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Arjun-Shankar/Dev-Danav
3 बजे के समय था कोई और एक साधारण से होटल के कमरे में संजीव अकेला हे बीएड पर सोया हुआ था. दरवाजे की घंटी के एक बार बजते हे वह झट्ट उठ खड़ा हुआ. कसरती जिस्म ऊपर से बेपर्दा था जिसकी परवाह किये बिना वह उठते हे दरवाजे पर पहुंच गया.
"बड़ी देर कर दी आने में आपने.", सामने डॉ शंकर खड़े थे, हाथ में के बैग लिए. उन्हें कमरे के अंदर करते हे संजीव ने फिर से दरवाजा बंद कर दिए.
"ये हाथ कैसे जख्मी हुआ?", बैग खोलते हुए उन्होंने मरहम पट्टी का सामान निकाल कर बिस्टेर पर रखा और संजीव के हाथ पर बंधा कपडा खोल कर ध्यान से देखने लगे.
"सब सही जा रहा था लेकिन एक हमारी उम्मीद से 3 लोग ज्यादा थे वह. फिर भी बचाव हो गया क्योंकि गोली मेरी हे पिस्तौल से टकरा गई थी.", संजीव की बात सुनते हुए शंकर जी चिमटी की मदद से 3-4 छोटे धातु के टुकड़े हथेली से निकल रहे थे. जख्म ाचे खासे थे लेकिन कोई शिकन न थी संजीव के चेहरे पर. सभी टुकड़े निकलने के बाद एक तरल से हाथ को साफ़ करने के बाद उन्होंने ख़ास तरह की मलहम एक पट्टी के टुकड़े पर लगाने के बाद उसको हथेली पर चिपका दिए. रूई का टुकड़ा लगाने के बाद ऊपर पट्टी करते हुए उन्होंने अगला प्रश्न किआ.
"कोई निशाँ पीछे?"
"नहीं. 7 लोग थे कुल वह. रोशन के भाई समेत सभी 3 से ज्यादा संगीन अपराध में वंचित.", संजीव ने पट्टी हो जाने के बाद ध्यान से हाथ को देखा और फिर टेबल पर उलटे रखे दोनों गिलास साफ़ करने के बाद वही पड़ी 'वैट 69' की बोतल से दोनों के लिए गिलास में जाम तैयार किये. थोड़ा पानी और बंद डब्बे से निकाल कर 3-3 टुकड़े बर्फ के डालने के बाद एक गिलास अपने चाचा की और बढ़ा दिए.
"कुछ jaan-ne लायक बात", गिलास होंठ पे लगाने से पहले शंकर जी ने पुछा.
"बहोत साडी है. जिन तीन लोगो की वह उम्मीद नहीं थी, वह सभी फाजिल्का एरिया कण्ट्रोल करते थे. सारा सफ़ेद सामान उन्ही के पास से इधर आता था. तक़रीबन 8 मर्डर के केस में वह भगोड़े करार थे पंजाब के 3 ज़िलों में और हरयाणा के 2. रोशन के भाई पास से ये बरामद हुआ जो वह रोशन को देने वाला था और शायद फिर वही जहा आपने मुझे नजर रखने को कहा था.", ये 4 तस्वीरें थी जिन्हे शंकर शर्मा ने देखा और एक तरफ रख दिए.
"सिग्रेटे.", शंकर जी ने इतना हे कहा तोह संजीव ने 2 सिग्रेटे सुलगते हुए एक उनकी तरफ बढ़ा दी.
"उनमे से एक आदमी ***** गांव से था और उसके पास ये तस्वीर, चिट्ठी और 3 लाख बरामद हुए. एक सूटकेस में था सारा सामान. पैसे मैंने हक़ भिजवा दिए थे बाकी असले और पैसे के साथ. .", इस बात को सुनते हे शंकर जी ने गिलास एक तरफ रखते हुए तस्वीर पर भरपूर निगाह डाली. फिर चिठ्ठी को पढ़ने के बाद संजीव की तरफ देखा.
"इनके साथ क्या चक्कर हो सकता है?", आस भरी निगाह से अब संजीव अपने चाचा की तरफ देख रहा था. शंकर जी ने 2 लम्बे काश लगाने के बाद सिग्रेटे बुझा कर raakh-dani में दाल दी.
"कनेक्शन समझो. ये उमेद गुज्जर है और मोहर सिंह खुद इसका कुछ बिगड़ नहीं सकता तोह उसके पास 2 हे रस्ते बचते है. या तोह किसी प्रोफेशनल से काम करवाया जाये या अपने भांजे बिजेन्दर से. तुमने पहला रास्ता फ़ैल कर दिए अब वह दूसरे को परखेगा, लेकिन एकदम से नहीं. और बिजेन्दर पर नजर रखना.", सारा सामान अपने ब्रीफ़केस दाल कर उन्होंने वह बंद कर दिए.
"आपका ऑपरेशन कैसा रहा?", संजीव ने दोनों गिलास में फिर से जाम बना दिए थे.
"मैं डॉक्टर हु और ऑपरेशन सफाई से करना मेरी आदत है. और शायद ये कहो तोह ज्यादा बेहतर होगा के मेरी टीम बदलती नहीं और सभी मेंबर अपने काम में माहिर है. मंगत की सर्जरी सक्सेसफुल रही और सांगवान का जन्मदिन भी."
इसके बाद जाने कितनी देर दोनों की बातें चलती रही और सुबह 6 बजे डॉ शंकर कमरे से चले गए संजीव को पूरा दिन आराम करने का बोल कर. आज संजीव ने पहली बार कोई ऐसा मिशन अकेले पूरा किआ था जहा उसके अनुमान से ज्यादा लोग और पास में गोलीअ काम थी. लेकिन अपने चाचा से इन 3 घंटो में वह सीख चूका था के भविष्य में ये गलतिया कैसे ख़तम करनी है.
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तक़रीबन पौने 6 बजे ऋतू दीदी ने करवट बदली तोह अर्जुन की आँख खुल गई. नींद में भी ऋतू के चेहरे पर एक मोहक मुस्कान थी लेकिन अर्जुन को कुछ अलग महसूस हुआ तोह बिना ज्यादा hile-dule उसने अपने पिछली तरफ देखा तोह अलका दीदी भी उस से चिपक कर सोई हुई थी. टीशर्ट पेट से ऊपर उठी हुई थी और एक उभार लगभग आधा बहार था. अर्जुन ने जल्दी से टीशर्ट को ठीक किआ और फिर आराम से बिस्टेर से उतर कर दोनों के ऊपर चद्दर डालने के बाद बहार आ गया. अब बारिश रुक चुकी थी लेकिन फिर भी आसमान में कही कही काले बादल घिरे हुए थे.
"अलका दीदी कब आई हमारे पास.?", सर को खुजाता वह सीधा नीचे उतर कर बाथरूम में घुस गया. नाहा धो कर अपने कमरे में आया और स्कूल के कपडे पहन कर पहले छत्त पर सबकुछ ठीक किआ और फिर जहा Ritu-Alka सो रही थी उस कमरे को. सबकुछ सही करने के बाद नीचे आते हे सामने दादी के खड़े पाया.
"आज सुबह गया नहीं तू?"
"दादी बारिश में अगर जाता तोह फिर बिस्टेर पर पड़ा होता. वैसे भी कल ज्यादा हे म्हणत हो गई थी. पहले स्कूल फिर स्टेडियम और रात को पढाई.", उनके हाथ से दूध का गिलास और 2 लड्डू लेकर वही आँगन में राखी कुर्सी पर बैठ कर वह खाने लगा.
"सही बात है वैसे तेरी. कोई बात नहीं थोड़े दिन में सब अपने समय पर होने लगेगा.", इतना कहती कौशल्या जी रसोईघर में काम कर रही ललिता और रेखा जी के पास चली गई.
रूपाली भी तैयार हो कर नाश्ता करने बैठ गई थी और प्रियंका दीदी चाय की ट्रे लेकर अपने कमरे में जा रही थी. कोमल और माधुरी दीदी के पास.
"ऋतू दीदी कहा पर है?", इतनी सुबह प्रीती को सामने देख अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ लेकिन उसकी बात सुनते हे चुप हो गया.
"वो और अलका दीदी ऊपर इस साइड वाले कमरे में सो रही होंगी.", रूपाली ने अपनी जगह बैठे हुए हे इशारे से प्रीती को बताया और वह तेजी से सीढ़ियां चढ़ती ऊपर चली गई.
"दीदी, अभी स्कूल जाने में पूरा एक घंटा पड़ा है. मैं जरा अपने एक दोस्त से मिल कर आ रहा हु. 15-20 मिनट में वापिस आ जाऊंगा.", रूपाली को इतना बता कर अर्जुन ने गलियारे में राखी अपनी पतले टायर वाली साइकिल उठाई और निकल लिए अपनी मंज़िल की तरफ.
"128, 127 और ये रहा 126.", अर्जुन 2 मिनट बाद हे इस आलिशान से घर के बहार खड़ा था. 4 लोगो के हिसाब से थोड़ा ज्यादा बड़ा और एक कार अंदर कड़ी थी और एक बहार. आसपास नजर दौड़ाई तोह बस इधर 4 हे घर थे और इनके सामने पार्क की छोटी वाली साइड. साइकिल एक तरफ कड़ी करने के बाद उसने घर के बढ़ा लगा घंटी का बटन दबा दिए. 'Trrr-Trrr'
आँगन के दूसरी तरफ जाली का दरवाजा खोलती हुई भरे भरे शरीर की 40-45 साल की ये गौरवर्ण महिला गेट की तरफ आ गई.
"हांजी क्या काम है?", गेट के दूसरी तरफ से उन्होंने अर्जुन पर नजर डालते हुए कहा. वह भी देख चुकी थी के ये लड़का स्कूल ड्रेस में है.
"जी आंटी जो वह अजीत अंकल से जरुरी काम है. एक बार उन्हें बता देंगी.", अर्जुन ने लचर आवाज में कहा. वह महिला बड़बड़ाती हुई अंदर चल दी. "इतने बड़े हो गए लेकिन दोस्ती स्कूल के बचो से लगाए रहते है." कुछ हे देर बाद एक सांवले रंग और औसत लम्बाई के साथ थोड़ा बहार को निकले पेट वाला अजीत सोलंकी कालर वाली टीशर्ट और घुटने तक की खुली निक्कर पहन कर सामने से चलता गेट तक आया.
अर्जुन को देख कर वो जैसे इस अनजान चेहरे को याद करने की असफल कोशिश करने लगा और अर्जुन ने उसकी शंका ख़तम करते हुए जेब से वह कागज़ का टुकड़ा निकल कर सामने कर दिए. चेहरे पर राजदार मुस्कान थी जिसको देख सोलंकी भी थोड़ा खुश होता बहार आ गया.
"तोह तुम हो मेरे कबूतर? लेकिन यहाँ चल कर आने की कोई खास वजह?", वो समझ गया था के ये लड़का भी काम के बदले sewa-pani की इत्छा रखता है.
"अंकल पार्क में चल कर बात करते है अगर 5 मिनट हो आपके पास?", अर्जुन ने वही मुस्कान चेहरे पर रखे हुआ कहा और सोलंकी हाथ से उसको साथ चलने का इशारा करता पार्क के अंदर जाने वाली जगह से प्रवेश कर गया.
"इसके बदले मैंने सनी को 1000 रुपये दे दिए थे ताकि वह तुम लोगो को खुश रखे. कही तुम भी उसकी तरह बहती गंगा में हाथ तोह नहीं धोना चाहते.?", इस समय उसके चेहरे से भरपूर काइयाँ पैन टपक रहा था.
"मैं जो चाहता हु उस से तेरा भविष्य अन्धकार में नज़र आता है सोलंकी.", खली पार्क में दूर बेंच पर सोलंकी की बगल में बैठे अर्जुन की आवाज में पहले से विपरीत सिर्फ आवेश और चेतावनी थी. लेकिन स्वर बहोत धीमा और सार्ड. अजीत सोलंकी के चेहरे के भाव भी अचानक बदल गए.
"तू क्या बात कर रहा है लड़के? तू मुझे जानता नहीं है ाचे से.", सोलंकी ने देखा था के ये लड़का जरुरत से ज्यादा हे तगड़ा और लम्बा चौड़ा है. लेकिन है तोह एक स्कूल जाने वाला नादान.
"पहले तू मेरे बारे में जान ले. अर्जुन शर्मा नाम है मेरा और इस नाम को तू कभी भूल न सके उसके लिए मेरे पिता का नाम भी बता देता हु, "डॉ शंकर शर्मा"." इतना सुनते हे सोलंकी की गर्दन झुक गई जिसको वह अपने दोनों हाथो से छुपाये था.
"तेरी भी एक जवान बेटी है, सुना ये भी है के वह खूबसूरत भी बहोत है.", अर्जुन ने उसके पत् पर हाथ रखते हुए कहा. सोलंकी अंदर तक हिल गया था उसकी बात का मतलब समझते हुए.
"ऐ.. इस सबसे उसका क्या लेना देना?"
"देखा कैसे आवाज निकली अपनी बेटी का नाम सुनते हे. मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला. लेकिन कान खोल कर एक बात सुन ले, जो काम तू करने की तैयारी कर रहा था उसको अंजाम तक पहुंचने के लिए ठोस सबूत जरूर होंगे तेरे पास. वह मुझे चाहिए और ऐसा न करने की सूरत में मैं तेरे साथ क्या करूँगा तू सोच भी नहीं सकता. तूने 2 बजे का समय निर्धारित किआ था न तूने उस मासूम की ज़िन्दगी खराब करने के लिए, तोह आज दोपहर 1:50 पर मैं तेरे घर आऊंगा. और अगर तुझे मेरी बातें कोरी धमकी लग रही है तोह पिछले महीने की 25 तारीख का अखबार उठा कर देख लेना, पुलिस ने जो 2 हत्यारे बेहोशी की हालत में kshatt-vishatt हालत में पकडे थे वह मेरा हे काम था. और तू उनसे कुछ अलग नहीं है, जैसी सोच है तेरी. चलता हु मैं और समय पर आऊंगा तुझसे मिलने.", अर्जुन ने कलाई घडी में समय देखा और सोलंकी को pareshan-gum में डूबा वही बैठा छोड़ बहार आ गया.
पहली मंजिल पर कड़ी ये लड़की ध्यान से देख रही थी कभी अपने बाप को और कभी इस लड़के को जो उनके घर के सामने से अपनी साइकिल चला कर निकलता बना. इधर सोलंकी कुछ याद करते हुए बेंच से खड़ा हुआ और अपने घर का दरवाजा खोल सीधा अपनी बीवी को आवाज लगाने लगा.
"Geeta-Geeta"
"कहो क्या काम है?"
"वह पिछले महीने के अखबार कहा है?", सोलंकी जैसे अभी भी उस लड़के को जांचना चाहता था.
"ऊपर चट्टी पर रखे है तारिख के हिसाब से. लेकिन उनमे क्या देखना है?", बीवी की पूरी बात सुने बिना हे वह अंदर हे बानी सीढिआँ चढ़ता खुली छत्त पर जाने से पहले बानी स्टोर नुमा जगह पर रखे अख़बार ध्यान से देखने लगा. 25 तारिख.. जैसे हे वह अखबार उसने उठा कर ध्यान से देखना शुरू किआ, उनके शहर वाले पृष्ट पर छपी बड़ी खबर पर उसकी नजर अटक गई. "जितेंदर और विष्णु घायल अवस्था में पुलिस को #### स्टैंड पर बेहोशी की हालत में मिले", इस लाइन को वह स्वर में बोल बोल कर पढ़ गया. और अख़बार हाथ से चूत कर नीच गिर चूका था.
"मतलब वह सही कह रहा था. और वो बीटा भी शंकर का है मतलब पंडित रामेश्वर के घर से.", अंदर तक हिल गया था सोलंकी. लेकिन इस सबके बीच वह ये न देख सका के उसकी लाड़ली, जिसको वह दुनिया के डर से ज़्यदातर घर में हे रखता था, उसने सब देख सुन्न लिए था. खुद को दुरुस्त करता वह नीचे चला गया. और उस लड़की ने अपने बाप के जाने के बाद वही अखबार उठा कर ध्यान दिए लेकिन ज्यादा कुछ समझ नहीं आया.
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आज भी आकांक्षा घर के बहार हे मिली थी और पिछले दिन की तरह अर्जुन उन दोनों के पीछे चल रहा था और वह अपनी बातो में लगी आगे आगे.
"आ गया बहनो का भैया. देखो सही काम लगाया हुआ है इसको, पीछे गुलाम की तरह सामान ले कर चलने के.", अर्जुन ने सनी की बात को नजरअंदाज करते हुए बस संदीप की आँखों में देखा और उसने पलके झपका कर जवाब दे दिए. फिर बिना रुके अर्जुन स्कूल के अंदर आ गया.
"फत्तू साला.", मुकेश ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा और सभी हंसने लगे.
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आज भी विद्या मैडम की क्लास ाची गई थी. लगभग सभी बचे इस सब्जेक्ट में ाचे थे और उनके पढ़ने का तरीका भी सरल था. पीरियड समाप्त होते हे सभी स्टूडेंट्स अपने आप हे सीधे बैठ गए थे लेकिन अर्जुन कल वाले डेस्क पर हे आज अंदर की तरफ था. डेस्क पर कोहनी टिकाये किताब में खोया हुआ. जब सभी ने एक साथ गुड मॉर्निंग मिस कहा तोह वह भी जल्दी से खड़ा हुआ लेकिन मिस अन्नू वालिए की नज़र तोह जैसे आते हे उस पर थी.
"सीट डाउन आल.", सबके बैठने के बाद उन्होंने अटेंडेंस लेनी शुरू की लेकिन आज वह हरेक नाम बोलने के बाद स्टूडेंट का चेहरा देख रही थी. अर्जुन का रोल नंबर 4 था क्योंकि नाम 'ा' से था और जैसे हे मिस वालिए ने अर्जुन शर्मा पुकारा, अर्जुन ने बड़ी शालीनता से 'प्रेजेंट' बोलै.
'अर्जुन शर्मा', मैं में ये नाम दोहराया मिस वालिए ने और फिर बिना ऊपर देखे सबकी हाजरी लगा ली.
"हम कल कहा थे?", मैडम ने इतना हे कहा के सभी ने एक स्वर में टॉपिक का नाम लिए, "एनर्जी- फंडामेंटल्स"
"गुड. मतलब सभी का ध्यान था क्लास में.", वह बोल रही थी और अर्जुन फिर से उस किताब में हे देख रहा था. लेकिन आते हे टोकना जैसे मिस वालिए को ठीक नहीं लगा. उन्होंने पहले आज का टॉपिक एक्सप्लेन किआ फिर बाकी बचो से 2-3 सवाल किये. जैसे हे सवाल थोड़े मुश्किल होने लगे क्लास में हाथ भी काम उठने लगे थे.
'मटर' से शुरू हुए क़ुएस्तिओन्स और भी ज्यादा मुश्किल हो गए जब मैडम ने फिर से अर्जुन को खड़ा किआ और आज समय भी पर्याप्त था सवाल भी. डेंसिटी, एटम, structre,nature सभी सवाल मिस अन्नू वालिए ने कर लिए थे लेकिन अर्जुन के पास सवाल ख़तम होते हे जवाब तैयार थे. मिस अन्नू वालिए जवान थी और दिमाग से गरम, बिना ज्यादा अनुभव के. और अगले 10 मिनट में हे फिजिक्स में मेजर करने वाली मैडम के पास सवाल ख़तम हो चुके थे. 6-7 सवाल तोह ऐसे थे जो बाकी किसी भी स्टूडेंट ने सुने भी नहीं थे कभी.
गोरा गुलाबी चेहरा अब हताश दिख रहा था. लेकिन हारने से पहले एक आखिरी सवाल किआ उन्होंने जिसका जवाब अर्जुन सही देते देते गलत दे गया.
"गेट आउट ऑफ़ माय क्लास. यू ओवरस्मार्ट.", ज्वालामुखी फट पड़ा था अर्जुन की इस गलती से लेकिन ये कहने के बाद हे अंदर से उन्हें एहसास हो गया था के अभी जो यहाँ हो रहा था वह कही से भी एक शिक्षक और विद्यार्थी का स्तर नहीं था. लेकिन वह कक्षा से अर्जुन को निकल चुकी थी और अपनी गलती मान लेना मुमकिन न था. डेस्क पर राखी अपनी पानी की बोतल से एक घूँट पीने के बाद वह चुपचाप बस बोर्ड पर घर से करने के लिए काम लिखने लगी और उसके बाद घंटी बजने से 5 मिनट पहले हे क्लास से निकल गई.
दर्शन जी की क्लास में आज भी सभी ने दिल से पढाई की और साथ हे उन्होंने पढ़ते हुए hansi-majaak का माहौल भी बनाये रखा. Chapter को समझते हुए वह आम ज़िन्दगी से जुड़े हुए मजेदार उदाहरण देते थे जो बिलकुल हे अलग और प्रभावशाली तरीका था. अपना पीरियड ख़तम होने से पहले वह भी थोड़ा मजेदार काम करने के लिए देते गए थे.
मिस चारुल सिंह आज भी क्लास को ग्राउंड में ले आई थी. लड़कियां फिर से सीढ़ियों पर बैठ कर criss-cross, पजल जैसे खेल खेल रही थी वही आज लड़को ने 2 टीम बना कर फूटबाल खेलना तये किआ. क्लास में 10 लड़किया और 14 लड़के थे जिसमे से एक लड़का आज नहीं आया था और अर्जुन ने खेलने से मन कर दिए तोह बाकि सभी 6-6 की टीम बना कर खेलने लगे. अर्जुन जहा लड़कियां बैठी थी उसी कतार में थोड़ा दूर जा कर अकेला बैठ गया.
"तुम नहीं खेल रहे?", मिस चारुल सिंह भी घूमती हुई अर्जुन के पास आ कर कड़ी हो गई थी. आज उन्होंने हलकी गुलाबी लिपस्टिक लगाई हुई थी और स्पोर्ट्स पाजामे की जगह एक फिटिंग वाली जीन्स पहन राखी थी. भूरे बाल आज भी ऊपर से बंधे थे.
"नहीं. सेविंग एनर्जी.", अर्जुन ने ये जानबूझ कर कहा था. उसने पीछे से आती मिस वालिए को देख लिए था और उसका ये जवाब सुनकर मिस वालिए एक पल के लिए रूकती हुई बस उसको हे देखने लगी. यहाँ बहार के उजाले में अर्जुन ने देखा था के सुर्ख गुलाबी रंग के साथ हे उनकी आँखों का भी रंग भी हल्का भूरा था. और चेहरे पर थोड़ी मायूसी.
"मतलब?", चारुल मम को पता नहीं चला के वह कहना क्या चाहता है.
"मिस, मैं स्टेडियम में शाम को 4-6 बॉक्सिंग प्रैक्टिस करता हु और फिर सुबह भी रनिंग और एक्सरसाइज के लिए जाता हु. इसलिए अभी थोड़ा बॉडी एनर्जी सेव कर रहा हु.", अर्जुन ने जब पूरी बात बताई तोह चारुल मैडम उसके पास हे बैठ गई. उन्होंने जब अन्नू मम को देखा तोह मुस्कुराते हुए अपने पास हे बुला लिए. वह चुपचाप उनकी तरफ बैठ गई.
"स्टेडियम में किसके अंडर प्रैक्टिस कर रहे हो? अनिल जी या रविंदर कुमार?" अर्जुन ने ये नाम सुने थे क्योंकि वह जूनियर लेवल के साधारण लड़को को सिखाते थे. चारुल मैडम को उनके नाम पता होना थोड़ा ताज्जुब की बात थी.
"नहीं नहीं. मेरे कोच सर जोगिन्दर सिंह संधू जी है. और हो सकता है अगले महीने मैं हैवी वेट जर में भाग लू.", मिस चारुल को थोड़ी हैरानी हुई जब अर्जुन ने अपने कोच का नाम लिए और बॉक्सिंग के बारे में बताया.
"कितने समय से प्रैक्टिस कर रहे हो?"
"एक महीना हुआ है अभी, मिस.", अर्जुन ने ये जवाब दिए तोह देखा की अन्नू मम उसको हे देख रही थी.
"तुम बैठो एक बार मैं आती हु अटेंडेंस रजिस्टर लेकर.", वह फुर्ती से कड़ी हुई और बिल्डिंग के अंदर की तरफ चल दी.
"तुम्हे बुरा नहीं लगा आज?", ये आवाज अन्नू मम की थी जो अर्जुन से नजरे मिलाये बिना सामने ग्राउंड की तरफ देख कर बोल रही थी.
"मिस बुरा किस बात का. आपने क्वेश्चन किआ, मैंने गलत बताया तोह सजा मिलनी हे चाहिए. एग्जाम में भी तोह गलत नंबर के मार्क्स कट होते है.", अर्जुन भी सामने देखते हुए हे जवाब दे रहा था. उसको यही ठीक लगा, क्योंकि सीधा आँखों में देखना ठीक नहीं था ऐसे अवसर पर.
"तुम्हे पता है वह क्वेश्चन तुम्हारी बुक से बहार का था.?"
"मेरी बहिन मेडिकल स्टूडेंट है और मैंने वह उसकी हे बुक्स में पढ़ा था."
"और तुम्हे उसका जवाब भी पता था न?", मिस अन्नू अब अर्जुन की तरफ देख रही थी. बहार हलकी हवा में उसके कुण्डल जैसे घुंगरल बाल हवा से हिल रहे थे. चेहरा कितना शांत था और आवाज में एक ख़ास भारीपन.
"मम, गलती ये हुई की मैंने उस से पहले कुछ ज्यादा हे जवाब दे दिए थे. ये ध्यान नहीं रहा के ओने 2 ओने डिस्कशन नहीं है, पूरी क्लास हमे देख रही है. एंड I'm रियली सॉरी फॉर तहत. आपने ये मुकाम अपनी म्हणत और लगन से कमाया है और स्टूडेंट्स का ाचा भविष्य बनाने में सबसे ज्यादा योगदान टीचर का हे रहता है. मैं कुछ समय के लिए भूल गया था. ी विल नेवर रिपीट सुच मिस्टेक अगेन.", अर्जुन ने बात ख़तम करि हे थी और मिस चारुल रजिस्टर लेकर उधर हे आ गई. और मिस अन्नू को जैसे अर्जुन के इस जवाब ने और परेशां कर दिए था लेकिन अभी वह आगे बात नहीं कर सकती थी.
"अभी तोह 20 मिनट से ज्यादा टाइम पड़ा है. हाँ तोह अर्जुन हम कहा थे?", उनकी ऐसी बात पर अर्जुन के जुबान एक बार फिर फिसल गई
"मिस हम तोह यही थे बस आप रजिस्टर लेने गई थी.", उसकी बात पर चारुल मैडम ने आँखें तरेर कर देखा तोह अर्जुन को गलती का एहसास हो गया.
"सॉरी. ध्यान नहीं रहा."
"It's ऑलराइट. वैसे बता देती हु मेरा पूरा नाम चारुल सिंह संधू है. और मेरे पापा तुम्हारे कोच है.", अब बारी अर्जुन की थी हैरान होने की.
"ओह..", वह इतना हे कह पाया.
"मैं भी स्टेडियम जाती थी लेकिन अब यहाँ इवनिंग में आना पड़ता है 1 घंटा रोज तोह ी ऍम आल्सो सेविंग एनर्जी.", इस बार वह ऐसे मुस्कुराई जैसे दोस्तों के साथ हो. घडी पर नजर डालने के बाद वह उठ कड़ी हुई और मिस अन्नू ने भी जाने से पहले एक बार फिर अर्जुन की तरफ देखा, जो उधर हे चल दिए था जहा बाकि सभी स्टूडेंट्स आ चुके थे हाजरी लगवाने.
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आज भी केमिस्ट्री की मैडम नहीं आई थी लेकिन ये सुब्स्तितुते लग गया था लाइब्रेरी के लिए और सभ स्टूडेंट्स ने अपनी पसंद की किताबो में ध्यान लगा लिए था. बस यही समय था जब अर्जुन आकांक्षा के साथ एक तरफ बैठा था और दोनों टेबल के नीचे से एक दूसरे का हाथ पकडे धीमी आवाज में बातें कर रहे थे. ये 40 मिनट कब ख़तम हुए दोनों को पता हे नहीं चला.
"भाई सनी और मुकेश?", संदीप ने अर्जुन को बैग उठाते देखा तोह पास आ कर जैसे पूछ रहा था के उनका क्या करना है.
"मैंने रूपाली दीदी को बोल दिए है के वह और आकांक्षा साथ चले जाये मैं थोड़ी देर तक आऊंगा. अब हम कुछ देर यही रुकते है और सनी तेरे बिना यहाँ से जाने से रहा तोह बस इन दोनों के जाते हे मैं सब संभल लूंगा.", अर्जुन ने संदीप को आश्वस्त किआ और दोनों वही गलियारे में कुछ देर खड़े रहे. जब इस तरफ का सारा स्कूल खली दिखने लगा तोह दोनों एक साथ हे बहार की तरफ चल पड़े. गेट के बहार हे सनी अपने 3 दोस्तों के साथ खड़ा संदीप का हे इन्तजार कर रहा था.
"कहा मर्डर गया थे रे बहनचोद.?" थोड़े गुस्से से उसने संदीप को आवाज लगाई लेकिन अर्जुन उसका हाथ पकड़ कर बिना सनी की और ध्यान दिए अपने साथ सड़क पार गली की तरफ चल दिए.
"ओह बहिन के लोडे तुझे सुन्न नहीं रहा मैं.. कडाककककक." सनी ने जब देखा की संदीप उसकी बात सुनकर भी अनसुना करता जा रहा है तोह वह गाली देते उसके पीछे लपका लेकिन जबड़े पर पड़े इस मुक्के ने उसके मुँह का भूगोल हिला दिए था. अर्जुन ने संदीप को एक तरफ करते हुए भरपूर प्रहार किआ था सनी के बाए गाल पर. फिर उसका गिरेबान पकड़ते हुए tada-tadd थप्पड़ो की बौछार कर दी थी. अपने दोस्त का ये हाल होता देख बाकी तीनो भी उनकी तरफ लपके लेकिन अर्जुन तैयार था. मुकेश जिस रफ़्तार से उसकी तरफ लपका था, अर्जुन ने उतनी हे फुर्ती से मुकेश को कमीज से पकड़ कर और आगे की तरफ जैसे उछाल हे दिए था. कन्धा अमलताश के वृक्ष के तने से टकराते हे मुकेश की दर्दभरी चीख निकल गई और इधर बाकी दोनों में से एक की गर्दन अर्जुन के पंजे में थी और आखिरी वाला अर्जुन को एक मिनट वही रुकने की धामी देता उनसे विपरीत दिशा में भाग लिए. संदीप में भी अब हिम्मत आ चुकी थी और वह भी नीचे गिरे मुकेश पर थप्पड़ बरसाने लगा.
"वह बचने नई चाहिए भाई.", इतने में वह चौथा लड़का स्कूटर पर पीछे बैठ कर उधर आ गया. उसके साथ कुलविंदर और राणा थे जिन्होंने जैसे हे स्कूटर बंद करने के बाद सामने अर्जुन को देखा तोह दोनों की घिघि बांध गई.
"ओह मादरचोद ये किस से लड़ने के लिए बुला लिए.", कुलविंदर ने पहले तोह खुद हे उस लड़के के गाल पर झापड़ रसीद कर दिए और उसके बाद दोनों हाथ जोड़ कर अर्जुन के सामने खड़ा हो गया. राणा तोह अर्जुन को देख कर पैदल हे वह से निकल लिए.
"भाई मेरा इनसे कोई लेना देना नहीं है. तुम कहो तोह मैं हे इन्हे मारता हु. लेकिन मैं इनके साथ नहीं दिखूंगा तुम्हे कभी.", नीचे गिरे सनी पर 3-4 ठोकर मरते हुए कुलविंदर जैसे उनपर हे गुस्सा निकल रहा था. संदीप और अर्जुन ने उन्हें मरना बंद कर दिए था क्योंकि ाची खासी धुनाई हो चुकी थी तीनो की और बस मुँह से खून आने के कसार रह गई थी.
"बस अपने दोस्तों को इतना समझा देना कुलविंदर की मैंने इन्हे सिर्फ सहलाया है. मार कैसे पड़ती है ये इन्हे दिखाया तोह इनके घरवालों को दुःख होगा की उनके बचो की ये दुर्दशा किसने की.", कुलविंदर के कंधे पर हाथ रखते हुए अर्जुन ने साइकिल का स्टैंड हत्या और संदीप के साथ आगे बढ़ चला.
"अरे बिलकुल गांडू आदमी है तू सनी, साले इस राक्षश से पन्गा ले लिए? शुक्र मन हलके हाथ से मारा तुझे नहीं तोह..", कुलविंदर अपने गाल पर हाथ रखता सनी और मुकेश के कपडे ठीक करता उन्हें समझा भी रहा था.
"भाई मुझे लगा के तुम आते हे उसकी धुलाई करोगे और यहाँ उल्टा मुझे हे कूट दिए.", सनी की आँखों से आंसू बह रहे थे और रो तोह मुकेश और वह तीसरा लड़का भी रहे थे.
"अरे शुक्र मन के अभी भी वह गुस्से में नई था. तुम्हारी शकल उतनी भी नहीं बिगड़ी, मैं और राणा तोह 3 दिन तक रुमाल बांड के घर में बंद रहे थे.", कुलविंदर उनको आपबीती बता रहा था.
"है बहनचोद का हाथ बहोत भरी है लेकिन तुम्हे देख के नहीं लग रहा के तसल्ली से मारा होगा. हमारी तोह माँ छोड़ दी थी साले ने सड़क पे लिटा के. ऊपर से पोलिसवाले भी उसको हे जानते है.", राणा जाने कहा से आ कर वही जमीन पर बैठ गया था. किसी बुजुर्ग समझदार व्यक्ति की तरह वह इन्हे ज्ञान दे रहा था और साथ हे अपना दुखड़ा रो रहा था.
"भाई इसलिए आप लोग अब स्कूल के सामने नहीं आते क्या?", मुकेश रुमाल से अपना चेहरा साफ़ कर रहा था साथ हे अपना कन्धा भी दबा रहा था.
"स्कूल? हम इस सड़क पे नहीं आते और आगे से इस पागल से दूर हे रहना. किस्मत ाची थी आज तुम्हारी.", इतना बोल कर वह सभी वह से निकल लिए.
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ठीक 1:50 पर अर्जुन सफ़ेद कासी हुई टीशर्ट और नीली जीन्स पहने अजीत सोलंकी के घर के बहार खड़ा था. लाल रंग का बुलेट वही एक तरफ खड़ा करके वह गेट खुलने की प्रतीक्षा कर हे रहा था के सोलंकी खुद गेट खोलकर उसको अपने साथ अंदर ले आया. उसकी बीवी नजर नहीं आ रही थी जब वह दोनों ड्राइंग हॉल से होते हुए इस ऑफिस नुमा कमरे में दाखिल हुए.
"मैं और विनय तनेजा साथ हे बिज़नेस करते है. और बचपन के दोस्त है. कुछ गलतियां हमने साथ हे की है और एक बार वह ज्यादा हे नशे में था तोह मैंने ये फोटो खींच लिए थे, भविष्य में इनको काम में लेने के लिए. लेकिन मेरी मंशा उस समय उसकी बेटी के साथ ऐसा वैसा कुछ करने की नहीं थी.", टेबल की दराज से 2 फोटो और उनके नेगेटिव अर्जुन के सामने रखते हुए वह सर झुकाये कुर्सी पर बैठा था.
"ाचा घर है, बीवी है, बचे भी और दौलत भी. फिर भी तुम्हे भूख है? घर से बहार तुम क्या करते हो ये तुम्हारा परिवार नहीं जानता, लेकिन सोचो अगर उन्हें ये सब पता चल जाये तोह? एक बेटी का विश्वास टूट जायेगा, उस पत्नी के साथ सम्बन्ध ख़तम हो सकता है, कानून के घेरे में आ गए तोह जो कमाया है सब मिटटी. अपनी भूख को काबू करो मर सोलंकी और अपने kaam-pariwar से प्यार करो.", टेबल पर रखे सिग्रेटे लाइटर को जलाते हुए अर्जुन ने वह दोनों फोटो और और नेगेटिव जलाते हुए टेबल के नीचे रखे स्टील के डस्टबिन में फेंक दिए.
"मैं आगे से ऐसा कुछ नहीं करूँगा लेकिन क्या मैं ये पूछ सकता हु के तुमने ये सब क्यों किआ? तुमने खुद हे वह सबूत जला दिए जिनका शायद तुम इस्तेमाल कर सकते थे, जैसा मैं सोच रहा था.", सोलंकी की बात सुनकर एक बार के लिए अर्जुन का पारा ऊपर हो गया था. मुट्ठी कस गई और भुजाये फटने की कगार तक फूल चुकी थी लेकिन अगले हे पल खुदको शांत करता वह बड़े साढ़े हुए स्वर में बोलै,
"तुम नहीं समझे मेरा मकसद? एक लड़की जिसके साथ कोई जबरदस्ती करके उसकी आत्मा को चलनी करदे, एक बाप जिसकी बेटी की ज़िन्दगी नरक बन जाये और एक इंसान जिसको ये पता हो के उसको प्यार करने वाली के साथ कोई ऐसा करने वाला है और वह कुछ न कर सके तोह क्या परिणाम होंगे? मैंने वही सब रोकने के लिए ये किआ है. और तुम्हे और तुम्हारे परिवार को भी उस परिणाम से बचाया है जो समाज में तुम्हे kalank-balatkari और एक धोखेबाज दोस्त के रूप में याद रखता. चलता हु और आशा करूँगा के आप ध्यान देंगे जो भी आपसे इस दौरान हुआ और क्या कुछ खोने से आप बच गए.", अर्जुन ने हाथ जोड़ने के बाद कमरे के दरवाजा खोला और ड्राइंग रूम से बहार निकलती उस परछाई को भी देख लिए.
सोलंकी के भी हाथ खुद हे जुड़ गए थे. आँखों से पश्चाताप के आंसू टपकते हुए फर्श पर गिरने लगे. अर्जुन वह से बहार निकल गया लेकिन उसकी धर्मपत्नी ने अपने पति की आँखों में वह ाँसे देख लिए थे.
"जी, आप रो रहे है? और ये लड़का कोण था? सुबह भी आया था ये.", अपने पति का चेहरा आँचल से साफ़ करती वह ये सब पूछ रही थी. दिल बैठ रहा था उसका किसी अनहोनी की आशा से.
"गीता इस लड़के ने हमारे परिवार को ख़तम होने से बचा लिए. इस से ज्यादा मैं कुछ नहीं कहूंगा. बस ये समझ आ गया के दुनिया में परिवार, विश्वास और इज़्ज़त्त से ऊपर कुछ नहीं है.", अपने पति के मुँह से ऐसे शब्द सुनकर गीता की आँखों में भी 2 बुँदे चल्लाकक आई थी. कहा तोह हमेशा काम के बहाने घर से कई कई दिन गायब रहने वाला सोलंकी जो अपनी biwi-beti को घर से बहार भी न जाने देता था. अपना कमरा तक अलग किये हुए थे कितने हे सालो से और आज वह इतने भारी शब्द कह रहा था.
"सब ठीक हो जायेगा जी. हम सबके आपके साथ हर घडी में हैं. चलिए मुँह धो लीजिये मैं आपके लिए खाना लगाती है.", सोलंकी अपनी बीवी के साथ हे खड़ा होता उनके शयनकक्ष की और चल दिए.
"कौन हो तुम?", पूर्वी ने अर्जुन को मोटरसाइकिल स्टार्ट करते देखा तोह घर के अंदर बानी क्यारी (गार्डन) से हे हलकी आवाज में पुछा. पतली- छरहरी सी काली आँखों वाली ये लड़की संदीप के वर्णन को बिलकुल सही साबित करती थी. अर्जुन ने एक पल के लिए उसको देखा और फिर एक छोटी सी मुस्कान के साथ जवाब दिए.
"बदमाश हु. तुमने तोह सुना हे होगा मैं कैसे आपके पापा से फिरौती मांग रहा था.", अर्जुन की बात सुनकर उसके सपाट चेहरे पर भी एक मुस्कान तैर गई.
"थैंक यू सो मच. ऐसा कोई भी किसी के लिए नहीं करता.", पूर्वी ने बहार खड़े हो कर साड़ी बात सुनी थी और हर गुजरते अंतराल के साथ उसके दिल में अर्जुन का चरित्र गहरा होता गया था.
"तुमसे थैंक यू sun-ne के लिए हे ये सब किआ है मैं, मिस पूर्वी सोलंकी.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल स्टार्ट करने के बाद पूर्वी की तरफ एक बार देखा और इतना बोलकर निकल लिए.
"ऐ तुम्हारा नाम..", पूर्वी को इस बात का जवाब न मिला और वह हैरान भी थी की इस लड़के को उसका नाम कैसे पता था. लेकिन एक अमित चाप छोड़ गया था अर्जुन उसके दिल पर. "पता लग हे जायेगा, देर सावेर. स्कूल ड्रेस थे सुबह देख हे ली थी."
Arjun-Shankar/Dev-Danav
3 बजे के समय था कोई और एक साधारण से होटल के कमरे में संजीव अकेला हे बीएड पर सोया हुआ था. दरवाजे की घंटी के एक बार बजते हे वह झट्ट उठ खड़ा हुआ. कसरती जिस्म ऊपर से बेपर्दा था जिसकी परवाह किये बिना वह उठते हे दरवाजे पर पहुंच गया.
"बड़ी देर कर दी आने में आपने.", सामने डॉ शंकर खड़े थे, हाथ में के बैग लिए. उन्हें कमरे के अंदर करते हे संजीव ने फिर से दरवाजा बंद कर दिए.
"ये हाथ कैसे जख्मी हुआ?", बैग खोलते हुए उन्होंने मरहम पट्टी का सामान निकाल कर बिस्टेर पर रखा और संजीव के हाथ पर बंधा कपडा खोल कर ध्यान से देखने लगे.
"सब सही जा रहा था लेकिन एक हमारी उम्मीद से 3 लोग ज्यादा थे वह. फिर भी बचाव हो गया क्योंकि गोली मेरी हे पिस्तौल से टकरा गई थी.", संजीव की बात सुनते हुए शंकर जी चिमटी की मदद से 3-4 छोटे धातु के टुकड़े हथेली से निकल रहे थे. जख्म ाचे खासे थे लेकिन कोई शिकन न थी संजीव के चेहरे पर. सभी टुकड़े निकलने के बाद एक तरल से हाथ को साफ़ करने के बाद उन्होंने ख़ास तरह की मलहम एक पट्टी के टुकड़े पर लगाने के बाद उसको हथेली पर चिपका दिए. रूई का टुकड़ा लगाने के बाद ऊपर पट्टी करते हुए उन्होंने अगला प्रश्न किआ.
"कोई निशाँ पीछे?"
"नहीं. 7 लोग थे कुल वह. रोशन के भाई समेत सभी 3 से ज्यादा संगीन अपराध में वंचित.", संजीव ने पट्टी हो जाने के बाद ध्यान से हाथ को देखा और फिर टेबल पर उलटे रखे दोनों गिलास साफ़ करने के बाद वही पड़ी 'वैट 69' की बोतल से दोनों के लिए गिलास में जाम तैयार किये. थोड़ा पानी और बंद डब्बे से निकाल कर 3-3 टुकड़े बर्फ के डालने के बाद एक गिलास अपने चाचा की और बढ़ा दिए.
"कुछ jaan-ne लायक बात", गिलास होंठ पे लगाने से पहले शंकर जी ने पुछा.
"बहोत साडी है. जिन तीन लोगो की वह उम्मीद नहीं थी, वह सभी फाजिल्का एरिया कण्ट्रोल करते थे. सारा सफ़ेद सामान उन्ही के पास से इधर आता था. तक़रीबन 8 मर्डर के केस में वह भगोड़े करार थे पंजाब के 3 ज़िलों में और हरयाणा के 2. रोशन के भाई पास से ये बरामद हुआ जो वह रोशन को देने वाला था और शायद फिर वही जहा आपने मुझे नजर रखने को कहा था.", ये 4 तस्वीरें थी जिन्हे शंकर शर्मा ने देखा और एक तरफ रख दिए.
"सिग्रेटे.", शंकर जी ने इतना हे कहा तोह संजीव ने 2 सिग्रेटे सुलगते हुए एक उनकी तरफ बढ़ा दी.
"उनमे से एक आदमी ***** गांव से था और उसके पास ये तस्वीर, चिट्ठी और 3 लाख बरामद हुए. एक सूटकेस में था सारा सामान. पैसे मैंने हक़ भिजवा दिए थे बाकी असले और पैसे के साथ. .", इस बात को सुनते हे शंकर जी ने गिलास एक तरफ रखते हुए तस्वीर पर भरपूर निगाह डाली. फिर चिठ्ठी को पढ़ने के बाद संजीव की तरफ देखा.
"इनके साथ क्या चक्कर हो सकता है?", आस भरी निगाह से अब संजीव अपने चाचा की तरफ देख रहा था. शंकर जी ने 2 लम्बे काश लगाने के बाद सिग्रेटे बुझा कर raakh-dani में दाल दी.
"कनेक्शन समझो. ये उमेद गुज्जर है और मोहर सिंह खुद इसका कुछ बिगड़ नहीं सकता तोह उसके पास 2 हे रस्ते बचते है. या तोह किसी प्रोफेशनल से काम करवाया जाये या अपने भांजे बिजेन्दर से. तुमने पहला रास्ता फ़ैल कर दिए अब वह दूसरे को परखेगा, लेकिन एकदम से नहीं. और बिजेन्दर पर नजर रखना.", सारा सामान अपने ब्रीफ़केस दाल कर उन्होंने वह बंद कर दिए.
"आपका ऑपरेशन कैसा रहा?", संजीव ने दोनों गिलास में फिर से जाम बना दिए थे.
"मैं डॉक्टर हु और ऑपरेशन सफाई से करना मेरी आदत है. और शायद ये कहो तोह ज्यादा बेहतर होगा के मेरी टीम बदलती नहीं और सभी मेंबर अपने काम में माहिर है. मंगत की सर्जरी सक्सेसफुल रही और सांगवान का जन्मदिन भी."
इसके बाद जाने कितनी देर दोनों की बातें चलती रही और सुबह 6 बजे डॉ शंकर कमरे से चले गए संजीव को पूरा दिन आराम करने का बोल कर. आज संजीव ने पहली बार कोई ऐसा मिशन अकेले पूरा किआ था जहा उसके अनुमान से ज्यादा लोग और पास में गोलीअ काम थी. लेकिन अपने चाचा से इन 3 घंटो में वह सीख चूका था के भविष्य में ये गलतिया कैसे ख़तम करनी है.
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तक़रीबन पौने 6 बजे ऋतू दीदी ने करवट बदली तोह अर्जुन की आँख खुल गई. नींद में भी ऋतू के चेहरे पर एक मोहक मुस्कान थी लेकिन अर्जुन को कुछ अलग महसूस हुआ तोह बिना ज्यादा hile-dule उसने अपने पिछली तरफ देखा तोह अलका दीदी भी उस से चिपक कर सोई हुई थी. टीशर्ट पेट से ऊपर उठी हुई थी और एक उभार लगभग आधा बहार था. अर्जुन ने जल्दी से टीशर्ट को ठीक किआ और फिर आराम से बिस्टेर से उतर कर दोनों के ऊपर चद्दर डालने के बाद बहार आ गया. अब बारिश रुक चुकी थी लेकिन फिर भी आसमान में कही कही काले बादल घिरे हुए थे.
"अलका दीदी कब आई हमारे पास.?", सर को खुजाता वह सीधा नीचे उतर कर बाथरूम में घुस गया. नाहा धो कर अपने कमरे में आया और स्कूल के कपडे पहन कर पहले छत्त पर सबकुछ ठीक किआ और फिर जहा Ritu-Alka सो रही थी उस कमरे को. सबकुछ सही करने के बाद नीचे आते हे सामने दादी के खड़े पाया.
"आज सुबह गया नहीं तू?"
"दादी बारिश में अगर जाता तोह फिर बिस्टेर पर पड़ा होता. वैसे भी कल ज्यादा हे म्हणत हो गई थी. पहले स्कूल फिर स्टेडियम और रात को पढाई.", उनके हाथ से दूध का गिलास और 2 लड्डू लेकर वही आँगन में राखी कुर्सी पर बैठ कर वह खाने लगा.
"सही बात है वैसे तेरी. कोई बात नहीं थोड़े दिन में सब अपने समय पर होने लगेगा.", इतना कहती कौशल्या जी रसोईघर में काम कर रही ललिता और रेखा जी के पास चली गई.
रूपाली भी तैयार हो कर नाश्ता करने बैठ गई थी और प्रियंका दीदी चाय की ट्रे लेकर अपने कमरे में जा रही थी. कोमल और माधुरी दीदी के पास.
"ऋतू दीदी कहा पर है?", इतनी सुबह प्रीती को सामने देख अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ लेकिन उसकी बात सुनते हे चुप हो गया.
"वो और अलका दीदी ऊपर इस साइड वाले कमरे में सो रही होंगी.", रूपाली ने अपनी जगह बैठे हुए हे इशारे से प्रीती को बताया और वह तेजी से सीढ़ियां चढ़ती ऊपर चली गई.
"दीदी, अभी स्कूल जाने में पूरा एक घंटा पड़ा है. मैं जरा अपने एक दोस्त से मिल कर आ रहा हु. 15-20 मिनट में वापिस आ जाऊंगा.", रूपाली को इतना बता कर अर्जुन ने गलियारे में राखी अपनी पतले टायर वाली साइकिल उठाई और निकल लिए अपनी मंज़िल की तरफ.
"128, 127 और ये रहा 126.", अर्जुन 2 मिनट बाद हे इस आलिशान से घर के बहार खड़ा था. 4 लोगो के हिसाब से थोड़ा ज्यादा बड़ा और एक कार अंदर कड़ी थी और एक बहार. आसपास नजर दौड़ाई तोह बस इधर 4 हे घर थे और इनके सामने पार्क की छोटी वाली साइड. साइकिल एक तरफ कड़ी करने के बाद उसने घर के बढ़ा लगा घंटी का बटन दबा दिए. 'Trrr-Trrr'
आँगन के दूसरी तरफ जाली का दरवाजा खोलती हुई भरे भरे शरीर की 40-45 साल की ये गौरवर्ण महिला गेट की तरफ आ गई.
"हांजी क्या काम है?", गेट के दूसरी तरफ से उन्होंने अर्जुन पर नजर डालते हुए कहा. वह भी देख चुकी थी के ये लड़का स्कूल ड्रेस में है.
"जी आंटी जो वह अजीत अंकल से जरुरी काम है. एक बार उन्हें बता देंगी.", अर्जुन ने लचर आवाज में कहा. वह महिला बड़बड़ाती हुई अंदर चल दी. "इतने बड़े हो गए लेकिन दोस्ती स्कूल के बचो से लगाए रहते है." कुछ हे देर बाद एक सांवले रंग और औसत लम्बाई के साथ थोड़ा बहार को निकले पेट वाला अजीत सोलंकी कालर वाली टीशर्ट और घुटने तक की खुली निक्कर पहन कर सामने से चलता गेट तक आया.
अर्जुन को देख कर वो जैसे इस अनजान चेहरे को याद करने की असफल कोशिश करने लगा और अर्जुन ने उसकी शंका ख़तम करते हुए जेब से वह कागज़ का टुकड़ा निकल कर सामने कर दिए. चेहरे पर राजदार मुस्कान थी जिसको देख सोलंकी भी थोड़ा खुश होता बहार आ गया.
"तोह तुम हो मेरे कबूतर? लेकिन यहाँ चल कर आने की कोई खास वजह?", वो समझ गया था के ये लड़का भी काम के बदले sewa-pani की इत्छा रखता है.
"अंकल पार्क में चल कर बात करते है अगर 5 मिनट हो आपके पास?", अर्जुन ने वही मुस्कान चेहरे पर रखे हुआ कहा और सोलंकी हाथ से उसको साथ चलने का इशारा करता पार्क के अंदर जाने वाली जगह से प्रवेश कर गया.
"इसके बदले मैंने सनी को 1000 रुपये दे दिए थे ताकि वह तुम लोगो को खुश रखे. कही तुम भी उसकी तरह बहती गंगा में हाथ तोह नहीं धोना चाहते.?", इस समय उसके चेहरे से भरपूर काइयाँ पैन टपक रहा था.
"मैं जो चाहता हु उस से तेरा भविष्य अन्धकार में नज़र आता है सोलंकी.", खली पार्क में दूर बेंच पर सोलंकी की बगल में बैठे अर्जुन की आवाज में पहले से विपरीत सिर्फ आवेश और चेतावनी थी. लेकिन स्वर बहोत धीमा और सार्ड. अजीत सोलंकी के चेहरे के भाव भी अचानक बदल गए.
"तू क्या बात कर रहा है लड़के? तू मुझे जानता नहीं है ाचे से.", सोलंकी ने देखा था के ये लड़का जरुरत से ज्यादा हे तगड़ा और लम्बा चौड़ा है. लेकिन है तोह एक स्कूल जाने वाला नादान.
"पहले तू मेरे बारे में जान ले. अर्जुन शर्मा नाम है मेरा और इस नाम को तू कभी भूल न सके उसके लिए मेरे पिता का नाम भी बता देता हु, "डॉ शंकर शर्मा"." इतना सुनते हे सोलंकी की गर्दन झुक गई जिसको वह अपने दोनों हाथो से छुपाये था.
"तेरी भी एक जवान बेटी है, सुना ये भी है के वह खूबसूरत भी बहोत है.", अर्जुन ने उसके पत् पर हाथ रखते हुए कहा. सोलंकी अंदर तक हिल गया था उसकी बात का मतलब समझते हुए.
"ऐ.. इस सबसे उसका क्या लेना देना?"
"देखा कैसे आवाज निकली अपनी बेटी का नाम सुनते हे. मैं ऐसा कुछ नहीं करने वाला. लेकिन कान खोल कर एक बात सुन ले, जो काम तू करने की तैयारी कर रहा था उसको अंजाम तक पहुंचने के लिए ठोस सबूत जरूर होंगे तेरे पास. वह मुझे चाहिए और ऐसा न करने की सूरत में मैं तेरे साथ क्या करूँगा तू सोच भी नहीं सकता. तूने 2 बजे का समय निर्धारित किआ था न तूने उस मासूम की ज़िन्दगी खराब करने के लिए, तोह आज दोपहर 1:50 पर मैं तेरे घर आऊंगा. और अगर तुझे मेरी बातें कोरी धमकी लग रही है तोह पिछले महीने की 25 तारीख का अखबार उठा कर देख लेना, पुलिस ने जो 2 हत्यारे बेहोशी की हालत में kshatt-vishatt हालत में पकडे थे वह मेरा हे काम था. और तू उनसे कुछ अलग नहीं है, जैसी सोच है तेरी. चलता हु मैं और समय पर आऊंगा तुझसे मिलने.", अर्जुन ने कलाई घडी में समय देखा और सोलंकी को pareshan-gum में डूबा वही बैठा छोड़ बहार आ गया.
पहली मंजिल पर कड़ी ये लड़की ध्यान से देख रही थी कभी अपने बाप को और कभी इस लड़के को जो उनके घर के सामने से अपनी साइकिल चला कर निकलता बना. इधर सोलंकी कुछ याद करते हुए बेंच से खड़ा हुआ और अपने घर का दरवाजा खोल सीधा अपनी बीवी को आवाज लगाने लगा.
"Geeta-Geeta"
"कहो क्या काम है?"
"वह पिछले महीने के अखबार कहा है?", सोलंकी जैसे अभी भी उस लड़के को जांचना चाहता था.
"ऊपर चट्टी पर रखे है तारिख के हिसाब से. लेकिन उनमे क्या देखना है?", बीवी की पूरी बात सुने बिना हे वह अंदर हे बानी सीढिआँ चढ़ता खुली छत्त पर जाने से पहले बानी स्टोर नुमा जगह पर रखे अख़बार ध्यान से देखने लगा. 25 तारिख.. जैसे हे वह अखबार उसने उठा कर ध्यान से देखना शुरू किआ, उनके शहर वाले पृष्ट पर छपी बड़ी खबर पर उसकी नजर अटक गई. "जितेंदर और विष्णु घायल अवस्था में पुलिस को #### स्टैंड पर बेहोशी की हालत में मिले", इस लाइन को वह स्वर में बोल बोल कर पढ़ गया. और अख़बार हाथ से चूत कर नीच गिर चूका था.
"मतलब वह सही कह रहा था. और वो बीटा भी शंकर का है मतलब पंडित रामेश्वर के घर से.", अंदर तक हिल गया था सोलंकी. लेकिन इस सबके बीच वह ये न देख सका के उसकी लाड़ली, जिसको वह दुनिया के डर से ज़्यदातर घर में हे रखता था, उसने सब देख सुन्न लिए था. खुद को दुरुस्त करता वह नीचे चला गया. और उस लड़की ने अपने बाप के जाने के बाद वही अखबार उठा कर ध्यान दिए लेकिन ज्यादा कुछ समझ नहीं आया.
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आज भी आकांक्षा घर के बहार हे मिली थी और पिछले दिन की तरह अर्जुन उन दोनों के पीछे चल रहा था और वह अपनी बातो में लगी आगे आगे.
"आ गया बहनो का भैया. देखो सही काम लगाया हुआ है इसको, पीछे गुलाम की तरह सामान ले कर चलने के.", अर्जुन ने सनी की बात को नजरअंदाज करते हुए बस संदीप की आँखों में देखा और उसने पलके झपका कर जवाब दे दिए. फिर बिना रुके अर्जुन स्कूल के अंदर आ गया.
"फत्तू साला.", मुकेश ने बुरा सा मुँह बनाते हुए कहा और सभी हंसने लगे.
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आज भी विद्या मैडम की क्लास ाची गई थी. लगभग सभी बचे इस सब्जेक्ट में ाचे थे और उनके पढ़ने का तरीका भी सरल था. पीरियड समाप्त होते हे सभी स्टूडेंट्स अपने आप हे सीधे बैठ गए थे लेकिन अर्जुन कल वाले डेस्क पर हे आज अंदर की तरफ था. डेस्क पर कोहनी टिकाये किताब में खोया हुआ. जब सभी ने एक साथ गुड मॉर्निंग मिस कहा तोह वह भी जल्दी से खड़ा हुआ लेकिन मिस अन्नू वालिए की नज़र तोह जैसे आते हे उस पर थी.
"सीट डाउन आल.", सबके बैठने के बाद उन्होंने अटेंडेंस लेनी शुरू की लेकिन आज वह हरेक नाम बोलने के बाद स्टूडेंट का चेहरा देख रही थी. अर्जुन का रोल नंबर 4 था क्योंकि नाम 'ा' से था और जैसे हे मिस वालिए ने अर्जुन शर्मा पुकारा, अर्जुन ने बड़ी शालीनता से 'प्रेजेंट' बोलै.
'अर्जुन शर्मा', मैं में ये नाम दोहराया मिस वालिए ने और फिर बिना ऊपर देखे सबकी हाजरी लगा ली.
"हम कल कहा थे?", मैडम ने इतना हे कहा के सभी ने एक स्वर में टॉपिक का नाम लिए, "एनर्जी- फंडामेंटल्स"
"गुड. मतलब सभी का ध्यान था क्लास में.", वह बोल रही थी और अर्जुन फिर से उस किताब में हे देख रहा था. लेकिन आते हे टोकना जैसे मिस वालिए को ठीक नहीं लगा. उन्होंने पहले आज का टॉपिक एक्सप्लेन किआ फिर बाकी बचो से 2-3 सवाल किये. जैसे हे सवाल थोड़े मुश्किल होने लगे क्लास में हाथ भी काम उठने लगे थे.
'मटर' से शुरू हुए क़ुएस्तिओन्स और भी ज्यादा मुश्किल हो गए जब मैडम ने फिर से अर्जुन को खड़ा किआ और आज समय भी पर्याप्त था सवाल भी. डेंसिटी, एटम, structre,nature सभी सवाल मिस अन्नू वालिए ने कर लिए थे लेकिन अर्जुन के पास सवाल ख़तम होते हे जवाब तैयार थे. मिस अन्नू वालिए जवान थी और दिमाग से गरम, बिना ज्यादा अनुभव के. और अगले 10 मिनट में हे फिजिक्स में मेजर करने वाली मैडम के पास सवाल ख़तम हो चुके थे. 6-7 सवाल तोह ऐसे थे जो बाकी किसी भी स्टूडेंट ने सुने भी नहीं थे कभी.
गोरा गुलाबी चेहरा अब हताश दिख रहा था. लेकिन हारने से पहले एक आखिरी सवाल किआ उन्होंने जिसका जवाब अर्जुन सही देते देते गलत दे गया.
"गेट आउट ऑफ़ माय क्लास. यू ओवरस्मार्ट.", ज्वालामुखी फट पड़ा था अर्जुन की इस गलती से लेकिन ये कहने के बाद हे अंदर से उन्हें एहसास हो गया था के अभी जो यहाँ हो रहा था वह कही से भी एक शिक्षक और विद्यार्थी का स्तर नहीं था. लेकिन वह कक्षा से अर्जुन को निकल चुकी थी और अपनी गलती मान लेना मुमकिन न था. डेस्क पर राखी अपनी पानी की बोतल से एक घूँट पीने के बाद वह चुपचाप बस बोर्ड पर घर से करने के लिए काम लिखने लगी और उसके बाद घंटी बजने से 5 मिनट पहले हे क्लास से निकल गई.
दर्शन जी की क्लास में आज भी सभी ने दिल से पढाई की और साथ हे उन्होंने पढ़ते हुए hansi-majaak का माहौल भी बनाये रखा. Chapter को समझते हुए वह आम ज़िन्दगी से जुड़े हुए मजेदार उदाहरण देते थे जो बिलकुल हे अलग और प्रभावशाली तरीका था. अपना पीरियड ख़तम होने से पहले वह भी थोड़ा मजेदार काम करने के लिए देते गए थे.
मिस चारुल सिंह आज भी क्लास को ग्राउंड में ले आई थी. लड़कियां फिर से सीढ़ियों पर बैठ कर criss-cross, पजल जैसे खेल खेल रही थी वही आज लड़को ने 2 टीम बना कर फूटबाल खेलना तये किआ. क्लास में 10 लड़किया और 14 लड़के थे जिसमे से एक लड़का आज नहीं आया था और अर्जुन ने खेलने से मन कर दिए तोह बाकि सभी 6-6 की टीम बना कर खेलने लगे. अर्जुन जहा लड़कियां बैठी थी उसी कतार में थोड़ा दूर जा कर अकेला बैठ गया.
"तुम नहीं खेल रहे?", मिस चारुल सिंह भी घूमती हुई अर्जुन के पास आ कर कड़ी हो गई थी. आज उन्होंने हलकी गुलाबी लिपस्टिक लगाई हुई थी और स्पोर्ट्स पाजामे की जगह एक फिटिंग वाली जीन्स पहन राखी थी. भूरे बाल आज भी ऊपर से बंधे थे.
"नहीं. सेविंग एनर्जी.", अर्जुन ने ये जानबूझ कर कहा था. उसने पीछे से आती मिस वालिए को देख लिए था और उसका ये जवाब सुनकर मिस वालिए एक पल के लिए रूकती हुई बस उसको हे देखने लगी. यहाँ बहार के उजाले में अर्जुन ने देखा था के सुर्ख गुलाबी रंग के साथ हे उनकी आँखों का भी रंग भी हल्का भूरा था. और चेहरे पर थोड़ी मायूसी.
"मतलब?", चारुल मम को पता नहीं चला के वह कहना क्या चाहता है.
"मिस, मैं स्टेडियम में शाम को 4-6 बॉक्सिंग प्रैक्टिस करता हु और फिर सुबह भी रनिंग और एक्सरसाइज के लिए जाता हु. इसलिए अभी थोड़ा बॉडी एनर्जी सेव कर रहा हु.", अर्जुन ने जब पूरी बात बताई तोह चारुल मैडम उसके पास हे बैठ गई. उन्होंने जब अन्नू मम को देखा तोह मुस्कुराते हुए अपने पास हे बुला लिए. वह चुपचाप उनकी तरफ बैठ गई.
"स्टेडियम में किसके अंडर प्रैक्टिस कर रहे हो? अनिल जी या रविंदर कुमार?" अर्जुन ने ये नाम सुने थे क्योंकि वह जूनियर लेवल के साधारण लड़को को सिखाते थे. चारुल मैडम को उनके नाम पता होना थोड़ा ताज्जुब की बात थी.
"नहीं नहीं. मेरे कोच सर जोगिन्दर सिंह संधू जी है. और हो सकता है अगले महीने मैं हैवी वेट जर में भाग लू.", मिस चारुल को थोड़ी हैरानी हुई जब अर्जुन ने अपने कोच का नाम लिए और बॉक्सिंग के बारे में बताया.
"कितने समय से प्रैक्टिस कर रहे हो?"
"एक महीना हुआ है अभी, मिस.", अर्जुन ने ये जवाब दिए तोह देखा की अन्नू मम उसको हे देख रही थी.
"तुम बैठो एक बार मैं आती हु अटेंडेंस रजिस्टर लेकर.", वह फुर्ती से कड़ी हुई और बिल्डिंग के अंदर की तरफ चल दी.
"तुम्हे बुरा नहीं लगा आज?", ये आवाज अन्नू मम की थी जो अर्जुन से नजरे मिलाये बिना सामने ग्राउंड की तरफ देख कर बोल रही थी.
"मिस बुरा किस बात का. आपने क्वेश्चन किआ, मैंने गलत बताया तोह सजा मिलनी हे चाहिए. एग्जाम में भी तोह गलत नंबर के मार्क्स कट होते है.", अर्जुन भी सामने देखते हुए हे जवाब दे रहा था. उसको यही ठीक लगा, क्योंकि सीधा आँखों में देखना ठीक नहीं था ऐसे अवसर पर.
"तुम्हे पता है वह क्वेश्चन तुम्हारी बुक से बहार का था.?"
"मेरी बहिन मेडिकल स्टूडेंट है और मैंने वह उसकी हे बुक्स में पढ़ा था."
"और तुम्हे उसका जवाब भी पता था न?", मिस अन्नू अब अर्जुन की तरफ देख रही थी. बहार हलकी हवा में उसके कुण्डल जैसे घुंगरल बाल हवा से हिल रहे थे. चेहरा कितना शांत था और आवाज में एक ख़ास भारीपन.
"मम, गलती ये हुई की मैंने उस से पहले कुछ ज्यादा हे जवाब दे दिए थे. ये ध्यान नहीं रहा के ओने 2 ओने डिस्कशन नहीं है, पूरी क्लास हमे देख रही है. एंड I'm रियली सॉरी फॉर तहत. आपने ये मुकाम अपनी म्हणत और लगन से कमाया है और स्टूडेंट्स का ाचा भविष्य बनाने में सबसे ज्यादा योगदान टीचर का हे रहता है. मैं कुछ समय के लिए भूल गया था. ी विल नेवर रिपीट सुच मिस्टेक अगेन.", अर्जुन ने बात ख़तम करि हे थी और मिस चारुल रजिस्टर लेकर उधर हे आ गई. और मिस अन्नू को जैसे अर्जुन के इस जवाब ने और परेशां कर दिए था लेकिन अभी वह आगे बात नहीं कर सकती थी.
"अभी तोह 20 मिनट से ज्यादा टाइम पड़ा है. हाँ तोह अर्जुन हम कहा थे?", उनकी ऐसी बात पर अर्जुन के जुबान एक बार फिर फिसल गई
"मिस हम तोह यही थे बस आप रजिस्टर लेने गई थी.", उसकी बात पर चारुल मैडम ने आँखें तरेर कर देखा तोह अर्जुन को गलती का एहसास हो गया.
"सॉरी. ध्यान नहीं रहा."
"It's ऑलराइट. वैसे बता देती हु मेरा पूरा नाम चारुल सिंह संधू है. और मेरे पापा तुम्हारे कोच है.", अब बारी अर्जुन की थी हैरान होने की.
"ओह..", वह इतना हे कह पाया.
"मैं भी स्टेडियम जाती थी लेकिन अब यहाँ इवनिंग में आना पड़ता है 1 घंटा रोज तोह ी ऍम आल्सो सेविंग एनर्जी.", इस बार वह ऐसे मुस्कुराई जैसे दोस्तों के साथ हो. घडी पर नजर डालने के बाद वह उठ कड़ी हुई और मिस अन्नू ने भी जाने से पहले एक बार फिर अर्जुन की तरफ देखा, जो उधर हे चल दिए था जहा बाकि सभी स्टूडेंट्स आ चुके थे हाजरी लगवाने.
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आज भी केमिस्ट्री की मैडम नहीं आई थी लेकिन ये सुब्स्तितुते लग गया था लाइब्रेरी के लिए और सभ स्टूडेंट्स ने अपनी पसंद की किताबो में ध्यान लगा लिए था. बस यही समय था जब अर्जुन आकांक्षा के साथ एक तरफ बैठा था और दोनों टेबल के नीचे से एक दूसरे का हाथ पकडे धीमी आवाज में बातें कर रहे थे. ये 40 मिनट कब ख़तम हुए दोनों को पता हे नहीं चला.
"भाई सनी और मुकेश?", संदीप ने अर्जुन को बैग उठाते देखा तोह पास आ कर जैसे पूछ रहा था के उनका क्या करना है.
"मैंने रूपाली दीदी को बोल दिए है के वह और आकांक्षा साथ चले जाये मैं थोड़ी देर तक आऊंगा. अब हम कुछ देर यही रुकते है और सनी तेरे बिना यहाँ से जाने से रहा तोह बस इन दोनों के जाते हे मैं सब संभल लूंगा.", अर्जुन ने संदीप को आश्वस्त किआ और दोनों वही गलियारे में कुछ देर खड़े रहे. जब इस तरफ का सारा स्कूल खली दिखने लगा तोह दोनों एक साथ हे बहार की तरफ चल पड़े. गेट के बहार हे सनी अपने 3 दोस्तों के साथ खड़ा संदीप का हे इन्तजार कर रहा था.
"कहा मर्डर गया थे रे बहनचोद.?" थोड़े गुस्से से उसने संदीप को आवाज लगाई लेकिन अर्जुन उसका हाथ पकड़ कर बिना सनी की और ध्यान दिए अपने साथ सड़क पार गली की तरफ चल दिए.
"ओह बहिन के लोडे तुझे सुन्न नहीं रहा मैं.. कडाककककक." सनी ने जब देखा की संदीप उसकी बात सुनकर भी अनसुना करता जा रहा है तोह वह गाली देते उसके पीछे लपका लेकिन जबड़े पर पड़े इस मुक्के ने उसके मुँह का भूगोल हिला दिए था. अर्जुन ने संदीप को एक तरफ करते हुए भरपूर प्रहार किआ था सनी के बाए गाल पर. फिर उसका गिरेबान पकड़ते हुए tada-tadd थप्पड़ो की बौछार कर दी थी. अपने दोस्त का ये हाल होता देख बाकी तीनो भी उनकी तरफ लपके लेकिन अर्जुन तैयार था. मुकेश जिस रफ़्तार से उसकी तरफ लपका था, अर्जुन ने उतनी हे फुर्ती से मुकेश को कमीज से पकड़ कर और आगे की तरफ जैसे उछाल हे दिए था. कन्धा अमलताश के वृक्ष के तने से टकराते हे मुकेश की दर्दभरी चीख निकल गई और इधर बाकी दोनों में से एक की गर्दन अर्जुन के पंजे में थी और आखिरी वाला अर्जुन को एक मिनट वही रुकने की धामी देता उनसे विपरीत दिशा में भाग लिए. संदीप में भी अब हिम्मत आ चुकी थी और वह भी नीचे गिरे मुकेश पर थप्पड़ बरसाने लगा.
"वह बचने नई चाहिए भाई.", इतने में वह चौथा लड़का स्कूटर पर पीछे बैठ कर उधर आ गया. उसके साथ कुलविंदर और राणा थे जिन्होंने जैसे हे स्कूटर बंद करने के बाद सामने अर्जुन को देखा तोह दोनों की घिघि बांध गई.
"ओह मादरचोद ये किस से लड़ने के लिए बुला लिए.", कुलविंदर ने पहले तोह खुद हे उस लड़के के गाल पर झापड़ रसीद कर दिए और उसके बाद दोनों हाथ जोड़ कर अर्जुन के सामने खड़ा हो गया. राणा तोह अर्जुन को देख कर पैदल हे वह से निकल लिए.
"भाई मेरा इनसे कोई लेना देना नहीं है. तुम कहो तोह मैं हे इन्हे मारता हु. लेकिन मैं इनके साथ नहीं दिखूंगा तुम्हे कभी.", नीचे गिरे सनी पर 3-4 ठोकर मरते हुए कुलविंदर जैसे उनपर हे गुस्सा निकल रहा था. संदीप और अर्जुन ने उन्हें मरना बंद कर दिए था क्योंकि ाची खासी धुनाई हो चुकी थी तीनो की और बस मुँह से खून आने के कसार रह गई थी.
"बस अपने दोस्तों को इतना समझा देना कुलविंदर की मैंने इन्हे सिर्फ सहलाया है. मार कैसे पड़ती है ये इन्हे दिखाया तोह इनके घरवालों को दुःख होगा की उनके बचो की ये दुर्दशा किसने की.", कुलविंदर के कंधे पर हाथ रखते हुए अर्जुन ने साइकिल का स्टैंड हत्या और संदीप के साथ आगे बढ़ चला.
"अरे बिलकुल गांडू आदमी है तू सनी, साले इस राक्षश से पन्गा ले लिए? शुक्र मन हलके हाथ से मारा तुझे नहीं तोह..", कुलविंदर अपने गाल पर हाथ रखता सनी और मुकेश के कपडे ठीक करता उन्हें समझा भी रहा था.
"भाई मुझे लगा के तुम आते हे उसकी धुलाई करोगे और यहाँ उल्टा मुझे हे कूट दिए.", सनी की आँखों से आंसू बह रहे थे और रो तोह मुकेश और वह तीसरा लड़का भी रहे थे.
"अरे शुक्र मन के अभी भी वह गुस्से में नई था. तुम्हारी शकल उतनी भी नहीं बिगड़ी, मैं और राणा तोह 3 दिन तक रुमाल बांड के घर में बंद रहे थे.", कुलविंदर उनको आपबीती बता रहा था.
"है बहनचोद का हाथ बहोत भरी है लेकिन तुम्हे देख के नहीं लग रहा के तसल्ली से मारा होगा. हमारी तोह माँ छोड़ दी थी साले ने सड़क पे लिटा के. ऊपर से पोलिसवाले भी उसको हे जानते है.", राणा जाने कहा से आ कर वही जमीन पर बैठ गया था. किसी बुजुर्ग समझदार व्यक्ति की तरह वह इन्हे ज्ञान दे रहा था और साथ हे अपना दुखड़ा रो रहा था.
"भाई इसलिए आप लोग अब स्कूल के सामने नहीं आते क्या?", मुकेश रुमाल से अपना चेहरा साफ़ कर रहा था साथ हे अपना कन्धा भी दबा रहा था.
"स्कूल? हम इस सड़क पे नहीं आते और आगे से इस पागल से दूर हे रहना. किस्मत ाची थी आज तुम्हारी.", इतना बोल कर वह सभी वह से निकल लिए.
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ठीक 1:50 पर अर्जुन सफ़ेद कासी हुई टीशर्ट और नीली जीन्स पहने अजीत सोलंकी के घर के बहार खड़ा था. लाल रंग का बुलेट वही एक तरफ खड़ा करके वह गेट खुलने की प्रतीक्षा कर हे रहा था के सोलंकी खुद गेट खोलकर उसको अपने साथ अंदर ले आया. उसकी बीवी नजर नहीं आ रही थी जब वह दोनों ड्राइंग हॉल से होते हुए इस ऑफिस नुमा कमरे में दाखिल हुए.
"मैं और विनय तनेजा साथ हे बिज़नेस करते है. और बचपन के दोस्त है. कुछ गलतियां हमने साथ हे की है और एक बार वह ज्यादा हे नशे में था तोह मैंने ये फोटो खींच लिए थे, भविष्य में इनको काम में लेने के लिए. लेकिन मेरी मंशा उस समय उसकी बेटी के साथ ऐसा वैसा कुछ करने की नहीं थी.", टेबल की दराज से 2 फोटो और उनके नेगेटिव अर्जुन के सामने रखते हुए वह सर झुकाये कुर्सी पर बैठा था.
"ाचा घर है, बीवी है, बचे भी और दौलत भी. फिर भी तुम्हे भूख है? घर से बहार तुम क्या करते हो ये तुम्हारा परिवार नहीं जानता, लेकिन सोचो अगर उन्हें ये सब पता चल जाये तोह? एक बेटी का विश्वास टूट जायेगा, उस पत्नी के साथ सम्बन्ध ख़तम हो सकता है, कानून के घेरे में आ गए तोह जो कमाया है सब मिटटी. अपनी भूख को काबू करो मर सोलंकी और अपने kaam-pariwar से प्यार करो.", टेबल पर रखे सिग्रेटे लाइटर को जलाते हुए अर्जुन ने वह दोनों फोटो और और नेगेटिव जलाते हुए टेबल के नीचे रखे स्टील के डस्टबिन में फेंक दिए.
"मैं आगे से ऐसा कुछ नहीं करूँगा लेकिन क्या मैं ये पूछ सकता हु के तुमने ये सब क्यों किआ? तुमने खुद हे वह सबूत जला दिए जिनका शायद तुम इस्तेमाल कर सकते थे, जैसा मैं सोच रहा था.", सोलंकी की बात सुनकर एक बार के लिए अर्जुन का पारा ऊपर हो गया था. मुट्ठी कस गई और भुजाये फटने की कगार तक फूल चुकी थी लेकिन अगले हे पल खुदको शांत करता वह बड़े साढ़े हुए स्वर में बोलै,
"तुम नहीं समझे मेरा मकसद? एक लड़की जिसके साथ कोई जबरदस्ती करके उसकी आत्मा को चलनी करदे, एक बाप जिसकी बेटी की ज़िन्दगी नरक बन जाये और एक इंसान जिसको ये पता हो के उसको प्यार करने वाली के साथ कोई ऐसा करने वाला है और वह कुछ न कर सके तोह क्या परिणाम होंगे? मैंने वही सब रोकने के लिए ये किआ है. और तुम्हे और तुम्हारे परिवार को भी उस परिणाम से बचाया है जो समाज में तुम्हे kalank-balatkari और एक धोखेबाज दोस्त के रूप में याद रखता. चलता हु और आशा करूँगा के आप ध्यान देंगे जो भी आपसे इस दौरान हुआ और क्या कुछ खोने से आप बच गए.", अर्जुन ने हाथ जोड़ने के बाद कमरे के दरवाजा खोला और ड्राइंग रूम से बहार निकलती उस परछाई को भी देख लिए.
सोलंकी के भी हाथ खुद हे जुड़ गए थे. आँखों से पश्चाताप के आंसू टपकते हुए फर्श पर गिरने लगे. अर्जुन वह से बहार निकल गया लेकिन उसकी धर्मपत्नी ने अपने पति की आँखों में वह ाँसे देख लिए थे.
"जी, आप रो रहे है? और ये लड़का कोण था? सुबह भी आया था ये.", अपने पति का चेहरा आँचल से साफ़ करती वह ये सब पूछ रही थी. दिल बैठ रहा था उसका किसी अनहोनी की आशा से.
"गीता इस लड़के ने हमारे परिवार को ख़तम होने से बचा लिए. इस से ज्यादा मैं कुछ नहीं कहूंगा. बस ये समझ आ गया के दुनिया में परिवार, विश्वास और इज़्ज़त्त से ऊपर कुछ नहीं है.", अपने पति के मुँह से ऐसे शब्द सुनकर गीता की आँखों में भी 2 बुँदे चल्लाकक आई थी. कहा तोह हमेशा काम के बहाने घर से कई कई दिन गायब रहने वाला सोलंकी जो अपनी biwi-beti को घर से बहार भी न जाने देता था. अपना कमरा तक अलग किये हुए थे कितने हे सालो से और आज वह इतने भारी शब्द कह रहा था.
"सब ठीक हो जायेगा जी. हम सबके आपके साथ हर घडी में हैं. चलिए मुँह धो लीजिये मैं आपके लिए खाना लगाती है.", सोलंकी अपनी बीवी के साथ हे खड़ा होता उनके शयनकक्ष की और चल दिए.
"कौन हो तुम?", पूर्वी ने अर्जुन को मोटरसाइकिल स्टार्ट करते देखा तोह घर के अंदर बानी क्यारी (गार्डन) से हे हलकी आवाज में पुछा. पतली- छरहरी सी काली आँखों वाली ये लड़की संदीप के वर्णन को बिलकुल सही साबित करती थी. अर्जुन ने एक पल के लिए उसको देखा और फिर एक छोटी सी मुस्कान के साथ जवाब दिए.
"बदमाश हु. तुमने तोह सुना हे होगा मैं कैसे आपके पापा से फिरौती मांग रहा था.", अर्जुन की बात सुनकर उसके सपाट चेहरे पर भी एक मुस्कान तैर गई.
"थैंक यू सो मच. ऐसा कोई भी किसी के लिए नहीं करता.", पूर्वी ने बहार खड़े हो कर साड़ी बात सुनी थी और हर गुजरते अंतराल के साथ उसके दिल में अर्जुन का चरित्र गहरा होता गया था.
"तुमसे थैंक यू sun-ne के लिए हे ये सब किआ है मैं, मिस पूर्वी सोलंकी.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल स्टार्ट करने के बाद पूर्वी की तरफ एक बार देखा और इतना बोलकर निकल लिए.
"ऐ तुम्हारा नाम..", पूर्वी को इस बात का जवाब न मिला और वह हैरान भी थी की इस लड़के को उसका नाम कैसे पता था. लेकिन एक अमित चाप छोड़ गया था अर्जुन उसके दिल पर. "पता लग हे जायेगा, देर सावेर. स्कूल ड्रेस थे सुबह देख हे ली थी."
