अपडेट 26
जलती जवानी
"ऋतू दीदी, ये आपके चेहरे पर चोट का सा निशा कैसा है?" कमरे में बिस्टेर पर लेटने से पहले प्रीती के सवाल ने अलका की नजर भी ऋतू की तरफ
कर दी थी. "है बता न ऋतू, ये तोह सच में सूज गया है. तुझे मेरी कसम है?" ऋतू कुछ देर चुप रही फिर उसने साड़ी बात शुरू से अंत तक बता
दी जिसको सुनकर दोनों हे सकते में आ गई थी. इतना कुछ हुआ और किसी को भनक भी नहीं थी. "मेरी कसम है तुम दोनों ये बात किसी को नहीं kahogi."Ritu
ने दोनों को ऐसे देख कहा.
"कल भी कुछ ऐसा होने हे लगा था की अर्जुन सही टाइम पर ऊपर आ गया था वह." प्रीती की बात ने दोनों को चौंका दिए था. और प्रीती ने अपनी कलाई
उनकी तरफ कर दी जहा चूड़ियों के निचे 2 बैंडऐड लगी थी. "शायद कल की बात के हे लिए उस लड़के ने ये सब आज किआ. क्योंकि जब वो मेरे पास आ रहा
था तोह आपने हे उसको भगा दिए था."
"कल अर्जुन ने उसको मारा था?" अलका को दिन की खाने पर हुई बात याद आ गई.
"नहीं दीदी इतना नहीं मारा था जैसे आज ऋतू दीदी ने बताया है. मैं उसको खींच कर ले आई थी अपनी कसम दे कर." थोड़ी देर तक तीनो खामोश थी
ये ख़ामोशी भी प्रीती ने हे भांग की. "मई जानती हु आप दोनों भी उसको उतना हे प्यार करती हो जितना मई. और वो भी, मैंने ये देखा है. और मुझे ये
ाचा भी लगा देख कर."
"क्या matlab?"Ritu ने ये बात कही तोह अलका दीदी का भी चेहरा प्रीती को हे देखने लगा.
"जैसे वो एक दिल है वैसे हे उसकी धड़कन हम तीनो है. और मई चाहती हु के ये सब कभी न बदले." प्रीती की बात सुनकर अलका और ऋतू ने उसको दोनों
तरफ से गले लगा लिए. "वैसे आप दोनों के भी सख्त हे है." इतना बोलकर प्रीती ने जल्दी से अपने ऊपर चद्दर ओढ़ ली और लेट गई.
"रुक तेरे तोह मई नरम करती हु अभी प्रीती की बची." ऋतू दीदी ने उसको लेते हुए हे बाहों में ले लिए और अलका दीदी भी आराम से पीछे बिस्टेर पर पसर
गई. प्रीती की बातों ने माहौल को हल्का कर दिए था. "ऋतू अब सो भी जा. कल पेपर है तेरा." अलका ने अपनी ब्याह प्रीती के ऊपर रख कर सोने से पहले कहा
कुछ हे देर में कमरे में शान्ति च गई.
"चल आजा आज मेरे साथ सो जा. मई भी थोड़ा अकेला फील कर रहा हु." अर्जुन को अपने कमरे में लेकर आइये संजीव भैया ने कहा.
कपडे बदल कर दोनों भाई हे बीएड पर लेत गए. "देख अब ज्यादा मत सोच और इस बात को भूल जा. वो दिल्ली का था और अब कभी फिर दिखाई देने वाला नहीं.
ऋतू भी ठीक है बिलकुल."
"हाँ भैया. मैंने बुरी बातें याद रखना छोड़ दिए है अब. जो भी हुआ वो किसी काम का नहीं. लेकिन आज एक असलियत तोह पता लग गई की सब लोग शराफत
के पीछे एक जैसे नहीं होते."
"सही कह रहा है छोटे. दुनिया हमारी सोच से कही अलग है. बस इतना याद रख जो तेरी परवाह करते है तू उनकी कर और बाकी सब सिर्फ अपने प्यार वालो
से दूर रख. इसमें हे बेहतरी है." संजीव भैया ने इतना बोलकर करवट बदल ली. अर्जुन भी आँखें बंद कर सोचता सा लेत गया.
उधर ललिता जी का दिल आज भारी सा था तोह उन्होंने रेखा को अपने कमरे में सुला लिए. दोनों अपने रात के परिधान में हे लेती बातें कर रही थी.
"देख तोह रेखा तू अभी तक जवान पड़ी है. माधुरी की उम्र के लड़के भी तुझको देख रहे थे वह." मैं को हल्का करने की जिरह से उन्होंने अपनी देवरानी
को चड्डा.
"क्या दीदी. आप भी मजाक करने लगी हो. 20-21 साल की 2 बेटियां है मेरी अब तोह." रेखा जी ने थोड़ी शर्म से कहा. कमरे में जीरो का बल्ब जल रहा था.
"वैसे इतनी खूबसूरत है तू, शरीर भी ऐसा दिए है की किसी का भी मैं दोल जाये. फिर तू अकेले कैसे रातें काट लेती है ऋ?" ललिता जी अपनी देवरानी
से लगभग सभी बातें कर हे लेती थी. रेखा जी भी उनमे अपनी बड़ी बहिन देखती थी तोह एक वह हे थी घर में जिन से खुलकर अकेले में वो दिल का हाल
बया कर लेती थी.
"क्या दीदी. आपको तोह पता हे है जब ये आते है तोह कुछ काम कहा करने देते है."
"वो सब तोह ठीक है लेकिन रेखा महीने में 3 दिन या कभी 4 दिन से पूरा महीना तोह ठंडा नहीं हो जाता.?" ललिता जी कही इस बात ने रेखा जी को अपने
पति की याद दिला दी. वैसे तोह शंकर जी ाचे से ख़याल रखते थे और प्यार भी करते थे अपनी पत्नी को लेकिन उनके और भी कई सच थे जीने कुछ
उन्होंने देखा था और कुछ उन्हें पता लगे थे. लेकिन नारी का तोह काम हे सिर्फ अपना फर्ज पूरा करना है.
"ऐसा कुछ नहीं है दीदी. वो मेरी प्यास बुझा देते है जो महीने भर नहीं भड़कती." कुछ सोच कर कही गई इस बात पर ललिता जी ने बस हलके से रेखा
जी के उभर पर हाथ रखा और कुछ पल बाद हटा लिए.
"अगर ाचे से ख्याल रखता न शंकर तेरा तोह ये पहाड़ अब तक ढीले हो जाते. ये तोह ऐसे खड़े है जैसे आज भी दूध निकल आये इनमे से." रेखा जी
ने उनकी बात सुनकर करवट सीढ़ी कर ली. उनके चेहरे पर तोह शर्म चाय थी लेकिन दिल में तीस सी हो रही थी. एक बात तोह उनकी जेठानी की बिलकुल ठीक
थी की ाचे से ख्याल.
"मुझे पता है सबकुछ. मई इस घर में तेरे से 5 साल पहले आई थी. शंकर कैसा है ये पता है मुझे और वो क्यों महीने में एक बार आता है ये भी.
तेरे आने से पहले भी मैंने कई होली दिवाली देखि है इस घर की. तब ये घर नहीं था सिर्फ 2 कमरे और गाये बंधी होती थी यहाँ. सब तोह पहले वही
रहते थे न पुराने घर जहा तू ब्याह कर आई थी." ललिता जी बातें अब रेखा जी के दिल में उतर रही थी. उन्हें तोह लगता था के जो कुछ उसने देखा था
वो कोई नहीं जानता होगा लेकिन जेठानी की बातें सुनकर वो सुन्न थी.
"शंकर दिल का बुरा नहीं मेरी बहिन. बस ये समझ ले की वो सबसे थोड़ा अलग है. बाप जब घर से दूर हो, घर की देखभाल सिर्फ एक माँ करती हो और
रुपये पैसे की कमी न हो तोह कोई एक बचा थोड़ा खुलकर जीने लगता है. शंकर भी वैसा था. जब घर में ब्याह कर आई थी तोह तेरे जेठ जी हर
रात अपने दोनों भाइयो की बातें करते थे. नरिंदर तोह शंकर की परछाई था, उसकी कोई दुनिया या मकसद नहीं था. जैसा शंकर ने कहा या किआ वो
बस अपने भाई का साथ देता था. तेरे जेठ की नौकरी लग गई थी तोह उन्हें तोह कभी फुर्सत न मिली ये सब देखने की. शंकर को कॉलेज में जिस लड़की से
प्यार था वो तोह ब्याह कर के चली गई थी किसी और के घर. डाक्टरी की पढ़ाई में उसने सिर्फ ladaai-jhagda, शराब और लड़कीअ हे समझी. दिमाग का धनि
था तोह Saas-Sasur तोह कुछ बोल नहीं पाते थे. और आज भी देख सांड जैसा है लेकिन तब बिगड़ैल सांड था पूरा. नरिंदर तोह पंजाब चला गया था
नौकरी के लिए तोह शंकर भी ट्रेनिंग ख़तम कर के सिविल हस्पताल में काम पे लग गया. सब आदत बदल गई थी बड़ा आदमी ban-ne के चक्कर में, उसको
सबसे ाचा डॉक्टर ban-ne का जूनून था लेकिन एक आदत न जा सकीय बल्कि वो तोह हॉस्पिटल में नौकरति के बाद बढ़ती चली गई. सुन्दर था, hatta-katta था
और ऊपर से डॉक्टर. पता नहीं कितनी लड़कियों, नर्सो के ऊपर से गुजरा होगा. यही आता था लेके कैयो को तोह, मैंने खुद कई बार देखा. फिर ससुर जी ने
तुझे कही देखा तोह उसके लिए पसंद कर लिए. उन्हें लगा के ाची पढ़ी लिखी पत्नी होगी तोह शंकर अब सिर्फ काम पे ध्यान देगा. लेकिन अब तू खुद हे बता
के कितना ध्यान दिए? तूने बहोत म्हणत की उसको खुद से बाँधने की. सबकुछ किआ जो उसने कहा, चर्बी तक ना आने दी शरीर पर बचे पैदा करने के बाद
लेकिन वो तोह फिर वही मूउए गुलाटी और सांगवान के साथ शबाब और शराब के मजे मारता फिरता है. तेरे जेठ को भी ये आदत लगा दी. होली पे खुद देखि
मैंने इनके लुंड पर लिपिस्टिक जब टुन्न हो के सोये पड़े थे." एक हे सांस में उन्होंने साड़ी raam-katha सुना दी, हल्का गुस्सा भी था उनके लहजे में.
"आपको सब पता था तोह भी कुछ न कर पाई दीदी आप?" रेखा जो सब सुनते हुए भावुक हो चुकी थी नम्म आँखों से ललिता जो को बोली.
"अरे इनके तोह maa-baap न कुछ कर पाए mai-aur तू क्या कर लेती? अब तेर जेठ को हे देख कैसे चहकते रहते है भाई के आने पर. मेरे साथ तोह ठीक
से खड़ा नहीं होता वह से अपना सुजा के लाते है. नए शरीर का चस्का है न या तोह अब मजा आता नहीं क्योंकि बचो की फैक्ट्री थी जो पहले खूब
चला ली अब मैं भर गया."
अपनी जेठानी की ऐसे बात सुनकर ना चाहते हुए भी रेखा जी की दुखी चेहरे पर हंसी आ गई.
"तू भी हंसले क्यों की तुझे तोह आदत है. लेकिन मैंने भी न कुटवाई किसी तगड़े मुसल से तोह मेरा नाम भी ललिता नहीं." कितना विद्रोह सा मचा हुआ था
ललिता जी के दिल में. एक तरफ रेखा थी जो सब जानते हुए भी बस चुप चाप गुजरा कर रही थी और दूसरी तरफ ललिता, जो अपने पति की बेवफाई का बदला
हे लेने पर थी. एक तरह तोह उन्होंने इसकी शुरुवात कर हे दी थी अपने भतीजे से छुड़वाकर. लेकिन एक माँ को तोह वो ये बताने से रही.
"ये आप क्या बोल रही है दीदी? आप ऐसा सोच भी कैसे सकती है.?" रेखा के चेहरे पर गंभीरता और परेशानी तैर गई थी सुनकर.
"वो इतने साल कर सकते है सबकुछ और मई बस देखती हे राहु. मेरे भी आग लगती है अंदर, मुझे भी कोई चाहिए जो प्यार करे और मेरी इज्जत करे. लेकिन
5 साल से ज्यादा हो गया है ये सब सहते. मई तेरी तरह अँधेरे में खुद पर ठंडा पानी दाल कर नहीं सोने वाली. जो होगा देखा जायेगा और कोनसा मई इस
बात की सुनवाई शहर में करुँगी." उन्होंने तोह जैसा अपना आदेश हे सुना दिए था. रेखा बस एकटुक उनकी बातों को सोचती उनको देखती पड़ी रही. जेठानी को
ये भी पता था के वो सुबह अँधेरे में अपनी आग कैसे ठंडी करती है.
"और आपकी इजात पर बात आई तोह?" रेखा की बात सुनकर ललिता जी मुस्कुराई. "मैं कोई रंडी तोह नहीं न. मैंने कहा है कोई ऐसा जो मेरी इज्जत करे, प्यार
करे और मुझे औरत होने का सुख दे. ये नहीं कहा के सड़क पर पाँव पसार कर हर कुत्ते को खुद पर चढ़ा लुंगी." उनकी बातें रेखा को हंसी भी दे
रही थी और बेचैन भी कर रही थी. न चाहते हुए भी उनका खुद का हाथ एक बार छूट को सेहला गया जो बुरी तरह तप रही थी.
"अगर कोई तुझे ऐसा कभी मिले जो तेरी इज़्ज़त करे, तुझे सम्मान दे और तेरा ख्याल रखे तोह मेरी लाडो उसको आजमाकर जरूर देख लिओ. करना या न करना फिर
तेरे हाथ में. और चल अब सो जा फिर तू मुँह अँधेरे में छूट पर पानी गिराने जाएगी. " ललिता जी आखिरी बात जो थोड़ी उन्होंने खुल कर कह दी थी को सुनकर
उनकी बाजू पर हलकी सी चपत लगा कर रेखा जी भी आँखें बंद कर लेत गई.
आँखों में दूर दूर तक नींद न थी. खुली आँखों से वह अपनी जेठानी की कही हर बात ध्यान से सोच रही थी. एक शर्मीली सी लड़की जो ब्याह कर इस घर
में आई थी तोह उसके पति ने शराब के नशे में कैसे उसको राउंड दिए था. फिर उसको वो सब सिखाया जिसकी कल्पना भी कभी रेखा ने न की थी. कभी कभी
तोह दर्द के निशाँ से बुखार भी हो जाता था उसको लेकिन पलट कर पुछा नहीं. एक बाप के तौर पर उनका पति सही था कुछ हद तक लेकिन पति के तौर पर
शायद वो कभी भी उनकी आत्मा तक न पहुंच पाया. 2 साल पहले जब वो खुद उनके साथ सिविल हॉस्पिटल गई थी तोह अपनी आखों से डॉ गुलाटी और अपने पति को
नर्स के साथ लगे हुए देखा था. ऑपरेशन का बहाना करके ाचा ऑपरेशन कर रहे थे दोनों एक 20-21 साल की लड़की का और वो लड़की भी मजे से उनका साथ
दे रही थी. इन सब बातों को याद करके उनका दिल दोराहे पर था. ऐसे हे उन्हें नींद ने आ घेरा.
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अर्जुन अपने वक्त से हे उठ गया था और फिर बाथरूम से फ्रेश हो कर जैसे हे बहार आया तोह अपने भैया को भी तैयार होते पाया. "आप इस वक्त तैयार होकर
कहा जा रहे है?"
"मई तोह तेरे उठने से पहले हे तैयार हो चूका था. बस अभी ऊपर आ कर जूते पहन रहा हु. आज एक मीटिंग है बहार शहर तोह बस निकल रहा हु. याद
से ऋतू को पेपर दिलवाने ले जाना. और मई अब गुरुवार तक हे वापिस आऊंगा." संजीव भैया ने खड़े होते हुए कहा और अपना बैग उठा लिए. दोनों भाई निचे
चल दिए. "ाचा एक कीजिये, आप मुझे भी ये अगले पार्क में छोड़ दीजिये." भैया को कार निकलते देख उसने कहा और कार में बैठ गया.
"ये कोनसी दौड़ करने चला है तू." भैया ने हँसते हुए कहा और कार बहार निकल कर वापिस गेट बंद कर चल दिए.
"बस एक बात करनी थी भैया. क्या मुझे फिर से बहार भेज देंगे पापा?" अर्जुन शायद कुछ महसूस कर रहा था.
"देख अभी तोह तू कही नहीं जा रहा. है शायद कॉलेज के लिए तुझे जाना पड़े. और उसमे कुछ बुरा भी तोह नहीं हफ्ते में 2 दिन तोह तू घर आएगा हे."
अर्जुन को थोड़ा आराम मिला ये बात सुनकर. "वैसे कल जैसा हंगामा किआ शायद पहले .... और भैया पार्क के पास कार रोक कर खड़े हो गए.
"छोटे तू अपने फैंसले खुद भी ले सकता है. अब तू बड़ा हो रहा है. लेकिन जो लोग तुझे उकसाये तोह अपनी शान्ति भांग मत होने देना. यहाँ बहोत से
गरम खून मिलेंगे जो शायद तुझे लड़ने तक उकसा दे. बस उनसे मुकाबला नहीं करना. और मई निकलता हु तू घर का ख़याल रखना."
पार्क के अंदर आकर कुछ देर तोह अर्जुन टहलता रहा फिर 2 चक्कर दौड़ लगाने के बाद घास पर बैठ कर ध्यान लगाने लगा. इतनी ाची हवा में ऐसे
लम्बी साँसे लेना उसको बहुत भ रहा था और उसका मैं भी हल्का हो रहा था. फिर फूल पातु को देखता कुछ देर घूमने के बाद घर की और चल दिए.
"ये लड़कियां जाने कब बड़ी होंगी? मुन्ना देख जरा अभी तक कोई उठा क्यों नहीं." अर्जुन घर में बैठा दूध पी रहा था और माँ आँगन की सफाई कर
रही थी. झुक कर गीले फर्श पर जब वो टिल्ले वाले झाड़ू से पानी बहती तोह उनके दोनों उरोज ब्लूज़ में हिलते. 6 बजे पूरा आँगन रोशन था तोह उसको
सब दिख रहा था. घूमती तोह उनकी साडी में कैसे कूल्हे नजर आते. अपने बेटे को बैठे देख एक बार उसकी तरफ नजर डाली फिर खुद को देखता पाया तोह
रेखा जी का दिल धड़क गया. उनकी मोटी चाटिया नुमाया हो रही थी और अर्जुन बस वही घूर रहा था. गिलास तोह जैसे उसके मुँह पर चिपका हुआ था.
उन्होंने सीधे होते हुए फिर कहा, "मुन्ना, दूध ख़तम कर और अपनी दीदी को जगा दे बीटा." आज उन्हें अपने बेटे का देखना बुरा नहीं लगा था लेकिन नारी
सुलभ मन. बस इसलिए उन्होंने उसका ध्यान ह्त्या. "जी माँ. "
अर्जुन ने माधुरी दीदी का दरवाजा बजाय तोह वह अंदर से बंद था लेकिन एक हे बार दस्तक देने पर कोमल दीदी की आवाज आ गई. "उठ गए है." फिर उसने
ऋतू दीदी के कमरे के दरवाजे पर हाथ रखा तोह वो सिर्फ भिड़ा हुआ था. उसका एक पैट खुल गया तोह अर्जुन ने देखा अलका दीदी प्रीती से पीछे से चिपकी थी
और उनके कूल्हे बहार की तरफ निकले थे. प्रीती सीडी लेती हुई बड़ी सुन्दर लग रही थी. चेहरे से निचे एक चादर से लिपटी थी. उधर सबसे आखिर में
ऋतू दीदी जिनका हाथ प्रीती की छाती के पास और कमर से ऊपर था और मुँह उसके गले के पास. टीशर्ट तोह उनकी कमर से ऊपर छड़ी थी. अर्जुन मुस्कुराता
हुआ अंदर गया और अलका दीदी के ऊपर से प्रीती के गाल थपथपाने लगा. उसकी neeli-hari आँखे जैसे शटर की तरह आराम से ऊपर हुई और एक चेहरा
बिलकुल उन आँखों में खोया सा नजर आया. प्रीती को ऐसी तोह कोई उम्मीद हे न थी के एक सुबह ऐसी भी होगी. वो इन्ही पालो में खोई थी की उसके होंठो पर
तपते हुए होंठ आ लगे और फिर वापिस उठ गए. बस एक पल में जो हुआ उसकी धड़कन दिल से बहार निकलती लगी. "उठ जाइये मेमसाब" बहोत धीमे से अर्जुन ने
कहा और पीछे को सरक गया. खुली आँखों से सपनो में खोई प्रीती शर्मा कर ऋतू दीदी से लिपट गई. "साड़ी रात चिपक कर दिल नहीं भरा क्या तेरा?
मई अर्जुन नहीं हु. चल सोने दे." ऋतू दीदी ने नींद में इतना कहा और खुद भी प्रीती को बाँहों में कास लिए. "दीदी, उठ जाओ आज आपका पेपर है." अर्जुन ने
ऋतू दीदी की हरकत देख मुस्कुराते हुए अलका दीदी को हिलाया. प्रीती ने एक बार पलट कर देखा फिर वापिस नजर घुमा ली.
"उठ गई रे मई तू चल." अलका दीदी ने अंगड़ाई ली तोह उनके कबूतर भी हिल गए, शायद अंदर उनका पिंजरा उन्होंने रात में हे खोल दिए था. अर्जुन को अपनी
तरफ देखता पा कर अलका दीदी लाल हो गई और मुस्कुरा कर बोली, "ऐसे लड़कियों के कमरे में नहीं आते मिस्टर. अब चलो बहार निकलो."
"तू ऐसे मेरे से चिपक कर क्यों मुस्कुरा रही है." यहाँ ऋतू दीदी भी उठ गई तोह प्रीती को अपनी तरफ मुस्कुराते देख बिना सोचे समझे बोल उठी. "ोये
निकल तू बहार. अलका ये कब आया यहाँ पे?" अर्जुन को नखरे से दांत टी ऋतू ने कहा तोह अलका दीदी ने अपने कंधे उचका दिए और अर्जुन बहार भाग गया.
"ये शर्मा रही है तू मुस्कुरा रही है. चल क्या रहा था यहाँ पे?" ऋतू दीदी बिस्टेर से निकलते हुए बोली और अपने बाल पीछे कर रबर लगाने लगी.
"मुझे क्या पता. मई जब उठी तोह अर्जुन मेरे पास खड़ा था और जगा रहा था. अब प्रीती और इसने क्या किआ मुझे नहीं पता." अलका ने प्रीती की चद्दर
हटते हुए कहा और वह भी कपडे ठीक करने लगी. "चलो महारानी जी आप भी उठ जाओ. यहाँ चाय बिस्टेर में नहीं मिलती सबके साथ पीनी पड़ती है. और
अब बस भी कर ये मुस्कुराना." अलका ने ये बात कही तोह प्रीती ने भी अंगड़ाई ली लेकिन अब तोह उन दोनों की आँखें भी फ़ैल गई उसकी तरफ नजर करते हे.
एक झीनी से बनियान प्रीती के शरीर पर थी और उसकी टीशर्ट तकिये के पास पड़ी थी. अंगड़ाई लेने के साथ हे वो बनियान बस निप्पल पर आकर हे रुक गई.
"ोये अब सुबह सुबह ये मत दिखा. जल्दी कर और अपने कपडे pehan,maan लिया की सब सही है तेरा अंदर से और रात चेक भी कर लिए. लेकिन एक पल और
ऐसे रही तोह तेरी चाय यही गरम हो जाएगी." ऋतू दीदी ने ये बात कही और प्रीती ने जल्दी से टीशर्ट ऊपर पहन ली. "आप न सच में बड़ी गन्दी हो दीदी."
शरमाते हुए प्रीती ने कहा. "ाचा मई गन्दी हु? राति तोह बड़ा मेरे अंदर आ रही थी अब देखो जरा कैसे सटी सावित्री बन रही है." अलका तोह इतना
सुनते हे हंसने लग पड़ी पेट पकड़ कर. "ऋतू बस कर यार. तू बेचारी की जान लेकर मानेगी. वो सोइ तोह कपड़ो में थी और देख तूने क्या किआ रात भर
इसके साथ." "आज तू सो जा अलका फिर तू भी कहेगी की लड़का होती तोह कितना मजा आता." और आँख दबा दी.
"ऋतू, अभी तक नहीं उठी क्या?" रेखा जी की आवाज सुनते हे तीनो जैसे बिजली की तरह सब सही कर बहार आ गई. प्रीती तोह बाथरूम में जाकर मुँह धोने
लगी और अलका और ऋतू दीदी ने आँगन में लगे नल पर हे चेहरा साफ़ कर लिए.
"आ मेरी बची इधर मेरे पास आ." कौशल्या जी ने प्रीती को अपने पास बिठा लिया और उनके साथ हे अलका और ऋतू दीदी बैठ गए. अर्जुन बहार बगीचे में
पानी दे रहा था रामेश्वर जी के कहे अनुसार.
"बीटा नींद तोह ठीक से आई न तुझे यहाँ? कोई दिक्कत तोह नै आई?" उन्होंने प्रीती से पुछा था
"इतनी अछि नींद तोह दादीजी पहले कभी नहीं आई. वह तोह अकेले सोती हु और कब आँख लगे न लगे पता नहीं रहता. लेकिन ऋतू और अलका दीदी के साथ
ाचा लगा." प्रीती ने चाय का कप उठाते हुए जवाब दिए. कौशल्या जी उसके बालो में हाथ फेर रही थी. "चाय पी ले फिर तेरे बालो में तेल लगा देती हु
देख तोह जरा कैसे रूखे हुए है." उनकी बात से प्रीती खुश हो गई. "है आज इस अंग्रेजन के सामने हमारी क्या बिसात. दादी को तोह बस यही ाची लगती
है. याद है न अलका गली में कुल्फी वाले को घर के अंदर रेहड़ी के साथ बुला लेती थी दादी इसके लिए कही इसका रंग पक्का न हो जाये." ऋतू की आदत थी
ऐसे मजाक करने की और कौशल्या देवी को उसका यही अंदाज पसंद था. "और उस रेहड़ी पर बैठकर तोह घंटी जैसे मई बजती थी? तू खुद हे तोह कहती
थी गुड़िया को बहार नहीं जाना, बाबा ले जायेगा इसको." कौशल्या जी भी अपनी बच्चियों का बचपन याद सा करने लग पड़ी.
"दादी आप अभी भी पकोड़े वाली कढ़ी बनती हो?" प्रीती ने उनकी तरफ देखते हुए ये बात कही तोह जवाब अलका ने दिया, "दादी ने आखिरी बार शायद कुछ 5-6
साल पहले कोई सब्जी बनाई होगी. इनको तोह याद भी एक हे बचा रहता है, इनका राजा अर्जुन जिसके लिए अँधेरे में हे दूध और बादाम पीसती है ये. तू तोह
आज हे खा लिओ कढ़ी." अलका का व्यंग सुनकर कौशल्या देवी मुस्कुराई और फिर बोली, "Rekha-Lalita, रसोईघर खली कर देना नाश्ते के बाद तुम दोनों. आज दोपहर
का खाना मई बनाउंगी. सूजी का हलवा, कढ़ी और मिस्सी रोटी." उनकी बात सुनकर तोह devrani-jethani भी थोड़ी हैरान हुई लेकिन बोली कुछ नहीं.
"सूजी का हलवा कोण बना रहा है?" घर के अंदर आते हुए अर्जुन ने ये बात कही जिसके साथ रामेश्वर जी भी चले आ रहे थे. ऋतू और अर्जुन का पसंदीदा
था सूजी का हलवा और कढ़ी तोह हरयाणा में प्रसिद्ध है हे.
"आज तेरी दादी हे बना रही होगी नहीं तोह घर में दिवाली या दुर्गाष्टमी पर हे हलवा बनता है." रामेश्वर जी भी कुर्सी पर बैठ गए ये बोलते हुए.
"ये मेरी जगह पर इसको बिठा लिए दादी?" अर्जुन ने अपनी कुर्सी पर बैठी प्रीती की तरफ इशारा करते हुए कौशल्या जी से कहा.
"तेरा नाम लिखा है क्या इस्पे? चल नाहा ले ऊपर जा के आया कुर्सी वाला?" ऋतू ने हेकड़ी दिखते हुए कहा तोह सब हंस दिए और मिटटी से सना अर्जुन ऊपर
चल दिए. ऐसे हे बातें चल रही थी और नाश्ता तैयार होने लगा था. प्रीती दोपहर को आने का बोल कर घर चली गई थी. माधुरी दीदी और कोमल दीदी
बहार अपना रोज वाला काम कर रही थी, कपडे धोने का. रेखा जी को पता था के अर्जुन ऊपर सुस्ती दिखा रहा होगा और उसको ऋतू को कॉलेज भी लेकर जाना है
तोह वह उसको बुलाने ऊपर गई. वो नाहा कर निकला था और अपने कमरे में खड़ा था बिस्टेर के किनारे. बेध्यानी में उसने अपना टोलिया सरकाया और इधर रेखा जी
अपने बेटे के कमरे के बहार थी. उनका मुँह खुला रह गया अपने बेटे का हाल देख कर. अर्जुन का लुंड हलके तनाव में था जो की आम बात थी. लेकिन रेखा जी
ने तोह अपनी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ पहली बार देखा था. होश में आते हे वह दापे पाँव पीछे हैट गई और इधर अर्जुन ने अपने बीएड पर पड़ा साफ़ कच्चा पहना
और ऊपर बनियान दाल ली. अब रेखा जी हलके शोरे से आवाज देते कहा, "मुन्ना तू तैयार हो गया.?" और उसके कमरे के बहार आ गई. अर्जुन ने अपना चेहरा दरवाजे
की तरफ करते हुए कहा, "बस माँ हो हे गया. वो कमीज के बटन लगा रहा था लेकिन रेखा जी चोर नजरो से अपने बेटे के कच्चे पर बने उभर को देख रही
थी. " तू तोह समझदार हो गया जो कमीज पेंट पहन ने लगा रे." उन्होंने बस ध्यान हटाने के लिए ऐसा कहा था.
"है माँ. संजीव भैया और दादाजी ने कहा के घर पर तोह पजामा टीशर्ट ठीक है लेकिन कही बहार जाओ तोह थोड़ा देख भल के ाचे से तैयार हो के जाना चाहिए."
और जैसे जैसे वो जीन्स ऊपर करता गया रेखा जी भी कुछ संभल गई. उसको आने का बोलकर वो खुद निचे चली गई और फिर सबके लिए खाना लगाने लगी.
"दीदी, आपका पेपर कितनी देर का है?" अर्जुन ने रास्ते में स्कूटर चलते हुए ऋतू दीदी से पुछा जो अपने भाई की पीछे चिपकी सी बैठी थी.
"3 घंटे का है. तू बता क्या करना है तुझे?" अपने हाथ को उसकी कमर पर फिरते हुए कहा
"कुछ नहीं मई 3 घंटे क्या करूँगा ये सोच रहा था.?" अर्जुन की बात ऋतू को समझ आ गई थी जो सही भी थी.
"ाचा तू एक काम करियो, मेरा पेपर है 9-12 और तू मुझे कॉलेज गेट पर उतार कर अगली मार्केट में चला जैव. वह सुना है सिनेमा है 2-3 पास पास में.
11:45 तक वापिस आ जाना." दीदी की बात उसको भी जाँच गई. फिर कुछ मस्ती में जब उसने देखा की ये सड़क खाली है तोह अपना हाथ पीछे कर उनका एक उभर
सूट पे से हे सेहला दिए. "तू मार खायेगा. ऐसी हरकत सड़क पर नहीं करते.' ऋतू दीदी ने भी देख लिए था के वह कोई भी नहीं था फिर भी नाटक करते
उन्होंने ये बात कही. "आप न मेरी हो तोह जो मेरा है उसके साथ मई कुछ भी कही भी करू."
"ाचा बाबा. लेकिन न हम दोनों किसी परिवार से तोह है जिसको सब जानते भी है. अब खुद सोच ले." अर्जुन दीदी की बात से शांत हो गया. "अकेले में तू जो
मर्जी कर मेरे भाई. मई तोह खुद पूरी तेरी हु. " थोड़ा चिपक अपने दोनों दूध उसकी पीठ से लगते ये कहा तोह अर्जुन ने समझदारी से कहा. "है वह
जब सुबह आपको जगाने रूम में गया था तभी से दिल में था के एक बार आपको गले लागू, प्यार करू फिर आप हे देखो. गलती से सबर नहीं रहा."
"चल कोई बात नहीं अब तू मुझे उतार और आगे किसी से भी पूछ लिओ. Bye" इतना बोलकर ऋतू दीदी कॉलेज के आगे उतर कर अंदर भाग गई और अर्जुन अगली
मार्किट की तरफ बढ़ गया.
"जलता बदन" ये पोस्टर एक सड़क किनारे बने शौचालय की दिवार पर चिपका था. और इस शीर्षक के साथ वैसे हे 5-6 पोस्टर से पूरी दिवार भरी हुई थी.
अर्जुन को तोह इसका कोई अनुभव नहीं था तोह लाल रंग की उस इमारत की तरफ चल दिए वो खुली पार्किंग में स्कूटर खड़ा कर. मुश्किल सी 12-13 लोग टिकट
की खिड़की पर खड़े थे. सिनेमा के प्रवेश द्वार पर मुँह पर कपडा लपेटे 2-3 ladkiya/aurate भी थी. अंदर से तोह वो घबरा रहा था लेकिन सोचा चलो
आज ये अनुभव भी ले लिए जाये. 100 का नोट भाड़ा दिए उसने छोटे सी सलाखों वाली की खिड़की के अंदर बैठे आदमी की तरफ. एक मरियल सा अधेड़, शायद मुँह
में तमभखु या गुटखा दबाये उसके और देखते हुए बोलै, "हॉल या बालकनी? हॉल का 20 बालकनी का 50." थोड़ा सयंम से अर्जुन ने कहा, "बालकनी की एक."
"अंदर की तरफ हे दिवार पर लाल पिचकारी मार कर उसने एक बस टिकट जैसी गुलाबी रसीद और 10-10 के 5 नोट उसकी और बढ़ा दिए. "अगला बोलो." अर्जुन
वह से हैट गया और जिधर की तरफ बाकी सब जा रहे थे वो भी पीछे चल दिए. "ऐ टिकट दिखाओ." एक खस्ताहाल लकड़ी के दरवाजे के अंदर जाते हे
एक और मरियल सा अर्जुन के सामने आ गया. खाखी वर्दी जो उसके शरीर पे झूल सी रही थी, हाथ में एक स्टील की बैटरी जो उनदिनों चौकीदार जैसे लोग
भी रखते थे लिए खड़ा उस से बोलै, "टिकट दिखाओ भाई." अर्जुन ने भी वो पर्ची सामने कर दी. "वो ऊपर की तरफ चले जाओ जहा लाइट दिखा रहा हु.
दरवाजा खोल कर किसी भी सीट पर बैठ जाना." उसने हॉल के अंदर थोड़ी उचाई की तरफ जाती सीढ़ियों से लाइट मारते हुए एक बक्से नुमा कमरे की तरफ
रौशनी रोक दी. पूरे हाल में ठंडक सी थी अजीब से, और लकड़ी की एक के साथ एक जुडी कुर्सियां. कही पर गद्दी थी तोह कही पर नहीं. वो ऐसे हे देखता हुआ
ऊपर छड्ड गया. एक पतली सी गली थी जहा ये 4 बक्से नुमा कमरे एक कतार में थे. पहले वाले को छोड़कर वह अगले के दरवाजे को खोलने लगा. हल्का हाथ
रखते हे वो खुल गया. अंदर 2 कतार थी कोई 6 सीट की. एक पिछली कतार की सीट जो दरवाजे सी बिलकुल दूर थी वो वह बैठ गया. ाची सीट थी यहाँ पर
तोह. पीठ की तरफ भी और निचे भी सोफे की तरह. कहा जाए तोह सोफे हे थी वह तीन एक साथ फिर एक हटती बीच में फिर तीन सीट. घडी का रेडियम बता
रहा था के 9 बज चुके है. पूरा हाल अँधेरे में डूब गया. कुछ हे देर में बड़ी स्क्रीन पर हिंदी के नंबर चलने लगे लेकिन अभी इतनी लाइट नहीं थी की
सबकुछ दिखाई दे. उसका ध्यान सामने था और इधर दरवाजा खुला और एक जोड़ा हलके से फुसफुसाता अंदर दाखिल हुआ. उन्हें अर्जुन नै दिखा.
"क्या कर रहे हो. जरा भी सबर नहीं है. काम से काम अंदर आकर बैठने तोह दो." ये एक लड़की की आवाज थी. मतलब कोई जोड़ा आया था अंदर. और वो दोनों
अर्जुन से जुडी तीन वाली सीट पर बैठ गए. दरवाजा अंदर से बंद होने की भी आवाज आई थी अर्जुन को. संकोच वश उसने नजर सामने कर ली जहा कोई
शादी का सन चल रहा था और शायद ये दक्षिण भारत की हिंदी में बदली फिल्म थी.
कुछ पल बाद सन बदल गया. अब लड़की बिस्टेर पर बैठी थी. ये सांवली सी और थोड़ी भरी शरीर की लड़की कहो या औरत, थी. साथ में हे उसको उन दोनों
के kachar-pachar सुन्न रही थी. वो जोड़ा कुछ बोलते बोलते चूमा छाती में लगा था. परदे पर अब सन ये था की एक मुचो वाला आदमी जो की दूल्हा था वो
लड़की का घूंगट उतार उसके ऊपर लेता उसको चूम रहा था. "ोूम आह्हः. तुम तोह अप्सरा हो मेरी जान." मुचड़ आदमी जिसने अपनी कमीज निकल दी थी और
सिर्फ एक लुंगी में था कुछ ऐसे बोलै और उस लड़की की साड़ी जिसम से अलग थी. यहाँ बॉक्स के अंदर भी अब ummm-aah की सिसकारियां चल रही थी. अर्जुन तोह मजे से
दोहरा हुआ जा रहा था. उसने एक बार नजर उन दोनों की तरफ की तोह नजर भी वही रुक गई. उन दोनों पे इतनी रौशनी गिर रही थी के कुछ हद्द तक साफ़ दिख
रहा था. लड़की की चुन्नी उसकी बगल में राखी थी और लड़का उसकी कमीज ऊपर कर लड़की को अपनी गौड़ में लिटाये उसके दूध पी रहा था. "सोनू मेरी जान ये
तुम्हारे दूध कितने बड़े है. दिल करता है इन्हे ऐसे हे खता राहु." वो ऐसे हे एक बार ऊपर उठा और फुसफुसाया जो अर्जुन को भी सुनाई दिया. दोनों में से
किसी का चेहरा नहीं दिख रहा था. फिल्म वाले परदे पर भी ऐसा हे कुछ चल रहा था, लेकिन वह वो मुचड़ आदमी ब्रा के ऊपर से हे उस लड़की के खरबूजे
चाट रहा था.
"थक्क थक्क." दरवाजे पर एक दस्तक हुई तोह लड़की ने जल्दी से कमीज निचे करि. लड़के ने उठकर चिटकनी खोली तोह सामने वही आदिमी था जो टिकट देख
रहा था सबकी. उसने अपनी टोर्च की लाइट जलाई और उस लड़के के चेहरे पर मारी, फिर लड़की के. यहाँ उस लड़की के चेहरे पर लाइट गिरी वह अर्जुन के दिमाग
में करंट लगा. उसके मुँह से दबी आवाज में सिर्फ इतना हे निकला, "नुसरत" जो उस लड़की ने भी सुना और घबरा के वही जम्म सी गई. इधर वो टिकट वाला शायद
बहस कर रहा था उस आदमी से. "ऐ ये सिनेमा है. फिल्म चाहे गन्दी लगती हो लेकिन ये अयाशी का अड्डा नहीं है. निकलो इस रंडी को लेकर यहाँ से." उस आदमी
की आवाज तेज थी जो सभी ने सुनी थी. साथ वाले बॉक्स से भी 2-3 लोग निकल आये थे और पूछने लगे क्या बात हुई है, जैसा की अमूमन खाली लोग करते हे है
"अरे मैंने बताया न भाई मेरे साथ नहीं है वो. मई तोह अकेला आया हु यहाँ." ये तोह आदमी हे हिजड़ा निकला. अर्जुन ने कुर्सी के किनारे पड़ी चुन्नी नुसरत की
तरफ फेंकी. एक पल के लिए रुक कर उसने फिर वो अपने चेहरे से लपेट ली.
"मैंने खुद देखा था तुम्हे लड़की साथ लाते हुए. परदे के सामने से हमारे आदमी ने देखा था तुम्हे कुछ करते हुए." उसकी बात सुनकर तोह अर्जुन को समझ
आ गया की मामला कुछ और है. "मई सच बोल रहा हु भाई ये लड़की मेरे साथ नहीं है. मई तोह ######## कंपनी में सेल्समेन हु और आज हे इस शहर आया
हु. अभी समय खली था तोह फिल्म देखने चला आया." उस आदमी की जान हलक में आ चुकी थी और उसने धीमे से कुछ पैसे अपनी जेब से निकल कर उस मरियल
आदमी की ऊपर जेब में दाल दिए. कोई इशारा किआ तोह वो अपना बैग उठा के वह से नौ दो गिरह हे हो गया.
"ऐ लड़की तू किसके साथ है? साली धंदा करती है." उसने इतना कहा तोह 2 लोग और भी अंदर की तरफ आने लगे.
"कान के निचे थप्पड़ खींच के मारूंगा तोह समझ आ जाएगी लड़की से बात कैसे करते है." अर्जुन गुर्राता सा खड़ा हुआ. 6 फ़ीट का तगड़ा जवान देख
कर वो आदमी हड़बड़ा गया. "भाई.. ये तुम्हारे साथ है क्या?"
"मेरे साथ है तभी यहाँ बैठी है. चल निकल यहाँ से चुपचाप. पैसे दे कर फिल्म देख रहे है फ्री में नहीं जो ड्रामा कर रहे हो."
"अरे ओह टिकट वाले क्यों जवान जोड़े को परेशां कर रहा है भाई. कॉलेज वाले है सोच के पन्गा लिए कर नहीं तोह तेरा सिनेमा टॉड देंगे और तुझे भी."
ये वो आदमी बोलै जो शुरू में आवाज सुनकर साथ वाले बॉक्स से आया था. एक और ने सुर में सुर मिलाया. "तू निकल रे. फिल्म की माँ छोड़ के रख दे. अब मई
मरूंगा तेरे कान के नीचे." वो मरियल सा आदमी दरवाजा बंद कर खिसक लिए बहार. उसने सोचा था पैसे के साथ लड़की के ऊपर भी हाथ फिर लेगा लेकिन
यहाँ तोह जान हे बच गई बहोत था. अब बॉक्स में दोनों चुप थे. फिर कुछ देर बाद अर्जुन हे बोलै..
"तोह ये पढाई भी करती है आप?" नुसरत तोह बस इतना सुनते हे जोर जोर से सुबकने लगी. अर्जुन पहली बार किसी लड़की को रोने से नहीं रोक रहा था. पता
नहीं क्यों. शायद उसको ाचा नहीं लगा था ये सब देख कर.
"मुझ से गलती हो गई अर्जुन. मुझे माफ़ कर दो. मई ऐसी लड़की नहीं हु जैसे तुम मुझे आज देख रहे हो?" उसने सुबकते हुए हे कहा.
"कौन था ये आदमी? और तुम एक ऐसे आदमी के साथ यहाँ तक आ गई.? किसी ाची जगह भी तोह जा सकती थी अगर ये सब करना था?" अर्जुन आवाज धीरे लेकिन
सख्ती से कर रहा था.
"मेरे बड़े जीजा है ये. कुछ दिन पहले इन्होने मेरे कमरे में मुझे और आशा को देख लिए था एक साथ. उसके बाद से हे मुझे बोल रहे थे बहार चलने के
लिए नहीं तोह मेरे maa-baap को बोलने की धमकी दे रहे थे." नुसरत ने इतना कहा तोह अर्जुन ने सर पे हाथ रखा और फिर पुछा, "क्या कर रही थी तुम
दोनों जो ये ऐसी हरकत करने पर उतर आया."
"वो.. वो आशा मेरे साथ अकेले में मस्ती कर रही थी. उस दिन स्टडी के लिए घर हे रुकी थी मेरे. जीजा ने खिड़की से झाँक कर देख लिए था." वो फिर
रोने लगी.
"तुम जानती हो जैसे वह तुम्हे यहाँ अकेली छोड़ कर भाग गया उसके बाद तुम्हारे साथ क्या करते ये लोग." अर्जुन की प्रश्न से नुसरत हिल गई थी.
"वो मुझे ये बोलकर लाये थी की एक बार उनके साथ होटल चल पदु. मैंने मन किआ तोह फिर कहा के एक फिल्म देख लो मेरे साथ और सिर्फ वैसे हे करने
देना जैसे अपनी सहेली के साथ कर रही थी. फिर कभी कुछ नहीं करूँगा या कहूंगा. और यहाँ छोड़ कर भाग गया." वो अर्जुन के सीने से लग कर रोने
लगी थी.
"पहले तोह मई सोच रहा था के अलका को सब असलियत बता दूंगा के देख लो कैसी सहेली है तुम्हारी. इस सब में ऐसा नहीं के वह आदमी हे पूरी तरह
गलत है. तुम्हे उसका विरोध वही करना चाहिए था जब तुम्हे उसने पहली बार ये सब कहा. लेकिन सुधर जाओ बस इतना कहूंगा. गलत सहने से ाचा
उसका विरोध करना है. आज यहाँ कोई तुम्हारी इज़्ज़त्त नीलाम कर देता तोह पूरे घर की बेइज़्ज़ती होती. लेकिन तुम उस दगाबाज के साथ बिना कुछ सोचे आ
गई." इस हंगामे के बीच मध्यांतर हो गया था. और रौशनी हो गई थी. 2-3 लड़के cola-paani-fulle के पैकेट बाल्टी में रख कर बेच रहे थे हर
सीट के पास जाते हुए. निचे तोह मुश्किल से 30 लोग थे और बॉक्स वाली जगह भी 5-6 हे फिल्म देखने आये थे. एक लड़के से 2 ठन्डे की बोतल लेकर अर्जुन ने
वही राखी और उसको फिल्म के बाद उठा लेने को कहा. लाडखा पैसे ले मुस्कुराता चला गया बहार. "चलो बाथरूम चलकर मुँह साफ़ कर लो. अगर तुम्हे बहार
जाना है तोह मई छोड़ आता हु. मेरी मज़बूरी है के अभी डेढ़ घंटा रुकना पड़ेगा यहाँ." इतना बोलकर वह गेट की तरफ बढ़ा और नुसरत उसके पीछे चल दी.
बाथरूम उस तरफ हे बना था जिस तरफ से मुड़ने के लिए जगह थी. अर्जुन बहार खड़ा रहा और 5 मिनट बाद नुसरत बहार आ कर सीधा बॉक्स की और चल दी.
"तुम्हे घर नहीं जाना क्या?"
"घर पर 12 बजे तक का हे बोलकर निकली थी और इस वक्त घर नहीं जा सकती. जब तुम निकलोगे तोह साथ निकल जाउंगी." नुसरत अभी थोड़ा काबू में थी.
"ाची बात है. ये लो कोला पी लो. मई खुद नहीं पीटा लेकिन सोचा कभी पी लेना चाहिए." नुसरत ने बोतल जरूर हाथ में पकड़ ली थी लेकिन वह
अभी तक सेहमी हुई थी.
"देखो बात को यही ख़तम करो. जरुरी बात है के तुम ठीक हो. और किस्मत हे कह लो के मई यहाँ था क्योंकि मई इस से पहले सिनेमा नहीं आया कभी अकेले.
और तुम्हे भी किसी ने नहीं देखा." इतना कह कर एक बार फिर अर्जुन ने प्यार से सर सेहला दिए और बोतल वाला हाथ नुसरत के होंठो की तरफ उठा दिए.
"वो उसने मेरे चेहरे पर लाइट मारी थी." घबराते हुए नुसरत ने ये बात कही तोह अर्जुन को हंसी आ गई. आधा चेहरा वह से देखा होगा उसने. वो भी
इतनी तेज पीली रौशनी में तोह क्या याद रहेगा. अब तुम फिर वापिस आओ तोह पता नहीं." और हंसने लगा.
"वापिस तोह क्या अब मई मेरे घर से भी नहीं निकलने वाली." इतना बोलकर एक बार फिर वह अर्जुन से लिपट सी गई.
"तुम्हारा मई किस मुँह से शुक्रिया ऐडा करू अर्जुन? कहा मुझे तुमपर इतना गुस्सा आया था जब तुम उसदिन कॉलेज में मुझे पूरी तरह से नजर अंदाज कर
चले गए थे और कहा आज तुमने हे मेरी इज्जत बचाई. उस दिन इतना गुस्सा था मुझे तुम पर की जाने खुद को क्या समझते हो लेकिन मई हे गलत थी."
सुबकते हुए हे उसने अपने होंठ अर्जुन के होंठो से मिला दिए. अर्जुन ने अपनी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न दी. फिर कुछ देर में दोनों सीधे होकर बैठ गए.
इतना देर रो लेने के बाद प्यास लग रही थी तोह अब नुसरत धीरे धीरे कोला पी रही थी. परदे पर अब कोई नया हे सन चालु था. एक जवान लड़का जो
शायद उस घर का नौकर था वह घर के बहार पानी दाल कर सफाई कर रहा था. नयी दुल्हन जिसकी शादी हुई थी आज वह घर के कपड़ो में थी. आँगन
में उस लड़की का पेअर फिसलता है और वह जमीन पर गिरी नजर आती है. "कन्हैया मुझे उठाओ." वो लड़का जिसका नाम कन्हैया था वो भाग कर आता है और
"मालकिन" बोलकर उस लड़की को उठता है. कैमरा अब सिर्फ उस लड़की की गुब्बारों पर था जो चोंच वाले ब्लाउज में थे. अगले सन में दोनों कमरे में थे और
कन्हैया मालकिन को बिस्टेर पर दाल देता है. अर्जुन और नुसरत बस सन देख रहे थे. दोनों एक हे सीट पर अगल बगल में बैठ थे. "कन्हैया जाने से
पहले जरा मेरी कमर में बालम लगा दे. लगता है कमल लचक गई है कही से." वो लड़की होंठ काट ते हुए कहती है. ऐसे हे सन में आग वो लड़का कोई
तेल रगड़ रहा था जवान मालकिन की कमर पर. सफ़ेद पेटीकोट और ब्लाउज में पीठ के बल लेती वो सिसकारियां भर रही थी. शायद ये नकली हे थी क्योंकि
एक्टिंग हे कर रहे थे. अगले हे पल दोनों के होंठ एक दूसरे से चिपके और अब मालकिन कन्हैया की गौड़ में दोनों टंगे फैलते हुए उसको चूम रही थी. इधर
नुसरत का तोह बुरा हाल हो गया था लेकिन अर्जुन मुस्कुरा रहा था. "बेशरम" इतना बोलकर नुसरत उसको नाटक सा करती मारने को हुई और खुद उसपर गिर गई.
दोनों जगह एक हे सन चल रहा था. लेकिन इस बार अर्जुन के होंठ भी नुसरत के होंठो को बराबर चूस रहे थे. मजे में वो उसके ऊपर हे पसरी हुई थी.
फिल्म में नौकर अब मालकिन की सफ़ेद ब्रा में से निकलते बड़ा बड़े सांवले दूध चूम रहा था और यहाँ अर्जुन नुसरत की गोलियां नाप रहा था. नुसरत ने खुद
हे अर्जुन का हाथ अपनी कमीज के अंदर कर दिए और दोनों एक लम्बा किश करते गए. अब वह सन बदला तोह यहाँ भी. अर्जुन की गौड़ में नुसरत बैठी थी और
वो उसकी कमीज ऊपर कर उसके मॉटे दूध पी भी रहा था और दबा भी रहा था. सच में हे नुसरत के चुनचे खूब बड़े और कैसे हुए थे. ज्यादा मसले
नहीं गए थे अभी. सिनेमा के परदे पर भी अब वो मालकिन ऊपर से नंगी थी और लड़का अपना मुँह उसके खरबूजों पर चला रहा था. लड़की बीएड पर थी और वो
बस सिसकिया ले रही थी. कन्हैया की कमर कमर के ऊपर से हे हिल रही थी. अपने दूध अर्जुन को पीलता नुसरत ने हाथ उसकी पंत में डालना चाहा तोह अर्जुन
ने उसको थोड़ा पीछे खिसका खुद पंत का बटन खोल दिए. "ये क्या है?" नुसरत को तोह बिलकुल उम्मीद नहीं थी की किसी का ऐसा भी हो सकता है. उसने अपने
didi-jija को देखा था. लेकिन जीजा का तोह किसी मोमबत्ती जितना मोटा और 4-5 इंच का था. लेकिन ये डंडा तोह उसकी मुट्ठी में नहीं आ रहा था. "मेरे पास
तोह यही है. खुद देख लो अगर छोटा है तोह." अर्जुन ने शरारत से कहा और उसके निप्पल खींचते हुए वापिस होंठ चूसने लगा. मस्ती में नुसरत लुंड
को आगे पीछे करने लगी. "हम यहाँ नहीं कर सकते और न हे मई ये ले पाऊँगी. लेकिन तुम्हे खाली कर देती हु." नुसरत ने अर्जुन को देखते हुए कहा.
"मुझे कैसे खाली कर डौगी?"
"वो सब बाद में बताउंगी लेकिन कही देखा था. तुम बस मेरे ये दबाते raho."Itna बोलकर वो वापिस साथ में चिपक कर बैठ गई. और अर्जुन उसके दूध दबाता
रहा. नुसरत ने अपना मुँह लुंड के ऊपर कर ढेर सारा थूक उसपर गिरा दिए और सुपडे को चिकना करने लगी हाथ से. अर्जुन पूरा उत्तेजित था और उसका लुंड
भी फूल कर फटने को हो चूका था. नुसरत के हाट तेजी से लुंड पर चल रहे थे और दूसरे हाथ से वह उसके अंडकोष सेहला रही थी. अर्जुन ने दूध
दबाते हुए हे वापिस उसको चूमना शुरू कर दिए और एक हाथ सलवार से सीधा छूट पर ले गया. पूरी गीली थी नुसरत की छूट और कुछ बाल भी थे वह.
अपनी उगलिया छूट के छेड़ पर रगड़ते हुए वह नुसरत को भी मजा दे रहा था. इधर उसका हाथ थकने लगा लेकिन वो करती रही लुंड को आगे पीछे.
"मैंने भी कही कुछ देखा था. तुम करोगी वैसा?" अर्जुन ने कुछ सोचते हुए कहा तोह सिर्फ उसने हँ कहा. "इसको मुँह में ले लो?" नुसरत ने ना में सर हिला दिए
और फिर से थोड़ा थूक गिरा गर ाचे से मालिश करने लगी. अर्जुन ने वापिस ध्यान उसके बड़े चुचो पर लगाया और उन्हें मसलने लगा. मजे से नुसरत की
सिसकारियां निकलने लगे और हाथ लुंड पर जोर से चलने लगा. अब तोह अर्जुन का भी समा बन गया था. जैसे हे नुसरत की छूट फिर से गीली हुई इधर अर्जुन
के लुंड से पिचकारी उड़ती अगली सीट पर गई. 4-5 लम्बी पिचकारियां मारने के बाद कुछ वीर्य नुसरत के हाथो पर भी लग गया.
"इन हाथों से तोह अब कोई काम होने से raha."Apni कमीज निचे करती हुई नुसरत रुमाल से हाथ साफ़ करने लगी. उसकी साँसे उखड़ी हुई थी. रुमाल अर्जुन की
तरफ बढ़ाया तोह अर्जुन ने सिर्फ ऐसे हे उसको देखा. नुसरत खुद उसका लुंड साफ़ करने लगी और धीरे से बोली, "मई तोह चाहती हु के तुम मुझे चाहे मजे से
मार दो लेकिन ये जगह तुम्हारा अजगर लेने के लिए ठीक नहीं. अगली बार पक्का मुँह से भी करुँगी और कभी अलका के सामने कुछ कहूँगी भी नहीं. थैंक यू."
एक बार मुँह चूम कर वो कड़ी होने लगी तोह अर्जुन का भी ध्यान गया की फिल्म ख़तम हो चुकी है. नुसरत ने चेहरे पर चुन्नी लपेटी और वो दोनों वह से
निकल चले. बहार आ कर अर्जुन ने नुसरत को रिक्शा करा दिए और कॉलेज की तरफ स्कूटर बढ़ा दिए. 11:45 हो चुके थे.