Incest Pyaar - 100 Baar - Page 3 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

आप सभी से सविनय निवेदन है की अगले कुछ अपडेट में कहानी धीमी चलेगी लेकिन अपना साथ बनाये रखियेगा. कुछ चरक्टेर्स और कहानी में उनका किरदार इन 4 उपदटेस पर निर्भर कर सकता है. यहाँ शादी का ये सन आगे की कहानी का बहुत कुछ बयां करेगा. कहानी लम्बी है और इसमें कोई शक नहीं की इनमे kaam-sex की भरपूर चक्की चलेगी. लेकिन शीर्षक के हिसाब से थोड़ा प्यार भी जरुरी है ;) अगला अपडेट बस कुछ हे देर में. साथ देने के लिए धन्यवाद्.
 
अपडेट - 20

एहसास- कुछ नए


अँधेरा हे था अभी, जैसे 4 बजे थे. प्रीती का अलार्म मधुर स्वर में बजने लगा. अलसाई सी आँखों से अलार्म को देख कर उसपे हाथ रखा और गण बंद

हो गया. "ये क्या सितम है?" खुद से बड़बड़ाती हुई वो उठकर कमरे के अंदर बने हुए बाथरूम की तरफ चल दी. रेशमी सफ़ेद बटन वाले नाईट सूट और

वैसे हे पाजामे में उसका हर अंग गज़ब ध रहा था. अपने कमरे में वह ऐसे हे सोती थी. नित्यक्रम से फारिग हो वह अंदर हे लगे शीशे के सामने कड़ी

ब्रश करने लगी. हाथ के हिलने से रेहमी कमीज के अंदर छुपे उसको दोनों सेब भी हिलने लगे. दांत साफ़ करने के बाद अपने मुँह को ठन्डे पानी से धो

वह शीशे में खुद को देखने लगी. बाथरूम पूरा सफ़ेद रौशनी में नहाया हुआ था. हर छोटी से छोटी चीज ाचे से दिखाई दे रही थी. खुले हुए उसके

हलके भूरे बाल जो अब कंधे सो कोई 2-3 इंच निचे तक बड़े हे सलीके से तराशे हुए थे. गीले चेहरा हलके गुलाबी रंग की वजह से दिलकश नजर आ

रहा था. लम्बी पलकों के पीछे hari/neele रंग की जादुई आँखें, भरे भरे रक्तिम होंठ और प्यारी सी नाक. होंठो के किनारे की तरफ थोड़ा निचे एक

काल टिल जैसे इस पारी को नजर से बचने के लिए भगवान् ने दिए था. कपड़ो के बहार से हे पता चल रहा था के शरीर सिर्फ मांसल हे नहीं कड़ी म्हणत

से तराशा हुआ है. लम्बाई उसकी आभा को और बढ़ा रही थी. फिर से एक बार आँखों में ठन्डे पानी के चिन्ता मार वह मुँह साफ़ करती बहार आ गई.

अपने कपडे बदल कर अब एक रनिंग ट्रैक सूट और डिज़ाइनर स्पोर्ट्स शूज पहन कर वह ड्राइंग रूम से एक निगाह सब तरफ दाल धीरे से बहार आ गई. अभी

वो गेट के अंदर हे थी. कुछ सोच कर बहार हे इधर से उद्धार टहलने लगी. बेचैनी साफ़ नजर आ रही थी उसके इस खूबसूरत चेहरे पर.

.

.

खुद को माधुरी दीदी से चिपका देख अर्जुन के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान तैर गई. उनके गाउन के ऊपर से हे दोनों उभारो को सेहला कर वो उठ खड़ा हुआ.

निचे आकर तैयार हो वो अंदर के आँगन में आया और पानी पीने लगा. बाथरूम का दरवाजा खुला तोह नजर वही रुक गई. उसकी माँ ने जो गाउन दरवाजे

पर लगी हुक पर टेंगा था वह शायद दरवाजे में अटक गया था और अब नहाने के बाद उन्होंने उसको दरवाजा खोलकर निकलना चाहा. इतनी सुबह वैसे तोह

कोई भी नहीं होता यहाँ तोह यही सोच कर वो सिर्फ एक कच्ची में कड़ी दरवाजे से गाउन निकल कर बस पहन हे रही थी की उनकी नज़र अपने बेटे से मिली.

उनका तोह खून हे जैम गया क्योंकि अर्जुन सीधा उनको हे देख रहा था, जाने कबसे. जल्दी में उन्होंने गाउन लेकर दरवाजा बंद किआ तोह अर्जुन को उनकी गोरी

गांड की लकीर में फांसी काली कच्ची दिखी. गांड भी ऐसी थी की एक बार तोह वह अर्जुन के हथियार को हिला गई. उसने जल्दी से होश में आते हे पूरी

बोतल पानी की गले के निचे उतार खाली करि और बहार की तरफ निकल लिए.

"तोह जनाब इस समय निकल रहे है." प्रीती ने देखा की रामेश्वर जी के घर का दरवाजा खुला और अर्जुन उस के घर से विपरीत दिशा में दौड़ लिए.

"चलो अब प्यासा हे कुए के पीछे जाएगा." इतना बोलकर प्रीती धीमी गति से अर्जुन के पीछे हे दौड़ लगाने लगी. कोई 10-12 मिनट के बाद वो एक

बड़े पार्क में घुस गया और किनारे वाले ट्रैक पर दौड़ने लगा. अब स्पीड तेज कर दी थी उसने. आसमान में अभी भी हल्का अँधेरा था. प्रीती अब पैदल

चलने लगी उस तरफ जहा पार्क उस से तक़रीबन 300 मत्र दूर था.

"गुड मॉर्निंग बीटा." चक्कर लगता हुआ अर्जुन जब बुजुर्ग मंडली के पास से गुजर रहा था तोह आचार्य जी ने उसको विश किआ. जवाब में अर्जुन ने भी

उनको गुड मॉर्निंग बोलै और आगे चल दिए. वो सभी अपने वही रोज के काम में लगे थे. आचार्य जी गीली घास पर टहलते हुए कभी आसमान तोह कभी

आस पास की हरियाली और शांति में खोये थे. जैसे हे अर्जुन अंदर आने वाले रस्ते के पास से दौड़ता आगे निकला प्रीती भी अंदर आ गई. उसने भी

पीछे दौड़ना शुरू कर दिए, लेकिन थोड़ी अधिक रफ़्तार से. कुछ पालो में वह अर्जुन के आगे से भागते हुए निकल गे बिना उसकी तरफ देखे. अर्जुन

को भी उम्मीद नहीं थी की प्रीती सुबह पार्क आती होगी तोह उसने बस बिना हे ज्यादा ध्यान दिए दौड़ना जारी रखा. लेकिन एक लड़की उस से आगे निकल

गई ये सोच कर वो और तेज दौड़ने लगा. जैसे जैसे पास आता जा रहा था उसको लगा के ये लड़ी शायद देखि हुई है. प्रीती उसके कदमो की तेज गति

महसूस कर थोड़ा और तेज हो गई. इस रफ़्तार से वो दोनों तक़रीबन डेढ़ चक्कर लगा चुके थे और अर्जुन हार नहीं मान रहा था जबकि उसको थोड़ी

सांस चढ़ने लगी थी वही प्रीती के चेहरे पे एक विजयी मुस्कान थी लेकिन दूर दूर तक कोई थकान नहीं. इस चक्कर में जब वो दोनों वापिस आचार्य जी

के पास से गुजरे तोह प्रीती उस से 200-250 मीटर आगे हो चुकी थी. अर्जुन ने हताश हो आचार्य जी की तरफ देखा और उन्होंने सिर्फ उसको इशारे से

मुँह बंद रखने को कहा. कुछ समझ तोह नहीं आया लेकिन अगले 300 कदम पर वो रुक गया और घास पर चलते हुए आचार्य जी की तरफ चल दिए था.

और अब सामने से आती प्रीती पर उसकी नजर पड़ी तोह वह हैरान हे रह गया. वही प्रीती ने भी ऐसे दिखाया जैसे वह उसको वह देख कर हैरान

और खुश दोनों है. अपनी गति धीमी कर वो बिना रुके वह से दौड़ती आगे चल दी.

"बीटा ज़िद से कोई नहीं जीत सकता. वो तुम्हे को चुनौती नहीं दे रही थी. लेकिन तुम्हारा अहम् तुम्हे खुद चुनौती दे बैठा. और देखो खुद को कैसे

थके हुए लग रहे हो." उसको देख कर आचार्य जी हलके से मुस्कुराये और फिर समझाया.

"सही कहा सर आपने. लेकिन मई 10 कम ाचे से दौड़ लेता हु पता नहीं आज क्या हुआ?"

"बीटा बंद कमरे में टारगेट पर 6 में से 6 गोलिया अचूक लगती है लेकिन जुंग के मैदान में 10 गोलिया भी एक सही जगह लग जाये तोह बहुत है.

प्रतिस्पर्धा (कम्पीटीटीओ) जीवन में आगे बढ़ने के लिए जरुरी है. ये तोह शायद तुमने स्कूल में सीखा हे होगा?" उनकी बात समझ आ गई थी अर्जुन

को. वो 8 घंटे रोज पढता था तब कही जा कर क्लास में अव्वल आता था और दूसरे नंबर पर आने वाला विद्यार्थी मात्रा कुछ हे अंक पीछे रहता था.

"बिलकुल ठीक कहा आपने सर. लक्ष्य हांसिल करने की दौड़ में साथ में कई लोग भागते है लेकिन कोई एक हे उसको हांसिल कर पता है. मेरी गलती थी

के अकेला भाग कर जीत रहा था और आज पहली हे रेस में हार गया."

"सोच तोह बिलकुल जायज है तुम्हारी बीटा लेकिन जिसको तुम प्रतिद्वंदी समझ रहे थे मुझे तोह वो शायद कोई तुम्हारा भला सोचने वाला लगता है."

बुजुर्ग तोह थे साथ भी नजर भी कमाल की थी आचार्य शास्त्री जी की. और उनकी बात समझने के बाद अर्जुन झेंप गया.

"ाचा तोह अब बताओ के कल जो सीखा था उसमे कितना काम्याद हुए?" उनका आशय ध्यान लगाने से था.

"दिनभर तोह मई सीखता हे रहा सर. लेकिन जब रात में अकेले छत्त पर जाकर ध्यान लगाया तोह शांत वातावरण में भी बहुत कुछ सुना. दूर से

आती धीमी आवाज, और उसके बीच में हे कोई और आवाज. थोड़ा जोर देने पर मई दोनों को अलग अलग महसूस कर पाया था." अर्जुन को रात का मंजर याद

आ गया था.

"ाची बात है बीटा लेकिन जब भी समय मिले तोह ये जरूर करते रहना. आज का तुम्हारा पाठ है "आकर्षण और प्यार". क्या तुम्हे दोनों में फरक

पता है?"

"जी सर कोई जिसको हम पहली बार देखे और उसके बाहरी रूप से हम प्रभावित हो जाये तोह बस वो एक आकर्षण हे है. लेकिन किसी को अंदर से

पहचान ने के बाद सिर्फ उसको याद करने भर से हम को आराम मिले या दुःख हो तोह वह प्यार होता है. ऐसा मुझे मेरे दादा जी ने मुझे समझाया

था जब उन्होंने मुझे कृष्ण जी और मीरा जी की कहानी सुनाई थी." अर्जुन का जवाब आचार्य जी को लाजवाब कर गया. उन्हें लगा की ये लड़का संस्कार

की शिक्षा भी लिए हुए है तोह सीधा बड़ा सवाल कर दिए. "वासना और प्यार" में क्या फरक होता है अगर पता हो तोह."

"नहीं सर ये वासना शब्द अगर सुना भी है तोह इसका मतलब नहीं पता." अर्जुन ने बिना झिझक के कहा. उधर प्रीती थोड़ी दुरी पर 2 बुजुर्ग व्यक्तिओ

के साथ हे बैडमिंटन खेल रही थी. शायद वो दोनों पहले से खेल रहे थे और प्रीती भी इनमे शामिल हो गई हो.

"ध्यान से समझना के इन दो शब्दों के अर्थ में क्या फरक है. फिर खुद अपनी ज़िन्दगी से जोड़ना दोनों को."

"वासना. मतलब एक भूख या लालच. इसमें इंसान सिर्फ पाने के लिए सोचता है. चाहे वो धन हो या तन्न हो. अगर सबकुछ होने के बाद भी किसी

दूसरे का हक़ जबरदस्ती लिया जाये वो वासना है. किसी साफ़ मैं के व्यक्ति को अँधेरे में रख कर उसके विश्वास या दिल से खेलना भी यही है. इसमें

सिर्फ लेने की चाह है. कोई सुन्दर शरीर भी भोगने की हे वास्तु लगेगा, सामने वाले की मर्जी हो या नहीं. आकर्षण की अधिकता से भी ऐसा हो सकता

है. वही दूसरी तरफ प्यार है. साफ़, स्वच्छ और निर्मल. यहाँ कोई भी किसी पर जोर नहीं देता. किसी के दुःख में उसका साथ देना, निस्वार्थ. इंसान

की मर्जी या इज़्ज़त को सम्मान देना. भरोसे को मजबूत करना. और बात अगर लेने या देने में से किसी एक पर आ जाये तोह स्वयं हे दे देना. इसको प्यार

कहते है." उन्होंने रुक कर फिर कहा, "सोच रहे हो की योग और प्राणायाम का इन सब से क्या लेना देना? जब तक मन निर्मल और शांत नहीं होगा तोह बीटा

बताओ शरीर और आत्मा का योग कैसे संभव है. कैसे एक अशांत मन ध्यान लगा सकता है?" धीरे धीरे हे सही लेकिन आज बात बहुत बड़ी कर दी

थी आचार्य जी ने. "अब मई भी चलता हु मेरे दोस्त. कल फिर मिलेंगे. अपना ध्यान रखना." सर सहलाकर वो अपनी mirtra-mandli की और हो लिए. अर्जुन

को अकेला देख प्रीती जो अब खेल नहीं रही थी वह उसकी तरफ चली आई.

"बड़े हे दिलचस्प दोस्त है जी आपके?", अर्जुन को ऐसे किसी बुजुर्ग के साथ इतनी देर तक बैठे देखा था तोह आते हे मजाक से हे बात शुरू करि.

"बस ऐसे हे जब दिल करता है तोह आचार्य जी से भी बात कर लेता हु. लेकिन तुम यहाँ और वो भी इतनी सुबह.?"

"मुझे रनिंग करते देख समझ नहीं आया क्या?" थोड़ा इत्र कर जब प्रीती ने बात कही तोह अर्जुन ने हलके से मुस्कुरा कर जवाब दिए. "सोचा भी

नहीं था अगर सच कहु तोह. कमाल हो मतलब. लेकिन आज तुमने भी मुझे कुछ सीखा हे दिए."

"ाचा जी हमने सिखाया और हमको हे नहीं मालूम." ये मुस्कान देख कर अर्जुन उसमे डूब सा गया. और फिर ज्यादा हे डूबता चला गया जब उसने पहली

बार ध्यान से Hari/neeli आँखों को देखा. कुदरत ने सारे रंग भर दिए हो जैसे इस चेहरे में.

"मिस्टर, बात नहीं करनी तोह फिर घर तक साथ हे चल पढ़ो." प्रीती की बात से तन्द्रा टूटी तोह वापिस कहना शुरू किआ, "आज पता लगा के अकेले

दौड़कर अकेला जीतने वाला कभी जिंदगी में जीत नहीं सकता." प्रीती ने साथ में चलते हुए ये बात सुनी तोह एक पल रुक कर कहा. "जरुरी तोह नहीं

जो साथ दौड़ रहा हो वह तुमसे मुकाबला कर रहा हो. ये भी तोह हो सकता है के वह तुम्हे तुमसे हे मिलवाना चाहता हो. कई रेस ऐसी भी होती है

जिनमे अकेले हे दौड़ना होता है लेकिन फरक सिर्फ इस बात से पड़ता है की उस दौड़ को जीतने के लिए तुमने कितनो को खोया या फिर कितनो को उस सफर

में अपना बनाया." दोनों चुपचाप गेट से बहार निकल आये. इतनी बड़ी बात कह कर प्रीती इसलिए चुप थी की कही अर्जुन को कुछ बुरा न लगा हो.

और अर्जुन ये सोच रहा था के ऐसी बात कोई लड़की इतनी काम उम्र में कैसे कर सकती है. सच में हे उसने अब आचार्य जी और प्रीती की कही बात

को जोड़कर देखना शुरू किआ. फिर सोच से बाहर आया तोह दोनों थोड़े दूर तक आ चुके थे. "रुको जरा." अर्जुन की बात से अभी तक चुप प्रीती वही

रुक गई और अर्जुन निचे बैठ कर उसके जूते के फीते बांधने लगा जो खुल गए थे लेकिन प्रीती को शायद पता नहीं चला था. बीच साक पर

अर्जुन की ये हरकत देख उसको एक बार तोह हल्का झटका सा लगा. लेकिन दूर दूर तक कोई खास लोग नहीं थे.

"वो तुम गिर सकती थी और शायद तुम्हे पता भी नहीं चला था. यहाँ बीच सड़क पर तुम बांधती ाची नहीं लगती." अर्जुन को देख कर प्रीती

बस मुस्कुरा भर दी. ज्यादा बातें नहीं हुई दोनों के बीच लेकिन जब भी कोई एक दूसरे को देखता तोह बस मुस्कुरा भर देता.

"ाचा तोह फिर कल मिलते है." अर्जुन का घर आ गया था तोह उसने घर के सामने रुक कर प्रीती से कहा.

"कल क्यों? आज का तोह पूरा दिन हे पड़ा है. और वैसे किसी लड़की को घर छोड़ने की जगह तुम पहले अपने घर जा रहे हो? सड़क पर तोह बड़ा ध्यान

दे रहे थे." प्रीती की बात सुनकर वो हँसता हुआ उसके घर की तरफ चलने लगा. "वो आज मेरी कोचिंग नहीं है तोह स्टेडियम तोह जाऊंगा नहीं. तोह फिर

कल सुबह हे मिल पाएंगे."

"हाहाहा. मतलब हमारा घर मुश्किल से 100 फ़ीट दूर है लेकिन अगर मिलना है तोह 10 कम दूर स्टेडियम या फिर 3 कम दूर पार्क.. हाहाहा.. तुम्हारे इरादे ठीक

तोह है?" अब तोह जैसे प्रीती की बात सुनकर अर्जुन से जवाब देते न बना.. "वो मेरा मतलब था के मई और तोह कही जाता नहीं हु. है तुम हमारे घर

आ सकती हो वह तोह सभी लोग है. 4 दीदी, तै जी, माँ और Dada-Dadi." अर्जुन का साफ़ दिल होना प्रीती को भी ाचा लगा.

"देखते है वैसे हमारे घर में तोह मई और दादा जी हे है बस. या फिर हमारे 2 सर्वेंट. तुम भी आ सकते हो मेरे दादा जी भी तुम्हे कुछ कहेंगे नहीं."

दादा जी का जीकर उसने जान कर किआ था. छोल पूरी को याद करते हे अर्जुन को आर्मी याद आ गई. "क्या घर में भी बॉर्डर जैसा सिस्टम है?"

"हाहाहा. तुम भी न. मेरे दादाजी ज्यादातर तोह तुम्हारे दादाजी के साथ रहते है तोह तुम्ही बताओ के क्या तुम्हारे घर में पुलिस स्टेशन जैसा माहौल है."

अब अर्जुन के झेंपने की बारी थी. लेकिन बात को वही ख़तम कर उसने शिस्टाचार से उसको bye किआ और जाने से पहले एक बार फिर उसकी आँखों को देखने

की कोशिश सी की. "Bye. और तुम्हारे देखने से इनका रंग नहीं बदलेगा." वो अर्जुन को ऐसे ताकता देख खिलखिला कर गेट की तरफ बढ़ चली.

.

.

" वो माँ सुबह के लिए सॉरी. मुझे नहीं पता था के ऐसा कुछ होगा लेकिन फिर पता नहीं मई जैसे कही खो गया था." अपनी माँ को रसोईघर में चाय

बनाते देख अर्जुन ने उनके पास जा कर शमा मांगी जो भी उसने सुबह देखा था उसके लिए.

"कोई बात नहीं बीटा. गलती मेरी भी थी. सावधानी नहीं रख पाई तोह अनजाने में हो गया. चल यहाँ बैठ मई तुझे दूध देती हु." अपने बेटे की बात

सुनकर रेखा जी को भी ाचा लगा. वो काफी देर से बस उस हादसे के बारे में हे सोच रही थी. लेकिन अर्जुन की माफ़ी ने बता दिए था की गलती तोह रेखा

की हे थी. बेटे को क्या पता था के माँ ऐसे बहार आ जाएगी. लेकिन जो बात उन्हें खाये जा रही थी वो यही थी के अर्जुन ने उनको देख कर नजर क्यों नहीं

फेरी थी. उसका घूरना रेखा जी का सरदर्द सा कर गया था. लेकिन घर आते हे उसने दिल से माफ़ी मांग कर उन्हें इस दर्द से निजात दिला दी थी.

"मुन्ना आज तू लेट कैसे आया रे?" ये ताईजी थी जो चाय पीने आई थी वह. हलके हरे रंग की साड़ी में लिप्त उनका गदराया जिस्म और मेहँदी रंग के

ब्लाउज में से बहार निकलने को तड़प रहे मॉटे बूब्स. ताईजी भी उसकी नजर देख मुस्कुराई और फिर कुर्सी पर बैठ गई. माँ वही थी तोह अर्जुन भी

शांति से थोड़ी दूर कुर्सी पर बैठ गया. "ले बीटा. आराम से पीना. जल्दी जल्दी पीने से दूध शरीर को सही से नहीं लगता." हिदायत देने के साथ उन्होंने

एक बड़ा गिलास दूध का जिसमे बादाम डालकर गरमा किआ था अर्जुन के सामने रख अपनी जेठानी को चाय का कप दिए. खुद भी वही बैठ गई. एक बार अर्जुन

ने फिर से दोनों को बारी बारी से देखा और फिर ऊपर कमरे में चल दिए. नहाने के लिए घुसा तोह अब गौर से प्रीती की बात पर ध्यान देने लगा. "अकेले

भी दौड़ना पड़ता है ज़िन्दगी में. लेकिन कई बार मंजिल से पहले हे बहुत लोग अपने बन जाते है और कई बार मंजिल पर पहुंचने के लिए कई लोग सफर

में पीछे रह जाते है. " उसको अब ये बात पूरी तरह से समझ आ गई थी. जरुरी नहीं के कोई ऐसा लक्ष्य बनाया जाये जहा अपने हे लोग न हो साथ.

और अगर अपने लोग हमेशा साथ हो तोह इंसान खुद हे इतना मजबूत होगा की वो किसी ऐसे लक्ष्य की तरफ देखेगा भी नहीं जिसके लिए सब से रिश्ता तोड़

कर जाना पड़े. नाहा के बहार आया तोह बिलकुल तारो तजा था अब वो. निचे अलका दीदी पता नहीं कबसे इन्तजार कर रही थी उसका. और जब अर्जुन ने उन्हें

खड़े देखा तोह कान पकड़ लिए और उनके पीछे बहार चल दिए. "दीदी भूल गया था. गुस्सा नहीं होना प्लीज."

"चुपचाप स्कूटरी बहार निकालो और चलो.", अलका दीदी थोड़ा गुस्से में थी क्योंकि 30 मिनट से अर्जुन नाहा रहा था. वो भी हुकुम मानकर चल दिए

ग्राउंड की तरफ. लेकिन उसने सीधा स्कूटरी वह रोकी जहा कॉलेज के बाद वह दीदी को लेकर आया था.

"मुझे चलना सीखना है." ये बात सिर्फ ऊपर से हे अलका दीदी ने कही थी. जगह को याद करके उनका जिस्म रोमांच से भर उठा था.

"पहले मुझे अपनी प्यारी दीदी को गले लगा कर उनका गुस्सा काम करना है." इतना बोलकर उसने स्कूटरी कड़ी करि और सीट पर बैठी अपनी गुस्से वाली

दीदी को बाहो में भरकर ऊपर उठा लिए. "दीदी आप जानती नहीं की आप नाराज होती हो तोह मुझे खुद पर कितना गुस्सा आता है. " उसने ये बात अलका

दीदी को गले लगाए हे कही थी. इसमें कोई वासना या भूख नहीं थी. लेकिन एक प्रेमी का प्रेमिका के लिए प्यार जरूर था. अलका दीदी ने भी उसको थोड़ा

जोर से कास लिए. "तू न मुझे मिनट में बेवकूफ बना लेता है." और मुस्कुरा कर होंठो पर किश करके जमीन पर पाँव टिका लिए. "चल अब सीखा."

फिर अर्जुन ने जैसे ऋतू दीदी को समझाया था वैसे वो अलका दीदी को समझने लगा. पीछे बैठकर उसने वैसे हे उनको चलने दिया. हर माउद पर वो

खुद स्कूटरी घूमता. थोड़ी देर बाद अर्जुन ने शरारत शुरू कर दी. एक हाथ हैंडल पर एक हाथ से दीदी की उभर का निचला हिस्सा सहलाने लगा.

"ऐसे मत कर वार्ना गिर जायेंगे." महसूस होते हे दीदी डरने लग गई. मजा भी आ रहा था और हैंडल छूटने का डर भी था.

"नहीं गिरते दीदी. आप बस पकडे रहो." इतना बोलकर वह अब थोड़ा ऊपर हाथ ले आया था. "भाई तू वही रोक ले जहा पहले रोकी थी." और अर्जुन ने वापिस

वही पेड़ो के झुण्ड के पास स्कूटरी कड़ी करि और उनको साथ लेकर झुण्ड के बीच आ गया. उस से ज्यादा उत्तेजित तोह अलका दीदी थी जिन्होंने रात को अर्जुन

और माधुरी दीदी का अध्भुत संगम देखा था. वो उसके शरीर पर नागिन सी चिपकती एड़ी के भर होंठ चूसने में लगी थी यहाँ अर्जुन ने हाथ सीधा

सलवार के अंदर दाल दिए और कच्ची के ऊपर से हे उनकी छूट सहलाने लगा. "भाई ये मत कर नहीं तोह मई सबर खो दूंगी. देख मेरे 4 पेपर बचे है

फिर मई चाहती हु खुद मेरे कपडे उतार मेरे अंदर समां जाए. बस इतने दिन ऊपर से जो भी कर ले." हाथ हटाने की कोई कोशिश नहीं की थी दीदी ने.

अर्जुन ने भी बिना कुछ बोले अपने हाथ पीछे कूल्हों पर रख दबाने शुरू कर दिए और उनको ाचे से चूमने लगा. कोई 10 मिनट बाद दोनों खुद को दुरुस्त

कर वापिस घर की तरफ चल दिए. इस बार अलका दीदी का हाथ बड़े प्यार से भाई की कमर में था.

"ले लिए मजे?" घर के अंदर अभी आये हे थे की ऋतू ने अलका को देखते हे कहा.

"कोनसे मजे लेकर आ रही हो?" माधुरी दीदी की आवाज सुनकर तोह तीनो एक बार ठिठक गए. ऋतू तोह बोलने लगी थी की दीदी हमारे मजे तोह आप वाले

मजे के सामने कुछ भी नहीं. लेकिन अलका ने आराम से कहा , "दीदी स्कूटरी चलने में भी मजा आता है. बस वही बात हो रही थी."

माधुरी दीदी गहरी निगाहो से देखती मशीन की तरफ चली गई जहा कोमल दीदी कपडे भिगो रही थी.

"किसी दिन पक्का मरवायेगी तू ऋतू की बची.", अलका दीदी ऋतू को खींचती हुई अंदर ले चली.

सभी काम से फारिग हो कर अर्जुन ऊपर ड्राइंग रूम में बैठ कुछ सोच रहा था. टेलीविज़न पर कोई कार्टून चल रहा था और अभी तक़रीबन 10 बजे थे.

"ये प्रीती को देख कर ऐसा क्यों लगता है के मई शायद पहले से जानता हु. लेकिन वो तोह कभी हमारे घर भी नहीं आई. दादा जी के इतने ाचे दोस्त है

पूरी अंकल और दादाजी भी उनके पास जाते रहते है. फिर ऐसा क्यों है के वो घर में अकेली होते हुए भी कभी हमारे घर नहीं आई?" अर्जुन हर बात पर

गौर कर रहा था. प्रीती की उन neeli-hari आँखों को पता नहीं उसने कब देखा था. लेकिन वह उसको बड़ी जानी पहचानी लग रही थी. जैसे उनको उसने पहले

बहोत करीब से देखा है, महसूस किआ है.

"छोटे तू यहाँ बैठा है और निचे तुझे दादाजी बुला रहे है.", संजीव भैया ने उसको हिलाते हुए कहा

"भैया ... आप कब आये और अब तोह नहीं जाओगे न बहार?" अपने भैया को इस टाइम घर अचानक आया देख वह खुश हो उठा.

"अरे नहीं जा रहा कही अभी. 2 दिन से 4-5 शहरों में कैंप लगाए थे और मीटिंग्स थी. बस अभी ऊपर आया हु नहाने फिर थोड़ा आराम करूँगा. शाम को

दोनों बहार चलेंगे." भैया की बात सुनकर अर्जुन किसी नन्हे बचे की तरह चहक उठा. "है और आज पूरी शाम मेरे साथ रहेंगे." अपने छोटे भाई

की ख़ुशी देख संजीव भैया भी मुस्कुरा के बोले, "अरे तू एक बार बोल कर देख हर शाम तेरे नाम. और जल्दी जा कही ज्यादा देर हो गई तोह फिर यहाँ

थानेदार साहब खुद आ जायेंगे." अपने दादा जी को दोनों कई बार इस नाम से आपस में बुलाते थे.

"हांजी दादा जी. कहिये क्या काम है?" वो अगले हे पल बैठक में खड़ा था जहा बोलने के बाद देखा तोह छोल पूरी और मल्होत्रा अंकल भी साइड सोफे पर

बैठे थे. उसने आदर से उन्हें नमस्कार किआ.

"है बीटा वो ऐसा है के आज मल्होत्रा जी के घर संगीत का कार्यक्रम है तोह मार्किट से कुछ सामान लेके आना था." उन्होंने बात करते हुए अपने दोस्त की

तरफ इशारा भी किआ. "खैर मई तोह भूल गया की ये बात किस से कर रहा हु. तुझे तोह पता हे नहीं होगा की कल पालक बिटिया की शादी है क्योंकि घर

की बातों में कभी पहले बैठा हो तोह पता होगा कोण आस पास रहता है या कहा क्या हो रहा है." थोड़ी तल्खी से बात करि रामेश्वर जी जो वो कभी

करते नहीं थे.

"क्या पंडित जी अभी बचा है और आप काम की बजयाये इसको ऐसे डांटने लगे. ाचा अर्जुन बीटा, वो ऐसा है न की शादी का घर है तोह सभी लोग काम

में लगे है और जो काम नहीं करना चाहतेत वह सजने सवारने में." थोड़ी मुस्करात से ये बात कही और आगे बोले, "सारे काम लगभग हो चुके है लेकिन

वो तेरी दीदी (पालक मल्होत्रा) का एक लेहंगा फिटिंग के लिए बड़ी मार्केट में दिए था "सिंगार घर" वाले को, उसने सन्देश भेजा की लेहंगा तैयार है ले

जाओ क्योंकि उनके घर में भी कोई कार्यक्रम है तोह दूकान 12 बजे बंद कर देगा. और ये कुछ सामान लाना था वही मार्किट से जो यहाँ नहीं मिला." मल्होत्रा

अंकल ने अर्जुन की तरफ एक छोटी सी स्लिप बधाई. "ये तोह शायद लड़कियों का सामान है?" अर्जुन ने सरसरी नजर डाली जिसमे फेसिअल क्रीम वैगेरह लिखा

था. "इसलिए तोह तुम्हारे साथ प्रीती को भेज रहा बरखुरदार. और उसने भी रात को फंक्शन में पहन ने के लिए कुछ लेना है. अकेले इतनी बड़ी मार्किट तोह

वह जाने से रही." ये कड़क आवाज पूरी अंकल की थी. "ये बीटा पैसे पकड़ लो. बाकी पैसे और पर्ची घर आने के बाद अपनी आंटी को दे देना." मल्होत्रा

अंकल ने एक दस हजार की गद्दी उसे थमा दी.

"तू ऐसे हे जायेगा क्या?" रामेश्वर जी ने थोड़ा नरमी से पुछा. "वो दादा जी फंक्शन तोह रात का है. मई संजीव भैया के साथ जा कर ले आऊंगा कुछ."

अर्जुन ने इतना कहा तोह अब दादा जी उठ खड़े हुए. "बीटा दुनिया में पाजामे की सिवा भी और कपडे होते है. और मार्किट जाना हो तोह काम से काम खुद की नहीं

लेकिन तेरे दादा की तोह पर्सनालिटी की इज़्ज़त रख. " अपने दोस्तों की तरफ मुड़कर हांसे और तकिये के निचे से 3000/- निकाल कर उसको थमा दिए. "पहले

ऊपर जा कर जीन्स और कोई ाची सी शर्ट पहन. और भैया के साथ नहीं अभी अपनी खुद की मर्जी से कपडे लेना. वही पहनकर देख कर. और पैसे काम

पड़े तोह मल्होत्रा जी के पैसो से प्रयोग कर लिओ. मई दे दूंगा इनको." उनकी बात सुनकर पैसे जेब में दाल वह मुड़े हे थे के फिर आवाज आई. "कुछ भूल

रहे हो? तैयार होने के बाद घर से प्रीती को लेके जाना है?" छोल पूरी ने फिर याद दिलाया उसको क्योंकि इतनी बातों के बीच वह ये सच में भूल गया था..

"भैया, दादा जी मुझे मार्किट भेज रहे है और तैयार होकर जाने को बोल रहे." लाचारी से उसने ऊपर आने के बाद भैया की तरफ देखा.

"है तोह क्या बड़ी बात है. सबको पता है की दिन में तू 3 बार पजामा बदल कर पजामा हे फैन लेता है. तुझे नए साल पर जो जीन्स की पंत दिलाई थी

कभी खोली भी तूने? या फिर कोई शर्ट पहनी है?" वो सोफे से उठ गए और अर्जुन की अलमारी खोल कर अंदर उसके कपडे देखने लगे. अंदर पाइप पर 8-9 शर्ट

प्रेस की हुई जाने कब से तंगी थी. 4 जीन्स थी वह जिन में से 2 के ऊपर अभी भी कीमत वाली पट्टी चिपकी थी. निचे हर तरफ़ा सिर्फ tshirt/lower का

बड़ा से ढेर लगा था.

"तेरा कुछ नहीं हो सकता भाई. चल ये पहने हुए कपडे उतर और जो दे रहा हु वह पहन." उन्होंने पहले एक साफ़ बनियान उठाई जो अर्जुन ने टीशर्ट उतार कर

पहन ली. फिर एक सफ़ेद सूती लेकिन कड़क प्रेस करि हुई कमीज जिसके साथ उन्होंने हलके नीले रंग की जीन्स पंत उसको दी. अर्जुन बस चुपचाप पहन रहा था.

"इधर है. तू सच में हे बचा है." उन्होंने अर्जुन की कमीज जो वो जीन्स पंत के अंदर डालने लगा था वही पकड़ li."Ye कोई फॉर्मल शर्ट नहीं है और न

ये पतलूर है. बहार रख इसको. दिख नहीं रहा सिर्फ बेल्ट की पट्टी से एक इंच हे निचे है. और ये जूते अंदर रख और तेरे सफ़ेद वाले एक्शन के जूते

डब्बे से बहार निकल. दिवाली का तोहफा अभी तक डब्बे में है." अर्जुन जब जूते पहन रहा था तोह संजीव भैया बाथरूम से थोड़ा पानी नहाने के डब्बे

में लेकर आये. अपने हाथ में थोड़ा पानी ले कर उन्होंने ाचे से उसके घुंघराले बालो को गीला किआ और फिर थोड़ा खुसबू वाला तेल लगाया. उसके बाल ाचे

दिख रहे थे. "चल अब जरा खुद को आईने में देख ले एक बार." उन्होंने हँसते हुए कहा और अलमारी का दरवाजा बंद किआ जीके बहार की तरफ कोई 4 फ़ीट का

शीशा लगा था.

"मेरा तोह काया कल्प हे कर दिए भैया आपने?" अर्जुन ने भी कबि खुदको ऐसा नहीं पाया था जैसे वह आज दिख रहा था. गोरा सख्त चेहरा, चौड़े कंधो

पर फिटिंग की सफ़ेद शर्ट, टांगो के ऊपर हलकी टाइट जीन्स की पंत और दोनों से मेल खाट उसके जूते. वह रविवार के अखबार में कपड़ो के प्रचार करते

किसी मॉडल जैसा लग रहा था. "थैंक यू भैया." अपने इस रूप से खुश होकर उसने अपने भैया को गले हे लगा लिया. "बस कर रे तेरी कमीज पर सिलवट

पद जाएँगी. चल जा और ध्यान रखना." दिए हुए पैसे अपनी जेब में डालने के बाद अर्जुन ने अपना बटुआ भी पिछली जेब में दाल लिए. थोड़े और पैसे उसने

बटुए में भर लिए थे. कोई 2 मिनट बाद अब वह छोल पूरी के गेट पर था. स्कूटर को स्टैंड पर लगा कर घंटी बजाई.

"जी कहिये." ये पारवती थी, घर की कामवाली.

"वो प्रीती जी को बोलना के अर्जुन आया है." संदेसा लेकर पारवती अंदर गई और वापिस आते हे गेट खोलकर बोली, "वो आप अंदर बैठ जाइये, दीदी को 2

मिनट लगेंगे, ऐसा उन्होंने कहा है. चलिए." अर्जुन मन करना चाहता था लेकिन कुछ सोचता हुआ अंदर चल दिए.

ड्राइंग रूम काफी ाचे से सजा हुआ था. सोफे पर बैठा तोह पारवती ट्रे में पानी का गिलास लेकर कड़ी हो गई.

"जी शुक्रिया. मई सीधा घर से आया हु. यही 2 घर छोड़कर मेरा घर है." पारवती ने एक बार अर्जुन को गौर से देखा और गिलास लेकर चली गई.

5 मिनट बाद हे दरवाजा खुला और अपने बालो को एक रबर से बांधती प्रीती बहार निकली. "क़यामत" अर्जुन के दिल ने सिर्फ इतना हे कहा. सफ़ेद और

काली पट्टी वाला टॉप और गहरे नीले रंग की टाइट जीन्स पंत पहन कर किसी अप्सरा सी वह अर्जुन को देख कर बोली, "तोह चले जनाब अगर आप चाहे

तोह."

"हां. . है चलो." अर्जुन बस उस पल में हे खोया सा प्रीती के पीछे चल दिए. गलियारे में आकर प्रीती एकदम से रुकी शायद कुछ भूल गई थी और पलट

गई. "थाड्ड" सीधा अर्जुन क सीने से टकराई, जो अभी भी खोया सा हे चल रहा था. "सॉरी. आपको लगी तोह नहीं. वो मेरा ध्यान नहीं था." अर्जुन झेंप

गया लेकिन प्रीती बिना कुछ बोले अंदर चली गई. अर्जुन अब शांत सा स्कूटर को स्टैंड से उतार किक लगा था की वो एक लड़कीओ वाला हैंडबैग अपने दाए कंधे

पर दाल बहार आ गई. स्कूटर पर प्रीती कुछ दुरी पर बैठी थी, दोनों हाथ उसने अपनी गौड़ में रखे था. ऐसे हे चुपचाप दोनों मुख्या सड़क तक आ गए.

"आज मौन व्रत है क्या?" प्रीती ने पहली बार उसकी पीठ को छुआ था. "नहीं वो कुछ देर पहले जो भी हुआ उसके लिए मई शर्मिंदा हु. अनजाने में सब हुआ"

"वो बात वही ख़तम हो गई थी. लेकिन आगे से टक्कर देख कर मारना. बिलकुल पत्थर हो." फिर आगे बोली, "वैसे ाचे लग रहे हो आज. कुछ खास है

क्या."

"नहीं तोह ऐसा तोह कुछ नहीं है. बस मार्किट आ रहे थे तोह दादाजी ने बोलै के तैयार होकर जाओ." अर्जुन ने संकोच से कहा. उसके मैं में कुछ चल रहा

था लेकिन शायद झिझक या कुछ और था के अभी वह ज्यादा बोल नहीं पा रहा था.

"स्कूटर ाचा चला लेते हो तोह स्टेडियम साइकिल से क्यों जाते हो.?" प्रीती शायद अर्जुन की इस झिझक को समझ गई थी लेकिन वो चाहती थी की दोनों बातें

करे.

"दादा जी ने कहा के साइकिल से जाना ठीक रहेगा. वो कसरत भी हो जाती है इसीलिए." अर्जुन ने फिर से छोटा सा जवाब दिए.

"क्या सोच रहे हो? देखो अगर तुम मुझे दोस्त या कुछ भी समझते हो तोह बता सकते हो."

"ऐसा कुछ नहीं है लेकिन एक बात मई काफी देर से सोच रहा हु. लेकिन लगता है के शायद वहां हो. बस ऐसा हे कुछ."

प्रीती ने अब अपना हाथ पीछे से उसके कंधे पर रखा. "तुम मुझसे बात कर सकते हो."

"क्या हम एक दूसरे को जानते है.?" अर्जुन का सवाल प्रीती के दिमाग के साथ दिल पर भी किसी सूई की तरह चुभा.
 
अपडेट 21

एहसास- कुछ नए (2)


"क्या हम एक दूसरे को जानते है.?" अर्जुन का सवाल प्रीती के दिमाग के साथ दिल पर भी किसी सूई की तरह चुभा.

"देखा न मैंने कहा था के ये मेरा वहां है. लेकिन क्या करू पता नहीं ऐसा लगता है के जैसे तुम्हारी आँखें मई पहले भी बहुत बार देख चूका हु.

बहुत करीब से. लेकिन याद कुछ नहीं आ रहा. शायद किसी और को होंगी या फिर कोई सपना भी हो सकता है." अर्जुन अब निरंतर अपनी बात बोलता रहा.

"सॉरी वो बस ऐसे हे कह दिए. मई तोह कोई 8 साल से हॉस्टल था. और फिर घर भी साल में एक बार आता था. तुम भी अभी आई हो यहाँ तोह ये मेरे वहां

से ज्यादा कुछ नहीं है." अर्जुन ये बात कह कर चुप सा हो गया और इधर दोनों मुख्या बाजार में आ गए थे. ये काफी ज्यादा बड़ी मार्किट थी जो पास के

2-3 शहरों में भी प्रचलित थी. हर तरह का सामान यहाँ मिलता था. कपडे, गहने, घर का सामान, ऑफिस का सामान, खाने पीने के कई रेस्ट्रा और

होटल भी थे. कही बड़ी दुकाने तोह कही रेहड़ी मार्किट. अंदर स्कूटर पर जाना ठीक नहीं था तोह अर्जुन ने प्रवेश करते हे स्कूटर को वही gaadi-dopahiya

के लिए बनाये एक प्लाट पर खड़ा किआ और वापिस बहार प्रीती के पास आ गया था. प्रीती चुप थी लेकिन अब उसके चेहरे पे चिंता नहीं थी.

"ये दूकान जरा पूछ ले किसी से? थोड़ा हे टाइम है नहीं तोह बंद हो जाएगी." अर्जुन ने फिर एक बार कोशिश की प्रीती से बात करने की. उसकी चुप्पी

अर्जुन को बुरी लग रही थी.

"ठीक है."

पास में हे एक ठेले वाले से उसने पुछा, 'भैया ये श्रृंगार घर किधर है.?"

"साहब ये सीढ़ी सड़क पर चले jao.Saamne गोल चक्कर के उस तरफ 2 मनिला दूकान है. दिख जाएगी वही से." वो आदमी जो chaat-paapdi बेच रहा था बोलै.

"शुक्रिया भैया." बोलकर दोनों ठेले वाले की बताई दिशा में चलने लगे. फुटपाथ पर चलते हुए प्रीती निचे देखती चल रही थी और अर्जुन कभी उसको

तोह कभी सामने. शनिवार था तोह भीड़ भी बहुत थी. हर जगह कही बहार लोग सामान बेच रहे थे और कही दुकानों पर सस्ते दाम के चार्ट चिपके थे.

गोल चक्कर को पार करते समय भी प्रीती का ध्यान निचे हे था. अर्जुन सड़क को तेजी से पार करने के चक्कर में थोड़ा आगे हुआ तोह पीछे मुदा. एक गाये

उसकी तरफ हे भागती आ रही थी. अर्जुन ने तेजी से प्रीती की और भड़कर उसको अपनी तरफ खींच. और उतनी हे देर में गाये उसकी पीठ के पीछे से निकल गई.

"मेरी बात से नाराज हो तोह मत बात करो लेकिन सड़क पर नजर तोह रख लो. अभी कुछ हो जाता तोह मई छोल अंकल को क्या जवाब देता?" उसने पहली बार सख्ती

से किसी से बात कही थी. यहाँ प्रीती उसके सीने से जा लगी थी. दोनों वापिस अलग हो कर चल दिए. इस बार अर्जुन आगे चल रहा था लेकिन उसने प्रीती का

हाथ ऐसे थाम रखा था के जैसे कोई बाप अपनी ज़िद्दी औलाद को उस दूकान से दूर ले जा रहा हो जहा खिलोने टंगे हो. वो कभी अर्जुन की तरफ देखती तोह

कभी आसपास. किसी को उनकी परवाह नहीं थी और ऐसे हे वह उस दूकान पर आ गए. यहाँ अर्जुन ने हाथ छोड़ दिया था और शायद प्रीती को ये ाचा नहीं लगा

"जी कहिये?" दूकान काफी बड़ी थी लेकिन अभी वह सिर्फ 2 हे लोग थे. एक लड़का जो अंदर सामान पैक कर रहा और एक ये अंकल जो मुख्या काउंटर पर बैठे

पैसे गईं रहे थे.

"जी मुझे मल्होत्रा अंकल ने भेजा है.", इतना हे कहा था के सामने वाले ने एक बड़ा सा बैग अर्जुन की तरफ बढ़ाते हुए कहा, "बीटा तुम्हारा हे इन्तजार कर

रहा था. ये लो बीटा जैसा कहा था सब वैसा कर दिए है."

"जी शुक्रिया. और पैसे कितने हुए?" अर्जुन ने जब पुछा तोह उन्होंने बैग पर लगी पर्ची पर निगाह डाली. "बीटा 3500 हुए है. ये एक्स्ट्रा काम था. लहंगे की

कीमत पहले हे मल्होत्रा जी दे चुके है." अर्जुन ने नोटों की गद्दी से 35 नोट उनको दिए और बाकी वैसे हे वापिस रबर से बांध जेब में रख लिए. फिर

प्रीती की तरफ देख शीशे के दरवाजे को खोला. दोनों बैग लेकर बहार आ गए.

"तुम्हे भी कुछ लेना था न? तुम्हारे दादाजी ने बताया था." अर्जुन की बात सुनकर प्रीती ने उसकी तरफ देखा तोह अर्जुन को उसकी वो आँखे अब किसी हीरे सी

चमकती दिखी. शायद सूरज की रौशनी से.

"है वो मुझे भी कुछ कपडे लेने है. लेकिन मुझे ज्यादा कुछ पता नहीं मार्किट में की कहा से ाचे कपडे मिल सकते है." प्रीती की बात सुनकर अर्जुन ने

उसको रुकने का इशारा किआ और वापिस उस दुकान में घुस गया जिस से लेहंगा लिए था. अब वह वो लड़का था जो पहले अंदर की तरफ था.

"भैया यहाँ लड़कियों के ाचे कपडे कहा मिलते है. किसी ख़ास दिन के लिए?"

"भाई मिल तोह यहाँ भी जाते लेकिन अभी दूकान बढ़ा दी है बस. लेकिन वह सामने नटराज होटल है. उसके साथ जो गली अंदर जा रही है वह सिर्फ लेडीज

के कपड़ो और सामान की दुकानों से भरी है. हर तरह का कपडा वह मिल जायेगा. और कुछ कमी होती है तोह ज्यादातर दुकानों में दरजी भी बैठे है." इतना

कहकर उसने चाबियों का गुच्छा उठाये हुए हे अंदर से दरवाजा खोला और दोनों बहार आ गए. "शुक्रिया भाई." फिर से अब दोनों लोग चल पड़े. आगे अर्जुन और

उस से एक कदम पीछे प्रीती. "अब ध्यान से पार करना." अर्जुन ने ये बात कही तोह प्रीती जो अब तक चुप थी बोली, "मुझे कुछ हो जाता तोह क्या तुम्हे बुरा

नहीं लगता?". अर्जुन ने उसकी बात सुनी और फिर गली में घुसते हुए हे बोलै. "अभी तुम मेरी जिम्मेदारी हो और अगर तुम्हे कुछ हो जाता तोह मुझे बिलकुल भी

नहीं पता के मई क्या करता. क्योंकि मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं होता."

"मतलब अगर मुझे चोट लग जाती तोह तुम्हे फरक नहीं पड़ता?", प्रीती की बात सुनकर अर्जुन के पेअर वही रुक गए.

"मई खुद को माफ़ नहीं कर पता. बस इतना कहूंगा." और फिर अपना पुराणी बात दोहराई, "बताओ क्या तुम मुझे जानती हो?"

"है तुम्हे जानती हु तभी तोह यहाँ आ गई तुम्हारे साथ. " प्रीती इतना बोलकर एक बड़ी दूकान में चली गई जहा बड़े शीशे से अंदर लगी कई खूबसूरत

पोषक दिख रही थी. अर्जुन भी पीछे हो लिए. अंदर से तोह ये दूकान और भी बड़ी थी. कोई 5 काउंटर थे यहाँ भीड़ ठीक थक हे थी. अर्जुन गौर से हर

तरफ देखने लगा.

"भैया वो स्टेचू पर लगा ब्लैक वाला सूट अवेलेबल है.?" प्रीती शायद उस सूट को देख कर हे अंदर आई थी. था भी वह बेहद हे उम्दा कलाकारी वाला

"जी मैडम. ये रेडी तो स्टीच सूट है और काफी पॉपुलर भी हो रहा है." दूकानदार ने और भी बहुत तारीफ की उस सूट की जिसमे रेशमी कपडे पे कांच

की कारीगरी की हुई थी.

"आप कितना वक़्त लेंगे इसको तैयार करवाने में? हमे थोड़ी जल्दी है." बिना दाम पूछे हे प्रीती किसी छोटी बची की तरह बार बार उसको देख रही थी.

"जी आप माप दीजिये हमारी मैडम इसको 2 घंटे में हे तैयार कर देंगी. सलवार सिर्फ चूड़ीदार हो तैयार होगा. मई ये पहले बता देता हु. पूरा सूट 4300 का

लगेगा. जिसमे हमने 300 हे सिर्फ सिलाई के जोड़े है." दुकानदार ने एक हे बार में अपनी बात कह दी. प्रीती ने अर्जुन की तरफ देखा जैसे पूछ रही हो के क्या करे

"जी अंकल आप सूट तैयार कीजिये. अभी 12 बजने वाले है हम 2 बजे आ कर ले जायेंगे." अर्जुन ने हे प्रीती की जगह जवाब दिए तोह प्रीती निचे देख कर

मुस्कुराने लगी. अर्जुन ने पैसे देने के लिए अपना बटुआ निकला तोह प्रीती हैरान होती उसकी तरफ देखने लगी लेकिन थोड़ी फुर्ती से उसने अपने हैंडबैग से 500

के 9 नोट दूकानदार के सामने रख दिए. दुकानदार भी दोनों की तरफ देख मुस्कुरा दिए. अर्जुन ने झेंपते हुए बटुआ वापिस पिछली जेब में रख लिए.

"पूनम ये सूट जरा जल्दी तैयार करना है पहले आकर यहाँ माप ले लो." दूकानदार ने आवाज लगाई तोह चस्मा पहने एक औरत अंदर बने एक कमरे से बहार

निकल कर काउंटर की तरफ आई. उसके हाथ में एक पेंसिल और फीता था. "आइये आप मेरे साथ चलिए. और छोटू जो सूट इन्होने पसंद किआ है उसका नया

पीेछे अंदर भिजवा दो." उन्होंने इतना कहा तोह प्रीती अंदर चली गई और एक लड़का पीछे के काउंटर से सूट निकलने लगा.

"चलो यहाँ से तोह फारिग हो गए बस अभी एक और ड्रेस लेनी है." प्रीती ने न जाने कैसे काउंटर पर आते हे अर्जुन की ब्याह थाम ली और उसके बहार

ले चल दी. अर्जुन स्तब्ध सा बहार आ गया. "वह तुम पैसे क्यों दे रहे थे?" उसने अब मुस्कुरा कर पुछा तोह अर्जुन से जवाब देते न बना. बस एक

शर्मीली सी मुस्कान के साथ सर झुका लिए. "दादा जी ने मुझे पहले हे काफी पैसे देकर भेजा है. और तुम तोह मुझे कुछ समझते नहीं फिर तुम्हारे

पैसे तोह मई वैसे भी नहीं लेने वाली थी." थोड़ा प्यार से किआ तंज काम कर गया. "क्यों? मेरे पैसे नकली है क्या? और तुम्हारे पास पैसे नहीं भी

होते तोह भी मई बिना कहे देने वाला था. मुझे भी सूट पसंद आया था और जिस तरह तुम उसको देख रही थी, मेरे दिल ने कहा के मई खुद हे तुम्हे

दिलवा दू." फिर से गड़बड़ कर दी थी अर्जुन ने . यही तोह कमी थी उसकी की शब्दों को नापतोल नहीं रख पता था.

"चलो मुझे कल के लिए भी एक ड्रेस लेनी है.", और वो उसको लेकर सभी दुकानों को बहार से हे देखने लगी. कही एक पल रूकती फिर चल देती. अर्जुन

भी घर से बहार आज पहली बार इस तरह घूम रहा था. उसको भी ाचा लग रहा था ऐसे प्रीती के साथ घूमना. "यहाँ चलो मेरे साथ." अर्जुन ने

देखा तोह ये एक बहुत हे शानदार और बड़ी सी दूकान थी. पहले वाली से कही तीन गुनी बड़ी और बहुत तड़क भड़क वाली. दोनों अंदर गए तोह दूकान

की पूरी चाट पर बहुत सी लाइट लगी थी. हर तरफ एक से बढ़कर एक पोषक टंगे थे या आदमकद महिला रुपी प्लास्टिक की मूरतो पर पहनाये गए

थे. अर्जुन के मुँह से बस इतना हे निकला. "वाह." कही शादी के जोड़े, तोह कही सारिया और सूट. खूबसूरत लहंगे और लम्बी स्कर्ट भी वह तंगी

थी. "सही जगह है न ये? अब तुम बताओ मुझे क्या लेना चाहिए?" प्रीती अर्जुन से कह रही थी और अर्जुन एक पोषक को घर रहा था. "वो हमरे काम

की नहीं है. उसको दुल्हन पहनती है." प्रीती की बात सुनकर अर्जुन अपनी बगले झाँकने लगा. एक मूरत पर लाल चूड़े, घूंगट, चोली और लेहंगा

पहनाया हुआ था. बेहद हे खूबसूरत थी वह. लेकिन अर्जुन को ये सब नहीं पता था. "ाचा ये देखो ये कैसी ड्रेस है.?" प्रीती ने उसका ध्यान एक

पश्चिमी पोषक की तरफ किआ. ये एक बहुरंगी फूलो वाली शर्ट और घुटनो से थोड़ी निचे तक की लाल स्कर्ट थी. "मुझे ये जरा भी पसंद नहीं आई.

एक बार इसको देखो." उसने काउंटर के पीछे टंगे हुए एक हलके गुलाबी lehnga-choli की तरफ इशारा कई. जिसपे सुनहरी और चंडी के रंग की कारीगरी

की गई थी. ये कोई ज्यादा तड़क भड़क वाला लेहंगा नहीं था जैसा आमतौर पर दिखाई देता है. उस काउंटर पर खड़े नवयुवक ने अर्जुन की बात सुनकर

कहा, "हमारे पास इसमें 2 और भी रंग है. इधर आइये मई दिखता हु अप्पको." दोनों उस काउंटर की तरफ चल दिए जहा वो युवक काउंटर के निचे से

अलग लहंगे निकल रहा था. "ये देखिये भाई. ये रंग भी थोड़ा अलग है और आँखों में चुभता नहीं." उसने एक मेहरून रंग का लेहंगा दिखाया जो

बिलकुल वैसा हे था जैसा दिवार पर लगा था. और फिर दूसरा दिखाया जो हल्का नारंगी और लाल था. अर्जुन ने दोनों को मन कर दिए. "एक बार वही उतार

दीजिये." अर्जुन ने इशारा किआ तोह युवक ने एक गोल लकड़ी की मदद से लेहंगा निचे उतार दिए. "इसको लगा कर देखो जरा खुद पर." अर्जुन के बोलते हे

प्रीती ने हैंडबैग काउंटर पर रखा और लहंगे हो दोनों हाथो में पकड़ कमर के सामने लगाया. काउंटर वाले लड़के ने उसके साथ की तारो से बनी हुई गुलाबी

किनारो की चुन्नी अर्जुन की और की तोह अर्जुन ने नासमझी से वह प्रीती के सर पर कर दी. "हाहाहा. इसको गले में लेते है यहाँ सर पर नहीं. लगता है

अभी भी तुम्हारा ध्यान उस दुल्हन की ड्रेस में है." उनकी हरकत देख कर आसपास 3-4 लोग और वह काउंटर पे खड़ा लड़का भी मुस्कुरा दिए. "मई कोई

लड़की तोह नहीं. ऐसे हे हो गया." अर्जुन ने सफाई दी फिर काउंटर की तरफ सर घुमा के दाम पुछा. "ये सेट कितने का है भाई? और क्या इसमें भी

दरजी की जरुरत पड़ेगी?"

"जरुरत तोह रहेगी भाई. चोली को माप के हिसाब से तैयार करना और लहंगे की लम्बाई भी पहन ने वाले के हिसाब से करनी पड़ती है. इसमें 2 दिन का टाइम लगेगा.

और जैसे की अभी ये ऑफ टाइम है तोह इसकी कीमत भी 50% काम है. अभी ये 6000/- का लगेगा तैयार करने के बाद."

"क्या हमे ये कल तक मिल सकता है.?" प्रीती पर्स से पैसे निकलती हुई बोली और ग्राहक को तैयार देख कर युवक बोलै. "आप एक मिनट रुकिए." इतना बोलकर

वो मुख्या काउंटर की तरफ गया और इधर एक लड़का ट्रे में 2 गिलास पानी लेकर उन दोनों के पास आया. पानी पीने के बाद दोनों ने उसका धन्यवाद् किआ.

"जी मैडम, ये कल 3 बजे तक आपको मिल जायेगा. आप एडवांस काउंटर पर जमा करवा दीजिये और अगर कोई और ये लेने आये तोह उनको ये पर्ची जरूर साथ

देकर भेजना." पूरे पैसे जमा करवा कर एक रसीद लेकर दोनों चल दिए वापिस जिस तरफ से आये थे.

"मुझे अभी कुछ और भी लेना है. तुमने वो ड्रेस दिलवाई तोह अब मेरे पास कोई चूड़ियां या पायल तोह है नहीं." अर्जुन प्रीती की बात सुनकर मुस्कुरा

उठा. "उसके बाद तोह कुछ नहीं लेना.?" उसने प्रीती को थोड़ा मजाक में ये बात कही तोह प्रीती सोचने के अंदाज में बोली, "है सही कहा. मुझे अब

कुछ और भी लेना पड़ेगा." दोनों चल रहे थे तोह एक दुकान के बहार सौन्दर्य प्रसाधन और चूड़ियों का बोर्ड लगा था. इस बड़ी दूकान में ाची खासी

भीड़ थी और ज्यादातर कॉलेज जाने वाली लड़किया अपनी माँ के साथ थी और कुछ सहेलियों के.

एक काउंटर पर अर्जुन ने हे कहा, "चूड़ियां और पायल दिखा दीजिये." वो लड़की तक़रीबन 22-23 साल की थी. उसने दोनों को देखा और कहा, "आपको किस

तरह की चूड़ियां चाहिए?"

"एक तोह ब्लैक सूट के साथ मैचिंग की और एक गुलाबी लहंगे के साथ." प्रीती ने जवाब दिए. उनके साथ वाले काउंटर पर भी एक लड़की खली कड़ी थी

तोह उसको देख कर अर्जुन ने अपनी जेब से मल्होत्रा अंकल की दी हुई पर्ची निकल कर उसकी तरफ बढ़ा दी. "ये सामान यहाँ मिल जायेगा?" लड़की ने सरसरी

निगाह डाली और है में गर्दन हिला कर वो पर्ची ले ली. "आप इतने चूड़ियां पसंद कीजिये मई ये सामान निकलती हु." अर्जुन थोड़ा निश्चिंत हो कर वापिस

पहले वाली लड़की की और देखने लगा. प्रीती अलग अलग तरह की चूड़ियां देख रही थी की अर्जुन बीच में बोल पड़ा, "क्या आप काली और सफ़ेद चूड़ियों

का सेट दिखा सकती है.?" हंसकर उस लड़की ने हां कहा और फुर्ती से 12-12 चूड़ियों के 2 सेट तैयार कर उनके सामने रख दिए. 2 सफ़ेद 2 काली के हिसाब

से वो बने थे. "कमाल है यार. तुमने तोह प्रॉब्लम एक चुटकी में सोल्वे कर दी." प्रीती प्रशंसा के भाव से बोली. "वो सूट भी कुछ ऐसा हे था तोह

मुझे लगा के ये सही रहेंगी."

"ठीक है आप इन्हे पैक कर दीजिये. और कोई गोल्डन गुलाबी चूड़ियों का सेट हो तोह वह भी दिखा दीजिये." इतना बोलकर वह आसपास देखने लगी.

"लीजिये ये थोड़ी भारी है और लहंगे के साथ ठीक रहेंगी. दोनों हाथो में 6 ठीक रहेंगी." लड़की अपने काम में दक्ष थी. अर्जुन को भी वो पसंद आई.

"एक जोड़ी पायल भी दिखा दीजिये." बिना हे प्रीती की तरफ देखे उसने अगला हुकुम दिए जैसे. लड़की काउंटर से निकल कर अंदर चली गई.

अब प्रीती ने कहा, "मैंने तोह वैसे हे बोलै था पायल के लिए."

"ड्रेस पूरी हे अछि लगती है. कुछ भी काम हो जाये तोह वो अधूरापन एक कमी का एहसास करा हे देता है. गलत तोह नहीं कहा." अर्जुन अपनी बात पर अङ्ग था.

"देखिये मैडम, ये सिंगल लाइन की छोटे घुँगुरो वाली पायल है. एक एहि जो थोड़ी चौड़ी पट्टी की है और निचे घुंगरू है. और एक ये वाली है जिसके निचे

चैन का डिज़ाइन है." जैसे हे उस लड़की ने वो सब पायल शीशे के काउंटर पर रखे अर्जुन ने छोटी छोटी चैन लगी वो पायल उठा ली. उसपर बिलकुल हे

महीन मोरपंख से बने थी जिनके निचे जंजीर जुडी थी और पूरी गोलाई तक ये डिज़ाइन था. "ये वाली पैक कर दीजिये." उसने वो पायल लड़की की तरफ

बढ़ा दी. प्रीती बस प्यार से अर्जुन की तरफ देख रही थी. "लगता नहीं की किस्मत ऐसे मेहरबान होती होगी हर किसी पर." बस उसने मैं में यही सोचा.

इधर भी सारा सामान पैक कर दिए था दूसरी लड़की ने और सब जोड़कर एक पर्ची दरवाजे वाले काउंटर की तरफ बढ़ा दी सामान के साथ.

"आपका सब सामान का हुआ 3750/-" जो आंटी वह बैठी थी उन्होंने अर्जुन से कहा तोह उसने उनसे 2 पर्ची बनाने को कहा. "देखिये ये सामान की अलग पर्ची

बना दीजिये." उसने मल्होत्रा अंकल वाली पर्ची उनके सामने कर दी. उसकी बात सुनकर प्रीती को थोड़ी हैरानी हुई और उसका हाथ फिर पर्स की तरफ चला

गया जिसको अर्जुन ने देख लिए था. उसने अपना हाथ वही प्रीती के हाथ पर रख कर हलके से दबा दिए. मतलब नहीं.

"ये सब हुआ 2800/-" अर्जुन ने वो पर्ची ले ली और उनको मल्होत्रा अंकल के पैसो से 2800 दिए और फिर अपने बटुए से 950/-. सारा सामान खुद उठा लिए और

प्रीती से कहा, "मैडम चले." वो भी हंसती हुई बहार आ गई.

"अब अगर कहो तोह मई भी कुछ खरीद लू?" अर्जुन ने विनती हे कर दी थी अब प्रीती से.

"पहले कुछ खिलाओ फिर हम तुम्हारे लिए कुछ लेंगे." प्रीती की बात सुनकर वो सर पर हाथ रख कर चल दिए. सामने हे नटराज resta/hotle देख दोनों

वह चल दिए. प्रीती ने मेनू उठा के एक पल के लिए देख फिर बोली, "मेरे लिए एक मसाला डोसा और लेमोनेड. और तुम्हे क्या खाना है"

अर्जुन ने एक बार प्रीती को देख और फिर मेनू पर नजर डाली. "मेरे लिए मिल्क बादाम. बस और कुछ नहीं." बैरा उनका आर्डर लेकर चल दिए 10 मिनट

का बोल कर.

"कैसा लगा यहाँ आकर?" प्रीती ने ये सवाल किआ. "पहले तोह लगा था के मल्होत्रा अंकल ने कहा फंसा दिए. फिर तुम पर बिनावजह थोड़ा गुस्सा आया था.

लेकिन अब सोच रहा हु तोह ाचा लग रहा है. आज पहली बार मई थोड़ा आजादी से घूम रहा हु."

"तुम्हे शायद खुद की आदत हो गई है. मेरा मतलब ये था की मेरे साथ आकर कैसा लगा." नौटंकी करने लगी थी प्रीती अब अर्जुन के साथ और उसने भी

बखूबी कहा, "छोल अंकल ने कभी कोई सही काम किआ है क्या? आज तुम्हारे साथ भेज दिए सामान उठाने के लिए." और हंसने लगा.

"कितना साफ़ दिल है ये. आज भी वैसा हे है. दुनिया बदल गई लेकिन शायद इसका वक्त आज भी वही रुका हुआ है. बचो की तरह साफ़, सीधा और निर्मल."

उसको हँसता देख वो लड़ने की जगह बस एकटुक देखती रही.

"लीजिये आपका आर्डर." प्रीती खाने लगी और अर्जुन आराम से अपना मिल्क बादाम पीने लगा. प्रीती ने उस से भी पुछा की वो उसके साथ खा ले. लेकिन उसका

मैं नहीं था. वह से फारिग होकर उन्होंने अर्जुन के लिए 2 जोड़ी कपडे लिए जो प्रीती ने पसंद किये. अर्जुन ने भी खुद से उसको एक ाची सी हाफ पंत

जो जीन्स के कपडे से बानी थी दिलवाई. प्रीती ने सिर्फ एक बार उसको देखा था की अर्जुन ने अगले हे पल सिर्फ इतना पुछा था, "तुम्हारी वैस्ट कितनी है?"

"28" और उसने दूकान के अंदर जा कर वह girl's डेनिम शार्ट ले लिया था. अब तक़रीबन 3 बज चुके थे और अर्जुन दोनों कंधो पर सामान लादे प्रीती के

साथ सबसे पहली दुकान की और चल दिए. वह सूट तैयार और पैक था. उसको लेकर दोनों जिस दिशा से आये थे उधर चल दिए.

"ये सब आएगा कैसे?" अर्जुन ने जब इतना सामान देखा तोह खुद से हे कहा.

"एक काम करो, ये सामान और चूड़ियों वाला बैग तुम सामने स्कूटर के बॉक्स में रख दो. तुम्हारे ड्रेस वाला बैग मेरे बैग के साथ आगे हुक के दाल दो और

ये शादी वाला लेहंगा मई पकड़ कर बैठ जाउंगी." नारी सर्वोपरि.. मतलब औरत के पास सब समस्या का हल होता है. और अर्जुन ने ठीक वैसा हे किआ.

अब स्कूटर पर प्रीती पहले से अलग तरह से बैठी थी. उसका हाथ अब अर्जुन की कमर पर था और दूसरे हाथ में लहंगे वाला पैकेट. दोनों निकल पड़े

वापिस घर की तरफ. कुछ ख्वाब अनकहे से ले कर.
 
अपडेट 22

जाने -अनजाने


यहाँ मल्होत्रा जी घर ाची खासी भीड़ लगी थी. हर तरफ चहल पहल थी और शोर हो रहा था. अर्जुन और प्रीती अंदर आये तोह इधर उधर देखने

लगे. आँगन में घर की औरते गीत गए रही थी और लकड़ी के फत्ते पर बैठी पालक दीदी के हल्दी रसम कर रही थी. एक फोटोग्राफर वह फोटो खींच

रहा था. घर मल्होत्रा जी का भी ाचा खासा था और उनका परिवार भी काफी बड़ा था, जैसा आमतौर पर पंजाबी परिवार होते है.

"आओ बीटा खड़े क्यों हो वह? चलो इधर आकर कुछ चाय नाश्ता करो pehle."Ye मल्होत्रा जी की श्रीमती कामिनी जी थी. खूब ban-than कर ये बस यहाँ

वह सब काम देख रही थी तोह आँगन के पास चुपचाप खड़े अर्जुन और प्रीती को देखा तोह उन्होंने प्यार से उन्हें अपनी तरफ बुलाया.

"नहीं आंटी जी पहले हे बहुत टाइम हो गया है. बस ये सामान देना था आपको. वैसे भी रात को तोह फिर मिलना हे है.", प्रीती ने लहंगे के पैकेट को

उन्हें देते हुए कहा. साथ हे अर्जुन ने वह मेकअप के सामान वाला थैला और पैसे उनके और बढ़ा दिए.

"शुक्रिया बीटा जो तुमने मेरा काम आसान कर दिए. घर में कोई भी आदमी फ्री नहीं था तोह तुम्हे कष्ट दिए." उन्होंने सामान लेते हुए अपने साथ कड़ी एक

लड़की को थमाया और पैसे अपने पर्स में रख लिए. "कैसी बात करती हो आंटी जी आप. क्या हमारा कोई हक़ नहीं इतना सा काम करने का भी?" प्रीती हे

बोल रही थी. "चलो अर्जुन अब मुझे घर छोड़ दो. वह भी काफी काम है अभी." उसने अर्जुन को बोलते हुए हे इशारा किआ बहार चलने का. एक बार फिर

आंटी के पेअर छु कर अर्जुन वही से बहार की तरफ चल दिए.

"ये सब क्या था? वो सब लेडीज दीदी के वो रंग और तेल क्यों लगा रहे थे?" अर्जुन ने कौतहूल वश पूछ हे लिए और स्कूटर पर उसके पीछे बैठती

प्रीती ने भी मुस्कुराते हुए कहा, "तुम्हे लगे गई जब पता कर लेना. रस्मे होती है घर में बहोत साड़ी लेकिन तुमने कभी घर में समय बिताया हो तोह न"

दोनों अब छोल अंकल के गेट के बहार थे. "ाचा एक बार अपना वाला बैग देना जरा." प्रीती ने अर्जुन से अपना शॉपिंग बैग लिए और अर्जुन ने स्कूटर के बॉक्स

को खोल कर बाकी सामान भी उसकी तरफ बढ़ाया.

"मेरे बैग में अब क्या रह गया देखना? उसमे तोह मेरा हे सामान है न?" ये बात थोड़ी हँसते हुए कही तोह प्रीती को भी समझ आ गया के अर्जुन अब उस से

मस्ती कर रहा है. "अब नहीं देना तोह ठीक है. लोग शायद तोहफा खरीद कर अपने पास हे रख लेते है." इतना कह कर वो स्कूटर के सामने से होकर जाने

तोह अर्जुन ने समझा के गुस्सा हो गई. जल्दबाजी में उसने प्रीती का हाथ पकड़ लिए. "मेरा मतलब ये नहीं था. वो तोह बस मई मजाक कर रहा था." थोड़ा

सियस हो कर उसने ये कहा और प्रीती पलट कर हंसने लगी.. "शकल देखो जरा तुम्हारी कैसे एकदम 12 बज गए है. मजाक सिर्फ तुम कर सकते हो."

और फिर उसके हाथ से बैग लेकर सबसे ऊपर वाले पैकेट को निकल अंदर चल दी बिना फिर वापिस मुड़े.

"आ गया बीटा?" रामेश्वर जी कौशल्या देवी के साथ आँगन में कुर्सी दाल कर बैठे थे. वही पर 3 और लोग थे लेकिन अर्जुन उनको नहीं जानता था. उसने

बस शिष्टाचार से उनको नमस्कार कर दिए.

"जी दादा जी. और सब सामान मैंने उनके घर दे दिए है. थोड़ा थक गया हु तोह ऊपर आराम करने जा रहा हु." सामने वाली सीढ़ियों से वह ऊपर चल

दिए. सारा सामान अपनी अलमारी में ाचे से रखा और फिर कपडे बदल कर बिस्टेर पर लेट गया. "मल्होत्रा अंकल के घर आज संगीत है तोह फिर तोह घर

के सभी लोग भी जा रहे होंगे." उसने यही सोचा तोह अपने आप वापिस उसके कदम पिछले आँगन की तरफ बढ़ गए. निचे उतर कर देखा तोह सिर्फ ललिता

जी हे रसोईघर में थी और उन्होंने उसको बस प्यार से देखा. उनकी आँखों और चेहरे पर चमक थी लेकिन अर्जुन इस सब बदलाव को कहा समझता. "वो तेजी

सब लोग कहा है.?" उसने इतना हे पुछा की कोमल दीदी के कमरे से हंसने की आवाज आई. ताईजी ने भी इशारा वही कर दिए और फिर वापिस काम में लग गई.

वो शायद बहार आये हुए मेहमानो के लिए चाय पानी का इंतजाम कर रही थी.

"दरवाजा तोह खोलो. बंद क्यों किआ है?" अर्जुन ने दरवाजा थपथपाया तोह अंदर से आवाज आई, "कुछ जरुरी काम है क्या तुझे?" ये तोह माधुरी दीदी है

ये भी अंदर है?" उसने मन में सोचा और कहाक, 'है जरा दरवाजा तोह खोलिये एक बार."

कुछ देर में ऋतू दीदी ने दरवाजा खोला. उन्होंने अपने बाल बंधे हुए थे और एक बिना ब्याह की पुराणी टीशर्ट और एक ढीला पजामा पहना था. "है बोल क्या

काम है तुझे?" अपनी कमर पर हाथ रख उन्होंने ये बात कही. दोनों हाथ उनकी कमर पर थे जैसे वो दरवाजे के अंदर का कोई राज छुपा रही हो.

"ये सब लोग अंदर क्या कर रहे है? और माँ भी अंदर है शायद." उसने अंदर की झलक देखि तोह उसको पुअर बिस्टेर 4-5 लोगो से भरा दिखा लेकिन इतना

भी कुछ साफ़ न था. फिर ऋतू दीदी के पीछे कमरे की जमीन पर कुछ कपडे की कतरन सी पड़ी थी जिनपर कुछ लगा था, ऋतू ने उसकी नजरो का पीछा

किआ तोह हँसते हुए दरवाजा बंद किआ और बोली, "चल भाग यहाँ से बड़ा आया व्योमकेश बक्शी. कोई काम वाम नहीं है बस ये देखना है की कमरे में हो

क्या रहा है. " दीदी की बात सुनकर कुछ सोचता हुआ वह चलने लगा तोह अब ताईजी ने आवाज दी, "बीटा ये जरा बहार पकड़ा दे तोह." अब अर्जुन रसोईघर में

दाखिल हो कर ट्रे लेने लगा तोह देखा की ताईजी के हाथ पर हलकी सी लाली चाय थी और वो जगह बिलुल बेदाग सी थी, लेकिन दूसरा हाथ पर अभी कुछ

हलके बाल से थे. "आपके हाथ पर कुछ गरम गिरा है क्या?" अर्जुन की बात का आशय समझ ललिता जी ने उसके सर पर चपत लगाई और उसको हैरान छोड़

कर वह भी दीदी वाले कमरे में चली गई. बेचारा समझ कुछ न पाया था तोह ट्रे लेकर बहार चल दिए.

इधर छोल पूरी के घर भी कुछ शांति सी थी. छोल साहब अपने कमरे में थोड़ा आराम कर रहे थे क्योंकि उनको पता था के रात को आज दोस्तों के साथ जाम

टकराएंगे. और अपने कमरे के अंदर बैठी प्रीती खरीदे हुए कपड़ो को निहार रही थी. कभी वो चूड़ियों को देखती तोह कभी पायल की जोड़ी को. फिर कुछ

सोचकर वह बाथरूम के अंदर चली गई बाहर निकली तोह एक शार्ट निक्कर और बिना ब्याह की टीशर्ट में थी. कमरे में अलमारी पर लगे आदमकद शीशे में खुद

को ध्यान से देखा. बिलकुल पास कड़ी वह अपनी ब्याह और टांगो को देख रही थी. फिर अपनी कपड़ो के साथ वाली अलमारी खोली और उसमे से कुछ अलग अलग तुबे

और डिब्बिया बिस्टेर पर राखी और एक पैकेट सा भी निकला. "पारवती दीदी.. इधर आना जरा." उसकी आवाज रसोईघर में सफाई करती पारवती ने सुनी और फिर

प्रीती के कमरे में चली आई. "जी दीदी कहिये."

"यहाँ आओ तोह और दरवाजा बंद कर दीजिये." उसने प्यार से पारवती को समझाया.

"एक पानी का मग बाथरूम से ले आइये और सॉफ्ट टॉवल भी." पारवती भी तुरंत हे सामान ले आई.

"पहले बस हलके गीले तोलिये से मेरी ब्याह और गर्दन साफ़ कीजिये और फिर ये क्रीम हलके हाथो से लगा दीजिये." प्रीती ने एक तुबे पारवती की तरफ बढ़ा दी.

अगले 10 मिनट में पारवती ने उतना कर दिए. "दीदी और भी कही?"

"है यहाँ पैरो पर भी कर दो." पारवती पहले वाला हे सब दोहरा रही थी और प्रीती अब उस पैकेट से कुछ गीले टिश्यू निकाल कर अपनी ब्याह और गर्दन साफ़ करने

लगी. "दीदी एक बात कहु?" पारवती ने थोड़ी शर्म से कही ये बात तोह प्रीती ने मुस्कुराते हुए गर्दन है में हिलाई.

"दीदी आपके पेअर न बहुत खूबसूरत है और मांसल होने के साथ कितने लम्बे भी है. कही भी कुछ हल्का सा ज्यादा या काम नहीं है. और वैसे हे आपकी

बाहें और गर्दन भी है."

"चल कुछ भी बोलती hai.Itna कुछ खास नहीं बस ये जरूर है के टेनिस खेलने से थोड़ी मजबूत हो गई है." और फिर उसने अपनी टीशर्ट भी उतार दी.

बेदाग़ सुडोल जिस्म और हर अंग जैसे तराशा हुआ था. पेट भी ऐसा था के उसपर कही कोई चर्बी न थी. हलकी मासपेशियो की झलक मिल रही थी जो

उसके उभरे यौवन को और बढ़ा रही थी. लास वाली सफ़ेद आधे कप की ब्रा में उसके उभर सर उठाये खड़े थे. प्रीती का शरीर और अंगो को देख कर लड़की

होते हुए भी पारवती को जैसे उसके शरीर की तरफ खिंचाव सा होने लगा था. "पारवती यहाँ पीठ और पेट पर भी कर देना." इतना बोलकर प्रीती पेट के

बल नरम बिस्टेर पर पसर गई. पारवती के हाथ जैसे अपने आप हे उसके शरीर पर रेंग रहे थे. सख्त जाँघे लेकिन उसपर बालरहित मुलायम खाल किसी

माखन से लग रही थी पारवती को. दोनों हाथो से ाचे से जैसे वह क्रीम से मालिश करने लगी थी. जांघो के जोड़ के पास जैसे हे हाथ पहुंचे प्रीती

की आवाज ने उसको चेताया. "बस दीदी अब उसको साफ़ कर दीजिये और यहाँ मेरी पीठ पर साफ़ करके क्रीम लगा दीजिये."

पार्वती भाई सांसों से पैरो का काम निपटा कर प्रीती की कमर के पा आ गई. "दीदी ये आपकी अंगिया की पट्टी मैली हो जाएगी." प्रीती बात सुनकर हलके

से मुस्कुराई और एक तौलिया सीने से लगा लिए और फिर खुद अपनी ब्रा के हुक खोल दिए. लड़की कितनी भी मॉडर्न हो, वो एकदम से किसी के सामने नंगी नहीं हो सकती.

यही प्रीती ने किआ था. पूरी तरह से अपने गोर उभर उसने सफ़ेद तौलिये से छुपाये और फिर पारवती ने पूरी पीठ को साफ़ किआ और वापिस काम करने लगी.

"दीदी आपके तोह जिस्म पर एक भी निशाँ नहीं hai.Aur ये देखिये यहाँ से आपकी पीठ थोड़ी ज्यादा चौड़ी और मजबूत सी है." पारवती ने गौर से देखा था

ऐसे जिस्म को. पहली लड़की होगी जो कही से मोटी तोह दूर की बात चर्बी रहित थी. "वो क्या है न तू भी रोज दौड़ लगाएगी, कसरत करेगी या कोई म्हणत का

खेल खेलेगी तोह तेरा शरीर भी ऐसा हे हो जायेगा." थोड़ी गर्दन उचका कर प्रीती ने बात कही तोह पारवती की जुबान फिसल गई, "दीदी खेल तोह म्हणत का

रोज हे खेल लेती हु लेकिन हुआ तोह कुछ नहीं." और फिर अपनी बात को समझ कर खुद हे शमा मांगने लगी..

"तेरा तोह बस वही ध्यान रहता है. शायद 5 साल हुए न तेरी शादी को, फिर भी परिणाम नहीं दिख रहा कोई." प्रीती ने चुटकी लेते हुए कहा तोह पारवती

शर्मा कर बोली, "जी म्हणत तोह लगभग रोज होती है लेकिन वह कहते है के शायद भगवन की अभी मर्जी नहीं है तोह बस फिर नहीं कुछ हो रहा."

कुछ देर सोचने के बाद प्रीती ने कहा. "चलो बस हो गया सारा काम. थैंक यू अब मैं नहाने जा रही हु."

.

.

शाम घिर आई थी लगभग 7:30 के आसपास समय था. घर में थोड़ी चहल पहल थी और सभी कमरों में रौशनी हो राखी थी. रेखा जी को कोमल दीदी तैयार

कर रही थी. एक रेशमी सुनहरी साड़ी और सुर्ख लाल ब्लाउज में वह बहुत आकर्षक लग रही थी. मांग में सिंदूर, चेहरे पे सिर्फ एक बिंदी और हल्का

काजल लगया हुआ था. कोमल दीदी ने उनकी साड़ी को सेट किआ और बोली, "लीजिये माँ हो गया आपका तोह. अब आप और ताईजी चलिए कामिनी आंटी की तरफ मई

भी अपने कमरे में तैयार होती हु." "शुक्रिया बेटी." किसी गुलाब से दिखती रेखा जी तोह कोमल से कही ज्यादा सुन्दर लग रही थी. शायद उनके चेहरे का तेज

उनको सबसे अलग हे दिखता था. अपनी जेठानी ललिता जी के पास गई तोह वह भी ाचे से तैयार थी. एक रेशमी गहरे नीले रंग की साड़ी और वैसा हे ब्लूज़

उनके गोर शरीर को ाचे से समेटे था. "चले दीदी. माजी भी तैयार है." ललिता जी ने उनकी बात सुनकर अपना पर्स और रुमाल उठाया और अपनी सास की

तरफ हो ली.

ऋतू दीदी और अलका दीदी तोह शायद एक घंटे से हे तैयार हो रही थी. जहा ऋतू दीदी ने झिलमिल सा सुर्ख लाल सूट पहना था जिसके निचे पंजाबी सलवार थी

और बड़ी बड़ी आँखें काजल से और भी बड़ी लग रही थी. बालो की एक गूँथ कर की हुई छोटी उन्हें बिलकुल हे किसी सरदारनी जैसा दिखा रही थी. रंग भी फक्क

सफ़ेद था. पूरा शरीर दमक रहा था. वैसा हे कुछ अलका दीदी लग रही थी. लम्बा कद और आसमानी रंग का फ्रॉक वाला कुरता जिसके निचे सफ़ेद चूड़ीदार

पजामी और खुले हुए बाल. एक काली लम्बी बिंदी से चेहरा किसी अप्सरा से काम न लग रहा था उनका भी. दोनों ऐसे हे कितनी देर तक निहारती रही खुद को.

दादी जी के कहने पर माधुरी दीदी ने आज एक क्रीम कलर की शिफॉन की साड़ी और हलके hare-neele रंग का बिना बाजु का ब्लाउज पहना था. वो तोह आज जैसे

दुल्हन को हे टक्कर देने जा रही थी. इतने सादगी वाले पहनावे में उनका शरीर और उनके उभार जानलेवा लग रहे थे. कोमल दीदी ने भी अपनी बड़ी बहिन का

अनुसरण करते हुए एक चमकदार काली साड़ी और काला हे मैचिंग बिना ब्याह का ब्लाउज पहन लिए. माधुरी दीदी हे उनको सजा रही थी. दोनों ने पहले भी

कई बार साड़ी पहनी हुई थी तोह वह सहज थी इस पहनावे में. समय 8 के ऊपर होने को आया था तोह चारो बहने भी चल दी अपने पड़ोस के फंक्शन में. किसी

ने एक बार भी अर्जुन को याद नहीं किआ इस दौरान. सब शायद ये सोच रही थी की दूसरी ने उठा दिए होगा.

मल्होत्रा जी का घर जैसे पूरा रौशनी में नहाया हुआ था. गलियारे और बहार के आँगन में खाने का कार्यक्रम था तोह स्टाल्स सजे थे वह. बड़े ड्राइंग रूम

जो बहार की तरफ हे था वह पर सभी बड़े पुरुष एकत्रित थे अपनी महफ़िल सजाये. कोई 20-22 लोग सोफे दीवान पर गोलाई से बैठे थे और उनके सामने ऐसे

हे टेबल लगे थे. गप्पो का दौर चल रहा था. छोल साहब तोह शराब पीने वाले व्यक्ति थे तोह उनको भी ाची सोहबत मिल गई थी. मल्होत्रा जी के सम्बन्धी

भी उनका साथ दे रहे थे. पंडित जी भी juice/Sharbat का गिलास हाथ में थाम कर उनके किस्से सुन रहे थे और अपने सुना रहे थे. पिछले आँगन में बड़े बड़े

स्पीकर बज रहे थे. ये आँगन कुछ ज्यादा हे खुला था क्योंकि यहाँ ज्यादा कमरे नहीं बनाये गए थे जैसा की रामेश्वर जी के घर में थे. कुछ छोटी उम्र

की लड़किया ऐसे हे नाच रही थी. अधिकतर लोग तोह पड़ोस के हे थे या फिर सेज सम्बन्धी मल्होत्रा जी के. दूसरी मंजिल पर भी 2 कमरे और निचे की तरह

एक बड़ा ड्राइंग रूम था. यहाँ जवान लोगो का पीने पिलाने का दौर चल रहा था. मल्होत्रा जी के बड़े बेटे ने ये प्रोग्राम सावधानी और एहतियात से किआ हुआ

था. अपने दोस्तों को यही से सेवा के बाद उन्होंने बहार भेजना था क्योंकि घर में इस बात की सख्ती थी की बहार के लोग शराब पीकर तोह अंदर आ नहीं सकते.

कुछ 15-16 लोग थे जो बियर और व्हिस्की का लुत्फ़ ले रहे थे और 3-4 वेटर उनको खाने पीने का सामान उपलदब्ध करवा रहे थे. यु तोह वो सभी सभ्य घरो

से थे और कुछ परिवार से हे थे. फिर भी कोई व्यक्ति ऐसा नहीं था जो ज्यादा या जल्दबाजी में शराब पी रहा था. अधिकतर तोह वो लोग कल होने वाली शादी

और अपने काम धंधे की बात कर रहे थे. ाची खासी महफ़िल तीन तरफ सजी थी इस बड़े घर में.

तक़रीबन 8 बजे हे अर्जुन बाथरूम से नाहा कर बहार आया. संजीव भैया बिलकुल तैयार सोफे पर बैठे थे. उन्होंने एक ाची सी फॉर्मल शर्ट और पंत पहनी

थी और भूरे चमड़े के पोलिश किये हुए जूते. संजीव भाइये ऐसे हे तैयार होते थे जब भी कहा जाना होता था. उनका व्यक्तित्व भी इस तरह ातच लगता था.

"तैयार हो जा छोटे नहीं तोह फिर तानेदार साहब ने वह नहीं पाया तोह दोनों की क्लास पक्का लग जाएगी."

"बस 10 मिनट भैया." बोलकर वह कमरे में घुसा और तौलिया निकल कर अलमारी से नए कपड़ो से एक जोड़ी निकल कर पहन ने लगा. कुछ देर बाद वो बहार निकला

तो अब हैरान होने के बारी संजीव भैया की थी. काला घुटनो तक का पठानी कुरता जो उसकी चौड़ी छाती पर कैसा हुआ था और कंधे पर भी. निचे एक तंग

पजामी थी गोल सिलवट वाली और पैरो में खुंडी वाली चमड़े के भूरी राजस्थानी जूती. उसके बालो के कुण्डल भी कानो से निचे आते उसके चेहरे को भरपूर

रौनक दे रहे थे. 6 फ़ीट लम्बे चौड़े शरीर वाला लड़का किसी काल्पनिक कहानी के शूरवीर सा लग रहा था.

"तेरा तोह कायाकल्प हे हो गया छोटे. ये सब कैसे और कब हुआ.?" टेबल पर से एक पुरुषो वाला इत्र उठाकर अपने छोटे भाई के कुर्ते पर छिड़कते हुए भैया

बस उसको हे देख रहे थे. अर्जुन बस मुस्कुरा रहा था. "ये सब तुझसे तोह होने वाला नहीं है और न हे मई इस घर में किसी को जनता हु जो तेरा ऐसा परिवर्तन

कर दे. कौन हे अब भाई को भी नहीं बताएगा.?" भैया की बात सुनते उसने कहा. "चलो रास्ते में बताता हु."

मार्कीट में जब अर्जुन ने अपने कपडे खरीदते हुए एक शर्ट पहन कर प्रीती को दिखाई थी तभी उसने ये कुरता उसको थमा दिए था. "मेरे कहने से बस एक बार

पहन कर देख लो फिर जितने यहाँ लोग खड़े है उनको देख कर खुद फैंसला करना." प्रीती की कही बात सही साबित हुई थी और उस दूकान पर खड़े लोगो ने

भी अर्जुन को प्रशंशा भरी निगाहो से देखा था. एक लड़की जो वह अपनी सहेली के साथ थी उसने तोह अपनी सहेली को चुटकी काट ते हुए अर्जुन दिखाया था.

और यहाँ भैया की पारखी नजरे भी कमाल कर गई थी.

"वो क्या हुआ भैया आज जब मार्किट गया था मल्होत्रा अंकल के काम से तोह दादा जी ने कुछ पैसे दिए थे 2 ड्रेस लेने के लिए. वही एक दुकान पर ये पोषक

भी एक मूरत पर सजाई थी. मैंने पहन कर देखि तोह ाची लगी और फिर लेली. एक और भी ली है वो कल शादी के लिए राखी है." निचे आते हुए उसने

बात अपनी तरफ से बनाने की कोशिश करि थी. वो नहीं चाहता था की प्रीती का नाम ले.

"मई मेरे भाई को कही ज्यादा जानता हु. है लेकिन तेरी इज्जत भी करता हु तोह मई इतना समझ सकता हु के कुछ बात है जो तू अभी नहीं बताना चाहता. जब

ठीक लगे तोह बता देना. और हर तरह से तेरा ये बड़ा भाई तेरे साथ है. घबराना नहीं." संजीव भैया भी समझ चुके थे उनका छोटा भाई अब बड़ा हो

रहा है और बात पक्का लड़की की है.

"आपको बिना बताये चैन नहीं आएगा भैया. लेकिन अभी ऐसा कुछ नहीं है." और दोनों बातें करते मल्होत्रा जी के घर के बहार आ गए. कोई 8-9 कार और

इतने हे दोपहिया वहां गली में खड़े थे. ाची रौनक लगी थी. छत्त से निचे तक आती लाइट की लड़ियों से पूरा घर गली में जगमग हो रहा था. कपिल,

मल्होत्रा जी का बड़ा बीटा कोई 34-35 साल का पहली मंजिल पर बहार खड़ा था. उसने वही से संजीव भैया को आवाज लगाईं तोह भैया अर्जुन को साथ लेकर

ऊपर चल दिए. "आओ पंडित जी. पड़ोस में रहते हो लेकिन देखो आज महीने बाद दर्शन दिए है." कपिल ने अर्जुन से हाथ मिलाया फिर अर्जुन की तरफ देख कर

बोले, "भाई ये गबरू कोण है? बड़ा तगड़ा दोस्त है तेरा"

संजीव भैया हँसते हुए बोले, "क्या भैया ये मुन्ना है. आप हमारे यहाँ नहीं आते और ये घर से बहार नहीं निकलता. जब तक आप घर आते हो ये तो सो

चूका होता है." बात भी सही थी. कपिल की धागा फैक्ट्री थी शहर से बहार और वह 10 बजे जाता था और 10-11 बजे रात में हे आता था.

"अरे मुन्ना इतना बड़ा हो गया. सुना था बाउजी से की हॉस्टल से तू वापिस आ गया लेकिन जाकर तोह तू ताड़ सा लम्बा हो गया रे." अर्जुन को अपने साथ प्यार

से लिए वो अंदर चल दिए. सजीव भैया भी साथ हो लिए. यहाँ पर हवा में शराब की हलकी महक थी और सब खा पी रहे थे. कपिल ने सबसे दोनों को

मिलवाया. संजीव भैया तोह अधिकतर को जानते हे थे. अर्जुन आज पहली बार सबसे मिल रहा था.

"ये मेरे दिल्ली वाले चाचा जी के सबसे छोटा बीटा है राजन, अभी कॉलेज में है 2ंद ईयर में." उन्होंने बियर पी रहे एक लड़के से अर्जुन को मिलवाया जो वह

खड़े अभी युवको में शायद सबसे छोटा था लेकिन अर्जुन से बड़ा. लम्बे बाल, थोड़ा भारी शरीर, घुटनो से फटी जीन्स की पंत और कुछ अधिक हे स्टाइल

वाला था वह.

"Hello ढूढे. हाउ अरे यू?" उसने हाथ बढ़ाया, दूसरे हाथ में बियर की बोतल थी.

"थैंक यू. ी ऍम अब्सोलुतेल्य फाइन. होप यू अरे तू." अर्जुन से ऐसे प्रतिउत्तर की शायद उस लड़के को उम्मीद नहीं थी. लेकिन फिर भी दोनों बात करते रहे

जब तक राजन की साड़ी इंग्लिश ख़तम नहीं हो गई.

"भाई थोड़ी तुम भी पी कर देखो. जन्नत सा मजा है इस बोतल में. ठंडी और गरम दोनों." ये बात आँख मारते हुए कही जैसे बियर पीना कोई महँ

काम हो.

"नहीं भाई. मई ऐसा कुछ नहीं पीटा. मेरे लिए यही सही है." उसने अपने शरबत के गिलास को दिखाया.

"क्या संजीव भाई अकेले पी रहे हो थोड़ा अपने छोटे भाई को भी सीखा दो." उसने पास में खड़े भैया का ध्यान अपनी और किया. भैया उनके हे किसी

रिश्तेदार से बातें करते हुए कोला में मिलकर व्हिस्की को धीरे धीरे पी रहे थे.

"जब इसका टाइम आएगा तोह मई खुद अपने भाई को पिलाऊंगा. राजन, ये अभी उतना भी बड़ा नहीं है तोह अभी इसको इस सब की जरुरत नहीं." उन्होंने इतनी बात

कही और फिर प्यार से अपने भाई की तरफ मुस्कुरा कर वापिस सामने वाले से बातों में लग गए.

अर्जुन का वह दिल नहीं लग रहा था. तभी कपिल भैया ने कहा, "मुन्ना तुझे निचे आंटी बुला रहे है. पीछे के दरवाजे से हे निचे चला जा."

"है शायद वही ठीक जगह है इसके लिए." राजन ने हलके नशे में ये बात कही तोह कपिल ने थोड़े गुस्से आँख dikhai.Sanjeev भैया ने कुछ नहीं कहा

और न हे अर्जुन ने. वो बस बहार निकल गया और भैया ने वापिस दरवाजा लगा लिए.

निचे तोह माहौल जबरदस्त था. संगीत बज रहा था और कुछ महिलाये और लड़कीअ नाच रही थी. आँगन की किनारे कोई 20 कुर्सियां लगी थी जिनपर

लोग बैठे थे. हर कोई खूब सज संवर कर आया हुआ था. अपनी माँ, दादी और ताईजी को वही मल्होत्रा आंटी के साथ बैठा देख वो सीढिया उतरता

उनकी तरफ चल रहा था और आँगन में कड़ी सब लड़कियों की नजर बस उधर हे थी जिधर से अर्जुन आ रहा था.

"ये कोण है रे?" एक लड़की ने ये बात कही तोह माधुरी दीदी ने नाचते हुए पीछे की तरफ देखा और उनके पाँव भी रुक गए. उनके साथ हे कोमल दीदी

के भी. "मेरा छोटा भाई है. लेकिन पहचान में तोह नहीं आ रहा." माधुरी दीदी मंत्रमुग्ध से बोली यही हाल कोमल का भी था.

"तोह तेरे भाई से बात करवा न माधुरी?" ये लड़की मल्होत्रा जी के परिवार से हे थी जिसको दोनों बहने जानती थी.

"वो अभी छोटा है. उसको बकश दे." मैं मारकर उन्होंने ये बात कही. बीच आँगन में सभी खड़े थे तोह शर्म से दोनों बहने वापिस हलके कदमो से

संगीत पर पाँव थिरकने लगी. हम आपके है कौन फिल्म का गण चल रहा था.

अर्जुन आकर अपनी दादीजी के पास खड़ा हो गया. वो सभी भी बस उसको हे देख रहे थे. रेखा जी तोह पहली बार अर्जुन को ऐसे देख कर यही सोच रही

थी की ये तोह पूरा जवान हो गया है. वही हाल ललिता जी का भी था लेकिन उनको उसकी जवानी का पता पहले चल चूका था.

"ये है मेरा प्यारा बीटा अर्जुन." कौशलया देवी ने ये बात कामिनी जी की एक रिश्तेदार से कही तोह अर्जुन ने उनको नमस्कार किआ.

"कौशल्या जी, लड़का तोह आपका बड़ा ाचा है. मैंने तोह देखते हे इसको अपनी पोती के लिए पसंद कर लिए था." उन्होंने ये बात कही तोह वो लड़की जो

माधुरी दीदी से उसके बारे में पूछ रही थी किसी अदृश्य डोर से खींची वही आ कड़ी हुई.

"हाहाहा. कैसी बात करती हो सुमित्रा जी. बचा है ये अभी. इसकी शादी को अभी 10 साल पड़े है."

"कुछ भी कहो बहिन मेरे पोते तोह इस से उम्र में बड़े है लेकिन इसके आसपास भी नहीं दीखते." और अपनी आँखों से काजल उतार कर उन्होंने अर्जुन के

कान के पीछे लगाया और आशीर्वाद दिए.

"बीटा तू कुछ खा ले. तेरी बहने भी यही है आसपास." ताईजी को लगा के अर्जुन को यहाँ से थोड़ा दूर हे रखना चाहिए. "जी ताईजी." बोलकर वह वह

से कुछ कदम गलियारे की तरफ बढ़ा हे था के फिर टकरा गया किसी से. पीछे से खिलखिलाने की आवाज सुनकर होश आया तोह सामने कड़ी अप्सरा को

देख कर सुन्न हो गया. प्रीती काले सूट में और खुले बालो में आँखें बंद किये कड़ी थी. उसका हाथ अपने बाए कंधे पर था. निचे उसका पर्स गिरा

पड़ा था और साथ हे chaat-paapdi की प्लेट.

"ज्यादा जोर से लगी? सॉरी ध्यान नहीं था और एकदम से मुदा तोह सामने तुम आ गई." अर्जुन की आवाज सुनकर प्रीती ने नजरे ऊपर की तोह फिर वही हुआ जो

हर बार उसके साथ होता था. खो गया उन आँखों में जिनमे हल्का काजल लगा था. और वह भीनी खुसबू जो उसकी साँसों में समां रही थी.

"नहीं मई ठीक हु." उसने इतना कहा तोह अर्जुन ने निचे झुक कर पर्स उठाया और आगे बढ़ाया. प्रीती अपने रुमाल से अर्जुन के कुर्ते पर लगे दही के

छोटे से निशाँ को साफ़ करने लगी.

"प्रीती ये मेरा भाई है अर्जुन. और अर्जुन ये है प्रीती, छोल अंकल की ग्रांडडॉह्टर." अलका दीदी ने ये कहा जो पीछे से अब उनके पास हे कड़ी थी.

"हम मिल चुके है." प्रीती ने एक बार झुकी नजरो से कहा और फिर बगल से निकल कर आँगन की तरफ आ गई.

"तू कब मिला रे इस से? और आज तोह लगता है तू किसी शोरूम से तया हो कर सीधा इधर आ गया." ऋतू दीदी ने अपने छोटे भाई को बड़े प्यार से देखा.

वो तोह जैसे उनकी नजरो में बस गया था. अलका दीदी भी बस अर्जुन को हे देख रही थी. "ये इम्तिहान मेरी जान न ले ले." मैं में सोचा उन्होंने.

"वो छोल अंकल ने आज मार्किट में प्रीती को भी मेरे साथ भेजा था. उसको भी सामान लेना था तोह मई ले गया था. " उसने स्टेडियम का जीकर नहीं किआ.

"ओह ाचा. वैसे तोह वो हमारी पुराणी सहेली है लेकिन बहार पढ़ रही थी और बस इस महीने हे आई है वापिस." चल ऋ अलका फिर तेरा गण लगवाते है

ये ाउंटिया ऐसे हे हिलती रहेंगी. दोनों हिरानी सी वह से निकल गई. अर्जुन ने एक बार पलटकर देखा तोह प्रीती अब उसकी माँ के साथ वाली कुर्सी बार थी.

कामिनी आंटी को उनकी देवरानी अपने साथ ठुमका लगवा रही थी. घर के कुछ पुरुष सदस्य और लड़के भी वही बैठे naach-gaana देख रहे थे और

हल्का फुल्का खा रहे थे. एक वेटर से जूस का गिलास लेकर वो वही साइड में खड़ा बस उधर हे देखता रहा.

"भैया ये वाला गण है आपके पास?" ऋतू दीदी ने डेक के पीछे खड़े युवक से कहा और गण बताया. कुछ 2-3 मिनट बाद गण चला दिल तोह पागल है

फिल्म का और अब ज्यादातर लड़कियों ने नाचने के जगह खाली कर दी थी. अगले 5 मिनट कोई कुछ नहीं बोलै जब अलका दीदी ने अपना हुनर दिखाया. उनका डांस

देख कर तोह सभी की नजरे उन्ही पर लगी थी. अर्जुन के पास में सीढ़ियों पर 2-3 लड़के बैठे थे. राजन भी वही था जो डांस देख रहा था. जैसे हे

गण ख़तम हुआ तोह सब तालियां बजने लगे. उनका डांस भी जोरदार था. फिर बड़ी महिलाये वह से उठकर खाना खाने जाने लगी. अब वह ज्यादातर हम

उम्र जवान लड़किया, भाभी लोग और कुछ युवक जो सिर्फ बैठे थे रह गया. ऋतू दीदी ने जा कर प्रीती का हाथ खींचा जो कब से कभी नाच तोह कबि

अर्जुन को देख रही थी. "चल उठ अब तेरी बारी है. तूने प्रॉमिस किआ था न. सब हटो यहाँ से अब प्रीती का नंबर है और यही है अलका की टक्कर की.

बाकी तोह बस कमर हिला के चल देते है." उन्होंने इतना बोलै तोह पहले तोह प्रीती नहीं नहीं करती रही फिर कुछ देर बाद आ गई वह जहा पहले अलका दीदी

thi."AB बोल कोनसा गण सुनकर तू अपना जलवा दिखाएगी?" ऋतू दीदी तोह थी हे माहिर. प्रीती ने उनके कान में कहा तोह उन्होंने वापिस गाना चलने वाले लड़के

को गाने के बोल बताये. कुछ हे देर में गाने की धुन शुरू हुई. ये बिलकुल हे नया गण था जो ज्यादातर लोगो ने नहीं सुना था. उसके बोल थे "सपने में मिलती

है कुड़ी मुझे सपने में मिलती है." संगीत भी बड़ा तेज और ढोल की मिलावट वाला था. फिर जब प्रीती के कदम थिरकने लगे तोह वह बस कमर में दुपट्टा

बाँध ऐसे नाची की एक 2 लड़को के मुँह से सीटी निकल गई. उनमे से एक राजन भी था. अर्जुन को उसका ये व्यहवहार जांचा नहीं लेकिन वो बस शांत रहत.

"तुम यहाँ की नहीं लगती." राजन उठाकर अब प्रीती के पास जा रहा था और उसकी तरफ देखते हुए उसने ये बात कही.

"तुमसे मतलब. चलो अपना काम करो. यहाँ पर लड़को का आना मन है. ऊपर से तुमने पी राखी है." ऋतू दीदी दिलेर थी और उन्होंने राजन को पीछे कर दिए.

वह भी ज्यादा बहस किये वह से चल दिए. लेकिन था वो भी थोड़ा टेढ़ा. ऐसे हे हलके फुल्के नाचने गाने के बाद सब खाना खाने चले गए. संजीव

भैया ने भी अर्जुन को बुलवा लिए था. खाने की तरफ ाची खासी भीड़ थी तोह अलका, ऋतू, प्रीती और उनके साथ वही लड़की जिसने अर्जुन को पहली नजर में

हे दिल दे दिया था, चरों खाने की प्लेट लेकर ऊपर चाट पर चल दी. कमरों में भी लोग भरे थे तोह उनका जाना कुछ अलग नहीं लगा. संजीव भैया को वो

बताकर गई थी. सबने खाना खाया और बातें भी की. बड़े बुजुर्ग घर निकल लिए थे तब तक. रामेशर जी भी पूरी साहब के सेहत हे चले गए थे. इस

बीच अर्जुन की आँखें प्रीती को ढूंढ रही थी. "छोटे चल सब को एक बार बोल दे फिर घर चलते है." अर्जुन ने सही तरफ देखा तोह कामिनी आंटी ने

बताया के माँ, दादीजी और ताईजी जा चुके है. तभी ऋतू और अलका दीदी के साथ कोमल दीदी और माधुरी दीदी भी आ गए. सभी निकलने हे लगे थे की

अलका दीदी ने बोलै, "भाई जल्दी से ऊपर से मेरा पर्स ले आ. वो मई वही खाने के टाइम भूल गई शायद."

उनकी बात सुनकर अर्जुन सीढिया चढ़ ऊपर चल दिए. दूसरी मंजिल बिलकुल शांत थी और पीछे हल्का अँधेरा था. लेकिन जब वह वह से निचे गया था तब

तोह बल्ब जल रहा था वह. अर्जुन ने ये सोचा और थोड़ा तेजी से तीसरी मंजिल पर चढ़ने लगा.

"मेरा हाथ छोड़ दीजिये. मई आपसे कोई बात नहीं करना चाहती." प्रीती की इतनी बात हे अर्जुन के कानो पे पड़ी और अगली 5 सीढिया वो एक झटके में पार

कर ऊपर आ खड़ा हुआ. बीच छत्त पर 3 साये खड़े थे. पास जाते हे देखा तोह वो लड़की, राजन और प्रीती थे वह. प्रीती अर्जुन को वह देखते हे

उसकी और लपकी, राजन ने अभी भी उसका हाथ पकड़ा हुआ था.

"हाथ छोड़िये इसका." राजन को जरा कड़ी आवाज में उसने ये बात कही. "तू जा यहाँ से. मुझे बात करनी है इस से." थोड़ी हेकड़ी से इतना हे बोलै था राजन

ने की उसकी चीख निकल गई. वो साथ में कड़ी लड़की भी दोनों की तरफ देख कर बोली, "छोड़ो मेरे भाई को और दफा हो जाओ यहाँ से." अर्जुन ने राजन का जो

हाथ प्रीती की कलाई को पकडे था वह पकड़ कर लगभग पूरा हे मरोड़ दिए था और अब राजन का शरीर आधा झुक चूका था और आँखों में पानी आ था.

"अपने भाई को कहो की लड़की की इज्जत करना सीखे. कोई जागीर नहीं है प्रीती उसकी. और तुम एक लड़की होकर अपने भाई के गलत काम में साथ दे रही हो. इतना

भी मत गिरो के फिर उठ हे ना पाओ खुद की नजर में." प्रीती बुरी तरह चिपक चुकी थी अर्जुन की छाती से. ऐसा नहीं था के वो कोई कमजोर लड़की थी लेकिन

किसी शादी वाले घर में वो भी अकेली एक शराब पिए लड़के के सामने वो दर गई थी. नहीं तोह किसी और जगह तोह राजन जैसा लड़का उसको हाथ भी न लगा

सकता था. अर्जुन ने उसको अपने से अलग किये बिना हे वह पड़ी चारपाई से पर्स उठाया और चलने लगा. प्रीती का हाथ थोड़ा गीला सा लगा तोह बस उन उसको

अपनी नजरो के सामने हे किआ और फिर राजन की तरफ वापिस घूम कर उसके गाल पर पूरे जोर से तमाचा जड़ दिए. एक के बाद एक लगातार 4-5 झापड़ खाने के

बाद राजन भी घुटनो पे गिर गया था. नाक से खून आ चूका था उसके. प्रीती ने अर्जुन को अपनी तरफ किआ और भीख मांगती सी बोली, "प्लीज यहाँ से चलो

अर्जुन. अब और कोई तमाशा नहीं करना. प्लीज." अर्जुन उसका सर सहलाता सार्ड आवाज में राजन को बोलै, "मेरी प्रीती का एक कटरा खून भी इतना कीमती है की

इसके बदले में तेरी जान भी ले लू मई. और तूने तोह उसका हाथ हे जख्मी कर दिए. अगर फिर तू नजर आया तोह मई भूल जाऊंगा सबकुछ." और इतना बोलकर वो

प्रीती को साथ लिए निचे चल दिए. आँगन में आने पर देखा तोह वह सफ़ेद काली चूड़ियां जो उसके सीधे हाथ की कलाई में थी उनमे से 4-5 टूट कर ऊपर

हे रह गई थी. कलाई पर अभी भी हल्का खून था. "मुझे रोक कर ाचा नहीं किआ तुमने." अर्जुन अभी भी गुस्से में था और प्रीती उसको इस तरह देख कर

बस मुस्कुरा दी. "ोये तू पर्स लेने गया था या बनाने. अरु प्रीती तुम कहा थी.?" अलका दीदी उनकी तरफ आती हुई बोली.

"आप के साथ गई थी न ये? तोह लेकर भी साथ आना चाहिए था आपको." अर्जुन बिना कोई जवाब सुने वह से निकल लिए. गेट पर हे संजीव भैया और बाकी

दीदी भी खड़े थे. सबको सामने देख कर थोड़ा शांत पद गया अर्जुन और उनके पास रुक गया.

"चलो भी अब. सब ऐसे क्यों खड़े ho."Alka दीदी ने हँसते हुए कहा और सब चलने लगे. अपने घर के बहार पहुंचते हे माधुरी दीदी ने अर्जुन को रोका.

"पहले प्रीती को घर तक छोड़कर आ."

"प्रीती आज तुम हमारे यहाँ रुक जाओ न." ऋतू दीदी ने उसके करीब जा कर कहा.

"नहीं दीदी. आज तोह नहीं लेकिन जल्दी हे आउंगी. आज वैसे भी थकान है थोड़ी और फिर दादाजी को नहीं बताया है."

"चल ठीक है. कल आ जाना साथ में तैयार होंगे. गूडनिघत." सब आपस में मिले. संजीव भैया ने भी शिष्टाचार दिखते हुए "गूडनिघत गुड़िया कहा"

और सामने से भी प्रीती ने जवाब दिए.

"आप सब ऐसे मिल रहे हो जैसे ये अगले शहर जा रही है. 2 घर दूर हे इनका घर है." अर्जुन की बात सुनकर सब हंस दिए और प्रीती अर्जुन को छोड़कर

सब अंदर चले गए.

"वैसे मुझे लगा था की अब तुम्हे गुस्सा आना बंद हो गया होगा. बड़े शांत से तोह दीखते हो." प्रीती ने चलने से पहले घर से बहार आती रौशनी में

एक बार उसके चेहरे को ध्यान से देख कर कहा

"बंद हो गया होगा से मतलब.? तुम्हे क्या पता है मेरे बारे में.?"

"तुम्हारी दीदी ने बताया था के बचपन में तुम्हे बड़ा गुस्सा आता था. लेकिन फिर तुम हॉस्टल में रहने के बाद से हे बिलकुल शांत हो गए थे." सफाई से

प्रीती ने जवाब दिए.

"ाचा तुम्हारा घर आ गया है." अर्जुन और प्रीती दोनों बातें करते हुए घर तोह पहुंच गए थे लें साथ चलने पर उनके साथ वाले हाथो की उंगलिया

एक दूसरे से खेल रही थी. उसकी बात सुनते हे प्रीती ने एक बार अर्जुन का पूरा हाथ पकड़ वापिस छोड़ दिए.

"मेरी प्रीती को हाथ भी लगाया तोह तेरी जान ले लूंगा." गेट की तरफ जाती प्रीती ने अर्जुन की नक़ल करते हुए उसकी हे बात दोहराई तोह वो शर्मा कर

अपने घर की और वापिस चल दिए और प्रीती खुद के घर के अंदर.
 
अपडेट 23

Satya-Asatya


"भैया आप सो गए?" अर्जुन कपडे बदल कर भैया के कमरे में आये.

"क्या बात है तुझे नींद नहीं आ रही क्या?" भैया वैसे हे लेते थे.

"नहीं भैया बस कपडे बदल कर यही आ गया आपके पास."

"कुछ पूछना है क्या भाई?" भैया अब बिस्टेर पर तक लगा कर बैठ से गए. उन्होंने अपने छोटे भाई को थोड़ा परेशां देखा

"आप मेरे बारे में सबकुछ जानते है न? सबसे बड़े तोह आप हे है. मुझे ज्यादा कुछ याद नहीं लेकिन क्या आप कुछ बता सकते है?" अर्जुन की बात सुनकर

थोड़ी देर तक तोह संजीव भैया किसी गहरी सोच में डूब गए फिर उसको अपने पास बिठा लिए.

"जो भी मई बताऊंगा तू वो किसी से नहीं कहेगा. खासकर घर में तोह बिलकुल भी नहीं." उन्होंने अर्जुन की तरफ देखा तोह उसने हां में सर हिला दिए.

"तू समय से पहले पैदा हुआ था मेरे भाई. उसकी वजह से काफी दिक्कत उठाई थी सबने. तुझे 3 साल तक तोह बहुत हे प्यार से और एहतियात से संभाला.

कही बहार नहीं ले जाते थे की तू कही बीमार न हो जाये. तुझे जो भी पसंद होता सब फरमाइश पूरी होती थी. फिर जब एक दिन जब डॉक्टर ने बताया की

तू अब बिलकुल ठीक है तोह घर में थोड़ा आराम हुआ सबको. लेकिन सबके इस प्यार ने तुझे ज़िद्दी बना दिए था. ऋतू तोह तुझे अपने से चिपकाये हे घूमती

रहती थी. उसके साथ हे तुझको स्कूल भी भेजना शुरू किआ लेकिन तू वह भी ऋतू की क्लास में बैठने की जिद्द करता था. दादा जी का ाचा नाम था वो बड़े

पुलिस अधिकारी थे तोह स्कूल में भी तुझे इतनी आज़ादी मिल गई." फिर भैया ने एक गहरी सांस ली और कहा, "तेरी वजह से अलका और ऋतू दोनों के हे ख़राब

नंबर आने लगे थे तोह शंकर चाचा जी नाराज रहने लगे. दादा जी ने हे उनको समझाया. कुछ समय बाद सतीश अंकल का बीटा और बहु आये पड़ोस में,

उनकी बेटी भी उसके साथ आई थी. वो लोग शायद अमेरिका में कही रहते थे."

"सतीश?" अर्जुन ने ये नाम दोहराया.

"है छोल सतीश पूरी जी. और जब वह हमारे घर आते तोह उनकी पोती भी यहाँ आती थी. ऋतू, अलका के साथ साथ तू उसके साथ भी खेलने लगा था. दोनों इतना

साथ रहने लगे की कई बार वो यही सो जाती या तू उनके घर. तीन साल तक हर साल वह यहाँ आते एक महीने के लिए और तू उनकी बेटी के साथ हे खेलता रहता.

फिर उस सल्ल वो लोग वापिस चले गए और जब सतीश अंकल तुझे समझने लगे तोह तूने उनके ऊपर पत्थर फेंक के मार दिए था. तू 7 साल का था उस समय.

ये बात चाचा जी को गुस्सा दिला गई. तू सबके साथ झगड़ने लगा था. सिर्फ ऋतू और अलका के साथ हे शांत रहता. और वो दोनों भी तेरे ऊपर जान छिड़कती

थी. लेकिन चाचा जी ने ठान लिए था के तुझे वो ठीक करके हे रहेंगे. उनको सबसे ज्याद उम्मीद तेरे जनम लेने से हुई थी लेकिन तेरी जिद्द और गुस्से ने

उनको बड़ा फैंसला लेने को मजबूर कर दिए था. फिर उन्होंने तुझे हॉस्टल भेज दिए, सबके मन करने के बावजूद. रेखा चची तोह सदमे में चली गई थी. सब

धीरे धीरे शांत होने लगा. दादाजी हे तुझ से मिलने हॉस्टल जाते थे और कोई नै. हॉस्टल के वार्डन और स्कूल के अनुशाशन ने तेरा गुस्सा तुझ पर हे

प्रयोग कर तेरा ध्यान सिर्फ चुनोतियो पर लगा दिए. अब जो गुस्सा और ज़िद थी वो तेरी ताकत थी. गुस्सा तोह ख़तम हे हो गया था. और अपने दादाजी ने भी बड़े

प्यार से तेरे जीवन में ये परिवर्तन किआ की तू सबकी भावनाओ को समझे. मुझे आज भी याद है जब तू वापिस आता था तोह वह सब काम छोड़ कर 2-3 घंटे

सिर्फ प्यार, संस्कार और भगवान् की बातें सिखाते थे. अलका और ऋतू को तोह साफ़ बोल दिए गया था के उस एक महीने कभी घर के बहार वालो कमरे में नहीं

जाएँगी. तुझे जो ये सब बगीचे के काम अब ाचे से आते है ये तू 5-6 साल से कर रहा है. है न."

"है. हमारे घर के पिछले हिस्से में किरायेदार रहते है और वह बिलकुल नहीं जाना. ये दादाजी की कही बात मुझे याद है. अभी 2 साल पहले हे मुझे बताया

था के अब सभी वापिस यहाँ रहते है." अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा. उसकी आवाज भर्रा गई थी.

"तू जानता है छोटे, कई बार तोह शुरू शुरू में हम सबको पुराने घर भेज दिए जाता था. तुझे याद है वो घर?" भैया के इस सवाल से अर्जुन ने सोचा

लेकिन कुछ याद नहीं आया तोह ना में सर हिला दिए.

"ये हमारे वाले कमरे बाद में बने थे और इनके पीछे भी 3 कमरे है दूसरी तरफ. जो बंद रहते है." अर्जुन ने है में सर हिलाया.

"इस घर में पहले Dada-dadi, तेरे papa-mummy, दीदी और तू रहता था. पुराने घर पर हम सब रहते थे. तेरे हॉस्टल के पहले 4 साल तोह सभी लोग एक

महीने के लिए वही रहने आ जाते थे. और दादा दादी के साथ कभी रेखा चची तोह कभी मेरी माँ आती थी. लेकिन ये सब तेरे पिताजी के कहने पे हे

हुआ था. वो नहीं चाहते थे की इस उनका वारिस ज़िन्दगी के पथ से अलग हो जाये और अपना जीवन खराब कर ले. पूरे 4 साल लगे थे तेरे गुस्से और माहौल

को ख़तम करने में." संजीव भैया इतना बोलकर छत्त की तरफ देखने लगे.

"और ये लड़की प्रीती वही है?"

"है. जब वो अमेरिका में बीमार रहने लगी तोह फिर सतीश अंकल उसको यहाँ अपने हे पास ले आये. अब इतना कुछ बता दिए है तोह तू अपना मुँह बंद रखेगा

और जा कर बिना कोई सवाल करे सो जायेगा."

अर्जुन के दिमाग पर छाए बादल कुछ हद तक हट चुके थे. कुछ सवाल थे लेकिन उसके उत्तर सिर्फ उसके पिता रामेश्वर जी हे दे सकते थे इतना उसको पता

था. कमरे आकर बिस्टेर पर थोड़ी देर वो सोचता रहा और अपने आप उसकी आँखे बंद हो गई.

"मेरी प्रीती." अपने आप से कहती हुई प्रीती अपने बिस्टेर पर लेती थी. आज उसने वो देख था जो 8-9 साल पहले होता था. अर्जुन का उसको खुद से चिपकना

और किसी को उसके साथ नहीं खेलने देना. आज जिस तरह से उसने अर्जुन को अपने अंदर तक उतरता महसूस किआ था वैसा कभी उसके साथ नहीं हुआ था. अपनी

कलाई का दर्द भूल चुकी थी लेकिन चूड़ियां टूटने का दर्द बहोत था उसको. ये अर्जुन ने दिलाई थी. उनको उतार कर डब्बे में बंद कर वो वापिस लेती खयालो

में खो गई. फिर नींद में.

समय से पहले हे अर्जुन की नींद खुल गई थी. घडी में देखा तोह अभी 3:30 दिखा रही थी वो. बिस्टेर से उठकर वो निचे आया और पानी की बोतल निकल

कर सीधा छत्त पर चल दिए. वह पर कोई सोया हुआ था. "माधुरी दीदी." इतना सोचकर हे उसने पानी पीकर बोतल दिवार पर राखी और उस एक हे गद्दे

पर सोये इंसान की चद्दर में आ घुसा. ये माधुरी दीदी हे थी. उनके साथ लेत ते हे अर्जुन फिर उस नशे में खोने लगा जिसमे अक्सर वो दोनों खो जाते थे

जब भी अकेले होते थे. उनके कमीज के ऊपर से हे अर्जुन ने हाथ फिराए. बड़े बड़े और मोठे उभर कमीज के अंदर आजाद हे थे. दीदी के कमीज के अंदर

हाथ डालकर उनका एक नंगा दूध उसने हाथ में भर लिए और सहलाने लगा. निप्पल कड़ा होता हुआ उसको महसूस हुआ तोह वह और जोश से उनसे चिपक गया था.

निचे वाला हाथ तोह चुके पर था, दूसरा हाथ उसने पीछे से सलवार में दाल उनके नंगे चूतड़ों पर फेरना शुरू कर दिए. दीदी की गरम सांसें उसकी भी

गर्मी बढ़ा रही थी. अपने होंठ उसने माधुरी दीदी के होंठो पर रख उनके दोनों होते पीने शुरू किये तोह नींद में हे दीदी ने उसको खुद से चिपका लिए.

इतने जोश में उसने उनका वो मोटा दूध मूठी से दबाया तोह दीदी के आँखें खुल गई. अपनी आँखों के सामने अर्जुन को देख उनके होंठ भी हरकत देने लगे

अर्जुन भी जोर जोर से उनकी गांड की दरार तक उंगलिया दाल कर उनके कूल्हे मसल रहा था. मुलायम रबर से कूल्हे एक अलग हे मजा दे रहे थे. अपने कपडे

निकल वो फिर से उनसे लिपटने लगा तोह दीदी भी बैठ गई और कमीज और सलवार खोल कर अर्जुन के ऊपर हो गई. अपने मुँह के पास लटकते उनके भारी दूध

वो निचे लेत कर पीने लगा और माधुरी दीदी अपनी छूट उसके लुंड पर रगड़ने लगी. वो दोनों कई देर तक ऐसे हे लगे रहे. अर्जुन ने उनके कूल्हे दबा दबा

कर लाल कर दिए थे. और निप्पल भी फूल कर मोठे होने लगे थे. लुंड किसी लकड़ी सा सख्त निचे से हे छूट में जाने की कोशिश कर रहा था. जब बर्दाश्त

न हुआ तोह उसने दीदी को अपने निचे घुमा लिए और उनके ऊपर आते हे छूट पर लुंड लगाकर धक्का जड़ दिए. "उह माँ.. भाई आराम से कर. कही नहीं भागी

जा राइ तेरी बहिन." आधा लुंड गीली छूट में किसी खूंटे की तरह घुस गया था और छूट चौड़ी हो गई थी. दोनों हाथो से उनकी टाँगे ऊपर उठा कर उसने

फिरसे एक धक्का दिए और 2 इंच के लगभग लुंड और आगे चला गया. दीदी तड़प रही थी और उनके चुके हिल रहे थे. ये देख कर अर्जुन उनके ऊपर झुक गया

और उनके दोनों उछलते फुटबॉल पकड़ कर चूमते हुए धक्के लगाने लगा. प्यार से आधा लुंड हे बहार निकल वो एक रफ़्तार में चुदाई करता रहा. दीदी के हाथ

जब उसकी पीठ सहलाने लगे तोह उसने उनके होंठ छोड़ एक धक्के में लुंड जड़ तक ठूस दिए. "आह भाई.. हर बार ये मेरे पेट में दर्द देता है. हाय राम..

लेकिन इसका ये dard...aah मजा भी खूब.. आह आह देता है.. उनकी बात बीच बीच में रुक जाती जब अर्जुन लम्बे करारे धक्के लगता.

"दीदी आपका जिस्म हे ऐसा है... आह.. के mai...aah खो जाता हु.. " सुपडे तक लुंड निकल फिर जड़ तक ठोकते हुए अर्जुन भी मजे में डूबा लगा हुआ था.

निचे से उसके हाथ जब दीदी की गांड के छेद से टकराये तोह उसने एक उंगली से उसको सेहला भर dia.."Aah भाई ये क्या दबा दिए.. मेरी माँ.. दीदी की छूट

इतने में झाड़ गई.. छूट से निकलता पानी जब अर्जुन की उस उंगली पर पड़ा तोह उस वह गीली ऊँगली वापिस छेद पर दबाई. उसका नाख़ून तक का भाग अंदर

चला गया.... "हाय रे.. ये कैसा नशा है.. अर्जुन भाई.. मर जाउंगी मई.. " वो गांड के इस हमले से पागल हो उठी थी.. अर्जुन भी ऊँगली अंदर करते हुए

धक्के बढ़ता जा रहा था... पूरी ऊँगली गांड के अंदर बहार हो रही थी और छूट हवा में उठी पूरा लुंड खाने लगी थी... 10 मिनट में हे दीदी फिर से

अकड़ने लगी.. और जैसे हे वो झड़ी तोह अर्जुन ने भी लुंड दोनों टंगे उठा उनकी गांड की लकीर पर सत्ता दिए.. उसका सारा सफ़ेद पानी गांड के छेड़ पर दबाव

से गिरा.. अपनी गांड पर गरम वीर्य महसूस कर के दीदी को लगातार झटके लगे.. मजे में वह बिस्टेर पर गिर पड़ी थी..

"तूने ये कोनसा नया जादू किआ रे.. कसम से ऐसा लग रहा है के हवा में हु मई.. " दीदी की बात सुनकर अर्जुन ने झुक कर उनकी होंठ चूमे और कपडे पहन

लिए. दीदी ने भी जैसे तैसे कपडे पहने और अर्जुन को जाता देख वापिस वही लेत गई.

अभी शरीर बिलकुल हल्का महसूस हो रहा था और अर्जुन को उम्मीद थी की आज फिर पार्क में प्रीती आएगी और वह उसके साथ बात करेगा. कुछ देर बाद वो पार्क

के अंदर था. आज भी बुजुर्ग मंडली वही थी जिन्होंने मुस्कुराकर अर्जुन का अभिवादन किआ और उसने भी भागते हुए हे प्रतिउत्तर में गर्दन हिला दी. पता हे

नहीं चला कब वो 5 चक्कर पूरे कर चूका था. थकान जरा भी नहीं थी लेकिन आचार्य जी को अकेले टहलते देख उनकी तरफ हलके कदमो से भाड़ गया.

"नमस्कार सर."

"कैसे हो बीटा. सब कुशल मंगल?" उन्होंने ये बात कही तोह अर्जुन ने सिर्फ हां में सर हिलाया.

"ये वृक्षों को देख रहे हो. कितने दयालु होते है ये. हम इंसानो को ज़िन्दगी भर फल, चाय, जीवदायिनी हवा और फिर मरने के उपरांत लकड़ी देते है.

हम सिर्फ इनको एक बार पानी देकर अपना कर्तव्य पूरा समझ बस इनसे हे आशा करते रहते है."

"आचार्य जी वृक्ष हमे प्यार देते है और हमारी वासना उनके प्रति जीवन भर रहती है." अर्जुन ने उनके पिछले पाठ को आज उनकी बात से जोड़ दिए था.

"सही बात कही बीटा." उन्होंने नंगे पाँव हे घास पर चलते हुए अर्जुन के कंधे पर हाथ रख लिए और एक फूलो से लड़ी दाल दिखने लगे.

"ये खूबसूरत फूल देख रहे हो बीटा. यहाँ देखो तितलियाँ और मधुमखिया मंडराती है लेकिन किसी नीम या बाबुल के पेड़ पर तुमने कभी उन्हें देखा है?"

"नहीं सर. उनको फूलो से पराग लेना होता है जो उनका भोजन और जीवन का आधार रहता है." अर्जुन की ये ख़ास बात थी की हर विषय को गहनता से समजह

था उसने. सिर्फ रट्टा मार कर प्रथम आने वाला लड़का नहीं था.

"बहुत खूब बात कही. अब इस बात को इंसान की जिंदगी से जोड़कर देखो. और बताओ क्या समझे."

अर्जुन ने काफी देर इस बात पर विचार किआ. उसको बात समझ आ रही थी लेकिन सही शब्द नहीं मिल प् रहे थे.

"ज्यादा मत सोचो बीटा. जिसको जरुरत होती है वो उसके पास हे जाता है जो उसको पूरा कर सकता है. लेकिन फरक है एक पहले वाली बात और इस बात में. एक

मधुमखी पराग लेने के बावजूद फूल को नुक्सान नहीं देती. वो बदले में उसके नन्हे बीज जमीन पर बिखेर उन पेड़ो का विस्तार करती है. आज का पाठ यही

है. निस्वार्थ प्रेम करो इन वृक्षों की तरह. और अगर तुम्हे लगता है की इस प्रेम में तुम्हे सामने वाली से लेना पड़े तोह इतना जरूर करना की उनके चरित्र

का ाचा विस्तार हो, आत्मा को सुकून मिले और तुम उनकी अपेक्षा पर खरे उतरो. स्वार्थ प्यार को हे नहीं उस व्यक्ति को भी ख़तम कर देता है. जब एक घड़ा

पानी चाहिए होता है तोह सिर्फ उतना हे लेना चाहिए. अन्यथा तुमने तोह सुना होगा की ज्यादा के चक्कर में नदी की दिवार देह जाती है तोह खेत और नदी

का वो भाग दोनों बर्बाद हो जाते है." कहते हुए वो वह से आगे बढ़ चले और अर्जुन उनके साथ चलता रहा.

"कोई प्रश्न चल रहा है दिमाग में बीटा?" उन्होंने उसको चुप देखा तोह पूछ लिए

"सर, एक सवाल परेशां कर रहा है कुछ दिनों से."

"बीटा मई तोह अन्तर्यामी हु नहीं. और जितने समस्या बताई न जाये तोह उसका हल नहीं होगा." मुस्कुरा दिए

"अगर ज़िन्दगी में पहले कुछ भी घटा हो लेकिन फिर समय बीत जाए और तब तक सब ठीक हो तोह क्या उन पुराणी बातो पर विचार कर के कुछ हांसिल होगा?"

"तुम क्या चाहते हो?" उन्होंने पलट कर सवाल कर दिए.

"मई सिर्फ सच और उस सब बात के पीछे का कारण जान न चाहता हु."

"सच क्या होता है बीटा? सच और झूठ जैसा कुछ नहीं होता अमूमन. एक इंसान किसी बात को अलग तरीके से कहता है. लेकिन दूसरे ने अगर वो वैसा नहीं

पढ़ा हो तोह वो उसको झूठ कहेगा. दोनों में से कोण सच्चा कोण झूठ उसको फिर लोगो का मत (वोट) साबित करता है. लेकिन क्या यही सब सच है? जिसने तुम्हारे

अतीत में जो भी किआ हो उसके पीछे कुछ मकसद रहा होगा. जरुरी नहीं के हर व्यक्ति जो तुम्हे दुःख दे वह तुम्हारा दुश्मन हो और जो तुम्हारे साथ हर वक्त

मीठी बातें करे वो दोस्त. ऐसी बातें मैं को विचलित करती है, इसको काबू करना सीखो. अतीत से सिर्फ मीठी यादें हे लेना सही है और या फिर

गलतियों से सीखना."

अर्जुन अब निरुत्तर था. वो भी तोह अब जो सब कुछ हुआ उसको बदल नहीं सकता था. और जो भी ज़िन्दगी में उसके पिता ने किआ था उसके साथ वो भी तोह किसी

बात को ध्यान में रख कर किआ होगा. संजीव भैया ने भी कहा था के जब मई पैदा हुआ तोह उनको मुझमे उम्मीद नजर आई थी. आज यही सब है जो

मई इतने ाचे से पढ़ प् रहा हु और ये शरीर जो पैदा होने पर रोगी था वह आज स्वस्थ है.

"बीटा आओ थोड़ा साथ में टहल ले. फिर तोह हम अब एक हफ्ते बाद मिलेंगे." इतना कह कर वो उसको अपने साथ लिए पार्क में चक्कर काटने लगे. धीमे कदमो से

अर्जुन को अब कोई सवाल किसी से नहीं पूछना था. क्योंकि उसको पता चल गया था की किसी बिमारी को ठीक करने के लिए जो इंजेक्शन दिए जाता है वो दुखता

है लेकिन फिर मरीज ठीक भी उस से हे होता है. उसके सभी अवगुण उसके पिता जी ने सख्ती से हे सही लेकिन ख़तम कर हे दिए थे. और अब उसको अपने आप

को साबित करना था.

"आप कहा जा रहे है सर?" उसको जानकार ाचा नहीं लगा था

"बीटा एक योग और हृषी महोत्सव है हरिद्वार में. बस वही. तुम सबसे ज्यादा तब सीखते हो जब तुम उन्ही लोगो की सांगत में रहो जिसमे वह सब या तोह

महारथ रखते हो या फिर उनका दिल उसमे लगा हो. मेरे भी कुछ guru/dost वह मिलेंगे तोह कुछ शायद सीख सकू."

ऐसे हे चलते हुए वह अर्जुन को आसपास ज़िन्दगी दिखा रहे थे. कही कोई बातें कर रहा था, कही बुजुर्ग बैडमिंटन खेलते हुए भी मुस्कुरा रहे थे.

5 से ऊपर का समय हो चूका था और ाची खासी रौशनी हो चुकी थी. उनके साथ अर्जुन समय भूल हे चूका था. घर से निकला था तोह शरीर हल्का था

लेकिन अब तोह उसका दिल और मैं दोनों शांत थे.

"आपका इन्तजार करूँगा." पहली बार अर्जुन ने उनके पाँव स्पर्श किये तब तक आचार्य जी मित्र भी उधर गेट के पास आ चुके थे. आचार्य जी ने उसको गले

से लगाकर सिर्फ इतना कहा, "प्रेम से जिंदगी जी ली जाये तोह बेहतर है बीटा, सबके साथ. अकेला तोह देखो सूरज भी गरम हे रहता है." उनके मजाक के

भाव में भी गहरी बात थी. "अपना ख्याल रखना और हमेशा ऐसे hi निश्चल रहना." वो दोनों हे साथ में बहार चल दिए.

"बीटा आज भी दौड़ने गए थे?", रामेश्वर जी ने अर्जुन को घर में आते देखा. 5:30 हुए थे अभी और वह चाय पी रहे थे.

"आज जल्दी चला गया था दादाजी. फिर एक दोस्त जैसे गुरूजी है और आज उनके साथ समय का पता हे नहीं चला."

"ाचा तोह अब तेरे दोस्त भी है? और गुरूजी?"

अपने दादाजी को तात्पर्य समझ उसने ाचे से बताना हे सही समझा, "वो कोई साधू महाराज नहीं है दादा जी. वो योग और प्राणायाम वाले गुरु है. और 70

साल के भी होकर मुश्किल से पापा जितने लगते है, बस सारे बाल आपकी तरह सफ़ेद है. रोज एक पाठ सिखाते है मेरी दौड़ पूरी होने के बाद और अगले

दिन सबक पूछते है नया पथ सीखने से पहले." अपने पोते का आचरण और लोगो का चुनाव भी पंडित जी को गदगद कर गया.

"आज का क्या पाठ सिखाया तेरे गुरूजी ने?"

"प्रेम और स्वार्थ. इसके साथ हे ये भी कहा की इंसान के प्रतिदिन के जीवन में सत्य और असत्य जैसा कुछ नहीं होता. एक बात जिस व्यक्ति ने महसूस

की हो वही बात दूसरे ने नहीं की हो तोह वो सिर्फ उन दोनों के लिए एक भाव भर है. और उन्होंने ये भी सिखाया की दुःख देने वाला व्यक्ति आपका दुश्मन

हो ऐसा जरुरी नहीं. शायद जब आपको वो बात दुःख देती होगी तब आप कमजोर होंगे और उस से उबरने के बाद पता चले की ये सब उस सख्त निर्णय का

हे परिणाम है जो आज हम शक्तिशाली है." यहाँ अर्जुन ने द्विअर्थी बात करि थी. दादाजी को ये भी बता दिए की जो भी परिवार नई उसके साथ किआ था

उसको अब उस बात का कोई gila-shikwa नहीं है.

"असाधारण बात कही है बेटे उन्होंने. इतनी बड़ी शिक्षा देने वाला व्यक्ति कोई आम गुरु तोह नहीं हो सकता. क्या नाम बताया तुमने उसका?" रामेश्वर जी थोड़ा

हतप्रभ हो गए थे उसकी बातों से.

"जी कोई आचार्य प्रमोद शास्त्री है. मेरे से भी लम्बे और तगड़े है वह." रामेश्वर जी की भी आँखें चमक उठी नाम सुनकर

"खुशनसीब हो बीटा जो तुम उन जैसी शक्शियत के सान्निध्य में हो. पूरे विश्व में जिनका नाम प्रचलति है वो तुम्हारे साथ समय बिता रहे है."

उन्होंने अपने पोते का माथा चूमा. उनका मैं भी प्रसन्न था. "चल उठ और दूध पी ले. फिर तेरा पता नहीं कहा निकल जायेगा." लाड से उन्होंने कहा

और अर्जुन अंदर आ गया जहा माँ रसोई में सबके लिए चाय बना रही थी और Ritu/Alka के लिए कॉफ़ी.
 
विवाह का मेगा अपडेट रात 2 बजे तक आएगा. अपडेट देरी से देने के लिए माफ़ कीजियेगा.
 
अपडेट 24

तुम साथ हो


"Kaam-Krodh-Kukarm ये ऐसे त्रिकाल है की मनुष्य इनके बस में हो जाये तोह उसको राक्षश ban-ne से फिर भगवन भी नहीं बचा सकते. जनम से हर

व्यक्ति किसी सफ़ेद पैन की तरह कोरा होता है. वो वही धारण करता है जो उसपे लिखा जाए. जैसे माहौल हो में वो बड़ा होता है, जैसी शिक्षा

वो ग्रहण करता है और जैसे निर्णय वो अपने आसपास के लोगो को लेते हुए देखता है. फिर हम कैसे कह सकते है के सिर्फ उस राक्षश की हे गलती

है? असुर भी ग्यानी होते है और देव भी kaam-pipasa के भोगी. सुख में रहता साधू और दरिद्रता में जीता राक्षश एक सामान हे तोह है."

.

.

"ले बीटा तू दूध पी तबतक मई तेरी बहनो को उठा दू. आज तोह माधुरी भी अभी तक सोइ हुई है. पता नहीं इतना कितना थक गई ये सब कल के संगीत

में. अपने घर जाएंगी तब भुगतेंगी." रेखा अपने बेटे के सर पर हाथ फिरते हुए बोल रही थी. अपनी माँ के इस दुलार भरे स्पर्श और उनके शरीर

से आती एक मदमस्त सी खुसबू में अर्जुन बस आँखें मूंदे बैठा रहा. कोमल दीदी जब उसके पास बैठी तब पता चला के माँ तोह कब की चली गई है वह

से. दूध की तरफ ध्यान लगाया और फिर मुस्कुराकर अपनी बड़ी बहिन को देखा. "साड़ी में बहुत ाची लग रही थी दीदी आप."

"रहने दे तू तोह. मेरे से ज्यादा ाची माधुरी दीदी लग रही थी और कल तोह तू भी कुछ अलग चमक रहा था." कोमल दीदी को दिल में ख़ुशी हुई के

उसके भाई ने उसको ध्यान से देखा तोह सही.

"अरे दीदी ऐसा नहीं है. माधुरी दीदी भी ठीक लग रही थी, लेकिन आपके शरीर पर तोह साड़ी इतना ज्यादा खिल रही थी के जैसे वो बानी हे सिर्फ

आपके लिए हो. मैंने तोह एक सदा कुरता पजामा हे तोह पहना था." अर्जुन की बातों ने तोह कोमल दीदी का आज दिन हे खिला दिए था.

"ाचा बच्चू. मेरे पर साड़ी ठीक थक हे लग रही थी?" माधुरी दीदी जो कबसे अर्जुन के पीछे कड़ी थी आखिर में बोली.

"वो.. वो दीदी मेरा कहने का मतलब था के .. आप दोनों खूब ाची लग रही थी." इतना बोलकर वह भाग लिए वह से. और इधर Ritu/Alka दीदी भी आ

गई थी.

"आह." माधुरी दीदी जैसे हे बैठी उनके मुँह से निकली ये हलकी सीत्कार तीनो बहनो ने सुनी. अलका और ऋतू तोह सिर्फ होल से हंस दी लेकिन कोमल ने

पूछ हे लिए. "क्या हुआ दीदी? आपको अभी भी दर्द है क्या?"

"अरे कुछ नहीं वह छत्त पर सोने से शायद पेअर की नस चढ़ गई थोड़ी. लेकिन ठीक हु मई इतना भी कुछ नहीं हुआ है." जवाब देते हुए हे उन्होंने

मैं में हे कहा, " एक बार तू लेके देख तोह जरा उस घोड़े का अपने अंदर. मई तोह चल कर निचे आ गई तू तोह घिसट कर हे आती. हाय कितनी बुरी

तरह फाड़ कर रख दी है मेरी."

"दीदी कहा खोई हुई हो. चाय ठंडी हो जाएगी." अलका की आवाज से माधुरी दीदी ने चुदाई याद करके बस कप उठाया और उनके मुँह पर लाली चा गई.

"आज तोह फंक्शन शाम को जल्दी हे शुरू हो जायेगा. माँ, दादी और ताईजी तोह शायद अभी नाश्ता बना कर हे कामिनी आंटी के घर चले जायेंगे."

ऋतू को शादी के फंक्शन का बड़ा चाव था. उन दिनों यही तोह एक समय होता था घर की लड़कियों का जब वो खुल कर सिंगार करती थी, अपने दिल के

वो अरमान जीती थी जो अधिकतर दिनों में घर की चार दीवारी में क़ैद रहते थे. खाना पीना, भाभियों से मस्ती, उनके द्विअर्थी चुटकुले और आप बीती

को मजे लेकर sun-na और फिर अपने मैं में उनके सपने देखना जब उनकी भी शादी होगी और वो किसी राजकुमारी की तरह दुल्हन बनेंगी. Shaadi-byaah

में इतनी rasme-riwaaj थे की 3-4 दिन तक बस वही होते थे. परिवार में दूर दराज के सभी सम्बन्धी एकसाथ होते थे.

"है तोह आज ज्यादा कुछ तोह करना नहीं है. वैक्सिंग और फेसिअल तोह कल हे सबका हो चूका है. जो भी थोड़ा बहुत है वह आज कर lenge."Komal ने बात

जारी राखी.

"मेरी भावो की भी थोड़ी शेप ठीक कर देना यार कोमल. और यहाँ की वैक्सिंग भी." माधुरी दीदी ने शर्म से अपनी काख की तरफ इशारा किआ तोह बाकी

सब हंस पड़ी. "है है क्यों नहीं. अगला नंबर आपका हे तोह है अब. मैंने सुना था कल एक आंटी को दादी से बात करते हुए और शायद दादी ने बाबा से

बात भी करि होगी." माधुरी दीदी तोह ये बात सुनकर हे वह से कड़ी हो गई. उनको बड़ी मुश्किल इस तोह एक प्यार करने वाला मिला था. "मई मन कर

दूंगी दादा जी को. अभी मैंने कोई शादी नहीं करनी." ये कहकर वो बाथरूम में चली गई लेकिन ये तीनो हंसती रही. ऐसे हे कुछ देर में सब अपने कामो

से फारिग हो कर नाश्ते में लग गए.

"बीटा वो तुम्हारी ड्रेस लाने के लिए मई अर्जुन को कह देता हु. रामेश्वर जी के घर हे जा रहा हु तोह वही बोल दूंगा. कुछ और भी चाहिए तुम्हे?"

छोल साहब खाने की टेबल से हाथ साफ़ करते उठे. उनके सामने हे कमीज पाजामे में बैठी प्रीती अपने हाथ में पकड़ी ब्रेड पर माखन लगा रही थी.

"नहीं दादू. मई भी वही जा रही हु तोह खुद हे उसको बोल दूंगी. कुछ फिटिंग की प्रॉब्लम हुई तोह बेचारे का एक और चक्कर लग जायेगा." और हंसती

हुई कड़ी हो कर अपने दादाजी को एक गिलास जूस का थमा कर वापिस बैठ गई.

"इतना ख्याल मत रखा कर अपने इस बूढ़े दादा का बिटिया. तू जब अपने घर चली जाएगी तोह फिर मई खुद को संभल नहीं पाऊंगा." उनकी बात सुनकर

प्रीती वापिस आ उनके ब्याह से लिपट ते हुए बोली, "तोह ऐसा करना के लड़का घर हे रख लेना." और हंसने लगी. उसको देख छोल साहब भी हंस दिए. "तू

कभी बड़ी नहीं होगी. है न? और मई तोह बस यही सोचता रहता हु के कब तू मेरा पीछा चोदे." गिलास टेबल पर रख उन्होंने प्यार से अपनी इस बिटिया को

गले लगाया और बहार निकल दिए. कुछ सोचते हुए प्रीती ने ब्रेड का पीेछे ख़तम कर अपना जूस का गिलास खाली किआ और मुस्कुराती सी अपने कमरे में भाग

गई.

रविवार था तोह संजीव भैया भी घर थे. अर्जुन उनके साथ हे बैठा हुआ टेलीविज़न पर वीडियो गेम खेल रहा था. कैसेटटे लगा कर कॉण्ट्रा खेलता हुआ

वो थोड़ा शोर मचा रहा था. ये वीडियो गेम भैया हे लेकर आये थे जब अर्जुन इस बार घर वापिस आया था और कभी कभी दोनों भाई बैठ कर एक साथ

खेल लेते थे जब उनको ऐसा टाइम मिलता था. "भैया इस 3रद स्टेज पर एक भी चांस आउट नहीं होने देना मेरा. नहीं तोह मई बहार हो जाऊंगा." वो पूरी

तरह से उसमे खोया हुआ था और भैया भी किसी माहिर खिलाडी के जैसे अपना खिलाडी उस से आगे चला रहे थे. इतने में हे ऊपर ऋतू दीदी आई और सीधा

टेलीविज़न बंद. "दीदी." अर्जुन तोह चीख हे पड़ा लेकिन भैया ने हँसते हुए रिमोट टेलीविज़न के निचे पड़ी गेम पर रख दिए.

"यहाँ तू गोलियां चला रहा है निचे दादा जी ने आवाज दे दे के घर सर पर उठाया हुआ है. भैया आपको भी एक बार हमको लेकर मार्किट चलना है. प्लीज

जल्दी आ जाओ निचे आप." संजीव भैया हां कहते हुए अपने कमरे में चले गए कार की चाबी लेने और अर्जुन भी उदास सा दादा जी के पास.

"लाला जी आप कोनसी दूकान चला रहे हो की आवाज भी नहीं सुनती अब?" रामेश्वर जी की दांत में भी मजाक हे होता था. जो उन्होंने अर्जुन के आते हे कहा.

अर्जुन ने छोल साहब के पाँव छुए और फिर दादा जी के सामने पड़ी खली कुर्सी पर बैठ गया. "अभी तोह दादा जी थोड़ा फ्री हुआ था के आपकी आवाज आ गई."

"बीटा पूरी साहब कुछ बात पूछना चाहते थे और तेरा इन्तजार कर रहे थे." अर्जुन ने दादा जी की बात सुनकर अपना चेहरा प्रश्नवाचक निगाहो से छोल

साहब की तरफ किआ.

"अरे बीटा ऐसी भी कोई बड़ी बात नहीं थी. वो मई बस पूछ रहा थे के आज भी तुम मार्किट जा सकते हो अगर थोड़ा टाइम है तुम्हारे पास." छोल साहब के

दिल में आज तक कुछ झिझक थी अर्जुन को लेकर. उन्हें हमेशा ऐसा लगता था के ये बारूद फिर न फट जाये. ऊपर से वह हमेशा शांत दीखते थे लेकिन.

"अंकल, आप भी तोह मेरे दादाजी हे हो. तोह फिर पुछा मत कीजिये बस बताया कीजिये क्या करना है. ाचा अब बोलिये भी." छोल साहब ने एक बार रामेश्वर

जी की तरफ थोड़ी शंका से देखा. "वो बीटा प्रीती का ड्रेस मार्किट में है. और मैंने सोचा तुम अगर उधर जाओ तोह ले आओगे आते हुए."

"हां तोह मई लेके आ सकता हु क्योंकि दुकानवाला तोह मुझे पहचानता है. लेकिन अभी तोह 10:30 बजे है अंकल और ड्रेस 1 बजे तक तैयार होगी. मई ले आऊंगा

आप परेशां मत होना. है अगर और भी कुछ लाना है तोह बता दीजिये." अर्जुन ने उनकी तरफ देखते हुए पुछा.

"है वो प्रीती बेटी अभी यही आती होगी तोह तुम पूछ लेना." उन्होंने इतना हे कहा था के एक सफ़ेद सलवार कमीज पहने किसी सफ़ेद गुलाब सी प्रीती सीधा आ

कर रामेश्वर जी की बगल में बैठ गई. "दादा जी ये पीछे वाली शोकेस में राखी लकड़ी की गुड़िया मेरी है न.?" जी दीवान पर रामेश्वर जी बैठ थे

उसके पीछे एक शीशे की 2 तरफ सरकने वाली शोकेस थी. उसमे कुछ फोटोफ्रेम थे जिनमे घर के सदस्यों को पुराणी फोटोज लगी थी और कुछ चुनी हुई

चीजें जैसे एक एफफिल टावर का ताम्बे से बना नमूना, कुछ कांच के rang-birange जानवर और 3 खिलोने रखे थे. जिनमे से एक चटख गुलाबी पेंट की हुई

लकड़ी की गुड़िया थी.

"तुझे याद है ये मेरी बची?" रामेश्वर जी ने प्रीती के सर पर हाथ फेरते पुछा. वो किसी बिल्ली के जैसे अपनी चप्पल जमीन पर उतार कर शोकेस से

गुड़िया उठा वापिस आ कर बैठ गई वही. अर्जुन ध्यान से देख रहा था सबकुछ. छोल साहब तोह प्रीती का बचपना देख हंसने हे लगे थे. "पंडित जी ये

लड़की जब आँखों से दूर थी तोह बता नहीं सकता के कैसे जी रहा था. अब भी देखो वैसे हे है."

"वैसे कहा रही ये पूरी साहब, मेरी बची तोह अब ज्यादा ाची हो गई है." रामेश्वर जी ने स्नेह से ये बात कही.

"इसमें से बचे निकलेंगे. खोलो इसको बीच से पकड़ कर." जैसे हे अर्जुन ने ये बात कही तोह तीनो हे हैरानी से उसकी हे तरफ देखने लगे. फिर प्रीती ने

उस गुड़िया को पेट की तरफ से गोल घुअमाया तोह वो खुल गई और उसके अंदर एक छोटी गुड़िया थी." इसको भी खोलो तोह एक और निकलेगी" और अर्जुन की बात

सुनकर प्रीती ने दूसरी गुड़िया के साथ भी वही किआ तोह एक और निकली अंदर से.. प्रीती ने जैसे उसको उठाया तोह अर्जुन बोल पड़ा, "बस कर इसमें और कुछ

नहीं है अब. खली होगी अंदर से. आखिरी वाली तोह मेरे बैग में होगी." और हंसने लगा.

रामेश्वर जी और छोल साहब को तोह सांप सूंघ गया था ये बात सुनकर. वो गुड़िया कोई 10-11 साल पुराणी थी. इधर प्रीती को झटका तोह लगा था लेकिन उसने

जाहिर किये बिना हे कहा, "तुम्हे इसके बारे में पता था?"

"ये मेरी हे तोह थी. फिर मैंने तुम्हे तुम्हारे 7तह बर्थडे पर दी थी लेकिन तुमने वापिस यहाँ रख दी थी. दादाजी लेकर आये थे इसको कश्मीर से, शायद."

अर्जुन ने वैसे बैठे हुए हे जवाब दिए. "ओह. मैंने इसको पहले भी हाथ में लिए था कई बार लेकिन ये नहीं पता था के ये खुलती है. बस देख कर वापिस

यही रख देती थी."

"बीटा, तुम्हे ये सब कैसे याद है?" ये बात कही थी छोल साहब ने.

"अंकल ये क्या बात हुई? याद तोह ये भी है के आप मुझको अपने हाथो से ice-cream खिलते थे, मेरे गले में टॉवल पहना कर. प्रीती खुद से खा लेती थी

लेकिन मई कपडे खराब कर लेता था. दादाजी आपको मन भी करते थे लेकिन आप कहते थे मेरा शेर बचा है ये इसको किसी बात की मनाही नहीं है."

अर्जुन थोड़ा मुस्कुरा कर बोलै और उठकर छोल साहब के साथ जा बैठा.

"छोटे दादू, अतीत की यादें पतझड़ सी जरूर होती है लेकिन हमे फिर भी कुछ महकते फूल हमेशा याद रहते है." और पहली बार उसने अपनी बाहे

उस सख्त इंसान के दोनों तरफ लपेट ली. ये इंसान जो हमेशा किसी मजबूत वृक्ष सा तना रहता था वो भी इस लड़के से लिपट सा गया था. "मेरे बचे

मैंने कोशिश की थी." इतना बोलकर छोल साहब की आँखें बस नाम हो चली.

"मई न कहता था सतीश, की प्यार कही नहीं जाता. देख ले सब यही सोच रहे थे की ये एक नया अर्जुन है लेकिन सब गलत हे थे. ये आज भी तुझसे

उतना हे प्यार करता है." रामेश्वर जी ने भी काफी समय के बाद अपने इस अजीज दोस्त का नाम लिए था. उनको भी अर्जुन के इस व्यवहार और बातों ने अंदर

से हिला जरूर दिए था लेकिन एक खुसी थी की उनके बचे ने अपने अँधेरे अतीत से सिर्फ फूल हे चुगे थे, दर्द नहीं.

"ाचा अब छोड़ मेरे दोस्त को और तैयार हो कर आ." उन्होंने अर्जुन से कहा जो अभी भी छोल साहब से चिपका था और इधर प्रीती की तरफ किसी का ध्यान नहीं

गया जो रट हुए भी मुस्कुरा रही थी.

"देख ले मानो ये मुझे तेरे से ज्यादा प्यार करते है, आज भी." अर्जुन ने अलग होते हे प्रीती की तरफ देख कहा और उठकर किसी बचे सा भाग गया. पीछे

छोड़ गया तीन मुस्कुराते हैरान चेहरे.

"वैसे दादू आपसे तोह बिलकुल ये उम्मीद न थी." प्रीती आँखें साफ़ कर खिलखिला उठी.

"अरे तेरा दादा कितना भी सख्त क्यों न हो इसने शहर के सभी डॉक्टर की जान निकाल दी थी जब अर्जुन पैदा होने के बाद बीमार हुआ था. मई तोह 2 दिन बाद

आ पाया था पोस्टिंग की वजह से लेकिन इसने दिन रात एक कर दिए था उसको बचने में. ये कहता था के अर्जुन को आर्मी में भेजेंगे और फिर अपनी बात से मुकर

भी गया था. जो दिल करेगा वो अर्जुन बनेगा." छोल साहब शांति से बैठे बस हल्का मुस्कुरा रहे थे. कितनो साल बाद उनका अंतर्मन हल्का हुआ था. अर्जुन के

पिता शंकर जी भी तोह सबसे करीब उनके हे थे. प्रीती वापिस गुड़िया वही रख उठकर अंदर चल दी और ये दोनों भूली बिसरि बातों में लग गए.

"भैया हम 5 लोग कैसे बैठेंगी इसमें.?" अलका ने संजीव भैया, जो कार की ड्राइविंग सीट पर बैठे थे उनसे कहा.

"दीदी आप लोग जाओ, मैंने नहीं जाना. मई कल हो आई थी मार्किट." प्रीती जो अभी अर्जुन की चारों बहनो के साथ कड़ी थी बोली.

"सोच ले. मई तोह तुझे गौड़ में बिठा लुंगी." माधुरी दीदी ने कार के अंदर से आवाज दी.

"नहीं आप लोग जाइये." और वो वह से घर के अंदर चल दी और ये सब कार में बहार.

अंदर सारा घर ध्यान से देखती हुई प्रीती कुछ ढून्ढ रही थी. वह तोह कोई नहीं था फिर वह अंदर आँगन में बानी सीढ़ियों से ऊपर आ गई दूसरी मंजिल

पर. ड्राइंग रूम में कोई नहीं था. बाथरूम का दरवाजा भी खुला था. फिर उसने अपना सर जैसे हे संजीव भैया के कमरे के अंदर किआ उसके पीछे से अर्जुन

की आवाज आई, "वह कोई नहीं है? भैया बहार चले गए है. कुछ काम था?"

प्रीती का दिल पहले तोह जोर से धड़का लेकिन अर्जुन का इतना ठंडा रवैया देख वह बस वापिस मुड़ी हे थी की अर्जुन ने उसका हाथ पकड़ कर अपनी तरफ खींच

लिए. "मैंने कहा न कोई नहीं है, सिर्फ हम दोनों है" और अपने सीने से चिपका लिए. बाला सी खूबसूरत प्रीती के गाल सुर्ख गुलाबी हो गए थे इस एहसास से

की आज वो उस शख्स की बाहो में है जो बचपन में उसकी खुशियां था. उसको वापिस हांसिल करने के लिए कितना कुछ किआ और करने वाली थी लेकिन सबको गलत

साबित करता वह सबकुछ जानते हुए उसके हे दिल से खेलता रहा और परेशां करता रहा.

"बहोत बुरे हो तुम. तुम्हे सब पता था पहल से?" नाराजगी दिखते हुए उसने इतना कहा तोह अर्जुन ने उसको गले लगाए हुए हे कहा, "बिलकुल भी याद न था मुझे

ये सब कल रात से पहले. बस तुम्हारी आँखें मुझे सोने नहीं दे रही थी. और तुमने भी तोह मुझे कुछ न बताया था."

"कल रात से पहले मतलब? लेकिन जो सिर्फ तुम जानते थे वह तोह तुम्हे कोई और बता नहीं सकता. फिर?" प्रीती ने अर्जुन की आँखों में देखते हुए सवाल किआ.

"कभी कभी हमारे पास हे हर सवाल का जवाब होता है लेकिन हम दुनिया भर में उसको ढूँढ़ते फिरते है लेकिन खुद के दिल की तिजोरी नहीं खोलते. बस

मैंने कल रात सही जगह ढूंढा था और मुझे वह सिर्फ तुम मिली और वो यादें जिनमे तुम थी, हमारा बचपन था. आचार्य जी ने जो समझाया था वो मई

उस समय महसूस न कर पाया. दुनिया भर की आवाज में ध्यान लगता रहा लेकिन बस एक बार तुम्हे ध्यान किआ तोह मुझे मेरी पारी मिल गई." अर्जुन के लरजते

होंठ जा भिड़े प्रीती के शांत कोमल लबो से. और एक बार दोनों गले लग गए.

"ाचा अब हटो यहाँ से. तुम रो रहे थे तोह आज नहीं रोका अगली बार मेरे कही भी टच या किश किया तोह देख लेना." नकली गुस्सा दिखती वह भाग गई निचे

और अर्जुन उसके पीछे चल दिए.

"संजीव भैया से रात बातें करने के बाद जब अर्जुन कमरे में आया था तोह उसको उनकी कही बातें समझ तोह आ रही थी लेकिन "सतीश" नाम और "प्रीती"

का उसके बचपन से सम्बन्ध उसको उलझा रहा था. लाइट बंद करके बस वह शांत मन से प्रीती का हे ध्यान करता रहा था. और उसकी neeli/hari आँखों

में खोया वापिस वह पहुंच गया था जहा सारा दिन वो एक नन्ही पारी से जुड़ा रहता था. सतीश जी कभी वर्दी में तोह कभी घर के कपड़ो में उसको उठाये दीखते

उस ध्यान से जब वह बहार आया था तोह सुबह होने हे वाली थी जब उठकर वह माधुरी दीदी के पास गया था. आगे उसके बाकी विचारो को सुबह आचार्य जी

सत्य और असत्य के पाठ से दूर कर दिए था."

अलका और ऋतू ने तोह मार्किट में ग़दर मचाया हुआ था. संजीव भैया बस उनको देख रहे थे कुछ बोल नहीं रहे थे. चाहे वह एक गंभीर इंसान थे लेकिन

अपनी बहनो और परिवार की जिम्मेदारी बखूभी निभाते थे. कोमल दीदी और माधुरी दीदी एक पास के स्टोर में, जो महिलाओ के अंगवस्त्रो की और ब्यूटी प्रोडक्ट्स

की थी वह khareed-dari कर रही थी. यहाँ सब काउंटर पर लड़कीअ हे थी. कोमल दीदी तोह nai-polish और बिंदी वैगेरह ले रही थी लेकिन माधुरी दीदी

शायद अपने लिए कुछ खास तलाश कर रही थी. "जी मम, बताइये आपको क्या चाहिए?" एक लड़की उनके पास चल कर आई. "वो मुझे शादी में एक ड्रेस पहन नई

है लेकिन उसके कंधे का स्ट्राप ज्यादा बड़ा नहीं है तोह.." उन्होंने थोड़ी परेशानी से अपनी बात केहनी चाहि.. "मम मई समझ गई. आप इस काउंटर पर आये

मेरे साथ." वो अपनी स्वाभाव से मुस्कुराती माधुरी दीदी को एक कोने वाले काउंटर पे ले गई. "आपका साइज?" उसने पुछा तोह दीदी ने बताया 38-फ, जिसपर एक बार

फिर उस लड़की ने दीदी की तरफ देखा और बिना कुछ बोले 2-3 बॉक्स निकले. "आपका ड्रेस का कलर क्या रहेगा?" एक बार फिर से उसने पुछा.

"जी, डार्क ब्लू साड़ी और लाइट ब्लू ब्लाउज. थोड़ा स्लिम शोल्डर वाला." उन्होंने अब खुद को बेहतर महसूस किया क्योंकि वह कुछ खास भीड़ नहीं थी.

"ये देखिये मम. इसके साथ ये स्ट्राप है जो ट्रांसपेरेंट है और अलग से निकल भी सकते है और एडजस्ट भी कर सकते है. लेकिन साइज की वजह से इसमें

आपको ज्यादा चॉइस नहीं दे सकते." उस लड़की की बात और अपने साइज का सुनकर वो शर्म से गाड़ी जा रही थी. वह राखी उन दो आधे कप की रेशमी ब्रा को

गौर से देखने के बाद उन्होंने एक पर हाथ लगा कर पैक करने को बोलै. इतनी देर में कोमल दीदी भी उनके पास आ गई थी. "क्या लेने लगी दीदी? ाचा ये. तोह

फिर मेरे लिए भी ले लीजिये एक?" उन्होंने ब्रा देख कर हे कहा. "है तेरी ड्रेस का रंग गहरा लाल है न?" "जी दीदी." कोमल दीदी ने कहा

"देखिये के मैरून रंग के ब्लूज़ के साथ का भी दिखा दीजिये." माधुरी दीदी ने हे उस लड़की से कहा. "मम शामे साइज?" उसके पूछने पर कोमल दीदी बोली,

"नहीं 36-डी में." बिलकुल माधुरी दीदी के पीेछे जैसी हे एक ब्रा उनको भी पसंद आई तोह उन्होंने वो भी पैक करवा ली. बिंदी, चूड़ियां और Alka/Ritu का

बताया सामान भी लेकर दोनों वह से निकल आई. अलका और ऋतू बहार वाली मार्किट में फुटपाथ पर लगे एक मेहंदी के स्टाल से अपने दोनों हाथो में मेहंदी

के डिज़ाइन बनवा रही थी. उनका खरीदा सामान कार में रख दिए था भैया ने. "तुम दोनों ने भी लगवानी है?" संजीव भैया ने कहा तोह दोनों ने हे मन

कर दिए लेकिन कोमल के जोर देने पर माधुरी दीदी बैठ गई वही मेहंदी लगवाने.

"है तोह आज तुम मुझे क्या दिलवा रहे हो? वो चूड़ियों का एक सेट तोह खराब हो गया मेरा कल." मार्कीट में अर्जुन के साथ चलती प्रीती ने कहा तोह वो बस

मुस्कुरा दिए. "कंजूस हो पक्के." और दिखावटी मुँह बनती प्रीती बस साथ चलती रही. ऐसे हे वो gol-chakkar पर पहुंच गया और अर्जुन प्रीती को ले

"सिंगार घर में घुस गया, जहा वह कल आये थे पालक दीदी का लेहंगा लेने. "यहाँ अब क्या काम है.?" उसने अर्जुन से प्रश्न किआ. वह बस कल वाला हे

लड़का था. "है भैया क्या चाहिए? दुकान बढ़ा कर अभी वापिस जाना है हमारे घर में शादी है?" उसने अंदर से उनकी तरफ आते कहा लेकिन फिर अर्जुन को

देख बोलै, "अरे भाई कल वह कुछ बात नहीं जो आज हमारे पास आ गए.?" उसका मतलब वही लड़कियों के कपड़ो से था.

"वो बात नहीं है भाई. मुझे पता था के शायद आज भी दूकान बंद हो आपकी लेकिन सोचा पहले एक बार देख लू. कल यहाँ एक लड़कियों की बड़ी ाची जूती

देखि थी सोचा अगर दुकान खुली हुई तोह ले लेंगे. है वो रही." उसने बात पूरी करके सामे हे शीशे की अलमारी से दिखती एक जूती की जोड़ी की तरफ

इशारा किआ. जिसका टाला हल्का लाल और ऊपर से पूरी सुनहरी थी. जिसपर छोटे छोटे सुनहरी घुंगरू टंगे थे पूरी हे सतह पर.

"बड़ी हे ाची कारीगरी वाली चीज है भाई ये. जो लड़किया लहंगे के निचे चप्पल या सैंडिल नहीं डालती उनके लिए ये बिलकुल सही है. इनकी तोह लम्बाई

भी काफी है तोह इन्हे तोह लहंगे के साथ यही जंचेगी." उसने प्रीती की तरफ बस सर से हे इशारा किआ था.

"नंबर कितना है जी मैडम आपके पाँव का?" ये अर्जुन ने पुछा तोह प्रीती ने धीमे से इतना हे कहा "7".

"भैया 2 मिनट दीजिये मई अंदर से इनके साइज का जोड़ा निकल के लाया. कोई दूकान में आये तोह बोल दीजियेगा के बंद है." इतना कह वो भीतर दौड़ गया.

"ये तुमने कब सोचा लेने का?" प्रीती ने प्यार से देखते हुए कहा. उसकी एक बालों की लत्त दाहिनी आँखों के सामने आई हुई थी जो बार बार छु रही थी

"बस सोच लिए था कल हे लेकिन आज मैं पक्का कर लिए था के यही लेनी है." और प्यार से उस लत्त को कान के पीछे कर उसकी तरफ देखने लगा. "दादा जी

कहते थे न की मेरे साथ खेलने गोरी मेम आई है, और देखो ये neeli-hari आँखों वाली आज फिर यही है." अर्जुन का प्यार देख कर प्रीती ने नजरे चुराते

हुए कहा, "है कहा मई उस वक्त दूध जैसी होती थी और तुम काले." और धीमे धीमे हंसने लगी. "मई कला था." इतना बोलकर वो हाथ पकड़ने हे लगा था

के वह युवक जोड़ी निकल लाया. "ये लीजिये." उसने आते हे वो डब्बा सामने किआ. "भाई इनका दाम?" अर्जुन ने ऊपर जेब में रखे पैसे निकल लिए

"भाई वैसे तोह ये जोड़ी 800 की है लेकिन तुम 500 दे दो. इतना तोह चलता है मेरे भैया और पापा तोह है नहीं यहाँ." अर्जुन ने धन्यवाद् किआ और पैसे

देकर दोनों बहार आ गए.

ऐसे हे घूमते हुए प्रीती को कुछ याद आया तोह उसने अर्जुन से कहा, "तुम यही रुको मई आती हु?" अर्जुन ने हैरानी से देखा लेकिन प्रीती सामने वाले स्टोर

में जा घुसी. उस स्टोर के बोर्ड पर लिखा था "लेडीज कास्मेटिक एंड गारमेंट्स". बस देख कर मुस्कुराता वह वही खड़ा हो गया. तक़रीबन 15 मिनट बाद एक

बैग लेकर प्रीती सड़क पार करके उसके पास आ गई. "ज्यादा इन्तजार तोह नहीं करवाया?" के रहस्यमई मुस्कान से सिर्फ ना में अपनी गर्दन अर्जुन ने हिला दी.

अब ये दोनों लोग जहा पहुंचे वह कोमल दीदी कड़ी थी.

"आप जाओ मैंने तोह नहीं जाना मार्किट. उस टाइम तोह यही बोलै था तूने प्रीती की बची." अर्जुन भी प्रीती के साथ वही जड़ हो गया. पीछे से संजीव भैया

की भी आवाज आई. "ाचा तुम दोनों. रुको प्रीती मई तुम्हारे लिए भी जूस लेके आया." उन्होंने ज्यादा कुछ कहे 2 गिलास जूस के कोमल दीदी के हाथो में थमा

दिए और वापिस चल दिए. "आप दोनों यहाँ?" अर्जुन ने इतना कहा तोह उनके तरफ आती हुई अलका दीदी ने कहा, "हम भी यही है जी. कोई इधर भी देख लो." उनके

दोनों हाथो में ऊपर तक मेहंदी लगी थी. कोमल दीदी के पास जा कर वह जूस के गिलास में लगी पाइप से हे पीने लगी. जो कोमल के हाथ में हे था.

"ाचा तोह प्रीती स्पेशल ड्राइवर के साथ आई है." ऋतू दीदी भी कुछ वैसे हे हालत में थी लेकिन चहक रही थी. प्रीती का तोह बुरा हाल था. अर्जुन ये

देख बोल पड़ा, "दीदी वह दादाजी ने यहाँ मुझे सामान लाने भेजा था और प्रीती का ड्रेस भी यही दिया हुआ था सिलाई के लिए तोह मई इसको भी ले आया छोल

अंकल के कहने पर."

"भाई हमको तोह कभी नहीं लाया?" अलका दीदी ने ये बात कही तोह अर्जुन ने आँखों से जैसे उनको कहा हो के तुम तोह मत हे कहो दीदी और अलका दीदी ने नजर

निचे कर ली.

"अर्जुन ये चुन्नी ठीक कर." ऋतू दीदी ने कहा तोह प्रीती ने ऋतू दीदी की चुन्नी जो हाथ पे आ रही थी को ाचे से गले में कर दिए.

"प्रीती को कहो तोह अर्जुन बोलता है और अर्जुन को काम कहो तोह प्रीती. अलका इसको घर ले जा कर ठीक करना पड़ेगा. हाथ से निकल रहा है." थोड़ा शरारत

से इतनी बात हे कही थी की प्रीती तोह जमीन में गाड़ी जाने लगी.

"तुम सब ने अपने चाव पूरे कर लिए न. तोह इस बेचारी को भी करने दो. तू इनकी बातों की परवाह मत कर प्रीती और इस ड्राइवर को ाचे से इस्तेमाल कर."

माधुरी दीदी संजीव भैया के साथ हे चलती उस तरफ आ गई.

"आप सबने हीना कहा से लगवाई दीदी?" प्रीती ने बात को घूमते हुए पुछा तोह ऋतू दीदी ने फिर खिंचाई कर दी. "अर्जुन ने बताया नई के हॉस्टल में इसने

हीना भी लगाना सीख लिए है.?"

"बस करो और चलो अब. तुम ये लो गुड़िया." उन्होंने एक जूस का गिलास प्रीती को दिए और कार की तरफ चल दिए. फिर वापिस आये और अर्जुन से बोले, "छोटे

पैसे है या चाहिए?" ये उन्होंने बहुत धीरे से उसके कान में कहा था. "है बहुत है भैया. थैंक यू." दोनों मुस्कुरुआ दिए और वो पांचो वह से निकल

लिए. "अब मुझे भी हीना लगवानी है." "तोह मैडम चलिए ड्राइवर साथ है आपके." दोनों ऐसे हे हँसते हुए मेहंदी वाले स्टाल पर चले गए. वह से

फारिग होकर उन्होंने प्रीती की ड्रेस उठाई और सब सामान स्कूटर पर सेट कर दिए आगे. "अब मई कैसे बैठूंगी?" दोनों हाथो में मेहंदी लगी थी तोह

प्रीती दुविधा में पड़ गई. "रुको" अर्जुन ने स्कूटर डबल स्टैंड पर वापिस लगाया और धीमे से प्रीती को कमर से पकड़ ऊपर उठा लिए और सीट पर बिठा

दिए दोनों पेअर एक हे तरफ कर. स्कूटर का पायदान निचे कर उसके पाँव वह रखवाए और फिर स्कूटर स्टार्ट कर आराम से निचे उतार कर चल लिए. प्रीती

चिपक के बैठी थी बिलकुल निचे गिरने के डर से. ऐसे हे वो आराम से उसको लिए घर आ गया.

.

.

दिन में सभी ने खाना मल्होत्रा जी के हे घर खाया था सिवाए प्रीती और अर्जुन के. छोल साहब ने प्रीती को चलने को कहा भी था लेकिन उसने कहा के वो

घर पर हे खा लेगी और अर्जुन का दिल नहीं किआ इस समाया वह जाने का तोह वह बस अपने कमरे में आकर लेत गया.

राजन का गाल अभी भी हल्का सूजा हुआ था और निचला होंठ भी, जहा थोड़ा सा चोट का निशान था. उसकी छोटी बहिन और अर्जुन को चाहने वाली, उर्मिला ने

घर में यही बताया था के उसके भैया सीढ़ियों में दिवार से टकरा गए थे. ऋतू ने खाना खाते हुए राजन को ध्यान से देखा और अलका को भी दिखाया.

"क्या लगता है ये उसका मुँह सूजा कैसे होगा?"

"क्या बता शराब पी राखी थी तोह कही टकरा गया होगा." दोनों खिलखिला दी. उर्मिला को बड़ा गुस्सा आया था उनकी बात सुनकर और ये सुना राजन ने भी

था लेकिन वह शांत था.

"दीदी आप मेरे भाई की चोट का मजाक उदा रही हो?" तुनक कर उर्मिला ने ये बात कही तोह अब अलका ने जवाब दिए, "जिस तरह की उसकी हरकत है तोह ये

देख कर तरस तोह आने से रहा. खुद हे देखा था ने तेरे भैया को तूने की कैसे शराब पी कर आया था बदतमीजी करने प्रीती से."

"वो लड़की कुछ ज्यादा हे समझती है अपने आप को." बस इतना बोलकर वो भी वह से उठकर चल दी.

"इसको क्या हुआ?" ऋतू दीदी ने कहा तोह अलका दीदी ने कंधे उचका दिए. खाने के बाद पूजा, गीत और len-den का काम होने लगा तोह लड़किया घर आ गई

संजीव भैया बहार गए हुए थे कुछ काम से. 4 बजे के पास प्रीती भी रामेश्वर जी के घर आ गई जहा अलका और ऋतू उसको अपने कमरे में ले गई.

"तेरी मेहंदी तोह बहुत खूब रची है." अलका ने प्रीती के हाथ देख कर कहा जहा गहरा भूरा डिज़ाइन उसके गोर हाथो पर बेहद खूबसूरत लग रहा

था. "दीदी आप दोनों की भी तोह इतनी ाची लगी है." अलका दीदी की बात का जवाब प्रीती ने उनके और ऋतू दीदी के हाथो को देखते हुए कहा. "वैसे एक

बात है ऋतू, प्रीती का रंग पहले से थोड़ा गहरा होने के बाद भी तेरी टक्कर का है. पहले तोह इसके nain-naksh सही से दीखते भी नहीं थे."

"है तोह ये राजकुमारी कोनसा इस देश में पैदा हुई. लेकिन बात सही है तेरी. पहले बर्फ जैसी थी अब तोह जैसे केसर वाला दूध हो गई है." आँख

मारते हुए कहा ऋतू ने तोह अलका ने झिड़क दिए. "शर्म कर तू." प्रीती बस इनदोनो की हरकते देख रही थी उसको समझ कुछ नहीं आ रहा था.

"चल ाचा नहीं करती यार. वैसे कुछ भी कह देख तोह इसको हम दोनों से कही ज्यादा सुन्दर तोह ये है. मई तोह अपने आप की तारीफ हे करती रहती थी

या फिर तेरी. इसको देख कर तोह लड़का बन जाने का दिल करता है." उसकी बात से वो दोनों भी खिलखिला उठी.

"ाचा चल अब थोड़ा तैयार हो जाते हे फिर पता नहीं टाइम मिले या न." तीनो वही लड़कियों वाले काम में लग गई.

"दीदी, वैसे याद है बचपन में आप कितना रोटी थी और अलका दीदी और मई आपको चुप करवाते थे. लेकिन अब देखो आप हे हिटलर बन गई हो, ब्यूटीफुल

हिटलर." प्रीती की बात से एक बार ऋतू सोच में पद गई और अपने हाथ रोक दिए nail-polish लगते हुए. फिर एकदम से प्रीती को बीएड पर खींच लिए.

"तूने भी बहुत रुलाया है मुझे देख आज हिटलर तेरे साथ क्या करती है?" और प्रीती को गुदगुदी करने लगी जो हँसते हुए इधर उधर हाथ पाँव चला

रही थी. एक बार तोह ऋतू के हाथ जा टकराये प्रीती के उभारो से और दोनों शांत हो कर अलग हो गई. लेकिन शर्म और मुस्कान सी थी चेहरों पर.

"वैसे इसके तोह पत्थर जैसे है अलका." ऋतू के इतना बोलते हे अलका हंसने लगी और प्रीती, "Didi,please " सके कानो तक लाली च गई थी. "अरे मेरी

बन्नो तू तोह जरा भी फिरंगी न रही रे. हम यहाँ लड़किया हे तोह है और कल को तेरे होने वाले वह तोह इनपर पता नहीं क्या क्या जुल्म करेंगे." ऋतू दीदी

तोह थक हे नहीं रही थी और अलका बस हांसे जा रही थी. "किसी को हाथ न लगाने दूंगी." थोड़ा संयत होते हे प्रीती ने कहा तोह दोनों लड़किया खिलखिला

उठी. "पूछ के थोड़ी हाथ लगाएगा." ये हंसी मजाक चल रहा था के कोमल दीदी और माधुरी दीदी ने दरवाजा खटखटा दिए. अब सब शान्ति से अपना

तैयार होने लगे.
 
अपडेट 25

राक्षश


मल्होत्रा जी ने बेटी की शादी का इंतजाम सेक्टर के हे एक बड़े कम्युनिटी सेण्टर में किआ था. ये एक सुविधा संपन्न जगह थी जहा अंदर 2 बड़े हॉल और

बहार खुले में आधे एकर के लगभग सफाई से कटी घास के समतल मैदान पर बड़ा सा टेंट और पंडाल लगाया गया था. अंदर की बिल्डिंग में कुल 10

वातानुकूलित कमरे भी थे जिनमे से 8 कमरों को खोल दिए गया था Var-Vadhu के तैयार होने और जरुरी मेहमानो की खातिर दरी के लिए. संगीत, हलके

खाने पीने के स्टाल, juice-cola के काउंटर बहार के पंडाल में लगाए गए थे. जहा कोई 300 कुरिस्य और पंखो की व्यवस्थ भी की गई थी. अंदर

के हॉल में प्रीतिभोज और फेरो की व्यवस्था की हुई थी. Khule-aam शराब का प्रचलन काम था इसलिए एक हाल के पीछे की तरफ छोटा सा काउंटर वह

लगवाया हुआ था. घर के कुछ पुरुष वह की व्यवस्थ देख रहे थे. तक़रीबन 8 बजे तक उनका परिवार भी वह आ गया था क्योंकि शादी के कार्ड पर

समय यही था. पालक दीदी के साथ घर की कुछ औरते और लड़किया उनको वह दिए कमरे में थी. और 3 कमरों में भी उनके घर परिवार के जरुरी लोग आ

गए थे. उनसे अगले गलियारे में लड़को वालो के लिए 4 कमरे थे और वह भी पंडाल से aane-jaane का रास्ता था.

रामेश्वर जी के परिवार के लोग संजीव और छोल साहब के साथ 2 कार से निकले थे. लड़किया और रामेश्वर जी तोह छोल साहब की कार में चल दिए थे और संजीव

भैया के साथ उनकी माँ, दादीजी, चची और माधुरी दीदी थे. छोल साहब की टाटा सिएरा गाडी ाची खासी बड़ी थी लगभग 9 लोग उसमे जरुरत के समय

बैठ सकते थे तोह प्रीती, कोमल, अलका और ऋतू को कोई परेशानी नहीं हुई वह. इधर संजीव भैया जो मारुती एस्टीम चला रहे थे वो भी 5 लोगो के

लिए आरामदायक थी. भैया ने अर्जुन से साथ चलने को कहा था लेकिन उसने अकेले आने का कह कर उन्हें भेज दिए था. वैसे भी अर्जुन bheed-bhaad से थोड़ा

अलग रहता था और शादी में तोह जाहिर सी बात थी की भीड़ और halla-gulla होना हे था. उधर पांचों लड़किया आज सब पर बिजली गिराने वाली थी. कार से

शादी की जगह 10-12 मिनट की दुरी पर थी तोह वह लोग आराम से पहुंच गए. दोनों परिवार एक साथ हे अंदर गए और रामेशर जी छोल साहब के साथ गेट

पर रुक कर मल्होत्रा जी के साथ लोगो से मिलने लगे और कौशल्या देवी अपनी बहु बेटियों को लेकर कामिनी जी से मिलकर पंडाल में लगी कुर्सियों पर आ गई.

जहा उनके परिचित लोग थे तोह वो उनके साथ हलके फुल्के खाने बतियाने लगे.

पालक दीदी तोह आज दुल्हन के रूप में कामदेवी लग रही थी. उनकी कुछ सहेलिया और माधुरी दीदी, कोमल दीदी उसके साथ बातें -हंसी मजाक करने लगी.

Alka/Ritu दीदी प्रीती को अपने साथ लेकर शादी की जगह को देखते हुए यहाँ वह घूमने में लगी थी. ज्यादातर लड़को की निगाह इन हसीनाओ पर थी लेकिन

इस दौर की एक और बात थी की लोग जो भी sochte-karte थे सिर्फ मैं में या दोस्तों में. ऐसी जगह कोई हंगामा नहीं करता था. ज्यादा से ज्यादा भीड़भाड़ के

समय किसी पर हाथ फेर देना या कोई तना कस देना, इतना हे चलता था.

लड़के वाले जब समारोह जगह के गेट पर आये तोह रिबन काटने की रसम होने लगी. गेट पर लड़कियों का हुजूम सा जमा हो गया था. यहाँ सालिया अपने

होने वाले जीजा से अंदर आने से पहले पैसो की डिमांड करती है और लड़के की होने वाली saas/badi बहु तिलक करके आरती उतरती है फिर वह बरात के

साथ अंदर प्रवेश करते है.

बड़ा हे शोर हो रहा था उस जगह . बाहर सड़क पर दूल्हे के दोस्त आतिशबाजी छुड़ा रहे थे, Gaadi-orchestra पर ऊँचा संगीत गूँज रहा था जिसपर

var-paksh के लड़के लड़किया ठुमके लगा रहे थे. अर्जुन बहार अँधेरे में स्कूटर पर बैठा बस ये सब होते देख रहा था. ये जगह एक बड़ी पार्किंग थी

जहा byaah-shaadi के समय अतरिक्त गाड़िया, वहां खड़े करने की सुविधा थी. रिबन कटवाने के समय कुछ पुरुष भी थे थोड़ा सुरक्षा की हिसाब से.

Komal-Alka भी रिबन के सामने कड़ी थी मल्होत्रा जी की बेटी और सम्बन्धियों की 2-4 लड़कियों के साथ.

"ऐसे तोह अंदर आने से रहे जीजा जी. दीदी से मिलना है तोह 5100/- से एक रुपया काम न लगेगा." ऋतू ने ये बात कही और उर्मिला, अलका और 2 लड़कियों

ने सुर में सुर मिलाया.

"हम तोह 2 बार 5100 देने के लिए तैयार है भाभी के साथ तुम भी चलो हमारे घर." दूल्हे का छोटा भाई जो घोड़ी के साथ खड़ा था तोह उसने मजाक

किआ और उसके दोस्तों ने भी शोर मचाया. थोड़ी देर ऐसे हे masti-majaak चलता रहा. लड़किया पैसे काम करने को मान नहीं रही थी कामिनी जी के और

लड़के के पिता के कहने पर उन्होंने 3100 रुपये थमा कर अंदर प्रवेश करने का लाइसेंस लिए. फिर आरती और शगुन के गीत गए जाने लगे. लोग तोह जैसे

एक दूसरे पर गिर से रहे थे. ये लड़की वालो की साइड पर हो रहा था पहले तोह ऋतू को कुछ अजीब न लगा लेकिन जब किसी ने उसके उभर पर हाथ रखा

तोह वह थोड़ा भड़क सी गई. पीछे मुड़कर देखा तोह उसके पीछे से राजन अंदर जाता दिखा बाकी तोह सब लड़किया या औरते हे उसके पीछे थी. ऋतू ने

अभी इस बात को नजर अदनाज कर दिया. वह से सब लोग पंडाल की तरफ चल दिए और बाराती chai-nashta करने लगे. लड़को वालो की तरफ से एक बात

सभी में सामान थी, नौजवान बेशक जोशीले थे लेकिन कोई भी अभद्र व्यवहार नहीं करता दिखा. कुछ लड़के और आदमी अपने मतलब की जगह ढून्ढ

वही अँधेरे में चल दिया. वर पक्ष के लोग भी अपने आप को ठीक करने मल्होत्रा जी और कपिल के साथ उनके लिए आरक्षित किये कमरों में चले गए थे.

संजीव भैया ने कार भी चलनी थी तोह आज वह बस दोस्तों के साथ बातें करते हल्का फुल्का juice-cola हे लेते दिखे.

"भाई आज तुम भी व्रत पर हो क्या?" ये राजन ने संजीव भैया को शरारत से कहा था.

"ऐसी कोई बात नहीं है. माँ और दादी साथ है उनको लेके जाना है वापिस. वैसे भी कल हे तो पी thi."Unhone इतना हे बोलै था के मरकरी लाइट में

उनको राजन के चेहरे पर लगे निशान दिखे. "तेरे तोह शायद चोट लगी है. कैसे लगी ये?" उन्होंने थोड़ी परवाह से पुछा था. पीछे से आते हुए

कपिल ने कहा, "2 बियर पीने के बाद सीढ़ियों से गिर जाते है जनाब और सबको जाम टकराने को बोलते है." वह खड़े सभी 25-26 लोगो ने ठहाका

लगा दिया जिनमे कुछ लड़को वालो की तरफ से थे. राजन बस खून का घूँट पीकर रह गया था. उसका एक दोस्त, जो शायद आज हे शादी के लिए दिल्ली

से हे आया था उसने कान में कुछ कहा तोह राजन ने एक सांस पे गिलास खली कर दिए और उसको फिर कुछ बोल कर वो वही सभी लोगो के साथ लगे रहे.

"सफ़ेद कमीज जिसके बटन आसमानी थे, उसपर आसमानी रंग का कॉटन का पतला सूट और एक आसमानी रंग की हे पंत में अर्जुन किसी हीरो सा लग रहा था.

चमड़े के भूरे चमकदार लम्बी नोक के जूते और वैसे हे बेल्ट कमर पर. उसका व्यक्तित्व देख कर पंडाल की हर लड़की उसकी तरफ सम्मोहित सी दिखी.

चलता हुआ वह सबसे पहले छोल साहब और रामेश्वर जी के पास पहुंचा.

"आज तोह पूरा आसमान हे चलता हुआ आ रहा है भाई." छोल पूरी अर्जुन को प्रशंशा भरी निगाहो से देखते बोले. "इस आसमान को कहो की संभल कर

रहे. ऐसे लड़के नसीब से मिलते है." मल्होत्रा जी भी इधर आ चुके थे 3-4 और दोस्तों के साथ.

अर्जुन ने सबको नमस्कार किआ और छोल साहब और रामेश्वर जी के पीछा खड़ा हो गया.

"मल्होत्रा जी ये मेरा आसमान है तोह इसपर तोह सितारे मरना तय है. लेकिन चाँद एक हे होगा." छोल पूरी मजाक भी करते थे और उन्होंने वैसे हे उनको

जवाब दिए. रामेश्वर जी ने पोते के सर पर स्नेह से हाथ फेरा और बोले, "चल अब खुद भी अपने साथ वालो के साथ मेलजोल बढ़ा." उनकी बात सुनकर वो

वह से पंडाल में वापिस आ गया.

"यु आसमान में भी सितारे कई होंगे, दुआ किसी एक के टूटने से काबुल होती है."

जन्नत की हूर सी प्रीती हाथो में kangan-chudiyan-mehandi लिए खूबसूरत लहंगे की खूबसूरती और बढ़ा रही थी. अर्जुन ने उसकी तरफ देखा और

दोनों की नजरे कुछ पल एक दूसरे को देखती रही. अपनी माँ के वही होने का एहसास कर उसने उनकी तरफ हे कदम लिए.

"ये है मेरा पोता, देख लो जी." कौशल्या जी ने अपने साथ बैठी औरतो की मण्डली का इशारा पास खड़े अर्जुन की तरफ किआ. सभी ने दुआए दी और

उसकी तारीफ करि. कुछ देर बाद हे वह अलका दीदी और ऋतू दीदी आ गए और अपने भाई को मंत्रमुग्ध से देखने लगी. "वो क्या है न बचपन में भी

शायद इसकी गोपियाँ थी." प्रीती ने उन दोनों को कहा तोह दोनों झेंप सी गई. "है तोह सबकुछ वैसा हे तोह है." अलका ने इत्र कर कहा तोह प्रीती ने

बस उनकी आँखों में वही देखा शायद जो वो खुद की आँखों में देखती थी अर्जुन के लिए. लेकिन दिल में कोई जलन या द्वेष नहीं था. खुश थी वह के

कुछ बदला नहीं है बस थोड़े बड़े हे हुए है. "तू यहाँ लेडीज में क्या कर रहा है." ऋतू ने इतना कहा तोह अर्जुन बगले झाँकने लगा. "मई तोह किसी

और को जानता नहीं यहाँ." उसने इतना हे कहा था के संजीव भैया के साथ 2 सभ्य से दीखते युवक आये और थोड़ी दूर से हे भैया ने उसको अपने पास

बुलाया. "ये है मेरा छोटा भाई अर्जुन और इनसे मिलो ये दूल्हे के भाई अमित और उनके दोस्त सुरेश है." दोनों युवक भी नजरो से हे तारीफ कर रहे थे

अर्जुन की. "ये अभी छोटा है क्या संजीव भाई?" अमित की बात से तीनो हंसने लगे और अर्जुन शर्मा सा गया. उसको लेकर तीनो इधर उधर घुमते हुए

खाने पीने लगे. दुल्हन पालक दीदी को भी अब वह लाया गया, माधुरी दीदी और कोमल दीदी भी उनके साथ थी कुछ और लड़कियों के साथ. उनको स्टेज पर

दूल्हे के साथ बिठाया गया. फिर वही से दोनों दीदी भी परिवार में शामिल हो गई. कौशल्या जी ने सबको खाने के लिए कहा तोह Alka/Ritu दीदी और प्रीती

को छोड़कर सभी खाना खाने लगे. छोल साहब भी वर पक्ष के बड़ो के साथ पेग ले रहे थे एक कमरे में और रामेश्वर जी सिर्फ बातें सुन या कर रहे

थे. थोड़ी देर में दोनों दोस्तों के लिए वही खाना लगाया गया तोह खाना खा कर थोड़ी और बातें कर रामेश्वर जी ने संजीव भैया को हिदायत दी की

वो और छोल सहा घर की महिलाओं के साथ जा रहे है वो भी समय से सबको ले आये.

"दादा जी अभी तोह 11 बजे है. हम 1 घंटे बाद आ जायेंगे प्लीज. मेरे इम्तिहान की पूरी तैयारी हो चुकी है." ऋतू ने प्यार से दादाजी को कहा तोह

छोल साहब ने हे कह दिए, "ठीक है बीटा और प्रीती भी वही सो जाएगी आज. तुम लोग अपना ख्याल रखना."

"और हमरे बरखुरदार कैसे आएंगे?" अर्जुन के लिए रामेश्वर जी ने पुछा तोह संजीव भैया ने हे कहा के वो स्कूटर लेकर आया है. संतुष्ट हो कर

छोल साहब के साथ रामेश्वर जी, कौशल्या जी, ललिता और रेखा जी निकल लिए.

"ऋतू तुम या कोई एक जान अर्जुन के साथ चलना. एक तोह कार में जगह उतनी नहीं है ऊपर से वो अकेला जायेगा."

"ठीक है भैया." इतना बोलकर वो हिरानी सी मचलती पंडाल की तरफ उड़द चली.

"अब करो मस्ती." ये बात उसने प्रीती और अपनी तीनो बहनो को कही. पांचो लड़कियों के साथ उर्मिला और एक लड़की भी थी. प्रीती बस अलका और ऋतू के हे

साथ घूम रही थी. जब दूल्हा दुल्हन नाचने के लिए आये तोह मल्होत्रा जी के कहने पर घर की लड़किया भी वह नाचने लगी. सब बस मजे के लिए हे

नाच रहे थे कोई अपना हुनर नहीं दिखा रहा था. भारी कपडे, गहने और शरीर की गर्मी से पसीना भी आने लगा था. अर्जुन कुछ देर ये आनंद लेता

रहा फिर अमित के बुलाने पर उसके साथ बहार कार की तरफ चला गया. वह से उन्हें कुछ सामान लाना था जो शायद फेरो के समय काम आना था. पंडित

अंदर हॉल में तैयारी में लगे थे. इस समय तक ज्यादातर लोग जा चुके थे सिर्फ घर के और रिश्तेदार हे थे अब वह.

"दीदी आप एक बार मेरे साथ वाशरूम चलोगी? मई अकेली कैसे जाऊ वह थोड़ा अँधेरा है" उर्मिला ने ये बात नाचते हुए ऋतू दीदी से कही थी. प्रीती

और अलका दीदी कुछ दूर पर थे क्योंकि बिलकुल बीच में तोह दूल्हा दुल्हन धीमे धीमे नाच रहे थे. बिना कुछ सोचे हे ऋतू दीदी ने भी कह दिए, "है

चल यार मुझे भी फ्रेश होना है और मुँह भी साफ़ कर लुंगी." पूरा चेहरा पसीने से सना था. इन दोनों पर किसी और की भी निगाह थी जो इनके वह

से निकलते हे हैट गया था.

महिलाओ के लिए एक बाथरूम तोह कमरों के आगे हे बना था लेकिन वह भीड़ का बहाना कर उर्मिला ऋतू दीदी को सामने से घुमा कर पिछले हिस्से की तरफ

ले गई जो शराब पीने वालो की जगह से बिलकुल हे विपरीत दिशा में थी. "यहाँ कहा जा रहे है yar.Kitna अँधेरा है?" ऋतू दीदी ने चलते हुए हे कहा.

"दीदी, उस तरफ तोह शराबी हे थे सब तोह ाचा नहीं लगता न." बात घूमती सी वो उन्हें ले कर बाथरूम तक आ गई. ये गलियारा बिलकुल अलग थलग था

शयद बिल्डिंग के ऊपर बने कमरों को यही रास्ता जाता था. "पहले मैं चली जाऊ दीदी?" उर्मिला ने कहा तोह ऋतू ने सर हिला दिए, "जल्दी आना" और वो इन्तजार

करने लगी. बाथरूम भी सिंगल हे था. कुछ हे देर में उर्मिला बहार आ गई अपना मुँह रुमाल से साफ़ करती हुई. "मई भी बस 5 मिनट तक आती हु. यही

रहना." और अंदर जा कर ऋतू दीदी ने चिटकनी लगा दी. "चल तू निकल यहाँ से." राजन ने धीमे शब्दों में उर्मिला को कहा और बाजू से पकड़ बहार की और

धकेल दिए. उर्मिला भी दरी सेहमी से निकल गई. राजन और उसके साथ उसका वही दोस्त था जो पहले शराब पीते समय कानो में बात कह रहा था. हत्ता कट्टा

था ये लड़का भी. बहार गलियारे की लाइट राजन ने बुझा दी और ऊपर जाने वाले सीढ़ियों के अंत में बने दरवाजे को उस लड़के ने धकेल कर खोल दिए. गण

गुनगुनाती ऋतू दीदी बहार आई तोह अँधेरा देख और उर्मिला को वह न पा कर उनका मैं शंका से भर गया और अगले हे पल सीढ़ियों पर खड़े लड़के ने पीछे

से उनका मुँह दबा कर छाती को दूसरे हाथ से जकड लिए. ऋतू के कुछ सोचने से पहले हे राजन ने उसके दोनों पेअर हवा में उठा लिए. दोनों लड़के फुर्ती से

ऊपर चढ़ गए.

.

.

उर्मिला भारी साँसों से जैसे हे अँधेरे से निकल कर बिल्डिंग की सामने की तरफ आई तोह अर्जुन उसके सामने खड़ा था. उर्मिला की जान हे निकल गई उसको

देख कर. "मैं नहीं जानती ऋतू कहा है?" अर्जुन की बिना कुछ पूछे हे उसके मुँह से ये बात निकल गई. शायद उसको भी पता लग चूका था की उसका

भाई बहुत गलत काम कर रहा है और यही उसको ज्यादा डरा रहा था. "दीदी कहा है?" अगले पल में अर्जुन की आवाज सार्ड हो गई थी और उसकी हथेली

उर्मिला की गर्दन पर कास गई थी... "वो राजन भाई ने कहा था. वो और उनका दोस्त उन्हें ऊपर लेके गए hai."Kaampti आवाज में उसने हाथ के इशारे से

अँधेरे की तरफ इशारा किआ तोह अर्जुन बिजली की रफ्ता से उधर दौड़ गया. बाथरूम की लाइट जल रही थी लेकिन गलियारे में अँधेरा था. ऊपर सीढ़ियों

का दरवाजा खुला देख वो अगले हे पल चाट पर जा पंहुचा. 5-6 कमरे जो पंडाल से उलटी डिश में थे उनमे से आखिरी वाले में रौशनी थी. अगले हे पल

उसकी लाठ पूरे जोर से दरवाजे पर पड़ी. ऋतू दीदी को पीछे से राजन के दोस्त ने पकड़ रखा था और मुँह पर एक रुमाल बांध रखा था. उसके जोर

लगाने पर भी पीछे वाला उसको हिलने तक नहीं दे रहा था. राजन उनकी सलवार खोल चूका था और कमीज ऊपर उठाने लगा था.

"कमीने." दरवाजे खोलने के बाद का दृस्य देखते हे अर्जुन की आँखों में खून उतर आया था और अगले हे पल उसकी लात सीधा राजन के जबड़ो पर लगी

और उसका सर फर्श पर.. "धड़ाम" दूसरे की तरफ देखे बिना हे वो राजन को कपडे की तरह धोने लगा. अपने दोस्त की चीखें सुनकर उस लड़के ने ऋतू

दीदी को सामने बिस्टेर पर फेंका जिसपर वो धम्म से गिरी और माथा दिवार से लगा. "साले बहनचोद मेरे दोस्त पे हाथ उठता है." इतना बोलकर एक पानी

से भरी कांच की बोतल अर्जुन के सर पर दे मारी. अर्जुन बिना कुछ हे कहे मुदा और उस लड़के की गर्दन पकड़ कर दरवाजे के साथ वाली दिवार पर उसका

सर दे मारा. जमीन पर राजन किसी कटे पेड़ की तरह पड़ा तड़फ रहा था. मुँह और नाक से खून निकल रहा था उसकी, जो फर्श पर भी गिर रहा था.

दूसरा लड़का जिसने बोतल फोड़ी थी अर्जुन के सर पर अब उसकी भी आँखें उबाल रही थी बाहर की तरफ. "छोड़ दे इन्हे अर्जुन. ये क्या कर रहा है तू?"

संजीव भैया के साथ कपिल और मल्होत्रा जी भी ऊपर आ गए थे. मल्होत्रा जी ने तोह बेडशीट हे ऋतू दीदी की टांगो पर पलट दी थी. वो समझ गए

थे की यहाँ क्या होने जा रहा था. "इसने मेरी बहिन के जिस्म पर हाथ दाल दिया और आप कहते हो छोड़ दू?" उसकी बात सुनकर संजीव भैया पीछे हैट

गए. कपिल तोह जमीन पर पड़े राजन को उठा उसके थप्पड़ मारने लगा था. "साले निकल जा यहाँ से अभी की अभी. मार देंगे तुझे अगर हाथ भी लग

गया तोह." कपिल ने इतना बोलै था के मल्होत्रा जी तोह जूता निकल पिल पड़े उसपर, "हरामी साले तुझे तोह मई पुलिस में देता हु. कुत्ते." इधर कपिल

ने देखा की दूसरे लड़के की हालत खड़े होने लायक नहीं बची है तोह उन्होंने अर्जुन को पीछे से पकड़ लिए और संजीव भैया ने सामने से अपने बाहे भर

ली अपने भाई की कमर पर. "तू फिर दूर चला जायेगा छोटे. रुक जा" उनकी इस बात ने अर्जुन को बर्फ कर दिए. उसके सर से बेहटा खून उसके चेहरे को भिगो

चूका था. किसी राक्षश सा दिख रहा था अर्जुन. "सब बहार जाओ." उसने सख्ती से कहा तोह कपिल उस लड़के को घसीट कर और संजीव को लेकर बहार आ

गया. "दीदी, ये पहनो जरा." उनकी सलवार बिना ऋतू दीदी की तरफ देखे उनकी और कर दी. ऋतू के ज्यादा चोट नहीं लगी थी लेकिन उसकी आत्मा पर वॉर हुआ

था. अपने भाई का खून से सना चेहरा और अपने लिए प्यार देख चुपचाप अपनी सलवार पहनी और उठकर बहार आ गई. जहा उर्मिला एक तरफ रो रही थी

और मल्होत्रा जी तोह संजीव भइया के पाँव में हे गिरे थे. "बीटा रामेश्वर जी को पता लगा तोह मेरा दोस्त तोह जायेगा हे मेरा परिवार भी उजाड़ जायेगा."

"आपकी कोई गलती नहीं है. आप निश्चिंत रहे अंकल लेकिन उन दोनों में से कोई भी नजर आया यहाँ तोह.." अर्जुन ने जवाब दिए संजीव भैया की जगह.

"अंकल आप निचे जाइये. कपिल तू भी जा भाई. दीदी की शादी है तोह सब होंगे. हम आते है" संजीव भैया की बात पर मल्होत्रा अंकल उनसे गले लग

बोलते गए, "बीटा जो भी हुआ उसमे मेरा कोई दोष नहीं था. समझना इस बात को. मई तुम्हे भी कपिल के बराबर हे मानता हु लेकिन आज मेरी इज़्ज़त पे

जो दाग लगा है कोशिश करना वह मेरे दोस्त तक न जाए." एक बार फिर हाथ जोड़कर उन्होंने भैया, ऋतू दीदी और अर्जुन की तरफ देखा. "अंकल आप

भी मेरे दादाजी के सामान है. लेकिन किस घर में राक्षश रहता हो ये कोई बता नहीं सकता. आप इसके लिए खुद को दोष मत दीजिये. मेरा घाव, ये मंजर

सब भर जायेंगे. अपने दिल से बोझ ख़तम कर आप ये शादी की तरफ ध्यान दीजिये बस." फिर वो अपने बेटे को लेके निचे चल दिए, नम्म आँखों से.

"ऋतू मुझे माफ़ कर दे. मुझे डरा कर हे राजन ने ये काम करवाया. उसने कल रात भी मुझे मारा था और आज भी उसने बोलै था के अगर मई तुम्हे

बाथरूम तक नहीं लाइ तोह फिर वो दोनों मेरे साथ ये सब करेंगे. मेरे से गलती हो गई." उर्मिला जो इतनी देर से रो रही थी फफक कर ऋतू दीदी के पाँव

में पद गई. "तुम यहाँ से जा सकती है. जब तुम्हारा दिल तुम्हे माफ़ कर दे तोह समझ लेना मैंने भी माफ़ कर दिए." ऋतू ने बात बिलकुल आराम से कही

थी लेकिन सख्त. संजीव भैया ने दोनों के हाथ पकडे और निचे आ गए. "चल ये इसका कोट पकड़ ऋतू." बाथरूम के बहार उन्होंने अर्जुन का कोट ऋतू

को थमाया और पानी के निचे अर्जुन का सर कर दिया. घाव कुछ ज्यादा गहरा नहीं था. बस कांच की वजह से और सर की चोट थी तोह खून ज्यादा आया

लेकिन सर के बीच में सिर्फ एक कम का कट था. "बिलकुल थी है तू मेरे शेर. उन्होंने अपने रुमाल से उसके जख को दबाया एक बार और फिर चेहरा साफ़ करने

लगे. चलो ऋतू तुम भी चेहरा ठीक कर लो." दोनों कुछ देर बहार खड़े रहे फिर ऋतू बहार आकर उनके साथ हे गेट की तरफ चल दी जहा अब तक सभी

खड़े थे. "मई भाई के साथ आती हु." ऋतू ने ये बात संजीव भैया को कही तोह उन्होंने हामी भर दी. एक बार अंकल आंटी को दूर से नमस्ते कर भैया

और दीदी लोग प्रीती को साथ लेकर निकल गया. इधर ऋतू दीदी अर्जुन का हाथ पकड़ कर उसके साथ स्कूटर तक आ गई. दोनों चुप थे लेकिन मैं में तूफ़ान

मचा था. स्कूटर पर दीदी को बिठा कर वो चल दिए वह से. ये रास्ता थोड़ा घूम कर घर की तरफ जाता था. कोई 2 मिनट का हे फर्क था इस साइड से.

"भाई रुक एक बार." ऋतू के इतना बोलते हे सुनसान सड़क पर ब्रेक दबाने से तैयार की रगड़ की आवाज फ़ैल गई. अर्जुन अगले हे पल स्कूटर स्टैंड पर लगा

अपनी बहिन को बाहो में लिए बीच सड़क पर खड़ा था. ऋतू फफक सी पड़ी थी और खुद को और जोर से अर्जुन से चिपका लिए था. "दीदी जब तक मई हु तोह

आपके ऊपर आंच भी नहीं आने दूंगा. वो साला अगर आज जिन्दा बचा तोह सिर्फ इसलिए के समय, मौका और जगह सब गलत थे." "मई जानती हु भाई के तू

मेरे से कितना प्यार करता है. और आज के बाद मेरी हर सांस पर सिर्फ तेरा हे नाम होगा." कुछ देर ऐसे खड़े रहने के बाद दोनों वापिस चल दिए. दादा

जी के सामने इस बात का जीकर मत करना मुन्ना. देख मई बिलकुल ठीक हु और बात होने पर वो सिर्फ बढ़ेगी हे." अर्जुन को समझते हुए कहा. "दीदी मई इतना

na-samajh नहीं हु. मल्होत्रा अंकल ाचे इंसान है. आंटी भी सब्खा ख़याल रखने वाली ाची औरत है. बस 1-2 गलत लोगो की वजह से सबके रिश्ते

ख़राब नहीं होने दूंगा." अर्जुन अब संभल चूका था लेकिन आज उसने कुछ सीखा भी था. ऐसे हे वो घर तक पहुंचे तोह बहार हे सब खड़े थे. "आ गए

तुम दोनों? यहाँ कब से इन्तजार हो रहा है तुम्हारा." अलका दीदी ने ऋतू का हाथ पकड़ा और अंदर चल दिए सब. प्रीती भी अलका और ऋतू दीदी के साथ उनके

कमरे में चली गई. "तू चल मेरे साथ छोटे." वो गली में ले चले अर्जुन को अपने संग जो अब अन्धकार में डूबी थी. दूर दूर बस स्ट्रीट लाइट थी. "आज जो

भी हुआ वो गलत हुआ भाई. तेरी जगह मई भी यही करता लेकिन इस बात को यही ख़तम कर देना. शंकर चाचा को इस बात की भनक लगी तोह तू खुद भी

नहीं जानता की मल्होत्रा जी के परिवार का क्या होगा. ऋतू उनकी जान है और उसका सिर्फ गाला खराब होने पर सबके सामने रेखा चची पर हाथ उठाने वाले

इंसान के बारे में तू कुछ सोच भी नहीं सकता. लेकिन तू आज बिलकुल वैसा हे लग रहा था जैसा एक बार उनको मैंने देखा था बचपन में कोई 20 साल पहले,

राक्षश.
 
एक अपडेट रेडी है लेकिन ऐसे मजा अधूरा रह जायेगा. दूसरा भाग लिख रहा हु 12 बजे तक दोनों अपडेट पोस्ट कर दूंगा
 
अपडेट 26

जलती जवानी


"ऋतू दीदी, ये आपके चेहरे पर चोट का सा निशा कैसा है?" कमरे में बिस्टेर पर लेटने से पहले प्रीती के सवाल ने अलका की नजर भी ऋतू की तरफ

कर दी थी. "है बता न ऋतू, ये तोह सच में सूज गया है. तुझे मेरी कसम है?" ऋतू कुछ देर चुप रही फिर उसने साड़ी बात शुरू से अंत तक बता

दी जिसको सुनकर दोनों हे सकते में आ गई थी. इतना कुछ हुआ और किसी को भनक भी नहीं थी. "मेरी कसम है तुम दोनों ये बात किसी को नहीं kahogi."Ritu

ने दोनों को ऐसे देख कहा.

"कल भी कुछ ऐसा होने हे लगा था की अर्जुन सही टाइम पर ऊपर आ गया था वह." प्रीती की बात ने दोनों को चौंका दिए था. और प्रीती ने अपनी कलाई

उनकी तरफ कर दी जहा चूड़ियों के निचे 2 बैंडऐड लगी थी. "शायद कल की बात के हे लिए उस लड़के ने ये सब आज किआ. क्योंकि जब वो मेरे पास आ रहा

था तोह आपने हे उसको भगा दिए था."

"कल अर्जुन ने उसको मारा था?" अलका को दिन की खाने पर हुई बात याद आ गई.

"नहीं दीदी इतना नहीं मारा था जैसे आज ऋतू दीदी ने बताया है. मैं उसको खींच कर ले आई थी अपनी कसम दे कर." थोड़ी देर तक तीनो खामोश थी

ये ख़ामोशी भी प्रीती ने हे भांग की. "मई जानती हु आप दोनों भी उसको उतना हे प्यार करती हो जितना मई. और वो भी, मैंने ये देखा है. और मुझे ये

ाचा भी लगा देख कर."

"क्या matlab?"Ritu ने ये बात कही तोह अलका दीदी का भी चेहरा प्रीती को हे देखने लगा.

"जैसे वो एक दिल है वैसे हे उसकी धड़कन हम तीनो है. और मई चाहती हु के ये सब कभी न बदले." प्रीती की बात सुनकर अलका और ऋतू ने उसको दोनों

तरफ से गले लगा लिए. "वैसे आप दोनों के भी सख्त हे है." इतना बोलकर प्रीती ने जल्दी से अपने ऊपर चद्दर ओढ़ ली और लेट गई.

"रुक तेरे तोह मई नरम करती हु अभी प्रीती की बची." ऋतू दीदी ने उसको लेते हुए हे बाहों में ले लिए और अलका दीदी भी आराम से पीछे बिस्टेर पर पसर

गई. प्रीती की बातों ने माहौल को हल्का कर दिए था. "ऋतू अब सो भी जा. कल पेपर है तेरा." अलका ने अपनी ब्याह प्रीती के ऊपर रख कर सोने से पहले कहा

कुछ हे देर में कमरे में शान्ति च गई.

"चल आजा आज मेरे साथ सो जा. मई भी थोड़ा अकेला फील कर रहा हु." अर्जुन को अपने कमरे में लेकर आइये संजीव भैया ने कहा.

कपडे बदल कर दोनों भाई हे बीएड पर लेत गए. "देख अब ज्यादा मत सोच और इस बात को भूल जा. वो दिल्ली का था और अब कभी फिर दिखाई देने वाला नहीं.

ऋतू भी ठीक है बिलकुल."

"हाँ भैया. मैंने बुरी बातें याद रखना छोड़ दिए है अब. जो भी हुआ वो किसी काम का नहीं. लेकिन आज एक असलियत तोह पता लग गई की सब लोग शराफत

के पीछे एक जैसे नहीं होते."

"सही कह रहा है छोटे. दुनिया हमारी सोच से कही अलग है. बस इतना याद रख जो तेरी परवाह करते है तू उनकी कर और बाकी सब सिर्फ अपने प्यार वालो

से दूर रख. इसमें हे बेहतरी है." संजीव भैया ने इतना बोलकर करवट बदल ली. अर्जुन भी आँखें बंद कर सोचता सा लेत गया.

उधर ललिता जी का दिल आज भारी सा था तोह उन्होंने रेखा को अपने कमरे में सुला लिए. दोनों अपने रात के परिधान में हे लेती बातें कर रही थी.

"देख तोह रेखा तू अभी तक जवान पड़ी है. माधुरी की उम्र के लड़के भी तुझको देख रहे थे वह." मैं को हल्का करने की जिरह से उन्होंने अपनी देवरानी

को चड्डा.

"क्या दीदी. आप भी मजाक करने लगी हो. 20-21 साल की 2 बेटियां है मेरी अब तोह." रेखा जी ने थोड़ी शर्म से कहा. कमरे में जीरो का बल्ब जल रहा था.

"वैसे इतनी खूबसूरत है तू, शरीर भी ऐसा दिए है की किसी का भी मैं दोल जाये. फिर तू अकेले कैसे रातें काट लेती है ऋ?" ललिता जी अपनी देवरानी

से लगभग सभी बातें कर हे लेती थी. रेखा जी भी उनमे अपनी बड़ी बहिन देखती थी तोह एक वह हे थी घर में जिन से खुलकर अकेले में वो दिल का हाल

बया कर लेती थी.

"क्या दीदी. आपको तोह पता हे है जब ये आते है तोह कुछ काम कहा करने देते है."

"वो सब तोह ठीक है लेकिन रेखा महीने में 3 दिन या कभी 4 दिन से पूरा महीना तोह ठंडा नहीं हो जाता.?" ललिता जी कही इस बात ने रेखा जी को अपने

पति की याद दिला दी. वैसे तोह शंकर जी ाचे से ख़याल रखते थे और प्यार भी करते थे अपनी पत्नी को लेकिन उनके और भी कई सच थे जीने कुछ

उन्होंने देखा था और कुछ उन्हें पता लगे थे. लेकिन नारी का तोह काम हे सिर्फ अपना फर्ज पूरा करना है.

"ऐसा कुछ नहीं है दीदी. वो मेरी प्यास बुझा देते है जो महीने भर नहीं भड़कती." कुछ सोच कर कही गई इस बात पर ललिता जी ने बस हलके से रेखा

जी के उभर पर हाथ रखा और कुछ पल बाद हटा लिए.

"अगर ाचे से ख्याल रखता न शंकर तेरा तोह ये पहाड़ अब तक ढीले हो जाते. ये तोह ऐसे खड़े है जैसे आज भी दूध निकल आये इनमे से." रेखा जी

ने उनकी बात सुनकर करवट सीढ़ी कर ली. उनके चेहरे पर तोह शर्म चाय थी लेकिन दिल में तीस सी हो रही थी. एक बात तोह उनकी जेठानी की बिलकुल ठीक

थी की ाचे से ख्याल.

"मुझे पता है सबकुछ. मई इस घर में तेरे से 5 साल पहले आई थी. शंकर कैसा है ये पता है मुझे और वो क्यों महीने में एक बार आता है ये भी.

तेरे आने से पहले भी मैंने कई होली दिवाली देखि है इस घर की. तब ये घर नहीं था सिर्फ 2 कमरे और गाये बंधी होती थी यहाँ. सब तोह पहले वही

रहते थे न पुराने घर जहा तू ब्याह कर आई थी." ललिता जी बातें अब रेखा जी के दिल में उतर रही थी. उन्हें तोह लगता था के जो कुछ उसने देखा था

वो कोई नहीं जानता होगा लेकिन जेठानी की बातें सुनकर वो सुन्न थी.

"शंकर दिल का बुरा नहीं मेरी बहिन. बस ये समझ ले की वो सबसे थोड़ा अलग है. बाप जब घर से दूर हो, घर की देखभाल सिर्फ एक माँ करती हो और

रुपये पैसे की कमी न हो तोह कोई एक बचा थोड़ा खुलकर जीने लगता है. शंकर भी वैसा था. जब घर में ब्याह कर आई थी तोह तेरे जेठ जी हर

रात अपने दोनों भाइयो की बातें करते थे. नरिंदर तोह शंकर की परछाई था, उसकी कोई दुनिया या मकसद नहीं था. जैसा शंकर ने कहा या किआ वो

बस अपने भाई का साथ देता था. तेरे जेठ की नौकरी लग गई थी तोह उन्हें तोह कभी फुर्सत न मिली ये सब देखने की. शंकर को कॉलेज में जिस लड़की से

प्यार था वो तोह ब्याह कर के चली गई थी किसी और के घर. डाक्टरी की पढ़ाई में उसने सिर्फ ladaai-jhagda, शराब और लड़कीअ हे समझी. दिमाग का धनि

था तोह Saas-Sasur तोह कुछ बोल नहीं पाते थे. और आज भी देख सांड जैसा है लेकिन तब बिगड़ैल सांड था पूरा. नरिंदर तोह पंजाब चला गया था

नौकरी के लिए तोह शंकर भी ट्रेनिंग ख़तम कर के सिविल हस्पताल में काम पे लग गया. सब आदत बदल गई थी बड़ा आदमी ban-ne के चक्कर में, उसको

सबसे ाचा डॉक्टर ban-ne का जूनून था लेकिन एक आदत न जा सकीय बल्कि वो तोह हॉस्पिटल में नौकरति के बाद बढ़ती चली गई. सुन्दर था, hatta-katta था

और ऊपर से डॉक्टर. पता नहीं कितनी लड़कियों, नर्सो के ऊपर से गुजरा होगा. यही आता था लेके कैयो को तोह, मैंने खुद कई बार देखा. फिर ससुर जी ने

तुझे कही देखा तोह उसके लिए पसंद कर लिए. उन्हें लगा के ाची पढ़ी लिखी पत्नी होगी तोह शंकर अब सिर्फ काम पे ध्यान देगा. लेकिन अब तू खुद हे बता

के कितना ध्यान दिए? तूने बहोत म्हणत की उसको खुद से बाँधने की. सबकुछ किआ जो उसने कहा, चर्बी तक ना आने दी शरीर पर बचे पैदा करने के बाद

लेकिन वो तोह फिर वही मूउए गुलाटी और सांगवान के साथ शबाब और शराब के मजे मारता फिरता है. तेरे जेठ को भी ये आदत लगा दी. होली पे खुद देखि

मैंने इनके लुंड पर लिपिस्टिक जब टुन्न हो के सोये पड़े थे." एक हे सांस में उन्होंने साड़ी raam-katha सुना दी, हल्का गुस्सा भी था उनके लहजे में.

"आपको सब पता था तोह भी कुछ न कर पाई दीदी आप?" रेखा जो सब सुनते हुए भावुक हो चुकी थी नम्म आँखों से ललिता जो को बोली.

"अरे इनके तोह maa-baap न कुछ कर पाए mai-aur तू क्या कर लेती? अब तेर जेठ को हे देख कैसे चहकते रहते है भाई के आने पर. मेरे साथ तोह ठीक

से खड़ा नहीं होता वह से अपना सुजा के लाते है. नए शरीर का चस्का है न या तोह अब मजा आता नहीं क्योंकि बचो की फैक्ट्री थी जो पहले खूब

चला ली अब मैं भर गया."

अपनी जेठानी की ऐसे बात सुनकर ना चाहते हुए भी रेखा जी की दुखी चेहरे पर हंसी आ गई.

"तू भी हंसले क्यों की तुझे तोह आदत है. लेकिन मैंने भी न कुटवाई किसी तगड़े मुसल से तोह मेरा नाम भी ललिता नहीं." कितना विद्रोह सा मचा हुआ था

ललिता जी के दिल में. एक तरफ रेखा थी जो सब जानते हुए भी बस चुप चाप गुजरा कर रही थी और दूसरी तरफ ललिता, जो अपने पति की बेवफाई का बदला

हे लेने पर थी. एक तरह तोह उन्होंने इसकी शुरुवात कर हे दी थी अपने भतीजे से छुड़वाकर. लेकिन एक माँ को तोह वो ये बताने से रही.

"ये आप क्या बोल रही है दीदी? आप ऐसा सोच भी कैसे सकती है.?" रेखा के चेहरे पर गंभीरता और परेशानी तैर गई थी सुनकर.

"वो इतने साल कर सकते है सबकुछ और मई बस देखती हे राहु. मेरे भी आग लगती है अंदर, मुझे भी कोई चाहिए जो प्यार करे और मेरी इज्जत करे. लेकिन

5 साल से ज्यादा हो गया है ये सब सहते. मई तेरी तरह अँधेरे में खुद पर ठंडा पानी दाल कर नहीं सोने वाली. जो होगा देखा जायेगा और कोनसा मई इस

बात की सुनवाई शहर में करुँगी." उन्होंने तोह जैसा अपना आदेश हे सुना दिए था. रेखा बस एकटुक उनकी बातों को सोचती उनको देखती पड़ी रही. जेठानी को

ये भी पता था के वो सुबह अँधेरे में अपनी आग कैसे ठंडी करती है.

"और आपकी इजात पर बात आई तोह?" रेखा की बात सुनकर ललिता जी मुस्कुराई. "मैं कोई रंडी तोह नहीं न. मैंने कहा है कोई ऐसा जो मेरी इज्जत करे, प्यार

करे और मुझे औरत होने का सुख दे. ये नहीं कहा के सड़क पर पाँव पसार कर हर कुत्ते को खुद पर चढ़ा लुंगी." उनकी बातें रेखा को हंसी भी दे

रही थी और बेचैन भी कर रही थी. न चाहते हुए भी उनका खुद का हाथ एक बार छूट को सेहला गया जो बुरी तरह तप रही थी.

"अगर कोई तुझे ऐसा कभी मिले जो तेरी इज़्ज़त करे, तुझे सम्मान दे और तेरा ख्याल रखे तोह मेरी लाडो उसको आजमाकर जरूर देख लिओ. करना या न करना फिर

तेरे हाथ में. और चल अब सो जा फिर तू मुँह अँधेरे में छूट पर पानी गिराने जाएगी. " ललिता जी आखिरी बात जो थोड़ी उन्होंने खुल कर कह दी थी को सुनकर

उनकी बाजू पर हलकी सी चपत लगा कर रेखा जी भी आँखें बंद कर लेत गई.

आँखों में दूर दूर तक नींद न थी. खुली आँखों से वह अपनी जेठानी की कही हर बात ध्यान से सोच रही थी. एक शर्मीली सी लड़की जो ब्याह कर इस घर

में आई थी तोह उसके पति ने शराब के नशे में कैसे उसको राउंड दिए था. फिर उसको वो सब सिखाया जिसकी कल्पना भी कभी रेखा ने न की थी. कभी कभी

तोह दर्द के निशाँ से बुखार भी हो जाता था उसको लेकिन पलट कर पुछा नहीं. एक बाप के तौर पर उनका पति सही था कुछ हद तक लेकिन पति के तौर पर

शायद वो कभी भी उनकी आत्मा तक न पहुंच पाया. 2 साल पहले जब वो खुद उनके साथ सिविल हॉस्पिटल गई थी तोह अपनी आखों से डॉ गुलाटी और अपने पति को

नर्स के साथ लगे हुए देखा था. ऑपरेशन का बहाना करके ाचा ऑपरेशन कर रहे थे दोनों एक 20-21 साल की लड़की का और वो लड़की भी मजे से उनका साथ

दे रही थी. इन सब बातों को याद करके उनका दिल दोराहे पर था. ऐसे हे उन्हें नींद ने आ घेरा.

.

.

अर्जुन अपने वक्त से हे उठ गया था और फिर बाथरूम से फ्रेश हो कर जैसे हे बहार आया तोह अपने भैया को भी तैयार होते पाया. "आप इस वक्त तैयार होकर

कहा जा रहे है?"

"मई तोह तेरे उठने से पहले हे तैयार हो चूका था. बस अभी ऊपर आ कर जूते पहन रहा हु. आज एक मीटिंग है बहार शहर तोह बस निकल रहा हु. याद

से ऋतू को पेपर दिलवाने ले जाना. और मई अब गुरुवार तक हे वापिस आऊंगा." संजीव भैया ने खड़े होते हुए कहा और अपना बैग उठा लिए. दोनों भाई निचे

चल दिए. "ाचा एक कीजिये, आप मुझे भी ये अगले पार्क में छोड़ दीजिये." भैया को कार निकलते देख उसने कहा और कार में बैठ गया.

"ये कोनसी दौड़ करने चला है तू." भैया ने हँसते हुए कहा और कार बहार निकल कर वापिस गेट बंद कर चल दिए.

"बस एक बात करनी थी भैया. क्या मुझे फिर से बहार भेज देंगे पापा?" अर्जुन शायद कुछ महसूस कर रहा था.

"देख अभी तोह तू कही नहीं जा रहा. है शायद कॉलेज के लिए तुझे जाना पड़े. और उसमे कुछ बुरा भी तोह नहीं हफ्ते में 2 दिन तोह तू घर आएगा हे."

अर्जुन को थोड़ा आराम मिला ये बात सुनकर. "वैसे कल जैसा हंगामा किआ शायद पहले .... और भैया पार्क के पास कार रोक कर खड़े हो गए.

"छोटे तू अपने फैंसले खुद भी ले सकता है. अब तू बड़ा हो रहा है. लेकिन जो लोग तुझे उकसाये तोह अपनी शान्ति भांग मत होने देना. यहाँ बहोत से

गरम खून मिलेंगे जो शायद तुझे लड़ने तक उकसा दे. बस उनसे मुकाबला नहीं करना. और मई निकलता हु तू घर का ख़याल रखना."

पार्क के अंदर आकर कुछ देर तोह अर्जुन टहलता रहा फिर 2 चक्कर दौड़ लगाने के बाद घास पर बैठ कर ध्यान लगाने लगा. इतनी ाची हवा में ऐसे

लम्बी साँसे लेना उसको बहुत भ रहा था और उसका मैं भी हल्का हो रहा था. फिर फूल पातु को देखता कुछ देर घूमने के बाद घर की और चल दिए.

"ये लड़कियां जाने कब बड़ी होंगी? मुन्ना देख जरा अभी तक कोई उठा क्यों नहीं." अर्जुन घर में बैठा दूध पी रहा था और माँ आँगन की सफाई कर

रही थी. झुक कर गीले फर्श पर जब वो टिल्ले वाले झाड़ू से पानी बहती तोह उनके दोनों उरोज ब्लूज़ में हिलते. 6 बजे पूरा आँगन रोशन था तोह उसको

सब दिख रहा था. घूमती तोह उनकी साडी में कैसे कूल्हे नजर आते. अपने बेटे को बैठे देख एक बार उसकी तरफ नजर डाली फिर खुद को देखता पाया तोह

रेखा जी का दिल धड़क गया. उनकी मोटी चाटिया नुमाया हो रही थी और अर्जुन बस वही घूर रहा था. गिलास तोह जैसे उसके मुँह पर चिपका हुआ था.

उन्होंने सीधे होते हुए फिर कहा, "मुन्ना, दूध ख़तम कर और अपनी दीदी को जगा दे बीटा." आज उन्हें अपने बेटे का देखना बुरा नहीं लगा था लेकिन नारी

सुलभ मन. बस इसलिए उन्होंने उसका ध्यान ह्त्या. "जी माँ. "

अर्जुन ने माधुरी दीदी का दरवाजा बजाय तोह वह अंदर से बंद था लेकिन एक हे बार दस्तक देने पर कोमल दीदी की आवाज आ गई. "उठ गए है." फिर उसने

ऋतू दीदी के कमरे के दरवाजे पर हाथ रखा तोह वो सिर्फ भिड़ा हुआ था. उसका एक पैट खुल गया तोह अर्जुन ने देखा अलका दीदी प्रीती से पीछे से चिपकी थी

और उनके कूल्हे बहार की तरफ निकले थे. प्रीती सीडी लेती हुई बड़ी सुन्दर लग रही थी. चेहरे से निचे एक चादर से लिपटी थी. उधर सबसे आखिर में

ऋतू दीदी जिनका हाथ प्रीती की छाती के पास और कमर से ऊपर था और मुँह उसके गले के पास. टीशर्ट तोह उनकी कमर से ऊपर छड़ी थी. अर्जुन मुस्कुराता

हुआ अंदर गया और अलका दीदी के ऊपर से प्रीती के गाल थपथपाने लगा. उसकी neeli-hari आँखे जैसे शटर की तरह आराम से ऊपर हुई और एक चेहरा

बिलकुल उन आँखों में खोया सा नजर आया. प्रीती को ऐसी तोह कोई उम्मीद हे न थी के एक सुबह ऐसी भी होगी. वो इन्ही पालो में खोई थी की उसके होंठो पर

तपते हुए होंठ आ लगे और फिर वापिस उठ गए. बस एक पल में जो हुआ उसकी धड़कन दिल से बहार निकलती लगी. "उठ जाइये मेमसाब" बहोत धीमे से अर्जुन ने

कहा और पीछे को सरक गया. खुली आँखों से सपनो में खोई प्रीती शर्मा कर ऋतू दीदी से लिपट गई. "साड़ी रात चिपक कर दिल नहीं भरा क्या तेरा?

मई अर्जुन नहीं हु. चल सोने दे." ऋतू दीदी ने नींद में इतना कहा और खुद भी प्रीती को बाँहों में कास लिए. "दीदी, उठ जाओ आज आपका पेपर है." अर्जुन ने

ऋतू दीदी की हरकत देख मुस्कुराते हुए अलका दीदी को हिलाया. प्रीती ने एक बार पलट कर देखा फिर वापिस नजर घुमा ली.

"उठ गई रे मई तू चल." अलका दीदी ने अंगड़ाई ली तोह उनके कबूतर भी हिल गए, शायद अंदर उनका पिंजरा उन्होंने रात में हे खोल दिए था. अर्जुन को अपनी

तरफ देखता पा कर अलका दीदी लाल हो गई और मुस्कुरा कर बोली, "ऐसे लड़कियों के कमरे में नहीं आते मिस्टर. अब चलो बहार निकलो."

"तू ऐसे मेरे से चिपक कर क्यों मुस्कुरा रही है." यहाँ ऋतू दीदी भी उठ गई तोह प्रीती को अपनी तरफ मुस्कुराते देख बिना सोचे समझे बोल उठी. "ोये

निकल तू बहार. अलका ये कब आया यहाँ पे?" अर्जुन को नखरे से दांत टी ऋतू ने कहा तोह अलका दीदी ने अपने कंधे उचका दिए और अर्जुन बहार भाग गया.

"ये शर्मा रही है तू मुस्कुरा रही है. चल क्या रहा था यहाँ पे?" ऋतू दीदी बिस्टेर से निकलते हुए बोली और अपने बाल पीछे कर रबर लगाने लगी.

"मुझे क्या पता. मई जब उठी तोह अर्जुन मेरे पास खड़ा था और जगा रहा था. अब प्रीती और इसने क्या किआ मुझे नहीं पता." अलका ने प्रीती की चद्दर

हटते हुए कहा और वह भी कपडे ठीक करने लगी. "चलो महारानी जी आप भी उठ जाओ. यहाँ चाय बिस्टेर में नहीं मिलती सबके साथ पीनी पड़ती है. और

अब बस भी कर ये मुस्कुराना." अलका ने ये बात कही तोह प्रीती ने भी अंगड़ाई ली लेकिन अब तोह उन दोनों की आँखें भी फ़ैल गई उसकी तरफ नजर करते हे.

एक झीनी से बनियान प्रीती के शरीर पर थी और उसकी टीशर्ट तकिये के पास पड़ी थी. अंगड़ाई लेने के साथ हे वो बनियान बस निप्पल पर आकर हे रुक गई.

"ोये अब सुबह सुबह ये मत दिखा. जल्दी कर और अपने कपडे pehan,maan लिया की सब सही है तेरा अंदर से और रात चेक भी कर लिए. लेकिन एक पल और

ऐसे रही तोह तेरी चाय यही गरम हो जाएगी." ऋतू दीदी ने ये बात कही और प्रीती ने जल्दी से टीशर्ट ऊपर पहन ली. "आप न सच में बड़ी गन्दी हो दीदी."

शरमाते हुए प्रीती ने कहा. "ाचा मई गन्दी हु? राति तोह बड़ा मेरे अंदर आ रही थी अब देखो जरा कैसे सटी सावित्री बन रही है." अलका तोह इतना

सुनते हे हंसने लग पड़ी पेट पकड़ कर. "ऋतू बस कर यार. तू बेचारी की जान लेकर मानेगी. वो सोइ तोह कपड़ो में थी और देख तूने क्या किआ रात भर

इसके साथ." "आज तू सो जा अलका फिर तू भी कहेगी की लड़का होती तोह कितना मजा आता." और आँख दबा दी.

"ऋतू, अभी तक नहीं उठी क्या?" रेखा जी की आवाज सुनते हे तीनो जैसे बिजली की तरह सब सही कर बहार आ गई. प्रीती तोह बाथरूम में जाकर मुँह धोने

लगी और अलका और ऋतू दीदी ने आँगन में लगे नल पर हे चेहरा साफ़ कर लिए.

"आ मेरी बची इधर मेरे पास आ." कौशल्या जी ने प्रीती को अपने पास बिठा लिया और उनके साथ हे अलका और ऋतू दीदी बैठ गए. अर्जुन बहार बगीचे में

पानी दे रहा था रामेश्वर जी के कहे अनुसार.

"बीटा नींद तोह ठीक से आई न तुझे यहाँ? कोई दिक्कत तोह नै आई?" उन्होंने प्रीती से पुछा था

"इतनी अछि नींद तोह दादीजी पहले कभी नहीं आई. वह तोह अकेले सोती हु और कब आँख लगे न लगे पता नहीं रहता. लेकिन ऋतू और अलका दीदी के साथ

ाचा लगा." प्रीती ने चाय का कप उठाते हुए जवाब दिए. कौशल्या जी उसके बालो में हाथ फेर रही थी. "चाय पी ले फिर तेरे बालो में तेल लगा देती हु

देख तोह जरा कैसे रूखे हुए है." उनकी बात से प्रीती खुश हो गई. "है आज इस अंग्रेजन के सामने हमारी क्या बिसात. दादी को तोह बस यही ाची लगती

है. याद है न अलका गली में कुल्फी वाले को घर के अंदर रेहड़ी के साथ बुला लेती थी दादी इसके लिए कही इसका रंग पक्का न हो जाये." ऋतू की आदत थी

ऐसे मजाक करने की और कौशल्या देवी को उसका यही अंदाज पसंद था. "और उस रेहड़ी पर बैठकर तोह घंटी जैसे मई बजती थी? तू खुद हे तोह कहती

थी गुड़िया को बहार नहीं जाना, बाबा ले जायेगा इसको." कौशल्या जी भी अपनी बच्चियों का बचपन याद सा करने लग पड़ी.

"दादी आप अभी भी पकोड़े वाली कढ़ी बनती हो?" प्रीती ने उनकी तरफ देखते हुए ये बात कही तोह जवाब अलका ने दिया, "दादी ने आखिरी बार शायद कुछ 5-6

साल पहले कोई सब्जी बनाई होगी. इनको तोह याद भी एक हे बचा रहता है, इनका राजा अर्जुन जिसके लिए अँधेरे में हे दूध और बादाम पीसती है ये. तू तोह

आज हे खा लिओ कढ़ी." अलका का व्यंग सुनकर कौशल्या देवी मुस्कुराई और फिर बोली, "Rekha-Lalita, रसोईघर खली कर देना नाश्ते के बाद तुम दोनों. आज दोपहर

का खाना मई बनाउंगी. सूजी का हलवा, कढ़ी और मिस्सी रोटी." उनकी बात सुनकर तोह devrani-jethani भी थोड़ी हैरान हुई लेकिन बोली कुछ नहीं.

"सूजी का हलवा कोण बना रहा है?" घर के अंदर आते हुए अर्जुन ने ये बात कही जिसके साथ रामेश्वर जी भी चले आ रहे थे. ऋतू और अर्जुन का पसंदीदा

था सूजी का हलवा और कढ़ी तोह हरयाणा में प्रसिद्ध है हे.

"आज तेरी दादी हे बना रही होगी नहीं तोह घर में दिवाली या दुर्गाष्टमी पर हे हलवा बनता है." रामेश्वर जी भी कुर्सी पर बैठ गए ये बोलते हुए.

"ये मेरी जगह पर इसको बिठा लिए दादी?" अर्जुन ने अपनी कुर्सी पर बैठी प्रीती की तरफ इशारा करते हुए कौशल्या जी से कहा.

"तेरा नाम लिखा है क्या इस्पे? चल नाहा ले ऊपर जा के आया कुर्सी वाला?" ऋतू ने हेकड़ी दिखते हुए कहा तोह सब हंस दिए और मिटटी से सना अर्जुन ऊपर

चल दिए. ऐसे हे बातें चल रही थी और नाश्ता तैयार होने लगा था. प्रीती दोपहर को आने का बोल कर घर चली गई थी. माधुरी दीदी और कोमल दीदी

बहार अपना रोज वाला काम कर रही थी, कपडे धोने का. रेखा जी को पता था के अर्जुन ऊपर सुस्ती दिखा रहा होगा और उसको ऋतू को कॉलेज भी लेकर जाना है

तोह वह उसको बुलाने ऊपर गई. वो नाहा कर निकला था और अपने कमरे में खड़ा था बिस्टेर के किनारे. बेध्यानी में उसने अपना टोलिया सरकाया और इधर रेखा जी

अपने बेटे के कमरे के बहार थी. उनका मुँह खुला रह गया अपने बेटे का हाल देख कर. अर्जुन का लुंड हलके तनाव में था जो की आम बात थी. लेकिन रेखा जी

ने तोह अपनी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ पहली बार देखा था. होश में आते हे वह दापे पाँव पीछे हैट गई और इधर अर्जुन ने अपने बीएड पर पड़ा साफ़ कच्चा पहना

और ऊपर बनियान दाल ली. अब रेखा जी हलके शोरे से आवाज देते कहा, "मुन्ना तू तैयार हो गया.?" और उसके कमरे के बहार आ गई. अर्जुन ने अपना चेहरा दरवाजे

की तरफ करते हुए कहा, "बस माँ हो हे गया. वो कमीज के बटन लगा रहा था लेकिन रेखा जी चोर नजरो से अपने बेटे के कच्चे पर बने उभर को देख रही

थी. " तू तोह समझदार हो गया जो कमीज पेंट पहन ने लगा रे." उन्होंने बस ध्यान हटाने के लिए ऐसा कहा था.

"है माँ. संजीव भैया और दादाजी ने कहा के घर पर तोह पजामा टीशर्ट ठीक है लेकिन कही बहार जाओ तोह थोड़ा देख भल के ाचे से तैयार हो के जाना चाहिए."

और जैसे जैसे वो जीन्स ऊपर करता गया रेखा जी भी कुछ संभल गई. उसको आने का बोलकर वो खुद निचे चली गई और फिर सबके लिए खाना लगाने लगी.

"दीदी, आपका पेपर कितनी देर का है?" अर्जुन ने रास्ते में स्कूटर चलते हुए ऋतू दीदी से पुछा जो अपने भाई की पीछे चिपकी सी बैठी थी.

"3 घंटे का है. तू बता क्या करना है तुझे?" अपने हाथ को उसकी कमर पर फिरते हुए कहा

"कुछ नहीं मई 3 घंटे क्या करूँगा ये सोच रहा था.?" अर्जुन की बात ऋतू को समझ आ गई थी जो सही भी थी.

"ाचा तू एक काम करियो, मेरा पेपर है 9-12 और तू मुझे कॉलेज गेट पर उतार कर अगली मार्केट में चला जैव. वह सुना है सिनेमा है 2-3 पास पास में.

11:45 तक वापिस आ जाना." दीदी की बात उसको भी जाँच गई. फिर कुछ मस्ती में जब उसने देखा की ये सड़क खाली है तोह अपना हाथ पीछे कर उनका एक उभर

सूट पे से हे सेहला दिए. "तू मार खायेगा. ऐसी हरकत सड़क पर नहीं करते.' ऋतू दीदी ने भी देख लिए था के वह कोई भी नहीं था फिर भी नाटक करते

उन्होंने ये बात कही. "आप न मेरी हो तोह जो मेरा है उसके साथ मई कुछ भी कही भी करू."

"ाचा बाबा. लेकिन न हम दोनों किसी परिवार से तोह है जिसको सब जानते भी है. अब खुद सोच ले." अर्जुन दीदी की बात से शांत हो गया. "अकेले में तू जो

मर्जी कर मेरे भाई. मई तोह खुद पूरी तेरी हु. " थोड़ा चिपक अपने दोनों दूध उसकी पीठ से लगते ये कहा तोह अर्जुन ने समझदारी से कहा. "है वह

जब सुबह आपको जगाने रूम में गया था तभी से दिल में था के एक बार आपको गले लागू, प्यार करू फिर आप हे देखो. गलती से सबर नहीं रहा."

"चल कोई बात नहीं अब तू मुझे उतार और आगे किसी से भी पूछ लिओ. Bye" इतना बोलकर ऋतू दीदी कॉलेज के आगे उतर कर अंदर भाग गई और अर्जुन अगली

मार्किट की तरफ बढ़ गया.

"जलता बदन" ये पोस्टर एक सड़क किनारे बने शौचालय की दिवार पर चिपका था. और इस शीर्षक के साथ वैसे हे 5-6 पोस्टर से पूरी दिवार भरी हुई थी.

अर्जुन को तोह इसका कोई अनुभव नहीं था तोह लाल रंग की उस इमारत की तरफ चल दिए वो खुली पार्किंग में स्कूटर खड़ा कर. मुश्किल सी 12-13 लोग टिकट

की खिड़की पर खड़े थे. सिनेमा के प्रवेश द्वार पर मुँह पर कपडा लपेटे 2-3 ladkiya/aurate भी थी. अंदर से तोह वो घबरा रहा था लेकिन सोचा चलो

आज ये अनुभव भी ले लिए जाये. 100 का नोट भाड़ा दिए उसने छोटे सी सलाखों वाली की खिड़की के अंदर बैठे आदमी की तरफ. एक मरियल सा अधेड़, शायद मुँह

में तमभखु या गुटखा दबाये उसके और देखते हुए बोलै, "हॉल या बालकनी? हॉल का 20 बालकनी का 50." थोड़ा सयंम से अर्जुन ने कहा, "बालकनी की एक."

"अंदर की तरफ हे दिवार पर लाल पिचकारी मार कर उसने एक बस टिकट जैसी गुलाबी रसीद और 10-10 के 5 नोट उसकी और बढ़ा दिए. "अगला बोलो." अर्जुन

वह से हैट गया और जिधर की तरफ बाकी सब जा रहे थे वो भी पीछे चल दिए. "ऐ टिकट दिखाओ." एक खस्ताहाल लकड़ी के दरवाजे के अंदर जाते हे

एक और मरियल सा अर्जुन के सामने आ गया. खाखी वर्दी जो उसके शरीर पे झूल सी रही थी, हाथ में एक स्टील की बैटरी जो उनदिनों चौकीदार जैसे लोग

भी रखते थे लिए खड़ा उस से बोलै, "टिकट दिखाओ भाई." अर्जुन ने भी वो पर्ची सामने कर दी. "वो ऊपर की तरफ चले जाओ जहा लाइट दिखा रहा हु.

दरवाजा खोल कर किसी भी सीट पर बैठ जाना." उसने हॉल के अंदर थोड़ी उचाई की तरफ जाती सीढ़ियों से लाइट मारते हुए एक बक्से नुमा कमरे की तरफ

रौशनी रोक दी. पूरे हाल में ठंडक सी थी अजीब से, और लकड़ी की एक के साथ एक जुडी कुर्सियां. कही पर गद्दी थी तोह कही पर नहीं. वो ऐसे हे देखता हुआ

ऊपर छड्ड गया. एक पतली सी गली थी जहा ये 4 बक्से नुमा कमरे एक कतार में थे. पहले वाले को छोड़कर वह अगले के दरवाजे को खोलने लगा. हल्का हाथ

रखते हे वो खुल गया. अंदर 2 कतार थी कोई 6 सीट की. एक पिछली कतार की सीट जो दरवाजे सी बिलकुल दूर थी वो वह बैठ गया. ाची सीट थी यहाँ पर

तोह. पीठ की तरफ भी और निचे भी सोफे की तरह. कहा जाए तोह सोफे हे थी वह तीन एक साथ फिर एक हटती बीच में फिर तीन सीट. घडी का रेडियम बता

रहा था के 9 बज चुके है. पूरा हाल अँधेरे में डूब गया. कुछ हे देर में बड़ी स्क्रीन पर हिंदी के नंबर चलने लगे लेकिन अभी इतनी लाइट नहीं थी की

सबकुछ दिखाई दे. उसका ध्यान सामने था और इधर दरवाजा खुला और एक जोड़ा हलके से फुसफुसाता अंदर दाखिल हुआ. उन्हें अर्जुन नै दिखा.

"क्या कर रहे हो. जरा भी सबर नहीं है. काम से काम अंदर आकर बैठने तोह दो." ये एक लड़की की आवाज थी. मतलब कोई जोड़ा आया था अंदर. और वो दोनों

अर्जुन से जुडी तीन वाली सीट पर बैठ गए. दरवाजा अंदर से बंद होने की भी आवाज आई थी अर्जुन को. संकोच वश उसने नजर सामने कर ली जहा कोई

शादी का सन चल रहा था और शायद ये दक्षिण भारत की हिंदी में बदली फिल्म थी.

कुछ पल बाद सन बदल गया. अब लड़की बिस्टेर पर बैठी थी. ये सांवली सी और थोड़ी भरी शरीर की लड़की कहो या औरत, थी. साथ में हे उसको उन दोनों

के kachar-pachar सुन्न रही थी. वो जोड़ा कुछ बोलते बोलते चूमा छाती में लगा था. परदे पर अब सन ये था की एक मुचो वाला आदमी जो की दूल्हा था वो

लड़की का घूंगट उतार उसके ऊपर लेता उसको चूम रहा था. "ोूम आह्हः. तुम तोह अप्सरा हो मेरी जान." मुचड़ आदमी जिसने अपनी कमीज निकल दी थी और

सिर्फ एक लुंगी में था कुछ ऐसे बोलै और उस लड़की की साड़ी जिसम से अलग थी. यहाँ बॉक्स के अंदर भी अब ummm-aah की सिसकारियां चल रही थी. अर्जुन तोह मजे से

दोहरा हुआ जा रहा था. उसने एक बार नजर उन दोनों की तरफ की तोह नजर भी वही रुक गई. उन दोनों पे इतनी रौशनी गिर रही थी के कुछ हद्द तक साफ़ दिख

रहा था. लड़की की चुन्नी उसकी बगल में राखी थी और लड़का उसकी कमीज ऊपर कर लड़की को अपनी गौड़ में लिटाये उसके दूध पी रहा था. "सोनू मेरी जान ये

तुम्हारे दूध कितने बड़े है. दिल करता है इन्हे ऐसे हे खता राहु." वो ऐसे हे एक बार ऊपर उठा और फुसफुसाया जो अर्जुन को भी सुनाई दिया. दोनों में से

किसी का चेहरा नहीं दिख रहा था. फिल्म वाले परदे पर भी ऐसा हे कुछ चल रहा था, लेकिन वह वो मुचड़ आदमी ब्रा के ऊपर से हे उस लड़की के खरबूजे

चाट रहा था.

"थक्क थक्क." दरवाजे पर एक दस्तक हुई तोह लड़की ने जल्दी से कमीज निचे करि. लड़के ने उठकर चिटकनी खोली तोह सामने वही आदिमी था जो टिकट देख

रहा था सबकी. उसने अपनी टोर्च की लाइट जलाई और उस लड़के के चेहरे पर मारी, फिर लड़की के. यहाँ उस लड़की के चेहरे पर लाइट गिरी वह अर्जुन के दिमाग

में करंट लगा. उसके मुँह से दबी आवाज में सिर्फ इतना हे निकला, "नुसरत" जो उस लड़की ने भी सुना और घबरा के वही जम्म सी गई. इधर वो टिकट वाला शायद

बहस कर रहा था उस आदमी से. "ऐ ये सिनेमा है. फिल्म चाहे गन्दी लगती हो लेकिन ये अयाशी का अड्डा नहीं है. निकलो इस रंडी को लेकर यहाँ से." उस आदमी

की आवाज तेज थी जो सभी ने सुनी थी. साथ वाले बॉक्स से भी 2-3 लोग निकल आये थे और पूछने लगे क्या बात हुई है, जैसा की अमूमन खाली लोग करते हे है

"अरे मैंने बताया न भाई मेरे साथ नहीं है वो. मई तोह अकेला आया हु यहाँ." ये तोह आदमी हे हिजड़ा निकला. अर्जुन ने कुर्सी के किनारे पड़ी चुन्नी नुसरत की

तरफ फेंकी. एक पल के लिए रुक कर उसने फिर वो अपने चेहरे से लपेट ली.

"मैंने खुद देखा था तुम्हे लड़की साथ लाते हुए. परदे के सामने से हमारे आदमी ने देखा था तुम्हे कुछ करते हुए." उसकी बात सुनकर तोह अर्जुन को समझ

आ गया की मामला कुछ और है. "मई सच बोल रहा हु भाई ये लड़की मेरे साथ नहीं है. मई तोह ######## कंपनी में सेल्समेन हु और आज हे इस शहर आया

हु. अभी समय खली था तोह फिल्म देखने चला आया." उस आदमी की जान हलक में आ चुकी थी और उसने धीमे से कुछ पैसे अपनी जेब से निकल कर उस मरियल

आदमी की ऊपर जेब में दाल दिए. कोई इशारा किआ तोह वो अपना बैग उठा के वह से नौ दो गिरह हे हो गया.

"ऐ लड़की तू किसके साथ है? साली धंदा करती है." उसने इतना कहा तोह 2 लोग और भी अंदर की तरफ आने लगे.

"कान के निचे थप्पड़ खींच के मारूंगा तोह समझ आ जाएगी लड़की से बात कैसे करते है." अर्जुन गुर्राता सा खड़ा हुआ. 6 फ़ीट का तगड़ा जवान देख

कर वो आदमी हड़बड़ा गया. "भाई.. ये तुम्हारे साथ है क्या?"

"मेरे साथ है तभी यहाँ बैठी है. चल निकल यहाँ से चुपचाप. पैसे दे कर फिल्म देख रहे है फ्री में नहीं जो ड्रामा कर रहे हो."

"अरे ओह टिकट वाले क्यों जवान जोड़े को परेशां कर रहा है भाई. कॉलेज वाले है सोच के पन्गा लिए कर नहीं तोह तेरा सिनेमा टॉड देंगे और तुझे भी."

ये वो आदमी बोलै जो शुरू में आवाज सुनकर साथ वाले बॉक्स से आया था. एक और ने सुर में सुर मिलाया. "तू निकल रे. फिल्म की माँ छोड़ के रख दे. अब मई

मरूंगा तेरे कान के नीचे." वो मरियल सा आदमी दरवाजा बंद कर खिसक लिए बहार. उसने सोचा था पैसे के साथ लड़की के ऊपर भी हाथ फिर लेगा लेकिन

यहाँ तोह जान हे बच गई बहोत था. अब बॉक्स में दोनों चुप थे. फिर कुछ देर बाद अर्जुन हे बोलै..

"तोह ये पढाई भी करती है आप?" नुसरत तोह बस इतना सुनते हे जोर जोर से सुबकने लगी. अर्जुन पहली बार किसी लड़की को रोने से नहीं रोक रहा था. पता

नहीं क्यों. शायद उसको ाचा नहीं लगा था ये सब देख कर.

"मुझ से गलती हो गई अर्जुन. मुझे माफ़ कर दो. मई ऐसी लड़की नहीं हु जैसे तुम मुझे आज देख रहे हो?" उसने सुबकते हुए हे कहा.

"कौन था ये आदमी? और तुम एक ऐसे आदमी के साथ यहाँ तक आ गई.? किसी ाची जगह भी तोह जा सकती थी अगर ये सब करना था?" अर्जुन आवाज धीरे लेकिन

सख्ती से कर रहा था.

"मेरे बड़े जीजा है ये. कुछ दिन पहले इन्होने मेरे कमरे में मुझे और आशा को देख लिए था एक साथ. उसके बाद से हे मुझे बोल रहे थे बहार चलने के

लिए नहीं तोह मेरे maa-baap को बोलने की धमकी दे रहे थे." नुसरत ने इतना कहा तोह अर्जुन ने सर पे हाथ रखा और फिर पुछा, "क्या कर रही थी तुम

दोनों जो ये ऐसी हरकत करने पर उतर आया."

"वो.. वो आशा मेरे साथ अकेले में मस्ती कर रही थी. उस दिन स्टडी के लिए घर हे रुकी थी मेरे. जीजा ने खिड़की से झाँक कर देख लिए था." वो फिर

रोने लगी.

"तुम जानती हो जैसे वह तुम्हे यहाँ अकेली छोड़ कर भाग गया उसके बाद तुम्हारे साथ क्या करते ये लोग." अर्जुन की प्रश्न से नुसरत हिल गई थी.

"वो मुझे ये बोलकर लाये थी की एक बार उनके साथ होटल चल पदु. मैंने मन किआ तोह फिर कहा के एक फिल्म देख लो मेरे साथ और सिर्फ वैसे हे करने

देना जैसे अपनी सहेली के साथ कर रही थी. फिर कभी कुछ नहीं करूँगा या कहूंगा. और यहाँ छोड़ कर भाग गया." वो अर्जुन के सीने से लग कर रोने

लगी थी.

"पहले तोह मई सोच रहा था के अलका को सब असलियत बता दूंगा के देख लो कैसी सहेली है तुम्हारी. इस सब में ऐसा नहीं के वह आदमी हे पूरी तरह

गलत है. तुम्हे उसका विरोध वही करना चाहिए था जब तुम्हे उसने पहली बार ये सब कहा. लेकिन सुधर जाओ बस इतना कहूंगा. गलत सहने से ाचा

उसका विरोध करना है. आज यहाँ कोई तुम्हारी इज़्ज़त्त नीलाम कर देता तोह पूरे घर की बेइज़्ज़ती होती. लेकिन तुम उस दगाबाज के साथ बिना कुछ सोचे आ

गई." इस हंगामे के बीच मध्यांतर हो गया था. और रौशनी हो गई थी. 2-3 लड़के cola-paani-fulle के पैकेट बाल्टी में रख कर बेच रहे थे हर

सीट के पास जाते हुए. निचे तोह मुश्किल से 30 लोग थे और बॉक्स वाली जगह भी 5-6 हे फिल्म देखने आये थे. एक लड़के से 2 ठन्डे की बोतल लेकर अर्जुन ने

वही राखी और उसको फिल्म के बाद उठा लेने को कहा. लाडखा पैसे ले मुस्कुराता चला गया बहार. "चलो बाथरूम चलकर मुँह साफ़ कर लो. अगर तुम्हे बहार

जाना है तोह मई छोड़ आता हु. मेरी मज़बूरी है के अभी डेढ़ घंटा रुकना पड़ेगा यहाँ." इतना बोलकर वह गेट की तरफ बढ़ा और नुसरत उसके पीछे चल दी.

बाथरूम उस तरफ हे बना था जिस तरफ से मुड़ने के लिए जगह थी. अर्जुन बहार खड़ा रहा और 5 मिनट बाद नुसरत बहार आ कर सीधा बॉक्स की और चल दी.

"तुम्हे घर नहीं जाना क्या?"

"घर पर 12 बजे तक का हे बोलकर निकली थी और इस वक्त घर नहीं जा सकती. जब तुम निकलोगे तोह साथ निकल जाउंगी." नुसरत अभी थोड़ा काबू में थी.

"ाची बात है. ये लो कोला पी लो. मई खुद नहीं पीटा लेकिन सोचा कभी पी लेना चाहिए." नुसरत ने बोतल जरूर हाथ में पकड़ ली थी लेकिन वह

अभी तक सेहमी हुई थी.

"देखो बात को यही ख़तम करो. जरुरी बात है के तुम ठीक हो. और किस्मत हे कह लो के मई यहाँ था क्योंकि मई इस से पहले सिनेमा नहीं आया कभी अकेले.

और तुम्हे भी किसी ने नहीं देखा." इतना कह कर एक बार फिर अर्जुन ने प्यार से सर सेहला दिए और बोतल वाला हाथ नुसरत के होंठो की तरफ उठा दिए.

"वो उसने मेरे चेहरे पर लाइट मारी थी." घबराते हुए नुसरत ने ये बात कही तोह अर्जुन को हंसी आ गई. आधा चेहरा वह से देखा होगा उसने. वो भी

इतनी तेज पीली रौशनी में तोह क्या याद रहेगा. अब तुम फिर वापिस आओ तोह पता नहीं." और हंसने लगा.

"वापिस तोह क्या अब मई मेरे घर से भी नहीं निकलने वाली." इतना बोलकर एक बार फिर वह अर्जुन से लिपट सी गई.

"तुम्हारा मई किस मुँह से शुक्रिया ऐडा करू अर्जुन? कहा मुझे तुमपर इतना गुस्सा आया था जब तुम उसदिन कॉलेज में मुझे पूरी तरह से नजर अंदाज कर

चले गए थे और कहा आज तुमने हे मेरी इज्जत बचाई. उस दिन इतना गुस्सा था मुझे तुम पर की जाने खुद को क्या समझते हो लेकिन मई हे गलत थी."

सुबकते हुए हे उसने अपने होंठ अर्जुन के होंठो से मिला दिए. अर्जुन ने अपनी तरफ से कोई प्रतिक्रिया न दी. फिर कुछ देर में दोनों सीधे होकर बैठ गए.

इतना देर रो लेने के बाद प्यास लग रही थी तोह अब नुसरत धीरे धीरे कोला पी रही थी. परदे पर अब कोई नया हे सन चालु था. एक जवान लड़का जो

शायद उस घर का नौकर था वह घर के बहार पानी दाल कर सफाई कर रहा था. नयी दुल्हन जिसकी शादी हुई थी आज वह घर के कपड़ो में थी. आँगन

में उस लड़की का पेअर फिसलता है और वह जमीन पर गिरी नजर आती है. "कन्हैया मुझे उठाओ." वो लड़का जिसका नाम कन्हैया था वो भाग कर आता है और

"मालकिन" बोलकर उस लड़की को उठता है. कैमरा अब सिर्फ उस लड़की की गुब्बारों पर था जो चोंच वाले ब्लाउज में थे. अगले सन में दोनों कमरे में थे और

कन्हैया मालकिन को बिस्टेर पर दाल देता है. अर्जुन और नुसरत बस सन देख रहे थे. दोनों एक हे सीट पर अगल बगल में बैठ थे. "कन्हैया जाने से

पहले जरा मेरी कमर में बालम लगा दे. लगता है कमल लचक गई है कही से." वो लड़की होंठ काट ते हुए कहती है. ऐसे हे सन में आग वो लड़का कोई

तेल रगड़ रहा था जवान मालकिन की कमर पर. सफ़ेद पेटीकोट और ब्लाउज में पीठ के बल लेती वो सिसकारियां भर रही थी. शायद ये नकली हे थी क्योंकि

एक्टिंग हे कर रहे थे. अगले हे पल दोनों के होंठ एक दूसरे से चिपके और अब मालकिन कन्हैया की गौड़ में दोनों टंगे फैलते हुए उसको चूम रही थी. इधर

नुसरत का तोह बुरा हाल हो गया था लेकिन अर्जुन मुस्कुरा रहा था. "बेशरम" इतना बोलकर नुसरत उसको नाटक सा करती मारने को हुई और खुद उसपर गिर गई.

दोनों जगह एक हे सन चल रहा था. लेकिन इस बार अर्जुन के होंठ भी नुसरत के होंठो को बराबर चूस रहे थे. मजे में वो उसके ऊपर हे पसरी हुई थी.

फिल्म में नौकर अब मालकिन की सफ़ेद ब्रा में से निकलते बड़ा बड़े सांवले दूध चूम रहा था और यहाँ अर्जुन नुसरत की गोलियां नाप रहा था. नुसरत ने खुद

हे अर्जुन का हाथ अपनी कमीज के अंदर कर दिए और दोनों एक लम्बा किश करते गए. अब वह सन बदला तोह यहाँ भी. अर्जुन की गौड़ में नुसरत बैठी थी और

वो उसकी कमीज ऊपर कर उसके मॉटे दूध पी भी रहा था और दबा भी रहा था. सच में हे नुसरत के चुनचे खूब बड़े और कैसे हुए थे. ज्यादा मसले

नहीं गए थे अभी. सिनेमा के परदे पर भी अब वो मालकिन ऊपर से नंगी थी और लड़का अपना मुँह उसके खरबूजों पर चला रहा था. लड़की बीएड पर थी और वो

बस सिसकिया ले रही थी. कन्हैया की कमर कमर के ऊपर से हे हिल रही थी. अपने दूध अर्जुन को पीलता नुसरत ने हाथ उसकी पंत में डालना चाहा तोह अर्जुन

ने उसको थोड़ा पीछे खिसका खुद पंत का बटन खोल दिए. "ये क्या है?" नुसरत को तोह बिलकुल उम्मीद नहीं थी की किसी का ऐसा भी हो सकता है. उसने अपने

didi-jija को देखा था. लेकिन जीजा का तोह किसी मोमबत्ती जितना मोटा और 4-5 इंच का था. लेकिन ये डंडा तोह उसकी मुट्ठी में नहीं आ रहा था. "मेरे पास

तोह यही है. खुद देख लो अगर छोटा है तोह." अर्जुन ने शरारत से कहा और उसके निप्पल खींचते हुए वापिस होंठ चूसने लगा. मस्ती में नुसरत लुंड

को आगे पीछे करने लगी. "हम यहाँ नहीं कर सकते और न हे मई ये ले पाऊँगी. लेकिन तुम्हे खाली कर देती हु." नुसरत ने अर्जुन को देखते हुए कहा.

"मुझे कैसे खाली कर डौगी?"

"वो सब बाद में बताउंगी लेकिन कही देखा था. तुम बस मेरे ये दबाते raho."Itna बोलकर वो वापिस साथ में चिपक कर बैठ गई. और अर्जुन उसके दूध दबाता

रहा. नुसरत ने अपना मुँह लुंड के ऊपर कर ढेर सारा थूक उसपर गिरा दिए और सुपडे को चिकना करने लगी हाथ से. अर्जुन पूरा उत्तेजित था और उसका लुंड

भी फूल कर फटने को हो चूका था. नुसरत के हाट तेजी से लुंड पर चल रहे थे और दूसरे हाथ से वह उसके अंडकोष सेहला रही थी. अर्जुन ने दूध

दबाते हुए हे वापिस उसको चूमना शुरू कर दिए और एक हाथ सलवार से सीधा छूट पर ले गया. पूरी गीली थी नुसरत की छूट और कुछ बाल भी थे वह.

अपनी उगलिया छूट के छेड़ पर रगड़ते हुए वह नुसरत को भी मजा दे रहा था. इधर उसका हाथ थकने लगा लेकिन वो करती रही लुंड को आगे पीछे.

"मैंने भी कही कुछ देखा था. तुम करोगी वैसा?" अर्जुन ने कुछ सोचते हुए कहा तोह सिर्फ उसने हँ कहा. "इसको मुँह में ले लो?" नुसरत ने ना में सर हिला दिए

और फिर से थोड़ा थूक गिरा गर ाचे से मालिश करने लगी. अर्जुन ने वापिस ध्यान उसके बड़े चुचो पर लगाया और उन्हें मसलने लगा. मजे से नुसरत की

सिसकारियां निकलने लगे और हाथ लुंड पर जोर से चलने लगा. अब तोह अर्जुन का भी समा बन गया था. जैसे हे नुसरत की छूट फिर से गीली हुई इधर अर्जुन

के लुंड से पिचकारी उड़ती अगली सीट पर गई. 4-5 लम्बी पिचकारियां मारने के बाद कुछ वीर्य नुसरत के हाथो पर भी लग गया.

"इन हाथों से तोह अब कोई काम होने से raha."Apni कमीज निचे करती हुई नुसरत रुमाल से हाथ साफ़ करने लगी. उसकी साँसे उखड़ी हुई थी. रुमाल अर्जुन की

तरफ बढ़ाया तोह अर्जुन ने सिर्फ ऐसे हे उसको देखा. नुसरत खुद उसका लुंड साफ़ करने लगी और धीरे से बोली, "मई तोह चाहती हु के तुम मुझे चाहे मजे से

मार दो लेकिन ये जगह तुम्हारा अजगर लेने के लिए ठीक नहीं. अगली बार पक्का मुँह से भी करुँगी और कभी अलका के सामने कुछ कहूँगी भी नहीं. थैंक यू."

एक बार मुँह चूम कर वो कड़ी होने लगी तोह अर्जुन का भी ध्यान गया की फिल्म ख़तम हो चुकी है. नुसरत ने चेहरे पर चुन्नी लपेटी और वो दोनों वह से

निकल चले. बहार आ कर अर्जुन ने नुसरत को रिक्शा करा दिए और कॉलेज की तरफ स्कूटर बढ़ा दिए. 11:45 हो चुके थे.
 
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