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ये एक ाचे स्तर का होटल था जहा आज संधू जी ने अपनी बेटी पारुल सिंह की सगाई का कार्यक्रम रखा था विकास पुनिअ के साथ, जो कभी उनका हे शिष्य था और आज एक नामी पहलवान के रूप में खुद को स्थापित कर चूका था. कार्यक्रम में सिर्फ निजी लोगो को हे न्योता दिए गया था जिनमे संधू जी के स्टेडियम से हे 4 अफसर और कोच शामिल थे. उनकी छोटे भाई और परिवार, संधू जी की धर्मपत्नी जी की बहिन, पारुल और चारुल सिंह की कुछ खास सहेलियों के साथ बस विकास की तरफ से गिने चुने परिवार के लोग. 7 बजे हे पहली मंजिल के हॉल में लोग पहुंचने लगे थे और इस जगह को आकर्षक रूप से संवारा गया था. 8-9 गोल मेज सफ़ेद कपडे से ढकी थी जिनपर बीच में गुलदस्ता और कांच के गिलास पानी से भरे धक् कर रखे गए थे. एक तरफ सुनेहर लाल सिंहासन रुपी कुर्सियां लगाईं गई थी जो लड़का और लड़की के लिए थी. ाची रौशनी की व्यवस्था के साथ हे हॉल के एक भाग में खाने के स्टाल लगे थे जहा अभी काम शुरू हो रहा था.
बेटी की सगाई थी तोह यहाँ संधू परिवार सबसे पहले हे पहुंच गया था और तैयारी का जायजा लेने के साथ हे आ रहे मेहमानो का स्वागत भी किआ जा रहा था. होटल के बहार हे कांच पर सगाई सन्देश का बोर्ड और स्थान लिखा हुआ था जिस से मेहमानो को परेशानी न हो. सही समय पर हे विकास भी कार से होटल के सामने की पार्किंग आ पंहुचा और अपनी माता जी के साथ behan-jija को लेकर अंदर चल दिए. गेट से हे शमत संधू और स. संधू जी ने उनसे गले लगते हुए स्वागत किआ और अपने साथ हे ले चले.
"क्या बात है जी, आज चेहरे पर मुस्कान भी है और coat-pant में भी हो.", चारुल ने विकास से हाथ मिलते हे साली स्वाभाव का मजार शुरू कर दिए. उनकी माता जी को प्रणाम करने के बाद अपने साथ विकास की बहिन को सबसे आगे की गोल मेज की तरफ लिए चारुल ने उन्हें वह नरम कुर्सी बैठने के लिए बैठ की. दोनों हे परिवारों का परिचय घर के बाकी सदस्यों और मेहमानो से करवाते हुए संधू जी ने मैनेजर को बोल कर coffe-thande के साथ हे हलके khan-paan शुरू करने का आदेश दिए. अभी तक पारुल नहीं आई थी इस जगह पर, जो होटल के हे एक कमरे में तैयार हो रही थी.
"तुम चलो जरा पहले ऊपर और मैं 2 मिनट तक आता हु. साथ में देखते हे कोई मुसीबत न गले पड़ जाये.", अर्जुन भी 7:20 के समय पर होटल की पार्किंग पर आ खड़ा हुआ था. कपडे जैसे फिर से इस्त्री किये थे और ताजगी बता रही थी के जैसे फिर से नाहा कर आया हो.
"अब मैं हे गले पड़ी हु. इसको मुसीबत समझो या प्यार. और साथ चलेंगे तोह साथ चलेंगे.", Laal-kaale रंग की इस पारदर्शी साड़ी में जैसे अन्नू हर दिल पर जुल्म हे करने वाली थी. खुल्ले बाल और सामने माथे पर लगी गोल लाल बिंदी, भरे होंठो पर उनके हे रंग की लाली और ऊपर से नीचे क़यामत धा थी ये अप्सरा अर्जुन को साथ हे ले जाने पर अदि उसको देख रही थी.
"अब तुम्हे साथ हे चलना है तोह चलो. मैं किसी की बात का कोई जवाब नहीं देने वाला.", अर्जुन ने दोनों हाथ सामने जोड़ते हुए फिर एक तरफ कोने में मोटरसाइकिल लगाया और सधी हुई चाल से अन्नू को साथ लिए अंदर चल दिए.
"हाथ पकड़ लू?", अन्नू ने शरारत से कहा. उसको मजा आ रहा था अर्जुन को छेड़ने में. दोनों हे रिसेप्शन के आगे बानी चमकती सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगे तोह मंज़िल से पहले हे घुमाव लेती सीढ़ी पर अर्जुन ने अपने दाए हाथ में अन्नू का बया नाजुक हाथ थम लिए. ऊपर चढ़ती वह दये हाथ की कलाई में पर्स लिए उस हाथ से साड़ी को पकडे थी लेकिन जैसे हे अर्जुन ने हाथ पकड़ा अन्नू ृक्क कर उसका हे चेहरा देखने लगी.
"अन्नू, तू अब आ रही है?", ये आवाज सुनते हे दोनों ने ऊपर की तरफ से आती इस खूबसूरत बाला को देखा तोह अर्जुन हैरान हो गया.
"मिस आपकी भी आज हे इंगेजमेंट है आपकी सिस्टर के साथ हे?", गुलाबी लेहंगा चोली और सलीके से बंधे बालो में चारुल के दुल्हन रुपी गुडिअ सी दिख रही थी अर्जुन को. उसकी बात सुनते हे वह चमकती आँखों से अर्जुन को देखने लगी.
"अब तुम कोण हो यार? और मैं चारुल नहीं हु, पारुल हु. सगाई भी मेरी हे है उसकी नहीं.", एक अजीब तरह से मुस्कुराते हुए पारुल ने इशारे से अन्नू से जैसे कुछ पुछा.
"अर्जुन, फ्रेंड है और निगहबॉर भी. आल्सो इन्वितेद.", इतना हे मुँह से निकल पाया अन्नू के और अर्जुन हाथ जोड़ कर पारुल को शुभकामनाये देता उन दोनों को वही छोड़ आगे बढ़ गया.
"पागल समझा है क्या मुझे? जैसे वह हाथ पकडे था उस से साफ़ पता चलता है के तुम दोनों में दोस्ती से तोह ज्यादा हे है. चल आजा अब ये बात आगे तू हे बताएगी. मेरी सगाई में मैं हे देरी से जा रही हु.", अन्नू थोड़ा झेंपते हुए पारुल के साथ हे अंदर चल दी.
"माँ, ये है अपने शंकर जी का बीटा और मेरा छोटा भाई. अर्जुन ये मेरी माता जी है.", विकास की तरह उनकी माता जी भी एक लम्बे कद तगड़ी महिला था, लगभग 50 के आसपास. अर्जुन के बारे में जानते हे उन्होंने उसका माथा स्नेह से चूमते हुए गले लगा लिए, पाँव छूने से रोकते हुए.
"अरे बीटा ये न जितनी बार घर आता है तेरा जीकर जरूर करता है. और सच कहु तोह देख के बड़ी ख़ुशी हुई की विकास ने गलत नहीं बताया था. लाखों में एक है बीटा तू.", अर्जुन ने भी उन्हें प्यार से वैसे हे अपने से लगाया जैसे वह अपनी माँ रेखा जी से मिलता था.
"आप हो प्यारी तोह आपको सभी ाचे हे लगेंगे आंटी जी. वैसे आपसे मिलते हे पता चल गया के भैया हर हफ्ते हे गाँव क्यों जाते है. उनके लिए आप हे सबकुछ हो.", अर्जुन की बात पर मुस्कुराते हुए उन्होंने सर पर हाथ फेरा और कुछ पल निहारने लगी.
"आंटी जी, ये दादी ने दिए है. मैं नहीं लेके आया, पहले हे बता देता हु. उनोहने कहा था के अपनी आंटी से मिलेगा तोह उन्हें कह देना के थानेदारनी ने प्यार से दिए है.", वह पैकेट मेज से उठा कर अर्जुन ने एक सांस में हे पूरी कहानी सुना दी. विकास की माता जी कभी उसको देख रही थी और कभी विकास को.
"देख छोटे यहाँ तू मेरी सगाई में आया है. मेरे लिए कुछ लेन की जगह तू माँ के लिए ले आया?", विकास ने वैसे हे अर्जुन से कहा जैसे छेड़ रहा हो.
"मैं छोटा हु तोह मैं कुछ कैसे दू. हाँ जो दादी ने दिए वह ले आया.", विकास ने उसकी बात पर हँसते हुए गले लगा लिए.
"रख ले माँ, ये सिर्फ दे रहा है. भिजवाया तोह घर के बड़ो ने है.", विकास की माता जी ने भी आशीर्वाद देते हुए वह तोहफा ले लिए.
"भाई तू छोटा कहा से है? मेरे सेल से 2 उंगल ऊपर हो रखा है और छोटा बतावे है.", ये thik-thak deal-dol वाले 30 के लगभग के व्यक्ति चलते हुए अर्जुन और विकास के पास आ खड़े हुए. हाथ में काळा सोडा का गिलास था.
"अर्जुन ये मेरे जीजा जी श बीरभान जी और जीजा जी ये अर्जुन, डॉक्टर साहब के बीटा और स्टेडियम में बॉक्सिंग का खिलाडी है.", अर्जुन उनके बड़े रिश्ते को देखता पाँव पर हाथ लगाने लगा तोह उन्होंने कलाई पकड़ ली.
"पंडत ते हाथ नहीं लवंडे रे मानस. देख के कालजा खुश हो गया भाई के तेरे जिसे बालक ेब भी होव है. कुरता पजामा मांड वाला, धर्मेंदर तेह भी तगड़ा गाठ भी विकास मान न मान चोर्रा यु तेरे तेह भी फालतू है.", उनकी कड़ी हरयाणवी सुनकर अर्जुन भी मुस्कुराने लगा.
"जीजा मैं तोह कहु था के आप मिलो तोह सही इस से. जड़ यु मेरे टी बचा सके है वह भी आपने ते बड़े और तगड़े पहलवान तेह फेर कोई बात होवेगी.", विकास ने जैसे हे ये जिक्र किआ तोह एक बार फिर उसकी माता जी ने अर्जुन का सर पूछकर दिए.
"शर्मा जी सही बात है. आप छोटे हो उम्र में लेकिन महारे परिवार पे बड़ा एहसान कर दिए.", उनकी बात बीच में काट कर अर्जुन विकास के जीजा के भी गले लग गया.
"जीजा, विकास भैया मेरे लिए इस से भी कही कर सकते है. मैंने कुछ भी नहीं किआ ये तोह. और यहाँ हमारी बातें नहीं करनी, उधर सभी लोग हमको देख रहे है के लड़के को रोके क्यों खड़े है हम.", अर्जुन के ऐसे धीमी आवाज में कहने से बीरभान जी ने हँसते हुए उसकी पीठ जोर से थपथपाई और फिर विकास के साथ परिवार को लेकर सामने संधू परिवार की तरफ चल दिए.
फोटोग्राफर कुछ देर तस्वीरें लेता रहा दोनों परिवारों की और अर्जुन मौका देख वह से खिसकता हुआ बलबीर के पास आ बैठा जो पीछे की एक मेज पर बैठा तंदूरी पनीर के साथ कोला जातक रहा था, अकेला बैठा.
"क्या बलबीर भाई, अकेले अकेले लगे पड़े हो"
"छोटे भाई, उसकी सगाई है वह लड़की के साथ खुश, बाकी सभी बातों से और मैं यहाँ के पनीर से. खा के देख गज़ब बना है.", कपडे से मुँह साफ़ करता बलबीर अर्जुन की तरफ खली प्लेट करते हुए बोलै.
"शर्म करो. खली है ये."
"तभी तोह कहा के इसमें भी दाल और अपने लिए भी ले आ. मैं जरा यहाँ आखें सेक लू. देख कैसे बिजलिया गिरा रही है वह तीनो.", बलबीर बैठा हुआ अन्नू, चारुल और उनके साथ हे कड़ी एक खूबसूरत सी लड़की की तरफ आँखों के इशारे से अर्जुन देखने का कहने लगा. वह भी मुस्कुराता हुआ सामने से आ रहे वेटर को उनकी प्लेट में पनीर रखने का बोल कर हंसने लगा.
"अबे हंस क्यों रहा है?"
"भाई एक तोह कोच साहब की बेटी है, दूसरी जो laal-kali साड़ी में है वह पत्नी नहीं वाली और तीसरी इधर देख नै रही.", बलबीर हलकी नाराजगी से देखने लगा उसको.
"क्यों नहीं पत्नी वाली? अब तोह वह देख भी रही है.", बलबीर ने अर्जुन को बताया तोह अर्जुन ने अपनी तरफ आती तीनो लड़कीओ को देखा.
"लो आ हे गई आपसे बात करने तीनो.", अर्जुन ने इतना कहा तोह बलबीर की सिट्टीपिट्टी गम हो गई.
"मर्डर गए भाई."
"Hello अर्जुन, थैंक यू सो मच फॉर किंग. ये मेरी कजिन है सिम्मी, लुधिअना से और सिम्मी ये अर्जुन है पापा के फ्रेंड के बेटे और उनके फवौरीते स्टूडेंट भी.", अर्जुन ने बड़े अदब से खड़े होते हुए हाथ जोड़े.
"क्या यार हैंडसम और हमउम्र हो. हाथ मिलाने की जगह जोड़ रहे हो.", सिम्मी के ऐसे खुले अंदाज और सामने बढे हुए खूबसूरत हाथ को देख अर्जुन ने भी मुस्कुराते हुए हाथ थाम लिए.
"प्लेअसुरे मीटिंग यू सिम्मी."
"अन्नू तुम भी यहाँ सिम्मी को कंपनी दो मैं जगह पारुल से मिल कर आई. शायद ड्रेस ठीक करनी है उसकी.", चारुल मुस्कुराती हुई अर्जुन को देख कर उन दोनों को वही रुकने का बोलती चली गई.
"तोह मिस्टर अर्जुन करते क्या हो आप?", यहाँ बलबीर जैसे बैठे हुए भी नहीं था. वह चुपचाप बातें सुनता अपनी पसंद का काम करने लगा, खाने.
"जी कुछ नहीं करता हु. पढाई और थोड़ा बहोत sports.",Arjun को ऐसे सिम्मी से बात करते देख अन्नू की धड़कन बदल रही थी.
"वाओ. मतलब तुम फ्री भी रहते होंगे अगर ज्यादा कुछ नै करते. यहाँ पारुल दीदी तोह बहार निकलती नहीं और चारुल को स्कूल से फुर्सत नहीं. अपना शहर हे घुमा दो यार. लुधिअना आओगे तोह मैं तुम्हे वह घुमा दूंगी."
"जी बिलकुल. लेकिन मेरे ख़याल से सैटरडे संडे ठीक रहेगा.", अर्जुन की बात सुनते हे अन्नू ने नीचे से हे उसको पाँव मारा और घूर कर देखने लगी.
"अरे जब तुम्हारे पास टाइम हो. मैं अभी दीदी से घर का नंबर लेके देती हु. बोर होने से ाचा है के घूम भी ले और शॉपिंग भी. क्या ख़याल है अन्नू?"
"यार तुझे पता हे है, स्कूल एंड आल.", अन्नू के स्वर में नाराजगी थी अर्जुन के प्रति.
"टेंशन मत लीजिये अन्नू जी भी साथ चल पड़ेंगी. मैं शॉपिंग के बारे में ज्यादा नहीं जनता.", अर्जुन ने नीचे से हे अन्नू का हाथ थाम कर सेहला दिए. अब नाराजगी की जगह मुस्कान और शर्म ने ले ली थी.
"मैं मैनेज करती हु कुछ.", अन्नू ने इतना कहा तोह सिम्मी ने ध्यान से उसके चेहरे को देखा.
"वाह भाई. तुमने कहा और मैडम एक बार में हे मान गई. ाची बात है. चल अन्नू उधर अंगूठी पहनाने वाले है. अर्जुन से बातें करेंगे साथ डिनर करते हुए. इनके फ्रेंड को भी डिस्टर्ब कर दिए हमने.", बलबीर को जैसे वह जाते हुए चिड़ा हे गई थी.
"छोटे तेरे लुंड पर टिल तोह नहीं?", बलबीर ने बिलकुल कान के पास ये कहा.
"हाँ, हैं तोह भैया. लेकिन उस से क्या?"
"साली साड़ी वही चढ़ेंगी क्योंकि मेरे तोह है नहीं. बहोत तेज है तू भी भाई. स्टेडियम में 2-2, यहाँ एक का तू हाथ पकडे था और दूसरी सामनसे से खुद गिर रही तेरे पर. डर है कही गुरूजी की दूसरी वाली भी न आ गिरे तेरे पर."
"अर्जुन, विकास बुला रहा है तुम्हे.", अर्जुन ने चारुल को देखा तोह उठ खड़ा हुआ.
"बलबीर भाई."
"भाई तू जा. मैं मेरे दिल को पनीर से मन लूंगा." बलबीर ने उसको अकेले हे जाने को कहा तोह अर्जुन जानता था के वह शर्मीला है इसलिए अकेले हे चारुल के पीछे चल दिए.
"भाई, ये तोह इस तरफ नई खड़ा होगा?", संधू जी ने हँसते हुए विकास से कहा जब उन्होंने उसको अर्जुन का हाथ पकड़ कर अपनी कुर्सी के हाथे पर बैठने को कहा.
"स्टेडियम में बिठा लेना पापा.", विकास ने उन्हें आज सीधा पापा कहा तोह वह भी मुस्कुरा दिए. अर्जुन इन सबकी ख़ुशी में खुश था.
अर्जुन के जैसे हे पारुल की कुर्सी पर चारुल बैठी थी और फोटो होने के बाद वह उठ गई तोह अब सिम्मी ने उधर बैठ गई. अर्जुन खड़े होने लगा तोह विकास ने बैठे हे रहने को कहा. तीसरी फोटो में अन्नू को जबरदस्ती चारुल ने बिठा दिए और अर्जुन ने जैसे उधर नजर अन्नू की तरफ की तोह फोटो हो गई.
"भाई साहब इधर कैमरा की तरफ देखिये उनकी तरफ नहीं. फिर से लेना पड़ेगा फोटो.", अर्जुन और अन्नू के चेहरे लाल हो गए उसकी बात पर और पारुल की आवाज सुनते हे विकास के कान खड़े हो गए.
"देख ले अन्नू, सगाई हमारी हो रही है लेकिन प्यार तुम दोनों दिखा रहे हो. वह बैठा भी वह तुझे देख रहा है.", अन्नू शर्मा गई और इधर विकास ने अर्जुन की कमर में हाथ डालते हुए उसके कान में कहा.
"अबे चक्कर क्या है तेरा? कितनी घुमा रहा है? यहाँ भी तू शायद इसके हे साथ आया है और ये इनकी सहली है. परसो बात करूँगा तुझसे.", विकास की बात सुनकर अर्जुन बस मुस्कुराता रहा और इस तस्वीर में चारो के चेहरे खुश थे.
"एकदम बढ़िया तस्वीर आई है जी. नेचुरल स्माइल के साथ.", अर्जुन और अन्नू वह से उठे हे थे की पारुल ने चारुल के कान में कुछ कहा और चारुल थोड़ा हैरानी से अन्नू और अर्जुन को देखने लगी. अन्नू वह से हट कर अब मरस संधू के पास आ कड़ी हुई और अर्जुन वही बलबीर की तरफ चलने लगा.
कुछ देर बाद हे दोनों लड़का लड़की ने अँगूठिया बदली तोह सितारों से भरा बड़ा गुब्बारा फोड़ते हुए इसकी ख़ुशी जाहिर की गई. सभी उन्हें बधाई दे रहे थे साथ हे सगुन और तोहफे भी. अर्जुन और बलबीर ने साथ हे उन दोनों को शगुन भेंट किआ और पारुल ने अर्जुन के हाथ से खुद हे शगुन पकड़ लिए.
"भाभी हु तेरी तोह ये हक़ मेरा है.", पारुल की ऐसी बात और हरकत देख अर्जुन दोनों को देखने लगा.
"हाँ भाई, लगता है मेरे भी दिन बदलने वाले है.", एक ठंडी सांस भरता विकास बेचारगी से अर्जुन और पारुल को देखने लगा.
"भैया ाची बात है. म्हणत घर के मर्द की और लक्समी घर की मालकिन की. ये मंत्र समझ लो कभी परेशानी नहीं आने वाली.", अर्जुन की बात पर विकास हँसते हुए दोहरा हो गया और अर्जुन के हाथ पर हाथ मरती पारुल की भी हंसी चूत गई थी. बच्चों को ऐसे खुश देख संधू जी ने भी अपनी धर्मपत्नी और बेटी के कंधो पर हाथ रखते हुए उन्हें ये दृश्य दिखाया. इस खास पल को फोटोग्राफर क़ैद करने से नहीं चूका.
"सरदारनी जी, ये लड़का है अपने शंकर जी का अर्जुन. पंडित जी सही कहते है के ये जहा जाता है खुशिया ला देता है. देख लो इन बच्चों को, ऐसी चमक और हंसी पहले नहीं देखि मैंने इनके चेहरों पर.", संधू जी की बात पर उनकी बेटी गले में हाथ डालती उनके साथ कड़ी अर्जुन को देखने लगी थी.
"वाहेगुरु सबको खुश रखे. सच कहा दार जी आपने. लड़के पर हे सबकी नजर है जी और कितना साफ़ रब्ब का बाँदा है जी. खुश भी है और खुशाली भी ला रहा है."
"मेहमानो को roti-shoti भी पूछो जी. इनके चक्कर में कही वह न रस जाये.", संधू जी के साथ उनकी पत्नी भी बाकि लोगो से मिलने और ratri-bhoj का कहने चल दिए.
"सही कहते हो पापा जी आप भी. लेकिन इसका दिल कुछ समंदर सा है जिसको पढ़ पाना मुश्किल है.", चारुल ये बुदबुदाती हुई मुस्कुरा रही थी.
"अकेली मुस्कुरा रही है कड़ी कड़ी. चल यार खाना खाते है फिर जाना भी है." अन्नू ने उसकी तन्द्रा भांग करते हुए कहा तोह वह गौर से अन्नू को देखने लगी.
"ये सिर्फ पडोसी हे है न तेरा? सच बोलिओ अन्नू की बची, तू बचपन से मेरी दोस्त है.", चारुल उसका हाथ पकड़ती दिवार के पास ले गई.
"जज मत करना यार. लेकिन सच ये है के मैं उस से प्यार करती हु.", अन्नू ने बड़ी गंभीरता से कहा.
"और वह?"
"वह कहता है के वह मुझे कभी दुखी नहीं होने देगा और जबतक उसके साथ हु वह मेरा ख्याल रखेगा. स्कूल से बहार. बाकी तुझे भी पता है के एक दिन जैसे पारुल है वैसे मैंने भी होना है लेकिन बगल में लड़का कोई और हे होगा. लेकिन इसके साथ मैं खुद को पूरा हुआ मानती हु. जितने है उतने हु. No कम्प्लेंट्स एंड ी ऑलवेज फील हिज लव इवन िफ़ हे रेसिस्टर्स सयिंग ठोस वर्ड्स.", अन्नू की ऐसे साफ़ बात सुनकर चारुल के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई.
"कामिनी पता था मुझे की तू इसकी दीवानी हो रही है. कैसे देख रही थी इसको जब मैं साथ बैठी थी स्कूल के दूसरे दिन. लेकिन इसके अंदर राज बहुत दफ़न है जो मेरी जिज्ञासा बढ़ा रहे है. यू अरे इन लव सो यू अरे जस्ट फौक्स्ड ों तहत. हे इस समवन हिडिंग ा लोट मोरे थान एनीवन कैन इमेजिन.", चारुल की बात पर अन्नू ने उसका हाथ थाम लिए.
"मुझे बस इतना पता है के ये ख़ास है और मेरी परवाह करता है. और मुझे कुछ चाहिए हे नहीं. यू अरे फ्री तो स्टडी हिम एंड एक्स्प्लोर अस मच यू कैन.", आँख मरती हुई वह चारुल को प्रोत्साहित कर रही थी की अन्नू को कोई परेशानी नहीं अगर वह अर्जुन के राज jaan-na चाहती है.
"हाँ वह तोह मैं देख रही हु. आजकल मैडम जैसे नजर आती है बिजलिया गिरती हुई बस वजह जान कर ाचा लगा. इस पर तोह बनती हे है.", चारुल के ऐसे जवाब पर वह शर्माती सी नजरे छुपाने लगी.
"ये ब्लाउज के पास निशाँ कैसा है स्किन पर.?", चारुल की इस बात को सुनते हे झट्ट अन्नू चौंकती हुई सीने की तरफ देखने लगी.
"हाहाहा. अरे कैसे डर गई तू. मजे ले रही थी बस लेकिन ऐसा लगता है बहुत कुछ तू मुझे जल्द बताने वाली है.", अन्नू शर्माती हुई उसको खाने की तरफ ले जाने लगी.
"बुला ले उसको भी. यहाँ कोई स्कूल से नहीं है. मैं भी देखु के तू उसको खिलाती है या वह तुझे."
"बस कर यार. वह सच में शुरू हो जायेगा अगर मैं गलती से बोल भी दिए. मेरा दिल रखने के लिए तोह हाथ भी पकड़ कर अंदर लेके आने लगा था वह.", अन्नू इधर उधर देखती जैसे अर्जुन का हे पता लगा रही थी.
"जिसको तेरी नजरे ढून्ढ रही है उसको पारुल खिला रही है. वाह ऋ किस्मत. जिनकी सगाई है वह दोनों खुद एक दूसरे को खिलने की जगह इसको अपने बचे की तरह खिला रहे है. चल इसके मजे लेते है.", चारुल उधर हे आ गई जहा विकास और पारुल अपने साथ हे अर्जुन को बिठाये थे.
"अभी सगाई हुई है. शादी नहीं. और बचो को खाना खिलने की प्रैक्टिस इतनी जल्दी शुरू कर दी.", चारुल की बात सुनकर तीनो मुस्कुरा दिए.
"साली साहिबा ये बचा यहाँ सिर्फ घूमता फिर रहा था, कुछ खा नहीं रहा था. तोह अपनी भाभी के हाथ चढ़ गया अभी से हे.", विकास की बात सुनते हे चारुल अर्जुन को देखने लगी.
"मैडम बचा लो. ये दोनों अपना खाना मुझे खिला रहे है क्योंकि एक ने आज प्रैक्टिस नहीं की और दूसरा डाइटिंग पर है, क्योंकि उनके माजी नहीं खा रहे.", अब दोनों ने हे उसका कान खींच लिए.
"देखो. बोल रहा हु तोह दोनों हे मार रहे है. बस पेट भर गया मेरा हाथ जोड़ता हु.", अर्जुन की नौटंकी देख विकास की माता जी हे उसको वह से बचा कर ले चली.
"शुक्र है. तुम दोनों उसको कैसे पकड़ कर बिठाये थे यार.", चारुल के ऐसा कहने पर पारुल ने विकास की तरफ देखा.
"अब वह और फस्स गया. इसलिए यहाँ बिठा रखा था.", विकास की बात पर उन्होंने पलट कर देखा तोह अब अर्जुन के सर पर दुलार करती माताजी अर्जुन को साथ बिठाये निवाला खिला रही थी.
"चारुल जी, गाँव में एक सरपंची झोटा होता है. सबसे तगड़ा और गाँव का लाडला जिसको सब खिलते पिलाते रहते है और यहाँ भी कुछ वैसा हे हो रहा है. अब कही पापा न पकड़ ले इसको, फिर तोह ये घर जाने से रहा."
"बस आंटी जी. पेट फट जायेगा. आप खाइये मेरा हो गया.", अर्जुन वह से उठकर जैसे गायब हे हो गया.
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"चल अब मैं निकलती हु यार. कल अगर तू स्कूल आएगी तोह मिलते है.", अन्नू ने चारुल से गले लगने के बाद परिवार के सभी लोगो से मिलकर एक बार और शुभकामनाये दी. संधू जी ने जब जाने का पुछा तोह अन्नू इधर उधर देखने लगी.
"अर्जुन के साथ आई है और वह पता नहीं कहा चला गया.", चारुल भी अर्जुन को हे जैसे तलाश रही थी.
"ाची बात है. लायक लड़का है और संभल कर ले जायेगा. इधर हे होगा कही.", संधू जी ने भी नजर घुमाई तोह अर्जुन उन्हें बीरभान जी के साथ उनकी तरफ हे आता दिखा.
"लो वह आ गया.", अर्जुन ने भी उन सभी को फिर से बधाई दी और संधू जी के साथ उनकी धर्मपत्नी ने भी अर्जुन को आशीर्वाद देते हुए 'सदा खुश रहो' कहते हुए गले लगा कर जाने की इजाजत दी. विकास के परिवार से भी मिलकर वह शांति से अन्नू के चलने की प्रतीक्षा करने लगा.
"अब ये इन्तजार कर रहा है.", पारुल की बात सुनते हे अन्नू झेंपती हुई उसके साथ चल दी.
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"बड़ा समझदार लड़का है ये चारुल. तूने कैसे इसको अनदेखा कर दिए.?", दोनों बहने कुछ पल अब अकेली थी तोह पारुल ने अपने दिल की बात कह दी.
"अनदेखा नहीं किआ है दीदी. ये अलग हे परिंदा है जो मेरे साथ एक घोंसले में नहीं रह सकेगा. जानती हो इसको पहली बार जब मैंने बास्केट कोर्ट पर देखा था तोह इसके नाम की तरह इसका ध्यान दिखाई दिए. वैसा अचूक थ्रो मैंने नहीं देखा था लेकिन पूछने पर इसने जवाब दिए था के ये उस खेल को कभी खेलना नहीं चाहता. मतलब साफ़ है के इसके लक्ष्य कही ज्यादा है और जो भी ये पा लगे ये और आगे बढ़ेगा. मैं इसके सामान नहीं हु. बेशक एक खिलाडी की तरह मैं भी फोकस्ड हु और समर्पित भी लेकिन ये समर्पण नहीं करता. ऐसी दिल्लगी से ाचा है दूर से हे देखो बस. और उम्र पता है कितनी है?" ये हमरे स्कूल में इलेवेंथ का स्टूडेंट है.", अब पारुल के चौंकने की बारी थी.
"मुझे लगा ये अन्नू और तेरा कॉमन फ्रेंड है. और जैसा तू कह रही है वैसा पापा को कहते भी सुना था. वह कहते है की ये लड़का समझ से बहार है उनकी. शायद बॉक्सिंग भी इसकी क्षमता के साथ न्याय नहीं कर पाए. लेकिन अन्नू?"
"प्यार है उसको अर्जुन से. और मैंने खुद देखा है के वह कितनी बदल गई है. जिसका मतलब उसने कुछ गलत नहीं किआ है. चलो छोड़ो इस बात को अब वह यहाँ नहीं है तोह यहाँ पर ध्यान दो.", चारुल बात को यही ख़तम करना चाहती थी.
"नहीं रोक पायेगी तू. लिखवा ले मेरे से. और एक बात बताती हु तुझे, इसकी ज़िन्दगी में सिर्फ अन्नू हे नहीं है 2 और भी लड़कियां है. विकास ने इसके सामने हे बताया था मुझे. उनमे से एक शायद वैसी हे है जो तेरे मुताबिक इस परिंदे के लिए बानी है. अर्जुन ने हम दोनों को हे बताया के जिस लड़की को विकास ने भी अर्जुन के लिए सही कहा था अर्जुन की शादी बचपन से उसके साथ तये है. लेकिन इस लड़के में दुसरो को खुश रखने का हुनर है. अन्नू को हे देख ले.", चारुल पहले तोह हैरान हुई फिर सोचने के बाद बोली.
"अन्नू ने कहा था के उसको हे अर्जुन से प्यार हुआ था. अर्जुन उसका ध्यान रखता है और उसकी परवाह करता है. खुद उसने कभी अन्नू से नहीं कहा के वह सिर्फ उसको प्यार करता है लेकिन अन्नू के मुताबिक वह नहीं कहेगा लेकिन दिल जनता है के अर्जुन प्यार भी करता है. कॉम्प्लिकेटेड है ये सब. तू खुद बता, एक पल के लिए विकास न हो लाइफ में तोह तू प्यार करती ऐसे इंसान से जिसकी लाइफ में 3 लड़कियां हो?"
"अगर वह मेरा ख़याल रखे और प्यार की कमी महसूस हे न होने दे तोह मैं क्यों पीछे हटूंगी. सबसे बड़ी बात जो तीन का दिल इतने ध्यान से रखता है वह चौथी को और ाचे से रखेगा. एक्सपीरियंस इस बेस्ट टीचर इन one's लाइफ.", पारुल इतना कहने के बाद अपने परिवार और विकास के पास चली गई. चारुल खुद को जैसे अपने हे अक्स से दूर होता देख रही थी. पारुल ने जो भी कहा था वह ठीक नहीं था लेकिन दिल गलत भी नहीं मान रहा था. 'अन्नू दोस्त है मेरी. बस यही सच है.'
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"अंदर नहीं आओगे.?", अन्नू घर तक आती बस अर्जुन से चिपक कर बैठी थी. उसको ाचा लग रहा था इस रात में ऐसे अर्जुन के पीछे बैठ कर उस के सीने पर हाथ रखना. सुनसान सड़क पर अर्जुन पहले हे उसके होंठो पर प्यार दे चूका था. अब दोनों घर के गेट के सामने हे खड़े थे.
"और अंदर क्या करेंगे.", अर्जुन की ऐसी मुस्कान देख वह पास कड़ी जैसे बहुत कुछ कहना चाह रही थी. अर्जुन अंधेर में जैसे कुछ देख कर वही नजरे जमाये रह गया.
"वह क्या देख रहे हो?"
"देख रहा हु के तुम्हारे घर में चोरी करने की इतनी ाची जगह पहले नहीं दिखी.", अर्जुन की बात समझने के लिए अन्नू ने भी उधर देखा तोह कुछ नजर नहीं आया.
"क्या कह रहे हो.?"
"तुम्हारा कमरा घर के सबसे पिछले हिस्से में है. यानि इस दिवार के पीछे आँगन होगा.", अर्जुन के ऐसा बताते हे अन्नू भी गौर से देख कर मुस्कुरा उठी.
"इरादे नेक नहीं लगते.", शर्माती हुई वह भी खुश थी की उन दोनों के पास शायद एक रास्ता हो सकता है.
"अभी चलता हु और जिस दिन इरादा खास हुआ तोह दरवाजा खुल्ला रखना पीछे का.", अर्जुन ने पास कड़ी अन्नू के पेट पर ऊँगली फिरते हुए हैंडल पकड़ लिए.
"गंदे कही के.", वह खुद चाहती थी की अर्जुन उसके साथ ऐसी हे शरारत करे.
"गुड नाईट. ध्यान रखना अपना.", अर्जुन ने हाथ हिलने के बाद बुलेट स्टार्ट की और घर की तरफ बढ़ गया.
"अंदर तह बुलाना सी पट. बहरो हे भेज तह मुंडा.", अन्नू की माँ ने जाली का दरवाजा खोल कर अंदर आती अन्नू से कहा.
"देर हो रही सी ओसनु माँ. फेर कड़े आ जायेगा. चलो मैं बुआ ला लेनी है.", अन्नू अंदर आते हे कमरे की और चल दी. मुआयना करने.
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"दीदी, कोई नजर नहीं आ रहा. सबा कहा गए?", अर्जुन घर में दाखिल हुआ तोह इतनी शांति देख रसोई में दूध उबाल रही कोमल दीदी के पास चला आया.
"4 तोह गई मंजू के साथ उसके ससुराल. माँ, मौसी और बुआ है तेजी के कमरे में और प्रियंका माधुरी दीदी के साथ अभी कमरे में गई है फिल्म देखने के बाद.", उनकी बात सुनकर अर्जुन ने जल्दी से उनका गाल चूम लिए.
"मतलब मेरी प्यारी दीदी आज अकेली है?", अर्जुन की इस बात पर कोमल दीदी नजरे झुकाये मुस्कुराती हुई दूध बंद करके उस पर चलनी ढकने लगी.
"दीदी से क्या काम है तुझे? याद तोह आती नै अपनी दीदी की.", कोमल दीदी के ऐसा कहने पर अर्जुन ने उनका चेहरा ऊपर करते हुए उन बड़ी आँखों में देखते हुए कहा.
"आज अगर बुआ नीचे सो जाये तोह आप छत्त पर आ जाना."
"ऋतू के नए कमरे में. छत्त पर अब नहीं.", कोमल दीदी के इतना कहते हे अर्जुन ने फिर से गाल चूम कर अपनी ख़ुशी जाहिर कर दी. फिर पानी की बोतल निकाल कर वह माँ के कमरे में चल दिए जहा रुपाली किताबे बंद करने के बाद सोने की तैयारी कर रही थी. कुछ देर वह उनके पास बैठ कर स्कूल, घर और उनकी व्यक्तिगत बातें करने लगा जो रुपाली को भी ाचा लग रहा था. आधे घंटे बाद अर्जुन जान गया के वह अब सोना चाहती है तोह खुदसे हे उनके माथे को चूम कर वह गूडनिघत कहता ऊपर कमरे में चल दिए. 'बचा हे है ये लड़का. ऋतू ठीक हे कहती है. लेकिन प्यारा है.', रुपाली खुश होती हुई दिवार की तरफ करवट ले कर लेट गई.
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"आज तोह मैं यही सोने वाली हु भाई.", मधु बुआ ने करवट बदलते हुए तकिया ठीक किआ और बाकी दोनों की तरफ देखने लगी. रेखा जी अपने कमरे में चली गई थी, रात गहराने की वजह से. अब यहाँ बुआ के सिवा ललिता जी और सरोज हे थे.
"हाँ मालूम है तेरी जांघ में दर्द है तभी आज सुबह से नीच हे परेशां हो रही है.", ललिता जी ने अपनी छोटी ननद की चुटकी लेते कहा तोह सरोज भी हंसने लगी.
"वैसे ननद रानी, ये जांघ पे ऐसा क्या लगा जो दिन में सिसकी निकल रही थी और अब भी टाँगे जुड़ नहीं रही?", सरोज की मस्ती देख कर मधु के चेहरे पे अलग हे चमक आ गई थी लेकिन शब्द कुछ और बयां कर रहे थे उनके.
"अरे अब ठीक हु मैं. वह तोह बस बाथरूम में पांव फिसल गया था रात को और एक की ठंडक में जकड़न भद्द गई. लगाया आगया कुछ नहीं है.", मधु बुआ सीने के सामने दोनों कोहनिया करती लेती थी.
"इन आँखों ने बहोत फिसलन देखि है. खेतो में, नहर किनारे, आँगन में और गुसलखाने में भी. अब ये है तोह उनमे से हे लेकिन लाडो रानी बता नहीं रही.", सरोज की बात पर ललिता जी भी मधु की कमर पर हाथ रख के चेहरा देखने लगी.
"अब भाभी आप न अपनी तरफ से जो भी सोचो, मैंने तोह सच बता दिए है.", मधु बुआ आँखें बंद करती चुप रहने का नाटक करने लगी.
"ललिता दीदी, वैसे हो सकता है के ये ठीक कह रही हो. 2 बचे है और इस उम्र में कोई जाँघे फैला दे ऐसा हथियार मुनासिब नहीं. लेकिन अनुभव कहता है बिल्ली ने चूहा तोह खाया है."
"चल अगर मधु नहीं बताना चाहती तोह कोई बात नहीं ऋ. सोने दे इसको लेकिन तुझे राज की बात मैं बता देती हु एक. तू कहती है न के ऐसा हथियार नहीं हो सकता जो खेली खाई को हिला दे तोह वहां है तेरा.", ललिता जी बीच में लेती सिर्फ saree-peticot में थी. सरोज और मधु के तन मैक्सी से ढके थे.
"क्या बात करती हो दीदी? जितना भारी पिछवाड़ा है मधु का तोह लुल्ली तोह पता नहीं चलनी इसको. और 2 दिन में मैंने देख लिए यहाँ शिकारी तोह कोई दिखा नहीं अब ये न कहना के बहार का इस घर में घुसके दूध पी गया और बिल्ली मार गया.", सरोज अपना सर हथेली के सहारे टिकाये गौर से ललिता जी को देख रही थी.
"मुन्ना के पास ऐसा अजगर है के काट ले तोह मधु क्या तेरी भी टाँगे फ़ैल जाये."
"पागल हो दीदी. वह बचा शरीर से तगड़ा हो रहा है लेकि उम्र और अंग वैसा हे है, जितनी मुझे समझ है.", सरोज का गाला सूख गया था नाम सुनते हे और मधु बुआ की धड़कन बढ़ने लगी थी, लेकिन आँखें बंद किये वह पड़ी रही.
"पिछले महीने तक बहार आँगन में हे नाहटा था छुट्टियों में सुबह 6 बजे हे. मशीन लगा राखी मैंने कपडे धोने की तोह वह नाहा कर कपडे बदलने बाथरूम में चला गया लेकिन दरवाजे के बीच किसी कपडे की वजह से वह बंद न हुआ. टोलिया सामने से हटा तोह मेरी मुनिया और दिल दोनों कांप गए. सच कहु सरोज तोह उसका इतना बड़ा है और काम से काम इतना मोटा जरूर रहा होगा. अब तोह पहले देख लेती हु मशीन लगाने से या ऊपर जाने से. गलती से घोडा बिदक गया तोह बिल्ली के साथ पेट फाड़ देगा.", हाथ के इशारे से जब ललिता जी ने ऊँगली से लेकर कलाई के 3 इंच नीचे निशान बनाया तोह सरोज जी की खांसी चूत गई. निचे राखी पानी की बोतल उठा कर गटागट पीने के बाद लम्बी सांस ली और फिर कहने लगी.
"ये कैसे मुमकिन है? रेखा से अकेले में मैं साडी बात करती हु. शंकर का कोई हथेली जितना होगा, आपके देवर का भी वैसा हे है समझ लो और बाकी जो सहेलिया है उनके खसम उतने भी खुशकिस्मत नहीं. और जैसा बता रही हो वैसा किसी सरपंच की तरह 5 गाँव में किसी एक का भी मुश्किल है. और इतना तोह यहाँ तक पहुंचेगा. बाप रे, दीदी. मधु ऐसा नहीं खा सकती.", सरोज के बदन में जैसे दाने उभर आये थे जब उसने छूट के सामने से नाभि तक लम्बाई माप और फिर भी आकर ललिता जी के हिसाब से आगे तक था.
"चल मान ले के मैंने झूठ कहा. भला मैं अपने मुन्ना के लिए कोई ऐसी वैसी बात कर सकती हु? सिर्फ तेरी बात का जवाब देते हुए मैंने वही बताया जो सच है. और रही बात ऐसे हथियार को झेलने की तोह कोई लड़की तोह सपने में भी झेल नई सकती अगर दरवाजा बंद हो लेकिन ब्याही हुई औरत जिसका पिछवाड़ा जोरदार हो वह जरूर आधा अधूरा झेल लेगी पहली बार में."
"हम्म्म. सही बात है आपकी. शादी के टाइम जब पहली बार आपके देवर का लिए था तोह मैं मंजू जैसी थी और मेरी तोह चीखे निकलती रही थी 10 मिनट तक. शुरू में हर बार ऐसा होता था लेकिन 6 साल पहले तक पूरा केला एक बार में अंदर गायब हो जाता था."
"मतलब 6 साल से सूखी है तू?", ललिता जी ने गौर से देखा सरोज के चेहरे को जहा सच लिखा था.
"सूखी तोह दीदी 10 साल से हु. उसके बाद अगले 4 साल में तोह ये कभी दारू के नशे में हे सख्त हो कर चढ़ते थे लेकिन फिर तोह वह भी बंद हो गया. और अब तोह लगता है जैसे वह जरर हे न लग गई हो.", सरोज साफ़ दिल और भोली थी बेशक पढ़ी लिखी लेकिन परवरिश वैसी हे थी.
"उम्र देख तेरी. अभी भी 10 बरस तोह पड़े है तेरी इमारत में भूकंप के झटके झेलने के. और ये मर्द सारे हे ऐसे होते है, बचे हुए नहीं के कुछ साल बहार चुपके मुँह मरते फिरेंगे और घर की दाल जैसे गले न उतरती इनके. शंकर जैसा भी है जब घर आता है तोह तबियत से रेखा की मुनिया लाल करता है. बत्ती रात को 10 बजे हे बंद हो जाती है और रेखा 6 बजे तक बहार नई निकलती. तभी आजतक चमक रही है वह. तेरा भी कुछ नहीं बिगड़ा अभी. या तोह अपने नंदलाल को वैद के पास ले जा नहीं तोह कोई और बांसुरी बजने वाला देख ले.", ललिता जी की बात का अब कोई जवाब न था सरोज के पास.
"जैसा किस्मत चाहेगी वही होगा दीदी. चलो अब सोना हे बेहतर रहेगा कल सुबह जल्दी निकलना है.", आँखे मुंदती हुई सरोज का सर भरी हो चला था. वही उसको अभी भी अर्जुन की शरारती आँखें याद आ रही थी. अर्जुन का नाम याद करने भर से दिल हल्का होने लगा और वह नींद में जाने लगी. मधु बुआ भी ये बातें sunn-ne के बाद अब निश्चिंत हो कर सो रही थी, एक मुस्कान के साथ.
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अर्जुन इतने दिन बाद एकांत में अपनी प्यारी दीदी से मिलने को लेकर बेचैन था. अब कही जा कर घर शांत हुआ तोह वह दबे पांव छत्त से उतरता पिछले भाग की तरफ आ खड़ा हुआ. ऋतू दीदी वाला ये कमरा अभी अंदर से हे बंद जान पड़ता था. सावधानी से अर्जुन ने ऊँगली से हल्का बजाते हुए दरवाजा थपथपाया तोह तुरंत हे दरवाजा आधा खुल गया. यहाँ कमरे में अँधेरा था और बहार से आती हलकी रौशनी की वजह से आधे के लगभग बिस्टेर और फर्श नुमाया थे.
"एक तरफ हटो तोह दरवाजा बंद करू.", कोमल दीदी की फुसफुसाती आवाज दरवाजे के पीछे से आई थी और अर्जुन उनकी हे तरफ आते हुए खुद दरवाजा लगाने लगा.
"मैंने ज्यादा देर तोह नहीं की आने में?", अँधेरे में हे अर्जुन ने उनके दोनों हाथ पकड़ते हुए खुद को करीब कर लिए. बंद कमरे में और इतनी करीब से दोनों हे एक दूसरे की साँसे सुन्न प् रहे थे.
"पहले आते भी तोह वैसे हे जाना पड़ता.", कोमल दीदी की बात उसको समझ न आई और फिर वह अर्जुन का हाथ पकड़ती इस कमरे से अंदर की तरफ चल दी जहा दूसरा कमरा था. उनकी आँखे और कदम जैसे अभ्यस्त थे या उन्हें ाचे से हर चीज भली भांति पता था.
"अंदर वाले कमरे में?", ये दरवाजा खुलने की आवाज पर वह उनके से हे एक पल रुका और फिर अंदर आते हे दीदी को दरवाजा फिर बंद करते महसूस किआ.
"जब ये कमरा ज्यादा एकांत दे रहा है तोह उधर रहने का क्या फायदा? और खिडकी भी घर के अंदर की तरफ हे है वह.", अर्जुन को अब इस अँधेरे में थोड़ा बहोत नजर आ रहा था. दिवार में बहार वाली दिवार में बानी कांच और जाली वाली एक खिड़की की वजह से. दीदी ने वह कांच वाला हिस्सा अंदर की तरफ और जाली बहार की तरफ खोल दी. 2क्ष2 के इस झरोके ने जल्द हे कमरे में तजि हवा भरनी शुरू कर दी. और चांदनी रात का प्रकाश अब यहाँ ठीक बीच में लगे बिस्टेर पर लम्बाई से गिरता उसके वह होने का परिचय करा रहा था.
"सच्चा कहा आपने. और ये सही में एक कही ज्यादा ाची जगह है."
"तुम बैठ मैं जरा रौशनी करती हु." ये कमरा कितना शांत था अर्जुन ने ाचे से जान लिए था. पूरे घर में एक यही कमरा था जिसमे वह ऐसे न बैठा था कभी. वैसे भी ये हिस्सा बंद रहता था और Ritu-Alka दीदी की वजह से ये कमरे आबाद होने लगे थे. हलकी दूधिया रौशनी कमरे में भरते हे अर्जुन साँसे थामे बस ये नजारा देखता रह गया.
सुर्ख लाल रेशम के सलवार कमीज में सर पे चुन्नी लिए कोमल दीदी बिस्टेर के दूसरी तरफ फर्श पर कड़ी थी. सूट का कसाव जैसे लेश मात्रा कही सिलवट न लिए था. कोमल दीदी हे तोह थी जिनकी सुंदरता सच में बेमिसाल थी. ऊपर से फक्क गोर रंग पर लाल लिबास उनकी रंगत गुलाबी कर रहा था. कमरे की सफ़ेद दीवारे और लालिमा लिए ये कुदरत का सबसे हसीं मुजस्समा. लम्बी पलके झुकाते हुए दीदी ने चादर को उस जगह से ठीक किआ तोह अर्जुन के होंठ सूख गए.
सीने के सामने वाले हिस्से में से झांकते वह गुलाबी बेदाग़ उभर आपस में एक दूसरे से चिपके अर्जुन का इम्तिहान ले रहे थे. और वह इसमें जैसे नाकाम हे होना चाहता था. अपनी जगह से उठ कर दीदी के करीब पंहुचा तोह वह mirg-nayan अर्जुन को भरपूर प्यार से निहारने लगे. ये भाषा हे तोह जानती थी कोमल जिसको समझना सबको कहा आता था. लेकिन अर्जुन भी उनसे हे जुड़ा था और औरो से अलग.
"आपने ये सब मेरे लिए किआ?", उनकी कलाई पर लाल चूड़ियां देखता वह अपने जज्बात बस किसी तरह रोके था.
"हमारे लिए.", होंठो का लरजना कोई और न देख ले शायद ये भी कोमल दीदी के चुप रहने की वजह थी. ऊपर वाला होंठ कुछ उभरा हुआ धनुष सा और नीचे एक गोलाई लिए रस से भरा थोड़ा मोटा. मुँह खोलने पर जैसे वह खास हरकत करते थे. अर्जुन के बेताब हाथ उनकी कमर के पिछले भाग पर चूहे तोह लम्बी पलकों ने वह नयन अपने पीछे छुपा लिए. ऊपर की तरफ उठा चेहरा और ये मदद्भरे होंठ बाकी की बात पूरी कर गए. अर्जुन यहाँ से वापिस न लौट सका और न दीदी ऐसा चाहती थी.
"आपको नक़ाब में रखा जाये तब भी सिर्फ आँखों से दीवानगी बढ़ जाएगी.", कोमल दीदी के कोमल आधार चूमने के बाद अर्जुन ने उनकी आँखे देखते हुए कहा.
"मेरी दीवानगी का सबब कभी देखना. वह एक याद हे मुझको अपने में समेटे रखती है, पूरी ज़िन्दगी का प्यार देती हुई.", कोमल दीदी की ऐसी मार्मिक बात सुनकर अर्जुन दोनों पांव जमीन पर टिकते उन्हें गॉड में लेकर बिस्टेर पर बैठ गया.
"इतना प्यार करती है की मेरी याद से ज़िन्दगी बिताने का सोचे बैठी है? मैं ज़िंदा हु और आपके पास. कह भर देंगी तोह मैं कही और अपनी परछाई भी न जाने दूंगा.", उनके दोनों गाल हथेली में समेटे वह उनकी बातें सुनता अपनी उनसे कहता बस इस चेहरे में डूबता जा रहा था.
"ऋतू का क्या होगा? वह खुद तेरी परछाई है.", ऋतू दीदी के जीकर पर अर्जुन ने उसी स्नेह से अपनी बड़ी बहिन से कहा.
"प्यार तोह दोनों का आप हे करती है, बराबर. तोह उनको अलग थोड़ी न करेंगी आप.", अर्जुन एक हाथ उनके सर पर लिए दुपट्टे पर रखते हुए जैसे उसको ठीक कर रहा था. किसी कश्मीरी यौवना से उनका ये रूप वह हर पल आँखों में भरे जा रहा था.
"ये मार्किट से लेकर भी वही आई थी और बिस्टेर को बना कर भी ऋतू खुद गई है. कैसे मैं अलग कर सकती तुम दोनों में से किसी भी एक को.?", अर्जुन ने ये तोह सोचा भी न था के सूट अपने आप आया कैसे.
"उन्हें पता है हमारे बारे में?", अर्जुन का एक हाथ दीदी के सुत्वा पेट पर फिर रहा था.
"मुझे जैसे पता है तुम्हारे बारे में.", कोमल दीदी ने प्यार से उसकी नाक के ऊपर नाक लगते हुए कहा. अर्जुन उनकी इस बात पर मुस्कुराते हुए वैसे हे होंठ चूम लिए.
"आपको कभी ऐसा नहीं लगा के हम bhai-behan है और ये सब गलत है, मर्यादा के बहार है?"
"कहने को मैंने कभी अपनी मर्ज़ी से घर की देहलीज तक नहीं लाँघि लेकिन मुझे हमेशा से हम तीनो ek-ansh नजर आये तोह फिर ये अंश आपस में मिलने से कोनसी मर्यादा भांग हो गई? प्यार है और कुछ नहीं. सबके सामने तोह मैं छह कर भी तेरे गले नहीं लग सकती.", अर्जुन के सीने से लगती कोमल का दिल खुद एक बलिदान की कहानी कह रहा था. समाज, परिवार, सोच और नैतिकता के झूठे आडम्बर की दिवार के पीछे दबा उनका दिल कोई स्पर्श नहीं करने वाला था.
"सच कहती है आप. वैसे आज आप ने जो भी मार्किट से ख़रीदा था सब दिखने का वडा किआ है.", अर्जुन इस गंभीरता को वापिस दोनों के इस अनमोल एकांत की तरफ मदद लिए.
"वादा? जहा तक मुझे याद है मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा था.", अपने मोतियों से दांत दिखती वह हंसती हुई उसकी गॉड से उठकर दूर होने लगी लेकिन उनकी एक कलाई पकडे हुए अर्जुन मुस्कुराते हुए उन्हें गर्दन से ना में हिलता जैसे वापिस खींच रहा था.
"चलो, मैंने कहा था. के जो भी लेंगे वह मैं खुद देखूंगा.", उसकी बाहों में गिरती वह अर्जुन के साथ हे बिस्टेर पर लेट गई. ऊपर झुका अर्जुन अपनी इस हसीं प्रेमिका की गर्दन पर अधीर होंठ रखता रेशम से पाँव ऊपर तक सेहला रहा था. कोमल दीदी को उसका ऐसा करना हे अर्जुन की तरफ और आसक्त करने लगा. खुद हे उन्होंने अपना हाथ ऊपर झूलती अर्जुन की टीशर्ट से अंदर करते हुए जैसे और तड़पना शुरू कर दिए.
"ओह्ह तोह अब ऐसे होगा.", अर्जुन के निप्पल नाख़ून से कुरदेति हुई कोमल मुस्कुरा रही थी. अर्जुन भी उनका दुपट्टा एक तरफ करता हुआ उनके बाल खोल कर बिस्टेर पर जैसे बिछाने लगा. शरीर में झुरझुरी हो रही थी दीदी के ऐसा करने से लेकिन वह इस प्यार को आगे बढ़ता जब उनके सीने से सत्ता तोह उनके गालो की लाली बता रही थी की वह खुद अर्जुन के लिए तैयार है. लाल कमीज के थोड़ा सा एक तरफ होते हे उनकी नाभि पर अर्जुन की उंगलिया कमाल दिखने लगी. रोयें खड़े होने लगे इस एहसास से, शरीर को यही स्पर्श तोह पसंद था. आँखे बंद किये वह सर को पीछे करने लगी और अर्जुन उनके ऊपर पूरी तरह झुकता उन मतवाले लबो को इस रात पहली बार जूनून से पीने लगा.
खुमार में दोनों हे आगे सरकते पूरी तरह बिस्टेर पर आ चुके थे लेकिन लैब अलग होना हे नहीं चाहते थे जैसे. यहाँ कोई कुछ नहीं सोच रहा था बस जहा हाथ जा रहे थे वही सहलाने लगते और अर्जुन को अपने नीचे दीदी के दबने का पता चलते हे वह ऊपर उठ गया.
"सॉरी दीदी. पता हे नहीं चला."
"वही मैं चाहती थी की तू मुझे मेरे नाम की तरह मत समझे.", मुस्कुराते हुए वह खुद अर्जुन को अपने ऊपर खींचने लगी लेकिन अर्जुन इस बार संभल कर उनके सीने से लग गया.
"मेरे साथ प्यार करते वक़्त कोई बंदिश मत लगा खुद पर. नहीं तोह हम रहने देते है.", कोमल दीदी की बात सुनते हे अर्जुन ने बिस्टेर से खड़े होते हुए उनके पाँव भी अपनी तरफ खींच लिए. गोल पिछवाड़े के निचे दोनों हाथ डालते हुए वह उन्हें लिए खड़ा हे हो गया.
"क्या कर रहा है ये?", दीदी बस बोल रही थी लेकिन रोक नहीं रही थी. उनके शरीर को दिवार से लगते हुए अर्जुन कमीज के ऊपर से हे उन मॉटे अनारो पर मुँह लगाने लगा. सलवार के पिछले हिस्से पर उनका नरम मांसल भाग अर्जुन के पंजो में डब्ब रहा था.
"आपको जैसा मिलान चाहिए मैं समझ गया हु. लेकिन उस से आगे मत जाने को कहना.", दीदी की महकती साँसे उसके चेहरे पर आ रही थी. दोनों हाथ सलवार के अंदर पीछे से डालते हुए अर्जुन इन चिकने तरबूज से कूल्हों को रबर जैसे दबाता उनके सीने और कस कर होंठ लगा रहा था. पहली बार दीदी की सिसकियाँ कान में सुनाई दी तोह उनके होंठ खोलते हुए अर्जुन वह गुलाबी जीभ मुँह में दबाते हुए पीने लगा. कोमल दीदी के भी हाथ अर्जुन के कपड़ो के अंदर से निर्वस्त्र कूल्हों पर नाख़ून के साथ गाड़ने लगे तोह उसको पता चला के कामुक समय में ऐसे दर्द में भी अलग हे मजा था.
होंठो अलग हुए तोह एक धागे की तरह लार दोनों के मुँह से जुडी खींचती चली गई चेहरे दूर होने पर. टूट कर जैसे हे वह कोमल की गोल ठुड्डी पर चिपकी वही अर्जुन ने जीभ से पूरा भाग चाट कर गीला कर दिए.
"साड़ी रात नहीं है, याद रखना.", दीदी ने कान में सरगोशी की और निचला हिस्सा दांतो में दबा लिए. उनकी इस हरकत ने जैसे कमर के सामने अपना असर दिखाया हो. लुंड ठुमकता हुआ उत्तेजना से अकड़ कर बहार निकल आया.
"लेकिन ये रात याद रहने वाली है, हम दोनों ko.",Arjun ने सलवार का नाडा शहीद करते हुए निचला भाग सलवार से विमुक्त कर दिए. बाहें अंदरूनी जोश से उभरने लगी और किसी गुड़िया की तरह उन्हें ऊपर उठता वह लटकती कुरी के नीचे मुँह घुसता हुआ लास वाली पतली पंतय के ऊपर से हे उनके महकते खजाने पर मुँह लगाए खड़ा हो गया.
इस दृश्य को कोई और देखता तोह यकीनन विश्वास नहीं होता के प्यार में ऐसा भी जूनून हो सकता है. कोमल बेपरवाह सी दिवार से लगी हवा में 6 फ़ीट ऊपर और उसको संभाले बलिष्ट अर्जुन जालीदार कपडे के ऊपर से हे पहले हुए हिस्से को मुँह में भरता चूसे जा रहा था. बाल खींचती हुई कोमल भी उत्तेजना के इस दौर में ऐसा मजा निडर होती उठा रही थी. कुर्ती फटने की हद्द तक टाइट हो चुकी थी उन्माद में और मॉटे हो रहे चुचो से. रास कपडे से निकल कर मुँह में आने लगा तोह अर्जुन भी पहले से तेज चूसै करने लगा उन चिकने छूट के होंठो की.
"आठ ाररू.. उम्मम्मम..", पसीने में नहाया अर्जुन का शरीर इस म्हणत से पूरा उभर चूका था. कोमल की मादक ाहो को कम् करते हुए उसने उन्हें नीचे उतार लिए. जमीन पर पाँव रखते हे हलकी कम्पन्न महसूस होने लगी. लेकिन नजरे उस पाजामे से बहार निकल कर नाड़े के दबाव से कुछ ज्यादा हे मॉटे हो चुके सुपडे पर गई तोह एक कुशल सपेरे की तरह कोमल दीदी ने उसका फानन नीचे से पकड़ लिए. दूसरा हाथ पाजामे को ढीला करता अब अर्जुन को नंगा कर चूका था.
अब आहें भरनी की बारी अर्जुन की थी जो दिवार पर दोनों हाथ रखे घुटने मौडे नीचे बैठी अपनी बड़ी बहिन को देख रहा था. उंगलिया लुंड के मूल पर कस्ती कोमल ने सूखे लाल सुपडे पर नीचे से ऊपर तक जीभ फिरते हुए अर्जुन की तरफ एक कामुक अदा से देखा और इस सबकी बेउम्मीदी लिए बैठा दिल जैसे अंदर तक हिल गया अपनी दीदी का ये रूप देख कर.
"आह्ह्ह्हह्ह.", गुलुप से पूरा लाल सूपड़ा उन नरम होंठो के अंदर उनके गरम गीले मुँह में भर गया. अर्जुन को ऐसे लग रहा था के वह गोल लिपटे होंठ गांड का सख्त छेड़ हो और आगे का गीला नरम हिस्सा दहकती छूट. इतना कसाव सेहन न करता लुंड खुद हे हिलने लगा. अर्जुन मदहोशी में कमर हिलता अपनी दीदी के मुँह को हे छोड़ने की जुगत में था लेकिन ये इतना आसान न था. 4 इंच लुंड आगे होते हे कोमल दीदी के दांतो की सख्ती ने उसको तड़पा कर रख दिए था. वह इस पल में कोई नाजुक लड़की बिलकुल नहीं थी जिसके हलक तक लुंड दाल दिए जाये और वह आंसू बहती रोने लगे. यहाँ अर्जुन उनका गुलाम हो चूका था. उतने हे संवेदनशील भाग पर सर आगे पीछे हिलती कोमल ने अर्जुन को इम्तिहान में लगभग फ़ैल कर दिए था. अंडकोष भरी होने लगे तोह उन्हें हलके से दबती कोमल ने अर्जुन के सखलन को वापिस भेज दिए.
"Kyaaa..karrr रही हो डीडीईई.. आह्हः.. मर्डर जाऊंगाआ.", हर बार ये शब्द सामने वाली लड़की कहती थी लेकिन आज अर्जुन के पाँव कांप रहे थे. अपने प्यार पर और जुल्म न करती कोमल दीदी ने वह भीगा सूपड़ा आजाद करने से पहले बड़े प्यार से चूमा और अर्जुन की छाती सहलाती हुई गर्दन पर मीठे चुम्बन करने लगी. अर्जुन जैसे ज़िन्दगी की सबसे भरी म्हणत करके लौटा, हाफ रहा था. अलग होते हुए कोमल दीदी ने अर्जुन की आँखों में आँखें डालते हुए वह कुर्ती बेहद धीमी गति से उतारते हुए शरीर के सामने किसी परदे की तरह कर ली. अर्जुन उनका ऐसा करना देख साड़ी थकान भूल कर कुर्ती झपटने के लिए आगे बढ़ा और सीधा कोमल दीदी के सीने से जा लगा. अब कुर्ती अर्जुन की पीठ पर कस्ती कोमल उसको साथ लिए हे पीठ के बल बिस्टेर पर आ गिरी.
"पहली बार मुझे प्यार हुआ और अगर प्यार में हसरत हे पूरी न हो तोह फिर कोई फायदा नहीं.", अर्जुन उन वक्षो को दबाये ऊपर लेता था और उसका गाल मुँह में भर्ती कोमल उसको हर बार दीवानगी में एक कदम ऊपर ले जा रही थी. वातस्यना की किताब से निकल कर जिवंत हो उठी इस कामदेवी का शरीर श्रेष्ट था जिसके सामने अर्जुन झुक चूका था. कमर पर अपनी टाँगे लपेट कर वह अपने सख्त उभार खुद हे अर्जुन के सीने से रगड़ रही थी, ब्रा के साथ.
"साड़ी हसरते पूरी करूँगा आपकी, ये नहीं कर सकता तोह आपसे प्यार का हक़ नहीं मुझे.", कंधे पर से दोनों लाल डोरियन निचे खिसकता अर्जुन उनका ऊपरी भाग निप्पल तक निर्वस्त्र कर चूका था. पहाड़ से वह सतांन जरा भी ढीलापन न लिए थे. समूची गोलाई और कसावट का फरक हे उन्हें माधुरी दीदी के जिस्म से 21 बनता था, लेकिन आज उन्होंने ये भी साबित कर दिए था के प्रेम में इंद्रधनुष से रंग भरने के लिए अपशब्द से ज्यादा एक दूसरे पर अँधा विश्वास और अछूते कपाट खोलने पड़ते है. अर्जुन सरक कर उन बुरी तरह अकड़े गुलाबी निप्पल पर आया तोह गोल घेरे पर जीभ घूमते हुए जैसे वह उनको तराश रहा था. होंठो में कस्ते हे वही मादक सिसकारी और कच्ची के साथ हे अपनी गीली छूट अर्जुन के सुपडे पर रागादि वह आनंद से अभिभूत होने लगी.
"ऐसे हे.. आठ.. अर्जुनंन.. ", गुलाबी घेरे के साथ पूरा हिस्सा मुँह में भरते हुए अर्जुन उन्हें चूसता हुए लुंड का दबाव भी दीदी की छूट पर बनाते हुए घिस रहा था. कोमल के उभार थे भी संवेदनशील, अपनी माँ की तरह. उन बड़े गोलों को दबाते हुए पीटा अर्जुन जैसे उनसे दूध की उम्मीद लगाए लगा हुआ था. लार में ाचे से दोनों को टर्र करता वह ऊपर उठा तोह चुचो के नीचे फांसी लाल ब्रा किसी उपहार पर बंधे रिबन सी दिख रही थी. गुलाबी फूले हुए दोनों चूचक भाले सी नोक सामान खड़े चाट को घूर रहे थे.
"नदी पर बांध बनाने का काम शुरू करते है.", मुस्कुराता हुआ वह जैसे नै ऊर्जा से भर उठा था. कोमल दीदी के दोनों चिकने पत् जोड़ते हुए वह छूट के सामने से भीगी लाल कच्ची खींच कर अलग करते हुए अर्जुन उनके गोल घुटनो से चुम्बन छापता हुआ नरम उभरी हुई गुलाबी छूट के सामने आ रुका. छोटी बुँदे बंद गुलाब की चोंच पर उबरी देख पूरी जीभ गुदाद्वार से कुछ पहले तक आई लकीर पर फिरता वह इस चोंच पर रगड़ता ऊपर तक ले आया. और छूट को थोड़ा फैलते हुए उस गुलाबी नोक को होंठो में भर लिए.
"आअह्ह्ह्ह.. सीई.", दोनों मुट्ठियों में बिस्टेर पर बिछी चादर दबोचती कोमल दीदी खुद हे कूल्हे ऊपर उठती अपनी गुलाबी काली को अर्जुन के मुँह में भरने लगी. कॉमर्स चाशनी सा पूरे मुँह में घुलता अर्जुन को और उकसा रहा था. होंठो के बीच जीभ की पेनी नोक निकल कर उन अंदर की फांको पर दबाव बनती डांक मारने लगी. हर कटरा कुरेद कर पीटा हुआ वह भूखा भंवरा इस फूल को खाली करने लगा था. जब ऊपर उठा तोह होठ शहद में भीगे चमक रहे थे. बिना घृणा के कोमल दीदी ने अपने हे कुमुद का रास उसके होंठो को चूमते हुए चख लिए. भीगी थोड़ी पर जीभ फिरती हुई वह निर्वस्त्र काया के साथ अर्जुन के ऊपर आती चली गई. दृश्य उलट चूका था. पीठ के बल बिस्टेर पर पड़ा वह अपने दोनों तरफ पाँव रखे नीचे आती कोमल दीदी एक हर अंग को निहार रहा था.
खुले बिखरे बाल, लाल भभकता मादक चेहरा, थिरकते हिलते दोनों दिव्या कलश और चिकने पत्तो के बीच वह गीली दरार, ये दृश्य इतना भी धीमा नहीं था जितना वह अपने जेहन में भर चूका था और पसरी टांगो के बीच 150 के कोण पर खड़ा वह हिलता kaam-dand पीछे हाथ करके पकड़ती कोमल दीदी ने अपने कूल्हों की गहरी दरार में लंबवत फँसत हुए दोनों फांको में कस लिए. छूट से रगड़ मरता लुंड फैंको के बीच पूरे दबाव से जकड़ा चल रहा था.
ऐसा तोह अलका दीदी भी न कर सकती थी, जिनके कूल्हों में अध्भुत लचक थी. कोमल दीदी ने उसके जेहन से आज सभी नाम मिटा दिए थे. हर बार वह सुपडे को ठीक गुदाद्वार के पास और अधिक कस लेती और फिर छूट की चिनहट से गीला वह मूल निरंतर फांको में फिरती हुई वह अर्जुन के साथ वैसा हे कर रही थी जैसे अर्जुन उनकी छूट चूसते हुए कर रहा था.
"आराम से दीदी.. आठ.. थोड़ा धीरे.. आह्हः..", मजे की अधिकता में जब भी वह गुदाद्वार के पास आता तोह उसमे ठेलने की नाकाम कोशिश करने लगता. अपनी जकड से उसका लुंड आजाद करती कोमल दीदी सीढ़ी लेती कर अर्जुन की छाती पर लाल निशाँ बनती हुई पसीने को भी चूम रही थी. नमी तोह उनके भी पूरे शरीर पर चाय थी इतनी मादकता और गर्मी से.
"आ जाओ, मैं तैयार हु.", अर्जुन की आँखों में देखती कोमल दीदी की ये बात सुनते हे अर्जुन की चेतना वापिस लौट आई. वह अभी तक बस kaam-jwar में तप्त हुआ उनकी गिरफ्त में क़ैद था.
"क्रीम?", अर्जुन ने फांको के बीच अंगूठा फिरते हुए उनको सही आसान में किआ और अतिरिक्त चिकनाहट के लिए पूछने लगा.
"वह आखिर में.", कोमल दीदी के इस जवाब के साथ बानी मुस्कान को समझते हुए अर्जुन ने बड़े प्यार से उस तंग दरवाजे की दरार को चूमा और दोनों जंघे फैलते हुए उनके बीच में सूपड़ा घिसने लगा. लुंड की नस्से ऐसे फूल चुकी थी जैसे शरीर का रक्त बस दिल साफ़ होता सिर्फ इधर आ रहा हो. नीचे हो कर वह उनका मुँह बंद करना चाहता था लेकिन आगे खिसक कर दीदी ने ना में गर्दन हिला दी.
"उम्.. ाः.", सूपड़ा फसते हुए हे दोनों के पेशानी पर पसीने की तजा बूंदा उभर आई. जैसे लुंड औकात से 15 प्रतिशत ज्यादा मोटा हो गया हो, शायद कसाव से हुआ भी हो. गीली छूट में ढाई इंच का गरम सूपड़ा जज्ब किये कोमल हौले हौले अर्जुन की छाती सेहला रही थी.
"दाल दे अर्जुन. देखा जायेगा.", जी मजबूत करती कोमल अपने छोटे भाई का प्यार उसके साथ मिलने वाले दर्द को पा कर हे करना चाहती थी. अर्जुन ने बुरी तरह फसे सुपडे को जैसे तैसे पीछे किआ और अपनी कमर का भरपूर जोर लगते हुए जैसे छूट की अंदर की दिवार खुरच दी.
"Aahhhhhh..hhh.. हिक्क.. आह्ह्हम्म्म्म", गले से कराह के साथ हिचकी भी निकल गई दीदी के और अर्जुन जबड़े भींचे खुद को संभल रहा था. लुंड बस 2 इंच बहार था और अब वह ये दर्द ख़तम करने की कोशिश में लगा निचे झुक कर उन गोल चुचो को पीने लगा. कमर पर दीदी की टाँगे लिपटी हुई कमजोर तोह पड़ी लेकिन निचे न हुई. अर्जुन दोनों उभारो को रगड़ कर उन्हें गर्मी देता हुआ निप्पल बुरी तरह चूसने लगा. छूट में हलकी सनसनाहट ने बता दिए था के कोमल संभल चुकी है लेकिन जब अर्जुन न हिला तोह खुद हे कोमल दीदी ने टंगे और ढीली करते हुए कमर निचे करनी शुरू की और अर्जुन कुछ समझता उस से पहले वह समूचा लुंड अंदर लेती दोनों के शरीर मिला चुकी थी.
"माँ.. अर्जुन तू पूरा समां गया.. aahh..Ab तेरी बारी.", दर्द और जूनून से भरी कोमल को देख अर्जुन ने एक झटके में हे आधा लुंड बहार निकल कर फिर से अंतिम चोरर तक पंहुचा दिए. गद्देदार कूल्हों के बीच अगले 20 धक्को तक उसके अंडकोष जोर से टकराते और दीदी की हलकी कराह या चीख उसके कानो में पड़ती रही. जल्दी हे दर्द सा लाल समां नीले रंग में भरने लगा.
"बस यही सफर तोह चाहती थी मैं.. आह्हः.. ऐसे हे अर्जुन ाःह.. उम्म्म्म", कमर उसकी ताल से मिलती वह अपने बड़े चुत्तड़ जोर से ऊपर धकेल कर अर्जुन से ये सम्भोग युद्ध लड़ रही थी. कॉमर्स की बुँदे छूट के अंदर चुहाने लगी तोह सिसकिया दोनों की फूटने लगी. मजे की ऐसी अधिकता अर्जुन ने कभी सोची तक न थी जो आज वह साक्षात् महसूस कर रहा था.
"इस सफर में मैं अंत तक आपके साथ rahunga...aahh.. दीदी.. आज कुछ हो रहा है मुझे.", वह बेकाबू होता उनकी टाँगे पूरी चौडाता हुआ हर बार छूट के मुँह पर प्रहार और गहरा करने लगा. साँसे चढ़ने लगी लेकिन वह जैसे रुकना नहीं चाहता था.
"उम्म्म.. नीचे आ.", दीदी की बात का असर इस गति में भी उसपर अगले हे पल हो गया. दोनों उभर छाती पर घिसती वह आगे पीछे हो रही थी लुंड पर उछलने की जगह. रास बहती छूट मॉटे लुंड पर प्यार से थिरकती हुई अर्जुन के आनंद को पहले से दुगना करने लगी.
"दीदी.. आठ.. क्या कर रही हो.. आअह्ह्ह.. ऐसे हे दबा कर रगड़ो.", चुचो के तीखे निप्पल चाकू की धार से अर्जुन की छाती पर आगे पीछे चलते हुए उत्तेजना के चरम पर ले जाने लगे. और मोटी फैंको के बीच फिसलता लुंड इस जन्नत से बहार आना हे नहीं चाहता था. कोमल का दूसरा स्खलन किसी पानी की तेज धार सा छूट और लुंड को भिगोने लगा.
"हूऊऊह्ह्हह्ह.. मा.. खड़ा हो अब. तेरी बारी.", दीदी हार न मानती लुंड से उठी तोह ये गाढ़ी धार पूरी तरह लुंड पर गिरती उसके अंडकोष भी गीले करते चली गई. अर्जुन पहली बार कोमल दीदी को घुटनो के बल गांड बहार उभरे देख रहा था. बीच का वह लाल चीरा अभी भी चिकनाई टपकता उसके इन्तजार में फड़क रहा था.
"आह दीदी. क्या नशा कर रही हो. न झड़ने दे रही हो न रुकने.", अर्जुन ने दोनों झुके हुए चुके बेदर्दी से पकड़ कर दबाते हुए जड़ तक लुंड घुसा दिए.
"और तेज दबा इन्हे अर्जुन.. आह.. माँ.. ऐसे हे .. रुकना मत अब.", किसी इंजन सा धक्के लगता अर्जुन अब रुकने वाला भी नहीं था. दिल की धड़कन और लुंड की रफ़्तार दोनों हौद में लगे थे. उनके पिछवाड़े से चिपका वह घुटने टिकाये पूरा लुंड गहराई तक अंदर बहार करने लगा
"Patt-patt" की आवाज दोनों के शरीर के भिड़ने से इस पल को जहा जगाये रखे थी वही छूट रास की अधिकता और खली जगह को भरते लुंड से निकलती fach-fach की आवाज दोनों को एक दूसरे से ज्यादा चिपका रही थी.
"मैं होने लगा हु दीदी. आह्हः.", अर्जुन लुंड बहार निकाल पता उस से पहले हे छूट ने वह सूपड़ा अंदर दबा लिए. कंपता हुआ शरीर पिचकारी के बाद पिचकारी छोड़ता पूरी छूट को हे जैसे गाढ़े तरल से भरने लगा. ज़िन्दगी में पहली बार अर्जुन इतना झाड़ा था और इतनी देर तक. आखिरी कटरा तक लुंड से पीने के बाद छूट ने उसको अपनी गिरफ्त से आजाद किआ तोह धम्म की आवाज से अर्जुन मुँह के बल एक तरफ गिर गया.
टाइट छूट मुँह खोले फ़ैल चुकी थी. अंदर की गहरी लाली के बीच से टपकता वह सफ़ेद रास लम्बी धार सा बिस्टेर पर गिरता रहा. कोमल इस मादक मुद्रा में कड़ी छूट के अंदर से सारा रास बहार निकल कर हे अर्जुन की तरफ लुढ़की. निप्पल सूज चुके थे और गोर तन्न पर हर तरफ उँगलियों, दांतो और दबाव के निशाँ इस मिलान की पूरी दास्ताँ बयान कर रहे थे. अर्जुन जैसे होश में हे नहीं था. लड़खड़ाती हुई कोमल जैसे तैसे टोलिया लपेटे बाथरूम से खुद को साफ़ करके आई और नंगी हे अर्जुन की पीठ पर लेट गई. अर्जुन श्रेष्ट नहीं था, उसने दिल से मान लिए था. उस मखमली नरम शरीर से हार कर भी वह खुश था जो पूर्ण अधिकार से उसके ऊपर था.
श्रेष्ठ- जयेष्ठ
ये एक ाचे स्तर का होटल था जहा आज संधू जी ने अपनी बेटी पारुल सिंह की सगाई का कार्यक्रम रखा था विकास पुनिअ के साथ, जो कभी उनका हे शिष्य था और आज एक नामी पहलवान के रूप में खुद को स्थापित कर चूका था. कार्यक्रम में सिर्फ निजी लोगो को हे न्योता दिए गया था जिनमे संधू जी के स्टेडियम से हे 4 अफसर और कोच शामिल थे. उनकी छोटे भाई और परिवार, संधू जी की धर्मपत्नी जी की बहिन, पारुल और चारुल सिंह की कुछ खास सहेलियों के साथ बस विकास की तरफ से गिने चुने परिवार के लोग. 7 बजे हे पहली मंजिल के हॉल में लोग पहुंचने लगे थे और इस जगह को आकर्षक रूप से संवारा गया था. 8-9 गोल मेज सफ़ेद कपडे से ढकी थी जिनपर बीच में गुलदस्ता और कांच के गिलास पानी से भरे धक् कर रखे गए थे. एक तरफ सुनेहर लाल सिंहासन रुपी कुर्सियां लगाईं गई थी जो लड़का और लड़की के लिए थी. ाची रौशनी की व्यवस्था के साथ हे हॉल के एक भाग में खाने के स्टाल लगे थे जहा अभी काम शुरू हो रहा था.
बेटी की सगाई थी तोह यहाँ संधू परिवार सबसे पहले हे पहुंच गया था और तैयारी का जायजा लेने के साथ हे आ रहे मेहमानो का स्वागत भी किआ जा रहा था. होटल के बहार हे कांच पर सगाई सन्देश का बोर्ड और स्थान लिखा हुआ था जिस से मेहमानो को परेशानी न हो. सही समय पर हे विकास भी कार से होटल के सामने की पार्किंग आ पंहुचा और अपनी माता जी के साथ behan-jija को लेकर अंदर चल दिए. गेट से हे शमत संधू और स. संधू जी ने उनसे गले लगते हुए स्वागत किआ और अपने साथ हे ले चले.
"क्या बात है जी, आज चेहरे पर मुस्कान भी है और coat-pant में भी हो.", चारुल ने विकास से हाथ मिलते हे साली स्वाभाव का मजार शुरू कर दिए. उनकी माता जी को प्रणाम करने के बाद अपने साथ विकास की बहिन को सबसे आगे की गोल मेज की तरफ लिए चारुल ने उन्हें वह नरम कुर्सी बैठने के लिए बैठ की. दोनों हे परिवारों का परिचय घर के बाकी सदस्यों और मेहमानो से करवाते हुए संधू जी ने मैनेजर को बोल कर coffe-thande के साथ हे हलके khan-paan शुरू करने का आदेश दिए. अभी तक पारुल नहीं आई थी इस जगह पर, जो होटल के हे एक कमरे में तैयार हो रही थी.
"तुम चलो जरा पहले ऊपर और मैं 2 मिनट तक आता हु. साथ में देखते हे कोई मुसीबत न गले पड़ जाये.", अर्जुन भी 7:20 के समय पर होटल की पार्किंग पर आ खड़ा हुआ था. कपडे जैसे फिर से इस्त्री किये थे और ताजगी बता रही थी के जैसे फिर से नाहा कर आया हो.
"अब मैं हे गले पड़ी हु. इसको मुसीबत समझो या प्यार. और साथ चलेंगे तोह साथ चलेंगे.", Laal-kaale रंग की इस पारदर्शी साड़ी में जैसे अन्नू हर दिल पर जुल्म हे करने वाली थी. खुल्ले बाल और सामने माथे पर लगी गोल लाल बिंदी, भरे होंठो पर उनके हे रंग की लाली और ऊपर से नीचे क़यामत धा थी ये अप्सरा अर्जुन को साथ हे ले जाने पर अदि उसको देख रही थी.
"अब तुम्हे साथ हे चलना है तोह चलो. मैं किसी की बात का कोई जवाब नहीं देने वाला.", अर्जुन ने दोनों हाथ सामने जोड़ते हुए फिर एक तरफ कोने में मोटरसाइकिल लगाया और सधी हुई चाल से अन्नू को साथ लिए अंदर चल दिए.
"हाथ पकड़ लू?", अन्नू ने शरारत से कहा. उसको मजा आ रहा था अर्जुन को छेड़ने में. दोनों हे रिसेप्शन के आगे बानी चमकती सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगे तोह मंज़िल से पहले हे घुमाव लेती सीढ़ी पर अर्जुन ने अपने दाए हाथ में अन्नू का बया नाजुक हाथ थम लिए. ऊपर चढ़ती वह दये हाथ की कलाई में पर्स लिए उस हाथ से साड़ी को पकडे थी लेकिन जैसे हे अर्जुन ने हाथ पकड़ा अन्नू ृक्क कर उसका हे चेहरा देखने लगी.
"अन्नू, तू अब आ रही है?", ये आवाज सुनते हे दोनों ने ऊपर की तरफ से आती इस खूबसूरत बाला को देखा तोह अर्जुन हैरान हो गया.
"मिस आपकी भी आज हे इंगेजमेंट है आपकी सिस्टर के साथ हे?", गुलाबी लेहंगा चोली और सलीके से बंधे बालो में चारुल के दुल्हन रुपी गुडिअ सी दिख रही थी अर्जुन को. उसकी बात सुनते हे वह चमकती आँखों से अर्जुन को देखने लगी.
"अब तुम कोण हो यार? और मैं चारुल नहीं हु, पारुल हु. सगाई भी मेरी हे है उसकी नहीं.", एक अजीब तरह से मुस्कुराते हुए पारुल ने इशारे से अन्नू से जैसे कुछ पुछा.
"अर्जुन, फ्रेंड है और निगहबॉर भी. आल्सो इन्वितेद.", इतना हे मुँह से निकल पाया अन्नू के और अर्जुन हाथ जोड़ कर पारुल को शुभकामनाये देता उन दोनों को वही छोड़ आगे बढ़ गया.
"पागल समझा है क्या मुझे? जैसे वह हाथ पकडे था उस से साफ़ पता चलता है के तुम दोनों में दोस्ती से तोह ज्यादा हे है. चल आजा अब ये बात आगे तू हे बताएगी. मेरी सगाई में मैं हे देरी से जा रही हु.", अन्नू थोड़ा झेंपते हुए पारुल के साथ हे अंदर चल दी.
"माँ, ये है अपने शंकर जी का बीटा और मेरा छोटा भाई. अर्जुन ये मेरी माता जी है.", विकास की तरह उनकी माता जी भी एक लम्बे कद तगड़ी महिला था, लगभग 50 के आसपास. अर्जुन के बारे में जानते हे उन्होंने उसका माथा स्नेह से चूमते हुए गले लगा लिए, पाँव छूने से रोकते हुए.
"अरे बीटा ये न जितनी बार घर आता है तेरा जीकर जरूर करता है. और सच कहु तोह देख के बड़ी ख़ुशी हुई की विकास ने गलत नहीं बताया था. लाखों में एक है बीटा तू.", अर्जुन ने भी उन्हें प्यार से वैसे हे अपने से लगाया जैसे वह अपनी माँ रेखा जी से मिलता था.
"आप हो प्यारी तोह आपको सभी ाचे हे लगेंगे आंटी जी. वैसे आपसे मिलते हे पता चल गया के भैया हर हफ्ते हे गाँव क्यों जाते है. उनके लिए आप हे सबकुछ हो.", अर्जुन की बात पर मुस्कुराते हुए उन्होंने सर पर हाथ फेरा और कुछ पल निहारने लगी.
"आंटी जी, ये दादी ने दिए है. मैं नहीं लेके आया, पहले हे बता देता हु. उनोहने कहा था के अपनी आंटी से मिलेगा तोह उन्हें कह देना के थानेदारनी ने प्यार से दिए है.", वह पैकेट मेज से उठा कर अर्जुन ने एक सांस में हे पूरी कहानी सुना दी. विकास की माता जी कभी उसको देख रही थी और कभी विकास को.
"देख छोटे यहाँ तू मेरी सगाई में आया है. मेरे लिए कुछ लेन की जगह तू माँ के लिए ले आया?", विकास ने वैसे हे अर्जुन से कहा जैसे छेड़ रहा हो.
"मैं छोटा हु तोह मैं कुछ कैसे दू. हाँ जो दादी ने दिए वह ले आया.", विकास ने उसकी बात पर हँसते हुए गले लगा लिए.
"रख ले माँ, ये सिर्फ दे रहा है. भिजवाया तोह घर के बड़ो ने है.", विकास की माता जी ने भी आशीर्वाद देते हुए वह तोहफा ले लिए.
"भाई तू छोटा कहा से है? मेरे सेल से 2 उंगल ऊपर हो रखा है और छोटा बतावे है.", ये thik-thak deal-dol वाले 30 के लगभग के व्यक्ति चलते हुए अर्जुन और विकास के पास आ खड़े हुए. हाथ में काळा सोडा का गिलास था.
"अर्जुन ये मेरे जीजा जी श बीरभान जी और जीजा जी ये अर्जुन, डॉक्टर साहब के बीटा और स्टेडियम में बॉक्सिंग का खिलाडी है.", अर्जुन उनके बड़े रिश्ते को देखता पाँव पर हाथ लगाने लगा तोह उन्होंने कलाई पकड़ ली.
"पंडत ते हाथ नहीं लवंडे रे मानस. देख के कालजा खुश हो गया भाई के तेरे जिसे बालक ेब भी होव है. कुरता पजामा मांड वाला, धर्मेंदर तेह भी तगड़ा गाठ भी विकास मान न मान चोर्रा यु तेरे तेह भी फालतू है.", उनकी कड़ी हरयाणवी सुनकर अर्जुन भी मुस्कुराने लगा.
"जीजा मैं तोह कहु था के आप मिलो तोह सही इस से. जड़ यु मेरे टी बचा सके है वह भी आपने ते बड़े और तगड़े पहलवान तेह फेर कोई बात होवेगी.", विकास ने जैसे हे ये जिक्र किआ तोह एक बार फिर उसकी माता जी ने अर्जुन का सर पूछकर दिए.
"शर्मा जी सही बात है. आप छोटे हो उम्र में लेकिन महारे परिवार पे बड़ा एहसान कर दिए.", उनकी बात बीच में काट कर अर्जुन विकास के जीजा के भी गले लग गया.
"जीजा, विकास भैया मेरे लिए इस से भी कही कर सकते है. मैंने कुछ भी नहीं किआ ये तोह. और यहाँ हमारी बातें नहीं करनी, उधर सभी लोग हमको देख रहे है के लड़के को रोके क्यों खड़े है हम.", अर्जुन के ऐसे धीमी आवाज में कहने से बीरभान जी ने हँसते हुए उसकी पीठ जोर से थपथपाई और फिर विकास के साथ परिवार को लेकर सामने संधू परिवार की तरफ चल दिए.
फोटोग्राफर कुछ देर तस्वीरें लेता रहा दोनों परिवारों की और अर्जुन मौका देख वह से खिसकता हुआ बलबीर के पास आ बैठा जो पीछे की एक मेज पर बैठा तंदूरी पनीर के साथ कोला जातक रहा था, अकेला बैठा.
"क्या बलबीर भाई, अकेले अकेले लगे पड़े हो"
"छोटे भाई, उसकी सगाई है वह लड़की के साथ खुश, बाकी सभी बातों से और मैं यहाँ के पनीर से. खा के देख गज़ब बना है.", कपडे से मुँह साफ़ करता बलबीर अर्जुन की तरफ खली प्लेट करते हुए बोलै.
"शर्म करो. खली है ये."
"तभी तोह कहा के इसमें भी दाल और अपने लिए भी ले आ. मैं जरा यहाँ आखें सेक लू. देख कैसे बिजलिया गिरा रही है वह तीनो.", बलबीर बैठा हुआ अन्नू, चारुल और उनके साथ हे कड़ी एक खूबसूरत सी लड़की की तरफ आँखों के इशारे से अर्जुन देखने का कहने लगा. वह भी मुस्कुराता हुआ सामने से आ रहे वेटर को उनकी प्लेट में पनीर रखने का बोल कर हंसने लगा.
"अबे हंस क्यों रहा है?"
"भाई एक तोह कोच साहब की बेटी है, दूसरी जो laal-kali साड़ी में है वह पत्नी नहीं वाली और तीसरी इधर देख नै रही.", बलबीर हलकी नाराजगी से देखने लगा उसको.
"क्यों नहीं पत्नी वाली? अब तोह वह देख भी रही है.", बलबीर ने अर्जुन को बताया तोह अर्जुन ने अपनी तरफ आती तीनो लड़कीओ को देखा.
"लो आ हे गई आपसे बात करने तीनो.", अर्जुन ने इतना कहा तोह बलबीर की सिट्टीपिट्टी गम हो गई.
"मर्डर गए भाई."
"Hello अर्जुन, थैंक यू सो मच फॉर किंग. ये मेरी कजिन है सिम्मी, लुधिअना से और सिम्मी ये अर्जुन है पापा के फ्रेंड के बेटे और उनके फवौरीते स्टूडेंट भी.", अर्जुन ने बड़े अदब से खड़े होते हुए हाथ जोड़े.
"क्या यार हैंडसम और हमउम्र हो. हाथ मिलाने की जगह जोड़ रहे हो.", सिम्मी के ऐसे खुले अंदाज और सामने बढे हुए खूबसूरत हाथ को देख अर्जुन ने भी मुस्कुराते हुए हाथ थाम लिए.
"प्लेअसुरे मीटिंग यू सिम्मी."
"अन्नू तुम भी यहाँ सिम्मी को कंपनी दो मैं जगह पारुल से मिल कर आई. शायद ड्रेस ठीक करनी है उसकी.", चारुल मुस्कुराती हुई अर्जुन को देख कर उन दोनों को वही रुकने का बोलती चली गई.
"तोह मिस्टर अर्जुन करते क्या हो आप?", यहाँ बलबीर जैसे बैठे हुए भी नहीं था. वह चुपचाप बातें सुनता अपनी पसंद का काम करने लगा, खाने.
"जी कुछ नहीं करता हु. पढाई और थोड़ा बहोत sports.",Arjun को ऐसे सिम्मी से बात करते देख अन्नू की धड़कन बदल रही थी.
"वाओ. मतलब तुम फ्री भी रहते होंगे अगर ज्यादा कुछ नै करते. यहाँ पारुल दीदी तोह बहार निकलती नहीं और चारुल को स्कूल से फुर्सत नहीं. अपना शहर हे घुमा दो यार. लुधिअना आओगे तोह मैं तुम्हे वह घुमा दूंगी."
"जी बिलकुल. लेकिन मेरे ख़याल से सैटरडे संडे ठीक रहेगा.", अर्जुन की बात सुनते हे अन्नू ने नीचे से हे उसको पाँव मारा और घूर कर देखने लगी.
"अरे जब तुम्हारे पास टाइम हो. मैं अभी दीदी से घर का नंबर लेके देती हु. बोर होने से ाचा है के घूम भी ले और शॉपिंग भी. क्या ख़याल है अन्नू?"
"यार तुझे पता हे है, स्कूल एंड आल.", अन्नू के स्वर में नाराजगी थी अर्जुन के प्रति.
"टेंशन मत लीजिये अन्नू जी भी साथ चल पड़ेंगी. मैं शॉपिंग के बारे में ज्यादा नहीं जनता.", अर्जुन ने नीचे से हे अन्नू का हाथ थाम कर सेहला दिए. अब नाराजगी की जगह मुस्कान और शर्म ने ले ली थी.
"मैं मैनेज करती हु कुछ.", अन्नू ने इतना कहा तोह सिम्मी ने ध्यान से उसके चेहरे को देखा.
"वाह भाई. तुमने कहा और मैडम एक बार में हे मान गई. ाची बात है. चल अन्नू उधर अंगूठी पहनाने वाले है. अर्जुन से बातें करेंगे साथ डिनर करते हुए. इनके फ्रेंड को भी डिस्टर्ब कर दिए हमने.", बलबीर को जैसे वह जाते हुए चिड़ा हे गई थी.
"छोटे तेरे लुंड पर टिल तोह नहीं?", बलबीर ने बिलकुल कान के पास ये कहा.
"हाँ, हैं तोह भैया. लेकिन उस से क्या?"
"साली साड़ी वही चढ़ेंगी क्योंकि मेरे तोह है नहीं. बहोत तेज है तू भी भाई. स्टेडियम में 2-2, यहाँ एक का तू हाथ पकडे था और दूसरी सामनसे से खुद गिर रही तेरे पर. डर है कही गुरूजी की दूसरी वाली भी न आ गिरे तेरे पर."
"अर्जुन, विकास बुला रहा है तुम्हे.", अर्जुन ने चारुल को देखा तोह उठ खड़ा हुआ.
"बलबीर भाई."
"भाई तू जा. मैं मेरे दिल को पनीर से मन लूंगा." बलबीर ने उसको अकेले हे जाने को कहा तोह अर्जुन जानता था के वह शर्मीला है इसलिए अकेले हे चारुल के पीछे चल दिए.
"भाई, ये तोह इस तरफ नई खड़ा होगा?", संधू जी ने हँसते हुए विकास से कहा जब उन्होंने उसको अर्जुन का हाथ पकड़ कर अपनी कुर्सी के हाथे पर बैठने को कहा.
"स्टेडियम में बिठा लेना पापा.", विकास ने उन्हें आज सीधा पापा कहा तोह वह भी मुस्कुरा दिए. अर्जुन इन सबकी ख़ुशी में खुश था.
अर्जुन के जैसे हे पारुल की कुर्सी पर चारुल बैठी थी और फोटो होने के बाद वह उठ गई तोह अब सिम्मी ने उधर बैठ गई. अर्जुन खड़े होने लगा तोह विकास ने बैठे हे रहने को कहा. तीसरी फोटो में अन्नू को जबरदस्ती चारुल ने बिठा दिए और अर्जुन ने जैसे उधर नजर अन्नू की तरफ की तोह फोटो हो गई.
"भाई साहब इधर कैमरा की तरफ देखिये उनकी तरफ नहीं. फिर से लेना पड़ेगा फोटो.", अर्जुन और अन्नू के चेहरे लाल हो गए उसकी बात पर और पारुल की आवाज सुनते हे विकास के कान खड़े हो गए.
"देख ले अन्नू, सगाई हमारी हो रही है लेकिन प्यार तुम दोनों दिखा रहे हो. वह बैठा भी वह तुझे देख रहा है.", अन्नू शर्मा गई और इधर विकास ने अर्जुन की कमर में हाथ डालते हुए उसके कान में कहा.
"अबे चक्कर क्या है तेरा? कितनी घुमा रहा है? यहाँ भी तू शायद इसके हे साथ आया है और ये इनकी सहली है. परसो बात करूँगा तुझसे.", विकास की बात सुनकर अर्जुन बस मुस्कुराता रहा और इस तस्वीर में चारो के चेहरे खुश थे.
"एकदम बढ़िया तस्वीर आई है जी. नेचुरल स्माइल के साथ.", अर्जुन और अन्नू वह से उठे हे थे की पारुल ने चारुल के कान में कुछ कहा और चारुल थोड़ा हैरानी से अन्नू और अर्जुन को देखने लगी. अन्नू वह से हट कर अब मरस संधू के पास आ कड़ी हुई और अर्जुन वही बलबीर की तरफ चलने लगा.
कुछ देर बाद हे दोनों लड़का लड़की ने अँगूठिया बदली तोह सितारों से भरा बड़ा गुब्बारा फोड़ते हुए इसकी ख़ुशी जाहिर की गई. सभी उन्हें बधाई दे रहे थे साथ हे सगुन और तोहफे भी. अर्जुन और बलबीर ने साथ हे उन दोनों को शगुन भेंट किआ और पारुल ने अर्जुन के हाथ से खुद हे शगुन पकड़ लिए.
"भाभी हु तेरी तोह ये हक़ मेरा है.", पारुल की ऐसी बात और हरकत देख अर्जुन दोनों को देखने लगा.
"हाँ भाई, लगता है मेरे भी दिन बदलने वाले है.", एक ठंडी सांस भरता विकास बेचारगी से अर्जुन और पारुल को देखने लगा.
"भैया ाची बात है. म्हणत घर के मर्द की और लक्समी घर की मालकिन की. ये मंत्र समझ लो कभी परेशानी नहीं आने वाली.", अर्जुन की बात पर विकास हँसते हुए दोहरा हो गया और अर्जुन के हाथ पर हाथ मरती पारुल की भी हंसी चूत गई थी. बच्चों को ऐसे खुश देख संधू जी ने भी अपनी धर्मपत्नी और बेटी के कंधो पर हाथ रखते हुए उन्हें ये दृश्य दिखाया. इस खास पल को फोटोग्राफर क़ैद करने से नहीं चूका.
"सरदारनी जी, ये लड़का है अपने शंकर जी का अर्जुन. पंडित जी सही कहते है के ये जहा जाता है खुशिया ला देता है. देख लो इन बच्चों को, ऐसी चमक और हंसी पहले नहीं देखि मैंने इनके चेहरों पर.", संधू जी की बात पर उनकी बेटी गले में हाथ डालती उनके साथ कड़ी अर्जुन को देखने लगी थी.
"वाहेगुरु सबको खुश रखे. सच कहा दार जी आपने. लड़के पर हे सबकी नजर है जी और कितना साफ़ रब्ब का बाँदा है जी. खुश भी है और खुशाली भी ला रहा है."
"मेहमानो को roti-shoti भी पूछो जी. इनके चक्कर में कही वह न रस जाये.", संधू जी के साथ उनकी पत्नी भी बाकि लोगो से मिलने और ratri-bhoj का कहने चल दिए.
"सही कहते हो पापा जी आप भी. लेकिन इसका दिल कुछ समंदर सा है जिसको पढ़ पाना मुश्किल है.", चारुल ये बुदबुदाती हुई मुस्कुरा रही थी.
"अकेली मुस्कुरा रही है कड़ी कड़ी. चल यार खाना खाते है फिर जाना भी है." अन्नू ने उसकी तन्द्रा भांग करते हुए कहा तोह वह गौर से अन्नू को देखने लगी.
"ये सिर्फ पडोसी हे है न तेरा? सच बोलिओ अन्नू की बची, तू बचपन से मेरी दोस्त है.", चारुल उसका हाथ पकड़ती दिवार के पास ले गई.
"जज मत करना यार. लेकिन सच ये है के मैं उस से प्यार करती हु.", अन्नू ने बड़ी गंभीरता से कहा.
"और वह?"
"वह कहता है के वह मुझे कभी दुखी नहीं होने देगा और जबतक उसके साथ हु वह मेरा ख्याल रखेगा. स्कूल से बहार. बाकी तुझे भी पता है के एक दिन जैसे पारुल है वैसे मैंने भी होना है लेकिन बगल में लड़का कोई और हे होगा. लेकिन इसके साथ मैं खुद को पूरा हुआ मानती हु. जितने है उतने हु. No कम्प्लेंट्स एंड ी ऑलवेज फील हिज लव इवन िफ़ हे रेसिस्टर्स सयिंग ठोस वर्ड्स.", अन्नू की ऐसे साफ़ बात सुनकर चारुल के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई.
"कामिनी पता था मुझे की तू इसकी दीवानी हो रही है. कैसे देख रही थी इसको जब मैं साथ बैठी थी स्कूल के दूसरे दिन. लेकिन इसके अंदर राज बहुत दफ़न है जो मेरी जिज्ञासा बढ़ा रहे है. यू अरे इन लव सो यू अरे जस्ट फौक्स्ड ों तहत. हे इस समवन हिडिंग ा लोट मोरे थान एनीवन कैन इमेजिन.", चारुल की बात पर अन्नू ने उसका हाथ थाम लिए.
"मुझे बस इतना पता है के ये ख़ास है और मेरी परवाह करता है. और मुझे कुछ चाहिए हे नहीं. यू अरे फ्री तो स्टडी हिम एंड एक्स्प्लोर अस मच यू कैन.", आँख मरती हुई वह चारुल को प्रोत्साहित कर रही थी की अन्नू को कोई परेशानी नहीं अगर वह अर्जुन के राज jaan-na चाहती है.
"हाँ वह तोह मैं देख रही हु. आजकल मैडम जैसे नजर आती है बिजलिया गिरती हुई बस वजह जान कर ाचा लगा. इस पर तोह बनती हे है.", चारुल के ऐसे जवाब पर वह शर्माती सी नजरे छुपाने लगी.
"ये ब्लाउज के पास निशाँ कैसा है स्किन पर.?", चारुल की इस बात को सुनते हे झट्ट अन्नू चौंकती हुई सीने की तरफ देखने लगी.
"हाहाहा. अरे कैसे डर गई तू. मजे ले रही थी बस लेकिन ऐसा लगता है बहुत कुछ तू मुझे जल्द बताने वाली है.", अन्नू शर्माती हुई उसको खाने की तरफ ले जाने लगी.
"बुला ले उसको भी. यहाँ कोई स्कूल से नहीं है. मैं भी देखु के तू उसको खिलाती है या वह तुझे."
"बस कर यार. वह सच में शुरू हो जायेगा अगर मैं गलती से बोल भी दिए. मेरा दिल रखने के लिए तोह हाथ भी पकड़ कर अंदर लेके आने लगा था वह.", अन्नू इधर उधर देखती जैसे अर्जुन का हे पता लगा रही थी.
"जिसको तेरी नजरे ढून्ढ रही है उसको पारुल खिला रही है. वाह ऋ किस्मत. जिनकी सगाई है वह दोनों खुद एक दूसरे को खिलने की जगह इसको अपने बचे की तरह खिला रहे है. चल इसके मजे लेते है.", चारुल उधर हे आ गई जहा विकास और पारुल अपने साथ हे अर्जुन को बिठाये थे.
"अभी सगाई हुई है. शादी नहीं. और बचो को खाना खिलने की प्रैक्टिस इतनी जल्दी शुरू कर दी.", चारुल की बात सुनकर तीनो मुस्कुरा दिए.
"साली साहिबा ये बचा यहाँ सिर्फ घूमता फिर रहा था, कुछ खा नहीं रहा था. तोह अपनी भाभी के हाथ चढ़ गया अभी से हे.", विकास की बात सुनते हे चारुल अर्जुन को देखने लगी.
"मैडम बचा लो. ये दोनों अपना खाना मुझे खिला रहे है क्योंकि एक ने आज प्रैक्टिस नहीं की और दूसरा डाइटिंग पर है, क्योंकि उनके माजी नहीं खा रहे.", अब दोनों ने हे उसका कान खींच लिए.
"देखो. बोल रहा हु तोह दोनों हे मार रहे है. बस पेट भर गया मेरा हाथ जोड़ता हु.", अर्जुन की नौटंकी देख विकास की माता जी हे उसको वह से बचा कर ले चली.
"शुक्र है. तुम दोनों उसको कैसे पकड़ कर बिठाये थे यार.", चारुल के ऐसा कहने पर पारुल ने विकास की तरफ देखा.
"अब वह और फस्स गया. इसलिए यहाँ बिठा रखा था.", विकास की बात पर उन्होंने पलट कर देखा तोह अब अर्जुन के सर पर दुलार करती माताजी अर्जुन को साथ बिठाये निवाला खिला रही थी.
"चारुल जी, गाँव में एक सरपंची झोटा होता है. सबसे तगड़ा और गाँव का लाडला जिसको सब खिलते पिलाते रहते है और यहाँ भी कुछ वैसा हे हो रहा है. अब कही पापा न पकड़ ले इसको, फिर तोह ये घर जाने से रहा."
"बस आंटी जी. पेट फट जायेगा. आप खाइये मेरा हो गया.", अर्जुन वह से उठकर जैसे गायब हे हो गया.
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"चल अब मैं निकलती हु यार. कल अगर तू स्कूल आएगी तोह मिलते है.", अन्नू ने चारुल से गले लगने के बाद परिवार के सभी लोगो से मिलकर एक बार और शुभकामनाये दी. संधू जी ने जब जाने का पुछा तोह अन्नू इधर उधर देखने लगी.
"अर्जुन के साथ आई है और वह पता नहीं कहा चला गया.", चारुल भी अर्जुन को हे जैसे तलाश रही थी.
"ाची बात है. लायक लड़का है और संभल कर ले जायेगा. इधर हे होगा कही.", संधू जी ने भी नजर घुमाई तोह अर्जुन उन्हें बीरभान जी के साथ उनकी तरफ हे आता दिखा.
"लो वह आ गया.", अर्जुन ने भी उन सभी को फिर से बधाई दी और संधू जी के साथ उनकी धर्मपत्नी ने भी अर्जुन को आशीर्वाद देते हुए 'सदा खुश रहो' कहते हुए गले लगा कर जाने की इजाजत दी. विकास के परिवार से भी मिलकर वह शांति से अन्नू के चलने की प्रतीक्षा करने लगा.
"अब ये इन्तजार कर रहा है.", पारुल की बात सुनते हे अन्नू झेंपती हुई उसके साथ चल दी.
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"बड़ा समझदार लड़का है ये चारुल. तूने कैसे इसको अनदेखा कर दिए.?", दोनों बहने कुछ पल अब अकेली थी तोह पारुल ने अपने दिल की बात कह दी.
"अनदेखा नहीं किआ है दीदी. ये अलग हे परिंदा है जो मेरे साथ एक घोंसले में नहीं रह सकेगा. जानती हो इसको पहली बार जब मैंने बास्केट कोर्ट पर देखा था तोह इसके नाम की तरह इसका ध्यान दिखाई दिए. वैसा अचूक थ्रो मैंने नहीं देखा था लेकिन पूछने पर इसने जवाब दिए था के ये उस खेल को कभी खेलना नहीं चाहता. मतलब साफ़ है के इसके लक्ष्य कही ज्यादा है और जो भी ये पा लगे ये और आगे बढ़ेगा. मैं इसके सामान नहीं हु. बेशक एक खिलाडी की तरह मैं भी फोकस्ड हु और समर्पित भी लेकिन ये समर्पण नहीं करता. ऐसी दिल्लगी से ाचा है दूर से हे देखो बस. और उम्र पता है कितनी है?" ये हमरे स्कूल में इलेवेंथ का स्टूडेंट है.", अब पारुल के चौंकने की बारी थी.
"मुझे लगा ये अन्नू और तेरा कॉमन फ्रेंड है. और जैसा तू कह रही है वैसा पापा को कहते भी सुना था. वह कहते है की ये लड़का समझ से बहार है उनकी. शायद बॉक्सिंग भी इसकी क्षमता के साथ न्याय नहीं कर पाए. लेकिन अन्नू?"
"प्यार है उसको अर्जुन से. और मैंने खुद देखा है के वह कितनी बदल गई है. जिसका मतलब उसने कुछ गलत नहीं किआ है. चलो छोड़ो इस बात को अब वह यहाँ नहीं है तोह यहाँ पर ध्यान दो.", चारुल बात को यही ख़तम करना चाहती थी.
"नहीं रोक पायेगी तू. लिखवा ले मेरे से. और एक बात बताती हु तुझे, इसकी ज़िन्दगी में सिर्फ अन्नू हे नहीं है 2 और भी लड़कियां है. विकास ने इसके सामने हे बताया था मुझे. उनमे से एक शायद वैसी हे है जो तेरे मुताबिक इस परिंदे के लिए बानी है. अर्जुन ने हम दोनों को हे बताया के जिस लड़की को विकास ने भी अर्जुन के लिए सही कहा था अर्जुन की शादी बचपन से उसके साथ तये है. लेकिन इस लड़के में दुसरो को खुश रखने का हुनर है. अन्नू को हे देख ले.", चारुल पहले तोह हैरान हुई फिर सोचने के बाद बोली.
"अन्नू ने कहा था के उसको हे अर्जुन से प्यार हुआ था. अर्जुन उसका ध्यान रखता है और उसकी परवाह करता है. खुद उसने कभी अन्नू से नहीं कहा के वह सिर्फ उसको प्यार करता है लेकिन अन्नू के मुताबिक वह नहीं कहेगा लेकिन दिल जनता है के अर्जुन प्यार भी करता है. कॉम्प्लिकेटेड है ये सब. तू खुद बता, एक पल के लिए विकास न हो लाइफ में तोह तू प्यार करती ऐसे इंसान से जिसकी लाइफ में 3 लड़कियां हो?"
"अगर वह मेरा ख़याल रखे और प्यार की कमी महसूस हे न होने दे तोह मैं क्यों पीछे हटूंगी. सबसे बड़ी बात जो तीन का दिल इतने ध्यान से रखता है वह चौथी को और ाचे से रखेगा. एक्सपीरियंस इस बेस्ट टीचर इन one's लाइफ.", पारुल इतना कहने के बाद अपने परिवार और विकास के पास चली गई. चारुल खुद को जैसे अपने हे अक्स से दूर होता देख रही थी. पारुल ने जो भी कहा था वह ठीक नहीं था लेकिन दिल गलत भी नहीं मान रहा था. 'अन्नू दोस्त है मेरी. बस यही सच है.'
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"अंदर नहीं आओगे.?", अन्नू घर तक आती बस अर्जुन से चिपक कर बैठी थी. उसको ाचा लग रहा था इस रात में ऐसे अर्जुन के पीछे बैठ कर उस के सीने पर हाथ रखना. सुनसान सड़क पर अर्जुन पहले हे उसके होंठो पर प्यार दे चूका था. अब दोनों घर के गेट के सामने हे खड़े थे.
"और अंदर क्या करेंगे.", अर्जुन की ऐसी मुस्कान देख वह पास कड़ी जैसे बहुत कुछ कहना चाह रही थी. अर्जुन अंधेर में जैसे कुछ देख कर वही नजरे जमाये रह गया.
"वह क्या देख रहे हो?"
"देख रहा हु के तुम्हारे घर में चोरी करने की इतनी ाची जगह पहले नहीं दिखी.", अर्जुन की बात समझने के लिए अन्नू ने भी उधर देखा तोह कुछ नजर नहीं आया.
"क्या कह रहे हो.?"
"तुम्हारा कमरा घर के सबसे पिछले हिस्से में है. यानि इस दिवार के पीछे आँगन होगा.", अर्जुन के ऐसा बताते हे अन्नू भी गौर से देख कर मुस्कुरा उठी.
"इरादे नेक नहीं लगते.", शर्माती हुई वह भी खुश थी की उन दोनों के पास शायद एक रास्ता हो सकता है.
"अभी चलता हु और जिस दिन इरादा खास हुआ तोह दरवाजा खुल्ला रखना पीछे का.", अर्जुन ने पास कड़ी अन्नू के पेट पर ऊँगली फिरते हुए हैंडल पकड़ लिए.
"गंदे कही के.", वह खुद चाहती थी की अर्जुन उसके साथ ऐसी हे शरारत करे.
"गुड नाईट. ध्यान रखना अपना.", अर्जुन ने हाथ हिलने के बाद बुलेट स्टार्ट की और घर की तरफ बढ़ गया.
"अंदर तह बुलाना सी पट. बहरो हे भेज तह मुंडा.", अन्नू की माँ ने जाली का दरवाजा खोल कर अंदर आती अन्नू से कहा.
"देर हो रही सी ओसनु माँ. फेर कड़े आ जायेगा. चलो मैं बुआ ला लेनी है.", अन्नू अंदर आते हे कमरे की और चल दी. मुआयना करने.
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"दीदी, कोई नजर नहीं आ रहा. सबा कहा गए?", अर्जुन घर में दाखिल हुआ तोह इतनी शांति देख रसोई में दूध उबाल रही कोमल दीदी के पास चला आया.
"4 तोह गई मंजू के साथ उसके ससुराल. माँ, मौसी और बुआ है तेजी के कमरे में और प्रियंका माधुरी दीदी के साथ अभी कमरे में गई है फिल्म देखने के बाद.", उनकी बात सुनकर अर्जुन ने जल्दी से उनका गाल चूम लिए.
"मतलब मेरी प्यारी दीदी आज अकेली है?", अर्जुन की इस बात पर कोमल दीदी नजरे झुकाये मुस्कुराती हुई दूध बंद करके उस पर चलनी ढकने लगी.
"दीदी से क्या काम है तुझे? याद तोह आती नै अपनी दीदी की.", कोमल दीदी के ऐसा कहने पर अर्जुन ने उनका चेहरा ऊपर करते हुए उन बड़ी आँखों में देखते हुए कहा.
"आज अगर बुआ नीचे सो जाये तोह आप छत्त पर आ जाना."
"ऋतू के नए कमरे में. छत्त पर अब नहीं.", कोमल दीदी के इतना कहते हे अर्जुन ने फिर से गाल चूम कर अपनी ख़ुशी जाहिर कर दी. फिर पानी की बोतल निकाल कर वह माँ के कमरे में चल दिए जहा रुपाली किताबे बंद करने के बाद सोने की तैयारी कर रही थी. कुछ देर वह उनके पास बैठ कर स्कूल, घर और उनकी व्यक्तिगत बातें करने लगा जो रुपाली को भी ाचा लग रहा था. आधे घंटे बाद अर्जुन जान गया के वह अब सोना चाहती है तोह खुदसे हे उनके माथे को चूम कर वह गूडनिघत कहता ऊपर कमरे में चल दिए. 'बचा हे है ये लड़का. ऋतू ठीक हे कहती है. लेकिन प्यारा है.', रुपाली खुश होती हुई दिवार की तरफ करवट ले कर लेट गई.
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"आज तोह मैं यही सोने वाली हु भाई.", मधु बुआ ने करवट बदलते हुए तकिया ठीक किआ और बाकी दोनों की तरफ देखने लगी. रेखा जी अपने कमरे में चली गई थी, रात गहराने की वजह से. अब यहाँ बुआ के सिवा ललिता जी और सरोज हे थे.
"हाँ मालूम है तेरी जांघ में दर्द है तभी आज सुबह से नीच हे परेशां हो रही है.", ललिता जी ने अपनी छोटी ननद की चुटकी लेते कहा तोह सरोज भी हंसने लगी.
"वैसे ननद रानी, ये जांघ पे ऐसा क्या लगा जो दिन में सिसकी निकल रही थी और अब भी टाँगे जुड़ नहीं रही?", सरोज की मस्ती देख कर मधु के चेहरे पे अलग हे चमक आ गई थी लेकिन शब्द कुछ और बयां कर रहे थे उनके.
"अरे अब ठीक हु मैं. वह तोह बस बाथरूम में पांव फिसल गया था रात को और एक की ठंडक में जकड़न भद्द गई. लगाया आगया कुछ नहीं है.", मधु बुआ सीने के सामने दोनों कोहनिया करती लेती थी.
"इन आँखों ने बहोत फिसलन देखि है. खेतो में, नहर किनारे, आँगन में और गुसलखाने में भी. अब ये है तोह उनमे से हे लेकिन लाडो रानी बता नहीं रही.", सरोज की बात पर ललिता जी भी मधु की कमर पर हाथ रख के चेहरा देखने लगी.
"अब भाभी आप न अपनी तरफ से जो भी सोचो, मैंने तोह सच बता दिए है.", मधु बुआ आँखें बंद करती चुप रहने का नाटक करने लगी.
"ललिता दीदी, वैसे हो सकता है के ये ठीक कह रही हो. 2 बचे है और इस उम्र में कोई जाँघे फैला दे ऐसा हथियार मुनासिब नहीं. लेकिन अनुभव कहता है बिल्ली ने चूहा तोह खाया है."
"चल अगर मधु नहीं बताना चाहती तोह कोई बात नहीं ऋ. सोने दे इसको लेकिन तुझे राज की बात मैं बता देती हु एक. तू कहती है न के ऐसा हथियार नहीं हो सकता जो खेली खाई को हिला दे तोह वहां है तेरा.", ललिता जी बीच में लेती सिर्फ saree-peticot में थी. सरोज और मधु के तन मैक्सी से ढके थे.
"क्या बात करती हो दीदी? जितना भारी पिछवाड़ा है मधु का तोह लुल्ली तोह पता नहीं चलनी इसको. और 2 दिन में मैंने देख लिए यहाँ शिकारी तोह कोई दिखा नहीं अब ये न कहना के बहार का इस घर में घुसके दूध पी गया और बिल्ली मार गया.", सरोज अपना सर हथेली के सहारे टिकाये गौर से ललिता जी को देख रही थी.
"मुन्ना के पास ऐसा अजगर है के काट ले तोह मधु क्या तेरी भी टाँगे फ़ैल जाये."
"पागल हो दीदी. वह बचा शरीर से तगड़ा हो रहा है लेकि उम्र और अंग वैसा हे है, जितनी मुझे समझ है.", सरोज का गाला सूख गया था नाम सुनते हे और मधु बुआ की धड़कन बढ़ने लगी थी, लेकिन आँखें बंद किये वह पड़ी रही.
"पिछले महीने तक बहार आँगन में हे नाहटा था छुट्टियों में सुबह 6 बजे हे. मशीन लगा राखी मैंने कपडे धोने की तोह वह नाहा कर कपडे बदलने बाथरूम में चला गया लेकिन दरवाजे के बीच किसी कपडे की वजह से वह बंद न हुआ. टोलिया सामने से हटा तोह मेरी मुनिया और दिल दोनों कांप गए. सच कहु सरोज तोह उसका इतना बड़ा है और काम से काम इतना मोटा जरूर रहा होगा. अब तोह पहले देख लेती हु मशीन लगाने से या ऊपर जाने से. गलती से घोडा बिदक गया तोह बिल्ली के साथ पेट फाड़ देगा.", हाथ के इशारे से जब ललिता जी ने ऊँगली से लेकर कलाई के 3 इंच नीचे निशान बनाया तोह सरोज जी की खांसी चूत गई. निचे राखी पानी की बोतल उठा कर गटागट पीने के बाद लम्बी सांस ली और फिर कहने लगी.
"ये कैसे मुमकिन है? रेखा से अकेले में मैं साडी बात करती हु. शंकर का कोई हथेली जितना होगा, आपके देवर का भी वैसा हे है समझ लो और बाकी जो सहेलिया है उनके खसम उतने भी खुशकिस्मत नहीं. और जैसा बता रही हो वैसा किसी सरपंच की तरह 5 गाँव में किसी एक का भी मुश्किल है. और इतना तोह यहाँ तक पहुंचेगा. बाप रे, दीदी. मधु ऐसा नहीं खा सकती.", सरोज के बदन में जैसे दाने उभर आये थे जब उसने छूट के सामने से नाभि तक लम्बाई माप और फिर भी आकर ललिता जी के हिसाब से आगे तक था.
"चल मान ले के मैंने झूठ कहा. भला मैं अपने मुन्ना के लिए कोई ऐसी वैसी बात कर सकती हु? सिर्फ तेरी बात का जवाब देते हुए मैंने वही बताया जो सच है. और रही बात ऐसे हथियार को झेलने की तोह कोई लड़की तोह सपने में भी झेल नई सकती अगर दरवाजा बंद हो लेकिन ब्याही हुई औरत जिसका पिछवाड़ा जोरदार हो वह जरूर आधा अधूरा झेल लेगी पहली बार में."
"हम्म्म. सही बात है आपकी. शादी के टाइम जब पहली बार आपके देवर का लिए था तोह मैं मंजू जैसी थी और मेरी तोह चीखे निकलती रही थी 10 मिनट तक. शुरू में हर बार ऐसा होता था लेकिन 6 साल पहले तक पूरा केला एक बार में अंदर गायब हो जाता था."
"मतलब 6 साल से सूखी है तू?", ललिता जी ने गौर से देखा सरोज के चेहरे को जहा सच लिखा था.
"सूखी तोह दीदी 10 साल से हु. उसके बाद अगले 4 साल में तोह ये कभी दारू के नशे में हे सख्त हो कर चढ़ते थे लेकिन फिर तोह वह भी बंद हो गया. और अब तोह लगता है जैसे वह जरर हे न लग गई हो.", सरोज साफ़ दिल और भोली थी बेशक पढ़ी लिखी लेकिन परवरिश वैसी हे थी.
"उम्र देख तेरी. अभी भी 10 बरस तोह पड़े है तेरी इमारत में भूकंप के झटके झेलने के. और ये मर्द सारे हे ऐसे होते है, बचे हुए नहीं के कुछ साल बहार चुपके मुँह मरते फिरेंगे और घर की दाल जैसे गले न उतरती इनके. शंकर जैसा भी है जब घर आता है तोह तबियत से रेखा की मुनिया लाल करता है. बत्ती रात को 10 बजे हे बंद हो जाती है और रेखा 6 बजे तक बहार नई निकलती. तभी आजतक चमक रही है वह. तेरा भी कुछ नहीं बिगड़ा अभी. या तोह अपने नंदलाल को वैद के पास ले जा नहीं तोह कोई और बांसुरी बजने वाला देख ले.", ललिता जी की बात का अब कोई जवाब न था सरोज के पास.
"जैसा किस्मत चाहेगी वही होगा दीदी. चलो अब सोना हे बेहतर रहेगा कल सुबह जल्दी निकलना है.", आँखे मुंदती हुई सरोज का सर भरी हो चला था. वही उसको अभी भी अर्जुन की शरारती आँखें याद आ रही थी. अर्जुन का नाम याद करने भर से दिल हल्का होने लगा और वह नींद में जाने लगी. मधु बुआ भी ये बातें sunn-ne के बाद अब निश्चिंत हो कर सो रही थी, एक मुस्कान के साथ.
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अर्जुन इतने दिन बाद एकांत में अपनी प्यारी दीदी से मिलने को लेकर बेचैन था. अब कही जा कर घर शांत हुआ तोह वह दबे पांव छत्त से उतरता पिछले भाग की तरफ आ खड़ा हुआ. ऋतू दीदी वाला ये कमरा अभी अंदर से हे बंद जान पड़ता था. सावधानी से अर्जुन ने ऊँगली से हल्का बजाते हुए दरवाजा थपथपाया तोह तुरंत हे दरवाजा आधा खुल गया. यहाँ कमरे में अँधेरा था और बहार से आती हलकी रौशनी की वजह से आधे के लगभग बिस्टेर और फर्श नुमाया थे.
"एक तरफ हटो तोह दरवाजा बंद करू.", कोमल दीदी की फुसफुसाती आवाज दरवाजे के पीछे से आई थी और अर्जुन उनकी हे तरफ आते हुए खुद दरवाजा लगाने लगा.
"मैंने ज्यादा देर तोह नहीं की आने में?", अँधेरे में हे अर्जुन ने उनके दोनों हाथ पकड़ते हुए खुद को करीब कर लिए. बंद कमरे में और इतनी करीब से दोनों हे एक दूसरे की साँसे सुन्न प् रहे थे.
"पहले आते भी तोह वैसे हे जाना पड़ता.", कोमल दीदी की बात उसको समझ न आई और फिर वह अर्जुन का हाथ पकड़ती इस कमरे से अंदर की तरफ चल दी जहा दूसरा कमरा था. उनकी आँखे और कदम जैसे अभ्यस्त थे या उन्हें ाचे से हर चीज भली भांति पता था.
"अंदर वाले कमरे में?", ये दरवाजा खुलने की आवाज पर वह उनके से हे एक पल रुका और फिर अंदर आते हे दीदी को दरवाजा फिर बंद करते महसूस किआ.
"जब ये कमरा ज्यादा एकांत दे रहा है तोह उधर रहने का क्या फायदा? और खिडकी भी घर के अंदर की तरफ हे है वह.", अर्जुन को अब इस अँधेरे में थोड़ा बहोत नजर आ रहा था. दिवार में बहार वाली दिवार में बानी कांच और जाली वाली एक खिड़की की वजह से. दीदी ने वह कांच वाला हिस्सा अंदर की तरफ और जाली बहार की तरफ खोल दी. 2क्ष2 के इस झरोके ने जल्द हे कमरे में तजि हवा भरनी शुरू कर दी. और चांदनी रात का प्रकाश अब यहाँ ठीक बीच में लगे बिस्टेर पर लम्बाई से गिरता उसके वह होने का परिचय करा रहा था.
"सच्चा कहा आपने. और ये सही में एक कही ज्यादा ाची जगह है."
"तुम बैठ मैं जरा रौशनी करती हु." ये कमरा कितना शांत था अर्जुन ने ाचे से जान लिए था. पूरे घर में एक यही कमरा था जिसमे वह ऐसे न बैठा था कभी. वैसे भी ये हिस्सा बंद रहता था और Ritu-Alka दीदी की वजह से ये कमरे आबाद होने लगे थे. हलकी दूधिया रौशनी कमरे में भरते हे अर्जुन साँसे थामे बस ये नजारा देखता रह गया.
सुर्ख लाल रेशम के सलवार कमीज में सर पे चुन्नी लिए कोमल दीदी बिस्टेर के दूसरी तरफ फर्श पर कड़ी थी. सूट का कसाव जैसे लेश मात्रा कही सिलवट न लिए था. कोमल दीदी हे तोह थी जिनकी सुंदरता सच में बेमिसाल थी. ऊपर से फक्क गोर रंग पर लाल लिबास उनकी रंगत गुलाबी कर रहा था. कमरे की सफ़ेद दीवारे और लालिमा लिए ये कुदरत का सबसे हसीं मुजस्समा. लम्बी पलके झुकाते हुए दीदी ने चादर को उस जगह से ठीक किआ तोह अर्जुन के होंठ सूख गए.
सीने के सामने वाले हिस्से में से झांकते वह गुलाबी बेदाग़ उभर आपस में एक दूसरे से चिपके अर्जुन का इम्तिहान ले रहे थे. और वह इसमें जैसे नाकाम हे होना चाहता था. अपनी जगह से उठ कर दीदी के करीब पंहुचा तोह वह mirg-nayan अर्जुन को भरपूर प्यार से निहारने लगे. ये भाषा हे तोह जानती थी कोमल जिसको समझना सबको कहा आता था. लेकिन अर्जुन भी उनसे हे जुड़ा था और औरो से अलग.
"आपने ये सब मेरे लिए किआ?", उनकी कलाई पर लाल चूड़ियां देखता वह अपने जज्बात बस किसी तरह रोके था.
"हमारे लिए.", होंठो का लरजना कोई और न देख ले शायद ये भी कोमल दीदी के चुप रहने की वजह थी. ऊपर वाला होंठ कुछ उभरा हुआ धनुष सा और नीचे एक गोलाई लिए रस से भरा थोड़ा मोटा. मुँह खोलने पर जैसे वह खास हरकत करते थे. अर्जुन के बेताब हाथ उनकी कमर के पिछले भाग पर चूहे तोह लम्बी पलकों ने वह नयन अपने पीछे छुपा लिए. ऊपर की तरफ उठा चेहरा और ये मदद्भरे होंठ बाकी की बात पूरी कर गए. अर्जुन यहाँ से वापिस न लौट सका और न दीदी ऐसा चाहती थी.
"आपको नक़ाब में रखा जाये तब भी सिर्फ आँखों से दीवानगी बढ़ जाएगी.", कोमल दीदी के कोमल आधार चूमने के बाद अर्जुन ने उनकी आँखे देखते हुए कहा.
"मेरी दीवानगी का सबब कभी देखना. वह एक याद हे मुझको अपने में समेटे रखती है, पूरी ज़िन्दगी का प्यार देती हुई.", कोमल दीदी की ऐसी मार्मिक बात सुनकर अर्जुन दोनों पांव जमीन पर टिकते उन्हें गॉड में लेकर बिस्टेर पर बैठ गया.
"इतना प्यार करती है की मेरी याद से ज़िन्दगी बिताने का सोचे बैठी है? मैं ज़िंदा हु और आपके पास. कह भर देंगी तोह मैं कही और अपनी परछाई भी न जाने दूंगा.", उनके दोनों गाल हथेली में समेटे वह उनकी बातें सुनता अपनी उनसे कहता बस इस चेहरे में डूबता जा रहा था.
"ऋतू का क्या होगा? वह खुद तेरी परछाई है.", ऋतू दीदी के जीकर पर अर्जुन ने उसी स्नेह से अपनी बड़ी बहिन से कहा.
"प्यार तोह दोनों का आप हे करती है, बराबर. तोह उनको अलग थोड़ी न करेंगी आप.", अर्जुन एक हाथ उनके सर पर लिए दुपट्टे पर रखते हुए जैसे उसको ठीक कर रहा था. किसी कश्मीरी यौवना से उनका ये रूप वह हर पल आँखों में भरे जा रहा था.
"ये मार्किट से लेकर भी वही आई थी और बिस्टेर को बना कर भी ऋतू खुद गई है. कैसे मैं अलग कर सकती तुम दोनों में से किसी भी एक को.?", अर्जुन ने ये तोह सोचा भी न था के सूट अपने आप आया कैसे.
"उन्हें पता है हमारे बारे में?", अर्जुन का एक हाथ दीदी के सुत्वा पेट पर फिर रहा था.
"मुझे जैसे पता है तुम्हारे बारे में.", कोमल दीदी ने प्यार से उसकी नाक के ऊपर नाक लगते हुए कहा. अर्जुन उनकी इस बात पर मुस्कुराते हुए वैसे हे होंठ चूम लिए.
"आपको कभी ऐसा नहीं लगा के हम bhai-behan है और ये सब गलत है, मर्यादा के बहार है?"
"कहने को मैंने कभी अपनी मर्ज़ी से घर की देहलीज तक नहीं लाँघि लेकिन मुझे हमेशा से हम तीनो ek-ansh नजर आये तोह फिर ये अंश आपस में मिलने से कोनसी मर्यादा भांग हो गई? प्यार है और कुछ नहीं. सबके सामने तोह मैं छह कर भी तेरे गले नहीं लग सकती.", अर्जुन के सीने से लगती कोमल का दिल खुद एक बलिदान की कहानी कह रहा था. समाज, परिवार, सोच और नैतिकता के झूठे आडम्बर की दिवार के पीछे दबा उनका दिल कोई स्पर्श नहीं करने वाला था.
"सच कहती है आप. वैसे आज आप ने जो भी मार्किट से ख़रीदा था सब दिखने का वडा किआ है.", अर्जुन इस गंभीरता को वापिस दोनों के इस अनमोल एकांत की तरफ मदद लिए.
"वादा? जहा तक मुझे याद है मैंने ऐसा कुछ नहीं कहा था.", अपने मोतियों से दांत दिखती वह हंसती हुई उसकी गॉड से उठकर दूर होने लगी लेकिन उनकी एक कलाई पकडे हुए अर्जुन मुस्कुराते हुए उन्हें गर्दन से ना में हिलता जैसे वापिस खींच रहा था.
"चलो, मैंने कहा था. के जो भी लेंगे वह मैं खुद देखूंगा.", उसकी बाहों में गिरती वह अर्जुन के साथ हे बिस्टेर पर लेट गई. ऊपर झुका अर्जुन अपनी इस हसीं प्रेमिका की गर्दन पर अधीर होंठ रखता रेशम से पाँव ऊपर तक सेहला रहा था. कोमल दीदी को उसका ऐसा करना हे अर्जुन की तरफ और आसक्त करने लगा. खुद हे उन्होंने अपना हाथ ऊपर झूलती अर्जुन की टीशर्ट से अंदर करते हुए जैसे और तड़पना शुरू कर दिए.
"ओह्ह तोह अब ऐसे होगा.", अर्जुन के निप्पल नाख़ून से कुरदेति हुई कोमल मुस्कुरा रही थी. अर्जुन भी उनका दुपट्टा एक तरफ करता हुआ उनके बाल खोल कर बिस्टेर पर जैसे बिछाने लगा. शरीर में झुरझुरी हो रही थी दीदी के ऐसा करने से लेकिन वह इस प्यार को आगे बढ़ता जब उनके सीने से सत्ता तोह उनके गालो की लाली बता रही थी की वह खुद अर्जुन के लिए तैयार है. लाल कमीज के थोड़ा सा एक तरफ होते हे उनकी नाभि पर अर्जुन की उंगलिया कमाल दिखने लगी. रोयें खड़े होने लगे इस एहसास से, शरीर को यही स्पर्श तोह पसंद था. आँखे बंद किये वह सर को पीछे करने लगी और अर्जुन उनके ऊपर पूरी तरह झुकता उन मतवाले लबो को इस रात पहली बार जूनून से पीने लगा.
खुमार में दोनों हे आगे सरकते पूरी तरह बिस्टेर पर आ चुके थे लेकिन लैब अलग होना हे नहीं चाहते थे जैसे. यहाँ कोई कुछ नहीं सोच रहा था बस जहा हाथ जा रहे थे वही सहलाने लगते और अर्जुन को अपने नीचे दीदी के दबने का पता चलते हे वह ऊपर उठ गया.
"सॉरी दीदी. पता हे नहीं चला."
"वही मैं चाहती थी की तू मुझे मेरे नाम की तरह मत समझे.", मुस्कुराते हुए वह खुद अर्जुन को अपने ऊपर खींचने लगी लेकिन अर्जुन इस बार संभल कर उनके सीने से लग गया.
"मेरे साथ प्यार करते वक़्त कोई बंदिश मत लगा खुद पर. नहीं तोह हम रहने देते है.", कोमल दीदी की बात सुनते हे अर्जुन ने बिस्टेर से खड़े होते हुए उनके पाँव भी अपनी तरफ खींच लिए. गोल पिछवाड़े के निचे दोनों हाथ डालते हुए वह उन्हें लिए खड़ा हे हो गया.
"क्या कर रहा है ये?", दीदी बस बोल रही थी लेकिन रोक नहीं रही थी. उनके शरीर को दिवार से लगते हुए अर्जुन कमीज के ऊपर से हे उन मॉटे अनारो पर मुँह लगाने लगा. सलवार के पिछले हिस्से पर उनका नरम मांसल भाग अर्जुन के पंजो में डब्ब रहा था.
"आपको जैसा मिलान चाहिए मैं समझ गया हु. लेकिन उस से आगे मत जाने को कहना.", दीदी की महकती साँसे उसके चेहरे पर आ रही थी. दोनों हाथ सलवार के अंदर पीछे से डालते हुए अर्जुन इन चिकने तरबूज से कूल्हों को रबर जैसे दबाता उनके सीने और कस कर होंठ लगा रहा था. पहली बार दीदी की सिसकियाँ कान में सुनाई दी तोह उनके होंठ खोलते हुए अर्जुन वह गुलाबी जीभ मुँह में दबाते हुए पीने लगा. कोमल दीदी के भी हाथ अर्जुन के कपड़ो के अंदर से निर्वस्त्र कूल्हों पर नाख़ून के साथ गाड़ने लगे तोह उसको पता चला के कामुक समय में ऐसे दर्द में भी अलग हे मजा था.
होंठो अलग हुए तोह एक धागे की तरह लार दोनों के मुँह से जुडी खींचती चली गई चेहरे दूर होने पर. टूट कर जैसे हे वह कोमल की गोल ठुड्डी पर चिपकी वही अर्जुन ने जीभ से पूरा भाग चाट कर गीला कर दिए.
"साड़ी रात नहीं है, याद रखना.", दीदी ने कान में सरगोशी की और निचला हिस्सा दांतो में दबा लिए. उनकी इस हरकत ने जैसे कमर के सामने अपना असर दिखाया हो. लुंड ठुमकता हुआ उत्तेजना से अकड़ कर बहार निकल आया.
"लेकिन ये रात याद रहने वाली है, हम दोनों ko.",Arjun ने सलवार का नाडा शहीद करते हुए निचला भाग सलवार से विमुक्त कर दिए. बाहें अंदरूनी जोश से उभरने लगी और किसी गुड़िया की तरह उन्हें ऊपर उठता वह लटकती कुरी के नीचे मुँह घुसता हुआ लास वाली पतली पंतय के ऊपर से हे उनके महकते खजाने पर मुँह लगाए खड़ा हो गया.
इस दृश्य को कोई और देखता तोह यकीनन विश्वास नहीं होता के प्यार में ऐसा भी जूनून हो सकता है. कोमल बेपरवाह सी दिवार से लगी हवा में 6 फ़ीट ऊपर और उसको संभाले बलिष्ट अर्जुन जालीदार कपडे के ऊपर से हे पहले हुए हिस्से को मुँह में भरता चूसे जा रहा था. बाल खींचती हुई कोमल भी उत्तेजना के इस दौर में ऐसा मजा निडर होती उठा रही थी. कुर्ती फटने की हद्द तक टाइट हो चुकी थी उन्माद में और मॉटे हो रहे चुचो से. रास कपडे से निकल कर मुँह में आने लगा तोह अर्जुन भी पहले से तेज चूसै करने लगा उन चिकने छूट के होंठो की.
"आठ ाररू.. उम्मम्मम..", पसीने में नहाया अर्जुन का शरीर इस म्हणत से पूरा उभर चूका था. कोमल की मादक ाहो को कम् करते हुए उसने उन्हें नीचे उतार लिए. जमीन पर पाँव रखते हे हलकी कम्पन्न महसूस होने लगी. लेकिन नजरे उस पाजामे से बहार निकल कर नाड़े के दबाव से कुछ ज्यादा हे मॉटे हो चुके सुपडे पर गई तोह एक कुशल सपेरे की तरह कोमल दीदी ने उसका फानन नीचे से पकड़ लिए. दूसरा हाथ पाजामे को ढीला करता अब अर्जुन को नंगा कर चूका था.
अब आहें भरनी की बारी अर्जुन की थी जो दिवार पर दोनों हाथ रखे घुटने मौडे नीचे बैठी अपनी बड़ी बहिन को देख रहा था. उंगलिया लुंड के मूल पर कस्ती कोमल ने सूखे लाल सुपडे पर नीचे से ऊपर तक जीभ फिरते हुए अर्जुन की तरफ एक कामुक अदा से देखा और इस सबकी बेउम्मीदी लिए बैठा दिल जैसे अंदर तक हिल गया अपनी दीदी का ये रूप देख कर.
"आह्ह्ह्हह्ह.", गुलुप से पूरा लाल सूपड़ा उन नरम होंठो के अंदर उनके गरम गीले मुँह में भर गया. अर्जुन को ऐसे लग रहा था के वह गोल लिपटे होंठ गांड का सख्त छेड़ हो और आगे का गीला नरम हिस्सा दहकती छूट. इतना कसाव सेहन न करता लुंड खुद हे हिलने लगा. अर्जुन मदहोशी में कमर हिलता अपनी दीदी के मुँह को हे छोड़ने की जुगत में था लेकिन ये इतना आसान न था. 4 इंच लुंड आगे होते हे कोमल दीदी के दांतो की सख्ती ने उसको तड़पा कर रख दिए था. वह इस पल में कोई नाजुक लड़की बिलकुल नहीं थी जिसके हलक तक लुंड दाल दिए जाये और वह आंसू बहती रोने लगे. यहाँ अर्जुन उनका गुलाम हो चूका था. उतने हे संवेदनशील भाग पर सर आगे पीछे हिलती कोमल ने अर्जुन को इम्तिहान में लगभग फ़ैल कर दिए था. अंडकोष भरी होने लगे तोह उन्हें हलके से दबती कोमल ने अर्जुन के सखलन को वापिस भेज दिए.
"Kyaaa..karrr रही हो डीडीईई.. आह्हः.. मर्डर जाऊंगाआ.", हर बार ये शब्द सामने वाली लड़की कहती थी लेकिन आज अर्जुन के पाँव कांप रहे थे. अपने प्यार पर और जुल्म न करती कोमल दीदी ने वह भीगा सूपड़ा आजाद करने से पहले बड़े प्यार से चूमा और अर्जुन की छाती सहलाती हुई गर्दन पर मीठे चुम्बन करने लगी. अर्जुन जैसे ज़िन्दगी की सबसे भरी म्हणत करके लौटा, हाफ रहा था. अलग होते हुए कोमल दीदी ने अर्जुन की आँखों में आँखें डालते हुए वह कुर्ती बेहद धीमी गति से उतारते हुए शरीर के सामने किसी परदे की तरह कर ली. अर्जुन उनका ऐसा करना देख साड़ी थकान भूल कर कुर्ती झपटने के लिए आगे बढ़ा और सीधा कोमल दीदी के सीने से जा लगा. अब कुर्ती अर्जुन की पीठ पर कस्ती कोमल उसको साथ लिए हे पीठ के बल बिस्टेर पर आ गिरी.
"पहली बार मुझे प्यार हुआ और अगर प्यार में हसरत हे पूरी न हो तोह फिर कोई फायदा नहीं.", अर्जुन उन वक्षो को दबाये ऊपर लेता था और उसका गाल मुँह में भर्ती कोमल उसको हर बार दीवानगी में एक कदम ऊपर ले जा रही थी. वातस्यना की किताब से निकल कर जिवंत हो उठी इस कामदेवी का शरीर श्रेष्ट था जिसके सामने अर्जुन झुक चूका था. कमर पर अपनी टाँगे लपेट कर वह अपने सख्त उभार खुद हे अर्जुन के सीने से रगड़ रही थी, ब्रा के साथ.
"साड़ी हसरते पूरी करूँगा आपकी, ये नहीं कर सकता तोह आपसे प्यार का हक़ नहीं मुझे.", कंधे पर से दोनों लाल डोरियन निचे खिसकता अर्जुन उनका ऊपरी भाग निप्पल तक निर्वस्त्र कर चूका था. पहाड़ से वह सतांन जरा भी ढीलापन न लिए थे. समूची गोलाई और कसावट का फरक हे उन्हें माधुरी दीदी के जिस्म से 21 बनता था, लेकिन आज उन्होंने ये भी साबित कर दिए था के प्रेम में इंद्रधनुष से रंग भरने के लिए अपशब्द से ज्यादा एक दूसरे पर अँधा विश्वास और अछूते कपाट खोलने पड़ते है. अर्जुन सरक कर उन बुरी तरह अकड़े गुलाबी निप्पल पर आया तोह गोल घेरे पर जीभ घूमते हुए जैसे वह उनको तराश रहा था. होंठो में कस्ते हे वही मादक सिसकारी और कच्ची के साथ हे अपनी गीली छूट अर्जुन के सुपडे पर रागादि वह आनंद से अभिभूत होने लगी.
"ऐसे हे.. आठ.. अर्जुनंन.. ", गुलाबी घेरे के साथ पूरा हिस्सा मुँह में भरते हुए अर्जुन उन्हें चूसता हुए लुंड का दबाव भी दीदी की छूट पर बनाते हुए घिस रहा था. कोमल के उभार थे भी संवेदनशील, अपनी माँ की तरह. उन बड़े गोलों को दबाते हुए पीटा अर्जुन जैसे उनसे दूध की उम्मीद लगाए लगा हुआ था. लार में ाचे से दोनों को टर्र करता वह ऊपर उठा तोह चुचो के नीचे फांसी लाल ब्रा किसी उपहार पर बंधे रिबन सी दिख रही थी. गुलाबी फूले हुए दोनों चूचक भाले सी नोक सामान खड़े चाट को घूर रहे थे.
"नदी पर बांध बनाने का काम शुरू करते है.", मुस्कुराता हुआ वह जैसे नै ऊर्जा से भर उठा था. कोमल दीदी के दोनों चिकने पत् जोड़ते हुए वह छूट के सामने से भीगी लाल कच्ची खींच कर अलग करते हुए अर्जुन उनके गोल घुटनो से चुम्बन छापता हुआ नरम उभरी हुई गुलाबी छूट के सामने आ रुका. छोटी बुँदे बंद गुलाब की चोंच पर उबरी देख पूरी जीभ गुदाद्वार से कुछ पहले तक आई लकीर पर फिरता वह इस चोंच पर रगड़ता ऊपर तक ले आया. और छूट को थोड़ा फैलते हुए उस गुलाबी नोक को होंठो में भर लिए.
"आअह्ह्ह्ह.. सीई.", दोनों मुट्ठियों में बिस्टेर पर बिछी चादर दबोचती कोमल दीदी खुद हे कूल्हे ऊपर उठती अपनी गुलाबी काली को अर्जुन के मुँह में भरने लगी. कॉमर्स चाशनी सा पूरे मुँह में घुलता अर्जुन को और उकसा रहा था. होंठो के बीच जीभ की पेनी नोक निकल कर उन अंदर की फांको पर दबाव बनती डांक मारने लगी. हर कटरा कुरेद कर पीटा हुआ वह भूखा भंवरा इस फूल को खाली करने लगा था. जब ऊपर उठा तोह होठ शहद में भीगे चमक रहे थे. बिना घृणा के कोमल दीदी ने अपने हे कुमुद का रास उसके होंठो को चूमते हुए चख लिए. भीगी थोड़ी पर जीभ फिरती हुई वह निर्वस्त्र काया के साथ अर्जुन के ऊपर आती चली गई. दृश्य उलट चूका था. पीठ के बल बिस्टेर पर पड़ा वह अपने दोनों तरफ पाँव रखे नीचे आती कोमल दीदी एक हर अंग को निहार रहा था.
खुले बिखरे बाल, लाल भभकता मादक चेहरा, थिरकते हिलते दोनों दिव्या कलश और चिकने पत्तो के बीच वह गीली दरार, ये दृश्य इतना भी धीमा नहीं था जितना वह अपने जेहन में भर चूका था और पसरी टांगो के बीच 150 के कोण पर खड़ा वह हिलता kaam-dand पीछे हाथ करके पकड़ती कोमल दीदी ने अपने कूल्हों की गहरी दरार में लंबवत फँसत हुए दोनों फांको में कस लिए. छूट से रगड़ मरता लुंड फैंको के बीच पूरे दबाव से जकड़ा चल रहा था.
ऐसा तोह अलका दीदी भी न कर सकती थी, जिनके कूल्हों में अध्भुत लचक थी. कोमल दीदी ने उसके जेहन से आज सभी नाम मिटा दिए थे. हर बार वह सुपडे को ठीक गुदाद्वार के पास और अधिक कस लेती और फिर छूट की चिनहट से गीला वह मूल निरंतर फांको में फिरती हुई वह अर्जुन के साथ वैसा हे कर रही थी जैसे अर्जुन उनकी छूट चूसते हुए कर रहा था.
"आराम से दीदी.. आठ.. थोड़ा धीरे.. आह्हः..", मजे की अधिकता में जब भी वह गुदाद्वार के पास आता तोह उसमे ठेलने की नाकाम कोशिश करने लगता. अपनी जकड से उसका लुंड आजाद करती कोमल दीदी सीढ़ी लेती कर अर्जुन की छाती पर लाल निशाँ बनती हुई पसीने को भी चूम रही थी. नमी तोह उनके भी पूरे शरीर पर चाय थी इतनी मादकता और गर्मी से.
"आ जाओ, मैं तैयार हु.", अर्जुन की आँखों में देखती कोमल दीदी की ये बात सुनते हे अर्जुन की चेतना वापिस लौट आई. वह अभी तक बस kaam-jwar में तप्त हुआ उनकी गिरफ्त में क़ैद था.
"क्रीम?", अर्जुन ने फांको के बीच अंगूठा फिरते हुए उनको सही आसान में किआ और अतिरिक्त चिकनाहट के लिए पूछने लगा.
"वह आखिर में.", कोमल दीदी के इस जवाब के साथ बानी मुस्कान को समझते हुए अर्जुन ने बड़े प्यार से उस तंग दरवाजे की दरार को चूमा और दोनों जंघे फैलते हुए उनके बीच में सूपड़ा घिसने लगा. लुंड की नस्से ऐसे फूल चुकी थी जैसे शरीर का रक्त बस दिल साफ़ होता सिर्फ इधर आ रहा हो. नीचे हो कर वह उनका मुँह बंद करना चाहता था लेकिन आगे खिसक कर दीदी ने ना में गर्दन हिला दी.
"उम्.. ाः.", सूपड़ा फसते हुए हे दोनों के पेशानी पर पसीने की तजा बूंदा उभर आई. जैसे लुंड औकात से 15 प्रतिशत ज्यादा मोटा हो गया हो, शायद कसाव से हुआ भी हो. गीली छूट में ढाई इंच का गरम सूपड़ा जज्ब किये कोमल हौले हौले अर्जुन की छाती सेहला रही थी.
"दाल दे अर्जुन. देखा जायेगा.", जी मजबूत करती कोमल अपने छोटे भाई का प्यार उसके साथ मिलने वाले दर्द को पा कर हे करना चाहती थी. अर्जुन ने बुरी तरह फसे सुपडे को जैसे तैसे पीछे किआ और अपनी कमर का भरपूर जोर लगते हुए जैसे छूट की अंदर की दिवार खुरच दी.
"Aahhhhhh..hhh.. हिक्क.. आह्ह्हम्म्म्म", गले से कराह के साथ हिचकी भी निकल गई दीदी के और अर्जुन जबड़े भींचे खुद को संभल रहा था. लुंड बस 2 इंच बहार था और अब वह ये दर्द ख़तम करने की कोशिश में लगा निचे झुक कर उन गोल चुचो को पीने लगा. कमर पर दीदी की टाँगे लिपटी हुई कमजोर तोह पड़ी लेकिन निचे न हुई. अर्जुन दोनों उभारो को रगड़ कर उन्हें गर्मी देता हुआ निप्पल बुरी तरह चूसने लगा. छूट में हलकी सनसनाहट ने बता दिए था के कोमल संभल चुकी है लेकिन जब अर्जुन न हिला तोह खुद हे कोमल दीदी ने टंगे और ढीली करते हुए कमर निचे करनी शुरू की और अर्जुन कुछ समझता उस से पहले वह समूचा लुंड अंदर लेती दोनों के शरीर मिला चुकी थी.
"माँ.. अर्जुन तू पूरा समां गया.. aahh..Ab तेरी बारी.", दर्द और जूनून से भरी कोमल को देख अर्जुन ने एक झटके में हे आधा लुंड बहार निकल कर फिर से अंतिम चोरर तक पंहुचा दिए. गद्देदार कूल्हों के बीच अगले 20 धक्को तक उसके अंडकोष जोर से टकराते और दीदी की हलकी कराह या चीख उसके कानो में पड़ती रही. जल्दी हे दर्द सा लाल समां नीले रंग में भरने लगा.
"बस यही सफर तोह चाहती थी मैं.. आह्हः.. ऐसे हे अर्जुन ाःह.. उम्म्म्म", कमर उसकी ताल से मिलती वह अपने बड़े चुत्तड़ जोर से ऊपर धकेल कर अर्जुन से ये सम्भोग युद्ध लड़ रही थी. कॉमर्स की बुँदे छूट के अंदर चुहाने लगी तोह सिसकिया दोनों की फूटने लगी. मजे की ऐसी अधिकता अर्जुन ने कभी सोची तक न थी जो आज वह साक्षात् महसूस कर रहा था.
"इस सफर में मैं अंत तक आपके साथ rahunga...aahh.. दीदी.. आज कुछ हो रहा है मुझे.", वह बेकाबू होता उनकी टाँगे पूरी चौडाता हुआ हर बार छूट के मुँह पर प्रहार और गहरा करने लगा. साँसे चढ़ने लगी लेकिन वह जैसे रुकना नहीं चाहता था.
"उम्म्म.. नीचे आ.", दीदी की बात का असर इस गति में भी उसपर अगले हे पल हो गया. दोनों उभर छाती पर घिसती वह आगे पीछे हो रही थी लुंड पर उछलने की जगह. रास बहती छूट मॉटे लुंड पर प्यार से थिरकती हुई अर्जुन के आनंद को पहले से दुगना करने लगी.
"दीदी.. आठ.. क्या कर रही हो.. आअह्ह्ह.. ऐसे हे दबा कर रगड़ो.", चुचो के तीखे निप्पल चाकू की धार से अर्जुन की छाती पर आगे पीछे चलते हुए उत्तेजना के चरम पर ले जाने लगे. और मोटी फैंको के बीच फिसलता लुंड इस जन्नत से बहार आना हे नहीं चाहता था. कोमल का दूसरा स्खलन किसी पानी की तेज धार सा छूट और लुंड को भिगोने लगा.
"हूऊऊह्ह्हह्ह.. मा.. खड़ा हो अब. तेरी बारी.", दीदी हार न मानती लुंड से उठी तोह ये गाढ़ी धार पूरी तरह लुंड पर गिरती उसके अंडकोष भी गीले करते चली गई. अर्जुन पहली बार कोमल दीदी को घुटनो के बल गांड बहार उभरे देख रहा था. बीच का वह लाल चीरा अभी भी चिकनाई टपकता उसके इन्तजार में फड़क रहा था.
"आह दीदी. क्या नशा कर रही हो. न झड़ने दे रही हो न रुकने.", अर्जुन ने दोनों झुके हुए चुके बेदर्दी से पकड़ कर दबाते हुए जड़ तक लुंड घुसा दिए.
"और तेज दबा इन्हे अर्जुन.. आह.. माँ.. ऐसे हे .. रुकना मत अब.", किसी इंजन सा धक्के लगता अर्जुन अब रुकने वाला भी नहीं था. दिल की धड़कन और लुंड की रफ़्तार दोनों हौद में लगे थे. उनके पिछवाड़े से चिपका वह घुटने टिकाये पूरा लुंड गहराई तक अंदर बहार करने लगा
"Patt-patt" की आवाज दोनों के शरीर के भिड़ने से इस पल को जहा जगाये रखे थी वही छूट रास की अधिकता और खली जगह को भरते लुंड से निकलती fach-fach की आवाज दोनों को एक दूसरे से ज्यादा चिपका रही थी.
"मैं होने लगा हु दीदी. आह्हः.", अर्जुन लुंड बहार निकाल पता उस से पहले हे छूट ने वह सूपड़ा अंदर दबा लिए. कंपता हुआ शरीर पिचकारी के बाद पिचकारी छोड़ता पूरी छूट को हे जैसे गाढ़े तरल से भरने लगा. ज़िन्दगी में पहली बार अर्जुन इतना झाड़ा था और इतनी देर तक. आखिरी कटरा तक लुंड से पीने के बाद छूट ने उसको अपनी गिरफ्त से आजाद किआ तोह धम्म की आवाज से अर्जुन मुँह के बल एक तरफ गिर गया.
टाइट छूट मुँह खोले फ़ैल चुकी थी. अंदर की गहरी लाली के बीच से टपकता वह सफ़ेद रास लम्बी धार सा बिस्टेर पर गिरता रहा. कोमल इस मादक मुद्रा में कड़ी छूट के अंदर से सारा रास बहार निकल कर हे अर्जुन की तरफ लुढ़की. निप्पल सूज चुके थे और गोर तन्न पर हर तरफ उँगलियों, दांतो और दबाव के निशाँ इस मिलान की पूरी दास्ताँ बयान कर रहे थे. अर्जुन जैसे होश में हे नहीं था. लड़खड़ाती हुई कोमल जैसे तैसे टोलिया लपेटे बाथरूम से खुद को साफ़ करके आई और नंगी हे अर्जुन की पीठ पर लेट गई. अर्जुन श्रेष्ट नहीं था, उसने दिल से मान लिए था. उस मखमली नरम शरीर से हार कर भी वह खुश था जो पूर्ण अधिकार से उसके ऊपर था.