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यह शाम मस्तानी (2)
"कुछ कह रही थी तुम आते समय", प्रीती की कमर में दोनों बाहे डाले अर्जुन ने अपना चेहरा उसके पास करते कहा तोह उसका चेहरा लाल होने लगा.
"हम सड़क पर है. कभी जगह देख कर बात कर लिए करो." प्रीती की लरजती आवाज सुनकर अर्जुन ने चेहरा तोह पीछे कर लिए लेकिन अपनी उँगलियों को उसके पेट पर चलता रहा. खेलने के बाद आने वाला पसीना भी अर्जुन को किसी बेशकीमती महक सा लग रहा था.
"हर समय तुम्हारा ये जिस्म महकता हे रहता है क्या?" एक बार गर्दन पर नाक फिरते अर्जुन ने कहा तोह प्रीती का जैसे स्कूटरी पर से नियंत्रण हे खोने लगा था.
"प्लीज काम से काम ये चौक तोह पार कर लेने दे. गिर जायेंगे फिर लेते रहना महक." प्रीती की बात पर वह हलके से हंसने लगा लेकिन हरकत कोई नहीं की. ऐसे हे वो अपनी उस खाली सड़क पर आ गए तोह अर्जुन ने दोनों हाथ ऊपर वाली उंगलिया टीशर्ट के अंदर से प्रीती के पेट पर चलनी शुरू कर दी. प्रीती ने ब्रेक लगाए और अर्जुन की तरफ देखा. जैसे पूछ रही हो के क्या कर रहे हो.
"ये जो पतली सड़क देख रही हो पार्क के पीछे जाती, इस तरफ घुमा लो. ये हमारे सेक्टर के पास हे निकलेगी." ऐसे हे हाथ रखे अर्जुन ने उसको ये नया रास्ता दिखाया जो शायद प्रीती ने पहले नहीं देखा था. उसकी बात मानती प्रीती स्कूटरी को उस सड़क की तरफ घुमा कर चल दी. वैसे तोह जिस रास्ते से ये दोनों जाते थे ये भी खाली हे रहता था लेकिन पार्क की वजह से पैदल कुछ लोग दिख जाते थे. और सड़क भी ज्यादा चौड़ी थी तोह कुछ कहा नहीं जा सकता था के कोण किस समय वह से निकल जाए उन्हें देखता. लेकिन अब ये दोनों जिस तरफ आये थे ये एक 8-10 फ़ीट चौड़ी पुराणी सड़क थी जो पहले काम में ली जाती थी. पार्क के पिछली तरफ दिवार सी बनाये घने वृक्ष यहाँ भी दिवार हे थे एक तरह से. और दूसरी तरफ यूनिवर्सिटी की 15 फ़ीट ऊँची दिवार. जैसे हे वो कुछ आगे आये तोह अर्जुन ने अपने दोनों हाथ प्रीती के पेट पर रख लिए और पीछे से उसका गाला चूम लिए. वही पर ब्रेक लग गए स्कूटरी के.
"बाज नहीं आओगे न.?" प्रीती ने दोनों पाँव जमीन पर रखे थे की अर्जुन ने साइड वाला स्टैंड लगा कर उसको वापिस बिठा लिए.
"अब तुम बताओ के यहाँ तुम्हे कोई परिंदा भी देख रहा है? और फिर हम दोनों ऐसा क्या कर रहे? रोज ऐसे हे दूर दूर से तुम्हे देख कर मेरा दिल करता है सबके सामने तुम्हारा हाथ पकड़ के बोल दू के अभी शादी करवा दो पढ़ाई बाद में कर lunga."Arjun की इस बात पर प्रीती पलट कर दोनों पाँव एक तरफ रखती बैठ गई. वो अब मुस्कुरा कर अर्जुन की बेताबी देख रही थी.
"अब काम से काम हम मिलते तोह है. तुम्हे तोह 10 साल मेरी याद भी नहीं आई लेकिन मई कितना तदपि हु तुम्हे नहीं पता." प्रीती ने बेशक बात मजाक में कही थी लेकिन अर्जुन ने जमीन पर खड़े होते उसके दोनों गाल अपने हाथो में लेते हुए होंठ उसके होंठो से मिला दिए. कोई वासना वाला चुम्बन नहीं था बस प्यार से उसके होंठो को चूमकर वो उसको देखने लगा.
"तब कुछ भी बस में नहीं था. लेकिन काम से काम आज हम पास में है प्रीती. और मई चाहता हु के इस बार अगर कुछ देर के लिए भी दूर गए तोह इतनी यादें तुम्हारी मेरे दिल में हो की मुझे दिन काटने न पड़े. वापिस आने पर ऐसा न लगे के हम दूर थे." अर्जुन ऐसे इतने अपनेपन से किसी से बात नहीं करता था. ऋतू दीदी या अलका दीदी के साथ भी नहीं. शायद बड़े होने की इज्जत और एक दूसरा रिश्ता भी होना. लेकिन यहाँ सिर्फ प्यार हे था दोनों में. प्रीती भी उठकर उसके गले लग गई.
"तुम मेरे हो और हमेशा तुम हे मेरे रहोगे. मुझे भी अंदेशा है के कुछ समय के लिए तुम दूर जा सकते हो लेकिन इन अगले 2 साल में तुम मेरे पास हो और मई इन 2 सालो में सिर्फ प्यार हे करना चाहती हु तुम्हारे साथ." इस बार उसके होंठ किसी तड़पती प्रेमिका की तरह हे अर्जुन के होंठो से जुड़ गए थे. पंजो के भर कड़ी वो बस जैसे उसके होंठो को चबा हे जाने वाली थी. अर्जुन के हाथ प्रीती की कमर और कूल्हों पर उसको थामे हुए थे. कोई 2 मिनट बाद दोनों अलग हुए तोह प्रीती उसके सीने से लगी कड़ी थी और अर्जुन की बाहें भी उसको अपने से लगाए थी. मस्ती भरी वह छेड़छाड़ इतना गंभीर प्यार हो सकती है शायद हे कोई और सोच सकता था.
"अब चले घर या रात यही बितानी है? बुआ को मार्किट भी लेके जाना है." अर्जुन की बात सुनकर प्रीती बेदिल्ली से अलग हुई तोह अर्जुन उसके मासूम चेहरे को हे देख रहा था. शाम ढलने लगी थी लेकिन प्रीती का चेहरा जैसे अब रोशन हुआ था. आकाश में छाए हलके बादल भी शायद इस चमक को धुंदला न कर सके थे.
"तुम बड़े गंदे हो. सच में बहुत ज्यादा. कभी मेरे लिए टाइम नहीं होता." प्रीती रूठने सी लगी तोह अर्जुन ने एक हाथ उसके कूल्हों पर रखते दूसरा सीने के उभार पर रख अपने पास कर लिए. प्रीती अर्जुन की ये मस्ती देख रही थी और उसको ये पसंद भी था के अर्जुन कैसे उसका मूड बदल देता था.
"गन्दी हरकत करने से पहले गन्दा कह दिए तोह चलो फिर अभी कर लेता हु." फिर बस एक बार उसके होंठो को चूमकर स्कूटरी पर आगे बैठ गया. प्रीती मुस्कुराती सी पीछे. उसको पता था के ये हे अर्जुन की सीमा थी उसके साथ बेशक वो खुद जो चाहे करवा सकती थी लेकिन अर्जुन ने इस से आगे कभी खुद को नहीं किआ था. पीछे से उसको जकड़ती वो उसके कान में बोली, "ी लव यू सोऊ मच. पता है मेरा प्लान था एक बिग नाईट का. सिर्फ तुम और मई और सॉरी वो मेरी हे वजह से खराब हो गया."
"तुम हमेशा के लिए मेरी हो तोह हमारी तोह हर रात वैसे हे होगी. हाँ लेकिन तुम अगर चाहती हो ऐसा कुछ तोह हम दोनों एक रात हमारी छत्त पर भी सो सकते है." अर्जुन उसके दिल की बात समझता हुआ बोलै
"सोने के लिए नहीं कह रही मई."
"जानता हु. मई चाहता हु के तुम पूरी रात मेरी बाजू पर सर रखे मुझ से बातें करो, खुले आसमान के नीचे. सुबह तक मई तुम्हे बाहों में भर के अपने सीने से लगाए लेता राहु. और हमारी आने वाली ज़िन्दगी में ऐसी हजारों रातें हो." एक दार्शनिक प्रेमी की तरह अपने विचार बताता वो घर तक आ गया था.
"और फिर.?" प्रीती भी उसकी बातों में हे खोई थी..
"तब तक शायद हमारी दोनों की बाजू पर 2 बच्चे सर टिकाये होंगे." प्रीती के घर के बहार स्कूटरी रोकता वो बोलै तोह प्रीती शर्माती सी उसकी कमर पर चूंटी काट अंदर भाग गई.
"ोये ये तेरी स्कूटरी है." अर्जुन ने बहार से आवाज लगाई लेकिन वो अंदर भाग गई थी. खुद हे स्कूटरी अंदर कर पारवती को चाबी देता 10 मिनट में आने का बोल कर वो अपने घर आ गया. जल्दी से नाहा कर उसने सिर्फ ऋतू दीदी को बताया के वो कहा जा रहा है. तारा की नजरे बस उसको हे देख रही थी लेकिन अब उनमे दर्द नहीं था. अर्जुन एक जीन्स और शर्ट पहन कर स्कूटर निकाल प्रीती के घर आ गया.
"बुआ चलो अब." ड्राइंग रूम से वह चिल्लाता सो बोलै तोह प्रीती बहार आई.
"ओह जनाब शांत. आ रही है बुआ तैयार हो कर बस 2 मिनट में." इतना बोलकर वह रसोईघर में खुद चली गई. कोई 5 मिनट बाद रेणुका बुआ एक हलके पीले कॉटन के सूट में बहार आई जिसके नीचे पजामी चूड़ीदार सफ़ेद थी. कद उनका भी ाचा था तोह कोई उन्हें देख कर ये नहीं कह सकता था के वह 37-38 साल की महिला होंगी. चेहरे की चमक और शरीर को देख कर 24-25 से एक महीना ऊपर न दिखती थी वह. अर्जुन झिझकते हुए अपनी नजर हटा ली तोह रेणुका बुआ ने एक काला क्लिप बालो में फंसते हुए प्रीती को जाने का बताया.
"बुआ इसको दूध ख़तम करने दो फिर आप लोग चले जाना." रसोईघर से वह एक गिलास दूध जिसमे बादाम काट कर डाले थे वो अर्जुन को देती बोली. अर्जुन प्रीती की इस देखभाल से खुश होता मुस्कुरा दिए वही बुआ भी दोनों को ाचे से देख रही थी. जल्दी से दूध ख़तम किआ तोह प्रीती ने एक साफ़ टोलिया आगे कर दिए जैसे अपने पति की खिदमत कर रही हो. मुँह पौंछने के बाद अर्जुन धन्यवाद् करता बुआ के साथ बहार निकल आया तोह प्रीती भी उनके घर की तरफ चल दी.
"तोह फिर यहाँ घर आने के बाद कैसा लग रहा है अर्जुन?" रेणुका अब स्कूटर पर ठीक तरह से बैठी थी और दोनों अपनी गली से बहार मुख्या सड़क पर आ गए थे. सड़क के किनारे की बत्तियां धीमी रौशनी में जगनि शुरू हो चुकी थी.
"सच कहु तोह अब पता चल रहा है के परिवार क्या होता है और यहाँ कितना प्यार मिल रहा है. हॉस्टल में तोह जैसे ज़िन्दगी का एक हे मकसद था और न कोई दोस्त वह थे और न परिवार." अर्जुन एक बार याद करता सा बोलै. रेणुका ने सफ़ेद सूती दुपट्टा गले में लिए हुआ था जो हवा से हिलता हुआ जा रहा था. इस तरफ भीड़ ज्यादा नहीं थी लेकिन आगे होने वाली थी.
"प्यार हे तोह जीवन को जीने लायक बनता है. और अगर ज़िन्दगी में ये न हो तोह फिर हर चीज बेबुनियाद या अधूरी लगती है." उनकी बात जाने कैसे जुबान पर आ गई.
"सही कह रही है आप. अपने जो होते है वह आपके हर सुख और दुःख में साथ खड़े हिम्मत देते है. और मैंने मेरे दादा जी से यही सीखा है की ज़िन्दगी जैसी भी हो बस खुश रहकर अपने लोगो में होनी चाहिए. इस से कभी ऐसा नहीं लगेगा के ज़िन्दगी का कोई अर्थ हे नहीं है या कोई मकसद." रेणुका जो अभी तक अर्जुन को एक बचा समझ रही थी और दिन में अपने पापा की बात भी शायद मान नहीं पाई थी वो उसकी इतनी स्पष्ट और गहरी बात सुनकर हैरान थी.
"तुम पहले तोह ऐसे नहीं थे. जहा तक मैंने तुम्हे देखा है तुम एक ज़िद्दी और गुस्सैल बचे थे. लेकिन अभी देख रही हु तोह लगता है के ये एक नया अर्जुन है." अपनी हैरत संभल न पाई तोह एक बड़ा सवाल कर बैठी थी रेणुका बुआ. अर्जुन उनकी बात से एक पल के लिए चुप हुआ लेकिन फिर सड़क पर ध्यान देते हुए बोलने लगा.
"बुआ जिसको जनम से हे इतना प्यार मिला हो के उसकी ज़िद्द भी ाची लगे. और फिर वही इंसान एक ऐसे सफर पर और छोटी उम्र में 9 साल तक अकेला रहे, उसको तोह प्यार की एक बूँद का भी एहसास किसी बारिश सा लगेगा. माँ के साथ सोने के समय अकेले घर से दूर रात काटना. राखी पर उन बहनो के प्यार से दूर रहना जो जान वार्ति हो, बुखार आने पर किसी अपने का हाथ सर पे न महसूस कर पाना.. ये सब या तोह इंसान को टॉड देता है या फिर एक आत्मा को सब सहने की शक्ति. घर पर आने के बाद आपको क्या लगता है मई सबसे एक पल में जुड़ गया था.? नहीं.. पूरा एक साल लगा अपने घर के सभी सदस्यों को अपनाने में, jaan-ne में. डर भी लगता था के कही ये प्यार फिर चला न जाये. लेकिन फिर एक भले इंसान की बात याद आ गई. ये प्यार जितना मिले, जहाँ से मिले समेत लो. बदले में तुम भी उतना या उस से ज्यादा दो. जब अकेले पड़ जाओगे तो वह प्यार और उसकी यादें जीने में मदद करेंगी." उसकी ये बात सुनकर रेणुका का हाथ उसके कंधे पर आ गया था. वो किसी गहरी सोच में डूब चुकी थी. 10 मिनट इस शान्ति के बाद दोनों पुल्ल पार करके अब बड़ी मार्किट में आ गए थे. आअज अर्जुन ने स्कूटर बहार वाली पार्किंग में नहीं लगाया था.
"पहले कहा चलना बताये आप?" अर्जुन की बात से रेणुका जी संभालती सी लगी. फिर सब तरफ इतनी रौशनी और bheed-bhad देख कर बोली, "वो प्रीती का लेहंगा कहा से लिए था? उसने मुझे बताया के वह ाची सारी भी मिलती है." उनकी बात सुनकर अर्जुन मुस्कुराता सो स्कूटर भीड़ से निकलता वही बड़ी दूकान की और चल दिए. 2-3 मिनट में वह यहाँ आ पहुंचे थे.
"आइये आप." उनके लिए खुद गेट खोलता वो खड़ा हुआ तोह मुस्कुराती हुई रेणुका जी अंदर चली आई. यहाँ पर तोह हर तरफ shaadi-byaah या बड़े त्योहारों के लिए एक से एक कपडे थे. काउंटर पर खड़ा नौजवान अर्जुन को पहचान गया था और वह से निकल कर उसकी तरफ चला आया.
"आओ भाई. आज बताओ क्या चीज पसंद करनी है?" ये दूकान के मालिक का हे बीटा था जो बड़े प्यार से अर्जुन से मुखातिब हुआ. अर्जुन ने भी प्यार से हाथ मिलाय और आने की वजह बताई.
"मोनू 2 गिलास जूस लेके आ. मीणा, यहाँ मैडम को सिल्क और शिफॉन में पार्टी वियर साड़ी दिखाऊ." उसने वही से आवाज लगा कर बोलो तोह दोनों हुकुम की तामील हुई. अर्जुन और रेणुका जी को सोफे पर बैठा कर उनके सामने पड़े कांच के टेबल पर 10-12 बेहतरीन कारीगरी की साड़ी सजा दी थी. रेणुका जी भी अर्जुन का दुकान पर ऐसे स्वागत देख थोड़ा हैरान थी. उन्हें क्या पता था की उनकी भतीजी को यही लड़का अर्जुन की होने वाली बीवी समझ चूका था और दोनों ने ाची खरीदी करि थी यहाँ.
"आपने शादी में pehan-ni है तोह बस ये ध्यान रखिये के रंग भी थोड़ा सुर्ख हो. रंग भी ाचा है तोह लाल से लेकर काले तक सभी आप पर जांचेंगे." मीणा नाम की इस लड़की ने एक काली और एक रेशमी लाल साडी खोल कर दिखते हुए कहा. बात भी सही थी की रेणुका का शरीर एक तोह बड़ा सांचे में ढला हुआ था और ऊपर से गोरा गुलाबी रंग. इधर अर्जुन की नजरे भी एक तरफ जमी हुई थी लेकिन वो कुछ नहीं बोलै. रेणुका जी ने कोई 5-6 साडी अपने हाथ पर रख कर देखि. थी तोह सभी सुन्दर लेकिन उन्हें कोई जाँच नहीं रही थी.
"तुम क्या कहते ho?"Unhone अर्जुन की राये लेने के मकसद से पुछा. उनके हाथ में वही एक काली सारी थी जिस पर कांचा ुर छोटे मोतियों का काम हो रखा था.
अर्जुन बिना कुछ कहे वह से उठकर एक लड़की की प्लास्टिक की मूरत के पास गया और दूकान वाली तरफ देखता बोलै, "भाई इसके साथ का जो हलके और ऐसी हे कारीगरी वाले रंग हो वो दिखाना जरा." मूरत पर लाल साड़ी पर सुनहरी किनारी थी. काम भी गजब का किआ हुआ था. मीणा नाम की वह लड़की बस अर्जुन की बात हे सुनकर चुप्प हो गई थी. इतनी देर में एक लड़का जो वही काम करता था 3 साड़ी लेकर आ गया. साफ़ समंदर के रंग सी हरी जिसपर बीच बीच में बिलकुल हलके आसमानी रंग की परछाई आ रही थी, एक बिलकुल हलकी गुलाबी जैसे बस ढेर सारे दूध में एक बूँद लाल रंग मिलाने से जो गुलाबीपन आता है. इस साड़ी में सफ़ेद रंगी की परछाई थी. तीसरी थी जो मूरत पर पहनाई गई थी. तीनो हे साड़ी के किनारे बेहद उम्दा तरके से सजे थे लेकिन tadak-bhadak की जगह शालीन और आकर्षक थी वह.
"आपके बाल चमकदार काले है और वैसी हे आँखें, तोह आपको इनका ख्याल करते हुए भी कभी रंग लेने चाहिए. गोरी त्वचा के साथ अगर हर सुर्ख रंग ाचा लगता है तोह इनके साथ ये आँखों को ठंडक देते रंग कही ज्यादा जांचेंगे. फिर तोह आप शिरंगार करे या सादगी से 12 बारीक इनके साथ की चूड़ियां पहन ले वही बहोत रहेगा." अर्जुन ने वो बिलकुल हलकी हरी साड़ी एक काले डब्बे के ऊपर रखते हुए दिखाई तोह रेणुका जी और वो लड़की बस अपनी नजरे वही लगा कर उसके तरीके को देखने लगे और दूकान के मालिक का बीटा बस मुस्कुरा रहा था.
"अगर आपको कुछ कमी लगती है तोह फिर ये देखिये हलकी गुलाबी, इंग्लिश में बेबी पिंक या रोज पिंक. साथ में लाल सुनहरी कंगन, मांग में सिंदूर और लाल या मेहरून हैंडबैग. क्यों शरीर पर इतना बोझ लादना जो जरुरत से ज्यादा लगे." उसकी आवाज अब इतनी धीमी थी की सिर्फ रेणुका जी को ाचे से समझ आ रही थी. सामने वाले तक शायद कुछ हे शब्द पहुंच रहे थे.
"ये दोनों हे पैक करवा दीजिये." रेणुका बुआ ने दूसरी बात नहीं करि.
"मम इसके साथ का ब्लाउज हम 3 दिन बाद दे पाएंगे." मीणा ने वो दोनों साड़ी संभाल कर उठाते हुए इतना हे कहा था के अर्जुन ने अपने इस बेनाम दोस्त की तरफ देखा.
"नहीं नहीं. आप बस माप दे दीजिये. ब्लाउज का क्या है हम कल शाम को हे तैयार कर देंगे बिलकुल आपके मुताबिक डिज़ाइन के." वो लड़का खुद चलता हुआ पास आ गया. रेणुका जी ने भी इन दोनों की नजरो में हुई बात समझ ली थी.
"मम आप मेरे साथ आइये." मीणा बेचारी तोह चुपचाप सी रेणुका जी को लेकर पिछले कमरे की तरफ चल दी जहा पर मास्टरनी जी बैठी थी.
"तुम नहीं चलोगे साथ?" रेणुका ने ये बात कही तोह अर्जुन बस मुस्कुरा दिए.
"मुस्कुरा क्या रहे हो. साड़ी पसंद कर दी तोह अब डिज़ाइन भी बता दो." उनकी बात पर वो सर झुकाये उनके पीछे चल दिए. और दूकान वाला लड़का उन्हें देख मंद मंद मुस्कुराने लगा था. "ये अकेला बाँदा शोरूम में आने वाली हर लड़की को साड़ी सूट बेच सकता है." खुद से ये बात कहता वह साड़ी पैक करवाने लगा था.
"ये पीछे से बैकलेस, ये वाला थीं स्ट्रिप राउंड बैक या फिर ये वाला बाजु के किनारे पर्ल वर्क और पीछे तन्निव वाला?" जो 3 डिज़ाइन का चुनाव रेणुका जी ने किआ था अर्जुन को भी वो पसंद आये फिर भी कुछ सोचने के बाद वो बोलै.
"साड़ी अगर घर पर किसी उत्सव में या खास समय पहन नई होती तोह पहले दोनों ठीक रहते, खासकर बैकलेस. लेकिन शादी है और वो भी लड़के की तोह भीड़, naach-gana और ज्यादा चलना फिरना होगा. हर तरह के लोग भी होंगे, इसलिए ये आखिरी वाला ठीक रहेगा. और आंटी जी क्या इस डिज़ाइन में यहाँ गले के कटाव पर भी ये मोतियों का काम हो सकता है?" जैसे उसने हे घोषित कर दिए हो के कोनसा ब्लाउज चलेगा. उन आंटी जी ने भी सर हिला दिए.
"बीटा वो जैसा कपडा बाजू पर लगेगा बस वही कपडा यहाँ बारीक तरीके से लग जायेगा. मोती का काम उसके ऊपर हे है. बस गाला कितना नीचे रखना है ये बता दो."
उनकी आखिरी बात पर दोनों के कान लाल हो गए.
"अब आप करवा लीजिये, मई बहार चलता हु." इतना बोलकर वो बहार आ कर उस लड़के से बात करने लगा.
"भाई मेरा नाम सुधीर है लेकिन दोस्त सोनू बुलाता है. तुम भी जो दिल करे बुला लिए करो." उसको अपने हाथ से पानी का गिलास पकड़ता वह लड़का अर्जुन के साथ हे सोफे पर बैठ गया.
"भाई मई तोह सुधीर हे बुला लूंगा. क्योंकि मेरा नाम अर्जुन है लेकिन घर का मुन्ना. तोह मुन्ना कहना और sun-na ाचा नहीं लगेगा." दोनों हंस दिए.
"वैसे यार कमल का हुनर है तुम में. मतलब यहाँ दिन भर में 100 महिलाये या लड़किया आती होंगी. कपड़ो के ढेर लगवा देती है लेकिन पसंद नहीं कर पाती लेकिन तुमने कमाल कर दिए भाई." सुधीर की शकल पर प्रशंशा के भाव थे.
"भाई एक तोह मेरी बहोत साड़ी बहने है तोह उनको देखता रहता हु. ऊपर से आज लाइब्रेरी में मैं एक किताब पढ़ी थी 'मेरी saheli-diwali संस्करण'. उसमे सिर्फ यही बताया गया था जो आज मैंने दिखाया. लेकिन वह इतनी बात 6 पन्नो और 12 चित्रों के साथ थी." अर्जुन हंसने लगा तोह सुधीर भी उसका साथ देने लगा.
"वाह भाई मतलब bade-buddhe सही कहते है के किताबो में हर चीज का हल है." सुधीर की बात का अर्जुन ने समर्थन किआ. लाइब्रेरी में आज इतिहास की किताब पढ़ने के बाद उसने 'मनोरंजन' शेल्फ पे राखी एक महिलाओं की किताब पढ़ी थी जिसमे उनके शिरंगार, कपड़ो का चयन और पति को लुभाने के बारे में बहुत कुछ बताया गया था. अर्जुन ने तसल्ली से एक घंटा उस पर हे लगा दिए था और वही उसके यहाँ काम आया.
"चले अब यहाँ से. और कितने पैसे हुए बता दीजिये.?" हैंडबैग खोलती रेणुका ने साड़ी के डब्बे पर देख लिए था 7499/- लिखा मतलब 15000 की दोनों. तोह उन्होंने 500 के नोटों की गद्दी हे निकल ली थी बहार. सुधीर के पिता जी दुकान से जा चुके थे तोह वह कागज पर एक बिल बनाने लगा.
"ये लीजिये मैडम." यहाँ पर्ची पर लिहा था 10000/- ब्लाउज सिलाई समेत. वो पर्ची को देखती तोह कबि उन दोनों को.
"देखिये अगर ज्यादा है तोह मई देख लेता हु कितना और काम हो सकता है. खरीदने की किताब से बिल निकलना पड़ेगा." उसकी बात पर रेणुका जी ने जल्दी से 20 नोट निकाल कर आगे बढ़ा दिए.
"इन पर तोह फ्रेश अर्रिवाल लिखा है. लेकिन आपने 33% चूत कर दी." अर्जुन ने तोह बिना कहे वो बड़ा बैग उठा लिया जिसमे दोनों साड़ी प्लास्टिक डब्बे को बंद करके टेप से सील कर दी गई थी.
"जी इतना मार्जिन रहता है तोह कर दिए. वैसे भी अर्जुन मेरा दोस्त है तोह ये मैंने कुछ ज्यादा नहीं किआ." बात कहते हुए उसने रेणुका जी को नमस्कार किआ और अर्जुन हाथ मिलाने के बाद जाते हुए हाथ हिला दिए.
"ये क्या किआ तुमने? उसका नुक्सान करवा दिए." बाहर आने के बाद स्कूटर पर बैग को आगे रखते अर्जुन से रेणुका जी ने कहा.
"आप इतना क्यों सोचती हो? दूकान की बात दुकान से बहार आने के बाद ख़तम. वो मालिक था उसको जो ठीक लगा उसने किआ. अब आप कभी भी आएँगी तोह यही से लेंगी. वो कर लेगा नुक्सान पूरा. अब चलिए आपको चूड़ियां, कड़े और जो सामान चाहिए वो दिलाता हु. यहाँ से जल्दी निकल लेंगे नहीं तोह पक्का बारिश में भीग जायेंगे." ऊपर आसमान में देखते हुए अर्जुन ने ये कहा तोह रेणुका कुछ सोचती सी मुस्कुराने लगी.
"तोह मतलब जो कुछ दूकान पर बोलै वो सब हे लेंगे हम?" वो स्कूटर पर बैठती बोलने लगी.
"है तोह नहीं क्या? अब मैंने तोह जैसे कहा वो चित्र पूरा करके हे तोह ये साड़ी ाची लगेगी. दूकान ज्यादा दूर नहीं है यही बस थोड़ी आगे है." जहा से प्रीती के लिए पाजेब और चूड़ियां ली थी वही पर वो उन्हें भी लेके आ गया.
"लीजिये यहाँ पर सब मिल जायेगा." अंदर उनके साथ हे आते हुए अर्जुन बोलै तोह काउंटर के दूसरी और कड़ी लड़की ने उनका स्वागत किआ.
"आये सर. क्या लेना है बताइये." एक स्वाभाविक सी मुस्कान से उन दोनों का अभिवादन किआ.
"इनके माप के laal-sunheri कड़े, बिलकुल हलकी हरी रंग की कांच की चूड़ियां 2 डोज़ेन और बाकी ये बता हे देंगी आपको." अर्जुन की बात सुनकर रेणुका जी बस मुस्कुरा रही थी. कुछ हे देर में उन्होंने सब पसंद करते हुए साथ हे गीला काजल, लिपस्टिक और पायलो को जोड़ी भी ले ली. यहाँ पर भी उन्हें डिस्काउंट मिला. दोनों वह से बहार निकले तोह ये वाला सामान अर्जुन ने स्कूटर की सामने वाली डिक्की में रख दिए. समय कोई साढ़े आठ हो चूका था. रेणुका इस बार बड़े आराम से अर्जुन के साथ लग कर बैठी हुई थी. दोनों हे गली से बहार मार्किट के चौक पर आये तोह रेणुका को गोलगप्पे चाट की रेहड़ी दिख गई. पिछले 7-8 साल में शायद उन्होंने एक दो बार हे उनका स्वाद चखा था. अर्जुन को प्यार से वह रुकवाती वो स्कूटर से उतर गई.
"भैया 2 प्लेट गोलगप्पे लगा दीजिये, तीखे खट्टे." उनकी बात पर अर्जुन गरदारन न में हिलता बोलै, "मुझे ये सब मन है. आप खा लीजिये."
"बड़ो की बात मान लेनी चाहिए. और फिर एक बारी से कुछ नहीं होने वाला." उनका दिल रखते हुए वो भी प्लेट लेकर खड़ा हो गया. लेकिन यहाँ तोह रेणुका जैसे गिनती हे भूल गई थी. अर्जुन भी साथ देता वो तीखे गोलगप्पे खता रहा. जब पेट भर गया तोह उन्होंने अपने मुँह में रखे आखिरी गोलगप्पे के साथ हे न में हाथ हिलाया. अर्जुन मुस्कुराता रेहड़ी वाले को पैसे दे कर स्कूटर पर आ बैठा तोह रेणुका ने थोड़ा तीखा पानी पीने के बाद स्कूटर का रुख किआ.
"तुमने पैसे क्यों दिए?"
"मई तोह वह भी दे देता जब चूड़ियां खरीद रहे थे. फिर सोचा आपको बुरा लगेगा. लेकिन यहाँ हम दोनों थे तोह लड़का होने के हिसाब से ये मेरा फ़र्ज़ था. अब आप बताइये क्या लेना है.?" अर्जुन के जवाब से रेणुका जी लाजवाब हो गई थी. मैं से मासूम, शरीर से हटकटा लेकिन दिल से एक परिपक्व इंसान. मुस्कुराती वो उसकी कमर पर हाथ रखती बोली, 'हम कल भी आएंगे न तोह फिर तभी ले लेंगे. और कल मई वो झूले भी लुंगी." चौंक के बीच में बने बड़े पार्क में ऊपर से नीचे आते झूले लगे थे जो अभी अभी बंद हुए थे. अर्जुन ने हाँ में सर हिलाते हुए धीमी रफ़्तार से स्कूटर वापिस ले लिए. पुल्ल पार करते हे बारिश शुरू हो गई थी. अभी इतनी तेज नहीं थी लेकिन हवा जोर से चलने लगी थी. स्कूटर को सड़क के किनारे चलता वो सड़क पर ध्यान लगाए था. यहाँ से भी घर 7 किलोमीटर तोह था हे. कुछ और आगे आने पर बारिश की रफ़्तार ऐसी हो गई थी की सामने सिर्फ सफ़ेद बौछार नज़र आ रही थी. पीछे रेणुका बुरी तरह अर्जुन से चिपकी हुई थी.
"किसी जगह पेड़ या बस स्टॉप के नीचे रोक लो. ऐसे तोह घर से पहले ऊपर पहुंच जायेंगे." सुनसान सड़क और बारिश में स्कूटर की लाइट भी काम करने से रही. अर्जुन ने अपने घर की जाती उस हरियाली सड़क पर फुटपाथ बार बानी तीन की छत्त देख स्कूटर वह रोक दिए. स्कूटर भी वही फुटपाथ पर उस तीन की छत्त के निचे खड़ा करके दोनों हलके से कंपते शर्ट और कमीज निचोड़ने लगे. बारिश अब अपने पूरे चरम पर आ चुकी थी. सड़क किनारे जमा होता पानी बता रहा था के कैसी रफ़्तार थी.
"ये गोलगप्पे पहले तीखे थे अब गीले कर गए." अर्जुन ने हँसते हुए ये बात कही. उसकी बात का मतलब समझकर रेणुका झेंप गई थी.
"सॉरी. मेरी वजह से हम आज यहाँ फंस गए." अर्जुन से स्कूटर पर चिपके रहने के बावजूद उनका पूरा कमीज गीला होकर शरीर से चिपक चूका था. हवा की वजह से उनको कंपकपी भी होने लगी थी.
"अगर ये बारिश मार्किट जाते समय हो जाती फिर भी आप यही कहती? ाचा हे हुआ न के पहले सामान ले लिए नहीं तोह वो भी रह जाता." अर्जुन ने सकरात्मक सोच से कहा. स्कूटर के सामने टेंगा थैला सुरक्षित था क्योंकि वो ऊपर से बंद था प्लास्टिक के बैग में. अंदर भी ाचे से पैक था.
"तुम हर बात को इतना पॉजिटिव हे सोचते हो क्या?" रेणुका उसके चेहरे की तरफ ध्यान करती बोली. एक दो सड़क किनारे लगी लाइट से इतना प्रकाश आ रहा था के शरीर की हरकत देखि जा सके.
"अगर हमारे वश में कुछ न हो तोह हमको वही करना चाहिए जिसमे नुक्सान न हो." अभी ये दोनों हे बातें कर रहे थे के 2 जवान से दीखते आदमी भी उस तीन की छत्त के नीचे आ खड़े हुए. रेणुका को शराब की दुर्गन्ध आई तोह वो उनकी तरफ से अर्जुन के पीछे आ कड़ी हुई. चेहरे पर दाढ़ी और शरीर भी ठीक था दोनों का. कपडे भीगे थे और उनमे से एक एक हाथ में प्लास्टिक की शराब की बोतल थी, जो जब भी वो दोनों बारी से घोंट भरते तोह चमकती थी.
"आप लोग ऐसे शराब नहीं पी सकते." जब अर्जुन से ये देखा न गया तोह उसने बस इतना कहा. वीएस भी ये छत्त कोई 8 फ़ीट लम्बाई में थी तोह ज्यादा जगह नहीं थी.
"ख़तम होने वाली है फिर तुझे हे यहाँ से भेजता हु." दाढ़ी वाले ने ये बात कही तोह अर्जुन बस आराम से खड़ा रहा लेकिन रेणुका की साँसे भरी हो गई थी. सड़क पर तोह कोई कार या इंसान नजर नहीं आ रहा था. ऊपर से ये दोनों शराब पीते आदमी जिनकी कद काठी भी ठीक थी और उम्र भी 30 के लगभग.
"अब बता तेरा क्या करू? इसको यहाँ छोड़ और निकल जा नहीं तोह कल के अख़बार में फोटो निकलेगी तेरी लाश की." दूसरा आदमी अभी शायद आखिरी के घूँट का मजा ले रहा था तोह ये वाला रेणुका की तरफ देखता आगे बढ़ के अर्जुन की शर्ट का कालर पकड़ने हे लगा था की जोरदार तननननन की आवाज के बाद तेज चीख हवा में गूँज उठी. जैसे हे इस आदमी ने हाथ आगे बढ़ाया था अर्जुन ने खुद को पीछे करते हुए उसकी गर्दन पकड़ कर लोहे के पोल से सर को जोर से भिड़ा दिए था. अब वो सड़क पर गिरा दर्द से तड़प रहा था.
"तेरी तोह बहनचोद.." इतना बोलता दूसरे वाला अर्जुन की तरफ लपका जिसके हाथ में एक देसी चूरा था. पूरी तरह चौकन्ना होने के बावजूद अर्जुन वार को फ़ैल न कर सका और चाक़ू का नुकीला हिस्सा कंधे के ऊपर घाव करता आगे निकल गया लेकिन इस वाले की गर्दन उसके बड़े पंजे में आ चुकी थी.
"गलती कर दी आप लोगो ने ये सब कर के. न यहाँ पुलिस है, न कोई बचने वाला और न मेरा संयंम." आखिर लफ्ज़ लगभग चीखते हुए अर्जुन ने इस तगड़े से आदमी को बीच सड़क पर दे मारा और खुद भी बारिश में उसकी तरफ चल दिए. उसकी चाल बता रही थी की शेर जख्मी भी है और अब आज़ाद भी. रेणुका तोह बस सेहमी सी देख हे रही थी.
"आज मई दिखता हु की किसका फोटो आएगा अखबार में." जमीन पर गिरे इस शख्स के मुँह पर अपने जूते से भरपूर वार किआ तोह शायद उसके दांत टूटकर मुँह में हे आ गए थे. फिर से नीचे झुक कर उसका हाथ पकड़ कर अर्जुन ने फुटपाथ के सहारे टिका दिए. अपने पाँव से उसकी हथेली दबाये बाजू पर दूसरा पंजा दे मारा. मुँह से दांत उगलता ये आदमी ऐसे चीखा जैसे अंतिम चीख हो. "कड़ाक" की ये आवाज बारिश के शोर में भी सुनाई पड़ गई थी. इतने में पहले जिसके मार पड़ी थी वो वाला खुद को संभल कर अब रेणुका के पीछे आ उसकी गर्दन दबोच के खड़ा था.
"छोड़ दे मेरे भाई को नहीं तोह इस साली को मार दूंगा. मई सच बोल रहा हु के इसको मार दूंगा. और मरेगा तोह तू भी, लेकिन कल. 4 मर्डर कर के भी बहार हु लड़के मई लेकिन तू भी मरेगा. छोड़ दे मेरे भाई को." वो जाने किस नशे में था के खुद हे मौत को बुला रहा था. अर्जुन बस घूरता हुआ उसकी तरफ बढ़ रहा था जैसे जैसे उसके कदम इस आदमी की तरफ बढ़ रहे थे वैसे वो आदमी पीछे हो रहा था.
"मई तुझे 1 मिनट देता हु अपने भाई को उठा और निकल जा. नहीं तोह कोई कल नहीं होगा तुम दोनों का." ये आवाज भी ऐसी थी की रेणुका को वह जैसे अर्जुन दिखाई सुनाई नहीं दे रहा था. ये इंसान कोई और हे था. लेकिन वो आदमी थोड़ा दीठ निकला.
"तू निकल जा यहाँ से. इसको मई खुद छोड़ दूंगा." जाने कोनसा नशा किआ था उसने की डर और वासना दोनों की पकड़ में था वो. जिस हाथ से गर्दन दबाई थी वो अगले हे पल हवा में उठ चूका था.
"छूने की गलती करदी अब तेरे इस हाथ का भी कोई काम नहीं." उसकी ब्याह को मरोड़ते हुए पोल से टिका कर अर्जुन ने झटक दिए तोह अपने भाई की तरह चिल्लाता ये नीचे गिर गया. गर्दन पर लात पड़ी तोह अब वो शायद मूर्छित हो गया था. रेणुका जो थोड़ी समय पहले तक इस इंसान से भयभीत थी वो उस से जा कर लिपट गई थी.
"यहाँ से चल अर्जुन. तुझे मेरी कसम है. हम आगे रुक जायेंगे." अर्जुन इस प्यार भरे एहसास से होश में आ गया था. एक बार उनकी पीठ सहलाने के बाद वो स्कूटर पर बैठ गया और रेणुका भी उसके पीछे दोनों तरफ पाँव करके बैठ गई थी. बारिश तोह अभी भी वैसे हे हो रही थी लेकिन दोनों बस चुपचाप चले जा रहे थे. अपने सेक्टर में पहुंच कर रेणुका ने अर्जुन से स्कूटर रुकवाया. यहाँ भी वैसी हे एक तीन की छत्त थी लेकिन इसके ठीक साथ में सफ़ेद मरकरी लाइट रोशन थी.
"इधर आ जरा." उसको अपने साथ लिए वो रौशनी के नीचे उसका बया कन्धा देखने लगी. शर्ट का किनारा कट गया था और वही ठीक नीचे लम्बाई में डेढ़ इंच का निशाँ बन गया था जिसमे से अभी भी हल्का खून रिस रहा था.
"इस पर चुन्नी रखने की गलती मत करना आप." उनको निहारते हुए अर्जुन ने कहा तोह वो प्रश्न करती आँखों से उसको देखने लगी.
"चुन्नी अपने पास हे रखिये. मई चोट छिपा लूंगा और ये बात जो भी आज हुई इसका जीकर गलती से भी घर में मत कर दीजियेगा नहीं तोह मेरा वनवास पक्का." उनकी हे चुन्नी से वो रेणुका का चेहरा साफ़ करने लगा जहा बारिश के बावजूद आंसू थे.
"और जब मई साथ में हु तोह आप रो क्यों रही है? आप भी सलामत है और मई भी. मेरे होते आपको कुछ होने नहीं दूंगा. बस एक गलती हो गई जिस वजह से उसने आपको हाथ लगा दिए."
"और तुमने वो टॉड दिए. क्या हुआ था तुम्हे यु एकदम से? हम वह से भाग भी तोह सकते थे."
"मुझे सिर्फ एक हे चीज बर्दाश्त नहीं होती, मेरे किसी अपने के ऊपर जुल्म. मई उन्हें दर्द और डर में भी नहीं देख सकता. फिर न मेरा सयंम टिकता है न संस्कार. छोड़िये ये सब और खुद को ठीक करिये. देख लीजिये कही कोई खून का धब्बा न हो. मेरे कपड़ो पर तोह दिखने से रहा कुछ." वो मुस्कुराता हुआ बोलै तोह रेणुका ने भी एक छोटी सी मुस्कान अपनी गीली आँखों के साथ बिखेर दी.
"पापा सही थे. तुझे जान पाना आसान नहीं है. लेकिन समझदार होने के साथ तू हिम्मत वाला भी है." एक प्यार सा उमड़ आया था रेणुका के दिल में. कितनी बहादुरी से आज उसने इज़्ज़त बचाई थी फिर समझदारी दिखते हुए चुन्नी तक के लिए मन कर दिए था. जैसे हे अर्जुन स्कूटर के पास जा कर उन्हें देखने लगा रेणुका झटके से उसके सीने लग गई. अर्जुन ने इस बार के गले लगने में कुछ अलग महसूस किआ था. कुछ देर बाद अलग होकर वो पिछली सीट पर बैठ गई थी नजर झुकाये और अर्जुन घर के बहार पहुंच गया था. समय कोई रात के 10 से ऊपर का था और घर के अंदर कड़ी छोल साहब की गाडी बता रही थी की वो आ चुके है. पूरी गली अन्धकार में थी जैसा आमतौर पर बारिश के समय होता था. मोमबत्ती या इमरजेंसी लाइट.
"अंदर नहीं चलोगे?" अर्जुन उन्हें सामान पकड़ाने लगा तोह रेणुका ने एक गुजारिश सी करते हुए कहा. 'अंदर गया तोह छोटे दादू पूछेंगे नहीं गया तोह वो समझ जायेंगे की बिना सामान अंदर रखे गया है तोह कोई गड़बड़ है.'
"आप कुछ नहीं बोलेंगी उन्हें. सिर्फ इतना याद रखना की आते समय बारिश में जब पेड़ के नीचे खड़े थे तोह ऊपर से कुछ आ कर यहाँ गिरा जिस से चोट लग गई." अर्जुन समझते हुए बोलै तोह वो सर हाँ में हिलती चूड़ियों वाला बैग लिए आगे चल दी इधर अर्जुन साड़ी के डब्बे लिए अंदर दाखिल हुआ. छोल साहब खाना खा चुके थे और अब ड्राइंग रूम में हे सामने बैठे टेलीविज़न देख रहे थे.
"ोये तुम तोह बुरी तरह भीगे हुए हो." उन्होंने रेणुका और अर्जुन को अंदर आते देख कहा.
"प्रीती कहा है?" रेणुका जी ने इतना हे पुछा तोह एक टोलिया उठा कर वो पास आते बोले, "वो तो ऋतू के पास गई है वही सोयेगी. क्या बात?"
"अंदर में पता नहीं अर्जुन के कंधे पर क्या लग गया जिस से इसको थोड़ी चोट आई है. फर्स्ट अिध बॉक्स देखिये जरा." छोल साहब ज्यादा बात किये बिना अंदर चले गए तोह रेणुका खुद हे अर्जुन का सर पौंछने लगी.
"कमीज उतार कर इधर आ कर बैठ. मेरा शेर पुत्तर है तू ये छोटी मोटी चोट लगती रहती है." अर्जुन ने दरवाजे पर हे कमीज उतार दी तोह छोल साहब की नजर उस जख्म पर गई, अभी तक हल्का खून आ रहा था. अर्जुन उनके पास आकर जमीन पर पंजे के भार बैठ गया.
"ये लगी कैसे है?" उनका ये सवाल और आवाज रेणुका को हिलने के लिए काफी थी.
"दादू, ये पिछले सेक्टर के पार्क के बहार पेड़ के नीचे खड़े हुए बारिश से बचने के लिए तोह पता नहीं कोई तीखी सी चीज शरीर पर लगती महसूस हुई और देखा तोह ये शर्ट फट गई थी और खून आ रहा था." अर्जुन ने उनकी तरफ अपनी मासूम शकल से देखते कहा.
"हम्म.. कोई पट्टी या तार से शायद कट लग गया है. हवा तेज भी थी. तू एक काम कर पहले ये पंत भी उतार के आ. पारवती इसको अंदर से पजामा दे जरा." उनकी आवाज पर पारवती रसोईघर से बहार आई, जो बर्तन धो रही थी. कुछ देर बाद अर्जुन अंदर के बाथरूम में था. शीशे में जख्म देखा तोह कुछ ख़ास नहीं लगा उसको चाक़ू के वार के मुताबिक. फिर दरवाजे के पीछे जीन्स टांग कर पजामा पहना और मुँह धोने के बाद शरीर पांच कर बहार आया जहा पर छोल साहब अकेले बैठे थे.
"ये पकड़ कर रख. मई ये ऊपर पट्टी लगा के टेप से इसको सेट कर देता हु." उसके जख्म को पहले हाइड्रोजन पेरोक्साइड से साफ़ करने के बाद उन्होंने तैयार करके राखी पट्टी और रूई जिसपे दवा लगी थी उसके कंधे पर दबा के उसको पकड़ा दी. फिर वो डॉक्टर टेप को कैंची से लम्बा काट कर चिपकने लगे. ाचे से ड्रेसिंग करने के बाद वो उठ गए.
"पारवती इन दोनों का खाना लगा देना और मुकेश को बोल दे के रामेश्वर जी के घर सदेशा दे आये की अर्जुन आज यही रहेगा. बाकी मई फ़ोन कर के देख लेता हु अगर उठा लिए तोह बस खाना लगा दो. मई अपने कमरे में जा रहा हु." एक बार फिर अर्जुन के सर को प्यार से सेहला कर कुछ सोचते से वह अंदर चले गए.
"अर्जुन, अलका को बता दिए के तू यही सोयेगा आज. खाना खाने के बाद प्रीती के कमरे में सो जाना." कोई 2 मिनट बाद उन्होंने फिर से अंदर से आवाज दी तोह अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा, "जी ाचा दादू. गूडनिघत."
पारवती ने टेबल पर खाना लगा दिया तोह रेणुका बुआ बाथरूम से तरोताजा हो कर आ गई थी. एक काले रंग की मैक्सी पहन कर और बिना हे किसी प्रसाधन के वो इस रूप में भी बड़ी आकर्षक लग रही थी. अर्जुन की नजर एक पल के लिए उन पर ठहर सी गई थी. यही हाल उनका भी हुआ जब सामने अर्जुन को बिना कमीज के सिर्फ एक सफ़ेद पाजामे में कंधे पर पट्टी करवाए बैठे देखा. छाती इतनी चौड़ी और वैसे हे कंधे थे. किसी पहलवान से बाजू लेकिन मासूम चेहरा.
"पारवती बहार का दरवाजा बंद कर के तू चली जा सोने मई बर्तन समेत दूंगी." कुर्सी पर बैठ ते हुए उन्होंने कहा और अर्जुन की प्लेट में खाना परोसने लगी. फिर अपनी पालते लगाने के बाद दोनों ने ज्यादा बातचीत किये बिना खाना शुरू किआ. पारवती भी दरवाजे बंद कर जा चुकी थी. बस ड्राइंग रूम और प्रीती के कमरे में हे लीगत जल रही थी. छोल साहब का कमरे के दरवाजा भी ढलका हुआ था.
रेणुका जी को एकदम से हिचकी लगी तोह अर्जुन ने झट से गिलास उनके चेहरे के सामने कर दिए. पानी पीने के बाद खाना ख़तम कर वो दोनों उठ गए तोह अर्जुन सीधा प्रीती के कमरे में चल दिए बिना कोई बात किये क्योंकि रेणुका जी भी बर्तन उठा कर रसोईघर में जा चुकी थी. उनका कमरा प्रीती के साथ वाला था जो वैसे तोह बंद हे रहता था. बिस्टेर पर लेत कर अर्जुन ने साइड वाला लैंप जला लिए था और मुख्या लाइट बंद कर दी थी. सिरहाने राखी चद्दर छाती तक ओढ़ कर वो वैसे हे लेता सोच रहा था के खा तोह आज वह घर में मजे कर रहा होता और कहा आज प्रीती के कमरे में उसके बिना हे सोना पड़ रहा है. कोई 15 मिनट बाद दरवाजा खुला और रेंजका जी अंदर आ गई.
"आप?"
"तुम सोये नहीं अभी तक? वो मई कल भी यही सोइ थी तोह सोचा आज भी यही सो जाती हु. लेकिन अगर तुम्हे ठीक नहीं लगता तोह मई पिछले कमरे में चली जाती हु. उधर ठीक से सफाई नहीं हुई है." इतना बोल कर वो वही कड़ी हो गई.
"नहीं नहीं. बहोत बड़ा बीएड है. आप भी सो जाइये एक तरह बस सुबह जल्दी उठ जाता हु तोह आपको परेशानी न हो जाये." दोनों हे बहुत कुछ कहना चाह रहे थे लेकिन बात घुमा रहे थे. अपनी तरह का तकिया अर्जुन के तकिये के पास करती रेणुका बिस्टेर पर आ गई थी. दरवाजा भी ढाल दिए था ाचे से.
"तुम्हे एक पल भी डर नहीं लगा था उस समय?" करवट अर्जुन की तरफ करती वो बोली तोह अर्जुन दाए कंधे पर उनकी तरफ मुँह करते बोलै.
"डर तब लगता जब आपको कुछ हो जाता. क्योंकि मुझे सही में किसी से डर लगता है तोह अपने उस बदलाव से जिसमे मई कुछ सोच नहीं पता. आज अगर आपको वह कुछ हो जाता तोह मई क्या जवाब देता छोटे दादू को?" इतनी परवाह देख कर रेणुका ने अपना दाया हाथ आगे बढ़ाते हुए उसका सर और गाल सेहला दिए.
"तू सच में बहोत ाचा है रे. एक बार तोह लगा था के शायद तू जानवर बन गया हो. लेकिन अब याद करती हु उस पल को तोह लगता है की शेर जंगल में परिवार की हिफाजत करता है. उसके भी दो रूप होते है. परिवार के प्रति प्यार और दुश्मन के लिए हिंसा."
"वैसे शेर की ढेर साड़ी शेरनिया भी होती है. डिस्कवरी पर देखा था मैंने." अर्जुन ने मजाक में ये बात कही थी माहौल को ठीक करने के लिए लेकिन ये बात कही और हे चली गई.
"तोह तेरी कितनी शेरनिया है?" घूरते हुए उन्होंने पुछा तोह वह हँसता हुआ बोलै, "अभी शेर नादान है तोह कोई भी नहीं." उसकी बात सुनकर बड़े प्यार से रेणुका ने अपनी ब्याह उसके ऊपर वाले हाथ पर रख दी.
"तू नादान हो कर भी कितना ख़याल रखता है प्यार करता है. लोग उम्रदराज होकर भी ये सब नहीं कर पाते. उतना भी नहीं दे पाती जिस से सामने वाले को जीने की आस तोह बानी रहे." ये बात सोचती कहती रेणुका के गाल पर 2 लम्बी धार मोतियों की बह गई. लैंप की रौशनी में अर्जुन ने ये चमकती बुँदे देखि तोह उनकी तरफ खिसक आया.
"आपको किसी ने दुःख पहुंचाया है? आप बताओ प्लीज की ऐसा क्या हो गया के आप ाची भली रोने लग पड़ी?" अर्जुन उनके आंसू पूछने के बाद गाल सहलाता उन्हें देखता रहा. उसका स्पर्श सीधा दिल में उतर रहा था रेणुका के.
"वो सब हम बाद में बात करेंगे. एक काम करेगा मेरा?" उनकी आँखों में देखते हुए अर्जुन ने हाँ में पलके झपका दी.
"मुझे आज अपने सीने से लगा कर सुला ले. बहोत बोझ सा लग रहा है दिल पर अर्जुन." उनकी रुलाई फुट पड़ी थी लेकिन आवाज को संभालती वो बस रोये जा रही थी. अर्जुन ने अपनी ब्याह को बिस्टेर पर फैला दिए. रेणुका उसके ऊपर सरकती सीधे हाथ की बाजू पर सर रख कर लेत गई. आंसू की कुछ बुँदे अर्जुन की छाती पारी गिरी तोह दर्द की परवाह किये बिना उसने दूसरे हाथ से उनको बाहों में भर लिए. रेणुका ने भी अपनी एक ब्याह उसकी पीठ तक कास ली थी. अर्जुन शांत सा बस उन्हें आराम दे रहा था और जब सारे आंसू बह कर थम्म गए तोह भीगी पलकों से रेणुका ने अर्जुन के चेहरे की तरफ देखा.
"मई इतनी बुरी हु की मेरे पति को मुझसे सही से बात किये भी आज 5 साल हो चुके है."
"नहीं. आप बुरी नहीं हो. आप बुरी नहीं हो सकती कभी." उनके माथे को चूमता अर्जुन उनकी पीठ सेहला रहा था.
"कहने को मई एक खूबसूरत घर सजाने का सामान भर हु. कभी अपने लिए उनकी नजरो में न इज़्ज़त देखि न प्यार. पापा की वजह से बस एक खूबसूरत मैडल भर हु मई जिसको कभी पार्टी में साथ ले जाते है 2-3 महीने में एक बार या फिर घर में क़ैद."
"आपकी गलती नहीं है. दादू से भी गलती नहीं हो सकती बस शायद फ़ौज का नाम देख कर उन्होंने ये कर दिए. नहीं तोह आप तोह उनकी जान हो." ये बोलते हुए अर्जुन ने चेहरा नीचे किया तोह रेणुका ने उसका गाल चूम लिए.
"मुझे प्यार कर सकता है? सिर्फ एक बार अर्जुन. मुझे फिर से मेरे औरत होने का एहसास करा दे. मुझे मालूम है के सिर्फ तू हे कर सकता है और कोई भी नहीं. और मई ये 10 साल में आज पहली बार अपनी जुबान पर लाइ हु क्योंकि मैंने तेरी आँखों में देखा है जो मई ज़िन्दगी भर ढूंढ़ती रही.. प्यार..