Incest Pyaar - 100 Baar - Page 8 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट 50

Ghar-Sansar (2)


तारा, अर्जुन के साथ आरती दीदी ने खाना खाया तोह माँ के कहने पर अर्जुन प्रीती को बुलाने उनके घर आ गया. प्रीती कमरे में अकेली कुछ लिखने में खोई थी. हलके भूरे रंग की ये एक मोती सी डायरी थी जिसपर वह जाने के लिख रही थी की अर्जुन के आने का आभास न हुआ. अर्जुन आराम से बिस्टेर पर उसके पास पीठ के बल लेट गया जहाँ प्रीती विपरीत मुद्रा में डायरी पर झुकी हुई थी.

"तुम कब आये?", अर्जुन को यु अपने चेहरे में खोया देख प्रीती थोड़ी हैरान भी हुई के ये कब यहाँ आ गया फिर जल्दी से डायरी को बंद करती उठने लगी तोह अर्जुन ने हाथ पकड़ लिए.

"मुझसे भाग रही हो?"

"नहीं. बस एक मिनट रुको.", प्रीती हाथ छुड़वाती अपनी अलमारी में रखे एक बक्से में डायरी रख उसको टाला लगाती वापिस आराम से अर्जुन के पास बैठ गई. उनकी नजरे फर्श पर थी लेकिन चेहरा सपाट था.

"ठीक है मई चलता हु. मेरी माँ ने कहा था के प्रीती को बोल दू खाने के लिए.", बिना हे नजर घुमाये वह तेज कदमो से बहार निकल गया और जब तक प्रीती उसकी कही बात को समझती वह बहार जा चूका था. प्रीती के दिल में दर्द सा हुआ ये देख कर की आज अर्जुन कैसे प्यार से उसके करीब आया था और उसकी तरफ ध्यान हे नहीं दे पाई सिर्फ इस चिंता में की अर्जुन वह कितनी देर से था और उसने कितना पढ़ा होगा. लेकिन वह कभी इस तरह 'मेरी' माँ नहीं बोलता था. शायद आज अर्जुन को उसकी ये अनदेखी ाची नहीं लगी. सब सोचते हुए उसकी neeli-hari आँखों से पिघलता कांच सा नीचे लुढ़कने लगा. और वही अर्जुन चुपचाप बहार से सीढ़ियां चढ़ता अपने कमरे में चल दिए. कितनी हे देर तक वह सोचता रहा फिर आराम से आँखें बंद करता वह ध्यान लगते हुए विचलित मैं को शांत करने लगा. आज क्षण भर के लिए उसके दिल ने महसूस किआ था के वह प्रीती के पास हो कर भी पास नहीं था. और प्रीती का वह सपाट चेहरा, जैसे वह अर्जुन था हे नहीं. लेकिन इस सब से उबरने का एक हे सही तरीका था के वह अपने इस विचलित मैं को ध्यान लगते हुए शांत कर ले. शांत होते हे वह भी एक गहरी नींद में जा चूका था.

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"प्रीती, अर्जुन नहीं आया था क्या तुझे बुलाने? चची ने तोह उसको आधे घंटे पहले हे भेज दिए था. और मैंने भी अभी तक तेरे इन्तजार में खाना नहीं खाया.", अलका दीदी ड्राइंग रूम से हे बोलती सीधा प्रीती के कमरे में आ घुसी जहाँ वह घुटनो में सर दबाये बैठी थी बिस्टेर से तक लगाए.

"ोये क्या हुआ तुझे?", थोड़ी चिंता से उन्होंने प्रीती का चेहरा सीधा किआ तोह उसकी नम्म लाल आँखें और घुटने पर गीले निशान देख वह घबरा गई थी. "प्रीती.."

उनकी इस तेज आवाज से जैसे प्रीती सदमे से बहार आई और अलका से लिपट गई.

"दीदी, आज शायद एक बड़ी गलती हो गई मुझसे. वो नाराज हो कर चले गए यहाँ से सिर्फ मेरी एक सोच की वजह से.", प्रीती फफक रही थी और अलका उसकी पीठ सेहला रही थी. ऋतू शायद कोई बेहतर हल निकाल सकती थी किसी भी समस्या का. लेकिन अलका से भी प्रीती का दर्द देखा न गया तोह गले लगाए हुए हे उसने प्रीती से कहा.

"तू जानती है प्रीती की उसकी सांस पर सबसे ज्यादा नाम तेरा हे है. और प्यार में नाराज होना और मानना भी तोह जरुरी है. और हर मंजिल सीढ़ी और आसान तोह नहीं होती? तू उस से प्यार करती है या तुझे अब अपने प्यार पर भी शक है?", उनकी बात से रोना तोह काम हो गया प्रीती का लेकिन वह परेशां भी हो गई थी की अलका दीदी ने उसके ऊपर ये सवाल कैसे कर दिए.

"आपको क्या लगता है?", प्रीती ने भीगी आँखों से हे कहा.

"वो तुझसे नाराज नहीं हो सकता लेकिन अगर तू मानती है के तेरी गलती है तोह ज्यादा देर मत कर. और वैसे भी तुझे उसको यही मन लेना चाहिए था. आगे राह मुश्किल हो जाएगी तेरी अगर थोड़ी बड़ी बात हो गई कभी. वह सबसे ज्यादा प्यार बेशक तुझसे करता है लेकिन वो बदल रहा है और मैंने खुद ये बात देखि है की वह अब सबकुछ अपना लेता है बिना जाहिर किये की उसको बुरा लगा है या ाचा.", ऋतू शायद बेहतर होती लेकिन अलका ने सीढ़ी राइ दे दी थी प्रीती को, ज़िन्दगी भर के लिए.

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"मैं चलती हु आपके साथ.", इतना बोलकर प्रीती बाथरूम में चली गई तोह अलका सोचने पर मजबूर हो गई की प्रीती ने ऐसा क्या किआ होगा जिसका अर्जुन बुरा मान सकता है. बात तोह बिलकुल भी प्रीती ऐसी कभी नहीं कर सकती, अर्जुन कोई गलत हरकत कर नहीं सकता कभी, प्रीती के साथ तोह सपने में भी नहीं. फिर क्या हुआ होगा.?

प्रीती चुपचाप बहार निकली और ज्यादा बात किये अलका दीदी के साथ चल दी उनके घर की तरफ.

"वो ऊपर होगा अपने कमरे में तू बहार से हे चली जा ऊपर. सब नीचे हे है और अभी यही रहने वाले है क्योंकि घर पे तोह आधे लोग है नहीं." अलका की बात सुनकर प्रीती हलके कदमो से सीढिया चढ़ती ऊपर अर्जुन के कमरे की और चल दी. हर कदम आज उसको भारी लग रहा था. एक डायरी का पन्ना आज ये करवा देगा की वह अर्जुन को नाराज कर देगी? आज उसने अपने प्यार पर संदेह किआ था की अर्जुन उसकी मर्जी के बिना हाथ तक नहीं लगता तोह कैसे उसने ये सोच लिए के वह उसकी डायरी को पढ़ेगा. बस ऐसे हे सोच में डूबी जब वह कमरे के अंदर दाखिल हुई तोह आज अर्जुन के बिस्टेर पर तकिये नहीं थे, वही नीचे फर्श पर गिरे पड़े थे. और वह बिस्टेर पर सीधा सोया हुआ था दोनों हाथ पेट पर रखे.

'इतनी चुभ गई तुम्हे मेरी वह एक अनदेखी अर्जुन?' प्रीती ने उसको बचपन से देखा था की वह कैसे सोता था और तकिये को कैसे अपने मुँह के नीचे दबा कर रखता था. एक करवट के बल, किसी बचे की तरह. अपनी सोच को लगाम देती वह बिना आवाज किये अर्जुन से थोड़ी दुरी पर बैठ गई.

"तुम्हे एहसास हुआ प्रीती की धड़कन अगर दिल से दूर हो तोह कैसा लगता है? आज वह तुम्हारा दिल मुझे महसूस नहीं कर रहा था. पहली बार ऐसा लगा जैसे मेरा तुम्हारे पास आना तुम्हे परेशां कर गया हो. वह चेहरा मैंने पहले कभी नहीं देखा था जैसा तुम्हारे बिस्टेर से खड़े होते हुए मैंने देखा. Shak-sandeh-shanka.

ऐसा हे कुछ था न तुम्हारे मैं में.?", अर्जुन सोया नहीं था बस ध्यान इतना गहरा हो गया था के शरीर सोने की स्थिति में पहुंच चूका था. लेकिन प्रीती की आहात उसने दरवाजे से पहले हे महसूस कर ली थी.

"अर्जुन, मुझे माफ़ कर दो प्लीज. मेरी गलती है के मैंने उस इंसान पर शक किआ जो मेरा सबकुछ है. बस एक वही डायरी है जो मैं नहीं चाहती की तुम कभी उसको हाथ लगाओ या देखो. मैं उसमे इतना खो गई थी की पहली बार मुझे तुहारा एहसास नहीं हुआ लेकिन एहसास होते हे गलती से शक कर बैठी. प्लीज अर्जुन, तुम्हारा वह से इस तरह वापिस आ जाना अब दर्द बढ़ा रहा है. एक बार मुझे माफ़ कर दो अर्जुन चाहे सजा दे दो लेकिन मुझे अपने सीने से लगा के बता दो की प्रीती तुम्हारी धड़कन है." उसका रुदन इतना करूँ और दर्दभरा था की खुद अर्जुन को महसूस होने लगा के वह खुद भी गलत था कहीं न कहीं. हर इंसान का एक तनहा समय होता है जिसमे वह उस जगह होता है जो सिर्फ उसकी होती है. आज पता चल गया था की बेशक प्यार जितना भी हो swayam-ekant में दखल देने से पहले सामने वाले को खुद का एहसास करना उतना हे जरुरी है जितना उसके प्यार की इज़्ज़त करना.

"तुम गलत नहीं हो सकती प्रीती. मई बैलबुद्धि हु न तोह मई उस लम्हे में वह आ गया जहाँ शायद कुछ पल के लिए तुम अपनी दुनिया में थी. आज तुम्हारा दिल दुखाया है मैंने लेकिन आइंदा अगर ऐसा हुआ तोह सजा मुझे मिलेगी.", प्रीती को कास के अपने सीने से लगाए वह उसको अपने ऊपर लिटाये रहा जब तक दोनों की धड़कन ek-samaan न हो गई. प्रीती के आंसू उसको अपने जिस्म में जैसे तेजाब से लग रहे थे. इतना प्यार करने वाली इस मासूम लड़की का भी एक अपना दायरा है जिसकी इज़्ज़त करना जरुरी था.

"मई बहोत बुरी हु न अर्जुन? तुम्हे कभी खुद को प्यार नहीं करने देती. आज तुम आये तोह देखो फिर से मैंने तुम्हारा वो पल खराब कर दिया जहा हम दोनों अब तक हो सकते थे.", प्रीती को अब भी बुरा लग रहा था की कैसे अर्जुन की अनदेखी कर दी थी उसने लेकिन कितनी जल्दी अर्जुन ने उसको अपने सीने से वैसे हे लगा लिए था.

"अब जैसी भी हो ये ज़िन्दगी तोह तुम्हारे साथ हे काटनी पड़ेगी. जैसे तैसे या फिर ऐसे वैसे.", उसका इतना रोना अर्जुन से देखा न गया तोह जो काम उसको ाचे से आता था उसने वही किआ. प्रीती से वैसा हे मजाक करना जिस से वह उसकी नीली आँखों वाली बिल्ली के रूप में आ जाती थी. उसकी 'मानो बिल्ली"

"काटनी पड़ेगी? मैं अभी kaat-ti हु तुम्हे.", पल भर में हे दोनों वैसे हो गए थे जैसे वो रहते थे. नखरे से अर्जुन की गर्दन पर दांत गदति वह फिर उसके चेहरे को देखने लगी जो उसके नीचे था. अर्जुन ने खुद हे उसका सर नीचे दबाते हुए आंसुओ से गीले चेहरे को चूमते हुए सुर्ख गुलाबी होंठ अपने मुँह में भर लिए. प्रीती भी आँखें बंद करती बस अपने इस आशिक़ का प्यार फिर से खून में चलता महसूस करने लगी थी. आज अर्जुन का ये चुम्बन उसकी रूह में उतरता एहसास करा रहा था के वो प्रीती के जीने के लिए कितना जरुरी है. 30 मिनट में वह मरने की हालत में आ गई थी अगर ऐसा कभी एक दिन के लिए हो गया तोह शायद वह अगले दिन का सूरज न देख पायेगी. अर्जुन ने आराम से उसको करवट के बल बिस्टेर पर करते हुए बाहों में भर लिए और आँखें बंद कर ली. प्रीती भी उसके सीने से लगी उसके साथ हे शांत हो गई थी.

प्यार में नाराजगी बड़ी बात नहीं. बस उसका बरक़रार रहना एक बड़ी सजा हो सकता है.

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"ओह Laila-Majnu, उठो भी अब. अभी कानूनन शादी नहीं हुई है तुम लोगो की जो ऐसे दिन में हे हमबिस्तर पड़े हो, वो भी दरवाजा खोले.", अलका ने झिंझोड़ते हुए अर्जुन को उठाया तोह प्रीती भी शर्माती सी फिर से उसके सीने लग गई.

"ये तोह शर्माने लगी है. मैंने वापिस चिपकने के लिए नहीं उठने के लिए कहा है.", अलका दीदी की बात पर अर्जुन ने अब बिस्टेर छोड़ा और सीधा बाथरूम में घुस गया. अलका ने प्रीती की कमर पर चुटकी काटी तोह वो उचकते हुए उन्हें देखने लगी फिर उनके गले लग गई.

"थैंक यू. थैंक यू सो मच दीदी. मेरी सच में जान निकल गई थी और अगर ये यहाँ पास नहीं होता तोह फिर पक्का मैं मर्डर हे जाती.", अलका मुस्कुरा रही थी इन दोनों की नादानी पर. उसको पता था के ये दोनों एक घंटे से ज्यादा हे नाराज नहीं रहने वाले थे बेशक फिर अर्जुन को हे जाना पड़ता इसके पास.

"अब न तू मेरी हर बात मानेगी. और पहली बात ये की आज रात तू मेरी है, जैसे ऋतू की.", अलका दीदी ने प्रीती की टांग खींचते कहा.

"हमर कुछ aisa-waisa नहीं है.", शर्माती हुई वह वैसे हे गले लगी बोली. इधर अलका दीदी ने उसका एक उभर दबा दिए तोह वह उछलती सी अलग हो गई.

"ये तोह सच में किसी बॉल से सख्त है. मतलब ऋतू ठीक कहती थी की तू 2 टेनिस बॉल हमेशा साथ में रखती है. आज रात फिर टेनिस मैच पक्का.", अलका दीदी मजे लेती कड़ी हुई तोह प्रीती ने अब मुस्कुराते हुए कहा.

"होमेग्राउण्ड या विजिटर? आप भी क्या याद करोगी की कितनी दिलदार लड़की से पला पड़ा है.", उनको उलझन में छोड़ वह हिरणी सी उछलती ड्राइंग रूम से होती पिछले आँगन की तरफ दौड़ी तोह अलका भी हंसती सी नीच भाग गई.

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"ओह मेरी बची. देख के देख के.", वह भगति नीचे आई तोह आँगन में सामने से आती रेखा जी ने प्रीती को देखा तोह इतनी हे देर में वह उनके सीने से आ लगी. उसके मुस्कुराते चेहरे पर भी उन्हें वह महीन आंसुओं के निशान दिख गए.

"तुझे सताया अर्जुन ने?", रेखा जी की बात पर वो वैसे हे गले लगी बस 'ना' हे बोली और पीछे से आती अलका को देखा तोह फिर उन्होंने अलका से पुछा

"ये रोइ थी अलका? और फिर ये सब क्या है. पहले अर्जुन को भेजा था इसको बुलाने तोह वह वापिस नहीं आया. और तू भी एक घंटे बाद आ रही इसको लेकर."

"चची इसके दादा आज घर पे अकेले छोड़ गए तोह बेचारी डर के रोने लगी थी. फिर मैंने बोलै इसको की आज तू मेरे साथ सोयेगी और मई साडी रात तेरा ध्यान रखूंगी. तब कही जा के ये चुप हुई और इतनी खुश हो गई के देखो सारे घर में दौड़ती फिर रही है.", प्रीती अब रेखा जी की बांह से लगी अलका दीदी को देख रही थी. उनकी बात का मतलब समझती वह बस मुस्कुरा रही थी.

"ाची बात है न और अगर अलका के पास दिल न लगे तोह मेरे कमरे में आ जाना.", रेखा जी ने उसको अपने साथ लगाए हे डाइनिंग टेबल की तरफ ले जाते अलका को खाना लगाने के लिए कहा.

"अब तुम दोनों चुपचाप खाना कहो और फिर आराम कर लेना. अलका मुन्ना तैयार हो गया क्या जाने के लिए?", कुर्सी पर प्रीती के सामने बैठ उन्होंने अर्जुन क लिए पुछा तोह अलका दीदी ने चची को बता दिए के वह तैयार होक जाने लगा है स्टेडियम. और फिर 2 प्लेट में खाना लेकर वह वही आ गई प्रीती के पास.

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हलकी गीली सड़क सुबह की बारिश से और नहाये हुए वृक्ष. इतने सुहाने नज़ारे को थोड़ा विचलित सी करती वह laal-chaandi के रंग की बुलेट 25-30 की रफ़्तार से चलता अर्जुन आज कुछ अलग हे महसूस कर रहा था. राह चलते हुए लोग भी जैसे उसको हे देख रहे थे और किसी के चेहरे पर तोह khud-ba-khud प्रशंशा झलक रही थी. वही अर्जुन आज थोड़ी देर पहले हुई घटना को सोच mand-mand मुस्कुरा रहा था. एक छोटा सा मजाक प्रीती से करना कितना भारी पड़ गया था लेकिन उसने प्रीती को बताया नहीं था के वह आज उसको सत्ता रहा था. फिर दुःख भी बहोत हुआ था के प्रीती आज इतना रोइ सिर्फ उसके इस बर्ताव से. बेशक वह अपनी यादों में थी और अर्जुन के आने का एहसास उसको नहीं हुआ था. उस सपाट चेहरे पर भी प्रीती की आँखों में तोह वही था बस.

'कितनी पागल है ये लड़की भी न. इसलिए हे तोह मेरी धड़कन है वह.' मुस्कुराता वह ये सोच रहा था के स्टेडियम से पहले आने वाले बड़े चौक पर पुलिस का एक नका लगा हुआ था. ब्रेक लगाई तोह देखा ट्रैफिक लाइट बंद पड़ी थी और आमने सामने का यातायात सफ़ेद वर्दी वाले पुलिस के 4 मुलाजिम रोके हुए थे.

"अंकल ये क्या हो रहा है?", साथ हे खड़े स्कूटर पर बैठे अधेड़ से चस्मा लगाए व्यक्ति से पुछा उसने.

"बीटा वह मंत्री आ रहा होगा कोई. जनता को परेशां करना तोह बस इन्ही लोगो के हाथ में है नहीं तोह पुलिस ऐसा नहीं करती.", इंसान शायद ज्यादा हे परेशां था इन राजनेताओ की शाही ज़िन्दगी से. अर्जुन बस मुस्कुराता अपनी मोटरसाइकिल को साइड स्टैंड पर खड़ा किये सामने देख रहा था. बीच से गुजरती सड़क पर साईरन की आवाज सुनाई दी जो थोड़ी दूर से आ रही एक सफ़ेद गैप्सी, जिपर लाल बत्ती तिकी थी से आती लगी. और इधर सड़क के सामने से एक लड़का जाने कसीसे कैंची साइकिल चलता वहां बीच चौराहे पर आ पंहुचा. पुलिस वाले से चूक हुई थी और ये लड़का भी शायद साइकिल को रोक न पाया था. 12-13 साल का ये डरा सा लड़का जैसे हे चौक के बीच आया वैसे हे गाडी के टायर की चीखती आवाज हुई और 5 गाड़ियां कतार से रुक गई. अर्जुन किसी चीतः सा दौड़ता वह पहुंच गया मोटरसाइकिल अपनी जगह छोड़. साइकिल सड़क के बीच गिरी थी और लड़का सेहमा सा सामने काली वर्दी पहने उस रोबदार ड्राइवर को अपनी और आते देख रहा था. किसी पुलिस के सिपाही में भी हिम्मत न हुई के वह अपनी जगह छोड़ कर वह beech-bachav करता लेकिन तभी 'तड़ाक' की आवाज आई और लड़का अपने गाल पर हाथ रखे बस रो पड़ा.

"बहनचोद बाप की सड़क है जो को करतब दिखा रहा है? मर्डर जाता तोह गले पद जाता अभी. 2 कौड़ी के साले बचे पैदा करके सड़क पर छोड़ देते है.", वो लम्बा सा रोबीला ड्राइवर मिजाज से हे किसी कसाई सा था जिसने इतने छोटे बचे पर करारा हाथ जड़ दिए था.

'काड्डाआक' ये आवाज तोह पहले वाले से भी कही दसगुना तेज थी लेकिन इस बार वो ड्राइवर जमीन पर पड़ा था, अर्जुन के इस झन्नाटेदार थप्पड़ से. फुर्ती से 3 आदमी जिप्सी से बहार लपके, हाथ में बंदूके लिए और सर पे गोल काली टोपी में.

"ोये लड़के. रुक नहीं तोह अंजाम के लिए तू जिम्मेदार होगा.", एक ने पास आते इतना कहा हे था के गर्दन दबोचते हुए अर्जुन ने उसको जिप्सी के बोनट पर टिका दिए.

"तुम्हारे बाप की सड़क है क्या? और दिमाग घुटने में है जो एक बचे पर हाथ उठा दिए इस आदमी ने और तुम मुझे धमका रहे हो.", पीछे से भागते हुए आये 3 पुलिस वालो ने उसको पकड़ लिए था और इधर सफ़ेद अम्बस्सडोर कार से कुर्ते पाजामे में एक ऊर्जावान बुजुर्ग नीचे उतरे जिन्होंने इशारे से सबको रुकने को कहा तोह 2 बन्दूक जो अर्जुन पर तन्नी थी नीचे झुक गई और पुलिस वाले भी पीछे हट गए.

"सही बात है बीटा. सड़क इनके बाप की नहीं है और इस ड्राइवर ने भी गलत किआ बचे पर हाथ उठा कर.", इतना बोलकर वह मंत्री जी अर्जुन के पास आते उस छोटे लड़के के गाल पर हाथ फिरते उसका होंठ देखने लगे जिस से हल्का खून रिस रहा था.

सड़क के दोनों तरफ ाची खासी भीड़ हो चुकी थी वाहनों की आवाजाही रुकने से और बाद में इस घटना के होने से. इधर इन मंत्री महोदय ने अपने ड्राइवर को आँख दिखाई तोह वह सकपकता सा हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगने लगा.

"अंकल जो समझदार थे वह सभी तोह अभी भी देखिये नियम से खड़े है अपनी जगह. ये बेचारा बचा अगर छोटी सी गलती कर गया तोह काम से काम ऐसी प्रतिकिर्या तोह नहीं मिलनी चाहिए थी इसको. कल यही फिर समाज के नियम तोड़ेगा तोह लोग गरीबी, जाट या जाने किस और बात के इल्जाम लगा देंगे इसके गलत राह पर चलने के लिए. लेकिन सिर्फ यही याद रखेगा इस घटना को जिसने इसके अंतर्मनन को पीड़ित किया है.", अर्जुन हाथ जोड़ कर वापिस मुड़ने लगा तोह मंत्री जी ने आवाज लगते हुए उसको रोक लिए. बड़े ध्यान से देख रहे थे वह इस इंसान को. 6 फ़ीट से ऊँचा, शरीर से इतना बड़ा लेकिन मासूम चेहरा और गंभीर बातें करता ये नौजवान. उन्होंने सभी गाड़ियां चौक से आगे करने को कहा और ट्रैफिक को जारी करने का निर्देश देते फुटपाथ पर अर्जुन के कंधे पर हाथ रख के खड़े हो गए. एक पोलिसवाले ने भी प्यार से उस छोटे लड़के को सड़क पार करवाते हुए जेब से कुछ मीठी गोलियां भी खाने को दी. और वह भी उस जगह चलता आ गया जहा 4-5 अंगरक्षको और एक बड़े पुलिस अधिकारी के साथ अर्जुन और मंत्री जी खड़े थे.

"क्या मई तुम्हे जानता हु बीटा?", उन्होंने उसके चेहरे को गौर से देखते हुए कहा तोह अर्जुन ने ना में गर्दन हिला दी.

"लेकिन जाने क्यों मैंने चेहरा भी देखा है कही और ये बात भी सुनी हुई सी थी. जो तुमने कही की जुर्म के पीछे कोई उस चिंगारी को नहीं देखता जो बहोत पहले लगी होती है इंसान के मैं में बस सभी वह देखते है जो आज हुआ होता है. किसी बड़े इंसान ने ऐसा हे कुछ कहा था मुझे, लेकिन याद नहीं आ रहा."

"पंडित रामेश्वर शर्मा, जी वह मेरे दादाजी है. उनसे हे मैंने सीखा था के 20 साल बाद किसी अपराधी को पकड़ने से ाचा है आज हे उसके साथ होने वाले अन्याय को रोक लिए जाये. और शायद कभी आप उनसे मिले हो.", हाथ जोड़ते हुए उसने ये बात कही इधर एक ट्रैफिक पुलिस वाला जो नाके के समय अर्जुन की तरफ खड़ा था वह उसकी मोटरसाइकिल को खींचता हुआ उनकी तरफ ला रहा था.

"वाह बीटा. पंडित जी (आह सी भरते हुए उन्होंने कहा).. मेरे मित्र है वह और बड़े एहसान है उनके भी मुझपर. और तुम्हारा बाप हैं न शंकर वह जवानी में ऐसा हे था, बस बातें अलग थी उसकी." अर्जुन के बाप का जिक्र करते वह मुस्कुराये तोह वह पुलिस अधिकारी जो साथ खड़ा तोह वो भी हंस दिया.

"गलत बात तोह नहीं कही मैंने सुरेश?", अपने इस अधिकारी को हँसते देख उन्होंने भी वैसे अंदाज में कहा

"नहीं सर. बिलकुल सही बात कही आपने डॉ शंकर के लिए. ये विनोद अभी तक एम्बुलेंस में होता और शंकर बात तोह सुनता भी कहा. बस आपको देख कर बेशक गले लग जाता.", जिस ड्राइवर को अर्जुन ने थप्पड़ मारा था अब वह भी खिसियाता सा मुस्कुरा रहा था.

"ाचे लड़के हो बीटा तुम. पंडित जी को तुम पर नाज होगा. उन्हें बताना के हमने इज़्ज़त और प्यार भेजा है उनके नाम. शंकर से तोह मिलना हो हे जाता है जब उसके शहर जाते है तोह." एक बार उसको गले लगते हुए वह आगे चलने लगे तोह अर्जुन ने पीछे से आवाज लगाई.

"अंकल नाम हे नहीं पता तोह क्या कहूंगा?", मंत्री जी के अंगरक्षाक ने कार का दरवजा खोल दिए था तोह बैठने से पहले हे वह मुस्कुराते हुए बोले, "चंदू बोल देना वह समझ जायेंगे." और बैठ कर बढ़ चले अपने काफिले के साथ.

"बीटा तुम पंडित जी के बचे हो?", मोटरसाइकिल में चाबी लगते हुए अर्जुन बैठने लगा तोह ये 2 सितारा वर्दी वाले पुलिस कर्मी ने कंधे पर हाथ रखते पुछा. बड़े प्यार से देख रहा था वो अब अर्जुन को जहाँ पहले यही था जिसने उसकी ब्याह पकड़ ली थी घटना के समय.

"जी अंकल. अर्जुन शंकर शर्मा नाम है मेरा. और आपका है श्री तेजपाल शर्मा. और ये कहीं सुना है मैंने.", किक लगाने से पहले अर्जुन इन व्यक्ति को गौर से देखने लगा.

"बस बीटा इतना कह दिए बहोत है के पहले देखा है. तुम्हारी माँ रेखा को कहना के उनका बड़ा भाई भी अब उनके शहर में है. बड़े ताऊजी का बीटा हु मई उनके और तुम्हारा मां हु.", अर्जुन नीचे उतारकर उनके पाँव छूने लगा तोह उन्होंने गले से लगा लिए. गोर और ाचे कद्द के थे वह, जैसे उसकी माँ और बहने भी थी.

"आप हमारे घर नहीं आएंगे?" अर्जुन ने उन्हें देखते हुए पुछा.

"आऊंगा न बीटा लेकिन बहिन के घर तोह सिर्फ त्यौहार या रक्षाबंधन पर हे आते है. रेखा हे तोह एक बहिन है हमारी पूरे 3 परिवार में. और तुम तोह अपने नाना के घर शायद 10-11 साल पहले हे आये थे. ये यूनिवर्सिटी के पास वाले थाने का इंचार्ज मैं हे हु. आना बीटा कभी अभी तोह शायद तुम्हे भी कही जाना है और मुझे भी.", एक बार और गले लगने के बाद वह प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते चलने लगे और उनके साथ हे बाकी सिपाही भी, जो अर्जुन का चेहरा देख कर गए थे की ये लड़का जहा दिखे कभी उलझना नहीं इसके साथ.

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"15 मिनट देरी से हो और कोई सफाई नहीं चाहिए. 100 uthak-baithak करने के बाद बलबीर के पास दौड़ जाओ.", जोगिन्दर जी ने आते हे अर्जुन से कहा और अर्जुन बैग एक बेंच पर रखता बिना कपडे बदले अपनी सजा पूरी करने लगा. बाकी लोग अभ्यास में लगे थे और स्टेडियम में आते हुए अर्जुन को आज ज्यादा लोग नहीं दिखे थे. 100 दंड बैठक पूरी करते हे शरीर गरम हो गया था. अपना बैग उठा के वह जल्दी से कपडे बदल कर गयम में पहुंचा जहाँ बलबीर एक योग की गद्दी पर लेता सपने ले रहा था.

"उठो मुंगेरी भैया. और आ जाओ इस बेंच पर.", बलबीर के गाल थपथपा के अर्जुन रोड में प्लेट लगाने लगा तोह हँसता हुआ बलबीर भी उठ खड़ा हुआ.

"आज लगता है पहली सजा मिल हे गई हीरो को.?", रोड के एक तरफ खड़े होते उसने अर्जुन को देखते कहा जिसके शरीर पर हल्का पसीना था.

"हाँ भाई. आप सही कहते हो के वो द्रोणाचार्य हे है. साँसे लेने से पहले हे ऐसे देख लिए जैसे उनको निशाना मिल गया जिसपर तीर लगाने का इन्तजार कर रहे थे काफी समय से.", हँसता हुआ वह बेंच पर लेट कर अभ्यास करने लगा और फिर दोनों अगले आधे घंटे तक बस वही रहे.

"हाँ तोह आज अर्जुन तुम मार खाओगे और बलबीर तुम इसके श्री पर उचित दुरी से 3-1-1-3 का अभ्यास करोगे. चेस्ट गार्ड लगा लो. 5 सेट के बाद दोनों जगह बदल लेना.", 'ये द्रोणाचार्य नहीं महिषासुर है भाई' उनकी बात सुनकर बलबीर ने वह सफ़ेद रंग का छाती पर pehan-ne वाला कवच अर्जुन की पीठ पर बांधते हुए कहा तोह दोनों हंसी मजाक करते फिर लगन से अभ्यास करने लगे. आज अर्जुन को समझ आया था के शरीर के किस भाग को सही से पंच करना होता है. बलबीर भी प्रहार वैसा हे कर रहा था जैसे अभ्यास में करना होता है. सिर्फ लक्ष्य तक अपना सटीक पंच लेकिन कोई ज्यादा दबाव नहीं. अर्जुन ने भी वही अनुसरण किआ. फिर अभ्यास होने पर जोगिन्दर जी ने खुद दोनों के हाथो से दस्ताने खोले और गार्ड हटाए.

"ये पी लो लेकिन इस शीशी को कोशिश करना 6-8 घूँट में आराम से ख़तम करने की.", ये बोतल लगभग 250-300 मल की थी जो दोनों को दी थी उन्होंने, हलके हरे रंग का पानी था. 5 मिनट में हे दोनों तारो तजा हो चुके थे.

"कल अगर तुम्हे समय लगे तोह 3-4 बजे आ जाना. रविवार है तोह वैसे तोह अवकाश है लेकिन यहाँ पर कल और परसो State-level के मैच है. देखने से शायद कुछ बेहतर समझ पाओगे. और बलबीर तोह होगा हे तोह तुम दोनों का tal-mel बेहतर रहेगा.", एक टोलिया देते हुए उन्होंने कहा तोह अर्जुन ने चेहरा साफ़ करने के बाद सर हिला दिए.

"ये मई घर से धुलवा लाऊंगा सर.", अर्जुन ने तार पर टंगे हुए 5-6 तोलिये भी उतारते हुए कहा तोह वह आज के दिन में पहली बार मुस्कुराये.

"ाची बात है. चलो अब तुम दोनों निकलो मुझे अपने खिलाडी तैयार करने है.", पीठ पर चपत लगते हुए उन्होंने बलबीर को भी बहार का रास्ता दिखा दिए.

"भाई कुछ भी बोल. कोच साहब न आदमी ाचे है लेकिन कोच सख्त. वह अखरोट की तरह.", बलबीर कंधे पर हाथ रखने की कोशिश कर रहा था लेकिन लम्बाई ज्यादा होने से बस हथेली अर्जुन के कंधे पर रख उसके साथ बहार आ गया.

"बलबीर भाई आओ आपको मेरी रानी से मिलवाता हु.", उनका साथ लिए वह अपनी मोटरसाइकिल के पास आया तोह विकास पहले से बैठा था उसकी मोटरसाइकिल पर और 4-5 लड़के बस देखने लग रहे थे के ये क्या चीज है.

"भैया ये लो.", अर्जुन ने चाबी उछलते हुए कहा तोह विकास ने वह लपक ली लेकिन purv-vat हे बैठा मुस्कुराता रहा. दोनों गले लग गए जब अर्जुन उसके पास गया तोह. विकास बलबीर से भी बड़े प्यार से मिला था.

"बड़े चर्चे हो रहे तेरी इस सवारी के भाई. चौक पे तू हे था जिसने आज मंत्री का सुरक्षा कर्मी लपेट दिए?", उसकी हंसी बता रही थी की बात फ़ैल चुकी है और बलबीर को अब समझ आया के अर्जुन देरी से क्यों आया. विकास ने चाबी मोटरसाइकिल में लगाई और बलबीर को बीच में आने को कहा. आखिरी में अर्जुन को बिठा के वह तीनो निक्कर में हे बहार की तरफ चल दिए.

"झोटा है भाई ये तेरी मोटरसाइकिल. 250 किलो वजन लाड के तोह और बढ़िया चल रही. मेरे पास भी है एक लेकिन इस बार गांव जाऊंगा तोह लेके आऊंगा.", सच में हे विकास बड़ी दक्षता से चला रहा था इस गाडी को. उसके और अर्जुन जैसे हे जवान तगड़े बने थे इस सवारी के लिए.

"भाई ये आपकी हे तोह है फिर गांव वाली वही रहने दो. वैसे भी तोह आप आधा समय तोह बहार रहते हो. अगर कभी मुझे अपने गाँव लेकर गए तोह वही मई चलने का मजा लूंगा न.", अर्जुन के प्यार से वह गदगद हो गया था. बुलेट को एक बड़ी जूस की दूकान के बहार रोका तोह वह पहले से हे कई जवान खिलाडी खड़े जूस पी रहे थे या इन्तजार कर रहे थे. कोई 15-16 लोग थे वह इस समय लेकिन जैसे हे उन्होंने विकास को देखा तोह वह बारी बारी से उसके पाँव छूने लगे. कुछ उनमे से बड़े थे तोह वह बस गर्दन झुका कर मिल रहे थे.

"अरे बस बस भाई. आराम से पीयो और स्टेडियम के बहार मैं पहलवान विकास कोणी. यो देखो मेरे भाई के सोचेंगे मेरे बारे में? प्रजापति ोये, 3 गिलास बना भाई आये है मेरे.", ठेठ हरयाणवी में बोलते हुए विकास ने एक बेंच उस जूस कुटेर के बहार रखते हुए दोनों को वह बैठाया.

"भाई ले चलूँगा गाँव भी. ये पहली तारीख को मई बहार जा रहा हु आज पासपोर्ट आ गया था मेरे, चाचा ने हे बनवा के दिए है. फेर जब आऊंगा तोह एक नेशनल कैंप है 2 दिन का उसके बाद चलेंगे मेरे गांव. तेरे घर मई अपने आप संदेसा भिजवा दूंगा.", अर्जुन की पीठ पर हाथ रखते हुए वह बता रहा था अगले कम्पटीशन के बारे में. फिर थोड़ा मजाक बलबीर के साथ भी किआ.

"रे बलबीर, कल तेरे थप्पड़ लगा मैंने सुना.", बलबीर नजरे झुकता सा इस बात से शर्मा गया. अर्जुन हैरानी से देखने लगा तोह विकास ने आँख मार दी.

"भाई वह ग़लतफहमी हो गई थी उस लड़की को. बिना सुने हे कान गरम कर दिए मेरा.", बलबीर सफाई दे रहा था लेकिन विकास पेट पकड़ एक हंसने लगा तोह अर्जुन बस उन्हें देख मुस्कुराने लगा.

"ग़लतफहमी? भाई एक तोह तू पव्वा है, ऊपर से वह छोरी 6 फुट की. साले ने टांग हे सेहला दी बता भाई.", और फिर वह हँसते हुए गिरने हे लगा के बलबीर ने हे हाथ पकड़ लिए जो किसी लड़की सा शर्मा रहा था. बात पल्ले पड़ी तोह अर्जुन हँसता हुए दिवार से टकरा गया.

"अरे शिकारी तू मत हंस. तेरी खबर भी है मेरे पास. चुन्नी तोह छोरी मुँह पे बाँध लेगी लेकिन kad-kathi और स्कूटर पे जिसके साथ थी वह तोह दिखेगा. के नहीं?", अर्जुन की हंसी एकदम से ृक्क गई. और विकास फिर हंसने लगा उसका चेहरे देख.

"आपने कहा देखा? वह तोह दोस्त है बस भैया?", अर्जुन झेंप गया था.

"अरे तेरी दोस्त ने हे कल धरा था इसके कान के नीचे. दोपहर में खाना खा रहे थे मेस में. और ये जनाब उस से टकराने के बाद नीचे झुक के उसकी पिंडली सेहला गए. दे दिया कान पे जाटनी ने." अब बलबीर भी हंस रहा था उसके साथ. इतने में हे वह छोटे कद का जूस की दूकान वाला फलों के जूस के 3 बड़े गिलास ट्रे में लेके उनकी तरफ आ गया.

"भाई पता है तू ऐसा वैसा लड़का नई है और वह जाटनी भी ाची चोरी है. बस समाज है न वह लड़का लड़की को एक नजर से देखता है. और कोई बड़ी बात नई तू टेंशन मत ले. वैसे आज तेरा जो पन्गा हुआ तोह तू बच कैसे गया.?" विकास ने बात बदलते हुए कहा.

"भैया मई तोह बाकी के लोगो को भी धार लेता लेकिन फिर पुलिस वाले आ गए और वह मंत्री जी. पता चला के दादाजी के दोस्त है और वह अंकल जो पुलिस इंचार्ज थे, मेरे मां हे निकले.", अर्जुन ने सर नीचे करते जूस का घूँट पीया तोह बलबीर गिलास मुँह से लगाए दोनों की तरफ देख रहा था.

"पुलिस वाले तोह भाई होते हे मामे है और तेरे वाला तोह असली निकल गया.. हाहाहा.. लेकिन भाई किस्सा मशहूर हो गया आज ये. सच में दिलेर आदमी है जो वर्दी वाले के थप्पड़ जड़ दिए बीच सड़क में.", विकास प्रशंशा के साथ प्यार भी दिखा रहा था.

"भाई अपने कोच साहब भी कल इसके जाने के बाद कह रहे थे के ये विभाग के अधिकारी गौतम जी की नजर में आ चूका है. वो उनके पीछे पड़े है के इसको हैवीवेट के लिए तैयार करो. अपनी तरफ से इस केटेगरी में कोई मुक्केबाज नई है अभी तक. लेकिन उन्होंने अभी जवाब नई दिए कोई.", बलबीर की बात पर अर्जुन थोड़ा हैरान हुआ लेकिन विकास शांति से घूँट भरता बोलै.

"वो करेंगे भी नहीं इसको तैयार. कोच साहब ने साफ़ बता दिए था के अर्जुन को एक मुक्केबाज से ज्यादा प्रशिक्षण देना है. इस साल ये बेशक मर्जी से डिस्ट्रिक्ट खेल ले सितम्बर में लेकिन अगले साल ये मेरे खेल में आने वाला है. और छोटे बस अपना ध्यान और समर्पण कोच पे रखिओ, खेल कोई भी हो फरक नहीं पड़ता. और उठो अब इसका घर का टेम हो गया रे बलबीर." प्रजापति को गिलास पकड़ते हुए इस बार विकास ने चाबी बलबीर को पकड़ा दी तोह वह अर्जुन की तरफ देखने लगा.

"चला रे. इसकी तरफ के देखे है, तेरा दिल है और फिर तेरे तोह पास थी भी पिछले साल वो फौजी वाली मोटोरोसीक्ले.", बलबीर ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की तोह इस बार अर्जुन बीच में और विकास आखिरी में बैठा था.

"भाई वो मोटरसाइकिल मेरे बड़े भाई की थी. गोली खा के बिस्टेर पे था 4 महीने तोह मई ले आया था यहाँ. लेकिन एक दिन भाई जरूर ये सवारी लूंगा, चाहे चली हुई लू.", बलबीर को शायद गहरा लगाव था इस से और सबसे बड़ी बात थी की इन दोनों से बेहतर तरीके से चलता हुआ स्टेडियम के अंदर आया तोह दोनों को नीचे उतारते हुए एक टांग पर पूरी मोटरसाइकिल गुआंते हुए एक कला गोल घेरा जम्में पर बना दिए जिसको अर्जुन हैरानी से देख रहा था.

"छोटे भाई. बड़ी से बड़ी चीज भी काबू कर सकते हो बस उस से प्यार करो और खुद को उसपर हावी रखो. सरपंची झोटा भी एक पतली रस्सी के साथ बालक लिए घुमते है क्योंकि वह उस से प्यार भी करते है और खाना देके ये बता देते है के वह मालिक है.", विकास ने बलबीर के हाथ से चाबी अर्जुन को देते हुए कहा तोह अर्जुन समझ गया था के control-niyantran क्या चीज है.

"और भाई इस्पे वो लिखवा ले पीछे 'रानी'." बलबीर ने हँसते हुए कहा तोह विकास ने भी कन्धा हलके से दबाते अर्जुन को जाने को बोलै.

"चल शेर. फिर मिलते है और बलबीर है न पक्की हड्डी है, बहोत सीखा सख्त है तुझे. इसको लगता होगा के मैं इसको जानता नई या देखता नई. लेकिन विकास बोलता काम था लेकिन अब उसके पास उसके 2 भाई और है." बलबीर को अपने साथ लेकर वह हाथ हिलता हॉस्टल की तरफ निकल लिए तोह अर्जुन भी खुश होता हुअबाध लिए अपनी 'रानी' को वैसे हे आराम से चलता.

"भैया, ये साड़ी दिखाना जरा.", अर्जुन आज मॉडल टाउन की उस दुकान पर खड़ा था जहाँ वह अलका दीदी को लेकर आया था ड्रेस दिलवाने के लिए. यहाँ एक पोरपङ्ख के रंग की चमकदार साड़ी को देखने के बाद उसने काउंटर पर खड़े व्यक्ति से कहा तोह प्लाटिक की मूरत पर नजर डालने के बाद उसने एक दराज से वैसी हे साड़ी का डब्बा निकल के सामने कर दिए.

"शिफॉन की बेहद उम्दा साड़ी है भाई ये. न कोई tadak-bhadak और न हे कोई jari-tar. लेकिन कपडे का कोई मुकाबला नहीं है. हाथ में लेकर देखो.", उसने वह एक तरफ से खोलते हुए सामने की तोह अर्जुन उस मुलायम रेशमी कपडे को महसूस करने लगा. ये बिलकुल वैसा हे थे जैसे उसकी माँ की कलाई का स्पर्श.

"इसका ब्लाउज का कपडा ये है, थोड़ा सा ज्यादा गहरा लेकिन इसपर कोई प्रिंट नहीं है. ये रेशमी है और अंदर से अस्तर लगवाया जा सकता है अगर जरुरत हो." अपनी बात पूरी करते उसने वह अलग कपडा भी दिखाया. सब देखने के बाद अर्जुन ने बैग से अपना बटुआ निकला तोह उसमे 500 के 4 नोट और 100 के 2 नोट हे थे. बैंक से वह कबि अपने पैसे नहीं निकलता था क्योंकि हमेशा उसकी अलमारी में जेबखर्ची वह एक बक्से में जमा रखता था और वह भी खरच नहीं होती थी. दुकानदार ने थोड़ा भांप लिए था उसका चेहरा के वह शायद चिंतित होगा कीमत के लिए. बात भी वही थी अर्जुन के सोचने की. रेणुका बुआ के साथ और प्रीती के अनुभव से उसको लगा था के साड़ी तोह 3-5 हजार तक आती होगी.

"भाई ये 1800 की है लेकिन बस 2 हे पीेछे है दूकान पर और अप्रैल से नया माल आएगा इसलिए सभी पर 25 प्रतिशत की छोट है."

"आप पैक कर दीजिये. अगर ये महंगी भी होती तोह मई कल आ कर ले जाता. पैसे तोह हैं मेरे पास और कम् पड़ जाते तोह फिर घर से ले आता. लेनी है तोह फिर दाम जो भी होता.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए 1500 दूकान वाले की तरफ बढ़ा दिए. उसने भी साड़ी को वापिस डब्बे में डालने के बाद एक प्लास्टिक के बैग में पैक करते हुए 200 रुपये वापिस कर दिए.

"भाई तुम पहले भी आ चुके हो हमारी दुकान पर और हम ग्राहक खराब नहीं करते. कुछ काम भी होते तोह मई दे देता साड़ी तुम्हे. पैसों का क्या है आने होंगे तोह आएंगे नहीं तोह नहीं." वह हँसते हुए बोलै तोह अर्जुन हाथ मिलते हुए बहार आ गया.

"Hello अर्जुन.", कान में ये मीठी आवाज सुनाई दी तोह वह मोटरसाइकिल में चाबी लगता रुक कर पीछे देखने लगा. आकांक्षा कड़ी थी ठीक पीछे वही पेड़ के नीचे. मुस्कुराती हुई किसी बिजली सी चमकदार.

"Hello आकांक्षा. कैसी हो? और यहाँ?", अर्जुन थोड़ा करीब चलते हुए बोलै तोह वह भी अब नजदीक आ कर कड़ी हो गई थी. Kaali-peeli धारियों वाली कासी टीशर्ट और नीली चुस्त जीन्स में खुल्ले बाल, बेहद आकर्षक लग रही थी वह. और अर्जुन को देख कर तोह चेहरे पर जैसे अलग हे नूर सा आ गया था.

"हाँ वह यहाँ आई थी पार्लर में. बाल ठीक करवाने, फिर स्कूल जाने पर टाइम मिले न मिले. पापा चले गए थे घर वापिस कुछ काम था उन्हें तोह बस इधर से ऑटोरिक्शा लेने लगी थी. तुम तोह एक बार भी नहीं मिले इन छुट्टियों में.", अपना बताने के बाद थोड़ी शिकायत से बोली तोह अर्जुन ने पैकेट उसके हाथ में दिए और मोटरसाइकिल पर बैठ गया.

"आओ चलते हुए बात करते है. रिक्शा के पैसे मुझे दे देना.", उसकी बात सुनकर वह खुसी से चहकती सी पास आ कड़ी हुई.

"वाह. तोह अब तुम्हे ये बाइक मिल गई घर से."

"हाँ आज हे मिली है. दादाजी का गिफ्ट है आने वाले जन्मदिन का." आकांक्षा लड़को की तरह पीछे बैठ गई थी डब्बे को दोनों के बीच रखती. अर्जुन ने मोटरसाइकिल को घूमते हुए सड़क पर चढ़ा लिए.

"एक तोह मुझे पता नहीं था के तुम रहती कहा हो. दूसरा जब पता चल गया तोह फिर सोचा के तुम्हारे घर तोह आ कर मिलना ठीक नहीं. ऐसा होता तोह तुम उस दिन खुद हे मुझे रोक लेती.", अर्जुन की बात सुनकर आकांक्षा ने वह डब्बा बीच से निकलते हुए एक तरफ कर दिए और एक हाथ उसकी कमर में रखती पीछे से चिपका कर बैठ गई.

"दिल तोह था के तुम्हे रोक लू. लेकिन जो मेरे साथ में मेरी सहेली कड़ी थी वह तुम्हारी हे बात कर रही थी और संदीप भी साथ में था तोह मैंने चुप रहना ठीक समझा. वैसे मेरे घर में ऐसा कुछ नहीं है. एक्चुअली, तुम तोह कभी भी आ सकते हो.", उसके गोल नरम दूध अर्जुन को अपनी पीठ पर हलके दबते महसूस हो रहे थे. यहाँ से उनके सेक्टर तक की ये सड़क भी शांत हे थी. वैसे भी शहर की ये साइड hari-bhari और bheed-bhaad से दूर थी.

"जब टाइम मिला तोह जरूर आऊंगा. लेकिन ये भी तोह पता नहीं के तुम किस समय होती हो घर और किस समय नहीं.", अर्जुन का तरीका अलग था जिस से वह जान सके की आकांक्षा कहा रहती है या कैसे समय निकलती है.

"मई तोह रहती हे घर पे हु. तुमने देखा नहीं के मेरे कोई दोस्त नहीं है सिर्फ गली में हे 2-3 है जिन से थोड़ा बहोत बात कर लेती हु. और Papa-mummy तोह हमेशा ऑफिस. शाम को 6 बजे हे आते है वापिस लेकिन पापा तोह ज्यादातर 10 बजे और कभी कभी टूर के कारण आते भी नहीं.", आकांक्षा अपना चेहरा उसके कंधे से लगती बता रही थी वो सब जो अर्जुन ने पुछा भी नहीं था. एक यही लड़का तोह था जिस पर उसका दिल आया था और पूरे स्कूल का दिल इस लड़की पर था. अर्जुन को भी पता था के वह उसको किस नजर से देखती है लेकिन वह दोस्त या बस एक गहरा दोस्त हे मानता था खुद को.

"मंडे देखता हु अगर लाइब्रेरी नहीं गया तोह मई आऊंगा तुमसे मिलने. Ice-cream खाओगी आकांक्षा?", अपने सेक्टर के बहार एक 'क़्वालिटी Ice-Cream' की रेहड़ी कड़ी देख अर्जुन ने वही इस बड़ी पार्किंग पर मोटरसाइकिल रोक ली थी. इस जगह अभी dukaan-showroom सिर्फ काटे गए थे लेकिन अभी वह पूरी तरह से खाली हे पड़ी थी.

"चॉकलेट कोर्नेत्तो." मुस्कुराते हुए आकांक्षा ने कहा तोह अर्जुन ने उस रेहड़ी वाले की तरफ देखा.

"अभी लाया साहब.", अपने रोज के स्वाभाव के मुताबिक इस आदमी ने अर्जुन को साहब हे कहा, जैसा वह अधिकतर गाडी वाले या premi-jodo के सामने लड़को को कहता था. फिर एक कोन बढ़ता वह चलके आया तोह अर्जुन ने पर्स से 100 का नोट बढ़ा दिए. आकांक्षा मोटरसाइकिल पे बैठी थी और अर्जुन बस सामने खड़ा उसको खाते देख रहा था.

"तुम नहीं खाओगे?"

"नहीं मई ice-cream नहीं खता.", हँसते हुए उसने कहा तोह आकांक्षा ने थोड़ा प्यार दिखते अपनी हे ice-cream उसके मुँह के पास कर दी. बिना हे जगह देखे के माहौल कैसा है. जबकि वह वैसे भी कोई खास लोग थे हे नहीं. रेहड़ी वाला आगे चल दिए था और ikka-dukka कोई सड़क से cycle-scooter पर निकल रहा था. यहाँ दोनों पेड़ के नीचे इस खुली पार्किंग पर खड़े थे. अर्जुन ने भी दिल रखने के लिए सिर्फ होंठो से छु भर लिए.

"मतलब सच में नहीं खाते?", वह उसके होंठो पर लगी ice-cream देखते हुए बोली. अंदर से तोह आकांक्षा को महसूस हुआ था के जैसे अर्जुन ने उसके हे होंठो को चूम लिए था. लेकिन वैसे हे हल्का मुस्कुराती वह खाती हुई बोली. "फिर तोह हम चल हे पड़ते है यहाँ से, कोई फायदा नहीं अगर अकेले हे खानी है तोह.", उसने नखरे से कहा था जिसपर अर्जुन मुस्कुरा दिए. अपने टंगे पिछली सीट पर दोनों तरफ करती वह अर्जुन को दिखने लगी थी की अब यहाँ से चलो और अपनी सीट पर बैठो.

"चलो तुम्हारी ice-cream तुम्हे मुबारक.", बैठने से पहले अर्जुन ने अपने होंठ उसके गाल पर लगते हुए चूम लिए और फिर बिना प्रतिकिर्या देखा आगे बैठते हुए किक मार कर मोटरसाइकिल उतनी हे रफ़्तार में आकांक्षा के घर की और मदद ली. पीछे बैठी हुई आकांक्षा तोह जैसे अभी तक सपने में थी. वो हमेशा शर्माने वाला, अकेला सा लड़का आज कैसे उसके गाल खुलेआम चूम गया था. और अब वह बातें करता भी hansta-muskurata है. फिर अपने गाल को छु कर उसने मुस्कुराते हुए बची ice-cream फेंक दी और अर्जुन के गर्दन पर हल्का सा चूम लिए.

"जितनी तुमने वापिस की थी वह मैंने फिर से तुम्हे दे दी.", उसकी बात को समझकर अर्जुन बस हंस दिए.

"जब अगली बार मिलूंगा तब जरूर ाचे से वापिस करूँगा." उनके घर के बहार बुलेट को रोकते उसने फिर से आकांक्षा को देखा जो एक दिलकश मुस्कान देती उसको हे देख रही थी.

"ाचा चलता हु." धीरे से उसने ये कहा तोह आकांक्षा ने भी हाथ हिला दिए और फिर उसको मोटरसाइकिल मदद कर वापिस जाते देखने लगी. हैंडल पर पैकेट लटकाये वह आराम से जा रहा था, गोल शीशे में पीछे कड़ी आकांक्षा को देखता.

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"बीटा ये लड़का कौन था? पहले तोह नहीं देखा इसको.", विनय तनेजा, जो घर के अंदर से हे अर्जुन को देख कर चौंक गया था अपनी बेटी से पूछ रहा था. इंसान ये भी अमीर था और घर भी शानदार बना रखा था. 2 कार हरदम घर में रहती थी और 1 घर के गेट पर. तनेजा जहा एक गहरे रंग का आदमी था वही उसकी बीवी जैसे उम्र को धोखा देती एक जवानी से भरपूर पंजाबी महिला थी. गोरी, गदराई और ाची padhi-likhi. एक हे बेटी थी जो बिलकुल हे अपनी माँ पर गई थी.

"पापा, वह स्कूल फ्रेंड है मेरा. अर्जुन शर्मा. पार्लर के पास हे दिख गया था तोह घर तक ड्राप करने आ गया. घर भी हमरे हे सेक्टर में और ाचा लड़का है.", अपने कमरे की तरफ जाती हुई वह बस इतना बताती निकल गई.

"कौन था बेटी? और ऐसे हे घर से भेज दिए पीना chai-thanda पूछे.", अंदर ड्राइंग रूम में कुछ काम करती उसकी माँ ने पुछा तोह आकांक्षा बस मुस्कुराती सी अपने कमरे में चल दी और दरवाजा बंद कर लिए.

"ये लड़का डॉ शंकर का बीटा था. हमारी हे बेटी के स्कूल में उसके साथ पढता है.", अंदर आ कर विनय अपनी बीवी के सामने बैठ कर बोलै तोह सुषमा तनेजा बस मुस्कुरा दी नाम सुनकर.

"ाचे घर से है तोह लड़का ाचा हे होगा.", विनय क्या जवाब देता बस वह कुछ याद करता सा गाल को सहलाता बस 'हम्म्म्म' हे बोल पाया. बेटी ने पसंद भी किआ तोह वही जिसने खुद बाप को अपनी बेटी सामान लड़की की चुदाई करते रेंज हाथ पकड़ा था. वाह ऋ किस्मत कैसा खेल खेला. कल को बेटी के सामने वह इस से नजर कैसे मिलाएगा.

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घर पहुंच कर सीधा वह अपने कमरे में भाग गया मोटरसाइकिल को खड़ा करते हे. पता तोह चल हे गया होगा घरवालों को उसके आने का लेकिन हाथ में पकड़ा पैकेट लिए वह जल्दी से कमरे में आया और अपनी अलमारी में पीछे की तरफ उसको छुपता वह जूते खोल साफ़ कपडे लिए तारा के कमरे में आया.

"हाँ तोह मैं नजर आ हे गई आखिर.", तारा ने अर्जुन को अपने सामने देखा तोह नाराजगी से कहा.

"तुम नजरो से दूर हे कब हुई थी.", वैसे हे उसके पास जा कर बाँहों में लेते उसने कहा तोह तारा शर्माती सी पीछे होने लगी.

"वैसे तोह कहती हो मई पास नहीं आता. और अब खुद दूर कर रही हो.", अर्जुन ने टीशर्ट के ऊपर से हे उसका नरम और मोटा उभर दबाते हुए कान में सरगोशी की तोह इतने में हे उसकी छूट में सनसनी होने लगी.

"आठ... गंदे बचे पहले नाहा तोह लो. पसीने के स्मेल आ रही है.", नखरे और शर्म से तारा ने इतना कह तोह दिए लेकिन ये पसीने की गंध उसको उत्तेजित कर रही थी. और अर्जुन ने भी वही बात कह दी.

"पसीना तोह तुम्हे भी बहोत आता है. और फिर परवाह भी नहीं करती जब दोनों हे पसीने में लिपटे होते हैं.", उसकी बंद हो चुकी आँखों को देखते हुए अर्जुन ने तारा के होंठ चूसने शुरू किये तोह वह खुद हे एक हाथ से अपना उभर दबवाती दूसरे से उसका सर जोर से अपने मुँह पर दबाने लगी थी. अर्जुन को डर भी था के कही कोई ऊपर न आ जाये. कस के एक बार चूम कर उसने तारा को छोड़ दिए लेकिन वो प्यासी नजरो से बस उसको हे देख रही थी.

"खाने के बाद बाथरूम में. बस ध्यान रखना सबसे पहले हम दोनों हे खाना खाये. उतना समय बहोत होगा हमारे लिए फिर रात का कुछ पता नहीं के कोण यहाँ सोये और कोण कहा.", अर्जुन ने दूसरा उभर भी दबाते हुए कहा और तारा ने भी हाँ में सर हिलाते हुए जवाब दिए. वह से निचे आने के बाद वो सीधा बाथरूम में घुस गया.

"टोलिया तो ले ले बीटा.", रेखा जी ने आवाज लगाई तोह अर्जुन ने टीशर्ट उतरने के बाद दरवाजा खोलते हुए उन्हें देखा और रेखा जी भी उसके चौड़े सीने और प्यारी सूरत को देखती हक्क पर टोलिया तंग कर मदद गई. दरवाजा फिर से बंद कर वह नहाने लगा इधर रेखा जी अपने बेटे के लिए दूध तैयार करने में लगी थी. अलका और प्रियंका को प्रीती थोड़ी देर पहले हे अपने घर लेकर चली गई थी उन्हें बता कर की आज रात वह वही रहने वाली है और खाना भी पारवती बना देगी. पुछा तोह उन्होंने आरती से भी था लेकिन आरती ने मन कर दिए था ये कहते हुए की आज रात को वह अपनी बुक ख़तम करने वाली है. कल वह प्रीती के साथ उसके घर हे रहेगी. इधर नाहा कर अर्जुन बहार आया तोह उसकी माँ ने टेबल पर दूध का बड़ा गिलास और 2 लाडू रख दिए थे.

"ला ये टोलिया मुझे पकड़ा और इधर बैठ.", उन्होंने टोलिया अर्जुन के हाथ से लेते हुए ाचे से उसका सर सुखाया और फिर आरती को आवाज दी.

"हाँ ताईजी. बताइये.", एक सफ़ेद टीशर्ट और गुलाबी प्रिंट वाला पजामा पहने और आँखों पर नजर का चस्मा लगाए वह आई तोह अर्जुन ने बड़े गौर से उसको देखा. कितनी मासूम और हमेशा अकेले में रहने वाली. बस ज्यादातर वह अपनी बहनो में हे बातें कर लेती थी नहीं तोह बस किताबे और उसका कमरा.

"यहाँ बैठ जा अपने इस छोटे भाई के भी पास. और मई तेरी कॉफ़ी लेके आती हु.", रेखा जी ने टोलिया तार पर डालते हुए कहा और फिर वह रसोईघर में चली गई.

"आपका दिल नहीं करता सबके साथ रहने को? हमेशा कमरे में अकेली घुसी रहती हो आप.", अर्जुन ने आँखों में देखते हुए कहा तोह आरती ने नजरे नीची कर ली.

"वैसे हमेशा तोह अकेली नहीं रहती. और ये 2 बुक्स तुमने दी है जो मुझे, ये बस मुझे कहीं जाने हे नहीं देती. आज रात पूरी हो जायँगी बस. कल से शिकायत का मौका नहीं मिलेगा.", आरती धीमी आवाज में वैसे हे बोल रही थी बिना उसको देखे.

"पता है ये चस्मा आपकी ख़ूबसूरती और बढ़ा देता है. और ये इतनी लम्बी पलके, ये शीशे पर नहीं लगती क्या?", अर्जुन को ऐसे तारीफ करते देख गोर गाल हलके गुलाबी होने लगे और इतने में हे रेखा जी 2 कप लिए वही टेबल पर आ गई. आरती की बगल में baith-te हुए उन्होंने अर्जुन से कहा.

"वो आरती को अपने साथ जरा मार्किट ले जाना बीटा. देसी घी और थोड़ा सामान लेके आना है. फिर बादल बने हुए है तोह रात में जाना ठीक नहीं होगा.", एक पर्ची और पैसे अर्जुन की तरफ करती वह बोली तोह अर्जुन ने लड्डू कहते वह पकड़ लिए.

"माँ, मैं कह रहा था के आरती दीदी तोह व्यस्त है क्योंकि किताब पढ़ना ज्यादा जरुरी है इनके लिए बजाये की ये छुट्टियां हमारे साथ बिताने के तोह आप हे चल लीजिये मेरे साथ मार्किट.", अर्जुन की इस बात पर थोड़ा चौंकते हुए आरती ने देखा तोह अपनी ताईजी को हँसते देख वह झेंप गई.

"नहीं ऐसी कोई बात नहीं. मैंने तोह ये कहा था न के रात को पढूंगी और वैसे भी ख़तम होने हे वाली है. मैं चल रही हु मार्किट.", आरती ने जवाब देने के बाद बस ख़ामोशी से कप को होंठो से लगा लिए.

"माँ फिर आपको तोह मई कल हे लेके जाऊंगा अपने साथ. आज आरती दीदी हे सही.", अर्जुन ने अपनी माँ को मुस्कुरा कर कहा तोह वह थोड़ा अचंभित सी देखने लगी.

"मैंने मार्किट क्यों जाना है? कोई काम नहीं है मुझे तोह वह."

"ओफ्फो, मुझे कुछ लेना है मेरे लिए तोह फिर आप चलेंगी तोह गलती नहीं होगी न. और वैसे भी अभी मुझे खरीदारी करनी कहाँ आती है.", अब वह समझी की अर्जुन क्या कह रहा है.
 
अपडेट 50 बी

Ghar-Sansar 2 (कंटिन्यू)


गाँव में संस्कार से आने के बाद अब सभी पुरुष घर के बहार वाले आँगन में बैठे थे. आखिरी बार अपने छोटे भाई को देख भर लेने की इत्छा समय से पूरी करवा दी थी रामेश्वर जी और छोल साहब ने कौशल्या जी की. हंसमुख के घर से हे सबके लिए चाय पानी आ रहा था क्योंकि इस घर में तोह 4 दिन तक चूल्हा नहीं जलना था. अपनी भतीजी के आंसू और रुदन देख कर तोह कौशल्या जी हे रोना भूल गई थी. गाँव की औरते तोह संस्कार में शामिल होती नहीं थी तोह लगभग पूरे गाँव की महिलाये भीतर के आँगन में शौक मन रही थी और badi-bujurg रोटी हुई इस लड़की के सर पर हाथ फेरती हौंसला देने की कोशिश कर रही थी. गाँव में कौशल्या जी के पिता वैद काशीराम का बड़ा रसूख था तोह आसपास के गांव से भी लोग पहुंचे थे. बनवारी भी एक ाचा इंसान था बेशक वह ज्यादा पढ़ा लिखा न था लेकिन ाची जमीन और खूब म्हणत से दौलत के साथ इज़्ज़त भी बहोत कमाई थी उसने.

काशीराम गर्ल्स स्कूल, डिस्पेंसरी, चौपाल और मंदिर बनवाने के साथ हे बनवारी गरीब किसानो की आर्थिक मदद भी करता रहता था. और सभी उस खुशमिजाज इंसान की इज़्ज़त और प्रशंशा भी करते थे. यही बातें बहार बैठे bujurg-jawaan याद कर रहे थे. रामेश्वर जी गाँव के दामाद थे तोह उन्हें और छोल साहब को चारपाई पर बिठा बाकी सब जमीन पर बैठे दुःख व्यक्त कर रहे थे. हंसमुख को अपने भाई की मौत का बहोत अफ़सोस था क्योंकि एक वह हे था जिसकी वजह से थोड़ा बहोत maan-samman उसको भी मिलता था लेकिन उसके जाने के बाद तोह अब शायद वह भी गाँव छोड़कर अपने बच्चों के पास दूसरे शहर जाने का मैं बना चूका था.

"हंसमुख, रुपाली बिटिया के बारे क्या सोचा है तुमने?", रामेश्वर जी ने इन्तजार नहीं किआ की आज हे मृत्यु हुई है घर में और शाम को हे वह ये बात कर रहे थे अपने साले के साथ.

"जीजा जी, घर के बड़े तोह आप हे हैं. तोह फैंसला भी आप हे करोगे.", गमछे से अपना चेहरा साफ़ करता वह बोलै तोह छोल साहब ने रामेश्वर जी की पीठ पर हाथ फेरा. जैसे वह कह रहे हो के अपनी बात कहो भाई साहब.

"तुम्हारी बहिन कह रही थी की तुम भी गाँव से जाने की तैयारी कर रहे हो?", रामेश्वर जी सामने वाले से हे सब बात कहलवा लेते थे. एक यही पोलिसिअ अंदाज था उनमे की वह पहले सिर्फ सुनते थे और आखिरी में हे अपनी बात कहते थे. हंसमुख का बड़ा बीटा अब वह बैठे लोगो और अपने फूफाजी को चाय दे रहा था. एक गिलास चाय का छोल साहब को पकड़ते और खुद लेते हुए घूँट बारे.

"जीजा जी अब यहाँ जी नहीं लगेगा. एक बनवारी हे था जिसके कंधे पर मई यहाँ टिका था लेकिन अब वह नहीं रहा तोह मई भी अब यहाँ नहीं रहूँगा. बचे सेहर है तोह उनके पास हे चला जाऊंगा मेरी जमीन बनवारी की तेहरवी के बाद अपने पडोसी को बेच कर.", रामेश्वर जी अब शांत हो गए थे तोह छोल साहब ने अपनी बात कही. हंसमुख इन्हे भी जीजा हे कहता था.

"बनवारी तोह नहीं रहा और तुम भी अब जा रहे हो. ये गांव स्वर्गीय काशीराम जी की यादों से भरा पड़ा है और तुम सब की जन्मस्थली भी है. रुपाली अब हमारे साथ जाएगी परसों फूल चुगने के बाद और अब वही रहेगी. तुम अपनी जमीन का बताओ और पडोसी जमींदार क्या रकम दे रहे है वह भी समझा दो.", रामेश्वर जी तोह बस जमीन को देख रहे थे लेकिन हंसमुख थोड़ा सा हल्का हो गया था ये जान कर की रुपाली बिटिया अब उनकी बहिन के घर जा रही है.

"जी 120 किल्ले कुल जमीन है जिसमे से 60 अर्जुन बेटे के नाम करवा दी थी पिछले जाड़े में बनवारी और शंकर बेटे ने, 20 रुपाली के हिस्से है और 40 पे मई खेती करवाता हु. पटवारी के हिसाब से 2 लाख का किल्ला है लेकिन इतना पैसा अभी किसी के पास नहीं है तोह अपना पडोसी जमींदार हरनाम मेरी जमीन के 60 लाख दे रहा है." हंसमुख की बात को पास बैठे बुजुर्ग भी सुन रहे थे और गर्दन हिला रहे थे.

"तेहरवी के अगले दिन शहर चले जाना संजीव आ जायेगा तुम्हारे पास. 70 लाख तुम्हे मिल जायेंगे खाता या नगद तुम्हारी मर्जी. फैरड और रेगिस्टरी अर्जुन के नाम चढ़वा देना और 120 किल्ले अब हमारा आदमी देखेगा. Bhool-chook हुई हो तोह माफ़ करना भाई, लेकिन हमारी इत्छा है के गांव में परिवार का नाम बना रहना चाहिए और जमीन भी.", छोल साहब ने हाथ जोड़ कर कहा तोह हंसमुख ने भी हाथ जोड़ दिए.

"जीजाजी आप दोनों नाहा लीये नलके पर, मैं टोलिया और धोती लेकर आता हु. घर में भी प्रवेश करना है और संध्या हो गई है.", इतना कहने पर वह अपने घर की तरफ चल दिए और गाँव वाले भी धीरे धीरे बातें करते अपने अपने घर चल दिए थे. खाट पर बस अब ये दो dost-bhai बैठे थे. अंदर से रेणुका अपने हाथ में दवा और पानी लेकर आई रामेश्वर जी के लिए तोह उन्होंने दवा खाने के बाद प्यार से अपनी इस समझदार बेटी के सर पर हाथ फिराया.

"मेरी बची आज तूने अपनी बड़ी माँ को ाचे से संभल लिए. तू और ऋतू न होती तोह वह तोह दोहरी हो जाती रोटी पड़ती. सतीश, बस एक ाचा काम तूने कभी किआ न वह मुझे ये बेटी देकर किआ है.", रामेश्वर जी की बात पर रेणुका भी अपने ताऊजी की ब्याह को पकडे बैठ गई थी. यहाँ आज सूट के साथ सर भी ढाका हुआ था रेणुका ने और खाली kaan-matha और कलाई बता रहे थे की वह रामेश्वर जी की खून की न सही लेकिन उतनी हे सगी बेटी थी.

"भाई साहब बस वही गलती हो गई थी की दे भी नई पाया और आज अफ़सोस भी है.", इतना कह कर वह कमर पे टोलिया बांध पजामा कुरता उतार कर बनियान पहने हे थोड़ी दूर पर लगे हाथ से चलने वाले नलके के नीचे बैठ गए. हंसमुख का पोता उसको चला रहा था और वह शरीर को ाचे से धोने के बाद वहीँ बने सीमेंट के एक 3क्ष4 के बाथरूम में चले गए कपडे बदलने. रेणुका भी अब बर्तन समेत कर हंसमुख के घर चल दी जहाँ ललिता जी और माधुरी दीदी सारा काम कर रही थी. हंसमुख की बीवी के तोह घुटनो का दर्द इतना था के वह कमरे से बहार भी न आई. गाँव की हर औरत इस बात का जीकर कर रही थी की हंसमुख की बीवी ने कभी रुपाली को रोटी न पूछी थी, बेचारी 8 की उम्र से चूल्हा करती आ रही थी और ऐसे हे म्हणत से 10 कक्षा भी कर ली थी. लेकिन उसके आगे न पास में स्कूल था न माहौल.

"कौशल्या, रुपाली और ऋतू को बैठक में भेज दो.", अंदर के आँगन में आवाज देते उन्होंने कहा तोह उनकी धर्मपत्नी ने आज्ञा का पालन करते हुए ऋतू को देखा जो इस लड़की का दर्द काम करने में लगी थी, जिसका बाप उसको इस छोटी उम्र में छोड़ चला था. ऐसे हे अपने से लगाए वो रुपाली को लेकर बैठक में आ गई थी.

"बीटा, मेरे पास आओ.", रामेश्वर जी ने प्यार से अपने पास बुलाया तोह वह सिमटी सिकुड़ी सी अपने फूफा के पास चली आई.

"तुम्हारे पिता एक बहोत नेक और ाचे इंसान थे. बनवारी ने ज़िन्दगी में कभी कोई गलत काम नहीं किआ बल्कि सबका साथ हे दिए था. और उसकी जान तुम थी. अब ऐसे रोने से उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलेगी. मेरी ाची बची है न.?", एक बार उन्होंने भी इस नादान से बची को सीने से लगा लिए. आँखें तोह रामेश्वर जी भी दबदबा गई लेकिन दिल मजबूत करते हुए उन्होंने बात जारी राखी.

"परसो सुबह पाठ करने और फूल चुगने के बाद तुम मेरे हे साथ चलोगी, अपने घर. और यहाँ गाँव में तुम्हारा ये घर हमेशा ऐसा हे रहेगा और जमीन भी. अभी से तुम रामेश्वर शर्मा की तीसरी बेटी हो. और अभी तुम्हारे सामने पूरी ज़िन्दगी है और सुनेहरा भविष्य. आज रात चाहे जितना रो लेना बेटी, कल से बस ये प्यारी गुड़िया अपनी आँखों से कभी पानी नहीं गिराएगी.", टेबल पर रखा पानी का गिलास उठाते हुए उन्होंने इस लड़की को अपने हाथ से पानी पिलाते हुए सर सहलाया. ऋतू भी वही बैठी बस रुपाली की पीठ पर हाथ फेरती हिम्मत दे रही थी. जिस लड़की ने सुबह से पानी का घूँट न भरा था और बस रोये जा रही थी अब वह पंडित जी के हाथों से पानी पीती खुद को शांत कर रही थी.

"जीजाजी, खाना आपका यही लगवा देता?", हंसमुख 2 थाली साग और रोटी की लेकर अंदर आया तोह आगे कुछ न बोलै.

"पहले मेरी बेटी खायेगी फिर हम खाएंगे नहीं तोह ये खाना ले जाओ भाई.", रुपाली ने जल्दी से प्लेट हाथ में लेते हुए रामेश्वर जी के हाथ में राखी और एक छोल साहब के.

"आप खा लीजिये फूफाजी, आपकी कसम मई दीदी और बुआ के साथ खा लुंगी.", पहली बार वह कुछ बोली थी और इस बात पर रामेश्वर जी ने एक बार उसका माथा चूमते बस इतना कहा 'ाची बात है'

और ऋतू फिर से रुपाली को अंदर ले आई जहाँ कौशल्या जी ने अब वाली अपनी भतीजी को देखा तोह उन्हें एक बार फिर अपने पति पर नाज हुआ. कैसे वह किसी का भी मैं हल्का कर देते थे और अपने साथ जोड़ लेते थे. ऋतू खुद साथ वाले घर गई और कौशल्या जी और रुपाली के लिए खाना और पानी लेकर आ गई. इतना बड़ा आँगन अब सुनसान था.

"दादी आप कुछ खा लो फिर आपको दवा भी लेनी है. और आप खाएंगी तोह बुआ भी आपके साथ खा लेंगी." प्यार से एक गरै अपने दादी के मुँह की तरफ करते हुए उसने कहा तोह एक बार फिर कौशल्या जी की आँखें दबदबा गई.

"मेरी बची, तू तोह खुद सारा दिन से भूखी प्यासी है. चल जो 2 निवाले खाने है खा लेती हु तेरे साथ. और अब से रुपाली को बहिन हे मान, तेरे से भी 3 महीने छोटी है ये.", एक निवाला ऋतू को खिलाती कौशल्या जी ने एक निवाला रुपाली को खिलाया. 3 रोटी जो थाली में थी जैसे तैसे उन्होंने दोनों बच्चियों को अपने हाथो से खिला दिए और खुद बस वही 2 निवाले खा कर ऋतू के हाथ से दवा लेने के बाद चारपाई पर लेट गई. वैसे हे एक खाट पर दरी बिछा के ऋतू ने रुपाली को अपने साथ लगा लिए था.

"अब बस कुछ हे दिनों बाद तुम अर्जुन के साथ स्कूल जाओगी.", अपने सीने से लगती रुपाली को इतना कहने के बाद ऋतू ने भी आँखें बंद कर ली थी. इतनी आदत तोह थी नहीं गाँव देहात की और काम करने की ऋतू को लेकिन फिर भी वह हर पल बस अपनी दादी और इस लड़की को संभालती रही थी. कोई आधे घंटे बाद वही आँगन में 2 चारपाई और लगवा दी गई तोह रेणुका और माधुरी दीदी भी लेट गई थी. ललिता जी ने अपनी सास के पाँव दबाने के बाद वही खांट के पास एक दरी पर गद्दा दाल लिए था.

ज़िन्दगी कितनी अजीब है. लोग भविष्य को लेकर चिंतित रहते है और आज को जीना छोड़ देते है. चाहे अगला दिन उनके नसीब में ये ज़िन्दगी लिखे या नहीं.

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"मेरे साथ आना ाचा नहीं लगता क्या आपको?", घर से बहार स्कूटर निकलते हुए अर्जुन ने आरती दीदी से पुछा. उन्होंने ने हे कहा था के स्कूटर पर चलेंगे जिस से आगे सामान रखने की परिशानी नहीं होगी.

"ऐसा मैंने कब कहा? बस तुम कभी पूछते हे नहीं.", गली से बहार निकले हे थे की अब आरती अर्जुन के थोड़ा करीब आ गई थी. उसको अर्जुन का साथ पसंद था लेकिन बस वह खुद से कुछ नहीं कह पाती थी. आज उसने पहल की थी की वह भी थोड़ा खुलेगी.

"आपको तोह सब पता है की घर में कितने लोग है और फिर मैं तोह हु भी ऐसा की जो खुद हे ध्यान नहीं दे पता. लेकिन मुझे ाचा लगेगा अगर आप कहेंगी तोह.", दोनों मार्किट से पहले वाली शांत सड़क पर थे और स्कूटर भी धीमी रफ़्तार से चल रहा था.

"हाँ तोह अब कहूँगी न. 2 दिन से तोह बस वह तुम्हारी दी हुई किताब हे पढ़ रही थी. कल से तुम्हे.." अपनी बात खुद हे बीच में रोक दी.

"मैं खुली किताब हु और जितना आप चाहो पढ़ सकती हो.", अर्जुन ने मुस्कुराते हुए कहा तोह आरती शर्माती सी उसकी पीठ चिपक गई. अर्जुन को उसने इन 2 दिनों में बस उन किताबो में kirdaar/aashiq की तरह जीया था. अब दिल में बस वही सब था जो उसने पढ़ा था या सपने देखे थे इन 2 दिनों में.

"कभी मुझे कहीं दूर लेकर चलोगे? बस इस bheed-pariwar से दूर."

"आप बस कह कर देखिये, मैं आपको वहां ले चलूँगा जहा आप खुद को महसूस करोगी.", दोनों अब मार्किट आ चुके थे. फिर साथ हे चलते हुए बातें करते वह सामान भी लेने लगे और एक जगह अर्जुन ने कुछ khaane-peene की रेहडिया देखि जो दुकानों से थोड़ी दुरी पर खुली जगह में लगी थी.

"आप कुछ खाना चाहोगी? मेरा दिल है की आप जो भी पसंद करती है मेरे साथ खाने चलो.", अर्जुन की ऐसी सीढ़ी भोली बात पर वह मुस्कुराती सी चल पड़ी. और खुद हे रेहडिया देखती फिर एक पर रुक गई. 'श्याम चाट भंडार'. ये एक gol-gappe, dahi-bhalle की साफ़ सुथरी रेहड़ी थी. तीन तरफ कांच के खानो में gol-gappe पपड़ी का सामान रखा था और एक बड़े थाल में भीगे भल्ले. तरह तरह के छोटे बड़े डब्बे.

"भैय्या, एक प्लेट दही भल्ले. मीठी चटनी काम और तीखी ठीक. बस ज्यादा कुछ नहीं.", आरती ने खुद हे बताया था के उसको क्या चाहिए. अर्जुन वहां भी बस ये मुस्कुराता चेहरा देख रहा था जिस पर अब चस्मा नहीं था लेकिन ख़ुशी बहोत थी. आरती बड़े ध्यान से देख रही थी की वह आदमी कैसे और क्या-2 दाल रहा है. और अर्जुन बस आरती को. बेशक ये हमेशा गंभीर, काम बोलने वाली और अंतर्मुखी सी थी लेकिन अब इसको भी अर्जुन के साथ वह सब करना ाचा लगता था जो पहले नहीं करती थी.

प्लेट हाथ में लेते हे सबसे पहले थोड़ा सा dahi-chutney चखा और फिर आराम से एक चम्मच भल्ले की मुँह में डाली. आंख्ने बंद करके जैसे अपने गुलाबी होंठो को आरती ने घुमाया था अर्जुन तोह बस ये देख कर हे चेहरे में खो गया था.

"तुम नहीं खाओगे?", आरती के पूछने पर अर्जुन होश में आता बस गर्दन ना में हिला गया.

"देखती हु कैसे नहीं खाते.", इतना बोलकर उसने एक चम्मच भरते हुए अर्जुन के होंठो से लगा दी तोह अर्जुन ने आहिस्ता से वह मुँह में लेली. आरती की आँखों में प्यार से देखते हुए. आरती की धड़कन बस इस हरकत से हे बढ़ गई थी वहीँ हाथो में थैले पकडे अर्जुन अब मुँह में चम्मच लिए खड़ा था क्योंकि हाथ तोह आरती ने हटा लिए था.

"ooooon--oooon" इस आवाज से आरती का ध्यान गया तोह जल्दी से उसने चम्मच मुँह से निकला.

"दूसरी ले लीजिये. झूठी हो गई है ये अब.", अर्जुन ने वैसे हे मुस्कुराते हुए कहा तोह आरती ने शरमाते हुए वही चम्मच प्रयोग करते हुए थोड़ा थोड़ा खाना शुरू किआ. बीच में वह अर्जुन को भी खिलाती रही और जब आधे से ज्यादा ख़तम हो गया तोह प्लेट रेहड़ी पर रखती वह चुपचाप स्कूटर की और बढ़ गई. अर्जुन ने हँसते हुए एक थैला रेहड़ी पर रखा और प्लेट का भुगतान करने के बाद स्कूटर की तरफ आ गया जहाँ पहले से आरती बैठी हुई थी.

"बुरा लगा क्या?", अर्जुन ने सामान आगे रखते हुए आरती से पुछा तोह बस शर्माती सी ना में सर हिलने लगी.

"बोलोगी भी नहीं?", अर्जुन ने इतना कहा तोह वह झट्ट से बोल पड़ी.

"यहाँ से चले हम. 8 बजने वाले है.", आरती की बात सुनकर अर्जुन भी स्कूटर स्टार्ट करता उसको लिए चल दिए.

"आज मुझे ाचा लगा तुम्हारे साथ आके. बस खुश थी इसलिए ज्यादा नहीं बोल रही थी.", कमर में हाथ डालते हुए आरती ने कहा. उसको इस अँधेरे में थोड़ा बेहतर महसूस हो रहा था.

"चलो ये तोह पता चला के आप नाराज नहीं थी."

"मैंने अभी तोह कहा के खुश थी और तुम्हारे साथ आना मुझे ाचा लगता है.", अपना सर अब अर्जुन के कंधे पे टिका लिए था. दोनों हे थोड़ी बहोत बातें करते घर आये तोह तारा को दरवाजे पर हे प्रीती के साथ खड़े पाया. दोनों कुछ बातें कर रही थी और जैसे हे अर्जुन और आरती पास आये तोह एक पल अपनी बात रोकते हुए उन्होंने अर्जुन और आरती को देखा.

"अंदर भी बात कर सकती हो दोनों. यहाँ खड़े हो कर क्यों परेशां हो रही हो.", अर्जुन ने रुकते हुए कहा तोह तारा ने जवाब दिए.

"कुछ नहीं. बस प्रीती कल के लिए मेरे साथ कुछ डिसकस कर रही थी और मुझे घर छोड़ने आई थी.", तारा की बात पर सुनकर अर्जुन अंदर आ गया जहाँ उसकी माँ रसोईघर में खाने की तैयारी में लगी थी.

"आ गया बीटा? बस दाल को तड़का लगा रही हु, तू घी निकल कर देदे. और Tara-Aarti बीटा तुम दोनों भी कपडे बदल कर hath-mooh धो लो.", उनकी बात सुनकर आरती अलका दीदी वाले कमरे में चली गई कपडे बदलने और तारा ऊपर. अर्जुन ने नलके पर हे हाथ मुँह धोया और तोलिये से साफ़ करने के बाद वही चूल्हे के पास बैठ गया, अपनी माँ को देखता.

"माँ आप कभी थकती नै क्या इतना काम करती हुई? ऊपर से आजकल अपनी तबियत का भी ध्यान नहीं रखती.", अर्जुन ने शिकायत के लहजे में कहा तोह रेखा जी अपने बेटे का चेहरा देखने लगी.

"ाचा तोह फिर ये बता के कौन करेगा ये काम? ये लड़कियां तोह चली जाएँगी अपने अपने घर.", उनकी बात का मतलब अर्जुन समझ गया था लेकिन वह अगले सवाल से बचना चाहता था.

"संजीव भैया की पत्नी आ जाएगी तोह वह संभालेंगी ये सब और ऋतू दीदी अलका दीदी अभी तोह हैं हे कुछ साल. कोमल दीदी भी तोह है.", कोमल दीदी का नाम लिए तोह वह भी अपने कमरे से बहार आती दिखाई दी.

"कोमल जितना काम तोह मैं भी नहीं कर सकती बीटा. आज हे उसने अकेली ने सारा घर साफ़ किआ है. फिर सभी की अलमारी और दूसरी मंजिल वाले पिछले तीनो कमरे भी. देख ये अभी भी काम करके हे आ रही है. मेरी बची अगर चली जायगी तोह मेरे तोह हाथ हे चले जायेंगे.", अपनी माँ की इस बात को सुनकर कोमल दीदी ने उन्हें पीछे से हे गले लगा लिए.

"ये अर्जुन आपको यहाँ बैठ कर परेशां कर रहा है न? ाचा अब तू खड़ा हो यहाँ से मैं रोटी बनती हु. और माँ आप भी जरा जगह दो और जा के अपने कपडे बदल लो. मैं इन्हे खाना खिला देती हु फिर मैं आपके साथ खाउंगी." कोमल दीदी ने अपनी माँ को भी चूल्हे के पास से हटा दिए था. एक साधारण सफ़ेद नीले सलवार कमीज में भी वह चमक रही थी. कुछ तोह अलग था कोमल में जो किसी और में नहीं था लेकिन सिर्फ रेखा जी में हे कुछ वैसा था.

"बीटा थोड़ा सा हे तोह काम है. कर लेने दे न देख तू भी थक्क चुकी है.", रेखा जी ने आखिरी कोशिश की तोह कोमल दीदी ने बस आँखें दिखाई प्यार से तोह वह अपने कमरे में चली गई कपडे लेने.

"आज मुश्किल है.", तारा ने बहोत हे धीमे से अर्जुन को कहा जब दोनों खाने की टेबल पर बैठे. अर्जुन गौर से देखने लगा के क्या कह रही है वह. खुद हे तोह उसने कहा था आज रात के लिए

"समझो. प्रीती के घर डेट आ गई थी. और वह इसलिए मेरे साथ आई थी. पजामा भी तोह उसका हे पहन रखा था मैंने.", तारा की इस बात पर अर्जुन को बात समझ आई की आखिर क्या हुआ है. वह हलके से मुस्कुराते हुए धीमी आवाज में हे बोलै.

"बस अपना ध्यान रखो और हो सके तोह अकेली मत रहना. ऐसे समय में.", अर्जुन की बात पर तारा को थोड़ी रहत मिली.

"सॉरी.", फिर भी तारा ने माफ़ी मांगी के अर्जुन को बुरा लगा होगा क्योंकि वह शायद उम्मीद में तोह होगा हे.

"Don't बे. It's जस्ट नेचुरल एंड हप्पेंस. हम यही हैं और अब खाना खाओ.", अर्जुन ने वैसे हे आराम से उसको समझाया तोह वह भी अब खाने लगी थी.

"आरती आज मेरे साथ सो सकती हो?", आरती वहां कपडे बदल कर आई तोह तारा ने आते हे पुछा. पहले तोह वह हिचकिचाई क्योंकि तारा उसके साथ लड़को वाली हरकत करती थी तोह आग भड़का देती थी. लेकिन जब चेहरा देखा और ऐसे सबके सामने पूछना तोह आरती ने मुस्कुराते हुए हाँ कह दिए.

"ये है मेरी ाची बहिन. थैंक यू.", तारा की इस बात पर रोटी पकड़ने आई कोमल दीदी ने भी मजाक में छेड़ दिए.

"मुझे कभी कोई नहीं बुलाता. शायद I'm लिटिल ऑर्थोडॉक्स और कन्सेर्वटिवे.", देखा जाये तोह ये शांत रहने वाली सबसे इंटेलीजेंट थी लेकिन बस कभी भीड़ ाची नहीं लगी थी तोह डिस्टेंस कोचिंग से हे अपना कॉलेज किआ था इन्होने.

"नहीं दीदी. ऐसा बिलकुल नहीं है. आप तोह फवौरीते हो बूत थोड़ा रेस्पेक्ट वाला मन्नेर बीच में आ जाता है तोह फिर.." तारा ने नजर नीचे करते हुए कहा तोह कोमल दीदी हंसती हुई चली गई.

"अर्जुन बीटा, बहार टाला लगा देना. और baithak-galiyare के दरवाजे अंदर से लगा लेना. ऊपर तोह तारा हे तेरे कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर देगी. आज घर में सिर्फ हम लोग हे हैं.", उनकी बात सुनकर अर्जुन सर हिलता उठ गया. उसका खाना भी हो चूका था.

"माँ इसके होते डरने की क्या जरुरत. मेरा भाई अकेला हे घर में सबसे हिम्मतवाला और समझदार है." रेखा जी जब कोमल दीदी से रोटी लेती Tara-Aarti को देने जाने लगी तोह कोमल ने अपने छोटे भाई की बात कही.

"पता है मुझे भी. लेकिन जरुरी तोह नहीं की हिम्मत दिखानी जरुरी हो बीटा. सावधानी जरुरी है. इस तरह देखा जाये तोह हमारे सेक्टर में तोह चारों तरफ हे गैप्सी घूमती है, बहार चौकीदार भी रहता है. लेकिन अपनी सुरक्षा पहले हे निश्चिन्त कर लेना समझदारी है." वापिस कोमल के पास बैठती वह बोली तोह कोमल दीदी भी माँ की बात पर सहमति में सर हिलने लगी. इन सबका खाना हो गया तोह कोमल दीदी ने फिर अपना और माँ का खाना लगा लिए. आरती दीदी रसोईघर में सब समेटने लगी, रेखा जी के मन करने के बावजूद. तारा ने भी थोड़ी हिम्मत करते हुए झूठे बर्तन धोने शुरू कर दिए थे. जितने कोमल दीदी और रेखा जी का खाना हुआ वह सब काम खता कर चुकी थी और फ्रिज पर कपडा लगा रही थी.

"ये भी मुझे दे दीजिये.", आखिरी बर्तन खुद हे तारा ने उठा लिए थे और फिर धोने के बाद वो जगह भी कपडे से साफ़ करने के बाद वह अपनी मामी को गूडनिघत कहती ऊपर चली गई.

अर्जुन ने बहार निकल कर छोल अंकल के दरवाजे पर नजर मारी और फिर बेल्ल बजाते हुए पारवती को टाला लगाने का बोलकर वापिस आ गया. अपने घर का दरवाजा ाचे से बंद कर वह गलियारे के दरवाजे पर कुण्डी चढाने के बाद बैठक में चल दिए. आज तोह 9:30 पर पूरा घर शांत हो चूका था. टेलेविज़न चालु करता वह ये दरवाजा भी अंदर से लगाने के बाद दीवान पर पसर कर ऐसे हे चैनल बदल रहा था.

"कुछ ढंग नहीं आ रहा?", कोमल दीदी की आवाज सुनते हे अर्जुन ने दीवान पर हे उनके लिए जगह बना दी, थोड़ा सा एक तरफ सरकते हुए.

"आप हे लगाओ, मुझे तोह समझ नहीं आ रहा.", रिमोट उन्हें देता वह बोलै और कोमल दीदी भी उसके साथ हे लेट गई पेट के बल. थोड़ी देर बाद उन्होंने एक चैनल पर रोक दिए बटन दबाना. विनोद खन्ना और माधुरी दीक्षित की फिल्म दयावान आ रही थी जो बस 10 मिनट पहले हे शुरू हुई थी शायद.

"दीदी, जाना मत कहीं. मई 2 मिनट में आया. प्लीज यही रहना.", कोमल ने भाई की बेताबी देखि तोह बस हंस दी.

"बाथरूम जाना है न तोह ऐसे क्यों बोल रहा है. और मैं क्यों कही जाने लगी.", उनकी बात पर वह हँसता हुआ बहार दौड़ गया. ऊपर आया और हलके से तारा का दरवाजा खटकाया तोह आरती ने दरवाजा खोला.

"क्या हुआ? कुछ चाहिए क्या कमरे से?", अर्जुन बस सीधा अंदर घुसा और तारा को देखे बिना अपने कमरे में घुस गया. वो अलमारी खोलने लगा हे था के आरती भी पीछे आ कड़ी हुई. वो ध्यान से अर्जुन को देख रही थी की अचानक ये क्या ढूंढ़ने ऊपर आ गया. अर्जुन ने खुद को एकदम शांत किआ और फिर बिना वह पैकेट बहार निकले आरती को देखा जो पास कड़ी थी. और कमर में हाथ डालते हुए अपने पास खींच लिए. आरती को तोह जैसे कुछ समझ हे नहीं आया था. अर्जुन ने अपने सीने से लगते हुए एक गहरा चुम्बन उसके होंठो पर किआ तोह एक पल को रूकती फिर खुद इस एहसास के मजे लेती वह आँखे बंद किये बस चिपकी रही. इधर दूसरे हाथ से अर्जुन ने वह पैकेट लिए और आरती को बिस्टेर पर लिटाते हुए हलके से पेट भी सेहला दिए बिना चुम्बन ख़तम किये. आरती अब बिस्टेर पर पूरी लेट चुकी थी. कुछ पल बाद जब आँखें खुली तोह वह अर्जुन नहीं था. अपने होंठो पर उंगलिया फिरती बहार आई तोह तारा निक्कर और बनियान सी टीशर्ट में बस बिस्टेर पर बैठने लगी थी.

"तूने अभी अर्जुन को देखा यहाँ से जाते?", आरती की बात पर तारा हंसने लगी.

"वो ऊपर आया था क्या? मैं तोह खुद बाथरूम से निकली हु अभी तोह मुझे क्या पता. और तू उसके कमरे में क्या कर रही थी?", तारा के सवाल से आरती घबरा गई थी.

"कुछ नै मई तोह तकिया लेने गई थी लेकिन लगा के ऊपर कोई आया है."

"मैंने हे बंद किआ है अभी दरवाजा और तकिया लेने गई थी तोह ले आ. यहाँ तोह 2 हे हैं." तारा की बात पर जब आरती सोचती सी अंदर आई तोह अलमारी खुली देख बस मुस्कुरा दी. तकिये उठा के फिर वह तारा के पास आ लेती और आज खुद उसने तारा को पीछे से पकड़ लिए था.

"इरादे ठीक नहीं लग रहे तेरे. मई पहले हे बता दू की सिग्नल लाल है.", तारा ने हँसते हुए कहा तोह आरती भी वैसे हे मुस्कुराती पीछे से लिपटी रही.

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"कहा रह गया था? इतनी देर लगा दी." अर्जुन को अंदर आते देख कोमल दीदी ने पुछा तोह वह उन्हें बाहों में भरता दीवान पर लेट गया.

"कही नहीं बस देखने गया था के सब सो गए या जाग रहे हैं. माँ, शायद अभी जाग रही है लेकिन इधर का दरवाजा मैं लगा आया हुआ.", उनकी कमर पर हाथ रखता वह पीछे से हे टेलीविज़न की तरफ देखने लगा तोह वह फिल्म बदल चुकी थी. इंग्लिश फिल्म 'बिटर मून' स्टार मूवीज पर शुरू हुई थी अभी 10 बजे. कोमल दीदी भी अपने भाई का स्पर्श पा कर खुश थी.

"क्यों देखने गया था?", सामने हे नजर रखती वह मुस्कुराती हुई बोली और इधर अर्जुन उनके बालों को फैलता उनमे अपना मुँह दाल कर उनकी महक लेने लगा था.

"जिस से मई जब अपनी दीदी के साथ राहु तोह कोई खलल न पड़े.", कोमल दीदी ने अब कपडे बदल लिए थे खाने के बाद. वह नाहा कर आई थी अर्जुन के पास.

"वैसे मुझे नहीं लगता के तू अपनी दीदी के साथ रहेगा.", उन्होंने ये बात जाने किस दर्द में कही थी लेकिन आहिस्ता से कही ये बात सुनकर अर्जुन ने उन्हें अपनी तरफ घुमा लिए.

"आपको ऐसा क्यों लगता है? जिस दिन आपने मुझे ये पहनाया था वह प्यार था और मैंने वापिस आपके गले में इसको पहना कर हमारे रिश्ते को नाम दे दिए था. बेशक आप मेरी दीदी हो लेकिन एक और रिश्ता भी अब जुड़ चूका है जिसको आपने खुद स्वीकार भी किआ था. इसलिए तोह मैं नहीं चाहता था के ऋतू दीदी इसको ले. और उन्होंने भी नै लिए. आपको कुछ महसूस नहीं हुआ था उस पल जब मैंने खुद ये आपको पहनाई थी, सातवे जोड़ को रोकते हुए.", अर्जुन की इस बात पर कोमल को पता चल गया था के सिर्फ उसने हे वह महसूस नहीं किआ था बल्कि अर्जुन ने तोह असलियत में उसको वैसे हे चैन पहनाई थी जैसे उसने महसूस की थी.

अपने भाई की कमर पर हाथ रखते खुद हे बिना कोई और सवाल किये उन्होंने बस अपने होंठो से उसको चूम कर फिर नजरे नीची करते हुए गर्दन में अपना सर लगा लिए.

"तुझे कैसे महसूस हुआ के मैं भी वही चाहती हु?", दिल भर आया था इतना प्यार देख कर.

"आपने हे तोह मुझे चलना सिखाया है. पहला तार मेरी धड़कन का बेशक माँ से जुड़ा हो. और ऋतू दीदी को भी मैं उतना प्यार करता हु जितना वह करती है, जिसका पता आपको भी है. लेकिन आप चुप रहती है तब भी मेरा दिल आपके दिल को ाचे से सुन सकता है. माँ के बाद आपने हे मुझे वह प्यार दिए जिसकी मुझे अंदर से जरुरत थी. आपके साथ मुझे कभी ये महसूस नहीं होता के 2 लोग है यहाँ.", उनके सर को चूमते हुए वह बस प्यार से उनकी पीठ सहलाता रहा.

"मैं बोलती नहीं क्योंकि उसका कोई फायदा नहीं होगा अर्जुन. लेकिन इस बात की ख़ुशी है की तूने मुझे वैसे हे अपना लिए जैसे मैं चाहती थी. घर से जाने के बाद भी मैं ये महसूस नहीं करुँगी. मैं पहले हे तेरी हो चुकी हु तोह अब मुझे सबकुछ मिल गया है." एक बार फिर दोनों होंठो को जोड़े एक दूसरे को प्यार कर रहे थे. अर्जुन तोह जब भी कोमल के पास आता था तोह उत्तेजना, उतावलापन या वासना उसके शरीर से गायब हो जाती थी. बस एक धीमा और लम्बा एहसास दोनों में चलने लगता था जिसको सीमा अभी तक इन्हे पता न चल पाई थी.

खुदसे हे कोमल ने अपने भाई की बनियान निकल दी और आराम से छाती पर हाथ फिरती वह उसके कंधे और गर्दन चूम रही थी.

"अपनी बना लेने के बाद की रसम तोह फिर तुझे हे करनी पड़ेगी. या फिर अब ये भी मेरा हे काम हैं.", हलकी मुस्कराहट देते हुए उन्होंने अर्जुन से कहा तोह वह इस बड़ी लाइट को बंद करता उनके पास वापिस आ गया.

"आज सिर्फ मैं हे करूँगा जो भी करना है. आप सिर्फ साथ देना.", उनको अपने ऊपर लिटाते हुए अर्जुन ने कमर पर हाथ रखते हुए फिर से उन गुलाब से होंठो को पीना शुरू कर दिए. बस इस बार उसके हाथ भी कोमल दीदी की कोमल पीठ पर फिर रहे थे. सफ़ेद टीशर्ट को पूरी तरह गर्दन पर लाकर दोनों हाथो से वह उनकी पीठ सेहला रहा था. एक पल के लिए होंठ अलग हुए और अब दीदी ने टीशर्ट निकल कर साइड में रख दी थी. उनके नरम उभर अब अर्जुन के छाती पर ठीके थे. दोनों के शरीर में जैसे अब ऊर्जा का संचार सा होने लगा था.

"आप जब साथ होती हो तोह दिमाग बंद हो जाता है और सिर्फ दिल हे चलता है.", कमर के ऊपर से निर्वस्त्र दीदी को करवट के बल करते हुए अर्जुन ने उनकी गर्दन से चूमना शुरू किआ और फिर उनके गोल बड़े उभारो पर आ रुका. ये जिन्हे वह हमेशा दिल से महसूस और पसंद करता था. जो सिर्फ अर्जुन के पास होने भर पर सख्त हो जाते थे. उन गुलाबी निप्पल को अपने होंठो में लेकर प्यार से चुभलाते हुए वो एक हाथ से उनके पाजामे में कैसे गोल चिकने नितम्भ भी सहलाने लगा था. मजे से हलकी सीत्कार लेती कोमल बस अपने भाई को वह सब करने दे रही थी जिसमे दोनों को हे सुख मिल रहा था.

उन्हें सीधा करता वह एक तरफ बैठा हे उनकी नाभि में मुँह लगा कर अब कोमल को अगले सुख की ऊंचाई पर ले चला था. एक तरफ एक हाथ उनके उभर नरम करने लगा था तोह दूसरा उनकी छूट को पाजामे के ऊपर से सेहला रहा था. टांगो के ऊपर आते अर्जुन ने वह आखिरी कपडा भी हटाया तोह सामने उनकी प्यारी सी फूली हुई माध्यम से चीरे की महकती छूट थी. बिना सोचे सिर्फ अपना मुँह उस दरार पर टिकते उसने दोनों उरोज थाम लिए. जैसे कोई सहारा ले रहा हो.

इतनी शांति से भी prem-milan हो सकता है भला? लेकिन यहाँ ये दोनों बस शांत और एक दूसरे में मगन थे. कोमल अपने भाई की हर हरकत को दिल से पसंद कर रही थी और पूरा साथ दे रही थी जो भी वह कर रहा था. दोनों टाँगे फैलते हुए अर्जुन उस madhu-kund से कटरा कटरा चाट गया और इधर अपने चरम पर भी वह सिर्फ मुस्कुराती रही. दोनों के पूर्ण निर्वस्त्र शरीर आपस में टकराये तोह अर्जुन के लुंड ने तगड़ा झटका लगाया, जैसे उसको अभी होश आया हो. फिर से एक बार उनके होंठ पीते हुए अपने लुंड का सूपड़ा छूट के छेड़ पर टिकाया तोह दीदी ने खुद उसको थाम लिए. अर्जुन ने दोनों खली हाथ उनकी मुलायम दूध की मटकियों पर रखते हुए धक्का लगाया तोह सुपडे से अधिक लुंड इस एक बार चूड़ी हुई छूट के होंठो को चौडाता अंदर चला गया. एक पल के लिए बस कोमल का बदन अकड़ा लेकिन फिर से उनके हाथ अर्जुन के निर्वस्त्र कूल्हों पर रेंगने लगे. सांस लेने बाहर के लिए अर्जुन ने होंठ अलग किये तोह टेलीविज़न की रौशनी में भी दीदी का चेहरा आनंद और शांति से भरपूर था. इतना भयंकर लुंड उस कासी छूट में फंसा था लेकिन वह उसको झेल चुकी थी.

बिना दर्द दिए अर्जुन ने बस उतने हे लुंड को आगे पीछे चलने की कोशिस की तोह दीदी ने उसके कूल्हे थाम लिए. और इतनी देर में पहली बार बोली.

"पूरा अंदर कर दो. मैं सेहन कर सकती हु और ये बना भी मेरे लिए हे है.", उनकी बार पर अर्जुन हलके से उनके गाल चूमे और फिर से एक हल्का धक्का लगाया तोह इस बार दीदी ने हे अपनी कमर ऊपर उचका दी. उन्हें पता था के अर्जुन दर्द नहीं देने वाला. माध्यम सा धक्का भी अब करारा हो गया था इस do-tarfa हमले से. 7 इंच लुंड अंदर और बस 2 बूँद पानी आँखों से बाहर आ गया था कोमल दीदी के. लेकिन वह मुस्कान बरक़रार थी. वह अपने प्यार के लिए इतनी पीड़ा भी चेहरे पर नहीं आने दे रही थी की अर्जुन को भी दर्द होने लगे. लुंड जैसे अटक चूका था. अपनी बाहें उसकी पीठ पर कस्ती वो खुद अर्जुन को पलटा कर ऊपर आ गई और अगले हे पल वह उसके लुंड की जड़ पर अपने मखमली कूल्हे टिकाये थी. इस बार बस मुँह से हलकी सी आह निकल गई थी.

"आप ठीक हो न? क्या जरुरत है पूरा अंदर लेने की.", उनके गाल सहलाता वह गर्दन चूमने लगा और वह बस उसके ऊपर लेती इस भयंकर लुंड को आराम से अपनी छूट के आखिरी हिस्से तक महसूस कर रही थी.

"मैंने कहा न ये मेरे हिसाब से बना है. तोह हर बार वहां तक हे जायेगा जहा तक होना चाहिए. और बस अब तू प्यार कर.", उनकी बात पर अर्जुन हलके धक्के लगता किसी मैराथन जैसे ये चुदाई करने लगा था जिसमे अपने नरम कूल्हे हिलती कोमल दीदी भरपूर साथ दे रही थी. जब अर्जुन का लुंड आराम से अंदर बहार होने लगा तोह फिर से उसने दीदी को नीचे कर लिए. ये गहरे धक्के उसको भी चरम तक ले जा रहे थे. लुंड अकड़ने लगा तोह छूट भी संकुचन करने लगी थी. और जैसे हे लुंड ने ये भीषण चरम महसूस किआ झट्ट से अर्जुन ने लुंड बहार खींच लिए. कोमल दीदी को ये पता लगने से पहले हे सारा kaam-razz उनकी कमर और छाती तक फ़ैल चूका था.

"मैं चाहती थी की अंदर करो. लेकिन कोई बात नहीं. अगली बार बस ध्यान रखना के पूछ लेना. सेफ था.", वह उसके गाल पर प्यार करती उठी और वैसे हे अपने कपडे पहन कर बहार निकल गई. 11:30.. ये छोटा सा लगने वाला मिलान कोई डेढ़ घंटे से निरंतर चल रहा था. अर्जुन बस इसके आनंद में आँखें बंद किये वैसे हे नंगा बिस्टेर पर देह गया था. आँख लग गई थी लेकिन अगले हे पल वह उठ खड़ा हुआ था. 11:55. माँ का जन्मदिन.
 
मैक्स लिमिट ऑफ़ अन्य पोस्ट इस 72000 वर्ड्स. यहाँ ये अपडेट ब्रेक करने का रीज़न है की वर्ड्स 100000 पार कर गए थे.
 
भाई इस समय घर आया हु और फाइनल एडिट कर रहा हु. कुछ देर में अपडेट देता हु. इस बार बस दिमाग ज्यादा लगेगा सबका
 
अपडेट 51

कलयुग की राधा


रेखा जी के कमरे का दरवाजा अंदर से बंद नहीं था बस उन्होंने उसको लगाया हुआ था. अर्जुन ने जैसे हे उसको आराम से अंदर की तरफ दबाया तोह बिना हे किसी आवाज के वह खुल गया. जीरो की हलकी रौशनी में उसकी माँ एक सफ़ेद गाउन में करवट के बल सोइ हुई थी. हलके बलखाये से काले बाल उनके गाल पर आये हुए थे और खूबसूरत चेहरा बिना किसी भाव के तकिये पर रखा था. अर्जुन बिना आहात किये उनके बिस्टेर पर बैठ गया और ऐसे हे उनके चेहरे को देखने लगा.

'माँ भी शायद भूल गई है के आज उनका जन्मदिन है और न हे किसी और को घर में याद आया.' ध्यान से देखने पर उसको अपने माँ के चेहरे पर हलकी सी पीड़ा उभरती दिखी और अगले हे पल उनकी आँखे खुली तोह अपने बेटे को ऐसे देखते वह हैरान हो गई थी. फिर खुद को शांत करते हुए उठने का उपक्रम करने लगी.

"आप लेती रहिये माँ. मैं बस अभी आया था और आपको कुछ कहना था.", अर्जुन ने हलके से उनके कंधे को वापिस बिस्टेर की और करते कहा. वह भी अब उसकी बात मानती तकिये पर सर टिका कर उसको देखने लगी.

"इतनी रात को? और वैसे भी जब मई सो हे रही थी तोह तू कैसे कहता जो कहने आया था?", उनकी बात पर अर्जुन मुस्कुराया और नीचे झुकते हुए अपनी माँ के खूबसूरत गाल को चूम लिए.

"हैप्पी बर्थडे तोह थे मोस्ट ब्यूटीफुल लेडी इन थे वर्ल्ड. हैप्पी बर्थडे माँ.", कहते हुए एक बार फिरसे गाल चूमकर उसने वह बड़ा सा पैकेट अपनी माँ के चेहरे के पास रख दिए. अब रेखा जी को समझ आया था के उनका बीटा इतनी रात को क्यों उनके पास आया था और उन्हें सोया देख कर कैसे वह जा सकता था. खुसी में उनकी आँखों से 2 बूँद टपक हे गई और ऐसे हे उन्होंने अपने बेटे का माथा अपने चेहरे पर झुकाते हुए चूम लिए. सच में उनको खुद को भी याद न थे के आज उनका जन्मदिन है और न हे घर में किसी और को. वैसे भी लोग थे हे कितने वह. लेकिन अपने बेटे का इतना प्यार देख कर उनकी आँखें भर आई थी और दिल में प्यार हिलोरे मार रहा था.

"मेरा प्यारा बीटा. तुझे याद था ये दिन? मैं तोह खुद भूल गई थी. और ये उपहार देने की जरुरत नहीं बीटा बस तेरा ये प्यार हे बहोत है मेरे लिए तोह.", ख़ुशी में उन्होंने पूरा चेहरा हे चूम लिए था अर्जुन का ये कहने के बाद.

"कैसे न याद रहता माँ? एक आप हे तोह हो जो हमेशा हे बिना कुछ कहे पूरे घर का ध्यान रखती हो. हम सबको इतना प्यार करती हो और सबसे ज्यादा मुझे. मैं तोह सोच भी नहीं सकता मेरा वजूद आपके बिना. और फिर ये उपहार थोड़ी न है. उपहार तोह आप देंगी जब आप ये पहन कर मेरे साथ चलेंगी.", लाड से इस बार अर्जुन ने अपनी माँ के हाथ को चूम के कहा जो उसका गाल सेहला रहा था. अब रेखा जी भी उठ कर बैठ गई थी. अर्जुन ने वह पैकेट खोलते हुए अपनी माँ को वह पारदर्शी डब्बे में बंद साड़ी दिखते हुए कहा.

"माँ, बस इसको देखा तोह मुझे सिर्फ आप याद आई. और ऐसा रंग आपके पास था भी तोह नहीं इसलिए मैंने ये ले लिए.", अर्जुन को रेखा जी ने अपने गले से लगाया तोह हलकी सी दर्द की कराह निकल गई जिसको उन्होंने जबरदस्ती दबा लिए था.

"ये मेरी ज़िन्दगी का सबसे ाचा उपहार है बीटा. और इसको लाने वाला मेरी जान से प्यारा है.", गले लगाए वह बस उस उपहार को निहार रही थी. कितनी परवाह है इसको मेरी.

"कल आप मेरे साथ चलेंगी इसका ब्लाउज सिलवाने. और आप चलेंगी, कोई नखरा नहीं.", अर्जुन ने थोड़ा जज़्बाती होते कहा तोह बस वो मुस्कुरा दी. जाने कितना समय हो गया था उन्हें कभी अकेले मार्किट गए और आज उन्हें पूछने वाला उनका बीटा था, जो कह चूका था के वह लेकर हे जायेगा..

"वैसे अब ये बताये के आपको दर्द क्यों हुआ था थोड़ी देर पहले?", अर्जुन की बात पर वो चौंक गई थी. उन्होंने तोह अपनी आवाज तक बहार न आने दी थी. फिर इसको कैसे पता चला दर्द के बारे में.

"आज मेरे पास सोयेगा मेरा राजा बीटा?", उन्होंने बात बदलते कहा तोह उठ कर अर्जुन ने पहले दरवाजा बंद किआ और अपने लाये उपहार को टेबल पर रखते हुए थोड़ा बिस्टेर सही करते लेटने लगा.

"इस तरफ आजा. और यहाँ मेरे हाथ पर अपना सर रख ले." उन्होंने कुछ सोचने के बाद ये कहा था और फिर अर्जुन ध्यान देते हुए दूसरी तरफ आया जहा अब उसकी माँ करवट ले गई थी. दरवाजे से दूसरी तरफ चेहरा था इस बार. फिर प्यार से रेखा ने अपने इस प्यारे बेटे का सर सहलाना शुरू कर दिए. अर्जुन को भी अपने माँ की जिस्म की महक बड़ी रहत सी देती थी और उनके आगोश में आने के बाद वह इतना बड़ा शरीर होने के बावजूद किसी छोटे बचे सा सिमट कर सो जाता था. रेखा ने 5 मिनट बाद देखा तोह अर्जुन अपना चेहरा उनकी छाती के सामने किये चैन से सो रहा था. अपने सीने पर लगी बारीक ज़िप को खोलते हुए उन्होंने दुखते उभर आजाद किये और आँखे मूँद कर एक फूला हुआ निप्पल चेहरे पर झुकाते हुए उसके होंठो से भिड़ा दिए. पूरा सतांन दूध भरने से सूज कर सख्त हो चूका था और जब अर्जुन उनके गले लगा था तोह वही दुःख गया था. अर्जुन ने भी नींद में इस मटर के दाने को होंठो में भर लिए और एक बार फिर उसको चुस्कने लगा जैसे पहले किआ था.

"ाःह.. मेरे बचे.. तेरी माँ को बड़ा दर्द दे रहा है ऐसे इनका हर समय दूध से भरे रहना.", इस धीमी आवाज ने उनकी आँखों को बंद कर दिए था लेकिन अर्जुन की आँखें मुँह में दूध की ये गरम मीठी धार आने से खुल गई थी. एक पल को तोह वह हैरान हो गया के उसकी माँ सो रही है कहीं खुद उसने हे तोह माँ को निर्वस्त्र करते हुए दूध पीना तोह शुरू नहीं कर दिए. लेकिन जैसे हे रेखा की आँखें खुली तोह दोनों की हे नजरे मिल गई. शर्म से चेहरे पर लाली चा गई थी उनके लेकिन इस अँधेरे में अर्जुन को बस उनके चेहरे पर सिर्फ आराम के भाव नजर आये तोह अब वह उनके दर्द को समझ गया था.

ऐसे खुद के बेटे का अपनी तरफ देखकर दूध पीना उनके बदन में सोइ हुई कामुकता बढ़ने का काम कर रहा था लेकिन वह बस उसकी पीठ पर हाथ रखे वैसे हे सब सेहन करती रही. 5 मिनट बाद हे उनका ये बड़ा दूध का कलश कुछ हल्का हुआ तोह बिना आवाज दिए उन्होंने अर्जुन के मुँह से निप्पल बहार खींचते हुए शरीर को हल्का सीधा किआ. जिस से नीचे वाला मोटा उभर ऊपर आ जाये. और अर्जुन ने भी समझते हुए इस थोड़े सूखे लेकिन कड़े निप्पल को अपने मुह में ले लिए था. अब वह निश्चिन्त हो कर इस वाले को चुस्त पहले वाले गीले और उभरे हुए निप्पल को हलके हलके दबा रहा था. छोटी छोटी बुँदे पुअर बड़े सतांन को गीला करती चमकाने लगी थी.

"आह. तू अभी भी वैसे हे पीटा है जैसे बचपन में पीटा था. आह बस अब जल्दी जल्दी खली करने लगा है.", रेखा जी ने ये बात वैसे हे मजाक में कही थी और दूध चुसकते अर्जुन के चेहरे पर भी मोहक मुस्कान तैर गई थी ये बात सुनकर. निप्पल को खींचना छोड़ जाने कैसे वह अब उस पूरे चुके को दबाने हे लगा था. लेकिन अभी भी मुँह में अपनी माँ का एक चूचक चूसना जारी था. मजे की अधिकता में रेखा की जांघो तक उनका kaam-ras बेहटा आने लगा तोह उन्होंने अपना चेहरा छत्त की तरफ करते हुए आँखें मूँद ली थी. दोनों हे जाने कब सो गए थे, अर्जुन वैसे हे निप्पल को मुँह में लिए हुए और एक उभर को पकडे. रेखा का दूध पहली बार इस हद तक उनके बेटे ने पिया था के वह गहरी नींद में जा चुकी थी.

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"मां, वैसे ाची बात नहीं आपकी ये गाँव छोड़कर जाने की.", सुबह 3 बजे हे शंकर और राजकुमार जी अपनी माँ के गाँव पहुंच चुके थे और जहाँ वह अपने मां हंसमुख के घर के आँगन में बैठ थे. शंकर की आदत जानते हुए इस समय हंसमुख जी की धर्मपत्नी सुशीला खुद चाय बना के चारपाई के सामने रखे मुद्दे पर रखती वहीँ एक पीढ़ी पर बैठ गई थी. Gaanv-dehat में तोह लोग 4 बजे वैसे हे जाग जाते थे और इस घर में तोह मौत हुई थी तोह लोग कहा गहरी नींद सोने वाले थे. पड़ोस से रामेश्वर और छोल साहब भी उठकर आ गए थे तोह वह भी एक चारपाई पर उनके बाई तरफ पर बैठे थे.

"बीटा, वह तेरी मामी भी छह रही थी की नरेश और बबलू के पास रहने के लिए और फिर बनवारी के बिना यहाँ...", शंकर के सामने जैसे हंसमुख मिमियाने हे लगा था. उसको भी पता था के जीजा तोह फिर भी एक शांत इंसान है लेकिन ये तोह खुल्ला सांड है जो umar-rishta कुछ नहीं देखता. लेकिन सुशीला हलके से हंसमुख के हाथ पर हाथ रखने लगी थी. जैसे हिम्मत दे रही हो.

"मामी कल को जब नरेश और बबलू के बचे बड़े होंगे, जरुरत बढ़ेंगी तोह फिर मंजूर होगा आपको ऐसे अपनों हे बचो पर हर चीज के लिए निर्भर रहना? वहां नोटों के ढेर नहीं लगे होते और राजा वाली ज़िन्दगी नै कोई. नरेश, कितना बड़ा घर है तुम्हारा? और पगार कितनी है?", शंकर की बात सुनकर रामेश्वर जी कुछ बोलने लगे थे क्योंकि माहौल बात करने वाला नहीं था. लेकिन छोल साहब ने हाथ रख कर उन्हें रोका. इधर रेणुका और कौशल्या जी भी एक लालटेन लिए आ गई थी. रेणुका रामेश्वर जी की बगल में बैठ कर देखने लगी और कौशल्या जी अपने बेटे राजकुमार को गले लगाने के बाद शंकर की तरफ देखने लगी थी जो इतनी सुबह गरम हुआ पड़ा था और उसको अपनी माँ का भी ध्यान नहीं हुआ था.

"भैया, 3 कमरे का है. और अभी 8000 पगार मिलती है लेकिन दिवाली तक 1000 का इजाफा हो जायेगा. बबलू का खुद का काम है तोह वो भी 12-13 हजार कमा लेता है और उसका भी घर मेरे साथ हे है 3 कमरों का.", नरेश ने बहोत इज़्ज़त के साथ बात की थी तोह शंकर ने उस से भी नरमी से हे कहा.

"देखो भाई. तुम्हारे 3 बचे है और वह अभी स्कूल जाते है. बबलू के भी 2 है और वह तोह 10-11 बजे तक घर भी नहीं आ पता. Mama-Mami की उम्र बढ़ने लगी है तोह dawa-khane का भी खर्चा बढ़ेगा. गोरी का ब्याह किआ है अभी पिछले साल तोह उसके बचे होंगे तोह वह भी छुछकह देना पड़ेगा न. यहाँ खुद की जमीन है और इतना बड़ा घर है. साल में 3-4 बार तुम्हारे बचे यहाँ आते है तोह आराम से अपने dada-padd-dada की जमीन पर खेलते है जानते है, अगर ये सब न रहे तोह फिर वह बैंक का पैसा साड़ी उम्र नहीं चलने वाला. बाकी तुम समझदार हो भाई और बेहतर जानते हो. इस बारे में मई अब mama-maami से तोह बात करने वाला नहीं. जैसा उनका दिल करे वह करे क्योंकि ये तोह उम्र और अनुभव में बड़े है.", शंकर ने एक नजर अपने mama-mami को देखने के बाद खड़े होते हुए चेहरे पर लौटे से पानी मारा और देसी अंदाज में हे हाथ से निचोड़ लिए. फिर स्टील का चाय से भरा गिलास उठाने के बाद देखा तोह माँ भी वही थी.

"मेरी माँ.", जोर से उन्हें अपने से गले लगते शंकर ने सीने से हे लगाए रखा. कौशल्या जी के दिल को भी अपने इस बेटे से हे मिलकर आराम मिलता था.

"मेरा बीटा इतना समझदार है पता हे न था.", उन्होंने भी अलग होते हुए गाल पर थपकी लगते कहा और फिर एक गिलास छोल साहब और एक अपनी पति को दे कर वह भी बैठ गई.

"हंसमुख, वह बहार पंडित मिला था अभी. आज हे फूल चुगने के लिए कह रहा है क्योंकि परसो अमावस्या है तोह पथ कल हे करना पड़ेगा.", बात को बदलते हुए उन्होंने ध्यान अब बाकी riti-riwaj की तरफ दिलाया.

"कौशल्या, सतीश और शंकर चले जाएंगे शमशान इतने राजकुमार मुंडन करवा लेता है और मैं हंसमुख के साथ बाकी सब देख लेता हु. और हाँ शंकर बीटा, वापिस जाने से पहले जरा मिलते जाना याद से. जरुरी बात है.", रामेश्वर जी इतना बोलने के बाद आराम से चाय पीने लगे और रेणुका देख रही थी कैसे ये मामी अब काम करने लगी है जो कल अपने कमरे से बहार तक ना आई थी. कौशल्या जी ने भी उसकी नजरो का पीछा करते मनोदशा को भांप लिए था. लेकिन जैसे हे दोनों की नजरे मिली कौशल्या जी ने होंठो पर ऊँगली रखते इशारा किआ शांत रहने का. लेकिन यहाँ वह भूल गई थी की उनके बेटे की तीसरी आँख भी है.

"मामी, चाय बना के बनवारी मां के घर में सभी को दे आओ और बबलू को भी कह दो की आँगन सही करवा के dari-chataai का बंदोबस्त कर दे. नरेश, सफ़ेद कपडा या धोती ला दे जरा फूल लाने के लिए और टोलिया दे जरा मैं पहले शुद्धि कर लू.", तुरंत हे बिजली की तरह सुशीला कड़ी होती वापिस चूल्हे की और चल दी. इस सांड से तोह दूर हे भली, जैसे कहता है कर लो बस एक हे दिन की बात है. मैं में तोह बहोत बड़बड़ा रही थी लेकिन हिम्मत नहीं थी की चेहरे पर कोई भाव या शब्द लाये.

"चल मेरे भोले भंडारी अब तू खड़ा हो और फिर बनवारी की आखिरी इत्छा पूरी कर. उसके फूल गंगा में नहीं बहाने, खेतों में तेरे हाथो हे वह चाहता था उसकी राख बिखरे. उसकी जान एक तू था और एक ये ज़मीन.", कौशल्या जी ने एक बार फिर खड़े होते हुए शंकर को गले लगाया और फिर आंसू बहने लगे. शंकर जैसे सख्त दिल की भी आँखें हलकी नम्म हो गई थी. उसका मां था भी तोह उसको सबसे ज्यादा प्यार देने वाला. नौकरी के पहले दिन हे स्कूटर ला कर दिए था उन्होंने शंकर को, खुद तोह साइकिल भी चलने से डरता था बनवारी उस समय. जब 1988 में मारुती कार की खबर आई थी तब भी आते के साथ शंकर के लिए वह ये लेकर आया था के उनका भांजा कार से हे चलेगा. बेशक दोनों को हे रामेश्वर जी से khari-khoti sun-ne को मिली थी. सब याद करके शंकर ने कास के अपनी माँ को भींच लिए था. अपने पिता की आवाज पर पल भर में हे वापिस पहले जैसा होते हुए वह घर के बहार बने नलके के नीचे सिर्फ एक टोलिया लपेटे नहाने लगा और हंसमुख का पोता नलका चला रहा था और बबलू की बीवी हाथ में लालटेन और सूखा टोलिया पकडे पल्लू के पीछे से उस शरीर को निहार रही थी जो किसी इस्पात (स्टील) का जान पड़ता था. इतनी उम्र में भी शंकर का शरीर पहलवान सा बलिष्ट और मजबूत था.

"मैं तैयार हो गया हु शंकर चल तू भी कपडे पहन ले.", छोल साहब की आवाज सुनकर नरेश की बीवी ने अब अपना शरीर घुमा लिए था और टोलिया आगे किआ तोह शंकर ने ऐसे हे ऊपर से पोंछते हुए वही टोलिया कमर पर बांध गीला टोलिया नीचे छोड़ दिए. एक कुरता पहन कर साफ़ धोती लपेट ये टोलिया भी अलग किआ और चप्पल पैर में दाल कर छोल साहब के साथ हे इस हलके अँधेरे में गाँव से बहार निकल लिए. साथ हे पीछे नरेश आ रहा था.

इधर आखिर में रूपाली को चाय देने के बाद सुशीला भी अपने घर के बहार आँगन में पानी का छिड़काव करवाने लगी थी. और बाकी सब नित्यक्रम से निवृत होने चल दिए.

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"ोये मुन्ना बीटा. अब छोड़ इन्हे देख खली तोह हो गए हैं.", रेखा जी ने हल्का सा अपने निप्पल को खींचने की कोशिश की तोह अर्जुन अभी सुबह के 5 भी उनका वह निप्पल होंठो में कास के दबाये पड़ा था. हलकी आवाज देने पर बस आँखें खोली और दूसरे वाले को फिर से पकड़ लिए. चेहरे पे हलकी शरारत थी उसके.

"तू न सच में वही शरारती छोटा सा मुन्ना हे है. अब देख पिछले 5 घंटे से लगा हुआ है और ये तोह लगता है सुन्न हे हो गया छोड़ दे और अगर पीना है तोह इसको हल्का कर ले.", अर्जुन ने इस बात पर वह निप्पल छोड़ा तोह देखा की लगभग आधा इंच का कर दिए था उसने वह. फूला हुआ वह निप्पल हल्का गुलाबी होकर पूरी तरह से गीला हो चूका था. फिर अपने मुँह को माँ के दूसरे स्तन पर रखते हुए वह हलके से एक हाथ से पहले वाले को दबाने लगा और उनके पेट पर हाथ फिरता इस मखमली त्वचा को महसूस करने में लग गया. रेखा का तोह बुरा हाल कर दिए था दूध पीते हुए और अब ये choti-choti शरारत उनके पूरे शरीर को एक बार फिर गुदगुदाती सी कामुकता से भरने लगी थी.

उनके गोर सपाट पेट पर गहरी नाभि इतनी जानलेवा थी की किसी सन्यासी का भी दिल बहकाने को बहोत थी. वैसे तोह वह सर से लेकर पाँव तक हे भगवन के एक अतुलनीय रचना थी लेकिन अर्जुन सिर्फ अभी तक उनके चेहरे से वाकिफ था. कल रात हे उसने ये अनुपम वक्ष देखे थे जो उसकी कल्पना से कही आगे थे. कसावट में किसी नयौवना से और आकर में एक परिपूर्ण भारी महिला के. लेकिन lesh-matra भी शरीर पर चर्बी न थी. इन्हे देखने के बाद हे अर्जुन के मैं में तुलना होने लगी थी. कोमल दीदी के सतांन थे जो ऐसे थे लेकिन उसकी माँ के उभार कही उन्नत और रास से भरे थे. उनका ये गोरा सपाट पेट भी इतना कोमल और संवेदनशील था की खुद उसको अपनी माँ का जिस्म थरथराता महसूस हुआ था जब उसकी उंगलिओं ने नाभि पर हरकत की थी.

"बस कर अब ये भी खाली हो गया. बाकी रात को पी लेना और उठने दे मुझे. तेरा तोह आज रविवार है लेकिन मेरे सब दिन सोमवार हे है.", शर्माती सी अब अर्जुन का मुँह हलके से उठती बोली. सुबह सुबह हे अर्जुन ने एक और बार उन्हें स्खलित कर दिए था और एक हलके अनजाने डर से वह जल्दी हे बाथरूम में जाना चाहती थी. इस बार अर्जुन ने भी उन्हें छोड़ दिए और बिस्टेर पर लेट गया. उठने के बाद गाल चूमने को झुकी तोह आँख बंद करता अर्जुन चेहरा तकिये पर सीधा करने लगा था. एक पल में हे दोनों के होंठ जुड़ गए लेकिन तुरंत हे वह सीढ़ी होती बहार निकल गई लेकिन अर्जुन का दिल इतना जोरो से धड़क गया था के कनपटी गरम हो गई उसकी सिर्फ इस एक सेकंड के चुम्बन से. आँखें बंद किये बस वह इस एहसास को दिल में समेटने लगा था.

"ये क्या हो गया एकदम से हे.?", पानी के नीचे निर्वस्त्र कड़ी रेखा ने अपनी जांघो के बीच में सफाई करते हुए कुछ देर पहले हुई घटना को याद किआ तोह जवाब उनके शरीर ने दिए. छूट सिर्फ उस पल को याद करते हे फड़फड़ाने लगी थी. अपनी आँखों को बंद करते हुए उन्होंने इस ठन्डे पानी से खुद को ाचे से साफ़ किआ और कपडे पहन कर रसोईघर में चल दी.

"जन्मदिन मुबारक हो माँ.", पीछे से लिपट कर कोमल ने अपनी माँ को शुभकामना दी तोह रेखा जी के चेहरे पर एक लम्बी मुस्कराहट फ़ैल गई.

"धन्यवाद् बीटा. मेरी बची को याद था ये दिन?", उन्होंने प्यार से सर चूमते कहा तोह कोमल का चेहरा भी दमक रहा था. उसके चेहरे की चमक कुछ ज्यादा हे थी लेकिन रेखा जी को तोह बस उसमे अपने लिए प्यार हे दिखा था.

"याद कैसे न होता? मैं तो रात को हे आने वाली थी लेकिन जाने कैसे इतना जागने के बावजूद मेरी आँख लग गई 5 मिनट पहले.", फिर खुद हे चूल्हे पर चाय का बर्तन रखती वह बोली. बेटी को काम करते देख रेखा जी भी मुस्कुराती दूध का बड़ा पतीला एक बार फिर साफ़ पानी से धोने लगी.

"अपने भाई को भी उठा दे, मेरे कमरे में सोया पड़ा है वह. और मई दूसरी तरफ उसके लिए दूध रखती हु.", अपनी माँ की बात सुनकर कोमल थोड़ा मुस्कुराती सी उनको देखने लगी तोह खुद हे उन्होंने आगे बताया.

"रात को आया था उपहार देने मुझे 12 बजे. फिर बातें करता वही सो गया. अभी तक वैसे हे सोता है और फिर पूरी रात हिलता तक नहीं.", अब कोमल को भी बात का पता चला था के वह रात ऊपर करने क्या गया था. फिर ऐसे हे वह अपनी माँ के कमरे में गई तोह अर्जुन तकिये को दबोचे लेता हुआ था.

"भाई, उठ जा. साढ़े 5 होने वाले है.", गाल सहलाती वह बोली तोह अर्जुन ने उन्हें अपने ऊपर हे खींच लिए. वो तोह बस ऐसे हे लेता था लेकिन कोमल को नहीं पता था.

"ऐसे थोड़ी न उठाते है पहली रात के बाद.", अर्जुन की इस सरगोशी को सुनते हे पल भर में चेहरा बदल गया था कोमल दीदी का. अब वह शर्म से लाल हो गई थी और नजरे नीचे झुकाती बस बैठी रही. अर्जुन ने उनके होंठो हलके से चूमते हुए बिस्टेर छोड़ा और सीधा बाथरूम में घुस गया.

"पागल है ये और कैसे आराम से कह के निकल गया.", 2 पल वही बैठ कर वह जब वापिस रसोईघर में आई तोह रेखा जी काटे हुए बादाम दूध में दाल रही थी. भीगे हुए चने और सोया की दाल उन्होंने एक बड़े कटोरे में रख दी पानी निकल कर.

"उठ गया आपका लाल और सीधा नहाने चला गया है. पता नहीं ये बड़ा भी होगा के नहीं. अभी तक कैसे बचो की तरह सोता है.", ऊपर से हे कोमल कह रही थी अंदर दिल में अलग हे शोर उठ रहा था. इधर अर्जुन के बाथरूम में जाने की बात सुनकर रेखा जी को कुछ होश आया.

'ये क्या हो गया मुझ से? रात के कपडे वही लटके रह गए और नहाने के बाद उतरने याद भी नहीं रहे.", फिर इतना सोचने के बाद भी किसी कोने में थोड़ी शर्म और एक हलकी मुस्कान भी आ गई उनके चेहरे पर.

अर्जुन भी दूध आदि से निपट कर बहार बगीचे में चला गया pedd-paudho का हाल देखने. साधू सिंह से भी दूध आज उसने हे डलवाया था और वैसे हे 5 मिनट बातें भी हुई थी. फिर घर आने का वडा भी किआ था अर्जुन ने उनसे और अब वह थोड़ा सोच में खोया इस hare-bhare बगीचे में पानी दे रहा था.

"क्या बात है आज तोह subah-savere हे माली बने हुए हो.", प्रियंका दीदी के साथ अलका और प्रीती भी आ रहे थे. अलका दीदी ने हे ये बात कही थी और प्रीती भी बगीचे में खिले gulabi-laal और पील गुलाब के फूल देख रही थी. मौसम ाचा था और इस समय लगभग हर तरह के फूल खिले होते थे. बगीचा था भी तोह बहोत बड़ा जहा हमेशा 3-4 कुर्सियां लगी रहती थी. जामुन, आम, अनार, पपीता और अशोक के पेड़ अपनी ऊंचाई लिए हुए थे. वही कुछ सब्जियों की बैल और अंगूर की बैल भी फैली हुई थी. रामेश्वर जी ने इस 500 गज जमीन पर अपने 15-16 साल लगाए थे और अर्जुन ने पिछले एक साल में कड़ी म्हणत से दरख्तों की छाँव में इतने फूल ऊगा दिए थे की दिनभर तितलियाँ यहाँ मंडराती रहती थी.

"अब अपना बगीचा है तोह फिर क्या मालिक और क्या माली. ध्यान तोह रखना हे पड़ेगा न सारे फूल मेरे हे है." अर्जुन की बात पर प्रीती के साथ वह दोनों भी थोड़ा शर्मा गई थी लेकिन अब प्रियंका दीदी ने छेड़ते कहा.

"माली को ाचे से पता है क्या कब खाद और पानी की जरुरत होती है? कहीं कुछ ज्यादा और कुछ काम हो जाये तोह.?", अर्जुन पानी का पाइप एक मिटटी की नाली में रखता खड़ा हुआ.

"वो ये गुलाब है न दीदी, इन्हे बस समय समय पर प्यार से तराशने की जरुरत पड़ती है. फिर खाद चाहे थोड़ा देर से हे दो. लेकिन ये मौसमी फूल है इनका कोई भरोसा नहीं. ये अभी कुछ दिन हैं फिर पूरे साल बाद हे दिखेंगे. इनका बस ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है. और बड़े पेड़ या जो ये बैल है इनका तोह पूरा हे साल है. ये सबको हे ध्यान से रखते है बस टाइम पे पानी और साल में 4-5 बार ठीक से खाद.", अर्जुन आगे नल बंद करने चला गया तोह इधर प्रियंका दीदी उसकी बात पर हंसती हुई आँगन से अंदर की और चलने लगी. पीछे हे अलका दीदी उनसे कुछ पूछती हुई.

"ये क्या बात हुई? हम तोह उसके मजे लेने वाले थे और आप चल दी."

"मौसमी फूल.", इतना बोलकर वह अंदर आती मुस्कुराती हुई हाथ धोने चली गई और अलका अपनी चाची के पास उन्हें मुबारकबाद देने. प्रीती ने हे उन्हें याद दिलाया था और ये बात उन्होंने अपनी चाची को भी बता दी थी.

"वैसे तुमने सच में ाचे से ध्यान रखा है इनका.", प्रीती एक हल्का गुलाबी सफ़ेद लड़कीओ का रात का सूट पहने खुद गुलाब सी लग रही थी.

"इधर आओ. कुछ दिखता हु.", अर्जुन ने आगे चलते कहा तोह प्रीती भी आराम से उसके पीछे चलने लगी. यहाँ कुछ पौधे बिना गमलो के कतार से सीधा जमीन पे लगे थे. कारनेशन, हिबिस्कुस, बड़ा गैंडा और सफ़ेद फूलो वाली रात की रानी. ये जगह इस समय भी बहोत ज्यादा महक रही थी लेकिन एक खुस्भु साफ़ इन सबमे महसूस हो रही थी. डेढ़ फ़ीट का एक गुलाब का झाड़ जिसपर कोई 5 गुलाब लगे थे, लम्बी डोड्डी वाले. अर्जुन ने नीचे बैठ कर प्रीती को भी उधर आने को कहा.

"ये ोमोर्फी है. मतलब पता है इस शब्द का?", अर्जुन ने वह ढाई-3 इंच लम्बी गुलाब की डोड्डी प्रीती की नाक के सामने करि और प्रीती ने आंख्ने बंद करते हुए इस महक को ाचे से अपने अंदर समेत लिए. अब तक की बेहतरीन खुसबू जो शायद हे उसने किसी अपने महंगे अमेरिकन परफ्यूम में भी नहीं पाई थी. अर्जुन की बात पर प्रीती ने हाथ में हे उस गुलाब की टहनी को नरमी से पकडे ना में गर्दन हिला दी.

"मुझे लगा शायद तुम्हे पता होगा क्योंकि ये तुम्हारी माँ के देश से है. ोमोर्फी मतलब खूबसूरत होता है और ये नस्ल वह के साधारण तापमान में पूरा साल खिलती है. अक्टूबर में लेके आया था मई इसको दादाजी के साथ यूनिवर्सिटी से लेकिन इसने बस 3 हफ्ते पहले हे ये फूल खिलाये है. और देखो जरा, इस्पे कांटे सिर्फ नीचे है.", अर्जुन के बात पर एक बार फिर से प्रीती ने उन्हें सूंघा जैसे वह अब अपने पूरा होने का एहसास ले रही थी.

"एमेलिया भी देखे थे वह पर मैंने. वो कोई जर्मन गुलाब थे, खुशबु भी थी और ाचे भी थे. लेकिन अब इन्हे देखने के बाद मुझे वह साधारण हे लग रहे है.", अर्जुन ने देखा तोह प्रीती भी जैसे उसको उन्ही गुलाब में से एक लगने लगी थी.

"ये बहोत खूबसूरत है अर्जुन. और इन्हे महसूस करने के बाद मैं बता नै सकती मैंने क्या पा लिए है.", प्रीती बोलने लगी थी की अर्जुन ने बीच में हे टोक दिए.

"ये न सिर्फ मेरे है. दादाजी को भी इनमे पानी नहीं देने देता मई. एक्चुअली सिर्फ हम दोनों के. तोह अब तुम कभी भी इनके पास आ सकती हो. और मैंने पढ़ा भी था कहीं की गुलाब को गुलाब के साथ रखने से वह ज्यादा खिलते है.", अर्जुन इतना बोलकर उठ कर भाग गया तोह प्रीती हंसती हुई एक बार फिर उन बेहतरीन गुलाब के फूलो को देखने लग गई. उसकी माँ के देश से थे वह और अर्जुन ने सिर्फ इसलिए उन्हें यहाँ लगाया था के वह उसको ये दिखा सके. 5 महीने तक इन्तजार किआ खिलने का. फिर एक बार और उसने उन गुलाबो की महक ली और अंदर आ गई.

"हैप्पी बर्थडे बड़ी माँ.", रेखा के गले लगते प्रीती ने कहा तोह उन्होंने भी उसको ढेर सारा प्यार किआ. अलका कॉफ़ी पीती देख रही थी और मुस्कुरा रही थी. इधर अर्जुन हाथ पाँव धो कर आया पानी पीटा हुआ और अलका के पास बैठ गया.

"वैसे इतनी सुबह सुबह ये कोनसा परफ्यूम लगा के आई है बीटा. चेहरा महक रहा है लेकिन और कही से तोह नहीं आ रही ये.", रेखा जी ने भी उसके शरीर से ये महक जैसे महसूस कर ली थी.

"वो बस गुलाबजल से मुँह धोया था न उसकी हे होगी.", प्रीती ने अलग होते हुए शरमाते हुए कहा.

"बेटी इस घर में भी लोग गुलाबजल प्रयोग करते है. लेकिन ये सुगंध उस से कही प्यारी और ाची है.", रसोईघर में वापिस जाते उन्होंने कहा तोह अलका दीदी ने जवाब दिए उनकी इस बात का.

"वो क्या है न चची जी, अर्जुन ने बगीचे में नए गुलाब उगाये हैं और प्रीती वही से आ रही है.", बेशक अलका ने ये बात मजाक में कही थी लेकिन उन दोनों के चेहरे तोह हैरानी में बस अलका दीदी को हे देखने लगे थे.

"तुम्हे क्या हुआ?", अर्जुन को उन्होंने बोलै तोह वह बस शांत हे रहा.

"आपको कैसे पता नए गुलाब के बारे में?", प्रीती ने ये बात कही तोह अब अलका दीदी हैरान हो गई.

"इधर आ जरा.", प्रीती को पास बुला कर उन्होंने सूंघने की कोशिश की तोह बेशक अब वह उतनी खुसबू नहीं थी लेकिन नाक के पास फिर भी महसूस तोह हो हे गई थी.

"सच में ये कोई ऐसे गुलाब है जिनकी इतनी तेज महक है? और फिर हमने तोह वह देखे नहीं.", अर्जुन तोह उठ कर ऊपर चल दिए कपडे बदलने और प्रीती शर्माती सी उनके साथ बैठ गई.

"सच में लेकिन अर्जुन ने साफ़ मन किआ है मुझे भी उनके पास जाने से. बस दूर से देखना है और हाथ तोह बिलकुल नहीं लगाना.", प्रीती ने भी हिदायत दे दी थी उन्हें बेशक अर्जुन उन्हें मन नहीं करता लेकिन अलका दीदी को भी पता था के अर्जुन दादी को पूजा के लिए भी सिर्फ सफ़ेद फूल हे तोड़ने देता था और कभी उसकी पसंद के गुलाब कोई और टॉड भी लेता या पड़ोस में पूजा के लिए bade-bujurg ले जाते थे तोह वो नाराज हो जाता था.

"ाची बात है लेकिन देख अगर तू भी कभी वह नजर आई तोह फिर मैं भी साथ आउंगी.", अलका दीदी की बात पर प्रीती ने हँसते हुए हाँ कहा तोह रेखा जी भी कॉफ़ी और बिस्कुट टेबल पर रख खाना बनाने में लग गई थी. अर्जुन ने बताया थे की वह 8:30 बजे बहार जाने वाला है. इधर कपडे बदल कर वह बहार से हे आँगन में आ गया था और अब geele-sookhe कपडे से अपनी रानी को चमकाने में लगा था. वो वैसे भी अपने स्कूटर और साइकिल को भी एक दिन छोड़ कर साफ़ करता हे था और ये तोह थी भी लाल चमकदार, थोड़े से निशान भी इसपर साफ़ हे दीखते थे. 8 बजे वह कुर्सी पर बैठ नाश्ता कर रहा था और प्रीती आरती दीदी से उनकी एक किताब लेकर अपने घर जा चुकी थी.

"अर्जुन, मुझे मार्किट से कुछ सामान लेना था. तू चल पड़ेगा साथ?", अलका दीदी की बात सुनकर तारा ने भी अर्जुन की तरफ देखा.

"आप दोनों ने हे कुछ लेना है?", अर्जुन की बात पर अलका दीदी ने हाँ में सर हिलाया और वो दोनों एक दूसरे को देखने लगी.

"मैं माँ को लेकर जाऊंगा 6 बजे मार्किट. आप उन्हें बता दीजिये क्या लेना है तोह वह ले आएँगी. वैसे भी 3 लोग तोह जाने से रहे और कार होती तोह फिर तारा हे चल पड़ती.", अर्जुन की बात पर अलका ने सहमति जाता दी.

"हाँ तोह कोई बात नहीं है. चची हे ले आएँगी हमारा भी सामान और मैं उन्हें बता दूंगी." अर्जुन ने भी हाँ कहते हुए कुर्सी खली की और अपनी बुलेट की चाबी जेब में से निकलते हुए बहार चल दिए.

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यूनिवर्सिटी के सामने से जाती गाँव की सड़क पर धीमी रफ़्तार से मुड़ने लगा था के वह कड़ी एक महिला ने हाथ से रुकने का इशारा किआ. सड़क तोह लगभग खली हे थी और न कोई बस कड़ी थी वह. अर्जुन ने धीमी मोटरसाइकिल को आराम से रोकते हुए इन महिला के सामने हे रोक दिए. कोई 32-34 साल की ये महिला एक सुघड़ शरीर और ाचा सलवार कमीज पहने थी. हाथों में सोने की चूड़ियां और गले में चैन बता रही थी की घर से भी ाची थी वह.

"भैया एक घंटे से कड़ी हु यहाँ लेकिन कोई बस या टेम्पो नहीं दिखा. और तुम भले जान पड़ते हो तोह तुम्हे इशारा कर दिए. मुझे ##### गांव जाना है अगर कही अगले अड्डे या चौक पर छोड़ दो तोह बहुत आभार होगा.", सर के ऊपर बड़ी तेजीब से चुन्नी ली हुई थी जिसका एक पला सामने और एक कंधे से होता पीठ पर था. आवाज भी बड़ी नरम और मीठी हे थी.

"जी मैं ##### गांव हे जा रहा हु. ाचा हुआ के कोई रास्ता बताने वाला मिल गया. बैठ जाइये मई आपको वही छोड़ देता हु." महिला भी ाची kad-kaathi की और सुत्वा शरीर था. नजाकत से अपना बैग गौड़ में रख वह अर्जुन के पीछे आराम से बैठ गई. मोटरसाइकिल की पिछली सीट बेशक समतल थी लेकिन आरामदेह भी थी. सहारे के लिए बस एक हाथ हल्का सा उसकी पीठ से टिकाया तोह अर्जुन ने आराम से अपनी रानी को आगे बढ़ा लिए. 'dug-dug' की आवाज फिर से सड़क पर फैलने लगी थी. यूनिवर्सिटी से बहार गांव जाने वाली इस सड़क पर कुछ आगे हे एक लम्बी लाल दिवार दिखी. "पुलिस स्टेशन-#### नगर" का बोर्ड यहाँ लगा था.

"मां जी का थाना ये है." एक बार देख कर फिर आगे बढ़ लिए. एक किलोमीटर के बाद हे सड़क खली और दोनों तरफ छायादार babool-kikar के पेड़ आने लगे. जिनके सिरे सड़क के ऊपर मिलते हुए लगते थे. 15-16 फ़ीट चुआड़ी इस साफ़ सड़क पर अब बड़ी शांति और ठंडक थी.

"वैसे मई आप से छोटा हु. आपने भैया कहा था तोह सोचो याद दिला दू.", अर्जुन ने बात शुरू करने के लहजे में कहा तोह इन महिला के सुर्ख होंठो पर के मुस्कान आ गई.

"पता है के छोटे हो और मैं भी कोई बूढी नहीं हु. लेकिन दूर से तोह किसी पहलवान से लग रहे थे तोह जो मुँह से निकला बोल दिए. वैसे मेरा छोटा भाई तुम्हारी उम्र का हे होगा. अभी कॉलेज ख़तम किआ और पुलिस की ट्रेनिंग लेने मधुबन में है. Sub-inspector लगेगा एक साल बाद." बात तोह प्यार से शुरू की थी लेकिन ख़तम करते हुए थोड़ा जोश आ गया था अपने भाई की उपलब्धि पर.

"ाची बात है जो सही समय पर हे नौकरी लग गई. वैसे मई बता दू के मई उतना बड़ा भी नहीं हु. अभी ग्याहरवी में हुआ हु और स्टेडियम में बॉक्सिंग सीख रहा हु साथ हे. अर्जुन नाम है मेरा.", पहली बार उसने अपना पूरा नाम नहीं लिए था.

"सच कह रहे हो? देख कर तोह तगड़े पहलवान लगते हो कोई 21-22 साल के. मेरा नाम मेनका सिंह है और ##### में हमारी रिश्तेदारी है तोह वही काम से जा रही हु. वैसे मेरे पति आर्मी में लूटिनेंट हैं और अभी एक हफ्ते बाद हमारा मकान भी यही तुम्हारे शहर में तैयार हो जायेगा.", मेनका सिंह को भी अर्जुन से बात करना ाचा लग रहा था. ऊपर से लड़का मोटरसाइकिल बड़े आराम से चला रहा था बिना कोई झटका दिए या फालतू ब्रेक लगते हुए. इन सब बातों पर भी इनकी नजर थी.

"चलिए आशा करता हु हमारा शहर आपको पसंद आएगा. जैसा ज्यादातर हरयाणा है यहाँ के हालात बेहतर है. ाचे कॉलेज, साफ़ सड़के, देर रात तक रहने वाली मार्किट और लगभग हर तरह के लोग साथ रहते है तोह ाचा लगता है. अखबार में तोह मैं देखता रहता हु बाकी सब जगह की हालत. वैसे आप गांव की नहीं लगती.", गहराई से सब बताते हुए अर्जुन ने आखिरी बात पर फिर सवाल सा कर दिए जिस पर मेनका थोड़ा हंस पड़ी और मोटरसाइकिल के गोल शीशे में उनकी हे तीखी मुस्कराहट अर्जुन ने भी देखि और उसको ऐसा करते मेनका ने भी. लेकिन जैसे हे सड़क पर ध्यान गया कुछ भैंस सड़क पार कर रही थी जिन्हे अपने से 25 कदम दूर देख अर्जुन ने ब्रेक लगाई तोह पीठ पे हाथ रखे होने के बावजूद मेनका ने दूसरे हाथ से भी कास के उसको जकड लिए. माध्यम से नरम अनार अर्जुन की पीठ में धंस गए थे.

"सॉरी. एकदम से सामने आ गई और ध्यान नहीं गया.", अर्जुन ने वैसे हे खड़े रहकर पहले इन भैंसो को सड़क पार करने दी. मेनका ने हालत देखि तोह धीरे से अपने को थोड़ा दूर किआ लेकिन दोनों हाथ वैसे हे रहने दिए पास जकड ढीली कर दी. बैग की तन्नी हाथ में से गई हुई थी तोह वह ठीक था.

"ध्यान रहना चाहिए वैसे. और हाँ ये शहर मुझे भी पसंद हैं. मैंने यही से अपनी M.A. और B.Ed. इंग्लिश सब्जेक्ट में की थी.", अर्जुन को जानकार ाचा लगा था के ये तोह ाची पढ़ी लिखी हैं.

"ये आपके पापा ने ाचा किआ की आपको इतनी शिक्षा दिलवाई. ज्यादातर तोह कॉलेज भी पूरा नहीं करती की उनकी शादी करवा दी जाती है और अगर ज्यादा से ज्यादा लोग अपनी लड़कियों को बस ग्रेजुएशन हे करवाते है.", अर्जुन की बात पर मेनका थोड़ा शांत सी हो गई थी.

"मैंने कुछ गलत कह दिए क्या? सॉरी अगर मुझसे कोई भूल हुई या गलत बात निकल गई हो मुँह से. मैं ज्यादा हे बोलने लगता हु जब कोई ाचे से बात करता है तोह.", अर्जुन की ये बात सुनकर वह वापिस मुस्कुरा उठी.

"नहीं तुमने बिलकुल सही और सच्ची बात की है अर्जुन. मेरे पिताजी ने तोह मेरा रिश्ता तभी करवा दिए था जब मई दूसरी कक्षा में थी. फिर हालात बदल गए एकदम से और फिर मेरे बड़े भाई ने हे म्हणत करते हुए मुझे आगे पढ़ाया और मेरी हर इत्छा पूरी की. खुद आज भी वह खेती करते है और चार कक्षा तक पढ़े है लेकिन मेरे लिए वह भगवन हे है नहीं तोह जाने कहा होती मैं.", उनकी बात सुनकर अर्जुन तोह जैसे चौंक सा गया था.

"कोई बाप ऐसा कैसे कर सकता है? दूसरी क्लास मतलब ज्यादा से ज्यादा 7 साल की उम्र में. क्षमा करना मेनका जी लेकिन ये बात जरा भी ाची नहीं लगी लेकिन आपकी भाई साहब के लिए दिल से इज़्ज़त्त, जिन्होंने अपनी बहिन के लिए इतना किआ.", अर्जुन की बातें मेनका को पसंद आने लगी थी. अब वह बिलकुल आराम से उसके साथ बैठी थी, बेहिचक और दोनों हे आधा सफर पर कर चुके थे.

"कभी कभी कुछ ऐसा होता है के सबकुछ बदल जाता है. कुछ बुरा होने से शायद ाचा हो जाता है और ाचा करने पर बुरा. मेरे पिता की 2 बीवी थी और मेरी माँ दूसरी थी. पहली से मेरे 2 भाई थे और मेरी माँ से मैं और मेरे बड़े भैया. पिताजी ने अपने दोस्त के बेटे के साथ हे मेरा रिश्ता उस समय कर दिए था जब मुझे कुछ समझ हे नहीं थी. और एक दिन फिर कुछ बड़ा घटा और मेरे पिता के साथ उनके दोनों बेटे, जो उस समय भी 25-28 साल के थे मारे गए और उनका वो दोस्त और लड़के भी जिनमे से एक वह भी था जिस से मेरा रिश्ता किआ गया था. कुछ समय बाद हे मेरे पिता जी की पहली बीवी ने मेरी माँ को जमीन का एक टुकड़ा और 3 कमरे का घर देकर हमारी बेशुमार जायदाद से बेदखल कर दिए. वह तोह ये भी नहीं देती लेकिन पंचायत के डर से 4 एकड़ जमीन का टुकड़ा और गांव से बहार खँडहर सा मकान दे कर अलग कर दिए. ये छोटा भाई जो है इसको मेरे भैया ने हे गॉड लिए था जब वो 6 साल का उनको लावारिस मिला था", अर्जुन उनकी दास्तान सोच कर खो सा गया और फिर कुछ देर शांति बानी रही जिसको खुद मेनका ने हे तोडा.

"यहाँ ढाबे पर रोक सकते हो 5 मिनट?", अर्जुन ने बिना सवाल किये मोटरसाइकिल कच्ची जमीन पर उतार दिए सड़क से. यहाँ ये कोई हाईवे ढाबा था जहाँ चारपाई के बीच लकड़ी का फटता लगा था जिसपर पानी का जग और नमकदानी रखे थे. कोई 5-6 चारपाई लगी थी और 2 ट्रक भी खड़े थे. पूरी सड़क सुनसान सी थी बस यही एक राजस्थानी ढाबा और पूरी शान्ति.

"अंकल जी बाथरूम है यहाँ पर?", मेनका ने उस हट्टेकट्टे लेकिन सफ़ेद बाल और लम्बी मुचो वाले ढाबा मालिक से कहा जो खुद तंदूर से एक लोहे की छड़ी से रोटियां निकल रहा था और एक चारपाई पर आमने सामने बैठे लोगो को 15-16 साल का लड़का जिन्हे प्लेट में रख के दे रहा था. वो दोनों भी लड़की की आवाज सुनकर उधर हे देखने लगे जहा से आवाज आई थी. भूरे रंग का कुरता पजामा और सर पे काली सफ़ेद धारी वाला अंगोछा बंधे उनमे से एक आदमी तोह मेनका को ऐसे देख रहा था के जीवन में पहली बार लड़की देख ली हो. दूसरा वाला एक दरमियाने कद का थोड़े साफ़ रंग और मटमैले kamij-kali पंत में था, जिसने वापिस अपना ध्यान खाने में लगा लिए.

"गुड्डी यहाँ तोह ये पीछे एक बना हुआ है लेकिन janana-mardana बस यही है. नहीं तोह फिर पीछे उधर प्लाट की दिवार है. देख लो जो बेहतर लगे.", इतना बोलकर वह वापिस अपने काम पर लग गया. गीले हाथो से तंदूर में रोटी लगाने.

"ाचा ठीक है अंकल आप 2 दही की लस्सी बना दीजिये मैं आती हु. अर्जुन जरा साथ आना.", मेनका इतना बोलकर ढाबे के पीछे चल दी और फिर बैग अर्जुन को थमा कर दिवार के साथ मुड़ी जहाँ एक पुराने तरीके का गुसलखाना और जमीन वाली सीट लगी थी. पान के धब्बे और बीड़ी के टुकड़े देख मेनका मुँह पर रुमाल रखती बहार निकली.

"की.. ये जहन्नुमम सी जगह.", अर्जुन ने हालत देखि तोह हलके से मुस्कुरा दिए. इस से मेनका थोड़ा गुस्सा हे हो गई.

"मज़बूरी थी लेकिन तुम हंस रहे हो?"

"आपने क्या सोचा के यहाँ आपको होटल या घर जैसा माहौल मिलेगा. ढाबे वाले के खुद के कमरे ऊपर बने है तोह ये तोह ट्रक वालो के हिसाब का हे होगा. बेहतर है हम आगे कही ाची जगह चलते है." अर्जुन ने सुझाव दिए लेकिन मेनका को जैसे दबाव आया हुआ था.

"तुम मेरे साथ उधर तक आओ. और दिवार से इधर हे रुक जाना.", वह बिना पीछे देखे आगे चलने लगी. कच्ची जमीन पर वह जल्दी जल्दी पाँव भाड़ा रही थी जिस से हलकी मिटटी भी उड़ती जा रही थी. अर्जुन बस मुस्कुराता सा धीमी चल से पीछे चलता रहा. मेनका दिवार के पीछे गई और फिर कोई 3-4 मिनट बाद आई. अर्जुन कोई 50 कदम दूर था दिवार से और अपनी तरफ आती मेनका को देख रहा था जो अभी भी तेजी से हे आ रही थी.

"आराम से चलिए. गिर भी सकती है आप यहाँ मिटटी में.", अर्जुन की बात पर जब मेनका ने गौर किआ तोह उसकी सुन्दर चप्पल मिटटी से सनी थी और सलवार का पहुंचे भी.

"ये दोनों हे नै थी और क्या हाल हो गया इनका.", नीचे नजर डालते हे मेनका ने ये बात कही.

"खेत की सूखी धुल है. वैसे हे उतर जाएगी आप चलिए मई झाड़ दूंगा." अर्जुन की बात पर अब वह थोड़ा मुस्कुराई और फिर साथ हे चलने लगी. वह ढाबे पर पहुँच कर अर्जुन ने सीमेंट की गोल मुँह वाली टंकी से पानी निकल कर उनके हाथ धुलाये और फिर उन 2 आदमियों से इधर चारपाई पर मेनका बैठी तोह एक साफ़ कपडे से उनकी सलवार के पाँव झाड़ने लगा.

"मैं कर लुंगी. तुम रहने दो प्लीज. मुझे दे दो ये कपडा.", मेनका ने कपडा लेना चाहा तोह अर्जुन ने उन्हें इशारे से न कहा.

"आप सीढ़ी बैठी रहिये और मैंने ये कर देता हु.", अर्जुन की बात समझ गई थी मेनका. अगर वह झुक कर खुद साफ़ करती तोह थोड़ा अजीब लगता और वह कड़ियल सा ड्राइवर अभी भी घूर हे रहा था. जैसे किसी नशे में हो.

"भैया जी, आपकी लस्सी.", 2 गिलास स्टील के फत्ते पर रखते हुए वह लड़का इतना बोलकर चला गया. इधर अब उनके खूसूरत पाँव और सलवार भी साफ़ हो चुके थे.

"लीजिये आप और फिर चलते है यहाँ से.", ढाबे वाला भी अब ऊपर अपने कमरे में चला गया था. शायद ये उसके आखिरी ग्राहक थे अभी के. ढाबे पर बस छोटू बैठा था. अर्जुन और मेनका मीठी लस्सी पीते बस शांत हे थे. मेनका जहाँ अर्जुन को गौर से देख रही थी और उसके देखने पर इधर उधर देखने लगती थी वही अर्जुन बस सड़क या ढाबे के आसपास हे देख रहा था. दूसरा ड्राइवर वहीँ चाव में एक चारपाई पर लेत गया था मुँह पर गमछा दाल के. इधर ये वाला ड्राइवर इनके साथ वाली चारपाई पर ढाबे की और पाँव करते हुए मेनका को देख रहा था, अर्जुन की पीठ उसकी तरफ थी. लस्सी ख़तम हुई तोह अर्जुन पैसे देने काउंटर पर चला गया. मेनका ने कोशिश की थी की वह देगी पैसे लेकिन अर्जुन ने साफ़ इंकार कर दिए. छोटू शायद तंदूर में पानी छिड़क कर बाकी लकड़ी पीछे रखने चला गया था इसलिए वह वही खड़ा हो कर प्रतीक्षा करने लगा. इधर से चारपाई कुछ 25-30 कदम दूर थी.

"कितना लेती हो एक बार का? उस चिकने से ज्यादा मजा दूंगा एक कैप्सूल खाने के बाद.", ये आवाज सुनते हे मेनका ने इधर उधर देखा फिर उस आदमी की तरफ जिसकी आँखें हलकी लाल थी और वह लार टपकता सा बस नशे में उसको हे देख रहा था. एक प्लास्टिक की पन्नी से कला सा कुछ चाटने के बाद वो फिर से बोलै.

"अजमेर में इतना गदराया माल नहीं मिलता, राजगढ़ में भी सब हड्डी जैसी. उनको 500 देता हु लेकिन तुम्हारे लिए 5000.", और अपनी ब्याह पर कूदता ऊपर चढ़ाते हुए वह अब चारपाई पर पाँव लटका कर बस 4 फुट हे दूर था.

"अपनी हद्द में रहो नहीं तोह .." मेनका की बात बीच में हे काट कर वह वैसे हे बोलने लगा. इधर वह लड़का 500 के खुल्ले लेने ऊपर अपने मालिक के पास चल दिए अर्जुन को वही छोड़ कर, जो अब अपना चेहरा धो रहा था टंकी से पानी निकल कर.

"तेरी जैसी रांड बहोत देखि है लेकिन तब पैसे नहीं होते थे. इस लोंदे के साथ भी तोह छुड़वा हे रही है तोह फिर मेरा लेने में क्या हर्ज़ है.", कलाई को अपने सख्त हाथ में पकड़ वह बेशर्मी से अब मेनका की चारपाई पर हे आ बैठा था. और मेनका तोह जैसे सदमे सी हालत में पहुँच गई थी.

"उठिये. अब चलते है." अर्जुन ने उस आदमी का हाथ पकड़ कर झटकते हुए कहा और मेनका का हाथ किसी हक़ से पकड़ कर चल दिए. दोनों हैरान थे. मेनका इसलिए की अर्जुन कितने आराम से चल दिए बिना कुछ कहे और वह आदमी इसलिए की ये हुआ क्या उसके साथ. लड़का औरत को ले भी गया और कोई फसाद भी नई किआ.

"ोये इसको छोड़ के जा यहाँ, 5000 दूंगा कोई मुफ्त में नहीं करूँगा. घंटे बाद ले जैव अगर तेरा दिल अभी नहीं .... आअह्ह्ह्हह.", बात पूरी भी न कह पाया था वह पीछे चलता की उसका करूँ रुदन हवा में गूंज उठा. नाक और मुँह से खून bhal-bhal के बह रहा था और वह जमीन पर किसी par-kate पक्षी सा फड़फड़ा रहा था.

"3-1-1-3 ाचा काम करता है. 3 पसलियों पर, 1 नाक पर फिर एक मुँह पर लेकिन आखिरी 3 रह गए." अर्जुन ये सब बुदबुदा रहा था और उस की तरफ देख रहा था.

"भाई मेरा तोह डाव अधूरा रह गया ये तोह सिर्फ 5 हे पंच लगे अभी 3 बाकी है." और वह आगे बढ़ा तोह दूसरा ड्राइवर भागता हुआ बीच में आ गया.

"बीटा रहने दो ये नशेड़ी मेरे चाचा का बड़ा लड़का है. मेरी आँख लग गई थी इसलिए इसने बदतमीजी कर दी होगी आपके साथ. इसको छोड़ दो वैसे हे हालत ख़राब हो गई है इसकी.", इस समझदार आदमी की बात पर अर्जुन रुक गया लेकिन खड़ा रहा. उसने सीखा था की दुश्मन जब तक सामने हो चौकन्ना रहना चाहिए लेकिन इस आदमी ने सिर्फ अपने भाई को घसीट कर चारपाई की तरफ कर लिए. जमीन पर 2 दांत पास पास पड़े थे जिन्हे मेनका ने भी देखा था. फिर अर्जुन चुपचाप मोटरसाइकिल पर बैठ गया. रेणुका ने अपनी काली चुन्नी से हे हे अर्जुन के हाथ पर लगा खून साफ़ किआ तोह वह पर दांत की वजह से 2 छोटे से कट लग गए थे.

"तुम्हे थोड़ी चोट आई है. इसको पानी से धो लेते है.", हाथ को थामते हुए मेनका ने कहा तोह अर्जुन बस मुस्कुरा दिए और उन्हें पीछे बैठने को बोलै. चुपचाप वह बैठ गई तोह अर्जुन ने आराम से मोटरसाइकिल आगे बढ़ा दी.

"थैंक यू सो मच. मैं घबरा गई थी क्योंकि मैं तैयार नहीं थी.", मेनका ने अपना हाथ एक बार फिर से अर्जुन के पीठ पर रखते हुए कहा.

"It's ऑलराइट. और ऐसी छोटी मोती बात दिल में नहीं रखनी चाहिए. ऐसे लोग नशा करते है, ट्रक चलते हैं और लड़की को सिर्फ एक नजर से देखते हैं."

"वैसे तुमने पहले सिर्फ उसका हाथ हटाया था लेकिन बिना कुछ बोले क्यों चल दिए थे?", अर्जुन को अपने दिल में चल रही बात उन्होंने पूछ हे ली.

"सबको एक मौका मिलना चाहिए. अगर वह वही रुक जाता तोह उसके दांत अपनी जगह सलामत होते. लेकिन जब उसने मुँह से अपशब्द कहे और वह भी एक महिला के लिए तोह फिर मुझे लगा की अगली बार उसकी आवाज साफ़ नहीं निकालनी चाहिए. इसलिए वैसे समझाया जैसे आपको पसंद था.", अर्जुन की बात पर ये आधा पौने घंटा पहले मिली मेनका सिंह अब पूरी तरह इस लड़के की कायल हो चुकी थी. जवानी सिर्फ उभरी है और अभी से इंद्रधनुष सा है. हर एक रंग है इसके व्यक्तित्व में. समझदारी, इज़्ज़त करना, मर्दानगी, शांत हृदय और सबसे बड़ी बात सादगी. जाने कब मेनका का सर उसकी पीठ पर टिक गया.

"आपको मेरी बात पसंद नहीं आई क्या? अगली बार ये मौका देने वाली बात हटा देते हैं." अर्जुन ने बीच में आई गंभीरता ख़तम करने के उद्देश्य से ये बात कही थी.

"हाहाहा. तुम बड़े दिलचस्प इंसान हो ये तोह मैं मान गई हु. जैसे हो वैसे रहना बिलकुल ऐसे हे. मैं खुद हैरान हु के 45 मिनट में मैंने अपनी ज़िन्दगी में अब तक का बेहतरीन इंसान और फिर एक बुरा इंसान दोनों देख लिए. तुम्हे किसी की नजर न लगे", अपनी आँख से हल्का काजल निकल मेनका ने अर्जुन के कान के पीछे लगाया तोह अर्जुन फिर से शीशे से उनका वह प्यारा चेहरा देखने लगा और इस बार जब दोनों की नजर मिली तोह मेनका ने एक बार नजरे मिलाने के बाद खुद हे नीचे कर ली.

"यही बस एक बात गलत हैं.", नखरे से अर्जुन को सुनते हुए कहा तोह अर्जुन सामने देख बस मुस्कुराने लगा था.

"कहते है याद रखने के लिए देख लेना चाहिए. और आँखें याद रखना तोह सबसे बेहतर है. ये बदलती नहीं पैदा होने से मरने tak.",Peeth पे सर टिकाये वह मंद मंद इस बात पर मुस्कुराने लगी थी.

"वैसे भी अब हम कभी न कभी तोह टकरा हे सकते है. शहर एक हे होने वाला है जल्द हे. और मेरी नौकरी भी 3 अप्रैल से शुरू हो जाएगी. ज्यादा याद रखने की जरुरत नहीं.", एक बार नजरे सीढ़ी सड़क पर की तोह एक पीपल का पेड़ दिखाई दिए जिसके नीचे गोलाई में सीमेंट का चबूतरा बना था.

"यहीं रोक देना. बस यहाँ से पास हे है मेरे मां का घर. बाकी तोह गांव अंदर है एक किलोमीटर.", अर्जुन ने उस पेड़ के नीचे मोटरसाइकिल रोक दिए.

"आप चली जाएँगी यहाँ से अपने मां के घर? मैंने उधर सामने हे जाना है अगर चाहे तोह मैं छोड़ सकता हु.", अर्जुन ने स्वाभाव के मुताबिक कहा तोह मेनका ने दूसरी और इशारा किआ जहाँ दूसरी कच्ची सड़क एक घर तक जा रही थी खेतों के बीच से. कोई 400-500 मीटर दूर 2-3 घर थे.

"तुम्हे उधर जाना है और मेरे मां जी के घर वो रहे. अपने भाई के लिए सामने वाले गाँव में लड़की देखने आई हु और बस 3 घंटे वाली बस से फिर वापिस जाना है. मां अपनी मोटरसाइकिल से ले जायेंगे लड़की वालो के घर. तुमने आज जो भी किआ उसके लिए धन्यवाद लफ्ज़ कुछ भी नहीं लेकिन कभी फिर मिले तोह मेरे घर खाना खाने का वादा कर दो बस.", मेनका बड़े हे साफ़ दिल की महिला थी और उसका हर शब्द बता रहा था के अर्जुन ने सच में उसके लिए बहोत कुछ किआ था.

"चलिए आप ऐसे खुश है तोह फिर मैं भी एक बार जरूर आपके हाथ का खाना खाने आऊंगा. वैसे मेरा घर नए सेक्टर में हैं.", और फिर मेनका को सोचता छोड़ वह गाँव की कच्ची सड़क पर हो लिए जहा मंजूबाला ने बताया था के उनके खेत सड़क पर हे हैं लेकिन कच्ची सड़क पर हे मोटर का रास्ता जाता है. अर्जुन ने एक बार घडी पर नजर डाली तोह वह आधा घंटा देरी से आया था. 10:25 समय हो चूका था और धुल भरे रस्ते पर आराम से मोटरसाइकिल चलता वह फिर खेत की तरफ अंदर जा रही पगडण्डी बार बढ़ गया. यहाँ सड़क वाले खेत से अलग फसल कड़ी थी. जहाँ सामने कनक की तैयार फसल थी इधर 4 फुट ऊँची हरा चारा उगाया हुआ था.

"उम्मीद छोड़ दी थी की तुम आओगे और फिर मुझे ढून्ढ भी लोगे.", मंजूबाला, जो यहाँ बीच में लगे नीम के पेड़ तक आ गई थी मोटरसाइकिल की आवाज सुनकर उसके पास अर्जुन ने अपनी रानी रोक दी थी.

"थोड़ा देरी से आया लेकिन तुमने बुलाया था तोह आना तोह था हे.", अर्जुन मोटरसाइकिल के ऊपर हे बैठा था और मंजू को इस लाल कुर्ती और सफ़ेद सलवार में देख रहा था. कहाँ वह बास्केटबॉल खेलने वाली, उघड़ी टांगो और हरदम गुस्सा दिखने वाली और कहाँ ये सर से पाँव तक ढकी हुई और हल्का हल्का शर्माती सी नाजुक मंजूबाला.

"ऐसे हे देखते रहोगे या मेरे साथ भी चलोगे? और ये मोटरसाइकिल इस बिटोड़े के पीछे कड़ी कर दो. दिखेगी भी नहीं अगर कोई इधर से गुजरा भी तोह. वैसे तोह कोई आ नहीं सकता क्योंकि ये सारे हे हमारे है और घर पे तोह कोई हैं नहीं." फिर शर्माती सी खुद हे उस गोबर के उपलों से बनाये के बिटोड़े की तरफ चल दी तोह अर्जुन ने मुस्कुराते हुए वहीँ जा कर मोटरसाइकिल को एक तरफ ाचे से लगा दिए.

"बड़ी ाची जमींदारी है वैसे तुम्हारी तोह मंजू. और जितना मैं जानता हु जमीन के बारे में सबसे ाची तुम्हारे हे पास होगी गाँव में.", वैसे हे उसके साथ मस्ती करता वह इधर उधर देख रहा था. फसल दूर तक फैली हुई थी और इनके खेत जहाँ तक थे वह दूर लगे सफेदे के पेड़ो से एक निशानदेही सी की गई थी. अंदर खेत में तोह काफी पेड़ और बेरी के झाड़ भी लगाए हुए थे.

"इधर आओ मेरे साथ. ये हैं हमारी हौद और मोटर.", 2 सीमेंट के कमरे बने थे और उनके चारो तरफ जैसे आधा एकड़ में सिर्फ घने पेड़, सब्जियां और पानी देने के पाइप लगे थे. अलग हे ठंडक और सुकून सा था इस जगह पर. कुछ जगह तोह साफ़ करके बस लगातार छिड़काव से पक्की समतल हे की गई थी. एक तक़रीबन 8क्ष4 फ़ीट की सीमेंट की टंकी भी बानी थी जो साफ़ पानी से ऊपर तक भरी थी.

"सच में मंजू, ये जगह बड़े प्यार से बनाई गई है. और कितना सुकून है यहाँ.", अर्जुन जगह के बिलकुल बीच खड़ा ध्यान से चारो तरफ देख रहा था. अमरुद के पेड़ो पर छोटे बेरी जितने फल आये हुए थे, अनार से पेड़ झुके हुए थे और कुछ अनार तोह फट कर अपनी लाली दिखा रहे थे. सब्जियां भी कतार से लगी थी जैसे हर रोज उनका ध्यान रखा जाता हो.

"यहाँ बैठो भी कबसे खड़े हो. फिर भागने की जल्दी करने लगोगे.", एक चारपाई जो सफ़ेद सूट से बनी गई थी और ऊपर चद्दर को सिला गया था को बिछाने के बाद मंजू ने अर्जुन को हिलाया. इस बार अर्जुन उन बड़ी और हिरणी सी काली आँखों में हे खो गया था. बहार बेशक धुप थी लेकिन यहाँ चाय थी और अर्जुन की आँखों में खूबसूरत कालिख, मनुबला का प्रतिबिम्ब.

"बस करो न अब.", खुद हे वह लिपट गई जिस से अर्जुन उसके चेहरे को देख न पाए और यहाँ भी गलती कर दी. अर्जुन ने कास के मंजूबाला को बाहो में भर लिए था.

"पता है तुम्हारी आँखें मैंने पहले इतने ध्यान से कभी नहीं देखि थी या शायद आज जितना ये बोल रही है उतना हे ये पहले चुप रहती थी.", अर्जुन की बाहों में बेशक पहले मंजू का दिल जोरो से धड़क रहा था लेकिन अब वह बिलकुल शांत और सुकून में थी.

"पहले इन्हे इन्तजार नहीं रहता था और वह सिर्फ हम नहीं होते थे. आज दोनों हे बात है. तुम इनके सामने हो एक इन्तजार के बाद और यहाँ सिर्फ हम दोनों हे हैं.", मंजूबाला आज अपने उस रूप में थी जिसको अर्जुन पसंद था और वह अब इजहार कर रही थी. कोई डर नहीं, कोई शिकायत नहीं और न कोई तीसरी निगाह.

"हम दोनों है यहाँ, तुम्हे डर नहीं लग रहा?", अर्जुन ने मंजू का चेहरा अपने हाथो में लेते हुए मुँह के सामने किआ तोह शर्माती सी मंजू ने ना में गर्दन हिलाई. उसका इस तरह से करना बहुत कुछ कह रहा था. 100 दिए जैसे आँखों में जल कर उन्हें रोशन कर रहे थे, गालो पर आई हाय की लाली बता रही थी की वह कितनी कुछ है और अपने मोतियों से दांतो से लाल सुरक होंठ दबती वह जैसे कामुकता को हवा दे रही थी. अर्जुन खुद हे उसकी और खींचता सा चला गया और अपने होंठ मंजू के होंठो से मिला बैठा. कितने नरम और मुलायम थे वह, रास से भरे और वैसे हे अंदाज में मंजू ने भी अर्जुन को चूमते हुए दोनों तरफ की आग का परिचय बता दिए था. उसकी साँसे इतनी गरम थी की अर्जुन को उनका एहसास अपने चेहरे पर होने लगा था. चेहरे से हट कर हाथ कब कमर पर चले गए दोनों को इसकी भनक तक न लगी. मंजू भी जोरो से अर्जुन का सर दबती अपनी पीठ पर उसके हाथों का स्पर्श जीने लगी थी.

"ये मंजू सबसे अलग है.", होंठो को छोड़ अर्जुन ने जब अपने दोनों हाथ उसकी पतली कमर पर कमीज के अंदर से रखे तोह उस रेशमी एहसास में वह खो सा गया था. ये शेरनी भी कुछ काम न थी, बराबर कद और बड़ी हे हिम्मत और मादकता से भरपूर.

"ये इस अर्जुन के हे लिए है और सिर्फ उसके सामने वो ऐसी है. इस पल में मैं सिर्फ तुम्हारी हु और देख रहे हो मेरी भी यही ख्वाहिश थी पहले हे दिन से की कभी खुले आसमान में तुम्हारे साथ और ऐसे बीच खलिहान में. मैं चाहती हु अर्जुन तुम मुझे आज औरत बना दो. मैं तुमसे कुछ नहीं मांगती.", इस पल में भी मंजू के शब्दों में वासना या अभद्रता नहीं थी. अर्जुन ने भी उसके इस प्यार को अंदर तक महसूस किआ था. जिस तरह से आज वह इस लड़की का दीवाना हुआ था वह खतरनाक भी था लेकिन दोनों को इसका एहसास अभी न था.

"मैं तुम्हे दर्द नहीं देना चाहता मंजू."

"मैं इस दर्द को हे सहना चाहती हु."

"मंजू, मैं जो बात कर रहा हु उसका गहरा मतलब है. जुदाई सेह पाओगी? शरीर का दर्द तोह बर्दाश्त हो जाता है.", अर्जुन ने साफ़ कर दिए था के वह उमरभर का वडा नहीं कर पायेगा.

"मैं भी तोह वही दर्द कह रही हु अर्जुन. प्रीती को सिर्फ कुछ देर तक जुबान पर मत आने दो. दिल में वही रहेगी लेकिन कुछ घंटे प्यार के मेरी आत्मा पर भी प्यार के बरसा दो." अर्जुन उसकी इतनी स्पष्ट बात पर हैरान हो गया था. कैसी लड़की है जो सब जानती है फिर भी वह वही मांग रही जिस से उम्र भर एक गहरी याद बन जाएगी.

"समझ लो की मेरी ये तुमसे भीख या आखिरी इत्छा है अर्जुन. अगर कहोगे तोह मैं कभी तुम्हे नजर भी न आउंगी.", मंजू की आँखें सजल हो गई थी. अर्जुन का दिल उसके प्यार को ठुकरा न सका. उसकी आँखों को चूमते हुए वह खुद हे उस से लिपट गया.

"मेरी आत्मा अगर प्रीती है तोह शरीर में एक जगह तुम्हारी भी मंजू. और तुम्हे पूरा हक़ है ऐसे हे साथ बिताने का. प्यार देने का हे नाम है तोह मई स्वार्थी नहीं हु और कोशिश करूँगा तुम्हारे हिस्से का तुम्हे देने का.", अर्जुन के होंठ अब मंजू की क़ैद में थे. दिल फिर से अपनी रफ़्तार पर आ चूका था. खुद हे अर्जुन के हाथ अपनी कमर पर रखती वह उस से चिपक गई थी. नीप के दरख्त से मंजू का शरीर लगता अर्जुन कब उसके रेशमी उभारो की जड़ तक आ पहुंचा पता न चला. लेकिन इस से आगे का सफर अब मुश्किल था.

"इन्हे खुद आज़ाद करो ये तुम्हारे हे है. और इनपर किसी का हक़ नहीं.", अपने कठोर उभारो की तरफ इशारा करती मंजू ने कहा तोह अर्जुन ने वह लाल कमीज दोनों सीरो से प्यार से ऊपर उठानी शुरू की तोह उसका ये तराशा बदन प्रतिपल उसकी आँखों में बसने लगा था.

सपाट और कटाव लिए पेट, 2 गीत से थोड़ी सी ज्यादा पतली कमर, गोल नाभि जहाँ बाल का naamo-nishaan तक न था, गहरी लाल ब्रा में क़ैद मुट्ठी से कुछ बड़े हे सर उठाये वह उभर, गले पर मादक कंधे की हड्डी और सुराहीदार लम्बी गर्दन. ऐसे हे वह देखता रहा फिर गले लगते हुए वह लाल ब्रा भी कमीज के साथ अब चारपाई की शोभा बढ़ा रही थी और अर्जुन उन नुकीले तीर से निप्पल और एक बड़ी कटोरी के आकर के दोनों गोलों को देख रहा था.

"तुम दिल के साथ शरीर से भी आदिवट्या हो मंजू. ये शरीर सही मायने में कलाकारी हे है.", एक निप्पल को ऊँगली के पूरे से छेड़ते हुए वह उसकी सख्ताई देखने लगा. बिलकुल हे सख्त और तीखा चूचक इस चुहान से और तन्न गया था जिसपर अब अर्जुन के होंठ जा चिपके थे.

"आह अर्जुन ये शरीर और सबकुछ तुम्हारा हे है. आत्मा भी और मैं भी.", उसका सर अपने उभर पर दबाते हुए मंजू आहें भरने लगी. उसपर इतना उन्माद छाया था के वह आज मर्डर भी जाये तोह ये कम् न होता. अपने दूसरे हाथ से मंजू ने अपनी सलवार खुद हे ढीली कर दी थी लेकिन अर्जुन ने उसके दूध को छोड़ते हुए सलवार को थाम लिए और दोनों पैरों से प्यार से नीचे बैठ कर निकलते हुए बिना सिलवट लाये फिर से चारपाई पर फेंक दिए था. मंजू बेशक अपनी टाँगे चिपकाये नंगी कड़ी थी लेकिन अर्जुन की आँखों में खुद के लिए प्यार और इज़्ज़त देखने के बाद वह खुद को सौंप क्युकी थी इस इंसान को.

लम्बी चिकनी टाँगे शायद अर्जुन की टांगो से भी एक इंच ज्यादा लम्बाई लिए थी. बास्केटबॉल की वजह से वह किसी विदेशी मॉडल जैसी छरहरी और रेशमी थी, साथ हे हलकी सख्त, छूट बिलकुल बहार को उभरी जहाँ और कोई उभर न था, 4 इंच का चीरा और एक तीखी सी गुलाबी चोंच बहार की तरफ एक कम लम्बी. बाल शायद आज हे साफ़ किये थे अगर वह उगे भी थे तोह. दोनों टांगो को प्यार से नीचे से ऊपर तक सहलाते अर्जुन हर पल को जैसे अपने जेहन में भर रहा था. कोई सोच भी नहीं सकता था की एक गाँव की लड़की का शरीर ऐसा हो सकता है जिसके सामने महंगे कपड़ो का प्रचार करती विदेशी बालाएं पानी भरने लगे लेकिन ये सच था और अर्जुन के सामने थे था. दोनों उभारो को फिर से अपने हाथो में भर वह होंठो को पीने लगा तोह मंजू ने टीशर्ट को शरीर से बहार निकलना चाहत और सिर्फ एक पल अलग हो कर अर्जुन ने चारपाई पर वह कपडा भी बिछा दिए था.

उसकी ये चौड़ी छाती और मजबूत बाहों को अपने जिस्म पर महसूस करती मंजू की छूट ने शहद की पतीली सी धार उन गुलाबी होंठो से नीचे बहनी शुरू की तोह अर्जुन ने वापिस उस शहद को अपनी ऊँगली से छूट के होंठो पर मसलते हुए उन्हें हल्का खोलना शुरू कर दिए.

"उम्मम्मम्म.. मममममम............ आह ये बिना हे कुछ किये क्या कर dia...mmmmm.. " शरीर ने सही मायने में एक छोटा सा चरमसुख पा लिए था. इधर जीन्स भी जूते पर अटकी पड़ी थी खुलने के बाद. लेहलाती फसलों के बीच बने इस छोटे से हरे भरे स्थान पर ये दो निर्वस्त्र शरीर एक दूसरे से चिपके प्रेम धुन पर थिरक रहे थे. मंजू ने बिना डरे उस साढ़े 8 इंच से भी बड़े लगते विकराल लुंड को बड़ी आराम से थाम लिए था. वह पहली लड़की थी जिसकी मुट्ठी इतनी दूर तक लुंड के गिर्द लिपटी थी लेकिन लम्बी हथेली के बावजूद आधा इंच उसकी पकड़ से बहार था. इधर अर्जुन ने वह पतले निप्पल चूस चूस कर हलके फुला दिए थे और सख्त चुके भी अब उसके हाथ की गिरफ्त में थोड़ी अकड़ काम करते हुए दबने लगे थे.

"एक मिनट रुको. वह मोटर के पास तुबे है लेकर आना." अर्जुन ने जूते खोलते हुए जीन्स भी बाकी कपड़ो की और फेंक दी और मंजू की बताई दिशा में बढ़ गया. पीछे से उसकी पीठ की विशाल चौड़ाई निहारती वह और गरम हो गई थी. कहाँ वह उसके अनुकूल लम्बाई वाली लेकिन पतली छरहरी लड़की और कहा ये पौराणिक कथाओं वाला विशाल घोडा. लेकिन taal-mel तोह जादुई था दोनों में. इधर अर्जुन वह सफ़ेद तुबे लेकर मंजू के पास आया तोह अपने हाथ में लेकर मंजू ने उसको खोला और पारदर्शी सी चिकनाई उस सीलबंद तुबे से निकल कर अर्जुन के लुंड के सुपडे पर ऊँगली घूमते हुए लगाने लगी. अर्जुन प्यार से उसके चेहरे को देखता तोह वह एक पल देखने के बाद फिर नजरे झुका लेती.

"हो गया यहाँ का तोह अब तुम लगाओ.", मंजू ने तुबे अर्जुन की तरफ की तोह उसने वह भी वहीँ फेंक दी और नीचे झुक कर जांघो के सामने बैठ गया था. मंजू बस हैरान से देख रही थी की ये क्या करने लगा है लेकिन अगले हे पल आँखें बंद हो गई और दोनों हाथ अर्जुन के सर के पीछे आ गए थे. छूट का दाना चूसता अर्जुन जीब से भी उस नरम दरार को कुरदेता ाचे से नरम करने में जुट गया था. रास जब नीचे टपकने लगा तोह वह ऊपर उठा.

"बड़ी मीठी हो. शायद गुस्सा बहार निकल कर अंदर से खुद को शहद बना चुकी हो.", अर्जुन की बात पर हंसती सी मंजू ने अपने होंठ उस से मिलते हुए टांग हलकी सी फैला ली थी जो इशारा था के मुँह से मुझे मेरी छूट का स्वाद लेने दो, तुम वह करो जो अभी जरुरी है.

"दर्द होगा लेकिन ज्यादा नहीं. तुम्हारी ये बता रही है के ये मेरा झेल लेगी.", छूट का लम्बा चीरा देखते अर्जुन ने ये बात कही और असल में वह हौंसला हे दे रहा था.

"कच्छ" की आवाज से वह मोटा डंडा इस चिकनी छूट को लहूलुहान करता सुपडे तक अंदर बैठ गया था. पतला लुंड होता तोह क्या पता खून न भी निकलता ऐसी छूट से लेकिन सुपडे की मोटाई तोह अंडे से भी कहीं अधिक थी.

"आठ.. बातों में उलझा के चाक़ू मार हे दिए.. आह.. एक दिन तोह होना हे था." हिम्मत से काम लेती मंजू ने अपनी पीठ नीम के पेड़ से टिकनी चाही तोह अर्जुन ने लुंड फंसाये खुद को हे पेड़ से लगा लिए.

"चिल जाएगी तुम्हारी पीठ, वह रेशम सी कोमल है और मेरी गैंडे से मोटी.", इस पल भी अर्जुन मजाक कर रहा था. उसका भी बुरा हाल था क्योंकि छूट ने बुरी तरह लुंड को जकड रखा था. हौले हौले उसके गुदाज और माध्यम से कूल्हे दबाने सुरु किये तोह ये भी लुभावने लगे अर्जुन को. पूरे आकर में थे वह कूल्हे, bhagne-daudne की वजह से. कस के पकड़ते हुए अर्जुन ने इस बार कमर चलाई तोह लुंड उस क्रीम की चिकनाई और कमर के जोर से चिकनी छूट में 6 इंच तक बैठ गया था और अगर मंजू के होंठ जकड़े न होते तोह इस बाघ में बैठा हर पंछी उड़द चूका होता. आँखों से पानी निकल आया लेकिन मंजू ने शरीर को सँभालते हुए अपना सर अर्जुन के कंधे पर रख लिए था.

"1 मिनट रुक कर शुरू करना. अभी बस इस पल को महसूस करने दो. लिखवा हे लिए मैंने तुम्हारा नाम अब अपनी इस सहेली पर.", अर्जुन उसकी पीठ और कूल्हे सहलाता देख रहा था के रोटी हुई भी वह मजाक कर सकती है.

"बड़ी हिम्मत है तुम में मंजू.", अर्जुन की बात का मतलब समझ कर मंजू ने एक गहरा चुम्मा जड़ते हुए जवाब दिए.

"ये जो हथियार है न तुम्हारा, मेरी उम्र की कोई भी लड़की इस गाँव की अगर लेकर बिना गाला फाड़े रह जाये तोह ये जाटनी नजर न दिखाएगी कभी. पता नई किस देवता की पूजा करि होगी तुम्हारे घरवालों ने जो ये वरदान में मिला. ाः.. कसम से.. लम्बाई बराबर न होती तोह मेरी जितनी पतली और कोई 5 फुट की होती तोह पेट फटने से मर्डर जाती इसके वॉर से.", हलकी सी कमर खुद हे हिलती वह बदन ढीला कर बोलने लगी. सिसकी और दर्द की आह निकलने लगी थी अब.

"मैं तोह पूछ भी नहीं सकता अपने घरवालों से के बताओ के किसकी पूजा की थी.", उसकी इस बात पर मंजू गले लगती उसके चूतड़ पर हल्का थप्पड़ मरती बोली.

"बदमाश कहीं के. हाहाहा.. आह्हः.. मत हंसा re..sach में फाड़ के रख दी तेरे भीमसेन ने तोह... उम्म्म", 2-3 इंच लुंड उस कासी छूट में आगे पीछे होने लगा था और वैसे हे दर्द और सिसकियाँ बढ़ने लगी थी.

"तुम्हे कैसे पता के ये ज्यादा बड़ा है?," अर्जुन ने फिर से मुस्कुराते हुए कहा और 3 इंच बहार करते इस बार 1 इंच और ज्यादा अंदर तेल दिए..

"आह माँ.. ख़तम होने का नाम भी लेगा क्या ये मूसल... उम्म्म्म.. ाः.. चांदनी.. आह और 2-3 सहेली है.. वह सुनती थी अपनी कहानियां.. उम्म्म.. के उसके बर्फ का 5 इंच का और इतना मोटा.. आह.. के फलनि के बर्फ का बहोत बड़ा कोई 6 इंच से भी थोड़ा ज्यादा.. किताब में भी 5-7 इंच हे बताये थे.. आह्हः मेरी माँ.. लेकिन ये तोह मेरी कलाई से मोटा और मेरे बिलंत (गीत - 9") के बराबर है.. उम्.. ", अर्जुन ने अब उसकी टाँगे अपनी कमर पर लपेट ली थी. लड़की ठोस थी और बेशक छरहरी थी लेकिन वजन भी 65-70 से काम नहीं था. इस बार होंठो को कस्ते हुए अर्जुन ने आखिरी धक्के में उसके कूल्हे लुंड की जड़ से मिला दिए तोह 2-3 बूँद खून के उसके अंडकोष से होती जमीन पर आ गिरी. छूट पूरी भर गई थी उस तगड़े लुंड से और इस बार फिर मंजू चरम पर पहुँचने से पहले फिर दर्द में हल्का सा तड़प गई थी लेकिन अर्जुन ने चारपाई के सिरहाने उसका धड़ टिकते हुए अब जमीन पर खड़े रहकर उसकी कास के चुदाई करनी शुरू कर दी थी. अगले 10 मिनट में हे छूट ाचे से खोल कर वो सुपडे तक लुंड अंदर बहार कर रहा था और दर्द की आहों को पीछे छोड़ मंजू अब मस्ती में चीखती उसके कूल्हों पर नाख़ून गदति हवा में झूल रही थी.

"अब तोह दर्द नहीं हो रहा न मंजू?", प्यार से उसकी गर्दन चूमते हुए अर्जुन ने धक्के लगते हुए हे पुछा..

"ये मजा है अर्जुन और सच में वह दर्द जायज था.. ाःह... उम्म्म....... इतना मजा है के मैं.. aahh.bayaan नहीं कर सकती.. कोई नै कर सकता.. मुझे फिर से बाहों में भर लो प्लीज." कमर उचकती मंजू ने छूट लुंड की जड़ से मिला दी थी और रह रह के उसका शरीर झटके लेने लगा. दांत अर्जुन के कंधे पर गड्ड गए थे और अंदर छूट के गीलेपन से लुंड पूरा चिकना हो गया था. एक पल रुक कर अर्जुन ने मंजू को उस सीमेंट की टैंक के सहारे खड़ा कर दिए. फिर पीछे से दोनों उभर कास कर पकड़ते हुए वह पूरे जोश से मंजू की चुदाई में मशीन सा लगा था.

"आअह्ह्ह.. उम्.. ाःह.. अअअअअ... जोरर से... अर्जुंन.... आह.." तूफानी चुदाई दोनों हे सेहन न कर पाए और लुंड फूलने लगा तोह गहरे धक्के लगता अर्जुन उसको बहार निकलने लगा लेकिन मंजू ने अपने हाथ से उसके शरीर को अपने साथ जोड़ लिए था. वह गरम धार अब लगातार छूट की गहराई में जाती बच्चेदानी पर लगने लगी थी. और साथ हे मंजू भी इस गर्मी से पिघल गई थी. बिना देरी किये वह उस पानी के टैंक के अंदर पलट गई थी. छूट को उँगलियों से खोलती जैसे वह साफ़ करने लगी और फिर गर्दन को दिवार से टिका कर बाकी शरीर पानी के ऊपर हे बड़ी दाखस्ता से रोक कर लेट सी गई..

"मई चाहती थी अंदर महसूस करना. और ये सबसे ाचा पल था उस पहले धक्के के बाद.", आँखें बंद किये वह मुस्कुरा रही थी और अर्जुन नंगा इस तरफ खड़ा अब उसके होंठ चूसता हलके हलके उसकी कमर पानी के अंदर सेहला रहा था.

"अंदर हे आ जाओ. फिर नाहा के खाना खाएंगे. इस पानी से दर्द नहीं होगा, खिलाडी होने का ये फायदा तोह है काम से काम.", अर्जुन को गले लगती वह उस से पानी के अंदर हे लिपट गई. दोनों एक बार फिर एक दूसरे में खो गए थे और पागलो की तरह चूमने लगे थे. पानी में तोह वह किसी हलकी मछली सी लग रही थी अर्जुन को जिसको वह बड़े प्यार से पूरा सेहला रहा था और जहा दिल करता वह चूम रहा था.

"तुम तैरती भी हो?", अर्जुन ने मंजू को गॉड में बिठाते हुए कहा

"हाँ. और कई बार तोह रात को 3-4 घंटे अकेले स्टेडियम के पूल में. तुम कभी गए नहीं उस साइड न. छुट्टी वाले दिन लेके चलूंगी या फिर तुम किसी रात बॉयज हॉस्टल रुक जाना. 6 बजे के बाद वह बंद रहता है सुबह 5 बजे तक.", इठलाते हुए मंजू ने कहा और पानी के अंदर हे एक बार फिर वह उस मूसल के ऊपर बैठ गई थी लेकिन यहाँ उतना दर्द नहीं हुआ था. गॉड में उठा के अर्जुन अब उसको फिर से टंकी की दिवार पर टिकाये छोड़ रहा था लेकिन इस बार उसके पाँव पानी के अंदर लेकिन कूल्हे और उस से ऊपर का भाग बहार था. मंजू तोह उस 9 इंच की टंकी की दिवार पर आराम से तिकी हर धक्के को मजे से सेहन कर रही थी. इस बार चुदाई वैसे रफ़्तार में नहीं थी. बस प्यार और एक दूसरे के शरीर से खेलते दोनों खिलवाड़ कर रहे थे और कभी होंठो को चुस्त कभी एक दूसरे को हल्का काट लेते. न थकान थी न जल्दबाजी बस एक रंगीन मिलान जिसको दोनों मजे से जी रहे थे. जब अर्जुन थकने लगा तोह नंगे हे मंजू को उठाये चारपाई पर लेत गया और यहाँ अब वह उसके सीने के ऊपर लिपटी अपनी लाचली लम्बी टंगे खुद हे उचकती जैसे चुदाई में लगी थी. 40 मिनट की इस अगली चुदाई में अंत वैसे हे हुआ जैसे पिछली बार हुआ था. दिवार से लगाए पीछे से लम्बे गहरे धक्के मरता अर्जुन बस इस बार उसके कूल्हों को फैलता पूरा जड़ तक पेल रहा था और इस बार फिर मंजू तीसरी बार झड़ी थी एक चुदाई में पर अर्जुन ने इस बार सारा वीर्य उसकी पीठ पर उड़ेल दिए था और खुद पहले टंकी में कूद गया था. मंजू थकी हरी सी अंदर गिरी तोह अपने ऊपर बाँहों में भरे वह मंजू को प्यार करने लगा था. कुछ हे देर में दोनों अब एक हे तोलिये से शरीर साफ़ करके कुछ देर उस चारपाई पर लेते रहे. मंजू अर्जुन के ऊपर पूरी लेती बस उसकी आँखों में देखती थोड़ा बहोत बोलती और फिर चूम लेती.

"वैसे सच बताओ मुझे तुमसे ऐसी उम्मीद नहीं थी.", अर्जुन ने ये बात कही तोह वह छाती पर चिपकती बोली

"हाँ. मुझे भी नहीं थी. लेकिन एक हे बार में आदत लग गई तुम्हारी और ज्यादा के चक्कर में बस जान जाने से बची है. लेकिन तुम्हारे साथ उसका भी दुःख नहीं होगा.", और फिर से हौले हौले वह होंठ पीने लगी थी.

"रुक जाओ नहीं तोह मर्डर हे जाओगी.", अर्जुन ने इशारा किआ तोह वह हाँ में गर्दन हिलती एक बार लुंड को पकड़ फिर शरारत से हंसती कड़ी हुई और जल्दी से कपडे पहन कमरे में चली गई. इधर अर्जुन भी हँसते हुए अपने कपडे पहन कर बिना जूते डाले चारपाई पर बैठ गया था.

"ाचा बा खाना खा लो मैंने खुद बनाया है तुम्हारे लिए. आज गांव का भी खाना चख कर देखो.", एक रोटी गरम रखने वाला डब्बा और बड़ी कटोरी में कढ़ी देसी घी दाल कर प्लेट के साथ मंजू ने चारपाई पर राखी फिर एक प्लेट में खीरा काट कर और एक गिलास लस्सी की बोतल लिए वह खुद भी अर्जुन के पत् पर बैठ गई. अपने हाथो से वह उसको प्यार से खिलने लगी थी. ये जैसे सपने जैसा था दोनों के लिए. इस खाने में भरपूर स्वाद के साथ बेइंतिहा प्यार भी था. अर्जुन उसको खिलता और फिर बीच बीच में कढ़ी वाले होंठो से चूम भी लेता था. प्यार से भरपेट खाने के बाद लस्सी का गिलास पी कर वह लेट गया तोह मोटर चला कर सारे बर्तन साफ़ करने के बाद मंजू ने गीले कपडे से खुद हे अर्जुन का चेहरा और हाथ साफ़ किये. वह किसी आदर्श बीवी की तरह उसका ख्याल रख रही थी और ऐसे हे कुछ देर बाद वह भी वहीँ उसके साथ आ कर लेट गई.

"सब एक ऐसे हसीं सपने सा है मंजू, की मई इसमें से बहार नहीं आना चाहता.", अपने दिल पर उसका हाथ रखते हुए अर्जुन ने मंजू की आँखों में भी वही देखा जो वह कह रहा था. उसके सीने पर हाथ फिरती मंजू बस कुछ देर चुप रही.

"मैं तुम्हारी हे हु अर्जुन और मैं चाहती हु के ये ऐसा हो. लेकिन सिर्फ 2 बार महीने में. बाकी दिन तुम उसको प्यार दो जो तुम्हे मेरे से पहले से प्यार करता आया है. मैं मेरे परिवार के खिलाफ नहीं जाउंगी लेकिन जब तक ज़िंदा हु मेरी आत्मा पर सिर्फ तुम्हारा अधिकार है. कमर से ऊपर तोह मैं अपने खसम को भी आने न दूंगी क्योंकि यहाँ ये दिल है जिसपर अब तुम्हारा हे नाम है." और गीली आँखों से गाल चूमकर वह उसके साथ हे लेट गई.

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"अर्जुन अब उठ जाओ न 2 बजने वाले है और तुम्हे जाना भी है. मैं भी घर जाउंगी अब नहीं तोह 3 बजे तक लोग इधर दिखने लगेंगे अड्डे की और जाते.", होंठो को चूमती वह अपनी जुल्फें अर्जुन के ऊपर गिराए उसको उठा रही थी. अर्जुन भी इस मजे की नींद से बहार आता इस हसीना को देख मुस्कुरा उठा.

"चलो जी फिर अब आपका इन्तजार रहेगा.", उसकी कमर पकड़ एक बार कास के होंठ चूमने के बाद वह खड़ा हुआ और बाल चेहरा ठीक करने के बाद जूते पहन कर चारपाई को अंदर रखता वह वहीँ कमरे के बहार फिर से मंजू को गले लगा कर खड़ा हो गया था.

"कब आओगी वापिस?", अर्जुन के इस तरह से पूछने पर मंजू बस लिपटी रही. फिर कोई 2 पल बाद वह बोली.

"3 दिन बाद. वैसे तोह मेरी छुट्टियां है लेकिन शहर में काम हैं तोह मैं आउंगी और फिर 1 बजे वही मिलूंगी स्टेडियम के पेड़ के पास. 4 बजे वापिस बिठा देना बस में.", आज के दिन का आखिरी और एक गहरा किश करते दोनों अलग हुए तोह वह मोटरसाइकिल के नजरो से गायब होने तक बस अर्जुन को देखती रही.

"शुक्रिया अर्जुन", इतना बोलकर वह 2 बूँद आँखों में लिए मुस्कुराती सी दूसरी तरफ बढ़ गई.

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"Hello, तुम अभी तक यही हो.?", वही पेड़ के नीचे मेनका कड़ी थी बस के इन्तजार में.

"सोचा आपको बस मिलेगी नहीं तोह ले हे चलता हु साथ. हड़ताल है न आज बस की.", अर्जुन की बात पर बिना नाज नखरे के वह हक़ से पीछे बैठ गई थी और दोनों बढ़ चले वहीँ जहा से ये सफर शुरू हुआ था.
 
जल्द हे शंकर से मुलाकात होगी. और उसके डॉक्टर दिमाग से.
 
अपडेट 52

एक नया बंधन


"हंसमुख ये बात ठीक नहीं करि तुमने. तुम्हे पता था के तुम्हारी जमीन मेरा सपना है और तुम ये बयाना ऐसे मुझे वापिस कर रहे हो.", सफ़ेद पगड़ी, कुरता धोती पहने ये रोबदार आवाज वाला जमींदार जैसे लताड़ रहा था हंसमुख को जो सामने कुर्सी पर बैठा था और दोनों के बीच वाली छोटी स्टूल पर पैसो का बण्डल रखा था. हुक्का गुदगुदाने के बाद जमींदार ने एक बार पैसो और फिर हंसमुख को देखा.

"भाई देशराज, मैंने तोह सौदा तुम्हारे हे साथ करना था तभी तोह ये एक लाख पकड़े थे साईं के. लेकिन मेरे जीजा ने जमीन देने से साफ़ इंकार कर दिए और मेरा भांजा तोह जल्लाद है. वह तोह चाहता है के मैं गाँव में हे राहु. जीजा काम से काम पैसे तोह दे रहा है लेकिन शंकर जमीन मुझे हे सँभालने को कह रहा. विनती है भाई तुम ये अपने पैसे रख लो और अगर चाहो तोह मैं तुम्हे इनका ब्याज भी दे देता हु.", हंसमुख की परेशानी देख इस जमींदार देशराज ने हलके से ना में गर्दन हिला दी.

"कैसे बात करते हो हंसमुख भाई. तुम्हारे साथ बचपन बीता है मेरा लेकिन कोई बात नहीं फिर मैं कोशिश करूँगा तुम्हारे जीजा से बात करने की. वह लोग तोह शहर रहते है कैसे संभालेंगे इतनी जमीन को.", देशराज सोचता सा बोलै. लेकिन हंसमुख उसकी बात से इकरार नहीं कर रहा था.

"ध्यान से सुनो मेरी बात. तुम इस 40 किल्ले की बात करते हो देशराज, जीजा के पास ***** में 400 से ज्यादा किल्ले, उनके पोते के पास पंजाब के फ****** शहर के साथ लगते गाँव की पूरी जमीन, ##### गाँव में 50 से ज्यादा हाईवे पर और हमारी जमीन के 60 किल्ले है. खुद सोचो वो इस 40 किल्ले का सौदा किस बात पर करेंगे जब बाकी के 80 भी उनके पास हों, रूपाली भी अब शहर जा रही है. बात सिर्फ जमीन की नहीं है, गुज्जर याद है बड़े गांव वाला जो 23 साल पहले अपने बेटे और दोस्त सोमबीर सिंह के साथ कतल हो गया था, शंकर जो मेरा भांजा है उसका सीधा तार था इस घटना से और बनवारी का भी.", बस इतना हे केहनृ था की देशराज के गले में धुआं अटक गया और किसी पागल कुत्ते सा वह खांसने लगा था.

"यह अहम अहम.. भाई नहीं चाहिए कोई जमीन. मैं ब्राह्मण हु और मेरे 2 हे बेटे है जो जमींदारी से संतुष्ट हैं. माफ़ करना जो bhool-chook हुई हो.", वह पानी का जग मुँह से लगता गहरी सांस लेने लगा था. उसको भी याद था वह हादसा जिस से पूरा प्रान्त हिल गया था लेकिन कोई गीअफ्तारी नहीं हुई थी. और जितनी जमीन उसके पास थी उस से 50 गुना ज्यादा के मालिक को वह क्या लालच दे सकता था. देशराज ने सोचा था के वह हंसमुख को कही 20-25 लाख दे कर साडी जगह हथिया लेगा. हंसमुख भी खड़े होते हुए हाथ जोड़ कर निकल लिए घर जहाँ ब्राह्मणो और पुजारी को भोजन करवाना था.

शंकर शर्मा भी खेत में अस्थियां और राख फैला कर फारिग हो चूका था. कोई डेढ़ घंटा छोल साहब से एकांत में लम्बी बातें की थी फिर कुछ देर रेणुका से भी. रूपाली को भी बड़े प्यार से हिम्मत दी थी और उसके भविष्य की बातें भी की थी जिस से अब रूपाली का मैं थोड़ा हल्का था. रामवेश्वर जी और कौशल्या जी ने खुद हे सभी riti-riwaj पूरे किये थे जिनमे ऋतू और माधुरी ने भी हिस्सा लिए था. दोपहर होने को आई तोह फिर 21 ब्राह्मणो और एक पुजारी को बनवारी की पसंद का भोजन करवाया गया था, कपडे और दक्षिणा के साथ. कौशल्या जी ने यहाँ अपना बड़ा दिल दिखाया था और खुलकर ाची खासी दक्षिणा चढ़ाई थी.

"माँ, आप चाहो तोह हम गाँव में बड़ा स्कूल या जो भी आप कहो बनवा सकते है, मां के नाम से.", आँगन में हे दरी पर बैठते हुए शंकर ने पत्तल से पूरी सब्जी का निवाला खाते हुए बात शुरू की. उनके बड़े भाई राजकुमार भी इस बात पर सहमत थे.

"नहीं बीटा दसवीं तक का जो स्कूल है उसको हे थोड़ा बढ़ा देंगे तुम्हारे पिता जी से बात कर के. लेकिन मेरा बड़ा दिल हैं के बनवारी के नाम से हम वह अपने शहर में एक गौशाला बनवाये और सड़क पर घूमती इन मासूम बेसहारा गायों को एक छत्त और सही खाना दे. ##### गांव में जमीन भी पड़ी है बाकी तुम्हारी समझ.", उन्होंने एक लड्डू बड़े बेटे की पत्तल पर रखा और 2 शंकर की, जिसपर दोनों हे भाई बस मुस्कुरा दिए.

"ऐसा हे होगा, फसल कटाई के बाद एक तरफ के 3 एकड़ मैं गौशाला के लिए तैयार करने के लिए अपने ठेकेदार को बोल दूंगा. बस आप अपनी इत्छा हमेशा खुलकर बोल दिए कीजिये. वैसे कल मैं जाऊंगा उधर रेणुका की ससुराल और जल्द हे फैंसला करवाता हु कुछ.", शंकर ने लड्डू के 2 टुकड़े किये और फिर हजम कर लिए.

"मैं गाडी ले चलूँगा और आप सब को छोड़ दूंगा कल. फिर एक दिन घर भी रह लूंगा क्योंकि बचे भी शिकायत कर रहे है थोड़ी.", राजकुमार जी तोह सर मुंडवा कर खुद हे भिक्षुक जैसे दिखने लगे थे और उनका छोटा भाई इस बात पर थोड़ा मुस्कुराता देख रहा था.

"कौशल्या तुम जरा बहार देखो. मुझे शंकर से बात करनी है. और तुम भी बैठो राजकुमार.", रामेश्वर जी वह अंदर आँगन में आये तोह कौशल्या जी से पहले राजकुमार उठने लगा था लेकिन उन्होंने सिर्फ अपनी धर्मपतिनि को बहार जाने को कहा.

"हांजी, मुझे याद है आपने बात करनी थी मुझ से.", शंकर ने purv-vatt हे बैठे हुए कहा तोह शंकर जी भी वहीँ नीचे दरी पर बैठ गए.

"घर का काम कहाँ तक पूरा हुआ है? और नौकरी का?", बिना नाम जाहिर किये उन्होंने अपनी बात कही.

"घर तोह पूरा हो गया है बस वह मुहूर्त देख कर ghrih-pravesh की बात कही है उसने. हाँ नौकरी भी करवा दी है और अगर वह पसंद नहीं आएगी तोह फिर कुछ समय तोह अभी मिल हे जायेगा. आपने शायद और जरुरी बात केहनी थी.?", शंकर ने अब घुटने मदद कर बैठते हुए अपने पिताजी की आँखों में देखा जो जहा वह हमेशा एक असीम शांति हे देखता था. पता नहीं लेकिन अगर आजतक वह कुछ समझ नहीं पाया था तोह बस इन 2 आँखों को जो हर समय उसको एहसास करवाती थी की इनको भेद पाना मुमकिन नहीं.

"तुमने तोह अब तक अंजाम भी दे दिए होगा सतीश की बात को sun-ne से पहले हे? जानता हु मैं कौशल्या और तुम्हे, वह भी कुछ नहीं कहेगी और तुम भी. लेकिन थोड़ा इशारा दे दो अगर ठीक लगता है तुम्हे.", उनकी बात पर शंकर के चेहरे पर एक हलकी सी चमक आ गई थी. दोनों हे बाप बेटे संदिग्ध तरीके से बात करते थे और ये तरीका सिर्फ इन दोनों के सिवा नरेंदर को हे आता था. लेकिन बिना शंकर के वह अपना मुँह कभी नहीं खोल सकता था.

"घर देना जरुरी था जो आपका फैंसला था. नौकरी भी लेकिन तीसरे को सरकारी करवा दिए है क्योंकि अब इस के बाद जरुरत बढ़ने वाली है. लूटिनैंट से मेजर, ट्रायल और फिर लूटिनैंट. हाँ रुक नहीं सकता आपके कहने पर भी क्योंकि 3 दिन हो चुके है. मैं चलता हु जरा शहर से सामान लेके आना है.", अपने पिता को सोच में हे छोड़कर शंकर ने बड़े भाई को भी इशारा किआ तोह दोनों वहां से चुपचाप खिसक लिए.

'हर बात सुलझाई जा सकती है.. लेकिन नहीं. इसकी माँ के फैंसले और इसका तरीका मैं भी रोक नहीं पाउँगा.' खुद को जब मजूर पाया तोह फिर दिमाग से साड़ी सोच को झाड़ते हुए वह खड़े हो गए.

"चलिए जी आप यहाँ बैठे है और सरे सरपंच को अकेले सतीश भाई साहब संभाले हुए है.", कौशल्या जी अंदर आती बोली. उन्होंने शंकर और राजकुमार को कार में बैठते देख लिए था.

"सरपंच तोह कुछ भी नहीं कौशल्या जी लेकिन आपको संभालना हमसे आज तक नहीं हुआ.", वह संजीदगी से बहार चल दिए और उनकी धर्मपत्नी जी उनके पीछे. यहाँ अब उन्हें समय लगने वाला था क्योंकि ये पांच जो aas-pas के गाओं में रसूख रखते थे वह भी इस गाँव के दामाद के सामने अपनी समस्या भी रखते थे.

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"वैसे आपका काम हुआ क्या, मतलब अपने भाई के लिए लड़की पसंद आई?", अर्जुन मेनका को लिए चल रहा था और इस बार तोह मेनका ऐसे बैठी थी जैसे वह वर्षो से इस शख्स को पहचानती और पसंद करती है.

"नहीं हुआ काम. इतनी मुश्किल से पहले अपने घर से शहर तक आई थी फिर वहां एक घंटे बस का इन्तजार करने के बाद तुम मिले और अब इतना समय यहाँ गंवाने के बाद क्या पता लगा के उनका तोह घर हे बंद पड़ा है आज.", मेनका की बात पर अर्जुन ने शीशे से उनका चेहरा देखा जहाँ अभी सिर्फ कमीज के ऊपर ढके हुए उभर और कला दुपट्टा हे नजर आ रहा था.

"मतलब फिर तोह आज यहाँ गांव आने से आपको कुछ हांसिल नहीं हुआ?", अर्जुन को लगा की मेनका जी परेशां हुई होंगी इतनी जेहमत उठाने के बाद.

"ऐसा तोह नहीं के कुछ हांसिल न हुआ हो. हाँ वह अलग बात है के जिसके लिए आई थी बस वही काम नहीं हुआ.", खुद मेनका को नहीं पता चला था के वह कैसे ये बात बोल गई और इस बार शर्माता हुआ चेहरा शीशे में दिखा तोह अर्जुन भी कुछ समझता सा मुस्कुरा दिए.

"आगे देखो तुम. सड़क वहां हैं और मेरा मतलब था इस बहाने मैं mama-mami से मिल ली.", अपनी सफाई देने लगी थी.

"ओह." और जान बूझ कर अर्जुन शांत सा आगे देखने लगा. मेनका को उसका ऐसे शांत होना खेलने लगा था लेकिन कैसे वह अपने सब बंधन एकदम टॉड देती.

"एक ाचा दोस्त भी मिल गया इस बार. हाँ तोह तुम्हे दोस्त तोह बुला हे सकती हु या नहीं.", मेनका की बात पर फिर से अर्जुन ने चिरपरिचित अंदाज में उनका चेहरा देखा तोह दोनों मुस्कुरा रहे थे.

"वैसे इतनी जल्दी क्या है लड़की देखने की? अभी समय होगा आपके भाई के पास भी, एक साल तोह ट्रेनिंग में हे निकल जायेगा.", अर्जुन भी थोड़ा संभल रहा था हालात को जिस से की अगली बार वह मिले तोह एक दूसरे के सामने शर्म न आये.

"समय तोह पूरा हे है. 2 दिन हुए है उसको ट्रेनिंग पर गए लेकिन अगर शादी हो जाएगी तोह यहाँ वाले घर में कोई तोह होगा मेरे साथ रहने वाला. पति साल में एक बार हे आते है 20-25 दिन के लिए. Saas-Sasur को अपनी जमीन और छोटे बेटे से मोह है और उनका बीटा सिर्फ और सिर्फ एक मुसीबत हे है. अब भैया ने हे कहा था के उनकी कुछ जमीन के बदले यहाँ शहर में ठेकेदार ये घर दे रहा है तोह बस उन्होंने ये मेरे नाम कर दिए.", अर्जुन बस ख़ामोशी से हर लफ्ज़ सुन रहा था.

"बड़ी किस्मत मेहरबान है वैसे आप पर. भाई की पुलिस में नौकरी, आपको नया घर और फिर ये नै नौकरी ऊपर से अब भाई की शादी की भी चर्चा चल रही है.", अर्जुन को नहीं पता था के उसने दुखती रागग पर हाथ रख दिए था मेनका की.

"ये किस्मत भी पहली हे बार मेहरबान हुई है अर्जुन. बारिश में टपकती छत्त, पत्थरो से भरी जमीन पर अपने हाथो से सफाई करना, सरकारी स्कूल की 1 रूपए फीस भी मुश्किल से दे पाना, कभी पूरा तोह कभी आधा हे खाना. फिर एकदम से हालत बेहतर होने लगे थे और तुम्हारी तरह मैं भी देखती थी के ये सब khud-ba-khud ठीक कैसे हो रहा है. भैया को तोह मैं जानती थी की वह जितनी म्हणत एक ऐसी जमीन पर करते है जिस से सिर्फ घर का राशन हे आ पाए तोह कैसे ये ठीक होने लगा. लेकिन कभी कभी ाचे हालत होने लगे तोह उन्हें जी लेना चाहिए क्या पता फिर ये किस्मत कब पलट जाये.", जाने किन गहराइयो में डूबी थी की वह ये बात करने लगी थी.

"मेनका जी, मेरे दादाजी एक बात कहते है और एक दादाजी के सामान है वह उस बात को और ाचे से समझते है. जब आपकी मुसीबत खुदसे हे ख़तम होने लगे बिना आपके योगदान के तोह इसमें सिर्फ एक बहरी ताक़त का हाथ होता है. लेकिन ऐसी हर ख़ुशी की कीमत जरूर निर्धारित होती है जो हमें तबतक नहीं दिखती जबतक हम वह कीमत भूलवश हे चूका नहीं देते. और वह कुछ भी हो सकती है.", अर्जुन ने इतना गंभीर जवाब दिए था के मेनका को एक पल को यही लगा जैसे वह किसी धर्मगुरु के साथ बैठी हो. बात भी सही थी उसकी क्योंकि हर बार कुछ ाचा होते हे कुछ कीमत दी गई थी.

"हम्म्म्म. सही कहते हो तुम. और वैसे सुबह तोह कह रहे थे के तुम इतने छोटे हो लेकिन अभी कैसे sant-guru हो गए.", मेनका का स्वाभाव भी हंसमुख हे था जो वह इस पल को ाचे से संभल गई

"हाहाहा. वह ऐसा है न मेरी उम्र का तोह घर में कोई हैं नहीं. ज्यादा समय मेरा ऐसे लोगो के साथ हे व्यतीत होता है जो मुझसे कही बड़े और अनुभवी है. ाचा आपने बताया नहीं के आपकी नौकरी कहा लगी है.", अर्जुन ने गढ़ी देखते हुए पुछा. 2:28 दोपहर.

"मैंने तोह ये भी नहीं बताया के मेरा घर तुम्हारे घर से कुछ ज्यादा दूर नहीं होने वाला. तुमने कहा था न के तुम्हारा घर नए सेक्टर में है लेकिन मेरा तुमसे भी अगले वाले में हैं जो शायद ज्यादा हे नया सेक्टर है. हाहाहा.", वो ऐसे खुल के मुस्कुराई तोह पहली बार अर्जुन ने देखा था की मेनका के बाए गाल पर गद्दा पड़ता था. कितना आकर्षक लगता था ये. ऐसे हे तोह प्रीती के भी पड़ते थे लेकिन उसके वह दोनों गाल पर थे.

"हाँ तोह ये फिर ऐसी बात हो गई की एक न एक दिन तोह आपके हाथ का नाश्ता पक्का हे है. लेकिन नौकरी अभी भी नहीं बताई आपने."

"इतनी खास भी नहीं लेकिन हाँ एक ाचे स्कूल में टीचर की नौकरी मिली है. B.Ed इंग्लिश में थी तोह वही सब्जेक्ट और हर रोज 5 से 7 पीरियड पढ़ने को मिले है. मैं चाहती थी की कंप्यूटर टीचर की मिल जाट तोह ाचा रहता. शादी के बाद हे मैंने नियत से 3 साल का डिप्लोमा किआ लेकिन उसको तवज्जो नहीं मिली.", अर्जुन के दिमाग का बल्ब जग गया कंप्यूटर लफ्ज़ सुनकर.

"मतलब आपको कंप्यूटर के बारे बहोत कुछ पता है? और आप टूशन देने के बारे में सोच सकती है?", अर्जुन के स्कूल में कंप्यूटर अनिवार्य था लेकिन अभी इस एक साल में उसने वह ज्यादा से ज्यादा टाइपिंग, कंप्यूटर के अंग, हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर जैसे कुछ सीखा था और सिर्फ गेम हे खेली थी.

"देखेंगे की अगर ये मुमकिन होता है के नहीं. क्योंकि फुल टाइम टीचर मतलब घर पर भी सब तैयारी करनी हे पड़ेगी. स्कूल भी बहोत बड़ा है तोह फिर कम्पटीशन भी रहेगा इसलिए पहले महीने तोह सिर्फ मुझे एहि देखना पड़ेगा की मैं ये संभल पाऊँगी या नहीं.", अर्जुन की उत्तेजना थोड़ी काम हो गई थी. उसको पता था के मेनका की बात एकदम ठीक है.

"कोई बात नहीं. मुझे भी पहले महीने तोह अपने सब्जेक्ट समझने में हे लग जायेगा. गर्मी की छुट्टियों में पता चलेगा की कितना टाइम बचता है. अभी तोह 5 बजे से पहले दिन शुरू होता है और जाने कब ख़तम होता है. स्टेडियम, घर के काम, लाइब्रेरी और किसी को खली दिख जाता हु तोह उनके काम भी.", अर्जुन की ऐसी बातें सुनकर मेनका को भी उसके भोलेपन से ख़ुशी हो रही थी.

"ाची बात है न की खली नहीं रहते. वैसे आगे चलकर ban-na क्या चाहते हो?", अर्जुन के पास इस सवाल का जैसे कोई जवाब नहीं था.

"ये कुछ ban-na इतना जरुरी है क्या?", कितना छोटा सा जवाब और उसमे सवाल था जिसका अब मेनका के पास ठीक हल नहीं था.

"समाज में तोह यही कहते हैं न की देखो वो डॉक्टर है, इंजीनियर है या वकील. इसलिए मुझे भी लगा के शायद तुम्हारा भी कुछ लक्ष्य हो."

"हाँ ऐसा तोह हैं. उस हिसाब से तोह मैं फ़िलहाल माली हे हु, वह भी बिना दिहाड़ी का.", खिलखिला कर दोनों हंस पड़े. शहर की हद्द भी शुरू हो गई थी इस पहले गांव के साथ हे.

"दिलचस्प इंसान हो. अगली बार पूरी उम्मीद है के तुमसे मुलाक़ात होगी, और जल्द हे.", अर्जुन ने जहाँ से सुबह उन्हें लिए था वही पर मोटरसाइकिल रोक दिए.

"वैसे बस अड्डा ये लेफ्ट साइड है. इधर से तोह आपकी तरफ कोई बस नहीं जाने वाली.", अर्जुन की बात पर वह अपनी चुन्नी को सही करती उसका चेहरा फिर से देखे लगी.

"नहीं. किसी से इधर हे मिलना है फिर मैं बस लुंगी.", उनकी बात पर अर्जुन ने मुस्कुरा कर सर हिलाया और यूनिवर्सिटी से स्टेडियम की और जाने वाली सड़क पर बढ़ चला. मेनका अभी तक अर्जुन को देख रही थी दिवार के पास कड़ी.

"कोशिश भी करू के नहीं मिलना तोह भी मिलना पड़ेगा." इतना बोलकर वह सीधा बस अड्डे की और चल दी. चेहरे पर अब पहले वाली ख़ुशी न थी.

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"आओ भाई सही समय पर आये हो. मैं भी चाहता था के तुम ये मुकाबला देखो.", जोगिन्दर जी ने यहाँ खचाखच भरे बॉक्सिंग हॉल में अर्जुन का हाथ पकड़ कर रिंग के पास ले जाते कहा. बलबीर भी पहले से हे खड़ा था. जोगिन्दर जी अर्जुन को उसके पास छोड़कर कुछ गणमान्य लोगो से मिलने चले गए.

"भाई, अपने स्टेट के लड़के की फाइट है. रेलवे का खिलाडी है सामने वाला.", बलबीर ने हाथ मिलाने के बाद कहा तोह रिंग के अंदर सफ़ेद कमीज और काली पंत पहने के रेफरी सीटी मुँह में लिए खड़ा था और आमने सामने 2 खिलाडी थे एक लाल में और एक नीली में. लाल किट वाला हरयाणा का था और जोगिन्दर जी का चेला था.

"मतलब ये पहला मुकाबला है क्या?", अर्जुन ने भी उत्सुकता से पुछा.

"नहीं वह क्वार्टरफईनल तक तोह छोटे हाल में हो चुके है सारे मैच. इधर तोह ये दूसरा सेमीफइनल है.", प्रतिस्पर्धा वर्ग लिखा था हैवी वेट और दोनों हे लड़को के शरीर पर इतने कटाव थे के जैसे वह मुक्केबाज न हो कर बॉडी बिल्डिंग वाले हो.

"तन्न" की आवाज हुई और इधर मुकाबला खोल दिए था रेफरी ने और सभी की निगाह इन दोनों तगड़े मुक्केबाजों पर जम्म गई थी. दोनों हे बड़ी फुर्ती से बचाव और प्रहार करने में लगे थे लेकिन 3 मिनट के इस दौर में ज्यादा कुछ नहीं हुआ लेकिन लाल वाले को 2 अंक हांसिल हुए थे टेक्निकल. लेकिन दूसरा दौर तोह कहीं तेज और खूब प्रहारों से भरा था जिसमे लाल वाले ने अपने इस रेलवे के प्रतिद्वंदी को चारो खाने चित्त हे कर दिए था.

"सेमीफइनल 2 के विजेता संजय इस मुकाबले को नॉक आउट से जीत कर फाइनल में प्रवेश कर गए है जो अब से 10 मिनट बाद शुरू होगा, यहीं पर. संजय का मुकाबला नागालैंड के मुक्केबाज और पहले सेमीफइनल के विजेता रथिनको ब्यौरा से होगा.", इस घोषणा के बाद जोगिन्दर सिंह जी ने रिंग के अंदर जा कर अपने शागिर्द को गले लगा लिए था. संजय पर उन्होंने 6 साल म्हणत की थी और वह उज़्बेकिस्तान में होने वाली स्पर्धा के लिए क्वालीफाई कर गया था इस जीत के साथ. बस अब प्रतिष्ठा का मैच था जो फाइनल होना था.

"मुबारक हो संधू जी. आपका लड़का ाचा खेला अपने इस रेलवे के प्रतिद्वंदी से. लेकिन अभी फाइनल बाकी है और मेरे स्टूडेंट्स तोह वैसे भी देश से बहार तक प्रसिद्ध है अपने अटैक और स्पीड के लिए. बचा के रखना इसको कही उज़्बेकिस्तान जाने से पहले मेडिकल हे क्लियर न हो पाए.", ये पक्के रंग का ऐबफि का नामी कास्ट और किसी समय जोगिन्दर जी का dost-pratidwandi रह चूका था और अपने rajneetik-paise के दम पर आज दिल्ली और बंगलोरे में अंतरास्ट्रीय मुक्केबाजी की कोचिंग दिलवाता था. कहा जाता था के इसके खिलाडी रिंग से ज्यादा जूरी के पक्षपात से जीत जाते थे.

"भाई ाची बात है न फिर तोह. ये लड़का फिर और कड़ी म्हणत करेगा और अगले साल वह daanv-pech भी सिख जायेगा जो नहीं सीखने चाहिए. वैसे कटियार जी, फैंसले तोह आप पहले हे तैयार करवा चुके है.", संजय के कंधे पर हाथ रख कर वह बहार आ गए और खुद हे तोलिये से उसका चेहरा और शरीर साफ़ करते उसको ग्लूकोस पिलाने लगे.

"अर्जुन ये है संजय सांगवान और संजय यही है वह लड़का जिसके लिए मैंने बात की थी तुमसे. कहो क्या कहते हो इसके बारे में? तुम्हारे साथ प्रशिक्षण ले सकता है या नहीं?", संजय ने अपने से भी 3 इंच ऊँचे और चौड़े अर्जुन को प्रशंशा से देखा और हाथ मिलाने के बाद कोच साहब से बात जारी की.

"गुरूजी, आपने चुना है तोह जरूर कुछ देखा हे होगा. मैं तोह मरियल सा था और आज कहा हैवी वेट तक ले आये. आप न मिलते तोह स्पोर्ट कोटे में ये ऐसी की नौकरी भी न मिलती और खुराक तक नसीब न होती. लेकिन ाचा लड़का ढूँढा है. 2 महीने तोह मैं रहूँगा हे आपके पास तोह फिर इस बार का हमजोली यही भाई सही.", संजय की बात पर अर्जुन मुस्कुराया तोह कोच ने भी अपने इस शागिर्द को गले लगते हुए अगले मुकाबले की लिए कामनाये दी.

"नेशनल हैवी वेट की इस प्रतिस्पर्धा में फाइनल मुकाबला है हरयाणा के संजय सांगवान और नागालैंड के टठिनाको ब्यौरा के बीच. दोनों हे मुक्केबाज उज़्बेकिस्तान में होने वाली स्पर्धा के लिए पहले हे क्वालीफाई कर चुके है, लेकिन ये मुकाबला है एक दूसरे से बेहतर साबित करने का." रेफरी के साथ हे ये घोषणा फेडरेशन के मुख्या अधिकारी ने रिंग में की और दोनों मुक्केबाजों का आपस में हाथ मिलवाया. घंटी की आवाज से ये मुकाबला शुरू हुआ तोह संजय शुरू से हे अपने इस tej-taraar प्रतिद्वंदी पर भारी पड़ गया और रिंग के कोने में हे tabad-todd प्रहार करने शुरू कर दिए. पूरा हाल शोर मचा रहा था लेकिन कटियार बार बार कोशिश कर रहा था के रेफरी उसके शागिर्द को संजय के हमले से बचाये लेकिन संजय तोह जैसे किसी और हे धुन में था और पहले एक मिनट में हे वह पूर्वांचल का मुक्केबाज रिंग के कोने में जमीन सूंघ रहा था. रेफरी ने संजय को अलग किआ तब भी वह एक जगह पर पंजो के भार उछलता बस नीचे गिरे ब्यौरा को हे देख रहा था. वो हिम्मत कर फिर से उठा और रश का सहारा ले कर सँभालने हे लगा था की 1-1-1-1 की शैली में संजय ने प्रहार किये और वह फिर से जमीन पर बिच गया और 10 की गिनती के बाद उसको स्टाफ ने वह से सहारा दे कर उठाया.

"इसके साथ हे मैच को टेक्निकल knock-out से संजय सांगवान ने जीत लिए है. और जीत के क्रमांक से वो उज़्बेकिस्तान जाने वाले दाल में नंबर एक मुक्केबाज़ के साथ भाग लेंगे.", बहोत देर तक सभी अधिकारी और कोच जोगिन्दर सिंह जी और संजय को बधाई देते रहे. करियर वह से कब निकल गया था पता हे नहीं लगा लेकिन जाते हुए वह अर्जुन को जरूर देख कर गया था.

"बहोत बहोत मुबारक हो बड़े भाई आपको. सच में हे आपने उन मुक्केबाज को समय तक नहीं दिए. पूछ सकता हु पहले मुकाबले की तुलना में इस बार आपका खेल बिलकुल अलग क्यों था.?", अर्जुन ने कोच के साथ आते संजय को मुबारकबाद देते हुए सवाल भी कर दिए था. वो तोह इतने तगड़े शरीर के इंसान की इतनी गति देख कर अभी तक हैरान था.

"हाहाहा. भाई ये मैच जो होते है न इनकी रूपरेखा मैच से बहोत पहले हे बनानी पड़ती है. मैच में जरुरी नहीं के सब नतीजे वैसे हे आये, खिलाडी बदल सकते है लेकिन उनके बारे में अगर पता न हो तोह आप आधा मैच वही हार जाते हो. सेमीफइनल में जो खिलाडी था उसका खेल मैंने आज हे देखा था लेकिन गुरूजी ने पहले हे समझा दिए था कल रात को की अगर उसके साथ मैच हुआ था क्या rann-neeti रेहनी चाहिए. मैंने पहले राउंड में सिर्फ डिफेन्स किआ और उसके खेल और पांव की गति को भी समझा था. लेकिन ये जो खिलाडी अभी था इस से मैं पहले एक अनधिकृत मैच में हार चूका हु और बहोत ध्यान से इसका खेल देखा था. जिसका डिफेन्स मजबूत हो उसके साथ आपको संभल कर रहना चाहिए क्योंकि एक गलती और आप सामने वाले को अंक दे देंगे. लेकिन इसका खेल था अटैक का और मैंने वही तोह करने नहीं दिए, 2 शेर की लड़ाई में जबड़ो की जगह फैंसला पहले पंजा मारने वाले शेर के पक्ष में जाता है. गुरूजी मुक्केबाजी नहीं सिखाते, वह ज़िन्दगी की शतरंज सिखाते है.", एक बार अपने कोच को गले लगते हुए संजय ने कहा और फिर से वह उनके गले लग गया था. गले में सोने का तमगा और कुंदन जैसा पकाया शरीर.

"याद रखूँगा ये आपका दिए हुआ पहला सबक और आपके अंतराष्ट्रीय दौरे के लिए बहोत शुभकामनाये. जीत कर वापिस आने पर आपका इन्तजार रहेगा.", एक बार फिर से हाथ मिलाने के बाद अर्जुन ने कोच के पाँव छू कर आशीर्वाद लिए और फिर वह से थोड़े उत्साह में स्टैंड की तरफ आ गया जहाँ पर बलबीर उसकी मोटरसाइकिल के पीछे बैठा जाने क्या कर रहा था.

"भाई देख मैं कभी मजाक नहीं करूँगा लेकिन हवा मत निकलियो इसको खींचना मेरे बस की बात नै.", भागता वह अपनी मोटरसाइकिल के पास पहुंचा तोह बलबीर उसकी खली नंबर प्लेट पर कपडा मार रहा था और उसकी आवाज सुनकर वहां हाथ रख कर पीछे मदद मुस्कुराने लगा.

"हवा क्यों निकलूंगा भाई? ये देख मैं क्या लेके आया था तेरे लिए.", काली नंबर प्लेट पर सफ़ेद रेडियम का छोटा सा स्टीकर चमक रहा था जहा हिंदी में लिखा था 'रानी'. अर्जुन ये देख कर मुस्कुरा दिए

"वाह भाई ये कब बनवाया था?", अर्जुन भी वही बैठ कर उस स्टीकर को देखने लगा.

"आज सुबह हे गया था मोटर मार्किट तोह वह से नम्पेर प्लेट वाले से बनवा लिए मैंने ये. ाचा नहीं है क्या?", बलबीर ने खड़े होते हुए पुछा और हाथ अर्जुन के कंधे पर रख दिए.

"नहीं बड़े भाई. ऐसा लग रहा है जैसे आज ये पूरी हो गई है. शुक्रिया बलबीर भाई इसके लिए.", एक बार और छु कर देखने के बाद उसने बलबीर से कहा तोह वह हँसता हुआ वापिस हाल की और चल दिए.

"भाई, भाई को धन्यवाद् नई करते. और तेरी रानी के लिए तोह इतना सा कर हे सकता हु.", आँख मारता वह निकल गया और अर्जुन भी हँसता सा अपनी रानी को चलता घर की तरफ चल दिए.

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"कहा था सारा दिन तू आज? दोपहर का खाना भी नहीं खाया और 5 बजे आ रहा है.", घर के अंदर आते हे सामना अपनी माँ रेखा जी से हुआ जो कपडे उतार रही थी तार पर से.

"माँ मैंने खाना खा लिए था. और वह स्टेडियम में आज मुकाबले थे तोह वह थोड़ी देरी हो गई. कोच सर के बुलाने पर मई वह देखने गया था.", अर्जुन कुर्सी पर बैठ कर जूते खोलते हुए बोलै तोह रेखा जी भी उसके पास आ बैठी.

"इतनी देर तू स्टेडियम में था?"

"नहीं माँ, सुबह तोह मैं अपने दोस्त के पास गया था वह यूनिवर्सिटी से आगे. वहीँ पर मैंने खाना भी खा लिए था और फिर स्टेडियम चला गया था.", अर्जुन जूते एक तरफ रख कर हाथ धोने लगा तोह रेखा जी ने उसको वही बैठने को बोलै. खुद वह रसोईघर के अंदर चली गई थी.

"माँ, बाकि सब कहाँ है?"

"तारा के पास प्रीती और अलका बैठी है ऊपर. प्रियंका और कोमल बहार बैठक में कोई पिक्चर देख रही थी अभी तक तोह और आरती माधुरी के कमरे में सो रही है. तू 10 मिनट बैठ बस मई दूध तैयार कर रही हु.", अपनी माँ की बात सुनकर अर्जुन चुपचाप उस तरफ चल दिए जहाँ आरती दीदी सो रही थी. कमरे का दरवाजा ढलका हुआ था जिसको आराम से खोलता वह अंदर आया तोह आरती एक किताब को कमर पर रखे सो रही थी. अर्जुन बड़े ध्यान से चेहरा देखने लगा और शरारत से अपने होंठ गीले करने के बाद आरती के मुलायम गुलाबी होंठो को चूम लिए. वह हल्का सा कसमसाई फिर जैसे नींद में हे मुस्कुराई. अर्जुन ने फिर से वही किआ तोह नींद में हे आरती ने अपने होंठ खोल दिए थोड़े से जिस पर अर्जुन ने एक बार फिर होंठो को चूमा तोह आरती ने अपनी जीभ उसके मुँह में दाल दी.

'उम्म्म' की आवाज करती जैसे वह नींद में हे सपना देख रही थी और वह भी अर्जुन शायद कुछ ऐसा हे कर रहा था. आरती ने अर्जुन का हाथ जब अपने सीने पर रखा तोह उसको महसूस हुआ की ये सपना नहीं है. दोनों की आँखें मिली और आरती ने झटके से अपनी बंद कर ली.

"उठ भी जाओ अब आप या ऐसे हे सोने का इरादा है.?", अर्जुन ने वैसे हे थोड़ा ऊपर झुके हुए हे कहा

"तुम कब आये? और ऐसे क्या देख रहे थे?"

"देख रहा था के नींद में भी कैसे आप किश कर रही थी.", अर्जुन की बात पर आरती अपनी नजर दूसरी तरफ करती पलट गई थी. अब दोनों उभर भी एक तरफ हे पलट गए जहा अर्जुन का हाथ पहले उनपर टिका था अब एक पूरा उभर उसकी हथेली में आ चूका था. हलके से उस मुलायम सतांन को दबाते हुए वह गाल चूमकर बहार निकल गया.

'ये मीठा दर्द बहोत हो गया. मुझे अर्जुन को बताना हे होगा की सपने भी अब सिर्फ उसके हे आते हैं.' आरती मुस्कुराती हुई खुद हे अपने उस उभर को सहलाने के बाद उठ कड़ी हुई.

"बीटा, जल्दी से दूध ख़तम कर फिर मुझे काम करना है." रेखा जी ने अपने बेटे को दूध और लड्डू दिए और वापिस जाने लगी.

"नहीं माँ. आप तैयार हो जाइये और फिर हम दोनों हे मार्किट चल रहे हैं.", अर्जुन ने उनकी बात नजरअंदाज करते हुए कहा. इधर कोमल दीदी और प्रियंका दीदी भी बहार आ रही थी.

"हाँ चची, आपको हमारा सामान भी लेके आना है. और आज तोह वैसे भी आपने रसोई का कोई काम नहीं करना था. मैंने बोलै था न के आज आपका जन्मदिन है और रात का खाना हम बनाएंगी.", अलका ने अपनी चची के हाथ से बर्तन लेते कहा तोह फिर रेखा जी भी उसके सर पे हाथ रखने के बाद अपने कमरे में चल दी और अर्जुन वैसे हे अपनी दीदी से बात करता हुआ दूध ख़तम करने लगा. कुछ हे देर बाद रेखा जी बहार आई तोह अर्जुन बस अपनी माँ को हे देखने लगा. इतने समय में पहली बार आज उन्होंने सलवार कमीज पहना था, अर्जुन के सामने तोह शायद उसके बचपन के बाद आज हे वह ऐसे रूप में दिखी थी.

"वाह माँ. आप तोह बिलकुल हे अलग दिख रही है.", अपने बेटे को इस तरह हैरान देख वह शर्माती सी मुस्कुरा गई थी. बिंदी वाला सफ़ेद कमीज और उस पर वैसा हे प्रिंट दुपट्टा, पाँव में हलकी खुली सलवार पहने वह सच में किसी जवान भाभी से लग रही थी.

"ाचा इतना भी कुछ खास नहीं. वह तेरे साथ स्कूटर पर जाना था तोह साड़ी में दिक्कत होती इसलिए ये सूट पहन लिए.", अपने दुपट्टे को सामने से घूमते हुए सर पर लिए और फिर टेबल से ब्लाउज वाला बैग उठा लिए. अलका दीदी भी अपनी चची को निहार रही थी. उन्होंने तोह पहले भी देखा था चची को सूट में, ज्यादातर जब वह सूट तभी पहनती थी जब घर में पुरुष सदस्य नहीं होते थे. उनके ऊपर और नीचे के उभर इस हलके खुले कपडे में भी ाचे से प्रकट हो रहे थे. कोमल दीदी भी अपनी माँ की ख़ूबसूरती की कायल थी और वह भी उन्हें ाचे से निहार रही थी.

"ाचा चची आराम से आना. और अर्जुन, भाई इनका जन्मदिन है तोह फिर काम से काम वह से भागने की जल्दी मत करना.", अलका दीदी की बात पर सभी के चेहरे पर मुस्कान आ गई.

"माँ, आप निश्चिन्त रहिये हम सब काम कर लेंगी. और अर्जुन ध्यान से.", कोमल दीदी की बात सुनकर अर्जुन ने सर हिला दिए और रेखा जी भी अपने बचो को एक बार देखने के बाद बहार आ गई. जाने कब वह ऐसे बहार निकली होंगी. शायद जब कोमल एक साल की रही होगी तभी उनके पति शंकर जी उन्हें स्कूटर पर मॉडल टाउन लेकर गए होंगे. उसके बाद वह पास की मार्किट तक अगर कभी काम से गई हो तोह वो कुछ ऐसा नहीं था जो याद रखने लायक हो. फिर अर्जुन को मोटोरोसीक्ले में चाबी लगते देखा.

"हम स्कूटर पर जाने वाले थे?", उनकी बात पर अर्जुन मुस्कुरा दिए.

"आप हे इतनी देर से बोल रही हो माँ. मैंने तोह एक बार भी नहीं कहा स्कूटर से जाना है. मैं तोह इसके ऊपर आपको घूमना चाहता था. और सच में आपको इस पर बैठना ाचा लगेगा.", एक बार फिर से सीट पर कपडा लगाने के बाद अर्जुन ने अपनी रानी को स्टार्ट किआ और माँ को पीछे बैठने को कहा. रेखा जी थोड़ा संभालती हुई उस स्टील के पाइप वाले पायदान पर पांव रख कर बैठ गई तोह बड़ी नजाकत से अर्जुन ने मोटरसाइकिल को आगे बढ़ाया.

"डरिये मत, स्कूटर जैसा हे तोह है.", अर्जुन की बात सुनकर वह हलके से मुस्कुराई और एक हाथ में वह पॉलीबाग को अपनी गॉड में टिकती दूसरे हाथ से कमर को पकड़ कर अब बेहतर महसूस करने लगी थी. मुख्या सड़क पर आने के बाद फिर से अर्जुन ने हे बात करना शुरू किआ.

"तोह अब बताये के हमने मार्किट में क्या क्या करना है.? आज की पूरी शाम आपके हे लिए है.", रेखा जी का शरीर भी गठीला और लम्बा था. अर्जुन भी तगड़ा चौड़ा था तोह रानी अब बड़ा सधी हुई चल रही थी. रेखा जी तोह बस सड़क के दोनों तरफ कभी दुकाने तोह आगे हरियाली देख रही थी. बेटे की बात से फिर ध्यान उस पर आया.

"इतना कुछ नहीं है रे. वह बस पहले कपडा सिलाई के लिए देना है फिर Tara-Alka का सामान लेना है.", अपनी माँ की बात सुनकर वह चुप हे रहा और रेखा जी को भी लगा की शायद बीटा नाराज हो गया है.

"ाचा ठीक है जैसे तू कहेगा मैं वैसा करुँगी. बस मुझे ज्यादा भीड़ से घुटन होने लगती है."

"आप पहले चलिए तोह सही फिर देखते है घुटन और भीड़ को." अर्जुन चहकते हुए बोलै और थोड़ी गति बढ़ा दी. इस बार रेखा जी थोड़ा अपने बेटे से सत् गई थी. उनका एक पूरा उभार साइड से अर्जुन के पीठ पर डाब रहा था लेकिन दोनों को हे इसकी परवाह न थी. हलकी फुलकी बातें करते जब वह मुख्या मार्किट में आ गए तोह रेखा जी ने फिर सवाल किआ.

"ये हम बड़ी मार्किट क्यों आ गए है? मॉडल टाउन या फिर नै मार्किट में जा सकते थे न वह पास भी थी.", अर्जुन ने मोटरसाइकिल सीधा अंदर की तरफ हे ले ली थी. वह पार्किंग में नहीं लगाना चाहता था जिस से माँ को पैदल चलना पड़े.

"वहां सिर्फ सिलाई होती या फिर जो सामान आपने लेना था वह मिलता. लेकिन यहाँ मैंने कुछ देखा था और उसके लिए आपका साथ आना भी जरुरी था. वैसे भी पता नहीं आप कब आई होंगी यहाँ पर तोह सोचा आपको भी बदलाव दिखा देता हु.", अर्जुन इस मार्किट से अब भली भांति परिचित हो चूका था. कुशलता से रानी को दौड़ता वह सीधा अपने दोस्त सुधीर की दुकान पर आ पहुंचा जहाँ शाम के समय दोनों बाप बीटा उपलब्ध थे, रविवार जो था.

"कैसे हो अर्जुन भाई." अर्जुन से हाथ मिलते हुए सुधीर ने रेखा जी को भी नमस्कार किआ.

"मई बिलकुल ाचा हु सुधीर भाई. ये माँ है मेरी तोह इनके लिए कुछ लेना था.", अपनी माँ का परिचय देने के बाद अर्जुन ने उसके पिता को भी प्रणाम किआ तोह लाला जी मुस्कुरा दिए.

"नमस्ते आंटी जी. आप बैठिये मैं जूस ठंडा कुछ मंगवाता हु.", अब सुधीर और तन्मयता से बोलै, रिश्ता पता लगने के बाद. वहीँ उसके पिता तोह काउंटर पर लगे थे पैसे लेने बिल बनाने में.

"नहीं बीटा उसकी कोई जरुरत नहीं है. सीधा घर से आ रहे है.", रेखा जी सुधीर को मन करने के बाद इस बड़ी कपड़ो की दूकान को निहारने लग गई थी. क्या नहीं था यहाँ पर? शादी के कपड़ो से लेकर हर तरह के उत्सव, पार्टी और ाचे रोजाना के वर्सा. वह भी एक से बढ़कर एक.

"माँ, आपको यहाँ से 2 चीज लेनी है. एक आपकी पसंद की और फिर एक जो मई लूंगा." अर्जुन ने बड़े स्नेह से ये बात कही थी. लेकिन माँ को तोह परवाह थी की बचा छोटा है और उसके पैसे वह ख़राब नहीं करने देना चाहती थी.

"नहीं बीटा देख यहाँ से कुछ लेना होगा तोह वह मैं फिर कभी तेरे पापा को या माजी को बोल के मंगवा लुंगी. तू पैसे खराब मत कर.", अर्जुन उनकी बात पर थोड़ा गंभीर हो गया.

"पता है मुझे हर महीने कितने पैसे मिलते है? और पिछले 5 साल की जेबखर्ची दादाजी ने पिछले साल दी थी जो वैसे हे बक्से में बंद है. इस साल के भी इतने पैसे पड़े है की ख़तम नहीं होने वाले. ऊपर से दादी ने 20,000 दिए थे आखिरी जन्मदिन पर ये कह कर की जब मुझे नया स्कूटर लेना होगा तोह काम आएंगे. अब तोह मोटरॉयचले भी ले लिए. मुझे कुछ नहीं पता है. अगर आपने अपनी पसंद से नहीं लेना तोह फिर ठीक है मैं बात नहीं करूँगा.", अपनी बात कहने के बाद वह नीचे देखने लगा तोह बेटे का इतना प्यार देख रेखा जी भी मान गई थी.

"ठीक है लेकिन फिर उसके बाद कुछ नहीं.", उन्होंने सभी तरफ चलते हुए कपड़ो को देखना शुरू किआ तोह कही कही आदत अनुसार वह कपडे पर लगी पर्ची भी देख लेती जहाँ मूल्य लिखा रहता था. एक कॉटन का बड़ा हे खूबसूरत सा सूट देख उनकी आँखे उस पर हे जम्म गई थी. पीला, नीला और लाल राजस्थानी प्रिंट था इस चटख सफ़ेद सूट पर. सामने की तरफ लकड़ी के पोलिश किये बटन जिनके बीच में छोटा चमकता नाग था. पिछली तरफ आधी पीठ पर रेशमी डॉयरियाँ थी जैसे जूते के फीते में पिरोई जाती है. डोरियों के आखिर में एक एक मोती के बीच से निकलते रेशमी लाल धागे. अर्जुन 5 कदम दुरी पर हे चल रहा था लेकिन उसने अपनी माँ की नजर का पीछा कर लिए था. रेखा जी ने उसकी पर्ची को आहिस्ता आहिस्ता से अपनी तरफ करते देखा और फिर बिना किसी प्रतिकिरिया के वह अब उस तरफ बढ़ चली जहा महिलाओं के गाउन, मैक्सी लगे थे. वह भी हर तरह के कपडे और बड़े शालीन डिज़ाइन में थे. काले रंग की उस निघ्त्य को देख कर वह उसके सामने कड़ी हो गई. एक बार अर्जुन की तरफ देखा तोह वह अब उधर नहीं था. सोफे पर बैठा पानी पी रहा था.

"मैडम, ये सिल्क और कॉटन की निघ्त्य है और पहली बार हे हमने इसको मंगवाया है, कुछ कस्टमर्स की डिमांड पर.", ये मीणा थी जो रेखा जी को उस निघ्त्य को देखते पा कर उनके पास आ कड़ी हुई थी.

"हाँ ाची दिख रही है बस सामने की तरफ ये बटन ज्यादा और पेट की तरफ तननिअ लगी है. कपडा भी आरामदायक है.", रेखा जी ने आराम से वही बताया जो उन्हें दिख रहा था.

"नहीं मम. इतना हे नहीं है. ये 3 पीेछे है. बहार से सिल्क है अंदर की तरफ कॉटन का कपडा सपोर्ट के लिए और फिर ये 2 पीेछे और हैं.", उसने निघ्त्य के 2 बटन खोल कर अंदर bra-panty नुमा कपडे को दिखाया जहाँ पेट और जांघो तक जालीनुमा कपडा लगा था. सतांन और योनि की जगह तोह पूरा कपडा था लेकिन नीचे पेट तक जाली फिर पंतय से घुटने तक भी जालीदार. उसको देख कर तोह एक बार रेखा जी थोड़ा हैरान हो गई. उन्हें तोह सिर्फ बहार वाला कपडा हे रात के लिए अनुकूल लगा था जिस वजह से उन्होंने ने इसमें दिलचस्पी ली थी. लेकिन अंदर वाला हिस्सा देख कर वह गेहटी सोच में डूब गई थी. कुछ ऐसा उन्होंने 6-7 साल पहले एक किताब में देखा था जिसको उनके पति लेकर आये थे जब मुखमईतून सीखने की कोशिश की थी उन्होंने रेखा को.

"मैडम, वह 2 पीेछे बिस्टेर पर आराम के समय बिलकुल सही है और अगर घर में कुछ काम भी करना हो तोह फिर ये फुल साइज बहार की निघ्त्य सारा शरीर कवर करती है. आपको ये जरूर ाचा लगेगा अगर आप तरय करेंगी तोह. इसमें लाल और सफ़ेद रंग भी उपलब्ध है.", मीणा की बात पर एक बार फिर उन्होंने बहार के कपडे को हाथ फिर कर देखा. वो सच में ठंडा और रेशमी फिसलन भरा कपडा था. जाने कोनसी दबी इत्छा थी की उन्हें ये पसंद आ गई थी.

"कितने की है ये? और क्या इसको आप ाचे से पैक कर सकती हैं बिना काउंटर पर दिखाए.?", उनकी शर्म मीणा ने महसूस कर ली थी और मुस्कान के साथ उसने हाँ कहा.

"वैसे तोह 1500 की है ये लेकिन दाम सुधीर जी हे तय करेंगे क्योंकि आपके बेटे उनके दोस्त है.", रेखा जी ने बस हलके से सर हिला दिए और मीणा ने वैसा हे एक पीेछे अंदर की दर्ज से निकल कर बिना प्रिंट के एक डब्बे में पैक करने के बाद बस पेन से कुछ लिख कर मुख्या काउंटर के सतह वाले काउंटर पर रख दिए.

"मैडम और कुछ भी देखना है आप? यहाँ आपके जरुरत के हर कपडे मिल जायेंगे.", मीणा की बात पर उन्होंने ना में सर हिला दिए.

"बस आप इसका बिल करवा दीजिये.", इतना बोलकर वह अर्जुन के पास आई तोह वह सोफे पर बैठा उनकी हे प्रतीक्षा कर रहा था.

"हो गया आपका सब?"

"हाँ चले अब यहाँ से.?", रेखा जी ने भी जवाब दिए.

"पहले आपका माप भी होना है न. तोह आप वह करवा लीजिये.", अर्जुन उठ कर खड़ा हुआ तोह रेखा जी ने भी वह ब्लाउज का पैकेट लिए और उसके साथ हे अंदर चल दी जहा टेलर मर्स्टर्नी जी का कमरा था.

"आंटी जी नमस्ते.", अर्जुन को भी वह पहचान गई थी और उन्होंने भी वैसे मुस्कुराते जवाब दिए और बिना कुछ कहे रेखा जी को अंदर आने को कहा. अर्जुन उन्हें वह छोड़कर सुधीर के पास आ गया.

"भाई जल्दी से बिल कर दे इस से पहले कुछ और झंझट हो. और कब तक मिल जायेगा बाकि सामान.?", अर्जुन की बात पर हँसता सा अपने बाप से कैलकुलेटर लेता वही सोफे पर आ बैठा.

"जब तुम्हे चाहिए हो बता दो. मैं तोह परसो हे कहूंगा क्योंकि सूट में समय लगेगा और ब्लाउज चाहो तोह कल हे ले लो.", कैलकुलेटर पर हिसाब करते हुए उसने कहा.

"परसो चलेगा. कोई बात नहीं वैसे भी बहार तोह 4-5 दिन से पहले मिलने वाला नै था.", अर्जुन को भी सुनकर ाचा लगा था के सुधीर उसके लिए ये इतनी जल्दी करवा रहा है.

"भाई ये निघ्त्य के 900, सूट और सिलाई के 1600. कुल हो गए 2500 रुपये और बाकी तेरी मर्जी जो देना चाहे.", उसकी बात पर अर्जुन ने जल्दी से 2500 निकल कर हाथ में रख दिए.

"देख भाई कही दोस्ती के चक्कर में तू अंकल से मार न खा लिओ. मुझे तोह यु लगता है के तू नुक्सान उठा रहा है.", अर्जुन के कंधे पर हाथ रखते हुए सुधीर ने कहा.

"भाई बनिया हु. मार नहीं खा सकता धंधे में. देख दुकान में रोज 100 लोगो से अगर 300 सी भी मुनाफा कमाता हु तोह 30000 हो गए. और तुझे आये दाम पर एक सामान देने से मेरा कोनसा नुक्सान है. ाची बात है के तुम मेरे पास हे आते हो और दोस्त भी हो.", फिर वह कुछ सोचने लगा तोह अर्जुन ने उसको ऐसे चुप देख कर पूछ हे लिए

"क्या हुआ भाई?"

"अर्जुन भाई, अभी 3-4 दिन पहले तुम हमारे पेट्रोल पंप पर खड़े थे न? ये बड़े चौक वाले जिधर स्टेडियम को भी सड़क जाती है."

"हाँ भाई. वो तुम्हारा पंप है?" अर्जुन ने चौंकते हुए पुछा

"वो छोड़ो भाई. पंप भी हमारा है और मॉडल टाउन वाली दुकान भी जहाँ से तुमने वह saree-blouse लिए. लेकिन बात ये है की उस दिन तुम भी शायद वही देख रहे थे जो मैं देख रहा था. वो काली गाडी वाले भाई साहब तुम्हारे कुछ लगते है क्या? मैंने उनके साथ तुम्हे यहाँ मार्किट में भी एक दिन देखा था दोपहर में लेकिन तुम शायद अपनी उसी दोस्त के साथ थे और वह गाडी से निकल गए थे." अर्जुन का भी दिमाग अब चकराया ये जानकार की सुधीर तोह संजीव भैया की बात कर रहा है.

"हाँ. क्या बात है भाई जरा इशारा करोगे कुछ? और क्या वह काली गाडी पहले भी देखि है.?", अर्जुन ने अपना रिश्ता जाहिर किये बिना हे पुछा. वह भी jan-na चाहता था के माजरा क्या है और सुधीर इतना गंभीर कैसे हो गया.

"भाई, वह क्या है के बात तोह मुझे भी नहीं पता लेकिन वह महीने में 2 बार जरूर हमारे पंप पर आते है. मेरे चाचा के पास पहले कुछ कागज देकर जाते है और फिर दूसरी बार जब भी आते है पैसों का बैग लेकर चले जाते है. मेरे पिताजी भी कुछ नहीं बताते और चाचा भी बस इतना बताते है के वह ये सब अपने बिज़नेस में लगा रहे हैं. लेकिन सच बताऊ वह कोई ब्रीफ़केस नहीं बड़े अटैची भर के पैसे लेकर जाते है. एक आदमी भी साथ रहता है, कला चस्मा और रिवॉल्वर वाला." अर्जुन की तोह घंटी बज गई ये सुन कर. भैया का तोह इन्शुरन्स का काम है और यहाँ ये कुछ और हे बता रहा है.

"भाई इतना सब तोह मुझे नहीं पता लेकिन मई कोशिश करूँगा सब पता करने की.", दोनों हे धीमी आवाज में बातें कर रहे थे और इधर अर्जुन की माँ की आवाज सुनकर चुप हो गए.

"चले बीटा?", रेखा जी के चेहरे पर कुछ अलग भाव थे लेकिन फिर उन्होंने खुद को ठीक करते हुए मुस्कुरा कर अपने बेटे को देखा.

"हाँ चलिए माँ. ाचा सुधीर फिर मिलते है.", और वो पैकेट उठाने के बाद अर्जुन माँ के लिए दरवाजा खोल उनके पीछे हे बहार आ गया.

"ब्लाउज सिलवाना था लेकिन माप पूरे शरीर का लिए उन्होंने. बोल रही थी की सूट भी सिलने को बोलै है.", बहार आती वह अर्जुन को देखते हे बताने लगी तोह वह मोटरसाइकिल पर बैठ कर किक लगाने लगा.

"सूट आपको पसंद आया तोह फिर मैंने अपनी पसंद से उसको आपके लिए ले लिए. लेकिन आपने वडा किआ था तोह गुस्सा नहीं होंगी.", उनके पीछे बैठने के बाद अर्जुन ने ये बात कही तोह रेखा जी हैरान हो गई थी इस बात को सुनकर.

"वह 3000 का था, बिना सिलाई के. तू सच में वह खरीद चूका है.?", उन्हें विश्वास नहीं हुआ था के अर्जुन ने बिना पूछे ये किआ

"आपको वो पसंद था न माँ? इसलिए मैंने वह ले लिए. और रही पैसों की बात तोह सुधीर ने तोह 1500 हे लिए है मुझसे उसके.", मोटरसाइकिल को चलते हुए अर्जुन ने सब बता दिए तोह रेखा को भी अपने बेटे का इतना प्यार देख उसपर नाज होने लगा. वह ाचे से सत् कर उसके साथ बैठ गई थी. बहार गोल मार्किट के पास अर्जुन ने मोटरसाइकिल को रोकते हुए पहले अपनी माँ को उतरने को कहा फिर उन्हें साथ लिए वह उस बड़े रेस्ट्रा में आ गया जहा वह प्रीती के साथ आया था.

"हम यहाँ क्यों आये है?", रेखा जी के सवाल पर अर्जुन एक कुर्सी उनके लिए खींच उन्हें बिताते हुए बोलै.

"आपका जन्मदिन है और बिना मुँह मीठा किये तोह वह पूरा होने वाला नहीं. वैसे भी मुझे याद है आपको kulfi-faluda बहोत पसंद है और यहाँ वह भी मिलता है. आखिरी बार शायद 10 साल पहले आपको खाते देखा था जब सबके लिए दादाजी ने घर पे ice-cream मंगवाई थी और आपके लिए भी फालूदा आया था. तोह अब अगर आपके सवाल ख़तम हो गए हो तोह फिर मैं आर्डर कर दू.?", आज इस छोटी से बात पर अर्जुन रेखा के दिल में और गहरा हो गया था. उसको सब पता था के उसकी माँ को क्या पसंद और क्या न पसंद था. बैरे को एक kulfi-faluda और एक जूस का आर्डर देने के बाद वह अपनी माँ को देखने लगा था. उनके चेहरे और रूप का कोई मुकाबला नहीं था पूरे घर में. शायद हे कोई ऐसी महिला अर्जुन ने देखि हो जो उनकी धुल के बराबर होगी. हमेशा खिला रहने वाला चेहरा, बड़ी गहरी आँखें और सांचे में ढला शरीर. सबसे ज्यादा जो चीज पसंद थी वह उसकी माँ की मधुर आवाज और उनका रहने का सलीका. कोई मर्द अगर सपनो में कामना करे सबसे खूबसूरत औरत का तोह भी उसकी माँ कहीं ऊपर हे थी.

"ऐसे क्या देखता रहता है?", अपनी नजरे नीचे करते उन्होंने ये बात कही तोह उनकी लम्बी पलके भी अर्जुन को पसंद आ गई थी.

"देख रहा हु के मेरी माँ जैसे हमेशा खूबसूरत रहती है कोई और ऐसे क्यों नहीं लगता. सच में माँ, कोमल दीदी भी कहती है के वो आपका दसवा भाग भी नहीं और मैं उनकी बात से इत्तेफ़ाक़ रखता हु.", बेटे के मुँह से पहली बार इतनी खुलकर प्रशंशा सुनकर गोर गाल सुर्ख होने लगे थे. रेखा को कभी ऐसी शर्म और ख़ुशी एक साथ महसूस नहीं हुई थी पहले. उनके पति ने कभी प्यार के 2 बोल नहीं कहे थे बेशक वह एक ाचे पिता और घर की हर बात का ध्यान रखने वाले इंसान थे लेकिन बंद कमरे में वह सिर्फ अपना खुद का हे सुख देखते थे. अर्जुन ऐसा था जो अभी से घर के लिए समर्पित था और अपनी माँ के लिए भी. सिर्फ बातों से हे अपनी माँ को वह इतनी ख़ुशी दे देता था की उन्हें फिर अपनी ज़िन्दगी की सभी शिकायत काम लगती थी.

"बातें मत बना ज्यादा. कोमल दिल रखने के लिए ऐसा बोलती है जब देखती है की मैं खुद के लिए समय नहीं निकल पाती और बूढी होने लगी हु. कोमल और ऋतू इतनी खूबसूरत है की जहाँ भी वह जाती है उनके रिश्ते की बातें शुरू हो जाती है. लेकिन मैं सिर्फ उन दोनों में अपना अतीत देख कर खुश हो जाती हु. " रेखा जी गहरी सोच में अपने समय को याद करती सी बोली.

"हाँ. वैसे तोह सभी बहने सुन्दर है माँ. लेकिन फिर भी उनके साथ साथ ताईजी और दादीजी की बातों में भी आपकी ख़ूबसूरती का जीकर होता रहता है. आप नहीं मान रही वह सिर्फ आपकी जिद्द है लेकिन सच यही है जो मैंने कहा और सभी कहते है.", दोनों हे ऐसे बातें कर रहे थे की बैरा उनका आर्डर लेकर आ गया. अर्जुन ने खुद प्लेट माँ की तरफ करते हुए पहली चम्मच अपने हाथो से उनके होंठो से लगाई.

"हैप्पी बर्थडे तो थे मोस्ट ब्यूटीफुल लेडी इन माय लाइफ. मई यू स्टे समिलिंग एंड शाइनिंग टिल एटर्निटी.", उसको लगा था के इस इंग्लिश की एक लाइन से वह माँ को ज्यादा परेशां किये बिना उन्हें शुभकामना दे सकता है.

"एटर्निटी इस रियली ा वैरी हैवी वर्ड एंड वे हुमंस अरे लिखे सेअसोंस. ा स्माइल और शाइन doesn't स्टे फॉरएवर. टाइम एंड लाइफ अरे सो डायनामिक तहत यू कैन नॉट प्रेडिक्ट व्हाट इस लाइंग थे चेस्ट ऑफ़ नेक्स्ट सपं. एंड थैंक यू सो मच फॉर मेकिंग थिस इवनिंग लिखे ा ड्रीम I've नेवर इवन िमगैनेड.", अर्जुन बस एकटक उनके चेहरे को देख रहा था, जहा एक गहरी मुस्कान के साथ थोड़ा दर्द भी था. अपनी माँ की फर्राटेदार अंग्रेजी सुनकर उसको एहसास हो गया था के वह भूल कर गया इस तरह तेज दिमाग चलने में. रेखा जी तोह खुद M.A. पास थी और उनके पिताजी ने ये ाचा रिश्ता देखते हुए शादी करवा दी थी नहीं तोह उनका तोह सपना हे था प्रोफेसर ban-ne का. अर्जुन को भी पता था के उसकी माँ ने हे घर में सजीव भैया से लेकर अलका तक को 12 क्लास तक पढ़ाया था. बेध्यानी में अपनी बात पर हे वह अंदर से थोड़ा झेंप गया था लेकिन वह उतना हे खुश भी था.

"बात एक हद्द तक आपने बिलकुल ठीक कही है माँ. हम किसी चीज का भविष्य नहीं देख सकते लेकिन पता हैं अगर चाहे तोह हम खुश हमेशा रह सकते हैं. बस इसके लिए एक बड़ा काम करना पड़ता है.", अर्जुन ने इतना कह कर बात बीच में छोड़ फिर से पिघलती कुल्फी चम्मच से उनके मुँह पर लगा दी. एक बूँद उनके होंठो से फिसलती थोड़ी पर आ कर रुक गई थी फिर से उसकी आँखें इस दृश्य पर अटक गई थी. रेखा जी थोड़ी देर उसको ये देखने दिए फिर कागज़ से साफ़ करने के बाद एक मुस्कान से कहा

"कोनसा बड़ा काम करना पड़ता है ये भी बता दो. अगर बस में हुआ तोह आज के दिन वादा है मैं भी कोशिश जरूर करुँगी.", फिर इशारे से जूस की तरफ ध्यान दिलाया और अर्जुन ने ख़ामोशी से एक घूँट लेने के बाद कहा.

"प्यार. बड़ा हे छोटा सा और एक उलझन से भरपूर शब्द है माँ. जैसे हे ये जुबान पर आता है हम उसके बारे में सोचने लगते है जिसको हम प्यार करते है. जैसे आपने मेरे चेहरे को देखा. या फिर आपको कोमल दीदी, पापा या कोई ऐसी चीज ध्यान आएगी जिस से आपको लगाव हो. लेकिन हम बस यही गलती कर देते है. शीशे के सामने खड़े होकर जो शख्स नजर आये बस उस से प्यार करने की कोशिश करना माँ. वह क्या चाहता है, क्या पसंद है और क्या नहीं. ये कर पाना थोड़ा मुश्किल है लेकिन मैं यकीन दिलाता हु अगर आप खुद से प्यार कर पाएंगी तोह कभी दुखी नहीं होंगी. इसमें स्वार्थ जरा भी नहीं हैं क्योंकि वही इंसान प्यार को बाँट सकता है जो खुद से प्यार कर सकता है." एक बड़ा घूँट भरते हुए गिलास खली करने के बाद अर्जुन ने चेहरा साफ़ किआ और अपनी माँ की तरफ देखा जो उसकी बात से इत्तेफ़ाक़ भी रखती थी लेकिन शांत भी थी.

"चले अब माँ?", प्लेट भी खली थी और बिल के साथ 20 रुपये की बख्शीश भी अर्जुन ने बैरे को पकड़ा दी थी. टेबल पर से माँ का सामान उठाते हुए वह उनके साथ बहार हो लिए. यहाँ गेट पर पहले हे दरबान था इसलिए वह बस उनके पीछे हे बहार निकला. थोड़ी देर दोनों खामोश हे थे. फिर सामने एक दूकान को देखते हुए रेखा जी ने अर्जुन को वहीँ रुकने का बोलै और उधर जाने लगी.

"माँ, पर्स.", बड़े हक़ के साथ अर्जुन ने अपना बटुआ निकल कर उनके सामने कर दिए था जिसको वह देख रही थी.

"आज आप एक रूपया भी खर्च नहीं कर सकती खुद से. ये भी आपके हे हैं, जो भी लेना हो इनसे हे.", उसकी बात पर वह मुस्कुरा दी. एक बार तोह मैं में आया था के साथ हे ले चले अर्जुन को फिर वही नारी और मर्यादा की बात सोचकर ऐसे खुलेआम अर्जुन को अपने साथ महिलाओं की दूकान पर ले जाने का इरादा छिटक दिए. पर्स को लेती वह सड़क पार कर उस दुकान में चली गई. अर्जुन वही गोल पार्क में लगे झूले देखता किताब की स्टाल पर आ पहुंचा.

"नमस्कार अंकल जी.", पीले कपडे धारण किये उन संत जैसे व्यक्ति को नमस्ते करने के बाद वह किताब देखने लगा.

"बीटा, तुम वही हो न 'रावण पुराण' वाले? आज कोनसा ग्रन्थ और किताब देख रहे हो?" बड़े प्यार से उन्होंने अर्जुन को सम्बोधित किआ तोह उसने भी सर हिला दिए.

"अंकल आज कुछ ऐसा ढून्ढ रहा हु जिसके बारे में मुझे भी पता न हो."

"ाची बात कही बीटा. साहित्य का शौक एक नौजवान में देख ाचा लगा. अगर चाहो तोह मैं भी मदद कर सकता हु.", अर्जुन को यु नजर घूमते देख प्रशंशा के सतह उन्होंने ये बात कही तोह अर्जुन ने भी उनकी बात मान ली.

"बीटा ये किताब भी बहोत काम लोग पढ़ते हैं. क्योंकि लोग धर्म से इंसान को जोड़ कर देखते है लेकिन साहित्य इनसे ऊपर है." 'दिव्या प्रेम की विधि' नामक एक किताब जिस पर श्री कृष्ण और राधा जैसी छवि बानी हुई थी. अर्जुन ने वह 40-45 पन्नो की किताब पकड़ ली और फिर से देखने लगा. साथ हे वह व्यक्ति भी.

"एक ये किताब भी बड़ी ाची है लेकिन गहराई से समझना. पहले हे इसका भाव समझने की कोशिश मत करना." 'श्रीमद भगवद गीता' का ये अलग संस्करण था एक मोती जिल्द वाला. अर्जुन के घर पर भी यही नाम की किताब थी लेकिन वह अलग आकर में थी.

"इसके बारे में तोह मैं जानता हु. ये हमारे घर के मंदिर में भी राखी है अंकल.", अर्जुन की बात सुनकर वह बस हंस दिए.

"कहा था न की भाव मत समझना. ये पूर्ण गीता है और किसी कारणवश तुम्हे शायद ये कहीं लाइब्रेरी या किताबों की धनि के पास तोह मिल जाएगी लेकिन मंदिर में नहीं. इसका व्याख्यान विस्तार से है तोह इसको वह नहीं पढ़ा जा सकता. बाकी तुम्हारी मर्जी.", उनकी बात पर अर्जुन ने ये वाली भी अपने हाथ में ले ली. बिल देने के बाद बचे पैसे उसने जीन्स की जेब में हे रख लिए थे और इनको 180 रुपये देने के बाद वह कुछ देर उनसे चर्चा करता रहा जब लगा की माँ आ गई होंगी तोह वह उनसे विदा लेने के बाद बहार की तरफ आया.

रेखा जी तोह मोटरसाइकिल के पास कड़ी सब तरफ देख रही थी. चेहरे पर घबराहट भी थी उनके की अर्जुन को यही रहने का कहा था लेकिन पिछले 10 मिनट में वह कही नहीं दिखा था ऊपर से एक शराबी कैसे घूर रहा था उसको. रेखा इतना घबरा गई थी की उसको ध्यान हे नहीं रहा के वह मार्किट में है और जैसे हे सामने से अर्जुन उसकी तरफ आता दिखा वह अपने सामान के थैले निचे गिरती उसके गले लग गई.

"क्या हुआ माँ? देखो तोह इधर, और आप घबरा क्यों रही हैं?", बेटे की बात और उसको महसूस करने के बाद रेखा ने जब अपना चेहरा ऊपर किआ तोह अब वह डर तोह नहीं था लेकिन आँखें भर आई थी.

"वह मैं सड़क पार करके इधर आई तोह तू नहीं दिखा. ऊपर से यहाँ सामने एक शराबी मेरी और लड़खड़ाता हुआ आया तोह मैं डर गई थी. तू बता देता अगर कही जाना हे था तोह."

"ाचा ाचा मेरी प्यारी माँ. आप तोह इतनी सी बात पर डर गई. यहाँ पूरी मार्किट है और मैं ये किताबे लेने गया था अंदर स्टाल से. ऐसे नहीं डरना चाहिए आपको और ाचा अब देखो हम मार्किट के बीच में हे है.", उनके सर पर हाथ फेरने के बाद अर्जुन ने नीचे पड़े प्लास्टिक के थैले उठाने शुरू किये तोह 2 पैकेट खुले थे और उनके अंदर पारदर्शी छोटे पैकेट में गलबी, नीले अंगवस्त्रो की झलक उसको मिल गई थी. फिर भी आराम से उन्हें उठाते हुए सारा सामान लेकर और एक ब्याह मान की पीठ से लगाए उन्हें लेकर वह मोटरसाइकिल तक आया. अर्जुन ने धायण दिए तोह इस तरफ सच में अँधेरा था और मार्किट की चहल पहल काम हे थी. एक घनी दाढ़ी वाला और लाल आँखें लिए झूमता शराबी बस उन दोनों को देख रहा था.

"इस से डर रही थी आप माँ? खुद वह मरने की हालत में है." हँसते हुए उसने सामान माँ को पकड़ाया तोह अपना बटुआ उनकी मुट्ठी में कैसा देखा. हाथ से बटुआ लेकर अपनी पिछली जेब में रखते हुए फिर से उसने वह थैले उन्हें पकड़ाए साथ हे एक बैग में दोनों किताब भी रख दी थी.

"वो तू नहीं दिखा तोह डर गई थी एक पल के लिए. लेकिन तू तोह अब बड़ा हो गया है न.", रेखा को अब खुद पर हे हंसी आ रही थी. वो अर्जुन को ऐसे ढून्ढ रही थी जैसे वह छोटा बचा उस से पीछे रह गया हो. सामान सारा एक बड़े बैग में आ गया था तोह दूसरे हाथ से उसको कास के पकड़ती वह चिपक कर बैठ गई थी. दोनों हे शांत होकर अब मार्किट से बहार की और निकल लिए थे. शाम ढल चुकी थी और 8 से ऊपर का समय था जिस समय दोनों हे पुराने शहर से नए शहर के बीच बने इस पुल्ल को पर कर रहे थे. हवा में ठंडक थी हलकी इस समय और हमेशा की तरह नए शहर की तरफ ट्रफ़फ़िके naam-matra था.

"इस घटना के सिवा आपकी शाम कैसी रही माँ?", अर्जुन ने पीठ पर अपनी माँ का सर महसूस करते हुए कहा जो आराम से चिपकी बैठी इस सपनो की शाम को जी रही थी.

"बुरी तोह वह घटना भी नहीं थी. कितनी परवाह करता है तू मेरी और अब सच में तू बड़ा हो गया है जैसे मेरा ख़याल रखता है. ये अब तक सबसे ाचा समय था तुझे जनम देने के बाद.", अपनी माँ की साँसों को भी अर्जुन पीठ पर महसूस कर रहा था. उसको ख़ुशी थी की वह आज खुश थी और घर से बहार आना उन्हें भी ाचा लग रहा था.

'इतना बड़ा हो गया है की अपनी माँ को सबके सामने सीने में छुपा लेता है. जाने क्यों मेरी धड़कन तेरे सीने से लगते हे तेज हो जाती है लेकिन दिल को कैसा महसूस होता है मैं किस तरह बताऊ.' मैं में ये विचार भी चल रहे थे रेखा के. आज उन्हें ऐसा लग रहा था के फिर से कॉलेज की ज़िन्दगी में आ गई हैं और उन्हें भी कोई चाहने वाला मिल गया है. दोनों जानते है लेकिन चुप रहते हुए बस एक दूसरे को खुश रखने की कोशिश करते हुए हे प्यार दिखा पाते है.

"सही कहा. मैं तोह उस शराबी का धन्यवाद करने वाला था की उसकी वजह से माँ मेरे गले तोह लगी. फिर सोचा की नशे में है तोह क्या याद रखेगा, जब अगली बार मिलेगा तब बोल दूंगा." अर्जुन की इस बात पर हलके से पीठ पे मारती रेखा ने नखरे से कहा.

"अब मजाक उड़ाएगा इस बात का भी?"

"अरे मेरी भोली माँ. आप न खूबसूरत होने के साथ हे बहोत भोली भी हो, सच में. और प्यारी तोह आप हो हे बहोत. ाची किस्मत थी पापा की जो आप जैसी पत्नी मिली, मन्नत हे मांगी होगी उन्होंने.", अपने बाप का जीकर करके फिर से एक गलती कर दी थी उसने. रेखा जी अब शांत सी बस अपने अतीत को हे याद करने लगी थी. अपने पति के सख्ती से समझने के बाद वह हमेशा उनकी उपस्थिति में चेहरे में मुस्कराहट और शर्म का नक़ाब लिए रहती थी. जब कहा कपडे खोल दिए, मैं हो या न हो. माहवारी के समय भी पीछे से तकलीफ देना उनकी ऐसी आदत थी जिस से अंदर तक वह कम्प जाती थी. जल्दी जल्दी 3 बचे कर देने के बाद हुकुम सुना दिए था के अगर शरीर कही से भी बिगड़ा तोह वह पास आना भी छोड़ देंगे. इतना कुछ सहा था की शादी से पहले सदा हंसती मुस्कुराती रेखा अब लोगो की नजरो में बस एक शांत और शर्मीली बहु बनकर रह गई थी. और अर्जुन कह रहा था के उसके पिता ने मन्नत की होगी उन्हें पाने के लिए. कितना भोला है उनका बीटा जो सच्चाई नहीं जानता. उनका ध्यान टूटा तोह मोटरसाइकिल रुकी हुई थी और अर्जुन उन्हें पुकार रहा था.

"माँ, उतरिये तोह सही. और देखिये हम कहा हैं?", मोटरसाइकिल एक काफी बड़े बाग़ की पार्किंग में खड़ा था. Safed-Neeli लाइट जो गोल कांच में क़ैद थी उनसे ये बड़ा सा पार्क जगमग कर रहा था दिवार के किनारे किनारे. अपनी माँ के हाथ से वह बैग लेने के बाद वह उन्हें साथ लिए छोटे से गेट से अंदर आया तोह वहां की छत्ता देख रेखा जी भी एक पल के लिए उस दृश्य में हे खो गई थी. जहा तक उनकी निगाह जाती थी वह तक वह बड़ा सा उद्यान फैला था. चौकोर सीमेंट की टाइल से बानी 4 फुट की पट्टी बीच से भी जा रही थी और पूरे उद्यान के किनारो पर भी जा रही थी. दूर हे santri-neeli रौशनी में नहाये पानी फुहारे चल रहे थे जो 2-3 मंजिल जितने ऊँचे जा रहे थे. कुछ हे लोग थे जो इस समय वह सैर कर रहे थे या हरे रंग के लोहे के बेंच पर बातें करने में लगे थे. उनका हाथ थाम कर वह उन्हें बीच वाली पट्टी से आगे लिए जाने लगा.

"ये पार्क हमारे शहर में है मैंने तोह पहले देखा भी नहीं था.", अर्जुन को हैरानी और ख़ुशी से देखती वह बोली तोह प्रतिउत्तर में वह भी मुस्कुरा दिए.

"मुझे भी कल हे पता चला था. सुबह जब आचार्य जी से मिलने के बाद मई इधर आया तोह पता लगा की ये भी एक इतनी बड़ी जगह है.", पट्टी की दोनों तरफ कुछ दुरी पर पाम और अमलतास के पीले फूल वाले पेड़ लगे थे. इस तरफ घांस भी सफाई से काटी हुई थी और हर तरफ छायादार वृक्ष भी थे.

"यहाँ मौसम में बहार से कही अलग ठंडक और कितनी शांति है न. और मुझे तोह ये वही तक दिख रहा है जहाँ लाइट जल रही है.", रेखा जी ने इस जगह को बड़े ध्यान से देखते हुए कहा.

"ये हम by-pas के पास वाली जगह पर है. अपने सेक्टर से 2 सेक्टर पहले वाली सड़क मुड़ने के बाद. आचार्य जी ने बताया था के सामने पार्क है लेकिन मैं जो दिखने लाया हु पहले वही चलते है.", अपनी माँ को संदेह में रखे हे वह उन्हें लिए बस सीधा चलता जा रहा था और वह भी किसी नवयौवना सी उसके साथ हे चलती जा रही थी. कोई 7-8 मिनट सीधा चलने के बाद वह उन लिघ्तों को 250-300 गज पीछे छोड़ आये तोह यहाँ अपने से कुछ हे दुरी पर घास के मैदान के पर एक बड़ा सरोवर सा दिखा, जिसको अगर साफ़ तालाब कहा जाये तोह बेहतर है. किनारे पर कटीली तार को लकड़ी के 5 फुट के खम्बो पर से लपेटे एक बाद सी बानी थी. चाँद की रौशनी भी नहीं थी आज आसमान में इसलिए पीछे से आती हलकी रौशनी में किसी neele-kale कांच सा चमक रहा था. बाद के पास लगे बेंच पर बैग को रखते हुए अर्जुन जैसे कुछ देखने लगा और फिर कुछ हे क्षण बाद उसने अपनी माँ को उस दिशा में इशारा करते दिखाया.

"ये सामने जंगल है न तोह देखो इस तरफ तालाब की किनारे कुछ दिखेगा.", उसके इतना कहते हे रेखा जी ने भी उधर नजर लगाई. गहरी neeli-kaali आकृति को उन्होंने भी पहचान लिए था. उनसे 30 कदम दूर 3 हिरण खड़े थे जिनमसे शायद एक उन्ही को देख रहा था और 2 अपना मुँह नीचे किये इस जलाशय से पानी पीने में लगे थे. दोनों हे बस उन्हें देखते रहे और फिर किसी मोर की 'पहूउउउणं' की आवाज से ये शांति भांग हुई तोह बाद के अंदर की तरफ उनके सामने से हे ये हिरण कुलांचे मारते हुए भागने लगे. यहाँ से बस वो कांटो की बाद हे बीच में थी नहीं तोह एक बार वो शायद 10 गज हे दुरी से निकले थे.

"सुबह वह उस और hara-bhara जंगल भी दीखता है और कही कही झुरमुट में ये हिरण और rang-birange पक्षी. अंदर जाने का रास्ता घूम के दूसरी तरफ से है लेकिन वह 8-5 हे खुला रहता है. मैं बस आपको ये दिखाना चाहता था.", अर्जुन की बातें रेखा बड़े ध्यान से सुन रही थी. कैसे वह उन्हें एक ऐसी जगह लेकर आया जैसी खुद उन्हें पसंद थी. न कोई bheed-bhaad और न कोई इंसान. शांति और प्रकृति, शायद ये 2 चीजे अर्जुन को भी उन्ही से मिली थी.

"थोड़ी देर यहाँ बैठे हम? बस 10 मिनट." अपनी माँ की बात सुनकर वह मुस्कुराता हुए उस बेंच पर बैठा तोह रेखा जी भी साथ में हे बैठ गई.

"पता है, जहाँ मैं पैदा हुई थी और पाली बढ़ी थी न वह हमारे कसबे के साथ हे काले हिरण, चीतल, सांभर और कई जानवरो के साथ पक्षियों का भी अभ्यारण्य था. मैं महीने में 2 बार जरूर अपने बड़े भैया और छोटे भाइयों के साथ वह जाती थी. इन सबके साथ हे सर्दियों में वह झील में कई तरह के पक्षी आते थे. हंस, बगुले, बत्तखे और मैं वहां बैठ कर घंटो उन्हें निहारती थी. फिर जैसे जैसे बड़ी हुई कॉलेज जाने लगी तोह वह भी बंद हो गया. तुम्हारे पापा से शादी हो गई और फिर वही दुनियादारी और ग्रहस्ती से कभी बहार हे नहीं निकल पाई. कभी अपने वह जाना होता था तब भी उस जगह को फिर देख न पाई थी लेकिन आज तुमने यहाँ लाकर मेरे दिल को वही एहसास करा दिए.", इतना कहने के बाद रेखा जी अपना सर अर्जुन के कंधे पर रखते हुए बस इस पल को महसूस करने लगी.

"पापा आपको नानाजी के घर क्यों नहीं लेके जाते कभी मिलवाने? जहा तक मुझे याद है बचपन में सिर्फ राखी पर हे कोई वह से आता था और पिछले एक साल में तोह कोई भी नहीं आया.", अर्जुन को भी अपने nana-naani के बारे में jaan-ne की इत्छा हुई.

"वह से फ़ोन आ जाता है. आज भी आया था और महीने में एक 2 बार बात होती रहती है. ताऊजी, पापा और चाचा जी तोह आज भी साथ हे रहते है वहां बस तेरे 4 मां है जिनमे से सिर्फ 2 वही है जो जमीन और मंडी में अनाज की दुकान सँभालते है. सबसे बड़े भैया पुलिस में है और पिछेल रक्षाबंधन आये थे लेकिन बस 10 मिनट बाद हे चले गए थे, जरुरी काम था. जब तू आठवीं में था उस समय तेरे तीसरे और चौथे मां की शादी हुई थी तब मैं और कोमल गए थे तेरे बड़े मां के साथ शादी में वह, 4 दिन के लिए.", उनकी बातें सुनकर अर्जुन भी सोच में डूब गया. इतना बड़ा परिवार है लेकिन उसको तोह कभी लेके नहीं गए पिछले एक साल में. और पापा क्यों नहीं जाते वह जैसा मम्मी ने कहा के शादी में भी वही गई थी.

"तेजपाल मां से तोह मैं आपको जल्दी मिलवा दूंगा माँ. लेकिन आप मुझे कब लेके चलोगी नानाजी के घर.?", थोड़ा हैरानी से उन्होंने देखा की वह कैसे जानता है उनका नाम. फिर शान्ति से उन्होंने बिना सवाल के जवाब दिए.

"मैंने तुम्हारी दादी से इजाजत ली हुई है वह जाने के लिए. अभी तुम्हारा स्कूल का दाखिला है परसो फिर वह करवा के हम 4 दिन के लिए वह चलेंगे.", एक मुस्कराहट से उन्होंने कहा जो अंधेर में उनकी सिर्फ आवाज से हे पता चल रही थी. अर्जुन ने एक बार उन्हें गले से लगा लिए किसी बचे के जैसे.

"वाह. फिर मैं भी वह जाऊंगा जहा आप जाती थी. ाचा हम अब यहाँ से चलते है 9 बजने वाले है.", उनसे अलग होता वह बैग उठाने लगा तोह रेखा जी ने भी खुद हे उसका हाथ थाम लिए और सहारा लेती कड़ी होने के बाद साथ हे चलने लगी. 10 मिनट शांति से चलते वह दोनों फिर से बहार आ गए थे.

"थैंक यू सो मच.", अपने बेटे का गाल चूमती वह पीछे बैठ गई और अर्जुन मुस्कुराता हुआ घर की तरफ बढ़ चला. कुछ हलकी फुलकी बातें करते वह 10 मिनट बाद हे घर पहुँच चुके थे.

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"भाई तू नाहा ले, फिर मैं खाना लगाती हु.", कोमल दीदी ने बैठक में टेलीविज़न देखते अर्जुन को कहा तोह वह नहाने चल दिए. घर में सभी खाना खा चुके थे और अपने घर वापिस जाने से पहले प्रीती भी कुछ देर अर्जुन से मिल कर गई थी. आज तारा और अलका दीदी उसके साथ उनके घर गए थे सोने के लिए. प्रियंका दीदी भी बर्तन साफ़ करने के बाद ऊपर टेलेविज़न देख रही थी आरती के साथ. रेखा जी ने तारा और अलका को उनका सामान दे दिए था और अब वह भी भीतर वाले बाथरूम में नाहने के बाद अपने कमरे में एक साधारण सलवार कमीज पहन रही थी.

'शांत व्यक्ति के दिल की गहराई को नाप पाना सबसे कठिन है. आप उसके चेहरे की शांति से अंदाजा नहीं लगा सकते के मैं में क्या चल रहा है. ऐसे इंसान के साथ रहकर उसका सुख दुःख महसूस करने के बाद हे वह आपके साथ अपनी ज़िन्दगी के पल और यादें साँझा कर सकता है.' अर्जुन को आचार्य जी की बात याद आई जब वह पानी के नीचे खड़ा था. उसको अपनी माँ की शान्ति के पीछे बहोत सारा दर्द और बेचैनी की झलक तोह मिली थी लेकिन वह चाहता था के दुनिया का हर सुख वह अपनी माँ के सामने ला कर रख दे. और वह भी उसको पूरे हक़ से हर बात कहें क्योंकि माँ तोह कभी भी कुछ कहती हे नहीं थी. न कोई इत्छा न पसंद. बस जैसे कहो वह वैसे करती थी और अपने हे इस परिवार में उलझी रहती थी.

'उन्हें मई वह खुशियां दूंगा जिसकी वह हक़दार है.' शरीर पौंछते हुए बस इतना हे खुद से कहा था अर्जुन ने और एक पजामा पहन कर वह बाथरूम से बहार आ गया. लगे हाथ हे उसने मुख्या दरवाजे को टाला लगाया और एक बार बगीचे की तरफ नजर मारने के बाद गलियारे का दरवाजा लगता हुआ वह अंदर चला आया.

"चल आजा इधर बैठ और माँ भी आ रही है.", कोमल दीदी ने वह तीनो की प्लेट साथ में लगाई हुई थी और उनके साथ हे अर्जुन बैठ गया.

"आपने अभी तक खाना नहीं खाया? ये गलत बात है दीदी.", अर्जुन ने उनके चेहरे को देखते हुए कहा तोह वह बस मुस्कुरा भर दी. उनकी आँखें बिलकुल माँ जैसी हे थी.

"आदत है मुझे माँ के साथ हे खाने की अगर वह अकेली होती है तब. नहीं तोह मैं पहले हे खा लेती हु जब सभी घर पर होते है. अकेले में वह खाना नहीं खाती. और फिर इतना तोह चलता हे है.", उनकी बात पर अर्जुन को ये भी पता चल गया था की माँ अकेली हो तोह खाना नहीं खाएंगी.

"आप तोह माँ के सबसे ज्यादा साथ रही है. फिर तोह आप उनके बारे में सब कुछ जानती होंगी न.", अर्जुन का ऐसा सवाल सुनकर एक पल तोह वह बस उसको देखती रही फिर थोड़ा आराम से बोलने लगी.

"हाँ. मैं शायद उन्हें थोड़ा बेहतर जानती हु बेशक माँ मुझे भी ज्यादा जाहिर नहीं करती. उनकी ज़िन्दगी में जाने कैसा अकेलापन है लेकिन पहले वह बिलकुल ऐसी नहीं थी. ननिहाल में तोह वह पहले बहोत बातें करती थी और ताईजी के साथ हे ज्यादातर वह बातें करती है, क्योंकि दोनों में बहनो का रिश्ता ज्यादा है. जब तू छोटा था तोह पापा अपने शहर में हे थे, ज्यादातर रात को देरी से आते थे और शराब भी पीते थे. फिर माँ बिलकुल हे बदल गई थी. तेरे जाने के बाद तोह जैसे उन्होंने कुछ कहना बंद हे कर दिए था और बस chulha-choka या घर का बाकी का काम करने में हे लगी रहती. उन्होंने आराम करना तोह छोड़ हे दिए था लेकिन फिर पिछले एक साल में वह थोड़ा बदलाव लाने लगी और इसके पीछे भी तेरा घर वापिस आना हे है. देखा नहीं जब तू उनके पास सोया तोह सुबह वह कितनी खुश थी और अभी शाम को तोह बिलकुल वैसी दिख रही थी जैसी जब तू 4-5 साल का था तब दिखती थी. भाई माँ की ज़िन्दगी बस तू हे है और उनके इतने साल खामोश रहने की आधी वजह भी. बाकि अगर तू ताईजी के करीब है तोह वह ज्यादा बता पाएंगी. लेकिन उनकी ख़ुशी बस तुझ से हे है, बेशक वह पापा के आने पर खुश रहने का दिखावा करती हैं लेकिन मैंने उन्हें कई बार 3-4 बजे रात में बाथरूम में सिसकते पाया है, जब भी वह यहाँ होते थे.", गाला रुंध गया था कोमल दीदी का इन सब बातों को कहते कहते और इस बीच अर्जुन बस खामोश सा शुन्य भाव में पहोच गया था. कोमल दीदी को दरवाजा खुलने की आहात हुई तोह जल्दी से वह कड़ी होकर रसोईघर में चली गई इधर अर्जुन वैसे हे मूरत सा बना बैठा था.

"कहा खो गया है बीटा?", माँ की इस आवाज से जैसे उसकी चेतना वापिस लौटी लेकिन बस सर ना में हिलता वह उन्हें देखे बिना रोटी के डब्बे से उनकी प्लेट में रोटी रखने के बाद सब्जी डालने लगा. रेखा जी अपने बेटे के ऐसे व्यवहार पर गदगद हो गई थी. फिर अंदर से कोमल बहार आई तोह उन्होंने अपने इस समझदार बेटी को अपनी दूसरी तरफ बिठा लिए.

"देख तोह तेरा या छोटा भाई कितना समझदार हो गया है. मैंने आज पहली बार महसूस किआ और देखा की ये अब बड़ा होने के साथ ये कितना समझदार भी हो रहा है.", अपनी माँ की प्लेट में खाना लगाने के बाद अर्जुन ने अपनी बड़ी बहिन को भी खाना परोसा और फिर सलाद की प्लेट भी सामने रख दी. खुद भी अपना खाना लगाया और फिर तीनो ने हे साथ में खाना शुरू किआ. जहाँ रेखा जी अपनी बेटी से बातें करती आराम से खाना खा रही थी वहीँ अर्जुन शांति से बस खाने की तरफ ध्यान लगाए था. और इसके चलते उसने जल्दी अपना खाना ख़तम किआ और प्लेट उठा कर खुद हे रसोईघर में रखने चला गया.

"माँ, थोड़ी देर में बैठक में हु. जब आप कमरे में जाने लगो तोह आवाज लगा देना. मैंने दरवाजे बंद कर दिए है.", इतना बोलकर बिना पीछे मुड़े वह अंदर चला गया. यहाँ पर इस समय आरती दीदी बैठी हुई अन्नू कपूर का गांव का प्रोग्राम देख रही थी.

"अकेले बैठी हैं आप?", उनके साथ हे सोफे पर बैठ गया. वो घुटने मोड दोनों पाँव सोफे के ऊपर रख कर बैठी थी. बिना बाजु की एक चटख टीशर्ट और सफ़ेद मुलायम लड़कियों के रात में pehan-ne वाला इलास्टिक का पजामा पहने. गोर बाल रहित पाँव 6-7 इंच तक नुमाया हुए चमक रहे थे.

"अब तोह अकेली नहीं हु न? वैसे भी सवा दस बजे है तोह नींद थोड़ी देर तक हे आएगी.", वह उस से नजरे नहीं मिला रही थी लेकिन एक मुस्कान जरूर थी उनके चेहरे पर. सोफे बैठक में दिवार से लगा था तोह इधर किसी की सीढ़ी नजर नहीं पड़ती थी. और घर में तोह लोग थे हे कितने. अर्जुन ने उनकी ये मुस्कान एक तरफ से देख ली थी और हलकी शरारत से उनके कान के पास निकली एक लत्त को सहलाते हुए उसने उनके कान को भी आहिस्ता से स्पर्श किआ तोह आरती के शरीर में मीठी सी झुरझुरी दौड़ गई. फिर भी उन्होंने उसकी तरफ नहीं देखा बस मुस्कान अब बड़ी हो चुकी थी. उँगलियाँ जैसे हे गर्दन पर लगी तोह अर्जुन की ब्याह पर गिरती वह कंधे पर सर टिकाये बोलने लगी.

"वो सपना नहीं था न?"

"नहीं.", अर्जुन ने भी मुस्कुराते हुए शाम वाले किश की सचाई बता दी.

"तुम्हे डर नहीं लगता?", वैसे हे उसकी ब्याह पर अपना सर टिकाये और पीठ आधी उसके सीने पर रखे आरती बोली.

"आपको डर हे तोह लगता है इसलिए तोह सिर्फ सपने देखती रहती है. नहीं तोह कब का आप असलियत में बाहों में भर लेती अगर इतना नहीं डर्टी तोह.", अर्जुन ने ये बात करते हुए अपनी तरफ से कोई स्पर्श नहीं किआ था. और उसकी बात सुनकर आरती की मुस्कान गायब हो गई थी. लेकिन इस बार पाँव सीधे करती वह उसके चेहरे के सामने चेहरा करती ध्यान से देखने लगी. कुछ भी नहीं था उनके चेहरे पर, सपाट और खाली सी आँखें. फिर जाने कहा से उनमे वह हिम्मत आई के खुद हे अर्जुन के होंठों पर अपने होंठ रखते बाहों में भर लिए. कुछ हे सेकंड बाद वह अलग होने के बाद उसकी गॉड में सर रख कर सोफे पर हे लेट गई.

"पता है डर किस बात का है अर्जुन? इजहार कर देने भर से प्यार पूरा नहीं हो जाता, इसको जीने और साथ रहने से ये जिन्दा रहता है. कल मैं किसी और के साथ रहूंगी लेकिन वह भी दिल में तुम होंगे. उस घुटन से डर लगता है. डर लगता है की शरीर एक जगह और आत्मा कही और. मैं tyaag-sacrifice जैसे भरी शब्दों में यकीन नहीं करती. लेकिन अब कुछ कर भी तोह नहीं सकती, क्योंकि नींद में भी सिर्फ तुम हे तोह दीखते हो.", आरती की बातें सुनता वह बस प्यार से उनका सर और बाल सेहला रहा था.

"प्यार पूछ कर तोह नहीं होता होगा न? और फिर क्या जरुरी है की अगर वह इंसान आपको मिल जाये तोह वह या आप हमेशा ज़िंदा रहेंगे या साथ रह सकेंगे? प्यार इंसान को अगर कमजोर करता तोह लोग कामयाब नहीं हो पाते. और ये हांसिल तोह कभी नहीं हो सकता क्योंकि ये महसूस होता है और जो कुछ हम महसूस करते है वह अनंत नहीं होता हाँ लेकिन उसका महसूस होना याद रहकर खुसी देता है. मैं और कुछ नहीं कहूंगा.", रात बहोत हो चुकी है आप सो जाइये.", अर्जुन ने वैसे हे गाल सहलाते हुए कहा तोह नीचे से हाथ बढाकर आरती ने उसका चेहरा अपने ऊपर झुका लिए.

"मुझे अपना एहसास इतनी गहराई तक करवा दो की जहाँ भी रहूं बस तुम अंदर हे रहते हो ये हर एक पल लगता रहे." और अपने होंठो से उसके होंठो को जकड़ती वह तन्मयता से ये विपरीत चुम्बन करने लगी. खुद से हे अर्जुन का एक हाथ अपने उभर पर रखती वह अब अर्जुन की जीभ भी दांतो में पकड़ रही थी. आरती का ये रूप उसके व्यक्तित्व से बिलकुल उलट था. कुछ जंगली, मजबूत और बेख़ौफ़, लेकिन अर्जुन ये सब महसूस करता भी सजग था. उन नरम उभर को हलके से पकड़ कर दबाते हुए अर्जुन बस आरती को वह करने दे रहा था जो वह चाहती थी. सांसें उखड़ी तब कही जा कर होंठ अलग किये लेकिन फिर भी वह उसके झुके चेहरे को बड़े प्यार से देख रही थी.

"अर्जुन बीटा, मैं सोने लगी हु. एक बार घर देख ले.", रेखा जी की आवाज से दोनों अलग होते खड़े हुए तोह आरती ने जोर से उसको गले से लगा लिए.

"मेरे जाने से पहले तुम मेरी हर ख्वाहिश पूरी करोगे न?", आरती की बात पर अर्जुन ने उनके होंठो पर ऊँगली रखते हुए माथा चूमकर सिर्फ हाँ में सर हिलाया और एक बार खुद गले से लगते हुए जाने को कहा. अब आरती के चेहरे पर थोड़ी संतुष्टि थी और छोटी सी मुस्कराहट भी. फिर अर्जुन ने यहाँ भी सब ाचे से बंद किआ और अपनी माँ के कमरे की तरफ बढ़ चला.

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आप चाहते है तोह एक विस्तार पूर्वक घटनाक्रम के साथ नया अपडेट देर रात को पोस्ट कर सकता हु :)
 
अपडेट 53

दिव्या प्रेम की अनुभूति


"आपने क्या लिए दिखाएंगी नहीं?", अर्जुन माँ के कमरे में बिस्टेर पर तक लगाए बैठा था और उन्हें देख रहा था. वह बिस्टेर पर आने से पहले आईने के सामने अपनी बाहों और गर्दन पर कोई क्रीम से मालिश सी कर रही थी.

"तुझे देखना है?", रेखा जी ने वैसे हे आईने की तरफ चेहरा किये हुए हे कहा. अर्जुन उन्हें यहाँ नहीं देख सकता था क्योंकि ये अलमारी और बिस्टेर के सिरहाने के बीच की जगह थी जहाँ वह कड़ी थी.

"सिर्फ आपकी मर्जी से. अगर आपको ठीक लगता है तभी. नहीं तोह ऐसा कुछ नहीं है.", अर्जुन ने सामने खली दिवार और परदे की और देखते कहा. कमरे में सफ़ेद बड़ी लाइट जल रही थी और दरवाजा बंद था. रेखा जी का कमरा पूरे घर में सबसे बड़ा था और जिसमे एक स्टोर रूम भी था. जहा कुछ अटैची रखे रहते थे या फिर वह जगह कपडे बदलने के काम आती थी.

"ाचा तू आराम कर मैं 5 मिनट बाद दिखती हु." अपने पाँव को अलमारी के शेल्फ पर रखती वह अपने सुडोल पिंडलियों की मालिश करती हलके से मुस्कुरा रही थी. अर्जुन का इस तरह उनसे हर बात के लिए पूछना उन्हें भी सुकून दे रहा था. कैसे वह इत्छा का सम्मान करने के साथ अपने दिल की बात भी कह रहा था. बेशक वह सभ्य और संस्कारी महिला थी लेकिन यहाँ इस कमरे में आज अर्जुन उन्हें एक नया रंग दे रहा था, जो उनकी ज़िन्दगी से जैसे हमेशा से गायब हे था. वह से फारिग हो कर अपने बाल हाथो से सुलझती रेखा जी ने बड़ी लाइट को बंद कर ये जीरो की रौशनी की और वह पैकेट लेकर उस स्टोर में चली गई जहाँ सिर्फ पर्दा हे था. अर्जुन जहां सोच में डूबा अब आँखें मूंदे इस शान्ति में हो रही हलकी आवाज को sun-ne की कोशिश कर रहा था. 5 मिनट बाद उसकी नजर परदे पर जम्म गई जहाँ से अभी तक उसकी माँ बहार नहीं आई थी.

"मुझे अजीब लग रहा है थोड़ा.", रेखा जी की अंदर से हलकी आवाज आई तोह अर्जुन मुस्कुरा दिए.

"थोड़ा हे अजीब है न? फिर आप आ सकती है. अगर ज्यादा होता तोह फिर मैं नहीं कहता.", अर्जुन की बात सुनकर वह हलके कदमो से चलती परदे तक आई और धीरे से उसको हटती वह कड़ी हो गई. अर्जुन बस किसी पत्थर सा जम्म गया था. काले चमकते उस कपडे में छातियों से ऊपर उनका गोरा चेहरा इस हलकी रौशनी में भी केहर धा रहा था. वो कपडा भी कही कही से चमकता अपना प्रभाव दिखता शायद बता रहा था के आज उसको सही हक़दार ने पहना है. ये निघ्त्य कुछ ऐसे सिली हुई थी की जहा वह उनके स्टैनो पर से कसावट लिए थी वही कमर पर और कूल्हों पर किसी खाल सी चिपकी थी. शरीर भी तोह इस उम्र में किसी नवयौवना सा कैसा और भरपूर खजाने से लड़ा हुआ था रेखा का. अपने बेटे को खुद में यु खोया देख हाय की लाली से कान तक लाल हो गए थे लेकिन उन्हें खुद पर नाज भी हो रहा था के एक जवान लड़का उन्हें ऐसे देख रहा था जैसे कभी कुछ ऐसा न देखा हो.

"बस? अब बदल लू?"

"आपने ये बदलने के लिए ख़रीदा था?", अर्जुन का मंतव्य समझ कर वह शर्माती सी बस चलती हुई उसकी और आ गई. अर्जुन का दिल उनकी ऐसी धीमी चाल और शरीर का कटाव देख जैसे गले से बहार आने को हो गया था. सच हे तोह था के यही वह महिला थी जिसने अर्जुन की ज़िन्दगी में सबसे खूबसूरत 2 लड़कियां दी थी जिन्हे वह खुद भगवान् की अनमोल रचना मानता था. लेकिन उसकी माँ उनसे भी कही ऊपर हे थी.

"अब बोलो. लिए तोह pehan-ne के लिए हे था लेकिन मैं नहीं था क्योंकि मुझे ये थोड़ा ज्यादा हे आधुनिक लगा. सिर्फ तुम्हारे कहने पर बस पहन कर देख लिए."

"नहीं. इसमें ऐसा कुछ गलत नहीं है. और सच में आपके पहन ने से हे ये ाचा लग रहा है. किसी और के लिए शायद ये ऐसा न हो.", उनका हाथ पकड़ कर अर्जुन ने अपने पास बिठा लिए. वह अब भी उन्हें किसी चकोर सा देख रहा था जो सिर्फ चाँद के लिए ज़िंदा हो.

"अभी गलत नहीं है क्योंकि ये सिर्फ पूरी पोषक का एक हिस्सा भर है.", बात कहने के बाद खुद हे उन्होंने नजरे झुका ली थी. अर्जुन को भी ये समझ नहीं आया था के उन्होंने ऐसा क्यों कहा.

"आज आप ये पहन कर हे सो जाइये न. ाचा लग रहा है और अगर आरामदायक न लगा तोह फिर मत pehan-na.", अर्जुन की बात पर बस हलके से मुस्कुराती वह उसके बराबर में आ गई.

"ठीक है. लेकिन.." उन्होंने इतना कहा और फिर बिना आगे बोले वह बिस्टेर के किनारे लेट गई. उनकी धड़कन बढ़ गई थी जिसके चलते उन्होंने बात बीच में छोड़ते हुए बस अर्जुन की तरफ पीठ कर ली और करवट के बल लेट गई थी.

"मैं सिर्फ देखना चाहता था आपको इन कपड़ो में, आपने प्यार से लिए था. आपको पसंद नहीं तोह फिर मैं नहीं कहूंगा.", अर्जुन की बात पर जैसे दिल में फांस सी चुभी रेखा के. सच में कितना नरम दिल था और प्यार भी कितना था उसका.

"नहीं ऐसा मत बोल. एक तू है जिसने 3 दिन में मुझे वह सब दिए जो 25 साल में मुझे नहीं मिला. तेरा साथ होना हे मेरे लिए सबसे बड़ी ख़ुशी है. लेकिन मैं खुदगर्ज़ नहीं होना चाहती अर्जुन.", अब चेहरा अपने बेटे के सामने करती वह अपना हाथ अर्जुन के गाल पर रख के बस उसको हे देख रही थी.

"पता है इतनी ख़ुशी मुझे अपनी शादी का जोड़ा लेने में नहीं मिली थी जितनी आज तुझसे मिले उपहारों ने दी. एक तरह से तूने वह सब कपडे दिला दिए जो सिर्फ किसी एक का हक़ होता है. साड़ी, सूट और अंतर्वस्त्र. बस इस सबमे मैं और लालच नै..." बात वही रह गई जब अर्जुन ने उनकी पलकों को चूमते हुए अपना हाथ उनकी कमर पर रख दिए. अपनी ब्याह को उनके सर के नीचे रखते हुए अर्जुन ने अपने आपको बिलकुल उनके साथ हे जोड़ दिए था.

"जानता हु आप शांत नहीं है. बहार से आप किसी रुके हुए पानी सी लगती है लेकिन अंदर से भी वैसी हैं. खुद की तड़प, िचाये और सच को दबाये जैसे वह पानी खुद को एक जगह रख कर ख़तम करने लगता है वैसे हे. जब तक उसको बहाव न मिले या निकलना नसीब न हो वह खुद को लाचार और विवश मानता है. ऐसे हे वह एक दिन सूख कर गायब हो जाता है. लेकिन पानी की सच्चाई वह नहीं है. उसको बहना होता है, जीवन देने के साथ अपनी गति बनाते हुए वह पहुंचना होता है जहा उसका वजूद हो. अगर आपकी ज़िन्दगी में जीने की वजह मैं हे हु, मैं हे आपकी ख़ुशी हु तोह फिर मुझे हे आपके वजूद को बनाये रखना होगा.", इतनी कड़वी लेकि सच्ची बात सुनकर एक पल को तोह रेखा को लगा के अर्जुन कही परिवार में बगावत हे न कर दे. लेकिन ये बात तोह उसने सिर्फ उस से ऐसे पल में कही थी जहा वह खुद उसकी बाहों में थी. इतना महसूस करते हे किसी सुख से बस आँखें बंद हो गई और उन्हें महसूस हुआ तोह पहला चुम्बन जिसमे एक प्यार की गर्माहट, दिल से निकलती ऊर्जा और खुद के प्रति समर्पण था. कोई वेग, जल्दबाजी या वासना न थी. खुद हे रेखा के होंठ खुल गए और वही सब उन्होंने भी अर्जुन को प्रदान किआ जो उन्हें मिला था. गहराई से बस एकाकार होते दोनों के लब्ब.

'उम्म्म' प्यार से हे वह अलग हुए तोह अर्जुन बस उन्हें निहार रहा था. उनके गालो से बाल पीछे करता वह उनके rom-rom को जगा रहा था. निर्वस्त्र गोरी बाहों की सतह पर जैसे विद्युत प्रवाहित हो गई थी इस छूने भर से. पूरी बाहन को सहलाते हुए अर्जुन ने अपने होंठो से उनके कान की लौ को छुआ तोह आँखें एक बार फिर बंद हो गई थी रेखा की लेकिन उसके होंठ वह से फंसलटे गले और कंधे को चूमते स्टैनो से ऊपर कपडे की सीमा पर आ कर रुक गए थे.

'आज मैं नहीं रोकूंगी' मैं में वह ये कड़ा फैंसला कर चुकी थी लेकिन बस वह आँखें बंद किये पड़ी थी. अर्जुन को आगे बढ़ते न देख उन्होंने आँखे खोली जहा अर्जुन का मुँह वही स्थिर था इतनी देर से. हिम्मत कर अपने निचले हाथ से उसका सर सहलाते हुए रेखा ने अपने ऊपरी कपडे के 3 बटन खोल दिए और चौथे पर अर्जुन का हाथ रख कर अनुमति दे दी थी जिसने कमर तक लगे हुए बाकी बटन खोलकर पहली परत को ढीला कर दिए था.

"आप कुछ कहेंगी?", अर्जुन ने एक बार फिर चेहरा सामने करते हुए उनसे पुछा तोह बस गर्दन ना में हिलने के बाद रेखा ने खुद हे अपने होंठ वापिस से चिपका दिए थे. उन्होंने सब कुछ कह दिए था इस एक पल में. अर्जुन ने भी उनके साथ चिपके हुए हे निघ्त्य को उनके ऊपर वाले हाथ से निकल दिए था. उसको नहीं पता था के नीचे क्या है लेकिन जैसे हे हाथ कमर पर आये तोह उस मखमली एहसास में डूबता वह बस अपनी ज़िन्दगी के इन सबसे बेहतरीन होंठो को पीने हे लगा था. कोनसा अध्भुत रस था जो उसको अब यही रोके थे.

"मुझे सिर्फ आज चुप रहने दे फिर मैं हर बात कहूँगी.", रेखा ने होंठ अलग होने पर अर्जुन को ऐसे देखा जैसे कोई जादू टूटने लगा हो और फिर अपने हाथ से अर्जुन का कमर पे आया हाथ अपने ऊपर वाले उभर पर रखती वह फिर से उस जादू को बरकरार रखने अर्जुन के होंठो से जुड़ गई थी. उन्नत उभर उस मुलायम कपडे के अंदर से भी अपनी कठोरता बता रहे थे. कुछ तोह वह दूध की अधिकता से अकड़े थे और कुछ इस हसीं लम्हे की वजह से. अर्जुन को ये दूध का कलश आज वैसा नहीं लग रहा था जिसको वह 2 रातों से पी रहा था, ये कुछ अलग और भारी था. एक सम्पूर्ण सतांन जिसका अस्तित्व जैसे आज हे हुआ हो. आधा उभर मुलायम ब्रा जैसे कपडे में क़ैद था और आधा उस जालीदार धागे में. नीचले हाथ ने भी दूसरे का अनुसरण करते हुए बिस्टेर पद दबे बड़े उभर को थाम लिए तोह ये चुम्बन अपना दायरा बढ़ता वह तक जा पहुंचा जहा दोनों के मुँह एक दूसरे की साँसों को अंदर करते जीभ से सारा भूगोल टटोल रहे थे. उभारो को जकड़े हे अर्जुन ने अपनी माँ को चादर की तरह खुद के शरीर पर ओढ़ लिए था. इस कश्मकश और एक दूसरे की अंतरंगता में वह कला लबादा कब शरीर से अलग हुआ दोनों को इसका कोई होश न था.

अद्भुत दृश्य था जो इस वीरान घर के एक कमरे में दिख रहा था. हलकी रौशनी में बिस्टेर पर पीठ के बल लेता मजबूत और बड़े जिस्म का ये नौजवान अपने सीने पर यौवन से भरपूर सुडोल अप्सरा को अपने ऊपर लिटाये उसके मदद से भरे लबों को किसी रेगिस्तान के प्यासे की तरह पी रहा था, जैसे की यह औंस की बुँदे सुबह होते हे किसी भाप सी विलुप्त हो जाएँगी. वही 2 झीने काले वस्त्रो में उसके ऊपर किसी नागिन सी लिपटी वह अप्सरा चन्दन के वृक्ष के सम्मोहन में क़ैद बस उसमे समाने को आतुर थी.

अर्जुन ने अपनी माँ की मखमली कमर से हाथ गुजारते हुए पतली डोरी से बंधे उनके नीचले वस्त्र के अंदर दोनों हाथो से उनके उन्नत और विशाल कूल्हों पर हाथ रख दिए थे. इस पल में भी रेखा की टाँगे सीडी थी जैसे उसके बेटे की. अगर कही भी उसने naari-nitambh का सौंदर्य पढ़ा था तोह वह सारा वर्णन बस किसी धुंए की मानिंद उसके दिमाग से उड़द चूका था. कहा तोह उसने अपनी ताई के वह सुडोल कूल्हे देखे थे जो बड़े और चौड़े थे, कुछ वैसे हे और ज्यादा आकर में माधुरी दीदी के थे लेकिन अलका और कोमल दीदी के नितम्भ हर उस कसौटी पर खरे उतारते थे जितना उसने साहित्य में पढ़ा और उन दोनों को महसूस किआ था.

लेकिन आज वह सब कहा धूमिल हो गए थे? आज क्यों उसके पास इन नितम्भो का वर्णन करने या उनकी तुलना में shabdo/premika का अभाव था.? उन पुष्ट गोलाकार उभारो पर सिर्फ हाथ रख भर देने से अर्जुन वशीभूत हो गया था. एक द्वन्द सा दिल और दिमाग में चलने लगा था के कैसे वर्णन करे वह कैसे अपने विचलित मैं की डोर को संभाले. दोनों अब आँखें बंद किये थे लेकिन जहाँ अर्जुन के हाथ अपने नितम्भ पर महसूस करने भर से रेखा उन्माद में उसकी गर्दन को चूमती बस किसी बैल से लिपटी थी वही सम्मोहित सा अर्जुन अपनी माँ के लिए सही शब्द खोज रहा था.

Nar-Narayan को तपस्या से हटाने के लिए आई Rambha-Menaka भी नारायण की रचना उर्वशी के अतुल्य सौंदर्य के सामने स्वयं धूमिल हो गई थी. सौंदर्य का विश्लेषण भी रुकमणी के लिए न्याय नहीं कर पता था. एक मोहिनी थी जिसके सामने असुरों के साथ स्वयं भोलेनाथ भी दिल हार गए थे. लेकिन ऐसा कही वर्णन था जिसकी तुलना अर्जुन के दिल को सुकून देती कह सकती की उसकी बाहों में जो अप्सरा है वह बिलकुल वैसे हे.

'तिलोत्तमा', जिसका kann-kann उत्तम हो. अर्जुन के हाथ स्वयं हे उन उभारो पर फिसलने लगे जैसे हे मस्तिष्क में ये लफ्ज़ टकराया. सर्वश्रेस्थ हे तोह थी वह. अर्जुन को जीवन का एहसास करने वाली और पहला स्पर्श देनी वाली ये आलोकिक महिला हे तोह पहला प्यार थी. मातृत्व के साथ हे आज ये सम्पूर्ण प्रेमिका थी उसके लिए. दिल एक दूसरे के शरीर में विद्युत भर रहे थे, और इसको सेहन करते हुए भी बस वह दोनों अब अनूठे आनंद में अपनी ज़िन्दगी का वह बरसो से खाली हिस्सा पूरा करने में लगे थे जिसको आज तक दोनों ने हे कभी खोजै न था.

बेशक रेखा के पति शंकर ने उनके शरीर को निर्वस्त्र किया था, सहलाया था, रौंदा था और 3 बचे भी वह जनम दे चुकी थी. लेकिन अर्जुन का प्यार और उसके शरीर को अपने नीचे महसूस करती वह ये भी देख रही थी की सभी तकलीफ, पीड़ा और घुटन उनके शरीर से किसी ऊष्मा सी निकलती उन्हें एक नया जीवन दे रही हैं. अपने होंठो से अर्जुन के गले को चूमती वह उसकी इस मजबूत पकड़ में पिघल रही थी. सीने का कपडा इतना भीग गया था उनके बहते दूध से की जब नीचे को आती वह अर्जुन की छाती चूमने लगी तब होंठो पर दूध का स्वाद आया, उनके खुद के हे दूध का. चेहरे पर अनजाने में हे एक मुस्कराहट सी आ गई थी अपनी हालत देख के. यही हाल तोह नीचे हो रहा था. जाने कितनी देर से योनिरस भी रिसने लग रहा था उनका लेकिन वह तोह अपने बेटे के इस प्यार में वशीभूत थी.

"इन्हे खली नहीं करेगा?", अपने बाल उसकी छाती पर गिराए रेखा जी ने नजरे मिलते हुए अर्जुन से कहा तोह वह उनके चेहरे, जो थोड़ी से सीने पर टिका था को देखता रह गया. उनकी बात समझ नहीं आई क्योंकि वह तोह अभी तक उनके पानी से भरे थिरकते नितम्भो में हे दिल लगाए था.

"आपने कुछ कहा क्या?", मासूमियत से अर्जुन ने पुछा.

"दूध...", बस इतना हे बोलकर वह अपने चेहरे को वापिस सीने से लगाती लिपट गई. अर्जुन को भी समझ आ गई थी उनकी बात और वह भी मुस्कुराते हुए उन्हें ऐसे हे लिपटाये करवट के बल हो गया. अपनी माँ के चेहरे को तकिये पर रखता जैसे हे थोड़ा फिसलता सा नीचे हुआ तोह उनका ये मादक रूप देख होंठ सूख गए थे. उसको उनका ये कला वस्त्र भी उस पौराणिक स्त्री की याद दिला गया जो सीने पर सोने का कवच और बारीक जंजीरो से अपना सीना छुपाये रहती थी. हलकी उँगलियों से वह उस जाली को महसूस करता नीचे खींचने लगा जहाँ वह गहरा कला कपडा उस गुलाबी गोलाई को छुपाये था. 2 दिन से बस वह उसने वो दूध से भरे चूचक हे तोह देखे थी, किसी नवजात बचे की तरह. लेकिन आज उसके अंदर का पुरुष अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ स्त्री के यौवन को parat-dar-parat खोलता उजागर करने में लगा था. इतनी रौशनी में उसको उन सांचे में ढले स्टैनो पर पतीली गहरी घूमती लकीरे भी दिख रही थी. जो कही गायब होती तोह कही दिखती सी लगती. यहाँ वह उनकी सुंदरता देख कर हलकी बेसब्री दिखने लगा था, क्योंकि जाली की परत तोह वही रुक गेन थी और उनके अंदर का पूरा स्वर्ण कलश क़ैद था. हलकी तड़प से अर्जुन ने अपना हाथ उनकी पीठ पर ले जाते हुए खोलने की जगह टटोलने लगा लेकिन वह सपाट थी. जहाँ न कोई डोरी थी और कोई हक्क, बस उसका हाथ उस रेशमी कपडे पर फिंसल रहा था. उसकी बेचैनी पर मुस्करात रेखा ने सीने के बीच में लगी उस बारीक ज़िप को आधा नीचे सरकाया तोह अर्जुन को समझ आया के हर अंगवस्त्र पीछे से नहीं खुलता. आधे वक्ष तक तोह खुद उसकी माँ ने हे रास्ता दिखा दिए और अब आगे वह खुद उस बारीक से चैन को मुँह में पकड़ता नीचे ले आया.

कितना अजीब होता है इंसान का हर स्पर्श. यही होंठ जब दूध पीते थे तोह कभी शरीर के जज्बात ऐसे नहीं निकलते थे और आज हलकी साँसे वहीँ टकरा रही थी तोह पेट और कमर के नीचे सनसनी से मच रही थी. सीने के कपडे को किसी परदे की तरह हटते हुए अर्जुन ने वह बड़े गोल नारियल उजागर किये तोह उत्तेजना की अधिकता में सीधा वह ऊपर वाले सतांन के कड़े और फूले निप्पल पर मुँह लगा बैठा. आँखे बंद करते हुए अनुमान से हे अपने दूसरे हाथ से नीचे वाला उभर भी गिरफ्त में लेता वह मजे से एक सतांन का भरपूर हिस्सा मुँह में लेकर चूस रहा था. सिर्फ दूध पीने का उपक्रम होता तोह बात अलग थी लेकिन उसका मरदाना हाथ जिस तरह से हक़ से एक को दबोचे और दूसरे को होंठो में दबाते हुए पी रहा था, रेखा की कमर 30 सेकंड में हे अर्जुन के सीने की तरफ हो चली. ऐसा बहाव होने लगा था योनि में की जांघो पर भी नमी पहुँचने लगी थी.

"आठ.. उम्.." सा सिसकती वह अपने बेटे के इस कमाल को सेहन करने की कोशिश करती उसका सर जोर से अपने भारी दूध से भरे उरोज पर दबाने लगी थी. लेकिन वह जरा भी दबने की इत्छा में नहीं थे. ऐसी चुसाई से जैसे उनके अंदर हवा भरने लगी थी और वह सख्त हो रहे थे अर्जुन के होंठो की जकड में. दूसरे सतांन ने अर्जुन की पूरी हथेली गीली कर दी थी और अब वह पूरी तरह अपनी माँ को पीठ के बल करता उनके दूसरे सतांन से आ लगा. यहाँ भी वही उपक्रम करता वह किसी दसहरी आम को चूसने का पर्यटन कर रहा था. लेकिन ये खबरबूजे इतने बड़े थे की सिर्फ एक छोटा सा मांसल भाग हे उसके मुँह और हाथो में समां रहा था. वहीँ रेखा को अपनी ज़िन्दगी की सबसे प्यार भरी इस रात में असली सुख मिल रहा था जो उनकी मादक सिसकियाँ खुलकर बता रही थी. 5 मिनट के बाद जब इस सतांन में भी दूध का प्रवाह न के बराबर हो चला तोह दोनों उभारो की चोटियां मुट्ठी में दबाते हुए अर्जुन सरकता सा उनके स्टैनो की ढलान से नीचे सपाट रेशमी पेट पर आ रुका. कितना सुघड़ था उसकी माँ का जिस्म और हर तरफ ढलान और उठान अपनी चरम परकाष्टा पर हे थे. Gol-gehri नाभि पर नुकीली जीभ फिरता जैसे कोई अदृश्य रास चख रहा था.

"यही प्यार का सपना देखा था मैंने लेकिन भूल गई थी की जीवन में ये नसीब होगा विवाह के बाद. उम्म्म्म.. आठ... सससससस..", अपने जिस्म पर हो रहे तीन तरफ़ा प्यार का आनंद लेती रेखा ने अपनी मधुर आवाज में आ चुकी मादकता के साथ ये कहा और अर्जुन ने नजाकत से अपने दोनों पंजो में निप्पल समेत उनके भारी चुचो को गोल घूमते हुए अब उनकी जांघो के बीच स्थित yoni-sthal पर अपना मुँह रख दिए.

"oooiiiiiiiiiii.. नाहीई.. उम्मम्ममाआ.", पहले से ज्वालामुखी सी दहकती और अपना लावा बहती उनकी गरम योनि पर अर्जुन की साँसों और होंठो के स्पर्श को पाते हे कामोन्माद में रेखा ने बिस्टेर को नोच हे लिए था अपने हाथो से. ऐसी पकड़ किसी के जिस्म पर अगर वह करती तोह पक्का हे पाँव भर मांस जिस्म से अलग कर चुकी होती. उनके पति को मुखमैथुन पसंद था लेकिन एक तरफ़ा. वह तोह कभी रेखा के जिस्म को जगाना तोह दूर प्यार की 2 बोल कहे बिना हे बस मुँह की चुदाई करने के बाद अपना औज़ार अंदर घुसा देते थे. दर्द या मजे की सिसकारी में कोई भेद किये बिना वह बस सिर्फ रौंदना जानते थे और गलती से कभी उनकी योनि कॉमर्स छोड़ देती तोह शंकर जी अपना स्खलन उनके मुँह में हे करते थे. यहाँ तोह अर्जुन सिर्फ उनके हर अंग को भरपूर प्यार करता जैसे 25 सालो की उनकी कसक इस एक रात में पूरी करने में लगा था. एक बार भी उसने चेष्टा न की थी उन्हें वैसा हे प्यार खुद को देने की. जहाँ वह इस वक़्त इतना सोच रही थी उन्हें पता भी न चला के अर्जुन उनकी टांगो के बीच बैठा बड़े गौर से टकटकी लगाए कॉमर्स से साणे उनके योनि पटल को घूर रहा था. कब वह वस्त्र वह से गायब हुआ और कितनी देर से वह ऐसे बैठा उन्हें देख रहा था?

"आप अध्भुत है.", बस इतना बोलता वह फिर से उन चिकनी मांसल जांघो को दोनों हाथो से पकडे इस आधे गुलाब से खिले kati-pradesh को नजदीक से ध्यानपूर्वक देखता नीचे झुकने लगा. तकिये पर सर टिकाये ऐंठती रेखा आने वाले पल को सोचती जैस जड़ हो चुकी थी.

जांघो के ठीक बीच में और नीचे की तरफ गहराती उनकी योनि भी अपने आप में जैसे विलक्षण हे थी. हलके उभरे पेडू पर गर्भावस्था के कुछ हलके निशाँ जरूर थे लेकिन वह भी किसी सूरज की किरणों का आभास कराती नीचे इस दमकते sandhi-sthal से बहोत पहले विलुप्त हो चुके थे. बहार को निकली उन पत्तियों पर हलके से झीब स्पर्श करते उसने मैं में जिस हलके कसैले स्वाद का आह्वाहन किआ था ये उसके बिलकुल उलट स्वादरहित लेकिन हलकी मीठी महक का ऊर्जा से भरपूर तरल था. इतनी म्हणत और प्यार से पूरे जिस्म को जागृत करने के बाद निकलने वाला अमृत. अधिक लोभ में अर्जुन ने गहरी सांस भरते हुए उस उभरी दरार के बीच पूरा मुँह लगते हुए अपनी जीभ को गहराई में उतारते उन नरम दीवारों को खुरचना शुरू कर दिए था. प्रत्येक हरकत पर उनकी योनि जैसे पहले से अधिक रास बहा रही थी.

शरीर जब साथ छोड़ने लगा और रेखा को लगने लगा के अब उनकी सीत्कार घर में गूँज सकती है, उन्होंने तकिये को अपने मुँह में कास के दबा लिए. एक jal-strot सा जैसे पल भर के लिए फूट कर बंद हुआ तोह अर्जुन को भी इतने रास से ठसका सा लगा. लेकिन एक कटरा भी व्यर्थ किये बिना वह योनि को साफ़ करने के बाद अब फिर से अपनी माँ के चेहरा के तरफ आ गया था. फिर से हलके हाथो से उनके विशाल स्टैनो का मर्दन करते हुए वह अपना पूरा जिस्म अपनी माँ के साथ मिला रहा था. एक विशाल लंबवत गोल कठोर अंग रेखा को अपने पेट पर महसूस हुआ तोह समझते देर न लगी की अर्जुन भी पूरा निर्वस्त्र उनके ऊपर चाय हुआ है. शरीर में इस अंग की कल्पना करने भर से तेज झुरझुरी के साथ प्रतीक रोयं खड़ा हो गया था. इधर अर्जुन ने भी अपनी माँ के योनिरस से महकते होंठ उनके होंठो पर रखते हुए, एक हाथ नीचे ला कर अपने मॉटे सुपडे को गरम योनिमुख पर लगा दिए था.

ऐसे ये मात्रा दूसरा अंग था जिसने रेखा को यहाँ स्पर्श किआ था. लेकिन जो पहला अंग उन्होंने ने अपनी अब तक की ज़िन्दगी में लिए था वह प्रथम मिलान के समय से लेकर आज तक सिर्फ उनके शरीर को हे भेद सका था. लेकिन जैसे इस अंग ने छुआ था ये बिना अंदर जाए हे मैं और दिल की गहराई में बस गया था. एक बार अर्जुन ने होंठ अलग करते हुए उनके चेहरे को देखा जैसे वह अभी भी पूछ रहा हो के अगर आपकी मर्जी नहीं है तोह मैं यही से वापिस मदद सकता हु. लेकिन उन्होंने आँखें बंद करते अपना सर्वस्व उसको सौंप दिए था.

"उम्.." वह मोटा सूपड़ा अत्यधिक चिकनी इस योनि में अपना हक़ जताता पूरा अंदर जा कर रुक गया था. डेढ़ इंच से लम्बा और किसी बांस सा मोटा वह हिस्सा इस लचीली गुफा को फैलता रुका तोह जैसे एक संपर्क सा पूरा होने लगा था. हलकी दर्द और मादक सीत्कार निकलती रेखा खुद से अर्जुन के मुँह में जीभ दाल कर उसको प्रेरित करने लगी थी. अगले धक्के पर वह इस्पात सा सख्त और कलाई के जोड़ सा मोटा लुंड 6-साढ़े 6 इंच अंदर जा बैठा तोह एक हलकी दर्द की लहर रेखा के शरीर में उठने के बाद हे गायब हो गई थी. अपने होंठ अर्जुन से अलग करती वह उसकी गर्दन पर चुम्बन करती अपने बेटे की पीठ सेहला रही थी. यही वह हद्द थी जहा तक शायद उनके पति का लुंड पहोच सका था और इसके आगे का सफर वह अपने बेटे के प्यार के साथ करने वाली थी.

"आपको दर्द तोह नहीं हो रहा न?", अर्जुन ने हलकी चिंता से ये कहा. वह खुद भी जैसे उनकी योनि के अंदर किसी अनजान ताक़त से खींचा जा रहा था लेकिन थोड़ा संयम रखते उसको अपनी माँ की पीड़ा का भी ध्यान आया. लेकिन यहाँ तोह उनके चेहरे की दीप्ती (रौशनी) बता रही थी की वह एक असीम आनंद में जा चुकी थी. बस लरजते होंठो से कुछ कहती वह ना में सर हिला कर फिर से उसके सीने से लग गई.

कसाव के साथ हे उनकी छूट लिजलिजी नर्माहट से भरी थी. उनके कंधो को दोनों और से जकड़ते हुए अर्जुन ने अपने कूल्हे आगे की और झटकते हुए दोनों के अंग आपस में मिला दिए थे. लुंड की जड़ छूट के होंठो से जा मिली और बस पहली बार अर्जुन को कंधे पर उनके दांत गाड़ने से उनकी इस पीड़ा का अनुभव हुआ था. लेकिन बस खषन भर के लिए हे उनके दांत वह गड़े और हलकी दर्द की सिसकारी लेती वह शरीर को आराम देती खुद को ढालने लगी थी अपने बेटे के विशाल मूसल के लिए.

"आपने सेहन कर लिए?", अर्जुन ने उनकी पीठ के नीचे दोनों हाथ लेजाते खुद को इस आसान में सहज किआ और फिर अपनी माँ से सवाल किआ. उसका ये लुंड अभी तक सिर्फ कोमल दीदी हे सबसे बेहतर सेहन कर पाई थी, लेकिन उनकी आँखों से भी आंसू जरूर निकल गए थे. यहाँ वह जड़ तक ये मूसल अपनी ताप्ती माँ के अंदर डालने के बाद कुछ हैरान था.

"ये मेरे हे शरीर से बना है न? इसमें दर्द कैसे हो सकता है? बस एक अवरोध भर था लेकिन अब तोह वह भी नहीं रहा.", गाल के सहलाते हुए बड़ी मोहक मुस्कान से अर्जुन को रेखा ने प्यार से दोनों के बीच की असलियत बताई तोह फिर उसने भी अपने डर को दरकिनार करते हुए उनके होंठो को चुभलाते हुए लुंड को हलके से चलते हुए इस संगम को आगे बढ़ाना शुरू किआ. 2-3 मिनट में हे रेखा का शरीर अर्जुन की ताल पर थिरक रहा था.

"उम्म्म्म.. मेरा ये शरीर .. ससस.. आठ.. सिर्फ तेरा नाम पुकार रहा है.. उम्म्म्म.. इसको ऐसे हे अपने प्यार से तृप्त करता रह अर्जुन.. मैं इस पल में सिर्फ ये प्रेम महसूस करना चाहती हु.. उम्म्म्म. ", होंठो को दबती खोलती और सिसकती रेखा खुद हे अपने पाँव मोड़ने लगी तोह अर्जुन ने भी जांघो को सहारा देते हुए थोड़ा ऊपर उचका दिए. उसका लुंड इस कासी लेकिन मादकता से लबरेज छूट की गहराई में निरंतर aa-ja रहा था. ये दृश्य इतना विहंगम था के जैसे हर अंग खुसी व्यक्त करने में लगा हो. दूध की बुँदे अपने आप हे उन बड़े कलश से छलकती रिसने लग रही थी. बंद पलकों से मोती से झरते आंसू सिर्फ असीम आनंद की प्राप्ति बता रहे थे और उनकी छूट का संकुचन इस लुंड को बता रहा था के वर्षो से जैसे ये उसका इन्तजार कर रही थी. दोनों के बदन पर पसीने के सूक्षम बूंदे उभर रही थी लेकिन न रेखा अपने चरम को पाने के बाद रुक रही थी और न हे अर्जुन की ताक़त ख़तम हो रही थी. कामराज्ज से बिस्टेर की चद्दर पर एक धब्बा जरूर गहरा होने लगा था.

"माँ, मुझे भी ऐसा लग रहा है जैसे हम दोनों हे किसी अलग दुनिया में हो. आठ.. आपका शरीर जैसे मुझे अंदर खींच रहा है.", अर्जुन का लुंड आजतक इतना नहीं फूला था जितना इस समय था. बहार निकलते और अंदर जाते हिस्से पर मोटी नीली नस्से बहार निकलने को हो रही थी. यहाँ कोई आसान नहीं बदला गया था और न जरुरत महसूस हो रही थी. वह हटना हे नहीं चाह रहे हो जैसे लेकिन हर सफर का एक अंजाम जरूर होता है. जैसे हे अर्जुन ने उनके दूध टपकते सतांन को मुँह में भरते हुए खींचा, इधर रेखा की छूट ने जैसे कोनसी गिरफ्त में उसका फूला हुआ सूपड़ा जकड़ते हुए शरीर को सुन्न कर दिए था. एक छोटी सी तेज फुआर सुपडे पर बच्चेदानी की और से आती पड़ी तोह पूरा जोर लगाने के बावजूद लुंड रत्ती भर न हिला वह से. एक मिनट से ज्यादा देर तक उसका अंदर फंसा लुंड अबतक का सबसे बड़ा वीर्यपात करता उनकी अनंत गहराई को भरने में लगा रहा. रेखा जैसे मुरचित्त सी होकर तकिये पर सर गिराए पड़ी थी और वैसे हे अर्जुन उनके ऊपर. कोई 5 मिनट के बाद लुंड अपने आप हे सिकुड़ता सा बहार को फँसल आया लेकिन दोनों उस अवस्था में तक़रीबन 15 मिनट तक पड़े रहे.

रेखा की चेतना वापिस आई तोह ध्यान से अर्जुन को एक तरफ सरकती वह कपडे समेत कर वह से नंगी हे कमरे के अंदर बने स्टोर में चली गई. वीर्य इतना ज्यादा निकला था की खड़े होने के बाद वह तेजी से नीचे बेहटा घुटने तक एक धार बना गया था. एक झीना सफ़ेद गाउन पहन कर बिस्टेर कर ठीक करने लगी तोह जमीन पर अर्जुन का पजामा और अपना अंगवस्त्र देख शर्माती से वह उन्हें उठा कर टेबल पर रख दी. एक धब्बा, तक़रीबन 5-6 इंच के दायरे में उन दोनों के मिलान की दास्तान सुना रहा था. रेखा का रूप इस एक मिलान से हे चन्द्रमा सा प्रकाशित हो गया था, अमावस की रात को. साफ़ चद्दर दोनों के ऊपर करती वह फिर से अपने इस मुन्ने के मुँह में अपना सतांन दे कर बाहों में लिए आँखें बंद कर लेट गई. कोई साढ़े 11 बजे शुरू हुआ उनका divya-milan 2 घंटे पार कर गया था और रात के सवा 2 बजा रही घडी भी जैसे जलन से अपने तीनो कांटे एक साथ खुद पर रखे अपने आप को सांत्वना दे रही थी.

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"माँ, आप उठिये मैं चाय बनाने जा रही हु.", कोमल ने दरवाजा सिर्फ खटखटे हुए इतना कहा था. उसने खोलने की कोई चेस्टा नहीं की थी. उसकी माँ हर रोज 5 बजे तक नाहा लेती थी लेकिन आज साढ़े 5 बजे तक उनके कमरे का दरवाजा बंद था.

"कोमल, बीटा मैं बस 5 मिनट में आई. तू चूल्हे पर पानी रख.", रेखा जी ने एक नजर घडी पर घुमाई तोह बस मुस्कुरा दी. 5:30. पूरा शरीर रोमांच से भरा था और अभी तक अर्जुन की गंध से जिस्म का हर कोना महक रहा था. अर्जुन के मुँह से अपना गीला निप्पल निकल कर उन्होंने सामने से गाउन को बंद किआ और हलके से उसको हिलती उठने का बोलकर अपने साफ़ कपडे लिए बाथरूम में चली गई. चाल में लड़खड़ाहट तोह हलकी सी उनके भी थी लेकिन शरीर ाचे से दर्द को जज्ब कर गया था. आज उन्हें अपने ऊपर गिरता ये पानी भी ऐसा एहसास करा रहा था जैसे ये भी अर्जुन की चाप मिटने में नाकाम हे है. मुस्कुराती सी वह अपने जिस्म को साफ़ करती फिर से उत्तेजित होने लगी लेकिन अगले हे क्षण सब दरकिनार करती वही घर की संस्कारी बहु के रूप में बहार निकल आई. अर्जुन अब अंदर कमरे में नहीं था और बिस्टेर की चादर भी बदली जा चुकी थी.

"तेरा भाई कहा गया?", वह 20 मिनट बाथरूम में लगा कर आई थी और ज्यादा से ज्यादा उन्हें अनुमान था के बीटा उठ कर बिस्टेर पर हे उनका इन्तजार करता मिलेगा.

"माँ वह तोह आपके बाथरूम जाने के बाद हे बहार वाले आँगन से तैयार हो कर सैर पर निकल गया. वैसे आप आज कुछ अलग लग रही है. कुछ लगाया है आपने चेहरे पर.?", रेखा जी बातें करती चूल्हे तक आई तोह कोमल की बात सुनकर बस शर्मीली सी मुस्कान देती चाय का बर्तन हिलने लगी.

"सुबह सुबह कोई और नहीं मिला तुझे? हर समय बस मुझे बनती रहती है.", उन्हें भी पता था के इंसान अंदर से खुश हो तोह वह अलग हे दमकता है और उनको तोह ये ख़ुशी बस कुछ घंटे पहले हे मिली थी, ज़िन्दगी में पहली बार.

"सच कह रही हु माँ. और पहली बार आप आज अपने समय से देरी से उठी है. लेकिन मुझे ाचा लगा देख कर की आपको भी ाची नींद की जरुरत महसूस तोह हुई.", साफ़ चाय के कप को एक बार फिर से पानी से निकलती कोमल उन्हें सूखे कपडे से साफ़ करने लगी. फिर माधुरी दीदी के कमरे में जा कर आरती और प्रियंका को उठाने के बाद वापिस अपनी माँ के पास आ कड़ी हुई.

"रात दादी का फ़ोन आया था, 8 बजे. वह कह रही थी की वो लोग 9 बजे तक पहुंच जायेंगे.", कोमल की बात पर रेखा जी ने अपनी बेटी की तरफ हल्का सा देखा और फिर चाय को कप में chaan-ne लगी.

"और क्या कहा उन्होंने? तेरे पापा भी आ रहे है?", रेखा जी ने अपने मतलब की बात पूछी.

"नहीं, उन्होंने अलका को बताया के ताऊजी उन्हें लेकर आएंगे यहाँ और छोल अंकल पापा के साथ कही जरुरी जाने वाले है तोह वह से अपनी ड्यूटी पर जाएंगे और अंकल को शाम तक वापिस भेज देंगे.", रेखा जी बहार से तोह बस सब सुन रही थी लेकिन अंदर से अब उन्हें थोड़ा चैन मिला था यह जानकार की उनके पति नहीं आ रहे.

"ाचा, चाय पीने के बाद एक काम करना. अलका को बुला लाना और तारा भी उठ जाये तोह उसको भी. नहीं तोह प्रीती अपने आप उसको घंटे बाद उठा देगी, कंपनी जाने के लिए.", रेखा जी ने पूर्ववत हे कहा. इधर उनके अंदर भी कुछ चल रहा था जो वह ख़ामोशी से दबाये थी.

"एक बात और कही थी, हाँ. अर्जुन को याद दिलाना है के वह आज लाइब्रेरी न जाए.", इतना बोलकर चाय की ट्रे और बिस्कुट टेबल पर प्रियंका और आरती के सामने रखती वो भी एक कुर्सी माँ के लिए छोड़ती बैठ गई. प्रियंका और आरती ने आते हे अपनी चची को गुडमॉर्निंग कहा और उन्होंने दोनों के सर पर प्यार देने के बाद साथ बैठ ते हुए चाय का कप उठा लिए.

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"क्या किसी इंसान का शरीर कभी दूसरे इंसान के पास होने पर ऐसा महसूस कर सकता है जैसे वह इस दुनिया से बहार जा चूका है? और वह thakaan-dard से बिलकुल परे पहुंच गया हो? ी मैं तो से तहत कैन वे हुमंस फील समथिंग एक्स्ट्राऑर्डिनरी लिखे सेलेस्टियल और हीवेनली जस्ट विथ प्रजेंस ऑफ़ समवन स्पेशल?", अर्जुन घास पर आचार्य जी के साथ चलता हुआ ये सवाल कर बैठ.

"व्हाट यू फील इस ा फीलिंग एंड तेरे इस no प्रिज्म तो मैसूर डेप्थ ऑफ़ अन्य फीलिंग वे हुमंस कैन अचीव. बूत थिस फीलिंग doesn't के थिस ैसिलय सोन. यू नीड तहत ओने ह्यूमन, ओनली ओने तहत कैन रेज यू तो योर मैक्सिमम और. एंड आईटी इस बेलिएवेद तहत सुच पैरिंग इस नेअर्ल्य इम्पॉसिबल. बूत थें तेरे इस ऑलवेज समथिंग वे हैवे एंड वे लाइव विथ तहत, होप.", आचार्य प्रमोद शास्त्री जी ने मुस्कराहट के साथ अर्जुन को बता तोह दिए के ऐसी अनुभूति लगभग असंभव है क्योंकि उनके अनुसार वह व्यक्ति जो तुम्हे तुम्हारी ऊर्जा की अधिकतम सीमा का अनुभव करवा दे उसका मिलना नामुमकिन सा हे है. लेकिन हम इंसान करम के साथ हे एक और चीज अपने दिल में रखते है, आशा. वह है तोह फिर मुमकिन भी है.

लेकिन उन्हें क्या पता था के जो प्रश्न कर रहा है वह एक दिव्या प्रेम की अनुभूति लेकर हे उनके पास आया था.
 
आज अपडेट आएगा भाई. कल सिर्फ 4 घंटे लिखने को मिले थे. एंड लैपटॉप पर टाइपिंग थोड़ा टाइम लेती है. अपडेट आज शाम को दूंगा
 
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