अपडेट 72
बारिश की वह रात
"दीदी कैसा रहा आपका पहला दिन?", अर्जुन रूपाली से बातें करता घर की और चल रहा था. रूपाली भी आज इतने दिन बाद कुछ ज्यादा हे खुश थी. उसको पढ़ना पसंद था और आज एक बार फिरसे उसकी शुरुआत हुई थी.
"बहोत ाचा और जल्दी हे शायद मैं भी माहौल को समझ जाउंगी. थोड़ा अलग स्कूल है यहाँ गांव से और अब ये ड्रेस भी उतनी खराब नहीं लग रही जितनी आज सुबह घर से निकलते समय लग रही थी.", अर्जुन ने गौर किआ तोह सही में रूपाली अब चलते हुए भरपूर विश्वास दिखा रही थी. अर्जुन को ाचा लगा ये देख कर की वह कितनी तेज थी माहौल में खुद को ढालने में.
"ख़ुशी हुई देख कर. बस ये ध्यान रखना के यहाँ शहर में लोग उतने सीधे नहीं होते जितने गाँव में होते है. यहाँ बात कुछ और करते है और दिल में कुछ और.", अर्जुन ने इतनी बड़ी बात जैसे दिल की रौ में बहते हुए कर दी थी लेकिन रुपाली को उसकी ये बात बड़ी भली लगी.
"ाची बात कही तुमने. और ये भी पता लग गया के तुम भी कितनी सीढ़ी बातें करते हो.", कुछ और ऐसी बातें करते वह दोनों हे घर आ गए थे. घर के बहार हे अर्जुन ने रेणुका बुआ को उनके घर के बहार खड़ा देखा तोह वह रूपाली को अंदर जाने का बोल कर साइकिल लिए उन्ही की तरफ चल दिए.
"आप धुप में बहार कड़ी क्या कर रही है?", अर्जुन जैसे हे उनके सामने खड़ा हुआ, उसने चिंतावश पहले यही पुछा.
"माँ की तोह नहीं बानी मैं.", रेणुका का चेहरा भावहीन था जिसको देख अर्जुन कुछ समझ न पाया लेकिन अगले हे पल उसने साइकिल का साइड स्टैंड लगाया और उनका हाथ पकड़ कर पेड़ की छाँव के नीचे ले आया.
"माँ की मूरत को फिर से आकार दिए जा सकता है लेकिन एक इंसान को नहीं. अब बताओ ऐसे बहार कड़ी क्या कर रही थी.?", यहाँ अर्जुन की आवाज धीमी लेकिन हक़ से भरी थी. जैसे वह अपनी ब्याहता से सवाल कर रहा हो.
"पहले ऐसे नहीं बात कर सकते थे. यहाँ कोई और दिख रहा है तुम्हे? बस तुम्हारा हे इन्तजार कर रही थी मैं और अभी आ कर कड़ी हुई हु.", चेहरे पर मोहक सी मुस्कान देख अर्जुन के माथे का पसीना कुछ काम हो गया था.
"कोण कहता है आप बड़ी हो गई हो? ाचा बताओ ऐसे नजरे बिछाये मेरा इन्तजार करने की वजह?", अर्जुन ने प्यार से पुछा इस बार.
"आज दोपहर का खाना मेरे साथ और हमारे यहाँ है, तुम्हारा. कपडे बदल कर आ रहे हो या ऐसे हे.", उनकी ये बात सुनकर और प्यार देख कर अर्जुन कुछ ज्यादा न कह पाया बस वापिस आने का बोल कर मुस्कुराता हुआ अपने घर चल दिए. रेणुका जी भी अपने इस कृष्ण कन्हैया को जाता देख खुश थी क्योंकि वो वापिस आने वाला था.
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"कैसा रहा तेरा पहला दिन?", अर्जुन जैसे हे ऊपर अपने कमरे में पंहुचा तोह वह पर ऋतू और अलका दीदी को पहले से हे बैठा देख हैरान हो गया. दोनों हे उसके बीएड पर लेती हुई थी और ऋतू दीदी ने अपना पढाई वाला नजर का चस्मा लगाया हुआ था. बैग को अलमारी में रखता हुआ वह बोलै, "इतना भी बुरा नहीं था क्योंकि पहला हे दिन था न. ज्यादा कुछ नहीं हुआ. वैसे आप दोनों इस कमरे में वह भी बीएड पर?", अर्जुन ने अलमारी से एक हलके रंग की टीशर्ट निकली और नीली जीन्स. शर्ट को उतार कर अलमारी के अंदर वाले हक्क पर टांगने के बाद उसने दोनों की तरफ देखा.
"इतनी शांति और तोह कही होती नहीं इसलिए हम यही आ गई आराम करने. वैसे अलका ने कुछ बात करनी है तेरे साथ और अब तू आ गया है तोह तुम बातें करो मैं नीचे खाने की तैयारी में मदद करवाती हु. अलका बात करके आ जाना.", जाते हुए ऋतू ने अलका के सामने हे अर्जुन के गाल को चूमा और बालो में उंगलिया फिरने के बाद कमर मटकती बहार निकल गई. अर्जुन एक पल तोह उन थिरकते हुए कूल्हों में हे खो गया था लेकिन फिर अगले हे पल नजरे अलका दीदी की और करते हुए प्रश्नवाचक निगाह से उन्हें देखने लगा. पीले रंग के चुस्त टॉप और काले पाजामे में वह कमाल लग रही थी. बिना कोई साज सज्जा के भी जैसे इन दोनों के सामने बहार की अधिकतर खूबसूरत लड़कियां फ़ैल थी.
"ाची नहीं लग रही क्या?", अपने निचले होंठ पर दांत गदति वह अर्जुन से हे सवाल करने लगी.
"ऐसा कब हुआ जब आप ाची न लगी हो.? अब बताओ भी क्या मुद्दा हो गया जो ऋतू दीदी भी चली गई यहाँ से. उनसे तोह आप कुछ छुपाती नहीं.", अलका इस दौरान बस अर्जुन के चेहरे को हे देख रही थी.
"सोच रही हु के आज रात तेरी दिली ख्वाहिश पूरी कर दी जाये लेकिन उस से पहले ये पूछना भी जरुरी है के आज रात तेरा कोई और जरुरी काम तोह नहीं.", अर्जुन को अब बात समझ आ गई थी की दीदी क्या कह रही है.
"आपको पता है न घर में इस समय कितने लोग है. फिर ये कैसे मुमकिन होगा? नीचे सभी, यहाँ ऊपर तारा और छत्त का भरोसा नहीं.", अर्जुन ने अपने दिल का हाल बताया
"3 कमरे और भी है घर में जहा रात को तेरा इन्तजार रहेगा.", अलका ने खड़े होने के बाद अर्जुन को गले लगते हुए कान में साथ हे कहा, "शायद वो भी तैयार मिले जो अभी यहाँ से गई है." और अर्जुन को हैरान छोड़ कर वह भी वह से कुलांचे मारती निकल चली.
'ये क्या हो रहा है?', अर्जुन खुद से हे कहता कपडे बदलने के बाद हाथ मुँह धो कर ाचे से तैयार हुआ और बहार वाले रस्ते से हे प्रीती के घर चल दिए. आराम से खुद हे गेट को खोलकर अंदर दाखिल होते समय हे उसने देख लिए था के घर में छोल साहब की गाडी नहीं थी.
अंदर आया तोह रेणुका को सामने हे खड़ा पाया. इतनी सी देर में हे उन्होंने अपने कपडे बदल लिए थे और इस समय हलके रंग की एक साड़ी बड़े सलीके से नाभि से सिर्फ एक उंगल नीचे बंधे हुए वह सादगी के साथ हे बड़ी लुभावनी लग रही थी. घर में इस समय जैसे कोई भी नहीं था. इस शांति को भी रेणुका की खनकदार आवाज ने हे भांग किआ.
"आपका हे राह देख रही थी लेकिन लगा नहीं की जैसे आपको कोई आने में दिलचस्पी हे नहीं थी.", रेणुका भी कितनी अलग हे थी. कभी गंभीर औरत, कभी नाजुक और कमजोर. कभी अतृप्त प्रेयसी और कभी जैसे ा शालीन बीवी, जैसे वह फ़िलहाल थी. अर्जुन ने 2 कदम में हे बीच की दूरी पार करते हुए रेणुका को गले से लगा लिए. इसमें कोई मिलावट नहीं थी और न हे कोई जोर. बस जैसे दोनों के दिल यही चाहते हो.
"वजह नहीं पूछूंगा क्योंकि बात उतनी हे ख़ास होगी जितना तुम्हारा मेरे लिए हमारे एकांत में समर्पण है.", अर्जुन के कहे हर लफ्ज़ को महसूस करती रेणुका ने बदले में सिर्फ इतना हे कहा, "मेरी कोख में हमारे प्यार का अंश आ गया है."
कितनी छोटी सी बात थी अगर सिर्फ सुनी जाए. महसूस करने पर जैसे जहाँ छोटा लगे.
"क्या बात कर रही हो?", अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ लेकिन अपने दिल के अनचाहे जज़्बात अंदर रखते हुए बड़े प्यार से रेणुका के माथे पर एक चुम्बन करते हुए हलके से वह नरम पेट भी सहलाने लगा जहा की रचना किसी भी जटिल विज्ञान से कही अधिक जटिल होती है लेकिन बहार से सब सपाट.
"अभी सबकुछ नहीं समझोगे लेकिन मैंने टेस्ट किआ था आज हे सुबह और वह पॉजिटिव आया. इतने दुखो में कितने हे साल जीने के बाद तुम्हारे साथ बिताये एक महीने में हे मुझे वह खुशियां मिली है जिनका कोई भी मोल नहीं.", इस बार बड़ी शिद्दत्त से एक गहरा चुम्बन अर्जुन को देने के बाद रेणुका रसोईघर में चली गई खाना लगाने. अर्जुन सोच रहा था के ज़िन्दगी जाने अभी और कितने रंग दिखाएगी. लेकिन अंदर हे अंदर उसको बेहद ख़ुशी थी की वह रेणुका को अपनी ज़िन्दगी ाचे से जीने की एक वजह दे रहा है.
कुछ देर बाद सामने बैठी रेणुका अपने हाथो से हे अर्जुन को खाना खिला रही थी. बीच बीच में वह भी रेणुका को खिलता लेकिन वह बस अपना ध्यान अर्जुन पर हे लगाए थी.
"कुछ देर आराम करना चाहो तोह हमारे कमरे में कर सकते हो.", ये बात नजरे झुकाये हुए कही रेणुका ने और अर्जुन ने एक बार फिर से गले लगते हुए जवाब दिए, "आज आप आराम करो, मैं जिस दिन हमारे कमरे में आऊंगा तब आराम नहीं करने दूंगा."
"इन्तजार रहेगा.", रेणुका ने दरवाजे के पीछे से हे इतना कहा.
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"सोलंकी भाई कल मई उपलब्ध नहीं रहूँगा, तुम जरा काम देख लेना. अंशु के स्कूल से वापिस आते हे सुषमा और मैं कल दोपहर हे दिल्ली निकल रहे है लेकिन देर रात तक वापिस आ जायेंगे.", विनय तनेजा अपने भागीदार सोलंकी को बता कर बस ऑफिस से निकलने हे लगा था.
"और बिटिया? उसको नहीं ले जा रहे साथ?", ये बात कहता सोलंकी मैं में खुश बहोत हो रहा था लेकिन बहार दुनिया भर की गंभीरता मुँह पे लिए था.
"नहीं भाई, अंशु के स्कूल भी शुरू हो गए है और वैसे भी उसको साथ नहीं ले जा सकता नहीं तोह फिर अगले दिन भी रुकना पड़ेगा. तुम यहाँ ऑफिस में एडजस्ट कर लेना. वैसे मैंने बचा हुआ काम निबटा दिए है."
"इत्मीनान से जाओ भाई. यहाँ मैं देख लूंगा.", हाथ मिलाने के बाद वह वापिस अपनी सीट पर बैठ गया और तनेजा को जाते देखने लगा.
'कल 2 बजे तेरी बेटी मेरे नीचे होगी तनेजा और उसके बाद तेरी बीवी खुद चलके आएगी उसी बिस्टेर पर. देख अब मेरा खेल. जिस लड़की को मैंने माँगा उसको तोह तू ला नहीं सका लेकिन अब उस लड़की का भाई मेरा तुरुप का एक्का बनेगा, जो वह खुद नहीं जानता.' सोलंकी ने कोई बड़ी गहरी साज़िश रची थी जिसका विनय तनेजा को रत्ती भर आभास न था.
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"मुन्ना, एक काम कर देगा मेरा?", कोमल दीदी ने मोटरसाइकिल स्टार्ट करते हुए अर्जुन के पास आते हुए पुछा. उजला रंग, भरा भरा लेकिन आकर्षक जिस्म इस समय एक लाल कमीज सलवार में क़ैद था कोमल दीदी का. और जैसे हे उन्होंने अर्जुन के बराबर आते हे बात शुरू की, उनके शरीर की प्राकृतिक सुगंध अर्जुन के नथुनों से होते हुए सीधी मस्तिष्क को छु गई. कुछ पल वह बस उन्हें हे देखता रहा. कैसे उनके वह सुरक होंठ लरज़ रहे थे और सफ़ेद ek-saar मोतिओं से दांतो के चमक.
"मुन्ना, कहा खो गया?", उन्होंने खुद हे शरमाते हुए अर्जुन को हिलाया तोह जैसे वह नींद से जगा, सपना नहीं कोमल दीदी साक्षात् सामने कड़ी थी.
"कही नहीं दीदी. वो मई.. मई.. आप को कुछ काम था.", अर्जुन थोड़ा अटक रहा था लेकिन जल्दी से उसने खुद को संभाला.
"हे.. हे.. तू भी न. ाचा सुन्न. वो मुझे न 2 पेंटिंग ब्रश और एक ऐक्रेलिक रंगो का सेट चाहिए था. अगर तेरे पास आते हुए समय हो तोह मॉडल टाउन वाले स्टेशनरी से लेते आना.", 500 रुपये अर्जुन की तरफ बढ़ाते हुए कोमल दीदी ने अपनी बात ख़तम की.
"ले आऊंगा मैं याद से. और ये पैसे अपने पास रखिये. वैसे अगर इस कलर का कुछ और चाहिए तोह मैं वह भी ले आऊंगा.", ये बात बड़ी धीमी आवाज में अर्जुन से शरारत से कही जिसको सुनकर कोमल दीदी की नज़रे ज़मीन पर गड्ड गई थी. लेकिन फिर अपने लम्बी घनी पलके झपकती वह बोली.
"शनिवार को साथ हे चलेंगे लेने.", और इतना कहते हे वह अर्जुन के चेहरे पर भी मुस्कान छोड़ कर बैठक की तरफ चली गई. अर्जुन भी मोटरसाइकिल को स्टार्ट करता गेट से बहार आ गया. यहाँ प्रीती भी अभी आई थी और फिर दोनों स्टेडियम की और निकल चले.
"मेरे पास आने का जैसे अब दिल नहीं करता न तुम्हारा.", अर्जुन ने रफ़्तार काम करते हुए पीछे बैठी प्रीती से कहा.
"हांजी, जैसे तुम्हारे पास बड़ी फुर्सत रहती है मेरे लिए. कल से देख रही हु कितनी बार जो तुमने मुझसे बात की या नजर उठा के देखा हो.", प्रीती के इस तंज़ का क्या जवाब देता.
"फिर भी मैं 3 बार तुम्हारे घर आया था. और कल दिन में जब तारा के साथ तुम हमारे घर आई थी तब भी मैं तुम्हे इशारे से बुला रहा था लेकिन क्या मजाल जो मेरी तरफ देख भी लिए तुमने.", अर्जुन ने ऐसा कहा तोह प्रीती को अपनी गलती समझ आ गई थी. पीछे से कस के अपनी बाहे अर्जुन की छाती पर बांधती वह बिलकुल हे चिपक गई थी उस से.
"मेरी जान कुछ ज्यादा हे नहीं डिमांड करने लगी आजकल? वैसे मैं आज यही बात करने वाली थी की अभी 2-3 दिन थोड़ा माहौल ठीक हो जाने दो, फिर हम आराम से प्यार करेंगे. इतने टाइम हम स्टेडियम आते जाते हे साथ रह लेंगे.", अर्जुन उसकी ऐसी सीढ़ी बात पर मुस्कुरा रहा था.
"वैसे अब नीचे सब ठीक है तोह फिर मैं दिवार कूद कर भी तुम्हारे घर आ सकता हु, रात में.", अर्जुन ने ये बात पिछली बार वाले प्रीती के अरमान को याद करते कही.
"मार खाओगे. चुपचाप आगे देखो और चलाओ. आये बड़े.. और इतनी गन्दी बात करते हो तुम.", प्रीती लाज से उसकी पीठ पर मुँह छुपाती बस अर्जुन की उभरी हुई चौड़ी छाती पर उंगलिअ फिरने लगी.
दोनों हे अपने निस्चल प्यार में डूबे ऐसे हे बातें करते स्टेडियम आ गए और प्रीती अपने कोर्ट की तरफ निकल चली हिरानी सी कुलांचे भर्ती. अर्जुन मंद मंद मुस्कुराते हुए उसको देखता रहा उधर हे खड़ा.
"भाई, दिल भर गया हो तोह आज कुछ प्रैक्टिस कर ले? वैसे भाभी एक नंबर है.", बलबीर कब उसके पास आ खड़ा हुआ ये अर्जुन देख न सका. फिर दोनों गले मिले और अपने प्रैक्टिस करने की जगह चल दिए.
कसरत, मुक्केबाज़ी की स्टेपिंग करने के बाद दोनों हे जब पंचिंग बैग के पास आये तोह संधू जी एक सीनियर मुक्केबाज़ को कंधे पर हाथ रख कर कुछ सलाह दे रहे थे. उन्हें तंग करना मुनासिब न समझ दोनों हे बारी बारी से स्ट्रैट और उप्पेर कट पंच की प्रैक्टिस में लग गए. अर्जुन ने शायद खुद गौर न किआ था लेकिन इतने हे दिनों में उसके छाती के साथ की मासपेशिया बहार निकलने लगी थी और जितनी भी वासा थी वह वह से नदारद थी. भुजाये भी फौलाद सी तराशी हुई दिखनी शुरू हो चुकी थी और कुछ ऐसा हे हाल उसके कंधो और घुटने से नीचे की मांसपेशियों का था. संधू जी कब के फारिग हो चुके थे लेकिन पिछले 15 मिनट से बस वह इन्ही दोनों को देख रहे थे.
बलबीर आज अर्जुन से भी अधिक केंद्रित था अपने अभ्यास में, लेकिन अर्जुन भी सामान रफ़्तार से लगा रहा. जैसे हे दोनों के 20 मिनट पूरे हुए, संधू जी 2 तोलिये लिए उन दोनों के पास आ पहुंचे.
"वाह मेरे बचो, रूह खुश हो गई तुम दोनों की लगन देख कर. लगता नहीं की इतने समय अभ्यास नहीं किआ होगा तुमने. ोये छोटू, जरा फीता और वजन की मशीन लेके आ.", दोनों ने जब अपना पसीना पांच लिए तोह कोच ने खुद हे दोनों को ग्लूकोस की बोतल पकड़ा दी. इतनी देर में एक जूनियर लड़का वजन वाली मशीन और मापने वाला फीता ले आया.
"इसका क्या काम है सर?", अर्जुन ने वैसे हे ये पूछ लिए था लेकिन बलबीर बिना कहे मशीन पर खड़ा हो गया. फिर उसके बाद अर्जुन भी. ऐसे हे दोनों के कमर और छाती का माप लेने के बाद वह दोनों के साथ हे एक लम्बे बेंच पर बैठ गए.
"तू तैयार है बलबीर लाइट फ्लाई वेट के लिए बस वजन एक किलो भी और नहीं बढ़ाना. और अर्जुन बीटा वजन तोह तेरा 85 किलो है लेकिन छाती अब 46 और कमर 30 हो गई है. मतलब बॉडी फैट ाचा बुरण हो गया है. स्टैमिना तोह देख हे रहा हु लेकिन अब तुझे एडवांस वेट ट्रेनिंग और स्पीड इनक्रीस करनी है. बलबीर, अगले सोमवार तक यही रूटीन रखना फिर हम लेवल बढ़ाएंगे. अब तुम दोनों मौज मारो.", संधू जी बात तोह उन दोनों से हे कर रहे थे लेकिन उनके नजर बाज सी थी जो वह 2 अनजान से लड़को को वही बैठ देख गए. कोई 200 मीटर दूर खड़े वह दोनों लड़के अचानक की ओझल हो गए. और ऐसे हे संधू जी भी वह से उठ गए दोनों को आशीर्वाद देते हुए.
"छोटे भाई तूने देखा क्या कुछ? कोच साहब ऐसे अचानक गंभीर हो गए थे और हमारी और उनका ध्यान नहीं था आखिरी समय.", बलबीर ने चिंता जताई.
"हाँ, उन्होंने ने वह 2 लड़के देख लिए जो साइकिल स्टैंड से हमारे पीछे थे और जब हम प्रैक्टिस कर रहे थे तोह वह रेस ट्रैक के पास बैठ कभी हमे तोह कबि इधर उधर देख रहे थे.", अर्जुन जैसे काफी देर से वही देख रहा था.
"मतलब इसलिए आज तेरी स्पीड मेरे से काम थी?"
"नहीं, आप प्रैक्टिस दिल से कर रहे थे और मैं उन लोगो की हरकत देख रहा था. वो सिर्फ 2 नहीं थे जैसा मुझे लगता है और मैं उन्हें जानता नहीं इसका मतलब वह शायद आपके पीछे हो या किसी और के.", अर्जुन ने हँसते हुए कहा और बलबीर का हाथ पकड़ कर उसको अपने साथ लेकर कपडे बदलने की जगह चल दिए.
"तू मेरे स्वाद ले रहा है न छोटे भाई? बहनचोद मेरा तोह आजतक कोई लफड़ा न हुआ कभी और अब तोह विकास भाई भी यहाँ नहीं के हम किसी के साथ मुक़ाबला कर सके.", बलबीर ने निक्कर उतरने के बाद पजामा पहनते हुए कहा.
"अरे टेंशन बहोत लेते हो आप भैया. इतना बड़ा स्टेडियम है और लोग तोह आते जाते रहते है. मैं वैसे हे डरा रहा था आपको.", बलबीर ने उसकी पीठ पर एक ढोल ज़माने के बाद हँसते हुए कहा.
"ले ले बीटा मजे, तेरी उम्र है. चल थोड़ी देर ट्रैक का चक्कर लगते है.", अर्जुन भी यही चाहता था और वो दोनों दौड़ने वाले ट्रैक पर इधर उधर देखते चलने लगे. इस समय ज्यादा भीड़ नहीं क्योंकि ज्यादातर बचे अपने घर गए हुए थे, हॉस्टल वाले. ज्यादातर वही थे जो शहर के थे या फिर जो सारा साल प्रैक्टिस और टूर्नामेंट खेलते थे. बलबीर को कोई लड़की नई दिखी और अर्जुन को वह लड़के नहीं दिखे जिन्हे उसकी नजर ढून्ढ रही थी. बातें करते हुए दोनों हे जब स्टैंड की और पहुंचे तोह सामने से आती प्रीती को अर्जुन ने नजरो से हे इशारा किआ जो समझ गई और बिना उसकी तरफ आये अपनी सहेली डिम्पी का हाथ पकड़ कर मुख्या द्वार की तरफ चल दी.
"बलबीर भाई उन लड़को को जानते हो? इशारा मत करना और सिर्फ उधर देखो जहा नीला बोर्ड लगा है. सफ़ेद टीशर्ट वाला और उसके साथ लाल शर्ट पहने हुए दूसरा जो है.", अर्जुन ने चेहरा बलबीर की तरफ रखते हुए हे कहा जैसे देखने वाले को लगे के 2 दोस्त बस बातें कर रहे है. बलबीर ने भी समझदारी दिखते हुए कनखियों से अर्जुन की कही जगह देखा.
"एक है गोलू पहलवान और उसके साथ जो है वह मैं नहीं जानता लेकिन है वह भी पहलवान. ये गोलू हमेशा बिजेन्दर के साथ हे रहता है लेकिन जिस दिन लड़ाई हुई थी ये वह नहीं था. नहीं तोह फैंसला कुछ और हे होता. बदमाश है ये और दूसरा भी वैसा हे लग रहा है.", बलबीर को जहा इस मौके पर डर लग्न चाहिए था, वह बिलकुल निर्भीक खड़ा था.
"अपना ध्यान रखना आप पीछे से. मैं चलता हु.", अर्जुन ने हाथ मिलाने के बाद मोटरसाइकिल निकली और बलबीर को अलविदा कहते हुए बहार की तरफ चल पड़ा. उधर वह दोनों पहलवान भी अब उस जगह नहीं थे. गेट से बहार निकलते हे अर्जुन ने एक बार हर तरफ नजर घुमाई और फिर सीधा दूर कड़ी प्रीती के पास जा कर उसको पीछे बिठाते हुए निकल चला.
"बात क्या है कुछ बताओगे?", प्रीती भी जान गई थी की कुछ तोह हुआ है. अर्जुन मोटरसाइकिल को लाल बत्ती पर रोक कर खड़ा था.
"कुछ भी नहीं. बस बलबीर भाई से जरुरी बात कर रहा था इसलिए तुम्हे बहार जाने को कहा था." प्रीती ने अर्जुन से फिर कोई सवाल नहीं किआ. दोनों अब मॉडल टाउन की तरफ जा रहे थे. रह रह कर अर्जुन शीशे से पीछे जरूर देख रहा था. लेकिन अगले 7-8 मिनट पीछे को न देख वह अब आश्वस्त हो गया और प्रीती का मूड ठीक करने के लिए मॉडल टाउन की मार्किट में पहले "आर्चिज" नाम की दूकान के बहार बुलेट कड़ी करता उसको लेकर अंदर आ गया.
"यहाँ हम क्यों आये है?", प्रीती ने थोड़ा हैरानी से पुछा.
"वह ऐसा है न आज तुम कुछ ज्यादा हे प्यारी लग रही हो. सोचा एक भूत ले लेता हु तुम्हारे लिए जिस से कोई नजर न लगे तुम्हे.", हँसता हुआ वह प्रीती के साथ उस लम्बी बड़ी सी खिलोने और ग्रीटिंग कार्ड की दूकान में ध्यान से सब तरफ देखने लगा. एक जगह उसकी नजर ृक्क गई और बस वह उसको हे देखता रहा. Kaale-bhoore गोल धब्बे वाला सफ़ेद रंग का मुलायम भालू जाइए खिलौना (टेडी).
"ये उतार दीजिये जरा.", अर्जुन ने काउंटर के पीछे खड़े लड़के से कहा तोह लड़के ने भी बिना सवाल वह 2 फ़ीट के लगभग का खिलौना उतर कर काउंटर पर रख दिए.
"सत. बर्नार्ड है ये अगर तुम्हे नहीं पता तोह बता देती हु.", प्रीती के चेहरे पर अलग हे खुसी थी.
"हाँ पहले लगा के ये टेडी बेयर है अब इसके गले में ये हड्डी (बोन) देख कर पता लग गया के डॉग है.", अर्जुन ने जैसे हे उसको सहलाते हुए पेट पर हाथ रखा वाइज हे खिलोने से आवाज आई "ी लव यू", और ये देखते हे अर्जुन ने प्रीती की और चेहरा किआ.
"अब से ये तुम्हारे कमरे में रहने वाला है. नाम तुम्ही रखना. और भैया इसको पैक कर दीजिये. हम अभी आते हु ले लेंगे."
"1400 डिस्काउंट के साथ.", दुकान के मालिक ने वह बड़ा सा खिलौना नीचे से देखते हुए कहा और अर्जुन ने दूकान से बहार निकलने से पहले पैसे पकड़ा दिए.
"5 मिनट में आ रहे है."
"उसकी क्या जरुरत थी?", प्रीती अर्जुन का हाथ थाम कर हे चल रही थी. पीठ पर टेनिस का राकेट लटका था.
"दिल से खरीदना भी कुछ होता होगा. और मैं नहीं चाहता तुम अकेली रहो तुम्हारे कमरे में."
स्टेशनरी से कोमल दीदी का सामान लेने के बाद उन्होंने वह खिलौना भी उठा लिए जो अब गट्टे के डब्बे में बंद था और एक बड़े प्लास्टिके में पैक. एक साइड अपनी जांघ पर उसको रखे प्रीती चहकती हुई अर्जुन के पीछे बैठी थी.
"ी लव यू एंड थैंक यू सो मच फॉर थिस. ी रियली लव्ड आईटी."
"ी लव यू तू.", अर्जुन ने भी गोल शीशे में प्रीती को देखते हुए कहा.
"वैसे घर पर क्या कहूँगी?"
"बता देना के अर्जुन ने अपने बर्थडे का रेतुर्न गिफ्ट आज दिए है. वैसे अगर ये भी कहो के अर्जुन ने दिलाया है तब भी मुझे नहीं लगता के कोई कुछ कहेगा." सच बात थी ये भी के उसके उपहार देने पर भला कोई क्या कहता छोल साहब के घर. जैसे हे मोटरसाइकिल प्रीती के घर के बहार रोकी वह सीधा घर के अंदर भाग गई, कोमल दीदी के कलर्स भी साथ लेती हुई.
"ये मैं अपने आप दीदी को दे दूंगी.", अंदर वाले दरवाजे के पास एक बार ृक्क कर प्रीती ने जोर से कहा और फिर नजरो से ओझल.
"पागल लड़की.", अर्जुन बस हँसता हुआ यही कह पाया और घर आते हे अपने पुराने काम में लग गया. नहाना, दूध और फिर किताबे.
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"आंटी अर्जुन है?", रात के तक़रीबन 8:30 बजे संदीप ने अर्जुन के घर की घंटी बजे तोह बहार कौशल्या जी आई.
"अभी बुलाती हु बीटा अंदर आ जाओ."
"नहीं आंटी जी बस मुझे घर वापिस जाना है. वह अर्जुन से स्कूल की कुछ जरुरी बात करनी थी."
"अभी बुलाती हु बीटा."
3-4 मिनट बाद हे अर्जुन भी घर के गेट के बहार खड़ा था संदीप के साथ.
"भाई मेरे कमरे में हे आ जाता. बहार क्यों खड़ा है?", अर्जुन ने हैरानी से पुछा.
"नहीं भाई जो बात करनी है वह अंदर नहीं हो सकती थी. अगर तेरे पास 10 मिनट है तोह हम चलते हुए बात करते है.", अर्जुन का जवाब सुने बिना वह खुद के घर से दूसरी दिशा में चलने लगा और साथ हे अर्जुन भी.
"ऐसी क्या बात हो गई जरा बताएगा.?", अर्जुन अपने दोस्त को परेशां देख कर बोलै.
"वह सनी और मुकेश ने स्कूल की छुट्टी के बाद मुझे मारा और फिर कहा के अगर मैंने उनका काम नहीं किआ तोह वह ज्योति दीदी का नाम खराब कर देंगे.", संदीप जैसे मैं में कई देर से गुबार इकठ्ठा किये था जो इतना बोलते हे फफक कर रो पड़ा. अर्जुन अपने दोस्त को ऐसी हालत में देख स्तब्ध रह गया.
"पहले रोना बंद कर और पूरी बात बता. वडा करता हु के ये सनी और उसके दोस्त आइंदा कभी तेरे सामने नहीं आयंगे. पूरी बात बता.
"भाई जब तू रूपाली दीदी के साथ स्कूल से निकला तोह मैं भी तेरे साथ आने लगा था लेकिन उन्होंने मुझे रोक लिए था. पहले तोह वह जो हमेशा करते है वही मेरे साथ करते रहे. तेरा और मेरा मजाक उड़ाना, मेरे इधर उधर हाथ लगाना. लेकिन फिर मुकेश और सनी मुझे अपने साथ स्कूल से अगले वाले पार्क में ले गए. उन्होंने बिना बात करे हे पहले तोह मुझे ाचे से मारा और फिर अपना मकसद बताया."
"आगे बता भाई. और रोना बंद कर."
"मुकेश ने बोलै के स्कूल से छुट्टी होने पर कल मैं आकांक्षा के घर पर नजर राखु. और जैसे हे उसके मम्मी पापा घर से निकले तोह मैं इस नंबर पर पीसीओ से फ़ोन करके सिर्फ इतना बोलू के 'वो चले गए', अगर मैंने ऐसा नहीं किआ तोह वह मेरी पिटाई तोह करेंगे हे साथ हे उनका कोई अमीर दोस्त दीदी के साथ गलत काम करेगा. और वो सभी पूरे स्कूल में ज्योति दीदी के नाम पर मुझे रोज बदनाम करेंगे. अर्जुन भाई, अगर ऐसा कुछ हुआ तोह भगवन कसम मैं मर्डर जाऊंगा. मैंने बहोत बड़ी गलती करदी जो उनकी सांगत में पड़ गया. उन्होंने ये बात किसी को भी बताने से मन किआ था लेकिन मैं सपने में भी तेरे साथ देगा नहीं कर सकता. और जहा तक मुझे लगता है उनका वह अमीर दोस्त शायद आकांक्षा के चक्कर में है.", संदीप ने बात ख़तम की तोह अब आंसू रुक चुके थे.
"घबराता क्यों है मेरे भाई मैं हु न तेरे साथ. कोई कुछ नहीं करेगा, मेरा यकीन कर. ये कागज़ इधर दे और मेरे साथ चल हमारे घर. और हाँ पहले चेहरा साफ़ कर लिओ बहार वाले बाथरूम में.", अर्जुन ने वह कागज़ का टुकड़ा संदीप से लेते हुए कंधे पर हाथ रखा और उसको लेकर अपना घर आ गया. दोनों हे बहार वाले रस्ते से सीधा उसके कमरे में आ गए. अर्जुन ने तारा और उसके कमरे के बीचा वाला दरवाजा बंद किआ और संदीप को एक मिनट वही बैठने का बोल कर नीचे दादाजी वाली बैठक में आ गया. यहाँ टेबल पर रखने टेलीफोन के पास हे उनके ज़िले की टेलीफोन डायरेक्टरी पड़ी थी जो वह उठा कर वापिस चल दिए.
"ये क्या है भाई?", संदीप ने उसके हाथ में वो पतली सी किताब देख कर पुछा.
"उस अनजान तक पहुंचने का हमारा रास्ता. थोड़ी म्हणत का काम है लेकिन हम दोनों साथ में ढूँढ़ते है. ये नंबर है 24034 और किताब में अपने शहर के सभी नंबर लिखे है, नाम और पते के साथ.", अर्जुन की बात समझते हे संदीप के चेहरे पर थोड़ी उम्मीद आ गई थी. दोनों सत् कर बैठ गए और बाए तरफ का पन्ना अर्जुन देखने लगा और दाए वाला संदीप. दोनों हे फ़ोन के आखिरी नंबर पर उंगलिअ रखते हर लाइन को ाचे से खंगालने लगे.
"भाई ये देख.", संदीप ने अपनी ऊँगली उस नंबर पर रखते हुए कहा. '24034'
"वाह.. यही है. नाम और एड्रेस देख जरा इसका.", अर्जुन के कहते हे संदीप ने एड्रेस पढ़ना शुरू किआ.
"अजीत सोलंकी S/O आप सोलंकी, H.N. 126, सेक्टर क्सक्स.. भाई मैं जनता हु ये पता.", संदीप ने पढ़ते हुए ये कहा
"हमारे हे सेक्टर में घर है वह भी उधर पार्क के पास. 350 गज वाले प्लाट में.", अर्जुन ने इतना कहने के बाद संदीप की तरफ देखा.
"हाँ. लेकिन मैं ाचे से जानता हु इस परिवार को. घर में 4 लोग है इनके. इसकी बीवी, एक बेटी जो अभी 12तह के पेपर देकर घर रहती है, एक बीटा है जो पिछले साल हे बोर्डिंग स्कूल में गया है और ये. विनय अंकल के साथ साँझा बिज़नेस है इसका.", संदीप एक सांस में ये बात कह गया.
"तुम्हारे घर भी आना जाना है?", अर्जुन ने साधारण आवाज में हे पुछा.
"नहीं भाई वह इसके पड़ोस वाले घर में मेरा एक दोस्त रहता है. और..." संदीप नीचे देखने लगा
"और तू अजीत सोलंकी की बेटी को देखने उधर जाता था.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए कहा
"हाँ भाई. भाई मैंने 4 साल पहले इसकी बेटी को देखा था. हमसे 2 क्लास आगे थी वह और सच बताओ तोह सारे लड़के उसको पसंद करते थे.", संदीप ये कहते हुए झेंप रहा था.
"अब चल तू घर जा और आराम कर. जितनी जानकारी चाहिए थी वह हमे मिल गई.", अर्जुन हँसते हुए संदीप के साथ खड़ा हुआ और दोनों नीचे उतारते बहार गेट पर आ गए.
"अर्जुन भाई, एक बार इस बेटी पूर्वी सोलंकी को जरूर देखिओ. सच कहता हु.", संदीप का मैं अब हल्का हो चूका था इसलिए जाने से पहले वह ये बात कहता गया. अर्जुन ने मुस्कुराते हुए उसकी पीठ पर हाथ मारा और गूडनिघत बोल कर वापिस कमरे में आ गया, जहा स्कूल की किताबे उसका इन्तजार कर रही थी.
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रात के 9 बजे थे और #### शहर में संजीव कार की पिछली सीट पर इत्मीनान से बैठा था. अगली सीट पर 2 और लोग थे, साडी वर्दी में पोलिसवाले. जगह थोड़ी शहर के बहार थी जहा ये शायद किसी पर नजर रखे थे. कांच के गिलास में बर्फ से ठंडी होती शराब की चुस्किया लेता संजीव बस एक हे तरफ देख रहा था, जहा एक लाइट जल रही थी और एक आदमी बहार खड़ा था. उनसे कोई 300 गज दूर.
"साहब, आप कहो तोह ये काम मैं करू? खतरा हो सकता है.", कंडक्टर साइड बैठे पुलिस वाले ने पीछे मदद कर संजीव से कहा.
"सुदीराम जी, आप भरे पूरे परिवार वाले है. और मैं नहीं चाहता के मेरी किसी गलती की सजा आपका परिवार भुगते.", एक सांस में गिलास खली करने के बाद संजीव ने सामने देखा था एक छोटी सी हरी रौशनी नजर आई. सीट पर एक तरफ राखी रिवॉल्वर और एक 12 इंच के फल वाला खंजर अपने कब्जे में लेते हुए संजीव गाडी से उतरता उस अँधेरे से रौशनी की तरफ चल दिए. जाने ये कोनसा मिशन था.
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आज भी घर में हमेशा वाला माहौल था. 11 बजे थे और रामेश्वर जी का घर जहां शांत था. तारा सो चुकी थी अर्जुन को पढाई करते देख और माधुरी दीदी भी छत्त पर सोने नहीं आ सकती थी क्योंकि आसमान घने बादलो से भरा था. दूसरी मंजिल के पिछले हिस्से वाले 2 कमरों में अन्धकार और एक में जीरो की हलकी सफ़ेद रौशनी प्रज्वल थी. अर्जुन हाथ में पानी की बोतल लिए ये उजाला देखने के बाद ऊपर खुली छत्त पर चल दिए, कुछ सोचता हुआ.
आसमान बिलकुल घुटा हुआ था. न कोई सितारा नजर आ रहा था और न हे हवा चल रही थी. ये भी धरती का संकेत था के घुटन के बाद हे हवा का महत्व और सूखे के बाद हे पानी की कदर पता चलती है. स्तिथि परिवर्तन जरुरी है किसी वरदान के महत्व को समझने के लिए.
किनारे किनारे छत्त पर टहलते हुए अर्जुन, पानी के छोटे घूँट ले रहा था. छत्त के बीच में आया तोह उसने पाया के एक गद्दा यही तेह किआ हुआ पड़ा था. शायद धुप लगाने के लिए ऊपर रखा होगा लेकिन कोई लेके जाना भूल गया होगा. गद्दे को उठा कर अर्जुन ने सीमेंट वाली पानी की टंकी के नीचे बानी खली जगह में रखा और छत्त से उतर कर निचली मंज़िल पर आ गया. सामने हे कड़ी अलका दीदी उसका हाथ पकड़ कर अपने साथ पिछली तरफ के पहले कमरे में ले आई.
"कब से तेरा इंतज़ार कर रही थी. लाइट भी जलाये राखी जिस से तुझे पता चले मैं कहा हु.", हलकी आवाज में फुसफुसाती सी वह अर्जुन के बिलकुल चेहरे के सामने बोल रही थी.
"सब उस समय तक नहीं सोये थे लेकिन अब सो चुके है. इसलिए मैं अब आपके पास आ रहा था.", दोनों हाथ अलका की कमर में पीछे से डालते हुए अर्जुन ने उन्हें अपनी तरफ खींचते हुए कहा और इतनी हे देर में दोनों के होंठ आपस में उलझते से अठखेलिए करने लगे. घुटने तक का सिर्फ कमीज पहने अलका दीदी का पूरा जिस्म अंदर से निर्वस्त्र था. इतने दिनों की आग अब अपना पूरा रूप ले चुकी थी और अर्जुन के चूमने से ये और भी भड़क गई.
मांसल गोल कूल्हे मसलते हुए अर्जुन को महसूस हो रहा था के दीदी के निप्पल किस कदर सख्त हो चुके है. किसी पेंसिल की नोक की तरह तीखे वह दोनों चूचक उसकी छाती से ठीक नीचे चुभ रहे थे. शरीर से आती भीनी भीनी खुशबु बता रही थी की अलका दीदी ने ये सबकुछ बस अर्जुन से मिलान के लिए किआ है. जल्द हे अर्जुन के हाथ कमीज के निचले भाग से होते हुए उनके ठोस निर्वस्त्र कूल्हों की घाटी में उतर आये थे. नंगी फांके अर्जुन के हाथो की लम्बी उँगलियों से कभ जुड़ा होती तोह कभी वह उन्हें ाचे से दबा लेता.
5 मिनट तक बस उनका ये होंठो का द्वन्द चलता रहा. जैसे हे दोनों अलग हुए अर्जुन ने अपनी टीशर्ट और निक्कर दोनों उतार कर नए बिस्टेर के एक किनारे रख दिए और साथ हे अलका दीदी का वह एक मात्रा कपडा उतारते हुए उनके चांदनी से चमकते शरीर को बाहों में लेकर बिस्टेर पर आ गया.
दोनों चुप थे लेकिन अशांत और तभी अलका दीदी ने अर्जुन को नीचे किआ और खुद उसके पेट पर दोनों तरफ पाँव करती बैठ गई.
"आज जो हमारा दिल करेगा वह हम करेंगे. जो तुम्हे पसंद वह तुम और जो मुझे पसंद वह मैं.", इतना बोल कर वह सीढ़ी अर्जुन पर लेट गई. दोनों हाथ बिस्टेर पर मजबूती से पकडे अलका अर्जुन के गले को चूमती नीचे गर्दन पर दांत गाड़ने लगी. साथ हे वह अपनी मखमली छूट बीच बीच में अर्जुन के बेचैन लुंड पर भी घिस रही थी.
एक बार ाचे से अर्जुन की उन्नत फौलादी छाती का जायजा लेने के बाद पहले तोह अपनी कमर उठा कर छूट को लुंड के बीच वाले भाग पर टिकाया और फिर मुँह उसकी छाती पर झुकाती अर्जुन की छाती पर फिरने लगी. अर्जुन का छोटा सा निप्पल अपने होंठो में दबत वह कभी उसको गीला कर रही थी और कभी हलके से दांतो में दबा कर काटने का उपक्रम. अलका ये दोनों तरफ कर रही थी और दूसरी तरफ नरम छूट की गीली रगड़ से लुंड जैसे अब तक के अपने विशालतम रूप में आ चूका था.
अलका को जब महसूस हुआ के उसकी खुद की छूट अब भरपूर गीली हो चुकी है तोह अपनी मुद्रा बदलती वह उस कस्सी के डंडे से मॉटे लुंड को पकड़ कर उस पर खुद हे बैठने का उपक्रम करने लगी. लेकिन अभी भी ये इतना आसान न था. सूपड़ा बस छूट के संकरे छेड़ पर हे चिपक कर रुक चूका था. अपनी दीदी को ऐसे मझदार में देख अर्जुन ने खुद हे अपने हाथो से उनकी जांघो को थाम कर नीचे से अपनी कमर ऊपर उचका दिए. इधर लुंड का सूपड़ा उस मलमल सी छूट को भेदता हुआ अंदर और उधर अलका एक हाथ से अपना मुँह दबाये अर्जुन के ऊपर. हाथ हटा कर खुद हे उन्होंने अपने होंठ अर्जुन के होंठो से मिला दिए.
एक और धक्का लगते हुए अर्जुन ने आधे से ज्यादा लुंड अंदर उतरा तोह अलका ने हलके से उसका होंठ काट लिए.
"शठ... मर्डर गई.. उम्म्म.. आह.. मुझे लगा ये तैयार थी लेने के लिए.. आह." हलकी आवाज में बोलती वह दर्द जज्ब कर रही थी. और अर्जुन ने एक हाथ से पीठ सहलाते हुए इसमें मदद भी की.
"समय लगेगा अभी आपको. बस आराम से थोड़ा थोड़ा कमर को हिलाओ.", पीठ पर हाथ फिरता वह उन्हें समझा रहा था और अलका ने बात मानते हुए अपनी पतली कमर को हलके हलके आगे पीछे करना शुरू कर दिए. हर घर्षण पर सुपडे तक आ कर वह वापिस आधा लुंड अंदर करने लगी थी और 2 मिनट बाद हे अब उनकी छूट अर्जुन के अंडकोष के ऊपर तिकी थी.
"आह.. ये अब गया पूरा.. मममम.." मजे में सिसकती अलका ने हिम्मत दिखते हुए पूरा लुंड जड़ तक अंदर ले लिए था. बेशक इस कोशिश में छूट का चला अपनी औकात तक चौड़ा हुआ लुंड के गिर्द चिपका हुआ था.
"आप पहले भी 2 बार पूरा अंदर ले चुकी हो.", अर्जुन ने एक ऊँगली से उनकी गांड के चले को कुरेदते हुए कहा तोह वह थोड़ा जोर से सिसकती हुई पूरी तरह उस से लिपट गई...
"सीईई... ममम.. लेकिन ये अब पहले से ज्यादा टाइट और बड़ा लग रहा है. अंदर ये वह लग रहा है जहा शायद लिमिट ख़तम हो गई है.", अलका का मतलब था उसकी बच्चेदानी, जिधर अर्जुन का गरम और असाधारण रूप से मोटा सूपड़ा ठोकर लगा रहा था. अँधेरे में कुछ दिखाई तोह नहीं दे रहा था लेकिन फिर भी दोनों लिपटे हुए अपने शरीर आपस में एक दूसरे से रगड़ते हुए इस चुदाई का मजा ले रहे थे. अलका का सखलना जैसे हे शुरू हुआ एक तेज कराह के साथ ढेर सारा पानी उसने अर्जुन के लंग पर बरसा दिए. लेकिन वह एक पल रुकने के बाद फिर खुद हे ऊपर नीचे होते हुए अपने दूसरे चरम की तैयारी करने लगी.
"रुको आप.", अर्जुन ने पलट कर अलका दीदी को नीचे लिए और खुद ऊपर आ गया. उसको मालूम था के अगर दूसरा चरम हो गया तोह फिर ये संगम ज्यादा देर नहीं चलेगा.
बिस्टेर पर लिटाने के बाद हे अर्जुन ने अलका को पीठ के बल कर दिए. मोटी गद्देदार गांड अब ऊपर थी और अर्जुन के दोनों हाथो की पकड़ में.
"मुझे पता था के अब यही होगा. और मैं इसके लिए खुद तैयार हु.", अलका ने तकिये के पास हाथ से टटोलते हुए एक तुबे ढून्ढ कर अर्जुन को पकड़े और अपनी लम्बी टंगे विपरीत दिशा में फैला कर उसका काम आसान करने लगी.
अब तक जितनी भी लड़कीअ अर्जुन के ज़िन्दगी में आई थी उन सभी में अलका दीदी के खूबसूरत कूल्हे सबसे बेजोड़ थे. और उसकी दिली तमन्ना था इनमे अपना परचम लहराने की. नृत्य अभ्यास और कसरत का कमाल था जो अलका को खुद भी अपने थिरकते और बेदाग कूल्हों पर नाज था. ऊँगली के पोरे पर ाचे से क्रीम निकलने के बाद अर्जुन ने अलका के कूल्हों को फैलते हुए guda-dwar पर वह क्रीम लगनी शुरू की. पहले तोह बहार वाले रबर से चले को ाचे से नरम किआ और फिर पहले जितनी हे क्रीम ऊँगली पर लगते हुए बड़े आराम से वह उनकी गुदा में धंसा दी. तुबे एक तरफ रख कर अब वह एक हाथ से उनकी मुलायम छूट की फांके मसल रहा था और दूसरे हाथ की 2 उंगलिअ अब उनके पिछले हिस्से में आधी अंदर बहार होती हुई उसको नरम कर रही थी. आधी से ज्यादा तोह वह उंगलिअ जा भी नहीं सकती थी. कूल्हे इतने उभरे हुए थे के डेढ़ इंच तोह गहरी बस दरार थी.
अलका दीदी को अब पीठ के बल करते हुए अर्जुन ने उनके दोनों पाँव उठा कर कंधे पर रख लिए. कमर के नीचे एक तकिया लगाने से गांड और उभर के आगे आ चुकी थी. बुरी तरह अकड़ा हुआ लुंड 3-4 बार उनकी टपकती छूट पर फिरने के बाद अर्जुन ने मजबूती से पकड़ कर उनके उभरे हुए पिछले छेड़ पर टिक्का दिए. लुंड को भी महसूस हो गया था के ये बेहद ख़ास है. किसी पानी भरे बड़े गुब्बारे की तरह.
"दर्द होगा आपको शुरू में. बस थोड़ा अंदर जाने तक." अर्जुन ने अलका दीदी को आगाह किआ.
"इस से ज्यादा तैयार मैं कभी नहीं थी. मुझे भी महसूस करना है ये.", अलका दीदी की रजामंदी मिलते हे अर्जुन ने दबाव बढ़ाना शुरू किआ. एक पल को तोह सूपड़ा मामूली सा आगे हुआ लेकिन फिर वही ृक्क गया. अर्जुन को पता था के अब उसको सही जोर लगाना पड़ेगा. अगले हे क्षण अलका ने अपने दोनों हाथो से मुँह दबा लिए और कच्छ से वो ढाई इंच लम्बा सूपड़ा उनकी नरम गांड को फैलता अंदर धंस गया था. लेकिन अर्जुन अभी रुका नहीं था. उसको पता था के सबसे मोटा भाग जब अंदर प्रवेश कर गया तोह अब सिर्फ आगे खाली जगह है.
दोनों पत्तो फैलते हुए अर्जुन अलका दीदी के ऊपर आ गया और लुंड भी चिकनाई की वजह से धीरे धीरे अंदर सरकने लगा.
"बस अब हो गया जितना दर्द होना था.", अर्जुन ने इस पूरे मिलान के दौरान अब उनके वह मुलायम दूध पकडे थे. आराम से उन्हें दबाते मसलते वह आधा लुंड अंदर फसाये उनके शरीर को फिर से गरमा रहा था.
"ोीी माँ... पूरे बेरहम हो.. मेरी जैसे फट गई है वह से..", अलका की बात सुनकर अर्जुन ने ऊँगली से पिछले छेड़ को टटोला तोह वह पर्याप्त चिकना था लेकिन कही भी गीलापन नहीं था. मतलब खून नहीं निकला था.
"नहीं.. कुछ नहीं हुआ उधर. और अब भी नहीं होगा.", दोनों उरोज मुट्ठी में भारत हुए वह अलका के मीठे होंठ पीटा हुआ अब आधे हे लुंड से उनकी गुदा को भेद रहा था. 30-35 छोटे हलके धक्को के बाद अब आधा लुंड मक्खन की तरह अंदर बहार हो रहा था, बेशक मासपेशिओ की कसवत छूट से कही ज्यादा थी लुंड पर लेकिन क्रीम की वजह से वह फिसल रहा था.
"आह... आह.. थोड़ा तेज करो न.. आह..", अलका के भी सुर बदल गए जब वही मोटा लुंड अब दर्द की जगह मजा दे रहा था. टाँगे अपने आप ऊपर उठ गई थी और अर्जुन भी ये देख कर हर 5-6 धक्को के बाद थोड़ा लुंड अंदर कर देता. दोनों मॉटे चुचो को एक साथ जोड़ते हुए उसने दोनों निप्पल मुँह में भरे और पूरा लुंड जड़ तक गांड में उतार दिए. अलका की दर्द और मजे की सिसकारी बता रही थी की अब अर्जुन उसके साथ कुछ भी करे उसको सिर्फ इसमें मजा हे आने वाला है. पूरा लुंड जब अंदर जाता तोह हर धक्के पर उसके सांड से अंडकोष अलका के नितम्भ से टकराते. Thapp-thapp की आवाज अब एक ताल में पूरे कमरे में गूँज रही थी. अर्जुन का लुंड भी अब पूरा गरम हो कर फूलने लगा था और अपने धक्को की गति बढ़ाते हुए वह पूरा जोर लगते हुए अलका के पिछले भाग को रोड रहा था.
"आठ... मई गई रे.. आठ.. ये क्या हो रहा है...", अलका की छूट पानी के कतरे उछलने लगी थी और उसके बाद अर्जुन भी जड़ तक लुंड दाल कर जैसे कूल्हों से चिपक हे गया था. गुर्राते हुए वह अपना पानी अलका दीदी की गांड में खाली करता चला गया.
"Hmmm...ahh.mmm.. रुको अभी मत निकलना.", अर्जुन ने दीदी को पीछे होने से रोका और खुद वैसे हे घुटनो के बल खड़ा रहा. लुंड जब थोड़ा तिथिल हुआ तोह खुद हे अर्जुन ने बड़े ध्यान से उसको बहार खींच लिए. लेकिन तब भी सुपडे ने अपना असर दिखा हे दिए.
"एआइइइइ.." अलका की हलकी सी चीख निकल गई क्योंकि सूपड़ा बाकी हिस्से के मुकाबले ज्यादा हे मोटा था और पूरी चुदाई के दौरान एक बार भी बहार नहीं आया था.
"इसलिए मैं थोड़ा इन्तजार किआ था. नहीं तोह ज्यादा दर्द होता.", अर्जुन ने बगल में लेट कर अलका को बाहों में भरा और अपने ऊपर हे लिटा लिए. कूल्हे से लेकर गर्डर तक उनकी रेशमी त्वचा को सहलाता वह उनका दर्द भी काम कर रहा था. नरम चुके छाती में धंसे थे लेकिन अलका को ऐसे बड़ा सुकून मिल रहा था.
"मैं खुद को साफ़ करने जा रहा हु. आप भी कर लीजिये और फिर आराम कर लेना.", बिस्टेर से उठ कर अपने कपडे पहन कर बहार निकलने से पहले अर्जुन ने उनको होंठो को चूमते हुए एक निप्पल भी हलके से दबा दिए.
"आउच.. कमीने.. आह.. कर लुंगी साफ़. अब तुम जाओ.", अलका ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिए था. और इधर अर्जुन जैसे हे अपने कमरे की तरफ जाने लगा वह दरवाजे के पास पहले से हे ऋतू दीदी बैठी हुई थी.
"5 मिनट में ऊपर आ जाना.", इतना बोल कर वह कड़ी हुई और ऊपर वाली मंज़िल की सीढिया चढ़ गई.
'ये कब आई इधर.?' अर्जुन सोचता हुआ अंदर दाखिल हुआ तोह तारा गहरी नींद में चादर लिए सो रही थी. उसको देखने के बाद सीधा बाथरूम में घुसते हे ाचे से खुद को साफ़ किआ और शरीर पर पानी डालने के बाद सिर्फ पजामा पहन कर वह ऊपर चल दिए, दरवाजा ढाल के.
"गद्दा कहा रख दिए यहाँ से.?", ऋतू दीदी कमर पर हाथ रखे कड़ी थी और अर्जुन के ऊपर आते हे यही सवाल किआ.
"wo..woh आपने रखा था?", अर्जुन को अब समझ आया के वह गद्दा यहाँ क्यों पड़ा था और कौन लेके आया था. फिर बिना कुछ पूछे उसने वापिस वह गद्दा टंकी के नीचे से निकला और झाड़ कर वही बिछा दिए. लेकिन मुड़ते हे ऋतू दीदी सीधा उसके ऊपर और अर्जुन गद्दे पर पीठ के भार.
"कितना मुश्किल होता है खुद को संभालना जब तुम सामने दीखते रहते हो और मैं कुछ कर न सकू.", और ऋतू ने अर्जुन को अपने आगोश में ऐसे ले लिए जैसे वह अभी भाग जायेगा. दिल और धड़कन दोनों हे परस्पर जुडी थी दोनों की.
"मेरा बस चले तोह एक पल भी खुद को आपसे दूर न करू.", अर्जुन ने भी ऋतू को खुद से ाची तरह चिपका लिए था. लम्बे घने बाल अर्जुन का पूरा चेहरा धक् चुके थे. और महकती साँसे अर्जुन के चेहरे को गरम करती उस दुनिया में ले जाने लगी थी जहा सिर्फ इन 2 दिलो का हे वजूद था. आँखें बंद करते हुए वह बस ऋतू के इस सुखद आगोश में खुद को वार चूका था. हलके सूख चुके अर्जुन के होंठो से ऋतू के तपते नरम होंठ मिलते हे जैसे बंजर जमीन पर पानी की पहली बौछार होने लगी थी. अर्जुन खुद को पूरी तरह ऋतू के सुपुर्द कर चूका था.
अर्जुन के होंठो को खोलती ऋतू की जीभ जैसे हे मुँह में दाखिल हुई तोह amar-ras सा घुल गया उसके मुँह में. अधिक की आस में और मुँह खोलते हे खुद उसकी जीभ ऋतू के दांतो में क़ैद हो गई थी. जैसे आज वह अपने होंठो से हे अर्जुन की जान निकल कर अपने अंदर सममाहित्त कर लेने वाली थी. इस mookh-dwand के अंतराल अर्जुन के हाथो ने कोई हरकत न की थी. लेकिन उसकी धड़कन ऐसे चलने लगी थी जैसे किसी मरीज की अंतिम समय पर रुक रुक कर चलती है.
जाने कितना समय दोनों ऐसे हे जुड़े रहे और जब अलग हुए तोह ऋतू अपना सर उसकी छाती पर रखे बगल में लेती थी. एक हाथ अर्जुन की कमर पर रखा था और दूसरा सर के नीचे. पूरा आसमान कुछ क्षणों के लिए रौशनी से नाहा गया जब बादलो के टकराव से श्वेत चमक तेज गर्जना के साथ उत्पन्न हुई. लेकिन इस भयंकर गर्जना का भी ऋतू पर कोई असर न हुआ. इस रौशनी में दोनों ने बस एक दूसरे के चेहरे को ाचे से देखा और एक बार फिर ऋतू ने अपने होंठ अर्जुन से मिलते हुए उसकी कमर पर नाख़ून दबाने शुरू कर दिए. उसकी जांघो के बीच का नरम भाग अर्जुन की मजबूत जांघ से चिपका हुआ रगड़ रहा था. फिर खुद हे ऋतू ने अर्जुन को उठने का संकेत दिए और अपने दोनों वस्त्र उतार, पाँव फैलाये बैठ कर अपनी प्रेमी को देखने लगी. अब अर्जुन के शरीर भी अपनी janam-awastha में था. दोनों एक दूसरे के सामानांतर बैठे एक दूसरे को देख रहे थे. आसमान एक बार फिर चकचौंध हुआ और लगातार होता रहा.
सामने बैठी संगेमरमर सी तराशी हुई अप्सरा को निहारता उसका प्रेमी उसके अध्भुत्त सौन्दर्य में जैसे डूब कर बहार आना हे नै चाहता था. घनी काली फैली हुई जुल्फे भी आसमान की घटाओ के सामान थी, चमकती काली बड़ी बड़ी आँखें, तराशा हुआ नाक और उभरे हुए धनुषाकार होंठ. पतले सुराहीदार गले से नीचे 2 चंद्राकर यौवन से भरपूर अद्वित्य दुग्धकलेश.
हिम्मत करते हुए अर्जुन ने अपना एक कांपता हुआ हाथ ऋतू के पहले हुए दाए सतांन पर रख दिए. तन्न कर खड़ा हुआ गुलाबी अग्रभाग जैसे हाथ लगाने से और ज्यादा उभर आया हो. होंठ स्वतः हे जा कर उस लालायित कर रहे अंग पर जा लगे. हलके हलके चुसकते हुए अर्जुन ने दूसरा ठोस सतांन भी अपने हाथ में थम लिए. जहाँ पहले दोनों की साँसों का शोर था अब वह ऋतू की मादक आहें और रह रह कर निकलती सिसकिओन का. इन दोनों से परे जितना भी shor-garzana हो रही थी, ये उस से बेअसर अपने योग में डूबे हुए थे.
पता हे न चला कब ऋतू के दोनों सतांन पीने के बाद अर्जुन उसके ras-kutumb पर पहुंच गया. मेघो की गर्जना अब बरस रही थी. Tip-tip करती बारिश की बूंदो में अर्जुन बड़ी लगन से उस कॉमर्स को पी रहा था जो ऋतू की योनि से निकलता सीधा उसके होंठो में आ रहा था.
"आह... बास...", ऋतू साखालित्त होती रही लेकिन अर्जुन जब न हटा तोह खुद हे उसने अर्जुन को पीछे किआ. नंगे जिस्म पर तीखी बारिश भी फूल सामान लग रही थी. अर्जुन को गद्दे पर लिटाने के बाद खुद हे ऋतू ने उसका वह प्रचंड लिंग दोनों हाथो से थाम लिए. अपनी नाजुक उंगलिओ से 5-6 बार ऊपर नीचे करने के बाद नीचे झुक कर ऋतू ने पूरा सूपड़ा अपने मुँह में दबा लिए था. मुश्किल जरूर था लेकिन ऋतू ने कोई hil-hujjat किये बिना अपने मुँह को कुछ देर वैसे हे रखते हुए सांस दुरुस्त किआ और अगले हे पल अब सिसकारियां अर्जुन के मुँह से फुट रही थी.
गरम मुँह और गीली जीभ का कमाल दिखती ऋतू ने अर्जुन को मजबूर कर दिए था गद्दे को मुट्ठी में भरने के लिए. कुछ हे देर बाद ऋतू लगभग आधा अंग मुँह में अंदर बहार करने लगी थी और अर्जुन का हाथ अब उत्तेजना में उसका सर सेहला रहा था.
"आह्हः.. बसससससस...", अर्जुन ने आराम से ऋतू को हटते हुए इतना हे कहा. वह लम्बी साँसे लेते हुए बारिश में भीगती हुई ऋतू को हे देख रहा था. ऋतू ने आगे बढ़ते हुए अर्जुन को अपने ऊपर खींचना शुरू किआ तोह पूरी तरह उत्तेजिट वह उसकी दोनों टाँगे फैलते हुए ऋतू के ऊपर चा गया. अपनी टाँगे अर्जुन के कूल्हों की गिर्द लपेट कर उसने पूरी तरह अकड़ा हुआ वह मोटा लुंड अपनी पनियाई छूट के मुहाने लगा दिए.
"समां जाओ मुझमे.", दोनों के बदन इस बरसती रात में भीगे हुए थे और ऋतू के इस आमंत्रण पर अर्जुन ने बड़े प्यार से दबाव बनाते हुए धीरे धिरे अपना लुंड उस मखमली सुरंग डालना शुरू कर दिए. अर्जुन की पीठ पर नाख़ून गदति ऋतू ने उसकी छाती में अपना मुँह दबा लिए.
बुरी तरह गीली सुरंग में सूपड़ा उतारते हे अर्जुन ने अपने घुटने सही करते हुए ऋतू के दोनों अमृत कलश हाथो में ले लिए. हलके हलके चूसते हुए वह सुपडे से हे उसको मजा देने में लगा रहा. जब मस्ती में आहें तेज हुई तोह कमर के तेज प्रहार से एक हे बार में 4 इंच से ज्यादा हिस्सा और अंदर करते हे दीवांवर सा वह ऋतू के सूजे हुए होंठो को पीने लग पड़ा.
'दर्द की परवाह किसे है, मंजिल जब purna-aanand से भरी हो'
ऋतू ने भी कमर को उछलते हुए हर पड़ते धक्के से ताल मिलनी शुरू कर दी थी. छूट के फैल चुके होंठ इस अँधेरे में बेशक नहीं दिख रहे थे लेकिन कैसा हुआ अंदर बहार होता लुंड बता रहा था के ये साँचा बस अर्जुन के लिए हे बना है.
"आह्हः.. और जोर से.. उम्म्म... और तेज.. करो न.. मुझे ऐसे हे प्यार करो अर्जुन."
"हाँ जान.. आह.. तुम सिर्फ मेरी हो.. आह.. और मैं भी तुम्हारा..", अर्जुन कभी ऋतू के कूल्हों को सेहलता कभी गर्दन को चूमता और वैसे हे ऋतू भी कभी उसकी चौड़ी छाती से खुद को चिपका लेती और कभी अर्जुन गीले चेहरे से बारिश की बूंदे पीने लगती. हर गहरे धक्के से दोनों के शरीर लरज जाते. कितनी हे देर दोनों का ये समागम चलता रहा. तेज रफ़्तार बारिश अब एकसार हो रही थी और यहाँ इनके मिलान की रफ़्तार भी.
"ी लव यू अर्जुन. ... उम्म्म्म..", ऋतू के शरीर ने एक के बाद एक झटके खाने शुरू किये तोह बुरी तारक अकड़ती वह जमीन से एक फुट ऊपर उठती हुई अर्जुन से चिपक गई थी. और अर्जुन भी अपने चरम पर पहुँच चूका था. ऋतू के थमने के बाद उसने भी जल्दी से अपना लिंग बहार निकाल कर ऋतू के पेट पर गरम वीर्य की बौछार कर दी..
कुछ देर बाद दोनों के शरीर हे बारिश के पानी से साफ़ हो चुके थे और ऋतू ने कपडे पहन ने चाहे तोह अर्जुन ने सिर्फ उन्हें उठाने को कहा. नंगे बदन हे वह ऋतू को भी वैसी हे हालत में लिए सीढ़ियों से नीचे चलने लगा.
"चाचाजी की तरफ वाले अगले कमरे में.", ऋतू ने इतना हे कहा था और अर्जुन वैसे हे उसको अपनी बाहो में लिए अलका के साथ वाले कमरे में चल दिए. पाँव भिड़ते हे दरवाजा खुल गया और फिर से दरवाजा बंद करने के बाद अर्जुन ने ऋतू को बड़े प्यार से नीचे उतरा और अंदाजे से लाइट जलाते हुए सिर्फ जीरो वाला सफ़ेद बल्ब हे चालू रखा.
"शरीर पांच लीजिये पहले.", अर्जुन ने ऋतू दीदी से कहा तोह दरवाजे के पीछे लगे हुक से टोलिया उतार कर ऋतू ने पहले अर्जुन को सुखना शुरू किआ लेकिन अर्जुन ने एक तरफ से टोलिया पकड़ते हुए अपने साथ हे ऋतू को भी पोंछना शुरू कर दिए. ऋतू का निर्वस्त्र खूबसूरत जिस्म अब अर्जुन के सामने रौशनी में उजागर था.
"शब्द काम पड़ जायेंगे लेकिन ख़ूबसूरती बयान नहीं होगी.", अर्जुन ने ऋतू की आँखों में देखते हुए कहा.
"ये सिर्फ आपका हे है.", हमेशा की तरह ऋतू भी प्रेम के एकांत पालो में अर्जुन को pati-samman हे देती थी. दोनों ने के बार प्यार से चुम्बन किआ और फिर अर्जुन ने ऋतू को बिस्टेर पर बिठाते हुए नीचे का जायेगा लिए. छूट के गुलाबी होंठ थोड़े सूज गए थे और ऊपर निप्पल का भी यही हाल था.
"दर्द है?", अर्जुन के पूछने पर ऋतू ने मुस्कुराते हुए सिर्फ ना में सर हिलाया. दरवाजे के पीछे पहले से हे टेंगा एक कमीज ऋतू की तरफ बढ़ाया तोह उसने फिर से मन कर दिए.
"ऐसे हे सो जाइये मेरे साथ कुछ देर के लिए.", ऋतू के इस प्यार भरे आग्रह को अर्जुन मन न कर पाया लेकिन टोलिया लपेट कर 1 मिनट में वापिस आने का बोल कर वह कमरे से निकल गया. कुछ हे पालो के बाद वह कमरे में वापिस आ गया था. नीचे एक आरामदायक निक्कर पहने और ऊपर से खुला सीना. हाथ में एक झीना सा गाउन था जो खुद उसने हे ऋतू को पहनाया और लाइट बंद करने के बाद अपने साथ चिपकते हुए लेट गया.
"2 बज चुके है. सुबह उठाना मत मुझे.", अर्जुन ने ऋतू के एक उरोज को हाथ में भरते हुए होंठो पर होंठ टिकाये और दोनों कब एक दूसरे की बाहों में नींद के आगोश में चले गए पता न चला. बहार अभी भी बरसात जारी थी.