Incest Pyaar - 100 Baar - Page 6 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar



अपडेट 39

यह शाम मस्तानी (2)


"कुछ कह रही थी तुम आते समय", प्रीती की कमर में दोनों बाहे डाले अर्जुन ने अपना चेहरा उसके पास करते कहा तोह उसका चेहरा लाल होने लगा.

"हम सड़क पर है. कभी जगह देख कर बात कर लिए करो." प्रीती की लरजती आवाज सुनकर अर्जुन ने चेहरा तोह पीछे कर लिए लेकिन अपनी उँगलियों को उसके पेट पर चलता रहा. खेलने के बाद आने वाला पसीना भी अर्जुन को किसी बेशकीमती महक सा लग रहा था.

"हर समय तुम्हारा ये जिस्म महकता हे रहता है क्या?" एक बार गर्दन पर नाक फिरते अर्जुन ने कहा तोह प्रीती का जैसे स्कूटरी पर से नियंत्रण हे खोने लगा था.

"प्लीज काम से काम ये चौक तोह पार कर लेने दे. गिर जायेंगे फिर लेते रहना महक." प्रीती की बात पर वह हलके से हंसने लगा लेकिन हरकत कोई नहीं की. ऐसे हे वो अपनी उस खाली सड़क पर आ गए तोह अर्जुन ने दोनों हाथ ऊपर वाली उंगलिया टीशर्ट के अंदर से प्रीती के पेट पर चलनी शुरू कर दी. प्रीती ने ब्रेक लगाए और अर्जुन की तरफ देखा. जैसे पूछ रही हो के क्या कर रहे हो.

"ये जो पतली सड़क देख रही हो पार्क के पीछे जाती, इस तरफ घुमा लो. ये हमारे सेक्टर के पास हे निकलेगी." ऐसे हे हाथ रखे अर्जुन ने उसको ये नया रास्ता दिखाया जो शायद प्रीती ने पहले नहीं देखा था. उसकी बात मानती प्रीती स्कूटरी को उस सड़क की तरफ घुमा कर चल दी. वैसे तोह जिस रास्ते से ये दोनों जाते थे ये भी खाली हे रहता था लेकिन पार्क की वजह से पैदल कुछ लोग दिख जाते थे. और सड़क भी ज्यादा चौड़ी थी तोह कुछ कहा नहीं जा सकता था के कोण किस समय वह से निकल जाए उन्हें देखता. लेकिन अब ये दोनों जिस तरफ आये थे ये एक 8-10 फ़ीट चौड़ी पुराणी सड़क थी जो पहले काम में ली जाती थी. पार्क के पिछली तरफ दिवार सी बनाये घने वृक्ष यहाँ भी दिवार हे थे एक तरह से. और दूसरी तरफ यूनिवर्सिटी की 15 फ़ीट ऊँची दिवार. जैसे हे वो कुछ आगे आये तोह अर्जुन ने अपने दोनों हाथ प्रीती के पेट पर रख लिए और पीछे से उसका गाला चूम लिए. वही पर ब्रेक लग गए स्कूटरी के.

"बाज नहीं आओगे न.?" प्रीती ने दोनों पाँव जमीन पर रखे थे की अर्जुन ने साइड वाला स्टैंड लगा कर उसको वापिस बिठा लिए.

"अब तुम बताओ के यहाँ तुम्हे कोई परिंदा भी देख रहा है? और फिर हम दोनों ऐसा क्या कर रहे? रोज ऐसे हे दूर दूर से तुम्हे देख कर मेरा दिल करता है सबके सामने तुम्हारा हाथ पकड़ के बोल दू के अभी शादी करवा दो पढ़ाई बाद में कर lunga."Arjun की इस बात पर प्रीती पलट कर दोनों पाँव एक तरफ रखती बैठ गई. वो अब मुस्कुरा कर अर्जुन की बेताबी देख रही थी.

"अब काम से काम हम मिलते तोह है. तुम्हे तोह 10 साल मेरी याद भी नहीं आई लेकिन मई कितना तदपि हु तुम्हे नहीं पता." प्रीती ने बेशक बात मजाक में कही थी लेकिन अर्जुन ने जमीन पर खड़े होते उसके दोनों गाल अपने हाथो में लेते हुए होंठ उसके होंठो से मिला दिए. कोई वासना वाला चुम्बन नहीं था बस प्यार से उसके होंठो को चूमकर वो उसको देखने लगा.

"तब कुछ भी बस में नहीं था. लेकिन काम से काम आज हम पास में है प्रीती. और मई चाहता हु के इस बार अगर कुछ देर के लिए भी दूर गए तोह इतनी यादें तुम्हारी मेरे दिल में हो की मुझे दिन काटने न पड़े. वापिस आने पर ऐसा न लगे के हम दूर थे." अर्जुन ऐसे इतने अपनेपन से किसी से बात नहीं करता था. ऋतू दीदी या अलका दीदी के साथ भी नहीं. शायद बड़े होने की इज्जत और एक दूसरा रिश्ता भी होना. लेकिन यहाँ सिर्फ प्यार हे था दोनों में. प्रीती भी उठकर उसके गले लग गई.

"तुम मेरे हो और हमेशा तुम हे मेरे रहोगे. मुझे भी अंदेशा है के कुछ समय के लिए तुम दूर जा सकते हो लेकिन इन अगले 2 साल में तुम मेरे पास हो और मई इन 2 सालो में सिर्फ प्यार हे करना चाहती हु तुम्हारे साथ." इस बार उसके होंठ किसी तड़पती प्रेमिका की तरह हे अर्जुन के होंठो से जुड़ गए थे. पंजो के भर कड़ी वो बस जैसे उसके होंठो को चबा हे जाने वाली थी. अर्जुन के हाथ प्रीती की कमर और कूल्हों पर उसको थामे हुए थे. कोई 2 मिनट बाद दोनों अलग हुए तोह प्रीती उसके सीने से लगी कड़ी थी और अर्जुन की बाहें भी उसको अपने से लगाए थी. मस्ती भरी वह छेड़छाड़ इतना गंभीर प्यार हो सकती है शायद हे कोई और सोच सकता था.

"अब चले घर या रात यही बितानी है? बुआ को मार्किट भी लेके जाना है." अर्जुन की बात सुनकर प्रीती बेदिल्ली से अलग हुई तोह अर्जुन उसके मासूम चेहरे को हे देख रहा था. शाम ढलने लगी थी लेकिन प्रीती का चेहरा जैसे अब रोशन हुआ था. आकाश में छाए हलके बादल भी शायद इस चमक को धुंदला न कर सके थे.

"तुम बड़े गंदे हो. सच में बहुत ज्यादा. कभी मेरे लिए टाइम नहीं होता." प्रीती रूठने सी लगी तोह अर्जुन ने एक हाथ उसके कूल्हों पर रखते दूसरा सीने के उभार पर रख अपने पास कर लिए. प्रीती अर्जुन की ये मस्ती देख रही थी और उसको ये पसंद भी था के अर्जुन कैसे उसका मूड बदल देता था.

"गन्दी हरकत करने से पहले गन्दा कह दिए तोह चलो फिर अभी कर लेता हु." फिर बस एक बार उसके होंठो को चूमकर स्कूटरी पर आगे बैठ गया. प्रीती मुस्कुराती सी पीछे. उसको पता था के ये हे अर्जुन की सीमा थी उसके साथ बेशक वो खुद जो चाहे करवा सकती थी लेकिन अर्जुन ने इस से आगे कभी खुद को नहीं किआ था. पीछे से उसको जकड़ती वो उसके कान में बोली, "ी लव यू सोऊ मच. पता है मेरा प्लान था एक बिग नाईट का. सिर्फ तुम और मई और सॉरी वो मेरी हे वजह से खराब हो गया."

"तुम हमेशा के लिए मेरी हो तोह हमारी तोह हर रात वैसे हे होगी. हाँ लेकिन तुम अगर चाहती हो ऐसा कुछ तोह हम दोनों एक रात हमारी छत्त पर भी सो सकते है." अर्जुन उसके दिल की बात समझता हुआ बोलै

"सोने के लिए नहीं कह रही मई."

"जानता हु. मई चाहता हु के तुम पूरी रात मेरी बाजू पर सर रखे मुझ से बातें करो, खुले आसमान के नीचे. सुबह तक मई तुम्हे बाहों में भर के अपने सीने से लगाए लेता राहु. और हमारी आने वाली ज़िन्दगी में ऐसी हजारों रातें हो." एक दार्शनिक प्रेमी की तरह अपने विचार बताता वो घर तक आ गया था.

"और फिर.?" प्रीती भी उसकी बातों में हे खोई थी..

"तब तक शायद हमारी दोनों की बाजू पर 2 बच्चे सर टिकाये होंगे." प्रीती के घर के बहार स्कूटरी रोकता वो बोलै तोह प्रीती शर्माती सी उसकी कमर पर चूंटी काट अंदर भाग गई.

"ोये ये तेरी स्कूटरी है." अर्जुन ने बहार से आवाज लगाई लेकिन वो अंदर भाग गई थी. खुद हे स्कूटरी अंदर कर पारवती को चाबी देता 10 मिनट में आने का बोल कर वो अपने घर आ गया. जल्दी से नाहा कर उसने सिर्फ ऋतू दीदी को बताया के वो कहा जा रहा है. तारा की नजरे बस उसको हे देख रही थी लेकिन अब उनमे दर्द नहीं था. अर्जुन एक जीन्स और शर्ट पहन कर स्कूटर निकाल प्रीती के घर आ गया.

"बुआ चलो अब." ड्राइंग रूम से वह चिल्लाता सो बोलै तोह प्रीती बहार आई.

"ओह जनाब शांत. आ रही है बुआ तैयार हो कर बस 2 मिनट में." इतना बोलकर वह रसोईघर में खुद चली गई. कोई 5 मिनट बाद रेणुका बुआ एक हलके पीले कॉटन के सूट में बहार आई जिसके नीचे पजामी चूड़ीदार सफ़ेद थी. कद उनका भी ाचा था तोह कोई उन्हें देख कर ये नहीं कह सकता था के वह 37-38 साल की महिला होंगी. चेहरे की चमक और शरीर को देख कर 24-25 से एक महीना ऊपर न दिखती थी वह. अर्जुन झिझकते हुए अपनी नजर हटा ली तोह रेणुका बुआ ने एक काला क्लिप बालो में फंसते हुए प्रीती को जाने का बताया.

"बुआ इसको दूध ख़तम करने दो फिर आप लोग चले जाना." रसोईघर से वह एक गिलास दूध जिसमे बादाम काट कर डाले थे वो अर्जुन को देती बोली. अर्जुन प्रीती की इस देखभाल से खुश होता मुस्कुरा दिए वही बुआ भी दोनों को ाचे से देख रही थी. जल्दी से दूध ख़तम किआ तोह प्रीती ने एक साफ़ टोलिया आगे कर दिए जैसे अपने पति की खिदमत कर रही हो. मुँह पौंछने के बाद अर्जुन धन्यवाद् करता बुआ के साथ बहार निकल आया तोह प्रीती भी उनके घर की तरफ चल दी.

"तोह फिर यहाँ घर आने के बाद कैसा लग रहा है अर्जुन?" रेणुका अब स्कूटर पर ठीक तरह से बैठी थी और दोनों अपनी गली से बहार मुख्या सड़क पर आ गए थे. सड़क के किनारे की बत्तियां धीमी रौशनी में जगनि शुरू हो चुकी थी.

"सच कहु तोह अब पता चल रहा है के परिवार क्या होता है और यहाँ कितना प्यार मिल रहा है. हॉस्टल में तोह जैसे ज़िन्दगी का एक हे मकसद था और न कोई दोस्त वह थे और न परिवार." अर्जुन एक बार याद करता सा बोलै. रेणुका ने सफ़ेद सूती दुपट्टा गले में लिए हुआ था जो हवा से हिलता हुआ जा रहा था. इस तरफ भीड़ ज्यादा नहीं थी लेकिन आगे होने वाली थी.

"प्यार हे तोह जीवन को जीने लायक बनता है. और अगर ज़िन्दगी में ये न हो तोह फिर हर चीज बेबुनियाद या अधूरी लगती है." उनकी बात जाने कैसे जुबान पर आ गई.

"सही कह रही है आप. अपने जो होते है वह आपके हर सुख और दुःख में साथ खड़े हिम्मत देते है. और मैंने मेरे दादा जी से यही सीखा है की ज़िन्दगी जैसी भी हो बस खुश रहकर अपने लोगो में होनी चाहिए. इस से कभी ऐसा नहीं लगेगा के ज़िन्दगी का कोई अर्थ हे नहीं है या कोई मकसद." रेणुका जो अभी तक अर्जुन को एक बचा समझ रही थी और दिन में अपने पापा की बात भी शायद मान नहीं पाई थी वो उसकी इतनी स्पष्ट और गहरी बात सुनकर हैरान थी.

"तुम पहले तोह ऐसे नहीं थे. जहा तक मैंने तुम्हे देखा है तुम एक ज़िद्दी और गुस्सैल बचे थे. लेकिन अभी देख रही हु तोह लगता है के ये एक नया अर्जुन है." अपनी हैरत संभल न पाई तोह एक बड़ा सवाल कर बैठी थी रेणुका बुआ. अर्जुन उनकी बात से एक पल के लिए चुप हुआ लेकिन फिर सड़क पर ध्यान देते हुए बोलने लगा.

"बुआ जिसको जनम से हे इतना प्यार मिला हो के उसकी ज़िद्द भी ाची लगे. और फिर वही इंसान एक ऐसे सफर पर और छोटी उम्र में 9 साल तक अकेला रहे, उसको तोह प्यार की एक बूँद का भी एहसास किसी बारिश सा लगेगा. माँ के साथ सोने के समय अकेले घर से दूर रात काटना. राखी पर उन बहनो के प्यार से दूर रहना जो जान वार्ति हो, बुखार आने पर किसी अपने का हाथ सर पे न महसूस कर पाना.. ये सब या तोह इंसान को टॉड देता है या फिर एक आत्मा को सब सहने की शक्ति. घर पर आने के बाद आपको क्या लगता है मई सबसे एक पल में जुड़ गया था.? नहीं.. पूरा एक साल लगा अपने घर के सभी सदस्यों को अपनाने में, jaan-ne में. डर भी लगता था के कही ये प्यार फिर चला न जाये. लेकिन फिर एक भले इंसान की बात याद आ गई. ये प्यार जितना मिले, जहाँ से मिले समेत लो. बदले में तुम भी उतना या उस से ज्यादा दो. जब अकेले पड़ जाओगे तो वह प्यार और उसकी यादें जीने में मदद करेंगी." उसकी ये बात सुनकर रेणुका का हाथ उसके कंधे पर आ गया था. वो किसी गहरी सोच में डूब चुकी थी. 10 मिनट इस शान्ति के बाद दोनों पुल्ल पार करके अब बड़ी मार्किट में आ गए थे. आअज अर्जुन ने स्कूटर बहार वाली पार्किंग में नहीं लगाया था.

"पहले कहा चलना बताये आप?" अर्जुन की बात से रेणुका जी संभालती सी लगी. फिर सब तरफ इतनी रौशनी और bheed-bhad देख कर बोली, "वो प्रीती का लेहंगा कहा से लिए था? उसने मुझे बताया के वह ाची सारी भी मिलती है." उनकी बात सुनकर अर्जुन मुस्कुराता सो स्कूटर भीड़ से निकलता वही बड़ी दूकान की और चल दिए. 2-3 मिनट में वह यहाँ आ पहुंचे थे.

"आइये आप." उनके लिए खुद गेट खोलता वो खड़ा हुआ तोह मुस्कुराती हुई रेणुका जी अंदर चली आई. यहाँ पर तोह हर तरफ shaadi-byaah या बड़े त्योहारों के लिए एक से एक कपडे थे. काउंटर पर खड़ा नौजवान अर्जुन को पहचान गया था और वह से निकल कर उसकी तरफ चला आया.

"आओ भाई. आज बताओ क्या चीज पसंद करनी है?" ये दूकान के मालिक का हे बीटा था जो बड़े प्यार से अर्जुन से मुखातिब हुआ. अर्जुन ने भी प्यार से हाथ मिलाय और आने की वजह बताई.

"मोनू 2 गिलास जूस लेके आ. मीणा, यहाँ मैडम को सिल्क और शिफॉन में पार्टी वियर साड़ी दिखाऊ." उसने वही से आवाज लगा कर बोलो तोह दोनों हुकुम की तामील हुई. अर्जुन और रेणुका जी को सोफे पर बैठा कर उनके सामने पड़े कांच के टेबल पर 10-12 बेहतरीन कारीगरी की साड़ी सजा दी थी. रेणुका जी भी अर्जुन का दुकान पर ऐसे स्वागत देख थोड़ा हैरान थी. उन्हें क्या पता था की उनकी भतीजी को यही लड़का अर्जुन की होने वाली बीवी समझ चूका था और दोनों ने ाची खरीदी करि थी यहाँ.

"आपने शादी में pehan-ni है तोह बस ये ध्यान रखिये के रंग भी थोड़ा सुर्ख हो. रंग भी ाचा है तोह लाल से लेकर काले तक सभी आप पर जांचेंगे." मीणा नाम की इस लड़की ने एक काली और एक रेशमी लाल साडी खोल कर दिखते हुए कहा. बात भी सही थी की रेणुका का शरीर एक तोह बड़ा सांचे में ढला हुआ था और ऊपर से गोरा गुलाबी रंग. इधर अर्जुन की नजरे भी एक तरफ जमी हुई थी लेकिन वो कुछ नहीं बोलै. रेणुका जी ने कोई 5-6 साडी अपने हाथ पर रख कर देखि. थी तोह सभी सुन्दर लेकिन उन्हें कोई जाँच नहीं रही थी.

"तुम क्या कहते ho?"Unhone अर्जुन की राये लेने के मकसद से पुछा. उनके हाथ में वही एक काली सारी थी जिस पर कांचा ुर छोटे मोतियों का काम हो रखा था.

अर्जुन बिना कुछ कहे वह से उठकर एक लड़की की प्लास्टिक की मूरत के पास गया और दूकान वाली तरफ देखता बोलै, "भाई इसके साथ का जो हलके और ऐसी हे कारीगरी वाले रंग हो वो दिखाना जरा." मूरत पर लाल साड़ी पर सुनहरी किनारी थी. काम भी गजब का किआ हुआ था. मीणा नाम की वह लड़की बस अर्जुन की बात हे सुनकर चुप्प हो गई थी. इतनी देर में एक लड़का जो वही काम करता था 3 साड़ी लेकर आ गया. साफ़ समंदर के रंग सी हरी जिसपर बीच बीच में बिलकुल हलके आसमानी रंग की परछाई आ रही थी, एक बिलकुल हलकी गुलाबी जैसे बस ढेर सारे दूध में एक बूँद लाल रंग मिलाने से जो गुलाबीपन आता है. इस साड़ी में सफ़ेद रंगी की परछाई थी. तीसरी थी जो मूरत पर पहनाई गई थी. तीनो हे साड़ी के किनारे बेहद उम्दा तरके से सजे थे लेकिन tadak-bhadak की जगह शालीन और आकर्षक थी वह.

"आपके बाल चमकदार काले है और वैसी हे आँखें, तोह आपको इनका ख्याल करते हुए भी कभी रंग लेने चाहिए. गोरी त्वचा के साथ अगर हर सुर्ख रंग ाचा लगता है तोह इनके साथ ये आँखों को ठंडक देते रंग कही ज्यादा जांचेंगे. फिर तोह आप शिरंगार करे या सादगी से 12 बारीक इनके साथ की चूड़ियां पहन ले वही बहोत रहेगा." अर्जुन ने वो बिलकुल हलकी हरी साड़ी एक काले डब्बे के ऊपर रखते हुए दिखाई तोह रेणुका जी और वो लड़की बस अपनी नजरे वही लगा कर उसके तरीके को देखने लगे और दूकान के मालिक का बीटा बस मुस्कुरा रहा था.

"अगर आपको कुछ कमी लगती है तोह फिर ये देखिये हलकी गुलाबी, इंग्लिश में बेबी पिंक या रोज पिंक. साथ में लाल सुनहरी कंगन, मांग में सिंदूर और लाल या मेहरून हैंडबैग. क्यों शरीर पर इतना बोझ लादना जो जरुरत से ज्यादा लगे." उसकी आवाज अब इतनी धीमी थी की सिर्फ रेणुका जी को ाचे से समझ आ रही थी. सामने वाले तक शायद कुछ हे शब्द पहुंच रहे थे.

"ये दोनों हे पैक करवा दीजिये." रेणुका बुआ ने दूसरी बात नहीं करि.

"मम इसके साथ का ब्लाउज हम 3 दिन बाद दे पाएंगे." मीणा ने वो दोनों साड़ी संभाल कर उठाते हुए इतना हे कहा था के अर्जुन ने अपने इस बेनाम दोस्त की तरफ देखा.

"नहीं नहीं. आप बस माप दे दीजिये. ब्लाउज का क्या है हम कल शाम को हे तैयार कर देंगे बिलकुल आपके मुताबिक डिज़ाइन के." वो लड़का खुद चलता हुआ पास आ गया. रेणुका जी ने भी इन दोनों की नजरो में हुई बात समझ ली थी.

"मम आप मेरे साथ आइये." मीणा बेचारी तोह चुपचाप सी रेणुका जी को लेकर पिछले कमरे की तरफ चल दी जहा पर मास्टरनी जी बैठी थी.

"तुम नहीं चलोगे साथ?" रेणुका ने ये बात कही तोह अर्जुन बस मुस्कुरा दिए.

"मुस्कुरा क्या रहे हो. साड़ी पसंद कर दी तोह अब डिज़ाइन भी बता दो." उनकी बात पर वो सर झुकाये उनके पीछे चल दिए. और दूकान वाला लड़का उन्हें देख मंद मंद मुस्कुराने लगा था. "ये अकेला बाँदा शोरूम में आने वाली हर लड़की को साड़ी सूट बेच सकता है." खुद से ये बात कहता वह साड़ी पैक करवाने लगा था.

"ये पीछे से बैकलेस, ये वाला थीं स्ट्रिप राउंड बैक या फिर ये वाला बाजु के किनारे पर्ल वर्क और पीछे तन्निव वाला?" जो 3 डिज़ाइन का चुनाव रेणुका जी ने किआ था अर्जुन को भी वो पसंद आये फिर भी कुछ सोचने के बाद वो बोलै.

"साड़ी अगर घर पर किसी उत्सव में या खास समय पहन नई होती तोह पहले दोनों ठीक रहते, खासकर बैकलेस. लेकिन शादी है और वो भी लड़के की तोह भीड़, naach-gana और ज्यादा चलना फिरना होगा. हर तरह के लोग भी होंगे, इसलिए ये आखिरी वाला ठीक रहेगा. और आंटी जी क्या इस डिज़ाइन में यहाँ गले के कटाव पर भी ये मोतियों का काम हो सकता है?" जैसे उसने हे घोषित कर दिए हो के कोनसा ब्लाउज चलेगा. उन आंटी जी ने भी सर हिला दिए.

"बीटा वो जैसा कपडा बाजू पर लगेगा बस वही कपडा यहाँ बारीक तरीके से लग जायेगा. मोती का काम उसके ऊपर हे है. बस गाला कितना नीचे रखना है ये बता दो."

उनकी आखिरी बात पर दोनों के कान लाल हो गए.

"अब आप करवा लीजिये, मई बहार चलता हु." इतना बोलकर वो बहार आ कर उस लड़के से बात करने लगा.

"भाई मेरा नाम सुधीर है लेकिन दोस्त सोनू बुलाता है. तुम भी जो दिल करे बुला लिए करो." उसको अपने हाथ से पानी का गिलास पकड़ता वह लड़का अर्जुन के साथ हे सोफे पर बैठ गया.

"भाई मई तोह सुधीर हे बुला लूंगा. क्योंकि मेरा नाम अर्जुन है लेकिन घर का मुन्ना. तोह मुन्ना कहना और sun-na ाचा नहीं लगेगा." दोनों हंस दिए.

"वैसे यार कमल का हुनर है तुम में. मतलब यहाँ दिन भर में 100 महिलाये या लड़किया आती होंगी. कपड़ो के ढेर लगवा देती है लेकिन पसंद नहीं कर पाती लेकिन तुमने कमाल कर दिए भाई." सुधीर की शकल पर प्रशंशा के भाव थे.

"भाई एक तोह मेरी बहोत साड़ी बहने है तोह उनको देखता रहता हु. ऊपर से आज लाइब्रेरी में मैं एक किताब पढ़ी थी 'मेरी saheli-diwali संस्करण'. उसमे सिर्फ यही बताया गया था जो आज मैंने दिखाया. लेकिन वह इतनी बात 6 पन्नो और 12 चित्रों के साथ थी." अर्जुन हंसने लगा तोह सुधीर भी उसका साथ देने लगा.

"वाह भाई मतलब bade-buddhe सही कहते है के किताबो में हर चीज का हल है." सुधीर की बात का अर्जुन ने समर्थन किआ. लाइब्रेरी में आज इतिहास की किताब पढ़ने के बाद उसने 'मनोरंजन' शेल्फ पे राखी एक महिलाओं की किताब पढ़ी थी जिसमे उनके शिरंगार, कपड़ो का चयन और पति को लुभाने के बारे में बहुत कुछ बताया गया था. अर्जुन ने तसल्ली से एक घंटा उस पर हे लगा दिए था और वही उसके यहाँ काम आया.

"चले अब यहाँ से. और कितने पैसे हुए बता दीजिये.?" हैंडबैग खोलती रेणुका ने साड़ी के डब्बे पर देख लिए था 7499/- लिखा मतलब 15000 की दोनों. तोह उन्होंने 500 के नोटों की गद्दी हे निकल ली थी बहार. सुधीर के पिता जी दुकान से जा चुके थे तोह वह कागज पर एक बिल बनाने लगा.

"ये लीजिये मैडम." यहाँ पर्ची पर लिहा था 10000/- ब्लाउज सिलाई समेत. वो पर्ची को देखती तोह कबि उन दोनों को.

"देखिये अगर ज्यादा है तोह मई देख लेता हु कितना और काम हो सकता है. खरीदने की किताब से बिल निकलना पड़ेगा." उसकी बात पर रेणुका जी ने जल्दी से 20 नोट निकाल कर आगे बढ़ा दिए.

"इन पर तोह फ्रेश अर्रिवाल लिखा है. लेकिन आपने 33% चूत कर दी." अर्जुन ने तोह बिना कहे वो बड़ा बैग उठा लिया जिसमे दोनों साड़ी प्लास्टिक डब्बे को बंद करके टेप से सील कर दी गई थी.

"जी इतना मार्जिन रहता है तोह कर दिए. वैसे भी अर्जुन मेरा दोस्त है तोह ये मैंने कुछ ज्यादा नहीं किआ." बात कहते हुए उसने रेणुका जी को नमस्कार किआ और अर्जुन हाथ मिलाने के बाद जाते हुए हाथ हिला दिए.

"ये क्या किआ तुमने? उसका नुक्सान करवा दिए." बाहर आने के बाद स्कूटर पर बैग को आगे रखते अर्जुन से रेणुका जी ने कहा.

"आप इतना क्यों सोचती हो? दूकान की बात दुकान से बहार आने के बाद ख़तम. वो मालिक था उसको जो ठीक लगा उसने किआ. अब आप कभी भी आएँगी तोह यही से लेंगी. वो कर लेगा नुक्सान पूरा. अब चलिए आपको चूड़ियां, कड़े और जो सामान चाहिए वो दिलाता हु. यहाँ से जल्दी निकल लेंगे नहीं तोह पक्का बारिश में भीग जायेंगे." ऊपर आसमान में देखते हुए अर्जुन ने ये कहा तोह रेणुका कुछ सोचती सी मुस्कुराने लगी.

"तोह मतलब जो कुछ दूकान पर बोलै वो सब हे लेंगे हम?" वो स्कूटर पर बैठती बोलने लगी.

"है तोह नहीं क्या? अब मैंने तोह जैसे कहा वो चित्र पूरा करके हे तोह ये साड़ी ाची लगेगी. दूकान ज्यादा दूर नहीं है यही बस थोड़ी आगे है." जहा से प्रीती के लिए पाजेब और चूड़ियां ली थी वही पर वो उन्हें भी लेके आ गया.

"लीजिये यहाँ पर सब मिल जायेगा." अंदर उनके साथ हे आते हुए अर्जुन बोलै तोह काउंटर के दूसरी और कड़ी लड़की ने उनका स्वागत किआ.

"आये सर. क्या लेना है बताइये." एक स्वाभाविक सी मुस्कान से उन दोनों का अभिवादन किआ.

"इनके माप के laal-sunheri कड़े, बिलकुल हलकी हरी रंग की कांच की चूड़ियां 2 डोज़ेन और बाकी ये बता हे देंगी आपको." अर्जुन की बात सुनकर रेणुका जी बस मुस्कुरा रही थी. कुछ हे देर में उन्होंने सब पसंद करते हुए साथ हे गीला काजल, लिपस्टिक और पायलो को जोड़ी भी ले ली. यहाँ पर भी उन्हें डिस्काउंट मिला. दोनों वह से बहार निकले तोह ये वाला सामान अर्जुन ने स्कूटर की सामने वाली डिक्की में रख दिए. समय कोई साढ़े आठ हो चूका था. रेणुका इस बार बड़े आराम से अर्जुन के साथ लग कर बैठी हुई थी. दोनों हे गली से बहार मार्किट के चौक पर आये तोह रेणुका को गोलगप्पे चाट की रेहड़ी दिख गई. पिछले 7-8 साल में शायद उन्होंने एक दो बार हे उनका स्वाद चखा था. अर्जुन को प्यार से वह रुकवाती वो स्कूटर से उतर गई.

"भैया 2 प्लेट गोलगप्पे लगा दीजिये, तीखे खट्टे." उनकी बात पर अर्जुन गरदारन न में हिलता बोलै, "मुझे ये सब मन है. आप खा लीजिये."

"बड़ो की बात मान लेनी चाहिए. और फिर एक बारी से कुछ नहीं होने वाला." उनका दिल रखते हुए वो भी प्लेट लेकर खड़ा हो गया. लेकिन यहाँ तोह रेणुका जैसे गिनती हे भूल गई थी. अर्जुन भी साथ देता वो तीखे गोलगप्पे खता रहा. जब पेट भर गया तोह उन्होंने अपने मुँह में रखे आखिरी गोलगप्पे के साथ हे न में हाथ हिलाया. अर्जुन मुस्कुराता रेहड़ी वाले को पैसे दे कर स्कूटर पर आ बैठा तोह रेणुका ने थोड़ा तीखा पानी पीने के बाद स्कूटर का रुख किआ.

"तुमने पैसे क्यों दिए?"

"मई तोह वह भी दे देता जब चूड़ियां खरीद रहे थे. फिर सोचा आपको बुरा लगेगा. लेकिन यहाँ हम दोनों थे तोह लड़का होने के हिसाब से ये मेरा फ़र्ज़ था. अब आप बताइये क्या लेना है.?" अर्जुन के जवाब से रेणुका जी लाजवाब हो गई थी. मैं से मासूम, शरीर से हटकटा लेकिन दिल से एक परिपक्व इंसान. मुस्कुराती वो उसकी कमर पर हाथ रखती बोली, 'हम कल भी आएंगे न तोह फिर तभी ले लेंगे. और कल मई वो झूले भी लुंगी." चौंक के बीच में बने बड़े पार्क में ऊपर से नीचे आते झूले लगे थे जो अभी अभी बंद हुए थे. अर्जुन ने हाँ में सर हिलाते हुए धीमी रफ़्तार से स्कूटर वापिस ले लिए. पुल्ल पार करते हे बारिश शुरू हो गई थी. अभी इतनी तेज नहीं थी लेकिन हवा जोर से चलने लगी थी. स्कूटर को सड़क के किनारे चलता वो सड़क पर ध्यान लगाए था. यहाँ से भी घर 7 किलोमीटर तोह था हे. कुछ और आगे आने पर बारिश की रफ़्तार ऐसी हो गई थी की सामने सिर्फ सफ़ेद बौछार नज़र आ रही थी. पीछे रेणुका बुरी तरह अर्जुन से चिपकी हुई थी.

"किसी जगह पेड़ या बस स्टॉप के नीचे रोक लो. ऐसे तोह घर से पहले ऊपर पहुंच जायेंगे." सुनसान सड़क और बारिश में स्कूटर की लाइट भी काम करने से रही. अर्जुन ने अपने घर की जाती उस हरियाली सड़क पर फुटपाथ बार बानी तीन की छत्त देख स्कूटर वह रोक दिए. स्कूटर भी वही फुटपाथ पर उस तीन की छत्त के निचे खड़ा करके दोनों हलके से कंपते शर्ट और कमीज निचोड़ने लगे. बारिश अब अपने पूरे चरम पर आ चुकी थी. सड़क किनारे जमा होता पानी बता रहा था के कैसी रफ़्तार थी.

"ये गोलगप्पे पहले तीखे थे अब गीले कर गए." अर्जुन ने हँसते हुए ये बात कही. उसकी बात का मतलब समझकर रेणुका झेंप गई थी.

"सॉरी. मेरी वजह से हम आज यहाँ फंस गए." अर्जुन से स्कूटर पर चिपके रहने के बावजूद उनका पूरा कमीज गीला होकर शरीर से चिपक चूका था. हवा की वजह से उनको कंपकपी भी होने लगी थी.

"अगर ये बारिश मार्किट जाते समय हो जाती फिर भी आप यही कहती? ाचा हे हुआ न के पहले सामान ले लिए नहीं तोह वो भी रह जाता." अर्जुन ने सकरात्मक सोच से कहा. स्कूटर के सामने टेंगा थैला सुरक्षित था क्योंकि वो ऊपर से बंद था प्लास्टिक के बैग में. अंदर भी ाचे से पैक था.

"तुम हर बात को इतना पॉजिटिव हे सोचते हो क्या?" रेणुका उसके चेहरे की तरफ ध्यान करती बोली. एक दो सड़क किनारे लगी लाइट से इतना प्रकाश आ रहा था के शरीर की हरकत देखि जा सके.

"अगर हमारे वश में कुछ न हो तोह हमको वही करना चाहिए जिसमे नुक्सान न हो." अभी ये दोनों हे बातें कर रहे थे के 2 जवान से दीखते आदमी भी उस तीन की छत्त के नीचे आ खड़े हुए. रेणुका को शराब की दुर्गन्ध आई तोह वो उनकी तरफ से अर्जुन के पीछे आ कड़ी हुई. चेहरे पर दाढ़ी और शरीर भी ठीक था दोनों का. कपडे भीगे थे और उनमे से एक एक हाथ में प्लास्टिक की शराब की बोतल थी, जो जब भी वो दोनों बारी से घोंट भरते तोह चमकती थी.

"आप लोग ऐसे शराब नहीं पी सकते." जब अर्जुन से ये देखा न गया तोह उसने बस इतना कहा. वीएस भी ये छत्त कोई 8 फ़ीट लम्बाई में थी तोह ज्यादा जगह नहीं थी.

"ख़तम होने वाली है फिर तुझे हे यहाँ से भेजता हु." दाढ़ी वाले ने ये बात कही तोह अर्जुन बस आराम से खड़ा रहा लेकिन रेणुका की साँसे भरी हो गई थी. सड़क पर तोह कोई कार या इंसान नजर नहीं आ रहा था. ऊपर से ये दोनों शराब पीते आदमी जिनकी कद काठी भी ठीक थी और उम्र भी 30 के लगभग.

"अब बता तेरा क्या करू? इसको यहाँ छोड़ और निकल जा नहीं तोह कल के अख़बार में फोटो निकलेगी तेरी लाश की." दूसरा आदमी अभी शायद आखिरी के घूँट का मजा ले रहा था तोह ये वाला रेणुका की तरफ देखता आगे बढ़ के अर्जुन की शर्ट का कालर पकड़ने हे लगा था की जोरदार तननननन की आवाज के बाद तेज चीख हवा में गूँज उठी. जैसे हे इस आदमी ने हाथ आगे बढ़ाया था अर्जुन ने खुद को पीछे करते हुए उसकी गर्दन पकड़ कर लोहे के पोल से सर को जोर से भिड़ा दिए था. अब वो सड़क पर गिरा दर्द से तड़प रहा था.

"तेरी तोह बहनचोद.." इतना बोलता दूसरे वाला अर्जुन की तरफ लपका जिसके हाथ में एक देसी चूरा था. पूरी तरह चौकन्ना होने के बावजूद अर्जुन वार को फ़ैल न कर सका और चाक़ू का नुकीला हिस्सा कंधे के ऊपर घाव करता आगे निकल गया लेकिन इस वाले की गर्दन उसके बड़े पंजे में आ चुकी थी.

"गलती कर दी आप लोगो ने ये सब कर के. न यहाँ पुलिस है, न कोई बचने वाला और न मेरा संयंम." आखिर लफ्ज़ लगभग चीखते हुए अर्जुन ने इस तगड़े से आदमी को बीच सड़क पर दे मारा और खुद भी बारिश में उसकी तरफ चल दिए. उसकी चाल बता रही थी की शेर जख्मी भी है और अब आज़ाद भी. रेणुका तोह बस सेहमी सी देख हे रही थी.

"आज मई दिखता हु की किसका फोटो आएगा अखबार में." जमीन पर गिरे इस शख्स के मुँह पर अपने जूते से भरपूर वार किआ तोह शायद उसके दांत टूटकर मुँह में हे आ गए थे. फिर से नीचे झुक कर उसका हाथ पकड़ कर अर्जुन ने फुटपाथ के सहारे टिका दिए. अपने पाँव से उसकी हथेली दबाये बाजू पर दूसरा पंजा दे मारा. मुँह से दांत उगलता ये आदमी ऐसे चीखा जैसे अंतिम चीख हो. "कड़ाक" की ये आवाज बारिश के शोर में भी सुनाई पड़ गई थी. इतने में पहले जिसके मार पड़ी थी वो वाला खुद को संभल कर अब रेणुका के पीछे आ उसकी गर्दन दबोच के खड़ा था.

"छोड़ दे मेरे भाई को नहीं तोह इस साली को मार दूंगा. मई सच बोल रहा हु के इसको मार दूंगा. और मरेगा तोह तू भी, लेकिन कल. 4 मर्डर कर के भी बहार हु लड़के मई लेकिन तू भी मरेगा. छोड़ दे मेरे भाई को." वो जाने किस नशे में था के खुद हे मौत को बुला रहा था. अर्जुन बस घूरता हुआ उसकी तरफ बढ़ रहा था जैसे जैसे उसके कदम इस आदमी की तरफ बढ़ रहे थे वैसे वो आदमी पीछे हो रहा था.

"मई तुझे 1 मिनट देता हु अपने भाई को उठा और निकल जा. नहीं तोह कोई कल नहीं होगा तुम दोनों का." ये आवाज भी ऐसी थी की रेणुका को वह जैसे अर्जुन दिखाई सुनाई नहीं दे रहा था. ये इंसान कोई और हे था. लेकिन वो आदमी थोड़ा दीठ निकला.

"तू निकल जा यहाँ से. इसको मई खुद छोड़ दूंगा." जाने कोनसा नशा किआ था उसने की डर और वासना दोनों की पकड़ में था वो. जिस हाथ से गर्दन दबाई थी वो अगले हे पल हवा में उठ चूका था.

"छूने की गलती करदी अब तेरे इस हाथ का भी कोई काम नहीं." उसकी ब्याह को मरोड़ते हुए पोल से टिका कर अर्जुन ने झटक दिए तोह अपने भाई की तरह चिल्लाता ये नीचे गिर गया. गर्दन पर लात पड़ी तोह अब वो शायद मूर्छित हो गया था. रेणुका जो थोड़ी समय पहले तक इस इंसान से भयभीत थी वो उस से जा कर लिपट गई थी.

"यहाँ से चल अर्जुन. तुझे मेरी कसम है. हम आगे रुक जायेंगे." अर्जुन इस प्यार भरे एहसास से होश में आ गया था. एक बार उनकी पीठ सहलाने के बाद वो स्कूटर पर बैठ गया और रेणुका भी उसके पीछे दोनों तरफ पाँव करके बैठ गई थी. बारिश तोह अभी भी वैसे हे हो रही थी लेकिन दोनों बस चुपचाप चले जा रहे थे. अपने सेक्टर में पहुंच कर रेणुका ने अर्जुन से स्कूटर रुकवाया. यहाँ भी वैसी हे एक तीन की छत्त थी लेकिन इसके ठीक साथ में सफ़ेद मरकरी लाइट रोशन थी.

"इधर आ जरा." उसको अपने साथ लिए वो रौशनी के नीचे उसका बया कन्धा देखने लगी. शर्ट का किनारा कट गया था और वही ठीक नीचे लम्बाई में डेढ़ इंच का निशाँ बन गया था जिसमे से अभी भी हल्का खून रिस रहा था.

"इस पर चुन्नी रखने की गलती मत करना आप." उनको निहारते हुए अर्जुन ने कहा तोह वो प्रश्न करती आँखों से उसको देखने लगी.

"चुन्नी अपने पास हे रखिये. मई चोट छिपा लूंगा और ये बात जो भी आज हुई इसका जीकर गलती से भी घर में मत कर दीजियेगा नहीं तोह मेरा वनवास पक्का." उनकी हे चुन्नी से वो रेणुका का चेहरा साफ़ करने लगा जहा बारिश के बावजूद आंसू थे.

"और जब मई साथ में हु तोह आप रो क्यों रही है? आप भी सलामत है और मई भी. मेरे होते आपको कुछ होने नहीं दूंगा. बस एक गलती हो गई जिस वजह से उसने आपको हाथ लगा दिए."

"और तुमने वो टॉड दिए. क्या हुआ था तुम्हे यु एकदम से? हम वह से भाग भी तोह सकते थे."

"मुझे सिर्फ एक हे चीज बर्दाश्त नहीं होती, मेरे किसी अपने के ऊपर जुल्म. मई उन्हें दर्द और डर में भी नहीं देख सकता. फिर न मेरा सयंम टिकता है न संस्कार. छोड़िये ये सब और खुद को ठीक करिये. देख लीजिये कही कोई खून का धब्बा न हो. मेरे कपड़ो पर तोह दिखने से रहा कुछ." वो मुस्कुराता हुआ बोलै तोह रेणुका ने भी एक छोटी सी मुस्कान अपनी गीली आँखों के साथ बिखेर दी.

"पापा सही थे. तुझे जान पाना आसान नहीं है. लेकिन समझदार होने के साथ तू हिम्मत वाला भी है." एक प्यार सा उमड़ आया था रेणुका के दिल में. कितनी बहादुरी से आज उसने इज़्ज़त बचाई थी फिर समझदारी दिखते हुए चुन्नी तक के लिए मन कर दिए था. जैसे हे अर्जुन स्कूटर के पास जा कर उन्हें देखने लगा रेणुका झटके से उसके सीने लग गई. अर्जुन ने इस बार के गले लगने में कुछ अलग महसूस किआ था. कुछ देर बाद अलग होकर वो पिछली सीट पर बैठ गई थी नजर झुकाये और अर्जुन घर के बहार पहुंच गया था. समय कोई रात के 10 से ऊपर का था और घर के अंदर कड़ी छोल साहब की गाडी बता रही थी की वो आ चुके है. पूरी गली अन्धकार में थी जैसा आमतौर पर बारिश के समय होता था. मोमबत्ती या इमरजेंसी लाइट.

"अंदर नहीं चलोगे?" अर्जुन उन्हें सामान पकड़ाने लगा तोह रेणुका ने एक गुजारिश सी करते हुए कहा. 'अंदर गया तोह छोटे दादू पूछेंगे नहीं गया तोह वो समझ जायेंगे की बिना सामान अंदर रखे गया है तोह कोई गड़बड़ है.'

"आप कुछ नहीं बोलेंगी उन्हें. सिर्फ इतना याद रखना की आते समय बारिश में जब पेड़ के नीचे खड़े थे तोह ऊपर से कुछ आ कर यहाँ गिरा जिस से चोट लग गई." अर्जुन समझते हुए बोलै तोह वो सर हाँ में हिलती चूड़ियों वाला बैग लिए आगे चल दी इधर अर्जुन साड़ी के डब्बे लिए अंदर दाखिल हुआ. छोल साहब खाना खा चुके थे और अब ड्राइंग रूम में हे सामने बैठे टेलीविज़न देख रहे थे.

"ोये तुम तोह बुरी तरह भीगे हुए हो." उन्होंने रेणुका और अर्जुन को अंदर आते देख कहा.

"प्रीती कहा है?" रेणुका जी ने इतना हे पुछा तोह एक टोलिया उठा कर वो पास आते बोले, "वो तो ऋतू के पास गई है वही सोयेगी. क्या बात?"

"अंदर में पता नहीं अर्जुन के कंधे पर क्या लग गया जिस से इसको थोड़ी चोट आई है. फर्स्ट अिध बॉक्स देखिये जरा." छोल साहब ज्यादा बात किये बिना अंदर चले गए तोह रेणुका खुद हे अर्जुन का सर पौंछने लगी.

"कमीज उतार कर इधर आ कर बैठ. मेरा शेर पुत्तर है तू ये छोटी मोटी चोट लगती रहती है." अर्जुन ने दरवाजे पर हे कमीज उतार दी तोह छोल साहब की नजर उस जख्म पर गई, अभी तक हल्का खून आ रहा था. अर्जुन उनके पास आकर जमीन पर पंजे के भार बैठ गया.

"ये लगी कैसे है?" उनका ये सवाल और आवाज रेणुका को हिलने के लिए काफी थी.

"दादू, ये पिछले सेक्टर के पार्क के बहार पेड़ के नीचे खड़े हुए बारिश से बचने के लिए तोह पता नहीं कोई तीखी सी चीज शरीर पर लगती महसूस हुई और देखा तोह ये शर्ट फट गई थी और खून आ रहा था." अर्जुन ने उनकी तरफ अपनी मासूम शकल से देखते कहा.

"हम्म.. कोई पट्टी या तार से शायद कट लग गया है. हवा तेज भी थी. तू एक काम कर पहले ये पंत भी उतार के आ. पारवती इसको अंदर से पजामा दे जरा." उनकी आवाज पर पारवती रसोईघर से बहार आई, जो बर्तन धो रही थी. कुछ देर बाद अर्जुन अंदर के बाथरूम में था. शीशे में जख्म देखा तोह कुछ ख़ास नहीं लगा उसको चाक़ू के वार के मुताबिक. फिर दरवाजे के पीछे जीन्स टांग कर पजामा पहना और मुँह धोने के बाद शरीर पांच कर बहार आया जहा पर छोल साहब अकेले बैठे थे.

"ये पकड़ कर रख. मई ये ऊपर पट्टी लगा के टेप से इसको सेट कर देता हु." उसके जख्म को पहले हाइड्रोजन पेरोक्साइड से साफ़ करने के बाद उन्होंने तैयार करके राखी पट्टी और रूई जिसपे दवा लगी थी उसके कंधे पर दबा के उसको पकड़ा दी. फिर वो डॉक्टर टेप को कैंची से लम्बा काट कर चिपकने लगे. ाचे से ड्रेसिंग करने के बाद वो उठ गए.

"पारवती इन दोनों का खाना लगा देना और मुकेश को बोल दे के रामेश्वर जी के घर सदेशा दे आये की अर्जुन आज यही रहेगा. बाकी मई फ़ोन कर के देख लेता हु अगर उठा लिए तोह बस खाना लगा दो. मई अपने कमरे में जा रहा हु." एक बार फिर अर्जुन के सर को प्यार से सेहला कर कुछ सोचते से वह अंदर चले गए.

"अर्जुन, अलका को बता दिए के तू यही सोयेगा आज. खाना खाने के बाद प्रीती के कमरे में सो जाना." कोई 2 मिनट बाद उन्होंने फिर से अंदर से आवाज दी तोह अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा, "जी ाचा दादू. गूडनिघत."

पारवती ने टेबल पर खाना लगा दिया तोह रेणुका बुआ बाथरूम से तरोताजा हो कर आ गई थी. एक काले रंग की मैक्सी पहन कर और बिना हे किसी प्रसाधन के वो इस रूप में भी बड़ी आकर्षक लग रही थी. अर्जुन की नजर एक पल के लिए उन पर ठहर सी गई थी. यही हाल उनका भी हुआ जब सामने अर्जुन को बिना कमीज के सिर्फ एक सफ़ेद पाजामे में कंधे पर पट्टी करवाए बैठे देखा. छाती इतनी चौड़ी और वैसे हे कंधे थे. किसी पहलवान से बाजू लेकिन मासूम चेहरा.

"पारवती बहार का दरवाजा बंद कर के तू चली जा सोने मई बर्तन समेत दूंगी." कुर्सी पर बैठ ते हुए उन्होंने कहा और अर्जुन की प्लेट में खाना परोसने लगी. फिर अपनी पालते लगाने के बाद दोनों ने ज्यादा बातचीत किये बिना खाना शुरू किआ. पारवती भी दरवाजे बंद कर जा चुकी थी. बस ड्राइंग रूम और प्रीती के कमरे में हे लीगत जल रही थी. छोल साहब का कमरे के दरवाजा भी ढलका हुआ था.

रेणुका जी को एकदम से हिचकी लगी तोह अर्जुन ने झट से गिलास उनके चेहरे के सामने कर दिए. पानी पीने के बाद खाना ख़तम कर वो दोनों उठ गए तोह अर्जुन सीधा प्रीती के कमरे में चल दिए बिना कोई बात किये क्योंकि रेणुका जी भी बर्तन उठा कर रसोईघर में जा चुकी थी. उनका कमरा प्रीती के साथ वाला था जो वैसे तोह बंद हे रहता था. बिस्टेर पर लेत कर अर्जुन ने साइड वाला लैंप जला लिए था और मुख्या लाइट बंद कर दी थी. सिरहाने राखी चद्दर छाती तक ओढ़ कर वो वैसे हे लेता सोच रहा था के खा तोह आज वह घर में मजे कर रहा होता और कहा आज प्रीती के कमरे में उसके बिना हे सोना पड़ रहा है. कोई 15 मिनट बाद दरवाजा खुला और रेंजका जी अंदर आ गई.

"आप?"

"तुम सोये नहीं अभी तक? वो मई कल भी यही सोइ थी तोह सोचा आज भी यही सो जाती हु. लेकिन अगर तुम्हे ठीक नहीं लगता तोह मई पिछले कमरे में चली जाती हु. उधर ठीक से सफाई नहीं हुई है." इतना बोल कर वो वही कड़ी हो गई.

"नहीं नहीं. बहोत बड़ा बीएड है. आप भी सो जाइये एक तरह बस सुबह जल्दी उठ जाता हु तोह आपको परेशानी न हो जाये." दोनों हे बहुत कुछ कहना चाह रहे थे लेकिन बात घुमा रहे थे. अपनी तरह का तकिया अर्जुन के तकिये के पास करती रेणुका बिस्टेर पर आ गई थी. दरवाजा भी ढाल दिए था ाचे से.

"तुम्हे एक पल भी डर नहीं लगा था उस समय?" करवट अर्जुन की तरफ करती वो बोली तोह अर्जुन दाए कंधे पर उनकी तरफ मुँह करते बोलै.

"डर तब लगता जब आपको कुछ हो जाता. क्योंकि मुझे सही में किसी से डर लगता है तोह अपने उस बदलाव से जिसमे मई कुछ सोच नहीं पता. आज अगर आपको वह कुछ हो जाता तोह मई क्या जवाब देता छोटे दादू को?" इतनी परवाह देख कर रेणुका ने अपना दाया हाथ आगे बढ़ाते हुए उसका सर और गाल सेहला दिए.

"तू सच में बहोत ाचा है रे. एक बार तोह लगा था के शायद तू जानवर बन गया हो. लेकिन अब याद करती हु उस पल को तोह लगता है की शेर जंगल में परिवार की हिफाजत करता है. उसके भी दो रूप होते है. परिवार के प्रति प्यार और दुश्मन के लिए हिंसा."

"वैसे शेर की ढेर साड़ी शेरनिया भी होती है. डिस्कवरी पर देखा था मैंने." अर्जुन ने मजाक में ये बात कही थी माहौल को ठीक करने के लिए लेकिन ये बात कही और हे चली गई.

"तोह तेरी कितनी शेरनिया है?" घूरते हुए उन्होंने पुछा तोह वह हँसता हुआ बोलै, "अभी शेर नादान है तोह कोई भी नहीं." उसकी बात सुनकर बड़े प्यार से रेणुका ने अपनी ब्याह उसके ऊपर वाले हाथ पर रख दी.

"तू नादान हो कर भी कितना ख़याल रखता है प्यार करता है. लोग उम्रदराज होकर भी ये सब नहीं कर पाते. उतना भी नहीं दे पाती जिस से सामने वाले को जीने की आस तोह बानी रहे." ये बात सोचती कहती रेणुका के गाल पर 2 लम्बी धार मोतियों की बह गई. लैंप की रौशनी में अर्जुन ने ये चमकती बुँदे देखि तोह उनकी तरफ खिसक आया.

"आपको किसी ने दुःख पहुंचाया है? आप बताओ प्लीज की ऐसा क्या हो गया के आप ाची भली रोने लग पड़ी?" अर्जुन उनके आंसू पूछने के बाद गाल सहलाता उन्हें देखता रहा. उसका स्पर्श सीधा दिल में उतर रहा था रेणुका के.

"वो सब हम बाद में बात करेंगे. एक काम करेगा मेरा?" उनकी आँखों में देखते हुए अर्जुन ने हाँ में पलके झपका दी.

"मुझे आज अपने सीने से लगा कर सुला ले. बहोत बोझ सा लग रहा है दिल पर अर्जुन." उनकी रुलाई फुट पड़ी थी लेकिन आवाज को संभालती वो बस रोये जा रही थी. अर्जुन ने अपनी ब्याह को बिस्टेर पर फैला दिए. रेणुका उसके ऊपर सरकती सीधे हाथ की बाजू पर सर रख कर लेत गई. आंसू की कुछ बुँदे अर्जुन की छाती पारी गिरी तोह दर्द की परवाह किये बिना उसने दूसरे हाथ से उनको बाहों में भर लिए. रेणुका ने भी अपनी एक ब्याह उसकी पीठ तक कास ली थी. अर्जुन शांत सा बस उन्हें आराम दे रहा था और जब सारे आंसू बह कर थम्म गए तोह भीगी पलकों से रेणुका ने अर्जुन के चेहरे की तरफ देखा.

"मई इतनी बुरी हु की मेरे पति को मुझसे सही से बात किये भी आज 5 साल हो चुके है."

"नहीं. आप बुरी नहीं हो. आप बुरी नहीं हो सकती कभी." उनके माथे को चूमता अर्जुन उनकी पीठ सेहला रहा था.

"कहने को मई एक खूबसूरत घर सजाने का सामान भर हु. कभी अपने लिए उनकी नजरो में न इज़्ज़त देखि न प्यार. पापा की वजह से बस एक खूबसूरत मैडल भर हु मई जिसको कभी पार्टी में साथ ले जाते है 2-3 महीने में एक बार या फिर घर में क़ैद."

"आपकी गलती नहीं है. दादू से भी गलती नहीं हो सकती बस शायद फ़ौज का नाम देख कर उन्होंने ये कर दिए. नहीं तोह आप तोह उनकी जान हो." ये बोलते हुए अर्जुन ने चेहरा नीचे किया तोह रेणुका ने उसका गाल चूम लिए.

"मुझे प्यार कर सकता है? सिर्फ एक बार अर्जुन. मुझे फिर से मेरे औरत होने का एहसास करा दे. मुझे मालूम है के सिर्फ तू हे कर सकता है और कोई भी नहीं. और मई ये 10 साल में आज पहली बार अपनी जुबान पर लाइ हु क्योंकि मैंने तेरी आँखों में देखा है जो मई ज़िन्दगी भर ढूंढ़ती रही.. प्यार..
 
यह शाम मस्तानी के तीसरे भाग में रेणुका मिलान को गहराई से बताया जाये या फिर जल्दी ख़तम कर अगले दिन की शुरुआत और नए किस्सों पर ध्यान दिए जाए?

आपकी राइ लेना मुझे मदद करेगा.
 
अपडेट 40

यह शाम मस्तानी (3)


"प्यार." बस उनका कहा ये आखिरी लफ्ज़ दोहराता अर्जुन रेणुका को पूरी तरह अपने सीने से लगाए उनकी आँखों और चेहरे को देखता रहा. कुछ पल ऐसे हे बीत गए तोह दोनों हे जैसे कुछ कहना चाह रहे थे पर अर्जुन ने पहले हिम्मत की.

"आप जानती हो की फिर एक ऐसे सफर पर जहा कोई रिश्ता या सीमा मायने नहीं रखती, चलना दुःख भी दे सकता.?" वो उनके चेहरे को एक ऐसे प्रेमी की तरह सेहला रहा था जैसे फिर जाने दोनों रहे या न रहे.

"तुमने कहा था न के सिर्फ अभी के बारे में सोचना चाहिए. मई वही जीना चाहती हु, इस समय को तुम्हारे साथ और तुम्हारी बाहों में." रेणुका अपने आंसू तोह संभल चुकी थी लेकिन अब उसका दिल उस से के वश में नहीं था. उस को बस अर्जुन के रूप में वो शक़्स दिखाई दे रहा था जो जीवन में हर लड़की को एक बार दीखता है. मिलना या न मिलना तोह किस्मत की बात होती है.

"और मई कहु की अगर हमारा रिश्ता बदल गया इस रात के बाद तोह दिन में हम इसको क्या नाम देंगे?", अर्जुन का ऊपर वाला हाथ अब रेणुका की कमर के ऊपर था जैसे रेणुका का अर्जुन पर पहले से रखा था. दोनों के चेहरे हे एक दूसरे से कुछ फांसले पर थे लेकिन शरीर कही कही से साथ जुड़ा था. सीना सीने से और पाँव दूसरे के पाँव से.

"सबके सामने हम कब बदले है जो फिर बदल जायेंगे? मैंने भी तुमसे वही प्यार माँगा जो एक पत्नी अपने पति से शयनकक्ष में हे चाहती है. लेकिन अगर तुम चाहते हो के मई सबके सामने तुम्हारी प्रेमिका सा बर्ताव करू तोह मई तैयार हु अर्जुन. तुम मुझे प्यार करते हो मेरे लिए इस से ज्यादा कुछ मायने नहीं रखेगा. चाहे दिन के उजाले में कपडे भी खोलने को कहोगे..." जिस हाथ पर रेणुका सर टिकाये थी उस से अपनी तरफ करते हुए अर्जुन ने उनकी आँखों पर अपने होंठो से प्यार भरा स्पर्श करने के बाद उनका ऊपर वाला होंठ चूम लिए. सिर्फ इस एक स्पर्श ने रेणुका के जिस्म की आखिरी हद्द तक को हिला दिए था. ऐसा प्यार भरा स्पर्श जो कभी महसूस नहीं किआ था अपने वैवाहिक जीवन में. बात अधूरी रह गई थी क्योंकि अर्जुन जान गया था के सिर्फ जिस्म की चाह नहीं है जिसके चलते ये सभ्य महिला आज उसके पास थी. ये सच वो चकोर थी जिसको सिर्फ चाँद चाहिए था. इसके बाद सवाल पूछना उनकी मर्यादा और चरित्र को taar-taar करने जैसे हे होता. कमर पर रखे हाथ को भी सर के पीछे करते हुए अर्जुन अब बड़े प्यार से रेणुका को एक प्रेमी का अपनी प्रेमिका के लिए सही दायित्व दिखा रहा था. बारी से दोनों लबो को अपने होंठो से पीने लगा था. एक बार अलग हुआ तोह दोनों की लार से बना धागा खींच के टूट सा गया और रेणुका के होंठो के नीचे जा चिपका. एक बार उन काली आँखों में देखने के बाद अर्जुन उनके होंठो के नीचे उस गोल थोड़ी के ऊपरी भाग को चूमने लगा था. 'एक छूने भर से जैसे ज़िन्दगी पूरी होने लगते है. प्यार का ये एहसास बहोत है दिल को जवान रखने के लिए.'

"आप बिलकुल शहद सी मीठी हो." अर्जुन को अपनी आँखों में देखते और उसकी बात को सुनकर रेणुका ने अपना सर उसकी गर्दन में धंसा लिए. प्रेमिका भी तोह ऐसे हे करती है. दिल से बेशक वह चाहती है के उसका आशिक़ उसके शरीर के हर तार से संगीत की धुन्न पैदा करे लेकिन एक स्वभक्ति लाज दोनों के इस मिलान को यादगार बना देती है.

इधर अर्जुन का हाथ अब हलके अँधेरे में उनकी कमर और काख तक रेणुका का जिस्म सेहला रहा था. अपने निचले हाथ से प्यार से रेणुका को जकड़े वह उनके बालो के महक लेता उनके शरीर को भी जगाने लगा था. आत्मा तो जुड़ने लगी थी लेकिन योग तोह ऐसे पूरा नहीं होना था. रेणुका के भी नाजुक हाथ और उँगलियों के नाख़ून यही हरकत अर्जुन की नंगी पीठ पर करने लगे. जहा अभी तक वो अपना सर दबाये थी, थोड़ा सा पीछे हो उन्होंने अर्जुन के गले पर अपने होंठ चलने शुरू कर दिए थे. Baar-baar रेणुका की ब्रा की पट्टी अर्जुन के हाथों के बीच आने लगी तोह उसने बड़ी दक्षता से कपडे के ऊपर से हे ब्रा के जोड़ को ढून्ढ लिए और हलकी सी कोशिश से हुक को अंदर हे आजाद कर दिए था. अब फिर से उसके हाट इस मखमली शरीर पर रेंग रहे थे और रेणुका अर्जुन के चौड़े सीने पे आती बस अपने होंठो से वह चित्रकारी करने में लगी थी.

"आप ऊपर देखिये मेरी तरफ." रेणुका को ऊपर खिसकने का बोलै तोह वो अब बिलकुल उसके मुँह के सामने अपने होंठ लेकर लेती से बस अर्जुन को देखने लगी थी. चेहरे को सामने देख अर्जुन ने उनके होंठ एक बार फिर मुँह में भरते हुए उनके गाउन को सहलाते हुए ऊपर करना शुरू कर दिया. रेणुका भी इस प्यारे एहसास को जीने लगी थी. नरम जांघो से ऊपर तक गाउन फिसलता सा कच्ची की डोर तक आ चूका था. ऐसे हे चूमते हुए जब अर्जुन का हाथ पहली बार उनकी मुलायम जांघो पर आया तोह एक पल के लिए दोनों वही रुक गए. रेणुका को तोह एहसास भी नहीं था की अर्जुन का हाथ कब उसकी उघड़ी जांघ तक आ पंहुचा. और अर्जुन उनकी नर्माहट और चिकनाई में हे खो गया. धड़कन कुछ तेज होने लगी रेणुका की तोह हाथ अब एक बार फिर से फंसलटा हुए ऊपर आने लगा था. और ऐसे हे वो कपडे के अंदर से होता हुआ उनकी समतल और नरम कमर पर आ गया. कुछ देर तक अपनी उँगलियों से उस नरम और हाली गद्देदार कमर को महसूस करते अर्जुन ने अपने पंजे में लिए तोह रेणुका अमरबेल की तरह उसके जिस्म से चिपक गई थी. पहली बार वो अर्जुन की जीभ को अपने मुँह में लेकर चूसने लगी तोह अर्जुन ने भी हाथ उनकी ब्रा की ढीली कटोरी से अंदर करते उनके ऊपर वाले दूध पर हाथ रख दिए. माध्यम आकर के ये dugdh-kalash उसके हाथों से कुछ थोड़े हे बहार थे जिनपर उनका उत्तेजित निप्पल किसी मटर के दाने के आकर का था. प्यार से इस स्तन को सहलाते और निप्पल को हलके हलके ऊँगली से चुभलाते अर्जुन उनके होंठो को पीटा रहा. दोनों की जीभ अब खुलकर एक दूसरे के मुँह में रास का adaan-pradaan कर रही थी. पहली बार रेणुका के स्तनों का इतनी नाजुकता से मर्दन हो रहा था जिसको वह भरपूर मजे लेती महसूस कर रही थी. उनका हाथ भी अब अर्जुन के पाजामे के अंदर उसके सख्त मुलायम कूल्हे पर फिर रहा था.

"सीढ़ी लेत जाइये एक बार." इतनी देर से चलती इस शांत क्रीड़ा को भांग करते अर्जुन उन्हें बिस्टेर पर सीधा करता अपनी दाई भुजा का सहारा लेता बैठ गया. शर्म एक बार फिर से रेणुका पर हावी हो चली थी अर्जुन के अलग होने पर. सीढ़ी होने के बाद उनका चेहरा अँधेरे की तरफ हो गया था. लेकिन इस लैंप की रौशनी में उनका ऊपरी गाल दमकता सा सब बयान कर रहा था. खड़े हो कर अर्जुन ने पहले दरवाजे की चिटकनी अंदर से लगाई और फिर उनके पैरो की तरह आ बैठा. धीरे धीरे दूसरी तरफ का भी गाउन वो ऊपर करता चला गया. कमर के पास आकर जब और आगे न हुआ तोह अर्जुन का ध्यान आपस में सटी इन गुदाज नरम जांघो पर गया. मुमुली सी आपस में सटी ये जाँघे बेहद मुलायम thi.Koi बाल या रोया न था यहाँ पर और ठीक उनके ऊपर एक हलके रंगी की लास वाली पंतय जो जांघो के जोड़ पर से थोड़ी अधिक फूली हुई थी. जांघो के हलके से चूम कर अर्जुन ने फिर से गाउन के दोनों सिरे पकडे और उन्हें आगे करने लगा. बेशक रेणुका को शर्मा आ रही थी ऐसे पहली बार ज़िन्दगी में अपने पति के अलावा एक इंसान के सामने निर्वस्त्र होने में लेकिन यहाँ प्यार और इज़्ज़त दोनों मिल रही थी अर्जुन से. यही सोचते हुए उन्होंने अपनी कमर उठाई तोह अर्जुन ने गले तक उनका गाउन ऊपर खींच दिए. ढीली ब्रा अब सिर्फ नाम के लिए उनके दूध छुपाये थी. खुद हे थोड़ा सा उठकर उन्होंने अपना ये कला चोगा शरीर से निकल दिए. ब्रा के स्ट्राप कंधो पर झूल रहे थे जिन्हे अर्जुन ने आगे की तरग से पकड़ा तोह रेणुका ने नजरे नीची करते दोनों हाथ सामने कर दिए.

"उम्म्म्म.." दांत से होंठ भींचते हुए रेणुका के मुँह से ये मजे की सिसकारी निकल गई जब अर्जुन ने उनके एक निर्वस्त्र उरोज को मुँह में भर लिए. उनके ऊपर झुका वो अपने दूसरे हाथ से उनकी दाई जांघ सेहला रहा था छूट के पहले हिस्से के पास. इस उम्र भी उनके चुके नरम नहीं पड़े थे. ऐसे सीधे लेटने पर भी दोनों कलश छत्त की और मुँह किये अपने कटाव दिखा रहे थे. दोनों जांघो को खोलता सा वो अब घुटनो के भार रेणुका के ऊपर चा गया था. वो नरम मांस के मुलायम गोले अब उसके दोनों हाथो का असर झेल रहे थी वही अर्जुन के होंठ रेणुका के गाल और कान की लौ को चूमने में लगे थे.

"िसष्ठ... मुझे कुछ हो रहा है अर्जुन." उसको कास के बाहों में भर्ती रेणुका ने सोचा भी नहीं था के ये लड़का उसके शरीर के हर भाग को जगा देगा. फिर दोनों हाथो को बिस्टेर पे दबाता वो नीचे सरकने लगा. रेणुका की कलाई भी हिलने के काबिल नहीं थी इस फौलादी जिस्म की पकड़ के सामने. वही वह बारी बारी से दोनों चुचुक को इत्मीनान से चूसता उनकी गहरी नाभि के ऊपर मुँह रख लेत सा गया. नरम मखमली पेट के ठीक बीच में ये एक 4 आने सी गोल नाभि कोई एक कम गेहटी थी. उस छोटे से गद्दे में अर्जुन की गीली जीब को महसूस कर्त हे रेणुका की कमर कमान की तरह ऊपर होने लगी. लेकिन एक सीमा से आगे वो विवश से रह गई थी. दोनों कलाइयां अर्जुन के बड़े पंजो में सख्ती से बिस्टेर पर जो तिकी थी..

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"आपका हर अंग भरपूर प्यार करने के लिए हे बना है. जहा भी मुँह रखता हु तोह ऐसा लगता है जैसे ये बाकी नहीं बचना चाहिए." अर्जुन ने और नीचे सरकने से पहले लैंप की रौशनी में दमकते उस सुर्ख चेहरे को देखा जिस पर कही कही लार की छोटी बुँदे चमक रही थी किसी औंस के जैसे.

"मेरे हाथ तोह छोड़ो. मई खुद तुम्हे सब करने दे रही हु." विनती करती सी आवाज में रेणुका ने कहा तोह अर्जुन मुस्कुराता हुआ वैसे हे दोनों हाथ पकडे उस सफ़ेद कच्ची पर नाक रख के सूंघने सा लगा. हलकी छूट रास की महक और थोड़ी नमी बता रही थी की रेणुका का जिस्म पूरा तैयार था. अपने होंठो में वो फूला हुआ हिस्सा कपडे के ऊपर से हे दबाता वो गीला करने लगा तोह उन्माद की अधिकता से रेणुका ने अपनी जांघो में उसका सर जकड सा लिए. लेकिन बेपरवाह सा वो कभी नरम छूट की फांको को होंठो में भरता तोह कभी हलके दांत से. कच्ची जब पूरी लार से गीली हो गई उस जगह पर से तोह उनके दोनों हाथ छोड़ उसने झटके में वो आखिरी कपडा जिस्म से अलग कर दिए. 'नाभि से नीचे को आता चिकना पेट और कोई 4-5 इंच के बाद छूट की शुरुवात से पहले थोड़े नन्हे बालो का एक तिकोना सा छोटा झुरमुट. उसके नीचे बस कही कही कोई बाल और फिर ये फूली हुई 3-साढ़े 3 इंच का चीरा ली हुई छूट. दोनों मॉटे नरम होंठो के बीच में से गुलाब की 2 पतली पंखुड़िआ कुछ आधा सेंटीमीटर बहा को निकली हुई. पहली बार एक महिला की ऐसी छूट देख रहा था अर्जुन जो कुदरती खूसूरत थी. और छेड़ के पास तोह ऐसे लग रहा था के अंडा कोई बंद गुलाब दब्या हो जिसकी ऊपर की थोड़ी खुली हुई चोंच छूट से बहार निकल कर उसके वह होने का आभास दिला रही हो.

"ऐसे मत देखो न. ये गलत है." अर्जुन को अपने खजाने में ऐसे खोया देख जहा दिल में ख़ुशी थी वही एक शर्म भी की वो कैसे अपने से आधी उम्र के एक जवान लड़के के सामने टाँगे फैलाये पड़ी है. शर्म से रेणुका ने टाँगे भींचनि चाहि तोह अर्जुन ने दोनों तरफ से पकड़ते हुए ना में गर्दन हिलाई.

"अगर आप चाहती हो मई आपको प्यार दू, वो भी पूरी तरह से तोह बस इतना साथ दीजिये के मई जो कर रहा हु वो करने दे. जब आप मन कर देंगी मई वही रुक जाऊंगा." अपनी बात कहने के बाद उसने उनकी आँखों में देखा तोह वह maun-svikriti थी. जैसे कह रही हो के सब तुम्हारा हे तोह है बस एक औरत हु तोह कुछ चीजे मेरे बस में नहीं है. हलके से दोनों जांघो में हाथ लपेट कर अर्जुन ने अपने होंठ उन गुलाब की नन्ही पत्तियों पर लगा दिए. शरीर में कही दुर्गन्ध नहीं थी और यहाँ आने पहले रेणुका ने नहाते हुए शरीर ाचे साफ़ किआ था तोह छूट के आसपास अभी तक एक ाची खुसबू फैली हुई थी. गीले होंठ में जैसे हे उसने छूट के हल्का बहार निकली नोक को चूमा रेणुका ने दोनों तरफ की चादर को दबोच लिए अपनी मुट्ठी में. 'ये कैसा प्यार है और इसको कोई फरक नहीं पड़ रहा ऊपर या नीचे के होंठो को एक सामान चूमने में?" बस मैं में अर्जुन का इस कदर प्यार करना उसको अर्जुन के लिए पागल बना रहा था. उधर अर्जुन जैसे अपनी काम कला को और ऊपर करता हुआ छूट को फैलते हुए अंदर के रास को चाटने लगा था. पूरी गुलाबी छूट अब गीली रास टपकने लगी थी. इतना बिलकुल सही था अर्जुन को आगे बढ़ने के लिए. बिना हे अपने मूसल की झलक उन्हें दिखलाये अर्जुन ने एक तरफ से खींच कर अपना पजामा नीचे कर दिए और छूट को चूसना छोड़ अब वो आगे को सरकता उनके मुँह की तरफ जा रहा था. पजामा दोनों पैरो की मदद से शरीर से निकल नीचे गिरा दिए तोह अपने होंठ फिर से रेणुका की थोड़ी और होंठो पर फिरने लगा.

"आपको मेरा ये सब करना गलत तोह नहीं लग रहा न? मई चाहता हु के आप मेरे प्यार को भी अपने अंदर तक महसूस करे." अर्जुन ने सर को उनके सर के सामने उठाते हुए कहा. जिस कंधे में चोट थी उस तरफ के हाथ से नीचे अपना मोटा लुंड जड़ से पकड़ कर वह अभी अनुमान से हे छूट की दरार तक उसको ले गया. और सुपडे ने हलके से छूट को चूम कर बता दिए था के वो कितना तड़प रहा था इतनी देर से उसको चूमने के लिए.

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"पहली बार लग रहा है के मेरी ज़िन्दगी में कुछ सही हो रहा है और तुम पूछ रहे हो के तुम्हारा ये सब करना मुझे गलत लगेगा? बस ऐसे हे मुझको प्यार करो अर्जुन और अपनी प्रेमिका समझ कर. यहाँ हम दोनों वही है और कुछ नहीं." अपने ऊपर झुकाते हुए रेणुका ने अर्जुन के होंठ चूमने चाहे थे के अर्जुन ने मुँह को खोलते हुए उनके हे दोनों होंठ दबा लिए. लुंड का अग्रभाग अब फूल के सख्त हो चूका था और छूट रास से चिकना भी. गुलाब की उन पंखुड़ियों को अपने उस टमाटर से सुपडे से छुपाते हुए अर्जुन ने कस के अपनी गांड को नीचे झटक दिए.

"ाः... उम्म्म ाआईई.." रेणुका की आवाज अर्जुन के गले में उतर गई बहार आने की जगह. छूट सुन्न सी पड़ गई थी लुंड के तगड़े प्रहार से. न रेणुका ने उसका वो हथियार देखा था और न हे अर्जुन ने इतना समय दिए था. लेकिन रेणुका को आभास हो गया था के कोई मोटा बांस उसकी फूल सी छूट को भेदता अंदर धंस चूका है. ऐसे हे उनके होंठो को मुँह में दबाये अर्जुन ने लुंड से हाथ हटा कर एक दूध को मुट्ठी में भर लिए और दूसरे से रेणुका का सर सहलाने लगा. सुपडे से कुछ एक इंच ज्यादा हे लुंड अभी छूट में घुसा था और छूट अपनी औकात तक चौड़ी हो कर लुंड का गाला दबाने लगी थी.

"एक बार और खुद को संभाल लेना आप. बस एक बार. फिर वादा करता हु की आपको दर्द नहीं होने दूंगा जरा सा भी." आँखों में 2 बूँद तैर गई थी रेणुका के लेकिन अब एक मिनट के बाद वो शांत थी अर्जुन के इस प्यार से सहलाने और शरीर को गराने से.. उन्होंने सिर्फ जरा सी गर्दन हिला कर हाँ कहा तोह फिर से उनके दोनों होंठ मुँह में दबा कर अर्जुन ने गांड से थोड़ा पहले हे उनके नरम पत्तों को पकड़ कर वैसा हे धक्का लगा दिए लेकिन इस बार चीख थोड़ी सी मुँह के किनारो से बहार आ गई थी. वो रुकी हुई 2 बुँदे अब बहती हुई सी बिस्टेर की दोनों तरफ जाने लगी थी. रेणुका की आँखे इस भयंकर दर्द से बंद हो चुकी थी और एक बार फिर अर्जुन उनके जिस्म को सेहला रहा था. लुंड महाराज किसी भैंस के खूटे से छूट में 7 इंच के करीब बैठ गए थे और पहले से चूड़ी ये छूट भी एक हलकी धार खून की निकलती इस लुंड की भयानकता बताने लगी थी.

"पता नहीं तुम्हारे क्या लगा है.. आनननहहह... ऐसा महसूस हो रहा है के पेट में कोई चाक़ू धंस गया हो वह के रास्ते से.. ामममममम.. ाहः.. अब तोह और दर्द नहीं डोज न.?" रोटी हुई रेणुका अर्जुन से चिपक गई थी. पहली बार एक लुंड उस हद्द तक पंहुचा था जहाँ उसने सोचा भी नहीं था. कौशल का औसत लुंड बेशक 5 इंच का था लेकिन वो साधारण सा लुंड भी पिछले 5-6 सालो में शायद हे अंदर लिए था रेणुका ने. फिर ये तोह तक़रीबन दुगनी मोटाई का और कुछ ज्यादा हे लम्बा था. छूट जैसे जोंक की तरह इस लुंड को पकडे हुए थी.

"मालूम है. इसलिए इतने से हे करूँगा और अभी कुछ हे देर में आपका दर्द ख़तम हो जायेगा." उनकी गीली आँखों को चूमता वो धीमे से अपने लुंड को बहार की तरफ करने लगा. "सशः... आह.. आराम से aah..maa मई मर्डर गई..." लुंड हे प्रचंड था इसमें बेचारी छूट का कोई कसूर नहीं था. बहार को निकलते हुए भी छूट लुंड की रैगर से सिसकने लगी थी. प्यार से दोनों गालो को सहलाते हुए अर्जुन ने आराम से बहार को निकला लुंड अंदर कर दिए. कुछ 15-20 बार ऐसे छूट को नरम करने की प्रक्रिया में रेणुका के मुँह से भी उतनी हे दार्द की हलकी आहें निकली जिन्हे वो दबाये थी. तक़रीबन 3 इंच लुंड अंदर बहार होने लगा तोह अर्जुन ने उनकी दोनों जांघो को ऊपर उठा कर वैसे हे धक्के लगाने जारी रखे. 3-4 मिनट के बाद अब वो दर्द थोड़ा मजा देने लगा था रेणुका को. छूट बेशक मुँह तक भर्र चुकी थी इस मूसल से लेकिन ऐसी हे रगड़ अब शरीर को आनंद देने लगी.

"आह... उम्म्म.. आठ. धीरे धीरे...... अर्जुन.." मचलती हुई वो उसके होंठो को खेंचने काटने लगी थी. जब आधे से ज्यादा लुंड फँसलने लगा तोह धक्के भी तेज होने लगे थे. लेकिन अगले 20-25 धक्को पर हे छूट ने घुटने तक दिए..

"मई... आह.. ये.. क्या हो रहा हीी.. आह ..ममम." बड़ा हे जोरदार सा चरम प्राप्ति का अनुभव हुआ था. जैसे कोई नदी बरसो से बाँध के पीछे रुकी थी और आज सालो बाद वो उसको तोड़ती बहार बह चली थी. छूट के अंदर इतनी चिकनाई अर्जुन ने भी पहली बार महसूस की थी. लुंड जैसे जड़ तक भीग गया था और madhu-ras गुलाबी होंठो से बहार तक आकर उनकी गांड की दरार से मिलान करता महसूस हुआ. निढाल सी वह कुछ बेसुध होकर लाश की तरह बिस्टेर पर पड़ी थी. अर्जुन शान्ति से उनकी कमर के दोनों भाग सहलाता उनकी गर्दन चूमने में लगा रहा.

"ये मुझे क्या हुआ था? पहले मुझे ऐसा सुख कभी नहीं मिला जितना आज मिला है." दोनों पंजे बिस्टेर पर टिकती वह हल्का सा उचक कर अर्जुन के होंठ चूमने लगी तोह अर्जुन ने भी एक तरह से रेणुका को गॉड में ले लिए था. जख्म की पट्टी जाने कब की उतर चुकी थी लेकिन अब उसके शरीर में कोई दर्द नहीं था. अपनी छाती से चिपकाये वह ऐसे हे गॉड में लेकर रेणुका को बड़ी शिद्दत्त से चूमने में लगा था और वो भी वैसा हे कर रही थी. होंठ दोनों के हलके सूज चुके थे जो पूरे गीले थे. जब याद आया के लुंड भी मैदान में है तोह खुद को ऐसे हे दोनों तरफ पाँव किये रेणुका खुद हे उसकी गॉड में आगे पीछे होने लगी. छूट में इस तगड़े लुंड का घर्षण आप उसकी सबसे मनपसंद चीज था. अर्जुन ने एक हाथ कमर और एक हाथ रेणुका के उन्नत मुलायम कूल्हे पर रखे होंठो का स्वाद लेता खुद भी हलके धक्के रेणुका के साथ मिलाने लगा था.

"अहंमम.. ये एहसास .. मई भी हमेशा याद रखूँगा." अब दोनों हाथ बाहों के जोड़ के नीचे रख अर्जुन ने इतना बोल कर रेणुका के दोनों दूध बारी से पीने शुरू कर दिए थे. छूट कभी लुंड को खींचती तोह कभी नरमाहट से रगड़ देती. अपने सुपडे पर छूट की ऐसी रगड़ अर्जुन ने सही मायने में पहले महसूस नहीं करि थी. हर धक्के के साथ रेणुका थोड़ा आगे को उठ जाती जिस से लुंड बहार निकली छूट की फांको को भी मजा देने लगता था.

"मुझे फिर ऐसा लग रहा है जैसे.. आह. मई.. आह उम्म्म्म.. मेरे अंदर वही.. आठ." करती रेणुका ने अर्जुन का सर अपनी चूंकि पर कास के दबा लिए. उसकी कमर बस कंपकंपा रही थी लुंड को छूट में दबाये.. ढेर सारा तरल निकलती वो अर्जुन के कंधे पर सर झूला कर लिपट गई. साँसे अनियंत्रित थी और अर्जुन बस ऐसे हे उन्हें थामे बैठा रहा. कुछ पल दोनों कूल्हों को मसलते हुए उसने वापिस उनका एक सूजा हुआ निप्पल मुँह में भर लिए और चुसकते हुए खुद हे नीचे से लुंड उनकी भीगी छूट में ठेलने लगा था.

"मुझे लिटा दो बिस्टेर पर और ऊपर आ जाओ." अर्जुन ने बात को मानते हुए अपने हाथो में रेणुका की पीठ थामते हुए उन्हें बिस्टेर पर लिटा दिए और इस बार दोनों पाँव ऊपर उठा कर एक सधी हुई रफ़्तार से उनकी छूट की गहराई ढीला करने लगा था. लुंड पर मोटी नस्से उभरने लगी थी जो छूट के अंदर एक नए तरह की रगड़ पैदा करने लगी थी..

"उम् आह्हः.. आठ.. और जोर से.. आह अर्जुन .. मार डालो मुझी.. आह्हः.. " वो लगभग मजे में चीखती सी अर्जुन को उकसाने लगी थी और वो भी एक तेज रफ़्तार से लुंड अंदर बहार करने में लगा था.. हर धक्के के साथ अर्जुन की एक भारी गुर्राहट सी आवाज आती और वो उनके ऊपर झुका बस ऐसे हे अंदर तक अपना मूसल पेलता रहा. सूपड़ा अब भयंकर तरीके से फूल चूका था, जो छूट की दीवारों को सख्ती से चढ़ाता जाता हर बार. रेणुका समझ गई थी की उसका भी होने वाला है..

"आह.. आह अर्जुन.. मेरे अंदर हे.. आह भर दो.. " और अपने नाख़ून उसकी पीठ में धंसा दिए. रेणुका के इस सखलन के साथ यह अर्जुन के लुंड ने भी उस भीगी छूट में अपनी गरम मलाई भरनी शुरू क्र दी. पिचकारी सीधा बच्चेदानी पर महसूस करती रेणुका का लगातार चरम चल रहा था. ये गरम लावा उसकी छूट को जैसे एक अध्भुत आराम महसूस करने लगा था. लुंड वैसे हे छूट में धंसाए अर्जुन हलके पसीने से नहाया हे रेणुका के ऊपर लेत गया, जहा वो उसके होंठ चूस रही थी. दिल इतना खुश था के जैसे आज ज़माने भर की साड़ी खुसी अर्जुन ने उसको दे दी थी.5 मिनट के बाद अर्जुन उठकर बाथरूम चला गया तोह रेणुका वैसे हे आँखें बंद किये पड़ी rahi.Choot और लुंड का मिश्रित पानी बहार निकलता चद्दर पर गिरने लगा था. कोई 10 मिनट बाद अर्जुन खुद पर पानी डालने के बाद पजामा पहन कर बहार आया तोह बिस्टेर पर नंगी पड़ी रेणुका को बाँहों में उठा कर वापिस बाथरूम में आ गया.

"आप खुद को साफ़ कर लीजिये." अंदर उन्हें कोड पर बैठा कर वह बहार निकलने लगा तोह रेणुका ने हाथ पकड़ लिए.

"वह अँधेरे था इसलिए नहीं शर्मा रहे थे? अब सबकुछ खुद किआ है तोह साफ़ भी खुद करो. और अकेले में सिर्फ मेरा नाम लेना है." उसके होंठो पर एक छोटा सा चुम्बन करती रेणुका बिलकुल किसी एक जवान प्रेमिका जैसा हे व्यवहार कर रही थी. अर्जुन ने पहली बार ाचे से अब उनके यौवन को देखा था. बिलकुल बेदाग और तराशा हुआ जिस्म. जिसपे हर तरफ सिर्फ इतना भराव था के वो ाचा हे लगे. गोर दूध जिनपर भूरे गोल निप्पल थे जिन्हे आज choos-choos कर उसने सुजा दिए था. आकर्षक चेहरा और काले रेशमी बाल. वो एक अनुपम सौन्दर्य हे थी. दूध बिलकुल ऐसे जो न बड़े और न छोटे थे. कही से भी ढीले नहीं. गुलाबी छूट जो आज की चुदाई से कुछ ज्यादा हे मोटी हो गई थी. ये सब देखता वह एक मग में पानी भर के उनके सारे शरीर को गीले तोलिये से साफ़ करने लगा. जैसे हे निप्पल पर टोलिया लगया तोह तेज सिसकी निकल गई रेणुका के मुँह से.

"आठ.. देखो क्या कर दिए.. अब ये 3-4 दिन दुखेंगे." रेणुका की बात पर बस वो मुस्कुरा दिए और सारा शरीर साफ़ करने के बाद छूट पर पहले हल्का गरम पानी डाला फिर अपनी ऊँगली से उसको ाचे से साफ़ करने लगा..

"आई.. यहाँ तुम मत करो.. नहीं फिर से गड़बड़ हो जाएगी.. और हिम्मत नहीं है.. " अर्जुन के हाथ से वो गीला टोलिया लेती खुद हे छूट को साफ़ करने लगी..

"इतना तोह पहली रात के बाद भी बुरा हाल नहीं हुआ था मेरा. आह.." फिर जब ाचे से साफ़ हो गई तोह वही टोलिया लेकर बिस्टेर की तरफ आई जहा तजा माल की बुँदे गिरी थी. पूरी चादर हे ast-vyast थी लेकिन रेणुकाने वो जगह साफ़ की तोह एक गहरा दाग दिखा जो जा नहीं रहा था.

"ये खून है आपका. धोने से साफ़ हो जाएगा यही आप आराम कीजिये. डेढ़ बज चुके है और मैंने फिर सुबह उठाना भी है." उनके नंगे जिसमे को बाहों में लेते हुए अर्जुन ने दोनों दूध दबाते हुए फिर बिस्टेर से उनका गाउन उन्हें पहनाया.

"बाकी कपडे?" रेणुका ने थोड़ी शर्म से कहा तोह अर्जुन ने वैसे हे एक हाथ से एक दूध दबाते हुए कहा, "रात को आजाद रहने दीजिये न. मई भी इन्हे हाथ में लेकर सोना चाहता हु." अर्जुन की इस शरारत से कही बात पर वो भी मुस्कुराती सी चादर ठीक करके बिस्टेर पर आ गई. करवट नहीं ले सकती थी छूट में जलन की वजह से तोह अर्जुन ने रेणुका को पहले की तरह अपनी ब्याह पर साथ चिपकते हुए सीने से लगा लिए. एक हाथ उस नरम रूई के गोले पर रखते हुए दोनों होंठो को चूमते हुए आँखें बंद करते एक मीठी नींद में डूब गए.
 
अपडेट नहीं लेकिन एक बात कहना चाहता हु. हेर इंसान की ज़िन्दगी में ऐसे मुकाम आते है जब किन्ही 2 में से एक का चुनाव करना पड़ता है . चुनाव भी हालत देख कर. ये दर्द जब हम खुद अपने दिल को देते है. तोह फिर साजिश और वजह कैसी? क्यों लगता है के सब अधूरा है या फिर ये बेहतर हो सकता है?

मुझे शायद एक तोह आजादी मिली थी
 
अपडेट 41

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते है लोग


सुबह बहार किसी खटके की वजह से अर्जुन की आँख खुल गई. वैसे तोह ये कमरा बिलकुल ध्वनि रहित हे था लेकिन इतने गहरे सन्नाटे में ये आवाज हलकी सी उसके कानो में उतर आई तोह वो झट्ट खड़ा हो गया. बिस्टेर पर रेणुका दोनों पैर चौड़े करके लेती थी, चेहरे पर असीम शांति के साथ. उनके होंठ एक बार चूमकर अर्जुन ने एक चादर उनके ऊपर दाल दी. अब समस्या थी की टीशर्ट तोह थी नहीं. और गीले कपडे पिछले बहतरूम में रात को उतार दिए थे. अपनी फटी शर्ट याद आई तोह वह आराम से दवराजा खोलकर बहार निकला. पूरा घर अँधेरे में डूबा था. ड्राइंग रूम में एक हल्का नीला प्रकाश था जीरो के बल्ब की वजह से. ड्राइंग रूम से बहार निकलने वाले दरवाजे की चिटकनी खोलकर वह बहार आया तोह स्कूटर के हैंडल पर वो शर्ट पड़ी थी, अभी भी गीली थी लेकिन इतनी नहीं. उसको नाम के लिए शरीर पर पहन कर वो बहार आया तोह दरवाजे का टाला लेटरबॉक्स में राखी चाबी से खोल कर फिर से भर से दरवाजा लगा दिए. गली में एक कार कड़ी थी उनके घर के सामने. शायद कश्यप अंकल का बीटा बहार जा रहा था तोह कार को गरमा करने के लिए अभी स्टार्ट हे रखे था. ऐसे हे चलता वो अपने घर के सामने आया तोह कार वह से चल दी लेकिन वो भाभी वही कड़ी उसको देख रही थी. अर्जुन ने मुस्कुराते हुए हाथ जोड़े लेकिन अंधेर में मुस्कान तोह दिखी नहीं बस सामने से भी हाथ जुड़ने का उपक्रम हुआ. फिर कुछ सोचता वह अपने घर की दिवार फांद कर अंदर आ गया और यहाँ का टाला भी खोल दिए. सीढ़ियां चढ़ता सीधा अपने कमरे में घुसा वो और जलदती से कपडे बदलने लगा. घडी में समय देखा तोह अभी 4:25 हुए थे. मतलब आज वो जल्दी उठ गया था और ये सामने वाला कल से भी जल्दी घर से निकल लिए था. ड्राइंग रूम के बाथरूम में जा कर चेहरा ठीक करने के बाद उसने बिस्टेर की तरफ नजर दौड़ाई. तारा और आरती वह लिपट के सोइ थी और दोनों के सिर्फ मुँह हे चादर से बहार थे. कमरे में ऐरकण्डीशनर बंद था शायद रात की बारिश के बाद बदले मौसम से. 'चल यार निकल यहाँ से' खुद से इतना बोलकर वह बहार से हे नीचे आने के बाद साइकिल उठा कर घर से निकल लिए. आज याद से उसने अपना बटुआ साथ लिए था जो रात को हे उसने ड्राइंग रूम की टेबल पर रख दिए था पजामा बदलते समय. साइकिल के पैदल मारता वो जैसे जैसे आगे जा रहा था मौसम और खुशगवार होने लगा था. बारिश की वजह से सड़क पर पत्ते तोह बिखरे थे लेकिन जैसे हर चीज धूल गई थी. इस ठन्डे एहसास से उसके शरीर में थकान का namo-nishaan न था. आज फिर वो वही तालाब वाली जगह आ पंहुचा था साइकिल चलते हुए. यहाँ एक अलग सी शांति थी वातावरण में और उसको महसूस करता अर्जुन उस पत्थर के पास साइकिल कड़ी करने के बाद कुछ 100 मीटर पैदल चलने लगा सीधा. यहाँ पर कुछ पत्थरो से निशाँ बना कर थोड़ी नरम सतह पर पुषप लगाने सा लगा. शरीर साइकिल की वजह से थोड़ा गरम था तोह ये अब उसको और गरमा रहा था. तक़रीबन 5 मिनट के बाद उठा और साँसे दुरस्त करता अपने पंजो के भार हल्का उछलने लगा. '10 स्प्रिंट हर हाल में करनी है' खुद से इतना कह कर वो तेज रफ़्तार से भागता साइकिल तक आ खड़ा हुआ कोई 13-14 सेकंड के बाद. एक पल रुक कर उसने फिर से उस तरफ दौड़ लगा दी जहा से पहले भागता हुआ आया था. ये पूरा उपक्रम उसने कोई 5 बार किआ तोह उसकी टीशर्ट अब पसीने से टर्र हो चुकी थी. हलके कदमो से फुदकता सा चलता वो इधर उधर घूमने लगा. बोर्डिंग स्कूल में अपने पट के टीचर से उसने ये सब सीखा था और दौड़ तो वैसे भी वो लगता था लेकिन हमेशा से लम्बी और धीमी. जिसको मैराथन भी कहा जाता है आम खेल की भाषा में और ये छोटी और तेज गति की दौड़, जिसको स्प्रिंट कहते है वो कुछ सोचकर हे उसने शुरू की थी आज. पसीने और थोड़ी ज्यादा म्हणत से वो शांत होने के बाद पत्थर पर बैठ कर ध्यानरत हो गया. अभी भी आसमान थोड़ा गहरा हे था. ऐसे हे कुछ समय बाद जब मैं और तन्न हलके हो गए तोह उसने साइकिल उठा कर गाँव का रुख कर लिए जैसे की आज वह कोई उसका इन्तजार कर रहा हो.

यहाँ सड़क खासी गीली थी और अभी हलकी रौशनी में इतना पता चल रहा था के साइकिल संभाल कर हे चलनी पड़ेगी. आज कुछ शान्ति थी यहाँ और थोड़ा आगे जाते हे अर्जुन को वो दूधवाले व्यक्ति दिखे जो अपनी साइकिल पर कनस्तर बाँध रहे थे.

"Ram-Ram अंकल जी." अर्जुन ने उनके समीप साइकिल रोकते कहा तोह अपने गमछे से मुँह साफ़ करने के बाद उन्होंने देखा.

"अरे बीटा तुम यहाँ. Ram-Ram. आज हमारी तरफ आ गए?" उन्हें भी अर्जुन का ऐसे रुक कर dua-salaam करना ाचा लगा था. उनके चेहरे की मुस्कराहट बता रही थी.

"वो क्या है न अंकल जी दौड़ और कसरत समय से पहले हे हो गई थी पूरी तोह सोचा इस तरफ चल कर थोड़ा गांव और हरियाली भी देख लेता हु."

"ाची बात है बीटा. आओ यही मेरा घर है. कुछ दूध चाय लेते है साथ में." घर के तरफ इशारा करते हुए उन्होंने अर्जुन को निमंत्रण दिए. ये घर लाल पक्की ईंट से बना था और एक मंजिल का थोड़ा बड़ा घर था. दरवाजे से हे अंदर घर का बड़ा आँगन दिखाई दे रहा था. घर के बहार काफी जगह थी और एक तीन की चद्दर के नीचे 4 भैंस और 1 गए बंधी चारा खाने में लगी थी.

"फिर कभी अंकल मई पक्का बैठूंगा. अभी देखिये आप को देरी भी हो रही है और दूध ख़राब भी हो सकता है. इतने मई आगे थोड़ा घूम आता हु." अर्जुन ने फिर से हाथ जोड़ते कहा. इधर घर के अंदर से घाघरा कमीज पहन कर सर पर चुन्नी लिए एक लड़की, शायद 18 साल, बहार निकली. चेहरा नहीं दिख रहा था और शायद चुन्नी के पीछे लौटा लिए थी.

"बापू खेत जा रही हु." पास से गुजरती वो सड़क के साथ हे कच्चे रास्ते पर निकल गई बिना हे इन व्यक्ति की प्रतिक्रिया सुने.

"ये मेरी बड़ी बेटी है काजल. कक्षा 12 के इम्तिहान दिए है इस बार सरकारी से. कल हे आखिरी परचा दिए है और फिर इस बार दिवाली के बाद ब्याह करके अपने ससुराल चली जाएगी." वो व्यक्ति बात करते हुए दोनों बड़े कनस्तर साइकिल पर कस चूका था. उसने अर्जुन के चेहरे की तरफ देखा तोह वह गए के एक छोटे बछड़े को ध्यान से देख रहा था.

"बीटा ये मेरी गाये ने पिछले महीने हे दिया है. अभी छोटा है तोह घर में समझ लो बचो को खेलने के लिए ये खिलौना मिल गया." उनकी बात सुनकर अर्जुन मुस्कुराने लगा. वो सफ़ेद बछड़ा था भी बिलकुल दूध के जैसा सफ़ेद जो अपनी माँ के थांन चूस रहा था.

"सुन्दर है अंकल जी. प्यारा कहना ज्यादा ठीक रहेगा. वैसे आपने तोह अपना नाम बताया नहीं. मेरा नाम है अर्जुन शर्मा, वह अगले सेक्टरों में घर है हमारा और मेरे दादाजी का नाम पंडित रामेश्वर शर्मा है." अर्जुन को भी लगा के परिचय हो जाना चाहिए क्या पता अगली बार मिले तोह कोई तीसरा जान भी हो साथ तोह उस समय क्या परिचय देना.

"हाहाहा. थानेदार जी के पोते हो तुम. अरे भाई लेकिन कभी तुमको देखा नहीं पहले. मेरा नाम है साधू सिंह और तुम्हारे घर मई कोई 6-7 साल से दूध देने जा रहा हु. पहले तुम्हारे पिताजी आते थे इधर फटफटी पे दूध लेने और उस से पहले तोह हमारे यहाँ से हे पंडित जी गाये खरीद कर लेके गए थे. शायद तुम पैदा नहीं हुए थे." पास आ कर अर्जुन के सर पर स्नेह से हाथ फेरते हु उन्होंने बोलै.

"हाहाहा. देखिये न मई आपसे आज मिल रहा हु. क्योंकि आप हमारे यहाँ दूध देने आते है कोई 6 बजे के पहले और दूध तोह हमेशा दादी जी हे लेती है या फिर ताईजी. आजकल शायद दीदी. और फिर मैंने कभी ध्यान भी नहीं दिए." बात भी सही थी. अब घर के आगे इतना बड़ा बगीचा था और घरवालों ने तोह कभी अर्जुन को दूध लेन भेजा भी नहीं था.

"चलो जानकार ाचा लगा के जान पहचान के हे बचे हो बीटा. और मेहनती भी हो जो neem-andhere कसरत करने निकल जाते हो. अगली बार समय रहते आना फिर तुम्हे मई हारे का दूध पिलाता हु." और साधू सिंह साइकिल खींच उसको आशीर्वाद दे बढ़ चला तोह अर्जुन भी विदा लेता आगे हो लिए था. अभी कोई 5:30 का समय था और हलके हलके बादल बने हुए थे आसमान में. खुशगवार मौसम में वह वही पुलिया तक आ पंहुचा था जहा कल आया था. साइकिल को वही पुलिया की दिवार से सत्ता के खड़ा कर वो पैदल हे थोड़ा आगे की तरफ आया. छोटी सी नहर जो 'व्' के आकर की थी पुलिया के नीचे से गुजर रही थी, ऊपर तक भरी हुई. इसके किनारे पर लम्बे पेड़ और झाड़ियां थी साथ में हे कच्ची सी पगडण्डी जो नहर के साथ सीढ़ी जा रही थी. बायीं तरफ जंगल सा था जो शायद वह तक जाता था जहा अर्जुन प्रैक्टिस कर के आया था और दूसरी तरफ पेड़ो के साथ हे खेत थे, काफी दूर तक. गन्ने और कोई फसल कड़ी थी उनमे. ऐसे हे देखता वो खेतो की तरफ बढ़ा था इस खूबसूरत दृश्य को देखते हुए की कच्ची पगडण्डी से सविता आती दिखी जिसने शायद अर्जुन को भी देख लिए था और इस वजह से उसकी चाल धीमी पड़ गई थी, डर या संकोच की वजह से.

"ये लीजिये जो आपका नुकसान हुआ मेरी वजह से उसके लिए. दुपट्टा तोह मुझे पता नहीं आपने कहा से लिया था तोह आप खुद हे ले लीजियेगा." 2 नोट 100 रुपये के अर्जुन ने सविता की तरफ बढ़ाये तोह उसने एक बार नजर उठा कर उसकी तरफ थोड़ी हैरत से देख और फिर पैसो की तरफ.

"ये मई नहीं ले सकती और जो हो गया अब हो गया." वो बोल तोह आराम से रही थी लेकिन शायद वह से निकलने की जल्दी थी उसको.

"देखिये पहली बात तोह मुझे पता नहीं था के ऐसा हो जायेगा. दूसरा कल आपके दादाजी ने बताया आपके पिताजी की नौकरी के बारे में. अब उनकी दिलाई चीज मई तोह ठीक नहीं कर सकता तोह जब आप शहर जाए तोह वापिस से खरीद लेना वह. ये प्लीज रख लीजिये नहीं तोह दिल पर बोझ रहेगा मेरे." अर्जुन को अब गान के माहौल का इतना पता तोह नहीं था इसलिए पैसे उसने सविता का हाथ पकड़ते हुए हथेली पर रख दिए. उसकी काली खूबसूरत आँखें विस्मय से और बड़ी हो गई जो अब अर्जुन को देख रही थी. शरीर में कंपकपी चढ़ गई थी एक नौजवान द्वारा हाथ पकड़ने से. फिर उसने मुट्ठी बंद कर ली तोह अर्जुन ने हाथ छोड़ दिए.

"ठीक है पैसे ले लेती हु लेकिन आइंदा हाथ मत पकड़ना." नजरे नीची करती वो जाने लगी फिर रुक गई. "और बाकी के 50 रुपये मई कल वापिस कर दूंगी."

"मतलब आइंदा हाथ मत पकड़ना? मैंने कुछ गलत कर दिए क्या?" अर्जुन ने भोलेपन से कहा और सविता हल्का सा सहज होती उसको देखने लगी. पहलवान सा जिस्म लेकिन चेहरा मासूम सा, शायद उसकी हे उम्र का ये लड़का बदमाश तोह नहीं था जैसी उसने पहली मुलाकात में धरना बना ली थी उसको पुलिया पर देखते हुए.

"अब ऐसे वीराने में अकेली लड़की का हाथ पकड़ना ठीक तोह नहीं. और यहाँ कोई ये सब देख लेता तोह बात गाँव में फैल जाती." उसको अपने शब्द कहने के बाद हे गलती का एहसास भी हो गया था.

"वह तुम्हारे घर आ कर पैसे देता तोह शायद लोग ज्यादा बातें करते. और यहाँ मुझे पता था के ऐसा नहीं होगा. मेरी कोई दूसरी मंशा नहीं थी तुम्हारा हाथ पकड़ने के पीछे. बेशक तुम सुन्दर हो लेकिन मेरा कोई aisa-waisa इरादा नहीं था. बुरा लगा हो तोह माफ़ कीजियेगा." अर्जुन ने शांत लहजे बात कही और उसकी तरफ देखने लगा जो जमीन पर नजर गड़ाए थी थोड़ी शर्मिंदगी में.

"तुम बापू के साथ खड़े थे न थोड़े समय पहले? और सविता तूने तोह बताया भी नहीं के कोई पहलवान जैसा लड़का तेरा दोस्त है जो गाँव तक आता है." ये लड़की थी काजल जो खेतो की तरफ से उनके बिलकुल हे पास आ गई थी. अर्जुन ने अभी उसका चेहरा देखा. एक जवान गाँव की जाट लड़की. गेंहुआ रंग, भरा हुआ शरीर और थोड़ी चुलबुली सी लड़की थी चेहरे से.

"दोस्त नहीं है मेरा और कोई मिलने नहीं आता." एकदम से वह सहज सी हो गई थी अपनी सहेली द्वारा उसको किसी पराये लड़के के साथ देख कर.

"जी ये ठीक कह रही है. हम दोस्त नहीं है. कल मेरी गलती से इनका दुपट्टा खराब हो गया थी यही इस पुलिया पर तोह बस माफ़ी मांगने और दुपट्टे की भरपाई करने आया था. और थोड़ी देर पहले मई हे आपके पापा के साथ बात कर रहा था." इतना कहने के बाद उसने दोनों लड़कियों के चेहरे की तरफ देखा तोह सविता जहा अब उसकी बात सुनकर थोड़ी राहत में थी वही उन दोनों को देखने के बाद काजल खिलखिला कर हंस पड़ी.

"वही तोह मई सोचु के सारा दिन तोह हम दोनों साथ रहती है तोह ये कहा से तुझे मिल गया. ऊपर से तू बकरी जैसी मरियल और ये छोरा तोह एकदम घोडा.. हाहाहा." उसकी बात पर अर्जुन मुस्कुरा दिए तोह सविता थोड़ा बुरा मानती अपनी सहेली से कहने लगी.

"मई बकरी लगती हु? मान लिए तू घोड़ी हो गई लेकिन इतनी भी कमजोर नहीं तेरे से. थोड़ा हे हल्का होगा शरीर." वो ये भी भूल गई के ये लड़का भी यहाँ खड़ा है जो दोनों की बातों पर बस मुस्कुरा रहा था.

"और वैसे ये तुझको पसंद है तोह तू हे दोस्ती कर ले इस से." झुंझालती सी वह अपने घर की तरफ कदम बढ़ने लगी तोह काजल पीछे से पकड़ती बोली.

"अररि ओह सविता. सुन तोह यार, मैंने मजाक किआ तोह तू सच में बुरा मान कर निकल चली. यहाँ ये भी तुझे देख रहा है के कैसी लड़की है." अर्जुन उसकी बात पर कुछ झेंपता सा खुद हे पुलिया की तरफ चल दिए. दोनों हे लड़किओं ने उसको जाते देख एक दूसरी की तरफ देखा. पता नहीं ये क्या इशारा था के सविता थोड़ा लज़्ज़ाने लगी और काजल मुस्कुराने. फिर काजल ने अर्जुन को पीछे से हे आवाज दी. "सुनो, कल इस से थोड़ा पहले आ जाना. मेरी सहेली यही तुम्हारा इंतज़ार करेगी. और इधर सिर्फ हम दोनों हे आती है क्योंकि यहाँ हमारे खेत है तोह डरना मत." सविता उसकी ब्याह पर चूंटी कांटने लगी और अर्जुन पीछे देख एक बार मुस्कुराया और फिर अपनी साइकिल घुमा घर की और निकल चला.

"तू सुधर जा पगली. पता है न अगर कुछ ऐसा वैसा हुआ तोह फिर क्या हो सकता है." सविता अपनी सहेली के साथ बात करती चल रही थी.

"देख बहिन, अब तू अगर उसको पसंद करती है तोह फिर बिलकुल मत घबरा. मई तेरे साथ हु और फिर मेरे पास तजुर्बा भी तोह है." काजल आँख मारती बोली.

"हाँ पता है तू क्या गुल खिला चुकी है और फिर तू पकड़ी भी गई तोह कोई कुछ कहने सा रहा. आखिर ब्याह भी तोह उसके साथ हे कर रही है. लेकिन इस लड़के को मई जानती तक नहीं हु. कल हे देखा था पहली बार और आज वो ये पैसे देने आया था चुन्नी ख़राब हो जानी की वजह से." अपनी मुट्ठी में पकडे रुपये दिखती वो काजल को अपनी बात समझने लगी.

"देख अगर मेरा ब्याह हो भी गया होता तोह ऐसे लड़के से तोह फिर भी मई सामान्य बना लेती. तेरा होने वाला जीजा दिल का तोह ठीक है लेकिन वह से फिसड्डी हे है." हंसती सी वह बोली फिर गंभीरता चा गई काजल के चेहरे पर.

"मतलब तू ये कैसे कह सकती है? और एकदम उदास क्यों हो गई ऋ तू?" अपनी सहेली का ये व्यवहार देख सविता ने पुछा.

"यार इस बार होली पर जब खेत में उसने मेरे साथ किआ तोह ये समझ ले की ऊपर घिसते हे दही निकल दिए. पिछली बार संक्रात पर तोह फिर भी 2 मिनट टिका था. एक वो अपना भूरा है जो भाभी के ऊपर 10-15 मिनट तक चढ़ाई करता देखा था जब मई चारा काटने पिछले खेत पर गई थी. अब कल को भी मेरा यही हाल हुआ तोह फिर ज़िन्दगी ख़राब हो जाएगी ऋ." काजल की बात सुनकर उसको अपनी सहेली से सहानुभूति तोह हुई लेकिन भूरे का नाम सुनते हे सावित चौंक सी गई.

"भूरा वह बिजली वाला? और तू मोती कमला का तोह नहीं कह रही?" काजल गौर से उसकी और देखती बस हाँ कह दी.

"ये कमला भाभी तोह पहुंची हुई निकली रे. वो एक दिन तालाब की तरफ भी पेड़ पकड़ के हरिराम से मजे ले रही थी जब मई उधर बेरी तोड़ने गई थी छोटू के साथ. छिनाल औरत है पक्की." दोनों बातें करती घर के पास हे आ चुकी थी.

"छिनाल कह या कुछ भी बोल तू उसको. लेकिन ये जिस्म है न बड़ा विचित्र है रे. जबतक ये कुंवारा है तोह ये काबू में रहता है लेकिन अगर एक पर इसको मर्द का सुख मिल जाये तोह फिर ये किसी की नहीं सुनता. ऊपर से अब कमला का मर्द तोह रहा नहीं फिर बेचारी खेत में काम करने के साथ ऐसे भी घर का खर्चा चला लेती है." काजल को तोह कही से भी वो औरत गलत नहीं लग रही थी.

"चल मई चलती हु. बाबा को खाना बना के देना है और छोटू को भी उठाना है. अभी तक सोया होगा स्कूल की छुट्टिया जो शुरू हो गई. बाद में आती हु तेरे घर."

इस तरह दोनों अपनी और चल दी.

"अर्जुन तू नाश्ता कर ले फिर तारा को इसकी फैक्ट्री छोड़ डीओ. कल से ये स्कूटरी लेकर चली जाया करेगी रास्ता देखने के बाद. शाम को भैया इसको लेते आएंगे." अर्जुन सब काम निपटा कर 8 बजे खाने की टेबल पर था. अलका दीदी की बात पर सर हिलता वो अख़बार देखने में लगा था. फिर जैसे हे दैनिक शहर वाला पृष्ट देखा तोह चौंक गया. "कुख्यात बदमाश जितेंदर उर्फ़ काला पुलिस ने दबोचा." इस शीर्षक के नीचे 2 छोटी फोटो लगी थी उन पकडे गए व्यक्तियों की. अर्जुन अब उस खबर को पढ़ने लगा. "4 कतल और 2 बलात्कार के मामलो में वंचित अपराधी जितेंदर और उसके भाई विष्णु उर्फ़ बिल्लू को कल रात पुलिस ने ##### स्टैंड पर अधमरी हालत में दबोच लिए. बताया जा रहा है की 6 महीने से पुलिस की दोनों मुजरिमो की तलाश थी और काला पर 25000 का इनाम पहले हे घोषित था. गंभीर हालत में उन्हें सरकारी हस्पताल में कड़ी सुरक्षा में इलाज के लिए भर्ती किआ गया है. पुलिस उपायक्त ने बताया है की रात तक़रीबन 10 बजे दोनों मुजरिम गश्त लगा रही पुलिस की जीप को बेहोशी की हालत में मिले है. विष्णु की हाथ की हड्डी टूटने के साथ हे चेहरे पर 8 टाँके आये है और जितेंदर को अभी होश नहीं आया था. उसके सर पर भी गहरी चोट है और हाथ की हड्डी के साथ छाती में भी फ्रैक्चर बताया गया है. यहाँ से उन्हें सीधा जेल भेजा जायेगा और कार्यवाही की जाएगी."

खबर पढ़ कर अर्जुन बस मुस्कुरा दिए. 'मतलब वो सच में हे अपराधी थे और अब तोह गए लम्बे समय के लिए अंदर.' फिर खाना खता हुए उसको रेणुका बुआ का ध्यान आया और प्रीती का.

"प्रीती कब गई थी यहाँ से?" ऋतू दीदी जो उसके पास आ कर बैठी थी उनसे धीमी आवाज में अर्जुन ने पुछा.

"वो तोह 6 बजे हे घर चली गई थी, क्यों कोई जरुरी काम था क्या?" ऋतू दीदी ने उसके चेहरे को जैसे पढ़ते हुए हे पुछा हो.

"नहीं वो बस ऐसे हे पूछ लिए. दिखाई नहीं दी तोह." इतना बोलकर वह अब समझ चूका था की शामत आने वाली है. बुआ वही सो रही होगी और उनकी हालत देख कर प्रीती समझ जाएगी की उनके साथ क्या हुआ है. वैसे तोह साफ़ कर हे दिए था रात को ाचे से लेकिन चादर पक्का फांस्वा देगी और उनका वह सोना भी. ये सब सोचता वो खड़ा हुआ हे था के सीढ़ियों से नीचे उतरती तारा दिख गई. काली जीन्स और एक डिज़ाइन वाली सफ़ेद शर्ट में जाँच रही थी वो. बालो को सलीके से एक काले मोठे रबर में बांध कर ऊँची हील के सांडले पहने वह उसके सामने आ कर बैठी तोह दोनों ने एक दूसरे को मॉर्निंग विश किआ. अर्जुन उठ कर बहार आ गया की अगर फंस गया तोह उसके साथ क्या होगा. इतना सोच हे रहा था के दरवाजा खोलती प्रीती सामने से उसकी तरफ आती दिखी.

"बचा ले बहगवां." दुआ मांगता सा वो पहली बार थोड़ा सेहमा सा था.

"गुड मॉर्निंग जी. मेरे साथ चलो घर पे काम है." उस से हाथ मिलती हुई वो मुस्कुराती हुई बोली तोह अर्जुन साथ हो लिए. 'अब शायद ये घर जा कर बात करेगी.'

"आओ बीटा. बैठो एक मिनट." छोल साहब को नमस्ते की जो की तैयार हो रहे थे शायद कही जाने के लिए. अर्जुन को लगा के उन्हें शायद कुछ शक न हो गया हो.

"जी दादू बताये क्या आज्ञा है." सहज होने की कोशिश करता वो बोलै.

"अरे इतना कुछ ख़ास काम नहीं है. ये कुछ दवाई है तुम बस लाइब्रेरी जाने से पहले दे जाना घर. मई अभी निकल रहा हु तो रात में आऊंगा." आस्तीन के बटन बंद करते हुए उन्होंने एक पर्ची उसकी तरफ की तोह अर्जुन पर्ची देखने के बाद उन्हें देखने लगा.

"वो क्या है न रेणुका थोड़ी टेम्परेचर सेंसिटिव है और कल तुम दोनों ाचे खासे भीग कर घर आये तोह आज सुबह उसको बुखार के साथ हाथ पाँव में भी दर्द था. अपने डॉ जैन को बुलाया था तोह उन्होंने ये बताई है देने के लिए." उन्होंने आराम से पूरी बात कही तोह अर्जुन को बारिश किसी वरदान सी लगने लगी थी.

"मेरे साथ आना तुम एक बार." अर्जुन ने पर्ची जेब में राखी तोह अपने कमरे में जाती प्रीती ने उसको बुलाया. 'अब जाने क्या देख लिए इसने'

"ये तुम्हारी है. और तुम्हे चोट लगी है ये बताना भी तुमने जरुरी नहीं समझा?" अंदर आने के बाद दरवाजा ढालती वो हलके गुस्से और आवाज को नियंत्रित करती सी अपने हाथ में एक पट्टी को दिखती बोली तोह अर्जुन उसका प्यार और गुस्सा देख मुस्कुराने लगा.

"वो क्या है न तुम्हारे बिस्टेर पर नींद बहोत ाची आई मुझको." बात को बदलता वो बोलै तोह प्रीती का गुस्सा उबाल खा गया. अर्जुन को दिवार पर धकेलती वो इस बार हलकी तेज आवाज में बोली. "मई क्या पूछ रही हु? कहा चोट लगी है दिखाओ और बताओ कैसे लगी?"

"मेरी माँ बहार सब सुन रहे होंगे. शांत हो जाओ. वो रात को बारिश में जब पेड़ के नीचे खड़े थे तोह कुछ आकर गिरा था यहाँ कंधे पर और बस छोटी सी चोट लग गई जिसपर दादा जी ने पट्टी की थी. नींद में शायद ये ुअत्तर कर गिर गई थी. अब जखम ठीक है पहले से." अर्जुन ने टीशर्ट को हल्का सा गले की तरफ से सरकते हुए कंधे पर बंधी पट्टी दिखते कहा और प्रीती उस तरफ देखती उसके सीने पर एक हाथ रख हलकी सी नम्म आँखों उसकी तरफ देखने लगी.

"बिलकुल पागल हो तुम. और गुस्सा भी आता है तुम्हे." उसके गाल थाम कर एक छोटा सा किश उसके होंठ पर करते हुए खुद से लगा लिए.

"ाचा चलो अब निकलो यहाँ से और कोई काम भी कर लिए करो कभी." नखरे से अर्जुन को बहार धकेलती वो मुस्कुराने लगी थी. क्या है ये लड़की भी कभी आंसू कभी मुस्कराहट. फिर उसको ध्यान आया के तारा को भी कंपनी छोड़कर आना है. छोल साहब को bye करता वो घर आ गया अपने जहा तारा तैयार थी अपना एक हैंडबैग लिए.

"चलिए मैडम. सॉरी अगर देरी हो गई हो तोह." अर्जुन ने स्कूटर बहार निकलते कहा तोह तारा शांत भाव से स्कूटर पर बैठ गई. दोनों गली से बहार निकले तोह तारा ने हे बात की शुरुआत की.

"रात तुम घर नहीं थे?"

"हाँ वह प्रीती के दादाजी ने मुझे वही रोक लिए था. सुबह वही से फिर रनिंग के लिए निकल गया था. कोई काम था?" अर्जुन ने बताया

"ऐसा तोह कुछ नहीं था. बस रात को नीचे तुम्हे देखने आई थी क्योंकि शाम के बाद से हे तुम गायब थे." तारा कुछ कहना चाहती थी लेकिन बात जुबान पर नहीं आ रही थी.

"स्टेडियम से आने के बाद प्रीती की बुआ को मार्किट ले गया था. आज भी शायद जाना पड़ेगा वापिस. फिर बारिश में भीग कर रात 10 बजे हे घर वापिस आये थे उनके. तोह खाना खाने के बाद बस सोना हे था तोह वही सो गया." तारा हिम्मत जुटाने में लगी थी और अर्जुन अपनी बात कह रहा था.

"आज रात को मेरे कमरे में आ जाना. मुझे तुम्हारी शर्त से अब कोई ऐतराज नहीं." उसकी कमर पर हाथ रखते हुए तारा चिपक गई थी उसकी पीठ से. ये घर से थोड़ा हे दूर बिपास की एक शांत सी सड़क थी.

"मई तुम्हारे ऊपर कोई दबाव नहीं देना चाहता तारा. और न हे मुझे शरीर देखने की भूख है कोई. बस बात थी तुम्हे समझने की." अर्जुन की बात पर तारा अपने आंसू रोक न पाई.

"तुम कहो तोह मई यही बीच सड़क पर कपडे उतारने को तैयार हु अर्जुन. 2 दिन से मई खुद को कोस रही हु की क्यों मैंने तुम्हे वो बात कही. मई तुम्हारा वही प्यार चाहती हु अर्जुन." रोटी हुई वो दोनों हाथ पीछे से उसके सीने पर रखे थी.

"खुद को ठीक करो तारा. मई रात को आऊंगा तुम्हारे पास. बस रोना बंद करो अब हम तुम्हारे काम की जगह आ गए है." थोड़ी दूर पहले स्कूटर रोक कर उसने पीछे बैठी तारा की तरफ देखा. और खुद हे उसके हैंडबैग से रुमाल निकाल कर ध्यान से आंसू पोंछे. आँखों पर काजल लगा था जो आंसुओ के साथ गालो पर भी आ गया था.

"कैसे बचो की तरह रोटी हो. लो अब सही करो खुद को जरा." स्कूटर का गोल शीशा उसकी तरफ करता वो बोलै और नाक पर लगी एक आंसू की बूँद को ऊँगली से पॉच दिए.

"बड़ा मजा आया होगा न मुझे सताने में तुम्हे? एक दिन देखना बदला जरूर लुंगी मई." अभी भी उसकी आवाज में रोने का असर जरूर था. अर्जुन ने प्यार से सर सेहला दिए

"चलो अब जाओ अपने काम पर. शाम को भैया आएंगे लेने." अंदर जाती हुई भी वो पीछे मदद कर अर्जुन को देखती जा रही थी. आखिर में चेहरे पर थोड़ी खुसी दिख हे गई थी उसके. 'चल भाई दवा लेके फिर चलते है आज ज्योति दीदी से मिलने' स्कूटर को मार्किट की तरफ करता वो आज ज्योति के वादे को याद करता मुस्कुरा दिए.

"ये दवा अंदर पकड़ा दो दीदी." पारवती को बहार से हे दवा का पैकेट देता अर्जुन स्कूटर अपने घर खड़ा कर बहार से हे संदीप के घर की और चल दिए क्योंकि अब 10 बजने को थे और फिर लाइब्रेरी भी जाना था.

"त्रीनगगगग" घर के बहार की घंटी बजाई तोह कोई एक मिनट बाद ज्योति ने हे दरवाजा खोला. अभी अभी शायद वो नाहा कर हे आई थी, एक खुली मैक्सी पहने अपने बालो को ऊपर जुड़ा सा बनाये हुए.

"चलो अंदर आ जाओ अब." अर्जुन को अपनी तरफ ऐसे देखते पा उसने एक बार गली में भी नजर घुमाई और अर्जुन भी तेज कदमो से घर के अंदर चल दिए.

"लगता है अभी नाहा कर आई हो." अंदर का दरवाजा लगाती ज्योति को उसने पीछे से हे पकड़ कर गले को चूमते हुए उसके अनार दबा लिए.

"बहोत समय है आज हमारे पास. कोई जल्दी नहीं बाबा दरवाजा तोह ाचे से बंद करने दो." ज्योति तोह हमेशा हे मस्ती से भरी रहती थी. अर्जुन को भी बेताब देख वो खुश हो गई.

"2 घंटे बाद मुझे लाइब्रेरी भी जाना है." अर्जुन ने जाने की बात कही तोह ज्योति ने घूम कर उसकी तरफ देखा. "दिल करे तोह चले जाना. नहीं तोह किताबे तोह वही रहेंगी लेकिन ऐसा समय फिर शायद जल्दी से न मिले." उसके लम्बे चौड़े शरीर में अपने मॉटे दूध दबती वो उस से चिपका गई थी. अर्जुन ने उसकी बाहों पर हाथ फिराया तोह पाया के ये आज कुछ ज्यादा हे चिकनी है.

"आज कुछ अलग लग रही हो."

"तुम्हारे लिए हे आज सारा मैदान साफ़ किआ है. पूरा एक घंटा भथरूम में थी मई." इतराते हुए ज्योति ने ये बात कही तोह अर्जुन ने पीछे से उसके मैक्सी की चैन खोलते हुए मैक्सी को उतार दिए. जो अब जमीन पर पड़ी थी. अंदर उसके सांवले मॉटे दूध सर उठाये थे. ज्यादा हे वजनी थे तोह वह हलके से नीचे की और थे लेकिन गोलाई एकदम पूरी लिए थे. भूरे निप्पल इस हलकी छेड़छाड़ से हे उभरने लगे थे. पेट से नीचे छूट तक जैसे आज सारा मैदान सफाचट और मुलायम था. 2 बार की तगड़ी चुदाई से छूट के अंदर की गुलाबी दरार ठीक से दिख रही थी और किसी ब्रेड सी फूली छूट, मोती जांघो के बीच से उभर कर बहार निकली थी.

"पहले एक बार आगे से मेरी प्यास बुझा दो फिर जैसे चाहो कर लेना." उतावलापन दिखती ज्योति ने अर्जुन की पंत खोलनी शुरू कर दी.

"वो मई तुम्हारे बिना कहे भी पहले आगे हे करने लगा था." उसके दोनों उभार कास के मसलते हुए अर्जुन एक नए अनुभव के लिए तैयार था. जैसे हे पंत उतर गई वो ज्योति को उठा कर अंदर वाले कमरे में ले आया. उसके चुत्तड़ पकड़ने भर से अर्जुन को मजा आने लगा था. नरम बिस्टेर पर लिटाते हे अर्जुन ज्योति के ऊपर लेत गया और होंठ पीते हुए उसकी छूट को ऊँगली से सहलाने लगा था जो अंदर से कुछ चिकनी थी.

"तुमने यहाँ कुछ लगाया है?" अपने होंठो अलग कर उसने ज्योति से पुछा जो मस्त हो गई थी इस 2 मिनट के हे जिस्म सहलाने से.

"हाँ. आगे भी और पीछे भी. पिछली बार तुमने बिना चिकनाई के किआ था तोह अगले दिन तक छूट में जलन होती रही. और ये binda(latth) भी तोह कितना मोटा और बड़ा है." उसका लुंड सहलाती ज्योति बेशर्मी से बता रही थी की उसने छूट के साथ हे अपनी गांड के छेड़ को भी चिकना करके तैयार किआ हुआ था.

"ठीक बात है तोह फिर अब तैयार हो तुम.?" उसकी टांगो को फैलते हुए हे अर्जुन ने अपने लुंड की खाल को सहलाते हुए छूट पर उसका लाल सूपड़ा चिपका दिए.

"मई हर वक़्त तुम्हारे लिए तैयार रहती हु. और इसके लिए भी." मजे में आँखे बंद कर वो आने वाले दर्द और फिर उसके बाद के मजे के लिए तैयार थी. और उसके इतना बोलते हे अभी तक छूट पर अपना लुंड रगड़ता अर्जुन छूट की चिकनाई सुपडे पर लगा चूका उसको छूट के छेड़ पर धंसा चूका था. और फिर हर बार की तरह एक करारा धक्का जड़ दिए. आधा लुंड इधर ज्योति की मखमली छूट में था और दर्द से उसके होंठ कास गए थे.

"आह्हः.. ये हर बार.. आह इतना दर्द.. उम्म्म .. सारा दाल दो.." उसकी बात सुनकर अर्जुन मुस्कुरा उठा और दोनों चुनचे मजबूती से पकड़ कर कमर को फिर से आगे तेल दिए. उसके बड़े अंडकोष ज्योति के कूल्हों से जा लगे और न चाहते हुए भी ज्योति की चींख निकल गई और आँखों से पानी.. बिना हे उसको सँभालने का मौका दिए अर्जुन ने आधा लुंड पीछे कर फिर से अंदर भर दिए. यहाँ दोनों के अंग अब जड़ तक चिपक चुके थे. सूपड़ा बच्चेदानी के भी दबाने लगा था.

"कमीने हो तुम.. ये घोड़े जैसा लुंड लड़कियों के लिए नहीं है.. आठ माँ.. पेट तक दुःख रहा है.. जानवर हे हो.." चीखती बड़बड़ाती ज्योति दोनों मुट्ठियों से चादर खींच रही थी और अर्जुन उसका एक दूध मसलता दूसरे हाथ से कमर को थाम के उसका चेहरा देख रहा था. फिर इत्मीनान से वो छूट में आधा लुंड अंदर बहार करने में लग गया बिना हे ज्योति के दर्द की परवाह किये. दोनों निप्पल दबा के चूसता वह हर बार लुंड जड़ तक पेलते हुए ज्योति की दर्द भरी आवाज को मस्ती वाली सिसकारियों में बदल रहा था. अब वो उसके नीचे दबी बस उसका सर सहलाती हुई अपने कूल्हे भी नीचे से उठाने लगी थी. इस लड़की के शरीर में वासना जैसे कूट कूट के भरी थी. ऐसे हे धक्के देते हुए जब छूट ाचे से गीली हो कर अपना कॉमर्स बहार निकलने लगी तोह अर्जुन ने एक छूंछा छोड़कर अपनी 2 उंगलिया छूट के नीचे रगड़नी शुरू कर दी. एक बार पूरा लुंड बहार निकल कर दोनों उंगलिया छूट में घुसाए वह उन्हें ाचे से चिकना कर वापिस लुंड छूट में दाल कर छोड़ने लगा. ज्योति को इस सब से कोई फरक नहीं पड़ रहा था. बस लुंड छूट में चाहिए था और वो अब किसी मशीन की तरह निरंतर अंदर बहार हो रहा था. एक गीली ऊँगली अर्जुन ने ज्योति के उठे कूल्हों के बीच की दरार में दाल कर गांड के छेड़ पर दबायी थो ज्योति का मजा दूंगा हो गया.

"तुम जब वह ऊँगली लगते हो तोह मजा बढ़ जाता है.. आह.. आह.. करते रहो.."

"अभी ऊँगली है तोह मजा आ रहा है.. हम्म्म. ये भी वही जायेगा.. हँ.." अर्जुन ने कच्छ से वो ऊँगली उन मॉटे कूल्हों के बीच इस छोटे से छेड़ में घुसा दी. अंदर पहले से हे खूब चिकनाई थी.

"क्या लगाया था यहाँ पर.?" थोड़ी हैरानी से उसने सिसकती ज्योति का एक दूध जरा सख्ती से दबा दिए..

"ोुच्छ.. वो मैंने बेतनावटे क्रीम की तुबे.. आह.. एक चौथाई अंदर दबा दी थी.. आह..." उसकी बात सुनकर अर्जुन ने दूसरी ऊँगली भी उस चिकनाई वाले छेड़ में घुसा दी थो ज्योति एक पल के लिए कमर रोक कर होंठ दबाने लगी.. अर्जुन नहीं रुका और दोनों उंगलिया अंदर बहार करता रहा छूट पे धक्के लगते हुए.

"आह.. मई गई.. आह.. ये.. मजा." छूट को लुंड पर कसने की कोशिसत करती वो निढाल से हो गई लेकिन अर्जुन धक्के लगता रहा. जब छूट का रास गांड की तरफ जाता महसूस हुआ तोह लुंड झटके से बहार खींच लिए.

अर्जुन ने उस किताब में पढ़ा था के ज्यादातर लोग गुदामैथुन घोड़ी बना कर करते है जो प्रथम संसर्ग के लिए सही नहीं है, और अगर लुंड बड़ा हो तोह इस मुद्रा में गुदा द्वार घूम जाने से पीड़ा और ज्यादा होती है. उस बात को याद करते हुए वो ज्योति को करवट के बल करता उसके पीछे आ लेता.

"ये थोड़ा मेरी तरह करो." गांड के उभार को थपथपते हुए उसने ज्योति को अपनी गांड हिलने को कहा तोह उसने वैसा हे किआ. गांड के भूरे छेद पद तक जाता लुंड दरार में हे तक़रीबन आधा इंच खो गया था.

"आह.. यहाँ आराम से करना." थोड़ा डरते हुए ज्योति बोली लेकिन अर्जुन ने धक्का लगाने की जगह लुंड को मजबूती से पकड़ कर उसका दबाव उस छेड़ पर बढ़ा दिए. एक पल को लगा के लुंड इस दिवार के पार नहीं जायेगा फिर अपनी कमर को आगे ठेलते हे सूपड़ा उस छेड़ के अंदर जा धंसा.

"मई मर्डर गई.. माँ .. निकाल लो इसको अर्जुन.. भहर निकल बहनचोद.. मेरी फट गई है.. आई रे. मुझे कुछ नहीं करवाना.." अर्जुन ने कमर को जोर से जकड रखा था तोह ज्योति उसकी पकड़ से तोह नहीं निकल पाई बस अपना सर तेजी से पटक कर छूटने की असफल कोशिश करने लगी. गांड की दरार पूरी खुल गई थी और उस छोटे भूरे छेड़ में अर्जुन का सूपड़ा फंसा हुआ था.

"गांड ढीली छोड़ दो ऐसे दोनों को हे ज्यादा दर्द होगा. और दर्द तोह पहली बार छूट में लुंड जाने से भी हुआ था न." दर्द तोह उसको भी हो रहा था क्योंकि गांड का चला इतना टाइट था की सूपड़ा बुरी तरह से फंसा हुआ था. ज्योति ने हिम्मत दिखते हुए गांड पर जोर लगाना बंद किआ और रोटी रही बिना आवाज के.

"बस थोड़ा और डालूंगा उसके बाद उतने से हे करूँगा." अर्जुन ने गांड पर हलकी थपकी मारते हुए गद्देदार कूल्हों को हिलाया और थोड़ा दबाव भदया तोह लुंड की हाथी अंदर फिसलने लगी.

"आह.. ये दर्द ज्यादा है aage..aah वाले से.. मर्डर गई मई तुझ जैसे जानवर से छुड़वाने के चक्कर में.." गरम लावा सा अपनी गांड में डालता महसूस हो रहा था ज्योति को और इधर 5 मिनट की म्हणत के बाद वो खूंटा गांड में आधा धंस कर रुक गया था. सुपडे के जोड़ तक फिर से बहार निकल अर्जुन ने अब उसका ऊपर वाला लटकता दूध अपने हाथ से दबाते हुए लुंड फिर अंदर पेल दिए. ज्योति बस गांड को ढीली छोड़ कर बिस्टेर पर पड़ी हुई थी. उसकी हालत देख अर्जुन ने छूट में 2 उंगलिया दाल कर उसकी गांड में हलके धक्के देने शुरू किये तोह 20-25 धक्को के बाद वो खुद हल्का सा हिलने लगी. हर धक्के पर उंगलिया छूट में पूरी उतर जाती.

"तुम्हारी गांड बहोत मजेदार है. आह.. इतनी कासी हुई है के लुंड अंदर बहार करने में भी एक अलग मजा है." अर्जुन को ज्योति की गांड अब छूट से भी ज्यादा पसंद आ गई थी.

"आह.. फाड़ कर मजा आ रहा है.. हाय यह.. एक ऊँगली और दाल रे.. आगे.." अपने चुनचे खुद मसलती वो कूल्हों को हिलने लगी थी इधर गांड में लगी क्रीम की वजह से जब आधा लुंड चिकना हो गया तोह अर्जुन ने थोड़ा जोर देते हुए और अंदर पेलना शुरू कर दिए.

"आह.. कमीने .. आज हे पेट फाड़ेगा गांड के साथ.. हाय मई मर्डर जाउंगी.." पौने लुंड गांड में उतार कर अब अर्जुन पसीने में भर गया था. धक्के भी सही से नहीं लगते देख उसने पीछे से जकड कर ज्योति को बिस्टेर पर उल्टा पलट दिए. खुद गांड पर लेटने के बाद किसी घुड़सवार की तरह कूल्हों पर बैठ गया.

"वजन मत दाल सारा." अर्जुन ने ज्योति की बात समझ कर घुटने बिस्टेर पर टिका दोनों कूल्हे फैलता हुए लुंड अंदर पेलना शुरू कर दिए. इस तरह उन मॉटे कूल्हों कर दबाते हुए अब उसको ज्यादा आसानी हो रही थी.

"आह ज्योति.. सच में ये मजेदार है." हाथो का भार भी बिस्टेर पर दाल कर वो गाल चूमते हुए अब कास कर उसकी गांड कूटने में लगा था. पता नहीं चला कब उसकी गोलियां मॉटे गद्देदार कूल्हों पर टकराने लगी थी. 8 इंच लुंड उस छूट से ज्यादा गरम सुरंग में तूफ़ान मचा रहा था. अब गांड मरवाने में भी ज्योति की वासना भड़ने लगी थी..

"फाड़ दे इसको आज.. ाः.. ाचा लग रहा है.. और कास के मार रे.." लुंड का सूपड़ा आज भयंकर तरके से फूलने लगा था उस तंग छेड़ के अंदर. इस मजे में होश गावता अर्जुन पूरा हे उसके ऊपर गिरता नीचे दबे चुंचो को मुट्ठी में भींचता किसी वहशी की जैसे अंधाधुन्द धक्के मार रहा था. बिस्टेर भी छू छू बोलने लगा उसके जोर और झटको से. 15-16 ऐसे तगड़े धक्के लगाने के बाद उसने गांड की फांको को फइलत हुए पूरा साढ़े 8 इंच का डंडा अंदर पेवस्त कर दिए और गांड के अंदर अपना गरम लावा भरने लगा. इधर ज्योति एक बार दर्द से करहि लेकिन जैसे हे वो गरम पानी गांड में गिरता महसूस हुआ तोह मजे से गांड कास के भींच ली. अर्जुन को भी उसका लुंड अंदर निचुड़ता सा महसूस हुआ और खाली होते हे वो उसकी पीठ पर देह गया.

"ऊपर नहीं. नहीं." वजन हटाने को बोलै तोह अर्जुन ने लुंड झटके से बहार खींच लिए.

"ोीी.. डालते हुए भी जान ले ली अब निकलते हुए भी.. आह मरी मई." फूला हुआ सूपड़ा अभी ढीला नहीं हुआ था और ऐसे तेजी से निकलते हे वो गांड का छेद फैलता हुआ बहार निकल आया था. गांड से थोड़ा खून और सफ़ेद पानी धीमे धीमे बहार निकलने लगा और ज्योति औंधी पड़ी रही. छेड़ कभी खुलता कभी बंद होता दिख रहा था.

अर्जुन उठकर बाथरूम में गया और अपनी हालत सुधर कर बहार निकला. लुंड को ाचे से साबुन से धो लिए था पंत वापिस पहन ने से पहले.

"कपडे पहन लो फिर आराम कर लेना. अगर मुमकिन हुआ तोह ढाई बजे आ जाऊंगा एक बार आगे से करने के लिए." ज्योति आँखें खोले उसकी और दर्द और प्यार भरी नजर से देख रही थी. कुछ सोच कर अर्जुन ने उसकी मैक्सी ला कर खुद पहना दी. गांड को हिलाते हुए भी ज्योति की सिसकारियां निकल जाती जो इस बात का सबूत था के गांड ाचे से मारी गई है. फिर वह से सीधा घर आ कर साइकिल उठा वह लाइब्रेरी चल दिए. ज्योति के साथ उसकी चुदाई लगभग 45 मिनट तक चली थी. शायद हे कोई इतना टिक पता हो लेकिन उसके अंदर कुछ तोह अलग था हे जो वो इस से लम्बी चुदाई भी कर चूका था.

11:10 पर वो लाइब्रेरी में बैठा हुआ शांति से एक फिजिक्स की किताब पढ़ने में लगा था और तक़रीबन एक घंटे बाद वो कुछ सोच कर वह से निकल लिए. उसको उम्मीद थी की ज्योति अभी भी शायद करने के लिए तैयार होगी. तेजी से साइकिल चलता वो सीधा उसके घर के बहार पहुँच गया कोई अगले 10 मिनट में. चुपचाप दरवाजा खोला और बिना आवाज किये बहार आँगन से अंदर जाने लगा. जब गया था तोह दरवाजा ढाल कर गया था लेकिन अभी वो पूरा बंद दिखा. जाली का दरवाजा बहार खींच कर आराम से लकड़ी वाले दरवाजे का हैंडल घूमते हुए वह बिना शोर किये अंदर दाखिल हो गया. लेकिन 'उह.. आठ.. उम्म्म' की आवाज कान में घुसी तोह थोड़ा हैरान हो गया. "शायद ऊँगली कर रही है" सोचता वो बिना शोर किये वैसे हे अंदर दाखिल हुआ जहा बैडरूम का दरवाजा खुला था. नजारा देखते हे पाँव वही जम्म गए और साँस अटक गई.

बिस्टेर पर ज्योति टाँगे पसरे हुए एक 45-46 साल के आदमी से अपनी चुदाई करवा रही थी जो खुद बड़ी मस्ती से उसके दूध दबाता बुआ अपना लुंड डेढ़ घंटे पहले चूड़ी उस छूट में घुसाए था. अर्जुन की परछाई जैसे हे उन दोनों पर पड़ी तोह ज्योति का चेहरा पीला पद गया. वो आदमी भी झट्ट से अपना खड़ा 6 इंच का कला लुंड चैन के अंदर करने लग गया.

"तुम.. तुम.. त्तुम्म्म कब आये अर्जुन.." बस लड़खड़ाती जुबान से वह इतना हे कह पाई और इधर वो आदमी ज्योति के चेहरे की और देखता अर्जुन के बारे में जैसे पूछ रहा था.

"ये .. ये संदीप का दोस्त है. अर्जुन." दोनों की गांड फट चुकी थी लेकिन अर्जुन बस उनके चेहरे देखता रहा. वो आदमी बहार निकलने लगा तोह अर्जुन ने मजबूती से उसका हाथ पकड़ कर बिस्टेर पर धकेल दिए.

"कब से चल रहा है ये सब?" आवाज भर्रा जरूर गई थी लेकिन इसमें एक दहला देने वाला दम था. जिसको सुनकर वो दोनों सेहम गए.

"मेरा तुमसे कोई मतलब नहीं है. मई जा रहा हु." वो आदमी हिम्मत कर खड़ा होने लगा तोह गाल पर झन्नाटेदार थप्पड़ पड़ते हे वापिस बिस्टेर पर गिर गया.

"एक बार और पूछ रहा हु. मई अगली बार नहीं दोहराऊंगा." अर्जुन एकदम से हे बदल गया था. शायद एक सदमा था उसके लिए ज्योति का ये नंगा रूप.

"ये मेरे अंकल है अर्जुन और आज ये पांचवी बार था." उसका ये नया रूप देख कर डर्टी ज्योति ने इतना हे कहा और उस आदमी की तरफ देखने लगी.

"आज के बाद ऐसा कभी नहीं होगा बीटा. मई बीवी बचो वाला आदमी हु और इसने हे मुझे बुलाया था फ़ोन कर के. जाने दो मुझे मई हाथ जोड़ता हु." उसको भी एहसास हो गया था के ये पहलवान सा लड़का उसकी दुर्गति करने के साथ इज़्ज़त भी नीलाम कर सकता है.

"नाम क्या है?" अर्जुन ने छोटा सा जवाब वैसी हे आवाज में पुछा तोह घबराते हुए इतना हे बोल पाया, "विनय.. विनय तनेजा." और अर्जुन अब ज्योति की तरफ रुख किआ.

"प्यार नाम पता है तुम्हे के क्या मतलब होता है इसका? मेरा आखिरी सवाल है और श्रीमान तनेजा जी आप कुछ जानते हो तोह बता देना लेकिन सवाल मेरा इस be-gairat लड़की से है." एक पल रुक कर उसने दोनों को देखा तोह तनेजा ने सहमे हुए हे गर्दन हिला दी.

"इन के सिवा और कितने है? मुझे सच बताना."

"2 है 2 हे लोग है. पड़ोस वाले भैया और और.. मेरे हिंदी के प्रोफेसर." ज्योति ने सर झुका लिए लेकिन अर्जुन ने जब तनेजा की गर्दन की तरफ हाथ बढ़ाया तोह वो पहले हे बोल पड़ा.. "मेरा ऑफिस का दोस्त भी है. उसने मेरे साथ मिलकर भी किआ है इसके साथ." मिमियाता सा वो बोलै तोह अर्जुन की आँख से पानी चालक आया.

"घिनंन आती है तुझ जैसी बाजारू से मुझे. गलती से मेरे घर या मेरी बहनो के आसपास तू दिख गई तोह फिर मई भूल जाऊंगा की तू लड़की है और मेरे दोस्त की बहिन. कसम खा कर कहता हु की तेरी गर्दन यही बहार दरवाजे पर टांग न दी तोह मेरा नाम अर्जुन शंकर शर्मा नहीं." तनेजा की बची खुची गांड भी फट गई उसका पूरा नाम सुनकर.

"शंकर.. डॉ शंकर शर्मा.?" वो हाथ जोड़ता सा जमीं पर हे बैठ गया.

"बीटा मई भी तुझे इस घर के और इस लड़की के aas-pas नहीं दिखूंगा बस ये बात अपने तक हे रखियो. तू जो कहेगा मई करूँगा. मेरी गलती है के मई इस रंडी के चक्कर में फंस गया. मुझे माफ़ करदे." उस आदमी की बात पर बिना ध्यान दिए अर्जुन ने अपने कदम घर के बहार बढ़ा दिए. अपने आंसू साफ़ करता वो दरवाजा खुला हे छोड़कर बहार निकल आया. साइकिल उठाई और सीधा जंगल की तरफ बढ़ गया. इधर ज्योति होश में आई तोह पछतावा भी दिल में आने लगा. तनेजा तोह अभी भी सदमे में इ था.

"बहनचोद साली मरवा दिए तूने मुझे. ये अगर पहलवान जैसा है तोह इसका बाप खूंखार कसाई है. मुझे मार हे डालेगा अगर उसको भनक भी लग गई की मैं कुछ ऐसा कर रहा था." वो गाली देता भी रोने हे लगा था.

"आप यहाँ से चले जाओगे लेकिन मुझे तोह इस घर में हे रहना है. एक गली दूर उस इंसान से जिनसे आज मुझे ऐसी हालत में देख लिए जो कभी सोची नहीं होगी. और वो रोज दिखेगा मुझे हर बार उसकी आँखें जलील करेंगी." इतना बोलकर वो कपडे पहन ने लगी और साथ हे आंसू बहाने. तनेजा उठकर चल दिए वह से डरता हुआ सा.

"वो अगर बता देती तोह मई ऐसा नहीं करता. और क्यों करता मई. उसकी ज़िन्दगी है जैसे मर्जी जिए लेकिन ये कहना की मुझसे प्यार करती है और सिर्फ मेरे साथ हे करती है. की... कोई भला ऐसा भी कर सकता है क्या." पेड़ के नीचे बैठा वो खुद से हे बातें करने में लगा था. आज उसके लिए ये एक गहरा झटका था और एक नै सीख. अगर कोई सिर्फ आपसे जिस्मानी सम्बन्ध चाहता है तोह उसको सिर्फ वही दो लेकिन उसके साथ दिल नहीं लगाना. और जो प्यार करता है उसके साथ सिर्फ प्यार और उसकी इज़्ज़त करते हुए पूरा समर्पण. लेकिन प्यार को जान लेने के बाद नहीं तोह आज तोह किसी तरह काबू कर लिए था खुद को शायद फिर न हो पाए. वो ये सब सोच रहा था यहाँ बैठा हुआ एक पास में हे एक मजदूर दोपहर की रोटी खता रेडियो पर पर गण सुन रहा था.

"आप सभी की पसंद पर पेश है सन्न 1973 में आई सुपरस्टार राजेश खन्ना की फिल्म दाग का ये गण जिसके बोल लिखे है साहिर लुधयानवी ने, संगीत है प्रसिद्ध जोड़ी Laxmikaant-Pyaarelal का और अपनी मधुर आवाज में इसको गया है सबकी प्यारी हमारी लता मंगेशकर जी ने."

जब भी जी चाहे नै दुनिया बसा लेते है लोग

जब भी जी चाहे नै दुनिया बसा लेते है लोग

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते है लोग

एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते है लोग
 
अपडेट 42

रावण


तक़रीबन ढाई बजे अर्जुन घर आया तोह अब दिल पहले से बेहतर था. भौतिक विज्ञान की पढ़ी हुई बात उसको स्मरण हो आई थी जब वो अपने इस मानसिक कष्ट में खोया बैठा था वह जंगल में. गति और संतुलन. ये दो चीज हे निर्धारित करती है ब्रह्माण्ड की हर वास्तु को. एक एटम से लेकर हमारे सौर मंडल तक को. अगर एक छोटा सा अन्नू (एटम) गति से अनियंत्रित हो जाये और बिना संतुलन रखे दिशाहीन बहार निकलने लगे तोह फिर वो अपनी ऊर्जा से तबाही कर सकता है. सूरज से लेकर पृथ्वी तक अपनी धुरी पर स्थिर हो कर एक संतुलित गति से घुमते है. किसी एक संतुलन सबको नुक्सान पंहुचा सकता है. क्या हो अगर सूर्य अपनी कक्षा से निकल कर पृत्वी की तरफ आने लगे? क्या हो अगर पृथ्वी एक हे जगह घूमती रही लेकिन सूर्य के ird-gird अपना नियम छोड़ दे.? सर्वनाश. एक शरीर भी तोह तभी बीमार होता है जब उसका संतुलन ख़राब हो जाता है. इस बात को ध्यान रख कर अर्जुन ने खुद को काबू में किआ था के अपनी दिनचर्या और साथ जुड़े प्यार करने वालो को वह दुःख नहीं पहुचायेगा. हर दिन अलग बेशक हो लेकिन अपने आपको वो हमेशा वैसा हे बना के रखेगा जैसा उसके लोग चाहते है. प्यार लेफ्ट भी दिमाग में घूम रहा था इस सब के बीच तोह कही किसी कवी की लिखी ये पंक्ति याद आ गई उसको.

'औकात और सहने के हिसाब से हे मिलता है जहाँ में प्यार सबको.

धरती के समंदर एक चाँद से हिल जाते है, शनि 18 चाँद लिए फिरता है'

बस फिर उसकी वो मुस्कान वापिस चेहरे पर आ गई थी. अब वो घर पर ऋतू दीदी के हाथ से खाना खा रहा था जो आज बड़े प्यार से खुद अपनी जान और छोटे भाई को सर पे हाथ फेरती खिलाने में लगी थी.

"ये हो क्या रहा है मतलब? न तू 9 की है और न ये 6 का. इतना बड़ा हो गया और देखो अभी तक बहिन के हाथो खा रहा है." प्रियंका दीदी ये कहती उनके सामने बैठ गई और आरती भी. अलका दीदी अपना पसीना पॉच कर हाथ मुँह धोने चली गई.

"दीदी, ये तोह हमेशा मेरे लिए 6 का हे रहेगा." खाना ख़तम कर के वो उठती हुई बोली और अर्जुन का माथा प्यार से चूम लिए. वो भी अपनी इस behan/premika को जान से बढ़कर चाहता था. इधर अलका दीदी आई तोह वो भी बोल उठी. "हाँ तोह बड़ा हुआ हे कब है ये. अभी बोल दो के घर के बहार हाथी आया है तोह देखना 5 रुपये ढून्ढ के गली में न दौड़ लगा दे तोह कहना मुझे." हंसती सी वह अर्जुन के बाल ख़राब करती उसके साथ बैठ गई तोह ऋतू दीदी भी अब अपनी प्लेट लेकर वह आ गई.

"आप बैठो यहाँ दीदी. मई एक बार रेणुका बुआ का हाल पूछ औ फिर तैयार होकर स्टेडियम भी जाना है." वो खड़ा होता बोलै तोह ऋतू ने आँगन में गिरती हलकी बूंदा बांदी होती दिखाई. "मतलब बारिश में तू जायेगा?"

"माँ का तोह नहीं बना हुआ मई दीदी. छोटा हु लेकिन इंसान हे हु, पिघलने से रहा मई." मुस्कुराता हुआ वो सीधा उनके गले लगने के बाद बहार निकल गया. एक पल को ऋतू थोड़ा चौंक सी गई फिर एक मुस्कान के साथ अलका के साथ बैठ खाने हे लगी थी के सामने बैठी प्रियंका दीदी और आरती को अपनी तरफ देखता पाया.

"ऐसे क्या देख रही हो आप? अर्जुन हमेशा ऐसा करता है जब थोड़ा खुश होता है." ऋतू की बात पर दोनों भी मुस्कुरा दी लेकिन उन्हें ये नहीं पता था के ऋतू के दिल में चिंता के लहर उठ गई थी.

"बारिश हो रही है अलका तू एक बार मेरे साथ बहार चल वो कपडे उतार कर लाने है." वो अपना तोडा हुआ निवाला प्लेट में रखती वापिस कड़ी हुई तोह अलका न पल भर की देर न की ऋतू के साथ जाने की.

"अरे तुम दोनों खाना खा लो मई जाती हु." प्रियंका उठ भी न पाई थी की दोनों बहार चल दी.

"अर्जुन कुछ ठीक नहीं है अलका." बहार आँगन में कोई कपडा नहीं था. लेकिन ऋतू ने चिंता से अपने दिल की बात बताई तोह अलका भी परेशान हो गई.

"क्या लगता है तुझे की क्या परेशानी हुई होगी.?"

"ये जब साइकिल लेकर बहार से हे निकल गया था उसके बाद से लेकर अभी खाने के बीच ये जिसके साथ था वही परेशानी की वजह बता या हो सकता है. लेकिन हम में से कोई नहीं है ये पक्का है."

"सही कहा ऋतू. मई भी 2 घंटे प्रीती के घर थी और उसने बताया था के सुबह वो घर आया था तोह खुश था. उसके बाद तारा को छोड़कर हे आते समय वो उनके घर के बहार से हे दवा पकड़ा गया था. स्कूटर यही खड़ा था मतलब वो कही आसपास हे गया था. और जब तूने उसको साइकिल उठाने आते देखा तब भी वो ठीक था. लाइब्रेरी और घर के बीच में कुछ हुआ है. चल अभी अंदर चल और खुद उस से कुछ मत पूछना बस देख अगर कोई बात है तोह वह जरूर हम दोनों से घुमा फिर के करेगा हे."

उधर जब अर्जुन प्रीती के घर गया तोह डाइनिंग टेबल पर रेणुका बुआ बैठी थी और पारवती रसोईघर में थी.

"आप कैसी हो अब? ज्यादा बीमार हो गई क्या?" उनके बराबर आते हुए अर्जुन ने पाँव छूने का उपक्रम किआ तोह सेब छिलती रेणुका ने उसको गले से लगा लिए.

"अरे नहीं रे पागल. इतना कुछ भी नहीं था बस हल्का सा शरीर गरम हो गया था मौसम और .. लेकिन मई अब बिलकुल ठीक हु. परेशां मत हुआ कर तू इतना." अपनी बात थोड़ी बीच में अधूरी छोड़ कर अपने हाथ से एक फांक सेब की काट कर उसके मुँह में डालती वो बोली. बहोत प्यारी लग रही थी रेणुका इस समय. अर्जुन को पास में देख कर तोह चेहरे पर एक हाय की लाली और मुस्कान तैर गई थी.

"प्रीती कहा है?" अर्जुन ने धीमे से कहा तोह रेणुका बुआ मुस्कुराती हुई बोली.

"तू घबरा मत ज्यादा. वो अभी नाहा रही है और तेरे जाने के बाद मई अपने कमरे में सो गई थी जा कर. बस प्रीती ने सुबह मुझ से तेरी रात को बिस्टेर पर गिरी पट्टी दिखते हुए पुछा था तोह पापा ने हे उसको बताया था के रात तू उसके कमरे में सोया था और चोट आई थी तुझे छोटी सी तोह उन्होंने हे पट्टी की थी." रेणुका बुआ की बात सुनकर वो थोड़ा शांत हो गया.

"वैसे एक बात पूछ लू?" उनके इस प्रश्न पर अर्जुन के चेहरे पर भी मुस्कान आ गई और उसने सर हिला दिए साथ हे टेबल के नीचे से उनका हाथ अपने हाथ में थाम लिए.

"प्रीती और तेरा प्यार बहोत गहरा है न? और अगर ऐसा है तोह फिर हमने जो किआ वह सही नहीं हुआ इस वजह से. क्या होगा अगर उसको सब पता चल गया तोह?" रेणुका की बात साफ़ थी और स्वर बेहद नरम.

"वो समझदार लड़की है बुआ. उसको ये बात हरगिज़ दुखी नहीं करेगी इतना मुझे मालूम है. मेरे दिल में प्रीती की जगह कोई ले नहीं सकता वो भी ये जानती है और मई ये बात आपको भी बता रहा हु. आप को भी पता है के हमने जो किआ था वो ख़ुशी से हे किआ था और कोई वासना या मजे के लिए तोह नहीं. और प्रीती अगर आपको समझती है तोह वह इस बात पर चिंता नहीं जतायेगी." हाथ को पकडे हुए हे उसने ये बात कह डाली तोह रेणुका के चेहरे पर मुस्कान चौड़ी हो गई थी.

"प्यार तोह मई तुम दोनों का हे समझ गई थी जब उसने मुझे कसम दे कर तुम्हारी चोट का पुछा था मुझ से. और फिर तुम्हारी जीन्स को अपने हाथो से धोने के बाद जब प्रेस किया उसने तोह चूम रही थी अपने गले से लगा कर उसको. और देखो अब कैसे शर्मा रही है पीछे कड़ी." अर्जुन की इतना सुनकर हे फट के 4 हो गई थी. जैसे हे पीछे मुदा तोह प्रीती ने अपनी बाहें उसके गले में दाल दी. रेणुका बुआ दोनों को देखती बस खुश हो रही थी.

"तुम कबसे यहाँ थी?", अर्जुन को ऐसे हैरान परेशां देख कर प्रीती मुस्कुराती बोली, "आज पारवती और मुकेश तोह है नहीं फिर खाना मई बना रही थी. कभी अंदर देख लिए करो सिर्फ बर्तन की आवाज सुनकर अंदाजा लगा लेते हो." न प्रीती ने कोई ऐसी वैसी हरकत की थी अपनी बुआ के सामने न कोई सफाई पूछी थी. बस कुर्सी के पीछे कड़ी दोनों हाथ उसके गले में दाल कर कड़ी हे थी.

"वैसे अब झूट बोलने लगे हो मुझसे भी." प्रीती की इस बात पर वो निरुत्तर सा हो गया था. नजरे झुकने लगी तोह रेणुका बुआ वह से उठ कर अपने कमरे की और चली गई. प्रीती अब उनकी कुर्सी पर आ कर बैठ गई थी.

"पागल मई तुम्हारी चोट के बताये झूठ पर बोल रही हु. तुमने बुआ की जान बचाई लेकिन फिर भी ये बात छुपा रहे थे. और जब इतना प्यार और विश्वास है मेरे साथ तोह तुम्हे क्या लगता है तुम्हारी कोई भी बात मुझे दुखी कर सकती है?" अर्जुन का हाथ पकड़ कर प्रीती ने दूसरे हाथ से उसका चेहरा ऊपर किआ तोह वह हलकी नमी थी. उसको कस के गले लगाती वह भी चिंतित हो उठी.

"कोई और बात है न? तुम्हे पता है अर्जुन के मई तुम्हारे दिल को ाचे से महसूस कर सकती हु. बुआ ने जब खुद हे मुझे सब बता दिए था तोह वो बात इतनी बड़ी नहीं और मई भी खुश हु इस बात से. लेकिन अभी तुम जो नहीं बता रहे वह बड़ी बात है." अर्जुन सोच रहा था के वो ज्योति का जिक्र करे या न करे. फिर उठ कर उसको गले लगता वो बस गाल चूमकर बाथरूम में चल दिए. चेहरा धोने के बाद बहार आया तोह वह कोई उदासी न थी.

"बहार बारिश हो रही है तोह आज तुम घर रहोगी. स्टेडियम नहीं जाना और अपनी सहेली से बोल देना के अगर शाम को बारिश रुकेगी तभी वो मार्किट जा सकती है नहीं तोह सामान मई ले आऊंगा." प्रीती बुआ के लिए सहेली शब्द सुनकर शर्मा सी गई थी और उसके पीछे चलती गेट तक छोड़ने आई.

"मई ऋतू दीदी से बात करने जाउंगी थोड़ी देर बाद." प्रीती की चेतावनी ाचे से समझ गया था अर्जुन.

"उन्हें भी कुछ नहीं पता वैसे. लेकिन सही समय पर मई खुद बता हे दूंगा अभी मई स्टेडियम जा रहा हु. चाहो तोह बुआ को भी घर ले जाना." सड़क की तरफ जाता वो इतना हे बोलै और इस हलकी किनमिन बारिश में फिर साइकिल लेकर चल दिए था स्टेडियम की तरफ अपना बैग पीठ पर टाँगे.

.

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"कुछ भी बोल प्रीती ये लड़का हर तरह से तेरे हे लिए बना है. बस एक हे बात का थोड़ा डर है." प्रीती अंदर अपनी बुआ के बिस्टेर पर उनके पास बैठी थी.

"बुआ, किसी बात का डर नहीं है. और आप अकेली नहीं जो उसको दिल दे बैठी हो. वो है हे ऐसा के कोई कुछ कर हे नहीं सकता सिवा प्यार करने के उस से. लेकिन मुझे ख़ुशी है की वो मुझ से इतना प्यार करता है के किसी के सामने हाथ पकड़ने तक से डर जाता है. देखा नहीं था आपने कैसे सर झुका लिए था सिर्फ इस बात पर के मई पीछे कड़ी थी. अगर मेरा दिल उसके हे नाम की धड़कन लेता है तोह वो भी वैसी हे डोर से मुझ से जुड़ा है." प्रीती और अर्जुन का प्यार रेणुका बुआ को ाचे से पता चल गया था.

"तुझे बुरा नहीं लगा जब हम दोनों के बारे में मैंने बताया?"

"बुआ आप इतना कुछ सेहती रही तोह अगर उसने आपको ख़ुशी दी तोह इसमें बुरा क्या लग्न. ाची बात है न के आपने एक सही फैंसला लिए. वो कभी इन दोनों घर में फरक नै समझता. दादू को आपने कभी किसी को इतना प्यार करते देखा है क्या?"

"तू बहोत खुशकिस्मत है प्रीती. सच में तुझे ऐसा इंसान मिला है जो प्यार के साथ तेरी इज़्ज़त करता है. कल रात जिस तरह वो उन लोगो को मार रहा था मुझे एक पल के लिए तोह तेरी परवाह हो गई थी की कही ये लड़का तेरे लिए गलत न हो. बेशक प्यार करता है लेकिन फिर जो अभी देखा की कैसे वो तेरे सामने झुक गया तोह मेरा डर भी ख़तम हो गया."

"मई कुछ काम थोड़ी न हु फिर." थोड़ा सा इतराते हुए वो बोली तोह रेणुका बुआ ने नहले पर दहला सा मार दिए.

"एक बार उस घोड़े के नीचे आजा फिर देखना तू कितनी काम है या ज्यादा. तुझे तेरा सारा यूरोप न याद करा दे तोह बता देना." प्रीती शर्म से लाल होती बुआ के ब्याह पर हाथ मरती सी उनके साथ हे लिपट गई. "गन्दा हे बोलती हो आप."

"मेरी गुड़िया तू नाजुक सी है और वो ऐसा जिसने मुझ जैसी औरत को भी बुखार चढ़ा दिए." लहजा थोड़ा फ़िक्र वाला था उनका. पिछले 3-4 साल में इन दोनों के बीच भी एक पक्की सहेली सा रिश्ता बन चूका था. रेणुका की तोह कोई इतनी खास सहेली थी नहीं शादी के बाद से. और जैसे जैसे प्रीती बड़ी होने लगी थी तोह चंडीगढ़ रहने के समय इन दोनों में ाचा तालमेल बन गया था. यही वजह थी की वो ऐसी बातें कर लेती थी बेशक प्रीती शर्म जाती थी लेकिन उनकी बातें सुनकर मजा लेती थी वो.

"आप यकीन हे नहीं करोगी की वह मेरे साथ इतना डरता है के मुझे तोह ये लग रहा है कही शादी के बाद भी मुझे दर्द न हो जाये इसलिए वो कुछ करे हे न." ऐसे हे उनके साथ लिपटी वो बोली तोह रेणुका ने अपना चेहरा उसकी तरफ कर लिए.

"फिर तोह बस बहार वालियों की मौज होगी." वो हंसी तोह प्रीती भी उसके साथ मुस्कुरा दी.

"ाचा बुआ चलो उठो हम ऋतू दीदी के पास चलते है. आपको भी कुछ और दोस्तों की जरुरत है और उनसे बेहतर तोह कोई हो नहीं सकता." वो कड़ी होती बोली तोह रेणुका जी भी उसकी बात मानती उठ गई.

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"आज कोई नहीं है यहाँ?" स्टेडियम तक पहुँचते हुए बारिश तेज हो चुकी थी और वह लगभग ना के बराबर हे लोग थे. सिक्योरिटी वाले 4 लोग तोह गेट के अंदर हे बने छोटे से कमरे में चाय पीने में लगे थे और साइकिल स्टैंड लगभग खाली था. 200 साइकिल जहा रोज कड़ी होती थी वह सिर्फ 6-7 हे थी. खुल्ले भाग में होने वाले खेल के तोह सभी मैदान खाली पड़े थे. अर्जुन खुद से बात करता बस अपने बॉक्सिंग हॉल की और चल दिए. बैग पानी से सुरक्षित था लेकिन पहने हुए कपडे भीग गए थे. ऐसे हे अंदर आया तोह वह भी न बलबीर दिखाई दिया न हे कोई और. एक परचा लगा था वह बोर्ड पर जिस पे मॉटे पेन से लिहा था के 2 बजे के बाद की सभी प्रैक्टिस बंद है. और कल भी अवकाश रहेगा.

'गयम हे चलता हु फिर.' गीले कपडे वह जंजीर पर निचोड़ के टांग वह निक्कर और बिना बाजू की अपनी खुली टीशर्ट पहन छज्जे के नीचे चलता हुआ गयम की तरफ बढ़ गया. यहाँ भी ये पूरी तरह खाली थी लेकिन फिर उसकी नजर पड़ी एक मत पर लेते बलबीर पर.

"भाई तुम तोह यहाँ सोये पड़े हो." उसको हिलता वो बोलै तोह बलबीर उठ गया.

"यार आज भी तुम्हे चैन नहीं. मई तोह इसलिए आराम कर रहा था के आज प्रैक्टिस है नहीं और बहार मेरे कोई दोस्त नहीं है. हॉस्टल में भी ज्यादा लोग घर जा चुके है क्योंकि इम्तिहान भी ख़तम हो चुके है. सिर्फ वही है जो नेशनल या स्टेट चैंपियनशिप में भाग लेने वाले है." अर्जुन के साथ मशीन की तरफ चलते हुए वो अपनी कमर और बाजू हिलता सब बताने में लगा था. बलबीर को भी उसका साथ अब ाचा लगने लगा था. इस बहाने से अब वो चाहे थोड़ा हे सही लेकिन अभ्यास करने लगा था.

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अपने शरीर को गर्माने के बाद दोनों हे एक रोड में लोहे की प्लेट दाल कर बारी से छाती की कसरत करने लगे थे. अर्जुन आराम से 80 किलो तक वजन को संभाल रहा था और जब बलबीर की बारी आती तोह 15-15 की 2 प्लेट काम कर देते थे. अर्जुन अपना आखिरी सेट कर रहा था और उसका ध्यान ऊपर रोड पर हे थे लेकिन बलबीर थोड़ा सा चौंक गया दरवाजे के बहार कुछ देख कर. अर्जुन ें नीचे से हे उसकी आँखों को देखा और फिर गेट की तरफ तोह रोड को रखता वो बेंच पर बैठ गया.

"भाई क्या देख लिए? मुझे तोह नजर नहीं आया कुछ." अर्जुन की बात पर बलबीर ने उसको चुप रहने को कहा. इन दोनों की आवाज इस खली जगह में साफ़ पता चल सकती थी.

"धीरे बोल छोटे भाई. मुझे लगता है के कुछ पन्गा होने वाला है. अभी मैंने 3 लड़को को देखा. ये ####### अखाड़े के पहलवान है और दूसरे शहर के स्टेडियम से थे. जितना मेरा दिमाग कह रहा है तोह आज कुश्ती के हाल में सिर्फ विकास पुनिअ हे अभ्यास कर रहा है और ये तीन उसके हे हाथ पाँव तोड़ने आये है. दरवाजे के सामने हे वो कपडा बाँध कर आगे बढे है." अर्जुन फुर्ती से सीधा खड़ा हो गया बलबीर की बात सुनकर.

"बात विकास और स्टेडियम की है और भाई आप अभी तक खड़े हो?" अर्जुन दरवाजे की तरफ जाता बोलै तोह बलबीर ने हाथ पकड़ा.

"छोटे भाई होश में लड़ाई लड़ते है. मई जाता हु उधर मुँह पर कपडा बाँध के तू भाग के सिक्योरिटी वालो को बुला." बलबीर खुद हिम्मत दिखा रहा था जो बड़ी बात थी. लेकिन अर्जुन नहीं मन.

"आप उनको बुला कर लाओ मई चला उधर." उसके हाथ से कपडा चीन कर चेहरे पर लपेट वो दौड़ हे लिए तोह बलबीर भी बहार भगा. दोनों विपरीत दिशा में दौड़ लिए बिना बारिश की परवाह किये.

"बहनचोद तू गोल्ड जीतेगा? तेरी माँ छोड़ू साले. बिजेन्दर पहलवान के होते तू नेशनल खेलेगा. देखु आज कोण बचावेगा तन्ने यहाँ हड्डी चट्टान से." विकास के हाथ दोनों तरफ से 2 तगड़े दिख रहे पहलवान से लड़को ने पकडे थे और उन दोनों ने हे उसके घुटने जमीन पर दबा के उसको काबू किआ हुआ था. विकास के बालों को खींचता वो 6 फ़ीट से थोड़ा काम लेकिन तगड़े शरीर वाला हाथ में एक कस्सी का डंडा लिए खड़ा था. विकास के कान के नीचे से खून टपक रहा था लेकिन चेहरे पर कोई दर्द का भाव नहीं थी. इधर उस बिजेन्दर पहलवान ने वो डंडा हवा में उठाया हे था के उसका पूरा शरीर साथ में पड़े लोहे की अलमारी में जा लगा. बहार को निकली रोड जब उसके सर से टकराई तोह अनार के जूस का गिलास जैसे टूट गया उसके सर पे. अर्जुन उसको लिए हे जा भिड़ा था और मामूली सी चोट उसके हाथ में भी आई थी लेकिन अपना काम उसने कर दिए था जो इतने तगड़े इंसान के पांव जमीन से उखाड़ उसको धुल छठा दी थी. दोनों पहलवान हरकत में आये ये दृश्य देख कर लेकिन जैसे हे एक अर्जुन की तरफ बढ़ा तोह दूसरे पर विकास हावी हो गया था. पल भर में हे दूसरा जमीन पर पड़ा था और उसकी गर्दन विकास के घुटने के नीचे.

"कोण है बे तू? बचेगा नहीं याद रखिओ." नीचे पड़ा बिजेन्दर तड़पता हुआ बोल रहा था. सर का खून अब आँखों और चेहरे पर भी फ़ैल चूका था. इधर वो दूसरा पहलवान अर्जुन की तरफ आया तोह दोनों के हाथ एक दूसरे की गर्दन पर शिकंजे से कास गए. बराबर कद और शरीर लेकिन एक अनुभवी पहलवान और दूसरा नौसिखिया मुक्केबाज. गले की नस्से उभरने लगी तोह अर्जुन ने दूसरा हाथ भी उसकी गर्दन पर दबा दिया लेकिन वह भी तैयार था. बीच में हे उसका हाथ अपने हाथ में पकड़ कर वो दोनों बस एक दूसरे को रोक कर खड़े थे. 'अपना हाथ चलने से बेहतर है के कंधे का जोर लगा कर बस हाथ को एक सही कोण से अपने प्रतिद्वंदी के संवेदनशील भाग पर कमर के ऊपरी हिस्से में मारो. दिल की तरफ की पसली, कंधे का जोड़ और नाक की हड्डी एक सही वार से पल भर में चटक सकते है.' कोच साहब के बात दिमाग में घूमते हे अपनी तरह उसका गाला खींचते अर्जुन ने उसके गले से सीधा हाथ झटके में छोड़ दिए और उसके दिल पर एक भरपूर मुक्का बची खुची ताकत से दे मारा. इधर वह नीचे गिरा था और बिजेन्दर अर्जुन को पकड़ने लगा था के बलबीर और 7-8 गार्ड डंडे लेकर उन्हें घेर खड़े हो गए.

"कोई हिला तोह तीनो यहाँ से बहार अपने पैरो पर नहीं जाओगी." बलबीर ने चेहरा ढके हुए ये बात कही तोह बिजेन्दर समझ गया था के वो फंस चुके है और स्टेडियम में इतना संगीन जुर्म करने के लिए अब उसका पहलवानी का सफर खतरे में आ चूका है. विकास जब उठकर खड़ा हुआ तोह नीचे पड़ा पहलवान भी बेहोश हो चूका था. अर्जुन ने भी जिसकी पसली पर वॉर किआ था वह चाह कर भी उठ नहीं प् रहा था. अगले 2 मिनट में हे वह पर स्टेडियम के प्रबंधक, मुख्या सुरक्षा अधिकारी, कुश्ती और बॉक्सिंग के प्रमुख कोच उपस्तिथ थे. तीनो लड़को के हाथ पीछे रस्सी से बाँध कर साथ में लाये गए डंडे और लोहे की रोड को प्लास्टिक में लपेट वो सब बहार चल दिए. सिवाए 2 कोच और विकास, बलबीर और अर्जुन के.

"अपने चेहरे से ये कपडा उतारो." कुश्ती के कोच ने ये बात कही तोह बलबीर और अर्जुन ने कपडे हटा लिए. संधू साहब शरीर से तोह अनुमान लगा चुके थे लेकिन वो चुप थे.

"तुम यहाँ कब से हो? और ये सब क्यों किआ.?" उनका सवाल शांत लहजे में था.

"ये मेरा छोटा भाई है कोच साहब और ये बड़े गुरूजी से मुक्केबाजी का प्रशिक्षण ले रहा है. मई इधर अभ्यास कर रहा था और ये अपने हॉल में." विकास अर्जुन के कंधे पर हाथ रख के बोलै. अर्जुन भी अपने हाथ में पकडे कपडे को उसके कान के ऊपर दबा के खड़ा हो गया जहा से खून आ रहा था हल्का.

"संधू यार तेरे लड़को ने आज मेरा पहलवान बचा लिए भाई. देख इतनी बारिश में भी ये नियम के पक्के है." ये कोच सहः हाथ जोड़ कर संधू जी को धन्यवाद् करने लगे तोह उन्होंने बस हाथो को पकड़ कर इतना कहा, "अपने बचे है जे सारे. जितने मेरे उतने आपके. अब आप बस इसका उपचार करवाओ जी मई जरा ऑफिस के हाल ले लू के उन बदमाशों को सजा कैसे देनी है." विकास अर्जुन और बलबीर को मिलने का बोल कर बहार निकल गया अपने कोच के साथ तोह संधू जी ने अर्जुन का कान उमेठ दिए.

"मोहम्मद अली बन गया क्या तू 10 दिन में जो पहलवानो से भीड़ गया?"

"सर, आपने हे तोह कहा था के ये बचाव करने के लिए हे सिखाया जाता है. मैंने भी सोचा के 10 दिन का अभ्यास परख लू के कही कमी न रह गई हो." अर्जुन अपनी मुड़ी हुई गर्दन से हे बोलै तोह वह हँसते हुए उसके कंधे पर हाथ लिए बहार आ गए. "बलबीर आजा तू भी. ाचा काम किआ बीटा तुम दोनों ने."

"धन्यवाद गुरूजी. लेकिन आज मैंने ज़िन्दगी में पहली बार देखा जी के एक मुक्के में 6 फुट का पहलवान जमीन पे गिर गया." बलबीर की बात पर कोच संधू वही रुक गए.

"क्या बोल रहा है तू?"

"जी गुरु जी. इसने वो जो जमीन पर पड़ा था न उसकी पसली में एक हे धरा था और वो कटे कबूतर सा नीचे फड़कने लग रहा था. सही बोल रहा हु गुरूजी. आप खुद हे सोचो के विकास तोह एक पहलवान से हे भिड़ा जिसको वह आखिरी तक पकडे था. इसने तोह इसका मतलब दूसरे कास सर फाड़ दिए था और एक नीचे गिरा दिए." बलबीर कहानी सुनाता सा बोलै और इधर विकास आ गया था साफ़ रूई कान पर दबाये.

"ठीक बात कह रहा गुरूजी बलबीर. मई तोह मासूम समझ रहा था इस बचे को ये तोह जानवर है. बिजेन्दर 85 किलो की वैघ केटेगरी का और कोई 12 साल अभ्यास कर चूका पहलवान है. लेकिन उठा के दे मारा दिवार में और सर खोल दिए एक बार में. जहा तक दूसरे वाले का सवाल है वो भी इस बार नेशनल में हैवी वेट में खेला था. लेकिन टकड़ा घुसंड मारा लड़के ने बखिया हिला दी. रो रहा है वह ऑफिस में. और आपको बुला रहे जी वह पर विटनेस सिग्नेचर के लिए. इन दोनों का नाम नहीं है कही."

"परसो से तू सिर्फ मेरे साथ अभ्यास करेगा और बलबीर आज गरम पट्टी बाँध लिओ तेरे हड्डियां भी टूटेंगी अब." दोनों के सर पे हाथ फेर के वो चल दिए प्रधान ऑफिस की तरफ.

"कटाई रावण आदमी है भाई तू तोह. बहनचोद कोनसी डाइट ले रहा तू." छज्जे के नीचे बानी 3 लम्बी सीढ़ियों पर बैठ गए तोह विकास आभार और प्यार से अर्जुन का गाला बाहों में लेते बोलै.

"विकास भाई पहले मई आने लगा था आपके पास. लेकिन ये दौड़ गया और सही भी किआ. नहीं तोह हम दोनों हे पड़े होते जमीन पर." बलबीर की बात पर विकास मुस्कुरा दिए और उस से हाथ मिलाया. बलबीर आज हवा में उड़द रहा था क्योंकि ये िस्नान स्टेडियम की शान और बहुत हे काम बोलने वाला उसके साथ बैठा उसकी हे बोतल से पानी पी रहा था.

"भैया खता तू वही हु जो सब खाते है. लेकिन आपने रावण क्यों कहा मुझे?" अब रामायण पढ़ने वाले अर्जुन को तोह ये उदहारण समझ न आया. उसकी बात पर वो दोनों हंसने लगे.

"भाई रावण का मतलब एक ताक़तवर और होशियार इंसान. खुद हे सोच के जिसको मारने खुद भगवन विष्णु जी को अवतार लेना पड़ा वह कोई मामूली तोह था नहीं. हनुमान जी न मार पाए थे भाई उसको. लेकिन रावण पुराण के अनुसार वो अत्याचारी नहीं था. सबसे ज्यादा ज्ञान वाला व्यक्ति था. इतना ग्यानी के दस सर में उतना ज्ञान समां सकता वो उसके एक अकेले के पास था. लेकिन उस से कही बढ़कर था उसका अपने से बड़े शूरवीरो से भीड़ जाना और उन्हें हरा देना. कभी पढ़ लिओ ाची किताब है वो भी. और आज तूने भाई मेरी जान हे खरीद ली. चाचा का तोह पहले हे मई कर्जदार हु लेकिन जो आज तू कर गया वो मेरी ज़िन्दगी से ऊपर है भाई. ये नेशनल खेलते हे पुलिस कोटा मिल जायेगा और ज्यादा ाची तैयारी कर सकूंगा फिर एशिया, यूरोप खेलने की."

"आपको देखता हु तोह लगता है के आप मेरे हे जैसे हो शायद कही गहरा रिश्ता जरूर है. बस फिर डर नहीं लगता." अर्जुन ने पहली बार विकास को गले लगा लिए तोह वो उसका सर सहलाने लगा ऐसे हे चिपकाए हुए. बारिश रुक गई थी बस कुछ बुँदे थोईड बहोत कभी कभी गिरती. इस सब के बीच 2 जोड़ी आँखें इधर देख रही थी.

"चल अब खड़ा हो भाई. खून सुख गया तोह अब एक बार दिखा आऊं अपनी चोट. और बलबीर भाई बड़ा शुक्रिया आज के लिए." विकास उस से हाथ मिला कर वह से चल दिए तोह बलबीर बोलै, "भाई मजा आ गया छोटे आज तोह. यार ये आदमी अब अपना दोस्त है." उसकी खुसी देख अर्जुन भी हंस दिए.

"मतलब मेरी दोस्त ाची नहीं लगती आपको?"

"अरे भाई तू तोह उसका भी उस्ताद निकला. लेकिन भाई विकास के साथ रहने के और बात करने के फायदे फिर बताऊंगा तुझे. चल हम भी चलते है." उसका हाथ पकड़ कर उठाने लगा तोह बलबीर ने देखा की उंगलिया सूजी हुई थी.

"ओह भाई. मेरे साथ चल जल्दी तू." वो जल्दी से उसको लेकर बॉक्सिंग हाल के कोने में रखे पुराने फ्रिज के पास आया और बर्फ निकल कर उसकी उँगलियों पर रगड़ने लगा.

"ये क्या है भाई?' अर्जुन की बात उसने अनसुनी कर दी और रगड़ के बर्फ दोनों हांथों की सभी उँगलियों पर मलने लगा.

"एक बार घर जा के बर्फ के पानी में उंगलिया दाल लिओ और फिर कपडा लपेट लिओ. शायद दिवार में लगने से फूल गई. ज्यादा वजन न डीओ भाई इनपे 24 घंटे." फिर दोनों वह से एक बार गले लग के निकल लिए. अर्जुन अपने गीले कपडे बैग में दाल कर अभ्यास वाली ड्रेस में हे साइकिल स्टैंड की तरफ चलने लगा तोह कुछ हे दूर पर मंजूबाला कड़ी दिखी एक और लड़की के साथ. नीले रंग की छतरी लिए थी.

"क्या हाल है अर्जुन? कल भी दिखाई नहीं दिए." मंजू के पास वो पंहुचा तोह शिकत सुनी.

"अब जब पता होता है के मई यही होता हु तोह फिर ये सवाल शायद गलत है. कल तुम गायब थी और मई यही था." उसने मुस्कुराते हुए हाथ मिलाया तोह ध्यान दिए साथ वाली लड़की पर. लम्बी और गोरी. कुछ उठी छातियां और गोल आकर्षक चेहरा.

"वो कल और आज हमारी प्रैक्टिस नहीं थी. ये मेरी सहेली है चांदनी. चांदनी ये मेरा दोस्त है अर्जुन." मंजू की आवाज में नजाकत थी इस समय जो उसकी सहेली भी देख रही थी. " Hello मिस चांदनी." हाथ मिलते हुए उसने ये बात कही तोह लड़की ने ाचे से उसका हाथ दबा लिए. "वैसे तुम दोनों कितनी देर से देख रही थी वह जो कुछ हो रहा था." अर्जुन की बात सुनकर दोनों एक दूसरे का चेहरा हैरानी से देखने लगी.

"तुम्हे पता चल गया था?" चांदनी ने ये बात कही तोह अर्जुन के चेहरे पे विजयी मुस्कान थी जो सब कह रही थी.

"पता चल गया था जब गार्ड अंदर आये और तुम दोनों ये नीली छतरी झाड़ियों के ऊपर किये अंदर देख रही थी. फिर वह भी जब मई विकास भाई और बलबीर के साथ बैठा था. लेकिन पिछले हफ्ते तुम शायद तीन लड़कियां थी जब मई और बलबीर अभ्यास कर रहे थे." अर्जुन की हर बात उनके दिमाग हिला रही थी.

"इतना सब एक साथ कैसे कर लेते हो?" मनुजे ने चांदनी का हाथ उसके हाथ से हटते हुए खुद पकड़ कर कहा तोह चांदनी थोड़ा हंस पड़ी.

"ऐसा है न जो लोग करीब हो वो कुछ भी करे पता चल हे जाता है." अर्जुन ने थोड़ी ढिठाई दिखते धीरे से उसको अपने और पास कर लिए तोह मंजू के रोंगटे खड़े होने लगे थे. जगह बेशक खाली थी और आज वह कोई था भी नहीं लेकिन साथ में हे उसकी सहेली भी थी जिसके सामने वो कह चुकी थी की उसका कोई खास लेना देना नहीं है इस लड़के से.

"वो.. वह.. बात ये थी के ये तुमसे मिलना चाहती थी." अपनी जान छुड़ाने के लिए वो इतना बोल तोह गई लेकिन अब उसका चेहरा बिलकुल पास आ चूका था अर्जुन के और हाथ अपनी छाती पर रख लिए था मंजू का उसने.

"तुम्हे नहीं मिलना था?" अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते कहा तोह मंजू ने अपनी बड़ी बड़ी आँखें झपका दी लेकिन उसकी आवाज दिल में अरमान जगाने लगी थी.

"मुझे लगता है के मंजू तू पहले ाचे से मिल ले अपने 'दोस्त' से." चांदनी हंसती हुई जाने लगी तोह अर्जुन ने मौके की नजाकत समझते हुए उसका हाथ छोड़ दिए.

"ऐसी कोई बात नहीं है चांदनी जी. ये लड़की पहले लड़की काम और तूफ़ान ज्यादा थी और बस मैं इसको सिर्फ असलियत बता रहा हु की तूफान कैसे काबू किआ जाता है."

"देख लिए मैंने भी के ाचे तूफान संभल लेते हो. लेकिन ये कह रही थी की तुम सिर्फ इसके दोस्त हो." चांदनी की इस बात पर मंजू ने उसकी तरफ देखा, जाने किस नजर से.

"है और तूने फिर कहा के तुझे ये लड़का पसंद है और तुझे इस से दोस्ती करनी है. ले अब कर ले तू बात और दोस्ती. मुझे कोई परेशानी नहीं है." मंजू इतना स्पष्ट बोल देगी, चांदनी को उम्मीद नहीं थी. वो वही कड़ी रही तोह अर्जुन हे बोलै.

"देखिये ये मेरी दोस्त है तोह आप भी मेरी दोस्त हुई इसकी सहेली होने के नाते. और आप मुझ से खुल के बात कर सकती है कभी भी. अभी मई निकलता हु लेकिन कल मेरा अभ्यास नहीं है." वो इतना बोलकर जाने लगा तोह मंजू ने कलाई थाम ली.

"परसो मुझे गाँव जाना है. मिलने आओगे?" इस बार सच में विनती सी थी मंजू के लहजे में और अपनी सहेली की कोई परवाह नहीं थी.

"आऊंगा भी और अगर कहोगी तोह बस में खुद बिठाने चलूँगा." आँखों में देखते हुए उसने मंजूबाला के गाल पर हाथ रखा प्यार से तोह वो एक पल उसके गले लग गई फिर अलग होती हुई bye बोलकर चांदनी के साथ चल दी. अर्जुन भी स्टैंड की और मुस्कुराता हुआ चल दिए.

"कितना झूट बोलने लगी है ऋ तू अपनी सहेली से भी." चांदनी उसका हाथ पकडे उसके साथ धीरे धीरे स्टेडियम के दूसरी तरफ बने गर्ल्स हॉस्टल जाती बोली.

"झूट कब बोलै मैंने? बताया तोह था के मेरा दोस्त है." मंजूबाला की धड़कन अभी तक तेज थी.

"तेरी आँखें जो कह रही है वह कुछ और बात है. प्यार करती है न तू उस से और वैसे वो भी तेरी परवाह करता है." चांदनी की बात से थोड़ी रहत मिली उसको.

"पूरा सच नहीं पता तुझे. एक और लड़की है चांदनी अर्जुन की ज़िन्दगी में. और जितनी मुझे समझ है उन दोनों का रिश्ता प्यार से ऊपर का है. दोनों एक हे जैसे है के कोई भी उनसे प्यार किये बिना न रह पाए. वो लड़की खुद मुझ से एक पल में घुलमिल कर बात करने लगी थी, इसके हे साथ खड़े हुए. मई नहीं चाहती के की मई बीच में आऊं उन दोनों के लेकिन दिल कहता है के ज़िन्दगी भर का साथ जब मुमकिन नहीं तोह जितना वो हक़ से दे रहा है उतना मिलना भी बहोत है." अपनी गुस्सैल सहेली की ऐसी गहरी बात पर चांदनी भी खो सी गई.

"तेरी बात बिलकुल ठीक है मंजू. जब कुछ मिल रहा हो तोह जितना नसीड दे उतना हे ठीक है. ाची बात है और वैसे अगर थोड़ा प्रसाद गरीबों के लिए बच जाये तोह मेरा भी ख़याल रखना.' गंभीर बात को पल भर में हंसी से भर दिए उसने.

"ले लिओ तू भी उसका. मन तोह करने से रहा जब सामने से लड़की हे खुद चल के आएगी तोह. बस वैसा हाल न कर दे जैसा उन लड़को का किआ था." मंजू की बात से उसका भी ध्यान वह लड़ाई पर गया.

"कसम से यार. मतलब विकास, जो मेरा पहला सपनो का प्रेमी था उसकी जान इस लड़के ने बचाई. और कैसे वह इसको अपना भाई बता रहा था और दोनों में इतना प्यार. कोई बात तोह जरूर है. और फिर अगर मेरी लेते हुए वो मुझे मार भी देगा तोह सौभाग्यशाली कहलाउंगी. हाय." चांदनी भी पक्की हरफनमौला थी. दोनों सहेलिया ऐसे हे निकल गई.
 
अपडेट 43

गन्धर्व विवाह


इधर अर्जुन घर आया तोह संजीव भैया की कार घर के बहार हे थी. मतलब भैया और तारा दोनों आ गए थे. वो आँगन में कुर्सी पर रखे तोलिये को उठा के खुद को साफ़ करता अंदर आया और जूते उतार कर सीधा बाथरूम में घुस गया.

"अर्जुन, दूध बना रही हु. कपडे बाद में पहन लेना पहल अपना दूध पी बहार आ के नहाने के बाद." ऋतू दीदी ने साफ़ पजामा दरवाजे के बहार लटकते कहा. 5 मिनट में हे अर्जुन पानी गिरा कर बहार आया और तोलिये के ऊपर से हे पजामा पहन कर बाल सूखता कुर्सी पर बैठ गया.

"दीदी आप क्या कर रही हो?" अलका को गुदगुदी करते उसने पुछा तोह किताब को टेबल पर पटकती वो हंसती हुई खुद को छुड़ाने लगी.

"हाहाहा. ऋतू ये मार खायेगा देख. बच्चू तू रात में मिल फिर बताती हु तुझे." अगली बात झुक कर उसके कान में कही तोह अर्जुन ने एक बार सूट के अंदर झाँक कर दोनों गोर उभर देखे फिर ना में गर्दन हिला दी.

"कल आप ऊपर बाथरूम साफ़ करने आओगी 9 बजे." और अपना गिलास पकड़ लिए इधर ऋतू दीदी के हाथ से.

"क्या कह रहा है ये?" वो मुस्कुराती हुई अलका से बोली तोह अलका आँखें नाचती सी गर्दन ना में हिलने लगी.

"पक्के ड्रामेबाज हो तुम दोनों. और तू ये लड्डू पूरा खाया कर ठीक है न. आज सुबह इसका एक टुकड़ा गमले में पड़ा दिखा मुझे. अलका अपने सामने ख़तम करवा ये. मई भैया के लिए चाय बनती हु." जाती हुई वो कान खींच गई थी अर्जुन के.

"तू बच के रहा कर इस से. हर बात का पता होता है तेरी ऋतू को." अलका की बात पर अर्जुन कुछ सोचता रहा.

"दीदी, एक बात केहनी है. हो सके तोह आप ये ऋतू दीदी को भी बता देना." अलका को महसूस हुआ था के अब ये शायद वही बात करेगा जो वो दोनों चाहती थी.

"है बोल न भाई." उसके सर पे हाथ रखती वो उसके गंभीर चेहरे की और देखती बोली.

"आप उस ज्योति से दूर हे रहना प्लीज. वो ाची लड़की नै है और ये कोमल दीदी को भी समझा देना." उसकी बात पर अलका गौर से उसको देखने लगी.

"तू उस लड़की से मिला था? जानती हु तेर दोस्त की बहिन है लेकिन मुझे और ऋतू दोनों को पता है के वो ठीक लड़की नहीं है. कोमल दीदी को मई समझा दूंगी लेकिन तू मुझे बता के ये बात कैसे कही तूने?" कुछ देर के लिए वो चुप हो गया.

"मैंने उन्हें अलग अलग लोगो के साथ देखा है." और फिर से शांत हो गया. दोनों हे हलकी आवाज में बात कर रहे थे.

"वो उनके साथ वाले घर में जो आदमी है जिसके एक 2 साल की बेटी है उसके साथ? या फिर वो कार वाला अंकल जिसकी कार पर Taneja's लिखा है?" अर्जुन के तोह होश उड़द गए इतना सही अनुमान अपनी बड़ी बहिन का देख के. लेकिन ये पहला आदमी वो नहीं जानता था. जानता था भी तोह ज्योति ने उसका जिक्र नहीं किआ था.

"आपको कैसे पता ये सब?", एक डर था उसकी आवाज में अब.

"घबरा मत भाई. तेरी बहने सिर्फ तेरी है. और रही बात उस लड़की की तोह उसके किस्से कॉलेज तक है क्योंकि वही से वो उस कार वाले के साथ जाती देखि है कई बार हमने. और जो उनके पड़ोस में रहता है उसकी बीवी ने एक बार खुद हे पकड़ लिए था दोनों को लेकिन ये बात सिर्फ उन्होंने मेरी माँ को बताई थी होली की पूजा के दिन. वो भाभी तोह बड़ी ाची है लेकिन ज्योति को हर तरफ सिर्फ मर्द हे नजर आते है जो उस से बड़े हो और .." अलका की आवाज में गुस्सा आ गया था.

"चल छोड़ ये सब और कभी मत जाना उसके आसपास. अगर उसने कुछ कहा तोह फिर देख मई क्या हाल करती हु उस बदचलन का." अलका दीदी की बात पर अर्जुन अब थोड़ा शांत महसूस कर रहा था. काश वो पहले कभी अपनी दीदी से ये सब बात कर पता तोह ये हाल न होता.

"दीदी क्या मई आगे भी आपसे सलाह ले सकता हु?" नजरे नीचे किये उसने ये बात कही थी अलका भी समझ गई थी की उसका ये नादान भाई क्या कह रहा है.

"देख तू हमेशा हर बात मेरे साथ या ऋतू के साथ कर सकता है. वैसे ज्यादातर हम दोनों को पता होती है लेकिन जब उनमे तेरी गलती नहीं दिखती तोह कुछ कहती नहीं. ऐसा होता तोह जरूर तेरी क्लास लेती. तारा और माधुरी दीदी. बस एक बात का ध्यान रखना के दीवारों के कान दीखते नहीं." अर्जुन को करंट लगा उनकी बात सुनकर और वो बस मुस्कुराती हुई उसके हाथ में आधा बचा लड्डू मुँह की तरफ कर के उठ गई.

"चल ये ख़तम कर और रेणुका बुआ के पास जा. भैया से पूछ लू के रात को क्या बनाना है वो अपनी कंपनी की फाइल बना रहे है."

"ये तोह सच में जेम्स बांड है." अर्जुन इतना कहकर लड्डू ख़तम करके उठ गया.

"प्रीती बोल कर गई थी के शादी में जाने के कपडे तैयार कर दू तेरे कल रात के लिए. बता देना जब आएगा या कल सुबह." ऋतू दीदी ने उसको जाते देख कहा तोह हाथ हिलता वो निकल गया.

'इतने समय से मई सोच रहा था के सब तरफ मई ध्यान दे रहा था. हलकी सी आवाज से लेकर सबके hav-bhav तक. और यहाँ तोह ये पहले से सबकुछ जानती है. ऋतू दीदी भी जानती है मतलब हुआ के प्रीती को भी पता होगा.' अर्जुन के कदम जैसे अपने आप हे चल रहे थे. सबसे बड़ा झटका था उसके लिए अब तक का ये की वो घर में रहने वाली अपनी पढ़ाकू बहनो को कमतर आंक गया. 'वह कुछ भी कहो. सवा शेर है ये तीनो.'

"बुआ आपका लाडला आ गया है." प्रीती ने अर्जुन को देख कर मुस्कुराते हुए आवाज दी

"5 मिनट में आई मई अभी." कमरे से हे उन्होंने कहा तोह प्रीती ने इशारे से अर्जुन को कपड़ो की तरफ दिखाया. और हंसने लगी. चप्पल, पजामा और ऊपर से उघडे बदन.

"ओह सॉरी. याद नहीं रहा ये सब कैसे हो गया. वो मई वो." अर्जुन की तोह घिग्गी बांध गई जब उसने अपनी हालत देखि

"मेरे कमरे में जीन्स है तुम्हारी और तुम वह जाओ मई पापा की टीशर्ट देती हु तुम्हे." हंसती हुई वो अर्जुन को अपने कमरे में धकेल कर पिछले कमरे में चली गई. अर्जुन वह बस ऐसे हे खड़ा रहा. इतना बेवकूफ है के गली में हे ऐसे आ गया.

"अरे ये क्या ऐसे हे खड़े हो?"

"वो तुम्हारी अलमारी में तुम्हारे कपडे भी होंगे." उसकी बात पर थोड़ा शर्माती वो खुद उसकी जीन्स निकल कर देने लगी. एक कालर वाली संत्री रंग की टीशर्ट, जो एक ाचे कपडे की थी बिस्टेर पे ला राखी थी उसने. अर्जुन ने पहले टीशर्ट पहन ली फिर वह प्रीती के चेहरे की तरफ देखने लगा.

"अब मई बहार जाऊ?" प्रीती ने हँसते हुए कहा तोह अर्जुन ने शर्म से सर हिला दिए.

"पक्का लड़की हे हो तुम." बहार जाती वो दरवाजा बंद कर गई तोह जल्दी से पजामा निकल कर जीन्स पहन ली. कच्चा नहीं था अंदर और इस बात से हे वो डर रहा था प्रीती की उपस्थिति में.

"हो गए तैयार?" वो बहार आया तोह प्रीती ने कमरे के अंदर जा कर उसका पजामा ाचे से तेह लगा के अपनी अलमारी में रख दिए. फिर बहार आई तोह उसके कालर को सही करती हाथो से बाल ठीक कर उसका चेहरा देखने लगी.

"अब ठीक लग रहे हो."

"ऐसे ख़याल रखती हो तोह फिर मेरे इरादे बदलने लगते है." उसके इतने प्यार को देख अर्जुन बोलै लेकिन यहाँ फिर प्रीती को एक मौका मिल गया था.

"इरादे देख लिए मैंने ाचे से. अभी थोड़ी देर पहले जिस तरह तुम शर्मा रहे थे और डर रहे थे. लगता है की मई यहाँ लड़का और तुम लड़की हो." प्रीती की बात पर अर्जुन ने उसको अपनी तरफ खींच लिए जैसे बताना छह रहा हो के लड़का कोण है लेकिन दरवाजे की आवाज हुई तोह पीछे हट गया..

"हाहाहा. हवा निकल गई एकदम से पहलवान की." प्रीती वह से निकल कर बहार भाग गई.

"ाचा तुम बैठो बस मई बालो में रबर लगा लू." रेनुकू बुआ बहार आई तोह एक सादे से सफ़ेद लम्बे कुर्ते और वैसे हे रंग की ढीली सलवार में थी. दोनों कड़क प्रेस किये हुए थे. कमीज पर हल्का हल्का फूलो वाला डिज़ाइन प्रिंट था. इतनी सादगी में भी वह कमाल हे लगती थी. जब वही आईने के सामने वह बालो में कंघी कर रही थी तोह दोनों उभर हाथो की हरकत से हिलते डुलते जिन पर अर्जुन की नजर जम्म सी गई थी. रेणुका जी उसकी इस हरकत को देखती बस मुस्कुराती हुई बाल सीधे कर जब उनमे सफ़ेद बड़ा रबर डालने लगी तोह कमीज के साथ हे दोनों उभर एकदम से तन्न गए.

"शीशा तोड़ने का इरादा है क्या?" आईने में उनके चेहरे को देख अर्जुन शर्मा गया. बिना लिपस्टिक के भी एक दम गुलाबी होंठ और वो कला टिल कितना जानलेवा था.

"ये लो जनाब अपने जूते पहन लो और ये रहा पर्स जो भूल आये थे आप." जूते नीचे रखती वह स्कूटर की चाबी और पर्स अर्जुन को थमती बोली तोह रेणुका जी ने भी प्रीती की तरफ थोड़ी हैरत से देखा.

"ये ऐसे हे आ गया था क्या यहाँ.?"

"नहीं. जब आया तब बड़ा स्मार्ट लग रहा था बुआ. आपने मौका खो दिए बस अब जाने दो." प्रीती की इस नटखट मुस्कान पर एक बार फिर अर्जुन शर्मिंदा सा हो कर जूते पहन ने लग गया.

"ाचा वो बुआ मेरे लिए न एक पलाइन कॉटन टीशर्ट ले आना अगर मिल जाये तोह, वाइट या लाइट येलो और कम्फर्टेबले हाफलपाणट्स. मौसम बदल रहा है न फिर गर्मी में तोह पजामा नहीं ठीक लगता." उसने ये बात बोली और ऋतू दीदी के घर जाने का कह वापिस बहार निकल गई अर्जुन को हाथ हिलाते हुए.

"सुन लिए तूने तोह याद रखना के क्या लेना है. और अभी थोड़ी देर पहले क्या देख रहा था तू?" नकली गुस्सा चेहरे पर लाती रेणुका शायद अर्जुन के मजे लेने के मूड में थी. पर्स पिछली जेब में दाल कर अर्जुन ने सीधा अपने हाथ उनके उभारो पर रख दिए जो अंदर ब्रा में क़ैद थे. पीछे से वो उनकी नरम गांड को महसूस करता खड़ा हो गया.

"शायद आपको जवाब मिल गया होगा के क्या देख रहा था." और उनके रबर में बंधे नीचे से खुले बाल एक तरफ करता ठीक टिल के ऊपर प्यार से होंठ रख के खड़ा हो गया. रेणुका तोह किसी nai-naveli दुल्हन सी शर्माती हुई सिमट के कड़ी हो गई.

"ाचा अब चलिए साढ़े 6 यही हो गए है. मार्किट बारिश के चक्कर में जल्दी बंद न हो जाये? वैसे अभी मौसम साफ़ है." एक बार उनकी पतली गर्दन को चूमते हुए वह बहार आ गया तोह मुस्कुराती शर्माती सी रेणुका टेबल से सफ़ेद दुपट्टा उठा कर बहार आ गई उसके पीछे. दोनों हे उसके घर की और चल दिए जहा से स्कूटर लेना था.

"मार्किट जा रहा है अर्जुन? अगर ठीक लगे तोह तारा कार चला के ले जाएगी आप लोगो को." बहार संजीव भैया थे आँगन में जिन्होंने दोनों हाथ जोड़कर रेणुका जी को प्रणाम किआ तोह उन्होंने भी अभिवादन किआ.

"नहीं संजीव, मार्किट के हिसाब से ये बिलकुल ठीक है. कार हमे शायद कल चाहिए हो अगर तुम्हे कही नहीं जाना तोह." रेणुका जी घर के बड़ो को तोह ाचे से हे जानती थी क्योंकि aana-jaana काफी बरसो से था यहाँ. संजीव भैया भी उन्हें अपने बचपन से जानते थे और वैसे हे इज़्ज़त देते थे.

"नहीं बुआ जी, अगर कही जाना भी हुआ तोह कल स्कूटर मई ले जाऊंगा. और अगली बार आप आएँगी तोह ये भी आपको कार चलता मिलेगा." एक बार अर्जुन के सर पर हाथ रख के वो अंदर चले गए और ये दोनों स्कूटर पर बैठ मार्किट की और.

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"तू सही थी ऋतू, वो अर्जुन जिस बात से परेशां था उसने मुझे बता दिए." कमरे में सिर्फ प्रीती, ऋतू और अलका थे. प्रियंका और आरती संजीव भैया के साथ अभी मार्किट निकल गए थे और तारा ऊपर अपने कमरे को बंद कर किसी काम में व्यस्त थी.

"है तोह क्या बताया उसने? ऋतू दीदी की बात पर प्रीती ने भी अलका के चेहरे को देखा.

"यार उसने जैसा बताया की ज्योति ाची लड़की नहीं है और हमको उस से दूर रहना चाहिए, बात उतनी नहीं है. तू और मई तोह उस लड़की की काली करतूत जानते हे है लेकिन जहा तक मुझे लग रहा है अर्जुन ने उसको रेंज हाथ पकड़ लिए होगा आज. वो भी उस अंकल के साथ जो कॉलेज के चौंक तक आता था."

"हम्म्म.. है पैदल वो अपने दोस्त के घर हे जाता है. और एक हे दोस्त है तोह शायद वो घर में भी आजादी से आता जाता लगता होगा. लेकिन बात सिर्फ पकड़ने की तोह नै लगती." ऋतू को अभी भी अर्जुन की वो बेचैनी महसूस हो रही थी उस समय गले लगने पर जो दिल ने महसूस की थी.

"शायद अर्जुन की फीलिंग्स आत्ताच थी उनके साथ तभी सुबह वह अंदर नहीं आया था और वही गया होगा. और फिर शायद लाइब्रेरी से वापिस गया हो जिसकी उन्हें उम्मीद नहीं होगी और अर्जुन ने वो देख लिए होगा जो सोचा नहीं था." प्रीती ने भी कुछ अलग महसूस किआ था और अर्जुन की आँखों में वो पानी देख कर समझ गई थी.

"तेरा दिमाग कब से इतना चलने लगा?" अलका ने इतना कहा तोह ऋतू ने प्रीती को प्यार से बाहों में भरते हुए खुद जवाब दिए.

"इसका दिल चलता है उसके साथ. हम दोनों से ज्यादा यह महसूस कर सकती है उसको. बेशक प्यार हमारा बराबर हो लेकिन हमारे 33-33 के बावजूद इसके पास 34 बचते है. और मई इसके अनुमान से सहमत भी हु. अर्जुन भावुक है और लोगो से जल्दी जुड़ भी जाता है. वो अगर ये सब जान ने के बाद ज्योति के साथ होता तोह परेशां नहीं होता और शायद उस से लगाव न रखता. लेकिन हादसा तोह फिर एक बार हिलता हे है इंसान को. लेकिन ाची बात है के वह कुछ ज्यादा हे जल्दी उबार गया."

"ऋतू तेरी बात ठीक है लेकिन अगर ज्योति ने कमीनापन किआ तोह? क्योंकि जहा तक अर्जुन के उस खास चीज की बात है तोह ज्योति उसके लिए पागल जरूर होगी."

"मुँह टॉड दूंगी मई उसका अगर उसने अपनी तरफ से ऐसा कुछ किआ तोह, बिना अर्जुन के मर्जी के." ऋतू और अलका दोनों हे प्रीती के इस गुस्से को देख हैरान हो गई लेकिन प्रीती एकदम शांत हो गई और सॉरी बोल दिए.

"हम दोनों का भी यही इरादा है. तू फ़िक्र मत कर जितना अर्जुन को हम जानते है वह कुछ तोह करके आया हे होगा. अपने दिल से धोखा बर्दाश्त कहा करेगा वो. वैसे वो ठरकी वही पिछली गली वाला हे है न जिसकी बेटी भी इनके साथ हे पढ़ती है. होलिका पूजन पर बात कर रही थी वो संदीप से." ऋतू दीदी ने प्रीती का बाहों में भरे हुए हे अलका से पुछा तोह उसने सर हिला दिए.

"ाची लड़की है यार और अपनी माँ की तरह सुन्दर भी कितनी है. समझ नई आता इतनी सुन्दर बीवी और इतनी बड़ी बेटी होने के बावजूद इस बेहया लड़की के चक्कर में पड़ा है वह. आकांक्षा तनेजा, यही नाम है उसका." अलका ने जो नाम लिए था इन तीनो को पता नहीं था के ये भूचाल लाएगा तनेजा की ज़िन्दगी में.

"पैसा, वासना और नए मर्द का चस्का. ये तीन चीज हे तोह चाहिए उसको. धर्मपाल अंकल और आंटी कितने सीधे है लेकिन ये लड़की चालक लोमड़ी है." ऐसे हे ये तीनो बातें करती रही इधर.

किसी प्रेमी युगल से रेणुका और अर्जुन चिपके हुए थे जैसे हे वो सेक्टर से बहार निकले थे. मौसम हसीं था और रेणुका का तोह ये सही मामले में पहला प्रेम अनुभव था.

"आज कुछ नहीं बोलोगे क्या?" अर्जुन के कंधे पर सर रखती वो बोली.

"आज मई महसूस कर रहा हु 2 चीज. आपके ये कोमल शरीर का एहसास और धड़कता दिल." अर्जुन को भी रेणुका का इस तरह से चिपक कर बैठना और इतनी प्यार से इज़्ज़त के साथ बात करना अलग हे सुख दे रहा था. उसकी इस बात पर रेणुका ने कुछ पल के लिए आँखें बंद कर बाहें कास के लपेट ली थी.

"तुम बहोत प्यारे हो अर्जुन. अगर ये मेरा कॉलेज का समय होता तोह मई हर हाल में तुमसे हे शादी करती. और एक तरह से अब इस दिल के मालिक तुम हे हो. पहले तोह ये ऐसे कभी धड़का हे नहीं था. तुम्हारी आँखें, प्यार भैर छेड़छाड़ के साथ हे जिस तरह से तुम मुझे इज़्ज़त देते हो, परवाह करते हो मेरी तोह दर लगता है कही सबके सामने मई तुम्हे प्यार न कर बैठु."

"बुआ हो तोह कर सकती हो. वो यही समझेंगे की बुआ भतीजा का रिश्ता मजबूत है." अर्जुन ने छेड़ते हुए इतना कहा तोह एक चपत रेणुका ने सर पे लगा दी.

"मई अब से तुम्हे आप कहना शुरू करने वाली हु." रेणुका ने भी छेड़ते हुए ये बात गंभीर स्वर में कही तोह अर्जुन ने स्कूटर की गति धीमी हे कर दी.

"मरवा डौगी आप मुझे."

"हाहाहा.. सही कहती है प्रीती तुम्हारे बारे में. लड़की हे हो पूरे जितना डरते हो मजाक से तुम." ऐसे हे दोनों बातें करते मार्किट आ गए. अर्जुन की बात ठीक हे थी के आज ज्यादा भीड़ नहीं थी यहाँ. Rehdi-fadi तोह न के बराबर लगी थी. कुछ हे देर बाद दोनों सुधीर की दुकान के बहार थे. कल की तरह हे अर्जुन ने पहले दर्जा खोला और उनके अंदर जाने के बाद हे पीछे आया.

"कैसे हो सुधीर भाई?" रेणुका जी को सोफे पर बिठाने के बाद वह सुधीर से हाथ मिला कर मिला जो वैसे हे गर्मजोशी से मिला.

"बैठो भाई मई juice-cola मंगवाता हु. आपका सामान भी तैयार कर दिए था आज शाम को हे. आप एक बार चेक कर लीजिये मैडम फिर मई पैक करवा देता हु." दुकान पर शायद आज उसके पिताजी नहीं थे तोह कुछ ग्राहक वो खुद हे देख रहा था गल्ले के साथ हे.

"भाई जूस कोला की जरुरत नहीं अभी तुम ग्राहक देख लो मई इतने अंदर से ब्लाउज ले आता हु." अर्जुन खुद हे अंदर की तरफ चल दिए और सुधीर काम निपटने में लग गया. टेलर मास्टरनी ने उसको देख कर दराज से अखबार में लपेटे ब्लाउज पकड़ा दिए जिन्हे ले कर वह रेणुका जी के पास आ गया.

"लीजिये आप देखिये." उनको पकड़ते हुए उसने इतना कहा तोह रेणुका ने हाथ पकड़ते हुए साथ हे बैठा लिए.

"अब तुम्हे भी पसंद आने चाहिए न. तोह खुद हे देख लो और बताओ के कैसे है." अर्जुन का मैं प्रसन्न हो गया रेणुका का इस तरह उसको इतना प्यार करने से. उसने अख़बार हटते हुए अंदर से दोनों ब्लाउज बहार निकले तोह ऊपर वाला हलके हरे रंग का ब्लाउज एकदम वैसा हे सिला था जैसे उसने आंटी को बताया था. वही मोतियों की कारीगरी वाला कपडा छाती के उभारो पर और बाजूबंद की तरफ. कपडा रेशमी मुलायम हाथो में मजा देने लगा. फिर जैसे उसको देखने के बाद दूसरा वाला हल्का गुलाबी ब्लाउज देखा तोह आँखें चौंधिया गई. सामने से किसी तंग चोली तरह ब्लाउज के उभार बड़ी कारीगरी से सिले गए थे. कंधे पर बस एक इंच की पट्टी, गहरा गाला और फिर पीठ पर गहरे गुलाबी रंग 2 तान्निया जिनकी गाँठ से हे ये ब्लाउज बांध सकता था. ाची तरह परख कर जब उसने थोड़ी हैरानी से रेणुका के चेहरे की तरफ देखा तोह वो सरक कर कान के पास मुँह करती हुई बोली, "अपने अंतरंग क्षण के लिए ये मेरी पसंद थी जो आपको पसंद थी." इस तरह रेणुका द्वारा उसके लिए 'आप' इस्तेमाल करना अर्जुन के दिल में प्यार के एहसास को कही दूर तक उतरता गया था. दिल छह रहा था के यही चेहरा थाम कर होंठ चूम ले फिर जगह देख बस मुस्कुरा दिए.

"दोनों पसंद है मुझे लेकिन जो सिर्फ मेरे लिए है वह फिर मेरे लिए रहना चाहिए." पहली बार उसके मैं में एक हक़ जताने वाली इच्छा हुई थी जिसको रेणुका ने भली भाँती समझ लिए था.

"अब आपके हे लिए है तोह फिर सिर्फ आपको हे हक़ है ये मुझे पहने हुए देखने का. अब यहाँ से चले हम?", अर्जुन ने एक बार फिर उस मासूम से चेहरे की तरफ देखा जो उसको बता रहा था जैसे ये सब अब उसका हे अधिकार है.

"चलिए. मई ये पैक करवाता हु." अर्जुन ने खड़े होते हुए दोनों ब्लाउज तेह लगते हुए वापिस अख़बार में रखे और काउंटर की तरफ बढ़ गया.

"सर एक मिनट दीजिये." ये लड़की आज हे देखि थी अर्जुन ने जिस ने आदर से दोनों कपडे लिए और अंदर चली गई. सुधीर भी अबतक खाली हो चूका था.

"सॉरी भाई. आज दूकान से 3 लोग छुट्टी पर है और पिताजी भी नहीं आये तोह थोड़ा व्यस्त हो गया था. मेरे लायक कोई सेवा हो तोह बताओ." सुधीर ने पास आते हे कहा.

"भाई ऐसा कुछ नहीं है. हमारा काम आपने समय से पहले करवा दिए और अब भी के रहे हो के समय नहीं दिए. ाचा एक बात पूछनी थी." अर्जुन को यहाँ प्रीती की बात याद आ गई थी.

"है भाई बताओ जो भी चाहिए है. नहीं होगा तोह मंगवा दूंगा." बात को कुछ समझते हुए वो कहने लगा.

"लड़किओं के लिए आरामदायक बिना बाजु की टीशर्ट और हॉफपैंट, क्वालिटी जो बेहतरीन हो." अर्जुन ने थोड़े हे शब्दों में बात कह दी.

"साइज बता सकते हो? या अंदाजन कुछ. मई यही मंगवा दूंगा." अर्जुन अब साइज के चक्कर में सोचने लगा.

"भाई अगर मई गलत नहीं हु तोह आप उनकी हे बात कर रहे हो जो पहली बार आपके साथ आई थी? तारिख बताओ अगर वही है तोह माप हमारे यहाँ मिल जायेगा लिखा तोह फिर मई बिलकुल सही चीज दे सकता हु." अर्जुन इस बात से चहक उठा और मल्होत्रा अंकल की बेटी की शादी से 2 दिन पहले की तारिख और जो रंग प्रीती ने बताये थो दोनों सुधीर को बता दिए. लड़का समझदार था और पसंद भी जानता था. उसने काउंटर से नै लड़की को सब समझा दिए और एक पर्ची लिख कर पकड़ा दी.

"भाई बस 5 मिनट दो मुझे. और मैडम के लिए जूस भी आ गया." अर्जुन ने देखा तोह एक लड़का ट्रे में जूस का गिलास लिए रेणुका के पास खड़ा था. हाथ से पांच उंगलिया दिखते हुए अर्जुन ने जूस पीने को कह दिए.

"वैसे भाई मेरा भी कुछ भला कर दो. शरीर दूकान पर बैठ कर भारी होने लगा लेकिन तुम तोह ाचे तगड़े पहलवान जैसे हो बिना किसी चर्बी के." उसकी बात पर अर्जुन हंस दिए.

"भाई ाचा है इस सब में न पदों और बस थोड़ा खाने पर ध्यान दो. दिनभर तोह दूकान पर म्हणत करते हो."

"नहीं अर्जुन भाई मई तोह दूकान पर 1 या 2 बजे हे आता हु. है ये सही कहा के जीभ थोड़ी ज्यादा चलती है." सुधीर अपनी परेशानी बताता बोलै. देखने में वह ठीक था. साधारण कद लेकिन हल्का भारी लेकिन पूरी तरह मोटापा नहीं था.

"भाई तभी कह रहा हु के khan-paan सादा करो, सुबह सिर्फ आधा घंटा पार्क या शांत जगह घूम लिए करो 4-5 महीने में सब ठीक हो जायेगा. जिस समय मई उठ कर कसरत करने निकलता हु मुझे नहीं लगता के तुम उस समय उठ सकते हो. थोड़ा अभी अभ्यास करो फिर देखेंगे." इतनी हे देर में वो लड़की एक प्लास्टिक के बैग में सामान ले आई तोह अर्जुन ने रेणुका से बचते हुए वह सुधीर के काउंटर पर रखा और देखने लगा. बड़ा नरम कपडा था ये और ऐसा था जो अपने आप में वापिस आकर में आ रहा था जितना मर्जी खींचने से.

"बिलकुल सही भाई." सुधीर के सामने वह कमर के नीचे के कपडे नहीं देखना चाहता था.

"अब ये बताओ के कितना दाम हुआ इनका." पर्स निकल कर नोट निकलने लगा तोह सुधीर ने पर्ची सामने कर दी. '2 जोड़ी इम्पोर्टेड कैल्विन क्लीन लौंगेवेअर. वाइट सेट, ग्रे सेट. शॉप- 2400, कस्टमर 2800.'

"भाई 2400 से एक रूपया ऊपर नहीं लूंगा." उसकी बात पर अर्जुन ने पूरे 2400 उसको पकड़ाए और काउंटर के पास कड़ी लड़की को 100 रुपये देते कहा, "थैंक यू फॉर थिस हेल्प." सुधीर ने भी सर हिला दिए तोह एक बार फिर हाथ मिलाने के बाद गले लग कर अर्जुन दोनों पैकेट लेकर रेणुका जी के साथ बहार आ गया.

"मतलब तुमने सब खुद हे करना होता है न? बिना बताये हे प्रीती के लिए ले हे लिया तुमने.?" अर्जुन को पता चल गया था की रेणुका ने दिवार के शीशे से देख लिए होगा तोह मुस्कुराता हुआ बोलै, 'आपको क्या लगता है उसने ये सब आपको लेने को बोलै था.?"

फिर दोनों पैकेट ध्यान से स्कूटर की डिक्की में रखने के बाद वो उन्हें लेकर सीधा हे कल वाली जगह आ गया. यहाँ 7-8 तरह के बड़े झूले लगे थे और कुछ लोग उनका मजा ले रहे थे. बस इस हे जगह उन्हें रेहडिया और खाने पीने के स्टाल दिखे थे. रेणुका उसके बाजू से चिपकी खुस हो रही थी की अर्जुन को याद नहीं दिलाना पड़ा था.

'गीता प्रेस गोरखपुर', एक पीले रंग के पोस्टर को देख कर अर्जुन रेणुका को साथ लिए हे इस स्टाल पर आ गया जो झुल्लो के पास हे लगी थी.

"यहाँ क्या है?" रेणुका थोड़ा हैरान होते पूछने लगी तोह अर्जुन ने बस उनका चेहरा देख का आँखों से हे आश्वासन दिए.

"भैया आपके पास "रावण पुराण" होगी?", दूकान पर खड़े एक साधू जैसे व्यक्ति से उसने पुछा तोह प्रतिउत्तर में वो मुस्कुराता सा सेंकडो किताबो पर गहरी नजर डालने के बाद एक किताब को उठा कर उसकी तरफ बढ़ने लगा.

"बीटा इसको काम हे लोग पढ़ते है. यहाँ ज्यादातर भगवद गीता, रामायण, व्रत कथा या चालीसा हे लेते है लोग. ये बस एक हे किताब लेकर आये थे हम." किताब के बारे में बताते उस बुजुर्ग ने कहा तोह अर्जुन ने पलट कर पीछे देखा जहा हिंदी में मूल्य मात्रा 100 रुपये लिखा था. उन्हें 100 का नोट और किताब वापिस करते हुए वो बोलै, "अंकल कोई ऐतराज न हो तोह ये किताब मई कुछ देर बाद आपसे वापिस ले लू? 2-3 झूले लेने है."

"हाँ बीटा क्यों नहीं. मई अभी यही हु साढ़े 9 बजे तक. तुम आराम से बिटिया संग झूले लो और मेला देखो." अपनी घडी पर अर्जुन ने नजर डाली तोह 8 हे बजे थे. इधर रेणुका उनकी बात पर मुस्कुरा उठी. वो उन दोनों को युगल समझ रहे थे.

"धन्यवाद् अंकल जी."

"ारी कोई बात नहीं बीटा. मुझे ाचा लगा देख कर के तुम एक जिज्ञासा वाले नौजवान हो जो किताबो में रूचि रखता है. भगवन जोड़ी सलामत रखे तुम्हारी." और उनकी इस बात पर रेणुका का चेहरा उस हलके अँधेरे में लाल हो गया था. अर्जुन भी मुस्कुराता हुआ उनकी ब्याह पकडे गोल ऊँचे झूले की तरफ हो लिए.

"हमारी जोड़ी." अर्जुन हँसते हुए छेड़ने लगा तोह रेणुका शर्माती सी पीठ पर हाथ मारने लगी.

"चश्मे की जरुरत है उन्हें शायद. मई कहा दुगनी उम्र की तुमसे."

"अगर एक तरह से देखो तोह आप बस प्रीती से 3-4 साल बड़ी लगती हो और मई मेरी उम्र से 5-6 साल ज्यादा. दाढ़ी आ जाने दो फिर सब यही कहेंगे की शादी किये कितना समय हो गया दोनों को." अर्जुन पूरे मजे ले रहा था उनके.

"ोये कुछ भी मत बोलो. और चलो अब पर्ची कटवाओ, मैंने सभी झूले लेने है." किसी बची की तरह वह गोल झूले के पास कड़ी हो गई जहा वो अभी रुका था और लोग निचे उतर रहे थे. एक छोटे से काउंटर से अर्जुन ने 20 रुपये में 2 टिकट ली और इस मोटर से चलने वाले झूले के पास खड़े संचालक को देते कहा.

"हम दोनों है."

"ये लाइन से लोग चढ़ रहे है. आप दोनों को एक सीट पर कर दूंगा आप लाइन में हो जाइये." ये इंसान बड़ा अनुभवी था. झूले में लोगो को जैसे भूतिक विज्ञानं के हिसाब से बराबर दुरी पर 2-2 के हिसाब से बिठाता रहा. कुछ हे देर बाद वो दोनों भी एक सीट पर बैठ गए जिसको उस आदमी ने बहार से एक रोड से बंद कर दिए. अब कुछ हे देर में दोनों ऊंचाई पर पहुंचे तोह नीचे आते हुए रेणुका जोर से चिपक गई अर्जुन के साथ.

"मुझे डर लग रहा है और पेट में सनसनी हो रही है. आयी" वह बिलकुल किसी छोटी बच्ची सी हरकत कर रही थी वही अर्जुन इस सब में मजे ले रहा था. ऐसे अपने साथ रेणुका का चिपकना और जोर से ब्याह पकड़ना मजेदार अनुभव था. थोड़ी देर बाद जब झूला तेज हुआ तोह हर तरफ से लड़कियों और बचो की मजेदार चीखें सुनाई पद रही थी. मजा तोह अर्जुन को भी बहोत आ रहा था लेकिन डर नहीं लग रहा था. 10 मिनट के बाद वो झूला अब थमने लगा तोह रेणुका ने रहत की सांस ली लेकिन वो अभी भी वैसे हे चिपकी हुई थी अर्जुन के शरीर से. 2 मिनट बाद अर्जुन उन्हें संभल कर उतरता हुआ साथ लिए अगले झूले की तरफ आ गया. हवा में झूलती इस कश्ती में भी वही सब दोहराया गया.

"मुझे न ice-cream खानी है. वो भी 2. एक चॉक्लेट वाली और एक वैनिला." चहकती हुई वह ice-cream के जगमगाते स्टाल की तरफ बढ़ चली वैसे हे उसकी ब्याह पकडे हुए. अर्जुन भी रेणुका को खुश देख कर मुस्कुराता हुआ उनकी इत्छा पूरी कर रहा था.

"भैया 2 आइस क्रीम. एक चॉक्लेट और एक वैनिला." पैसे देते हुए उसने स्टाल वाले से कहा. रेणुका कुछ दुरी पर अँधेरे में कड़ी थी भीड़ से थोड़ा पहले. दोनों ice-cream लेकर वो उनकी तरफ आया तोह अपना पर्स अर्जुन को थमती वो बारी बारी से दोनों खाने लगी थी. फिर एक ice-cream अर्जुन की तरफ की तोह उसने भी थोड़ा सा बस चख लिए. रेणुका अब उस काटी हुई जगह पर अपने होंठ फिरने लगी. इस छोटी सी हरकत में भी गजब की मादकता थी. फिर थोड़ा बहुत खाने के बाद दोनों बची हुई ice-cream वही रखे गट्टे के खुले डिब्बे में डालती वो उसके साथ गेट की तरफ बढ़ चली.

"बीटा तुम्हारी किताब." ये आवाज सुनकर दोनों हे वापिस मुड़कर किताब की स्टाल पर आये.

"धन्यवाद् अंकल. हम तोह भूल हे गए थे. आपने बचा लिए." अर्जुन किताब लेकर फिर से धन्यवाद् करता स्कूटर की तरफ चल पड़ा. रौशनी में आते हे अब रेणुका सिर्फ हाथ पकड़ कर चलने लगी थी.

"आपको ाचा तोह अलग न?", किताब रेणुका ने हैंडबैग में दाल ली थी और वो स्कूटर पर बैठने लगी तोह अर्जुन ने पुछा.

"ये सबसे खूबसूरत लम्हा था मेरा आज तक का." रेणुका ने ख़ुशी से कहा.

"मतलब कल रात वाला भी इसके सामने कुछ नहीं था.?" अर्जुन की बात का मतलब समझते हुए उन्होंने उसकी पीठ पर धूल जमा दी.

"बड़े वो हो. अब उस बारे में थोड़ी बात कर रहे है. बैडरूम के लम्हे बस वही रहने दो न. और ये प्यारे बहार के इस बहरी दुनिया में." अर्जुन को रेणुका की ये बात बड़ी ाची लगी थी. फिर दोनों वह से निकल लिए. हल्का बारिश का मौसम सा होने लगा तोह स्कूटर के उचित रफ़्तार से चलता वो अगल 10 मिनट में अपने सेक्टर से पहले वाले तक आ गया था. जहा रात को हादसा हुआ था. रात के इस समय सड़क सुनसान थी पूरी तरह. जैसे हे वो पार्क की तरफ आने लगे अर्जुन ने स्कूटर उस पतली सड़क मर घुआं लिए जहा वो प्रीती के साथ स्टेडियम से आते समय रुका था. कुछ आगे जा कर उसने स्कूटर रोकते हुए बड़े स्टैंड पर लगा दिए, रेणुका वैसे हे पायदान पर पाँव टिकाये देख रही थी के ये सब क्या हो रहा है.

"मुझे ice-cream खानी थी तोह सोचा रुक जाता हु. फिर आज मई अपने घर रहूँगा तोह मुश्किल होगा." रेणुका एक हद्द तक शर्मा गई थी उसकी इस बात पर. उसके हिलते उभार बता रहे थे के साँसे कुछ अनियंत्रित सी है. थोड़ी को ऊपर उठाते हुए अर्जुन ने अपने होंठ इस वीरान जगह पर रेणुका के मीठे हो चुके होंठो पर टिका दिए.

"उम्म्म.." खुद हे अपने होंठ खोल कर वो अर्जुन का साथ देने लगी. इस दौरान वो कब स्कूटर से नीचे अपने पाँव पर कड़ी हो चुकी थी पता हे न चला था.

अर्जुन अब उन्हें खुद से सताए बाहों में भर के खड़ा था. कठोर उभार सीने से हल्का दबते हुए दोनों की उत्तेजना बढ़ने में लगे थे. खुद हे उसका हाथ अपने कूल्हों पर कास के रख लिए था रेणुका ने तोह दोनों कूल्हे मसलता बस अर्जुन उनके होंठो को ाचे से चूस रहा था.

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दोनों कोई 2-3 मिनट बाद अलग हुए तोह रेणुका की नजरे नीचे हो गई थी फिर स्कूटर स्टार्ट कर अर्जुन घर की तरफ बढ़ चला. रेणुका बस अब ाचे से उसके साथ चिपक कर बैठी हुई कुछ सोच रही थी.

"इतनी खामोश क्यों हो आप? अपने सेक्टर में आते हे अर्जुन ने पुछा तोह रेणुका की तन्द्रा भांग हुई.

"रात को तुम नहीं आओगे? कोई रास्ता नहीं है क्या?", हलकी पीड़ा के भाव थे उनकी आवाज में. जैसे दो प्रेमियों के बीच अलगाव हो रहा हो.

"कल हम साथ हे होंगे न. और ऐसे हमारा रात को मिलना परिवार के लिए गलत हो सकता है रेणुका." नाम लेते हुए अर्जुन ने कहा तोह दिल को समझती हुई वो बोली.

"कल तुम मेरे साथ रहोगे न? और हम विचार करेंगे इस बात पर के कैसे मिल सकते है. समझती हुई की आपके घर अभी बड़े सदस्य नहीं है और एक लड़के की जिम्मेदारी से वही रहना ठीक है." हल्का सा पानी आँखों में न चाहते हुए भी आ हे गया अपनी बायत कहते हुए. अर्जुन ने स्कूटर एक बार फिर रोक दिए उस हलके अँधेरे में. घर यहाँ से बस 3-4 मिनट दूर हे था.

"प्यार करती हो और फिर रोने भी लग रही हो? मई यही तोह हु और हम रोज रात को नहीं मिलेंगे लेकिन जब भी समय मिलेगा मई हर कोशिश करूँगा तुम्हारे साथ समय बिताने की. अब खुद को ठीक करो थोड़ा. इतना हसीं समय बिताने के बाद ये आंसू ाचे नहीं लगते." रेणुका एक बार पीछे से उसको गले लगते हुए फिर खुद को ठीक करने लगी. ऐसे हे कुछ देर बाद दोनों हे घर के बहार थे. अर्जुन स्कूटर को खड़ा करने के बाद सामान निकलता हुआ उनके साथ अंदर चल दिए. छोल साहब कल की तरह हे खाने के बाद डाइनिंग टेबल पर बैठे कोई फाइल देख रहे थे. प्रीती रसोईघर से पानी और उनकी दवा लेकर आ रही थी.

"आ गए आप दोनों.?" प्रीती ने जब उन्हें देखा तोह एक हलकी मुस्कान के साथ स्वागत किआ.

"अर्जुन बीटा, ज्यादा दिक्कत तोह नहीं हुई तुम्हे अपनी बुआ के साथ इस काम में? अब एक तू हे तोह मेरा बीटा है." पाँव छु रहे अर्जुन को गले लगते उन्होंने कहा.

"कैसी बात करते हो आप भी? कभी बीटा कभी पराया." अर्जुन ने नाराजगी से कहा तोह वो हँसते हुए बोल पड़े.

"तू मेरा सच्चा बीटा है रे. बस तेरा रूटीन बिगड़ जाता है तोह बुरा लगता है. लेकिन इस बुड्ढे के पास फिर और सहारा हे कोण है.?"

"दादू मई हमेशा आपके साथ हे हु और पास भी. आप बस वही मिलिट्री वाला हुकुम दिए करो बस.", प्रीती के हाथ से गिलास लेते हुए उसने दोनों पैकेट पकड़ा दिए.

"अर्जुन तुम्हारी किताब." रेणुका बुआ ने चिरपरिचित अंदाज में ये बात कही. यहाँ बिलकुल भी वो प्रेमिका का स्वर न था.

"शुक्रिया बुआ जी. ाचा अब मई चलता है. सबको गूडनिघत." प्रीती बहार तक आई उसके पीछे तोह गेट के पास उसने कहा, "मेरी पसंद देख लेना जरा. जैसा तुमने चाहा था वैसा हे लेकर आया हु अपनी जान के लिए." हाथ से चुम्बन का इशारा करता वो स्कूटर पर बैठ घर की तरफ मदद गया इधर प्रीती मुस्कुराती हुई अंदर दाखिल हो गई.

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"भाई चल खाना खा ले अब." घर में आते हे ऋतू दीदी, जो बर्तन साफ़ कर रही थी तारा के साथ उन्होंने कहा तोह अर्जुन haath-mooh धो के वही बैठ गया. तारा तोह आज पूरी बाजू का सलवार कमीज पहने थी जो अलग बात थी.

"तारा इतनी सर्दी तोह नहीं हुई के ये कपडे निकाल लिए?" उसकी बात से तारा शर्मा गई लेकिन ऋतू दीदी हंसने लगी. जाने क्यों चेहरा भी दमक रहा था पूरा.

"मच्छरर के डर से यही पहन लिए. बारिश हुई है न 2 दिन तभी." फिर वह काम पे लग गई और प्रियंका दीदी एक गिलास में फ्रिज से दूध दाल कर जाने लगी.

"ठंडा दूध?" अर्जुन ने पुछा तोह दीदी ने संजीव भैया का नाम लिए जो बैठक में अभी भी काम में लगे थे. अलका दीदी और आरती दीदी अपने कमरे में जा चुकी थी.

"तू कहा सोयेगा?", ऋतू दीदी की इस बात पर अर्जुन ने ऊपर की तरफ इशारा किआ क्योंकि मुँह में खाना था तोह वो पल भर के लिए उदास सी दिखी लेकिन फिर वापिस बाकी का काम करने लगी. अर्जुन ने उनके दिल की बात समझ ली थी बस चुपचाप खाना खाने में लगा रहा.

"छोटे बहार टाला मैंने लगा दिए है और मई बैठक में हे सोने जा रहा हु. सुबह मुझे अपने समय जगा डीओ अगर मेरी नींद न खुले तोह." भैया के चेहरे से लग रहा था के वो थक्क चुके थे. अर्जुन ने सर हिलाया और खाने की प्लेट लेकर रसोईघर में चल दिए. भैया वापिस चले गए थे और तारा भी.

"मई आपके पास आऊंगा लेकिन देरी से. बस तब तक नींद पूरी कर लेना आप. कहा मिलोगी सोइ हुई?" अर्जुन प्लेट धोने की जगह में रखता हुआ बोलै तोह ऋतू दीदी के चेहरे पे फिर से चमक आ गई थी.

"माँ के कमरे में अकेली." और फिर वो आखिरी बर्तन पानी के नीचे कर दिए. नाहा कर अर्जुन अब 11 बजे दूसरी मंजिल की तरफ चल दिए था. सिर्फ पजामा पहने और हाथ में टोलिया लिए सर सूखता हुआ.

"आ गए तुम?", कमरे में जैसे गुलाब के इत्र की सुगंध से फैली हुई थी और बड़ी तुबेलिघ्त रोशन थी. अर्जुन और संजीव भैया के कमरे का दरवाजा इस तरफ से बंद पड़ा था.

"आना तोह था हे मुझे लेकिन जान सकता हु के आज ऐसे कपड़ो में क्यों हो?" अर्जुन की बात पर तारा उसकी तरफ बढ़ती दरवाजे की चिटकिनी लगाने लगी. अर्जुन की पीठि उसकी तरफ थी. फिर कुछ पल बाद जब उसको कोई आवाज ना आई तोह वो खुद हे पीछे घूम गया.

आँखें वही रुक गई या बेहतर होगा के कहे जैसे चुम्बक की तरह चिपक गई थी. एक तराशा हुआ सा वो नाजुक जिस्म इस दूधिया रौशनी में जैसे और इजाफा कर रहा था. पाँव में सिर्फ एक सफ़ेद रंग की लास वाली पेंटी पहने तारा कपड़ो के ढेर पर कड़ी थी.

"क्या हुआ? मई तुम्हे इस रौशनी में पसंद नहीं आई?" नजरे नीची करती तारा थोड़ा झिझक रही थी. उसके पाँव का अंगूठा ये बता रहा था जिसको वो फर्श में गाड़ने की कोशिश करने में लगी हुई थी.

"तुम बेमिसाल हो तारा. मई जानता था ये क्योंकि मैंने महसूस किआ है तुम्हे. लेकिन अब सामने हो तोह मेरे अल्फाज भी तुम्हारी सुंदरता के साथ न्याय नहीं कर पा रहे है. और अब समझ भी आ रहा है के क्यों आज तुम इन कपड़ो में थी." उसकी तरफ कदम बढ़ा कर अर्जुन ने तारा को अपने नंगे चौड़े सीने से लगा लिए. गोल उभार इतने मुलायम थे की जैसे छाती में टकरा कर कही उनपर निशान न पड़ जाये.

"आह. अर्जुन बहोत परेशां किआ है तुमने मुझे और मेरे दिल को. लेकिन आज रात मुझे वो साडी कमी याद नहीं रेहनी चाहिए." बंद आँखों से वह उसके सीने से लगी उसके कंधे को चूमने लगी थी. अर्जुन ने भी दोनों कूल्हों पर हाथ फिरते हुए इस रेशमी त्वचा का पूरा रास अपनी उंगलियों से लेने का उपक्रम किआ. पंतय पर से उभरी हुई छूट पाजामे में क़ैद लुंड के लिए मचल रही थी. दोनों कूल्हों के नीचे हाथ रखता वह तारा को उठाये बिस्टेर पर आ गया.

"आज तुम्हे मई इस संसर्ग की अगली मंजिल तक लेके चलूँगा तारा." उसके होंठ चूमता वो जब नीचे सरकने लगा तोह जैसे पूरे शरीर के रोयें खड़े हो गए थे तारा के. मुलायम दूध को अपने हाथो की मुठी में भरता वो उसकी चिकनी नाभि को मजे से चूमने लगा था. अर्जुन को अपने लुंड में भी आज कुछ भयानक तनाव उठता महसूस हो रहा था तारा के साथ इस काम की शुरुआत में हे.

"तुम जहाँ ले जाना चाहो मुझे ले चलो आह.. आह.. मई तुम्हारी हु.. उम्म्म." मॉटे दूध किसी आते की तरह गूंधते हुए अर्जुन ने उस फूले हुए उभर पर अपनी जीभ फिराई तोह मजे की इन्तहा में तारा ने उसका सर वही दबा लिए.

"आह.. मुझे तुम्हारे लिए बेशरम बना दो अर्जुन.. उम्म्म.. मेरे जिस्म पर बस तुम्हारा हे नाम होना चाहिए.." उसकी सीत्कार बुलंद होने लगी तोह अर्जुन ने अपना पजामा उतार कर फेंक दिए और झटके से उसकी सफ़ेद पंतय भी निकल ली. छूट किसी गुलाब सी दमक रही थी और बहार को निकली चोंच पर एक छोटी औंस की बूँद दमकती दिखी.

"ुम्हा.. ये कैसा नशा है.. आह अर्जुननननन.." अपनी छूट का अर्जुन द्वारा चाटना उसकी कमर को बिस्टेर से उठा रहा था. दोनों फांको को फैलाये हुए अर्जुन अब जीभ के पूरे दबाव से वो संकरी दरार साफ़ करने में लगा था. जब वो ाचे से गीली हो गई तोह तारा के कूल्हों के नीचे तकिये रख उसको ऊपर उठा दिए.

"आज तुम्हे दर्द और मजा एक साथ मिलेगा तारा और फिर सिर्फ मजा." उसके पूरे शरीर को अपने नीचे करता अर्जुन दोनों मॉटे सतांन पकड़ कर बारी से पीने लगा और वही उसका विकराल लुंड जो आज पहले से भी ज्यादा फूल चूका था तारा की गीली छूट को reh-reh के चूम रहा था. होंठ एक बार मुँह में भर के अर्जुन ने बाए हाथ से उसका कन्धा थाम लिए और सीधे हाथ से लुंड का सूपड़ा उस चिकनी छूट के होंठो के बीच रख दिए. छूट पूरी ऊपर उठी थी उभरी हुई और उसका धड़ निचाई पर था. तारा अपने शरीर को हिम्मत देती आने वाले पल का इन्तजार कर रही थी.

"कच्छ से सूपड़ा उस नरम छूट को चौडाता अंदर घुस चूका था. लेकिन आज इस धक्के पर तारा की आँखों में आंसू नहीं थे. बस नाख़ून अर्जुन की पीठ पर टिक चुके थे. जांघो को ाचे से दबाये अर्जुन ने अगला धक्का थोड़ा और जोर से लगा दिए. और इसके साथ हे उसके होंठ पर तारा के दांत गड्ड गए. 7 इंच लुंड यहाँ छूट में उतर गया तोह तारा बेहोश सी हो गई थी दर्द से. पिछली बार 5 इंच से पौने घंटा चुआड़ै करवाने वाली ये लड़की इतने दर्द के लिए शायद थोड़ी कमजोर थी. अर्जुन वैसे हे रुक कर उसके सर को थपकाने लगा था जहाँ कनपटी पर पसीने की बुँदे आ गई थी. 25-30 सेकंड का ये अंतराल जैसे वर्षो सामान था. एकदम से आँखें खोलती तारा कास के लिपट गई अर्जुन से. आँखों से जहर जहर आंसू टपक रहे थे.

"आह.. अर्जुन.. ये प्यार का सफर आठ.. दर्दनाक है..", उसकी हालत देख एक बार तोह अर्जुन सोचने लगा था लेकिन फिर मैं पक्का करते हुए वह उसको गले लगाए हे लुंड बहार खींचने लगा. छूट की गहराई में जैसे वो कही फंसा हुआ था लेकिन थोड़ा जोर लगते हे वह 2-3 इंच बहार निकल आया तोह एक बार फिर तारा का शरीर कांप गया.

"बस तारा... बस. अब तुम्हे दर्द नहीं दूंगा." खुद से चिपकाए वो उसका सर सहलाता उतना हे लुंड अंदर बहार करने लगा तोह तारा अपने दांत उसके कंधे में दबा कर पीड़ा और आवाज काम करने लगी थी.

"आज ये और भी बड़ा कैसे हो गया है यार.? इतना मोटा पहली बार में भी महसूस नहीं हुआ था जितना आज है. उम्म्म.. अर्जुन मुझे आदत दाल दो इसको सहने की.", इन 5 मिनट में तारा का रोना तोह बंद हो गया था लेकिन हर धक्के पर छूट जरूर दुखती महसूस होती थी. थोड़ा दूर हो कर अर्जुन उसके मॉटे चुंचो को जितना मुँह में भर सकता था, भर कर हल्का हल्का खींच कर पीने लगा था. लुंड भी कोई 4-5 इंच अब अंदर बहार होने लगा तोह अपने दूध पिलाना भी तारा के दर्द को ख़तम कर गया. पहली बार इस पूरे सम्भोग में उसके कूल्हे उचके तोह लुंड सुपडे तक बहार आकर उतना वापिस अंदर गया तोह बड़ी मादक सी सिसकारी निकल गई तारा की. छूट एकदम से गीली होकर झड़ने लगी और ऊपर उठी गर्दन फिर से बिस्टेर पर लुढ़क गई. लेकिन अर्जुन निरंतर उसके दूध का आकर बढ़ने में लगा था.

"अब तुम पलट जाओ तारा. मई पूरा मजा देता हु इस बार तुम्हे." उसको पलटा कर अपना लुंड वापिस छूट में डालने से पहले दोनों मोटी फांके ाचे से दबाता वो जैसे उन्हें और नरम करने लगा था. तारा की चुत्तड़ थे भी बड़े आकर्षक. जांघो के जोड़ के बाद एकदम से ऊपर को उभरे हुए और पूरे गोलाई लिए. जब ाचे से दोनों फैंको को अलग करते हुए वो छूट देखने लगा तोह गांड का पूरा बंद गुलाबी सिलवट लिए छेड़ भी दिख गया. लुंड ने इस नज़ारे को देख एक झटका सा खाया हवा में. दोनों तकिये अब उसके पेट के नीचे थे. जमीन पर खड़े होते हुए अर्जुन ने झुक कर लुंड गांड की दरार पर फिरते हुए छूट के बहार निकल आये होंठो की बीचा फसा कर प्यार से धक्का लगाया तोह आराम से लुंड आधा अंदर बैठ गया और ऐसे हे अगले धक्के में 7 इंच. दोनों हाथो से उसकी कमर थाम कर अब वह मचिनी अंदाज में तारा की कास कर चुदाई करने लगा था. इस आसान में छूट में रगड़ भी कास के लगने लगी तोह एक बार फिर तारा जोश से भर उठी. निप्पल सख्त हुए तोह अर्जुन अब उन्हें और दबाने लगा था. अगले 10 मिनट में दोनों पसीने में नाहा चुके थे लेकिन इस बार जैसे तारा भी भरपूर साथ देती अपनी चुदाई करवाने में लगी थी. गांड का उभार हर बार अर्जुन को महसूस होता लेकिन अपनी इत्छा को दबाये वो इस टाइट छूट को ढीला करने में लगा रहा. पूरा साढ़े 8 इंच तोह अब भी छूट में नहीं जा पाया था. जैसे बस यही गहराई थी इसकी.

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"अर्जुनंनं... मेरा होने लगा है.. आह तेज करो.. " गांड बराबर उचकाती तारा अपनी छूट में उबाल रहे तूफ़ान को महसूस कर बोली.

"मेरा भी होने वाला है तारा. आह.. अह्ह्ह." और जैसे हे तारा इस बार बिस्टेर पर गिरी अर्जुन ने झट्ट से लुंड बहार निकाल गांड की दरार में रगड़ना शुरू कर दिए. इतना वीर्य निकला था के पूरी दरार और कमर तक मोटी लकीरे बन्न गई थी तारा के जिस्म पर. रौशनी में ये नजारा बता रहा था के दोनों किस कदर भरे हुए थे. फिर एक तरफ लुढ़क कर वो तारा के बालो में हाथ फेरता साँसे दुरुस्त करने लगा.

"मई बता नहीं सकती तुम्हे के मई कितनी खुश हु अर्जुन." ऊपर होती वो होंठ चूमने लगी थी. कुछ देर ऐसे हे प्यार करने के बाद अर्जुन बाथरूम के अंदर ले कर आ गया तारा को. दोनों ने बस ाचे से शरीर साफ़ किआ और गीले बदन हे वो उसको बाहों में लिए बिस्टेर पर जकड कर लेत गया. तारा अभी तक सम्भोग के बाद की मस्ती में उस से छेड़छाड़ करती कभी चूम रही थी तोह कभी आधे खड़े लुंड को दबा देती. ऊपर लेत कर भी 2-3 बार उसने अपनी गीली छूट कमर के ऊपर रगड़ दी थी. कुछ देर बाद शांत होती वह उसकी बाहों में हे सो गई थी. अर्जुन ने समय देखा तोह अभी 11:50 हुए थे. 40 मिनट चुदाई करने के बाद वो नाहा के ऐसे हे अगले 15-20 मिनट मस्ती कर चुके थे. अब उसकी बाहों में नंगी पड़ी तारा गहरी नींद में थी लेकिन अर्जुन नहीं. उसको प्यार से एक तरफ लिटा कर उसने 2 तकिये उसके साथ हे बिछा दिए. पजामा पहन कर लाइट बंद करते हुए वो नीचे चला गया जहा पूर्ण शान्ति चाय थी. दबे पाँव वो अपनी माँ के कमरे की तरफ बढ़ चला जहा उसकी प्यारी बहिन सोइ हुई थी. दरवाजा खोला तोह ऋतू दीदी कमरे में हलकी पीली रौशनी में शरीर पर चद्दर डाले सो रही थी. अर्जुन ने आहिस्ते से वो चादर सरकाई और वह वो अपने पूरे यौवन को उजागर करती लेती थी.

दरवाजा बंद करके बस वो उनके पास बैठ कर उनकी इस ख़ूबसूरती और मासूम चेहरे को देखता रहा. सच हे था के ऋतू दीदी अपनी तरह की बस एकलौती हे थी. खूबसूरत, मासूम, जज्बाती और प्यार करने वाली एक उपयुक्त जीवन संगिनी. अर्जुन को ये ध्यान भी न रहा के अब वो आँखे खोल कर बस अपने भाई के चेहरे को देख रही थी. जैसे वो उनमे खोया हुआ था.

"बस यही प्यार तोह चाहिए मुझे तुझसे ज़िंदगीभर." उनको मुस्कुराता देख अर्जुन होश में आया. साथ में हे लेटकर बस फिर से उनकी आँखों में डूबता वो उनके मुँह पर आये कुछ बालों को पीछे करता रहा तोह ऋतू खुद हे उठकर उसके शरीर पर आ कर बिछ गई.

"लगता है के एक जनम काम रहेगा आपको प्यार करने के लिए. हर रोज आप मुझे और प्यारी लगने लगती हो." उसकी बात पर ऋतू उसके गले को चूमती गाल तक आ गई थी. फिर ऊपर को उठती दोनों होंठ प्यार से जोड़ कर वापिस वही रुक गई.

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"तू मेरा सबकुछ है अर्जुन. बेशक मई तुझे भाई बोलती हु लेकिन मेरा दिल सिर्फ तुझे अपने मालिक और मेरे पति के रूप में देखता है. बस हम दोनों की बहरी असलियत याद रखने के लिए मई तेरा नाम लेने का पाप करती हु जिसका अफ़सोस नहीं है लेकिन चाहती हु अगर कभी ये मुमकिन हुआ तोह मेरी मांग में तेरे नाम का सिंदूर हो." आँखों में आंसू लिए वो कास के लिपट गई थी अर्जुन से.

"आपकी अगर ये इत्छा है तोह फिर मेरा भी वादा है आपसे. मुझे सिर्फ 6 साल का वक़्त दे दो आप. मई हे आपकी मांग भरूंगा अगर उस समय भी आप इस बात पर बानी रही और आपका विवाह न हुआ तब तक तोह." सीने से लगाए हुए हे वह उन्हें ऐसा वादा कर गया जिसका पूरा होना जैसे असंभव था. लेकिन ये कहने के पीछे कुछ जरूर सोच लिए होगा उसने. क्योंकि वो ऋतू से तोह झूटी बात तक नहीं करता था, वादा तोह जान की बात थी उसके लिए.

"मई ज़िन्दगी भर रुक सकती हु तेरे लिए भाई. 4 साल मेरे यहाँ पढाई के बाकी है फिर मई इतने हे साल बहार रह सकती हु. लेकिन मई नहीं चाहती की ये बात कोई जुंग बन जाये जिसमे तुझे बहोत कुछ खोना पड़े. बस उम्मीद रहेगी और फिर मई शादी तोह किसी हाल में नहीं करने वाली." यहाँ अब दोनों प्यार के उस समंदर में थे जिसमे इनका जहाज एक ऐसी उम्मीद में किनारे आने की सोच रहा था जिसके बीच 100 तूफ़ान सर उठाये खड़े थे.

ऋतू ने फिर हरकत करते हुए पाजामे के अंदर से हे उसका लुंड थाम लिए जो अभी हल्का नरम पड़ चूका था लेकिन बस हाथ लगा कर एक बार पकड़ भर लेने से वो अंगड़ाई लेता सा खड़ा होने लगा.

"तेरा ये भी मेरी बात समझता है." उनकी इस नटखट बात से पल भर में हे दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ गई. वापिस होंठो की पीती वह बस उसका लुंड हिलाये जा रहे थी.

"आपकी वो भी तोह इसकी बात को ाचे से समझती है." दोनों कूल्हों को दबाते वो बोलै तोह ऋतू ने अपने दांत छाती पर गदा दिए.

"ाचा. ज्यादा बोलने लगे हो जनाब." और उसके छोटे निप्पल दांतो में काट टी वह नीचे सरकने लगी. इस धीमी हरकत से भी अर्जुन हवा में उड़ने सा लगा था. पजामा नीचे सरका के अगले हे पल उन्होंने वो कर दिए जिसका अनुमान तक न था अर्जुन को. उसका मोटा सूपड़ा उनके गरम मुँह और नरम होंठो के बीच फंसा था. अपने मुँह को सही से उसकी ऊपर झुकाये ऋतू ने पूरे होंठ फैलते हुए उसको 2-3 बार अंदर किआ. बेशक थोड़ी परेशानी हुई लेकिन वो आधा लुंड अब गले की शुरआत तक कर चुकी थी. ये एहसास अर्जुन की नसों को खींचता सा लगा. सारा खून जैसे लुंड की तरफ उबलने लगा था उसका. एक हाथ से उसका वो दाने जितना निप्पल चुटकी में सहलाती लुंड को अपने मुखरास से भिगोने लगी थी. मस्ती में अर्जुन ने थोड़ा जोर से हे उनका एक लटकता dugdh-kalash पकड़ कर दबा लिए. वो बेपरवाह सी बस मुठी में पकडे आधे लुंड पर अपना सर चलने में लगी रही.

"आह दीदी.. अब मई करता हु." वो उनका दूध खींचता सा रोकने लगा तोह ऋतू ने हाथ झटक कर वापिस अपने मुँह की चुदाई खुद करनी शुरू कर दी. 2 मिनट बाद हे लुंड इतना फूल गया के अब उनके पास रुकने के सिवा कोई रास्ता न था.

"चल देखती हु तू क्या करता है." वो बिस्टेर पर आती बोली तोह अर्जुन झट्ट से अपने तन्नाए लुंड के साथ खड़ा हो पजामा पूरा निकल कर ऊपर चढ़ गया. दोनों टाँगे फैलाते हुए उसने दीदी की महकती छूट को एक बार सहलाया और फिर उनको वही मजा देने लगा जो वो उसको अभी देके हटी थी.

फूली हुई वो गोरी छूट ऐसी थी जैसे उसमे से पिघलता मक्कन बह रहा हो. अभी से वो खुलकर रास बहा रही थी. उनकी गांड के नीचे हाथ रख अर्जुन भी दिल लगा कर वो रास का प्याला पीने में लगा रहा. जब ऋतू ने मस्ती की अधिकता से बाल खींचे तोह वह कही जा कर हटा.

"अब अंदर दाल नहीं तोह सुबह तक यही होता rahega."Unki बात पर मुस्कुराता वह लुंड उनकी छूट पर रखने लगा तोह हाथ बीच में अदा दिए.

"मई हे करुँगी तू वापिस लेत जा." उसको हुकुम सुनती ऋतू दीदी बीएड की उलटी दिशा में हे उसको लिटटी खुद बिस्टेर के ऊपर नंगी कड़ी हो गई. नीचे लेता वो बस उनके इस सांचे में ढले खूबसूरत शरीर को देख रहा था और उसकी तेज आह निकल गई जब दीदी अपने मुँह पर एक हाथ रखती नीचे से लुंड को पकडे आधा अंदर ले गई.

"आह.. यार. तू 2-3 दिन लगातार कर दे मेरे साथ नहीं तोह हर बार ये तंग करेगा ऐसे." उसकी छाती पर हाथ रखे वो वही रुकी थी. अर्जुन तोह जैसे उनकी छूट का सही में गुलाम हे था. एकदम उसके लुंड के लिए बानी थी. पूरी तरह कासी हुई और अंदर से हमेशा geeli-naram. उसको सँभालने देने से पहले हे वो अगला झटका खाती उसके पेट पर जा तिकी. चेहरे पर दर्द के भाव आये लेकिन फिर उसके मुँह पर झुकती वो बस एक दीवानी की तरह धक्के देने लगी अपनी कमर हिलती सी. अर्जुन किसी लड़की की तरह मादक आहे भर रहा था. बेशक ये उसका दिन भर में तीसरा और अभी रात में दूसरा दौर था सम्भोग का लेकिन ऋतू दीदी के जोश के सामने वह भी काम पड़ता नजर आने लगा था. हर किसी के साथ उसका ध्यान सम्भोग से हट कर रहता था जिस वजह से वो समय लगा लेता था. लेकिन यहाँ ये जुनूनी लड़की उसको अपने से बहार होने हे नहीं देती थी. 10 मिनट के लम्बे अंतराल के बाद जब वो धीमी पड़ने लगी तोह अर्जुन ने मोर्चा संभल लिए. उनकी टाँगे ऊपर छत्त की तरफ उठाये वो वैसे हे रफ़्तार में उनकी चुदाई कर रहा था जैसे वो उसके ऊपर आ कर कर रही थी. छूट एक बार तभी झाड़ चुकी थी जब ऋतू उसके ऊपर थी लेकिन अब फिर से वो गर्माने लगी तोह अर्जुन भी उनकी राह पर हे चल रहा था.

"तू चाहे तोह अंदर कर सकता है. मई मन नहीं करुँगी. आह.. ममममम.. जैसे तुझे पसंद हो.. अर्जुनंनं.." लेकिन इन आखिरी 20 धक्को के बाद उसका लुंड बहार छूट पर रगड़ खता उनके ऊपर अपना प्यार बरसाने लगा था. वो भी उस से आधा मिनट पहले हे अपने चरम पर पहुंची थी.

"आह.. तुम एक दिन मेरी जान निकाल लोगी." अर्जुन ने ऐसे हे अपने वीर्य के ऊपर लेत कर ऋतू के होंठ चूमते पहली बार 'तुम' शब्द कहा जिसको शायद वह कबसे sun-na चाहती थी.

"आप का दिल बता देता है के वह क्या चाहता है. उठिये अब साफ़ भी करना है खुद को." ऋतू को वही प्यार मिल गया जो वो दिल से चाहती थी और अर्जुन दिल से उन्हें पतिनि क़बूल कर चूका था. एक तरह से गन्धर्व विवाह पूरा हो गया था उनके बीच.

खुद हे ऋतू दीदी को गीले तोलिये से साफ़ करने के बाद एक गाउन पहना कर वह भी अपना पजामा पहन कर उन्हें पीछे से बाहों में लेकर वही लेत गया. तारा तोह इस समय उसके दिमाग से कोसो दूर जा चुकी थी. पहली रात वो आज अपनी दिल से क़बूल की हुई बीवी के साथ अपने हे maa-baap के बिस्टेर पर सो रहा था. ऋतू भी अपने साथ लिपटे उसके हाथो को पकडे सो गई थी. एक बजे से पहले हे घर फिर से सन्नाटे के आगोश में आ गया था.
 
अपडेट कल सुबह 10-12 के बीच पोस्ट करूँगा. अगर आप लोग एक अपडेट पढ़ना चाहते है पहले तोह आप लोगो की प्रतिक्रिया स्वरुप मई एक अपडेट रात 1 बजे तक दे सकता हु. लेकिन दूसरा कल दोपहर से पहले.
 
डेफिनिटेली अपडेट दूंगा भाई. लेकिन फिर वही हिसाब से. 2 उपदटेस सुबह कल और 2 कल शाम को. संतुलन बनाये रखने के लिए
 
पिता जी के साथ बहार चला गया था सुबह. जरुरी काम था भाई रिश्तेदारी और हॉस्पिटल का जरुरी काम था. ऊपर से बारिश ने हिमाचल की मार राखी है 3 दिन से. अभी घर आया हु भाई सोने से पहले अपडेट पोस्ट कर दूंगा
 
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