हो?", अर्जुन ने पलट कर सवाल किआ

"6"

"5 बजे बहार कड़ी मिलना. जब हॉर्न दू तब इस साथ वाली गली में. अब चलता हु दरवाजा बंद कर लेना.", अन्नू के होंठो को हल्का सा चूम के अर्जुन उसके साथ हे बहार आ गया ड्राइंग रूम से किताब उठाते हुए. जिसको लेके आने की अब कोई जरुरत नहीं थी आगे से.
 
अपडेट 79

Luka-Chhippi


शंकर रसोई में शिमला मिर्च को बारीक काट रहा था किसी कुशल पांच सितारा खानसामा की तरह और एक तरफ चूल्हे पर कढ़ाई में कटी हुई सब्जियां मसाले के साथ पक्क रही थी और दूसरी तरफ कुकर में दाल की सीटी लग रही थी. इस आलिशान रसोईघर में वह बड़े दिल से खाना पकने में लगा था. अभी काटी हुई शिमला और चौकोर एकसार पनीर के टुकड़े कढ़ाई में डालते हुए ाचे से मिलाने के बाद एक तश्तरी से उसको ढकते हुए तश्तरी पर थोड़ा पानी डालने के बाद जैसे फ्रिज को खोलने लगा तोह अंदर आती इस अप्सरा को देख मुस्कुरा दिए.

"तुम्हारा हलाहल विष तैयार है.", एक अदा से जब इस गौरवर्ण महिला ने वह जाम शंकर की तरफ किआ तोह शंकर ने गिलास पकड़ते हुए सिर्फ 'थैंक यू' कहा और अदब से गर्दन झुका दी. वह महिला किसी छोटी बच्ची से खिलखिलाती एक हाथ शंकर की कमर में डालते हुए साफ़ तोलिये से पूरा चेहरा पौंछने लगी.

"सुधर जाओ. एक तोह 6 महीने बाद मेरी याद आई है और आते हे मुझे रसोई से बहार करके खुद लग गए हो यहाँ.", कीमती सफ़ेद एक कपडे के इस झीने परिधान में वह कामुक बदन पूरी तरह नुमाया हो रहा था. बड़े गोल उभर थिरकते हुए बता रहे थे के अंदर वह आजाद है. चेहरा बढ़ती उम्र के बावजूद बेहद आकर्षक. बड़ी काली आँखें, घुंघराले घने बाल, तराशी हुई पतली बोहेन लेकिन सबसे ख़ास वह रसीले मॉटे होंठ. उस नूरानी चेहरे को देखते हुए शंकर सब भूल बैठा था.

"सब्जी चला कर अंदर आ जाओ. मैं एक ों करती हु.", गाल चूमने के बाद वह शंकर के हाथ से रेत सी फिसलती अंदर चल दी, एक खास तरह से कमर और कूल्हे हिलती जिन्हे शंकर वैसे हे खड़ा निहार रहा था. पीछे नजर घूमती वह एक आँख दबाये ऊँगली से पास आने का इशारा करती एक तरफ ओझल हो गई. शंकर ने लिपस्टिक लगे गिलास को उस तरफ से हे घूँट भरने के बाद दाल वाला चूल्हा बंद किआ और सब्जी वाले को धीमा.

इस आलिशान से बड़े कमरे में बस हलकी रौशनी थी. बड़ा शाही बीएड और एक तरफ कांच के टेबल के बराबर लगे आरामदायक 2 छोटे सोफे रखे थे. शराब की बोतल, बर्फ और कुछ कटे हुए फल उस कांच की टेबल पर बड़े सलीके से सजाये रखे थे. बाथरूम से गुनगुनाने की आती आवाज सुनकर शंकर उस सोफे पर बैठ गया. जाम थोड़ा गरम हो गया था शायद जिसको ठीक करने के लिए शंकर ने चांदी के उस बर्तन से 2 टुकड़े अपने गिलास में डालते हुए हल्का हिलना शुरू किआ.

"कुछ कमी तोह नहीं रह गई?", इस आवाज की तरफ शंकर ने देखा तोह बाथरूम की भरपूर रौशनी में दरवाजे पर दोनों तरफ हाथ रखे कड़ी अप्सरा पर रुक गई. कंधे से कुछ नीचे तक के घुंगराले बाल दोनों तरफ बिखरे थे, पहली सूनी पड़ी कलाइयों में अब कांच की चूड़ियां और गोर पाँव में पायजेब.

"साडी रात बस मुझे ऐसे हे तड़पने का इरादा बनाये हो?", जाम टेबल पर रखते शंकर ने आस भरी नजरो से देखा. अपने बड़े थिरकते कूल्हे हिलती वह बड़ी मादक चाल से चलती शंकर की गॉड में आ बैठी.

"जो तुमने तड़पाया है उसका हिसाब ले ले जरा.", शंकर का सर निचे करती वह उसके होंटो को बड़े इत्मीनान से मुँह में लेती हुई शंकर के हाथ में उँगलियाँ फसा रही थी. दूसरा हाथ उस बड़े नारियल से चुके पर रखते हुए शंकर ने उसको टटोलना शुरू किआ तोह ये कामदेवी जैसे उसकी गॉड में हे पसारने लगी थी.

"आठ.. ये सिर्फ तुम्हारा स्पर्श जानते हैं.", चुम्बन ख़तम होने के बावजूद शंकर उस मुलायम गोले को हलके हलके मसल रहा था और उसकी गॉड में लेती मधु आहे भर रही थी.

"मैं भी तोह सिर्फ तुम्हारा हे स्पर्श महसूस कर सकता हु.", हलके से होंठो को चूमने के बाद शंकर ने मधु को गॉड में उठाये हे दूसरे सोफे पर बिठाया और रसोईघर में सब्जी बंद करने चला गया. वापिस आने पर जाम मधु के मुँह से लगा देख मुस्कुराता हुआ बराबर बैठ गया. अब मधु के पाँव उसकी गॉड में थे.

"Ek-ek पेग जल्दी से ख़तम करो और बिस्टेर पर चलो. फिर देखते हैं आगे क्या करना है.", पांव से शंकर का लिंग पंत के ऊपर से हे टटोलती मधु बोली तोह शंकर ने उन गोरी पिंडलियों को बेपर्दा करते हुए सहमति में सर हिला दिए. अगले 5 मिनट में हे खली गिलास टेबल पर और वह दोनों इस बड़े आलिशान बिस्टेर पर.

"क्या कह रही थी थोड़ी देर पहले? मैंने तुम्हे तड़पाया hai.",Shankar ने पूरा दूधिया जिस्म बेपर्दा करते हुए दोनों उन्नत मॉटे चुके मुठी में भरते कहा और एक खड़े निप्पल पर दांत चुभते हुए दूसरे का मर्दन करने लगा.

"ष्ठी.. आह्हः. और नहीं तोह क्या.. तुम्हे सब पता है के मेरे शरीर को सिर्फ तुम्हे हाथ लगाने का अधिकार है. फिर भी आह्ह्ह्ह... कितने दिन बीत जाते है.. उम्म्म. तुम्हारा चेहरा देखे हुए.", मधु पर खुमार हावी था शंकर का. और शंकर भी दोनों उभर हाथो में दबाते हुए अब मधु का मधुर रास पीते हुए अपना मजबूत जिस्म पूरी तरह उसके ऊपर बिछाये था.

"सब जानते हुए भी मुझे हे दोष दे रही हो. गलत बात है.", अब हाथ उन टांगो को फैला रहे थे जो नीचे दबी थी. मधु की जाँघे फैलते हुए शंकर ने अपने हाथ से लुंड को छूट के मुहाने लगते हुए करारा धक्का लगा दिए.

"आह्हः... उम्म्म्म..", आज भी ये वैसा हे है तुम्हारा.", मधु ने भी अपने घुटने मोड़ते हुए कूल्हे थोड़ा ऊपर उठा लिए थे. इस धक्के से एक बार वह कांप गई थी क्योंकि पूरा लुंड छूट की गहराई में बैठ गया था.

"तुम भी वैसी हे हो. अहह..", मधु ने शनकर के लुंड को छूट में कैसा तोह एक सिसकारी उसके मुँह से भी निकल गई.

"6 महीने बाद हल चलाओगे तोह जमीन पर म्हणत करनी हे पड़ेगी.", छाती के बालो में उंगलिया फिरती मधु अगले हे पल सिसकने लगी. शंकर के धक्के शुरू हो गए थे और हर बार वह उसकी छूट में जड़ तक वॉर करता अपने बड़े अंडकोष उस भरी गांड पर मार रहा था.

"इसलिए तोह मिलने में और भी मजा आता है. हर बार पहली बार सा मजा आता है. हहह..", दोनों मॉटे चुचो को अब शंकर सख्ती से दबाते हुए हर धक्का पिछली बार से तेज मार रहा था.

"आह्हः.. माँ.. पहली बार का याद मत दिलाओ.. उम्.. मैं भोली भली सी.. आह. . तुम जैसे सीई.. कसाई के चक्कर में फंस गई थी. क्या हाल किआ था मेरी छूट का तुमने, 2 दिन तक पेशाब करना भी मौत सा लगता था.. आठ.. थोड़ा धीरे आह्हः...", सिसकती मधु की टाँगे ऊपर उठाते हुए शंकर ने उन मोटी फांको को और उभरते हुए लम्बे गहरे लेकिन थोड़ा धीमे धक्के लगाने शुरू कर दिए थे, आज्ञाकारी प्रेमी की तरह. फूली हुई छूट के होंठ बता रहे थे के इसकी मालकिन यहाँ बाल रखने की आदि नहीं है.

"पहली बार था न वह.. आह.. लेकिन कैसे अगली बार .. तुम खुद हे सलवार निचे करके कड़ी हो गई थी चारे वाले कमरे में.. अह्ह्ह.. पलट जाओ अब.", शंकर ने चुत्तड़ो पर थपकी मारते हुए कहा और लुंड बहार निकाल लिए, जो कॉमर्स से गीला हो कर चमक रहा था. मधु भी घुटनो के बल औंधी होती अपने बड़े फैले हुए चुत्तड़ बहार निकलती बिस्टेर पर घोड़ी की मुद्रा में हो गई. अगले हे पल शंकर अपना लुंड गहराई में उतारते हुए निचे झूलते पपीता को थाम दनादन पेलने लगा.

"आई.. कमीने हो. जरुरी है पूरा हे एक बार में ठूस देना.. आह.. तब नासमझ थी और तुम भी रात में सोई हुई इस नादान लड़की को उठा कर ले जाते थे और अपनी मनमानी करने के बाद फिर ला कर वही पटक कर गायब हो जाते थे.. उम्म्म.. मैं गई भाई.. आठ..", मधु झड़ते हुए नीचे गिरने लगी तोह शंकर ने कमर अपनी गिरफ्त में लेते हुए ताबड़तोड़ धक्के लगते हुए अपना माल भी अंदर हे खाली शुरू कर दिए..

"माँ.. आह.. सुधर जाओ.. 4-4 बचो के बाप हो और पांचवा पैदा करने की न मेरी हालत है न उम्र.", बिस्टेर से उठ कर बड़बड़ाती हुई वह बाथरूम में चली गई और शंकर मुस्कुराते हुए उसको जाते देख रहा था.

"ये पहन लो बस. खाने के बाद उतरना हे है. और अब अंदर नहीं करना, हाँ नहीं तोह.", तोलिये से अपनी ताज़ी धोयी छूट साफ़ करती मधु ने एक निक्कर शंकर को देते हुआ कहा.

"अंदर तोह होगा हे. आगे नहीं तोह पीछे सही.", शंकर ने भी खुदको ठीक करते हुए कहा.

"ये कितने फैला दिए तुमने पीछे कर कर के. अशोक ने शादी के 5 साल बाद पूछना शुरू कर दिए था के आज तक मैंने उन्हें पीछे नहीं करने दिए तोह ये इतने बड़े कैसे हो गए. और तुम अब तक इनमे घुसे रहते हो. कर लेना अपनी मर्जी पहले अपना ये आखिरी पेग लो मैं आती हु रोटी बना के.", जाते हुए वह शंकर को चूमने लगी तोह शंकर ने भी एक चुका थोड़ा सख्ती से मसल दिए.

"आउच.. बेदर्दी कमीने आह.. तुम लगाना अब हाथ.", सिसकती हुई वह झूठा गुस्सा दिखती रसोई की तरफ चल दी और शंकर अपना जाम बनाने लग गया.

.

.

"क्या करने लग रहे हो भैया अभी तक? चलो न बहार आपने कहा था खाने के बाद चलेंगे.", अर्जुन जब संजीव भैया को बुलाने कमरे में आया तोह वह पजामा बनियान पहने एक कागज़ पर कुछ लिख रहे थे.

"ाचा चलते है. जरा कमीज निकल कर दे अलमारी से फिर चलते है.", बिना देखे उन्होंने कहा तोह अर्जुन ने सबसे ऊपर राखी कमीज अलमारी से निकलते हुए उनके सामने रख दी.

"बाद में करते रहना भैया. आप तोह इसमें हे खोये हुए हो.", अर्जुन भी बिस्टेर पर बैठ गया. भैया ने हँसते हुए उसको एक बार देख कर कमीज पहनी और वह कागज़ ऊपर वाली जेब में रखने के बाद खड़े हो गए.

"चल मेरे बाप चल.", संजीव भैया पीछे पीछे और अर्जुन आगे आगे. दोनों नीचे उतर आये तोह अर्जुन को स्कूटर निकलते देख संजीव भैया अचरज से देखने लगे.

"क्या देख रहे हो भैया? हम दोनों का तोह यही सवारी ाची है. इस्पे हे तोह आपने सिखाया था और ये उस मोटरसाइकिल से ज्यादा खास है.", अर्जुन की बात सुनकर भैया मुस्कुरा दिए.

"फिर चल पीछे बैठ, तू छोटा है और मैं बड़ा.", संजीव भैया ने हैंडल पकड़ते हुए कहा कहा और अर्जुन पीछे सरक गया. सुनसान गली से निकल कर दोनों इस खुशनुमा रात में सेक्टर की मार्किट की अपनी पार्किंग में आ खड़े हुए. अर्जुन को भैया के साथ देखते हे पनवाड़ी ने एक गोल्डफ्लेके सिग्रत्ते देने के बाद गिलास में निम्बू और गोली सोडा मिलाना शुरू कर दिए. कुछ हे पल बाद दोनों चलते चलते इधर अँधेरे में लगी ग्रिल पर आ गए.

"कोई परेशानी तोह नहीं है तुझे? स्कूल या स्टेडियम में?", पहली बात उन्होंने ऐसे शुरू की.

"भैया मुझे क्या परेशानी होने लगी. स्कूल में सिर्फ पढाई करने जाता हु और स्टेडियम में बॉक्सिंग, वह भी प्रीती साथ हे जाती है. आपका पालिसी का काम?", अर्जुन ने वही फुटपाथ पर बैठते हुए पुछा.

"सब सही है रे. बस टारगेट ज्यादा होते जा रहे है हर गुजरते दिन के साथ. अब तेरी वाली उम्र तोह रही नहीं के इधर प्रीती उधर कोई और.", ये बात एक मुस्कान के साथ कही.

"सच के रहे हो भैया. इतने दिन हुए आपसे बात नहीं हुई ढंग से. प्रीती तोह आपको पता हे है लेकिन कुछ और भी है. मैं कबसे सोच रहा था के आप मिलो तोह काम से काम आपको पता तोह हो. जैसे आपने पहले कहा था.", अर्जुन ने थोड़ी गंभीर आवाज में कहा.

"कुछ? मतलब मेरे हिसाब से ज्योति हे थी. और कौन आ गई तेरी ज़िन्दगी में छोटे?", संजीव भैया ने चौंकते हुए कहा.

"एक है स्टेडियम में भैया. ाची लड़की है वह और परसो शादी है उसकी. वैसे बाद में वह पहचान की निकली नाम मंजूबाला है. एक अपने हे सेक्टर में है मेरी क्लास में हे पढ़ती है. आकांक्षा नाम है और बड़ी प्यारी लड़की है भैया. ये वही है जिसने आखिरी इम्तिहान वाले दिन मुझसे इज़हार किआ था.", संजीव भैया को ख़ुशी हुई के अर्जुन ने कितने आराम से अपनी ज़िन्दगी की व्यक्तिगत बातें सरलता से कह दी थी.

"मतलब मेरा छोटा भाई अब जवानी में कदम रख चूका है. वैसे एक बात कहु, मुझे भी पता था मंजूबाला के बारे में. ये दलीप जी बेटी है ने तेरे ननिहाल वाली.", संजीव भैया की बात सुनते हे अर्जुन ने थोड़ी हैरानी से देखा.

"तोह इसलिए आपने कहा था सुधर जा?"

"नहीं. अभी एक नाम तूने नहीं बताया है.", संजीव भैया उसके चेहरे को हे देख रहे थे.

"आप हे बता दो भैया अब वह नाम.", अर्जुन ने सरलता से कहा.

"ये मेनका कौन है?"

"है है है .. क्या भैया? अब जिसके साथ कोई चक्कर नहीं उनका नाम ले रहे हो. बस जानता हु उन्हें थोड़ा बहुत. एक बार #### गांव गया था मंजूबाला से मिलने तोह अपने यूनिवर्सिटी वाले मदद से वही गांव तक लिफ्ट दी थी क्योंकि बस हड़ताल थी. फिर संयोग से आते हुए भी वह बस का इंतजार कर रही थी तोह वापिस भी वही उतार दिए था. अब ये बताओ के आप कैसे जानते हो और उस दिन आपने देखा कैसे.", संजीव भैया समझ चुके थी की चाचा को गौशाला की वजह से पता चला होगा और उन्होंने हे तोह कहा था के फसल उन्होंने तैयार की.

"कुछ नहीं रे बस वैसे हे जनता हु और तू उसदिन जिधर से गया था वही गाँव के स्टैंड से पहले अपनी गौशाला का काम चल रहा है तोह नजर पड़ गई थी. उन्हें फिर मिले तोह जीकर नहीं करना के मैंने तुम दोनों को देखा था.", संजीव भैया मिटटी दाल रहे थे अब खुदाई के बाद.

"मंडे को आप क्या कर रहे थे स्टेडियम के पास दूसरी तरफ.?", अब चौंकने की बारी उनकी थी.

"कार में बैठे थे आप और वह हमारी कार नहीं थी. काले रंग की कॉन्टेसा और मैं जब प्रीती को लेकर जा रहा था तब बीच फुटपाथ पे खड़ा आदमी हमारी फोटो ले रहा था. सही कह रहा हु न मैं?"

"मैं आया था उधर लेकिन ये फोटो वाला मामला मुझे नहीं पता. मेरे बॉस किसी से मिलने गए थे तोह उनका इन्तजार कर रहा था.", संजीव भैया भी उस्ताद थे. बड़ी सफाई से बात गोल कर गए.

"मतलब मैंने उस आदमी को वैसे हे जाने दिए? उसको मैंने उस दिन कही और भी देखा था बस याद नहीं आ रहा.", संजीव भैया समझ गए थे वह स्कूल के पास की बात कर रहा है.

"चल छोड़ ये सब मेरे व्योमकेश बक्शी. घर चलते है फिर कल बहोत काम भी है मुझे क्योंकि मधु बुआ आ रही है. थोड़ा संभल के रहिओ उनके सामने.", आँख मरते वह बोले और दोनों खड़े हो कर वापिस स्कूटर की तरफ चल दिए.

"वैसे संभल के बुआ को रहना पड़ेगा मेरे से. देख लेना मैं पहले हे बता रहा हु.", अर्जुन की आवाज में चुनौती का स्वर था.

"लगा ले शर्त बीटा तू भी क्या याद रखेगा. 14 दिन काम से काम वह रहने वाली है और काम से काम 7 बार तुझे उनकी दांत झेलनी पड़ेगी. तुझ पे भरोसा है तोह उनके जाते हे तू बताएगा स्कोर क्या रहा. मैं जीता तोह तू एक हफ्ता रसोईघर में बर्तन धोएगा और तू जीता तोह तू बता क्या लेगा.", संजीव भैया के चेहरे की ख़ुशी बता रही थी की वह अर्जुन को फंसा रहे है.

"मैं जीता तोह आप मुझे कार सिखाएंगे. और आपके लिए शर्त आसान कर देता हु. 3 बार अगर उन्होंने मुझे झाड़ लगाई तोह मैं उस दिन से हे रसोईघर में बर्तन धोने पर लग जाऊंगा.", स्कूटर पर पीछे बैठता वह बोलै तोह संजीव भैया उसका यकीन देख हैरान हो गए. फिर पनवाड़ी को पास बुलाते हुए चुपचाप वह कागज और पैसे दे कर निकल लिए घर की तरफ.

.

.

"माँ कही जाने लगी है आप?", अर्जुन घर आने के बाद सोने से पहले अपनी माँ के कमरे में आया तोह वह ऋतू दीदी के साथ कुछ कपडे देख रही थी. कोमल दीदी भी अपने पापा के खास कपडे प्रेस करने में जुटी थी.

"अरे वह तेरी मौसी की बेटी है न मंजू, परसो शादी है उसकी. मैं और तेरे पापा जा रहे है तोह बस उसकी हे तैयारी कर रहे है. आ बैठ यहाँ.", अर्जुन को अपने साथ बिस्टेर पर बिठाती रेखा जी बोली और खुद भी सब chodd-chaad उस से बातें करने लगी.

"पापा कल आ रहे है? और कौन जा रहा है शादी में?", अर्जुन अब उनकी गॉड में सर रखते हुए लेट गया था. नजर अब कोमल दीदी के झुके हुए चेहरे पर थी.

"हां. कल आ रहे है और परसो शादी के बाद शायद एक रात यहाँ रुके क्योंकि बुआ भी होगी. प्रीती बता रही थी अगले दिन उसकी माँ भी आ रहे है तोह देखते है के उनसे मिलने के लिए रुकेंगे या परसो हे वापिस चले जायेंगे. बाकी और तोह कोई नहीं जा रहा शादी में यहाँ से. उधर से तेरी naani-nana, सरोज की एक बहिन है जिसकी शादी तेरे मौसा से हे हो राखी है तोह वही लोग होंगे. वह तेरे पापा के ाचे दोस्त है इसलिए वह शादी में जा रहे है.", रेखा जी उसका सर थपकती बता रही थी.

"ये मधु बुआ का क्या चक्कर है माँ जो सभी कह रहे है के उनसे संभल के रहना?"

"ऐसा कुछ नहीं है बीटा. बस वह थोड़ी गरम स्वाभाव की है तोह जल्दी गुस्सा आ जाता है, एकलौती है न. लेकिन तेरी दोनों दीदी को बहोत प्यार करती है वह. कोमल के हाथ के खाने में आजतक कमी नहीं निकली उन्होंने और ऋतू को तोह बचपन से प्यार मिला है उनका. बाकी गलती होने पे तोह सबको दांत पड़ती हे है.", रेखा जी सोच रही थी ये बात कहते हुए.

"कोमल दीदी तोह है हे फवौरीते सबकी. और ये कभी कुछ कहती भी तोह नहीं जो इनपर गुस्सा भी आये किसी को.", अर्जुन के मुँह से अपना नाम सुनते हे एक पल के लिए दीदी के हाथ रुक गए. फिर कपडे एक तरफ रखती वह ऋतू के साथ कपडे देखने लग गई.

"अब मेरे से ज्यादा तोह तुम दोनों को कोमल ने हे संभाला है. तुम दोनों इतने शरारती थे, सारा दिन बस तुम्हारी खातर पातर सुनते सुनते ये चुप हे रहने लगी. मेरी प्यारी बेटी है ये."

"और मैं कौन हु फिर?", अब ऋतू की ऐसी बात सुनते हे कोमल दीदी के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी. अर्जुन को एक तरफ धकेलती वह उसकी जगह लेट गई.

"अरे तुम दोनों अभी भी छोटे बचो जैसे कर रहे हो? बड़े हो गए हो और मुझे उठने दो, बहोत काम बाकी है.", अपनी माँ की बात सुनते ऋतू उनकी तरफ डेक्टि कुछ कह रही थी.

"ठीक है आज तुम सो जाना मेरे पास.", ऋतू के सर को वह थपकती हुई बोली और उठ कड़ी हुई. ऋतू दीदी अर्जुन को जीभ निकलती बहार भाग गई. और अर्जुन भी हँसता हुआ अपनी माँ का गाल चूमता उठ खड़ा हुआ.

"दीदी, कल आपने मेरे साथ मार्किट चलना है. शाम को चलेंगे.", अर्जुन भूला नहीं था वह कपडे दिलाने वाली बात और कोमल दीदी, जिनका चेहरा इतनी देर से उतरा हुआ था वह अब खिलने लगा था, जो उनकी चेहरे की लाली बयान कर रही थी.

"हाँ ले जाना इसको भी. कही तोह जाये ये रसोई और घर के कामकाज से दूर.", अर्जुन अपनी माँ की बात सुनकर ऊपर संजीव भैया के कमरे में चला गया.

.

.

शंकर और मधु ने एक और पारी ख़तम की थी अभी. और जैसे हे उन मोटी फांको के बीच से लुंड पानी भरने के बाद बहार निकला वह "आह्हः" की आवाज करती कूल्हों पर हाथ रख कर वैसे हे औंधे मुँह लेती रही.

"अब मत करना नहीं तोह कल घर पे सारा दिन उठने में परेशानी होगी. बड़ी भाभी को जानते हे हो, मुँहफट है पूछ लेगी के कौन हल चला गया जब पति बहार है. गंदे ये अंदर करना जरुरी होता है?", गांड के छेड़ से रिश्ते वीर्य को अपनी जांघो पर महसूस करते वह कह रही थी.

"ठीक है लेकिन सुबह चलने से पहले एक बार और करूँगा. फिर अगले 2 दिन तोह मुश्किल है.", शंकर ने एक निप्पल को चुटकी में लेते हुए रगड़ा.

"सीई.. पता है मुझे. कल तुम्हे दोस्तों से फुर्सत नहीं मिलने वाली परसो रेखा से. और हम 3 बजे निकलेंगे, रास्ता खली मिलेगा. अभी 11 बजे है तोह इतना बहोत है सोने के लिए", तल्खी से मधु ने कहा और शंकर ने पूरा उभर दबाते हुए जवाब दिए.

"ठीक है चलेंगे 3 बजे. और कल कुछ काम है और परसो एक शादी में जाना है. खास बुलाया है और उधर रेखा के maa-baap भी होंगे, अब तुम बताओ क्या करू?"

"जाना चाहिए तुम्हे. वैसे हे कह रही थी. और उस बेचारी को भी थोड़ा खुस कर दिए करो कभी कभी.", मधु की तल्खी एकाएक संजीदगी में बदल गई.

"बड़ा प्यार आ रहा है रेखा पर."

"ाची है वह. हम दोनों जो है सो है लेकिन अगर उस बेचारी को सुख नहीं डोज तोह क्या ये ठीक बात है? आधी अधूरी तोह मेरी गर्मी अशोक भी शांत करते है. कितनी खूबसूरत थी रेखा जब ब्याह के आये थी. आज तक मुझे रश्क होता है के कोई इतना सुन्दर कैसे हो सकता है. वह जाने के बाद एक दिन मेरा एक दिन रेखा का. अगर ऐसा नहीं हुआ तोह फिर मेरे मुँह नहीं लग्न.", मधु ने चेतावनी से कहा तोह शनकर उसके गाल मुँह में भरते हुए मॉटे चुत्तड़ो पर चपत लगाने के बाद उठ गया.

"जो आज्ञा महारानी जी. वैसे इस दौरान 4 हे दिन आ पाउँगा घर. मतलब 2 तुम्हारे और 2 उसके. अब सो जाओ तुम और सुबह टाइम से उठ जाना.", शंकर बाथरूम से फारिग होने के बाद दूसरे कमरे में चला गया सोने के लिए. शाम से अब तक 3 बार वो दोनों प्यार का खेल खेल चुके थे.

.

.

"गाडी आ रही है कोई.", अर्जुन बीएड पर अपने भैया के साथ लेता था और उसने एकदम से ये कहा.

"कान बज रहे है तेरे.", संजीव भैया ने तकिया ठीक करते हुए सोने की स्थिति में आते हुए कहा.

"लो रुक गई और अब हॉर्न बजेगा. सुनो." और वही हुआ तोह दोनों खड़े हो गए क्योंकि टाला लगा था.

"कुत्ते के कान लगवा लिए क्या तूने? चल देखते है कौन आया है.", दोनों वैसे हे पजामा पहने निचे उतर आये तोह गेट पर राजकुमार जी थे, संजीव भैया के पिताजी. उनसे मिलने के बाद भैया ने गाडी अंदर की और अर्जुन सामान लेने के साथ हे दरवाजा बंद करता अपने ताऊजी के साथ अंदर चल दिए. भैया जैसे नीचे आये थे वैसे हे ऊपर.

"इस बार आप कितने दिन बाद आये हो ताऊजी पता है? आपको मेरी तोह कोई फ़िक्र हे नहीं जैसे.", अर्जुन उन्हें लिए तेजी के कमरे में आया तोह वह कपडे ठीक करती अपने पति के लिए पानी लेने चली गई.

"तेरे बार में सुना तभी तोह आया हु मेरे लाल. अब दुरी ज्यादा थी और सफर लम्बा, इसलिए समय लग गया. अब तू आराम कर बीटा रात बहुत हो गई है. सामान उधर कुर्सी पर रख दे.", अर्जुन को प्यार करते हुए राजकुमार जी ने कहा तोह वह उन्हें गूडनिघत कहता वह रसोईघर की तरफ आ गया जहा तेजी पानी में निम्बू मिला रही थी.

"आज तोह लाटरी लग गई आपकी तेजी.", अर्जुन उनके मजे लेते हुए बोलै.

"ये लाटरी 25 साल से फ़ैल है. और रात को आये अब सुबह तुझे नजर नहीं आने वाले.", ललिता जी की आवाज रूखी थी और इतना कहते हे वह चली गई. अर्जुन पीछे खड़ा सोच रहा था के ताऊजी फिर आये हे क्यों है जो सुबह उन्होंने फिर चले हे जाना है. दिमाग को शांत करता वह भी भैया के पास सोने आ गया.

"लाइट बंद करदे और मुझे उठाना नहीं सुबह.", संजीव भैया उसकी तरफ मुँह करते हुए आँख बंद करके लेट गए.

"आने के बाद हे उठाऊंगा. 5 बजे निकल जाना मैंने घूमने. गूडनिघत.", अर्जुन भी आँखें बंद करके सोने लगा.

.

.

पौने 5 बजे अर्जुन नाहा कर बाथरूम से बहार आया था अपने कमरे में खड़ा भीगे लम्बे बालो को देख रहा था. गीले होने पर वह गर्दन से नीचे तक आ रहे थे. उंगलिओं से हे उन्हें सही करता वह कपडे पहन कर नीचे आ गया. पूरा घर शांत था तोह मोटरसाइकिल बिना स्टार्ट किये घर से बहार निकलने के बाद गेट बंद करता वह कुछ आगे तक ऐसे हे उस भरी बुलेट को साइकिल जैसे लिए चला और फिर स्टार्ट करता हुआ बहार की तरफ से अन्नू की तरफ चल दिए. इतनी ख़ामोशी में धीमी रफ़्तार से चलत मोटरसाइकिल की डुंगडुंग आवाज भी संगीत हे लग रही थी. उनके घर से पहले हे एक हॉर्न दिए तोह अन्नू भी कार्गो पजामा और स्पोर्ट्स शूज पहने उसकी तरफ चलती आ गई.

"हीरो, ये इतनी सुबह का क्या प्रोग्राम बनाया है? मेरे पेरेंट्स तोह हैरान हो गए जब मैंने उन्हें जॉगिंग का बहाना बनाया. चलो इधर से जल्दी अब.", अन्नू के शरीर से उठती खुसबू बता रही थी की वह इस पल में भी ाचे से तैयार हो कर आई थी. और आज जैसे वह दोनों तरफ पाँव करते हुए पीछे बैठी वह उसका अर्जुन के प्रति भरोसा दिखा रहा था.

"आज मैंने सोचा है के थोड़ा घूम आया जाये. रोज तोह इस समय दौड़ने निकल जाता हु, कभी थोड़ा पहले. वैसे तुम्हारी हाइट ाची है और जॉगिंग के कपड़ो में भी जाँच रही हो.", अर्जुन मोटरसाइकिल को बाईपास वाली सड़क की तरफ ले जा रहा था. उसकी बातें सुनती अन्नू पीछे बैठी लम्बी मुस्कान बिखेर रही थी. आसमान में अभी भी हल्का अँधेरा था जिस वजह से गोल लाइट जल रही थी.

"पहले मेरी लम्बाई पर ध्यान नहीं गया क्या? मुझे तोह बचपन में जिराफ़ बुलाते थे लेकिन अब खुद को तुम्हारे साथ देखती हु तोह लगता है मैं नार्मल हु और तुम जरुरत से ज्यादा लम्बे.", ठंडी बयार में इस तरफ शहर से ज्यादा ठंडक थी. गोरी नंगी बाहों पर रोये खड़े होने लगे तोह अन्नू ने अपने हाथ उसके चौड़े सीने पर बांध लिए.

"हम्म.. आज आईने के सामने क्या सोच रही थी?", अन्नू ने थोड़ा छेड़ते हुआ कहा

"आज आइना नहीं देखा क्योंकि अब उसकी जरुरत नहीं है. और ये हम जा कहा रहे है?", अन्नू ने उस सुनसान खाली सड़क पर ध्यान दिया तोह वह देख के हैरान थी की 10-12 मिनट में हे वह दोनों शहर पीछे छोड़ चुके थे.

"सरप्राइज भी रहने देना चाहिए कुछ या घर से एक अड्रेस पर जाने की आदत है?", यहाँ अब अर्जुन ने क्लच से हाथ हटा कर अन्नू के पत् के ऊपर रख लिए था. ठन्डे शरीर में तापमान एकदम से बढ़ने लगा उसका स्पर्श महसूस होते हे.

"नहीं ऐसा कुछ नहीं. मैं कभी इधर नहीं आई. वैसे सच कहु, तुम स्कूल ड्रेस में फिर भी कही कही स्टूडेंट लग जाते हो लेकिन अभी पूरे कॉलेज गोएर दिख रहे हो. बस इस मोटरसाइकिल के साथ एक कमी हेयर वह भी जल्द दूर हो जाएगी.", अर्जुन के कान पर अपने आप हे अन्नू ने होंठ टिका दिए. अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ हलके से उसके पत् सहलाने लगा.

"लो बस हम आ गए है.", अर्जुन ने रोड से नीचे उतरती उस पगडण्डी पर बुलेट आगे बढ़ाते हे 500 मीटर पर रोकते हुए एक तरफ लगा दी.

"वाओ. ये क्या है? शहर के बहार इतनी खूबसूरत जगह भी है ये मुझे नहीं पता था.", अन्नू ने अपनी नजरे सामने हर तरफ घूमते हुए कहा. आसमान का पूरा प्रतिबिम्ब इस दूर तक फैली हुई झील में दिख रहा था. पानी के बीच में कही कही गोल मामूली तरंगे उठती दिख रही थी. अर्जुन अन्नू का हाथ थमते हुए एक तरफ किनारे किनारे चलते हुए उस जगह आ गया जहा पूरी झील के कच्चे किनारे वही एक जगह थी जहा दोनों तरफ लोहे की रेलिंग के साथ नीचे की तरफ सीढिया जा रही थी. 6-7 सीढ़ियों के बाद हे साफ़ निर्मल पानी था.

"जूते खोल लो अन्नू.", अन्नू झील की ख़ूबसूरती में खोई अर्जुन के हिलने से होश में आई.

"थिस इस हेवन. यहाँ देख रहे हो पूरी लाइन ट्रीज की है और पानी में उनका व्यू कितना साफ़ है.", अन्नू एक सीढ़ी पर बैठ कर जूते खोलने लगी तोह अर्जुन को फिर वही नजारा दिखने लगा जो मग्न के घर दिखाई दे गया था. तुरंत अपनी नजरे हटाता वह अन्नू के सामने नीचे बैठ कर खुद हे उसके जूते खोलने लगा और वह मुस्कुरा रही थी.

"आज लगता है जनाब मूड में नहीं है.", घुटने पर कोहनी टिकाये वह अर्जुन को हे देख रही थी. उसके लम्बे कुण्डल से बाल आँखों से नीचे आ रहे थे और अन्नू को वह बेहद आकर्षक लग रहे थे. हिम्मत करते हुए उसने अपने हाथो से एक लत्त को पकड़ कर सीधा किआ तोह वह उसकी सोच से भी लम्बे थे.

"कोई मैथोलॉजिकल करैक्टर तोह नहीं हो तुम? ये इतने लम्बे है तुम्हारे हेयर लेकिन कर्ल्स और इन्हे सेट रखते हो तोह पता नहीं चलता.", अर्जुन ने वैसे हे चेहरा ऊपर किआ तोह अन्नू ने बालो की वह लत्त छोड़ दी जो अब हलकी घूमी हुई भी अर्जुन के होंठो तक थी. ऊँगली में गोल घूमने के बाद अर्जुन ने उसको वापिस पीछे की तरफ खास तरह से छुपाते हुए फिर से सेट कर दिए.

"अर्जुन हु न तोह वैसे हे बाल है.", अन्नू के माँ से पाँव हाथ में लिए वह उनकी ख़ूबसूरती भी देख रहा था.

"अब चलो मेरे साथ. बातें इधर करेंगे.", अन्नू कड़ी हुई तोह ध्यान दिया के उसके कार्गो को अर्जुन ने ाचे से घूमते हुए घुटने तक ऊपर कर दिए था. गोरी पिण्डलिया अपनी चमक बिखेर रही थी. ऐसे हे अर्जुन ने भी अपने ट्रैक को घुटने तक ऊपर किआ हुआ था.

"आउच. बड़ा ठंडा है yar...ss..", अन्नू का पाँव पानी पर लगते हे वह हल्का उछाल हे पड़ी.

"यहाँ बैठो, हम पानी के अंदर नहीं जा रहे.", अर्जुन ने उस से 2 ऊपर वाली सीढ़ी पर बैठते हुए अपने पाँव पानी में डुबो दिए. अन्नू भी बगल में आ कर बैठ गई. अर्जुन की पण्डालियाँ जहा पथरर सी ठोस थी और उनपर मांसपेशिया बहार को अलग सी निकली हुई दिख रही थी वही अन्नू के उस मांसल भाग पर बाल का एक रोया न था और चिकनाहट बता रही थी की इन्होने ज्यादा म्हणत नहीं की है. पानी में पिंडली तक पाँव डूबते हुए अन्नू ने अर्जुन को खास के बाजु से पकड़ लिए.

"सीई.. यार पानी सच में ठंडा है.", चेहरा गुलाबी होने लगा था उसका.

"अभी थोड़ी देर में देखो यही पानी महसूस भी नहीं होगा. ये सामने देख रही हो गोल गोल रिंग्स जो बन रहे है, ये बताते है वह मछली है. और अगर नहीं हिलेगी तोह इस तरफ सीढ़ियों के पानी पर भी मैं तुम्हे वह दिखा दूंगा.", अर्जुन की ब्याह पर अब अन्नू का गोल उभर डाब रहा था, जिस तरह जुड़ कर वह बैठी थी. लेकिन अन्नू सिर्फ उसकी बातें सुन्न रही थी.

"हे वह देखो, यहाँ ग्रे कैटफ़िश. तुम सच कह रहे थे.", किसी छोटी बच्ची की तरह वह खुश होती अर्जुन को बता रही थी अर्जुन ने भी देख लिए था बिल्ली सी मूछों वाली उस लहराती हुई 7-8 इंच की मछली को.

"जितना मुझे याद है यहाँ दूसरी और भी मछलिया है. कुछ का रंग safed-peela भी है और कोई कोई तोह मेरी कोहनी तक बड़ी भी.", अर्जुन जैसे याद करते हुए बता रहा था.

"पहले कब आये थे यहाँ?", अन्नू के इस सवाल पर वह एक पल के लिए खामोश हो गया फिर बोलै.

"10 साल पहले. रास्ता याद नहीं था मुझे कभी यहाँ का बस उधर बिपास की तरफ जो फैक्ट्री है वह मुझे याद थी. उधर पहले कोई पहचान के अंकल थे जहा दादाजी आते थे और इस जगह मैं पिकनिक के लिए आया था अपनी फॅमिलिय के साथ. पापा, मैं, मेरी दोनों बड़ी दीदी और माँ. लेकिन तुम्हारे घर जब मैंने ड्राइंग रूम में एक्वेरियम देखा तोह मुझे इस जगह की याद आ गई. जाने क्यों ये पहले कभी याद हे नहीं आई.", अर्जुन अपनी धुन में बताये जा रहा था. अन्नू उसकी बातें सुनती देख रही थी की ये लड़का कितना अलग है.

"तुम अपने परिवार से दूर हुए थे कभी?", उसका हाथ अपने नाजुक हाथ में लेती वह एक बार उसका चेहरा देखते हुए फिर से सामने पानी में देखने लगी.

"हाँ. 9 साल के लिए. फिर पिछले पूरा साल घर में ऐसे बिताया जैसे घर से जाने से पहले मैं फर्स्ट क्लास में था.", अर्जुन ने अपनी बात हँसते हुए कही और अन्नू ने भी उसके गाल पर चूम लिए.

"बड़े सीधे हो यार तुम. एक दम सच्चे और सीधे."

"तुम्हारा वही नरम part लग रहा है इतनी देर से मुझे.", अर्जुन ने नटखटपन दिखते हुए कहा लेकिन अन्नू और ज्यादा उस से सत् गई.

"लगने दो न. इन्हे तुमसे लग्न पसंद होगा.", अर्जुन के चेहरे के पास अपना चेहरा लाती वह एक खुमार से बोली. अर्जुन इस एकांत में उसकी मंशा समझते हुए अपने होंठ उस से मिलते हुए अन्नू के दिल की बात पूरी करने लगा. आसमान अब neela-kesari हो रहा था. दुनिया के शोर से परे वह इस भरपूर शांत जगह पर सूरज के उगने से पहले ek-dusre में डूब रहे थे. दोनों का बहार की तरफ वाला पाँव पानी में एक दूसरे से उंगलिया भिड़ा रहा था और अर्जुन की हथेलियां जैसे हे अन्नू की बाजू के नीचे आई, वह अपने कूल्हे उठती उसकी एक मुड़ी जांघ पर आ गई, एक पाँव अभी भी पानी में अर्जुन के पाँव पर था और दूसरा वैसे हे मोड हुए वह अब उसके सीने से लगी अर्जुन को अपने होंठो का रास पीला रही थी.

"उम्म्म... आठ.", अन्नू के वक्ष जरुरत से ज्यादा हे नरम थे जिनमे अर्जुन की उंगलिया हलके हलके दबने पर भी अंदर धंस रही थी, बस ये नयी उत्तेजना जो वह पहली बार महसूस कर रही थी उसकी वजह से निप्पल सख्त होने लगे थे. धीरे धीरे जब ये नशा हावी होने लगा तोह वह अर्जुन को पीछे करने लगी.

"दोनों गिर जायेंगे ऐसे तोह.", अर्जुन ने होंठ अलग करे तोह अन्नू ने अपनी बोझिल आँखें थोड़ी सी खोलते हुए उसको देखा. और दोनों की स्थिति देख वह शर्माने लगी. ब्रा में क़ैद उसके नरम चुके अभी भी अर्जुन के हाथो की गिरफ्त में थे.

"मैंने कहा था यहाँ बैठने को?"

"मुझे नहीं पता था न के यहाँ पर हम ये करने लगेंगे. घर से सोच कर तोह नहीं चला था.", अर्जुन ने हलके से एक उभर दबाया और अन्नू सिसकती हुई पीछे हो गई.

"Aaai..Gande कही के. ये प्लेइंग बॉल नहीं है. सीई..", अन्नू सिसकते हुए बोली और अपना बया उभर हलके से सहलाने लगी.

"सॉरी, मुझे लगा तुम्हे ाचा लग रहा था मेरा इन्हे पकड़ना.", अर्जुन ने मायूसी से कहा तोह वह खिलखिलाती हुई हंसने लगी.

"इतने भोले मत बनो. सब समझ रही हु मैं तुम्हारी बातें. वैसे मुझे सच में ाचा लग रहा था.", अन्नू वह से उठकर सिद्धिया चढ़ती नंगे पाँव हे पेड़ो के झुरमुट की तरफ चल दी, आगे से अर्जुन को एक खास तरह पलट कर देखते हुए. घास की मौजूदगी और प्राकृतिक जमीन होने से नंगे पाँव चलना कोई खतरे वाली बात न थी. अर्जुन भी उसके दिल को समझता उसके पीछे चल दिए. घने पेड़ो के बीच खुद को अर्जुन की आँखों से ओझल करती वह जैसे luka-chhippi खेलने की चाह में थी.

इन घने नीम, अमलताश, शीशम के झरमुट में अन्नू एक चौड़े तने वाले नीम की आउट से अर्जुन को दूसरी दिशा में जाता देख दबे पाँव पीछे होती वह इस शरारत का भरपूर लुत्फ़ ले रही थी. आँखे हटी और दुर्घटना घाटी. ये मीठी दुघटना ऐसी थी जिसमे अब अर्जुन पीछे से उसको बाहों में लिए था.

"इतनी सुबह वह खेल खेलने लगी जिसमे तुम्हारा कोई अनुभव नहीं और मैं धड़कन सुन्न कर छुपे हुए को ढून्ढ लेता हु.", अन्नू उसकी तरफ नजर झुकाये सीने में खुद को छुपाने लगी थी और अर्जुन की उँगलियाँ उसके गालो को सहलाती हुई चेहरे को थामे थी. खेल एकदम से उस मदद पर पहुंच गया था जहा शिकार खुद शिकारी की बाहों में था. वृक्ष के तने से लगी अन्नू के लरजते होंठ एक बार फिर अर्जुन की क़ैद में थे और अपनी एक तंग अर्जुन के घुटने के पीछे से लगाए वह उसके जिस्म को खुद से सत्ता रही थी. अर्जुन का दूसरा हाथ उस ऊपर उठी टांग पर पत् के नीचे से सरकता नरम कूल्हे को संभाले था.

लाल लबो को भिगोने के बाद अर्जुन अपने गीले होंठ अन्नू की गोल ठुड्डी चूमते हुए गर्दन की तरफ लाया हे था के अन्नू का शरीर मीठी उत्तेजना से कम्पन्न करने लगा. गाल पे जो हाथ था अब वह ढीले टॉप के निचले हिस्से में से गुदाज नर्म पेट को सहलाता उन नरम गुब्बारों की तरफ बढ़ रहा था. अपना पूरा जोर लगाती अन्नू आँखें बंद किये हुए हे अर्जुन की कमर को अपने यौनकुंड की तरफ दबा रही थी.

"सीई.. आठ... ममममम.", अर्जुन ने दोहरा वार किआ था अन्नू की अक्षतत जिस्म पर. सीने के ऊपर मखमली हिस्से पर अपने तपते होंठो में उसकी खाल मुँह में भरी और बाय वक्ष, जो आधा ब्रा में और आधा निर्वस्त्र था उसको अपनी हथेली में भर लिए था. अन्नू के दोनों हाथ अर्जुन के सर को पकडे थे जो अब धीरे धीरे और नीचे सरक रहा था. जिस पाँव को अन्नू पहले अर्जुन की पिंडली पर टिकाये थे वह भी जमीन पर टिका पेड़ का सहारा लिए था. गोल गहरी नाभि अब बेपर्दा अर्जुन के सामने थी और दोनों हाथ बड़े चुचो की जोड़ी पर. होंठो चूमने के बाद जब अर्जुन ने उस छोटे से गड्ढे में जीभ का कमाल दिखाया तोह अन्नू मजबूती से उसके कंधो को पकड़ती रह रह के झटके खाने लगी थी. टॉप के अंदर दोनों निप्पल ब्रा की पकड़ से बहार अर्जुन के अंगूठे और पहली ऊँगली के बीच हलकी रगड़ से अकड़े हुए फूल चुके थे. अर्जुन ने धारिया से काम लेते हुए वैसे हे ऊपर की तरफ जाते हुए अन्नू के गाल चूमते हुए उसको गले से लगाए संभाल रहा था.

अर्जुन जैसे परिपक्व के सामने अन्नू एक नादान जवान लड़की भर थी. उसके शरीर में हो रहे बदलाव अर्जुन bhali-bhati समझता था. चरमसुख अन्नू के लिए वह नया एहसास था जो उसका अर्जुन से प्यार और गहरा कर रहा था. पढ़ी लिखी जवान लड़की थी जिसको किताबी ज्ञान था लेकिन जिस तरह अर्जुन ने उसके शरीर के तार छेड़े थे वह स्वर्गीकानंद उसने पहले महसूस नहीं किआ था.

"ठीक हो न?", बाँहों में लिए हे अर्जुन ने अन्नू का सर और पीठ सहलाते हुए पुछा.

"हम्म्म. ये क्या था जो अभी मेरे साथ हुआ? कुछ ऐसा कल हुआ था लेकिन आईटी वास् वॉलकनिक, माय एंटीरे बॉडी शिवरेद.", अन्नू की सांसें अब थोड़ा संभल रही थी.

"तुम्हे अपने होने का पहला एहसास हुआ है अभी. नारीत्व का एहसास, चरमसुख. ओर्गास्म", अर्जुन ने अब पकड़ ढीली की और अन्नू ने एक मीठा चुम्बन देते हुए उसकी ब्याह थामे राखी.

"लेकिन हमने सेक्स नहीं किआ.", झेंपते हुए उसने कहा और अर्जुन हाथ पकडे हे मुस्कुराता चलने लगा. दिन निकल आया था.

"वह जरुरी नहीं इसके लिए. और अभी सफर लम्बा है जो तुमने कहा उसके लिए. वैसे तुम बिलकुल स्पंज जैसे हो कही कही से.", अर्जुन अन्नू के चुचो और कूल्हों की बात कर रहा है वह समझ गई थी. शर्माती हुई भी वह मुस्कुरा रही थी.

"जितना अपनी मैरिड फ्रेंड्स से सुना था या रिश्ते की भाभियो ने बताया था उनके हिसाब से तोह सटिस्फैक्शन ladka-ladki के सेक्स करने से होती है. यहाँ सब मेरे साथ हुआ..", अन्नू सीढ़ियों पर बैठी और अर्जुन जूते पहनाने लगा. उसको देखती वह अपनी किस्मत पर गर्व महसूस कर रही थी. कितना ख्याल रखने वाला है ये लड़का. आज उनके सामने वह खुद उस अवस्था में थी लेकिन कोई फायदा उठाये बिना बस वह उसको सुख देता रहा.

"हाँ वैसे भी होता है लेकिन जरुरी नहीं के हमेशा हो. उसमे दर्द भी होता है और कुछ गलत भी हो सकता है. ये bhabhi-married फ्रेंड्स जो कहती है न पूरा सच नहीं होता. कई बार सिर्फ आग भड़का देती हैं और कुछ नहीं. आधी से ज्यादा ने तोह कभी वह महसूस नहीं किआ होगा जो तुमने अभी किआ. पूछना कभी जो आज तुमने फील किआ है. चलो नहीं तोह आंटी ये सोच रही होंगी लड़की पहले हे दिन जॉगिंग के लिए निकली थी, कही भाग हे तोह नहीं गई.", अर्जुन ने माहौल को हल्का करते हुए फिर से अन्नू को साथ लिए और पैदल मोटरसाइकिल की तरफ चलने लगा.

"तुम्हारे कुछ ज्यादा हे नरम है.", अर्जुन फिर से उसको याद दिला रहा था के आज उसने अन्नू के दोनों अछूते उभार पकडे भी थे और दबाये भी.

"वह तुम्हारे हे लिए हैं. मैंने एक बार भी रोका तोह नहीं तुम्हे. वैसे इतना कण्ट्रोल कर लोगे ये मैंने नहीं सोचा. उल्टा मैं एक बार तोह खुद..", चुप होती हु वह बात अधूरी छोड़ते हुए मोटरसाइकिल के पीछे बैठ गई.

"बात पूरी करते है. ऐसे बीच में छोड़ना गलत बात है. सोचो अगर मैं वह तुम्हे बीच में हे छोड़ देता तोह?"

"मार देती तुम्हे. मैं चाहती थी की तुम और मैं. बस तुम समझ गए हो और चुपचाप घर चलो.", उसकी पीठ में मुँह छुपाती वह कह नहीं प् रही थी.

"तुम चाहती थी की हम दोनों वह करते, इस जगह पर? अभी समय लगेगा अन्नू तुम्हे ये समझने में की सिर्फ सेक्स और प्यार में एक होने में कितना फरक है. अभी जितना मैं समझ सका हु, तुम नादान हो थोड़ी. सीधा सेक्स हुआ तोह वह तुम्हारे शरीर और आत्मा दोनों को दर्द हे देगा. पहले सब समझते है, एक दूसरे को, दोनों के बीच जो अलग है उसको, जब दोनों हे मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार हो तभी करना ठीक है.", बाइक चलते हुए वह ाचे से अन्नू को समझा रहा था.

"हम्म.. और जो उन मूवीज में दिखते है?", थोड़ी शरारत थी उसके स्वरर में.

"वह एक्टर्स है, अनुभवी और पैसे के लिए करने वाले. वह प्यार या पहली बार वाला कुछ नहीं होता. वैसे तुम देखती हो ये सब?"

"2-3 बार देख लिए था मैंने, याहूमेल पर एक लिंक आया था तोह ओपन करते हे वही सब दिखने लगा. लेकिन मुझे ाचा नहीं लगा तोह फिर नहीं देखा. और एक मूवी थी जिसमे ऐसा एक सन था लेकिन वह वह कपल थे और प्यार दिखाया गया था. मैं part नहीं.", अन्नू की नादान सी बातें अर्जुन को ाची लग रही थी

"अब ज्यादा मत सोचना इस बारे में. दिमाग वही चलता रहेगा नहीं तोह."

"हम फिर कब मिलेंगे?", बिपास के पास पहुंचते हे अन्नू ने अर्जुन के पीठ से सर लगाए हे पुछा.

"आज मेरे पापा ने आना है और बुआ ने भी. कल भी मुश्किल है दिन में लेकिन रात को हमारा डिनर याद है तुम्हे?", अर्जुन ने मेनका के घर जाने का याद दिलाया.

"हाँ. फिर ठीक है. इस बार मुझे मेनका की रिएक्शन देखने में मजा आने वाला है.", मुस्कुराती हुई वह अब खुश थी एक पूरी शाम अर्जुन के साथ अपनी सहेली के घर रात के खाने पर जाने का सोचते हुए. शहर में आते हे वह थोड़ा संभल कर बैठ गई. अर्जुन ने थोड़ी देर बाद उसके घर से पहले वाले पार्क के पास उसको उतरा तोह ाचे से सब तरफ देखने के बाद वह उसका गाल चूमती हुई चुपचाप सीधा चल दी. अर्जुन एहतियात रखते हुए कुछ देर वही खड़ा रहा.

"ओह हीरो, आज इधर अकेले कैसे खड़े हो?", ये आवाज देने वाली को देख कर अर्जुन थोड़ा चौंक गया लेकिन फिर उसको घर से बहार निकलते देख समझ गया के इसने कुछ नहीं देखा.

"देखने आया था के यहाँ अभी भी लोग रहते है क्या. और ाचा लगा देख कर की सब ठीक है.", ये लड़की पूर्वी थी, सोलंकी की बेटी. पजामा टीशर्ट पहने वह पार्क में घूमने आई थी लेकिन अर्जुन को मदद पर खड़े देख उसकी हे तरफ चली आई.

"मुझे तोह लगा था के अब दर्शन नहीं देने वाले.", पूर्वी कुछ दुरी पर कड़ी थी अर्जुन से.

"तुम्हारे पापा बुरा न मान जाये इसलिए नहीं आया था."

"पापा तोह दिन में 3-4 बार तुम्हे याद करते हे रहते है. वैसे मेरी माँ ने भी कई बार उन्हें कहा था के अगर वो लड़का उन्हें दिखा तोह जरूर घर बुला कर थैंक यू कहेंगी. आजकल दोनों एकसाथ घूमने भी जाने लगे है.", पूर्वी दिल से बोल रही थी और हर लफ्ज़ में अर्जुन के लिए जैसे करीतिज्ञता थी.

"जान कर ाचा लगा के सब ाचा है. तोह कॉलेज में जाने वाली हो इस बार?"

"हाँ. पापा ने तोह कह दिए के जो दिल करता है वो सब्जेक्ट लू. कोई दबाव नहीं और साथ हे मुझे नयी स्कूटी भी लेकर दी है उन्होंने. तुम ाचे लड़के हो अर्जुन."

"तुम ाची हो तोह तुम्हे सब ाचे हे दिखेंगे. मेरे अंदर भी कमियां है जो मुझे पता है सबको नहीं. चलता हु", अर्जुन जाने के लिए मोटरसाइकिल स्टार्ट करने लगा तोह पूर्वी ने बड़ी शालीनता से कहा

"एक बार जरूर आना घर पर. माँ को ाचा लगेगा तुमसे मिलकर और उनकी इत्छा भी है.", पूर्वी कुछ देर अर्जुन को चुप खड़े देखती रही.

"अगर उन्होंने उस बारे में हे बात करनी है तोह I'm सॉरी पूर्वी.", अर्जुन ने भी आराम से हे जवाब दिए.

"वह वैसे कोई बात नहीं करने वाली. बस उन्होंने उस लड़के से मिलना है जो समझदार है और जिसकी वजह से आज हमारी फॅमिली पूरी हुई है."

"ठीक है. फिर उन्हें कहना के मैं कल हे सबसे मिलने आऊंगा. 11 बजे के आसपास, संडे है तोह घर हे मिलेंगे सब?"

"थैंक यू सो मच. 11 बजे कल.", अपनी ख़ुशी न संभालती वह वापिस घर में दौड़ गई. अर्जुन इस छरहरी सी लड़की को खुश देख मुस्कुरा दिए. घर की तरफ नजर डाली तोह हाथ में चाय का कप लिए सोलंकी को हाथ हिलाते देख अर्जुन ने भी वैसे हे अभिवादन किआ और अपने घर चल दिए.

.

.

"कल हम नाश्ता 11 बजे करेंगे माँ.", पूर्वी ने अपनी माँ गीता को पीछे से बाँहों में भरते हुए कहा और अपनी बेटी को खुश देख वह भी मुस्कुराने लगी.

"क्या कह रहा था अर्जुन?", सोलंकी ने भी ड्राइंग हॉल में आते हे पूर्वी से पुछा तोह वह वैसी हे उमंग से बताने लगी.

"वह कह रहा था के अगर आंटी ने वही बात करनी है तोह वह नहीं आएगा. जब मैंने बताया के माँ ने बस मिलना है और सिर्फ थैंक यू कहना है, तोह मान गया.", अपनी बेटी को खुश देख सोलंकी भी मुस्कुराते हुए उसको गले से लगाने के बाद सोफे पर बैठ गया.

"तू कुछ ऐसा वैसा तोह नहीं सोचने लगी पूर्वी बीटा?", गीता ने थोड़ी फ़िक्र से कहा तोह पूर्वी ने साफ़ मुस्कराहट के साथ अपनी माँ को देखा.

"आपको ऐसा लगता है माँ? वो एक ाचा लड़का है जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते और न हे जरुरत है. बस उसने ाचा काम किआ तोह मैं इज़्ज़त्त करती हु.", पूर्वी की बात सुनते हे गीता ठहाका लगाती हंसने लगी.

"झल्ली है ये लड़की. ाचे लड़के को समझना चाहिए बीटा. क्या पता तुझे बेहतर होने में मदद मिले. आज से पहले कभी तूने बात की थी किसी लड़के से, स्कूल या पड़ोस में? लेकिन अगर उस से बात करके मनोबल बढ़ता है तोह ाची बात है न. चल मैं तेरे पापा के कपडे रखती हु तू गार्डन में पानी दे पौधों को.", सोलंकी इन maa-beti को खुश देख दिल हे दिल अर्जुन को दुआ दे रहा था. फिर अपनी पत्नी की आखिरी बात सुनते हे उसके भी चेहरे पर चमक आ गई थी. आज वह उसके साथ हे नहाने वाली थी.

.

.

अर्जुन घर आया तोह 7 बज चुके थे और आँगन से रामेश्वर जी बगीचे की तरफ आ रहे थे छोल साहब के साथ, उनकी रोजाना वाली चाय और गपशप के लिए.

"बरखुरदार ये मोटरसाइकिल पे कबसे सैर होने लगी?", अर्जुन ने आँगन में बुलेट कड़ी करने के बाद अभिवादन किआ और छोल साहब की बात सुनकर मुस्कुराने लगा.

"दादू आज थोड़ा इसको चलने का दिल था इसलिए ले गया. कल से फिर वही सड़क पर जूते पहन कर दौड़ना है.", उनके पास रुके बिना वह ऊपर भाग गया लेकिन पीछे हे उसका दूध और नयी खुराक लेकर ऋतू दीदी आ गई थी. जल्दी से दोनों चीज ख़तम करने के बाद वह बिस्टेर पर जा गिरा.

"अब ये कोनसा समय है सोने का? चल उठ और नाहा ले.", ऋतू दीदी की बात पर जवाब कमरे में आते संजीव भैया ने दिया.

"सोने दे इसको थोड़ी देर फिर उठने पर इसका जो हाल होगा वह देखने के बाद फिर कभी ये ऐसी गलती नहीं करेगा.", अर्जुन समझ गया था भैया का इशारा मधु बुआ की तरफ है. ऋतू दीदी भी हंसती हुई gilas-katori लिए नीचे चली गई. भैया तैयार होने के बाद नाश्ते के लिए और अर्जुन मीठी नींद में.

.

.

घर में एकाएक थोड़ी chehal-pehal शुरू हो गई थी 8 बजे. आँगन में काले रंग की मर्सिडीज़ आ कर कड़ी हुई तोह संजीव भैया ने गाडी से उतरती मधु बुआ के चरण स्पर्श करने के बाद डिक्की से उनका सामान उतार कर बड़ी सावधानी से पहले एक तरफ रखा और फिर dada-dadi के साथ अंदर जाती बुआ के पीछे चल दिए सामान लिए. सभी बचे बड़ी तहजीब से उनसे मिले और वह अपना चेहरा रुमाल से साफ़ करती अपने maa-baap के साथ वही बिस्टेर पर बैठ गई.

"लाडो, ड्राइवर ले आती अपने साथ. इतना लम्बा सफर अकेले करना ठीक नहीं.", कौशल्या जी ने दुलारते हुए अपनी बेटी को गले से लगते हुए कहा. अब मधु जी क्या कहती की वह अभी तक अपने भाई के साथ ये प्यार की luka-chhippi खेल रही है जिस से पूरा परिवार अनजान है. और शंकर उसको घर के पास गाडी संभलवा कर खुद गायब हो गया.

"दिल था मेरा खुद आने का माँ. और कुछ खास टाइम भी नहीं लगा आने में. पापा, आपने एक नहीं लगवाया न कमरे में अभी तक.?", और इसके साथ हे शुरू हो गया उनका परिचित अंदाज.

"तेरा कमरा ऊपर है तेरी बेटी के साथ. वह एक भी लगा है, टेलीविज़न भी और साथ हे जुड़ा तेरा बाथरूम भी. चल पहले कमरे में सामान रखवा ले और फ्रेश हो के आ जा. तारा से भी मिल लिओ अगर उठ गई हो तोह. आज उसका रेस्ट था कंपनी में.", ऊँची एड़ी के सांडले पहनती वह thak-thak करती चल दी पिछले आँगन की तरफ. यहाँ सबसे पहले वह खाना बनती रेखा जी से गले लगके मिली और ललिता जी के पाँव छूने का अभिनय करती वह आने का बोल कर ऊपर चल दी. संजीव भैया ने उनका samaan-attechi अलमारी और बिस्टेर के बीच की जगह रखते हुए उन्हें बाथरूम बताया और वैसे हे नीचे चले आये.

"हम्म्म. चलो एक जगह तोह सुकून आया.", एक पर तापमान 25 दिख रहा था जिसको रिमोट से 20 करने के बाद मधु जी का ध्यान ast-vyast सोई अपनी लाड़ली पर गया. हाथ के निचे तकिया लगाए वह बेखबर सोई हुई थी. अपनी बेटी को ऐसे देखते हे मधु जी के चेहरे पर प्यार उमड़ आया. गले में घुमा के लिया दुपट्टा उतर कर एक तरफ रखती वह सावधानी से उसके चेहरे पर झुकती उसके माथे को चूमने लगी.

"अर्जुन मैट कर न. सोने दे मुझे.", तकिया अपने मुँह पर करती तारा की मुस्कान जो कह गई वह मधु के hav-bhav बदल गए थे एक पल के लिए. लेकिन तारा की अगली बात से उन्हें कुछ बेहतर महसूस हुआ.

"ाचा भाई सो जा तू भी अगर अपने कमरे में गर्मी लग रही है तोह.", मधु को बड़ा आराम पंहुचा और उसकी साडी फ़िक्र धुआं हो गई.

"मेरी जान ये मैं हु. तेरी माँ.", प्यार से तकिया हटती मधु ने अब गाल चूम कर तारा को कहा तोह अपनी आँखें खोल कर वह एक पल उन्हें हे देखती रही फिर झटके से गले लग गई.

"माँ, आप कब आयी.?", अपनी बेटी को ऐसे खुश देख वह भी गदगद हो गई.

"चल तू आराम कर मैं नाहा के आती हु फिर आज दोनों साथ में नाश्ता करेंगे.", टोलिया और कपडे बैग से निकलने के बाद वह बाथरूम में गई तोह रहत की सांस ली. ये भी ाची तरह से रखा गया था. अलग अलग साबुन, शामपुर, फुहारा, शीशा और टाइल लगा खुला बाथरूम. इधर बहार तारा अपने सर पर हाथ रखती बाल बाल बचने पर भगवन का शुक्रिया कर रही थी. "बच गई नहीं तोह मेरी गलती से अर्जुन का काम हो गया था आज."

15 मिनट बाद मधु बाथरूम से बहार निकली तोह अब चेहरे पर सुकून था और थकान दूर दूर तक नहीं दिख रही थी. बिस्टेर से अपनी बेटी को गायब और दरवाजे को बंद देख कर बाल सूखती वह टहलने लगी. अर्जुन का कमरा इस तरफ से बंद था लेकिन जैसे हे वह संजीव के कमरे में आई जहा आधे कमरे में खिड़की से भरपूर रौशनी आ रही थी लेकिन आगे थोड़ी चाय में लगे बिस्टेर पे सोये अर्जुन को देखते हे हाथ बालो में चलने बंद हो गए.

6 फ़ीट से ज्यादा हे लम्बा और नंगी कटाव ली हुई चौड़ी छाती के साथ यथा आकर्षक चेहरा देख कर मधु एक शुन्य सी स्थिति में पहुंच गई. घुंगराले बाल कुछ चेहरे के सामने और कुछ बिस्टेर पर फैले हुए थे. चेहरे पर इतना तेज जो साधारण नहीं था. कदम अपने हे आप उसकी तरफ बढ़ चले लेकिन पास आते हे एक तगड़ा झटका लगा जिस से बची खुची सांसें भी रुकने को हो गई थी. पाजामे की दायी तरफ का भाग जरुरत से अधिक उभार लिए थे और लम्बाई हथेली से ज्यादा.

'हे भगवन ये कौन है? कही से भी साधारण नहीं है.' हिम्मत करती वह नजरे उस भाग से हटा कर उसकी बलिष्ट भुजाओ पर डालते हुए सोचने लगी. अर्जुन ने नींद में हे करवट लेते हुए मुँह दूसरी तरफ किआ तोह मधु होश में आई और धड़कते हुए दिल से अपने कमरे में आ कड़ी हुई. तारा भी एक मिनट बाद अंदर चली आई लेकिन मधु कुछ पूछताछ किये बिना हे उसके साथ नीचे खाने के लिए आ गई. भूख तोह naam-matra रह गई थी उसको देखने के बाद.

दोनों ने साथ हे खाना खाया और Ritu-Alka दीदी ने भी अपनी बुआ के साथ हे बैठ कर नाश्ता किआ. तारा उन दोनों के साथ कोमल दीदी के खली पड़े कमरे में चल दी जरुरी बात करने और मधु बुआ खुद को संभालती अंदर कमरे में कौशल्याजी के पास. दोनों maa-beti फिर महीनो का haal-chal लेकर बैठ गई. उधर अर्जुन उठ चूका था और ाचे से नहाने के बाद jeans-shirt पहन कर नीचे आने लगा.

"ोये कुम्भकरण, मधु बुआ से मिला या नहीं? वह दादी के कमरे में बैठी है जा मिल ले.", माधुरी दीदी ने हँसते हुए उसको बताया तोह वह मुस्कुराता हुआ अंदर चल दिए अपनी बुआ को दूसरा झटका देने. आखिर वह खुद हे तोह इस खेल का सूत्रधार था.
 
अपडेट 80

बिसात- आखिरी गलती


"ओह मेरी प्यारी बुआ. कैसी हो आप?", अर्जुन जब कमरे के अंदर आया तोह मधु बुआ बिस्टेर से उठी हे थी और जैसे हे अर्जुन ने पीछे से उन्हें अपनी बाहों के घेरे में लेते हुए ऊपर उठाया किसी अनजाने डर से वह हतप्रभ रह गई. अर्जुन की ऐसी हरकत पर कोअहल्या जी के चेहरे पर मुस्कराहट आ गई लेकिन अगले हे पल जैसे अर्जुन ने उन्हें नीचे खड़ा किआ मधु ने बिना देखे की कौन है, इतनी हिमाकत करने वाले के मुँह पर एक करारा थप्पड़ जड़ दिए.

कौशल्या जी के चेहरे की मुस्कान तुरंत फुर्र हो गई और अर्जुन चुपचाप बिना कुछ कहे घर से बहार निकल गया. मधु की सांसें अभी भी बेतरतीब चल रही थी.

"ये तूने क्या किआ मधु? वो बेचारा तोह अपनी बुआ से इतने साल बाद मिलने की ख़ुशी जाहिर कर रहा था लेकिन बजाये उसको प्यार से गले लगाने के तूने तोह थप्पड़ हे जड़ दिए.", कौशल्या जी ने शायद पहली बार अपनी इस लाड़ली पे गुस्सा किआ था. मधु का शरीर उस अलग हे मरदाना पकड़ को अपने शरीर पर अभी तक महसूस करते हुए अंदर से कांप रहा था.

"वो जो भी हो उसको अपनी हद्द का पता होना चाहिए माँ. मधु से घर में ऐसा आजतक किसी ने नहीं किआ तोह आगे भी कोई नहीं करेगा.", तमतमाती हुई वह पाँव पटकती ऊपर तारा वाले कमरे में चल दी. कौशल्या जी को दुःख था के आज उनके सामने उनकी हे बेटी ने अर्जुन पर हाथ उठा दिए था. और वह बस देखती रह गई.

"मधु कहा गई? अभी तुम्हारे पास हे तोह बैठी थी यहाँ.", रामेश्वर जी एक फाइल हाथ में लिए संजीव भैया के साथ हे अंदर आये थे.

"आपके लादले का गाल सेकने के बाद ऊपर चली गई अपना हमेशा वाला गरम दिमाग लिए. मैं तोह कुछ कह नहीं सकती आपकी इस लाड़ली को लेकिन अगली बार ऐसा न हो ये आपकी जिम्मेवारी है. आये एक पहर हुआ नहीं और चंडी अवतार शुरू.", कौशल्या जी से अपना गुस्सा काबू नहीं हो रहा था तोह वह भी वह से उठकर पड़ोस वाले मल्होत्रा जी के जाने का बोल बड़बड़ाती हुई चली गई.

"ये तोह गृहयुद्ध शुरू हो गया भाई संजीव. आज लगता है इस बुड्ढे को रोटी नहीं मिलने वाली.", रामेश्वर जी ने जिस अंदाज में ये कहा संजीव भैया हंसने लगे लेकिन अंदर हे उन्हें बुरा लगा था ये जान कर की बुआ ने अर्जुन के साथ ऐसा किआ. फिर कुछ याद आते हे मैं में कहा 1-0

.

.

मधु ऊपर आई तोह खली बिस्टेर देखते हे एक 20 पे करने के बाद दरवाजा लगाती वह बीएड पे लुढ़क गई. सुबह अँधेरे में सफर पर निकली थी और रात की म्हणत अलग से. अगले हे पल वह din-duniya की फ़िक्र भूलती नींद में खो गई.

उधर अर्जुन जब घर से निकला तोह थोड़ी आगे चलते हे उसके चेहरे पर मुस्कान आ चुकी थी. अपना गोरा गाल जिसपे 4 लम्बी उँगलियों के निशाँ बने थे एक बार उसको सहलाता वह आकांक्षा के घर की तरफ चल दिए. और 5-6 मिनट बाद हे वह घंटी बजा चूका था.

"वाह. आज तोह जनाब बिना नोटिस हे हमारे दरवाजे पे खड़े है.", आकांक्षा अर्जुन को सामने खड़ा देख ख़ुशी से चहक उठी. अर्जुन भी मुस्कुराते हुए अंदर आने के साथ हे आकांक्षा को बाहों में उठाये उसके कमरे की तरफ चल दिए.

"कितने सरप्राइज देने वाले हो पहले हे बता दो?", आकांक्षा गले में बाहों का घेरा बनती उसकी गर्दन चूम कर बोली और अर्जुन ने फिर वही मुस्कान दिखते हुए कहा

"यहाँ ये फलों की टोकरी 3 बजे तक अकेली थी और मुझे घर खाना नसीब नहीं हुआ तोह सोचा के आज नाश्ते में तुम्हे हे खा लेता हु."

"छी.. सड़कछाप लाइन सुना रहे हो. वैसे आज मेरा भी इरादा कुछ ऐसा हे था.", अर्जुन ने बिस्टेर पर आकांक्षा को पटका तोह वही नए कपडे रखे दिखे.

"तोह मैडम का इरादा क्या था?", अर्जुन ने अपने दाहिने अंगूठे से तकिये पर सर रखे लेती आकांक्षा के होंठ को सहलाते हुए उन्हें मुँह में ले लिए. बिना देरी किये आकांक्षा ने भी अपने होंठ खोलते हुए अर्जुन के मुँह में अपनी गुलाबी जीभ डालते हुए पहले हे किश को उत्तेजक बना दिए. प्रिंट वाली फ्रॉक के ऊपर से हे अर्जुन वो दोनों माध्यम अनार दबाते हुए बड़े इत्मीनान से होंठो का रास पीने के बाद अलग हुआ.

"अह्ह्ह.. इरादा पहले तोह नहाने का था और फिर रुपाली से मिलने का. देखा तोह जाये के हमरे अर्जुन जी घर में मिलते है या नहीं.", अर्जुन का सीना अभी भी आकांक्षा के ऊपर हे था. हाथ रेंगते हुए चिकिनी जांघो पर आये तोह उन्हें अंदर की तरफ सरका दिए.

"ये नहाने वाली बात तोह मुझे भी पसंद है बस पहले नहाने लायक बन्न तोह जाओ.", पंतय के दोनों सीरा पकड़ कर अर्जुन ने वह कपडा जिस्म से जुड़ा कर दिए और आकांक्षा ने शरारत से गर्दन ना में हिलाते हुए दोनों जंघे आपस में कस ली.

"तुम तोह नहाये लग रहे हो. फिर मुझे तुम पर ज्यादा म्हणत करनी पड़ेगी ऐसे में.", अर्जुन को अपने सीने से चिपकने लगी वह इतना कहते हुए और अर्जुन अपने जूते एक दूसरे पर रगड़ कर उतरता आकांक्षा के पूरा ऊपर आ गया.

"कैसे करोगी जरा ये भी बता दो?", परस्पर जुडी जंघे दोनों तरफ फैलते हुए वह अपना कमर का खास हिस्सा वह दबाते हुए आकांक्ष के पेट से होता हुआ फ्रॉक के अंदर हे कैसे हुए अनारो को सहलाते हुए बोलै.

"उम्म्म्म.. वह भी पता लग जायेगा. सबर करो थोड़ा.", अर्जुन की कासी हुई टीशर्ट को दोनों सीरो से खींचते वह मुँह तक ले आई और आगे अर्जुन ने मदद करते हुए खुद हे अपने हाथ उसकी फ्रॉक से भहर निकल कर अपनी टीशर्ट एक तरफ रख दी. और यही आकांक्षा उसके नीचे से निकल कर अर्जुन की पीठ पर सवार हो गई.

"ाचा बच्चू. मेरी बिल्ली मुझसे हे मियॉं.", अर्जुन उसके अल्हड़पन के साथ हे बचकानी हरकत पर मुस्कुराते हुए छाती के बल बिस्टेर पर गिर गया. आकांक्षा उसकी चिकनी पीठ पर अपना सीना रगड़ती हुई हर तरफ गीले होंठ लगा रही थी.

"ये बिल्ली अब देखो क्या करती है.", गर्दन पर दांत गदति वह अपनी नंगी छूट हलके हलके उसकी कमर पर रगड़ रही थी. वह नरम फांके अर्जुन को भी महसूस हो रही थी, हलकी गीली और लिजलिजी सी. अपनी कमर थोड़ी सी ऊपर उठाते हुए अर्जुन ने जीन्स के सामने का गोल बटन खोलते हुए उसको ढीला किआ और एक तरफ घूम गया. मस्ती में भरी आकांक्षा बिस्टेर पर थी और अर्जुन फुर्ती से अपनी जीन्स जमीन पर गिरते हुए वापिस उसको दबोचे बाहों में भरता चूम रहा था.

"इसशहहह.. आठ.. धीरे धीरे न बाबा आह्हः.", एक हाथ नीचे से उस फूली हुई लकीर को सेहला रहा था और गाछ से अर्जुन ने अपनी पहली ऊँगली पानी बहती छूट में घुसा दी. आकांक्षा मजे से दोहरी होती अर्जुन के पूरे चेहरे को चूम रही थी अपनी एक टांग उसके ऊपर रखे हुए. अर्जुन भी बड़े प्यार से उस पतली सुरंग में ऊँगली अंदर बहार करता आकांक्षा के जिस्म को मजे से भर रहा था. जब वह छोटी सी पहली हुई छूट कुछ ज्यादा हे पानी बहाने लगी तोह दूसरी ऊँगली ने भी अंदर जाने की ठान ली.

"उम्म्म.. उम्म्म्म.", हलके दर्द के साथ हे उसके जिस्म में मीठी तरंगे उठने लगी थी जब दोनों उंगलिया उसकी छूट में फांसी हुई आधी लम्बाई तक अंदर बहार होने लगी. लेकिन यहाँ दोनों के होंठ आपस में khincha-tani करते उनकी आवाजे रोके हुए थे. इतने घर्षण से आकांक्षा अपने चरम तक पहुंच पाती उस से पहले हे अर्जुन ने उँगलियाँ बहार खींच ली. होंठ अलग करती वह उसकी आँखों में बड़े प्यार से देख रही थी, जैसे पूछ रही हो के रुक क्यों गए. जवाब तुरंत हे मिला जब पूरे शरीर में सिरहन सी दौड़ गई, गरम और मोटा सूपड़ा छूट के बहरी होंठो को चूम रहा था.

"थोड़ी सी हिम्मत रखना.", अर्जुन ने अपनी बात कहते हुए हाथ से हे सुपडे को उन गीली फांको में फिरते हुआ कहा और छूट की चिकनाई से गीला हुआ सूपड़ा ाचे से छेड़ पर टिका कर धक्का लगा दिए.

"आह्हः..", आकांक्षा के होंठ मुँह में दबे थे लेकिन सिर्फ दूसरी बार ये मोटा लुंड झेल रही आकांक्षा की छूट में दर्द भर गया. होंठ अर्जुन के मुँह से बंद थे लेकिन जिस्म का अकड़ना उसके दर्द को जाहिर कर रहा था. चरम का सफर एक बार फिर शुन्य पर आ चूका था.

"बस हो गया. अब खुद को ढीला छोड़ दो.", होंठ अलग करते हुए अर्जुन उसकी आँखों पर प्यार करते हुए बोलै. जिस ब्याह पर आकांक्षा ने अपना सर टिकाया हुआ था वही ब्याह मोड़ते हुए अर्जुन उसकी पीठ सहलाने लगा. आकांक्षा का मुँह अब उसके गले और सीने के बीच छुपा था. ऊपर वाले हाथ से वह बहार की तरफ निकले कूल्हे और पत् को सहलाता थोड़ा सा सूपड़ा बहार निकल वापिस अंदर करने लगा.

"आठ.. सीई.. एक बार में कर दो न आह..", सुपडे की रगड़ ने अब आकांक्षा के जिस्म को फिर से जगाना शुरू किआ तोह वह अर्जुन की तरफ नजरे ऊपर करती हुई और लुंड अंदर करने को कहने लगी.

"नहीं. कोई जल्दी नहीं. और अभी ये खुद हे आराम से अपनी जगह बना लेगा.", अर्जुन ने उस ऊपर वाले हाथ की उंगलिया कूल्हों की दरार में एक खास अंदाज में फिरै और बड़े हलके से उस बंद हलके भूरे छेड़ की दरदरी सतह पर फिराया तोह आकांक्षा ने अपनी गांड को थोड़ा सा कस लिए. इसके साथ हे छूट में 2 इंच के लगभग लुंड सरक गया..

"अर्जुनंनं.. आह.. हाथ हटाओ वह से.. कुछ आह्ह्हम्म्म. अजीब लग रहा है.", उसकी बात मानते हुए अर्जुन ने हाथ वापिस ऊपर राखी जांघ पर थोड़ा मजबूती से रखा और ऐसे हे करवट के बल लेते उतना हे लुंड बहार निकलते हुए फिर अंदर धकेल दिए.

"आउच.. ऐसे हे आह ऐसे हे करो .. ममम. ", 20-25 धक्के छूट में लगने के बाद आकांक्षा भी अब मजे से वह आधा लुंड छूट में लेती सिसक रही थी. दोनों हे एक दूसरे को चूमते सहलाते इस धीमी चुदाई का मजा ले रहे थे. आकांक्षा की छोटी सी छूट बहोत हिम्मत वाली थी जो दूसरी बरी में हे इस विशाल लुंड को मजे से झेलने लगी थी, बेशक वह आधा हे था लेकिन छूट का छेद तोह छोड़ने के लिए बहोत था.

"थोड़ा और अंदर करू?", अर्जुन ने प्यार से उसको गले लगाए हे धीरे से पुछा.

"अभी कितना बहार है?"

"आधा.", अर्जुन ने जवाब दिए तोह वह मुस्कुरा उठी.

"मुझे पहले इस से आजाद करो और उसके बाद जो आधा बहार है उसका आधा अंदर.", शर्माती हुई वह अपने आपको फ्रॉक से निजात दिलाने को कह रही थी और अर्जुन ने भी वैसे हे उसको पीठ के बल बिस्टेर पर करते हुए बड़े आराम से वह फ्रॉक ऊपर की तरफ सरकते हुए शरीर से अलग कर दी. अब वह बुरी तरह फैली हुई छूट जो लुंड के गिर्द फेविकोल सी चिपकी थी, अर्जुन को दिखाई दी. देखने पर तोह यही लग रहा था के यहाँ छेड़ जैसे जबरदस्ती बनाया गया था.

"इधर देखो उधर नहीं. ये कौन खोलेगा?", आकांक्षा की जिंदादिली देख अर्जुन भी मुस्कुरा दिए और उसके ऊपर आते हुए पीठ पे लगे ब्रा के हुक खोल कर वह कपडा भी उन गोर गुलाबी चुचो से हटा दिए.

"यही तोह अब तक मिसिंग थे.", अर्जुन ने दोनों को पकड़ते हुए किसी लालची बचे की तरह उन्हें मुँह में भरते हुए दोनों निप्पल गीले कर दिए. आकांक्षा ने भी टाँगे ाचे से फैलते हुए अर्जुन के सख्त कूल्हों पर बांध ली थी.

"तुम्हारे हे तोह है.. उम्.. बस आराम से चूसना. कल इनका दर्द काम हुआ है लास्ट टाइम जो तुमने किआ था इनके साथ.", अर्जुन ने बात मानते हुए सिर्फ नुकीले लाल निप्पल को आराम से मुँह में भरते हुए पीना शुरू कर दिए. दोनों हाथ अब कमर को पकडे थे जिसका मतलब आकांक्षा समझ रही थी. कमर हलके हलके हिलाते हुए पहले तोह अर्जुन उतने हे लुंड से इस कासी छूट का मर्दन करता रहा और जैसे हे आकांक्षा के कूल्हे साथ देने लगे, थोड़ा जोर से एक धक्का लगते हुए वह फिर उन लाल होंठो को मुँह में लेते हुए रुक गया.

"बस्सस आह्ह्ह्ह..", हलकी सी चीख फिर भी निकल गई होंठो के बंद होने से पहले. लेकिन शायद जोश में धक्का थोड़ा तेज लगा था. लुंड अंदर एक नरम दिवार से टकराया और बहार सिर्फ एक इंच के लगभग बाकी बचा था. छूट के निचले हिस्से से 2 बूँद रक्त की बहार निकल आई. लेकिन यही वह पल था जहा अर्जुन उसके शरीर को ठंडा नहीं होने देना चाहता था. आधा लुंड बहार निकलता वह वैसे हे अंदर करने लगा. दर्द की आहें अगले 2 मिनट में हे मजे में बदल चुकी थी. आकांक्षा खुद हे अपने हाथो में अर्जुन के हाथ लिए अपने गोल चुचो पर दबाने लगी.

"आह.. ाचा लग रहा है.. उम्म्म्म इन्हे दबाओ.. आठ.. खा जाओ इन्हे अर्जुन", चुके भी कामुकता से सख्त होने लगे जिन्हे अर्जुन मसलते हुए अपना लुंड उस गरम छूट की हद्द तक मार रहा था. दोनों नंगे जिस्म एक हे ताल में हिल रहे थे और जहा दिल करता वह एक दूसरे को चूम रहे थे. आकांक्षा एक चरमसुख ले चुकी थी लेकिन न वह रुक रही थी और न अर्जुन को रुकने दे रही थी. नाख़ून उसके चूतडो पर गदति वह और तेज करने के लिए उकसा रही थी लेकिन अर्जुन समझदार था जो उतनी हे रफ़्तार से इस मासूम को प्यार करने में लगा रहा. मिलान के आधे घंटे के होने से कुछ पहले हे आकांक्षा हलकी चीख मारते हुए कांपने लगी और अर्जुन उसके बेदाग़ पसीने से गीले जिस्म पर गरम फुहार एक के बाद एक बरसाने लगा. वीर्य की इतनी मात्रा पहले कभी नहीं बरसी थी जितनी उसका प्रचंड लुंड हिलते हुए उड़ा रहा था. गोर चुचो पर बने लाल निशाँ से लेकर गोरी छोटी सी नाभि के बीच हर तरफ अर्जुन का सफ़ेद गाढ़ा रास बिखरा हुआ था. गहरी सांसें लेती आकांक्षा ने अर्जुन को अपने हे ऊपर खींच लिए. अर्जुन भी बिना गंदे होने की परवाह किये उसके ऊपर लेट कर आकांक्षा की बंद आँखों और कंपते होंठो को चूमने लगा.

10 मिनट बाद अर्जुन अलग हुआ तोह आँखें बंद किये लेती इस मासूम को निहारने लगा. बिना अपने दर्द की परवाह किये वह अर्जुन को अपने शरीर के साथ पूरी मनमानी करने देती थी. सर्वस्व उसके हवाले करते हुए. नजर जब गोरी जांघो के बीच वाले हिस्से पर गई तोह अर्जुन को थोड़ा दुःख हुआ. जो फक्क गोरी खूबसूरत छूट उसने पहली बार आकांक्षा के जिस्म पर देखि थी, सिर्फ 2 बार के सम्भोग से वह आज सूजने के साथ हे फ़ैल गई थी.

"ऐसे क्या देख रहे हो इतनी देर से? अब मुझे गॉड में उठाओ और ाचे से नेहलाओ. नहीं तोह आगे से स्ट्रिक्टली no. कोई प्यार व्यार नहीं करने दूंगी.", आकांक्षा की ऐसी बात सुनते हे अर्जुन मुस्कुराते हुए उसको अपनी मजबूत बाहों में फूल की तरह उठाये बाथरूम में चल दिए.

"जैसा आप कहो मालकिन. सेवक आपकी सेवा में सदैव हाजिर है.", शावर ों करने के बाद जैसे हे अर्जुन ने आकांक्षा को फर्श पे खड़ा किआ, कुछ कमजोरी और थोड़े दर्द की वजह से गोर चेहरे पर दर्द उभर आया.

"श.. वापिस इधर आओ.", नंगे जिस्म को अपने सीने से लगाए अर्जुन पानी के नीचे खड़ा आकांक्षा की पीठ और नितम्भ सहलाने लगा.

"बता नहीं सकती थी की इतना दर्द है?

"पहले पता हे नहीं चला. तुम एक काम करो न. टब के दोनों तप ों कर दो इतने हम यही शावर के नीचे बैठते है.", अर्जुन उसकी बात मानते हुए आराम से आकांक्षा की पीठ दिवार से लगते हुए फर्श पर बिठाने के बाद बड़े नहाने के टब पर लगी दोनों टूंटिया चलता उसके सामने बैठ गया. आकांक्षा सरकती हुई अपने पाँव अर्जुन पर रखती फर्श पर हे लेट गई. दोनों के निर्वस्त्र शरीर पर बड़े फुहारे से निकलती असंख्य पानी की धराये गिरती हुई उन्हें भिगो रही थी. एक हाथ में साबुन से झाग बनता वह उन खूबसूरत गोरी जांघो को साफ़ करने लगा और वैसे हे ढेर सारा झाग छूट पर लगते हुए उस हिस्से को भी.

"सी.. आराम से करो न.. लेकिन मजा भी आ रहा है.", आकांक्षा अपनी ऐसी खातिरदारी का भरपूर मजा ले रही थी, दर्द के बावजूद. थोड़ी देर बाद अर्जुन पूरा उसके जिस्म पर ऐसे झुका था जैसे वह इस गोर जिस्म को पानी की तीखी बूंदो से बचा रहा हो. आकांक्षा ने मादकता से उसको देखते हे नीचे होने को कहा और दोनों के गीले होंठ बहते पानी में चिपक गए.

"अब चलो टब में.", अर्जुन के लुंड भी हरकत होने लगी थी और वह आगे कुछ नहीं करना चाहता था. अगले 20 मिनट उसने सिर्फ पानी में आकांक्षा के साथ अठखेलिया करते हे बिताये. आकांक्षा तोह तैयार थी अगले दौर के लिए लेकिन वह बस उसको अपनी बाहों में लिए टब के किनारे बानी सर टिकने की जगह आँखें बंद किये पड़ा रहा.

"उठो अब. बीमार होना है क्या. स्किन खराब हो जाएगी.", आकांक्षा को अभी भी अपनी बाँहों में निर्वस्त्र पानी में देख वह उठ गया. अब वह बेहतर थी और चलने में उतना दर्द भी न था. अर्जुन ने हे उसका शरीर तोलिये से सुखाया और उसके पीछे हे खुद भी कमरे में आने के बाद कपडे पहन ने लगा. आकांक्षा ने एक सफ़ेद फ्रॉक पहन ली थी, बिस्टेर पर रखे कपडे वापिस अलमारी में बंद करने के बाद.

"माँ, परांठे और सैंडविच बना कर गई थी. तुम गरम करो मैं आती हु.", अर्जुन के गाल को चूमते हुए वह बाल सूखने लगी और अर्जुन मुस्कुराता हुआ इस लड़की के लिए वह काम भी करने लगा जो घर पे आने के बाद उसने कभी नहीं किआ था.

"नीचे कुछ मत pehan-na", जाने से पहले इतना हे कहा और आकांक्षा शर्माती हुई मुस्कुराने लगी. उसने पहले हे नीचे कुछ नहीं पहना था. 10 मिनट बाद वह उसकी गॉड में बैठी हुई अपने हाथो से खिला रही थी. जितने अर्जुन ने खाना गरम किआ था इतनी देर में आकांक्षा ने अपना कमरा और बाथरूम ठीक कर दिए थे. अब दोनों एक दूसरे को प्यार से खाना खिलने में व्यस्त थे. बीच बीच में आकांक्षा अर्जुन के होंठो पर मीठा जैम लगाने के बाद चूम भी रही थी. वह उसकी हर शरारत में साथ देता बस मुस्कुरा रहा था.

"अब क्या करे?", अर्जुन ने सारे बर्तन समेत कर रसोई में रखने के बाद आते हे पुछा. आकांक्षा उसकी अपनी बाहें गर्दन में डालती हुई साथ सत् के कड़ी हो गई.

"जो तुम्हारा दिल करे. वैसे तोह मेरा दिल है के कमरे में हे चलते है.", उसकी चमकती आँखों की बात अर्जुन समझ रहा था.

"पागल लड़की, आज के लिए जो किआ बहोत है. थोड़ी देर में मैंने घर भी जाना है देखो 1 बजने वाला है.", फ्रॉक के ऊपर से हे गोल कूल्हों को अपने पंजे में लेते हुए उसने आकांक्षा को एक छोटा सा किश किआ और फिर आगे बिना कुछ बोले उसको उठाये हुए बैडरूम में आ गया.

"चलो थोड़ी देर मेरे ऊपर लेट जाओ. बातें करते है फिर तुम आराम करना और मैं चला जाऊंगा.", आकांक्षा भी बात मानती हुई उसके सीने पर लेट गई. प्यार भरी छेड़छाड़ करते दोनों कभी चूमने लगते कभी आकांक्षा उसके गाल सहलाती हुई धड़कन महसूस करने लगती. अर्जुन ने आज का आखिरी किश करने के बाद जूते पहने और गले मिलने के बाद अपने घर चल दिए. आज आकांक्षा उसके ऐसे आने से हद्द से ज्यादा हे खुश थी. नाचती हुई वह कमरे में आने के बाद नरम तकिये को बाहों में भर्ती आज जो हुआ था उसके मीठे सपने लेती सोने लगी.

.

.

"आप कब आये और अभी जा रहे है कही?", अर्जुन ने घर में आते हे गलियारे की तरफ से आते हुए अपने पिता को देखते पहले सर झुकाते हुए अभिवादन किआ जिसके जवाब में उन्होंने अपने से भी 3-4 इंच लम्बे अपने बेटे को एक पल निहारने के बाद गले से लगा लिए.

"अरे कही नहीं बस तेरे गुलाटी अंकल के यहाँ जा रहा हु. शाम को आऊंगा. लेकिन तू इतनी धुप में कहा से पैदल आ रहा है?", कार के बोनट पर हाथ रख के वह खड़े हो गए थे जैसे कुछ देर बात करने का विचार था.

"2 घंटे पहले हे अपने दोस्त के घर गया था, सैटरडे है और छुट्टी थी. घर में सभी आज व्यस्त थे तोह थोड़ी देर वीडियो गेम खेलने चला गया था. अब इवनिंग तक मैथ और केमिस्ट्री. पापा, वैसे मैं आपके लिए कुछ लाया था अगर आप कासुअल हे उनके पास जा रहे है तोह एक बार देखोगे.?", अर्जुन ने इतने प्यार से कहा था और पहली बार वह अपने पिता के लिए कुछ लाया था. शंकर जी उसके बाल बिखेरते हुए उसके साथ वापिस अंदर चल दिए. उन्हें माँ और उनके कमरे में एक मिनट रुकने के लिए बोल कर वह बहार की तरफ वापिस दौड़ गया. शंकर जी भी अपने बेटे की हरकते देख रहे थे और इधर कमरे में अपने पति को वापिस आया देखा रेखा जी भी उनके पास आ गई.

"जी, कुछ भूल गए है? रुमाल, चाबी? पानी लौ?", शंकर जी ने उनका हाथ पकड़ कर वही बिस्टेर पर बिठा लिए और इधर अर्जुन एक पैकेट लिए उनके पास आ गया.

"ये मैंने आपके लिए हे बनवाया है. आपकी बॉडी का जितना आईडिया था वैसे हे.", पैकेट उनके हाथ में देने के बाद वह थोड़ा पीछे खड़ा हो गया. शंकर जी ने जैसे हे खोलकर अंदर देखा तोह वह सफ़ेद वस्त्र बहार निकल लिए. फक्क सफ़ेद लिनन का कुरता पायजामा, गोलाकार पट्टी वाले कालर वाला. शंकर जी बिना कुछ कहे वो ले कर कमरे में बने स्टोर में चले गए. रेखा जी कभी हैरानी से अर्जुन तोह कभी खली पैकेट को देख रही थी. वह बस होंठ पे ऊँगली रखे उन्हें चुप रहने का इशारा करता अपने पिता के आने का इन्तजार करने लगा.

"ओह वाओ. पापा यू लुक सो नीस.", इधर शंकर जी आधी ब्याह के उस कुर्ते और सिलवट वाले पाजामे को पहन कर बहार आये और इधर ऋतू दीदी अपने पापा का ये अंदाज देख उनके गले लग गई. शंकर जी के चेहरे पर ऐसी मुस्कान उनके इतिहास में देखि थी जैसे किसी ने. ऋतू दीदी का सर सहलाने के बाद उन्होंने हाथ पे बंधी स्टील की महंगी कलाई घडी उतार कर अपनी धर्मपत्नी की तरफ बधाई तोह रेखा जी ने भी एक मुस्कान से वह लेने के बाद भूरे चमड़े की उनकी ये पसंदीदा घडी और एक bhoora-kala बारीक डंडी का चस्मा उनकी तरफ बढ़ा दिए. घडी बांधने के बाद उन्होंने चस्मा अपनी ऊपर वाली जेब में रखा और अर्जुन को एक मुस्कान देते हुए बहार निकल गए. पाँव में भी अब भूरी चमड़े की जूती थी, महंगे काले बूट की जगह. आँगन में बैठी कौशल्या जी भी अपने सपूत के इस रूप को देख हैरान और खुश थी.

"ये कैसे हुआ माँ? पापा और kurta-pyajama? याद भी नहीं कब देखा था आखिरी बार."

"9-10 साल पहले पापा ऐसे हे तोह होते थे संडे को. हम पिकनिक जाते थे जब.", अर्जुन की बात सुनते हे ऋतू दीदी ने उसको अपने गले से लगा लिए था. उनको अब समझ आया था पापा के इस बदलाव का कारण.

"फिर तोह तेरी nikkar-kameej भी निकल देगी माँ लेकिन..", ऋतू दीदी आगे की बात बोलती हुई शर्मा गई थी. और रेखा जी भी उसकी बात का मतलब समझती हुई वैसी हे दिलकश मुस्कान देती उठ कर वह खली पैकेट संभाल कर अलमारी में रखने लगी.

"आगे बोलो दीदी, पूरी बात.", अर्जुन नासमझ सा पूछने लगा.

"यही की अब तेरी उम्र नहीं है माँ का दूध पीने की. अब भाग यहाँ से.", ऋतू दीदी ने उसके सर पर चपत लगते हुए कहा. और वह भी हँसता हुआ दरवाजे पे रुक कर बोलै, "आपकी तोह अभी तक वह उम्र ख़तम नहीं हुई.", और बहार भाग गया. ऋतू दीदी हैरानी से देखने लगी फिर अपनी माँ की तरफ नजरे की जो अपने बचो की बातें सुनती मुस्कुरा रही थी.

"वो तुझे हे देखने आया था और देख कर चला गया के कैसे सो रही थी. तभी बोलती हु के बड़ी हो जा नहीं तोह इसकी जगह कल किसी और ने देखा तोह तेरी शीशी शुरू करनी पड़ेगी.", अपनी माँ की बात सुनकर ऋतू दीदी ने दरवाजा लगते हुए उन्हें पकड़ते हुए बिस्टेर पर ले आई.

"बोलने दो जो भी बोले. मैंने तोह यही करना और वैसे भी आज तोह मैं इधर सोने नहीं वाली.", इतना बोलती वह ढीठ बचे की तरह वही करने लगी जिसके लिए वह अर्जुन की उम्र का हवाला दे रही थी, 2 मिनट पहले. ये माँ का सान्निध्य हे था के दोपहर में हे उनके सीन्स से चिपकी ऋतू दोनों सतांन खली करने के बाद छोटी बची सी गहरी नींद में सो चुकी थी. सर पर दुलार करने के बाद रेखा जी ने उसका मासूम चेहरा चूम कर पंखा तेज किआ और बहार निकलने से पहले दरवाजा ठीक से बंद कर दिए. उनकी गुड़िया की नींद खराब न होने पाए.

.

.

"ये आज क्या देख रहा हु मैं सांगवान? ये पंडत इतने साल बाद दिखाई दिए है.", शंकर ने चस्मा गोल मेज पर एक तरफ रखने के बाद कार की चाबी और सिग्रत्ते की डब्बी भी उधर हे रख दी और कुर्सी पर बैठ गया. गुलाटी भी हैरान था अपने दोस्त को पुराने रूप में देख कर.

"अबे ऐसा कुछ नहीं है. मेरे बेटे ने खास मेरे लिए लिए था तोह दिल रखने के लिए पहन लिए.", इन दोस्तों का ये सालो पुराण अड्डा था, गुलाटी का फार्म. जब भी समय होता तोह तीनो यहाँ समय साथ बिताते थे.

"गुलाटी की बात 16 आने सच से. एक बार तोह दिल बैठ गया देख के, यो दांगी भूतकाल में से वापिस किस तरिया चल्या आवे है. टेंशन देदी बहनचोद के यो एब्बी तक जवान से. गुलाटी तू पेग गैर नहीं तोह बैठना दूभर हो जावेगा.", पेग शंकर ने बनाया तीनो के लिए.

"वैसे सच बात है शंकर. दिल खुश हो गया यार तुझे ऐसे देख कर. साली ज़िन्दगी इतनी भसड़ से भरी है के अपना ध्यान हे नई रहा. सांगवान की खुली जीप, तेरा यही रूप और मैं तोह साला रंगीन कमीज पहने जैसे बरसो बीत गए भाई. माँ छुड़ाए सबकुछ अब से शनिवार तुम दोनों के साथ, बरी बरी हरेक की जगह और ऐतवार अपनी लुगाई के साथ.", गुलाटी ने जैसे फैंसला सुना दिए था. कॉलेज, हॉस्पिटल और जवानी की बातें करते तीनो धीमी रफ़्तार से अपने जाम पीने लगे. लेकिन आज तीनो के हे दिल ने बहुत कुछ समझ लिए था. हर चीज से भागना जरुरी तोह नहीं होता. ज़िन्दगी में अनगिनत जरूरते, मुश्किलें और काम हमेशा रहेंगे, बस ये ज़िन्दगी हमेशा नहीं रहने वाली.

.

.

अर्जुन अपने कमरे में किताब खोले पढ़ने में व्यस्त था जब संजीव भैया दोनों का खाना लेकर उसके हे कमरे में आ गए. वह ख़ामशी से अर्जुन को देखते रहे जो गणित के सवाल हल करने में तबियत से लीं था. लेकिन जल्द हे दोनों का ध्यान टूट गया जब इधर अंदर की तरफ से तारा ने उनका बंद दरवाजा पीटा.

"अर्जुन दरवाजा खोल जरा." लेकिन खोला संजीव भैया ने.

"क्या हो गया? ये यहाँ पढ़ रहा था तोह मैंने खाने के लिए नहीं पुछा और तुम ढोलक की तरह दरवाजा बजा रही हो.", भैया ने आराम से हे कहा.

"भैया बाथरूम में सांप है.", तारा ने घबराते हुए कहा तोह अर्जुन अपनी जगह से झट्ट खड़ा हो गया और सीधा अंदर वाले बाथरूम के दरवाजे पर जा खड़ा हुआ. पीछे हे संजीव भैया भी उसके पास आ गए.

"तू पीछे हट यहाँ से मैं डंडा लेके आया.", ये आकर्षक पीले और सफ़ेद रंग का एक फ़ीट के लगभग लम्बाई का सांप था जो भाटरूम के कोने में राखी बाल्टी के पीछे जा छिपा. अर्जुन ने साढ़े कदमो से उसकी तरफ बढ़ते हुए ध्यान से बहार की तरफ निकले मुँह को देखा. 'सपाट चौड़ा सर और गोल मुँह. Non-venomous', वह ये बुदबुदाता फर्श पर उसके पास हे बैठ गया. संजीव भैया बाथरूम के अंदर आने लगे तोह हाथ के इशारे से उन्हें वही रुकने को कहते हुए अर्जुन ने बाल्टी के पिछली तरफ बड़ी सावधानी से हाथ बढ़ाते हुए उसके शरीर को चूहा और जैसे हे सांप ने अपना सर पीछे घुमाया, उसको सर के ठीक नीचे गर्दन से पकड़ते हुए वह खड़ा हो गया. सांप उसकी कलाई पर अपना निचला भाग लपेटने लगा तोह इधर से उसकी पूछ को भी अर्जुन ने सावधानी से पकड़ लिए.

"काट लेगा.", संजीव भैया को अब चिंता हो रही थी लेकिन अर्जुन बड़े प्यार से उस जीव को निहार रहा था.

"ये काट नहीं सकता. हाँ कोई छोटी मोती चीज हो तोह निगल जरूर सकता है. लेकिन जितना मैं समझता हु ये इधर तोह नहीं मिलते. तारा, तुम्हारी तरफ जरूर होते है ये, पहाड़ो में.", अर्जुन बहार आ गया था और तारा उसके हाथ में वह सांप देखती थोड़ा डर रही थी.

"हाँ.. हाँ.. घर का नया हिस्सा बनाते टाइम मैंने भी देखे थे 4-5 लेकिन इतने छोटे नहीं थे वह. पापा के कहने पर मजदूरों ने मार के दबा दिए था उन्हें. लेकिन इसको दूर रखो मुझसे, प्लीज.", अर्जुन ने भी घबराई हुई तारा को तंग करना ठीक नहीं समझा और भैया के साथ हे बहार वाली सीढ़ियों से नीचे आ गया.

"स्कूटर निकालो भैया. चलो इसको सही जगह छोड़ आते है.", संजीव भैया भी अब बेफिक्र दिख रहे थे. उन्होंने स्कूटर बहार निकला और दोनों अगले सेक्टर की तरफ चल दिए.

"वैसे तुझे इनके बारे में कैसे पता छोटे?"

"भैया मेरे बोर्डिंग में बहोत निकलते थे ये. लेकिन उनका रंग थोड़ा भूरा होता है राजस्थान की मिटटी की वजह से. और इनका पीला सफ़ेद जिस से ये निचले पहाड़ी इलाको में आराम से रह सके. बोर्डिंग में एक सीनियर भैया था वह जब भी ऐसा कोई सांप देखते उसको पकड़ कर पीछे वाले जंगल में छोड़ आते थे. उनके साथ हे मैंने थोड़ा बहुत समझा था. बायोलॉजी के भी अलग हे फायदे है.", दोनों अब jal-nigam वाले जंगल के पास आये तोह अर्जुन ने घनी घास और छाया वाली जगह पर उसको आजाद कर दिए.

"ये हिल नहीं रहा?"

"हिलेगा भैया. अभी नार्मल होने दो जरा. अगर कोई जेह्रीला सांप होता तोह उसकी रफ़्तार बाथरूम में हे पता चल जाती. और मैं ऐसा जोखिम लेता भी नहीं. ये सुस्त होते है लेकिन देखो अब ये चलने लगा.", और संजीव भैया ने देखा तोह वह सांप थोड़ी आगे बढ़ते हे एक पत्थर के पीछे गायब हो गया.

"घर पर कुछ मत कहना. नहीं तोह खामखा मैं फंस जाऊंगा.", अर्जुन अपने बड़े भैया से विनती कर रहा था जैसे.

"और तारा का क्या?"

"उसको भी आप हे बोलना. जहा तक मैं समझता हु वह भी नहीं कहेगी की सांप उसकी मम्मी के साथ आया है.", दोनों भाई इस बात हंसने लगे. कुछ हे देर बाद चुपचाप ऊपर चले आये. खाना ठंडा हो चूका था तोह भैया गरम करवाने का बोल कर प्लेट उठा चल दिए और इधर तारा कमरे में आते हे अर्जुन के गले लग गई.

"ोये पागल. तुम्हारी माँ ने देख लिए तोह मर्डर जायेंगे.", अर्जुन की बात अनसुनी करती वह कुछ देर वैसे हे लगी रही.

"थैंक यू सो मच. उम्म्मेह.. माँ को देखना है तोह देख ले. हम भी सामना कर सकते है."

"चुप. बिलकुल भी नहीं तारा. आइंदा ये बात कभी नहीं करोगी और मैंने कहा था न के मैं सब ठीक कर दूंगा. प्यार से सबकुछ बदला जा सकता है तोह अपने बड़ो के साथ गलत करना ठीक नहीं. ाचा अब ये सांप वाली बात भूल कर भी नहीं करना. बाकी बुआ बस 2 कदम दूर है बदलने से. चलो अब नीचे उनके पास जाओ और थोड़ा समय वही रहना.", बदले में अर्जुन ने भी उसके गाल चूमते हुए जाने को कहा.

भैया के साथ खाना खाने के बाद अर्जुन पढता रहा और भैया वही उसके हे कमरे में आराम से लेट गए. अब यहाँ भी उनके कमरे की तरह बड़ा बीएड जो लग चूका था. इस बीच मधु बुआ भी तारा के साथ ऊपर उनके कमरे में आ कर लेट गई थी. बीच वाला दरवाज़ह अर्जुन वैसे हे अपनी तरफ से बंद किये था. घडी ने साढ़े 5 का समय बताया तोह वह चुपचाप नीचे चल दिया, अपनी प्यारी कोमल दीदी के पास.

"तैयार हो जाइये न. फिर चलते है.", वह अपने कमरे में धुले हुए कपडे तेह लगा रही थी जब अर्जुन ने उन्हें पीछे से बाहों में जकड़ा. अर्जुन का इस तरह से उनके शरीर से जुड़ना ऐसा था जैसे वह अंदर तक उतर आया हो. अर्जुन भी उनके सपाट पेट को हौले हौले सेहला रहा था कुर्ती के ऊपर से हे.

"हट ारु, कोई आ जायेगा. प्रियंका अभी हे गई है इधर से. पापा आ गए तोह क्या कहेंगे.", वह अर्जुन की ढीली बाहोने में उसकी तरफ मुँह करके पूछने लगी.

"पापा अपने बचो को कुछ कहते है क्या? मुझे नहीं लगता वह देखने के बाद भी पूछेंगे. चलो आप तैयार हो जाओ मैं 5 मिनट में हे बहार आनन् में मिलता हु.", उनके कूल्हे पर थपकी देता वह अपनी माँ के कमरे में आया तोह थोड़ा हैरान हो गया.

ऋतू दीदी अब रुपाली दीदी के ऊपर एक पाँव रखे उनसे लिपटी सो रही थी. रुपाली दीदी भी उनके आगोश में बड़ी मासूम सी गुड़िया दिख रही थी ऐसे हालत में. छोटे टेबल पर उनकी kitab-pencil पड़ी बता रही थी की वह भी पढ़ने के बाद सोई थी. बाथरूम से मुँह हाथ धो कर वही आँगन में कुर्सी पर बैठ गया.

"ले बीटा, दूध ख़तम कर पहले.", रेखा जी ने अपने बेटे को दूध का गिलास दिए और उनके साथ हे माधुरी दीदी ट्रे में 4 कप चाय लेती दादी की तरफ चल दी. इधर दूध ख़तम करके उठने हे लगा था के कोमल दीदी को काले सलवार कमीज में अपनी तरफ आता देख उसका मुँह खुला रह गया. वह शर्माती से पहले गिलास रसोई में रख कर आई फिर अर्जुन को इशारे से चलने का कहने लगी.

"माँ, मैं दीदी के साथ जा रहा हु.", अर्जुन ने थोड़ी ऊँची आवाज में इतना हे बताया और उनको साथ लिए अपनी मोटरसाइकिल पर घर से निकल चला.

.

.

"हम जा कहा रहे है भाई?", अर्जुन के पीछे बैठी कोमल दीदी अब खुली हवा में आते हे बदल गई थी. छोटे भाई के साथ लग कर बैठी वह एक हाथ थोड़ा सा कमर के पास दूसरा उनकी पीठ पर रखे थे.

"पहले तोह हम लेंगे आपके लिए एक सूट, जो पहले हे मैं पसंद करके रखवा चूका हु. फिर लेंगे उसके साथ की सभी चीज और जब सब हो जायेगा तोह इन्तजार.", अर्जुन ने एक हे सांस में बात ख़तम करते हुए अपने बाए हाथ से उनका नरम हाथ कमर के पास से अपने पेट पर रख लिए था. कोमल दीदी ने भी एक मुस्कान के साथ अर्जुन के इस कदम पर मोहर लगा दी.

"वैसे इन्तजार मतलब?"

"मतलब जब वह सब पहन कर आप मेरे पास आएँगी, दूध का गिलास लेके.", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर वह शर्माती हुई उसकी पीठ पर दूसरे हाथ से हलके से मारने लगी. अर्जुन आराम से मोटरसाइकिल चलता हँसता हुआ पीछे बैठी दीदी को भी देख रहा था.

"धत्त. कैसी बातें करता है.?"

"ाचा ाचा. दूध का गिलास कैंसिल. लेकिन बाकी सब सच है दीदी. और अभी ये मुमकिन नहीं 2 दिन तोह परसो रात में आप अकेले हे सोना. मैं खुद आऊंगा आपके पास और अगर कोई बदलाव होता है तोह पहले हे कह दूंगा.", कोमल दीदी अब सचमुच शर्मा रही थी. फिर उनका ध्यान हटते हुए अर्जुन ने बाकी इधर उधर की बातें शुरू कर दी. थोड़ी हे देर में दोनों अपनी मंज़िल पर आ चुके थे. दीदी का हाथ पकड़ कर उन्हें अपने साथ अंदर लता अर्जुन उन्हें भी जैसे बता रहा था के वह उनके लिए कितनी अहमियत रखती हैं.

"आओ अर्जुन भाई. तुम्हारी हे प्रतीक्षा थी. पहले क्या लोगे ये बताओ? कपडे बाद में हे मिलेंगे देखने को.", सुधीर ने ाचे दोस्त की तरह ज़िद्द की और अर्जुन हाथ मिलाने के बाद बस पानी का बोल कर दीदी के साथ उस लड़की वाले काउंटर की तरफ आ गया.

"जी, वह सूट निकलवा दीजिये जरा.", लड़की अर्जुन को ाचे से जानती थी. मुस्कुरा कर वह अंदर की तरफ चली गई कपडे लेने और यहाँ दीदी को समझने लगा.

"इसके साथ के इनरवेअर देख लेना. और जो भी आपने और लेने थे वह भी. मैं वही बैठा हु आप आराम से देखिये.", अर्जुन ने कोमल दीदी को भरोसा दिलाया क्योंकि वह अकेले कभी बहार सामान लेने पर थोड़ा घबरा जाती थी. अर्जुन के पास होने पर वह शांत थी और खुश भी.

"मेरा कुरता पायजामा तैयार है न भाई? तबियत ठीक नहीं थी तोह लेने नहीं आ पाया था.", सोफे पर बैठ कर अर्जुन ने पानी पीने के बाद सुधीर से पूछा.

"हाँ भाई कबसे तैयार है. वह भाभी जी भी आई थी, शायद उनके भाईसाहब थे उनके साथ और ले गई थी सामान. साथ हे कुछ और सूट, बिना सिलवाए. लेकिन तूने पहले जो kurta-pyjama सिलवाया था वह तोह पहने देखा नहीं और दूसरा सिल्वा लिए."

"पापा के लिए था वह. अब ये मैंने कल ख़ास जाना है कही तोह उसके लिए. वैसे एक बात बता भाई, यहाँ कही सुनार होगा?", अर्जुन ने अपनी बात बताने के बाद पुछा.

"भाई बहार निकलते हे मनचंदा के साथ 3-4 बड़ी दूकान है. बता अगर कुछ खास बनवाना है तोह.", शनिवार था और भीड़ ाची थी. अर्जुन ने सुधीर को काम पर ध्यान देने का कहा और खुद वही पुरुष काउंटर पर कपड़ो पर नजर डालता घूमने लगा. वह से घूमता वह नए कपड़ो का प्रदर्शन करती मूरत देखने लगा तोह एक नजर कोमल दीदी पर डाली फिर ध्यान से उस मूरत की पहनी हुई साड़ी को देखने लगा. उसके मैं की वही जानता था. हाथ बढ़ाते हुए उसके कपडे को महसूस करने लगा तोह वह बेहद मुलायम और रेशमी था. फिर नीचे लगी सफ़ेद पर्ची को देखा तोह मुस्कुराता हुआ आगे चल दिए. पर्ची पर लिखा था 6500/-

"मेरा हो गया अर्जुन. इन्होने माप भी ले लिए है और ये सामान लिए है मैंने.", वह चलती हुई काउंटर की तरफ गई पैसे देने तोह अर्जुन वैसे हे घूमता और कपडे देखने लगा.

"भाई वह पैसे नहीं ले रहे. क्यों?", कोमल दीदी ने पीठ पर हाथ लगते हुए कहा.

"दीदी, आप माँ की तरह दिखती हो. अब ये बताओ के उनपर ये काली साड़ी ाची लगेगी या फिरोज़ी?", अर्जुन उनकी बात को नजरअंदाज करता उन दोनों साड़ी की तरफ इशारा करता पूछने लगा. दीदी की नजर भी बड़ी गहराई से उन्हें देखने लगी.

"काली फिर भी माँ के पास है लेकिन फिरोज़ी का ऐसा शादी नहीं है उनके पास. इसका जाली वाला बॉर्डर भी बड़ा प्यारा है भाई.", कोमल दीदी भी उस साड़ी को करीब से देखने लगी. साड़ी की खासियत उसके ऊपर एक समुन्दर की लहर सा प्रतीत होता रंग था.

"लेकिन इसके साथ का ब्लाउज?", अर्जुन ने उन्हें उस साड़ी में खोया देख पुछा.

"वह हैं माँ के पास. ऐसे रंग की रेशमी साड़ी उनके पास थी लेकिन पिछले साल वह पूजा मामी ने ले ली थी लेकिन ब्लाउज माँ की अलमारी में है. वैसे भी ये और लाल तोह उनके फवौरीते है.", वह फिर वर्तमान में आती हुए अर्जुन से पैसो की बात करने लगी.

"ये साड़ी भी साथ हे पैक करवा दीजिये.", उस फिरोज़ी रंग की साड़ी की तरफ इशारा करते हुए अर्जुन ने काउंटर पर खड़े लड़के से कहा. सारा सामान काउंटर पे जाने के साथ हे अर्जुन ने दीदी से पुछा

"अब बताओ के क्या रह गया? वो सब ले लिए आपने? वह शर्माने की जरुरत नहीं है?"

"ले लिए है सब. शायद ज्यादा हे ले लिए जितना सोचा था उस से.", शरमाते हुए दीदी ने कहा तोह अर्जुन काउंटर पर पैसे देने के बाद उन्हें साथ लिए बहार आ गया, सुधीर से फिर आने का बोल कर.

"पैसे तुमने क्यों दिए?"

"क्योंकि वह हमारे हे थे. और अभी भी मेरे पास बहोत से है. वैसे ये काम करने से पहले मैं पूछ लेना जरुरी समझता हु. आप अपने नाक को चीड़वाएंगी?", अर्जुन के ऐसे सवाल पर वह गौर से उसका चेहरा देखने लगी. फिर एक मुस्कान के साथ बोली.

"मेरा बहोत दिल था नाक में बारीक नाग pehan-ne का. लाल. लेकिन पता नहीं घर पे किसी को ऐतराज न हो और तुम्हे भी. लेकिन अगर तुम्हे भी पसंद है तोह ठीक है. घर पे जो होगा देखा जायेगा.", अर्जुन उनकी बात सुनकर उन्हें पीछे बिठाये सुधीर की बताई जगह आ गया.

"भैया नाक ने नाग पहवना है.", अर्जुन को जानकारी नहीं थी लेकिन वैसे हे सरल भाषा में काउंटर के दूसरी तरफ बैठे एक सजीले से लड़के से उसने कहा.

"जी नाक छिद्दा हुआ है?"

"नहीं. इन्होने pehan-na है.", अर्जुन ने कोमल दीदी की तरफ इशारा किआ तोह इन भाईसाहब ने उस लड़के को पुकारा जो आग उगलती बारीक पिपेनुमा चीज से एक गहने पर कुछ करने में व्यस्त था.

"छोटू दीदी के नाक में पिन दाल दे. और भाई अभी छेड़ में चंडी की पिन डलवा लीजिये. एक रात और सुबह थोड़े गरम सरसो के तेल में हल्दी मिला के छेड़ पर लगाने के बाद कल शाम तक जैसा नाग, कोका या बलि पहन सकते है.", अर्जुन उनकी बात समझता उस तरफ देखने लगा जहा एक सूई से अधिक पेनी चंडी की तार उस लड़के ने दीदी की दाई तरफ वाले नाक के हिस्से से aar-par कर दी थी. हलकी सीई की आवाज आई लेकिन कोई खून नहीं दिखा. फिर सफाई से तार को निकलने के बाद उतना हे महीन तार जिसके पीछे पेच लगता था वह दाल दिए.

"ये ठीक है?", दीदी ने अर्जुन को दिखते हुए पुछा. और लड़के ने एक रूई का टुकड़ा उन्हें नाक पर लगाने को दिए.

"बिलकुल ठीक है. आपको दर्द तोह नहीं हुआ?", अर्जुन की बात पर उन्होंने सिर्फ ना में गर्दन हिला दी.

"अब कोई ऐसी हे पिन गुलाबी या लाल नाग में दिखा दीजिये.", अर्जुन की बात पर उन भाईसाहब ने 15-16 अलग अलग पिन दिखाई तोह एक महीन सोने की पिन पर लगे सफ़ेद नाग और चंडी पर लगा लाल नाग अर्जुन ने पसंद किआ.

"कितने हुए?", दीदी ने इतना हे बोलै था के अर्जुन ने सख्त नजरो से उन्हें देखा और वह चुप हो गई.

"जी, सोने वाला 600 का और ये लाल जिरकान वाला 150 का. 750 हुए.", अर्जुन ने छेड़ के पैसे देने चाहे लेकिन उन्होंने उसका कोई दाम नहीं लिए. दीदी को अब साथ लिए वह बहार आया तोह पहली बार दीदी ने नखरे से कहा.

"कैसे देख रहे थे? बड़ी बहिन हु."

"जब हम सबके सामने हो तब. बाकी आप समझदार हो. आइंदा ये नहीं होगा.", अर्जुन ने प्यार से हे उन्हें समझाया.

"हम्म्म", वह बात समझ चुकी थी और अब वैसे हे पीछे बैठ कर बिना कहे अर्जुन के छाती से नीचे हाथ रखे दूसरे हाथ से गॉड में रखा सामान पकडे दोनों चल दिए.

"वैसे कौन कौन से रंग लिए आपने.", अर्जुन की मुस्कान बता रही थी की वह किस ख़ास चीज की बात कर रहा है.

"डार्क रेड सूट के साथ, एक ब्लू सेट और एक ब्लैक."

"नेट में नहीं लिए कुछ?"

"तुमने देख लिए था तोह पूछ क्यों रहे हो?"

"मैंने नहीं देखा था. पूछ रहा हु इसलिए."

"रेड मैंने नेट में हे लिए है. हाफ नेट हाफ फैब्रिक.", बात करते हुए कोमल दीदी के कान गरम हो रहे थे. उनका एक ठोस बड़ा उभार अर्जुन को पीठ पर महसूस हो रहा था. शरारत से उसने थोड़ा दबाव डाला तोह दीदी ने भी खुदको उस से लगते हुए बता दिए के वह उसके लिए हमेशा तैयार है.

"आपका साइज चेंज है या अभी भी डी है.?"

"चुप. कैसी बात करते हो? साइज से क्या मतलब है?"

"पता होना चाहिए न. कभी मेरी पसंद से अगर लेके औ तोह."

"36 दद बताया अभी उस लड़की ने. पहले मैं डी हे पहन रही थी, स्टाप ढीला करके कंधे पे से.", हाथ सरकता हुआ अर्जुन के सीने पे आ गया था. सड़क पर शाम रात की तरफ अग्रसर होने लगी थी. 10 मिनट बाद हे दोनों घर के सामने थे. मुख्या द्वार खुला था तोह अर्जुन वैसे हे दीदी को बिठाये आँगन में मोटरसाइकिल कड़ी करता उन्हें बोलै.

"माँ को दे देना ये साड़ी. मेरा सामान मैं बाद में आपसे लेता हु.", अर्जुन दीदी के उतरने के बाद स्टैंड लगते हुए बोलै.

"कोमल, इस वक़्त कहा से आ रही है? और नाक पर क्या हुआ जो रूई लगा राखी है? जरूर इस जाहिल ने कही गिरा दिए होगा.", ये तल्खी भरा स्वर सुनते हे कोमल दीदी ने जैसे तैसे खुद को शांत रखा और अर्जुन मुस्कुराता हुआ एक तरफ बैठे अपने पापा, छोल साहब और दादाजी की और चल दिए. बिना अपनी मधु बुआ की तरफ देखे.

"नहीं, वह अर्जुन के साथ मार्किट गई थी बुआ कुछ सामान लेने. और नाक में पिन डलवाई है.", आज यहाँ आँगन में तुबेलिघ्त जगमग थी, जो अधिकतर नहीं होता था. और एक बार लाल मोटरसाइकिल पर नजर डालने के बाद वह भी उधर हे चल दी जहा रामेश्वर जी बैठे थे कुर्सी पर.

"कहा घूम आये बरखुरदार आज? कमाल की बात ये है के तेरी बड़ी दीदी साथ गई थी?", रामेश्वर जी की कुर्सी के छठे को पकड़ कर अर्जुन घुटने के भर बैठ गया. पापा और छोल साहब भी उसको हे देख रहे थे.

"आज maa-papa की सालगिरह है न तोह माँ के लिए उपहार लेना था. इसलिए दीदी को साथ लेकर मार्किट गया था. उन्हें ज्यादा ाचे से पता है माँ की पसंद.", ये कोई बम फोड़ दिए था अर्जुन ने जैसे. शंकर जी अगले हे पल उठ खड़े हुए वह से लेकिन अपने पिता का जवाब उन्होंने सुन्न लिए था.

"ये बात तोह मैं भी भूल गया था मेरे बचे. तुझे कैसे याद रही. घर में शायद किसी को शादी की सालगिरह की तारिख याद हो. बड़ा नाज है तुझपे जो तू ये छोटी छोटी बातें याद रखता है बड़े कारनामे करने की जगह. यही तोह purn-aanand है जिसमे सभी शामिल हो.", रामेश्वर जी की बात ख़तम हुई तोह शंकर जी ने छोल साहब से रात के कार्यक्रम के लिए क्षमा मांगी और अंदर चल दिए. छोल साहब भी खुश थे और जैसे उन्होंने अर्जुन पर नजर डाली वह उन्हें हे देख रहा था.

"भाई साहब ये कुछ नहीं भूलता और मुझे ख़ुशी है के शंकर ने अब तक का सबसे बेहतरीन काम जो किआ उसका परिणाम अर्जुन है.", दोनों हे इस बात पर हंस दिए और इधर मधु बुआ बिना सोच विचारे आदत अनुसार बोल पड़ी.

"इसकी अभी उम्र कितनी है पापा? आप लोगो ने इस उम्र में इतनी चूत दे राखी है इस लड़के को. ये मोटरसाइकिल, जरुरत से ज्यादा खर्चने की आदत और आवारागर्दी. किसी और को ये सब करते नहीं देखा मैंने अपनी पूरी ज़िन्दगी में इस घर में.", सामने सीढ़ियों से नीचे उतर रहे संजीव भैया भी अपनी बुआ की ऊँची आवाज सुन्न कर सकते में आ गए और हिम्मत करते वह अर्जुन को इस झंझट से निकलने के लिए आगे बढे हे थे की इस बार आवाज दूसरी तरफ से आई.

"बचे बड़े हो जाये तोह भी उन्हें नहीं भूलना चाहिए के बाप कौन है, बिटिया. बुरा लगेगा लेकिन पूरा सुनके हे जाना. इस घर में यही एक है जिसकी वजह से मैं खुश हु, ज़िंदा हु और अभी भी इसके साथ जीने की तमन्ना रखता हु. राजकुमार ने न वह सुख दिए जो बड़े बेटे को देना चाहिए, शंकर ने नाम बड़ा किआ लेकिन शिकायत मुझे उस से भी है बस वह घर का ध्यान मेरे से बेहतर रखता है तोह कुछ नहीं कहता, नरिंदर तोह अपने भाई की परछाई हे है तोह उसका तुम मेरे से बेहतर जानती हो. और तुम्हे घर में घुसे एक मिनट नहीं हुआ था लेकिन कमियां दिखनी शुरू हो गई. संजीव और अर्जुन है जो इस घर को घर बनाये हुए है. एक जाने क्या क्या करता है इस घर की खुशियां बरक़रार रखने के लिए घर से बहार जवानी ख़तम करता हुआ और दूसरा सबको घर के अंदर सिखाता है हर घडी एक दूसरे के साथ खुस हो कर रहना. आज सुबह इस बचे के नहीं मेरे और तुम्हरी माँ के मुँह पर तुमने तमाचा ज्यादा. लेकिन इसकी हंसी काम हुई क्या? यही सीखता हु मैं मेरे बचे से की जीने के लिए वजह ढूंढ़ने के साथ पैदा भी करनी पड़ती है. और जिस खर्चे की बात कर रही हो वह तुम भी जानती हो के सब इसका है. और तोह और संजीव ने भी अपना इसके नाम कर दिए क्योंकि वह खुद को इस से अलग नहीं समझता. यहाँ आपसी विश्वास है, प्रेम है और सबसे बड़ी बात दिखावा नहीं है. तुम्हे याद है के मैंने तुम्हे कितना प्यार किआ है?", रामेश्वर जी ने इतनी लम्बी बात कहने के बाद प्यार से मधु को अपने साथ वाली कुर्सी पर बिठाते हुए कहा.

"बीटा तुम मेरा मान थी और तुम्हे देखे बिना मैं काम पर नहीं जाता था. लेकिन मेरी साडी शिक्षा उस दिन व्यर्थ चली गई जब तुम अपने ससुराल से अशोक के साथ अलग हो गई थी. मुझे कोई शिकायत नहीं है क्योंकि ये आपसी ज़िन्दगी है तुम्हारी. लेकिन जो सबके दर्द को समझे हमको उसकी कदर करनी चाहिए, प्रताड़ित नहीं. तुम पढ़ी लिखी हो लेकिन अगर एक दिन भगवन न करे ऐसा हो, फिर भी अगर तुम्हारे पास कुछ नहीं बचा तोह पैदल चल सकोगी? खुले आसमान के नीचे नींद आएगी? लेकिन अगर परस्पर प्यार है तोह चलने के लिए एक भरोसेमंद हाथ और सोने के लिए सुकून बहोत है. बाकि मैंने अगर कुछ भी गलत कहा हो तोह मैं अपने शब्द वापिस लेता हु. बूढ़े और बेरोजगार इंसान की समाज में कोई कीमत थोड़ी है."

"बुआ आप रोना बंद कीजिये. ये दादाजी का रेडियो गलत लाइन पकड़ लेता है कभी कभी.", अर्जुन ने बड़े प्यार से उनके सामने बैठ कर गिलास होंठो से लगाया और रुमाल से चेहरा साफ़ करने लगा. वह कुछ भी नहीं बोल रही थी बस मुँह नीचे किये थी. अर्जुन ने अपने दादाजी को भी पानी पिलाया और उन्हें इशारे से बुआ को मानाने के लिए कहने लगा. रामेश्वर जी के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आ गई थी उसके चेहरे की गंभीरता और इशारे देख कर.

"मेरी लाडो है ये. मेरी गुड़िया और इसके पापा को पूरा हक़ है वह अपनी बिटिया को जो भी कह सकते है. लेकिन और कोई भी नहीं.", रामेश्वर जी ने अपनी कुर्सी छोड़ कर खड़े होते हुए अपनी बेटी का एक हाथ पकड़ कर उठाया तोह वह सामने से उनके सीने से लग गई.

"सॉरी पापा. I'm रियली सॉरी. आप ठीक कहते हो, हमेशा.", फफक कर रोटी मधु इस वक़्त बिलकुल एक बचे की तरह अपने पिता से लिपटी थी. अर्जुन को लेकर संजीव भैया कब का बहार जा चुके थे, पैदल. अब वह सिर्फ रामेश्वर जी, उनकी धर्मपत्नी और छोल साहब थे. कौशल्या जी तोह वैसे हे देखने आई थी लेकिन मधु के सुबकने की आवाज उन्हें भी बर्दाश्त न हुई.

"आप भी न थोड़ा भी सबर नहीं रख सकते. रुला दिए मेरी बची को अपने उस लादले के चक्कर में. वह तोह लड़का है समझ जायेगा लेकिन ये कितनी नाजुक है भूल गए हो इस बुढ़ापे में.", कौशल्या जी ने अब अपनी बेटी को पंडित जी से अलग करते हुए खुद से लगा लिए था और वह बड़े स्नेह से हाथ फेर रही थी धीमी आवाज में सुबकती मधु के सर पे.

"चल मधु, तू हमारे साथ चल. मैं और तेरी भाभी बहार हे जा रहे है. रोना बंद कर बस, आने के बाद मैं खबर लेता हु सबकी.", ये कड़कदार आवाज सुनते हे एक पल के लिए सभी शांत हो गए. शंकर जी ने अपनी रोटी हुई बहिन को देखा तोह आवाज संभल नहीं पाए. ये भी नहीं देखा के बाकी तीनो कौन है.

"मैं ठीक हु. आप जाओ भैया रेखा भाभी के साथ. मैं थोड़ी देर maa-papa के साथ हु. फिर देखती हु उस शैतान को जिसकी वजह से पहली बार मुझे दांत पड़ी है.", मधु बुआ का रोना बंद हो चूका था और बाकी सब बस मुस्कुरा रहे थे, चुपचाप.

"चल मधु, मुझे ाचा लगेगा तेरा साथ. इतने दिन बाद आई है तोह थोड़ी देर हमारे साथ भी समय गुजर ले.", ये रेखा जी थी जो अपनी ननद का हाथ पकड़ती उसके गाल को सहलाती हुई शंकर जी की तरफ देख रही थी, जैसे की वह एक बार फिर अपनी बहिन को कहे साथ चलने के लिए.

"अरे आप दोनों जाओ यार, मेरी सालगिरह नहीं है. मैं कल मिलती हु रेखा तुमसे और ये अर्जुन आज मेरे हाथ लगे तोह सही. मेरी जगह ले ली उसने इस घर में.", अब मधु सच में किसी बचे की तरह पाँव पटकती अंदर चली गई थी.

"ध्यान रखना पापा, मैं थोड़ी देर तक आऊंगा.", शनकर जी ने आज जैसे एहसास किआ था के घर से जाते हुए अपने पिता को बताना जरुरी है. छोल साहब और रामेश्वर जी ने दोनों के सर पे हाथ रखते हुए आराम से आने को कहा.

"सतीश क्या लगता है तुझे?", छोल साहब से जैसे वह सत्ता लगाने को कह रहे थे.

"अर्जुन. आप बताओ भाई साहब क्या कहते हो?", उनकी बात पर रामेश्वर जी बस मुस्कुरा दिए.

"वो मधु की समझ से कही आगे है सतीश. देखा न एक मिनट में हे कार्यक्रम बना गया और मधु समझ भी नहीं सकीय. लेकिन मैं सहमत हु उसके इस तरीके से. कुछ चीजे कड़े कदम लेने से हे ठीक होती है. शंकर हे देख लो, ये उसको भी बगीचे में न बैठा दे तोह मेरा नाम बदल देना.", रामेश्वर जी अपने भाई सामान मित्र के साथ बहार आये तोह मल्होत्रा जी भी आ कर खड़े हो गए.

.

.

"माँ, ये लड़का कैसा है? पापा ने कितना सुनाया मुझे देखा आपने? मेरी गलती मैंने मान भी ली लेकिन उसको उन्होंने कुछ नहीं कहा के मैं उसकी एकलौती बुआ हु.", मधु बुआ कमरे में अपनी माँ की गौड़ में सर रखे लेती थी. कौशल्या जी बादाम का तेल हथेली में डालने के बाद उनके सर की हलके हाथो से मालिश करती हुई बोली.

"एक बार मिल तोह सही अपने इस भतीजे से. तू शायद उसके प्रति कोई धरना बनाये बैठी है. वह ाचा बचा है मधु और सच में उसकी आँखों में सुबह भी तेरे लिए प्यार और ख़ुशी थी. और मैं बीच में नहीं पड़ने वाली साफ़ कहती हु. तू बेटी है इसलिए चुप रही जब तूने उसपर हाथ उठाया. मैं शंकर को कुछ नहीं कहने देती अर्जुन को. और अब छोड़ ये सब बातें. तेरे पापा तुझे हे ज्यादा प्यार करते है इसलिए सिर्फ उन्होंने समझाया. वह अर्जुन की गलती पर भी उसका हे साथ देने वालो में से है.", कौशल्या जी अभी बातें कर रही थी बेटी के साथ के सामने से दौड़ती आई तारा ने अपनी माँ का हाथ पकड़ कर उठाते हुए कहा.

"माँ, कितनी देर नानी के पास बैठोगी. चलो बहार अर्जुन आपकी फवौरीते केसर राबड़ी लेके आया है. ख़राब हो जाएगी न, उठो भी.", मधु अपनी बेटी के ऐसे प्यार से लेके चलने पर हिम्मत करती बहार आ गई. टेबल पर रखे प्लास्टिक के अंदर एक और प्लास्टिक के लिफाफे में kulfi-rabdi थी साथ हे एक कागज़ "सॉरी बुआ". और मधु ये पढ़ते हे इधर उधर देखने लगी लेकिन वह सिर्फ तारा, ऋतू और अब कौशल्या जी हे थे.

.

.

आज शंकर शर्मा अपनी खूसूरत धर्मपत्नी के साथ उस जगह आये थे जहा वह हमेशा अकेले हे आये थे. उनके पसंदीदा रेस्ट्रा और सिर्फ वही दोनों नहीं थे इस समय यहाँ, शंकर जी ने गुलाटी को अपनी मोहतरमा के साथ घर से चलने से पहले हे इधर आने का न्योता दे दिए था. जो उनके लिए गुलदस्ता और उपहार लिए थे. ये शाम खुद शंकर के लिए बहुत कुछ लेके आई थी. अपनी खूसूरत पत्नी के तहजीब और अंग्रेजी के ज्ञान को देख कर उनके साथ हे मेहमान जोड़ी भी हतप्रभ थी. रेखा जी ने अपने पति का बखूबी साथ निभाया था इस शाम में. श्रीमती गुलाटी तोह जाने से पहले गले मिलती घर आने का वादा खुद हे करके गई थी.

"मुझे नहीं मालूम था के मेरी बीवी लाखों में के है.", गाडी चलते हुए शंकर जी अपनी बीवी को बार बार देख रहे थे. फिरोज़ी रंग में क़ैद वह खिलता हुआ गुलाब जैसे उन्हें आज हे नजर आया था.

"छोड़िये न जी. किस्मत मेरी ाची है जो आप जैसे इंसान मिले. परिवार के लिए भला कौन घर से दूर रहते हुए भी सब देखभाल समय से पहले करता है. मुझे तोह कभी शिकायत का मौका नहीं दिया आपने.", अपनी बीवी का हाथ गियर बदलने के बाद पकड़ते हुए शंकर जी ने वह कसेट्टी वाला बटन भी दबा दिए था.

'तुम आ गए हो, नूर आ गया है.

नहीं तोह चरागों से लौ जा रही थी.

जीने की तुमसे वजह मिल गई है

बड़ी बेवजह ज़िन्दगी जा रही थी.'

दोनों ने एक दूसरे की तरफ प्यार से देखा तोह अगली आवाज रेखा जी की सुनाई दी,

"दिन डूबा नहीं, रात डूबी नहीं

जाने कैसा है सफर

ख्वाबो के दिए, आँखों में लिए

वही आ रहे थे

जहाँ से तुम्हारी सदा आ रही थी

तुम आ गए हो, नूर आ गया है."

और गली से पहले हे गाडी रोकते हुए शंकर जी ने जो जवानी में न किआ वह अब कर दिए था. रेखा का चेहरा ऊपर करते हे होंठो पर अपने होंठ. दिल थोड़ा तेज धड़कने लगा था रेखा का अपने पति की इस हिम्मत से.

"घर चलो और बचो से कह देना के मुझे सोने दे थोड़ा चैन से.", शंकर जी मदिरा से ज्यादा आज अपनी बीवी के सुरूर में थे. गाडी कड़ी करते हे वह बिना किसी से मिले कमरे में घुस गए. ऋतू अपने पापा को सीधा कमरे में देखती रुपाली को लेकर बहार निकल गई. आज इस कमरे की बत्ती सबसे पहले बंद हो गई थी. 10 बजे हे रेखा जी अपने पति के लिए दूध लेकर अंदर जा चुकी थी.

"2-0", छत्त पर खड़े संजीव भैया ने कहा तोह अर्जुन मुस्कुरा दिए.

"आप जानते हो 1-6 स्कोर हो चूका है. अगला 6 हमारे कमरे में लगने वाला है देख लेना.", संजीव भैया मुस्कुराते हुए आज पूनम की रात का दीदार करने में लग गए. रात बता रही थी की सितारों का परिवार आबाद था. और अर्जुन को पता था के जब अपने से बड़ा शिकार हो तोह परिवार को कैसे साथ लेना है.

.

.

"तुम dada-paute जुगत भिड़ा हे देते हो न जी.? सांप भी मार दिए और लाठी भी नहीं टूटी.", कौशल्या जी ने दूध का गिलास उनकी तरफ बढ़ाते हुए कहा.

"तुम्हे मेरे से ज्यादा पता है अपने पौटे का. मैं तोह ये सोच रहा हु कल को मधु का जब पता लगेगा तोह मेरी खैर नहीं.", हँसते हुए रामेश्वर जी ने जवाब दिए. फिर आगे भी वही बोले. "देखा आज शंकर को? अर्जुन कर सकता है कौशल्या. वह इस घर के तीनो बेटे और परिवार एक कर सकता है. बस मैं उस पर अभी दबाव नहीं डालना चाहता. भगवन सबको खुशहाल रखे.", गिलास रखने के बाद उन्होंने इतना कहा और कमर सीढ़ी करते सो गए.

.

.

कमरे के बहार तक सुनाई दे रही हलकी सिसकियाँ बहार अँधेरे में कड़ी मधु सुन्न ने के बाद रसोईघर की तरफ आई तोह चेहरे पर पसीना आ चूका था. शंकर आज जैसे पहली बार रेखा से मिला था और दोनों हे कमरे में ग़दर मचाये थे. मधु से वह खड़ा रहना मुश्किल हो गया था. गाला सूख गया तोह रसोईघर में घुसती पानी देखने लगी. पूरा फ्रिज खली था.

"बुआ, पानी. ये आखिरी था.", अर्जुन इतना बोलकर वह उन्हें पसीने से तरबतर छोड़ गुनगुनाता हुआ सीढ़ियों से ऊपर अपने कमरे की और निकल गया.

"माफ़ है सबकुछ इस जहां में ऐ मेरी हमनवा.

तोडा कोई दिल और आखिरी गलती यहाँ माफ़ नहीं होते"
 
अपडेट 81

ये क्या हो रहा है


आज मधु की जैसे नींद उड़द चुकी थी. सफ़ेद जालीदार निघ्त्य में वह अपनी बेटी की बगल में लेती करवट बदल रही थी और दिमाग में बस यही लड़का घूम रहा था. पहले तोह सुबह से वह उस लड़के को देखने के बाद हे परेशां थी. फिर उसकी हरकत ने जो एक नया एहसास भरा था जिस्म में उसकी तपिश वह संभल न सकीय और बिना सोचे थप्पड़ लगा दिए. कोमल का उसके पीछे बैठना जैसे आग में घी दाल गया था. कैसे उसके पापा, अंकल और माँ सिर्फ उस लड़के की तारीफ कर रहे थे. पहली बार मधु को उसके पापा ने इतना कुछ कह दिए था. और शंकर, कैसे पल भर में हे शंकर अपने बेटे की बात सुनते हे वह से चल दिए था. शंकर की बाहों में खुद उसकी जगह आज रेखा थी. जिस इंसान से वह शादी से पहले से प्यार करती आ रही थी उसने एक बार भी पूरे दिन में उस से कोई प्यार भरी बात न की थी. वजह भी यही लड़का था, कही न कही.

जब कमरे का 20 डिग्री भी मधु को ठंडक देने में विफल रहा और आज दिल पहली बार इतना अकेलापन महसूस करने लगा तोह वह चुपचाप उठ कर बहार निकल आई. यहाँ कुछ बेहतर था. मधु बेहिचक ऊपर छत्त की तरफ चल दी. गहरी खामोश इस रात में पूरा चाँद आसमान में था और उसकी रौशनी में मधु को ये खामोश बैठी आकृति दिखाई दी. जो ऊपर चाँद को हे देख रही थी. हवा की ये प्राकृतिक ठंडक मधु को उस वातानुकूलित कमरे की हवा से कही बेहतर लग रही थी लेकिन छत्त पर ये कौन था.?

"आप परेशां है न?", अर्जुन की धीमी और स्पष्ट आवाज ने जैसे इस खामोश रात में एक खलल पैदा की थी लेकिन मधु को ये अपने अंदर लगती महसूस हुई.

"इतनी रात में तुम छत्त पर क्या कर रहे हो?", वह अभी भी 20 गज़ दूर कड़ी थी उस से. लेकिन मैं में उथल पुथल मच गई थी ये सोच कर हे की इसको मेरे आने का पता कैसे चला.

"चाँद को देख रहा हु बुआ. खूसूरत है लेकिन देखो कितना अलग है न ये, एकदम अकेला. और सितारे कितने सारे. छोटे दीखते है वह इस चाँद से और चमक भी नहीं है.", मधु के कदम अपनी जगह से khud-ba-khud अर्जुन की तरफ बढ़ गए. वो क्यों अपने हे घर में इस लड़के से डर रही है? दिल की यही बात सुनती वह अर्जुन के बराबर आ कड़ी हो गई.

"पहेलियाँ ाची बना लेते हो. अगर तुम्हारा मतलब इस से है के मैं चाँद की तरह अकेली हु तोह ये भी देख लो की रौशनी उस से हे है.", मधु बुआ लड़ने तोह आ गई थी लेकिन astra-shastra के बिना.

"बुआ ये बड़ा चाँद और उसकी रौशनी तोह उधार की है. लेकिन आपका अस्तित्व और रौशनी खुद की है, इस परिवार की है. मैं कैसे आपका अनादर कर सकता हु ऐसी गलत तुलना करके.", अर्जुन ने सरल भाषा में उन्हें बता दिए के उसके मैं में कोई मैल नहीं है अपनी बुआ के प्रति.

"तुम खुद को कोई तीसमार खान समझते हो जो सब तुम्हारे आगे पीछे रहे? जो कहो वह मान ले? ाचे होने का ढोंग बड़ी छोटी उम्र में करने लगे हो.", मधु बुआ कटाक्ष कर रही थी.

"बड़ी उम्र में ऐसा ठीक नहीं लगता तोह सोचा नादानी में हे कर लेता हु. माफ़ तोह कर दिए जाता है ऐसी उम्र में. बड़ी उम्र में नादानियाँ फिर गलतियां हो जाती है.", अर्जुन की ये बात सुनते हे वह उस हलकी रौशनी में हे उसके चेहरे को देखने लगी. कुछ ज्यादा हे गहरा मतलब था इस बात के पीछे. अनजाने हे मधु बुआ की रीढ़ की हड्डी तक सिरहन दौड़ गई एक अनजाने डर से.

"तुम साफ़ साफ़ बात नहीं कर सकते? जो भी कहना चाहते हो सीधा कहो. यहाँ हम दोनों हे है तोह तुम्हे डरने की जरुरत नहीं.", गुरूर. मधु को यही तोह था जो अभी भी हावी था दिमाग पर, डर के बावजूद.

"आपसे सभी डरते है बुआ इस घर में सिवाए 3 लोगो के. दादाजी और पापा आपसे प्यार करते है और बाकी सब उनसे प्यार करते है या वह डरते है की अगर आपकी किसी बात को गलत ठहराया तोह वह दोनों नाराज हो जायेंगे. इसका मतलब यही हुआ न के वह आपकी बजाये इन दोनों से डरते है. आप यहाँ बैठ सकती है अगर आपकी शान में कमी न आये कोई.", बात के बीच में हे अर्जुन ने उन्हें बैठने को कहा और वह बिना कुछ बोले उसके बराबर बैठ गई. Sunn-na चाहती थी के ये कहना क्या चाहता है.

"आप ने जो भी चाहा वह आपको मिला या आपने जोर जबरदस्ती से ले लिए. जानती है ऐसे में उस किसी भी वास्तु या इंसान का अस्तित्व नहीं रहता जिसको दबा कर हांसिल किआ जाये. कभी आपने इसका उलट किआ है? प्यार या स्नेह से किसी को एहसास कराये बिना की आप raees-rutbe से अलग एक साधारण इंसान है, जिसके पास भी वैसा हे दिल है, भावनाये है और dard-khushi सब महसूस कर सकती है? नहीं बुआ आपने कभी ऐसा नहीं किआ क्योंकि आपमें हार सहने की क्षमता नहीं है. इसके पीछे एक बाप का अपनी बेटी के लिए बेशुमार प्यार होना बस एक छोटा सा कारण हो सकता है लेकिन पूरी वजह नहीं. और मेरे पापा,..", अर्जुन की बात बुआ गौर से सुन्न रही थी और धीरे धीरे अर्जुन की बातें उन्हें कमजोर भी कर रही थी लेकिन जैसे हे उसने अपने पिता का जिक्र किआ और रुक गया तोह इसके साथ हे मधु बुआ की सांसें भी एक पल के लिए रुक सी गई थी.

"तुम्हारे पापा?"

"बुआ वह भी कही न कही जिम्मेदार है आपके ऐसा होने के पीछे. कोई भी लड़की अपना आदर्श अपने भाई और पिता में हे ढूंढ़ती है, वह 2 लोग जो उस से सबसे ज्यादा प्यार करते है. लेकिन आपने दादाजी से उनके आदर्श लेने की जगह सिर्फ फरमाइश पूरी करवाई और वैसे हर बेटी यही तोह करती है. लेकिन आपके गुस्से, ज़िद्द और घुटन की वजह कोई नहीं जानता बुआ. बेशक वह सब यही सोचते है के आप घर के उन 2 लोगो की लाड़ली है और शुरू से ऐसी हे है." अर्जुन अब शांत हो कर बस सामने आसमान में देख रहा था लेकिन मधु बुआ की बेचैनी बढ़ रही थी. आज इतनी खामोश रात में ये लड़का जैसे आसमान के भीतर से उनकी ज़िन्दगी के जलाये जा चुके पैन खोलने वाला था.

वजह? और तुमने कहा था 3 लोग नहीं डरते.", घबराई हुई बुआ का गाला सूख गया था. अर्जुन ने उनकी तरफ देखे बिना पानी का लौटा बढ़ा दिए, जिसको वह सीधा मुँह लगा कर बिना सांस लिए पीने लगी. सांस लेने की आवाज से अर्जुन समझ चूका था के बुआ ने पानी पी लिए है.

"आपका प्यार बुआ.", अर्जुन ने आँखों में देखते हुए दिल की गहराई से ये शब्द कहे थे लेकिन लगे जैसे लोहे की गुल्मख की तरह उनके दिल में.

"एक लड़की को जब उसका पहला प्यार हे न मिले तोह उसका दिल टूटना लाज़मी है. लेकिन इस प्यार में वजह ये नहीं थी की दोनों के परिवार नहीं मानते, वह दोनों खुद हार गए क्योंकि परिवार एक हे था और उसका सामना करने की हिम्मत दोनों में से किसी में नहीं थी. आँखों के सामने हे एक दूसरे को किसी और का होते देखना मौत से कम् तोह नहीं. और बलिदान की कदर? कोई जानता हे नहीं तोह कदर कौन करता? अवसाद, गुस्सा, अकेलापन और अगर ये ज्यादा हो जाये तोह मन बहलाने के लिए अपने आप को कुश दिखने का ढोंग. बड़ा घर, बड़ी गाडी, महंगे कपडे और उनके भीतर एक कमजोर घायल दिल. न किसी ने इस पर मलहम लगाई न कोई टटोल के देख पाया की हंसती खेलती घर की लाड़ली ज़िद्दी थी लेकिन 100 नक़ाब के पीछे छुपी हुई कमजोर नहीं. जिसको अपने होने का एहसास ताक़त से करवाना पड़ता है. शायद अवसाद और भीतर का अकेलापन हे था जिसकी वजह से पहले आपने फूफाजी के परिवार से दूर सिर्फ उनके साथ घर बनाया, फिर यहाँ से भी दूरिया बढ़ा ली. तारा और हिमांशु भी तोह इसकी वजह से आपने खुद से हे दूर कर दिए, जिन्हे आप प्यार तोह करती है लेकिन उस अकेलेपन को कही ये भी देख लेते तोह क्या रह जाता आपके पास? और वह तीसरा मैं हु बुआ, जो शायद उन दोनों जितना प्यार नहीं करता आपको न हे जानता है क्योंकि हमने कितना हे वक़्त कभी बिताया साथ लेकिन ये kam-umar ढोंगी लड़का दिल और इंसान को समझने में कुछ बेहतर जरूर है. वैसे आपने उन तीनो को बिना bhed-baav भरपूर प्यार दिए बुआ जिनकी आँखें एक जैसी है, सुबह मेरी भी देख लेना. शायद मेरे हिस्से का थोड़ा मुझे भी मिल जाये.", अर्जुन ने इस बार मधु बुआ के बहते आंसू साफ़ नहीं किये, जो जाने कबसे बह रहे थे. वह जानता था के दिल पे चाय धुल को हटाने के लिए इनका निकलना जरुरी है. चुपचाप वह नीचे भैया के कमरे में जा कर लेट गया. नींद जाने कब आई लेकिन इतना जरूर था के आज वह अर्जुन को भी आसानी से नहीं आई थी..

.

.

सुबह 6 बजे कोमल दीदी ने अपने maa-papa के लिए चाय बनाने के बाद उनका कपड़ो का छोटा बैग और शादी में देने का सामान गाडी में रखवाया. दोनों हे pati-patni के चेहरे पर अलग हे आभा थी इस नयी सुबह और अपनी बेटी का माथा चूमने के बाद रेखा जी अंदर अपनी सास कौशल्या जी को मिलने चली गई घर से निकलने से पहले और अपने पिता को इतनी सुबह दाढ़ी बनाते देख शंकर जी भी उनके पास बैठ कर घर परिवार की छोटी मोती बात करने लगे. शंकर जी के पूछने पर रामेश्वरजी ने कुछ काम बता दिए, घर से जुड़े हुए और इधर रेखा जी के साथ मधु बुआ और कौशल्या जी भी बहार चली आई.

"तेरे लिए कुछ लेते हुए औ गुड्डू?", शंकर जी के मुँह से न्यास हे ये लफ्ज़ निकल गया और मधु अपने भाई के गले से लग गई. ये उनके बचपन का नाम था जो तीनो भाई लेते थे. रामेश्वर जी की नजरे इस घटना को अनदेखा न कर सकीय.

"नहीं भैया मुझे कुछ नहीं चाहिए. और बस आप भाभी का ख़याल रखना वह. गांव का माहौल होगा जैसा माँ ने बताया.", एक बार रेखा जी से भी गले मिलती वह कोमल का हाथ थामे दोनों को गाडी में बैठ कर जाते हुए देखने लगी.

"आपने देखा, ये मधु वैसी हे थी जैसे मैंने पहली बार देखि थी.", रेखा जी ने अपने पति से जैसे वही बात कर दी थी जो वह भी सोच रहे थे.

"हाँ रेखा. ये वही मधु थी, घर की गुड्डू.", एक शांत मुस्कान के साथ उन्होंने अपनी बीवी के चेहरे को देखने के बाद सड़क पर ध्यान लगा लिए. ख़ास बात थी की उनकी कार में गाने चल रहे थे.

.

.

"वह खोता दिखाई नहीं दिया अभी तक कोमल?", कौशल्या जी ने अपनी पौती से पुछा जो तीनो के लिए वही आँगन में चाय और कॉफ़ी लेके आई थी. मधु बुआ ने काफी समय से चाय त्याग राखी थी और सुबह कॉफ़ी की आदत थी उन्हें अब.

"दादी ारु भैया के साथ हे सोया हुआ है. मैं देखने गई थी थोड़ी देर पहले लेकिन फिर संजीव भैया की वजह से नहीं उठाया.", कोमल दीदी ने उन्हें बताया तोह शांत सपाट चेहरा लिए बैठी मधु बुआ उठ कड़ी हुई.

"तू कहा चली लाडो? कॉफ़ी तोह पी ले पहले.", रामेश्वर जी ने अपनी लाड़ली से कहा लेकिन जवाब सुनकर वह अपनी धर्मपत्नी की तरफ देखने लगे.

"जरा मैं भी तोह देखु ये आपके नवाब साहब को उठाने की सजा क्या होती जो कोमल ऐसे हे आ गई.", कौशल्या जी अपने लादले पौटे के बारे में सोचते हे परेशां हो गई और मधु बुआ तेज कदमो से अंदर वाली सीढ़ियों की तरफ बढ़ गई.

"अब?", ये छोटा सा हे शब्द कह पाई थी वह.

"अब अर्जुन जाने और उसकी बुआ. बाकी इतनी सुबह तुम कुछ भी मत कहना.", कोमल दीदी भी अपने dada-daadi के पास कड़ी थी और उन्हें भी चिंता थी अपने भाई की लेकिन जब बड़े हे कुछ नहीं के रहे थे तोह उनका बीच में पड़ना भारी हो सकता था. फिर भी वह हिम्मत करती हुई धीमे कदमो से ऊपर की तरफ चल दी, जैसे उन्होंने सोच लिए था के अगर कुछ गलत किआ बुआ ने तोह वह अर्जुन की जगह खुद उनका गुस्सा सेह लेंगी.

यहाँ तोह माहौल बिलकुल अलग हे था. संजीव भइया दिवार की तरफ करवट लिए सो रहे थे. अर्जुन एक तकिया घुटनो के बीच दबाये दूसरे पर हाथ रखे इस तरफ हे मुँह किये चैन की नींद सोया पड़ा था. मधु बुआ बड़े प्यार से कुछ देर उसको निहारती रही और फिर बड़े हे हलके हाथ से उसके चेहरे के सामने आये बाल हटती माथे को सहलाने लगी. वह बीएड के बिलकुल किनारे अर्जुन के सर के पास हे बैठी हुई थी. इस स्नेहात्मक स्पर्श से अर्जुन ने अपनी आँखें खोली और अपनी बुआ को पास देख अपना सर थोड़ा उचकाते हुए उनकी गॉड में रख कर वापिस आँखें बंद कर ली. मधु बुआ के चेहरे पर मुस्कान थी और आँखे थोड़ी डबडबाई हुई. जिन्हे जल्द हे उन्होंने साफ़ करने के बाद अपने भतीजे का सर वैसे हे सहलाना शुरू कर दिए.

संजीव भैया कब उठे और बहार चले गए, बुआ को खबर न लगी. बस इस मासूम से चेहरे में खोई वह अपने आप से कह रही थी, 'तेरे हिस्से का प्यार मैं चाह कर भी नहीं चीन सकती. तूने खुद उसको कमा लिए है बीटा. तेरी बुआ को तू अगर ये सच न दिखता तोह जाने कितने हे साल और मैं ये बेवजह का दर्द और अकेलापन लिए पड़ी रहती. अब तुझे शिकायत का कोई मौका नहीं मिलेगा.'

"माँ आप इसके पास हो और मैं परेशां हो गई जब इतनी सुबह आपको बीएड पर नहीं देखा. और इस उल्लू को इतने प्यार की वजह?", तारा nikkar-tshirt पहने हुए कमर पर हाथ रखे अपनी माँ से कह रही थी, जो अर्जुन का सर अपनी गॉड में लिए बैठी उसको थपकिया दे रही थी.

"तारा की बच्ची, संडे है. तू तेरे बिस्टेर से बहार हे क्यों निकली? यहाँ बुआ इतनी प्यारी बातें कर रही थी मुझसे. कर दिए सत्यानाश.", अर्जुन वैसे हे लेता तारा को कोस रहा था और मधु बुआ पहले हैरान और फिर मुस्कुराती हुई अर्जुन और अपनी बेटी, दोनों की तरफ देखने लगी.

"माँ ये भोला भला लगता है पैर देखा आपने ये सो नहीं रहा था. और वैसे ये आप दोनों की सुलह इतनी जल्दी हो कैसे गई? राबड़ी तोह आपने भी गुस्से में नहीं खाई थी और खाना खाने ये भी नहीं आया था रात को.", तारा ने जैसे दोनों की पोल खोल दी थी.

"कोई बात नहीं. आज मेरे बेटे के लिए मैं खाना बनाउंगी फिर ये मेरे लिए राबड़ी ले आएगा, क्यों अर्जुन लेके आएगा न?"

"ओह बुआ. राबड़ी लाना मुसीबत है. प्लास्टिक में पैक करवाओ, फिर यहाँ बरता और प्लेट खराब करो. आप न मेरे साथ हे चलना, वही खा के आएंगे. इन सबने तोह वैसे भी भरपेट खा हे ली थी तोह हम दोनों हे चलेंगे.", अर्जुन ने बिस्टेर से खड़े होने से पहले अपनी बुआ का गाल चूम लिए और तारा के सर पर चपत लगता बहार भाग गया.

"देखा आपने. ये मुझे दीदी की जगह अभी भी नाम से बुलाता है. लगे तोह मेरे हाथ फिर बताती हु इसको."

"नाटक मत करो मेरे सामने. इतनी भी मंदबुद्धि नहीं हुई जो तुम दोनों मिलकर मुझे बना रहे हो.", मुस्कुराती हुई मधु बुआ अपनी बेटी का कान खींचने के बाद उसको गले लगाने के बाद बाथरूम चली गई, तैयार होने.

.

.

खाने की मेज पर कौशल्या जी ने जब अर्जुन और संजीव की प्लेट में मटर के पराठे रखते ललिता जी को देखा तोह थोड़ा हैरान हो गई.

"ललिता, कोमल बना रही है खाना तोह प्रियंका या अलका को बोल दे वह परोस देंगी खाना. तू क्यों andar-bahar चल रही है.?"

"वह माँ जी, नाश्ता मधु बना रही है और उसने हे सबको रसोई से बहार कर दिए अभी के लिए.", ललिता जी को पता था के यहाँ अब उनकी शामत आने वाली है.

"मधु?", वह इतना सुनते हे अंदर अपने कमरे में चली गई. अर्जुन ने जल्दी से एक पराठा ख़तम किआ और प्लेट लेकर रसोई में चला गया. यहाँ उसकी बुआ पसीने में भीगी आते में मटर का मसाला भर्ती, पराठे बैल कर खुद हे उन्हें सेक रही थी.

"बुआ, बस कीजिये अब. मेरा हो गया है. और इस घर में पूरा गाँव रहता है तोह इतने लोगो के लिए कष्ट मत कीजिये.", किल्ली पर टंगे साफ़ छोटे तोलिये से उनका माथा पोंछता वह उन्हें समझने लगा. सफ़ेद सलवार कमीज सामने और काख के पास से पूरा पसीने में भीग चूका था इतनी देर में. ऊपर नजर करती मधु बुआ ने उसको देखते हुए पराठा तवे पर पलटा.

"इतनी जड़ली खा लिए? और सबके लिए क्यों न बनाऊ? मुझे ाचा लग रहा है अब.", मधु बुआ का जवाब सुनकर अर्जुन क्या कहता

"गर्मी कितनी लग रही है आपको. पूरी पसीने में नहीं हुई हो.", अर्जुन ने इतना कहा तोह बुआ ने बेध्यानी में कमीज का सामने वाला हिस्सा एक हाथ से खींचते हुए अंदर फूंक मारी और अर्जुन का दिमाग हिल गया. पसीने से भीगे उनके बड़े सतांन और वह गहरी खाई जो उनके आपस में चिपके होने से बानी हुई थी. बुआ ने जैसे हे नजर ऊपर उठाई, उनको पता लग गया था के अभी अर्जुन ने क्या देख लिए है. अर्जुन पाँव सर पे रखता रसोईघर से निकल सीधा अपने कमरे में जा कर रुका. थोड़ा हैरान हुई बुआ के चेहरे पर नटखट मुस्कान आ गई अर्जुन को ऐसे वह से भागते देख.

"भाई आज तोह मैं मेरी लाडो के हाथ का खाना यही बैठ के खाऊंगा.", रामेश्वर जी रसोईघर में तभी बैठ कर खाना कहते थे जब उनकी धर्मपत्नी उनके लिए बनाया करती थी. और साथ हे कौशल्या जी ने चकला और आता दूसरी पीढ़ी की तरफ खींचते हुए खुद बेलना शुरू कर दिए.

"पापा आपके लिए मैं चपाती बना देती हु. परांठे भरी रहेंगे.", मधु ने अपने पिता की सेहत का सोच कर कहा लेकिन रामेश्वर जी ने मन कर दिए.

"वैसे ये चमत्कार हुआ कैसे?", कौशल्या जी ने अपने पतिदेव के लिए प्लेट लगते हुआ पुछा.

"माँ ने ये अर्जुन के लिए खास बनाये और किस्मत सबकी खुल गई जो आज इतने साल बाद माँ के हाथ के परांठे खाने मिले.", तारा भी अंदर अपने नाना की बगल में बैठती हुई बोली. रामेश्वर जी ने एक नजर अपनी बीवी को देखा और फिर नीचे मुँह करते हुए मुस्कुराती अपनी बिटिया को.

"ये कैसे मुमकिन हुआ? चाँद और सूरज एक साथ.?", रामेश्वर जी को अर्जुन पर भरोसा था लेकिन वह अपनी बेटी से भी sun-na चाहते थे.

"कोई चाँद और सूरज नहीं पापा. वह ाचा लड़का है और समझदार भी. बस मैंने थोड़ा देर से समझा उसको. शायद अपने झूठे दायरे से बहार निकलना मेरे बस में नहीं था.", मधु बुआ के चेहरे पर थोड़ी गंभीरता आई कुछ पल के लिए लेकिन फिर वह मुस्कुरा उठी. "लेकिन है वह भी ढोंगी, एक नंबर का."

"हाहाहा. देखा कौशल्या तुम संदेह कर रही थी उस पर लेकिन उसका प्लान कामयाब हुआ.", रामेश्वर जी का निवाला हाथ में रुक गया जब उनके मुँह से ये बात निकली. और उनकी बेटी थोड़ा गुस्से से आँखें दिखती अपने maa-baap की तरफ देखने लगी.

"कैसा प्लान? मतलब कही न कही आप लोग भी शामिल थे उसके साथ?", अब तारा की हंसी ने उनकी बात को पुख्ता कर दिए था

"ये भी थी मतलब?"

"मेरी बेटी तू न बहोत भोली है जो इन dada-paute के जाल में फँस गई. लेकिन जितना मैं जानती हु उसके हिसाब से तोह तुम्हारा समझौता राबड़ी पर हे हो जाना था. इतनी देर कैसे लगी?", शायद इन्हे भी अर्जुन और मधु के बीच हुई रात वाली कहानी का पता नहीं था. ये मधु को भी समझ आ गया था लेकिन बात को टालते हुए वह बोली.

"चलो कोई बात नहीं माँ. जो हुआ वह ाचा हे हुआ न. इनको मेरी फ़िक्र थी तभी तोह ऐसा किआ. अब आप खाना बनाओ मेरा मैं एक बार पानी दाल औ.", अपनी बेटी को म्हणत करते देख रामेश्वर जी को भी ख़ुशी हो रही थी. साथ हे अपने पौटे पर नाज.

.

.

"यहाँ क्या कर रहा है छोटे अकेला बैठा हुआ?", संजीव भैया तैयार हो कर आये थे. शायद कही जाने का प्रोग्राम था.

"कुछ नहीं भैया, बस ये बुक का लास्ट chapter रह गया है वही ख़तम कर रहा था. आप कही जा रहे है?", अर्जुन अपनी इंग्लिश की किताब पढ़ रहा था.

"हाँ यही बताने आया हु. थोड़ा काम से बहार जा रहा हु और कल सुबह तक हे आऊंगा. देख लेना जरा अगर पीछे कोई काम हो.", अर्जुन भैया से गले लग कर मिला और उस दौरान हे beep-beep की आवाज उनकी जेब से आई. काळा रंग का ये पेजर था जिस पर कोई सन्देश देखने के बाद वह अर्जुन के सर पर हाथ फिरते चले गए. अब अर्जुन ने तारा और उसके बीच वाला दरवाजा खोल लिए था.

वापिस किताब में सर खपाने लगा और इधर बुआ अपना कमरे में आते हे दरवाजा लगा कर सीधा बाथरूम में चली गई. उनकी नजर संजीव के दरवाजे के बहार लगी कुण्डी पर जरूर पड़ी थी लेकिन अर्जुन के कमरे के ढलके हुए दरवाजे पर कोई गौर नहीं किआ. अर्जुन किताब का पथ पढ़ने के बाद प्रश्न उत्तर कर रहा था साथ हे बीच बीच में नजर सामने वाले शीशे पर डालते हुए पिछले खली कमरे पर भी नजर घुमा लेता, ये जैसे उसकी आदत हे थी.

मधु बुआ जैसे बाथरूम में गए थी वह सिर्फ पानी से शरीर साफ़ करने के बाद कमर और सीने पर बड़ा टोलिया लपेटे बहार निकल आई. गुनगुनाती आवाज सुनकर अर्जुन का ध्यान एक बार फिर शीशे पर गया और न चाहते हुए भी नजर उस भरे हुए शरीर की स्वामिनी पर रुक गई जो एक सफ़ेद बड़े तोलिये में अपना खजाना छिपाये बिस्टेर पर रखे बैग से अपने अधोवस्त्र निकल रही थी. गोरी मांसल पिंडलियों, भारी जंघे और चिकने कंधे उसकी आँखों के सामने थे. पानी की बुँदे बता रही थी की बुआ ने ज्यादा पौंछने की जेहमत नहीं उठाई थी. अगले हे पल वह टोलिया बिस्टेर पर और अपना एक पांव ऊपर करती मधु बुआ ने काले रंग की कच्ची का सिरा डाला और ऐसे हे दूसरे वाला. उनका शरीर हर तरफ से खास आकर में थे. विशाल कूल्हे, गदराया चिकना पेट और कुछ ज्यादा हे बड़े चुके जिनपर 2 गहरे भूरे निप्पल. अपने वजन की वजह से थोड़ा ढलाव लिए हुए लेकिन बिलकुल बेदाग चिकने. ऊपर सफ़ेद ब्रा पहन ने के बाद हुक लगते समय उनकी नजर उस आधे खुले दरवाजे पर गई तोह उनके हाथ भी वही रुक गए लेकिन अर्जुन को बेखबर पढ़ते देख दिल को थोड़ी तसल्ली हुई.

"अभी ये इधर है और मैं नंगी इसके ठीक पीछे. अनर्थ हे हो जाता जो ये देख लेता.", खुद को इतना कहती हुई वह जैसे हे ब्रा की पट्टी को कंधे पे ठीक करते ध्यान से अर्जुन की तरफ देखने लगी तोह पाया के वह दिवार की तरफ देख रहा था. बड़े शीशे में वह दोनों आँखे मधु को अपने शरीर को हे घोरती मिली. जल्दी से टोलिया सीने पर रखती वह बीएड के बगल वाली जगह में जैसे खुद को छुपाने लगी. जैसे तैसे सूट पहन कर अर्जुन के दरवाजे तक हिम्मत करती आई, वह नदारद था.

"हे भगवन. इतनी देर से मैंने ध्यान हे नहीं दिए और वह मुझे इस हालत में जाने कब से देख रहा होगा. क्या सोचता होगा के उसकी बुआ कमरे में नंगी घूमती रहती है. अगर बात हुई तोह कह दूंगी के ध्यान नहीं गया क्योंकि पहले तोह दर्जा बंद हे था.", अब अकेले कमरे में खड़ा होना मुश्किल हुआ तोह बुआ नीचे चली गई, नाश्ता करने.

.

.

"क्या कर रही हो जो घर से निकलने का भी समय नहीं तुम्हारे पास?", प्रीती घर पे पारवती से पूरे घर की सफाई करवा रही थी. जब अर्जुन सीधा अंदर आया तोह प्रीती खुद रेणुका बुआ और उसके कमरे के बीच वाले कमरे के दरवाजे पर कड़ी थी. अर्जुन की आवाज सुनते हे चेहरा खुश हो गया.

"आओ इधर और खुद देख लो.", प्रीती ने जैसे ये कहा था मतलब था के कुछ खास हे था इधर. अर्जुन उसकी बगल से निकलता कमरे के अंदर आया तोह ये कमरा थोड़ा अलग तरीके से सजा था. कमरे के ठीक बीच में लोहे के फ्रेम का बीएड जिसका सिराहना भी खास तरह से घुमाये लोहे से बना था. छत्त पर जंजीर से झूलते प्लेट लगे हुए बल्ब और एक तरफ वाले बल्ब के नीचे गोल टेबल और आमने सामने 2 कुर्सियां. पूरे कमरे की दिवार खली थी सिवाय एक तरफ जहा अलमारी दिवार में हे बानी हुई थी.

"इतना बड़ा कमरा और ऐसे खली? लेकिन ये बीएड बड़ा अलग है. ये लटकते बल्ब भी शायद डोरी से ऊपर नीचे होते है. मुझे याद हे नहीं के मैं कभी इस कमरे में आया भी हु.", अर्जुन बता रहा था और प्रीती उसके साथ आ कर कड़ी हो गई.

"ाचा हुआ तुम आये और ये कमरा देख लिए. शायद तुम्हेर थोड़ी मदद मिले माँ को समझने में.", छोल साहब घर थे नहीं, जो अर्जुन अंदर आने से पहले देखता आया था. पारवती साथ वाले कमरे में जा चुकी थी इधर की सफाई करने के बाद. अर्जुन ने एक बार फिरसे कमरे का जायजा लेते हुए प्रीती का हाथ भी पकड़ा हुआ था.

"उन्हें सादगी बहोत पसंद है न? चादर सफ़ेद, दीवारे सफ़ेद और कोई tam-jham नहीं. शायद पढ़ना भी पसंद होगा क्योंकि बल्ब ठीक टेबल के ऊपर लगा है. लेकिन बीएड ऐसे बीच में?", अर्जुन यही बात समझना चाहता था. प्रीती ने हाथ वैसे हे उसका हाथ थामे अर्जुन के कंधे से सर लगते हुए कहा.

"उनका कहना है की सोने की जगह ऐसी हो जहा कोई रास्ता न रुके. और बाकी तुमने सब ठीक कहा के वह अपने कमरे में बस वही चीज रहने देती है जो जरुरी हो. उनके आने के बाद शायद 1-2 प्लांट वह खिड़की में दिखे साथ हे इंकपेन, चारकोल और ड्राइंग पद. लाइट इसलिए ऐसे लगी है वह. माँ बात करने से ज्यादा लोगो को स्टडी करती है.", अर्जुन सब ध्यान से सुन्न रहा था और उसको थोड़ी हैरत थी की बहार देश में रहने के बावजूद जैसा प्रीती बता रही है उसकी माँ तोह बिलकुल विपरीत है. क्योंकि उसने तोह सुना था के अमेरिका और यूरोप के लोग कही ज्यादा विकसित है और दुनिया भर की सुखसुविधा से घिरे रहते है.

"यार तुम्हारी माँ तोह मेरे ख़याल से बिलकुल अलग है, अगर तुम्हारी बात मानु तोह. मुझे लगा था के वह कंप्यूटर हाथ में लिए घूमने वाली, एक, कद सिस्टम के साथ हे ज्यादा आधुनिक होंगी.", प्रीती खिलखिला के हंसने लगी उसकी बात सुनकर.

"बुद्धू, हर कोई ऐसा नहीं होता है. अगर तुम्हारी उनके साथ थोड़ी भी जमी न तोह देखना तुम्हे क्या कुछ नया पता लगेगा. वह पापा को भी कमरे में टेलीविज़न नहीं रखने देती या ऐसी कोई भी चीज जिस से सोने वाले कमरे का माहौल ख़राब हो. हाँ पूरे घर में वह सब मिल जायेगा जो तुमने कहा अभी. जितना जरुरी उतना हे इस्तेमाल. ाचा छोड़ो ये सब, मैं भी कहा ले कर बैठ गई तुम्हे. चलो मेरे कमरे में चलते है.", अर्जुन का हाथ पकड़ कर प्रीती बहार आ गई और कमरा वापिस बंद करती वह अपने कमरे में आ गई.

"बैठो मैं जरा पारवती दीदी को काम बता कर आई.", अर्जुन भी तकिया उठाते हुए अपनी छाती के निचे दबा कर उल्टा हे बिस्टेर पर लेट गया. दरवाजा बंद होने की आवाज से पलटा हे था के प्रीती उसके ऊपर आ कर बैठ गई.

"ोये पागल हो गई हो?", अर्जुन हैरान हो गया था के घर में पारवती है और प्रीती क्या कर रही है.

"क्यों डर लग रहा है इस शेर को?", प्रीती उसकी आँखों में शरारत से देखते हुए बोल रही थी और साथ हे अर्जुन के चेहरे से गर्दन तक अपनी ऊँगली का नाखून हल्का गदति उसके मजे ले रही थी.

"पारवती?", अर्जुन ने इतना हे कहा था के प्रीती हंसती हुई उसकी बगल में लेट गई. बड़े प्यार से वह उसके घबराये चेहरे को देखती मुस्कुराने लगी.

"मजाक कर रही थी बाबा.", लेकिन अर्जुन उसके उलट अब खुद प्रीती का एक उभर हल्का से दबाते हुए मुट्ठी में पकड़ने लगा.

"आउच.. ये हरकत अभी नहीं.", वह फुर्ती से उस से दूर होती फर्श पे कड़ी हो गई. अपना उभर हलके से सहलाती वह अर्जुन को वैसे हे शरारत से देख कर बाथरूम में भाग गई.

"ये चीटिंग है."

"न न. ये सजा है और मिस्टर अब तुम्हे आराम करना है तोह कर लो, मैं नहाने लगी हु. बहार दादू आ गए हैं.", प्रीती की हंसने की आवाज के साथ हे अर्जुन ने गाडी रुकने के आवाज भी सुनी. वह दरवाजा खोल कर वापिस बिस्टेर से हे तक लगा के बैठ गया, ाचे बचे की तरह.

"अरे, आज तोह बरखुरदार पहले से आये हुए है. क्या बात है भाई?", अर्जुन ने हाथ में सामान उठाये छोल साहब को देखा तोह जल्दी से उनकी तरफ लपका.

"आप क्यों ये सब ले आये? मुकेश भैया नहीं है क्या साथ?", अर्जुन ने सामान उनसे लेते हुए एक तरफ रखा और फिर उनका जवाब सुने बिना बहार गाडी की तरफ आ गया. 3-4 गट्टे के बड़े डब्बे टेप से सील किये हुए थे जिन्हे मुकेश उतार रहा था. अर्जुन ने खुद हे उठाते हुए बड़ी सावधानी से अंदर ड्राइंग हॉल में रखा और फिर निश्चिन्त करने के बाद की सब सामान आ गया है वह वापिस छोल साहब के पास आ गया.

"आज ये आप सुबह सुबह इतना सामान लेने कहा चले गए थे.?", पारवती उन्हें पानी दे कर वापिस रसोई में जा चुकी थी.

"अरे कल बहु आ रही है तोह जरुरत का सामान लेने गया था बीटा. मैं तोह विशुद्ध हिंदुस्तानी खाना खाता हु, मसाले और तड़के वाला. अब तेरी विलायती सास उस सब से कोसो दूर है.", उनकी हंसी बता रही थी की अर्जुन को वह तंग भी कर रहे थे.

"क्या दादू ये भी तोह कह सकते थे की प्रीती की माँ. कुछ भी बोल देते हो कभी कभी आप.", वह शर्माता हुआ नजरे बचा रहा था अब छोल साहब से.

"गलत क्या कहा है बीटा? वह बात अलग होती अगर वह यही रहती लेकिन मेरे सुपत्र जी तोह.. चलो छोड़ो ये सब और ये बताओ के अब तुम्हारी बुआ ठीक है?"

"वह तोह पहले से कही ज्यादा ठीक है. आज तोह मेरे लिए नाश्ता भी उन्होंने हे बनाया.", अर्जुन एकाएक खुश हो कर बताने लगा. प्रीती भी नाहा कर अब उधर हे आ गई थी. पारवती ने 2 गिलास जूस के टेबल पर रखने के साथ हे 2 सैंडविच भी रखे और छोल साहब को चाय देने के बाद वापिस काम में लग गई.

"शकल मत बनाओ, ये तुम्हारा है.", प्रीती ने बड़े अधिकार से ऐसा कहा और अर्जुन ने दोनों की तरफ देखा तोह छोल साहब बस दोनों हाथ अर्जुन को दिखने लगे जैसे कह रहे हो के मैं नहीं जानता कुछ.

"लेकिन ये सैंडविच नहीं लूंगा.", अर्जुन ने एक गिलास अपनी तरफ करते हुए कहा.

"वह तुम्हारे लिए हैं भी नहीं. पराठे हे खाओ.", प्लेट प्रीती ने अपनी तरफ की और आराम से नाश्ता करने लगी. जूस ख़तम करते हे अर्जुन ने घडी की तरफ देखा और फिर आने का बोल कर घर चल दिए.

"बेटी तुम्हे लगता है ये रोमिला के सामने टिक पायेगा? इसको ज्यादा समझ नहीं है इसलिए मैंने तेरे बाप को मन भी किआ था के वह खामख्वाह परेशां हो रहा है. जब दोनों ने रहना हे यहाँ है और दोनों परिवार भी सहमत है. लेकिन वह भी क्या हे कर सकता है.", एक आह से भरते छोल साहब चाय की प्याली को देखने लगे.

"आप माँ को उतना नहीं जानते दादाजी. वो थोड़ी अलग है लेकिन मुझसे प्यार करती है तभी तोह उन्होंने हाँ कह दिए था बस जोएल वाली शर्त पे. अब उन्हें लड़के से मिलना है जिस से उन्हें तसल्ली हो जाये.", प्रीती ने सैंडविच का एक छोटा हिस्सा खाया अपनी बात कहने के बाद और अपने दादा जी की तरफ देखने लगी.

"बेटी, तुझे पता है न के तेरा बाप साल में 2 बार अपनी ससुराल जाता है लेकिन यहाँ उसको आये 4 साल हो गए. रोमिला को तोह मैंने आखिरी बार वही देखा था जब तू 5तह में थी और मैं मिलवाने ले गया था तुझे, छुट्टियों में. बेशक हर माँ अपने बचो का भला चाहती है लेकिन ये अर्जुन नासमझ है और कही कोई ऐसी शर्त मान बैठा जिसकी वजह से वह भी ये देश छोड़ने को तैयार हो जाये तोह तुम नहीं जानती की इसका असर कितनी दूर तक पड़ेगा.", अपने दादा की ये गहरी बात सुनते हे प्रीती के हाथ मुँह की तरफ जाते हुए रुक गए. अब वह भी सोच में पद चुकी थी क्योंकि उनकी बात सच थी. ऐसी हे शर्त तोह माँ ने राखी थी उसके पापा के साथ लेकिन उसको अर्जुन पर भी भरोसा था.

"आप फ़िक्र न करे दादू. अर्जुन उनकी नजर में जैसा भी बने, होगा वही जैसा आपने सोचा है. यू अरे थे हेड ऑफ़ आवर फॅमिली एंड शी मस्ट एक्सेप्ट थिस.", प्रीती इतना बोलकर बिना अपने दादा की तरफ देखे जूस ख़तम करने के साथ हे रसोईघर में चल दी. छोल साहब भी अपनी लाड़ली की बात सुनकर थोड़ा निश्चिन्त थे के उनके घर के 5 सदस्यों में से ये उनके साथ है.

.

.

अर्जुन बगीचे में 2 पौधे पपीते के लगाने के बाद ऊपर अपने कमरे में तैयार हुआ और सोलंकी के घर चल दिए, जहा आज उसको नाश्ते पर गीता सोलंकी ने बुलाया था. धन्यवाद् कहने के लिए.

.

.

विवाह समारोह सदा रखने की बात हुई तोह वर पक्ष की तरफ से, घर की बेटी कुछ समय पहले हे विधवा जो हो गई थी. फिर भी दलीप सिंह जी ने माहौल को शांत बनाये रखने के साथ हे खाने और लोगो के स्वागत का उचित प्रबंध किआ था. उनकी एक हे तोह बेटी थी मंजू, जिसको हमेशा उन्होंने sar-maathe रखा था. बरात 10 बजे पहुंची थी, 4 गाड़ियों में. रेखा जी के परिवार से सिर्फ बड़े हे आये थे और यहाँ वर पक्ष के शगुन में शंकर जी ने हे अपनी धर्मपत्नी के साथ उनका स्वागत किआ था. बाराती खाने से निपट गए तोह दोनों घरो के सदस्यों के बीच ladka-ladki ने अग्नि के सामने फेरो की रसम निभाई. मंजूबाला शादी के जोड़े में जितनी खूबसूरत लग रही थी, ऋषभ सिंह पूरी तरफ फीका दिख रहा था. बेशक देखने में वह एक आदर्श लड़का था लेकिन मंजूबाला कही से भी साधारण नहीं थी. 6 फ़ीट लम्बी, कमनीय शरीर, लुभावनी काली आँखों के साथ हे शरीर का हर भाग संवाद करता था. आज इस लिबास में अपनी छोटी भाभी को देख वही बैठी मेनका की आँखों में नहीं आ गई थी.

"पिताजी, आज मैं यही रुकूंगा.", शंकर जी ने अपने साथ हे बैठे ससुरजी से धीमी आवाज में कहा और वह भी मुस्कुरा दिए.

"मैं तोह खुद चाहता हु दामाद जी. धन्यभाग हमारे.", उनकी बात सुनकर अब शंकर जी मुस्कुरा दिए थे. दोनों हे बाकी बचे फेरे देखने लगे. मांग में सिन्दूर भरते वख्त मंजू के वह हल्का लाल टीका पहले हे लगा था जिसपर एक को छोड़ कर किसी की भी नजर न पड़ी.

"लड़की के mata-pita को कन्यादान के लिए बुलाइये.", पंडित जी की इस आवाज पर दलीप सिंह ने एक बार फिर शंकर जी की तरफ देखा और सरोज जी ने अपने साथ बैठी रेखा को हाथ लगाया. यहाँ कन्यादान इन चार लोगो ने किआ जो बाकी सब भी देख रहे थे. सरोज जी ने हलकी नाम आँखों से लड़के की माता और बहिन को हाथ जोड़ के इसकी वजह बताई.

"संधान जी, बेटी मेरी है लेकिन छाती मेरी बहिन के लगी है. इसलिए इनका हक़ ज्यादा है.", मेनका की माता जी ने भी ख़ुशी ख़ुशी हाथ जोड़ दिए और मेनका ध्यान से रेखा जी को देखने लगी. सभी रस्मो और mel-jol से निबटने के बाद लड़के की माँ ने जो कहा उसको सुनते हे एक पल के लिए दलीप जी और उनकी बीवी सकते में आ गए.

"समधी जी, बहु अभी यहाँ से हमरे साथ गांव जा रही है कुलदेवी के मंदिर डोरा बांधने. लेकिन जैसे पहले बताया था के मेरी बिटिया और इसकी बड़ी ननद शहर में रहःती है तोह, ये तीनो लोग वही से #### शहर चले जायेंगे. परिवार का लड़का, जो बहु का भाई लगता हो कृपया उसको साथ भेज दीजिये. कल ghar-fere के लिए बहु को घर लिए लाएगा.", लड़का तोह रेखा जी के मायके वाले घर भी नहीं था और दलीप जी के छोटे भाई के भी लड़की हे थी. वह हाथ जोड़े हे खड़े थे की अब रेखा जी की आवाज सुनाई दी.

"संधान जी, हम #### शहर रहते है और मेरा बीटा, जो मंजू से छोटा है वही इसको ghar-fere पर ले आएगा."

"ाची बात है जी, फिर अपने बेटे को बता दीजिये के आज शाम हे इनके घर चला जायेगा. बड़ी बहिन के साथ उसकी ससुराल में एक रात वही रहेगा.", उनकी बात सुनते हे शंकर जी के चेहरे पर अलग हे मुस्कान आ गई और वह मैं हे मैं कहने लगे. 'ये देखो किस्मत. इनको खुद नहीं पता ये किसको कहा बुला रहे है और साथ हे अब सोने भी जरुरी करवा दिए. धन्य है अर्जुन शर्मा. बीटा किस्मत हो तोह तेरे जैसे वर्ण इंसान पैदा हे न हो.'

.

.

सब कार्यक्रम से निबट कर 3 बजे तक शंकर जी रेखा के साथ दलीप सिंह के हे घर आ गए थे. रेखा जी ने हे सबके लिए चाय बनाई और शंकर जी दलीप सिंह के साथ आपसी बातें करने लगे. वही से थोड़ी देर बाद रेखा जी ने घर पे फ़ोन कर के बता दिया के शंकर जी आज इधर अपनी ससुराल में हे रुकना चाहते है. और एक बार अर्जुन से बात करवा दीजिये, थोड़ा जरुरी है.

"हांजी माँ.", अर्जुन ने उस तरफ से फ़ोन लिए और अपनी माँ से पूछने लगा जो काम वह कहने वाली थी.

"बीटा, ये अपनी मौसी से बात कर ले और समझ ले सबकुछ.", रेखा जी ने फ़ोन सरोज जी को दे दिए. दलीप सिंह जी के छोटे भाई, बीवी और शंकर जी भी अब फ़ोन लिए सरोज को हे देख रहे थे.

"मेरे लाल, देख तू तोह आया नहीं यहाँ लेकिन अब आना पड़ेगा. तेरी बहिन शादी के बाद उधर हे आएगी, तुम्हारे शहर. अब तेरी मौसी का ये काम कर देना बीटा. उसके घर आज शाम तुझे जाना है और मंजू के पास उसके नए घर रात गुजरने के बाद उसको यहाँ ले आना कल सुबह. क्षमा चाहती हु के तेरा एक दिन स्कूल का खराब जाने वाला है."

"मौसी, कैसी बात करती हो आप? इसमें क्षमा वाली बात कहा से आ गई. जब घर का काम बेटे ने करना है तोह मेरी जिम्मवारी है. स्कूल की फ़िक्र मत करो, आपका बीटा इस साल की पढाई पहले हे किये बैठा है. बस वह पापा को आप बोल देना.", अर्जुन की बात ख़तम भी नई हुई थी की मौसी ने फ़ोन शंकर जी की तरफ कर दिए.

"हाँ बीटा. जैसा मौसी कह रही है तेरी वैसे हे करना. और अपनी दादी से पैसे लेकर fal-mithai के साथ हे मंजू, उसके पति और ननद के लिए एक जोड़ी कपडे लेते जाना. अगर संजीव उधर हे है तोह वह मार्किट चला जायेगा."

"नहीं मैं कर लूंगा पापा. भैया बहार है लेकिन मुझे पता है दूकान का."

"ठीक है. ले मौसी से घर का पता पूछ ले. और मैं भी यहाँ से कल हे निकलूंगा लेकिन तुझे परसो वापिस जाना पड़ेगा क्योंकि कल हे मंजू का पति ड्यूटी चला जायेगा तोह लेने नहीं आ सकता.", शंकर जी ने अपनी बात उसको बता दी. दलीप जी मन भी कर रहे थे mithai-kapdo के लिए लेकिन शंकर जी ने हाथ के इशारे से उन्हें चुप करा दिए.

"हाँ बीटा ये पता लिख ले...", और पता सुनते हे अर्जुन के कान गरम हो गए. ये तोह मेनका का घर है. तोह मंजू हे उसकी छोटी भाभी है. अर्जुन को ऐसे चुप देख सरोज जी ने hello hello कहा तोह वह होश में आया.

"हाँ मौसी. वह मैं लिखने लगा था. ठीक है मैं चला जाऊंगा और कल वही आ भी जाऊंगा. लेकिन मैं बस से नहीं आने वाला. मोटरसाइकिल पे हे आऊंगा.", अर्जुन ने जैसे यही शर्त लगा दी थी और सरोज जी भी उसकी बात पर मुस्कुरा दी.

"तू बीटा मोटरसाइकिल पे आ या जहाज पे. कोई कुछ नहीं कहने वाला. फिर तेरी पसंद का खाना बना कर रखूंगी. और उस नकचढ़ी को समझा डीओ के अब अपने गुस्से पर काबू रखे थोड़ा. पराये घर में रहना है साडी जिंदगी."

"ठीक है मौसी. रखता हु."

"तोह हो गया समाधान साली साहिबा? देख लो इतने बचे करने का फायदा. मैं तोह दलीप को अभी भी कहता रहता हु के उम्र है और अब तोह दोनों हे खली हो.", शंकर जी की ऐसी बात पर सभी ने ठहाका लगा दिए. ग़मगीन माहौल अब बेहतर हो गया था जिसमे सरोज जी और रेखा जी के चेहरे पर शर्म आ चुकी थी.

"आप नहीं सुधरने वाले डॉक्टर ji.",Saroj जी इतना कहने के बाद सर झुका कर बैठ गई.

"अब भाई शंकर जी ने तोह मुझे कह दिए के वह कोशिश करने वाले है तोह मुझे भी कोई बुराई नजर नहीं आती ऐसा हे करने में.", दलीप जी की बात पर कमरे में मौजूद तीनो महिलाये उठ कर बहार चल दी.

"शाम को घर आ जाना यार दलीप. बहोत समय हो गया खेत में बैठ कर नहीं पी. इस बहाने ठरकी को भी देख आएंगे.", उनका मतलब अपने सबसे छोटे ससुर से था और दलीप जी ने भी गले मिलने के बाद आने की है भर दी.

.

.

"क्या कह रही थी सरोज?", दादी ने पुछा तोह अर्जुन ने सब बात विस्तार से बता दी.

"ये तोह बहुत ाची बात है बीटा. चल तू भी इस बहाने सीख लेगा. कल को इस घर में भी लड़कियों की शादी होनी है. देख 4 बजने वाले है तोह तुझे मैं पैसे देती हु और सामान बता देती हु जो जितना लेके जाना है.", अर्जुन को समझती हुई वह स्टोर में राखी अलमारी की तरफ चल दी.

अर्जुन खड़ा परेशां हो रहा था के ये सब कैसे हो रहा है और मंजू की शादी भी वही होनी थी. शाम को मेनका के घर कहा वह दावत पे जाने वाला था अब वह उस घर में लड़के के साले की हैसियत से जा रहा था. तभी अन्नू का ध्यान आया. "उसके हे घर चलता हु यहाँ से तैयार हो कर.", इतना सोचते हे वह दादी को सब बताने के बाद कोमल दीदी के पास चल दिए.

"दीदी, वह माँ का फ़ोन आया था और उन्होंने ये कहा है. मैं तैयार हो कर बाजार से वही चला जाऊंगा. और उनके घर जा कर फ़ोन भी कर दूंगा अगर कोई काम पड़े तोह. Papa-mummy कल आएंगे लेकिन मैं परसो सुबह जल्दी आ जाऊंगा.", कमरे में कोमल दीदी के साथ हे प्रिययन्का दीदी और ऋतू दीदी भी थी. जिन्होंने सब सुना था और सभी ने मंजूरी दे दी. अर्जुन 5 बजे अपने घर से तैयार हो कर एक जोड़ी कपडे बैग में दाल कर सीधा अन्नू के घर चल दिए.

.

.

"आंटी जी, अन्नू है?", घंटी बजाते हे अन्नू की माता जी अंदर का दरवाजा खोला तोह अर्जुन ने उन्हें नमस्ते करते हुए पुछा.

"पुत्तर अंदर आजा. बहार क्यों खड़ा है? अन्नू वि अंदर हे हैगी.", उनकी बात सुनते हे अर्जुन अंदर आ गया पीछे दरवाजा बंद करते हुए. ड्राइंग रूम में आते हे मुलाक़ात हुई नीली पगड़ी पहने हुए 6 फ़ीट लम्बे और लगभग 50 उम्र के सरदार जी से.

"जी, ऐ मुंडा अपनी अन्नू डा फ्रेंड है. पट ऐ ने अन्नू दे पापा.", अर्जुन उनके कहने से पहले हे नीचे झुक कर उनके पाँव छु चूका था. सरदारजी सेहतमंद और खुशमिजाज इंसान थे.

"ाचा जी. पुत्तर जी, शरीर चंगा बनाया होया तुस्सी तेह नाल पंजाबी वि बोल लेने हो. फेर कित्थे दे रेहान वाले हो.", आंटी जी अंदर चली गई थी अन्नू के कमरे में और इन्होने अर्जुन को अपने पास हे बिठा लिए था.

"जी अंकल जी. घर वच वड्डे सरे पंजाबी ज्यादा बोलदे ने. दादाजी वि पीछे पंजाब तोह हे ने. मैं नेड़े हे रेह्न्दा है जी, 2 गली छड्ड के.", अर्जुन ने ज्यादा खुल के नहीं बताया था परिवार के बारे में.

"अर्जुन.", अन्नू एक सफ़ेद पजामा और गुलाबी टीशर्ट पहने ऐसे हे बहार आ गई थी और अर्जुन को अपने हे घर में ऐसे बैठे देख थोड़ा हैरान भी.

"वह मेनका के घर जाना था तोह पहले गिफ्ट लेना भी जरुरी है सोच कर मैं आ गया था. मुझे तोह पता नहीं क्या देना चाहिए इसलिए.", अर्जुन को ऐसे थोड़ा हड़बड़ाते देख वालिए साहब हंस दिए.

"ओह पुत्तर जी ऐ कहो के तुस्सी डिनर तोह पहले अपने फ्रेंड न गिफ्ट देना है ते अन्नू नाल चले. पंजाबी मूंदे ेहड़ा शर्मन्दे नहीं.."

"जी मैं पंडत हाँ.", अर्जुन ने सकुचाते हुए कहा.

"पंडत. पट लगदा तह तू कित्थो वि नई पंडत है. कहंदा हां तह मैं लेना है. घर केहड़ा दास्य सी तुस्सी बीटा?", अब उन्होंने थोड़ी तफ्तीश करने का सोचा जब अर्जुन ने खुद को पंडित बताया.

"जी हं क्सक्स, रिटायर्ड सप पंडित रामेश्वर शर्मा जी का पौता हु.", इस बार अर्जुन ने साफ़ हिंदी में कमर सीढ़ी करते हुए कहा.

"बल्ले हु पुत्र. निम्मो, यह मुंडा तह अपने पंडत जी दे घर तोह आ. चंगा लगेया पुत्तर जी मिल के तुहाडे तोह. हूँ साहनु इजाजत दो, सहदे मित्र जी बहार बुला रहे ने chidi-chikka खेदन वास्ते. अगली वार आराम नाल गल्लां करेंगे.", बहार आँगन में आये एक व्यक्ति को देख कर वालिए जी भी अर्जुन के सर पर हाथ फेरते हुए उठ खड़े हुए. बिस्टेर पर रखा बैडमिंटन अपने साथ ले जाते हुए.

"लो बीटा जी, तुस्सी दूध पीयो िन्नी देर तक अन्नू वि आ जांदी है तैयार हो के.", आंटी जी ने बॉर्न्विटा वाला दूध अर्जुन के सामने रखते हुआ कहा और वह हैरानी से उनकी तरफ देखने लगा.

"ओह अन्नू ने दस्स्या मैनु की तुस्सी दूध हे पसंद करदे हो. ओह वि स्कूल जान तोह पहला तेह रात न बिस्टेर तोह पहला बॉर्न्विटा हे पींडी है. पता नई पट लेकिन तेरी उम्र वच तह पंजाब दे मूंदे कमल होये शराब दे मगर लग्गे रेह्न्दे है. वेख के चंगा लगेया के तेरे वर्गे मूंदे हुन्न वि हुन्दे ने.", बड़े स्नेह से उन्होंने हाथ फेरने के बाद अर्जुन की नजर उतरी. उनका भोलापन और साफ़ बेटे सुनकर अर्जुन को भी ाचा लगा और वह भी आराम से दूध पीने लगा. दूध ख़तम होने के साथ हे अन्नू भी तैयार हो कर आ कड़ी हुई. लेकिन उसको देखते हे अर्जुन का मुँह एक पल के लिए खुल्ला हे रह गया.

मोरपंख के रंग का बिना ब्याह का फ्रॉक वाला लम्बा कमीज और त्वचा से चिपकी सुर्ख नीली सलवार. सही तरीके बनाये खुल्ले बाल एक कंधे से सामने सीने से नीचे आते हुए, गीला काजल और आँखों के ऊपर हल्का नीला सा रंग. कान में मोरपंखी वाले तर से बंधे झुमके और हलकी लाल लाली होंठो पर. अर्जुन को ऐसे अपनी तरफ देखते प् कर अन्नू को भी थोड़ी शर्म आ गई.

"सोहनी तह यह कुड़ी शुरू तोह हे है. वेख हूँ ज्यादा लग रही है. मैं हमेशा केहन्दी रेहनी है के ेहड़ा हे तैयार रेया कर.", आंटी की आवाज सुनते हे अर्जुन नजरे झुकता खुद को हे समझने लगा के वह कैसे अन्नू को उसके घर में हे देखने लग गया था.

"अब उठो भी या मम्मी के हे पास बैठे रहोगे.?", अन्नू की बात सुनकर अर्जुन खड़ा होता अपने कुर्ते को ठीक करने लगा.

"चलो. ाचा आंटी जी, फेर मिलदे है.", उनके पाँव छूने लगा तोह आंटी जी ने उसको गले से लगा लिए, जो अर्जुन के लिए थोड़ा हैरानी वाली बात थी.

"बीटा आया करो. घर भी खुशाल दिखदा है. रब्ब तुहानू खुश रखे."

.

.

"आज अगर तुम्हारे mummy-papa के साथ 10 मिनट बैठ जाता तोह हमारा रिश्ता कर देते वह. और मैं भी कैसे आ गया बिना तुम्हे बताये.", अर्जुन अभी तक लम्बी सांसें ले रहा था और पीछे बैठी अन्नू उसकी बात सुनकर हंस रही थी. शीशे में उसकी दिलकश हंसी देख एक पल के लिए अर्जुन भी उसमे खो गया था.

"बहोत ज्यादा सुन्दर लग रही हो.", ये बात उसके मुँह से अपने आप हे निकल गई.

"तुमने घर पे हे बता दिए था.", फिर से हंसती वह बोली और अर्जुन को फिर याद आ गया के कैसे वह देख रहा था अन्नू को उसकी हे माताजी के सामने.

"सॉरी."

"अरे. मुझे ाचा लगा. सच कहु तोह पहली बार मुझे लगा के तुम वैसे मुझे देख रहे हो जैसे मैं चाहती हु. वैसे मेरे पापा क्या कह रहे थे.?"

"शुक्र करो उनके दोस्त आ गए. सोच के हे घबराहट हो रही थी. मतलब उन्हें ये पता चलता के मैं तुम्हारा स्टूडेंट हु तोह?"

"तोह कुछ नहीं. वह कहते की बेटी इन्तजार कर लेगी. हाहाहाहा.", अर्जुन बुरी तरह झेंप गया ये बात सुनते हे. दोनों जल्दी हे मार्किट आ गए थे और यहाँ भी हर नजर जैसे अन्नू को हे देख रही थी. समय बर्बाद न करते हुए अर्जुन ने फटाफट सुधीर से सामान लिए और फिर मिठाई की दूकान से 2 डब्बे बर्फी के.

"कपडे क्यों लिए सभी के लिए?", अन्नू हैरान थी अब.

"एक झंझट हो तोह बताऊ. चलोगी तोह खुद हे देख लेना.", अर्जुन वैसे हे अन्नू के लिए मेनका के घर की तरफ बढ़ गया. अन्नू ने भी एक ाचा गिफ्ट लिए था ladka-ladki के लिए. दोनों 8 बजे मेनका के घर के बहार खड़े थे और आज इधर एक चमचमाती कार भी कड़ी थी, अन्नू की पहले से कड़ी काइनेटिक के साथ. 2 बार घंटी बजने के बाद मेनका ने हे दरवजा खोला, जो खुद भी बानी संवरी थी लेकिन हलके रंग के परिधान और बिना ज्यादा saaj-sajja के.

"आओ अंदर आओ. तुम्हारी हे राह देख रही थी. और ये सब क्या उठा ले आये हो?", दोनों को अंदर लेकर आई मेनका के हाथो में सबकुछ पकड़ते हुए अर्जुन सोफे पर बैठ गया. घर जगमगा रहा था पूरा और अभी ये तीन हे लोग थे यहाँ पर.

"पता नहीं के ये ज्यादा है या काम.", अर्जुन देख रहा था के दोनों हे कमरे बंद थे और मेनका उनके सामने हे बैठ गई थी टेबल पर पानी रखने के बाद.

"वैसे दोनों एकसाथ आ रहे हो. अन्नू तू गाडी में भी आ सकती थी जो इसको स्पेशल लेने बुआलया.", मेनका की बात पर अन्नू ने अर्जुन की तरफ मुस्कुरा कर देखा तोह अर्जुन ने भी कुछ सोच कर अन्नू का सोफे की पुष्ट पर रखा हाथ पकड़ते हुए अपने हाथ में ले लिए. मेनका ये देखते हे एक पल में समझ गई.

"ओह तोह बात ऐसी है. तभी कहु के के अन्नू के सामने सबकुछ फीका नजर आ रहा है.", मेनका की बात पर अन्नू ने दूसरा हाथ भी अर्जुन के हाथ पर रखते हुए कहा.

"तुझे क्या लग रहा है के कैसी बात है?", मेनका जवाब देती उस से पहले हे बाए तरफ वाला कमरा जो खली रहता था उसका दरवाजा खोल कर ये व्यक्ति बहार आया. तक़रीबन 6 फ़ीट लम्बा, साधारण कसरती शरीर, छोटे फौजी स्टाइल बाल और वैसी हे चाल. हल्का रेशमी भूरा कुरता और सफ़ेद पजामा पहने हुए.

"ऋषभ, ये है मेरी सहेली अन्नू और ये..", मेनका अभी परिचय करवा हे रही थी. अन्नू और ऋषभ ने एक दूसरे को हाथ जोड़े नमस्ते किआ और अर्जुन ने झुकते हुए चरणस्पर्श कर दिए.

"नमस्ते जीजा जी.", मेनका हैरान सी कड़ी कभी अर्जुन को देखती कभी अपने भाई को जो अब अर्जुन के इतना कहते हे उसको गले लगा चूका था.

"तुम मंजू के भाई हो?", मेनका ने ये कहा और अर्जुन मुस्कुरा दिए.

"फ़ोन पर नाम नहीं बताया था क्या आपको मेनका जी? मेरी मौसी की बेटी की आप ननद है और इनका मैं साला.", मेनका का माथा ठनका जब याद आया के मंजू की माँ ने बताया था के अर्जुन वही रहता है और रात को वही आएगा.

"हे भगवन. मतलब तुम अब रिश्तेदार हो.?"

"पहले क्या था, दीदी?", ऋषभ के बैठ ते हे बाकी लोग भी बैठ गए. और उसके सवाल के जवाब में अन्नू बोली.

"आपकी आगे कितनी है?"

"जी 24.", ऋषभ ने अपनी बड़ी बहिन की तरफ एक बार देखने के बाद अन्नू से कहा.

"तोह भाई, ये है मेरा बॉयफ्रेंड और तुम्हारी दीदी इसलिए जानती है क्योंकि वह मेरी सहेली है. आगे इसलिए पूछी थी की पूरा बताऊ या नहीं. अब तुम हो बराबर के तोह मैंने साफ़ बताना ठीक समझा.", ऋषभ भी सर हिलाते हुए मुस्कुरा दिए.

"मतलब हमारे साले साहब तोह भाई पहुंचे हुए निकले. शरीर भी टकड़ा, पर्सनालिटी भी और अभी से गर्लफ्रेंड. बहुत खूब भाई. ाचा दीदी, जरा उन्हें भी बुला दो के भाई आया हुआ है. फिर हल्का नाश्ता लेते है और बातें करेंगे तबतक खाना भी तैयार हो जायेगा.", ऋषभ सिंह का स्वाभाव ठीक था लेकिन बोलने का तरीका बता रहा था के वह अंतर्मुखी स्वाभाव का थोड़ा शर्मीला व्यक्ति है.

मेनका थोड़ा चुप थी लेकिन अपने छोटे भाई की बात सुनते हे अपने कमरे का दरवाजा हलके से खटकने के बाद अंदर चली गई. यहाँ अर्जुन जैसे तैसे ऋषभ से बातें करके उसका मैं बेहला रहा था. साथ हे अन्नू को भी बातों में शामिल कर लेता. कोई 10 मिनट बाद मेनका दरवाजा खोल कर बहार आई तोह उसके साथ लाल जोड़े में लिपटी मंजू भी नजरे झुकाये आ गई. Laal-sunehari kameej-lehanga पहने वह सचमुच शहजादी लग रही थी. आधी कलाई तक लाल चूड़ियां और उनके आगे पीछे सोने के कंगन, गले में बारीक जंजीर में बंधा सोने का हर और kaale-sunahre मोतिओं वाला मंगलसूत्र. अर्जुन के साथ आज तीसरी बार हो रहा था जब वह ऐसे किसी की सुंदरता में खोया था. लेकिन जल्द हे खुद को संभालता वह खड़ा हुआ. मंजू की झुकी हुई नजरो ने ये सफ़ेद पठानी पायजामा देखा और धीरे धीरे नजरे ऊपर करती जब छाती तक पहुंची, उसके दिल की धड़कन भी तेज हो गई थी कल्पना करते हे की भगवन भी उसका साथ कैसे दे रहा है जो मुमकिन हे नहीं था वह हो रहा था.

"मंजू, भाई से तोह मिल लो अपने.", ऋषभ की आवाज खता होते हे मंजू अर्जुन की बाहों में जा लिपटी. न चाहते हुए भी आँखों से अश्रुधारा बहती उसके खूबसूरत गालो को भिगोने लगी.

"पगली चुप हो जा. जो तेरे चेहरे पर मेकअप लगा है न उस से मेरे सफ़ेद कुरता खराब हो जायेगा.", अर्जुन के दिल में मंजू की खास जगह थी. प्यार तोह दोनों को हे था लेकिन माहौल को देखते हुए उसने मजाक किआ तोह मंजू ने भी बिना ये देखे की वह कहा है अर्जुन की छाती पर हल्का सा मुक्का मार दिए.

"बहोत बुरे हो तुम.", एक बार फिर से गले लगने के बाद दोनों अलग हुए तोह मेनका ने इन bhai-behan का इतना प्यार देखने के बाद खुद हे उसका चेहरा प्यार से साफ़ किआ.

"इतना प्यार है दोनों में फिर भी ये तुम्हारी शादी में नहीं आया? और यहाँ आते हे देखो रुला दिए.", मेनका ने तल्खी से कहा जैसे वह मंजू का पक्ष ले रही हो और अर्जुन को दांत रही हो.

"दीदी, वह गर्लफ्रेंड नहीं जा सकती थी न. आप भी समझो.", मौके पर चौका लगाया ऋषभ ने. लेकिन तबतक खुद अन्नू ने मंजू की तरफ हाथ बढ़ा दिए था.

"Hello, I'm अन्नू. आपकी ननद और भाई की दोस्त.", अन्नू की बात पर मंजू ने भी हलके से हाथ मिलते हुए नजरे उठा कर देखा.

"प्लेअसुरे. I'm मंजू सिंह."

"बड़ी सुन्दर हो यार. और हाइट सच में किसी मॉडल जैसी है.", अन्नू की बात पर मंजू ने हलकी सी मुस्कान के साथ धन्यवाद किआ.

"आप कही ज्यादा सुन्दर हो.", ये अभी jaan-pehchaan कर रही थी की मेनका एक बड़ी ट्रे में ठंडा, टेल हुए काजू और मीठा ले कर आ गई. साथ हे ऋषब वह से खड़ा हो गया.

"दीदी एक बार जरा मैं घर और अकादमी फ़ोन कर लू. गाडी सुबह लेने आएगी तोह उसका पता भी करना.", और सामने से जवाब सुने बिना वह वापिस उस कमरे में चला गया जहा से पहले आया था, दरवाजा बंद करने के बाद. उधर अन्नू अब मंजू की बगल में बैठी बातें भी कर रही थी और उसके मेहंदी वाले हाथ बड़े ध्यान से देख रही थी.

"तू ये इतना कुछ क्यों लेके आया है?", मेनका अब वह सामान देखने लगी थी जो अर्जुन लाया था.

"दादी और माँ ने कहा था लेने के लिए. और दादी ने ये आपको देने के लिए दिए है.", अर्जुन ने गुलाबी कागज जेब से निकल कर मेनका की तरफ बढ़ा दिए जो अर्जुन के लाये कपडे देख रही थी, जो बता रहे थे की अर्जुन के परिवार के लिए मंजू कितने मायने रखती है.

"अब ये क्या है?", कागज खोलते हे उसमे लिपटी सोने की जंजीर देख कर मंजू थोड़ा गुस्से से अर्जुन को देखने लगी.

"ये खास आपके लिए है मेनका जी. दादी ने दी है क्योंकि अब आप यहाँ बड़ी है और वह शादी में आ नहीं पाई थी इसलिए. वापिस करने का ख़याल निकल दीजियेगा क्योंकि मैं मेरी दादी की हर बात पूरी करता हु.", अर्जुन की बात सुनते हे मेनका का चेहरा ठीक हो गया.

"लेकिन इस सबकी जरुरत नहीं थी."

"पता है लेकिन घर के बड़े प्यार से कुछ दे तोह मन नहीं करते. अब खाना बना लो नहीं तोह सरदारजी ने देरी से आने का पुछा तोह मैं फंस जाऊंगा. वैसे भी आज तोह bal-bal बचा हु", अपने पापा का जीकर सुनते हे अन्नू ने अर्जुन को घूर के देखा.

"सरदारजी?"

"ये मेरे पापा के लिए कह रहा है. आज वह भी मिले थे न जब ये बिना बताये घर आ गया था.", अन्नू की बात सुनते हे मेनका हंसने लगी.

"चल आजा अन्नू तू मेरे साथ रसोई में कड़ी हो और इन दोनों को बातें करने दे. मंजू को भी ाचा लगेगा.", अन्नू अर्जुन को नखरे से मुँह दिखती उधर की तरफ चली गई. और अर्जुन मंजू की बगल में आ बैठा. अब सिर्फ दोनों हे थे यहाँ हॉल में.

"तुमने पसंद किआ था ये?", अर्जुन से धीमी आवाज ने मंजू ने पुछा.

"हम्म्म. मेनका की छोटी भाभी के लिए. पता होता तुम्हारे लिए लेना है तोह नहीं लेता.", अर्जुन भी वैसे हे स्वर में बात कर रहा था. और मंजू ने नीचे से हे उसकी कमर पर चूंटी काट दी.

"मतलब?"

"मतलब तुम्हे भी तोह पता है?"

"भूल जाओ अब."

"आज तोह बिलकुल नहीं. साथ हे सोने वाला हु, खास कहा था मौसी ने की मंजू के साथ हे सोना.", अर्जुन की बात सुनते हे मंजू के शरीर में संगीत बजने लगा. खुद को संभाले वह आगे बात करने लगी.

"ये कौन है? और बड़ा चिपक के बैठी थी तुम्हारी बगल में."

"दोस्त है. लेकिन मेरी बात सुनो. कपडे नहीं बदलने.", अर्जुन ने इतना कहा तोह मंजू ने थोड़ा हलके हाथ से उसके हाथ पर मारा.

"ज्यादा मत सोचो तुम. पहली रात है यहाँ. अब रोज इधर हे हु मैं. स्टेडियम, तुम्हारे घर और यहाँ, जब मेरी ननद स्कूल होगी."

"वह बाद में देखेंगे. एक आज रात, फिर कल तुम्हारे घर गांव में और फिर सुबह अगर टाइम मिला तोह.", अर्जुन ने इतना कहने के साथ हे टेबल पर रखा शरबत अपने हाथो से मंजू के मुँह लगाया और वापिस नीचे रख दिए. इतनी देर में ऋषभ भी कमरे से निकल आया तोह अर्जुन भी उन दोनों को समय देने के हिसाब से बोलै.

"आप लोग तब तक थोड़ा छत्त पर हे घूम लो. मंजू ने तोह घर नहीं देखा होगा अभी.", ऋषभ को भी बात जांची तोह वह मंजू से जैसे चलने का आग्रह हे करने लगा और मंजू मैं में अर्जुन को कोसती उठ कड़ी हुई. ऋषभ आगे चलते हुए मंजू को रास्ता दिखता छत्त पर चला गया.

"आउच.", मेनका और अन्नू बातो में लगी थी और पीछे से अर्जुन ने हलके से हाथ फिर दिए अन्नू के मांसल नितम्भ पर. अचानक इस स्पर्श से वह उछाल पड़ी.

"तुम हो?", अन्नू अपने पास अर्जुन को खड़े देख मुस्कुरा दी.

"तुम दरी क्यों थी? क्या किआ इसने?", मेनका ने कुकर बंद करते हुए पुछा. वह भी अर्जुन के चेहरे को देख रही थी.

"ज्यादा हाथ चलने लगे है इसके.", अन्नू ने खुद हे अर्जुन की कमर में ब्याह डालते हुए कहा.

"तोह इसलिए मेरे भाई और मंजू को तुमने ऊपर भेजा है.?", काटी हुई सब्जियों का पानी सिंक में डालती मेनका थोड़ा इत्र के बोल रही थी.

"हाँ आपका भाई जितने दिखेगा उतने तोह मैं अन्नू को हाथ लगाने से रहा. ज़िन्दगी में क्या मायाजाल बना दिए है बताओ. कल तक मेनका दोस्त थी अब वह मौसी की लड़की की बड़ी ननद बन गई. इस घर में सुकून था लेकिन अब मंजू भी इधर और ऋषभ भी. अन्नू तोह कह रही थी यहाँ बैठेंगे अब अपने जीजा के सामने इसको देखु तोह बात दूर तक जाएगी. फसवा दिए मेनका जी आपने.", अर्जुन ने हलके से अन्नू की कमर पर हाथ फिरते हुए ध्यान रखा के मेनका की नजर न पड़े.

"और अन्नू को हाथ लगाना क्यों है? वैसे तेरे लिए मैं मेनका हे हु टेंशन मत ले. मंजू भी कॉलेज, स्टेडियम में बिजी रहेगी और ऋषभ महीने में 2 दिन के लिए आया करेगा. त्राणिनिंग से छुट्टी नहीं मिलती. देख लिओ जितना देखना है अन्नू को फिर. या अभी भेज दू कमरे में अगर ज्यादा आग लगी है तोह.?", मेनका की बात पर बाकी दोनों हंसने लगे.

"ाची लगती हो जब ऐसे बोलती हो."

"अर्जुन ठीक कह रहा है. मैं भी बोर होने लगी थी यार तुम्हारे भाई के सामने.", अन्नू की बात पर मेनका भी हंस दी. तीनो अगले 25-30 मिनट बातें करते रहे और मेनका ने खाना तैयार कर लिए था. उन्हें बता कर वह अपने भाई को बुलाने निकली हे थी की अन्नू ने अर्जुन को बाँहों में कस्ते हुए अपने होंठ उसके होंठो से मिला दिए. वो भी जैसे तैयार था लेकिन दोनों ने ध्यान नहीं दिए के मेनका अभी निकली नहीं थी.

"शाम से पागल किये हुए हो.", खुद हे अर्जुन का एक हाथ अपनी कमर पे रखती वह इतना बोल कर फिर से उसके होंठो से जा चिपकी. अर्जुन भी इस पल का मजा लेता दूसरे हाथ से अन्नू का एक गोलाकार भरी नितम्भ कपड़ो पे से दबाता आँखें बंद किये होंठो की लाली पीने लगा. धीरे धीरे हाथ अन्नू का पूरा भूगोल नापने लगे और दिवार से लगी अन्नू अब अर्जुन का सर अपने सीने पर चिपकाये बस मुँह बंद किये अर्जुन का स्पर्श भीतर तक महसूस कर रही थी.

मेनका ने ऐसा दृश्य नहीं देखा था. कपड़ो के ऊपर से हे दोनों कैसे एक दूसरे को चूम रहे थे, सेहला रहे थे. अगर वह सच में कमरे के अंदर होते तोह काम का एक दूसरे को कपड़ो से आजाद कर चुके होते. अपनी जांघो के बीच हलचल महसूस करते हे मेनका की सांसें उखाड़ने लगी. वही अर्जुन थोड़ा सय्यम रखता अब प्यार से सिर्फ होंठो पर चुम्बन कर रहा था.

3-4 मिनट बाद हलकी आवाज से दोनों अलग हुए और खुद को दुरुस्त करने लगे. ये आवाज ऊपर वाला दरवाजा बंद होने की थी. अन्नू शर्माती हुई फ्रिज से पानी निकलने लगी और अर्जुन वह से निकल कर सोफे पर आ गया.

.

.

मेनका और अन्नू टेबल पर खाना लगाने लगी तोह अर्जुन ने घर फ़ोन करने का कहा.

"हाँ कमरे में चले जाओ उधर. और नंबर..", मेनका नंबर बताती अर्जुन उस से पहले अंदर जा चूका था.

"बिना नंबर पूछे वह घर पे नंबर कैसे बताएगा? बड़ी जल्दी रहती है?", मेनका ने इतना कहा और फिर से काम में लग गई और थोड़ी देर में सभी अपनी अपनी जगह बैठे थे. अर्जुन कमरे से बहार आ गया बात करके.

"हमारा नंबर पता भी है जो घर बता सकते?", मेनका की बात पर मुस्कुराता वह टेबल पर रखे कपडे से हाथ पांच कर बैठ गया.

"पुलिस अफसर का घर है मेनका जी. कॉल करते हे पहले नंबर दीखता है वह.", अब ऋषभ ने नजरे अर्जुन की तरफ की ये सुनते हे.

"पुलिस? भाई मैं भी पुलिस अकादमी में हे हु. तुम्हारे घर में कौन है पुलिस में?"

"मेरे दादा जी सप रिटायर्ड है जी, पंडित रामेश्वर शर्मा.", अर्जुन ने खुद हे अन्नू की प्लेट में सब्जी डालते हुए जवाब दिए. अन्नू भी उसके लिए प्लेट लगा रही थी.

"ये नाम मैंने कई बार सुना है अकादमी में हमारे सीनियर्स के मुँह से.", ऋषभ दिमाग पर जोर दाल रहा था इस नाम को सोचते हुए.

"छोटा मुँह और बड़ी बात. मेरे भैया कहते है के हरयाणा पुलिस में कोई भी व्यक्ति 10 साल से है वह इस नाम और व्यक्ति से वाकिफ है. वैसे तोह मेरे मां जी भी शो हो यूनिवर्सिटी के पास वाले थाने में.", अर्जुन ने बेआवाज बैठी मंजू की प्लेट भी लगते हुए उसके सामने रख दी. मेनका देख रही थी की वह बातें करते हुए हे अगली प्लेट में खाना डालने लगा. जब तक वह उसको टोकती अर्जुन ने ऋषभ की प्लेट में भी सब्जी, रायता, पुलाव डालने के बाद उसके सामने कर दी थी.

"थैंक यू. बड़ी ाची बात है यार के फॅमिली में इतने रसूख वाले अफसर है. मैं ट्रेनिंग करके ऐसी लगूंगा और वैसे तुम्हारा क्या प्लान है?"

"जब ट्रेनिंग होने हे लगी है तोह आप ऐसी हो हे गए, बस पोस्टिंग मिल जाएगी. वैसे मेरा कुछ खास नहीं है प्लान. जो ठीक लगेगा वह कर लूंगा नहीं तोह फिर इस कुर्ते के ऊपर गमछा लिए खेतो में दिखेंगे हल चलते.", अर्जुन ने माहौल को हल्का करते हुए मजाक में कहा. उसकी बात पर सब मुस्कुरा दिए सिवाए ऋषभ के.

"मतलब कोई लक्ष्य नहीं है ज़िन्दगी में?"

"लक्ष्य. बड़ा छोटा सा शब्द है जी. लेकिन इसके बिना वजूद हे नहीं ज़िन्दगी का. मेरा एक हे लक्ष्य है के मेरा परिवार और मुझसे जुड़े लोग हमेशा खुश रहे, मुस्कुराते रहे. अगर उनपर कोई भी विपदा आये तोह उन्हें भनक लगने से पहले हे मैं वह दूर कर दू. बाकी न मुझे डॉक्टर ban-na है न वकील और पुलिस तोह कभी भी नहीं.", अर्जुन ने बात ख़तम करने के लहज़े में कहा और चम्मच उठाते हुए खाना शुरू किआ.

"अर्जुन नार्मल स्टूडेंट्स से अभी से हे 3 क्लास आगे चल रहा है ऋषभ जी और बॉक्सिंग की प्रोफेशनल ट्रेनिंग भी ले रहा. जितना मैं समझती हु स्पिरिचुअल और ह्यूमैनिटी की भी नॉलेज ज्यादा ाची है.", अन्नू की बात सुनकर ऋषभ ध्यान से इस दैत्याकार शरीर और मासूम चेहरे वाले को देखने लगा.

"मतलब भाई हम रुतबे और पैसे के लिए काम करने में लगे है और जनाब ज़िन्दगी के लिए.", ऋषभ ने भी बात बढ़ानी ठीक नहीं समझी और इतना कहते हुए वह भी खाने पर ध्यान देने लगा.

"वैसे मैं तोह ट्रेनिंग ले रहा हु, मंजू नेशनल प्लेयर है बास्केटबॉल की. और जितना मैंने देखा है ये बेस्ट है अपने गेम में.", मंजू का जीकर करते हे अन्नू नजर उठा कर उसकी तरफ हे देखने लगी.

"वाओ. मुझे लगा था के हाइट लम्बी है तोह कॉलेज टीम में होंगी. मतलब she's ा रियल नेशनल लेवल प्लेयर."

"हाँ अन्नू. मंजू ने शादी के लिए हाँ भी इसलिए की थी की अगले 3 साल कोई गेम बंद करने को नहीं कहेगा. और हमको दिक्कत भी नहीं है. मेरा रूटीन है, ऋषभ की भी ट्रेनिंग फिर पोस्टिंग. ाची बात ये है के मैं अकेली नहीं रहूंगी यहाँ.", ऐसे हे बातें करते सबने खाना ख़तम किआ और मुँह मीठा होने के बाद अन्नू ने मेनका और मंजू से गले लगते हुए जाने की इजाजत ली.

"मैं आता हु छोड़ कर.", अर्जुन ने भी टेबल से मोटरसाइकिल की चाबी उठाई तोह ऋषभ भी गेट तक बहार चला आया. मोटरसाइकिल पर नजर पड़ते हे मुँह से निकल गया.

"गाडी खतरनाक राखी है भाई."

"जी इसका नाम रानी है अब आप खुद हे सोच लो खतरनाक होना हे है.", अन्नू को बिठाने के बाद उसने कहा तोह दोनों हंस दिए. इधर अंदर फ़ोन की घंटी बज उठी.

.

.

"इतनी देर से साथ हैं लेकिन अपने लिए टाइम हे नई मिला.", अन्नू की आवाज में थोड़ी तड़प थी.

"फ्री होने दो इस झंझट से फिर निकलता हु हमारे लिए भी टाइम.", वह ये बात कह हे रहा था के अन्नू ने पीछे से हे उसकी गर्दन पर किश कर दिए.

"आजकल तोह ये लगता है के रात में आँखें खोलूंगी और तुम मेरे बीएड पर मेरे साथ मिलोगे.", अर्जुन उसकी बात सुनते हे मुस्कुरा उठा. हाथ बायीं जांघ पर रखता वह हलके हलके सहलाते हुए बोलै.

"पागल हो रही हो तुम. मुमकिन नहीं है ऐसा अभी. लेकिन ट्यूसडे को देखते है अगर किस्मत ने साथ दिए तोह."

"ट्यूसडे मम्मी शहर वाले गुरुद्वारा साहब जाएँगी शाम को पापा के साथ. 7 baje.",Annu ने भी पीछे से खुद को अर्जुन की पीठ से चिपका लिए. बहार अँधेरा था क्योंकि 10:30 बज चुके थे. ऐसे सुनसान सड़क पर वह बहार वाले रस्ते से हे उनकी गली से पहले ब्रेक लगते हुए पीछा मुदा और अन्नू के होंठो पर किश करने के बाद घर के सामने उतार कर चला गया.

वापिस घर आने में आधा हे समय लगा और मोटरसाइकिल अंदर कड़ी करने के बाद दरवाजा थपकते हे अर्जुन इन्तजार करने लगा किसी के आने का.

"खुल्ला हे तोह है. तुम आ सकते हो अंदर बिना इजाजत के.", मेनका ने हलकी मुस्कान के साथ अंदर आने का रास्ता दिए और दरवाजा कुण्डी से बंद करती सोफे पर बैठ गई.

"कोई नजर नहीं आ रहा है?", अर्जुन ने माहौल शांत देखते हुआ पुछा.

"मंजू अपने कमरे में है और भाई मेरे कमरे में. वही पे कार्डलेस पर बात कर रहा है ड्राइवर से. तुम्हारे घर से फ़ोन आया था और उसके बाद मंजू के पापा और तुम्हारे पापा का भी. तुम्हारी दादी जी ने कहा है के दादाजी का आदेश है बेटी उनके घर हे आएगी कल सुबह. और इस बात को स्वीकारते हुए तुम्हारे पापा ने फ़ोन किआ और उनके हे साथ मंजू के papa-mummy भी तुम्हारे घर आ रही है. मतलब अब सुबह मंजू को यहाँ से ले जाने के बाद तुम स्कूल आ रहे हो.", एक अदा से मेनका ने कहा तोह अर्जुन ने अनजाने में हे मेनका की कमर पर ऊँगली चला दी.

"बड़ी खुश हो मेरे स्कूल आने से. इरादा ठीक है न?", पूरे शरीर में एक झुरझुरी सी दौड़ गई थी मेनका के अर्जुन की इस शरारत से.

"मेरे इरादे वैसे हे है. अन्नू को सम्भालो तुम जो कही भी बेकाबू हो जाती है.", मेनका ने नखरे से कहा और वैसे हे 2 इंच दूर खिसक का अर्जुन को देखने लगी.

"मजा ले रही थी देख कर और फिर भाग गई. काम नहीं हो तुम भी कुछ लेकिन बोलोगी नहीं.", अर्जुन की बात सुनकर मेनका की नजरे झुक गई.

"अजीब सी आवाज सुनकर रुकी थी. मेरा ऐसा वैसा मतलब नहीं था. और कसूर अन्नू अकेली का नहीं था, तुम भी काम नहीं हो कुछ."

"अजीब सी आवाज. हम्म्म. सही बात है लेकिन देखने के बाद खड़े रहना? काम तो तुम भी नहीं हो.", अर्जुन की आवाज सच में शरारत से भरी थी और अब मेनका को शर्म आने लगी जब अर्जुन कुरुदने लगा अपनी बातों से.

"मैं चलती हु सुबह ऋषब को लेने गाडी 4 बजे आ जाएगी. 2 दिन से किसी की नींद पूरी नहीं हुई है. तुम भी जाओ मंजू के पास, सुबह बात करते है.", मेनका कड़ी होने लगी तोह अर्जुन ने हलके से हाथ थाम लिए और फिर छोड़ दिए. मेनका ृक्क कर उसको देखने लगी.

"मैं तुम्हे समझता हु. बातें करनी चाहिए तुम्हे अंदर रखने की जगह. जानती हो अन्नू को भी पता है के हमारा साथ कुछ समय या हद्द कुछ साल का है लेकिन वह खुश है क्योंकि ये वह चाहती थी. उसको कोई शिकायत नहीं है क्योंकि मैं उसके लिए टाइम निकल लेता हु या वह मेरे लिए. मेनका तुम तोह शायद उस दिन हे कहने लगी थी जिस दिन मैंने तुम्हे बस स्टैंड छोड़ा था. दोस्त है हम याद रखना. गूडनिघत.", अर्जुन उठकर कमरे में आ गया जो अभी खली था. मेनका बहार कड़ी उसकी बातों को याद कर रही थी. फिर आने वाले कल पर कुछ फैंसले छोड़ कर वह अपने कमरे में चली गई, बत्तियां बंद करने के बाद. ऋषभ गहरी नींद में 3:30 का अलार्म लगा के सो चूका था.

"बाथरूम में हो?", अर्जुन ने हलके से दरवाजा थपकाया तोह मंजू ने सिर्फ हाँ कहा. कमरा अंदर से बंद करने के बाद बड़ी लाइट भी बंद कर दी थी अर्जुन ने. बड़े बिस्टेर के किनारे दोनों तरफ लैंप जगमग थे. कुरता उतार कर दरवाजे के पीछे टांगने के बाद बनियान और पाजामे में हे वह बिस्टेर पर तकिये पर मुँह रख कर लेट गया. थोड़ी हे देर बाद दरवाजा खुला और मंजू दबे पाँव चलती अर्जुन के बराबर आती लिपट गई. अर्जुन ने चेहरा ऊपर किआ तोह मंजू ने अपने तपते होंठ उसके होंठो से मिला दिए. पलभर में हे अर्जुन का दिमाग शुन्य हो गया लेकिन जब आँखें खोल कर मंजू को देखने लगा तोह वह बिस्टेर के दूसरी तरफ घूंघट किये बैठी थी.
 
अपडेट 82

एक रात के बाद - एक रात से पहले (ी)


तनहा रात में बिस्टेर पर अकेली लेती मधु की आँखों से नींद जैसे कोसो दूर थी. सारा हे दिन आज उसने घर में परिवार के हे साथ बिताया था. माधुरी, प्रियंका के साथ कुछ लड़कियों वाली बातें, अपनी बड़ी भाभी ललिता की बेबाक हंसी ठिठोली और माँ कौशल्या के सान्निध्य में बचपन वाला वही ममतामई सुख. फिर भी इस पल में कुछ अधूरा था आज. ऋतू आज तारा को अपने साथ लेके प्रीती के घर चली गई थी और अब ऊपर के इस हिस्से में, कमरे में अकेली मधु.

रह रह कर उसका ध्यान न चाहते हुए भी अर्जुन की तरफ जा रहा था. हर बार दिल में अजीब uthal-puthal मच जाती जब वह उसके बारे में सोचने लगती. गॉड में लेता हुआ वह एक मासूम लगता था लेकिन जब भी मधु उसको दूर से देखती या बिना अर्जुन की जड़ में आये निहारती तोह वह ऐसा खिंचाव महसूस करती थी जैसे वही एक इंसान उसकी आत्मा और शरीर को सुकून पंहुचा सकता है. ऐसा खेल हे तोह आया था उसको जब पहली बार उसकी निगाह सोये हुए अर्जुन पर पड़ी थी. आज सुबह जो भी हुआ था वह दृश्य याद करते हे मधु को भी मालूम चला था के अर्जुन खुद भी एक खिंचाव महसूस करने लगा है.

"आने दो वापिस घर. बहोत सारे सवाल अभी बाकी है जिनके जवाब वही देगा. फिर देखती हु के मुझे खुद को रोकना है या वह इतना समझदार हो चूका है जो मेरे मैं और शरीर के वेग को सही दिशा दिखा सकता है."

.

.

दरवाजे पर टंगे कुर्ते की दूसरी तरफ की जेब से अर्जुन ने एक और गुलाबी कागज़ निकलने के बाद वापिस घूंघट लिए बैठी मंजू के सामने बैठते हुए उसमे से ये बारीक चैन निकाल कर मंजू की हथेली में रख दी.

"अब इजाजत हो तोह मुँह देख सकता हु?", मंजू ने मुट्ठी बंद कर ली थी अर्जुन की बात सुनते हे. और अर्जुन ने बड़े आराम से घूंघट को दोनों तरफ से ऊपर करते हुए मंजू के अलौकिक चेहरे को आँखों से सीधा दिल में क़ैद कर लिए. बंद आँखे जिनकी लम्बी पलके बेजोड़ थी. साफ़ मांग जिसमे सोने का टीका माथे की हद्द तक आ रहा था. होंठो पर वैसी हे लाली जैसी माथे पर बिंदिया लगी थी. इस समय गले में सिर्फ वही हार था जो फेरो के समय मंजू ने पहना हुआ था, कोई मंगलसूत्र नहीं. सीने की उठान के बाहरी भाग तक आती चोली में क़ैद उसके प्राकृतिक खूबसूरत उभार. पतली गुदाज कमर ऐसे बैठे होने की वजह से चिप्प सी गई थी. लम्बे चिकने हाथो पर लाल चूड़ियां और गहरी कठै मेहंदी. पाँव में नजर की काली डोर के साथ हे चांदी के पायजेब उन्हें एक नया आयाम दे रही थी. इस मंजू के सामने अर्जुन फिर से एक बार अपना दिल हार चूका था.

"पहले ये फिर जो चाहे कीजिये.", मंजू की लरजती आवाज को वह दिल तक महसूस कर रहा था. उसकी हथेली में रखा लाल सिंदूर और तुलसी की माला देख अर्जुन सिर्फ एक पल रुका और चुटकी से सिन्दूर लेते हुए टीके की षुरूअवत से मांग के कोर तक वह सिंदूर भर दिए. मंजू की झुकी आँखों में उतर आई थी लेकिन अर्जुन ने उसको देखने से पहले वह तुलसी की माला गले में पहनाने के बाद लैंप की हे बगल में रखा ऋषभ द्वारा पहनाया मंगलसूत्र भी गले में फिर से बांध दिए.

"मैं आत्मा से सिर्फ तुम्हारी रहूंगी और मुझ पर सैदेव तुम्हारा अधिकार रहेगा.", बाहोने में भरते हुए वह अर्जुन से लिपट चुकी थी. पूरी तरह से बंद इस कमरे में उनकी आवाज बस इतनी हे थी जो वह दोनों हे सुन्न सके. वैसे भी दोनों कमरों के बीच बने 2 बाथरूम पर्याप्त थे इस आवाज को यही तक सिमित रखने के लिए. अर्जुन भी कुछ क्षण उसको बाहों में लिए वैसे बैठा रहा. आज मंजू का यु उसके दिल से लगे होना जैसे अंदर तक अर्जुन के एक खली हिस्से को पूरा कर रहा था.

"मुझे मालूम है. मेरे दिल में भी तुम्हारा उतना हे स्थान है जितना तुम चाहती हो.", अर्जुन ने अब उसकी गोलाकार ठुड्डी को उँगलियों पर टिकते हुए प्यार से मंजू को देखा और दोनों पलकों पर चूम लिए.

"तोह हमारे प्यार की कहानी लिख दो मेरे रोम रोम पर अर्जुन. जिस से अगर कोई और मुझे हाथ लगाए भी तोह आत्मा को फरक न पड़े.", मंजू ने उसके दोनों गाल हाथ में लेते हुए जैसे निवेदन सा किआ और अर्जुन ने एक हाथ चूमते हुए बड़े प्यार से वह लाल चूड़ियां कलाई से उतारते हुए एक तरफ रख दी. मंजू अपलक उसको ऐसा करते निहार रही थी. समय हर तरफ जैसे रुक गया. दोनों हाथ में सिर्फ ek-ek कंगन छोड़ कर अर्जुन ने मंजू को अपने सीने से लगते हुए गले के पास होंठ लगा दिए. पूरा जिस्म गुलाब सा महकता अर्जुन की साँसों में सामने लगा.

"सिर्फ दिल का शोरे हे बहोत है आज. इनका नहीं.", गले में बंधा हार भी अब चूड़ियों के साथ पड़ा था. मंजू के शरीर में अर्जुन का हर स्पर्श जैसे प्यार की बारिश सा करता एक सुकून देने लगा. कूल्हों के नीचे हथेलिया लगते हुए अर्जुन ने किसी नाजुक फूल की तरह मंजू को अपनी गॉड में बिठा लिए.

"उम्म्म..", उरोजों की घाटी में गीला चुम्बन होते हे मंजू की गर्दन पीच हो गई. दोनों उभार और भी बहार को निकलते अर्जुन को जैसे मिलने के लिए बेक़रार होने लगे. ब्लाउज की तान्निया पीठ से कब खुली ये तोह पता न चला लेकिन एक मदद्भरी आवाज मंजू के मुँह से निकल गई.

"आह्ह्ह्ह... िसष्ठ.", निप्पल तक वह वस्त्र नीचे ढलक आया और बाएं नास्त्र से चूचक को होंठ में भरते हुए अर्जुन ने प्यार से होंठो में दबा लिए. मंजू इस सुखद एहसास से भर्ती हुई नीचे गिरने लगी और अर्जुन ने भी वह खूबसूरत चेहरे तकिये पर रखते हुए कुछ पल ध्यान से देखा.

"तुम हमेशा से हे खूबसूरत हो मंजू, लेकिन आज जैसे ये रूप कोई शब्द बयान नहीं कर सकता.", मुस्कुराती मंजू ने उसको अपने ऊपर खींच लिए. दोनों उभार पंजे में भरते हुए वह बड़े हौले हौले उन्हें दबाता, चूचक उमेठता हुआ मंजू के मुँह के भीतर का रास किसी भँवरे की तरह पीने लगा. लेहंगा अभी भी बीच में आ रहा था लेकिन इस क्षण उन्हें इसकी चिंता नहीं थी. मंजू भी अपने दिल के अधिकारी की बाहों में लिपटी भरपूर साथ देती अर्जुन के मुँह के भीतर तक जीभ चला रही थी.

"एक बार समां जाओ न?", मंजू के ऐसे आग्रह पर अर्जुन ने मुस्कुराते हुए ना में सर हिलाया और खुद को ऊपर उठाते हुए उसकी पतली कमर और बीच में गोल नाभि को देखने लगा.

"उम्म्म्म.. आह्ह्ह्ह.", गरम स्पर्श नाभि पे होते हे उसकी टाँगे ऊपर उठने लगी और साथ हे अर्जुन ने आहिस्ता से वह भरी लेहंगा जिस्म से जुड़ा कर दिए. कुछ समय बाद एक बार फिर अर्जुन इस अप्सरा के ऊपर पूरी तरह से चाय हुआ था, निर्वस्त्र.

"अभी आधे से ज्यादा भाग पड़ा है जहा मैंने अपना प्यार नहीं दिखाया.", अर्जुन ने उस हीरानी की आँखों में देखते हुए कहा और मुँह बिस्टेर की तरफ पलट दिए. शरीर पर रोयें खड़े होने लगे थे मंजू के. किसी घोंघे (स्नैल) की रफ़्तार से अर्जुन पूरी पीठ चूमता हुआ बिस्टेर में धंसे दोनों कठोर चुचो का मर्दन भी बखूबी किये जा रहा था. बेपर्दा उन्नत और मुलायम कूल्हों पर चूमता हुआ वह नीचे जाने लगा लेकिन मंजू ने खुद को वापिस सीधा कर लिए.

"अब और नहीं.", लेकिन इस बात को अनसुना करते हुए अर्जुन ने अपने होंठ फिर से नीचे झुकाते हुए जांघो के ठीक बीच में उस पहले हुए नाजुक हिस्से को मुँह में भर लिए. नरम छूट की फांको के बीच की खाई से हर कटरा चूसता अर्जुन अब मंजू को वास्तविक सुख का एहसास करने लगा.

"आअह्ह्ह.. िष्ठ.. अर्जुन.. उम्म्म.. मर्डर जाउंगी मैं...", उसके सर को सहलाती मंजू को इतने में चरमसुख मिलने लगा. जब अर्जुन ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा तोह शर्म से मंजू ने नजरे घुमा ली.

"गंदे हो तुम. बहोत गंदे.", मंजू की शर्मीली मुस्कान कुछ अलग कह रही थी. अर्जुन ने उसकी हथेली में अपना अंग पकड़ते हुए मुँह के पास सरगोशी सी की.

"इसके बारे में क्या ख़याल है? ये भी गन्दा है?"

"ये मेरा है.", अर्जुन के होंठो को चूमती वह अपनी जाँघे फैलाती खुद हे वह टमाटर सा सूपड़ा अपनी छूट की लकीफ पर फिरने लगी.

"करो.", छेड़ पर सूपड़ा थामे मंजू ने अर्जुन से कहा और उसकी बात मानते हुए अर्जुन ने भी इस jaani-pehchani गली में उसका आशिक उतार दिए.

"आह्हः माँ.. आराम से. ये अलग कसरत करने लगा है क्या? माँ.. आठ..", हवा में उठी टाँगे अर्जुन के कूल्हों पर चिपक गई जब उसका अकड़ा हुआ लुंड एक बार में हे आधा छूट के अंदर जा घुसा. मंजू इसकी ताक़त से अनजान न थी लेकिन आज ये ज्यादा हे बड़ा महसूस हो रहा था.

"कसरत अभी शुरू हुई है.", अर्जुन ने आधे हे लुंड से बिना आराम दिए मंजू की छूट ढीली करनी शुरू करते हुए कहा. कूल्हों को दबाता वह उस गीली गहराई में हर धक्के के बाद थोड़ा आगे जा रहा था. हलकी सिसकियाँ और दोनों के जिस्म की गर्मी.

"आह.. अर्जुन.. थोड़ा आराम से.. आठ.. ाचा लग रहा है. उम्म्म.", कभी उसकी पीठ पर नाख़ून चुबती तोह कभी होंटो को काटने लगती. अर्जुन भी अब छूट के अंतिम सिरे तक ताबड़तोड़ धक्के लगते हुए मुठी में भरा कभी एक दूध पीटा कही हवा में उठे कूल्हों के बीच की खाई में उंगलिया धंसते हुए दोनों कूल्हों को पकड़ कर जड़ तक छूट की गहराई नापने लगता. वह मुलायम कोरी छूट बड़े रबर की तरह फैली लुंड को पूरा निगल रही थी.

"उम्म्म.. मंजू.. गॉड में आ जाओ.", होंठो को चूमने के बाद अर्जुन ने उसको ऊपर आने का कहा. वह बेशक शादी ऋषभ से कर चुकी थी लेकिन पति का अधिकार खुद मंजू ने अर्जुन को दिए था. अपनी पहली रात में यही तोह उसका सबकुछ था. और अर्जुन की बात मानती वह अलग हुई तोह मुँह से हलकी कराह के साथ सिसकी भी निकल गई. हलकी रौशनी में वह ढाई इंच लम्बा माध्यम टमाटर सो सूपड़ा मंजू को उतना हे अनमोल लग रहा था जितनी ये रात उसके लिए थी. अर्जुन की भरपूर चौड़ी छाती पर हाथ रखती वह धीरे से उस सुपडे को छूट के मुहाने रखती नीचे बैठती चली गई.

"आह.. ये बड़ा हो गया है.", इस जगह से न अर्जुन को अपना लुंड दिख रहा था और न मंजू की छूट की लम्बी फांके. गहरी साँसें लेती मंजू के दोनों गुदाज चुके जैसे कांप रहे थे. थोड़ा ऊपर होती वह खुदसे हे एक सतांन अर्जुन के मुँह में देती इस सफर को बढ़ने लगी.

"उम्म्म.. aahhh...Arjun.. आराम से पीयो.. उम्", अर्जुन भी नीचे होती मंजू के साथ हे धक्के लगा रहा, एक दूध चुसकते हुए. इतना कामुक दृश्य था ये जिसमे दोनों जैसे बने हे एक दूसरे के लिए हो. मंजू हे तोह थी जो अर्जुन के सांप को अपने पिटारे में बंद कर लेती थी, बेशक जगह एक रत्ती ज्यादा न थी अगर ये कुछ बड़ा होता तोह. अब धक्को के साथ हे दोनों की खास चिकनाई की वजह से हर धक्के पर fach-fach की आवाज होने लगी थी.

"मैं गई.. आठ..", मंजू का सर बेशक लुढ़क गया था इस चरमसुख की अनुभति से लेकिन अपने कूल्हे वह बदस्तर एक खास अदा से लुंड पर चलती कभी वह सुपडे को कस लेती कभी पूरा अंदर भर लेती. बाँहों में मंजू को भरे हुए हे अर्जुन ने अपने बराबर लिटा लिए. अब वह धीमे धीमे गहरे धक्के देता हुआ उसके शरीर को भी आराम दे रहा था. ऊपर वाली टांग मंजू ने अर्जुन की जांघ पर रखते हुए सुरंग में बेधड़क aane-jaane में आसानी कर दी. शरीर रगड़ खाते हुए और गरम होने लगे थे और मंजू की सिसकियाँ इस मुद्रा में कही ज्यादा हे निकलने लगी. हर बार लुंड छूट के बहरी होंठो पर रगड़ मारता अंदर जा रहा था. वह भी जुनूनी हद्द तक उसके गले, छाती और चेहरे को चूमती हुई फिर उस मुकाम तक उड़ती चली आई जहा अर्जुन 2 बार पहले हे उसको ले जा चूका था इस रात में.

"हँ.. उम्.. aah..",Arjun की धीमी गुर्राहट इशारा थी की उसका भी समय निकट आ चूका है. सूपड़ा जब पूरी तरह से फटने की हालत में आ गया तोह मंजू ने भी जाँघे कस्ते हुए उसको अंदर हे दबा लिए.

"आठ.. ऊपर आ जाओ.. मुझे ये अंदर चाहिए.. उम्.. ", अर्जुन ने भी आधी करवट लेते हुए खुद को मंजू के ऊपर कर लिए. गरम लावा जब अन्दर भरने लगा तोह मंजू जैसे स्वर्ग पहुंच गई थी. उसकी आहें बता रही थी की वह इस purna-milan से कितनी खुश थी. और आज उसकी ख्वाहिश भी पूरी हुई जो वह चाहती थी. कितनी हेर देर वह कूल्हे हवा में उठाये अर्जुन के नीचे दबी रही. दोनों अभी भी एक दूसरे का जिस्म सहलाते हुए मीठे चुम्बन कर रहे थे. जैसे सम्भोग तोह बस एक हिस्सा भर था उनके लिए. कोई आधे घंटे बाद मंजू उठ कर बाथरूम चली गई. शरीर साफ़ करने के बाद कपडे और सामान सही करती वह पूरा कमरा ठीक होने के बाद फिर से अर्जुन की बाहों में आ लेती. वह भी जाग रहा था और मंजू को बाहों में भरे फिर से उसके जिस्म को सहलाने लगा.

3 बजे तक मंजू की छूट के अंदर अर्जुन 3 बार खाली हो चूका था. अब दोनों हे कपडे पहने एक दूसरे की बाहों में चिपक कर सो चुके थे. मंजू इस रात शायद एक और बार कर लेती लेकिन अर्जुन हे पीछे हट गया था. मंजू की छूट इस से ज्यादा सूज जाती तोह वह पहली हे सुबह संदेह के घेरे में आ जाने वाली थी. लेकिन वह हद्द से ज्यादा खुश थी क्योंकि अर्जुन ने पिछले 4 घंटे में एक पल भी खुद को जुड़ा नहीं किआ था मंजू के जिस्म से. हर बार उसने मंजू की कोख में अपना अंश भरा था. मंजू को बस एक दुःख था जो वह अर्जुन से न कह पाई थी. उसको मालूम था के अर्जुन बुरा नहीं मानेगा लेकिन वह बताना नहीं चाहती थी की यहाँ घर आने के बाद उसके शरीर को ऋषभ ने अपवित्र किआ था और कुछ सोच कर मंजू ने वह होने भी दिए. बाद में ऋषभ हे था जो झेंपते हुए कमरे से चला गया था मंजू के अंदर 1 मिनट में हे खली होने के बाद.

अब उसको सुकून था और दिल हल्का. जिस से प्यार था वही उसके साथ सुहाग की पहली रात में था और ये रात उसकी सोच से भी कही बेहतर रही थी. नींद में भी मंजू का हाथ छूट पर हे जा रहा था. कैसे अर्जुन के प्यार से निहाल हुई वह अब फूल का कुप्पा हो चुकी थी. 3:30 के अलार्म का इन दोनों पर जैसे कोई प्रभाव हे न पड़ा और 4 बजे ऋषभ ने हलकी सी दस्तक दी तब भी कोई जवाब न मिलने पर वह सोया जान कर निकल लिए अपनी ट्रेनिंग पर, घर अर्जुन के हवाले करता हुआ. मेनका भी अपने भाई को भेज कर दूसरे कमरे में सो चुकी थी ये अकेलापन ख़तम करने के सपने लेती हुई.

.

.

6 बजे थे और शंकर जी की गाडी में सामान रखते हुए दलीप सिंह अगली सीट पर उनके बराबर बैठ गए. उन्होंने बहोत कहा था के वह अपनी गाडी ले चलते है लेकिन शंकर जी के सामने उनकी कोई बात न चली. पिछली सीट पर दोनों महिलाये बैठ गई तोह खली सड़क पर कार अपनी रफ़्तार में चलती शंकर जी के घर की और निकल चली. उन्हें भी अपने पिता की बात जान कर ाचा लगा था के वह मंजू को पराया नहीं मान रहे थे. और इस बहाने हे घर में थोड़ी चहल पहल भी होगी और सबको ाचा लगेगा.

.

.

अर्जुन 6 बजे छत्त से नीचे आया तोह मेनका भी उठ चुकी थी. वह तैयार होने लगी थी अर्जुन को सोया जान कर लेकिन रसोईघर में इतनी सुबह मंजू को दूध गरम करते देख जल्दी से उधर आ गई.

"मंजू, इतनी सुबह क्यों मेरे सर पाप चढाने लगी है मेरी बची. शादी के अगले हे दिन तेरी कलाई पर आंच नहीं लगने दूंगी मैं.", उसको एक तरफ करती वह चूल्हे के सामने कड़ी हुई तोह मंजू उन्हें मन करने लगी.

"दीदी, आपने भी तैयार होना है न स्कूल के लिए. मैं बस अर्जुन के लिए दूध गरम कर रही थी और आपका नाश्ता. आप अगर मुझे थोड़ा सा भी मानती है तोह प्लीज करने दीजिये.", अब मेनका के पास मंजू की ऐसी प्यारी बात का जवाब न था.

"बहोत चालक है तू. ऐसे कोई धर्मसंकट में डालता है क्या? दिल तुझे काम करने की इजाजत नहीं देता लेकिन जो तूने कह दिए उसको मन भी नहीं कर सकती. इस घर में तू मेरी छोटी बहिन है अब से न कोई भाभी. और ध्यान से करना काम. अर्जुन को मैं उठा देती हु.", वह वापिस बहार निकल कर जाने लगी तोह मंजू ने कहा.

"दीदी वह तोह एक घंटे से उठा हुआ है. अभी बाथरूम से आने वाला होगा नाहा कर.", मेनका रुक कर मंजू को देखने लगी और फिर नजर पड़ी सामने से आते अर्जुन पर. साफ़ आसमानी कमीज और गहरी नीली जीन्स पहने हुए वह बाल ठीक करता उधर हे सोफे पर आ बैठा.

"गुड मॉर्निंग मेनका जी. आशा करता हु के नींद आई होगी आपको रात में.", अर्जुन की बात सुनकर वह हंसती हुई बाथरूम में चली गई. दूध पीने के बाद अर्जुन वही बैठा दोनों के तैयार होने की प्रतीक्षा करने लगा, जिसमे वक़्त लग्न स्वाभाविक था. दोनों हे स्त्री जो थी. कोई पौने 7 बजे दोनों तैयार हो कर बहार आई तोह अर्जुन ने एक बार उन्हें देखा और फिर अखबार पढ़ने लगा.

"दीदी, आप भी चलिए हमारे साथ.", मंजू की बात सुनकर मेनका मुस्कुरा दी.

"तू ghar-fere पर चली है. मैं नहीं जो तेरे साथ चालू. लेकिन अगली बार तेरे साथ हे चलूंगी इस नालायक के घर. वैसे तू स्कूल नहीं जा रहा क्या?", मेनका की बात पर अर्जुन सर खुजाने लगा.

"आज न इसके अलावा भी मुझे जरुरी काम है थोड़ा. और अन्नू को मैंने बता दिए था पहले हे की अर्ज़ी दे देना वर्मा मैडम को. प्लान तोह बाद में बदला न इस घर जाने का फिर मैंने सोचा के स्कूल कल हे जाऊंगा मंजू को वापिस यहाँ छोड़ कर आपके साथ.", अर्जुन की बात पर मंजू के चेहरे पर मुस्कान आ गई थी शायद ये सोच कर की वह आज उसके आसपास हे रहेगा. उसको नहीं पता था के अर्जुन छुट्टी ले क्यों रहा है. मंजू ने सिर्फ चाय पी और अपनी ननद को नाश्ता करवाने के बाद तीनो हे घर से निकल लिए. अर्जुन के लाख मन करने के बावजूद मेनका ने शगुन के 1100-1100 दोनों को पकड़ते हुए घर की एक चाबी मंजू के हवाले कर दी.

"आप कैसे जाएँगी?", घर का अंदर का दरवाजा लगाती मेनका से अर्जुन ने पुछा तोह उसने कार की तरफ इशारा कर दिए.

"कार चलनी आती है?", अर्जुन ने हैरानी से पुछा तोह मेनका हंसने लगी.

"मेरे बड़े भैया ने जब ट्रेक्टर लिए था न तोह 16 की थी मैं जब उन्होंने मुझे सीखा दिए था. फिर गाडी भी सीख ली थी लेकिन ससुराल वालो ने साफ़ मन कर दिए था के लड़की होक गाडी चलाएगी तोह लोग क्या कहेंगे, बिरादरी क्या कहेगी. अब न यहाँ ससुराल और न बिरादरी. वैसे मंजू की टवस स्कूटी भी आ जाएगी आज शाम तक तोह कल से अगर ये स्टेडियम जाना चाहे तोह एक बार रास्ता समझा देना तुम.", अर्जुन हाँ में गर्दन हिलता मोटरसाइकिल बहार निकलने लगा.

"ाचा, तोह क्या मुझे गाडी सीखा डौगी?", अर्जुन ने मोटरसाइकिल स्टार्ट करते हुए कहा. उसके ऐसे पूछने पर मेनका की हंसी चूत गई.

"लड़की से गाडी सीखोगे?"

"तोह क्या हुआ? तुम्हे आती है तोह सीखा सकती हो. मुझे मोटरसाइकिल आता है कहो तोह मैं ये आपको सीखा दूंगा.", अर्जुन के पीछे मंजू उनकी बातें सुनती मुस्कुरा रही थी. फिर उनके हे साथ मेनका भी निकल चली, बहार वाले रस्ते से. अर्जुन अपने घर की तरफ जाते गली वाले से.

.

.

अर्जुन के घर पहुंचने से पहले हे शंकर जी की गाडी आ गई थी. दलीप जी को साथ लिए शंकर जी बैठक में चले गए और सरोज को अपने साथ लेती रेखाजी घर के अंदर वाले भाग में. संजीव भैया भी वापिस आ चुके थे जो सबसे पहले इन दोनों से मिले और अपने चाचा के पीछे बैठक में चल दिए.

"आ भी दलीप सिंह, तूने तोह भाई अपने बाप सामान व्यक्ति का तिरस्कार कर दिए. एक बार न सोचा के ये तेरा अपना घर है भाई. कुन्दनलाल भाई साहब के फ़ोन से पता लगा के क्या हो रहा है.", पंडित जी ने गले मिलने के बाद शिकायत का पिटारा खोल दिए और शंकर जी अपने पिता की बातें सुनते एक तरफ सोफे पर पसरे मुस्कुरा रहे थे.

"बाबा, आपसे हमे कैसी शिकायत हो सकती है. आपने हे पिताजी के जाने के बाद घर संभाला. और तिरस्कार की बात मत कीजिये, सपने में भी नहीं सोच सकता ऐसा मैं. आपकी हे बची है वह और अगर रिश्तेदारों के घर वह समस्या न हुई होती तोह आप खुद जानते है के दलीप शादी का निमंत्रण गणेश जी को बाद में देगा आपको पहले. फिर भी शंकर भाई से पहले मैंने आपको हे आने का आग्रह किआ था लेकिन आपने हॉस्पिटल वाली बात कहके फिर आने का बोलै तोह मैं भी मान गया था.", दलीप सिंह हाथ जोड़े उनके पास हे दीवान पर बैठा था. जो बता रहा था के उनके परिवार के लिए इस इंसान के मायने अलग है और ख़ास भी.

"एहसान तोह हमारे सर पर स्वर्गीय मेवा सिंह जी का है बीटा. हमने कोई एहसान नहीं किआ और फिर उन्होंने हे मिलवाया था सोहनलाल जी के परिवार से जहा आज शंकर की ससुराल है. बस मेरी शिकायत यही है की अगर बेटी ब्याह करके अपने हे शहर आई तोह उसका इस घर में हे फेरा डालना चाहिए, अगर तुम अभी भी हमे घर का बुजुर्ग और इस घर को अपना घर मानते हो.", रामेश्वर जी के इस अपनेपन का जवाब तोह दलीप नहीं दे पाया बस सर झुकाये कुछ पल बैठा रहा.

"पापा, आपका लाडला नहीं आया अभी तक?", शंकर जी ने जानकारी लेने के हिसाब से कहा.

"उसकी मोटरसाइकिल की आवाज सुनाई नहीं दी मतलब के नहीं आया. वह भी चरखा हे है पूरा जो बिना काम अँधेरे में हे घूमने चला जायेगा और जब कहो के जल्दी घर आना है तोह उस दिन जरूर देरी करेगा.", बात ख़तम होते हे dug-dug की आवाज घर के अंदर सुनाई देने लगी.

"लो जी भगवन उम्र लम्बी रखे इस बचे की. आ गया जी आपका लाडला.", दलीप सिंह ने इतना कहा तोह रामेश्वर जी के साथ शंकर जी भी मुस्कुरा दिए. जिसका नाम ले रहे थे वह उस वक़्त हे आ चूका था.

"ओह यार तू तोह बड़ी सुन्दर लग रही है मंजू.", प्रीती बगीचे के पास हे कड़ी थी जब अर्जुन आया और उसके साथ मंजू को देख कर प्रीती भी हैरान हो गई.

"लग ऋ है न कमाल. सीधा फेरो से उठा लाया मैं इसको.", अर्जुन ने प्रीती से मजाक किआ था जो उसको अगले हे पल भरी पड़ गया.

"ओह पृथ्वीराज चौहान, चल अपनी बहिन को अंदर लेके आजा अब. फेरो से उठा के ले आया. चल प्रीती तू भी आजा अंदर ये बेवकूफ कुछ भी बोलता रहता है.", आरती का थाल लिए ऋतू दीदी ने अपनी दादी के साथ मंजू की नजर उतरी और एक तरफ कोने में खड़ा अर्जुन अब प्रीती की नजरो से खुद को बचा रहा था. सभी मंजू को अंदर ले गए तोह प्रीती ने आँखे नाचते हुए कहा.

"तोह फिर फेरो से उठा के लाने लगे हो अब तुम लड़कियां? वैसे ये मंजू तुम्हारे घर में ऐसे?", अर्जुन बात पर सकपका जरूर गया था लेकिन थोड़ा सँभालते हुए कहने लगा.

"वह इसकी मम्मी मेरी मौसी लगती है. शादी की पहली रात भाई जाता है न बहिन के घर अगले दिन अपने घर लेने के लिए. बाकी यहाँ घर पे दादाजी ने क्यों बुलाया है वह मुझे नहीं पता. और आज तुम्हारी मम्मी भी तोह आने वाली थी.", अर्जुन ने जितना पता था बता दिए.

"हाहाहा. क्या सोचा और क्या निकला. मेरी मम्मी तोह सुबह दिल्ली पहुंच गई थी 4 बजे हे. दादाजी लेने गए हुए है तोह आ जायेंगे साढ़े 8 या 9 बजे तक. मई चली अंदर और तुम अपने किस्से सुनाओ किसी छोटे बचे को. हाहाहा.", हंसती हुई वह भी अंदर दौड़ गई. अर्जुन अब निश्चिन्त था. एक बार अपने मौसा से मिलने के लिए वह भी अंदर बैठक में आया तोह यहाँ अपने पापा और भैया को भी बैठे पाया.

"नमस्ते मौसा जी.", पाँव छूने पर उसने कहा तोह शंकर जी की आवाज सुनाई जब दलीप जी ने अर्जुन को गले लगाया हुआ था.

"इन्हे तू चाचा बुला. वह तेरी माँ की सहेली है तोह मौसी ठीक लेकिन दलीप के साथ हमारा रिश्ता अब तीसरी पीढ़ी तक आ चूका है."

"जी."

"अरे बीटा तू जो दिल कहे बुलाया कर. और बस यही एक वजह हे के मैं पंडित जी की चाय में बैठ प् रहा हु. मंजू के घर कोई परेशानी तोह नहीं हुई न तुझे?", दलीप जी की बात पर अर्जुन ने ना में सर हिला दिए.

"बाबा, सच कहु तोह इसको देखता हु तोह जवानी का शंकर याद आता है लेकिन थोड़ा फीका इसके सामने.", दलीप सिंह खुद भी ाची deel-dol वाला था लेकिन अर्जुन ने खुद को तराश कर बेहतर बनाने की कवायद में अभी से सबको पछाड़ दिए था.

"सच कहु तोह अब मुझे शंकर में अर्जुन दिखने लगा है दलीप. जो ज्यादा सुकून वाली बात है. नहीं तोह मेरे दोनों लाड़लो ने जो तस्वीर बना दी थी वह कितने हे साल दिमाग में छपी रही.", अपने पिता की बात पर शंकर जी मुस्कुरा दिए और रामेश्वर जी अपने बेटे को देख कर.

"सही बात है. नरिंदर तोह दिखाई नहीं देता अब. गौशाला पे आया था बस शंकर के साथ, कितने साल बाद हे देखा था.", अपने छोटे भाई का जिक्र होते हे शंकर जी उठ खड़े हुए. छोटे स्टूल पर रखा फ़ोन पास करते हे नंबर लगते हुए प्रतीक्षा करने लगे.

"कब आ रहा है तू?" सामने से कुछ आवाज आई तोह शंकर जी ने फिर जवाब दिए.

"मधु अभी यही रहेगी थोड़ा समय. वह दलीप याद कर रहा है तुझे.", और फ़ोन दलीप सिंह की तरफ कर दिए. इधर अर्जुन अपने दादा के कान में कुछ कह रहा था और उसकी बात सुनते हे उन्होंने संजीव को अपने पास बुलाया.

"जरा इसके साथ चला जा. अभी घर में तेरे चाचा है तोह कोई काम पड़ा तोह ये देख लेंगे.", संजीव जवाब में बस हाँ कहता हुआ अपने छोटे भाई के साथ बहार आ गया.

"अरे रुको तोह एक मिनट. मैं मौसी से मिलके आया.", अर्जुन अंदर दौड़ गया और भैया कार की तरफ चल दिए, उसकी बात पर हँसते हुए.

"ओह मौसी, आप हलवा बना कर लाइ हो?", अर्जुन ने बिना सोचे समझे सरोज जी के गले लगते हुए कह दिए. यहाँ सभी बैठे मंजू को घेरे और मधु बुआ, कोमल दीदी के बीच में थी मंजू.

"ये एक रात घर से बहार था और लगता है इतने में हे दिमाग में गड़बड़ हो गई इसके. मौसी सुबह यहाँ आई अपनी बेटी से मिलने और इसको हलवे की सूझ रही है.", ऋतू दीदी की बात पर सरोज ने अर्जुन को सीने से लगते हुए हलकी फटकार देते कहा.

"एक हे बीटा है मेरा और पूरा हक़ है जो भी कहे अपनी मौसी को. मेरे लाल, खीर और हलवा दोनों हे लाइ हु मैं. बस सगुन और पूजा से फारिग हो जाये फिर सबका खाना बाद में पहले मेरे बेटे को खिलाऊंगी.", शरीर से ये भी कुछ काम नहीं थी, लम्बी तगड़ी और भरपूर यौवन था एक बेटी की शादी के बावजूद.

"नहीं नहीं. पहले इन सबको खा लेने देना, मैं बाद में खाऊंगा. पेट न दुखे इसलिए. अभी मैं चलता हु कुछ काम है.", मस्ती करता वह उनके गाल चूम कर बहार निकल गया.

"सरोज, तेरी तोह बहोत जमने लगी है मुन्ना से. एक हे बार तोह ननिहाल गया वह.", कौशल्या जी, जो दोनों के प्यार को देख रही थी बोल पड़ी.

"माँ जी, हाथ भर का था जब मेरी गॉड में मालिश करवाता था. इतनी जल्दी तोह भूल नहीं सकता मुझको. इस बार आया तोह फिर अपनी मौसी को पहचान गया.", सरोज जी भी वैसे हे जवाब दे गई.

"हाँ मौसी, हम तोह ननिहाल 10 बार जा चुके, लेकिन न ये मंजू कभी हमारे यहाँ आई और ना आपने अर्जुन जितना प्यार हमे किआ.", ऋतू दीदी अपनी दादी के गले लगती बोली.

"माँ ने तोह मुझे भी नहीं किआ.", इतनी देर से चुपचाप बैठी मंजू के मुँह से ये सुनते हे सबकी हंसी चूत गई.

"लो देख लो माँ जी. यही चिंता रहती है मुझे सारा दिन. पता नहीं ससुराल में क्या dhan-dhan करेगी ये लड़की.", वह मंजू के लिए बोल रही थी की तभी नजर रेखा जी की ब्याह पकडे बैठी प्रीती पर पड़ी. एक पल को वह जैसे इस लड़की में हे खो गई. प्रीती ने भी उनको देखा तोह नजरे झुकाती वह रेखा जी से और सत् गई, रेखा जी भी इस दौरान उसका हे सर सेहला रही थी.

"ये बिटिया वही है रेखा?", उनकी बात समझते हुए रेखाजी और कुआशालय जी ने भी हामी भरी लेकिन मंजू अब यहाँ थोड़ा खुलने लगी थी तोह वह पूछ बैठी.

"ये बिटिया प्रीती है माँ. स्टेडियम ये भी जाती है."

"अरे मंजू, मौसी का मतलब ये नहीं है. और इस मानो ने तुझे भी नहीं बताया क्या?", ऋतू दीदी ने प्रीती को मुँह बनाते हुए देख कर कहा तोह वह ज्यादा शर्माने लगी.

"अरे क्यों तंग कर रही है ऋतू तू मेरी बची को? मंजू ये प्रीती है."

"हाँ मौसी मैं जानती हु ये प्रीती है.", मंजू उनकी हे बात दोहराती सी बोली.

"मतलब यही प्रीती है जिस से अर्जुन का रिश्ता बचपन में हो चूका है.", मंजू ने अब ध्यान से देखा उसकी हरकतों को.

"तोह इसलिए ये अभी से आपके गले पड़ी हुई है. बहोत होशियार निकली ये तोह. "अर्जुन मेरा निगहबॉर है", यही बोली थी मुझे तोह.", अब मंजू ने खिंचाई शुरू की तोह ऋतू दीद ने प्रीती को गले लगा लिए.

"अररि तू इसके साथ रह थोड़ा टाइम. वैसे न तू कुछ दिन हमारे हे साथ रह मंजू, मजा आएगा. तेरी ननद स्कूल और तू हमरे यहाँ.", ऋतू की बात पर मंजू ने झट्ट हामी भर दी लेकिन सरोज जी तोह सरोज जी थी.

"पहले हे ये घोड़ी काबू नई थी अब इसका ब्याह भी यहाँ हो गया. ाचे से डुबाओ मेरी इज़्ज़त्त के गंगा भी नसीब न हो. देख लो माँ जी क्या कह रही ये सब.", सरोज जी की बात पर कौशल्या जी ने भी अपनी पोतियों का पक्ष हे लिए.

"गलत क्या कह दिए और कौनसी इज़्ज़त चली गई ये बता? लड़की हमारी है तोह हमरे घर हे आएगी. मंजू बीटा, 2 महीने कॉलेज है नहीं. तू सुबह यहाँ आएगी अपनी ननद के साथ और शाम में प्रीती तुझे छोड़ दिए करेगी स्टेडियम से आते हुए. सरोज अकेली रहती परेशां हो गई थोड़ी इसकी बात का बुरा न मन कर.", कौशल्या जी की बात सुनते हे मंजू चहक उठी. लेकिन बाकी सबको कहा पता था उसके ऐसे खुश होने का राज. बहार से जब खाने की पुकार आई तोह सब कड़ी होने लगी. ऋतू और अलका ने मंजू का हाथ पकड़ कर उठाते हुए अपने साथ चलने को कहा, प्रीती बाद में आने का बोलकर घर चली गई.

.

.

संजीव भैया को एक घंटा घूमने के बाद अर्जुन वापिस घर ले आया. अब उसके चेहरे पर चमक थी जैसे पता नहीं क्या पा लिए था. दोनों ने साथ में हे खाना खाया तोह पता चला के दादाजी उसके पापा और अंकल के साथ बहार गए है. अपनी बहने भी पास नहीं दिखी तोह अर्जुन ने इस सन्नाटे की वजह ताईजी से पूछी.

"वह साड़ी तोह ऊपर पिछले वाले कमरे में बंद है अपना खाना लिए. सारा ज्ञान आज हे लेंगी जैसे.", ललिता जी की बात का मतलब समझते हुए अर्जुन चुपचाप खाने पर ध्यान देने लगा. रेखा जी भी सबका खाना होने के बाद सरोज के साथ अपने कमरे में थी और ललिता जी भी उधर चली गई इन दोनों से फारिग होते हे.

"चल छोटे मैं भी चला काम पे और अब शुक्रवार मिलता हु तुझसे. अपना और घर का ख़याल रखना क्योंकि तेरे पापा और मौसा वही से मेरे साथ निकलने वाले है. मौसी अभी 2 दिन यही रहेगी.", भैया खड़े होने लगे तोह अर्जुन ने उन्हें हैरानी से देखा.

"आपके साथ पापा जायेंगे और मौसा भी. लेकिन आप यहाँ से कैसे जायेंगे? गाडी तोह पापा लेकर गए है न. फिर दादाजी कैसे आएंगे.?", अर्जुन की बात का जवाब भैया क्या देते.

"मैं ऑटो ले लूंगा और दादाजी को यहाँ उतार कर फिर चला जाऊंगा चाचा के साथ.", अर्जुन कपडे से हाथ पोंछता उनके साथ खड़ा हो गया.

"चलो मैं छोड़ देता हु आपको. और दादाजी को मैं हे ले आऊंगा अपने साथ.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल की चाबी जेब से निकलते हुए कदम आगे बढ़ा लिए. संजीव भैया चुपचाप उसके पीछे. अगले 10 मिनट तक मोटरसाइकिल चलने के बाद ये दोनों हे सदर थाने के बहार आ खड़े हुए. पापा की कार भी कड़ी देख अर्जुन समझ गया के वो लोग यही है.

"हम पुलिस स्टेशन क्यों आये है?"

"दादा जी को कुछ काम था इसलिए चाचा उन्हें ले आये. वह आते हे होंगे उसके बाद तू दादाजी को लेके निकल जाना. मैं चाचा के साथ चला जाऊंगा.", अर्जुन जाहिर किये बिना बहुत कुछ देख चूका था. भैया बिना सामान लिए घर से 5 दिन बहार जाने वाले है, मोटरसाइकिल उन्होंने नहीं चलाई लेकिन इसमें बड़ी बात नहीं थी. बड़ी बात थी पीठ पर बना हुआ उभार जो कमर के ऊपर था. और यहाँ उन्होंने बहार खड़े पुलिस वाले को आँखे दिखाई और वह नजरे झुका कर खड़ा हो गया. मतलब बहुत कुछ नहीं पता था अभी उसको.

सामने से हे हाथ में एक फाइल लिए शंकर जी और दलीप सिंह बातें करते हुए बहार आ रहे थे. और उनके पीछे कोई पुलिस का बड़ा अधिकारी रामेश्वरजी के साथ. अर्जुन को उन चारो ने हे देख लिए था लेकिन वह भी अपनी हे धुन्न में आ रहे थे.

"हाँ तोह छोटे पंडित जी भी साथ आये है.?", इस अधिकारी ने अर्जुन के सर पर हाथ फेरा और अर्जुन ने नमस्कारं करने के साथ हे पूरा मुआयना कर लिए 'निर्मल सिंह'. फिर संजीव भैया ने कुछ बात की तोह शंकर जी और दलीप सिंह दोनों हे अर्जुन से मिलते हुए गाडी में बैठ गए. पिछली सीट पर संजीव भैया.

"ाचा तोह पंडित जी इजाजत दीजिये और आगे से ऐसा कोई भी छोटा मोटा काम हो तोह आप कष्ट मत कीजियेगा. फ़ोन बहुत है आपका.", उन्होंने हाथ जोड़ते हुए कहा और रामेश्वर जी ने भी ज्यादा कुछ कहे बिना प्रतिउत्तर में हाथ जोड़ दिए. अर्जुन के पीछे बैठे तोह वह अभी बिना कुछ पूछे वह से चल दिए. लेकिन पंडित जी को मालूम था के सवाल कभी भी आ सकता है इस लड़के का और ऐसा हे हुआ जब वह मुख्या मार्ग पर आये.

"आपको यहाँ आने की क्या जरुरत थी बाउजी? मैं भी आ सकता था अगर कोई फाइल हे सिग्न करवानी थी. और पापा और अंकल भी आये थे."

"अरे भाई वह मेरा दोस्त है तोह मिलने आ गया. काम तेरे चाचा का था और शंकर ने जाना भी उसने अगले हे शहर में है तोह वह साथ आ गया. लेकिन तू यहाँ क्यों आया? संजीव टेम्पू पकड़ कर आ जाता. अब घर पे कोई तोह मर्द होना चाहिए या नहीं.", उनकी बातों में अब अर्जुन फंस गया था. अपने शक भी जाहिर नहीं कर सकता था और ये भी नहीं कह सकता था के इस बात की तरफ तोह उसने गौर हे नहीं किआ.

"भैया, तोह टेम्पू में आ जाते लेकिन आपको थोड़ी आने देता मैं. फिर आगे इतना पैदल चलना पड़ता है."

"ओह मेरे होशियारचंद, रहने दे तू ऐसी बातें. मुझे टेम्पू की जरुरत नहीं है क्योंकि 10 सरकारी गाड़ियां कड़ी थी उधर मुझे छोड़ने के लिए लेकिन तेरे आने का कारण जो भी है ये उनमे से नहीं था. जरा ये छोटी मार्किट में रोक दे एक डायरी और कलम लेनी है.", घर के पास वाली मार्किट की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा और अर्जुन ने वैसा हे किआ. वह पहली बार ऐसे दादाजी के साथ आया था इधर मार्किट लेकिन देख कर हैरान था की सभी दूकान वाले उन्हें ाचे से जानते थे. किताबो की दूकान से पहल हे 10 लोग उन्हें ram-ram, नमस्कार कर चुके थे. डायरी और पेन लेने के बाद उन्होंने कुछ फल भी खरीद लिए.

"चल मेरे शेर अब घर ले चल.", उनकी बात सुनकर अर्जुन अपने दादाजी को लिए सीधा घर आ गया. छोल साहब के घर के बहार कड़ी गाडी देख वह समझ गया था के प्रीती की माँ आ चुकी है. फिर सामान अपने दादाजी से लेता वह भी उनके हे साथ अंदर आ गया.

"मैं अपने कमरे में जा रहा हु दादी. थोड़ी नींद ले लू जरा. सुबह से उठा हुआ हु और काम हे काम.", अर्जुन सीधा ऊपर कमरे में घुसता बिस्टेर पर जा गिरा. इस तरफ शायद कोई नहीं था और अर्जुन ये समझते हे आँखें बंद करता लेट गया..

.

.

"थक गए हो क्या?", अर्जुन को लेते कोई आधा घंटा हुआ था और जैसे हे ये स्पर्श और आवाज सुनाई दी, वह आँखे खोल कर सिरहाने बैठी मधु बुआ को देखने लगा.

"नहीं बुआ थका नहीं हु बस घर की इतनी भीड़ से बचते हुए यहाँ आराम कर रहा था. आप बताओ कैसे आना हुआ??", अर्जुन का स्वर साफ़ और साधारण हे था. मधु बुआ ने कमर बिस्टेर के लकड़ी वाले हिस्से से टिकते हुए सामने देखते हुए कहा.

"तुम्हे मेरे बारे में इतना कैसे पता चला अर्जुन? इस बात की भनक तोह इतने साल से घर के किसी बड़े को भी नहीं लगी फिर तुम्हे ये कैसे पता है? अगर तुम्हे बताने में कोई कष्ट हो तोह तुम मत बताना लेकिन मैं jaan-na चाहती हु. और ऐसी बात पता होने पर लोग किस हद्द तक जा सकते है मैं कह नहीं सकती लेकिन तुमने तोह बात कहकर ऐसे नजरअंदाज कर दिए जैसे वह मामूली सी बात थी.", बुआ इस पल में शुन्य निहारती कुछ कमजोर सी लग रही थी. उनकी हालत देख अर्जुन उनका हाथ थामे वैसे हे बैठ गया जैसे वह बैठी थी. कमरे के सभी दरवाजे बंद थे, ये अर्जुन को अभी पता लगा जब तारा वाले कमरे में कुण्डी लगी देखि.

"बुआ, आधी बातें मुझे पता थी और आधी मैं समझ सकता हु. आपको याद है के इस से पहले हमारा घर कहा था?", अर्जुन के हाथ का स्पर्श बुआ को थोड़ी हिम्मत दे रहा था.

"हम्म.. वह इस सेक्टर की शुरुवात में जहा तब गिने चुने हे घर थे पूरे सेक्टर में. आज भी वह वैसा हे है."

"बुआ, गर्मी की छुट्टियों में आप पापा से वही तोह मिलती थी. मैं छोटा जरूर था लेकिन वह सब मेरे दिमाग में आज भी किसी चलचित्र की तरह छापा हुआ है. मैं हमेशा इधर से भाग कर उस घर चला जाता था. कावेरी, हमारी गाये को देखने. वह सब दृश्य बस याद थे मुझे जो मैंने देखे लेकिन समझ नहीं थी. 7 साल की उम्र होती हे कितनी है. फिर एक दिन आपने ये बात वही चारा रखने वाले कमरे में कही थी, 'शंकर या तोह मुझे मार दो या फिर भगा कर ले जाओ. मैं अब और ये सब नहीं सेह सकती. न तुमने शादी के समय सुना और न अब.' ये बेशक चाँद लाइन हे थी लेकिन आजतक मुझे याद है. मैं वही कमरे के बहार वाले आँगन में बैठा निक्कर साफ़ कर रहा था, पापा के डर से. और उन्हें उधर आपके साथ आता देख छुप कर खड़ा हो गया था. उनका भी जवाब स्पष्ट था. 'मधु तुम्हे औलाद चाहिए थी मैंने तारा के रूप में दी और अभी भी मैं तुम्हे वक़्त देता हु. हमारा रिश्ता तब भी गलत था और आज भी है. मेरे लिए हमारे पापा और परिवार जरुरी है और अगर आइंदा ऐसी बात हुई तोह मैं शकल भी नहीं दिखाऊंगा कभी.' इसके बाद पापा आपको वही रट हुए छोड़ कर आ गए थे और आप बार बार यही कह रही थी की 'प्यार हुआ भी तोह उस से जो सागा भाई है. पापा की िज्जात्त खराब होते तोह मैं भी नहीं देख सकती.'", इतना कहने के बाद अर्जुन ने आँखें बंद कर ली जैसे दिमाग की तिजोरी में कुछ ढून्ढ रहा हो.

"बुआ, बोर्डिंग भेजने से पहले पापा ने मुझे अकेले कमरे में सुलाना शुरू किआ था जहा मैं रात को रोने लगता था. लेकिन फिर रोने के साथ हे कुछ समय बाद नींद भी आणि बंद हो गई थी. रात में जाने कोनसे वक़्त आप साथ वाले कमरे में आती थी और कुछ देर बाद पापा. मैं तबतक ये सब देखता रहता था जब तक आँखे खुली रहती थी. ये मुझे बोर्डिंग भेजने का आईडिया भी आपने हे दिए था उन्हें. फिर मुझे जब बोर्डिंग भेज दिए तोह मेरे दिमाग में बस यही बात थी की बड़ा होने पर मैं आपसे बदला लंग क्योंकि आपकी एक सलाह ने मेरी ज़िन्दगी बदल दी थी. बहाना भी ये लगाया था के मेरी सेहत ठीक रहेगी घर से बहार रहूँगा तोह. गुजरते वक़्त के साथ इन यादों ने मुझे कमजोर नहीं किआ बल्कि मैंने खुद को मजबूत बने, अकेले रह कर. फिर मेरी ज़िन्दगी वापिस मुझे परिवार में ले आई और गुजरते दिनों के साथ मैंने प्यार को समझा तोह मुझे कही ऐसा नहीं लगा की गलती आपकी या पापा की थी. तीस थी बस के मुझे क्यों दूर किआ गया लेकिन आचार्य जी ने मुझे इस दर्द से भी विमुक्त कर दिए. क्यों उस घडी को याद रखना जिसमे दुःख हो, दर्द हो या बदले की भावना. बुआ, मैं छोटा था और शायद ज़िद्दी होने की वजह से कभी मेरी वजह से परेशानी हुई होगी आपको. तोह मैंने भी ज़िद्द ख़तम कर दी अपनी. लेकिन सच कहु तोह मैंने जानबूझ कर कुछ नहीं किआ था उस समय.", अपनी बात कहते कहते कब अर्जुन की भी आँखें उसका चेहरे भिगोने लगी उसको ध्यान हे नहीं रहा. ऐसा हे हाल मधु बुआ का था.

"मैं भी यही सोचती थी की तुम हमारे रस्ते में इतनी काम उम्र में आने लगे हो. तुम्हारा हम दोनों को देखना कभी मुझसे छुपा न था इस घर में. लेकिन मैं कैसे तुम्हारे पापा को कहती की ये छोटा लड़का ये सब देखता है. मुझे पुराने घर में तुम्हारा आभास नहीं हुआ था लेकिन जो तुमने कहा है वह सच हे था. ऐसा हे होता था जब हमारी लड़ाई हो जाती थी. मैं फिर मन लेती थी शंकर को और तुमसे पीछा छुड़ाने के लिए हे मैंने तुम्हारे पापा को राजी किआ था बोर्डिंग भेजने के लिए. तुम यहाँ बड़े होते हुए हमको देखते तोह जरूर घर में बात बता देते. लेकिन तुम्हारी यादें सच में पठार सी है जो हर चीज तुम याद रखे हो. मेरे बचे मुझे माफ़ कर दे उस सबके लिए जो भी मेरी वजह से तूने सहा है. इसकी माफ़ी हो भी नहीं सकती लेकिन एक बार बोल देने से मेरा दिल हल्का हो जायेगा.", मधु बुआ जैसे बदहवास होने लगी थी लेकिन अर्जुन ने उन्हें अपने सीने से लगते हुए चुप करना शुरू किआ.

"बुआ, आपको माफ़ी की जरुरत नहीं है. प्यार करना कबसे पाप हो गया? बस मुझे दुःख रहेगा की आपको वह प्यार मिल न सका. मेरे लिए आप सभी बराबर हो लेकिन दादाजी, वह आज जहा भी जाते है मैंने लोगो की नजरो में उनके लिए प्यार हे देखा है, िज्जात्त देखि है. पापा जिस जगह पर आज है वह उम्र के आधे पड़ाव पार कर चुके है. मेरी माँ और आपके दोनों के बचे बड़े हैं, फूफाजी का एक भरा परिवार है. ऐसे स्थिति में गलती नादानी नहीं रह जाती, वह परिवार के खिलाफ बगावत हो जाती है. लेकिन मैं एक बात से इत्तेफ़ाक़ रखता हु, आपमें पापा से ज्यादा क्षमता है. आपको यही प्यार किसी आपके बराबर वाले से हुआ होता तोह तस्वीर कुछ होती. फैंसले बदल सकते थे लेकिन अब नहीं.", अर्जुन उन्हें सीने से लगाए पीठ सेहला रहा था. मधु बुआ भी किसी बचे की तरह उस से लिपटी अपने दिल को हल्का करती रही, सिसकते हुए.

"पता नहीं कैसे लेकिन रेखा ने अनगिनत पुण्य किये होंगे जो तू जन्मा अर्जुन. मेरी सोच से ज्यादा समझ और प्यार को जानता है तू."

"बुआ, आपको बस खुद को टटोलना है. सबसे पहले कोशिश करो के ज़िन्दगी में कहा सुधर हो सकता है. नए सिरे से कभी भी शुरुवात हो सकती है. प्यार तोह आपको सभी करते है, आप भरोसा करेंगी तोह अकेलापन और मानसिक अवसाद कब गायब हो जायेगा आपको खुद पता नहीं चलेगा. खुश रहने हे तोह सबसे आसान है मेरी प्यारी बुआ.", उनके गाल थमते हुए अर्जुन ने छोटा सा चुम्बन गाल पर कर दिए तोह न चाहते हुए भी मधु बुआ के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आ गई.

"अब आप खुद को ठीक करो और सबसे पहले ये चेहरे साफ़ करो. आंसू ाचे नहीं लगते इस चाँद पर, दादाजी चाँद हे कहते है न आपको कभी कभी.", अर्जुन ने उन्हें अलग करते हुए कहा और वह सकुचाती सी बाथरूम में चली गई. अर्जुन टीशर्ट उतार कर एक तरफ रखता वापिस बाजू के नीचे तकिया रखते हुए लेट गया. दोपहर के 12 बजने वाले थे और वह पिछली रात से सिर्फ 1 घंटा हे सो पाया था.

"मैं अकेले नहीं सोने वाली.", मधु बुआ अब ढीला सा गाउन पहने बाथरूम से खुद को ठीक करती अर्जुन के हे पास आ गई थी. उसके हाथ के नीचे से तकिया निकाल कर अपने सर के नीचे रखती वह अर्जुन के हे बगल में लेट गई. कुछ हे देर में दोनों हे सो चुके था.

.

.

(नोट: प्रीती की माँ रोमिला अंग्रेजी में हे अधिक बात करती है, बेशक उन्हें कुछ हद्द तक हिंदी बोलने और समझने का ज्ञान है. लेखक यहाँ उनके संवाद हिंदी में हे लिखेगा जिस से कहानी का mukhya-pravaah बाधित न हो और कहानी सरलता से हे चले. धन्यवाद)

छोल साहब के घर में गिनती के हे लोग थे और प्रीती की माँ रोमिला पूरी के आने से थोड़ा माहौल बना हुआ था. पारवती के साथ प्रीती ने हे उनका सामान कमरे में रखवाया, जैसा उन्हें पसंद था. हलके नाश्ते के बाद थोड़ी बहोत बातें छोल साहब नई की थी अपनी बहु के साथ और उन्हें आराम करने का कह कर खुद भी अपने कमरे में चले गए थे.

"माँ, आप अभी मेरे हे कमरे में आ जाइए. थोड़ी बातें करते हुए आप आराम भी कर लीजियेगा.", प्रीती इतने वर्षो बाद अपनी माँ से मिली थी और वह उनके गले लगी हुई बिलकुल छोटी बची की तरह निवेदन कर रही थी.

"मैं भी यही चाहती हु बीटा. जल्दी से इस घर में खुद को ढाल लू जिस से कोई दिक्कत न हो. वैसे भी तुमसे मिलकर ाचा लगा और इतने सालो की बातें भी करनी है.", अपनी बेटी के सर पर हाथ रखती वह प्रीती के साथ हे कमरे में चली गई. एक ों करते हुए प्रीती ने एक तकिया उनकी तरफ लगाया और अपना वाला भी उनके बराबर करती वह अपनी माँ रोमिला की बगल में लेट गई.

"तुम्हारी बहुत याद आई इतने साल बीटा. वह उस घर में तुम्हारे जाने के बाद से हे एक खालीपन आ गया था जो आज भी है.", रोमिला प्रीती के चेहरे को बड़े स्नेह से निहार रही थी. ईमेल से फोटो तोह मिलते रहते थे लेकिन अपने पास उसको देख कर माँ का दिल संजीदा हो उठा.

"माँ, याद तोह मैं भी आपको, पापा को और उस शैतान जोएल को रोज करती हु. लेकिन यहाँ दादाजी है न, तोह उनकी देखभाल भी जरुरी है. लेकिन आप सच में इतनी वेस्ट रहने लगी की मेरे से मिलने का समय भी नहीं मिला?", इस प्रश्न की उम्मीद रोमिला को पहले से हे थी.

"बीटा याद तोह मैंने भी हर रोज किआ तुम्हे. वह तुम्हारे पापा, भाई और हमारा काम भी है. जिसको छोड़ना नामुमकिन हे है और यहाँ हिनड़स्तान में हमारे काम का उतना मोल हे नहीं है. लेकिन तुम्हे तोह शुरू से हे अपने दादा जी और अर्जुन चाहिए थे इसलिए तोह एक पल भी पीछे मुड़के देखे बिना तुम यही की हो कर रह गई.", प्रीती इन बातों का जवाब देकर आते हे माहौल खराब नहीं करना चाहती थी.

"माँ, वह मेरा बचपन था और दादाजी का प्यार. बचपन तोह नहीं रहा लेकिन उनका प्यार पहले से भी ज्यादा बढ़ गया है. वैसे आप नानी से मिलने गए थी?"

"हम्म. वह अब क्रीट (ग्रीस का एक द्वीप) रहने लगे है. तुम्हारे दोनों मां ने अपना काम बाँट लिए था तोह बड़े मां अभी भी फार्मिंग कर रहे है और छोटे वाले तुम्हारी नानी और अपनी फॅमिले के साथ क्रीट में पर्यटन रिसोर्ट चला रहे है. 2 हफ्ते हे रह पाई थी इस क्रिसमस और नए साल पर. अभी जाना था लेकिन पहले मैं इधर आ गई हु तोह सितम्बर में देखेंगे. वह भी तुम्हे याद करते है.", प्रीती देख रही थी की माँ के चेहरे पर कितनी ख़ुशी आ गई थी ग्रीस का नाम सुनते ह

"ाची बात है. भगवन सबको खुश रखे. मेरे भी 2 प्रवेश परीक्षा के इम्तिहान है अब एक इस हफ्ते और दूसरा उस से अगले संडे को. फिर अगर आर्किटेक्चर मिला तोह पहले वही लुंगी नहीं तोह इंजीनियरिंग आखिरी ऑप्शन है.", प्रीती ने थोड़ा अपने भविष्य के बारे में बताया तोह रोमिला एक पल सोचने के बाद बोली.

"तुम्हारा स्टेट्स वापिस आने का कोई विचार नहीं है? या कभी ग्रीस जाने का?"

"फिलहाल तोह अगले 5-6 साल बिलकुल भी नहीं है, माँ. उसके बाद देखेंगे अगर घूमने का दिल किआ तोह जरूर.", प्रीती ने साफ़ इंकार हे कर दिए था एक तरह से.

"हम्म. मतलब तुम अर्जुन के साथ यही हिंदुस्तान में पूरी ज़िन्दगी बिताने वाली हो? और ये लड़का है कैसा?"

"माँ, जरुरी नहीं पूरी ज़िन्दगी सिर्फ हिंदुस्तान में हे रहे. जहा उसका दिल करेगा, हम चले जायेंगे. लेकिन इतनी आगे का नहीं सोचता कोई भी. आप मिलो तोह सही उस से एक बार. साधारण सा लड़का है और वैसे हे उसके ज़िन्दगी में लक्ष्य है. थोड़े में हे खुश रहने वाला और ठीकठाक. ाची बात है के बचपन से हम दोनों दोस्त है तोह हमारी ठीक तरह से निभती है.", प्रीती ने कुछ सोच के हे ऐसा बताया था.

"बचपन में हे रिश्ता कर दिए क्योंकि वह तुम्हारे दादा जी के ख़ास दोस्त का पौता है और तुम कहती हो इतनी आगे का नहीं सोचते. दोहरा मापदंड है हिन्दुस्तान में. वैसे साधारण तोह होना हे था, जैसे सारे एशियन्स होते है. कोई खासियत नहीं बस जनसँख्या बढ़ाते रहते है. ग्रीस के लड़के दुनिया में सबसे खूबसूरत माने जाते है, या फिर इटली के. लेकिन तुम्हारे दादाजी और तुमने वही करना है तोह मैं इतना क्यों समझौ. बस तुम्हारे पापा चाहते थे की मैं एक बार मिल लू इस लड़के से. लेकिन एक बात पहले हे बता देती हु, एवरेज से भी काम लगा मेरे इम्तिहान में तोह हम परिवार के वोट से इसका फैंसला करेंगे.", रोमिला अपनी बेटी को मीठी चेतावनी देते हुए बोली, मुस्कान के साथ.

"ठीक है और आप अभी इधर हे है तोह फैंसला समय बिताने के बाद हे करना. No फर्स्ट इम्प्रैशन एंड आल.", प्रीती ने थोड़ी ढीली आवाज में कहा.

"आज शाम को बुलाओ उसको खाने पर. अगर बात करने लायक लगा तोह मैं हर गुजरते दिन के साथ उसको समझने की कोशिश करुँगी लेकिन ठीक दसवे दिन मेरा फैंसला सामने होगा.", उनकी बात पर प्रीती बस उनके गले लग गई और बाकी बातें शाम को अर्जुन के साथ करने के लिए बोल कर. लेकिन मैं में वह खुश थी एक बात से की वोट घर में 5 है तोह फैंसला वोट से भी हुआ तोह उसके पापा किसी हाल में दादा के खिलाफ नहीं जायँगे और न हे जोएल, बेशक माँ उन्हें कितना भी दबा के रखती हो. उसको ये जानकार ाचा नहीं लगा था के माँ सिर्फ ग्रीक्स को हे सर्वश्रेष्ट मानती है, अभी तक. कुछ देर आराम करने के मकसद से वह भी सो गई.

.

.

तक़रीबन 2 घंटे बाद मधु बुआ की नींद हलकी सी खुली तोह अर्जुन का मजबूत हाथ अपनी कमर से लिप्त पाया. मधु बुआ का पूरा पिछले हिस्सा अर्जुन से सत्ता था और वह जैसे उसके आगोश में थी. एक पल को वह मुस्कुरा उठी खुद की इस हालत पर लेकिन अपने भरी कूल्हों के बीच हलकी गर्माहट महसूस करते हे rom-rom कांप उठा. 'क्या ये वही है जो मैं सोच रही हु?', इतना दिमाग में आते हे पहले तोह वह उठना चाहती थी लेकिन फिर कुछ सोच कर लेती रही. अब अर्जुन गहरी नींद में था और उसको वह उठाना भी नहीं चाहती थी. दिल के एक कोने में ये एहसास बड़ा सुकून दे रहा था.

मधु बुआ आँखें बंद किये इस एहसास में डूबी लेती थी और अर्जुन जाने कोनसे ख्वाब देख रहा था जो उनकी कमर से हाथ सरकता बुआ के विह्लकाये उभारो की जड़ में जा पहचा. हल्का सा बुआ को अपनी तरफ करते हे मधु बुआ अर्जुन के सीने से जा लगी. उन्हें खुद विश्वास नहीं हो रहा था के ये लड़का सिर्फ हथेली से उनके समूचे शरीर को किसी हलके रूई के गोले की तरह घुमा लेगा. अब उसकी वह बनियान से निकली हुई बलिष्ट भुजा में खुद को पाया तोह वह उसके पौरुष को हे निहारने लगी थी. ाचे शरीर की मधु कोई पतली मरियल सी स्त्री तोह नहीं थी लेकिन अर्जुन के जिस्म को निहारती हुई समझ गई थी की वह बेजोड़ है और ये शरीर सचमुच किसी काल्पनिक योद्धा सा था. इस बाहुपाश में न चाहते हुए भी मधु बुआ के दोनों उन्नत वक्ष अर्जुन के चौड़े सीने में धंसे हुए थे.

'कुछ देर और ऐसे रही तोह गड़बड़ हो जाएगी. इसका वह भी इसकी तरह हे असाधारण है. कैसे आधे फ़ीट की दुरी से भी मेरी नाभि पर चुभ रहा है.', इतना सोचते हे जांघो के बीच वाले गहरे रेगिस्तान में शबनम की बूँद बिखरनी शुरू हो गई. चेहरा ऊपर करते हे khud-ba-khud दोनों के होंठ आपस में टकरा गए लेकिन ये कोई चुम्बन न था. मधु खुद को अर्जुन की बाहों में बर्फ सा पिघलता महसूस करने लगी थी और दिल पर जोर न चलता देख बस आँखें मूंदे वैसे हे पड़ी रही. लेकिन ये पल ऐसे हे रहा. न अर्जुन ने आगे कुछ किआ और न मधु में हे हिम्मत हुई. बस 15 मिनट के बाद अर्जुन ने करवट लेते हुए खुद को सीधा किआ तोह मधु बुआ की धड़कन सम्भली. बिस्टेर से उतरती वह एक भरपूर निगाह अर्जुन पर डालने के बाद बाथरूम चली गई.

.

.

ऋतू दीदी ठीक 3 बजे अर्जुन को जगाने उसके कमरे में आई तोह उसकी मासूम सूरत देख कुछ पल कड़ी रही. फिर कुछ सोच कर उसके कान को मुँह में भरने के बाद दूर हो गई. अर्जुन ने आँखें खोली तोह घडी पे नजर डालते हे बराबर में दिवार के पास कड़ी अपनी दीदी को देख मुस्कुरा दिए.

"आपने नहीं सुधारना. है न?", वह भी हंसती हुई ना में सर हिलती उसको देखने लगी.

"खड़ा हो जा और खाना खा ले. सब पूछ रहे हैं और स्टेडियम भी जाना है न.", अर्जुन दिखने के लिए टीशर्ट उठाने लगा और जैसे हे दीदी का ध्यान हटा पालक झपकते हे वह उनको दिवार से लगाए खड़ा था.

"अब दिखता हु आपको के जो आपने किआ कैसा लगता है.", अर्जुन ने इतना हे कहा था के दरवाजा खुलने की आवाज बहार से हुई और ऋतू दीदी मछली की तरह उसके हाथो से फंसलटी तारा के कमरे के बहार कड़ी उसको चिढ़ाने लगी.

"दरवाजा मैंने हे हिलाया था बहार की तरफ. बड़ा आया दिखने वाला.", अर्जुन भी हँसता हुआ खुद को ठीक करने के बाद नीचे चल दिए. जहा अब सरोज मौसी के साथ आरती दीदी और मंजू खाने के लिए बैठे थे. अर्जुन बेहिचक मंजू के कान पर ऊँगली मरता उसकी हे बगल में जा बैठा.

"देख लो मौसी आपकी लाड़ली को. शादी क्या हो गई सब काम से हाथ हटा लिए. वह वाले घर में तोह आपको मैंने खबर लेते देखा था मंजू की.", मंजू उसको घूर कर देख रही थी.

"बीटा, तू हे समझता है तेरी मौसी को. बाकी सबको तोह मैं कसाई लगती हु जो कुछ भी कह दू इस लड़की को."

"ये जनाब जबसे आये है खुद तोह बिस्टेर टॉड रहे है और मुझे काम की शिक्षा. मैंने नहीं खाना खाना बस.", मंजू उठ कर जाने लगी तोह कोमल दीदी ने वापिस बिठाया और अर्जुन का कान खींच दिए.

"सुधर जा ारु. चल सॉरी बोल.", अर्जुन ने बिना कुछ सामने जवाब दिए मंजू से सॉरी बोल दिए. सरोज मौसी के साथ हे मंजू भी अचरज से देखने लगी की ये एकदम कैसे भोला बन गया.

"मौसी ये ऐसा हे है. थोड़ा भी किसी से हिलमिल गया तोह पूछो मत. सब अपने हे मान लेता है फिर.", मंजू को अपना नाटक अब महंगा लगने लगा था.

"दीदी, मैं भी तोह नाटक हे कर रही थी. सॉरी. अर्जुन के साथ मैं भी कम्फर्टेबले रहती हु, चाहे माँ से या मौसी से भी पूछ लो.", रेखा जी भी उधर चली आई ये सब देखती हुई.

"कोमल बीटा तेरी भी प्लेट इधर हे ले आ. ये दोनों छोड़ दे इनके हे हाल पे. ाची दोस्ती हो चुकी है इनकी अब.", रेखा जी की बात का अर्थ थोड़ा गहरा था जो वह किसी को समझ नहीं आया. माहौल को ठीक करते हुए अर्जुन ने हे कहा.

"ये तोह कोमल दीदी है. मंजू तेरी खबर मैं ऋतू दीदी और अलका दीदी के साथ मिलके लूंगा, और तारा को भी आने दे.", उसकी ऐसी बात सुनते हे आरती भी हंसने लगी.

"इसकी बात पर रत्तीभर यकीन मत करना मंजू, ऋतू और अलका तेरे साथ मिलके इस बंद बजेंगी फिर ये वापिस अपनी कोमल दीदी के गले लगता शिकायत करेगा.", कोमल दीदी भी आरती के बगल में बैठती हुई उसकी बात पर मुस्कुरा दी.

"चलो फिर ये भी देख लेते है. ऋतू और अलका से पुराणी दोस्ती है मेरी, जरा पता कर लेना. रही तारा की बात तोह वह बेचारी नहीं बोलने वाली बीच में.", मंजू ने तुनक कर कहा.

"देख लिए मौसी, मैं न कहता था के ये शादी के बाद एक हे दिन में कैसे बदल गई है. मेरे जैसे मासूम को सबके सामने धमका रही है."

"इनके बीच में मत बोलना सरोज. ये नौटंकी तेरे कंधे पर रख कर बन्दूक चला रहा है.", ललिता जी की बात सुनते हे अर्जुन ने रोनी शकल बनाते हुए अपनी तेजी को देखा.

"मौसी, इसकी शीशी साथ भेजती हो क्या स्कूल में?", मंजू की बात पर एक तेज ठहाका टेबल पर गूँज उठा. लेकिन ऋतू दीदी को देखते हे ज्यादातर शांत हो गए.

"ऐ मंजू, ऐसा नहीं कहना. हाँ. मेरा भाई मेरी जान है.", ऋतू दीदी ने उसका सर सहलाते हुए कहा तोह अर्जुन खुश हो कर मुँह बनाने लगा.

"वह अलग बात है एक अभी भी माँ की छाती से लगा रहता है. बस बहार किसी को बताना नहीं.", मंजू के साथ ताली मरते हुए ऋतू दीदी ने बात पूरी की तोह अर्जुन नाराज हो कर प्लेट एक तरफ करके बैठ गया. अगले हे पल बड़े प्यार से मंजू ने एक निवाला उसके मुँह में डालते हुए कहा.

"मजाक का बुरा नहीं मानते. सभी खुश थे इसलिए hans-bol रहे थे. अब खाना खा लो.", ये भावनात्मक दृश्य देख कर तोह अलका दीदी मुँह पर कपडा रखती रोने हे लगी थी और अर्जुन ने प्यार से मंजू की आँखों में देखते हुए निवाला मुँह में लिए और ऊँगली पर हलके से दांत गदा दिए.

"आउच..", ऊँगली को हिलती वह उसकी तरफ देखने लगी साथ हे हंसती हुई अलका दीदी की तरफ, जो अब अर्जुन से ताली मरती हंस रही थी.

"ऋतू तेरी तरफ तोह मैं अर्जुन की तरफ. दोनों की जोड़ी सबपे भरी रहेगी.", अलका की बात सुनते हे ऋतू दीदी हंसती हुई मंजू के सर के पास कड़ी हो गई.

"देख ले मंजू, ये मजा है यहाँ घर का. Ladne-hansne वाले इतने लोग और सबसे जरुरी की कोई कभी किसी से नाराज नहीं होता. अब से तू भी यहाँ दिखनी चाहिए, हम सबके साथ.", ऋतू दीदी की बात पर मंजू थोड़ा भावुक हो गई थी.

"सच कहु तोह मैंने इतना प्यार पाया है न इस आधे दिन में हे की लगता है दूर रहते हु गलती कर दी. लेकिन अबसे जब भी समय मिलेगा मैं तुम्हारे पास चली आउंगी."

"पागल लड़की, हम भी तेरे वह आ सकते है. माहौल तोह हमने हे बनाना है. यहाँ क्या और वह क्या.", अलका ने भी मंजू का गाल सहलाते हुए कहा.

"ऐ इसकी शादी हो गई है.", ऋतू दीदी की धीमी आवाज ज्यादा लोगो ने नहीं सुनी लेकिन जिन्होंने सुनी वह हंस दिए.

"इसका क्या मतलब था अलका?", मंजू ने पुछा तोह अर्जुन ने नजर हे फेर ली.

"कुछ नहीं यार बस ऋतू ने दिल टॉड दिए ये कह कर.", मंजू को अब समझ आया तोह वह भी उनके साथ हे हंसने लगी.

"चलो लड़कियों बर्तन अंदर पहुचाओ फिर मैं करती हु साफ़.", ललिता जी की बात पर कोमल दीदी ने बर्तन खुद धोने का कहा तोह अलका ने मन कर दिए.

"हम कर लेंगी ये सब. आप लोग जाओ अंदर और करो बचपन की यादें तजा.", अलका के साथ हे आरती, ऋतू और मंजू भी रसोईघर में चल दी.

"माधुरी दीदी और प्रियंका दीदी नजर नहीं आ रही ताईजी?", अर्जुन ने थोड़ा ध्यान दिए तोह बस उसकी ये दोनों बहने हे नदारद थी.

"वह तेरे आने से पहले हे सरोज के घर चली गई.", सरोज मौसी ने अपना नाम सुना तोह ताईजी ने हँसते हुए समझाया.

"हमारे सामने वाले घर में कश्यप जी की बहु है, उसका नाम भी सरोज है. अभी जो आई थी जब बचे खाना खाने बैठे थे.", तब उन्हें समझ आया के वह किसकी बात कर रही थी. अर्जुन ने ज्यादा ध्यान नहीं दिए और कपडे बदलने ऊपर चल दिए.

"अर्जुन कहा हैं?", प्रीती ने घर में आते हे कोमल दीदी से पुछा जो खाने की मेज पर अपनी माँ, मौसी और ताईजी के साथ बैठी थी. प्रीती को ऐसे सीधा अर्जुन के बारे में पूछते देख रेखा जी ने जवाब दिए.

"वह अभी ऊपर गया है बीटा. स्टेडियम जाने के लिए, जा मिल ले वही.", उन्होंने कोई सवाल जवाब न किआ लेकिन रसोईघर में कड़ी ऋतू दीदी के साथ हे मंजू ने भी उसको ऊपर जाते देखा तोह मंजू ने इशारे से हे ऋतू दीदी से पुछा.

"उन मिया बीवी की बातें न बिलकुल उबले आलू जैसी होती है यार. कोई स्वाद नहीं. तू अलका के दिल को समझा, टूट गया सुनते हे की तेरी तोह शादी हो गई है.", उनकी बात पर मंजू और अलका दोनों हंस दिए.

"ये न बड़ी तेज है मंजू. इसका माल वही है जिसको आलू बता रही थी अभी. खुद तोह उस से चिपकी रहती है और मेरे मजे ले रही है."

"तोह मंजू है न तेरे पास अब. तू भी जी ले अपनी ज़िन्दगी अलका, क्या याद करेगी की सीखी सिखाई लड़की मिली है. मुझे तोह इतनी म्हणत के बाद भी सूखा सूखा रहना पड़ता है.", ऋतू दीदी ने मस्ती करते हुए दोनों के कूल्हों पर हाथ जमा दिए. अलका को तोह आदत थी लेकिन मंजू थोड़ा हैरान हो गई.

"क्यों परेशान हो रही है. देख इधर भी हैं इसके हाथ. तेरे कुछ अलग लगा है तोह बता दे यार, मैं तुझे गर्लफ्रेंड नहीं बनाने वाली.", अलका का भी अपने जैसा हल देख मंजू शर्मा गई.

"ले अलका ये तोह खुद तैयार है. आज रात ये रहेगी हमारे साथ और आरती का पहला लेसन मंजू मैडम देंगी.", आरती हंसती हुई उनसे दूर कड़ी हो गई.

"यार सच में तुम लोग गज़ब हे हो. वैसे सच में प्रीती तेरी गर्लफ्रेंड है?", मंजू के सवाल पर ऋतू ने सीढ़ियों की तरफ देखा जहा से प्रीती वापिस आ रही थी.

"जानेमन.", ऋतू ने हलके से पुकारा और प्रीती हंसती हुई अंदर चली आई. इस जगह ये लोग खाने की मेज से दिखाई नहीं देती थी तोह वह निश्चिंत थी.

"बोलिये.", प्रीती उनके गले में हाथ रखते हुए कड़ी हो गई. मंजू थोड़े आश्चर्य से देखने लगी जब ऋतू ने हलके से प्रीती की कमर सहलाते हुए साथ लगा लिए. लेकिन अगले हे पल बाकि सब हंसने लगी.

"यार मंजू, ये न मेरी भोली सी जान है. हम आपस में हे मस्ती करती रहती है क्योंकि ज्यादा सर्किल नहीं है. सभी किताबो में लगी रहने वाली और जब मौका मिलता है तोह साथ में मजाक कर लिए, फिल्म देख ली और मौका मिला तोह इसके मिया जी को बकरा बना दिए.", अब मंजू के समझ आया के वह सभी जिंदादिल थी और अपनी हे दुनिया थी इन सभी की.

"सही है यार. और प्रीती फिर क्या कह रहे थे तुम्हारे मिया जी.", मंजू की बात सुनते हे वह शर्माती हुई सबको देखने लगी.

"बता दे डार्लिंग सब अपने हे है.", ऋतू दीदी ने वैसे हे चिपकाये हुए कहा तोह प्रीती ने हलके से कहा.

"वह, माँ ने बुलाया है आज मिलने के लिए. वही बताने आई थी के कही भूल जाये और कोई पन्गा न हो जाये.", प्रीती की बात सुनकर ऋतू दीदी ने गले लगा लिए.

"टेंशन मत ले मेरी गुड़िया. वह कहने को हे बैलबुद्धि है लेकिन बात तेरी हो तोह फिर वह जमीन आसमान एक कर देगा लेकिन तेरे बुलाने पे आएगा जरूर.", ऋतू दीदी को भी प्रीती के दिल की हलचल का पता था. इस दौरान प्रीती हलकी सी कमजोर होने लगी थी लेकिन ऋतू दीदी ने उसको संभल लिए.

"शादी तोह मैं करके रहूंगी. लेकिन ाचा लगेगा की वह गलती न करे कोई. आप तोह जानती है न के कई बार वह बातों में आ जाता है.", प्रीती को इस समय वह ऋतू दीदी के सिवा कोई नहीं दिख रहा था. यही उन दोनों का जुड़ाव था. सामने से अर्जुन को कंधे पर स्पोर्ट्स बैग डाले आते देख ऋतू दीदी ने आवाज दी और वह सीधा चला आया.

"समय याद है? इसके चेहरे पर शिकन नहीं आने देनी.", अर्जुन भी दीदी की आवाज से हे समझ गया था के वह अभी कैसे मूड में है.

"आपको लगता है के मैं ऐसा कुछ भी करूँगा जिस से शिकन आ जाये? चलता हु और 7 बजे मैं पहुंच जाऊंगा.", प्रीती के बाल हाथो से बिखेरता वह बहार निकल गया.

"वह समझदार है और अब तोह उसने अलका को भी देख लिए जो मेरे से पहले हे उसको आँखें दिखा रही थी.", ऋतू दीदी की बात पर प्रीती मुस्कुरा दी लेकिन मंजू ने पाया था के ऋतू ने बिना देखे हे अलका का भी बता दिए था.

"कमाल हो यार. क्या तुम आपस में इनविजिबल वायर्स से कनेक्टेड हो जो एक दूसरे को इतना समझते हो? प्रीती तुम तीनो को, ठीक वैसे हे ऋतू और अलका भी. अर्जुन की नजरे जैसे एकदम से किसी 25-26 साल के गंभीर लड़के से हो गई थी एक पल को."

"मंजू, सही समझा तुमने. चारो साथ हे रहे है न. प्रीती और अर्जुन, मैं और ऋतू. तभी कहती हु के थोड़ा साथ रहेगी तोह पता चलेगा. आँखें तेरी भी बहुत कुछ कहती है लेकिन वह बात रात में करेंगे. और तू जा अपनी मम्मी के पास. आंटी से कल मिलके देखते है यूनाइटेड स्टेट्स.", अलका दीदी ने ये बात कही थी और प्रीती मुस्कुराती हुई बहार निकल चली.

"क्या देख लिए अलका जो मुझे हे नहीं पता.", मंजू ने सवाल किआ और जवाब ऋतू दीदी ने दिए अलका की जगह.

"प्यार. और मेरा भाई भी करता है.", मंजू इतना सुनते हे एक पल के लिए जड़ हो गई. वह आरती नहीं थी, जो पहले हे जा चुकी थी. बस ये तीनो हे थी. मंजू सदमे सी हालत में सीधा ऊपर की तरफ वाली पिछली मजिल पर बढ़ गई. उसको जाता देख ऋतू दीदी ने अलका के कंधे पर हाथ रखा और खुद उसके पीछे चल दी.

"Ae.sshh.. पागल लड़की. रो क्यों रही है? प्यार हे किआ है न तुमने, जुर्म तोह नहीं. रोना बंद कर पगली.", ऋतू दीदी ने कमरे का दरवाजा लगाने के बाद ये कहते हुए रोटी हुई मंजू को सीने से लगा लिए.

"ऋतू यार, गलती हो चुकी है और मैं चाह कर भी वापिस नहीं लौट सकती. मुझे पता है के अर्जुन प्रीती से प्यार करता है, पहले दिन से हे और उसने भी बताया था मुझे. लेकिन ये मेरा फैंसला था जिसमे अर्जुन का कोई दखल नहीं."

"यार मैं कह रही हु न के ये बुरी बात नहीं है. खुद को दोष मत दे इसके लिए. मैं पूछूँगी भी नहीं के तुम्हारे सम्बन्ध कितने गहरे है. कोई नहीं पूछेगा और जो जैसे है वैसे हे रहने दे. तुझे ये लगता होगा के तेरा प्यार एक तरफ़ा है लेकिन अर्जुन की आँखों को मैं जानती हु. वह सबसे ज्यादा प्यार प्रीती को हे करता है लेकिन तेरे लिए भी उसके दिल में खास जगह है. चल चुप हो जा और न इसका जीकर अर्जुन से करना और न मैं किसी से करुँगी.", ऋतू दीदी उसको कुछ देर तक समझती रही फिर दरवाजा हल्का बजते हे खोल कर अलका को भी अंदर बुला लिए.

"वह पृथ्वीराज चौहान सच में हे बैलबुद्धि है. संभल तेरी जान को तू हे.", ऋतू दीदी के ऐसा कहते हे मुश्किल से चुप हुई मंजू का एक उभर अलका ने दबा दिए.

"हमारे भाई से इश्क़ करने की सजा तोह हम सुनाएंगे."

"आउच. मत करो यहाँ कुछ भी, तुम्हारे भाई ने इनका बुरा हाल कर रखा है.", बेध्यानी में मंजू के मुँह से एकदम से निकल गया और वह दोनों हे कड़ी कड़ी मंजू को देखने लगी.

"इसको अभी बिस्टेर पर बीच में बिठा. ये कहनी सुने बिना अब दरवाजा नहीं खुलने वाला. यही सजा है राज को राज रखने की.", अलका की बात पर ऋतू ने चिटकनी के साथ हे कुण्डी भी लगा दी और दोनों उसको बीच में करती बीएड पर आ बैठी.

"अपने हे भाई के बारे में सुनकर शर्म नहीं आएगी?", मंजू ने बचने की कोशिश की थी, आखिरी.

"ना, तू बस नाम मत लिओ और शुरू हो जा. हम तोह तेरी कहानी सुन्न रहे है, क्यों अलका.", अब मंजू फंस चुकी थी दोनों के बीच.
 
अपडेट 83

एक रात के baad-Ek रात से पहले (ी)


"भाई, क्या सोच कर आया है आज तू? इतना वजन तोह पहले नहीं उठा रहा था.", बलबीर देख रहा था अर्जुन को कसरत करते हुए. आज अर्जुन का ध्यान पूरी तरह से कसरत करने पर हे था जबसे वह स्टेडियम आया था. आधे घंटे बाद वह 120 किलो वजन रोड में डाले हुए बिना बलबीर की सहायता लिए छाती की कसरत कर रहा था.

"बलबीर भाई, पहले भी 100 किलो तक करता हे हु. और शरीर जितना सेहन कर सकता है मुझे देखना है. परेशां मत होना, जहा लगेगा के नहीं होगा, तोह नहीं करूँगा.", सेट ख़तम करने के बाद अपने चेहरे पर आया पसीना और गाला तोलिये से साफ़ करता वह मुँह में हल्का सा पानी भरता हुआ अब बलबीर को कसरत करते देखने लगा. अगले 10 मिनट तक दोनों कसरत से फारिग हो कर अभ्यास के लिए आ खड़े हुए और कोच संधू जी भी इनकी चमकती म्हणत देख मंद मंद मुस्कुरा रहे थे.

"भाई आज से हमारा सचेडूले बदल रहा है. याद है न तुझे जो कोच साहब ने बताया था के हमको सोमवार से अगली ट्रेनिंग करनी है.?", अर्जुन ने हामी भरी तोह बलबीर उसको लेके पहले किट पर हे आ गया.

"हलके हाथो से आज स्पीड देखनी है पंचिंग की. स्पीड सिर्फ और कोई जोर नहीं. कंधे से लेकर कलाई तक हर पंच पहले वाले को क्रॉस करता हुआ किट पर आना चाहिए. देख मैं करता हु पहले.", बलबीर का ध्यान जैसे चाँद दिनों में हे एकलव्य सा हो गया था, सटीक और सीखने को तत्पर. धीमी शुरुवात करता वह अगले 2 मिनट बाद हे भरपूर तेजी से दोनों मुक्के उस गोलाकार लंबवत टंगे हुए किट पर बरसा रहा था. अर्जुन देख रहा था के बलबीर के दोनों पाँव स्थिर है एक जगह, कमर खास कोण में मुड़ी हुई और कंधे तक शरीर में कोई हलचल नहीं लेकिन उसके बाद दोनों बाजू किसी बिजली के पत्ते इस tak-tak करती किट की सतह से टकरा भर रही थी. पूरे 5 मिनट बलबीर ये करता रहा और उसने ख़तम भी रफ़्तार को धीमा करते हुए किआ. बाजू के नीचे वाली तरफ बड़ी आकर्षक सी मांसपेशी उभरती हुई फड़क रही थी.

"क्या बात है बड़े भाई. ये तोह कबीले तारीफ था. एक पल तोह आपके पंच सेकंड से भी तेज चलने लगे थे.", अर्जुन बलबीर की जगह जाते हे कहने लगा और बलबीर सिर्फ मुस्कुराता हुआ अर्जुन को किट के सामने ठीक से खड़ा करने लगा.

"ये पाँव इस तरह क्योंकि सामने वाले हिस्से से शरीर हरकत करेगा तोह पंजा मजबूती से टिका रहना चाहिए. और छोटे ये किट और तेर शरीर मान अभी 180 के कोण पर सीधा है, लेकिन स्पीड हिटिंग के लिए हमको ये इस तरह से कमर को रखना है जिस से कंधे एक हद्द से आगे नहीं जाये. पंच ख़राब जा सकता है और रिफ्लेक्स कमजोर पड़ जायेगा. बस ये भुजा की लम्बाई 2-3 बार देख कर दुरी सही की और अब शुरू कर बिलकुल आराम से. 30 पंच 50 पंच 70 और फिर वापिस से काम करते हुए. मैं ये करता रहता हु तोह मेरा अभी थोड़ा आगे है गणित लेकिन तू कोई जल्दी नहीं करेगा."

"ठीक है बड़े भाई.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए गर्दन इज्जत देने के लहजे में झुके और जैसा बलबीर ने कहा था ठीक वैसे हे वह करने लगा. बलबीर देख रहा था के उसके मुक्के तेज चलने के साथ हे बीच बीच में जोर से भी पड़ रहे थे किट पर. लेकिन वह देखता रहा जब तक अर्जुन ने अपना सेट पूरा नहीं कर लिए.

"कैसा था?", अर्जुन को भी शायद कमी महसूस हुई थी.

"पहले सेट के हिसाब से एकदम सही. लेकिन तेरी शंका दूर कर देता हु. देख भाई तेरा वजन और साइज है बड़ा, तोह ऐसे में चाहने के बाद भी तू हेल पंच नहीं मार सकता. कोशिश ाची थी लेकिन वह बीच बीच में जो थोड़ा किट पर दबाव पड़ता था उसकी फ़िक्र मत कर. हम फिर से करेंगे लेकिन इस बार पंच की स्पीड तेरे दिमाग में तू सेट करेगा न की 30-50 का गणित.", बलबीर ने अगला सेट भी बखूबी पूरा किआ और अर्जुन को जगह दी.

इस बार अर्जुन ने वही किआ जैसा बलबीर ने कहा था. एक मिनट बाद हे उसकी गति वैसे हे हो चली जैसे बलबीर की थी लेकिन अगले हे मिनट रफ़्तार के हे साथ उसके मुक्के के प्रहारों से भाई किट भी पीछे होने लगी लेकिन उसकी परवाह किये बिना वह daya-baya करता अपने दोनों हाथ मचिनी अंदाज में घूमता रहा और जबतक वह धीमा हो पता उसको ऐसा करते हुए 8 मिनट हो चुके थे.

"देख ले बलबीर इस पट्ठे को. ये हमारे काबू नहीं आने वाला.", संधू जी हँसते हुए बलबीर के कंधे पर हाथ रखते हुए अर्जुन को देखने लगे, जो हाथ पे बंधी ढीली हो चुकी गरम पट्टी को कास रहा था.

"कोच साहब, इसका शरीर अलग है और स्टैमिना तोह हमने हे नहीं देखा अभी तक पूरा. फ्लायवेट में स्पीड रहती है हमारे पास और जैसे विकास भाई कभी हैवीवेट में सिर्फ जोर से काम चलते थे तोह वह उस केटेगरी में हे काम करता है. लेकिन एक तोह ये उनसे भी भरा और बड़ा है, दूसरा मेरी स्पीड जैसे दिमाग में फिट करके बराबर तोह गया हे लेकिन 9 मिनट की हीट. आप हे समझा सकते हो जी.", बलबीर ग्लूकोस वाला पानी पीटा हुआ शरीर को ठीक करने लगा.

"हँ.. बात तोह ठीक कही बलबीर तूने. मैंने भी स्टैमिना नहीं देखा इसका अभी तक लेकिन जल्द हे देखना पड़ेगा क्योंकि ऐसा न हो के हम इसको यहाँ क़ैद करके बैठे हो और मंज़िल इसकी भी अलग हो कोई.", संधू जी अर्जुन के पास आ गए और उसको ले कर लकड़ी के फत्तेनुमा बेंच पर बैठ गए.

"तुम्हारा khaan-pan और रूटीन क्या है बीटा? थोड़ा समझा सकते हो मुझे.", कोच साहब की बात सुनते हे अर्जुन ने पसीने में भीगी निक्कर ठीक करने के बाद गहरी सांस ली.

"सर, सुबह कुछ पक्का नहीं है 4 बजे या 5 बजे, लेकिन मैं या तोह 10 कम दौड़ लगता हु धीमी गति से जिसके साथ कुछ छोटी तेज स्प्रिंट. शरीर की लचक खोलने और गर्माने के बाद 150-200 push-up या फिर ध्यान लगता हु. जिस दिन दौड़ता नहीं उस दिन 12-13 कम साइकिल चलता हु और अभी कुछ दिन पहले साइकिल के साथ हे 20-25 मिनट स्विमिंग. शाम को यहाँ 40-50 मिनट कसरत, थोड़ी जॉगिंग के बाद और फिर आधा घंटा प्रैक्टिस. लेकिन और भी वर्कआउट हो हे जाता है jaane-anjaane.", अर्जुन ने आखिरी बात साफ़ नहीं बताई थी लेकिन उसको पता था के 2 शरीर के बीच भी कड़ा परिश्रम होता, जो आजकल हर dusre-teesre दिन वह कर हे रहा था.

"हम्म.. तुम्हे मालूम है की साधारण खिलाडी को 60-90 मिनट की हे कड़ी म्हणत की जरुरत होती है. तुम दोगुनी से ज्यादा कर रहे हो. चलो अब डाइट का बताओ जरा अपनी क्योंकि जितना मैं देख प् रहा हु शरीर तुम्हारा स्वस्थ भी है और मजबूत भी. माता जी के हिसाब से तोह तुम शाकाहारी हो लेकिन ऊर्जा कुछ और हे कह रही है.", संधू जी इस बात पर अर्जुन मुस्कुरा भर दिए बोलने से पहले.

"सर, सुबह आधा किलो का बड़ा गिलास दूध का पीटा हु साथ में एक लड्डू जो ख़ास मेरी दादी ने बनाये है. पहले भी उन्होंने कुछ ऐसी हे खुराक शुरू की थी तब 2-2 लड्डू मैं सुबह शाम खता था लेकिन अभी ये नयी खुराक में सिर्फ एक हे लड्डू है और वह भी एक समय. फिर 7 सवा 7 बजे नाश्ता रहता जिसमे दलीय, कभी paratha-makhan और लस्सी तोह कभी गुड़ वाला चूरमा. लेकिन तब भी आधा किलो के लगभग दही में खा कर हे घर से निकलता हु स्कूल के लिए. दोपहर 2 बजे खाना जिसमे सब्जी, दाल, रोटी, दही सलाद रहता है. शरीर बड़ा है तोह भूख वैसी हे लगती है. 3 बजे कटे हुए फल, एक बड़ी प्लेट. यहाँ से जाने के बाद फिर आधा किलो के लगभग दूध और एक मुट्ठी मेवे. रात को हल्का खाना, क्योंकि फिर म्हणत नहीं करनी होती.", अर्जुन ने अपनी पूरी दिनचर्या उन्हें एक हे बार में बता दी.

"तुम्हारी डाइट ठीक है लेकिन पर्याप्त नहीं है. वैसे वह लड्डू कैसे है जो तुम खाते हो?", संधू जी संतुष्ट नहीं थे अभी तक.

"जी ज्यादा नहीं पता लेकिन उनमे जावित्री, केसर, शिलाजीत और पता नहीं कितना कुछ रहता है. इन से पहले वालो में हे कोई 15-16 चीज डाली थी दादी ने और ये तोह और ज्यादा अलग है उनसे. सारा दिन शरीर में जैसे तरंगे उठती रहती है रह रह कर और कभी थकान महसूस हे नहीं होती.", अर्जुन ने जो भी बताया उसको सुनकर संधू जी गहरी सोच में पड़ गए की ऐसा क्या ले रहा है ये लड़का जो ये खुद कह रहा है शरीर में थकान हे महसूस नहीं होती.

"ाची बात है बीटा. चलो अब तुम लोग आराम करो और फिर चले जाना. हाँ, बलबीर तुम और अर्जुन अपना यूरिन सैंपल दे देना जरा. वह फॉर्मेलिटी है स्टेडियम में प्रैक्टिस करने वालो का रिकॉर्ड रखने के लिए.", संधू जी की बात सुनकर बलबीर ने गर्दन हिला दी. और दोनों कपडे बदलने चले गए गयम की तरफ.

"भाई ये ले शीशी और इसमें अपना बाथरूम दाल के इस पैकेट में बंद कर के दे दे.", बलबीर ने गयम की एक दराज से वह छोटी शीशी निकल कर अर्जुन को दी और साथ हे प्लास्टिक का एक पाउच, जो ऊपर से दबाने पर बंद किआ जा सकता था. थोड़ी हे देर बाद दोनों ने अपना पेशाब का सैंपल प्लास्टिक के बंद पैकेट के साथ अपने कोच के हवाले कर दिए और बातें करते बहार निकल गए. संधू जी ने भी इधर उधर टहलते हुए बलबीर का सैंपल गोल मुँह वाले कूड़ेदान में फेंक कर अर्जुन वाले को अपने स्कूटर की अगली डिक्की में रख लिए. "पता तोह लागू के कोई देसी drug-vrug तोह नहीं ले रहा ये लड़का. माफ़ करना बचे ये तेरी भलाई के लिए कर रहा हु इसलिए झूठ बोलै तुझसे. कल को तेरा भविष्य न खराब हो जाये कही."

.

.

अर्जुन नहाने के बाद टोलिया बंधे कमरे में आ खड़ा हुआ. कुछ सोचता हुआ वह बस शीशे को देख रहा था और कमरे के अंदर आती ऋतू दीदी को देख पल भर में हे साडी सोच ख़तम हो गई.

"ोये क्या सोच रहा है. चल पहले बनियान पहन ये और फिर मैं करती हु आज तुझे तैयार.", ऋतू दीदी ने जिस तरह ये बात कही थी वह बताता था उनके दिल में अपने छोटे भाई के लिए प्यार और इस मुलाकात की एहमियत. अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ बनियान पहन ने लगा और दीदी ने एक प्रेस की हुई सफ़ेद कमीज, जिसकी कालर हलकी नीली और वैसे हे कलैबंद थे. अर्जुन की कमीज का हर बटन दीदी ने खुद से हे लगाया और उसके साथ ये बारीक मोरी वाली bina-silwat की काली पतलून अर्जुन को देती वह देखने लगी. अर्जुन ने भी पतलून पहन ने के बाद बटन लगाए बिना दीदी की तरफ देखा.

"तू सच में हे मुन्ना है रे. चल इधर आ.", खुद हे वो कमीज अंदर करने के बाद हर तरफ से उसको सही करने के बाद ाचे से उसका निरिक्षण करने लगी. अलमारी खोल कर ऋतू दीदी ने एक साफ़ बेल्ट अर्जुन को देते हुए अंदर हे रखे उसके ख़ास काले जूते जो किसी समारोह या ख़ास समय के लिए थे बहार निकल कर कपडे से साफ़ किये.

"आप न होती तोह मेरा क्या होता.?", अर्जुन मुस्कुराते हुए उन्हें देख कर कह रहा था.

"मैं कैसे न होती? मैं और तू, एक दूसरे के हे तोह 2 पहलु हैं. अब ये साफ़ सफ़ेद जुराबे पहन और चलता बन्न.", अर्जुन हँसता हुआ जूते पहन रहा था और उतनी हे देर में दीदी ने उसके घुंघराले कुंडली जैसे एक एक करते हुए उनके वास्तविक रूप में व्यवस्थित कर दिए.

"उम्म्म.. मेरी प्यारी दीदी.", अर्जुन ने खड़े होने के बाद खुद को देखा तोह आज सच में वह एक purn-purush सा नजर आ रहा था, ज्यादा निखरा हुआ और प्रभावशाली. ऋतू दीदी ने बी जाने क्या सोच कर काले पेन से उसके कान के पीछे बिंदी लगा दी थी. फिर ऋतू दीदी को बाहों में भरते हुए उसने धन्यवाद के रूप में हल्का सा चुम्बन गाल और होंठो पे कर दिए.

"समझदारी दिखने की जरुरत नहीं ज्यादा. कही कोई वादा, वचन कर बैठे तू आंटी से. प्रीती के लिए तू हे सबकुछ है और मैं नहीं चाहती की एक माँ को अपनी बेटी के चुनाव पर संदेह हो. बात सिर्फ तेरी नहीं है मेरे भाई, बात है हमारी. और उस लड़की की जिसके लिए तू हे विश्वास है, प्यार है और ज़िन्दगी का सच. जब तू सिर्फ मुस्कुरा देता है न तोह सामने वाला आधा कमजोर वही हो जाता है. बेस्ट विशेष. उम्माह.", पंजे के बल कड़ी होती ऋतू दीदी ने कमरे से जाने से पहले अर्जुन को ये प्यार दिए. अर्जुन ने एक हाथ में चमकदार कागज़ में बंद बॉक्स लिए और दूसरे में हरे रंग का कपडा लिप्त हुआ थोड़ा बड़ा सा सामान. सावधानी से कदम रखता हुआ वह नीचे चला आया बहार वाले हे रस्ते से.

.

.

"Tring-Tring", बहार घंटी बजने की आवाज पर पारवती बड़े साढ़े हुए कदमो से चलती हुई गेट की तरफ आई तोह एक पल वह भी सामने खड़े शक्श को देख कर हैरान होती हुई बस निहारने लगी.

"दीदी, दोनों हाथो में सामान है. खोल दो दरवाजा.", झेंपती हुई सी वह अर्जुन के लिए दरवाजा खोल कर एक तरफ कड़ी हो गई और वह अंदर की तरफ चल दिए. अंदर वाला दरवाजा भी पारवती ने हे अर्जुन के लिए खोल दिए था, थोड़ा तेजी से चलते हुए.

"ग्रीटिंग्स मरस रोमेलिए मेसिना पूरी, ये खास आप के लिए.", अर्जुन ने बड़े सोफे पर बैठी इस आकर्षक महिला का अभिवादन हलकी मुस्कान के साथ सर झुकाते हुए किया तोह शिष्टाचार दिखती वह भी इस काल्पनिक से दीखते नौजवान के लिए अपनी जगह से कड़ी हो गई. अर्जुन ने बड़ा गोलाकार सामान टेबल पर रखते हुए दूसरे उपहार को दोनों हाथो में ऊपर करते हुए उनके सामने कर दिए.

"खास आपके लिए. मेरा नाम अर्जुन शंकर शर्मा है, आप सिर्फ अर्जुन बुला सकती है.", उस बंद पैकेट के ऊपर रखा गुलाब देख कर रोमिला गहरी सोच में हे डूब गई. वह भूल गई थी की यहाँ इसको लेके आना वाला भी खड़ा है. और ख़ास बात थी की इस गुलाब के साथ टहनी और आखिर में बंधा कपडा, जो बता रहा था के देने वाले के लिए इस गुलाब के ज़िंदा रहने की एहमियत कितनी है.

"प. प्लेअसुरे मीटिंग यू. प्लीज कम्फर्ट योरसेल्फ.", जब ध्यान आया तोह उन्होंने एक ाचे मेजबान की तरह अर्जुन को ठीक बराबर वाले एक सीट के सोफे पर बैठने को कहा. रोमिला की उम्र का अंदाजा लगा पाना जैसे मुमकिन न था. एक आकर्षक गोल चेहरा, जिसपर हलकी बहार को निकली हुई थोड़ी, तराशी हुई बारीक लम्बी बोहेन, चमकदार नीली आँखें, स्पष्ट नाक हलकी सी गोल और बेमिसाल मॉटे रक्तिम आधार. बिना किसी सौन्दर्य प्रसाधन के भी चमकता गोरा गुलाबी चेहरा. बाल कंधे के पास से गोलाकार कुंडलियां लेते कमर तक लम्बे, जो खुले हे थे. एक काला बिना ब्याह का कमर से कुछ नीचे तक का कुरता जिसपर कोई सुनेहरा चित्र छापा था और घुटने से आधा फ़ीट नीचे तक की एक आरामदायक स्कर्ट. वह सचमुच एक प्रभावशाली महिला थी.

"थैंक यू."

"तोह आप है अर्जुन.", एक बार फिर रोमिला ने अर्जुन पर भरपूर नजर डालने के बाद आराम से कहा. अभी भी हाथ में वह गुलाब और उपहार था जिसको वह देख लेती थी.

"जी. और माफ़ी चाहता हु के वाइन नहीं ला सकता था क्योंकि अपने से बड़ो को मैं कोई भी ऐसा तोहफा नहीं दे सकता जो किसी छोटे को देना चाहिए. इसलिए जो बेहतर लगा वह आपके लिए मैं हमारी पहली मुलाक़ात पर भेंट देने के लिए ले आया."

"ये कही ज्यादा कीमती है, किसी भी वाइन या गुलदस्ते से. और इसमें जीवन रखते हुए तुमने एक बात साबित की है की तुम्हे कदर है हर ज़िन्दगी की. इसके लिए शुक्रिया.", पारवती ने इस दौरान ट्रे में केतली और 2 कप ला कर वह रखे और वैसे हे वापिस चली गई. अर्जुन ने खुद हे उस पारदर्शी कांच के कप में केतली से वह हरा तरल डालने के बाद, छोटी प्लेट में कप रखते हुए रोमिला के सामने रख दिए. जिसके जवाब में एक बार और सामने से सर हिलाते हुए उन्होंने अभिवादन किआ.

"जी ये आप मेरे से बेहतर जानती है. मैंने तोह कोशिश की थी ोमोर्फी हमारे बगीचे में fale-badhe, और उस म्हणत ने मुझे जीवन के कई और पाठ सीखा दिए. अब उनमे से एक आपके पास है तोह ये यहाँ भी वैसे हे बड़ा होगा. वैसे आपके लिए मैं कुछ और भी लाया था जिस से आपका खली कमरा थोड़ा जीवंत लगने लगे.", अर्जुन ने वह हरा कपडा ध्यान से खोलते हुए ये उपहार उनके सामने हे बेपर्दा कर दिए. चीनी मिटटी के डेढ़ फ़ीट व्यास वाले इस बर्तन में किसी बड़े वृक्ष की डेढ़ फ़ीट ऊँची जीवंत प्रतिकृति थी, जिसपर छोटे काले अंगूर से फल लगे थे.

"वाओ. कौन हो तुम? ये यहाँ हिंदुस्तान में भी मिल सकता है?", रोमिला सोफे से थोड़ा आगे खिसक कर इस उपहार को देखने लगी. "ये बोन्साई है."

"जी आपके हे देश में होने वाला सलामत जैतून (ओलिव), मेसिना से हे तोह है आप दोनों.", पास में हे राखी बोतल से थोड़ा पानी उसमे डालती रोमिला इतनी जल्दी हे लाजवाब हो चुकी थी.

"वैसे यहाँ की कुछ खासियत नहीं है जो दोनों उपहार मेरे हे देश के लेकर आये हो?", रोमिला एक प्रभावशाली महिला थी और वह क्यों थी शायद उसका हर बात के अंदर से बात निकल लेने की कला.

"फिलहाल तोह आप यहाँ अकेली थी इसलिए मैंने वही दिए जिस से आपको कुछ बेहतर लगे. अब आप यही हैं तोह कुछ समय साथ गुजरने के दौरान यहाँ की खासियत भी आपको दिखाएंगे, आपकी अगर इत्छा हो तभी.", अर्जुन की तहजीब रोमिला को पसंद आ चुकी थी और वह खुद भी चाहती थी इस इंसान को थोड़ा ाचे से समझना.

"बिलकुल. मैं खुद भी यही चाहती हु की तुम मुझे प्रभावित करो यहाँ की खासियत से. वैसे क्या करते हो तुम?"

"ज़िन्दगी का हर मिला हुआ पल जीने के साथ हे कुछ समय पढाई, खेल और अपने परिवार के साथ बीतता हु. Non-medical सब्जेक्ट है फिलहाल लेकिन जिसमे बेहतर रहूँगा उसमे हे आगे पढाई जारी रखूँगा. बेवजह ऐसा चुनाव करना जिसकी तरफ सभी जा रहे हो, उस से बेहतर रहेगा जो पसंद हो वह करना.", अर्जुन ने गहरी बात कही जिसका रोमिला नई तनिक भी बुरा नहीं मन. पांव को हलके से दूसरे पांव पर रखती वह हाथ में लिए कप से एक चुस्की लेने के बाद बोली.

"प्रीती. क्या वैल्यू है तुम्हारे लिए प्रीती की?", इस सवाल पर अर्जुन सामने हे दिवार पर लगी प्रीती की तस्वीर को देखने लगा और रोमिला की नजरे भी उसके पीछे वही जा तिकी.

"आपको ये गुलाब और बोन्साई किसी याद दिलाता है, अगर बुरा ना मने तोह?", रोमिला तस्वीर से नजर हटती इस प्रश्न पर अर्जुन को देखने लगी.

"मुझे ये दोनों हे मेरी याद दिलाते है. मेसिना मेरा सुर्नामे और मेरा जन्मस्थान है. ोमोर्फी जैसे हर ग्रीक महिला."

"वैसे हे प्रीती है मेरे लिए. जो मेरे अस्तित्व का प्रमाण है.", अर्जुन के चेहरे पर जो मुस्कान रोमिला ने ये बात कहते समय देखि थी उसने सबकुछ बयान कर दिए था.

"शादी के बाद अगर वह कहे की उसके साथ तुम्हे ग्रीस चलना होगा तोह जवाब क्या होगा?", रोमिला ने आज का शायद ये आखिरी तीर चलाया था.

"तोह उसमे हर्ज हे क्या है. प्रीती के nana-nani, मां और उनके बचे वही रहते है तोह जाना तोह चाहिए हे. वह जहा जाना चाहेगी मैं वह उसको खुद लेके जाऊंगा. आप इस बात से निश्चिंत रहिये.", अर्जुन पूर्ववत्त हे मुस्कुरा रहा था.

"हमेशा के लिए अगर वह वही रहने के लिए कहे तोह.?", रोमिला ने वह बंद उपहार खोलते हुए पुछा.

"ये तोह मेरे से बेहतर आप हे जानती है की प्रीती ऐसा सपने में भी नहीं कह सकती. बेशक मैं कभी ऐसा बोल भी दू अगर ग्रीस पसंद आ गया तोह लेकिन वह मुझे भी वापिस यही ले आएगी.", रोमिला ने उस किताब जैसे बक्से के अंदर विभिन्न तरह के चारकोल, पेंसिल और साथ जुडी चीज देखते हुए अर्जुन के इस जवाब पर पहली बार नजर उठाते हुए मुस्कान दी.

"जानते हो, एयरपोर्ट पे मेरा art-box खो गया था. लेकिन तुमने जैसे ये दे कर मेरी खुशिया वापिस लौटा दी. तुझारा बहुत धन्यवाद इसके लिए. मैं अभी आती हु तुम बैठो.", रोमिला मुस्कुराती हुई अपने कमरे में दाखिल हुई और लटकते बल्ब के नीचे रखे टेबल पर वह बक्सा चूमने के बाद दराज में दाल दिए. एक खाली गिलास में गुलाब को संभल कर खिड़की में रखती वह बेहद खुश थी लेकिन वापिस दरवाजे तक आती हुई वह खुद को ठीक करती हुई बहार आ गई.

"8 बज गए है अब हमे डिनर करना चाहिए. मैं टेबल लगवाती हु तुम प्रीती को उसके कमरे से बुला कर ले आओ.", अर्जुन ने उनकी बात सुनते हे प्रीती के बंद दरवाजे के बहार हलके से ऊँगली की खटखट की.

"अंदर आ जाओ.", प्रीती की आवाज सुनते हे अर्जुन ने रोमिला की तरफ देखा. उन्होंने भी जाने का इशारा किआ तोह अर्जुन दरवाजा खोल कर अंदर आ गया.

"माँ खाने के लिए बुला रही है.", अर्जुन प्रीती को कान पर वॉकमेन लगाए देख एक तार निकलते हुए बोलै. "और नौटंकी ये खली है काम से काम कसेट्टी दाल लेती."

"माँ का मूड कैसा है?", वह मुस्कुराती हुई पूछने लगी तोह अर्जुन भी मुस्कुरा दिए प्रतिउत्तर में.

"ी लव यू.", उठते हुए वह इतना बोली और अर्जुन ने भी धीमे से ी लव यू तो कहा और उसके साथ हे बहार आ गया. पारवती के साथ हे रोमिला हर प्लेट ध्यान से कुर्सी के सामने रख रही थी. खाना भी बर्तनो में ढाका टेबल पर रखा जा चूका था. जैसे हे सामने से छोल साहब कमरे से निकल कर आये तोह अपने हे अंदाज में बोल उठे, "आ भाई मेरे शेर पुत्तर, लगवा ली अपनी क्लास. तोह रोमिला ये बन्दर पसंद किआ है तेरी प्रीती ने.", उनके चेहरे की हंसी तोह कुछ और हे बयान कर रही थी.

"डैड, ये बन्दर बहोत ाचा है. सीरियसली, हर बात कितनी पॉजिटिव लेता है. न कोई ओवर एक्टिंग न कुछ बना के कहना. हे इस रियल, टोटली रियल. बूत नाउ वे बोथ ोवे ा कैरिफिकेशन तो थी गाइस. तेल्ल थम तहत वे जस्ट दीद ा प्रैंक विथ बोथ ऑफ़ थम. बूत प्रीती थिस इंटरव्यू वास् रियल सोज़ I'm योर मदर एंड टोटली कंसर्नड.", अर्जुन अब प्रीती की तरफ देख रहा था जो बस रोने हे वाली थी अपनी माँ की बात सुनकर. अर्जुन अभी भी शांत था और बरी बरी से सबकी तरफ देख रहा था.

"गलत तरीका था ये आपका. दादाजी ने भी नहीं बताया के वह ये सब मिलकर कर रहे है आपके साथ.", प्रीती की आँखों में पानी आ चूका था लेकिन रोमिला ने अपनी बेटी का चेहरा सीने से लगते हुए उसको संभाला.

"बीटा, रोमिला को चिंता है तुम दोनों की. बचपन में तुम साथ थे लेकिन इतने साल में बहुत कुछ बदल जाता है. वह एक माँ के साथ हे मनोविज्ञान भी समझती है. मुझे मेरे बेटे पर कभी शक नहीं था और मैं हमेशा जानता हु की अर्जुन का दिल उम्र के साथ नहीं बदलेगा, वह ऐसे हे साफ़ रहेगा. लेकिन तुम्हारी माँ चाहती थी की वह तुम दोनों को समझे. तुम अर्जुन के लिए कितनी गंभीर हो और क्या ये लड़का तुम्हे खुश रख पायेगा. साथ हे परिवार शामिल होंगे तोह उसका नजरिया कैसा रहेगा इसके प्रति. तुम दोनों रिश्ते में समझदारी रखोगे या बचपना चलता रहेगा. मैं रोमिला की बात से सहमत था लेकिन जैसे ये अर्जुन को देखना चाहती थी वैसे हे मैं तुम्हारी संजीदगी देखना चाहता था.", छोल साहब के खड़े होते हे रोमिला ने प्रीती को छोड़ा और उन्होंने अपनी लाड़ली को बाहों में लेते हुए प्यार दिए.

"तुम्हे तोह बुरा नहीं लगा प्रीती की तरह?", रोमिला ने हँसते हुए अर्जुन से पुछा.

"मतलब अगर मैं रोऊँगा तोह आप मुझे भी गले लगा के चुप करवाएंगी?", अर्जुन की ऐसी बात सुनते हे प्रीती का रोना हंसने में बदल गया और रोमिला भी हंसती हुई अर्जुन के सर पे चपत लगाती हुई बोली.

"शैतान कही के. लगता है इंटरव्यू फिरसे लेना पड़ेगा."

"ये फिर रो देगी. इंटरव्यू जितने भी ले लीजिये लेकिन इसको बता कर.", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर रोमिला न प्यार से उसका गाल सेहला दिए.

"ाचे लड़के हो तुम बीटा. बस हमेशा इसका ध्यान ऐसे हे रखना. अब डिनर करो और कल जब भी समय मिले तोह आ जाना.", अर्जुन आज पहली बार ऐसे प्रीती की बगल में बैठा उसके हे साथ खाना खा रहा था. सबको खाना दाल देने के बाद रोमिला भी अपनी बेटी के सामने वाली कुर्सी पर बैठ कर प्रार्थना करने के बाद खाना खाने लगी.

"अर्जुन अगर तुम्हे किसी भी बात का बुरा लगा हो तोह उसके लिए माफ़ करना. एक बेटी की माँ हु तोह जान लेना जरुई था समय रहते. बाद में शायद हालात और लोग बदल जाते है लेकिन एक लड़की का दिल जरूर जख्मी हो जाता है." खाना ख़तम होने के बाद प्रीती कपडे बदलने अंदर चली गई थी और ड्राइंग हॉल में बस ये दोनों हे थे.

"आप बिलकुल ठीक कहती है और वह आपकी बेटी है तोह मुझे इस से कोई भी शिकायत नहीं जो हुआ. मुझे तोह ाचा लगा ये जानकार की अपनी बेटी के भविष्य का आप अभी से इतना सोचती है. और व्यक्तिगत तौर पर आपको जान ने का सौभाग्य मिला वह अलग."

"तुम्हारे सभी उपहार मुझे बेहद पसंद आये. जब तुम प्रीती की माँ के लिए इतना कुछ कर सकते हो तोह मैं समझ चुकी हु के मेरी बेटी को उसकी किस्मत से ज्यादा बेहतर मिल रहा है. भगवान् तुम्हे खुश रखे, हमेशा.", अर्जुन ने भी उनके हाथ सर पर आते हे चेहरा नीचे झुका लिए. रोमिला ने माथे को चूम कर आशीर्वाद दिए. प्रीती दरवाजे पर कड़ी दोनों को देख रही थी.

"मैं चलता हु आंटी, कल मिलता हु आपसे.", अर्जुन इजाजत लेने लगा जाने की तोह प्रीती ने अपनी माँ की तरफ देखा.

"जल्दी आ जाना इसको छोड़ कर. अब ये बचपन की तरह गम नहीं होने वाला, जितना मुझे लगता है.", उनकी बात सुनकर दोनों मुस्कुरा दिए और रोमिला भी हंसती हुई कमरे में चली गई उस नए उपहार का प्रयोग करने के लिए.

.

.

"तुम्हे जरा भी डर नहीं था के अगर ऐसा वैसा कुछ हुआ तोह?", प्रीती उछलती से उसके साथ चल रही थी और वह बस उसको देख रहा था.

"तुम्हारी माँ ने कभी तुम्हे मेरे साथ बचपन में खेलने से रोका था?"

"नहीं."

"फिर? और वैसे भी मुझे तुम पर ज्यादा यकीन है. वह मन कर भी देती तोह तुम उन्हें फिर से मन लेती. अब ऐसे बचो की तरह उछलना बंद करो घर आ गया है.", अर्जुन ने प्रीती को चेताया तोह वह बगीचे से पहले हे उसका गाल चूमती अर्जुन के घर के अंदर भाग गई.

"पागल लड़की. कभी दादी बन जाती है कभी बची. चलो ये कपडे उतारे जाये पहले, सांस नहीं आ रही इनमे.", अर्जुन कमीज के बटन खोलता बहार से सीढिया चढ़ता ऊपर कमरे की तरफ चल दिए.

.

.

"यार ये अर्जुन का बचा इतना आगे निकल गया और हमको कानो कान भनक भी न लगी. मंजू मासूम सी है जो देख कैसे सब बता दिए. लेकिन हैरान हु उसकी हिम्मत पर हे की वह इतना बड़ा जोखिम उठा गई अपनी हे सुहागरात पर.", अलका और ऋतू ऊपर कमरे में आ गई थी अपने. खाना इन्होने मंजू और प्रियंका के साथ हे खाया था. आरती, कोमल और माधुरी अब मंजू से बातें कर रही थी तोह ये दोनों अपनी दुनिया में सब विचार कर रही थी.

"अलका, देख सच तोह ये है के वह प्यार करती है और कितना स्पष्ट तरीके से उसने कह दिए था के अगर हम कहेंगी तोह वह कभी उसके पास नहीं दिखेगी. दिल में अजीब सा लगा था ये सुनते हे.", ऋतू दीदी थोड़ी भावुक हो रही थी.

"तोह उसको मन तोह नहीं किआ. यही कहा न के आगे से जो भी करना हो थोड़ा संभल के और अपने ससुराल में हे करना. यहाँ पहले हे इतने दर्शक है. लेकिन तेरी बात सही है यार. एक तोह वह अर्जुन को इतनी बार झेल गई और सबसे बड़ी बात तोह अभी तक हजम नहीं हो रही. चल उसको भी वादा किआ है और गलती से ये सब अर्जुन की नजर में नहीं आना चाहिए. प्रीती तक अगर कभी गई भी तोह वह बेशक समझ जाये. अर्जुन खुद को हे दोष देने लगे गए.", अलका दीदी ने इतना कहा और कमरे का दरवाजा खोलती हुई प्रीती अपने साथ हे मंजू का हाथ पकडे आ गई उनके पास.

"नाम लिए और देख ले तेरी लाड़ली आ गई. लगा ले सीने में. मैं आरती और मंजू से काम चला लुंगी.", प्रीती अलका दीदी की बात पर हंसती हुई उनके हे गले लग गई.

"आपको मैं ाची नहीं लगती क्या? कभी कभी टास्ते बदल लिए करो.", प्रीती की ऐसी बेबाकी देख अलका दीदी ऋतू को देखने लगी. मंजू भी मुस्कुराती हुई ऋतू दीदी की बगल में बैठ गई और ज्यादातर चुपचाप रहने वाली आरती अलका की गॉड में सर रखती मंजू को देखने लगी.

"ऋतू, बाद में मत कहना के तेरी मोहब्बत झूठी कर दी मैंने. और ये आरती कैसे मंजू को निहार रही है?", प्रीती तोह अलका दीदी की कमर में हाथ डालते हुए चिपक गई लेकिन जो आरती ने कहा उसको सुनते हे सभी उसको हे देखने लगे.

"हाँ तोह मंजू, करो न पहला लेसन शुरू. मुझे भी पता लगे की कैसे क्या होता है और क्यों."

"अरे ये बोलती भी है?", प्रीती की बात पर बाकी सब हंसने लगे और मंजू शर्मा रही थी.

"चल यार बता न मंजू. एक तू हे एक्सपीरियंस वाली है तोह यहाँ 4 स्टूडेंट बैठी है ज्ञान लेने. काम से काम इस भोली आरती और प्रीती का लिहाज कर ले.", ऋतू दीदी की बात सुनते हे प्रीती ने थोड़ा नाराजगी से देखा उन्हें.

"इसमें क्या बताने वाली बात है यार ऋतू. वही एक्सपीरियंस है जो सबको होता है.", मंजू कटरा रही थी उन दोनों से लेकिन जब दोनों ने हे अपनी आँखे आश्वासन में दिखाई तोह वह थोड़ा ठीक महसूस करने लगी.

"सबको एक्सपीरियंस होता होगा. लेकिन पहले से तैयारी हो तोह ज्यादा ठीक रहेगा न. अब देख यार तू नहीं बताएगी तोह मैं जा रही हु. वैसे भी माँ ने जल्दी आने का कहा है.", प्रीती के मुँह से माँ शब्द सुनते हे मंजू ने पलट कर सवाल कर दिए.

"बताउंगी चल पहले ये बता के तेरे मामले का क्या हुआ?"

"मंजू अगर ये ऐसे यहाँ बैठी उछाल रही है तोह मतलब यही हुआ न के उन्हें अर्जुन पसंद है. चल देर मत कर.", अलका ने बात काट ते हुए कहा.

"ठीक है बाबा. पहले तोह प्रीती को ढेर साडी मुबारकबाद. और मेरे से आप बरी बरी से सवाल करो मैं वही एक्सपीरियंस शेयर करुँगी. लेकिन ऐसे कहानी नहीं सुना सकती. साथ हे मैं उनका नाम नहीं लेती हु तोह बस 'उनका' हे कहूँगी, तुम लोग समझ जाना." सभी ने हम्म्म्म की आवाज के साथ हामी भरी तोह सबसे पहला सवाल सबसे छोटे को पूछने को कहा गया.

"यार मंजू मेरा सवाल थोड़ा सा अजीब लगेगा. देख जितना स्टेडियम में थोड़ा बहुत पता लगा उस से इमेज तोह बड़ी खतरनाक लड़की की निकली. ऐसे में पहली बार तेरे 'उन' ने तुझे टच किआ तोह तेरी रिएक्शन क्या थी.?", प्रीती की बात पर मंजू वह पल याद करके मुस्कुरा दी.

"मुस्कुरा क्या रही है यार. इतनी बढ़िया बात है तोह बोल हे दे.", आरती से सबर न हुआ.

"गाल पे पंजा चाप दिए था मैंने उनके. लेकिन फिर सॉरी बोल दिए था.", ये बात कहते वक़्त जैसे मंजू ऋतू और अलका से भी आँखों हे आँखों में सॉरी कह रही थी. उन्होंने उसको इशारे करने के लिए मन करते हुए गर्दन हलकी सी ना में झटक दी.

"आउच. डेंजरस हो यार. बताओ प्यार करने वाले के हे थप्पड़ जड़ दिए."

"बताया न के फिर सॉरी भी मांग ली थी और अगली बार हाथ खुद हे पकड़ लिए था."

"जैसे शादी तेरी कल हे हुई मंजू, तोह तुम लोगो का शादी से पहले अकेले में मिलना तोह मुमकिन नहीं हुआ होगा. अगर हुआ तोह क्या तुमने वह सब किआ था और कैसे? ये न शुरुआत से बताना हर फीलिंग जो उस वक़्त हुई उसके साथ. हाँ तोह तूने सवाल एक साथ हे कर दी है.", आरती अब गॉड में तकिए लिए बैठ गई थी और वैसे हे प्रीती सरक कर करीब आ गई थी.

"बड़ी हम दोनों है और हमसे ज्यादा चाव इन दोनों को हो रहा है मिलान करने का.", ऋतू दीदी की बात सुनकर प्रीती ने उन्हें अपने साथ हे आने का इशारा किआ.

"जा कहानी से पहले हे पकड़ ले इसको. पता लगे सुनते हे ये भी सुहागरात के लिए भाग ली.", अलका ने ऋतू को धक्का देते हुए प्रीती की तरफ किआ और वह भी बड़े आराम से प्रीती की गॉड में आ लेती.

"चल शुरू हो जा मंजू डार्लिंग, फिर गुरुदक्षिणा भी देंगे हम तुझे.", ऋतू दीदी ने मंजू को आँख मरने के साथ हे प्रीती का उभर हल्का सा दबा दिए. मंजू ने भी ये देखते हुए अपने पहले मिलान की कहानी शुरू कर दी. अर्जुन का नाम तोह वह पहले हे छुपा चुकी थी, उसकी जगह बस इज्जत से पति का सम्बोधन करने के स्थान पर.

"वह उस दिन पूरा परिवार सवामणी लगाने गया था और मैं हमारे खेत में हमने मिलने का प्रोग्राम बनाया था. तब तक हम दोनों बस किश तक पहुंचे थे लें जैसे मैं हे आगे बढ़ना चाहती थी.......

.

.

नीचे चहल पहल थी ललिता जी के कमरे में. यहाँ रेखा जी, सरोज जी और मधु बुआ बैठे थे. सभी विवाहित थी और ललिता जी की तरह सरोज जी भी थोड़ी मुँहफट और हंसमुख थी, और दोनों हे रंगीन किस्से सुना रही थी. बाकी दोनों बस सुनती मुस्कुराती खुश हो रही थी. तारा इधर एक नजर डालने के बाद ऊपर चली गई. यहाँ कमरे में हलकी आती आवाज बता रही थी की बाकी लड़कियां यही है. वह बहार हे कड़ी थी की अलका ने दरवाजा खोला और उसको अंदर खींच लिए.

"चल अंदर आजा तारा की बची. खिड़की से दीखता है कौन खड़ा है बहार. और आज तू भी यही सोने वाली है, आरती के साथ.", तारा ने बिस्टेर पर बैठी आरती को इस बात पर मुस्कुराते देखा तोह हंसती हुई वह भी शामिल हो गई इनके साथ. मंजू ने तारा को देखा तोह चुप हो गई.

"अरे ये भी अपनी हे है. चल आगे बता फिर क्या हुआ जब तेरे उन्होंने तुझे वही चारपाई पर लिटा लिए था.", ये बात ऋतू दीदी ने कही तारा की नंगी पिंडलियाँ पर हाथ फिरते हुए. तारा भी मुस्कुराती हुई निक्कर ठीक करती हुई मंजू से लग गई. गोल घेरा बना हुआ था बिस्टेर के ऊपर और आज रात ये सब यही रहने वाली थी प्रीती के सिवा. कहानी फिर शुरू हो गई.

.

.

रात के 11 बज चुके थे और अर्जुन अपने कमरे में अकेला था. कुछ हे देर पहले उसने स्कूल का काम ख़तम किआ था रुपाली दीदी के नोट्स के हिसाब से. इस मंजिल के पिछले हिस्से में Alka-Ritu वाले कमरे में वही सब लड़कियां थी जो 3 गद्दे फर्श पर लगाए अठखेलिया करती किस्से सुन्न रही थी. अर्जुन उठ कर पहले मुख्या द्वार पर टाला लगते हुए बाथरूम गया. और फिर अंदर आँगन से होता अपनी माँ के कमरे में उन्हें देखने लगा. वह पर रुपाली दीदी सोई हुई थी तोह वह चुपचाप वापिस बहार चला आया. कोमल दीदी के कमरे से Priyanka-Madhuri दीदी की आवाजे हलकी आ रही थी लेकिन मतलब साफ़ था के ये तीनो यहाँ सोने लगी है. फ्रिज से पानी की बोतल निकाल कर वह छत्त पर चल दिए. वैसी हे तारो से भरी रात और हलकी हवा में आते हे जो थोड़ी बहुत थकान थी वह भी चली गई.

टहलते हुए पानी पी रहा था और साथ हे aas-pas देख रहा था. प्रीती के घर का दरवाजा अभी मुकेश ने बंद किआ था और अर्जुन के देखते हुए हे वह छत्त पर अपने कमरे में चला गया. दिवार पर बैठ कर बस अब आसमान हे था जो नजर आ रहा था. आँखें हलकी झपकने लगी तोह हिम्मत करते हुए वापिस नीचे आ कर एक गद्दा और 2 तकिये ला कर छत्त पर बिछाते हुए वह लेट गया. समय कैसी चाल चल रहा था. कल रात वह मंजू के घर था और वह सब हुआ वह. आज यहाँ घर में ाचा माहौल बन गया था मौसी और मंजू के आने से. प्रीती की माँ के लिए उपहार लेते समय कितना परेशान किआ था उसने संजीव भैया को और बुआ के साथ वह समय. प्रीती के घर जो हुआ वह बहुत कुछ सीखा गया था औरत के बारे में. कितनी फ़िक्र करती है हर माँ और बच्चों के लिए सबकुछ छोड़ कर जितनी मारजु दुरी हो वह तये करती है.

"पूर्वी." जेहन में जैसे हे ये नाम आया तोह अर्जुन की आँखों के सामने वह कल सुबह का दृश्य जैसे जिवंत हो उठा. गीता सोलंकी कितना खुश हुई थी अर्जुन से मिलकर. जिद्द करते हुए खुद उसने अर्जुन को किसी छोटे बचे की तरह खाना खिलाया था. कैसे उनके बेटे की मौत ने घर के हर सदस्य को बदल कर रख दिए था जिसका परिणाम सोलंकी का वह गलत राह पर चलना, पूर्वी का अपने हे घर में क़ैद रहना और गीता की दुनिया कैसे उजड्ड गई थी. पहली बार किसी लड़की ने उसको गले लगते हुए भाई कहा था, बजाये किसी प्रेम इजहार के.

"अर्जुन, तुमने इस घर में अगर खुशियां लौटा हे दी है तोह ये सूनापन भी ख़तम कर दो. माँ की आँखों में ात वैसा हे प्यार था तुम्हारे लिए जैसा भैया के लिए होता था. और इस बहिन को भी तोह उसका सबकुछ मिल गया लेकिन मेरा भाई नहीं. क्या मैं तुम्हे भाई बुला सकती हु? अगर तुम्हारे दिल में कुछ और है तोह कह दो मुझे वह भी मंजूर है.", पूर्वी का ऐसे उसके साथ लिपटना रूह को सुकून देने वाला था जिसमे एक अंश भी मिलावट न थी. कैसे वह अर्जुन को उस कमरे को दिखा रही थी जो उसके भाई की अकस्मात मृत्यु के बाद बंद था लेकिन पूर्वी ने अर्जुन को उन्हें स्पर्श करके देखने को कहा तोह खुद अर्जुन की आँखें नम्म हो गई थी ये सोच कर हे की ज़िन्दगी से ऐसे कोई प्यारा चला जाये और पीछे उसके चाहने वाले उन यादों को सहेज कर बस जैसे तैसे ज़िंदा रहे.

गीता के वह खुद गले लग गया था वह से आने से पहले और पूर्वी को मोटरसाइकिल पर बिठाते हुए जब चक्कर पूरा किआ था तोह उसकी आँखों में वह ख़ुशी अभी तक अर्जुन के दिल में तजा थी.

"भगवन, किसी को ऐसा दिन न दिखाए.", अर्जुन शांत हो गया था सब सोचते सोचते और अब आँखें बंद करता वह ध्यान लगाने लगा, गद्दे पर लेते हुए हे.

.

.

"भाभी मैं तोह चली सोने 12 बज गए है. सरोज मेरे कमरे में आ जाओ वही सो जाना.", मधु बुआ ने खड़े होते हुए कहा और उनके साथ हे रेखा जी भी कड़ी हो गई.

"न मधु. एक में तोह मैं सो न सकती और अब उठने की हिम्मत है नहीं तोह मैं तोह ललिता भाभी की बगल में हे पसर रही हु. हाँ रेखा को ले जा, दूध भी आ रहा है.", उनकी बात पर रेखा जी ने शरमाते हुए सरोज के कंधे पर हाथ मारा.

"इसके अलग लगे है क्या? मेरे पे तुम्हारे जीजा ने म्हणत कर दी तोह इनमे भी आ जाना. चलो तुम दोनों करो मस्ती मैं ऊपर चली और रेखा सुबह मिलते है. गूडनिघत.", उनके साथ हे रेखा जी भी मुस्कुराती हुई अपने कमरे में आ गई रुपाली बिटिया के साथ सोने. नींद उन्हें भी तेज आई थी तोह बड़ी लाइट बंद करती वह साड़ी उतर कर ब्लाउज पेटीकोट में हे लेट गई. उधर उनकी जेठानी के कमरे में भी अब जीरो का बल्ब जगमग हो गया था बड़ी तुबे की जगह.

मधु बुआ ऊपर अपने कमरे में आई तोह वह भी खली था और एक बंद. अर्जुन न अपने कमरे में था और न हे संजीव के. 'कहा गायब हो गए ये तारा और अर्जुन?' यही सोचती वह पिछले हिस्से की तरफ जाने लगी तोह बाथरूम से अंदर जा रही अलका ने उन्हें बताया.

"बुआ, हम सब यही सोने लगी है. तारा, आरती और मंजू तोह सो भी चुकी. मैं भी कपडे बदल कर सोने हे जा रही थी. कुछ चाहिए था आपको.?"

"नहीं बीटा. बस तारा नहीं दिखाई दी तोह सोचा इधर पता कर लू. वह सो गई है तोह तुम लोग भी आराम करो मैं चलती हु.", मधु बुआ भी कमरे में आने के बाद दरवाजा लगाती हुई बाथरूम में चली गई अपनी मैक्सी अलमारी से निकलती हुई. कुछ सोच कर पानी डालने के बाद सिर्फ वही कपडा ऊपर शरीर पर पहनती वह बिस्टेर पर आ लेती. तारा और अर्जुन की gair-maujdgi में वह अपने बड़े कबूतर आजाद करके बेहतर महसूस कर रही थी. अपने घर तोह हर रात हे वह ऐसे रहती थी.

इन सब के बीच एक चालू करना याद नहीं रहा और कमरे भी सभी बंद थे. थोड़ी हे देर बाद जब मधु बुआ को गर्मी लगने लगी तोह बिना एक को देखे वह कमरे से निकलती बहार आ गई.

'ऊपर हे चलती हु थोड़ी देर. कल रात भी ऊपर खुली हवा में समय बिताने के बाद हे सो पाई थी.", गर्मी से परेशां वह खुली छत्त पर आई तोह अपनी लम्बी उँगलियों से बालो को खंगालती हुई इस ठंडी हवा में दिवार पर बैठ ाचा महसूस करने लगी थी. इतनी लम्बी चौड़ी छत्त थी ये और हर तरफ गहरी शांति. वह भी कभी तारो को देखती तोह कभी चाँद को. एक बड़ा सा बदल चाँद की तरफ आता हुआ उसकी रौशनी काम करने लगा था. उसके पीछे कतार में 3-4 और थे जिन्हे ये हलकी हवा जैसे बहा ले जा रही थी, लेकिन रफ़्तार इतनी मंद की 5 मिनट में वह बदल बस चाँद को छु भर सका था. स्याह गहरे रंग के ये मेघ खाली थे या पानी के भरे, कोई अंदाजा न था.

एक की वह कृत्रिम ठंडक मधु अपने जेहन से फेंक चुकी थी. टहलते हुए हे पहली बार नजर बीच छत्त पर सोये इस इंसान पर पड़ी. पर्याप्त रौशनी में ये चेहरे देख वह मुस्कुरा दी. चैन से सोया हुआ अर्जुन एक तकिया ब्याह के नीचे और दूसरा दोनों पाँव के बीच रखे गद्दे के बिलकुल किनारे पर था. ये गद्दा भी बीएड पे रखे जाने वाला फैंसी 6क्ष3 नहीं था. रूई से भरा घर पर तैयार किआ हुआ बड़ा गद्दा था जो मधु कितने हे समय बाद देख रही थी. पाँव को आराम देने के लिए वह भी एक तरफ बैठ कर गद्दे पर हाथ फिरती अपनी यादें तजा करने लगी. शादी से पहले और बाद के कुछ साल तक ऐसे हे गद्दे थे सारे घर में. उस पुराने घर में जब भी कभी बिजली चली जाती या गर्मियों की रात में अंदर घुटन महसूस होती थी तोह, एक मंजिला घर की छत्त पर वह भी ऐसे हे सोया करती थी. बिछाने से पहले थोड़ा पानी का छिड़काव करते हुए.

'सही में जो आराम ये सूती कपडा और रूई शरीर को पहुँचती है वह उन महंगे गड्डो में जरा भी नहीं. शरीर बस धंसा रहता है लेकिन इनके आराम के सामने वह कही नहीं.', खुद से बात करती हुई मधु ने बिना सोचे हे अर्जुन की ब्याह के निचे से तकिया निकल कर सर के पास रखा और आसमान को देखती लेती गई. अभी भी चाँद आधे से ज्यादा नजर आ रहा था लेकिन जितना भाग बदल के पीछे था उसकी रौशनी जैसे उनके अन्धकार ने अपने अंदर समेत ली थी.

'एक ये है जिसकी नींद में भी मुस्कान सजी रहती है. पता नहीं कैसे खुश रह पता है ये? पापा कहते है इसका दिन सुबह अँधेरे में शुरू हो जाता है, फिर कसरत, बगीचा, स्कूल, घर के काम, सबका ध्यान रखना, बॉक्सिंग, maa-papa से बातें करते हुए उनकी मालिश और जब भी मौका मिलता है किताब. यहाँ जाग कर आधा दिन काटना भी ज्यादा लगता है और ऊपर से हर समय शिकायत और तनाव. जीने का कोई मंत्र मुझे भी बता दे रे, क्या बता जून सुधर जाये.', वह अर्जुन के चेहरे में खोई मैं हे मैं खुदसे बातें कर रही थी, जैसे अभी अर्जुन उठकर उन्हें ज़िन्दगी के वह राज बता देगा जिनकी वजह से वह नींद में भी खुश रहता है.

'अब गई काम से.', और दोपहर की तरह हे इस बार भी अर्जुन का हाथ उनके ऊपर आ गया, पूरी तरह से कमर के पर.

'तकिया हे गड़बड़ करवा रहा है ये. इसलिए तोह नहीं रखता ये इसको ब्याह के नीचे.', अब वह न उठ सकती थी और न अर्जुन की नींद खराब करने का कोई इरादा था. गहरी साँसे भर्ती वह जाने कब अर्जुन के इस स्पर्श में सुख सा महसूस करती हुई खुद हे उसकी तरफ करवट लेती हुई खिसक गई. मधु बुआ की मुलायम बेपर्दा ब्याह अर्जुन की कमर से ऊपर आ तिकी. हलके से उसको सहलाती वह जैसे अर्जुन के शरीर को आराम पंहुचा रही थी. दोनों के जिस्म के बीच चाँद इंच का हे फैसला था, अर्जुन की थोड़ी मुड़ी टांगो के बीच तकिये की वजह से. बुआ ने भी आँखें बंद कर ली थी अर्जुन की इस ब्याह के घेरे की वजह से.

'बस यही बाकी था अब.', एक बार फिर उनकी आँखें खुल गई थी 10 मिनट बाद हे. अर्जुन का एक पांव मधु बुआ के निचले पांव पर आ टिका था और उनकी कमर को करीब करता वह उन्हें अपने सीने से लगाए थे. चेहरा हे बचा था जो जागने की वजह से बुआ पीछे किये हुए थी अभी तक. लेकिन अर्जुन की गरम साँसे और सीने से लगा धड़कता दिल इस चेहरे को भी अर्जुन के करीब हे ले आये. खुद को जैसे किसी अदृश्य डोर से आजाद करती मधु बुआ भी अपना दूसरा पाँव उसपर रक्तही अर्जुन से लिपट चुकी थी.

तकिया उनके भी सर से पीछे रह छुअका था और दोनों चेहरे आपस में सटे थे. पलके भींच कर मधु बुआ ने अंजाम की फ़िक्र न करते हुए अपने आधार अर्जुन के होंठो से जोड़ दिए. आसमान में चाँद भी विलुप्त हो चूका था बादल की आड़ में.

अर्जुन जैसे ख्वाब देख रहा था किसी का जो उसकी बाहों में थी और ख्वाब में हे चुम्बन होने लगा. चेहरा दिखाई नहीं दे रहा था उस अन्धकार और इतने करीब होने की वजह से. जिस्म को टटोल कर पहचान करने लगा तोह ये जिस्म अलग था. भरा हुआ, हर तरफ उचित मांसल अंग और कही रोया तक न था बाल का. कपडे की बारीक सी सतह के अंदर पूरा वजूद नुमाया था.

हकीकत में भी ऐसा हे हो रहा था कुछ. मधु बुआ के शरीर में हलकी कम्पन्न होने लगी थी जैसे हे अर्जुन ने अपने होंठो में उनका निचला होंठ भरते हुए चूसना शुरू किआ. कमर पर रखा हाथ उस पतले कपडे के ऊपर हे रेंगता सामने के एक बिना ब्रा के लटके हुए पपीते पर आ रुका. इस से आगे तोह जैसे वह सुन्न हो गई थी. नींद में हे अर्जुन उनसे लिप्त हुआ उनके इस ऊपर वाले उभर को हलके हलके सहलाता जैसे माप ले रहा था. आज हे वह बिना अंगवस्त्रो के थी और आज हे उनके dugdh-kalash पर ये मजबूत हाथ आ टिका था.

कपडे के ऊपर से हे वह कठोर हो चूका मोटा चूचक ऊँगली और अंगूठे के जड़ में आते हे अर्जुन ने हलके से पेच की तरह उमेठ दिए. मुँह से सिसक भी न पाई क्योंकि वह तोह पहले हे अर्जुन के होंठो में बंद था. ऐसा लग रहा था जैसे वह उसके साथ निर्वस्त्र हे थी. पूरे उभार का निचला हिस्सा अपनी हथली में लिए वह कभी हलके हलके उन्हें दबाता तोह कभी फिर से निप्पल के कड़ेपन को परखने लगता. होंठ आजाद हुए तोह हाथ चुचो से फिसलता मटके से बड़े कूल्हों पर फिरने लगा था. अर्जुन उनके जिस्म की खुसबू लेता हुआ सेर भर मांस हथेली में पकड़ कर हलके से दबा कर पूरा जायजा लेने लगा. मजे की अधिकता में मधु ने खुद हे उसका चेहरा अपने सीने पर लगते हुए खुद को ऊपर सरका लिए. सर अब गद्दे की हद्द पर आ चूका था और उनके मॉटे चुके पर अर्जुन का मुँह गरम साँसे छोड़ता.

अगले हे पल मधु बुआ की आँखें खुली तोह अर्जुन उन्हें हे देख रहा था आँखें खोले. नींद उचट गई थी और बुआ को बराबर में ऐसे लेते देख थोड़ा हैरान था. मधु बुआ को भी सब समझ आ गया था के ये ऐसे क्यों देख रहा है. दोनों खामोश रहे तोह मधु बुआ ने हे अपना चेहरा दूसरी तरफ घूमते हुए अर्जुन की और पीठ रखते हुए करवट ले ली. कुछ पल ये देखने के बाद अर्जुन भी चुपचाप खुद को उनके सर के बराबर करते हुए पाँव का तकिया सिरहाने लगता हुए लेट गया. हाथ अब भी बुआ के ऊपर था. उनकी सांसें बता रही थी की वह जाग रही है. बुरा नहीं लगा था इसलिए हे वह अभी भी अर्जुन के आगोश में थी.

"बुआ सो गई क्या?", अर्जुन ने वैसे हे उंगलिया उनकी गहरी नाभि के ऊपर हलके से फिरते हुए कहा तोह मधु बुआ बस ख़ामोशी से इसका आनंद लेती हुई वैसे हे पड़ी रही.

"नाराज हो क्या बुआ? वो तोह नींद में था मैं और पता नहीं था के आप मेरे बराबर में सो रही हो.", अर्जुन अपना मुँह उनके कंधे के ऊपर रखता बुआ के चेहरे को देखने लगा. ऐसे में उसका वह बड़ा सा उभार पाजामे से हे बुआ के कूल्हों पर दबाव दे रहा था. अर्जुन की ऐसी भोली बातें और साथ हे ये सम्पूर्ण मरदाना स्पर्श, मधु बुआ दुविधा के बावजूद मुस्कुरा रही थी, आँखें बंद किये हुए.

"ठीक है फिर अगर नै बात करनी तोह.", अर्जुन उनसे अलग होने लगा तोह बुआ ने हाथ कस के पकड़ते हुए अपने गुदाज उभारो के निचे हे दबा लिए.

"तू नींद में क्या देख रहा था.?", अर्जुन अब फिर से उनके नरम गद्देदार अंग से चिपका था.

"आपको देख रहा था बुआ. अँधेरे में आप हे थी वह जो मुझे सीने से लगाती हुई चूम रही थी. पहले चेहरा न देख प् रहा था फिर इनपे हाथ लगते हे आपने होंठ अलग किये तोह हमारी नजरे मिली. जब आँख खोल के देखा तोह सच में हे आप थी.", अर्जुन बताते हुए उनका ये दूसरा उभर सेहला रहा था. और बुआ भी अपना हाथ उसके हाथ पर रखे हुए दोतरफा मजा ले रही थी.

"अपनी बुआ के सपने देखने लगा है अब तू.", वह करीब से उसके चेहरे को देख कर एक अदा से पूछने लगी.

"मैं तोह बुआ पहले अकेला हे खुश हो रहा था कही अनजान सी जगह बैठा हुआ. वह दूर दूर तक सिर्फ पहाड़ और पानी बेहटा दिख रहा था. एक परछाई के पीछे चलता हुआ थोड़ा आगे निकला के अँधेरा हो गया. फिर जो हुआ मैंने बता दिए. वैसे आपके ये बहोत मुलायम है और बड़े भी.", अर्जुन ने पांचो उंगलिया फैलते हुए उनका ये उभार आधे के लगभग पंजे में ले लिए.

"िसष्ठ.. आराम से रे. ये मुलायम हे तोह होते है लेकिन आह मेरे जाने कैसे इतने बड़े हो गए. उम्म्म", अर्जुन उन्हें किसी भोपू की तरह दबा के देखने लगा तोह मधु बुआ ने आराम से दबाने को कहा.

"आपने अंदर कुछ नहीं पहना हुआ?", अर्जुन उनके मजे ले रहा था आगे बढे बिना हे.

"सीई बीटा उसकी हे सजा भुगत रही हु. आज हे ब्रा नहीं पहनी और देख ये तेरी हथेली में आ गिरे. ममम.. कुछ आता भी है या नंदलाल है.", बुआ का kaam-jwar बढ़ रहा था और वह करवट लेती अर्जुन की तरफ हो गई. अब दोनों उभर अर्जुन के हाथो की गिरफ्त में थे.

"आप जैसा कहोगी मैं करूँगा.", अर्जुन ने एक साथ दोनों चुके दबाते हुए बुआ से कहा.

"आह माँ. जीरो से शुरू करवाएगा ये मुझसे. उम्म्म.. पहली नजर में तुझ पर फँसल के वह गलती हुई और आज दूसरी गलती करते हुए वह सीखने लगी हो जो पता नहीं मेरा क्या हाल करेगा.", सामने की लम्बी चैन खोलती हुई बुआ ने दोनों बड़े चुके निर्वस्त्र कर दिए. 2-2 किलो के ये झूलते पपीते हलकी रौशनी में भी अपनी छत्ता बिखेरते हुए एक दूसरे से चिपके अर्जुन के अगले कदम का इन्तजार कर रहे थे.

"अब दबा इन्हे और मुझे वैसे हे चूम.", बुआ की बात पूरी करता अर्जुन अब उन चुचो की असली मलाई सी चिकनाहट महसूस करता हुआ उनका ाचे से मर्दन करने लगा और बुआ अपनी जीभ उसके मुँह में देती हुई उसको वह kaam-kala सीखा रही थी जिसमे वह पहले से हे पारंगत था. चुचो का मसलने का पूरे शरीर पर असर होने लगा था बुआ के. टाँगे मदद कर अर्जुन पर रखती बुआ को कोई भान न था के उनका ये चोगे सा लिबास जांघ तक बेपर्दा था. ऐसे हे एक दूसरे का मुखस्वाड लेते हुए अर्जुन का ऊपर वाला हाथ मैक्सी के अंदर चिकनी मोटी जांघो से फिरता हुआ रबर सी नरम लेकिन ाचे फैले हुए बड़े चुत्तड़ो पर आ रुका. निचले हाथ से वह उस अंगूर के डेन को दबाता इस हाथ से उनके रूई से नरम कूल्हों में उंगलिया दबा रहा था.

"पहले इन मुँह में भर के चूस रे ाचे से. लेकिन ये बनियान उतार फिर ऊपर आजा.", अर्जुन ने आज्ञाकारी बचे की तरह ये बात भी मानते हुए अपना ऊपरी हिस्सा उजागर कर दिए. बुआ भी उसके जिस्म को निहारती हुई चौड़ी छाती पर हाथ फिरने लगी.

"अब आप पीने तोह दो.", अर्जुन की ऐसी बात सुनते हे वह मुस्कुराते हुए अपने उभर पकड़ती खुद उसके मुँह में लगाने लगी.

"आह्हः.. पी ले रे इन्हे. कस के निचोड़, ऐसा हाल कर दे की 2-3 दिन ये हाथ लगने से भी दुखे.", सचमुच मधु बुआ कुछ अलग हे स्तर की कामुक महिला थी. उनके शरीर का हर भाग मखमली नाजुक सा था, लेकिन वह जैसे अलग हे तरह का प्यार चाहती थी. अर्जुन भी कभी निप्पल तोह कभी पूरा निप्पल से आगे का भाग मुँह में लेता और होंठो में भर के जोर से पीने लगता. मस्ती में एक हाथ से उसका सर सहलाती बुआ का दूसरा हाथ दोनों के बीच की उस जगह आ पहुंचा जहा वह भयंकर अजगर झूल रहा था.

"अरे बाप रे. ये क्या बाला पाल राखी है तूने?", अर्जुन को परे हटती मधु बुआ मैक्सी के खुल्ले हिस्से से अपने बड़े और झूलते चुके लटकती अर्जुन के लिंग का जायजा लेने लगी तोह कान के पीछे इस हलकी ठंडक में भी पसीने की लकीर बह चली. तुरंत पजामा निचे सरकती वह आँखे बड़ी करती इस हथियार को देख रही थी जो उसके शरीर की गर्मी से इतनी देर से अकड़ा खड़ा था.

"क्यों सबका ऐसा नहीं होता?", अर्जुन ने चित्त लेते हुए हे एक नरम चुका दबाते हुए पुछा.

"आठ.. रुक तोह सही. सबका ऐसा नहीं होता रे. ये तोह मुट्ठी से भी एक इंच बहार है. और ये लम्बा कितना है?", बुआ आश्चर्य से उस विकराल अंग को मुठिया जोड़ते हुए मापने लगी तोह तीन हथेली की चौआई जितना लम्बा वह लुंड इस्पात (स्टील) सा सख्त था. हाथ पर हे उन्हें उसकी मोटी नस्से पता चल रही थी.

"करना क्या है? ऐसे हे इसको पकडे बैठी रहोगी रात भर.", अर्जुन ने फिर से वही उभार दबाते हुए पुछा जहा से बुआ उसका हाथ हटा चुकी थी.

"जो भी करना है मैं करुँगी. लग तोह रहा है के मौत बुला ली लेकिन पीछे तोह नहीं हटूंगी.", मैक्सी पूरी उतार कर वह खुली छत्त पर अब अपने भतीजे के सामान जन्मजात अवस्था में थी. बहार को निकली गांड अब बता रही थी की ये कितनी बड़ी है और पतली कमर के बाद ठीक वैसे हे भारी चुके जो गांड से विपरी सामने की तरफ निकले थे, 2 गोल निप्पल को उभरे हुए.

"अब तू ज्यादा hil-dul मत, जो करना है कर मैं मेरा काम करती हु.", दोनों हाथो से उस लुंड को ऊपर सीधा करती वह चेहरा करीब करने के बाद मुँह से लार लुंड के मॉटे सुपडे पर गिराने लगी. अर्जुन नीचे लेता बस मुस्कुराता हुआ बुआ के परिश्रम को देख रहा था. सूपड़ा भिगोते हे बुआ ने हलके हाथो से लुंड की खाल उंप्पर नीचे करते हुए उसको चिकना करना शुरू कर दिए था.

"सच में तू पूरा हे असाधारण है रे. क़ुतुब मीनार लिए कौन घूमता है.", बुआ अर्जुन के दोनों तरफ पाँव करती अपनी आग को भुजने की जल्दी में लग रही थी. घुटने गद्दे पर टिकाये वह आँखे बंद करती हुई जितना ऊपर उठ सकती थी उतना हो गई. लुंड एक हाथ में उतना हे ऊँचा था उनके मांसल शरीर की जड़ के मुहाने पर. चिकनी मोटी और लम्बी फांको में खुद हे अर्जुन के लुंड का सूपड़ा फिरती वह मदहोश हुए जा रही थी.

"कछह.", कूल्हों का भार नीचे की तरफ गिरती वह इस भयंकर दर्द से चीख पाती की अर्जुन ने फुर्ती से उनके बड़े गुम्बद से कूल्हों को हाथो में सँभालते हुए होंठो पर टाला लगा दिए. आधा लुंड बुरी तरह से चूड़ी हुई छूट को फाड़ता हुआ अंदर जा चूका था. वही हाथ उनकी पीठ पर ले जाते हुए अर्जुन ने सिरहाने से उलटी दिशा में उनका जिस्म गद्दे पर टिका दिए.

"शठ. शांत रहिये बस हो गया.", आँखों के किनारे से आंसू निकल आये जो रात के समय चमक रहे थे. अपनी बात बोलते हे अर्जुन थोड़ा रूमानी होता हुआ उनके होंठो को प्यार से पीने लगा और साथ हे बड़े दूध सख्ती से दबाता हुआ छूट का दर्द काम करने. लुंड उतना हे फंसा हुआ था और बुआ के पाँव अब जैसे जवाब देते हुए सीडी पसरे थे.

"पाँव पे कुल्हाड़ी मरते होंगे लोग लेकिन यहाँ तोह छूट में तलवार हे दाल ली.. आह्हः माँ.. ", अर्जुन ने उनके गालो को चूमते हुए हल्का सा लुंड बहार किआ तोह मोटी फांके और जयादा उभर कर रगड़ खाने लगी. लेकिन शरीर की गर्मी बनाये रखने के उद्देश्य से उसने वापिस उतना हे लुंड अंदर भर दिए. गांड की भीड़ी दरार में कोई तरल सा बेहटा महसूस हुआ लेकिन मधु की हिम्मत न थी.

"बुआ हो चूका जितना दर्द होना था. जल्दी आपको हे थी सीखने की और अंदर लेने की. अब बस आराम से लेती रहो और मुझे प्यार करने दो. दर्द ख़तम हो जायेगा.", उन्हें हौंसला देता वह फिर से मधु का मधुरस पीटा हुआ दोनों हाथ मोती गांड के निचे रखते हुए थोड़ा ऊपर उठाने लगा. ऐसे में लुंड बिना अतिरिक्त धक्के के सिर्फ दबाव से हे आगे सरकने लगा. छूट का सामने वाला भाग हे टाइट था सही से चुदाई न होने की वजह से. अंदर की सुरंग चिकनी थी जहा अब 7 इंच लुंड फसाये अर्जुन उनकी गांड के नरम छेड़ को दबाता हुए फिर से kaam-rang उनमे भरने लगा.

"सीई.. ये ाः कहा से सीखा रे.? उस छेड़ को दबाते हुए दर्द काम होता मैं आज देख रही हु. उम्म्म.. लेकिन छूट तोह फाड़ हे दी. बस जैसे तैसे करके तू हो जा अब.", अर्जुन उनकी बात पर मुस्कुराता हुआ धीमी रफ़्तार से अपना घोडा आगे पीछे करने लगा. मॉटे होंठ अब खिंच नहीं रही थे धक्के के साथ लेकिन फिर भी कैसे हुए थे.

"आअह्ह्ह. अर्जुननननन.. उम्म्म.. काट इन चुचो को और ऐसे हे पूरा दाल के कर... उम्..", छूट रास लुंड बहार की फैंको पे आने लगा चिकने लुंड के साथ तोह अर्जुन ने ऊँगली का पूरा वह से गीला करते हुए उस गद्देदार कूल्हों की जोड़ी के छेड़ में ऊँगली दाल दी. एक पल को हवा में रूकती मधु बुआ इस नए मजे से निहाल होने लगी. जहा छूट के फटने से दर्द हुआ था वही 5-6 मिनट में छूट ने इस लुंड के सामने पानी बहा दिए था. वह लम्बी लम्बी साँसे लेती आँखें बंद किये तृप्त होने का मजा ले रही थी और अर्जुन ने उनका शरीर गद्दे पर टिकते हुए लुंड बहार खींच लिए.

"आईई.. इस्सस..", वह आँखे खोल कर उसको देखने लगी की ये अचानक क्या हुआ.

"तेरा नहीं हुआ है. कर तोह ले पहले."

"बुआ मेरा ऐसे नहीं होगा. फिर कभी करेंगे. आप आराम करो इधर मेरे साथ लेट कर.", अर्जुन अपनी पुराणी जगह लेट कर आँखे बंद करने लगा तोह शरीर की साड़ी तगत जमा करती मधु अपने भतीजे के ऊपर आ लेती.

"तेरा होगा जभी तेरे साथ सोऊंगी. मेरी जिद्द है और मैं मनवा के रहूंगी." लुंड के ऊपरी हिस्से पर छूट रगड़ती वह सिसक रही थी लेकिन हटी नहीं. फिर लेते हुए हे थोड़ा आगे सरकती वह सुपडे पर छूट भिड़ने लगी तोह अर्जुन ने दोनों कूल्हे पकड़ते हुए हलके से कमर धकेल दी.

"ओह्ह्ह.. आराम से.. देख अब दोनों साथ हे होंगे.", अपने चुके उसकी छाती पर घिसती हुई मधु बुआ अर्जुन के होंठो को चूमती हुई बोल रही थी. इस बार आधा लुंड बड़े आराम से अंदर aa-ja रहा था. हथेली उसकी छाती पर रखती वह गांड को और पीछे करती अब ज्यादा हे अंदर तक लेने लगी तोह अर्जुन भी मजे में उनके निप्पल चूसता हुआ कमर हिलने लगा.

"ऐसे हे रे.. आठ. एक बार तोह तारे दिखा दिए थे. उम्.. लेकिन बचा पैदा कर चुकी हु.. आह तोह लेके भी रहूंगी ये पूरा.."

"बुआ पहले भी 2 इंच बहार था और अभी भी है. फिर कभी पूरा लेना अब मैं आता हु पीछे.", अर्जुन ने छूट रास से सना लुंड बहार निकलते हुए उन्हें घोड़ी की मुद्रा में किआ तोह वह इन फैले हुए चुत्तड़ो को निहारने लगा.

"अब वह मत दाल डीओ जहा घूर रहा है. चल अगली पर हे ध्यान दे.", अर्जुन ने हँसते हुए दोनों कूल्हे फैला कर छूट का छेड़ उभरा और इस बार एक झटके में हे वह पूरा अंदर डालते हुए गांड से चिपक कर रुक गया. लुंड का आखिरी हिस्सा उसकी मुट्ठी में था.

"आह्हः.. दाल दे रे पूरा. हाथ हटा.", अर्जुन भी समझ गया था के वह ले लेंगी. और अगले 3-4 धक्को में थोड़ा थोड़ा करता वह समूचा लुंड उनकी फैली हुई गांड के नीचे से छूट में बिठा चूका था.

"बुआ अब देखो जरा.", कुछ सोच कर हे उसने कहा था और अगले हे पल वह सुपडे तक बहार निकल कर बुआ की छूट के अंतिम सिरे पर ठोकर मरने लगा. मजे से दोहरी होती बुआ सर तकिये पर टिकाया मस्ती में छुड़वा रही थी.

"मममम.. आह्हः.. क्या खता है रे तू... शरीर टॉड दिए लेकिन छूट तेरे लुंड से हटने का नाम नहीं ले रही.. कस के मार.", हर धक्के बार दोनों कूल्हे पानी की टंगे से छोड़ते हिल रहे थे. अंगूठे से गांड का छेड़ कुरदता अर्जुन भी बुआ को दोगुना मजा दे रहा था. जल्द हे उनकी छूट ने बारिश शुरू की तोह अर्जुन ने भी लुंड बहार निकलते हुए गांड के नरम छेड़ से थोड़े दबाव से भिड़ा दिए. ऊँगली बराबर खुले छेड़ में भरता वह गधा रास जैसे चिकना करने लगा और एक चौथाई गुलाबी हिस्सा वही फंस के रुक गया.

"ाः.. कैसे कैसे मजे दे रहा है रे तू. उस छेड़ में हे सब भर दिए बिना अंदर डाले.", अर्जुन के अलग होते हे वह धम्म से वैसे हे लेट गई. उनकी बगल में अर्जुन भी पजामा पहन कर उनकी पीठ सहलाने लगा.

"अगली बार के लिए तैयार कर रहा था बुआ.", अर्जुन ने धीरे से कहा तोह वह दर्द से सिसकती जैसे तैसे बैठी और जल्दी से मैक्सी पहन कर उठने लगी लेकिन यहाँ ताक़त ख़तम हो चुकी थी.

"मजाक कर रहा हु बुआ. चलो मैं कमरे में छोड़ आता हु.", अर्जुन ने उन्हें किसी छोटे बचे की तरह बाहों में उठाया तोह वह दर्द में भी मुस्कुराती हुई उसके होंठ चूम कर बोली. "मजाक तोह मैं भी कर रही थी तेरी बाहों में आने के लिए. अब उठा लिए तोह सुला के भी आ.", अर्जुन भी हँसता हुआ उनको लिए नीचे आ गया.

"मेरे साथ यही सो जाओ न.", बाथरूम से उन्हें साफ़ करके खुद हे वह बिस्टेर पर लिटाने के बाद जाने लगा.

"नहीं बुआ. ये तारा और आपका बिस्टेर है. दिन की तरह वही सोना है तोह ठीक है. ये रात मैं आपके साथ हे सोऊंगा.", अर्जुन छत्त पर गद्दा उठाने चला गया बुआ को कमरे में लिटाने के बाद. रात के पौने 2 हो चुके थे और अब सोना हे था.

"मैं यहाँ भी खुश हु.", बुआ अर्जुन के बिस्टेर में लेती मिली जब वह अंदर आया. बहार कमरे की लाइट बंद थी जिस से वह देख न सका. अपने बिस्टेर पर उनकी बगल में लेता तोह उन्होंने चादर उसके ऊपर भी दाल दी.

"अंदर आजाओ. एक ों है और ये दरवाजा इसलिए खुल्ला रखा है.", अंदर वह निर्वस्त्र थी और बहार वह अर्जुन की तरफ मुँह करके मुस्कुरा रही थी.

"मानोगी नहीं?", अर्जुन ने भी उन्हें बाहों में लेते हुए कहा.

"तेरा दिल नहीं है तोह कोई बात नहीं.", इसके साथ हे उनकी हलकी सिसकी कमरे में गूँज गई.

"अब अंदर हे करूँगा. बीएड खराब नहीं करना मैंने अपना.", पीछे से हे वह बुआ में समां चूका था और दोनों के उलझे होंठ बता रहे थे की इस रात ये दोनों हे नहीं सोने वाले
 
अपडेट 84

एक रात के baad-Ek रात से पहले (III-A)


इस गहरी रात में कोई और भी था जिसकी नजरो में नींद न थी. दिन तोह जैसे तैसे काट गया था लेकिन आज घर में किसी के न होने से मेनका शाम को हे अन्नू के साथ उसके घर चली गई थी. दोपहर का खाना दोनों ने हे साथ में खाया था और कुछ वक़्त कंप्यूटर पर बिताने के बाद दोनों हे सहेलियां अन्नू के बिस्टेर पर लेती पहले स्कूल फिर अपनी अपनी ज़िन्दगी की बातें करने लगी थी. कब ये बातें रुख बदलती प्यार और चाहत की तरफ चली गई शायद उस वक़्त दोनों इस से अनजान थी. मेनका अभी बिस्टेर पर लेती अन्नू के कहे हर अल्फाज जैसे याद कर रही थी.

"यार मेनका, तेरी शादी हुई तोह तुमने तोह फिर भी ज़िन्दगी के कुछ पल जिए हे हैं, बेशक रिश्ता उतना नहीं चला लेकिन अपने खुद के पूरे होने का एहसास हो जाना कुछ काम तोह नहीं. यहाँ जैसे आधी जवानी निकल गई किताबो में और अब जा कर जो प्यार मिला है वह मेरी हालत समझता हे नहीं है. क्या करू यार?", अन्नू जैसे बात करते हुए भी अर्जुन की कमी महसूस कर रही थी. बाहों में तकिया दबाये मेनका से हल पूछ रही थी जो भी वह ऐसे में महसूस कर रही थी या चाहती थी.

"अन्नू, हमने स्कूल के पहले 6-7 दिन साथ गुजरे और मैं तेरे घर से अनजान भी नहीं. न हे हम कोई बात छुपाते है ek-dusre से. लेकिन क्या तुझे मेरा सारा सच पता है?", मेनका जैसे उसके सवाल की जगह इस अन्नू के उसकी पिछली ज़िन्दगी के अनजाने अनुभव से कुछ आहात हुई थी.

"तुमने जितना बताया है यार या फिर मैं जितना सोच सकती हु एक मैरिड की लाइफ के बारे में, मैंने उसके हे हिसाब से कहा है. कुछ गलत कह दिए तोह यार सॉरी.", अन्नू ने एक हाथ पास में बैठी मेनका पर रखते हुए जैसे उसके ऐसा कहने के पीछे का राज भी jaan-na चाहा.

"अरे तेरी कोई गलती नहीं है लेकिन आज तुझे बता हे देती हु. घर में जब पैदा हुई थी तोह सब तरह से संपन्न थे लेकिन एक तोह वह गाँव का माहौल जहा घर में सिर्फ baap-dada की हुकूमत चलती थी, ladaai-jhagde, किसी की जान lena-maar देना यही सब होता था. और दूसरा मेरी माँ, जो मेरे बाप की दूसरी बीवी थी. इन झगड़ो की वजह से एक दिन वही हुआ जो ऊपर वाला करता है. उस समय के सभी मर्द मारे गए और मेरी माँ विधवा हो गई. दूसरी पत्नी थी तोह नयी जिमिदार और मुखिया, मेरे बाप की पहली बीवी ने उनके साथ हमको भी बेदखल कर दिए. 6-7 साल की रही होउंगी मैं और मेरे से बड़े मेरे भैया हे थे जो उस समय 12 के रहे होंगे. हमारी बड़ी माँ, जो खुद उस समय एक बेटी की माँ थी और खुद पेट से भी थी को जरा तरस नहीं आया हम बचो पर. गांव के बहार 2 कमरे का कच्चा मकान और 2 एकड़ बंजर जमीन देने के बाद उन्होंने सब रिश्ते ख़तम कर लिए थे.", मेनका अतीत में खोई आज अपना सबकुछ बता रही थी और अन्नू वैसे हे उसका हाथ थामे सुन्न.

"माँ सारा दिन खुद टोकरी में पठार इकट्ठे करती और भाई उन्हें एक तरफ फेंकता. बहोत म्हणत करके थोड़े हिस्से को खेती लायक बनाया था दोनों ने. फिर कुछ दिनों के बाद एक शख्स आया 23-24 का रहा होगा, मेरी माँ को उसने 10000 रुपये दिए थे ये कहते हुए की वह पैसा किसी निवेश का था जो हमारे पिता ने उनके नाम से किआ था. माँ समझदार थी और उन्होंने भैया के साथ खेती संभाली और मुझे आगे पढ़ना शुरू करवा दिए. थोड़े समय के बाद भैया एक बचे को अपने साथ घर ले आये ये कहते हुए की वह उन्हें मिला है जो अकेला भूख से बिलबिलाता उजाड़ में जगह पर था. माँ ने उस अबोध बचे को भी परिवार में शामिल कर लिए. सब धीरे धीरे ठीक होता चला गया, जमीन भी घर भी और साथ हे परिवार की हालत भी. माँ ने मेरी पढाई नहीं रुकवाई और भैया ने भी एक bhai-baap का फर्ज ाचे से निभाया. वह पैसे हर साल हमे मिलते रहे जो वह लड़का पहली बार खुद दे कर गया था लेकिन अब खाते में आते थे. मास्टर की डिग्री करते समय हमारे पड़ोस की जमीन देखने उनके मालिक आये थे और उन्होंने मुझे भी भैया को रोटी देने आने के समय देख लिए था. पता नहीं कैसे लेकिन भैया मान गए और कुछ दिन बाद हे मेरा lagan-shaadi आगे पीछे हे करते हुए मुझे घर से विदा कर दिए एक ऐसे घर और परिवार में जिसका मुझे कुछ ata-pata न था पहले.", मेनका अपनी कहानी बताती हुई अन्नू की तरफ हे मुँह करती लेट गई थी. अन्नू अपनी इस सहेली की व्यथा सुनती इस मदद पर थोड़ी दुखी हो गई थी.

"मेनका, ये तोह सचमुच बहुत na-insaafi हुई तेरे साथ. अगर तेरे भैया तुझसे इतना हे प्यार करते थे तोह काम से काम तुझसे पूछते और सलाह मश्वरा करते. ऐसे कैसे सीधा शादी? बुरा हुआ सरासर.", अन्नू की बात पर मेनका एक फीकी हंसी हस्स दी.

"बुरा? वह तोह अब होने वाला था. मेरा पति फ़ौज में था और थोड़ा सरफिरा सा. ऐसा नहीं की कोई चरित्र से बुरा लेकिन वह थोड़ा अलग था. हाँ maa-baap ऐसे थे जो jaat-biradari की डींगे हाका करते थे और सब पाबंदिया औरतो पर हे लागू थी. पहली हे रात को मुझे पता चला था के शादी करने के पीछे एक मरद की मंशा क्या होती है. कॉलेज की 5 साल पढाई में जिस्मानी रिश्ते और ladka-ladki का पता था लेकिन हमेशा से मैं अपनी माँ और भैया को देख कर बड़ी हुई तोह pyaar-vyaar से कोसो दूर थी. लेकिन उस पहली रात मेरे साथ जो भी हुआ वह प्यार कदापि नहीं था. शराब के नशे में चूर इंसान ने जो दिल किआ वह करा और मेरे रोकने पर कपडे फाड़ना और हाथ उठाना तक हुआ. औरत, वह भी अकेली नयी जगह. जैसे तैसे सब सहा और जाग कर रात निकली. सुबह छोटे से ऋषभ के साथ अपने घर आई थी फेरे पर तोह सोचा था के माँ समझेगी और उनसे बात करेगी लेकिन उन्होंने सिरे से नकार दिए ये कहते हुए की मर्द को सुख देना हे मेरा धरम है. पति के घर वापिस आ गई और 4 दिन बाद वह ड्यूटी पर. अगले ये 6 साल मैंने सास के ताने, ससुर के हुकुम और jaan-pehchaan में एक आदर्श बहु की तरह गुजरे, मुँह पर एक नक़ाब पहने हुए. मेरा देवर हमेशा मुझपे निगाह रखता था के कब मैं अकेली मिलु और वह भी अपने भाई की तरह मुझ पर अपनी चाप लगा दे. एक तरह से खुद को बचते हुए मैंने वह समय निकला.", एक आह सी लेती वह छत्त को देख रही थी और अन्नू भी वैसे हे ऊपर देखती हुई अपनी सहेली की ये दास्ताँ सुन्न कर खुद को खुशकिस्मत मान रही थी ऐसे maa-baap और भाई के परिवार में जनम लेने पर.

"मैं या तोह खुद को मार लेती या फिर घर से भाग जाती. इतना कुछ नहीं सेहन कर सकती थी मैं. सही हुआ जो पीछा छूटा उस नरक से तेरा.", अन्नू का ये परवाह से भरपूर और मेनका के प्रति इतनी संवेदना बता रही थी की अन्नू सच में इतने दर्द से अनजान थी.

"सुख की बात भी सुन्न ले. जो बताने जा रही हु पहले तोह सोचा था कभी न कहूँगी, लेकिन राजदार से फिर क्यों कुछ छिपाना. 23 साल बाद मुझे वही शख्स दिखा जिसने पहली बार हमारे परिवार की मदद की थी जब हम ज़िन्दगी के आगे बस हरने हे वाले थे.", मेनका के ऐसा कहते हे अन्नू ने उसको हैरानी से देखा.

"23 साल बाद तूने उस शख्स को देखा और पहचान भी लिए? 7 साल की लड़की थी तू और वह 23-24 का रहा होगा जैसे तूने कहा था. और इतने साल बाद तूने वह इंसान एक हे बार में पहचान लिए? कुछ भी यार.", अन्नू ने नखरे से हवा में हाथ चलते हुए जैसे बात पर विश्वास नहीं करते हुए कहा.

"देख हम किसी भी चेहरे को भूल सकते है लेकिन उसको नहीं जो तुम्हारे हाथ पकड़ कर बुरे वक़्त में मदद करे. लेकिन ये चेहरा रत्ती भर बूढा नहीं हुआ था. बल्कि जैसे ज्यादा हे जवान और चेहरे पर गंभीरता की जगह एक मासूमियत के साथ हे चमक. मैं बस का इन्तजार कर रही थी यूनिवर्सिटी वाले थाने के मदद पर, पहली बार मंजू को देखने जाने के वक़्त. ये वही लड़का मदद से पहले मोटरसाइकिल की टंकी हिलता दिखा तोह मैं भी चेहरा देख हैरान रह गई. वह पास से निकलता उस से पहले मैं हे मोटरसाइकिल के सामने आती उसको अगले गाँव तक लिफ्ट देने का कहने लगी. मालूम था के ये इंसान मन कर हे नहीं सकता. पूछेगी नहीं के वह कौन था?" मेनका के ऐसे रहस्यमयी तरीके से पूछने पर अन्नू भी आँखें बड़ी करती उसको देखने लगी.

"हम ऐसे कितनो को जानते है जो कॉमन हो हमरे बीच?", अन्नू का जवाब सही था.

"तोह जो कॉमन है वही बता.?", मेनका ने आँखों में एक ख़ास चमक के साथ कहा.

"अर्जुन? सीरियसली?", अन्नू उठ कर बैठ गई थी इतना कहते हे और साथ हे हंसती हुई मेनका भी.

"हाँ. जो चेहरा मुझे याद था ये वही लड़का था और नाम पता चला तोह अर्जुन. लेकिन शकल एक जैसी थी और ये एक स्कूल में पढ़ने वाला लड़का. मतलब हमारा मददगार या तोह इसके पिता थे या परिवार से हे कोई. लेकिन उसके बाद जो हुआ जैसा मैंने पहले बताया था तुझे तोह पहली बार ज़िन्दगी में मुझे एहसास हुआ के कैसा इंसान मुझे चाहिए था. मेरी िज्जात्त करने के साथ हे हर पल में मेरा ध्यान रखने वाला और दिल से समझदार. खुद हे सोच के 10 मिनट पहले मिली औरत के लिए उसने अपने से दोगुनी उम्र के एक बदमाश से लड़ते हुए मेरी हिफाजत की. न सारे रस्ते वह मुझे लेके गया और आया, बल्कि इस वक़्त के दौरान पूरी आत्मीयता के साथ अपनापन, देखभाल की. और चेहरे पर हलकी परेशानी तक न आने दी. मुझे कोई अफ़सोस नहीं था मेरे पति के गुजरने का क्योंकि हम कभी एक हुए हे नहीं थे. अर्जुन के साथ एक घंटा मुझे ज़िन्दगी का सबसे अनमोल याद बांके मिला. सोचा था के जब कभी भी किस्मत ने मिलाया तोह उसको बता दूंगी की मुझे जैसे तुम्हारी हे तलाश थी. हाहाहा..", अन्नू अब अंदर से घबरा रही थी लेकिन मेनका के हंसने से वह जैसे स्थिति को समझ कर चुप हे रही.

"फिर.?"

"फिर वही. वह एक मासूम सा जवान हो रहा एक लड़का और मैं 30 साल की विधवा. उसके परिवार ने हे हमको ये ज़िन्दगी दी है जिसमे हमारे पास सबकुछ है, मेरा दिल यही कहता है. किसी ने मुझे कुछ बताया नहीं और ना मैं जान न चाहती हु. वह खुद मुझे परेशां नहीं देख सकता और जब भी मैं उसको अपने aas-pas देखती हु तोह जैसे मुझे वही जीने की एक वजह मिल जाती है. ये लड़का बस खुश रहे, मेरा हाल चल पूछता रहे और जब भी उदास हो तोह मेरी मुस्कान अपनी बातों से वापिस ला दे. मैं इतने में हे खुश हु अन्नू. और जरा खुद को देख, अर्जुन के साथ होने के बाद तू भी कितनी बदल गई है एकदम से हे. हैं न जादूगर?", मेनका की इतनी समझदारी वाला तर्क कहने के साथ हे ये Arjun-Annu की चुहल करना पर्याप्त था अन्नू के मुस्कुराने के लिए.

"हाँ यार जब तेरी बात को ाचे से सुना तोह मैं भी मानती हु की वह अलग हे हैं. मतलब मैं टीचर हो कर उसके सामने बोखला गई थी क्योंकि उसके पास हर जवाब था. जहाँ मैं चारुल और कुछ सहेलियों के मुँह से अपने खूबसूरत होने की बातें सुनती थी तोह लगता था के शायद मैं सुन्दर हु और हर लड़का देखता भी था मुझे, चाहे वह स्कूल के हे 12तह क्लास के हो या बहार मार्किट में. लेकिन इसपर गुस्सा होने के बावजूद मैं खुद को संवार कर गई इसके सामने की चलो आज ये देखने की गलती करेगा तोह मैं फिर बहार निकाल कर इसका किस्सा ख़तम करती हु लेकिन ये कोई इंटेरसेट लिए बगैर मुझे अगले दिन भी क्लास में उकसाने लगा. लेकिन आखिर में खुद हे हार गया क्योंकि मैं उसकी टीचर हु और मेरा क्लास में अपमान न हो इसलिए.", अन्नू के ऐसा कहने पर मेनका मुस्कुरा रही थी.

"सच में यार मैं उसी वक़्त अकेले उस से माफ़ी माँगना चाहती थी लेकिन इसने सारा इल्जाम ले लिए. फिर चारुल ने अलग आग लगा दी ये कहते हुए की अर्जुन बेहद ख़ास है और शायद हर लड़की ऐसा हे इंसान चाहती होगी. और फिर रात जब मैं उस से मिली तोह मैंने थोड़ा सा इसके बारे में जाना. ये मुस्कुराता है, गाने भी गता है और हमेशा खुश हे दीखता है. मैं बात करना चाहती थी लेकिन वह घर भाग गया, एक और वॉर करता. सुअभ स्कूल के बहार ये और इसका दोस्त तुझे ताड़ रहे थे और पार्किंग में इस से मेरी मुलाकात हो गई. जैसे इसने देखा था वही मैं बचा खुचा दिल भी हार बैठी इसके सामने. बाकी तू जानती हे है.", अन्नू फिर से तकिया दबाये मुस्कुराने लगी.

"मुझे देख रहे थे?", मेनका ने चौंकते हुए कहा

"हाँ जैसे बाद में मैं भी देख रही थी. तेरा ये नया बदला हुआ रूप, बिना बोले बिजलीए गिरती हुई.", अन्नू ने थोड़ा सा आँख को दबाते हुए कहा तोह मेनका हाथ मरती हुई हंसने लगी.

"वैसे तूने तोह आगे कुछ बताया नहीं. वही बताया जो शायद शुरुवात सा था.", मेनका को उत्सुकता देख अन्नू ने हलके से उसकी जांघ सहलाते हुए कहा.

"ाचा अब तू 2 लवर्स के बीच क्या हुआ वह sunn-na चाहती है? आ यहाँ लेट वापिस. बैठ के नहीं बताउंगी.", अन्नू और मेनका फिर से बिस्टेर पर करवट लिए लेती थी, एक दूसरे की तरफ चेहरा किये.

"तेरे घर से निकली तोह वही सब हुआ. उसने बात शुरू की और मैंने इजहार करते हुए उसको वही सब कहा जैसा तू सोच कर दूर रख रही है खुदको. लेकिन मुझे खुद नहीं पता था के मैं कितनी बड़ी रोटदु हु और वह भी मुझे समझता हुआ वह ले गया जहा सिर्फ हम दोनों हे थे. मेनका, जो उसने किआ वह जैसे मेरे खाली दिल में उतर कर उसको एक नए लाइफ एसेंस मतलब वही जैसे कुछ नया सा था. ी can't एक्सप्लेन तहत फीलिंग इन एक्सएक्ट वर्ड्स. लेकिन वह उसका मुझे चूमना और मतलब अपनी बाहो में लेते हुए खुद से लगाना जैसे कुछ बदल गया था मेरे अंदर से. मैं कब खुद उसको वापिस किश करने लगी पता न चला. वह एक परफेक्ट लवर है जो कब क्या ठीक है क्या नहीं सब जानता है. उसके बाद हम दोनों हे एक बार मेरे कमरे में थे. मतलब इस कमरे में जहा आज तक कोई नहीं आया, रिश्तेदार का लड़का या कोई भी लड़का जो फॅमिली का नोन हो कोई भी. मैं 68 किलो की एक भारी लड़की हु लेकिन वह आराम से मुझे उठाये चूम रहा था, कितनी हे देर तक मैं खुद उसके ऊपर लेती रही और चाहती थी की वह अगर आज कुछ भी करेगा तोह ी विल नॉट स्टॉप हिम. उसने कमर पर हाथ रखने की सिवा बाकी कही भी जिस्म पर हाथ नहीं रखा.", अन्नू के इतना खुल कर बताने से जहा मेनका अपनी सहेली के लिए खुस थी वही उसके दिल के कोने में कही कही स्पंदन हो रहा था.

"तोह बस laila-majnu ने किश किये और लेते रहे? वाह मॉडर्न टाइम के संस्कारी बचो.", मेनका की हंसी देख अन्नू भी हंसने लगी.

"हे ग्रोपेड माय बूब्स. मतलब मैंने हे कहा था तोह कपड़ो के ऊपर से उसने इन्हे पकड़ा. मैं देखना चाहती थी ये कैसा फील होता है. और फिर लगा के बस वह जल्दी से हटा दे सबकुछ एंड दो व्हाटएवर हे इस विल्लिंग तो दो विथ थम. गॉड में बिठा कर बस फिर से प्यार करने लगा एंड ी हद माय फर्स्ट ओर्गास्म. उस पर भी वह जान गया था और फिर थोड़ी देर बाद एक किश किआ और फिर ख़याल रखने का बोल कर चला गया. मतलब लड़की खुद तैयार है सामने से लेकिन उसका कहना है के नहीं. अभी हम साथ समय बिताएंगे और ये सब फिर कभी. प्यार इतना कुछ महसूस करवाएगा ये मैंने कभी सोचा नहीं था. ये बड़ा सुलझा हुआ लड़का है मेनका जो फायदा नहीं उठा रहा. हम शायद एक साल साथ हो या 2 क्योंकि शादी तोह होने से रही. लेकिन मैं चाहती हु के अर्जुन इन 1-2 साल में हर रोज मुझे प्यार करे, इम्पॉसिबल है लेकिन चाहना गलत तोह नहीं. ात लीस्ट एक बार हम दोनों वह करे जो अबसे पहले मैंने सोचा नहीं था और फिर हफ्ते में या 10 दिन में एक रियल कपल की तरह दोनों प्राइवेट मोमेंट्स में हो. Let's सी हाउ सून वे बात थिस फोर्बिडन फ्रूट.", अन्नू एक उम्मीद करती हुई होंठो को खास अंदाज में दबा कर मेनका की तरफ देखने लगी.

"क्या बात है यार. मतलब तू दीवानी हो चुकी है उसकी और अब बस दोनों को टाइम और कमरा चाहिए? हाहाहा. लेकिन जैसा तूने बताया तोह जान कर बड़ा ाचा लगा के वह ये इतनी गहरी और अंतरंग बातें भी ाचे से समझता है. नहीं तोह मर्द तोह कई बार जरुरत का कपडा नीचे उतर कर अपना पानी निकला और चैन बंद कर चल दिए. ये भी नहीं की जहा 2 मिनट का मजा किआ उधर कपडा हे ऊपर कर दे."

"नहीं मेनका, जब हम दोनों परसो सुबह बहार थे तोह उसने मुझे दिल से प्यार किआ. जंगल में जैसे हाईड न सीक खलेते हुए हमने खुल कर एक दूसरे को महसूस किआ, पूरी बॉडी कवर्ड थी लेकिन उसका टच हर तरफ महसूस हुआ मुझे. वह कैसे ये कर लेता है मुझे नहीं पता लेकिन उसमे जल्दबाजी जैसे है हे नहीं. हे स्पेंडर्स टाइम ों गिविंग पलेसुरे. आधा घंटा हम दोनों प्यार करते रहे लेकिन अपना किये बिना वह चला गया. लिखे यू साइड, कोई पानी वाणी नहीं निकला लेकिन घर आते हे मुझे अपनी पंतय बदलनी पड़ी. आईटी वास् ड्रेन्चेड, लिखे टोटली. शाम तक फिर बॉडी में यही लग रहा था के ी स्टॉप वेअरिंग उन्देर्गर्मेन्ट्स व्हेन हे इस अराउंड. खुद हे देख मैं कैसी बातें करने लगी हु यार उसके साथ रहने के बाद.", अब अन्नू खुद शर्मा रही थी अपनी बात कहते हुए.

"ओहो. अब गाल लाल हो रहे है याद करते हुए जो भी किआ दोनों ने. जिस दिन वह 4-5 इंच का अंदर जायेगा तोह हर तरफ से लाल हो जाएगी और चेहरा हमेशा ऐसे खिला रहेगा जैसे अभी है.", मेनका के ऐसे छेड़ने पर अन्नू पलके झपकती मुस्कुराने लगी.

"मैंने जितना महसूस किआ या उसका वह part ासुमे किआ तोह it's नॉट 4-5 इंच. वह मेरी पूरी बॉडी के साथ चिपक कर प्यार कर रहा था अन्नू और तहत हूजे थिंग वास् लिखे थिस बिग.", दोनों हाथो से आकर बनती अन्नू जैसे मेनका को अर्जुन के उस ख़ास अंग की लम्बाई समझा रही थी.

"जेब कुछ और होगा मेरी जान. ये इतने बड़े तूने इस इंटरनेट पर देखे होंगे यहाँ ऐसे नहीं होते और वह अभी उतना बड़ा भी नहीं हुआ है.", मेनका अविश्वास से कह रही थी जैसे अन्नू ने झूठ बोलै हो.

"पता है तुम बिलीव नै करोगी लेकिन मैंने जैसे अपने आपस के सभी मोमेंट्स बताये तोह मैं ये झूठ क्यों कहूँगी. सच में वह एक्स्ट्राऑर्डिनरी है जितना मैंने फील किआ है. वैसे उसको ऊपर से नंगा देखना वह वह से भी डबल है और नीचे से भी. तभी शायद वह मेरे साथ सबकुछ करने में देरी कर रहा है. उसने कहा था के ाचे से एक दूसरे के हर चीज को समझ ले, प्यार करे फिर आगे करेंगे.", मेनका की धड़कन बढ़ गई जब उसने मैं में चित्र बनाया उतने हे बड़े अंग का जितना अन्नू बता रही थी.

"अगर जैसे तूने बताया के वह इतने ाचे से प्यार करता है तोह किस्मत ाची है तेरी. एक बार दर्द देने के बाद वह हमेशा तुझे खुश रहकहेगा. लेकिन पता नहीं इतना बड़ा कोई लड़की झेल भी सकती होगी.", मेनका और अन्नू कुछ देर तक बातें करती रही और फिर स्कूल से सम्बंधित काम करने के बाद रात का खाना वही अन्नू ने खिलाकर हे उसको भेजा था.

अब इस खाली घर में बिस्टेर पर लेती वह करवट बदल रही थी. रह रह कर अर्जुन की कही बातें सोचते हुए शरीर में जाने ये कैसा अलग खुमार चढ़ने लगा था. अन्नू ने अपने अंतरंग क्षण बता कर तोह ये आग ज्यादा हे भड़का दी थी. मेनका खुद एक परिपक्व, सुलझी हुई मजबूत महिला थी. लेकिन ज़िन्दगी में कभी वो सुख न मिला था जो अर्जुन के होने भर से मिलता था.

कैसे उसके उभार अर्जुन की पीठ पर दबते थे जब वह मोटरसाइकिल पर होते थे और इस बात पर अर्जुन गोल शीशे में देखता मुस्कुराता रहता था. जिस रात जाने से पहले उसने अपनी बाहों में लिए था वह उतने में हे अंदर तक हिल गई थी. जब मैं ज्यादा हे विचलित होने लगा तोह मेनका ने खड़े होते हुए अपना ऊपरी अंदरूनी वस्त्र निकाल कर तकिये के नीचे रख लिए.

"कोई बात नहीं. उसने हे कहा था के वह चाहता है मैं अपना दिल उसके सामने खोल दू तोह ऐसा हे सही. बहार मर्यादा बनाये हुए अंदर तोह मैं अर्जुन का सामीप्य पा हे सकती हु. उसको मेरी परवाह है तोह फिर मैं भी अब खुद को नहीं रोकने वाली, लेकिन उस पर कोई आंच आये बिना.", मेनका ने खुद के दिल को आश्वस्त करते हुए कहा और आँखें बंद कर ली.

.

.

सुबह के साढ़े 4 बजे अर्जुन तैयार हुआ तोह मधु बुआ अभी गहरी नींद में सो रही थी उसके हे बिस्टेर पर. चादर कबकी नदारद थी शरीर से और नीचे फर्श पर पड़ी थी. दोनों बड़े उभर करवट लेने से बिस्टेर की और मुँह किये थे, जाँघे कुछ दुरी पर थी छूट के ऊपर आई सूजन की वजह से लेकिन दमकते चेहरे पर एक सुकून और मुस्कान थी. दर्द के बावजूद उन्होंने दूसरे दौर में अर्जुन का बखूबी साथ दिए था. अर्जुन ने भी सबकुछ धीरे और आराम से हे किआ था, बिना खास दर्द दिए. एक हे मुद्रा में पीछे से चिपकते हुए वह आधे लुंड से इस दूसरी चुदाई को करने के बाद 3 बजे तक फारिग हुए थे और अब अर्जुन उठने के बाद तैयार था बहार जाने के लिए.

बुआ को बड़े ध्यान से बाजुओं में लेता वह उनके हे कमरे में आ गया जहा अब कुछ ज्यादा हे ठंडक थी, एक की वजह से. बुआ कुनमुनाई और आँखें खोल अर्जुन को देखने लगी तोह वह प्यार से उनका चेहरा चूमने के बाद चादर ुधा कर बहार निकल गया अपने कमरे के दरवाजे से. बुआ ने कुछ सोच कर ढीला गाउन पहना और फिर वापिस सो गई जांघो में उठ रही मीठी चुभन का मजा लेती हुई.

आज वह दौड़ते हुए गाँव की बजाये पार्क की तरफ चल दिए था. खुली वीरान सड़क पर शांति के साथ हे ठंडी बयार चल रही थी. कुछ हे देर में अर्जुन शरीर में स्फूर्ति महसूस करने लगा और इस बड़े पार्क में घुसते हे सीमेंट की पटरी पर पूरे पार्क का चक्कर लगता वह हर तरफ देख रहा था. घने पेड़, पक्षियों का कलरव, कुछ स्वस्थ्य प्रेमी अधेड़ और बुजुर्गो का हलकी chehal-kadmi, कसरत करना. ाचा लग रहा था आज इतने समय बाद इधर आ कर. इन सब में खोये हुए उसको 20 मिनट हो चुके थे और आसमान की कालिख भी neeli-safed हो चली थी जब ये jaani-pehchani आवाज सुनी.

"तोह हमारे आने की खबर तुम्हे हो हे जाती है.", आचर्य जी हाथ में बाजरा लिए उसके करीब आते हुए बोले और अर्जुन अपनी गति रोकता उनके सामने आते हे झुक कर पाँव छूने लगा.

"मेरे बचे तेरी जगह मेरे दिल में है यहाँ पाँव में नहीं. सच कहु तोह मैं निर्मोही भी तेरे मोह में पड़ गया और 4 दिन से बस तेरा हे समरण हो रहा था. सब ठीक है न अर्जुन?", सामान kad-kathi के ये 2 इंसान जैसे एक वृक्ष के फल थे. आचार्य जी उस पके हुए नारियल जैसे, जिसने सब देख लिए हो और तपस्या से dhoop-sard सहने के बावजूद अपने पानी को मिठास और गिरी में बदल लिए हो. जिसका हर भाग गुणकारी है. तेल, गिरी, कवच और जताये. दूसरी और अर्जुन भी एक उस वृक्ष का हे एक नारियल लेकिन hara-paani से भरा, जो पूरे परिवार के साथ जुड़ा हुआ अंदर और बहार दोनों तरफ से saral-taral. उम्र के हिसाब से मजबूत और कई कवच लिए.

"पता है मेरे साथ भी ऐसा हे हुआ आचार्य जी. मैं थोड़ा विचलित था 4 दिन पहले लेकिन जैसे हे ध्यान में लीं हुआ सभी विचारो को पर करते करते आपकी आवाज सुनाई दी. ऐसा लगा जैसे हम दोनों हे वह मेरी छत्त पर आसमान के नीचे साथ में थे. सब शांत हो गया था और आज मैं उठने वाला नहीं था लेकिन अपने आप हे नींद खुली और तैयार हो कर इधर आ गया. वैसे बंगलोरे में सब ठीक रहा?", अर्जुन की बात पर आचार्य जी मुस्कुराने लगे और हाथ में वह बाजरा पकड़ा दिए.

"बंगलोरे भी ठीक था, बलि भी और उसके बाद सिंगापुर. लेकिन सच कहु तोह तुम्हारे पास आ कर लग रहा है के वह वैसे हे घूम आया. जीवन में इत्छा तोह कोई बची नहीं है बेटे, लेकिन अगर कभी मुमकिन हुआ तोह तुम्हारे साथ जरूर चलूँगा कुछ दिन या अगर तुम मेरे साथ चलो. लेकिन अभी haal-filhal नहीं. Ksheet-hritu के आरम्भ में देखेंगे. आओ यहाँ बैठो और इन्हे थोड़ा बाजरा खिलाओ.", पार्क का ये हिस्सा थोड़ा kacha-thoda पक्का था जहा दोनों चले आये थे. कबूतर, घुग्गी, तोते और 3-4 मोर इस जगह मिटटी पर चोंच मार रहे थे शोर कर रहे थे.

अर्जुन ने थोड़े दाने हवा में उछाले जो पक्षियों के करीब बिखर गए. और तुरंत हे उनमे से कुछ दूर फुदक गए और बाकी निश्चिंत से खाने लगे. अर्जुन उन्हें ध्यान से हे देख रहा था. कुछ हे पल हुए और सामने से ये मोर सीधा उनकी तरफ चला आ रहा था. अर्जुन से एक फीति दुरी पर बैठे आचार्य प्रमोद जी के हाथ से दाना चुगता हुआ वह विश्वास से भरा था. अर्जुन चुपचाप बैठा देखता रहा के कैसे ये मोर उन पर इतना विश्वास कर रहा है. आचार्य जी ने भी गर्दन पर हलके से हाथ फिराया तोह एक बार उन्हें अपनी नीली आँखों से देख वह वापिस बाजरा खाने लगा. ख़तम होने के बाद भी दूर न जाते हुए वह aas-pas हे रहा.

"ये श्रेष्ट है जितने भी तुम्हे यहाँ पंछी नजर आ रहे है उनमे. निर्भीक क्योंकि हम दोनों के दिल साफ़ हैं और मैंने ये हाथ नीचे किआ जिसका मतलब मैं खुद को उसके सामने रख रहा हु. पहल मैंने की तोह श्रेष्ट जीव उसका आदर रखते हुए खुद चल कर मेरे पास आया. दाना खाने के बाद कृतज्ञता दिखते हुए अभी भी पास में है. अर्जुन इंसान को छोड़ कर जो भी जिवंत है चाहे वह पक्षी, पशु, रेंगने वाला कीड़ा या peid-paudhe, सभी श्रेष्ठ है. वह सिर्फ देना जानते है थोड़ा सा मिलते हे. लेकिन ये जीव भी 2 तरह के होते है, ऐसा लोग सोचते है. भयभीत होने वाले या भयभीत करने वाले."

"जैसे की?", अर्जुन ने हाथ नीचे जमीन पर हे रख लिए था जिसमे वह बाजरा फैला हुआ था.

"जैसे जो लगता है की पीछे हैट रहा है मतलब भयभीत हो रहा है. Chui-mui का पौधा हाथ लगते हे बंद, heeran-khargosh के पास जाओ और वह फुर्र से भाग जाते है. तिलचट्टे के पास जाओ तोह वह भी छुपेगा. लेकिन दूसरी तरफ बबूल है ऊँगली लगी नहीं की स्कूल चुभ गई, matki-phool में तितली कैद हुई नहीं और मौत, मगरमछ के पास गए तोह वह भी हमला कर देगा. लोग कहते है ये स्वाभाव है लेकिन बात है के परिस्थिति से कैसे निकला जाये. पीछे हटने वाला भी श्रेष्ठ है क्योंकि पकड़ तोह उसको भी नहीं पाए और वह हुम्ला करने वाला भी क्योंकि चुनौती आप दे रहे हो. इंसान के साथ अलग है, जो डरता है वह करीब आता है. जो मजबूत है वह लोगो से दूर भागता है. हम श्रेष्ठ नहीं हुए ऐसे तोह. जब जीव झुक गया तोह उसको मत बताओ के तुम कौन हो और नहीं झुका तोह करीब मत जाओ", आचार्य जी की बातें सुनते हुए अर्जुन ने अपनी हथेली पर गुड़गुड़ाहट महसूस की तोह यहाँ मोरनी और मोर दोनों हे दाना चुग्ग रहे थे. ये मोर जैसे दाना कहते हुए भी मोरनी का ध्यान रख रहा था और अर्जुन को सीधा देख रहा था. थोड़ी हे देर बाद दोनों हे अर्जुन को देखते जैसे शुक्रिया अदा करने लगे और वही विचरण करने लग.

"ये बातें अनिवार्य नहीं होनी चाहिए किसी भी स्कूल में? मतलब हुआमणित्य की किताब में सब होगा लेकिन ह्यूमैनिटी हे नहीं है. आप जैसे समझते है न ऐसा लगता है जैसे पहले से पता हो के मैं किस विषय पर परेशां हु.", अर्जुन की ऐसी बात सुनकर उनके दिव्या चेहरे पर धनुष सी मुस्कान आ गई.

"मेरे बचे, बूढा आदमी हु तेरे साथ किस्से बातें कर लेता हु. अगर शिक्षा और ज्ञान को एक कर दिए गया तोह दुनिया बदल जाएगी मेरे बचे. डिक्टेटर्स, पॉलिटीसीओंस, सिक्योरिटी फोर्सेज और जाने क्या क्या उस स्टीकर की तरह हो जाएने जो कपडे पर गर्दन के पीछे लगा होता है. उसके होने न होने से फरक नहीं पड़ता, लेकिन जो नाम है वह दिमाग के भीतर और समाज में इंसान का जाली रसूख बना देता है. गलती से भी ये बात 10-50 लोगो के बीच मत कह देना. शिक्षा पहला कदम है ज्ञान की तरफ लेकिन हम उच्च शिक्षा को मानते है एक नौकरी का पैमाना. हाँ वह मचिनो के सामने वह सब व्यर्थ है बीटा लेकिन ज्ञान है मशीन का तोह वह किताब जरुरी नहीं थी जिसको 4-6 साल यहाँ भारत या विदेश से पढ़कर आये. लेकिन हम यहाँ 2 लोग है तोह मैं को बेहला लेते है बदलाव की बात नहीं करेंगे. आओ मेरी मित्र मण्डली के साथ थोड़ा योग कर लो.", अर्जुन एक तरफ आज इतना शांत था उनसे मिलने और इंसान को समझने के बाद. वही उनके ज्ञान और शिक्षा वाले मापदंड को समझने के बावजूद उनकी हिदायते थोड़ी अजीब लगी.

सबसे ध्यान हटा कर वह भी आज यहाँ इनके साथ योग में मस्त हो गया. ज़िन्दगी से भरपूर थे ये सभी दिल से नौजवान बालो से बुजुर्ग लोग. आधे घंटे के बाद सभी बुजुर्ग आचार्य जी से मिल कर विदा लेते चल दिए और वो भी अर्जुन के साथ बहार आने लगे. अर्जुन का मैं अब प्रफुलित था और दिमाग शांत.

"चलो मेरे दोस्त अब चलते है, खुश रहो और ज़िन्दगी को भरपूर जियो.", अर्जुन को गले लगते हुए उन्होंने भी सामने की तरफ कदम बढ़ाये जिधर उनका घर था और अर्जुन भी उन्हें सड़क पार करते देख मुस्कुराता हुआ अपने घर की और निकल लिए. आज कदमो में अलग हे चपलता थी. 'आप श्रेष्ट का भरोसा भी जीत सकते हो और श्रेष्ठ भी बन सकते हो. दिल साफ़ और खुले हाथ.'

"ये लो बीटा, आ गया अर्जुन भी. अर्जुन तेरी आंटी याद कर रही थी तुझे.", बगीचे में रामेश्वर जी के साथ छोल साहब, कौशल्या जी और रोमिला बैठे थे. यहाँ अर्जुन ने पल भर के लिए ध्यान से रोमिला को देखा तोह वह इस प्राकृतिक रौशनी में पहले से कही अलग दिख रही थी. काली लम्बी टीशर्ट जिसपर कंधे की तरफ तान्निया थी और हल्का सलेटी इलास्टिक वाला पजामा, रंगत जैसे दूध में हल्का गुलाबी रंग दाल दिए हो. फिर अंदर आते हुए सबको अभिवादन करने के बाद वही बैठ गया बात sunn-ne के लिए. दादी किसी बात पर मुस्कुराती हुई अंदर चल दी.

"ऊपर कुर्सी पर बैठ जाओ?", रोमिला की मधुर आवाज जैसे इस बगीचे में कोयल की कमी को पूरा कर रही थी.

"थैंक यू. यहाँ ज्यादा बेहतर है आंटी, घास और जमीन की ठंडक.", अर्जुन ने जूते खोलने के बाद बगीचे में पानी छोड़ रहे पाइप से हाथ और चेहरा धोया और चौकड़ी लगते हुए बैठ गया.

"तुम रोज अँधेरे में हे घूमने निकल जाते हो?", रोमिला ने बात करने की शुरुवात की और अर्जुन ने वैसे हे उन्हें जवाब दिए.

"अँधेरे के बाद. मतलब जब अँधेरा ख़तम होने लगता है. यही समय होता है जब दिमाग और शरीर को वातावरण से भरपूर ऊर्जा मिलती है. लेकिन जरुरी नहीं है की एक समय पर हे जाता हु.", ये बात उसने अपने दादाजी को देखते हुए कही.

"हाँ, रोमिला इसका कोई प्रिंसिपल नहीं है की 4 बजे जाना है या 5. जब उठ गए साहब तोह सूरज को बता देते है के मैं बहार निकल रहा हु और आप भी आना शुरू करो.", रामेश्वर जी की इस बात पर बाकी तीनो भी हंसने लगे.

"यू सी. मुझे थोड़ा काम था अगर तुम्हारे पास समय हो. जरुरी नहीं की आज हे या कल, लेकिन ये तुम बताओगे की क्या ये हो सकता है और हम कब कर सकते है.", रोमिला की बात सुनकर अर्जुन अपने सर पर हाथ रखते हुए उन्हें देखने लगा.

"आप काम बताना भूल गई है शायद. वह बतायेनिग तभी तोह हो पायेगा.", अर्जुन के ऐसा कहते हे वह चेहरे पर हाथ रखते हुए हंसने लगी. इधर दादी भी उसका दूध का बड़ा गिलास और लड्डू लाती उसके सामने रख फिर से कुर्सी पर बैठ गई.

"ऐसा है के मुझे कुछ तस्वीर लेनी है. प्रकृति की, रोजाना ज़िन्दगी की जो थोड़ी रूरल हो और थोड़ी शहर की लाइफ की. समझ लो की सिक्के के दोनों तरफ की. अब जैसे तुम सुबह घूमने जाते हो, वह भी कोई स्टोरी होगी. लोग होंगे, लैंडस्केप्स होंगे. मतलब ी विल गेट सम कंटेंट. और मैं वह तुम्हे डिस्टर्ब नहीं करुँगी. मेरे पास एक ाचा कैमरा है और तुम चाहो तोह मैं तुम्हे भी सीखा दूंगी.", इंसान को जिस चीज का दिल से शौक हो वह उसके बारे में बातें करते वक़्त जैसे अलग हे दुनिया में चल देता है. अर्जुन भी देख रहा था के रोमिला कैसे सबकुछ बयान कर रही है. हर बात को कहते समय अलग ऊर्जा, चेहरे के haav-bhav और शारीरिक भाषा.

"जैसे साइकिल पर दूध लेके गाँव से आता दूधवाला, पुराण छोटा पुल्ल जहा एक तरफ जंगल एक तरफ खेत और एक तरफ गाँव. जैसे नहर किनारे कपडे धोती हुई महिलाये, हुक्का पीते हुए गांव के चौधरी साहब और शाम के समय मार्किट की chehal-pehal.", अर्जुन अपने सुझाव देने लगा तोह जैसे उसकी कही हर बात वह अपने दिमाग में हे लिखने लगी थी.

"बिलकुल ऐसा हे और शायद तुम समझ भी रहे हो के मुझे कैसी लोकेशंस देखनी है."

"लेकिन ये सब तोह बहोत लोग करते हे रहते है. मैंने ऐसे बहोत करक्याकरम देखे है टेलेविज़न पर जिसमे लोग अपनी यात्रा का वर्णन फोटो के माध्यम से करते है.", अर्जुन को अजीब भी लगा था क्योंकि ऐसा सबकुछ उसने देखा हुआ था.

"जैसे हर हाथ की रेखाएं एक जैसी नहीं होती वैसे हे हर फोटो के पीछे की कहानी. और मुझे ये सब किसी जोड़ने के लिए नहीं चाहिए. आर्ट मतलब चित्रकारी के लिए मुझे ये सब चाहिए. अपने काम के साथ हे मैं ये करती हु जैसे तुम्हे चारकोल अफेयर के बारे में पता है. लेकिन यहाँ ये थोड़ा बड़ा काम है. मैं इन्हे बड़े कैनवास पर पेंट करुँगी.", अर्जुन को अब जा कर मंतव्य समझ आया था के वह ये सब क्यों चाहती है.

"समझ गया. आज तोह शाम को नहीं मार्किट जा सकते हम. लेकिन कल सुबह मैं आपको गाँव की थोड़ी ज़िन्दगी दिखा सकता हु, थोड़ी वह जगह जहा नहर, जंगल एक तरफ और दूसरी तरफ लोग. और फिर हम मार्किट चल सकते है. वह आपको हर तरह के लोग और काम देखने को मिल सकते है. लेकिन आप मुझे बदले में थोड़ा बहोत चित्र बनाना सिखाएंगी.", अर्जुन ने अपनी बात पूरी करते हुए गिलास से दूध की आखिरी घुट भरी और रोमिला की तरफ देखने लग.

"वेल. तुम ये काम करो और मैं तुम्हे सीखा दूंगी दुनिया को एक अलग पर्सपेक्टिव -नजरिया से कैसे देख सकते है. डील.", वह कड़ी होते हे अपनी टीशर्ट को व्यवस्थित करती अर्जुन से हाथ मिलाने लगी. अर्जुन ने भी ख़ुशी से हाथ मिलते हुए सहमति जाता दी.

"अब मैं चलता हु आंटी. स्कूल जाना है वह भी 3 दिन बाद.", अर्जुन ने ये बात कहते हुए अपने दादाजी को देखा जो उसकी ये बात सुन्न रहे थे.

"बेटी वैसे ये गाँव वाली ज्यादा ाची तस्वीर लेनी हो तोह 1 साल रुक जाओ. अर्जुन स्कूल छोड़ कर गाँव हे चला जायेगा.", उनकी बात समझते हे वह भी हंसने लगी और अर्जुन बिना पलट के देखे अंदर दौड़ गया.

"हे इस ा गेम ऑफ़ ा पर्सन, अंकल. देखा आपने कितनी तेजी से समझ गया के मुझे क्या चाहिए और सब कैसा होना चाहिए. लगता है जैसे सब काम करने के बाद वह बस घूम रहा है. वंदेरेर. जो आप लोग कहते है, योगी."

"उसके सामने मत कह देना बेटी. वह सच में कही घर छोड़ कर घूमने न निकल जाये.", छोल साहब की बात पर रामेश्वर जी के साथ रोमिला भी हसने लगी. कुछ देर और वही बातें करते हुए वह यहाँ के बारे में जान रही थी और साथ हे वह विदेश की ज़िन्दगी कैसी है उस पर गंभीर पक्ष रख रही थी. प्रीती के बुलाने पर हे वह मुस्कुराती हुई रामेश्वर जी से हाथ जोड़ कर विदा लेती अपनी बेटी के पास चली गई.

.

.

"आज स्कूल जाना कैसा लग रहा है?", रुपाली दीदी की बात सुनकर खाना ख़तम करता अर्जुन मुस्कुरा दिए.

"वैसा जैसे पहली बार लगा था. लेकिन लगता नहीं टीचर्स ज्यादा कुछ कहेंगी.", अर्जुन अपनी प्लेट उठाते हुए बोलै.

"बच्चू आज कंबाइंड टेस्ट है तुम्हारी और हमारी क्लास का, केमिस्ट्री में. देखते है उसके बाद कैसा लगता है.", रुपाली दीदी दही खा रही थी.

"ाचा जी. मतलब ये बात बताई नहीं.", अर्जुन वही खड़ा दीदी को देखने लगा.

"कॉपी ली थी न मेरी तोह उस पर लिखा नहीं देखा था. फिजिक्स के फर्स्ट 2 chapter रेडी करने के लिए?", अर्जुन सर खुजाता अंदर चल दिए. लेकिन उनकी बात सुनते हुए कौशल्या जी कहने लगी.

"चल बीटा आज देखते है के मेरी बची ज्यादा होशियार है या वह बैलबुद्धि. जिसके नंबर ज्यादा आये उसका इनाम मेरी तरफ से.", उनकी बात पर रुपाली दीदी खुश हो गई और उनकी तरफ आता हुआ अर्जुन हँसते हुए बोलै.

"दीदी, मैं जीता तब भी इनाम आपको हे मिलने वाला है. बस ध्यान टेस्ट पर हे लगाना. ये दादी न दोनों में प्रतियोगिता करवा रही है.", रुपाली भी हंसती हुई प्लेट रखने चल दी.

"ाचा, तू आज शाम को सगाई पर जा रहा है? तेरे दादाजी ने बताया मुझे.", दादी अर्जुन से जैसे कुछ पूछना चाह रही थी.

"हाँ दादी. वह मेरे एक भैया है स्टेडियम में. पहलवान है और पापा ने हे उनकी मदद की थी इसलिए मेरी उनसे ाची जमती है. और पता है उनकी सगाई हमारे कोच सर की बेटी से हो रही है. अब उन्होंने प्यार से बुलाया है तोह थोड़ी देर के लिए हे सही लेकिन जाना तोह चाहिए हे.", अर्जुन अपने बास्ते की दोनों तान्निया एक हे बाजू में डालते हुए बताने लगा.

"अरे मेरा मतलब ये सब से नहीं था. मैं कहना चाहती हु के ऐसे शुभ अवसर पर कुछ देना भी होता है. तोह क्या लेके जायेगा तू उनके लिए?", अर्जुन ने तोह ये सोचा हे नहीं था. अब सोचने लगा तोह जैसे कुछ ध्यान आया.

"दादी, भैया ने कहा था के वह अपनी माता जी से मुझे मिलवाएंगे. सगाई में अपने से बड़ो को कुछ देने के बजाये मैं उनकी माता जी के लिए कुछ ले जाओ तोह?", अब करि तूने कुछ समझदारी वाली बात. जाने से पहले मेरे से मिलते हुए जाना. उनको देने का उपहार मैं निकाल कर रखूंगी और साथ हे लड़का लड़की के लिए सगुन भी लेते जाना. ये तेरे पापा ने कहा है अभी थोड़ी देर पहले फ़ोन करते हुए.", अर्जुन को अब मामला समझ आया के घरवाले भी जानते है के वह कहा जा रहा है.

"ठीक है दादी. अब मैं चलता हु.", रुपाली दीदी को साथ लिए वह वैसे हे स्कूल चल दिए जैसे हमेशा जाता था. संदीप और फिर आकांक्षा को साथ लिए. क्लास में पहले हे पीरियड में मरस वर्मा ने सरप्राइज टेस्ट लिया तोह आधे बचे वैसे हे परेशान हो गए थे. लेकिन सबने जैसे तैसे परचा किआ और वह हाजिरी लेने के बाद सभी के पर्चे रजिस्टर में रखती हुई चली गई.

"भाई तू इतने दिन नहीं आया? सब ठीक तोह था न?", सुशिल ने अर्जुन से पुछा तोह उसके जवाब देने से पहले हे दिनेश बोल पड़ा.

"ोये इस पीरियड में चुप्प रह मेरे बाप. सारे बहार निकाले जायेंगे. माँ छोड़ देगी वह हिटलर आते हे.", उसको ऐसे हाथ जोड़ते देख बाकी तीनो मुस्कुराने लगे.

"वैसे कल धरमिंदर पूरे लेक्चर में हाथ ऊपर करके खड़ा था.", दिनेश ने शोखी से कहा और इधर मिस अन्नू वालिए तेज कदमो से कक्षा के भीतर आ गई. हलकी पीली पारदर्शी से साड़ी और उसके साथ का हे एक आधुनिक ब्लाउज पहने वह चलती हुई आग दिख रही थी. और यही पर दिनेश के मुँह से आह निकल गई.

"भाई, दरामगिरल होती जा रही है ये तोह. बस इसका गुस्सा देख के फट जाती है."

"सेकंड बॉय फ्रॉम मोस्ट राइट सेकंड डेस्क, गेट उप एंड रेज योर हैंड्स. बेंच पर खड़े हो के.", और आज ये फस्स गया था. सभी अपनी किताब निकाल कर वही देखने लगे क्योंकि किसी को नहीं पता था के अगला कौन हो जाये शिकार.

अगले 30 मिनट ाचे से पढ़ने के बाद अन्नू ने रजिस्टर खोलते हुए पूरी क्लास को देखा, जो बोरड़ पर लिखा सवाल कॉपी में लिखने के बाद अब हल करने में व्यस्त थे. और अर्जुन डेस्क पर कोहनी टिकाये इस गुलाबी पंजाबन को देखने में व्यस्त था. गुस्सा करती कितनी कमाल लगती है और ऊपर से आज साड़ी में. वह यही सोच रहा था जब सुशिल ने उसकी कमर पर कोहनी मारी.

"भाई, बस कर. वैसे हे दोनों डेस्क वाले हम चारो लोग इसकी लिस्ट में सबसे ऊपर है.", अर्जुन ने उसकी बात मानते हुए लिखना शुरू किआ तोह कनखियों से अर्जुन को देख रही अन्नू ने अब ाचे से उसका दीदार किआ. वह हलकी से मुस्कान बहोत थी किसी का भी दिल बेताब करने के लिए.

दिनेश को बोर्ड पर सवाल हल करने का कहा तोह उसने बिलकुल ठीक तरीके से वह कर दिए.

"तुम चार लोग पढ़ने में ाचे हो, इसलिए क्लास से नहीं निकलती. लेकिन मैनर्स भी सीखो थोड़ी, ये क्लास है चाय की टापरी नहीं.", घंटी बजते हे वह बहार जाते वक़्त ये बोलती गई और इस बहाने एक बार और अर्जुन का चेहरा देख लिए था.

"यार सच में भाई मैं तोह फिजिक्स की टीचर बदलवा रहा हु अपनी. अब इतनी पटाखा है तोह देखना बनता है लेकिन साला देखो तोह मुँह अपने आप खुल जाता है और पूरे पीरियड की लंका लग जाती है. हर रोज हम चारो में से हे एक बलि का बकरा बनता है.", दिनेश बैठने के बाद भड़ास निकाल रहा था.

"तू भाई इसको पता ले. फिर नहीं निकलेगी बहार.", सुशिल की बात सुनकर दिनेश की बजाये धरमिंदर ने गाल पर हाथ रख लिए. अर्जुन उसको देखने लगा.

"दोस्त नहीं है तू साले दुश्मन है. कल मुझे कहा था के जा टूशन का पता कर ले फिर आराम से जी भर कर अकेले देखिओ. 5 की 5 चाप दी थी गाल पर, बहार गलियारे में. धरमिंदर गलती न कार्यो कोई. जितना यहाँ क्लास में हंसी मजाक है उतना ठीक. और अपना इम्प्रैशन पढाई के मामले में सबसे ाचा है."

"लेकिन ऐसी बात पर थप्पड़ क्यों मारा भाई?", अर्जुन ने पीछे मदद कर कहा.

"जुबान लड़खड़ा गई थी और मेरे मुँह से निकल गया था के मैडम आपको पढ़ने के लिए टूशन लगनी है. कहना था के आपसे निकल गया आपको. सफाई का मौका हे नहीं मिला. ऊपर से बोल कर चली गई की क्लास में जो पढ़ते हो वही टूशन है. पेरेंट्स को डायरी में नोट लिख देगी अगर आगे से टूशन की बात कही तोह.".

.

.

ये दिन का आखिरी लेक्चर था और 2 सेक्शन को बड़े हाल में कतार से एक बेंच पर एक बिठाने के बाद सबका टेस्ट शुरू हो गया था. लेकिन सवाल बोर्ड पर लिखने के 10 मिनट बाद हे अर्जुन ने परचा मैडम के हवाले कर दिए.

"बैठना है तोह बैठ सकते हो नहीं तोह बहार जा सकते हो.", चस्मा हिला कर सही करते हुए मैडम ने अर्जुन का पेपर रख लिए और ाचे से ये चेहरा देख लिए जो शायद पढ़के नहीं आया था. अर्जुन मुस्कुराता हुआ बहार ग्राउंड में चल दिए.

.

.

"क्लास नहीं कोई तुम्हारी इस वक़्त?", बस्ता लम्बी सीढ़ी पर वह रखता हुआ बैठा तोह वापिस खड़ा हो गया, मिस चारुल सिंह को देखते हे. जो उस से हे बात कर रही थी.

"जी मिस, class-test था और वह दे कर आ गया. वैसे कोंग्रटुलतिओन्स.", अर्जुन की इस बात पर मुस्कुराती हुई वह भी उसके बराबर हे बैठ गई, 2 फ़ीट की दुरी पर.

"थैंक यू. तोह तुम्ही विकास के खास इन्वितेद हो आज.?", चारुल सिंह की बात पर अर्जुन ने थोड़ा हैरानी से उन्हें देखा.

"ख़ास? मतलब मिस मैं समझा नहीं."

"विकास के ज्यादा दोस्त नहीं है जितना हम जानते है. उसके परिवार से सिर्फ मम्मी, एक बड़ी behan-jijaji और उसके पापा हे आ रहे है सगाई पर. लेकिन उसने पारुल को तुम्हारे बारे में बताया था के अर्जुन आएगा और उसका ाचे से ख़याल रखना है. ऐसा क्या है जो विकास जैसा इंट्रोवर्ट भी तुम्हे इतना पसंद करता है. नाम लेते वक़्त भी चेहरे पर स्माइल थी उसके, पारुल ने हे पहले उसको मुस्कुराते देखा हो मैंने तोह कभी नहीं देखा.", उनकी बात सुनकर अर्जुन भी मुस्कुरा दिए.

"ोये होये. तुम भी वैसे हे मुस्कुरा रहे हो."

"वह मिस ऐसा है न के वह जैसे हम दोनों का कुछ अंदर से हे कनेक्शन है. बहोत ध्यान रखते है विकास भैया मेरा और मुझे भी उनके साथ ाचा लगता है.", अर्जुन साफ़ दिल से जवाब दिए जो चारुल को भी सुनकर ाचा लगा.

"पापा भी पसंद करते है लेकिन उनके सामने मत कहना ये.", संधू जी का जीकर हुआ तोह अर्जुन जैसे पूरी बात sunn-na चाहता था.

"वह बोलते हे कितना है?", अर्जुन की बात सुनकर उन आकर्षक होंठो पर लम्बी मुस्कान आ गई. बड़ा हे निस्चल चेहरा और साफ़ दिल थी चारुल. अर्जुन उस मुस्कान को महसूस कर सकता था की वह कितनी असल थी.

"बहोत बोलते है वह. बस ऐसा है के तुम उनके साथ जब होते हो तोह वह एक गुरु होते है. कल शाम को खाने के वक़्त कह रहे थे की अभी तक वह तुम्हारी क्षमत की हद्द नहीं देख पाए है और जितना देख रहे है वह पहले हे बहोत ज्यादा है. वैसे सच बताओ क्या तुम्हे सचमुच बॉक्सिंग पसंद है?", बात को अलग तरफ ले जाते हुए उन्होंने अर्जुन के भीतर क्या है jaan-na चाहा.

"मिस, बॉक्सिंग पसंद है क्योंकि मैं उसमे दक्ष नहीं हु. जिस दिन लगेगा की बहुत हुआ उस दिन देखेंगे अगला क्या चुनाव करना है. और रही बात मेरी क्षमता की तोह ये तोह तभी पता चलेगी जब सामने एक असली चुनौती होगी. रिंग के बहार मैं कितना भी तेज या दमखम वाला राहु लेकिन अगर जब सामने प्रतिद्वंदी हो और घुटने टिक जाये तोह हो गया काम.", अर्जुन की ऐसी बेबाकी देख चारुल खिलखिला कर हंसने लगी.

"Satya-vachan. तुम्हे देख कर बेशक लगता है के पहलवान जैसे कुछ होंगे लें बातें करने से तोह तस्वीर कुछ और हे बनती है. एक मिनट शायद मिस अन्नू को कुछ काम है.", उनकी बात सुनकर अर्जुन ने पास आती अन्नू को देखा तोह गर्दन झुकाते हुए मुस्कुराने लगा.

"तुम जा रहे हो शाम को पारुल की इंगेजमेंट पर?", अब मिस चारुल देख रही थी अन्नू को जो अर्जुन से बात कर रही थी.

"जी मिस."

"ठीक है. मुझे साथ ले चलना, 7 बजे. अगर तुम्हे ठीक लगे तोह. घर पे पापा नहीं होंगे तोह ऑप्शन नहीं है. चारुल से पता चला था के तुम जा रहे हो.", इतना कहती वह चारुल को देखने लगी.

"इसका घर पास में हे है क्या तेरे?", चारुल के सवाल पर अन्नू ने आराम से जवाब दिए.

"नेइबोर्स है यार. नोन फैमिलीज़. तोह प्रॉब्लम भी सोल्वे हो गई.", अन्नू ने जैसे बताया तोह चारुल ने फिरकी ले हे ली.

"चल वह सब ठीक है लेकिन इसने तोह अभी तक हाँ भी नहीं कहा. और तब नहीं पहचाना था जब पहले हे दिन बहार निकाल दिए था?", चारुल के हंसने पर अर्जुन भी मुँह ऊपर करके उन्हें देखने के बाद वापिस सर झुकाये हंसने लगा.

"मिस, प्लीज आगे मत कहना नहीं तोह मैं कल भी क्लास के बहार मिलूंगा. और मैं ले जाऊंगा आपको जी. राइट ात 7.", अर्जुन ने हंसी काबू करने के बाद कहा तोह अन्नू उसको आँखें दिखती चली गई, चारुल को अपना purse-bag लेके आने का बोल कर.

"डर लगता है मिस अन्नू से? वह टीचर जरूर सख्त है लेकिन ोथेरविसे ाची है.", चारुल ने एक बार ग्राउंड में नजर डालने के बाद कहा.

"पता है मिस. लेकिन अभी स्कूल में हु तोह बचके रहना हे ठीक है.", अर्जुन की बात पर वह फिर से खिलखिला उठी.

"सही बात है यार. अभी उसके एरिया में हो तुम. हाहाहा.", चारुल जैसे खुद भूल गई थी के वह एक स्टूडेंट से बात कर रही है दोस्त से नहीं. जैसे हे याद आया तोह अर्जुन को बता कर वह भी अंदर चली गई.

'ये मैं खुद हे उसके साथ लगी हुई थी और बात अन्नू की कर रही हु. पता नहीं इतना कैसे बोलने लगी हु. शाम को हे ठीक रहेगा बात करना.', खुद को शांत करती वह sports-room में आ गई थी.

.

.

"मिस सिंह बुला रही है यार तुम्हे. और कैसा रहा तुम्हारा टेस्ट.?", आकांक्षा बैग लेकर उसके पास हे आ कर बैठ गई.

"5 क्वेश्चन थे, कर दिए. लेकिन मैं यहाँ इतनी देर से बैठा हु तुम्हे इतना टाइम कैसे लग गया?", अर्जुन ने प्यार से आकांक्षा को देखा तोह वह उसके हाथ पर हाथ मरती बोली.

"स्कूल में है यार हम. कैसे देख रहे हो जैसे अभी पकड़ लोगे. शर्म करो थोड़ी. और 5 नहीं 6 क्वेश्चन थे बता देती हु. मतलब तुमने आखिरी वाला 2 नंबर का किआ हे नहीं. अब 20 की जगह 18 में से कितने नंबर आएंगे देखते है. 12 से काम वाले एक वीक तक लास्ट बेंच पर.", आकांक्षा की बात पर अर्जुन जैसे कुछ सोचने का नाटक करने लगा.

"मतलब अगर हम दोनों हे जीरो लेके आते तोह एक वीक लास्ट बेंच पर मजे करते."

"ोये बेशरम. घर आ जाना इस से ाचा तोह. और याद है मैंने कहा था मिस सिंह बुला रही है तुम्हे.?"

"कोनसी सिंह, अब एक तोह स्पोर्ट्स वाली है जो यहाँ से गई है और दूसरी कंप्यूटर वाली.",

"कंप्यूटर वाली. मिस मेनका सिंह. और 10 मिनट में वापिस आ जाना.", अर्जुन बात सुनते हे अपना बस्ता आकांक्षा के हवाले करता अंदर चल दिए, मेनका से मिलने जो अकेली कंप्यूटर पर जैसे कुछ जरुरी काम कर रही थी.

"मिस मई ी के इन?" सामने से बिना देखे जवाब आया, "के इन अर्जुन. और इधर बैठो."

"क्या बात है, आवाज पहचान ने लगी हो.", अर्जुन ने बगल वाली कुर्सी पर बैठते हुए कहा. कंप्यूटर की काली स्क्रीन पर वह कुछ लिख रही थी और लगातार लाइन अपने आप चली जा रही थी. थोड़ी देर बाद उसको बंद करते हुए मेनका ने अर्जुन को देखा.

"तोह रोमियो आजकल नखरे करने लगा है बुलाने पर भी. और मंजू को खुद ले गए थे लेकिन छोड़ने ऋतू के साथ भेजा.", अर्जुन को तोह पता हे न था के मंजू जा भी चुकी थी.

"जूलिएट जी, मुझे तोह पता भी नहीं के कब गयी वह. दादी तोह कह रही थी के वह आपसे बात करेंगी की जितने उसकी छुट्टियां है वह आपके पास स्कूल से जाते समय साथ चली जाया करे और सुबह आप रस्ते से हे उसको वापिस हमारे यहाँ छोड़ दे. अब पता नहीं क्या हुआ.", अर्जुन के द्वारा खुद को जूलिएट कहने पर वह हंसती हुई उसके सर पर चपत लगाने लगी.

"तेरी जूलिएट आ रही है अभी. और तुम्हारी बहिन ने बता दिए था मुझे. वह और मंजू उसके कुछ कपडे लेकर चली गई थी. और मैंने भी सचेडूले ऐसा हे बना लिए है. आज से अन्नू को मैं हे लेके आउंगी और जाते हुए घर ड्राप करने के बाद मंजू को ले जाया करुँगी. सही है न.?"

"ओह तभी वह साड़ी में आई, क्योंकि कार में आये हो आप लोग. हाँ ठीक है इस बहाने हमारे घर भी आना होगा आपका."

"साड़ी के बचे मैंने अपनी बात करने के लिए बुलाया था और वह छोड़ कर तुझे उसकी साड़ी दिख रही है अभी तक."

"हाँ याद है याद है. बोलो जी क्या हुकुम है."

"कल मेरे यहाँ आ सकते हो. शाम को, मेरे साथ चलना है कही जरुरी. वैसे भी अभी मंजू 2 दिन तुम्हारे हे घर रहेगी जितने उसके मम्मी वही है.", अर्जुन को कुछ अजीब नहीं लगा.

"हाँ तोह जहा कहोगी ले चलूँगा. कल शाम वैसे भी कुछ कर तोह रहा नहीं हु. वैसे चलना कहा है ये बताओगी तोह वैसे हे तैयार हो कर आ जाऊंगा.", अर्जुन की ऐसी बात पर मेनका उसको हे देखने लगी.

"जैसे घर रहते हो वैसे हे आ जाना. किसी फंक्शन में नहीं जाना बस एक डॉक्टर को दिखा कर आना है.", अर्जुन थोड़ा चिंतित हो गया ये सुनते हे.

"स्कूल के बाद अभी चलते है न. कल तोह बहुत दूर है अगर डॉक्टर का मामला है."

"ओह bhole-bhandari, डॉक्टर से कल शाम का समय लिए है. कुछ हुवा नहीं है मुझे लेकिन 1-2 चेकउप करवाने है.", अर्जुन के सर पर हाथ फेरते हुए बड़ी आत्मीयता से मेनका ने बताया तोह अर्जुन को थोड़ी रहत मिली.

"कभी भी अगर थोड़ा सा भी चिंताजनक हो तोह सीधा हमारे घर फ़ोन करके बोल देना के अर्जुन को भेज देना, मैं आ जाऊंगा. लापरवाही मत करना, अकेली रहती हो और कुछ हो गया तोह.", अर्जुन को ऐसे घबराते देख मेनका का दिल प्यार से भर उठा.

"तू बड़ा प्यारा है रे. चल कल मिलते है."

"प्यारी तोह आप भी हो लेकिन बात नहीं मानती."

"मान ली. अब खुश", इतना सुनते हे अर्जुन दरवाजे के पास हे ृक्क कर पीछे मुड़ते हुए मेनका को देखने लगा.

"फिर तोह रात को हे आ जाता हु."

"घर जाओ चुपचाप. कल बात करेंगे.", मेनका झूठे नखरे से कहती हुई फिर हंसने लगी और अर्जुन भी हँसता हुआ आकांक्षा के पास चल दिए.

"ये इतना मुस्कुराता हुआ क्यों जा रहा था.?", अन्नू क्लास में अंदर आई तोह अर्जुन थोड़ा तेजी से आग जा चूका था.

"मैंने उसको कहा के आज अन्नू 6 बजे तैयार मिलेगी, कपडे पहना देना उसको 7 बजे तक."

"धत्त. कुछ भी. वह तोह उतारे हुए पहना देगा जितना मैं समझने लगी हु इसको.", अन्नू एक ठंडी आह लेती हुई बैठ गई.

"चल ाची बात है के पहनायेगा तोह सही. वैसे तूने बुलाया किस वक़्त है उसको?"

"हो गई गलती. 7 बजे का बोल दिए जबकि घर खली हे है 6 से 9 तक.", अन्नू को ध्यान आया के आज उसके घर वाले भी तोह गुरुर्ध्वरे जाने वाले है.

"अब करती रहना 7 बजे का इन्तजार. पहले नहीं बोल सकती थी की साढ़े 5 या 6 बजे तक आ जाये.?"

"यार वह कहने तोह यही गई थी लेकिन चारुल के सामने मैंने 7 बोल दिए. और वह तोह निकल भी गया होगा.", अन्नू इस मौके को हाथ से जाते देख थोड़ा दुखी हो गई थी.

"कोई बात नहीं यार. शाम उसके साथ हे है तोह उतने में हे खुस रह. फिर मिल जायेगा मौका.", मेनका ने समझते हुए कहा.

"वह चारुल और उसकी फॅमिली होगी मेनका. कुछ नहीं बस आना और जाना हे होगा.", अन्नू सोच रही थी की कैसे गलती कर दी. फिर दोनों हे अपना कुछ स्कूल का काम करती कुछ देर बैठने के बाद उठ कड़ी हुई.

.

.

"मौसी सच में चूरमा तोह आपका हे बनाना आता है.", सब अपना साधारण खाना खा रहे थे और अर्जुन रसोई में हे बैठा सरोज मौसी के हाथ का बना चूरमा खाने में लीं था. तवे पर सबके लिए रोटियां भी वही बना रही थी और माधुरी दीदी बाकी लोगो को परोसने में लगी थी.

"अरे तू हे हैं जो ये सब खुस हो के खता है. इन लड़कियों के चेहरे बदल जाते है चूरमा देखने भर से हे. मर्द की खुराक तोह ऐसी हे होनी चाहिए, शुद्ध और ताक़त से भरपूर.", अर्जुन का शरीर निहारते हुए सरोज जी के भी जिस्म में चींटिया से रेंगने लगी थी. सच में हे उसका जिस्म अभी से कुछ ज्यादा हे bada-chauda और पूरा कैसा हुआ था.

"मौसी, सही कहा आपने. ऐसा खाना और फिर ाची जोरदार म्हणत से हे शरीर निखरता है. वैसे आपको भी खाना चाहिए. नानी के घर आया था तब आप फिट दिख रही थी और अब थोड़ी कमजोर लग रही हो.", अर्जुन की बात सुनकर उन्होंने नजरे बचते हुए चिमटे का हिस्सा जांघो के बीच हलके से रगड़ा और फिर रोटी सकते हुए उसको देखने लगी.

"बीटा इतने दिन से म्हणत हे नहीं की तोह खुराक का क्या फायदा. ऊपर से बेटी ब्याह दी है तोह बूढी होने लगी हु.", अर्जुन चूरमे में दाल मिलता हुआ उन्हें भी देख रहा था. चौकोर धब्बे वाला ये सफ़ेद लाल सूती सूट उनके जिस्म से त्वचा की तरह चिपका सारा भूगोल बता रहा था. लम्बाई ाची थी और सेहतमंद भी थी. देखा जाये तोह वह ललिता जा का एक बड़ा और कही ज्यादा प्रभावी रूप हे थी. और उनसे जवान भी.

"फिर खुद को बूढी बताने लगी हो मौसी. बस अड्डे छोड़ते वक़्त भी मैंने कहा था और फिर कह रहा हु के अभी भी आपने खुद को कही ज्यादा ाचे से रखा हुआ है. पड़ोस वाली ाउंटिया देखना जो 40 में 60 की लगती है और आप 40 में 30 की."

"धत्त. कुछ भी बोलता रहता है. जानती हु अपनी मौसी का दिल रखने के लिए बोल रहा है बस.", पसीना चुनी से साफ़ करती वह रोटी बेलने लगी तोह उनके बड़े हिलते गुब्बारे देख अर्जुन के गले में हे चूरमा फंस गया. वह सीना बता रहा था के शायद ताईजी के भी इतने बड़े न था और न हे इतने कैसे हुए. छोटे से गले के पास से भी वह बहार निकलने को आतुर थे.

"पानी पी ले नहीं तोह खांसता रहेगा.", एक अदा से उन्होंने थोड़ा आगे होते हुए गिलास बढ़ाया तोह अब तोह अर्जुन ने उठने में भलाई समझी. वह मांस से भरे सतांन इतने बड़े होंगे उसे सोचा न था. जल्दी से पानी पीटा वह उठ खड़ा हुआ और सरोज जी उसके ऐसे करने पर मुस्कुरा रही थी. 'जल्द दिखती हु तुझे जो तू देखना चाहता है. पता लगे के रेखा का मुन्ना अभी मुन्ना हे है या मुनिया हिलने भी लगी है.'

.

.

अर्जुन ऊपर आया तोह यहाँ कोई न दिखा. बुआ निचे थी ललिता जी के कमरे में उसकी माँ रेखा जी के साथ और अलका, ऋतू, आरती दीदी उसके सामने हे प्रीती के घर गई थी रोमिला आंटी से मिलने के लिए. मंजू को दादी ने अपने पास हे बिठा लिए था खाने के बाद और रुपाली भी उनके हे सान्निध्य में थी, जैसा आमतौर पर वह करती थी स्कूल के बाद. अभी 2 से कुछ ऊपर हे समय हुआ था तोह अर्जुन को यही सही समय लगा था एक घंटा सुस्ताने के लिए लेकिन ऊपर यहाँ इस शांति में भी एक शोर था. हलके पानी गिरने का जो बाथरूम से आ रहा था. मुस्कुराते हुए उसने यहाँ अंदर आने वाला दरवाजा लगाया और फिर बाथरूम पर बहार से हे थपकी दी.

"कौन है बाबा? यहाँ तोह नहाने दो आराम से. नीचे भी दोनों बाथरूम रोके हुए हैं.", माधुरी दीदी की आवाज थी ये और अर्जुन इतने समय से उनसे दूर हे था. आज सही मौका जान कर उसने सिर्फ इतना हे कहा.

"दीदी, खोलो न.", और जैसी उम्मीद थी वही हुआ. दरवाजे के उस तरफ वह चिकना भरावदार जिस्म पानी से भीगा उसके सामने था. एक टोलिया सीने और जांघो के सामने लटकाये माधुरी दीदी उसको थोड़ा हैरत से देख रही थी.

"क्या हुआ? दिन में तुझे मेरी याद कैसे आ गई?", उनकी बात पर अर्जुन बस पूरी रौशनी में खिलते हुए उस जिस्म को देखता अंदर आ गया. टीशर्ट और पजामा मिनट के दसवे हिस्से में दरवाजे के पीछे लटके थे. माधुरी दीदी उसको ये करते देख एक लम्बी मुस्कान देती उस एक मात्रा तोलिये को दिवार पर लगे हक्क पर लटकती हुई अब पूरा जिस्म पेश करती कड़ी हो गई.

गीले बाल उन तन्ने हुए निप्पल के आगे से निकलते सामने नाभि तक शरीर से चिपके हुए थे. अगर कोई सही मायने में उनसे 21 थी शरीर के उठान और कटाव में वह बस कोमल दीदी हे थी, लेकिन माधुरी दीदी की खासियत थी उनका इस खेल में सामने से भरपूर खुल कर साथ देना. एक हाथ गीले चुके का गोल निप्पल सहलाते हुए वही रुक गया तोह दूसरे से अर्जुन ने उनका भरी नितम्भ पकड़ कर खुद से सत्ता लिए.

"पहले पता होता तोह आज ख़ास तैयारी करके रखती. उम्मीद नहीं थी की तू ऐसे वक़्त मेरे पास चला आएगा.", अर्जुन का सर नीचे झुकाती माधुरी दीदी अपने गीले होंठो से उसके मुँह को चूमती हुई पूरे सख्त शरीर को अपने नरम चिकने तन्न से चिपका रही थी.

"यहाँ बस किस्मत ने साथ दे दिए दीदी. नहीं तोह सोने हे लगा था मैं.", उनके वह गोल उभार बुरी तरह शरीर से दबने लगे जब अर्जुन ने खड़े हुए हे दीदी के दोनों नितम्भ हाथो से फैलते हुए उंगलिया उस गहरी घाटी में अंतत तक गदा दी.

"आठ.. अर्जुन, जल्दी कर जो भी करना है. उम्.. कोई ऊपर आ गया तोह फिर अगले हफ्ते दस दिन तेरे पास आना नसीब न होगा.", लुंड भी सख्ती से अकड़ा हुआ दीदी की नाभि से लेकर चुचो के नीचे तक सत्ता हुआ दोनों को बता रहा था के सब तैयार है. फिर भी अर्जुन ने एहतियात रखते हुए शरीर पर लगाने वाली क्रीम हथेली पर डालने के बाद जांघो के बीच छुपे उस ख़ास नरम हिस्से पर मसलनि शुरू कर दी. टाँगे खुद हे दीदी ने हलकी चौड़ा ली थी.

"उम्म्म.. तू यहाँ हाथ लगता है तोह ये अपने आप हे रोने लगती है रे.. ख़ुशी से... आठ.", रगड़ती हतेली के साथ हे अर्जुन उन चर्बी से फूली हुई फांको के अंदर उंगलिया फिरने लगा. माधुरी दीदी की सिसकारिओ ने जाहिर कर दिए था के वह मजे की और बढ़ने लगी है. थोड़ी क्रीम उनके हाथो पर गिरे तोह वह भी समझ गई क्या करना है. मजे में उसके होंठ चूसती हुई वह पूरे लुंड पर अपनी हथेली सुपडे से नीचे जड़ तक फिरने लगी. नरम चिकनी उंगलियों ने जैसे और हवा भर दी थी अर्जुन के बड़े डंडे में. मस्ती में सिसकते हुए उसने दोनों गुब्बारे थोड़े जोर से दबा लिए. वह नरम उभार इन हाथो में जैसे और सख्त होने लगे. छोटे मटर के दाने से निप्पल मसलता अर्जुन दीदी के हाथो में खुद हे लुंड आगे पीछे चलने लगा.

"आजा भाई. जल्दी से और थोड़ा आराम से कार्यो क्योंकि एक तोह इतने दिन बाद कर रहा है दूसरा तेरा ये लुंड अब ज्यादा हे खतरनाक दिखने लगा है.", माधुरी दीदी हे तोह थी जिसने ये शब्द अर्जुन को सिखाये थे. उनकी बात मानते हुए अर्जुन ने वह मांसल जांघ औंधी पड़ी बाल्टी पर रखते हुए पूरा जिस्म दिवार से लगाया और अपने घुटने थोड़े मदद कर उनके बराबर कद कर लिए.

भरपूर रौशनी में जीरो वाट के बल्ब जैसा हे उसका सूपड़ा रास टपकती हुई उस बहार की तरफ मुँह खोले इन्तजार करती छूट के मुहाने से चिपक गया.

"सच में हे मोटा हो गया है ये. आपकी वह तोह पीछे हे चिप्प गई.", अर्जुन ने ये छूट 3 बार छोड़ी थी लेकिन आज भी ये वैसे हे नाजुक लग रही थी.

"तू अंदर दाल और चुदाई कर. बाकी सब ये खुद सेहन कर लेगी.", बदन की आग में जलती माधुरी दीदी ने खुद हे सुपडे से पिछले हिस्सा थमते हुए उसको छूट पर दबाया और अर्जुन ने धक्का मार दिए. पर्याप्त चिकनी छूट में सुपडे के साथ हे एक इंच हिस्सा अंदर की दीवारे चौडाता हुए समां गया.

"मर्डर गई रे.. आह्ह्ह्ह.. कमीने .. सच में बड़ा हो गया माह.. ृक्क एक बार.", वह दर्द में हल्का कम्पटी हुई छूट के बहार उंगलिया फिरने लगी लेकिन वह वैसा कुछ नहीं था जैसा सोच रही थी. अर्जुन ने एक उभर ऊपर उठाते हुए होंठो में भर लिए.

"उम्माह.. दबा के pee...aah.. अभी लुंड मत डालिओ.. आह.", निप्पल होंठो में दबाता वह दीदी के ढीला होने का इन्तजार कर रहा था. साथ हे इन चुचो को पीने में उसको अलग हे स्वाद मिलता था जिसकी वजह से उसने अपना लुंड अभी रोक लिए था. छूट लुंड पर पकड़ ढीली करने लगी तोह उतना हे लुंड बहार निकलते हुए अर्जुन ने दीदी की गांड पर उंगलिया गड़ाई और एक बार फिर कमर हिला दी.

"आठ.. दीदी बड़ी गर्मी है अंदर आपके. ाः.. ढीला करो.", दीदी ने 6 इंच लुंड अपने भीतर गायब करते हे जैसे सुपडे का गाला छूट की नरम माँसपेशिओ से दबा लिए. आँखे बंद किये वह खुद को संभल रही थी और अर्जुन ने लुंड चलना शुरू कर दिए.

"माह.. आठ.. आराम से रे.. पीछे से ऊँगली निकाल.. आह्हः.", छूट इतनी जल्दी अंदर से रोने लगी और लुंड ने ये भांपते हे आखिरी झटका खाया.

"पागल.. आई.. मार दिए माँ.. कमीना बहनचोद..", इस बार लुंड जैसे बच्चेदानी को पीछे धकेल रहा था. समूचा लुंड छूट को बुरी तरफ फैलते हुए फंसा था और बहार बस वह बड़े अंडकोष छूट से टकरा रहे थे.

"आपकी छूट खुद कहती है पूरा अंदर करने को. आठ.. सच में कासी हुई पड़ी है.. उम्..", इतना कहते हे दोनों खरबूजे बरी बरी से मुँह में भरते हुए अर्जुन ने लुंड से गहरी ठोकर उन मोटी जांघो के बीच मारनी शुरू कर दी. हर धक्के पर हाय हाय करती माधुरी दीदी निहाल हुई जा रही थी. अर्जुन का सर चुचो पर दबती वह झड़ने लगी तोह शरीर खुद नीचे होने लगा. अर्जुन ने भी उन्हें सँभालते हुए फर्श पर अपने नीचे दबाया और दोनों टाँगे फैलता हुआ अपना घोडा उस गीली सड़क पर बेलगाम दौड़ने लगा. हर बार लुंड पहले से ज्यादा चिकना होता बहार आता और सीधा गर्भाशय पर जा भिड़ता. इतनी हे देर में दोनों गोश्त से भरे चुके उसने दबा दबा कर लाल कर दिए थे और हर धक्के पर खुद हे थिरक रहे थे.

"तेज कर रे आह.. ाचा लग रहा है. अपनी ऊँगली वही दाल.", सिसकती हुई माधुरी दीदी अब खुद भी गीले फर्श पर इस चुदाई का आनंद ले रही थी. पूरा शरीर हर धक्के से नाचा रहा था. गांड हवा में 4 इंच ऊपर उठाये अर्जुन जैसे आज फाड़ के हे रुकने वाला था उनकी छूट को.

"कहा ऊँगली दालु दीदी.?", अर्जुन ने नासमझ बनते हुए लुंड की स्पीड अधिकतम कर दी. अगर घरवालों का डर न होता तोह माधुरी दीदी अपनी मजे की चीखें पूरे घर में सुना देती. छूट से अब हल्का सफ़ेद द्रव्य लुंड के साथ हे बहार निकलता गांड पर जमा होने लगा था.

"गांड में दाल. ज्यादा बन्न मत.. आह्हः.. फाड़ दे इसको.. आठ.", दोनों हाथो से खुद हे वह अपने दूध दबती हुई अगले चरम पर पहुंचने लगी थी लेकिन तभी अर्जुन ने अपना वह मूसल बाहर खींच लिए.

"पलट जाओ न.", माधुरी दीदी बिना कहे घुटनो के बल होती दिवार की जड़ में हथेलिए सताती घोड़ी बन गई. उनके मॉटे चुचो इस वक्त किसी मुर्राह भैंस के थांनो की तरह लटक रहे थे. अर्जुन ने भी गांड के पीछे आते हुए एक हे धक्के में अंतिम सिरा नाप दिए.

"आह.. ऐसे तोह और कैसा जा रहा है रे... उम्.", लुंड सच में इस वक्त दोनों कूल्हों को फैलता हुआ उस लाल सुरंग में फंसता हुआ जा रहा था. नीचे से एक हाथ आगे बढ़ता वह उनके एक दूध को कुशलता से दुहने लगा और अंगूठे को छूट रास में चिकना करते हुए उनके पिछले द्वार में भर दिए. शरीर उत्तेजना में अकड़ने लगा लेकिन न अर्जुन ने धक्के रोके न अंगूठे को उस नरम गांड के चले से बहार निकला.

"मार दिए रे.. आह... मई गई." दीदी धम्म से फर्श पर गिरी तोह दोनों चुके आधे से ज्यादा बहार की तरफ फिसल कर निकल आये. लुंड का सूपड़ा हे अंदर रहा था जिसको अर्जुन ने निकाल कर छूट से आधा इंच ऊपर उसकी ज्यादा हे भीड़ी सहेली के मुँह पर लगा दिए. दीदी अपने चरम का मजा ले हे रही थी की एक भयंकर पीड़ा से शरीर अकड़ गया.

"आह दीदी.. बस हो गया."

"हो गया के बचे.. आह्हः.. मैं उठूंगी कैसे.. बहनचोद गांड भी अभी मारनी थी.. माँ.. फट गई.", कूल्हों के बीच वह अजगर जैसे उस बिल को जबरदस्ती फैलता आधा अंदर बैठ चूका था. उतने हे लुंड को जबड़े कसके बहार निकल अर्जुन ने फिर अंदर पेल दिए. अब ये वह लगातार बिना रुके कर रहा था. दर्द की आहे मजे की सिसकारिओ में बदल गई थी. चौड़े चुत्तड़ हर धक्के पर फैलते और थिरकने लगते.

"ाःह आपकी हे गांड है जो ममममम. मेरा ले लेती है.. आठ.." उनके ऊपर लेता वह अब लगातार सिर्फ कमर हिला रहा था. बहार को निकले दोनों चुचो को गिरफ्त में लेता अर्जुन भी उस सख्त चले में ज्यादा देर नहीं टिक पाया. लुंड फटने की हद्द तक फूल गया तोह दीदी ने भी उसको अंदर हे जकड लिए.

"आठ.. मा.. ये क्या कर रहा है.. सीई.. फाड़ने के बाद दवा भी तू हे लगता है रे.. अभी मत निकलिओ..", गांड मरवाने से भी उनकी छूट खुश हो रही थी. अर्जुन का बोझ महसूस किये बिना वह इस गरम पानी का मजा लेती अब गांड को ढीला चोदे बस गहरी साँसे ले रही थी. अर्जुन भी हलके हलके उनके निप्पल उंगलियों में दबाता आखिरी कटरा खली करने के बाद लेता रहा. 5 मिनट बाद आधा अकड़ा लुंड भी सोडा की बोतल जैसे आवाज करता बहार आया तोह गांड के भूरे छेड़ का मुँह कांपता हुआ अठन्नी जितना खुल्ला हे रहा. सफ़ेद तरल हल्का हल्का बहार निकल रहा था. अर्जुन ने शावर चलाया और खुद हे दोनों को साफ़ करने के बाद दीदी को सहारा देता बहार ले आया.

"कर ली मैं की? अब अगर 3 दिन से चौथा दिन हुआ न तोह ये छूट नहीं मिलने वाली. पहले ढीली कर फिर जहा मर्जी घुसा ये घोड़े का लुंड.", माधुरी दीदी कपडे पहन चुकी थी लेकिन शरीर में जान naam-matra थी. संजीव भैया के कमरे का पंखा चला कर अर्जुन ने उन्हें वही लिटा दिए और अपने कमरे में आ गया. वह खुश था माधुरी दीदी के साथ करने के बाद क्योंकि एक वही संगिनी थी जो खुलकर चुदवाती भी थी और बोलती भी थी. 3 बजने वाले थे तोह 45 मिनट का अलार्म लगा कर वह बिस्टेर पर गिरते हे सो गया.

.

.
 
अपडेट 84

एक रात के baad-Ek रात से पहले (III-B)


"मंजू, जरा अर्जुन को उठा दे वह सोया पड़ा होगा और स्टेडियम का समय भी होने वाला है.", रेखा जी ने आँगन में बैठी मंजू से कहा तोह वह भी उठ कड़ी हुई. संभल कर चलती हुई वह ऊपर आई तोह अर्जुन को उसके कमरे में पीठ के बल चित्त लेते देख ठिठक गई. नंगी चौड़ी छाती का उभार जैसे उसकी आग भड़काने लगा था. वह कुछ सोच कर वापिस नीचे चली आई और ऋतू दीदी को कहने लगी अर्जुन को उठाने के लिए.

"क्यों तुझे क्या हुआ? चल आ मेरे साथ.", ऋतू दीदी उसका हाथ पकड़ती ऊपर लाइ तोह अर्जुन को ऐसे सोया देख माजरा समझ गई.

"इसलिए नहीं उठा रही थी इसको?", ऋतू दीदी की बात पर मंजू ने शरमाते हुए हाँ कहा.

"अगर मैं इसको उठती तोह पक्का हे इसने पकड़ लेना था."

"चल फिर देर किस बात की. तू उठा मैं उधर से देखती हु.", ऋतू दीदी ने आँख मरते हुए कहा.

"यार इधर घर में नहीं. समझा कर.", मंजू ने गंभीरता से कहा तोह ऋतू दीदी मुस्कुरा दी.

"ाची बात है. और कभी ये मत सोचना के मैं तुझे इसको प्यार करने से मन करुँगी. और तू समझदार है ये बहोत ाची बात है.", ऋतू दीदी ने मंजू का हाथ पकड़ते हुए कहा और फिर अर्जुन के बिस्टेर के पास जाते हे उसकी टांग जोर से खींच दी.

"क्या हाउ? दीदी ये क्या हरकत है?"

"हरकत के बचे माँ कह रही है तू 2 बजे से ऊपर है. चल उठ जा और तैयार होजा. वैसे मैं, अलका, तारा और आरती इसके ससुराल जा रहे है तारा के आते हे. मेनका दीदी को भी थोड़ा सत्ता ले जा कर.", हंसती हुई ऋतू दीदी को देख कर अर्जुन भी खुश हो गया और खड़े होते हुए उन्हें गले लगता वह कपडे ले कर बाथरूम में चला गया.

"सच कहु तोह आप दोनों में भी बड़ा प्यार है. इतना साफ़ और चमकता हुआ तोह ये हमारे एकांत पालो में भी नहीं दिखा. ", मंजू की ऐसी बात पर ऋतू दीदी ने भी अपने दिल की बात उसको बता दी.

"मंजू ये दिल है और मैं धड़कन. हम दोनों को बात करने के लिए शायद जुबान की भी जरुरत नहीं है. अलका और मेरा तोह तूने देख हे लिए है लेकिन अर्जुन के साथ ये कनेक्शन कही ज्यादा मजबूत है.", ऋतू दीदी के चेहरे पर अपने भाई के लिए इस वक़्त जो असीम प्रेम उभरा हुआ था उसका जीकर करते हुए वह मंजू ने भी महसूस किआ.

"प्यार करती है आप उस से.?"

"कौन नहीं करेगा? ऊपर से जब मैं ढाई साल की थी तोह वही मुझे अपने सबसे प्यारे खिलोने के रूप में मिला था. 5 साल की हुई तोह सारा दिन उसको अपनी कमर पर उठाये घूमती रहती थी. अर्जुन के बिना तोह मैं जैसे हु हे नहीं रे. खुद सोच जरा के वह कभी रहा हे नहीं बचपन मेरे मेरे बिना", एकाएक वह भावुक हो गई थी लेकिन तभी प्रीती उन्हें ढूंढ़ती उधर आ गई. ऋतू दीदी का चेहरा देख कर उसके भी चेरे की रंगत बदलने लगी.

"अर्जुन ठीक है?"

"है रे पागल. तू भी उछलती हुई इधर आ गई."

"आपके चेहरे को देखा तोह लगा आप परेशां हो उसकी वजह से. हैं कहा वह जनाब?", प्रीती ने नजरे दौड़ते हुए पुछा.

"वह शायद नीचे चला गया कपडे बदल कर.", ऋतू दीदी उन दोनों के हे साथ नीचे वापिस आई तोह अर्जुन के मोटरसाइकिल स्टार्ट होने की आवाज तीनो ने सुनी.

"सच में बहुत ज्यादा ाचे से एक दूसरे को जानते हो सभी.", मंजू ने इतना हे कहा और सोचने लगी.

"चल छोड़ ये सब और आजा कोमल दीदी के साथ कर्रम का मैच लगते है.", ऋतू दीदी की बात पर प्रीती ने पहले हे बोल दिए के वह कोमल दीदी की तरफ रहेगी.

"Thik-thak खेल लेती है क्या दीदी? बच्चों वाली गेम हुई तोह मैं थोड़ी हे देर में बहार हो जाउंगी.", मंजू की बात पर दोनों हंसने लगी.

"हम दोनों हे बहार हो जाने वाली है 3 राउंड से पहले, अगर प्रीती ने साथ दिए तोह.", ऋतू दीदी की बात पर प्रीती ने अंगूठा दिखा दिए. 5 मिनट बाद हे 4 लोग कर्रम बोर्ड पर गेम लगाए बैठे थे और अलका आरती उन्हें देख रही थी.

"पहली बारी मेरी.", ऋतू दीदी की बात पर कोमल दीदी ने स्ट्राइकर उन्हें दे दिए. उनके बाद बरी प्रीती की थी और फिर मंजू की, सबसे आखिर में कोमल दीदी.

"चल सब बिखेर दिए, मंजू. अब जितना हो सके ले लेना इस प्रीती के बाद.", मंजू गर्दन हां में हिलती बारी का इन्तजार करने लगी और इधर प्रीती ने 24 में से 6 गीति साफ़ करते हुए मंजू को स्ट्राइकर दे दिए.

"ये तोह तेज निकली. चल अब रानी का शिकार करते है.", मंजू ने निशाना लेना शुरू किआ तोह ऋतू दीदी ने इशारे से मन कर दिए.

"जितनी ले सकती है वह ले. रानी के बाद कवर तोह बना पहले.", लेकिन मंजू ने भरोसा दिखते हुए रानी दाल दी और कवर भी, काली गीति के रूप में. लेकिन अगले हे निशाने पर चूक हो गई.

"हो गया खेल ख़तम.", ऋतू दीदी अलका की बाजू पकड़ कर बोर्ड को देखने लगी और मंजू हैरानी से ऋतू को. जल्द हे ये हैरानी कोमल दीदी की तरफ हो गई. देखते हे देखते बोर्ड पर 2 पीली गीतियाँ उनकी हे पटरी के पीछे चिपकी रह गई. पीछे सीधा स्ट्राइकर मरना मन था.

"चल 100 नंबर तोह बोर्ड पे रखेंगे. और फिर गलती नहीं होने दूंगी पहली बारी वाली.", बात ख़तम की तोह स्ट्राइकर सामने के मोरी की गिर्द घूम कर इस गीति से लगा और वह अंदर. दूसरी बार में 3 तरफ टकराने के बाद बची आखिरी गीति से टकराया और वह भी अंदर.

"तू 100 की बात कर रही थी यहाँ 60 बचे और पहली बारी भी इनकी.", ऋतू दीदी ने अपना सर कोमल दीदी की गॉड में रखते हुए गुजारिश की के वह पहली बारी में कोई गीति न ले.

"अपने हाथ खड़े है भाई. दीदी के साथ नहीं खेलती बाकी कोई भी आ जाओ इनकी जगह.", मंजू ने अगले दौर से पहले हे दोनों गीतियाँ बाकी में मिला दी.

"तू क्या कह रही थी थोड़ी देर पहले की 3 गेम खेलेंगे. दूसरी भी नसीब न हुई.", प्रीती खुश थी जितने की वजह से.

"छम्मकछल्लो, चल तू इस बार मेरी साथ हो. हम मिलके देखते है ऋतू और मंजू को.", अलका दीदी ने मोर्चा सँभालते हुए कहा तोह ऋतू दीदी उन्हें देखने लगी.

"अब ये मत कहना के ये कोमल दीदी जैसा हे खेलती है."

"अरे नहीं नहीं. उनके जैसा सिर्फ माँ खेलती है. अलका अपने हे लेवल की है. हाँ माँ और दीदी की गेम चलती भी घंटा भर है अगर कभी खेलने लगे तोह.", ऋतू की बात सुनकर मंजू कड़ी होती बहार चल दी.

"मौसी को बुला कर लाइ मैं. अलका और कोमल दीदी, मैं और मौसी.", मंजू की बात सुनकर कोमल दीदी का चेहरा चमक उठा.

"अब आएगा मजा. इसको माँ नहीं मन करेगी. फिर देखते है कोमल दीदी को.", ऋतू दीदी की बात का मतलब समझते हुए कोमल दीदी ने हँसते हुए कहा.

"मतलब तू अभी भी परसो वाली हार का बदला लेने में लगी है. चल आने दे माँ को भी, अलका बस मंजू को गीति न लगा कर दे. यहाँ जैसे माहौल बन्न चूका था ाचे खेल का.

.

.

गयम में कल जैसा हे माहौल था आज भी. अर्जुन इत्मीनान से बाजू और कंधे की कसरत करता हुआ पहले से ज्यादा वजन उठाये लगा रहा जब तक की बलबीर ने बस नहीं कह दिए. दोनों के शरीर पसीने में चमचमा रहे थे.

"छोटे भाई, हो क्या गया है तुझे. किसी को कंधे पर उठाने की तोह नहीं सोच रहा था.?", बलबीर की ऐसी बात पर अर्जुन हँसता हुआ पसीना पौंछने लगा. बाजू की मछलिया बाहर उभर कर एक नया अवतार दिखा रही थी अर्जुन का. वैसे हे फूली हुई नस्से बता रही थी की शरीर पर चर्बी पिघल कर बस माँसपेशिओ को बढ़ा चुकी है.

"बलबीर भाई, पहले मैं वही करता था जो आप करते हो लेकिन अब समझ आया के आप अपने शरीर के अनुपात सही म्हणत कर रहे थे और मैं काम. चलो अब प्रैक्टिस पे चले.", अर्जुन बहार चलने लगा तोह बलबीर ने रोक लिए.

"आज छुट्टी है उधर की. और तैयार भी होना है भाई सगाई में जाने के लिए. 5 बज चुके 7 बजे होटल पहुंचना भी है. चल तू भी निकल और मैं भी चला.", दोनों हे बहार निकल आये तोह अर्जुन घर जा कर हे नहाने का विचार से स्टैंड की तरफ बढ़ गया.

"ओह ये रा बलबीर. पकड़ साले को, 2 लगेंगे तोह बताएगा के फूफा कहा है इसका.", अर्जुन जल्दी से पलट गया ये आवाज सुनते हे. टेनिस कोर्ट की तरफ पैदल जा रहे बलबीर को ये 3 लोग घेरे थे. बिजली की रफ़्तार से दुड्ता हुआ वह उनके बीच में पहुंच गया.

"शांत हो जाओ और वापिस चले जाओ. फिर नहीं कहूंगा.", अर्जुन की चेतावनी अनसुनी करता ये लम्बा छरहरा लड़का बलबीर की गर्दन की तरफ हाथ बढ़ता उस से पहले हे उसकी कलाई पंजे में पकड़ते हुए अर्जुन ने बाकी सबको देखा.

"बलबीर भाई इनका क्या चक्कर है?", वह लड़का जमीन की तरफ झुक्क चूका था इतनी देर में हे.

"छोटे भाई तू रहने दे इस झमेले में ना पड़. ये पिछले साल तक कॉलेज हॉस्टल में हे थे लेकिन नए लड़को के साथ गलत काम करते थे इसलिए शिकायत कर दी थी मैंने और मेरे दोस्त ने. आज जब मौका मिला तोह बदला लेने आ गए. मैं देख लूंगा इन्हे तू निकल.", बलबीर कदम आगे बढ़ने लगा हे था के उस लड़के के चीख सुनकर वही रुक गया. जमीन पर पूरा धड़ टिका था लेकिन कलाई अभी भी अर्जुन के हाथ में थी.

"देख क्या रहे हो? बढ़ो आगे.", अर्जुन की गर्जना सुनते हे वह दोनों हे शरीर से तगड़े लड़के एक दूसरे को देखने लगते तोह कभी जमीन पर पड़े अपने दोस्त को. हिम्मत करता हुआ दोनों में से ज्यादा तगड़ा लड़का 2 कदम आगे आया और फिर 5 कदम पीछे जमीन पर जा गिरा. तीसरे वाले को बलबीर रूई की तरह धुन चूका था बॉक्सिंग किट समझते हुए. और इसकी गर्दन हाथ में पकड़े अर्जुन आँखों में आखें दाल कर जैसे जान निकलने हे लगा था.

"गलती से मत दिख जाना यहाँ नहीं तोह जिस किट पर प्रैक्टिस करते है वही लटका दूंगा.", उसको धमका हे रहा था के पहले वाला लड़का अर्जुन पर पीछे से लपका लेकिन उलटे हाथ का भरपूर पंच कमर से ऊपर लगते हे बिलबिलाता हुआ जमीन पर पेट पकड़ कर दोहरा हो गया.

"बात कर रहा हु मैं इस से और तुझे समझ नहीं आ रहा.", जमीन पर पड़े उस 22-23 साल के 6 फ़ीट लम्बे गबरू को अर्जुन ने काख से पकड़ कर ऊपर उठा लिए.

"दिल तोह करता है उखाड़ फेंकू दोनों हाथ. माँ बाप ने पढ़ने भेजा और यहाँ कुकर्म करते फिर रहे हो. ठयऊ है तुम जैसो पर.", निचे गिरता हुआ वह बलबीर की तरफ देखने लगा तोह अब वह दूसरे वाले पर मुक्के बरसता पीला हुआ था.

"ओह बस करो भाई. लोग इकट्ठा हो गए है आसपास.", बलबीर को एक हाथ से पकड़ कर अर्जुन उठाये हुए हे दूसरी और चल दिए. हवा में भी वह जैसे मुक्के बरसा रहा था. जब थोड़ा आगे आ गए तोह अर्जुन ने उसको जमीन पर खड़ा किआ.

"बड़े फुर्तीले हो यार. आज नहीं रोकता तोह मार हे देते.", अर्जुन मुस्कुराता हुआ जमीन पर गिरा बैग उठाते हुए बलबीर को ठंडा करने लगा. टोलिया निकाल कर उसको देते हुए एक से खुद को साफ़ करने लगा.

"छोटे भाई, ये साले नाली के कीड़े है. अब देख क्या हो रहा है इनके साथ. यहाँ इनके आने पर पाबन्दी थी और अब ये गए लम्बे.", वह बातें हे कर रहे थे के स्टेडियम के इंचार्ज उधर आ गए. कुछ लड़कियां भी थोड़ी पीछे कड़ी ये नजारा देख रही थी.

"कुछ कहना है इस घटना के बारे में.?", नरमी से इस शख्स ने पुछा तोह बलबीर ने हे जवाब दिए.

"सर, तीनो आखिरी साल हॉस्टल से निकले गए थे, मेरी कंप्लेंट पर. जूनियर को फैसिअल हरस्मेंट के लिए. आज मौका देख कर इन्होने हे ये शुरू किआ, सिर्फ आत्मरक्षा में हमने हाथ उठाया है. वह 3 थे और हम 2."

"वह सब हमे पता है. इन पर स्टेडियम में घुसपैठ और अराजकता का मामला दर्ज होगा लेकिन तुम कोई कम्प्लेन करना चाहते हो.?"

"जी नहीं सर. मार उन्हें पड़ी है तोह हमारा कंप्लेंट करवाना ठीक नहीं. आपके सिस्टम के हिसाब से जो है वही बेहतर रहेगा.", अर्जुन ने नजरे झुकाये हे कहा.

"ाची बात है. और एक बार तुम मिलना मुझसे, परसो 4 बजे मेरे ऑफिस में.", अर्जुन और बलबीर का कन्धा थपथपते हुए वह सिक्योरिटी के 5-6 लोगो के साथ उन तीनो को वह से ले गए.

"छोटे भाई, तेरी प्रमोशन पक्की हो गई देख लिओ. वैसे सही कहु तोह मैंने किसी को छाती में upper-cut लगते आज हे देखा वह भी ऐसा के 5 फ़ीट उछाल दिए उसको तूने. और जब राजा को हवा में उठाया तोह भाई जरासंध और भीम याद आ गए थे. के तू अभी उसके 2 टुकड़े करेगा और एक उत्तर में, एक दक्षिण में."

"हाहाहा.. बलबीर भाई, चलो अब. बचे थे वह जो हम सलामत है. 3 लोग अगर त्रिनेड होते तोह आज घर हम मुँह फुलाए जाते. ाचा मिलता हु फिर शालीमार में, 7 बजे.", निक्कर पहने हे वह बैग पीठ पर ठीक करता हुआ बैठा और वह से चल दिए. आज खास बात थी की वह अपनी प्रैक्टिस वाली ड्रेस में हे शहर से गुजर रहा था. बलिष्ट चमकती भुजाएं बेपर्दा थी और औसत रफ़्तार पे ये लाल बुलेट चलता हुआ अर्जुन आसपास की हर नजर में आ रहा था.

"यार ये वही मंजू वाला दोस्त है न?", ये मुस्कान थी, मंजू की सहेली जो सारा तमाशा देख रही थी.

"ये प्रीती पूरी का बॉयफ्रेंड है, अर्जुन शर्मा.", डिम्पी ने मुस्कान को आँख मरते हुए कहा.

"तू जानती है इसको? यार सच बता.", मुस्कान के साथ हे 2 लड़किया और डिम्पी के पास आ कड़ी हुई.

"अरे बचपन का दोस्त है मेरा. लेकिन पता नहीं कब ये बड़ा हुआ और कब प्रीती का हो गया.", डिम्पी बेचारगी से बोली

"कोई न. अब तूने नाम बता दिए है तोह काम हम कर हे लेंगे. फ्रेंडशिप हे करनी है pyaar-vyaar नहीं.", मुस्कान उस से हाथ मिलती चली गई और डिम्पी आह भर्ती स्कूटी लेने.

.

.

पौने 6 बजे थे और अर्जुन फक्क सफ़ेद कुरता पायजामा पहने अपनी दादी जी के पास खड़ा था. पाँव में भूरी चमड़े की नयी जूती और सीने पर कैसा ये कुरता एक अलग हे छठा बिखेर रहा था उसके रूप की. कान के पीछे कला तिलक लगाती कौशल्या जी ने बंद पैकेट और साथ हे सगुन का एक लिफाफा पकड़ते हुए उसको विदा किआ. साथ हे हिदायत भी दी के कुछ भी ऐसा वैसा मत खाना. उनकी बात मानते हुए वह एक बार खुद को शीशे में देखने के बाद बहार निकल आया. उसको पता था के अब अगला एक घंटा वह अन्नू के हे साथ है.

"Tring-Tring" घंटी की आवाज सुनते हे झल्लाई हुई अन्नू पाँव पटकती हुई अपने कमरे से बहार की तरफ चल दी. इतनी हे देर में एक बार फिर घंटी बज उठी.

"आ रही हु, बटन से उंगलिया हटा लो. एक तोह कोई कपडा समझ नहीं आ रहा ऊपर से अर्जुन से बात भी नई कर पाई.", लेकिन बहार निकलते हे सामने खड़े इंसान को देख सारा गुस्सा फुर्र हो गया. चहकती हुई वह दरवाजे पर जल्दी से आई और दरवाजा खोलते हे अर्जुन की ब्याह पकड़ अनादर ले जाने लगी.

"दरवाजा तोह बंद करने दो मैडम. और पहले क्या बोल रही थी के बटन से उँगलियाँ हटा लो. अब देखो कौनसे बटन दबाता हु.", ड्राइंग हाल का जाली वाला दरवाजा अन्नू ने बंद किआ हे था के अर्जुन ने इस लम्बी और जवानी से लड़ी यौवना को बाँहों में उठाते हुए उसके कमरे का रुख कर लिए.

"किस मूड में हो आज.?", उसकी गॉड में मुस्कुराती अन्नू बस अर्जुन के चेहरे को देख रही थी. दिल में खुशियां जैसे उमड़ती हुई आँखों से जाहिर हो रही थी.

"मूड तोह ऐसा है की फिर मेरे कपडे तुम्हे प्रेस करने पड़ेंगे.", कमरे के अंदर आते हे अर्जुन उसको बिस्टेर पर आराम से लिटाते हुए पूरा उसके ऊपर चा गया. अन्नू प्यार से अर्जुन को देखने के बाद खुद हे आँखें मूंदे उस से जुड़ने का इन्तजार करने लगी. दोनों के होंठ कुछ ऐसे चिपके की जैसे वह अलग थे हे नहीं.

"तुम्हे याद था आज का दिन?", गहरी सांसें लेती हुई वह अपने ऊपर झुके अर्जुन की छाती सहलाती पूछने लगी.

"तुम्हे अपने हाथो से तैयार करने का मौका कैसे गवा सकता था? और वैसे भी तुमसे कल नहीं मिल पाया तोह आज बोनस देने का दिल था.", नारंगी पजामा और ढीली सफ़ेद टीशर्ट पहने अन्नू की बड़ी छातियां हर सांस के साथ ऊपर नीचे हो रही थी. उन बड़ी आँखों में देखते हुए अर्जुन ने अपने हाथ टीशर्ट के अंदर से नंगी कमर पर रखे तोह मदद्भरी सीत्कार लेती अन्नू की गर्दन एक तरफ हो गई.

गोरी गर्दन को तपते होंठो से चूमता अर्जुन उन घने बालो की खुसबू भी ले रहा था.

"आह्ह्ह्ह.. कैसा नशा भर देते हो? फिर ऐसे हे छोड़ जाओगे साड़ी रात तड़पने के लिए.", अन्नू के स्वर में बेचारगी थी और अर्जुन का सामीप्य पाने का निवेदन.

"आज एक नए एहसास से तुम्हे मिलवाने का इरादा लिए आया हु. तड़पाऊंगा नहीं.", गले से नीचे उस गोरी त्वचा पर अपने आधार चुभता हुआ वह अपने लम्बे हाथ चिकने पेट से सरकता और आगे बढ़ने लगा.

"ये उतार लो, खराब हो जायेगा.", सफी इस्त्री किये कुर्ते की तरफ धाय दिलाया तोह अर्जुन ने तीनो बटन खोलते हुए इस वस्त्र को दरवाजे पर टांग दिए. गोरा मजबूत सीना अन्नू के सामने था. लेकिन उसको वैसे हे लिटाये अब फिर से अर्जुन उसकी कान की लौ मुँह में लेते हुए एक टांग को ऊपर उठता अन्नू की मुलायम जांघ से हाथ फिरता हुआ नरम और भरी कूल्हे को सहलाने लगा. अन्नू इस दोहरे मजे से निहाल होती हुई लम्बे नाख़ून पीठ पर गदति अपनी जांघो का मध्य भाग अर्जुन की कमर पर चिपकने लगी.

"जहा भी चूमता हु वही से लाल हो जाती हो. पता नहीं लग रहा के रुक जाऊ या करता राहु.", अर्जुन ने उसके निचले होंठ को पूरा मुँह में लेते हुए ाचे से चूस लिए.

"जैसे चाहो करो और जो चाहे. बस आज मुझे तुम्हेर पूरा देखना है.", अन्नू की मंशा जानते हे अर्जुन ने सीने को सूंघते हुए निचे आ कर गोल गहरी नाभि पर जीभ लगा दी.

"इसशहहह.. मममम. ये कहा कहा आग लगा रहे हो अर्जुन?", इसके साथ हे वह टीशर्ट ब्रा को पर करती गले पर आ रुकी. एक पल के लिए उन बड़े सैंट्रो को हलकी पीली ब्रा में क़ैद देख अर्जुन भी दांग रह गया. दोनों दूध से सफ़ेद चुके ब्रा के कसाव की वजह से आपस में जुड़े थे. गोरी गहरी दरार देख वह खुद को रोक न सका.

"उम्म्म.. आह्ह्ह्हह्ह..", कभी उन अमृत कलश के बेपर्दा भाग पर होंठ लगता तोह कभी जीभ. अन्नू की दोनों टाँगे विपरीत फैली हुई थी जिनके बीच में पयजामे के अंदर से हे उसका सख्त अंग अन्नू के जिस्म में काम वेग बढ़ा रहा था. जाली वाली इस ब्रा का हुक दोनों कप के बीच हे था. हल्का जोर लगते हे दोनों सिरे चित्तक कर एक दूसरे से दूर बिस्टेर पर पसर गए.

"क्या हुआ? ऐसे क्या देख रहे हो.?", अन्नू ने शरमाते हुए अपने उभारो पर कलाई और हथेली रख ली.

"देख रहा हु के ये ऐसे भी हो सकते है. लेकिन फिर तुम्हारी ये हाय जो बीच में आ रही है.", पहली बार तोह अन्नू ऊपर से निर्वस्त्र हुई थी अर्जुन के सामने. जितना भी प्यार हो लेकिन ये लज्जा आना लाजमी थी.

"मैं खुद इन्हे नहीं देखती आजकल. फिर तुम ज्यादा याद आने लगते हो.", अन्नू की ऐसी बात सुनकर अर्जुन प्यार से उस हाथ को चूमने लगा जिसने वह पूरा बड़ा उभर सामने से ढाका हुआ था.

"अब सामने हे तोह हु."

"लग तोह सपना हे रहा है.", एक कामुक मुस्कान के साथ अन्नू ने जवाब दिए तोह अर्जुन ने कमर पर उंगलिया एक ख़ास अंदाज में घुमानी शुरू कर दी. मचलती अन्नू ने दोनों हाथ उसके कंधे पर रखते हुए जैसे उसको रोकना चाहा.

"ये किसी के लिए भी सौन्दर्य का सर्वोच्च मापदंड होंगे.", अर्जुन थोड़ा पीच होता उन एकदम गोलाकार उरोजों को देखने लगा. आधा सेंटीमीटर के लगभग ठीक बीच में बना वह चूचक प्राकृतिक गुलाबी था. कही गोल भूरा घेरा नहीं सिर्फ चार आने की गोए सी एक लाल लकीर जिसका बीच का भाग भी वैसा हे था. दोनों हे उभार जैसे एक दूसरे का hu-ba-hu अक्स थे. सुत्वा नरम पेट से ऊपर का ये हिस्सा एक ख़ास अंदाज में बहार निकला अध्भुत नजारा प्रदान करता था.

"बस करो इन्हे देखने. ये तुम्हारे हे है लेकिन बस ऐसे मत देखो न.", अन्नू की हया हद्द से ज्यादा होने लगी और इसको उत्तेजना में बदलने के लिए अर्जुन ने हौले से उन दोनों उभारो को थाम लिए. दोनों के हे जिस्म में करंट सा भर गया स्पर्श मात्रा से.

"डर लग रहा है अगर इन्हे थोड़ा भी सख्ती से पकड़ लिए.", अर्जुन हौले से उन्हें चूमने लगा और अन्नू की धड़कन जैसे दिल से बहार हे निकलने लगी थी. पल भर में हे वह गुलाबी निप्पल अर्जुन के होंठो में था, जिसको वह एक खास अंदाज में ऊपर से नीचे तक चूसता हुआ दूसरे उभार पर ुक्रे निप्पल को एक ऊँगली से उत्तेजित कर रहा था. 5 मिनट इतनी आत्मीयता से चूमने के बाद वह दूसरे वाले पर आ गया. पहले वाला अब और भी फूल कर अर्जुन की लार में चमक रहा था. गुलाब पर जैसे ौस की बूँद बन गई हो. दोनों निप्पल पर बराबर प्यार देने के बाद उनपर हथेलिया जमता हुआ अर्जुन दिल की गहराई से वैसा हे धीमा चुम्बन उन होंठो पर करता हुआ खुद को जैसे अन्नू के सुपुर्द करने लगा. आँखें बंद किये अन्नू भी उसका सर अपनी लम्बी उंगलिओं से सहलाती मस्ती में डूब रही थी. पेट के निचले हिस्से में अलग हे भूचाल उठ रहा था. कुछ अर्जुन द्वारा इतने कामुक अंदाज में किये सतांन मर्दन और चूसै से और कुछ उस दहकते हुए गोलाकार लंबवत रगड़ मार रहे लिंग की कर्ठोरता से.

"मुझे अपने में समां लो अर्जुन.", दोनों एक दूसरे के चेहरे को देख रहे थे और अन्नू अब इस सफर से आगे जाना चाहती थी. बिस्टेर के ठीक ऊपर लगे बोर्ड के सभी बटन बंद करते हुए अर्जुन फिर से अन्नू के ऊपर आ गया. ऊपरी हिस्से पर टीशर्ट गायब हो चुकी थी और इस हलके अंदर में अन्नू को अपने ऊपर लिटाते हुए अर्जुन ने उन फूले हुए कूल्हों से वह इलास्टिक का पजामा निचे खिसकना शुरू कर दिए. अन्नू के दोनों निप्पल किसी नश्तर की तरह अर्जुन की मजबूत छाती में गड्ड रहे थे लेकिन साथ हे मखमली उभर दबते हुए दोनों की आग और बढ़ा रहे थे. आधा काम अर्जुन ने किआ था पाजामे को जांघो से निचे करके, बाकी हिस्सा खुद अन्नू ने हटा दिए.

"तुम्हे सचमुच इस पल को और आगे ले जाना है?", अर्जुन ने अपनी उंगलिया इन दूसरे बेजोड़ भाग पर रखते हुए महसूस किआ था के अन्नू के नंगे नितम्भ भी एक बेहतरीन कारीगरी की मिसाल थे, बनाने वाले की. उंगलिया फिसल भी रही थी और हल्का दबाने पर धंस भी रही थी. पूरे शरीर की गंध एकसार सी मीठी और दिल में उतरने वाली थी.

"मुझे इस पल को वह तक ले जाना है जहा से वापिस न आ सके. बात स्वार्थ सी लगेगी लेकिन अगर तुम्हारा साथ मिले तोह मुझे सब मंजूर है.", खुद हे अर्जुन का दूसरा हाथ अपने दूसरे नितम्ब पर टिकती वह उसके गालो, गले और सीने को चूमने लगी. अर्जुन भी उसका साथ देता हुआ जांघो से लेकर कमर तक हर हिस्से को स्पर्श करता, दबाता हुआ अन्नू का सहयोग कर रहा था.

"मुझे तुम्हेर पूरी तरह अपने नीचे महसूस करना है. रिमूव.", अन्नू को बिस्टेर पर एक तरफ लिटा कर अर्जुन ने पायजामा और कच्चा सही से एक किनारे रख दिए. और जैसे हे दोनों पुराणी हालत में आये तोह अर्जुन भी हैरान था इस नए अनुभव से. अन्नू ने भी अपनी पंतय उतार कर खुद को निर्वस्त्र कर लिए था. उन नरम फांको से निकलती गर्मी अर्जुन के लुंड को झुलसा रही थी. वह भी इस अंग से अंग के टकराव में आज खुद को कमजोर पाने लगा था. दिमाग को फिर से काबू करते हुए अर्जुन ने अन्नू को अपने नीचे ले लिए.

"आठ.. क्या हुआ हनी?", अन्नू ने आज इस एकांत में उसको ये नाम दे दिए था.

"हनी. वही तोह करने लगा हु.", टाँगे पृथक करता वह अपना सर निचे झुकता चला गया जबतक उस मादक स्त्रोत की उत्त्पत्ति पर अपने होंठ न लगा दिए.

"म्मम्माह्ह्ह.. ी ऍम डाईंग.. ोुछः.. मार दो मुझे इस प्यार से.", अर्जुन की बड़ी तीव्र इत्छा थी की बाकी शरीर की तरह वह इस अनमोल खजाने को भी देख ले. फिर दिल को शांत करते हुए वह मैं की आँखों से हे जैसे उस लम्बे चीरे को देखने लगा था, एक साफ़ खुसबू इस जगह पर शायद उसने सोची भी न थी. जीब जहा भी टकराती कुछ कतरे उसके मुँह में उतारते हुए शराब सा नशा कर रहे थे. वह इतनी संवेदनशील थी की 2 मिनट से पहले हे साँसे बदहाल करती अर्जुन के सर को जकड कर लगातार हिलती रही. गुलाब के आरक सा उसका रास अर्जुन ने व्यर्थ न करते हे एक एक कटरा खुद में समां लिए.

"कैसा लग रहा है अन्नू?", खुद से चिपकते हुए वह अब अन्नू को दुलार रहा था जो जैसे एक लम्बी दौड़ से लौटी हांफ रही थी.

"I'm okay हनी. बूत तुम्हारा?"

"हमारा. और अब तुम्हे त्यार भी करना है.", उसके होठो को चूमता अर्जुन हलके अँधेरे में हे नीचे के कपडे पहन कर अन्नू के उठने की प्रतीक्षा करने लगा.

"अभी जो हुआ मैंने ये लास्ट टाइम समझ कर मान लिए. नेक्स्ट टाइम ी विल नॉट लिसेन एनीथिंग एंड ी वांट यू इनसाइड में, इस रात के बाद कोई ऊपर ऊपर से नहीं.", सिर्फ पंतय पहने वह कड़ी हो कर अर्जुन से चिपक गई अपने नंगे उभर उसपर दबाते हुए.
 




जल्द हे आने वाला एक किरदार





अन्नू वालिए
 
Back
Top