Incest Pyaar - 100 Baar - Page 2 - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

अपडेट - 10

प्यार और परिवार


घर की सभी महिलाये पड़ोस वाले गुप्ता जी के घर गई हुई थी जहाँ होली की कथा सुनाई जा रही थी. दोपहर का 1

बज रहा था और इस समय रामेश्वर जी भोजन करने के बाद अपने कमरे में नींद ले रहे था. ऋतू और अलका एक साथ

बैठी पधारी भी कर रही थी और कुछ खुसुर फुसुर भी. कोमल का भी फाइनल का इम्तिहान था तोह वो दूसरी मंज़िल

वाले ड्राइंग रूम, जहा इस समय कोई नहीं था बैठी हुई िटमिनियन से नोट्स बना रही थी. संजीव भी गुप्ता जी के

हे घर पर था क्योंकि उसको वही से दादी जी और घर की बाकी महिलाओं के साथ पूजा का सामान लेकर होलिका स्थान पर

जाना था. गुप्ता जी का बीटा अरुण संजीव का ाचा मित्र था तोह वो दोनों अलग कमरे में बैठे गप्पे हेंक रहे थे.

और यहाँ घर पर माधुरी भीतर वाले आँगन में बने बाथरूम में स्टूल पर बैठी किसी बात को सोच मुस्कुरा रही

थी. "हाय राम. ये ऋतू भी न, क्या जरुरत थी मुझे ये सब देने की", खुद से बातें करती हुई वो अपनी योनि पर

उग्ग आये जंगल को सहलाते हुए उनपे क्रीम लगा रही थी. पूरा शरीर दमक रहा था उसका और पूरी योनि के ird-gird

सफ़ेद क्रीम लगी थी. ऐसे बैठे होने से उसके दूध अपने आप सख्त हो रहे थे और उनपर चिपके हुए वो भूरे रंग

के निप्पल नंगे होने के एहसास भर से तीर की तरह तीखे हो चुके थे. पूरे शरीर पर रोये खड़े हो गए थे.

माधुरी के शरीर में भी एक बात कमाल की थी. उसके किसी भी हिस्से पर कही कोई बाल नहीं था. न हाथो पर और

न हे कही जांघ, पिंडलियों या चूतड़ों पर. सिर्फ छूट के ऊपर एक उल्टा व् के आकर का जंगल थे और ऐसे हे बड़े हलके

से बाल छूट के चारो तरफ. "ऋतू ने बोलै था के 10 मिनट लगा कर रखना है फिर कपडे से साफ़ करके धोना है",

यही याद आते हे माधुरी ने अपनी आँखें बंद कर ली और अगले हे पल उसकी साँसों की रफ़्तार बढ़ गई. "हाय अभी भी

ऐसा लग रहा है जैसे वह पागल अपना डंडा घिसा रहा हो मेरी मुनिया पर.", ऐसा एहसास होते हे उसकी छूट से एक ौस

की बूँद बहार निकल आई और छूट के मुहाने पर रुक गई. और उसके मुँह से हलकी सिसकारी निकल गई , "शह्ह्ह्ह पागल कर

दिए है इस लड़के ने तोह. और क्या हालत कर दी है मेरी." खुद से बातें करते हुए जब माधुरी की नजर सामने लगे

शीशे पर पड़ी तोह उसने देखा छोटे छोटे नीले निशान उसके निप्पलों के आसपास बने हुए, लाल लाल खरोंच के निशाँ

और सूजे हुए दोनों निप्पल जो अब पहले से कही बड़े दिख रहे थी. जैसे हे उसने अपने निप्पल को छूआ, वो छूट पर रुकी

शबनम की बूँद फर्श पर जा गिरी. "ूई माँ." फिर जब उसने ड़याँ दिए के क्रीम सूखने लगी है तोह पास में रखे गीले

कपडे से उसने ऊपर से निचे तक रगड़ के पांच दिए. "वाह." माधुरी के मुँह से अपनी छूट देख कर यही निकला बस.

जहा पहले जंगल था वो जगह अब ऐसे दमक रही थी जैसे कोई बाल वह ऊगा हे न था. और उसकी छूट के दोनों मोठे

होंठ अब साफ़ गोर और पहले से ज्यादा पहले दिख रहे थे. कुछ सोच कर वो शरमाई और सारा कचरा एक पॉलिथीन में

दाल दिए. छूट को ठन्डे पानी से धोने के पाउडर लगाया और कपड़े पहन चल दी अपने कमरे में कोई गण गुनगुनाते हुए.

अर्जुन जैसे हे घर पंहुचा बिना किसी को देखे सीधे अपने कमरे की तरफ दौड़ लिए. जाते हे टीशर्ट उतार फेंकी और

बनियान पहन कर ड्राइंग रूम में घुस गया. सामने का नजारा देख पेअर वही जम्म गए. कोमल दुनिया से बेखबर छाती

के भार लेती स अपने नोट्स बना रही थी और उसके गोर गोर उभार कमीज से नुमाया हो रहे थे. पजामी के ऊपर से कमीज

कमर पर छड़ी हुई थी और उसका भाई पिछवाड़ा सलवार से चिपका हुआ बड़ा दिलकश नजारा दे रहा था.

"दीदी आप यहाँ." अर्जुन ने खुद को सँभालते हुए कोमल को पुकारा

"ओह. है भाई वो क्या है न निचे शोर हो रहा था. मेरे कमरे में ऋतू और अलका कब्ज़ा कर के बैठी थी. पापा अपने कमरे

में सो रहे है तोह मई यहाँ चली आई. अगर तुझे कुछ काम है तोह मई उठ जाती हु.", बिना हिले हे कोमल दीदी ने अर्जुन

को सब बता दिए.

"अरे नहीं दीदी. आपका हे तोह है ये भी. मई तोह बोर हो रहा था तोह सोचा टेलीविज़न हे देख लेता हु. लेकिन आप कर लो

पढाई मई कही और बैठ जाऊंगा." इतना बोलकर जैसे हे वो मुदा तोह कोमल ने उसको रोक लिए.

"चल आजा यहाँ मेरे पास बैठ. मेरा काम भी हो हे गया है. कभी मेरे भी साथ समय बिता लिए कर." और वह सीधी हो गई.

"आप हे सारा दिन घर के काम या पढ़ाई में लगी होती हो. मई तोह हमेशा यही होता हु अकेला." मासूम सा चेहरा बनता हुआ

वो सोफे पे आ बैठा और कोमल ने भी लेते हुए अपना सर छोटे भाई की गौड़ में रख लिए टेलीविज़न की तरफ मुँह करके.

"कुछ ाचा सा लगा न भाई. क्रिकेट मत लगाइओ बस.", बड़े लाड से उसने ये बात कही तोह अर्जुन ने रिमोट का बटन दबाया

और फिर भो चैनल पर रोक दिए. यहाँ एक रोमांटिक मूवी आ रही थी जो अभी शुरू हुई थी. अर्जुन इंग्लिश फिल्म भी इसलिए

देखता था की उसकी इंग्लिश पर पकड़ बानी रहे. और कोमल जो की खुद फाइनल ईयर में थी उसको भी इंग्लिश की ाची समझ थी.

दोनों भाई बहिन फिल्म देख रहे थे और अर्जुन अपने हाथ से बहिन का सर सेहला रहा था. दूसरा हाथ उसका वैसे हे दीदी की

कमर से ऊपर रखा था. फिल्म काफी ाची थी तोह कोमल तोह उसमे हे खो गई. अर्जुन की एक पल नजर हटी तोह उसका ध्यान

अपनी दीदी की कमर पर गया, जहा से कमीज ऊपर सरक चूका था. एक बार अपनी बहिन की सपाट चिकनी कमर देख कर उसने

वह से नजर हटाई और अपनी दीदी का चेहरा देखने लगा. बिलुल मासूम सा चेहरा था कोमल का और त्वचा ऐसी बेदाग के

कही कोई टिल भी नहीं. आँखों पे चस्मा लगा हुआ था जो की काफी जंचता था और छोटा पावर का था वह. ऊपर वाला होंठ

थोड़ा उठा हुआ नाक की दिशा में एकदम गुलाब जैसा. सीढ़ी प्यारी नाक और बादाम जैसा चेहरा. कोमल के चेहरे पे एक अलग

हे नूर था. ना तोह उसपे ऋतू जैसी चंचलता थी, न हे अलका जैसा बचपना. एक अलग हे सकूं से भरा चेहरा था उसका.

आज पहली बार अर्जुन ने अपनी इस बड़ी दीदी को इतने ध्यान से देखा था और वो उसमे हे खो गया था. अब उसके मैं में कोई काम

विचार या वासना नहीं थी, सिर्फ एक एहसास था के ये पल बस यही रुक जाये. उसका दिल रुक रुक कर धड़क रहा था और काफी देर

से बानी इस ख़ामोशी को देख कोमल ने सिर्फ अपनी नजर हिलाई, गर्दन नहीं. अपने भाई को खुद के चेहरे में खोया देख एक बार

तोह उसको अजीब लगा लेकिन जैसे हे उसने अर्जुन की आँखों को देखा वो खुद भी शांत हो गई. अर्जुन bhaav-shunya सा खोया था

और उसको कुछ पता नहीं चला. बस उसकी दीदी के गाल हलके गुलाबी हो गए थे. कोमल के होंठ धनुषाकार हो चुके थे. लाज

शर्म, और सिर्फ इस विचार से की उसका भाई कितने वात्सल्य से उसको देख रहा है.

हिम्मत कर के कोमल ने इस बार नज़र घुमाई और अपने भाई का चेहरा देखने लगी जैसे वह देख रहा था. बड़ी गहरी भूरी

आँखें, घुंगराले कुंडली बाल, चेहरे पे एक तेज जिसको कोई नजर अंदाज न कर सके, हलके bhoore-gulabi होंठ जिनके ऊपर

अभी मूछ के अंकुर बस निकलने हे लगे थे, तराशा हुआ चेहरा. और बस यही दोनों की नजर एक हो गई.

अपनी दीदी की गहरी आँखों की तरफ अर्जुन झुकता हे चला गया और कोमल के हाथ खुद बा खुद भाई की गर्दन को घेर कर

आपस में जुड़ गए. दोनों एक दूसरे की साँसों को महसूस कर रहे थे. टेलीविज़न पर फिल्म ख़तम हो चुकी थी लेकिन यहाँ शुरू

हो चुकी थी. कोमल ने खुद से हे अपने लबों को अर्जुन के लबों से मिला दिए. इस चुम्बन में lesh-maatra भी वासना न थी.

अर्जुन ने अपने होंठो से कोमल का ऊपर वाला होंठ चुभलाया तोह उसकी आँखें सुकून से बंद हो गई. गर्दन पर पकड़ और

मजबूत. जैसे वह कह रही हो के भाई मुझको खुद से अलग मत करना. अर्जुन ने भी अब कोमल के दोनों होंठ अलग कर अपनी

जीभ से उसकी जीभ को छु लिया था और एक हाथ के अंगूठे से उसके गरम हो रहे नाजुक गाल को सेहला रहा था. गीले होंठ

एक बार फिर जोरदार तरीके से चिपक गए और जब अलग हुए तोह अर्जुन की गर्दन सोफे की तक पर लुढ़क गई और कोमल अपने

भाई की गौड़ में आँखें बंद किये निढाल मूर्छित सी पड़ी थी.

वो उठी और जब उसने देखा के उसका भाई अभी भी साँसे दुरुस्त कर रहा है तोह एक बार फिर कोमल ने झुक कर अपने भाई के

होंठो पे प्यार से एक छोटा सा चुम्बन दिए और अपनी किताबे लेकर निचे चली गई, एक नै ऊर्जा और प्यार से भरी.

"ऐसा जादो तोह मुझे सेक्स करते वक्त भी नहीं हुआ. और मेरी नजर को कुछ भी दिखाई क्यों नहीं दिए?" सोचते हुए वो अपने बीएड

पर निढाल होकर नींद के आगोश में चल दिए.

.

.

इधर ऋतू और अलका के कमरे में.

ऋतू- यार सोचा है कुछ कल जन्मदिन के बारे में?

अलका - क्या सोचना है वही सुबह उठकर पूजा करनी है दादी जी के साथ. ऊपर से फाग है तोह रंग खेलेंगे और शाम को

जैसे हर साल होता है वैसे हे मेरी पसंद का खाना बनेगा और जो दादा जी daan-puniya करवाएंगे. नया क्या होगा? जन्मदिन

तोह अप्रैल में बनता है.

ऋतू (सोच के लहजे में)- है यार जन्मदिन तोह दादा जी अर्जुन का हे मानते है. देखा नहीं जब वह 8 साल नहीं था तब भी बड़ी

धूम धाम से मानते थे, जैसा खुद उनका हे जनम हुआ हो उस दिन. लेकिन प्यार तोह वह तुझे हे करते है सबसे ज्यादा उसके बाद.

अलका- अरे ये देख के तोह मुझे कही ज्यादा ख़ुशी होती है. छोटा भाई है हमारा और प्यार तोह सभी करते है उस से. जहा

तक मुझे याद है तोह तू हे सारा दिन उसको गौड़ में लिए छोटा काका- छोटा काका करती रहती थी बचपन. कितनी बार तोह उसके

रोने से तू हे रोने लग जाती थी के देखो काके के क्या हुआ.. और खिलखिलाने लग पड़ी

ऋतू मुस्कुराते हुए बोली," यार बचपन कितना प्यारा था न और अब देख ये पिताजी के चक्कर में 12 घंटे तोह किताबो में निकल जाते

है." किसी तरह अर्जुन क टॉपिक को उसने बदल दिए. जब भी उसके सामने अर्जुन का चेहरा आता था वह खुद हे नज़र हटा लेती थी.

जाने क्या था उसके दिल में जो अपने भाई से 8 साल दूर होने के बाद घर कर गया था.

अलका ने बात आगे बधाई," वैसे तू मुझे क्या दे रही है? चाचा जी ने तोह 2 कंगन बनवाये है मेरे लिए सोने के. चची जी

ने एक नया फुलकारी वाला सूट, माधुरी दीक्षित जैसा. पापा तोह कल हे देंगे लेकिन दादा जी ने बैंक में अकाउंट खुलवा दिए है और

50,000 जमा किये मेरे नाम से." बिस्तर पर दोनों आमने सामने लेती थी झुकी हुई सी.

"यार तेरा सही है. इतना कुछ मिला है तोह मई सोच रही थी के तू हे उपहार देदे मुझे." बोलकर ऋतू खिलखिला उठी. सबके

सामने हिटलर सी रहने वाली ऋतू सिर्फ अलका, शंकर जी और अपने दादी जी के साथ हे खुलकर बात करती थी. दादी तोह खुद हिटलर

थी तोह उनको अपनी यही गुस्सैल पोती पसंद थी और पिताजी भी ऐसे हे थे. लेकिन अलका और ऋतू बचपन से एक साथ रही थी और

अलका का विपरीत स्वाभाव हे था के ये दोनों एक दूसरे से जान तक जुडी थी.

"है तोह तुझे पता हे है मई कोनसा कंगन पहनती हु. तेरे हे है वह और जो भी संजीव भैया देंगे वह भी तुझे हे मिलेगा.",

अलका ने प्यार से उसकी थोड़ी ऊपर उठा के बोलै तोह ऋतू ने कुछ न कहा बस हलके से चूंटी काट दी अलका के झांकते हुए अभारो

पर.

"अह्ह्ह.. कमीनी", इतना बोलकर दोनों मुस्कुरा di.."Tu कभी नहीं सुधरेगी न? जब देखो तुझे यही दीखता है." अलका ने झूठे गुस्से

से कहा तोह ऋतू ने पलट वॉर किआ, "दिखती है तभी तोह दीखते है मेरी जान. वैसे कुछ भी के अलका तुझे देखती हो तोह ऐसा

लगता है के मई तोह कुछ भी नहीं तेरे सामने. भगवान् ने तुझे न जैसे अपने स्वर्ग के लिए हे बनाया था और भेज दिए यहाँ." इतना

बोलकर एक बार फिर उसने अलका के उभार पकड़ लिए.

"क्या करती है पागल कुछ भी बोलती है. तू शायद ये भूल रही है तू क्या चीज है यार. पिछले साल याद है न फ्रेशर टाइम

क्या हुआ था? लड़के पुलिस की लाथिऑन खाने से भी हेट नहीं थे तुझे साड़ी में देख कर." अलका ने ऋतू का हाथ हटाने के कोई

कोशिश नहीं की, उल्टा खुद भी उसके गले से निचे हाथ फेरने लगी.

"इतना खूसूरत होने का फायदा हे क्या हम दोनों का जो शादी तक रहना हे जेल में है. और फिर शादी के बाद पता नहीं कैसा घर

माहोल मिले." दार्शनिक अंदाज में अपनी बात कहते हुए ऋतू अब अपना पूरा हाथ अलका की कमीज में घुसाए उसका एक चूचा दबा रही

थी..

"सष्ठ.. बस कर यार. तेरा तोह पता नहीं लेकिन मई तोह जिंदगी जीने में यकीन करती हु. काट ता तोह कुत्ता भी है और हम पढ़े

लिखे इंसान है." अपनी चूची के दबाये जाने से मजे में आती अलका ने भी ऋतू का निप्पल खींच लिए और उसकी भी सिसकी फूट गई

"मत आग लगा कामिनी. Pachtayegi."Itna बोलकर ऋतू ऊपर आ गई अलका के लेकिन अपना पूरा वजन नहीं डाला. "और क्या कह रही है के

तू जिंदगी जीने में यकीन करती है? कोई शहजादा तोह नहीं आ गया तेरे सपने में?" इतना बोलकर इस बार ऋतू ने अपने दोनों हाथ अलका

की कमीज में घुसा दिए और पूरा कमीज उल्टा दिए गले तक.

"ोये अभी मत कर. तेरा ये मस्ती करना दोनों को भरी पद जायेगा किसी दिन." अलका बोल तोह रही थी लेकिन खुद उसने भी ऋतू की टीशर्ट

में दोनों हाथ घुसा दिए थे. "और कोई शहजादा वेह्जादा नहीं आया सपने में. अब जो भी आएगा सामने हे आएगा. और प्यार होना है तोह

होकर हे रहेगा. शादी जहा मर्जी हो.", इतना बोलकर उसने भी ऋतू की ब्रा उलट दी.

"वाह मेरी भगत सिंह. क्रान्ति की बातें कर रही है." ऋतू ने अब अलका के दोनों चुके जो की बिलुल सर उठाये खड़े थे, एकदम

गोर ुर लालिमा लिए हुए अपने दोनों हाथो से सहलाने दबाने शुरू कर दिए. उनपर उगे नुकीले हलके भूरे निप्पल कड़े होकर सुलग

ने लगे थे. वही ऋतू के एकदम सफ़ेद चूचे जो किसी भी प्रकार से अलका से काम न थे वह भी अकड़ने लगे. उनपे हलकी नीली रागे

साफ़ दिख रही थी.

अलका ने उन्हें मसलते हुए kaha,"Dekh मेरी जान कल को किसी अजनबी से शादी करके घर तोह बसना हे है. फिर चाहे रोना पड़ा या

हंसना तोह उस से पहले जीना कोई गुनाह तोह है नहीं.", इतना कहकर उसने ऋतू का एक पूरा चूचा चूसना शुरू कर दिए और ऋतू

भी अलका का सर सहलाने लगी..

"सही कह रही है मेरी जान तू. यहाँ सब आराम है लेकिन क्या फायदा इन सुख सुविधा का जहा अपनी मर्जी से बहार हे न जा सके."

अगले 10 मिनट तक दोनों हे एक दूसरे को ऐसे हे गरम करती रही जोकि ये महीने में 2-3 बार करती हे थी जब भी अकेली होती थी.

दोनों के तन पे सिर्फ पजामा हे था और ऐसा प्रतीत होता था के 2 अप्सराये एक दूसरी से नागिन की तरह लिपटी है. और तभी

दरवाजे पे "Thak-Thak"

"कौन है?", ऋतू ने पास राखी टीशर्ट पहनते हुए कहा और अलका को उसकी कमीज पकड़े. दोनों ने बिना ब्रा के हे वह पहन लिए.

"अरे ऋतू दरवाजा तोह खोल. मुझे बुक्स रखनी है और मई चाय बना रही हु तू दादा जी और पापा को उठा दे. 4 बज रहे है.

बाकी सब भी पूजा से आने वाले होंगे." कोमल ने इतना बोलै था के दरवाजा खुल गया. वो अंदर आई अपनी किताबे रखकर सीधा

बहार चली गई. और ये दोनों मुस्कुराती हुई अपनी अपनी ब्रा पहन कर, कपडे ठीक कर ऋतू चली गई शंकर जी को उठाने और

अलका अपने दादा जी को.

दूसरी तरफ संदीप और उसकी माता जी भी पूजा से फारिग होकर घर आ गए थे. वापिस आने में उनको कोई 3 घंटे तोह लग हे

गए थे. घर में घुसते हे रजनी जी की नजर पड़ी बीएड पर लेती हुई ज्योति पर फर्श पर रखे जला उतरने वाले ब्रश पर.

"बेटी, क्या हुआ? ये कोनसा समय है सोने का?", रजनी जी ने बड़े प्यार से ज्योति के सर पर हाथ फेरते हुए उसको उठाया.

"वो माँ मई दिवार से मकड़ी के जले निकाल रही थी के टेबल सरक गया और मई निचे गिर गई. लगता है जांघ की नस चढ़

गई कोई और पाँव भी दुःख रहा था.", ज्योति ने बड़ी सफाई से झूठ बोलै रोनी सूरत बना कर.

"क्या पड़ी थी बीटा ये सब काम तुझे करने की? इसके लिए ये संदीप और तेरे पिताजी है न. अब देख त्यौहार के दिन तुझे चोट

लग गई." उन्होंने भावुकता से उसका माथा सहलाया. "तुझे तोह बुखार भी आ गया है बीटा. संदीप, जरा दवा का डब्बा और

पानी लेकर आ यहाँ."

संदीप ने अपनी माँ के हाथ में डब्बा पकड़ाया तोह रजनी जी ने उसमे से क्रोसिन दवा निकल कर अपनी बेटी को खिलाई और पानी दिए.

"माँ मैंने दर्द की दवा खा ली थी. रात तक ठीक हो जाउंगी मई. आप चिंता मत करो और पापा को मत बताना कुछ भी." ज्योति

की बात सुनकर रजनी जी को हंसी आ गई. "चल बेटी तू आराम कर मई रसोई में जा रही हु कल के लिए पकवान और गुझिअ भी

बनानी है." एक बार फिर प्यार से हाथ फेर कर रजनी जी चल दी रसोईघर में और संदीप अपनी दीदी के पैरो की तरफ बैठ

गया. "दीदी मई वापिस आकर कर हे देता. देखो अब आप तोह बीमार पढ़ गई. कल फाग कौन खेलेगा?" उसने थोड़ा जज्बाती होकर

ये बात कही अपनी दीदी से. संदीप और ज्योति में आपस में प्यार तोह बहुत था लेकिन इन दोनों में एक सीमा थी जिसकी दोनों इज़्ज़त

करते थे.

"अरे 3-4 घंटे की तोह बात है भाई. देख फिर कल जमकर रंग लगाएंगे सबको." उसने भी प्यार से जवाब दिए

"ाचा दीदी, वह अर्जुन कब गया था घर.? वो मैंने उसको रुकने का बोलै था और मुझे हे देर हो गई."

अर्जुन का नाम सुनकर हे ज्योति की छूट कुलबुला गई. हाय रे कितना जालिम है तेरा दोस्त और उसका लुंड. तेरी बहिन को बीएड

पे लिटा कर खुद मजे कर रहा है. ज्योति ने ये मन में हे सोचा.

"भाई वो तोह 10 मिनट इंतज़ार करके हे वापिस चला गया था. मई बहार सफाई कर रही थी तब.? बड़ी सफाई से एक और झूठ

बोलै ज्योति ने और उसकी दुखती हुई छूट में खारिश शुरू हो गई.

"ाचा दीदी आप आराम करो मई रसोई में मम्मी के मदद करता हु." इतना बोलकर वो उठ गया वह से और ज्योति ने अपनी छूट को

कास कर सेहला दिए. "अगली बार तेरा पूरा मुँह खुलवाउंगी उसके लौड़े से", अपनी मुनिया को बोल हँसते हुए ज्योति ने भी पलके बंद

कर ली.

"ाचा माँ अभी तोह मई काम से जा रहा हु, देर रात तक आऊंगा तोह आपसे कल सुबह हे मिलूंगा." शंकर जी ने चाय ख़तम

करते हुए एक छोटा सा डब्बा रामेश्वर जी को दिए और पास में बैठी अपनी माँ कौशल्या जी के हाथ में एक शगुन का लिफाफा थमा

दिए. "एंड फॉर माय स्वीट लिटिल प्रिंसेस, हेरे इस ा स्माल लिटिल बर्थडे प्रेजेंट." रेखा जी के हाथ से एक चमकदार छोटा सा

डब्बा उन्होंने लेकर अलका का दिया और उसका माथा चूम लिए. "Thank's ा बंच चाचा जी." उसने भी उनके गले लगकर अपना प्यार

जताया.

"भाई कभी हमे भी ले जाया करो अपनी कासुअल मीटिंग्स में", रामेश्वर जी ने ठहाका लगते हुए कहा तोह शंकर जी अपने पिता

की बात पर मुस्कुरा दिए और जाते जाते आँखों से हे अपनी पत्नी रेखा जी को कुछ इशारा कर गए जिसे देखकर वह शर्माती हुई

वापिस रसोई की तरफ चल दी जहाँ ललिता जी और कोमल मीठी पूरियां बना रहे थे, माधुरी गुझिअ बेल रही थी.

"वैसे एक बात तोह है चाची, आप और चाचा अभी तक जवान हो. लगता नहीं कोमल और ऋतू जितने बड़े बचे होंगे आपके",

माधुरी की इस बात से जहा रसोईघर में आती हुई कौशल्या जी के साथ साथ ललिता जी और कोमल भी हंस दिए, वही रेखा जी

पेअर के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगी.

"चल इधर ला ये थाल. कुछ भी बोलती है. मार खायेगी मुझसे", उन्होंने झूठा दिखावा किआ लेकिन मुँह पे शर्म चाय थी.

"तोह सही तोह कह रही वह. गलत क्या कह दिए मेरी बची ने. अब तुम दोनों महीने में 1-2 बार हे मिलोगे तोह जवान हे रहोगे."

कौशल्या जी ने भी माहोल को थोड़ा और रंगीन कर दिए लेकिन यही उनसे गलती हो गई. रेख जी तोह कुछ बोली नहीं लेकिन कोमल

ने बड़ा खूब कहा, "दादी तभी मई कहु के आप तोह खुद अभी माँ की बड़ी बहिन लगती हो. देखो तोह सर के बाल भी अब तक

नहीं पके आपके." और माधुरी की तरफ आँख मार दी. ऐसे हे ये लोग हसी ख़ुशी काम करते रहे. कौशल्या जी की एक बात

तोह तारीफ के काबिल थी के वह अपनी bahu-betion में फरक नहीं करती थी. और हंसी मजाक भी खूब कर लेती थी gahe-bagahe.

रामेश्वर जी भी अपनी बीवी के ऊपर हुए इस तारीफ युक्त हमले को सुनकर हँसते हुए वह से निकल चले अपने बगीचे की तरफ.
 
अपडेट 11

भाई, ी लव यू



शाम गहरा चुकी थी और संजीव कार चलता हुआ अपने पिता राजकुमार जी के साथ घर आ रहा था बाजार से सामान खरीद कर.

"पापा, मई सोच रहा था इस बार चुटकी को सनी दिलवा देते है. वैसे भी कल जन्मदिन है उसका. कॉलेज भी जाने में सहूलियत

होगी उसको और ऋतू को.", उसने ये बात बड़े सोच विचार कर कही थी. राजकुमार जी भी अपने बेटे को पूरी इज़्ज़त देते थे तोह उन्होंने

सिर्फ इतना kaha,"beta जैसा तुझे ठीक लगे. लेकिन उन्हें चलनी नहीं आती और एक बार माँ से भी बात कर लेना." राजकुमार जी

का इशारा कौशल्या देवी से था.

"है दादी से मई रात को हे बात कर लूंगा. आपसे पूछना ज्यादा जरुरी था क्योंकि दादी जी मान जाएँगी. वैसे भी कभी रिक्शा

तोह कभी आप और मई उन्हें लेके जाते है. इस से उनका टाइम भी बचेगा और निर्भर भी नहीं रहेंगी."

"ठीक कहा बीटा. वैसे भी अगले महीने मेरा तबादला अगले शहर हो रहा है तोह यहाँ सिर्फ तू हे रह जायेगा मई तोह सिर्फ सप्ताह

के अंत हे आया करूँगा." राजकुमार जी को बात बिलुल सही लगी अपने बेटे के.

रास्ते में उन्होंने कार को हीरालाल जोहरी की दूकान पर रुकवाया और वह से अपना दिए हुआ आर्डर उठा लिए. दोनों वापिस घर चल दिए

जहा सभी इन्तजार कर रहे थे. जैसे हे कार घर में दाखिल हुई संजीव सामान निकलने लगा पिछली सीट से. अलका और कोमल ने

भी मदद की उनकी. मिठाई के डब्बे, rang-gulal, fal-fool, कपडे थे जो उन्होंने खरीदे थे.

"छोटा कहा है गुड़िया?" संजीव जी ने ये बात अलका को देख कर कही

"वो तोह सो रहा होगा अपने कमरे में शायद. नहीं तोह आपकी आवाज सबसे पहले उसको हे सुनाई देती है भैया." बहिन की बात सुनकर

संजीव भी मुस्कुरा दिए और बोलै, "मई और कोमल रखते है सामान को, तू जाकर उसको उठाकर निचे ले आ." इतना बोलकर वो बैठक

की तरफ सामान लेकर चल दिए. अर्जुन को उठाने को सोचकर अलका के मैं में भी फुलझड़ी सी जल गई और वो कुलांचे मारती सी

बहार वाली सीढ़ियों से हे दौड़ गई दूसरी मंजिल पर. जैसे हे वो अर्जुनके कमरे में दाखिल हुई तोह देखा साहब बाजु के बल सोये पड़े

है. चौड़े सीने पे कासी हुई सफ़ेद बनियान और निचे सफ़ेद पजामा. और जब नजर रुकी बीच वाली भाग पर तोह हाय सी चा गई

अलका के चेहरे पर. तम्बू सा बना था वह. हिम्मत कर वो उसके बिस्तर पर जा बैठी और गाल सहलाते हुए उसका नाम पुकार के लगी

उठाने. "Arjun-Arjun, उठ न. देख कितना टाइम हो आया है. 7 बज गए है भाई और सब बुला रहे है निचे."

थोड़ी से पलके उठा अर्जुन ने जब अलका को देखा तोह गहराई से उसको देखते हुए खुद के ऊपर लिटा लिए बाँहों में भर के.

"आप भी आ जाओ न यहाँ मेरे पास." बंद आँखों से हे उसने अलका के कान में ये सरगोशी की तोह अलका ने खुद को ढीला छोड़ दिए उसकी

बाहों में. अर्जुन ने होल से अपने गाल अलका के गाल से रगड़ दिए. और अपनी छाती पर उसके भारी उरोजों को महसूस करने लगा.

"छोड़ दे न भाई देख कोई आ जायेगा." अलका ने भी ये बात बिना कोई छूटने के प्रयास से कही. उसको भी अपना नाजुक बदन अर्जुन की

बाहों में जकड़ा मजा दे रहा था.

"एक शर्त पर. अगर रात 12 बजे आप मेरा प्रेजेंट पहनकर मेरे रूम में दिखने आओगी तभी." अर्जुन की बात सुनकर अलका का rom-rom

खिल उठा लेकिन फिर भी उसने दिखावा किआ, "इतनी रात को मई तेरे कमरे में कैसे आउंगी भाई.? तू खुद हे सोच न और ऊपर से साथ

वाला कमरा संजीव भैया का है. उन्होंने देखा तोह?"

"मई कुछ नहीं जानता दीदी, मुझे तोह बस आपको उन्ही कपड़ो में सबसे पहले देखना है. और मई हे सबसे पहले विश करूँगा." अर्जुन ने

अब खड़े होते हुए ये बात कही. और फिर अलका के गाल को चूमकर सीधा बाथरूम में घुस गया. अलका वही कड़ी सोचती रही. 5 मिनट

बाद दोनों निचे चल दिए.

"आजा भाई यहाँ बैठ.", कोमल ने कुर्सी आगे करते हुए अर्जुन को कहा. दोनों की नजर 4 हुई तोह दोनों खिल उठे. अर्जुन वही बैठ गया

"मेरे लिए क्या लेके आये भैया आप?" अर्जुन ने संजीव भैया से पहली बात यही कही तोह सभी उसकी बात सुनकर हंसने लगे

"तेरे लिए तोह कुछ मिला हे नहीं भाई. और पापा को घर जल्दी आना था तोह वैसे भी कुछ खास ले नहीं पाए." संजीव ने जवाब दिए

तोह अर्जुन को मुँह लटक गया. फिर भी उसने मूड सही किआ और बोलै, "तोह ठीक है न. हम अभी चलते है और ले आते है मार्किट से."

"कोई कही नहीं जायेगा. जिसने जो भी लेना हो परसो ले लेना." ये आवाज थी रामेश्वर जी की. ये सुनकर तोह अर्जुन बिलकुल हे उदास हो गया

"सब चुप करो. बहुत हुआ. मेरे बचे के लिए तोह मई ऐसे त्यौहार रोज मनाऊंगी." कौशलया जी इतना बोलकर अर्जुन को दुलारने लगी और

अपने हाथ से 5-6 डब्बे उसके सामने रख दिए. "ये ले बचे ये सब तेरे लिए है. तेरी पसंद की सफ़ेद शर्ट, जीन्स, जूते, पर्स."

"दादी आप जैसा कोई नहीं." इतना बोलकर अर्जुन ने अपनी दादी के गाल चूम लिए. फिर रामेश्वर जी ने भी हँसते हुए सभी बचो को

उनके उपहार दिए और कौशल्या जी ने अपनी बहुओं को.

"वो दादी जी एक बात करनी थी आपसे. अगर इजाजत हो तोह.?" संजीव ने जब ये बात कही तोह वह रामेश्वर जी, अलका, ऋतू और अर्जुन

हे थे.

"बोल मेरे बचे. तुझे कबसे मुझसे पूछने की जरुरत ाँ पड़ी?", स्नेह भाव से कौशल्या जी ने ये बात तोह कही लेकिन उन्हें संदेह

हुआ की शायद कुछ ज्यादा जरुरी बात है.

"वो मई दादी जी ये कह रहा था के अलका और ऋतू कॉलेज जाती है और दोनों समझदार भी hai."Jhijakte हुए अपनी बात जारी राखी

"तोह मई सोच रहा था के उन दोनों के लिए एक सनी ले दू. इस से उनको किसी पे निर्भर भी होना नहीं पड़ेगा और कॉलेज आने जाने का

टाइम भी बचेगा. पापा का भी तबादला हो रहा है अगले महीने और तब तक इनके एक्साम्स भी ख़तम हो जायेंगे. छुट्टिओं में सीख भी

लेंगी और नै क्लास में दोनों उसी पे साथ चली जाया करेंगी." इतना कहकर संजीव चुप हो गया और सब तरफ शांति च गई.

"है तोह बात बिलकुल ठीक है तेरी बीटा. लेकिन.." कौशल्या जी ने अनमने ढंग से बात शुरू करि थी की अलका ने अपने दादा जी की

तरफ गुहार लगाईं.

"जब बात ठीक है तोह थानेदारनी जी इजाजत में इतना टाइम क्यों? और वैसे भी मेरी बेटियां कोई बेटो से काम है क्या? तू बोल संजू बीटा

कितने पैसे लगेंगे, मई परसो देता हु बैंक से निकलवा कर." रामेश्वर जी ने दो टूक बात कही

"वो दादा जी मई पहले हे बुकिंग करवा चूका हु गुड़िया के जन्मदिन का यही तोहफा मुझे ठीक लगा था. आपकी और दादीजी की इजाजत

के बिना तोह मई ये कर नहीं सकता था तोह इसलिए आपकी आज्ञा हे चाहिए. परसो आ जायगी घर." संजीव ने अभी भी गंभीरता से

बात कही. "ठीक बात है बीटा. लेकिन ज्यादा खुश होने की जरुरत नहीं है. कॉलेज से आने के बाद चाबी रोज मेरे कमरे में होनी

चाहिए." दादी ने इतना हे बोलै था के अलका जा चिपकी अपनी दादी से. ये देख रामेश्वर जी को बड़ी ख़ुशी हुई की उनके परिवार में आज

भी सभी निर्णय बड़ो की मर्जी और सलाह से होते है. अपनी जगह से उठते हुए उन्होंने एक बार संजीव क सर पर प्यार से हाथ फेरा

और कौशल्या जी के साथ अंदर जाने लगे. तभी उन्हें अर्जुन मुँह लटकाये बैठा दिखा.. "अब तुझे क्या हुआ जो ऐसे मुँह बनाये बैठा

है?" रामेश्वर जी ने उस से पुछा तोह जवाब कौशल्या जी ने दिए, "इसको कार सीखनी है और मैंने मन कर दिए है."

"चल बीटा कभी कभी अपनी दादी की एक आधी बात मान लिए कर. गर्मी की छुट्टिओं में तुझे कार सीखा देंगे लेकिन तुझे तेरी कार

कॉलेज के बाद हे मिलेगी." इतना बोलकर दोनों चले गए और यहाँ संजीव अपनी कुर्सी से उठा और अर्जुन को इशारा कर बहार चल दिए.

"है भैया. अब बताओ" बहार आकर अर्जुन ने संजीव भैया से पुछा

"छोटे मैंने पापा को बोल दिए है के दोस्त के घर जा रहा हु. तू घर का ध्यान रखिओ मेरे पीछे से.", संजीव ने कार की चाबी जेब

से निकलते हुए कहा.

"वो तोह ठीक है भैया आप आओगे कब वापिस?"

"भाई मई सुबह 7 बजे तक आ जाऊंगा."

"ठीक है भैया." इतना बोलकर संजीव भैया कार लेकर निकल गया और अर्जुन ने मैं गेट ढाल दिए.

अंदर आया तोह अब माँ और तै जी खाना बना रहे थे और कोमल अपने dada-dadi को उनके कमरे में हे खाना दे रही थी.

"तेरे पापा नजर नहीं आ रहे ऋतू?", रजाकुमार जी ने ये बात पूछी ऋतू से जो वही बैठी थी.

"पापा देर से आएंगे ताऊजी. वो मल्होत्रा अंकल के साथ गुलाटी अंकल के घर गए है. और बोलकर गए थे के सुबह आपको उनके साथ

कही जाना है." अपनी भतीजी की बात सुनकर उनके मुँह पर एक छोटी सी मुस्कान आ गई. "ठीक है."

अब अलका, कोमल और माधुरी खाना खा रहे थे और ऋतू खाना परोस रही थी. अर्जुन भी आकर बैठ फ्रेश होकर वही.

"मालकिन इस गरीब को रोटी मिलेगी क्या आज?", अर्जुन ने ये बात ऋतू को छेड़ते हुए कही थी.

"है. लेकिन हमारे घर में रिवाज है के नौकर मालिक के बाद कहते है." ऋतू ने भी अर्जुन को उसके हे लहजे में जवाब दिए ये देख

अलका मुस्कुरा रही थी.

"दीदी आप खाना खाओ नहीं तोह फिर खांसी आ जाएगी." अर्जुन ने अब अलका को छेड़ा तोह ऋतू और अलका दोनों हे हंसने लगी

"चाची आज मुन्ना दूध हे पियेगा." जब ये बात अलका ने कही तोह चारो बहने खिलखिलकर हांसे लग पड़ी और अर्जुन ने तल्खी से

अलका को देखा लेकिन कुछ कहा नहीं. ऋतू ने भी उसकी प्लेट लगा दी थी लेकिन अर्जुन ने खाना शुरू नहीं किआ.

"अरे मेरा प्यारा भाई. चल गुस्सा नहीं करते देख खाना ठंडा हो रहा है na."Maadhuri ने ये बात पीछे से अर्जुन के गले में हाथ

डालते हुए कही तोह अर्जुन के चेहरे पे वापिस चमक आ गई और वह खाने लगा. अलका ने देखा तू उसको उसकी गलती महसूस हुई लेकिन

वो चुपचाप खाना बीच में छोड़ अपने कमरे में चली गई.

"ाचा सब टाइम से सो जाना अब ठीक है. सुबह बहुत काम है. और माधुरी और कोमल अभी तुम दोनों एक बार नाहा लो फिर माँ जी के

साथ पूजा करनी है 10 बजे.", ललिता जी ने ये बात सबसे कही थी.

अर्जुन उठा और चल दिए ऊपर अपने कमरे में. समय था के काट हे नहीं रहा था. वापिस उठकर उसने टेलीविज़न चालू किआ और हाथ में

तकिया लेकर बैठ गया. ज़ी सिनेमा चैनल पर एक डरावनी फिल्म आ रही थी "रात", वो बस वही देखने लगा. थोड़ी देर में हे ऋतू

और अलका ऊपर आ गए कपडे बदल कर. अलका का चेहरा अभी उतना नहीं चमक रहा था लेकिन वो ठीक लगने की कोशिस कर रही थी.

"क्या देख रहा है तू?" ऋतू ने हक़ जमाते हु ये बात कही अर्जुन से और बैठ गई उसके साथ. ये पहली बार था के वह बड़े सोफे पे

ऐसे बैठी थी.

"तू वह क्यों बैठी है? चल इधर आ देख कितनी जगह है यहाँ." उसने अलका को भी आर्डर दिए तोह वह कुछ सेहमी हुई से ऋतू के साथ

बैठ गई. ऋतू का ध्यान फिल्म में था, अलका चुपके चुपके टेलीविज़न और अर्जुन को देखे जा रही थी. 10 मिनट बाद ब्रेक हुआ तोह ऋतू

कड़ी हुई. "यार फिल्म मत बदलना मई बस अभी आई पानी लेकर." इतना बोलकर वह चली गई और पीछे रह गए अर्जुन और अलका.

"I'm सॉरी अर्जुन." जैसे हे अर्जुन को ये आवाज सुनाई दी तोह उसकी नज़र गई अलका पर जिसकी आँखे भीगी हुई थी. वह एक झटके में

खड़ा हुआ और अपने दोनों हाथो से अलका का चेहरा थामते हुआ बोलै, "दीदी, ये क्या है? किस बात की सॉरी? आप रो क्यों रही हो?" उसका

दिल बैठ गया अपनी बहिन की आँखों में आंसू देख कर. और उसने अलका को अपने से चिपका लिए.

"वो मैंने आ तुझसे गलत तरह से बात की थी इसलिए. जब तुझे बुरा लगा तोह मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ. आईएम सॉरी अर्जुन.",

इतना बोलकर वो फफक पड़ी. "श. चुप हो जाओ दीदी. वो तोह देखो रोज का मजाक हे था न. अब आपकी आँखों में आंसू देख कर मेरे

दिल में दर्द हो रहा है. प्लीज चुप हो जाओ." और उसने एक बार अलका के गाल चूमे और सर सहलाया. सीढ़ियों पर कदमो की आवाज

से अलका सीधा बाथरूम में चली गई. मुँह साफ़ करने और अर्जुन वापिस वही बैठ गया. "कितनी भोली है अलका दीदी" उसने मैं में

सोचा.

"ये महारानी कहा चली गई अब.?" ऋतू ने आते हे अर्जुन से पुछा.

"वो दीदी वाशरूम गई है."

इतने में हे अलका बहार आ गई. चेहरा पानी से धोया हुआ था और कुछ बूंदे अभी भी थोड़ी से निचे टपक रही थी तशिरे पर.

"क्या हुआ जो तुझे मुँह धोना पड़ा?" ऋतू ने मजाक किआ तोह अलका ने भी हँसते हुए जवाब दिए, "वो तूने दिन में गाल छु लिए थे

न तोह अभी भी जलन हो रही थी." और वो दोनों हंस पड़ी. अर्जुन को इल्म नहीं था के इन दोनों ने दिन में क्या किआ था.

तीनो 11 बजे तक फिल्म देखते रहे. बीच बीच में अलका ऋतू का हाथ दबा देती थी जब भी कोई डरावना सन आता था. ऐसे हे

जब फिल्म ख़तम हुई तोह वह दोनों चल दी अपने कमरे की और. अर्जुन ने भी सोचा की एक चक्कर निचे लगा आता हु.

"आज तोह मुझे और कोमल को निचे हे सोना है दादी जी के पास. वो पूजा के बाद फिर मई कल तेरे साथ छत्त पर सोऊंगी.", ये बात

माधुरी ने अर्जुन के कान में कही जब वह रसोई में अकेला खड़ा पानी पी रहा था. "ठीक है दीदी." इतना बोलकर उसने जल्दी से एक

छोटा सा चुम्मा ले लिए माधुरी के गाल का.

"बदमाश." और मुस्कुराती हुई वह वह से बैठक की तरफ चल दी जहा पूजा हो रही थी. अर्जुन भी यही घूमता फिरता तीसरी मंजिल

पर चला गया और बैठ गया खुले आसमान के निचे. तारे टिमटिमा रहे थे और बड़ी ाची हवा चल रही थी. वो कितनी हे देर

ऐसा बैठा रहा और निहारता रहा neele-kaale आकाश को. उसका ध्यान टूटा जब अलका की आवाज सुनाई दी. "तोह जनाब यहाँ बैठे है

और हमने सारा घर देख लिया" बड़ी चंचलता से वो अर्जुन की तरफ चली आई. अब अर्जुन का ध्यान गया अपनी दीदी की तरफ. बिलुल

चुस्त जीन्स और टाइट टॉप में वह कमाल लग रही थी. उसको कपड़ो का रंग नहीं दिख रहा था.

"चलो जल्दी निचे चलो." अर्जुन ने अलका का हाथ पकड़ा और उसको खींचता हुआ दूसरी मंजिल वाले ड्राइंग रूम में आ गया. लाइट

जलाई तोह उसके होश हे उड़द गए. वो हल्का गुलाबी रंग का टॉप ऐसा लग रहा था जैसे अलका के जिस्म का हे हिस्सा हो. दोनों का रंग

एक सा था. और चुस्त नीली जीन्स ऐसे चिपकी थी जैसे खाल के ऊपर कोई रंग किआ हुआ हो. पिंडलिओं को आकर, जाँघे, कूल्हे सब

उसकी आँखों के सामने हे हो जैसे. अर्जुन को अपनी तरफ यु देखते देख अलका की नजरे फर्श में गाड़ने लगी और चेहरा लाल हो चूका

था. अर्जुन ने जैसे हे अपने कदम अलका दीदी की तरफ किये दोनों के दिल की धड़कन बढ़ गई. उसने बड़े आराम से एक हाथ से अलका की

थोड़ी ऊपर करि और दूसरे हाथ से उसकी कमर को लपेट लिए. "ा वैरी हैप्पी बर्थडे तो थे मोस्ट ब्यूटीफुल गर्ल ों एअर्थ." इतना बोलकर

अर्जुन ने अपने होंठ अलका के होंठो से जोड़ दिए. अलका इस सबके लिए जैसे अंदर से हे तैयार थी. उसने भी चुम्बन का जवाब एक

चुम्बन से दिए." थैंक यू सो मच फॉर मेकिंग आईटी थिस स्पेशल." और दोनों ऐसे हे चिपके खड़े रहे एक दूसरे के साथ.

"अब मई चलती हु निचे. मुझे सोना है भाई." उसने ये बात ऐसे कही जैसे सिर्फ चुप्पी तोडना चाहती हो जो कमरे में फैली थी.

"कही नहीं जा रही हो आप अभी. मेरा रेतुर्न गिफ्ट है के आप थोड़ी देर मेरे पास रहोगी." इतना बोलकर उसने अलका दीदी को अपनी

बाँहों में उठा लिए और अपने कमरे में ले आया. यहाँ सिंगल बीएड हे था. और दोनों किसी चुम्बक की तरह चिपक गए एक दूसरे से.

"ी लव यू अर्जुन.", अलका ने ये बात अर्जुन का चेहरा अपने दोनों हाथो में पकड़ते हुए कही. और ये सुनते हे अर्जुन ने दीदी को

अपने ऊपर लिटा लिए और फिर से अपने होंठ दीदी के होंठो से मिला दिए. बारी बारी से दोनों लबो को चूस रहे थे और अब हालत ये

थी की अलका की लार अर्जुन के मुँह में जा रही थी. होंठ बुरी तरह से भीग चुके थे. अलका की जिंदगी में ये पहला पुरुष स्पर्श

था. और उसको एहसास हुआ के इस चुम्बन में और ऋतू के साथ किये हुए में कितना फरक था. एक पुरुष का स्पर्श हे कही ज्यादा सुखद

था ऋतू के साथ की हुई छेड़छाड़ से.

"आपके वह पर टिल है.?" अर्जुन ने ये बात जब अलका से कही तोह वह और जोर से लिपट गई शर्माती हुई. उसके टॉप के बड़े गले से

अर्जुन ने आधा मंजर देख लिए था.

"बताओ न"

"अब देख लिए तोह क्यों पूछ रहा है." शरमाते हुए अलका ने कहा.

"देखा कहा है सिर्फ झलक हे तोह मिली थी. प्लीज देखने दो न." अर्जुन ने प्राथना की तोह अलका शरमाते हुए हंस दी.

"लाइट बंद कर दो अर्जुन."

"फिर मई इस खूसूरत पारी का देदार कैसे करूँगा." कहते हे अर्जुन ने अपनी दीदी को अपने निचे घुआं लिए.

अब वो धीरे धीरे टॉप को ऊपर उठा रहा था और अलका ने अपना मुँह तकिये में छुपा लिए था. जैसे हे टॉप ब्रा से ऊपर हुआ अर्जुन

कुछ पल के लिए वही रुक गया. अलका का पेट मखमल की तरह मुलायम और सपाट था. नाभि थोड़ी हे गहरी थी और उसका बेजोड़

रंग. अर्जुन ने ब्रा के निचले हिस्से पर अपनी जीभ भिड़ा दी. उसके ऐसा करते हे अलका के एक तेज सिसकी निकल gai,'aah"

अर्जुन वैसे हे झुका रहा और उसने ब्रा के कप से दाया दूध पकड़ लिए. "मत कर भाई मुझे कुछ हो रहा है." अलका ने धीमे

से ये बात बोली लेकिन इसमें इंकार न था. और अर्जुन ने उसका पूरा मोटा ढूढ़ उस ब्रा के कप से बहार निकल लिए. गोल गोर तने

हुए चूचे पर किशमिश के आकर का gulabi-bhoora निप्पल. और उसके थोड़ी ऊपर एक मूंग दाल जितना कला टिल. अर्जुन ने अपने होंठ

उस टिल के ऊपर रख दिए. अलका को ऐसे लगा जैसे अर्जुन ने वह से उसकी आत्मा चूस ली हो. उसका धड़ बिस्तर से ऊपर उठ गया और

तभी अर्जुन ने उसका वो गुलाबी निप्पल अपने मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिए.

"आह भाई. क्या जादू कर रहा है तू. देख मई मर जाउंगी इस आनंद से मत कर." अब अलका तड़पने लगी थी लेकिन अर्जुन यही न रुका

उसका वो दूध चूसते हुए दूसरे हाथ से उसने अलका का दूसरा चूचा भी बहार निकल लिए. ब्रा के कप निचे लटक रहे थे और वो एक

दूध को दबा रहा था और एक को चूस रहा था. बारी बारी से चूस दबा कर उसने अलका के दोनों बड़े चूचे लाल कर दिए थी

"दीदी आपको पता है के आपके ये अनार मुझे सोने नहीं देते. दिल करता है बस इनको चूसता दबाता राहु." अर्जुन ने अपने आप को

पूरी तरह से अलका के ऊपर बिछते हुए कहा. उसका लुंड अब अलका की जांघो को रगड़ रहा था.

"भाई क्या तू ऐसे हे मुझे साड़ी ज़िन्दगी प्यार करेगा.?" उसने अर्जुन का मुँह ऊपर करते हुए कहा.

"मरते डैम तक." इतना बोलकर दोनों एक दूसरे की जीब से जीभ लड़ने लगे. कभी अर्जुन अलका की जीब अपने मुँह में लेके चूसता तोह

कभी अलका. अलका की छूट ने सिर्फ चूचे चूसै से हे पानी बहा दिए था. जैसे हे उसका जिस्म अकड़ा बहार कार का हॉर्न सुनाई दिए.

अलका और अर्जुन दोनों हे खड़े हो गए और अर्जुन सामने वाली सीढ़ीओं से निचे चल दिए गेट खोलने. उसके पिता शंकर जी वापिस

आ गए थे.

"यू स्टिल अवेक?"

"यस डैड. एक्चुअली मोस्ट मेंबर्स अरे अवेक. सम ऋतुअल्स."

"Okay, I'm गोइंग तो माय रूम. जस्ट पास थिस मैसेज तो योर मदर." कार कड़ी करके शंकर जी अंदर चले गए और अर्जुन ने

गेट पे टाला लगा लिए अंदर से.

"माँ पापा आ गए है." पूजा बस अभी ख़तम हुई थी तोह सब लोग खड़े हो गए. ललिता जी रेखा जी अपने कमरे की तरफ चल दिए

और कोमल और माधुरी अपनी दादी के साथ. अर्जुन जब ऊपर आया तोह वह कोई नहीं था. लेकिन वो खुश था क्योंकि बिस्तर पर एक

कागज के टुकड़े पर लिखा था "ी लव यू".
 
अपडेट 12

होली के दिन दिल जुड़ जाते है


रात के तक़रीबन 2 बजे थे और कौशल्या जी के कमरे में सोइ हुई माधुरी की नींद प्यास की वजह से खुल गई थी. कमरे में

हलकी रौशनी में उसने देखा के पानी बिलकुल विपरीत दिशा में रखा था और इस बीच दादी और कोमल सो रहे थे. माधुरी बिना

शोर किये रसोईघर की तरफ चल दी. फ्रिज से बोतल निकल के वही खड़े होकर पानी पिया और पेशाब करने के लिए आँगन

में बने बाथरूम की और चल दी. माधुरी नंगे पेअर हे थी तोह उसके चलने की कोई अव्वज नहीं थी. घर में घुप शान्ति छायी

हुई थी. माधुरी ने कमोड पे बैठने से पहले पजामा सरकाया और बैठ गई. इतनी शान्ति में उसके पेशाब की सीटी सी आवाज

मधुर शोर मचा रही थी. निपटने के बाद बहार निकल कर जैसे हे माधुरी नल की तरफ बढ़ी उसके कानो में चूड़ियों के

खनकने की आवाज आई. ये बहुत हलकी हे आवाज थी लेकिन इतनी शान्ति थी की सुनाई दे हे गई. माधुरी ने ध्यान दिए तोह

ये चाची के कमरे से आ रही थी जहा अभी भी जीरो बल्ब की रौशनी हो रही थी. धीमे कदमो से वह उत्सुकता से उस तरफ

चल दी. दिवार पे लगी हुई बड़ी खिड़की के पल्ले थोड़े से खुले हुए थे तोह माधुरी ने अपनी नज़र वही गाढ़ा दी. उसकी नजर

जैसे हे अंदर देखने की अभ्यस्त हुई तोह उसका गाला हे खुश्क हो गया. रेखा चची जो हमेशा साड़ी में लिपटी रहती थी और

आधे से ज्यादा समय सर पे भी पल्लू रखती थी माधुरी के नजरो से कुछ हे दूरी पे अल्फ नंगी पड़ी थी. उनके बड़े बड़े

अमृत कलश किसी पेंडुलम से हिल रहे थे. उसको चाचा का चेहरा और छाती हे नज़र आ रही थी जो बड़ी बुरी तरह से

चची की टंगे ऊपर उठाये मचिनी अंदाज में धक्के पेल रहे the.Thapp-Thapp, Fuch-Fuch की आवाज से कमरा गूँज रहा था

उनका हाथ चाची के एक बड़े उबार को बेदर्दी से निचोड़

रहा था लेकिन चची के चेहरे पे मजे की लहर दिख रही थी. उन्स्की सिसकारियां हलकी थी लेकिन वो लगातार सिसक रही थी.

कुछ हे देर में चाचा ने उन्हें घुटनो के भार कर दिए. पहली बार माधुरी को चाचा का हथियार नज़र आया जो तक़रीबन 6-7

इंच लम्बा था और चची की छूट के रास से भीगा चमक रहा था.

"अब दाल भी दो जी." बड़ी धीमी सी आवाज सुनाई दी चची की फिर चाचा ने हँसते हुए अपना लुंड छूट पर सेट करके एक करारा

धक्का लगा दिए और पूरा लुंड जड़ तक अंदर घुस चूका था. "आई माँ. है ऐसे हे करते रहो." और चची की बात मानते हुए

चाचा लग गए उनकी छूट ढीली करने. उनके बड़े चूतड़ हर धक्के के साथ हिल रहे थे और बड़े बड़े चूचे हवा में झूल

रहे थे. कुछ देर बाद हे चची का सर बिस्टेर पर टिक चूका था और उनकी सांसें भी माधुरी को सुनाई दे रही थी.

"तुम्हारा तोह हो गया जान अब जरा इसका भी ख्याल करो." चाचा ने अपना लुंड चची के मुँह के सामने कर दिए ये देख माधुरी

चकित रह गई के ये क्या हो रहा है

"इधर लाओ जी नहीं तोह फिर तीसरी बार मेरी जान निकल डोज." इतना बोल मुस्कुराती हुई रेखा चची ने चाचा का लुंड हाथ में

पकड़ लिए और अगले हे पल आधे से ज्यादा उनके लिपस्टिक से सजे रसीले होंठो में घुस चूका था. और चची मजे से अपना मुँह

उसपे चला रही थी. ऐसा नजारा माधुरी ने अपने 25 साल के जीवन में पहली बार देखा था और वह भी अपनी चची को करते.

इधर चाचा की आँखें मजे से बंद हुई पड़ी थी, ये देख माधुरी सोच रही थी के उसकी चाची कितनी शरीफ और संस्कारी

दिखती है लेकिन चाचा के साथ तोह खुल कर मजे उदा रही है.

"मेरा होने वाला है जान." चाचा की आवाज से उसकी तन्द्रा टूटी तोह देखा के चाची अभी भी उनका लुंड चूसे जा रही है.

और फिर जब उसने देखा के अब चची ने लुंड निकल दिए है तोह नजर आया के कुछ सफ़ेद बूंदे उनके होंठो पर लगी है.

"हे भगवन ये दोनों तोह कॉलेज के जोड़ो को भी पीछे छोड़ दे." माधुरी अपनी चाची का अंदाज देख प्रभावित हो गई थी.

तभी तोह चाचा उनके आगे पीछे घुमते रहते है जब भी घर होते है. वो दोनों अब हलके कपडे पहन चुके थे. माधुरी भी

चुपके से खिसक ली वह से. उसकी छूट ने ाचा खासा पानी बहा दिया था ये फिल्म देख कर. वापिस कमरे में आकर पता नहीं

वह कितनी देर करवाते बदलती रही फिर थोड़ी हे देर में उसकी भी आँख लग गई.

अर्जुन 4:30 बजे अपना ट्रैक पेण्ट पहन कर निचे आया था तोह देखा उसके पिता जी भी स्पोर्ट्स शूज पहनी शरीर गरम कर रहे

थे. "गुड मॉर्निंग बीटा. ी वास् एक्सपेक्टिंग यू ात थिस टाइम एंड सी यू अरे राइट ों टाइम." शंकर जी ने कहा तोह अर्जुन ने भी

प्रतिउत्तर दिए." गुड मॉर्निंग डैड. बूत ी वास् नॉट एक्सपेक्टिंग यू ात थिस अर्ली टाइम. बूत ग्लैड तहत यू स्टिल मेन्टेन योर हेल्थ

रूटीन." और मैं में सोचने लगा के अगर आज लेट हो जाता तोह अपने पिता जी नजर न मिला पता और दादा जी से भी पिताजी सवाल

करते.

"के ों. Let's जो." इतना बोलकर शंकर जी ने हलके कदमो से दौड़ना शुरू कर दिए और अर्जुन भी उनका अनुसरण करने लगा. ऐसे

हे 15 मिनट दौड़ने के बाद उसके पिताजी पार्क में चले गए और अर्जुन रोज की तरह अपने रस्ते हो लिए. शंकर जी पार्क में हलकी

चहल कदमी करते हुए घास पे बैठ योग करने लगे और फिर नंगे पाँव घास पर टहलने लगे. अर्जुन ने जब देखा के आज वो

5 कम आ चूका है तोह वापिस चल दिए दौड़ लगता हुआ घर पे. मौसम में अभी भी हलकी ठंडक थी लेकिन अब उजाल हो रहा था.

5:30 बजे जैसे हे वह घर के अंदर आया तोह सामने अपने पिताजी को दादा जी के साथ बैठे पाया. दोनों बातें कर रहे थे की

दादी चाय की ट्रे लेकर आ गई. "आ गया मेरा शेर." दादाजी ने अर्जुन को जूते खोलते देखा तोह पुकारा.

"है दादाजी. मौसम ाचा था तोह आज पता हे नहीं चला."

"ाचा अब तू यहाँ बैठ मैं तेरे लिए दूध लेके आई." इतना बोलकर दादीजी वापिस चली गई और रामेश्वर जी अपने बेटे से बातें

करते हुए हे अर्जुन के पाँव की उँगलियों पर सरसो के तेल से मालिश करने लगे.

(अब से शंकर जी और अर्जुन की वार्तालाप भी हिंदी में हे दूंगा)

"आप तोह इसको खिलाडी हे बनाने में लगे हो पापा. इतनी ट्रेनिंग और सेवा से कल को अगर ये कही आगे निकल गया तोह?", शंकर जी

ने अपने पिता जी से जरा हलके से ये बात कही.

"बीटा बड़े सांड को पालने वाला उसको एक पतली सी रस्सी से भी बांध हे लेता है." इतना बोलकर रामेश्वर जी ने अपने बेटे की तरफ

देखा तोह अब शंकर जी शांत मुद्रा से मुस्कुरा रहे थे.

"किस सांड की बात हो रही है दादा जी?", अर्जुन ने भोलेपन से पुछा तोह उसके दादाजी ने भी हँसके कहा, "बीटा तेरे पापा की हे

बात कर रहा हु. ये शादी से पहले सांड जैसा हे था और फिर तेरी माँ के प्यार से देख अब शांत बैल बन गया है." इस बात

पर तीनो हे हंस दिए. शंकर जी को आज बड़ा ाचा महसूस हो रहा था. दादी जी ने दूध का लौटा अर्जुन को दिए और तौलिया

कपडे शंकर जी. "जा बीटा अब नाहा ले. फिर तेरा क्या भरोसा तू कहा निकल जाये." अपनी माँ को एक बार फिर गले से लगा के अर्जुन

के पिता जी चल दिए बाथरूम की तरफ और अर्जुन दूध ख़तम कर पिछले आँगन में चल दिए जहा पर उसकी माँ रेखा झाड़ू दे

रही थी. आ गया मेरा बचा", इतना कह उन्होंने अर्जुन का माथा चूमा और गले लगाया. अभी तक माधुरी, कोमल और ऋतू सो रहे

थे लेकिन अलका अपनी दादी जी के पास पूजा में बैठी थी, उसका जन्मदिन जो था.

"ाचा बीटा तेरी ताई जी ऊपर सफाई कर रही है और मई अब रसोईघर में जा रही हु. तू जाकर ऋतू और कोमल को उठा दे. फिर

नहाने चले जाना." और इतना बोलकर वो रसोईघर में चली गई. अर्जुन भी अपनी बड़ी दीदी के कमरे की तरफ चल दिए. उसने एक

बार दरवज्जे पर थपथपाया लेकिन कोई जवाब नहीं आया. दरवाजा वैसे हे भिड़ा था तोह उसने धकेल दिए और अंदर आ गया.

कोमल ने छाती तक एक चद्दर ले राखी थी और वो सीढ़ी सो रही थी लेकिन जब उसकी नजर ऋतू दीदी पर गई तोह उसके कदम

उनकी तरफ खुद हे चल दिए. घुटने तक पजामा चढ़ा हुआ था, गोरी पिण्डलिया नुमाया हो रही थी और फिर पूरा पेट कमीज से

बहार था. इतनी खूबसूरत और गोरी पतली कमर, और चाँद से चेहरे पे आई हुई बालो की लेट. खूबसूरती का मुजस्समा सी

दिख रही थी. ध्यान से देखा तोह ऋतू के चूचे कमीज के निचे आज़ाद दिख रहे थे. अर्जुन होश में आया और ऋतू के पास जा

बैठा. "दीदी उठिये. आज फाग है और अलका दीदी का जन्मदिन. उठिये न दीदी." उसने अपनी बहिन के गाल को एक बार हलके से छुआ

और फिर ब्याह पे हलके से थपथपाया. ऋतू उनींदी से अपने आस पास देखने लगी. जैसे हे उसको अपने पास अपना छोटा भाई बैठा दिखा

उसकी मासूम सूरत में एक पल के लिए खो सी गई वो. और उसने उसको अगले हे पल गले लगा लिए. "गुड मॉर्निंग भाई. ग्लैड तो सी यू

हेरे." एक तरफ तोह अर्जुन को ऋतू दीदी के नंगे चूचे अपनी छाती पर महसूस हुए, लेकिन अगले हे पल वह अपनी बहिन क प्यार

को महसूस करने लगा. लेकिन उसने अपने हाथ से ऋतू दीदी को नहीं जकड़ा.

"आज तोह शायद चमत्कार हे हो गया. या मई सपना देख रही हु." जैसे हे ऋतू ने कोमल की आवाज सुनी वह झट से अर्जुन से अलग

हो गई. "माँ को बोल वो कॉफ़ी बनाये मई अभी फ्रेश हो के आ रही हु." ऋतू ने जैसे आदेश सा दिए और अर्जुन मशीन सा बहार

चल दिए.

"तू तोह मेरी समझ से बहार हे है ऋतू. इतना प्यार भी करती है उस से और फिर उसको अपने पास भी नहीं आने देती. क्या समस्या

है तेरे?", थोड़ा नाराजगी भरे स्वर में उसने तनु को दांत सी लगाई क्योंकि उसके इस व्यहवहार से अर्जुन कोमल से मिले बिना हे

चला गया था.

"जो अपनी मर्जी से कभी दूर गया हो और फिर इतने साल बाद वापिस आये तोह रिश्ते में फरक आ हे जाता है दीदी.", थोड़ा गुस्सा

था ऋतू की आवाज में और दर्द भी. वो चुपचाप बहार निकल गई. अर्जुन ऊपर वाले बाथरूम में चला गया था अपनी माँ को ऋतू दीद का

आर्डर बता कर. अर्जुन को उसके दादाजी ने एक बात बार बार सिखाई थी, जो बात या इंसान तुम्हे दुःख दे उसके बारे में सोचना नहीं.

और उसने वही किआ. बस इतनी ख़ुशी थी की वह आज 9 साल बाद अपनी बहिन क गले लगा था. नहाने के बाद उसने संजीव भैया को

उठाया और खुद तीसरी मंजिल पर जाकर बैठ गया. बड़ी शान्ति थी वह पर तोह वह पानी की टंकी से पीठ लगा कर आँखें

बंद करके बैठ गया. 15 मिनट गुजरे होंगे के उसको अपने होंठो पर कुछ गीला सा महसूस हुआ. पलके खोली तोह देखा माधुरी

दीदी अपनी जीभ उसके होंटो पर फिर रही थी. बड़ी हे सेक्सी लग रही थी उनकी ये हरकत. अर्जुन ने भी निचे से हाथ बढाकर

उनका एक ढूढ़ पकड़ कर दबा दिए. "आउच. बदमाश कुछ भी करता है. चला निचे खाना खा ले फिर तोह टाइम मिलेगा नहीं. फाग

खेलने पडोसी और Ritu/Alka की सहेलिया आ जाएँगी." इतना बोलकर वो पलट गई जाने के लिए लेकिन अर्जुन ने उनको एक बार पीछे

से बाहो में जकड बूब्स दबाये और उनके कूल्हों पर चुटकी काट उनसे आगे भाग गया. माधुरी भी अपने छोटे भाई की मस्ती देख

खुश होती हुई उसके पीछे चल दी..

निचे सब लोग अलका को बधाई दे रहे थे तोहफों के साथ तोह अर्जुन ने भी हैप्पी बर्थडे बोलै. उसकी आवाज सुनकर अलका ने शरमाते

हुए थैंक यू कहा. हल्का फुल्का नाश्ता किआ तोह दादी जी ने सबके गुलाल से तिलक किआ. रामेश्वर जी अपने दोस्त कोलोनेल पूरी के घर

जा चुके थे. उनको रंगो से परहेज था लेकिन बचो को खेलने की आजादी थी. शंकर जी भी अपने बड़े भाई को लेकर निकल दिए अपनी

दोस्त मण्डली की और. जाने से पहले वो ललिता जी और रेखा को गुलाल से रंग गए थे. फिर सभी बहनो ने भी संजीव भैया और

अर्जुन को रंग माला. संजीव भैया तोह उतनी देर में हे चल दिए घर से बहार अपने दोस्तों के पास होली खेलने लेकिन अभी तक अर्जुन

ने रंग को हाथ नहीं लगाया था. दादी जी, तेजी और माँ जैसे हे बहार वाले आँगन में गई जहा पड़ोस की महिलाये आई हुई थी

होली खेलने, अर्जुन ने अपनी दोनों मुट्ठी रंग से भरी और कोमल को पीछे से जकड कर दोनों गालो, गले और सर को रंगो से भर

दिए. कोमल इसके लिए तैयार नहीं थी. जैसे हे वह सम्भली अर्जुन ने पास में राखी पक्के रंग से भरी पानी की बाल्टी उसके सर पे

उलट दी. पूरा सूट पक्के लाल रंग से सन्न गया था और कोमल भी.

"अर्जुन के बचे.." उसने इतना हे बोलै था के अर्जुन भाग गया दूसरी मानिल पर. कोमल से पहले माधुरी भागी अर्जुन को पकड़ने लेकिन

जैसे हे वह दूसरी मंजिल पर पहुंची अर्जुन ने एक बाल्टी उनके ऊपर भी उड़ेल दी. जब तक वो संभालती उनका चेहरा पीले और हरे रंग

से सना हुआ था. और अर्जुन वापिस भाग कर निचे आँगन में आ गया.

माधुरी ने कोमल और अलका के साथ मिलकर प्लान बनाया था अर्जुन को रगड़ने का लेकिन अर्जुन पहले हे तैयारी करके बैठा था. जगह

जगह रंग से भरी बाल्टी और रंग छुपा कर.

उसने सब तरफ देखा लेकिन अलका नहीं दिखी. कोमल मुँह पर पानी दाल रही थी क्योंकि ज्यादा हे रंग पूत गया था. और इतने में हे अर्जुन

को अलका दीदी रसोईघर के पास वाले खम्बे के पीछे छुपी दिखी. वह चुपके से एक बाल्टी लेकर उनके पीछे जा खड़ा हुआ. जैसे हे अलका

दीदी पलटी अर्जुन ने ये बाल्टी भी उड़ेल दी उनके ऊपर और जेब से 2 मुट्ठी रंग लेकर पूरे चेहरे के साथ साथ गले और उस से निचे भी

चिपका दिए.

"तू इसको पकड़ अलका. मई बताती हु इस किशन कन्हैया को." माधुरी ने जोर से आवाज लगाई. वो सीढ़ियों पर कड़ी थी और उनका पूरा

सूट शरीर से चिपका हुआ था. कामदेवी लग रही थी वह इस रूप में भी. कुछ यही हाल था अलका और कोमल का. लेकिन अर्जुन अभी

खेलने के हे मूड में था. तीनो बहनो के सूट गीले थे और वो फर्श पर दौड़ भी नहीं सकती थी. फिसलने के डर से.

"हिम्मत है तोह कोई भी छु के दिखाऊ. जिसने भी मेरे मुँह पर रंग लगा दिए मई उसकी एक विश पूरी करूँगा.", अर्जुन ने थोड़ा

चिल्ला कर ये बात कही थी. आँगन काफी बड़ा था और ऊपर से रसोईघर के सामने बने 3 खम्बो का अर्जुन बखूबी फायदा उठा रहा

था. तीनो बहने असह्य सी नजर आ रही थी की अगला सन देख कर सभी रुक हे गई अपनी जगह पर.

"बड़ा आया खिलाडी. देख अब तू भाग कर दिखा.", ऋतू पता नहीं कहा से प्रकट हुई और उसने अर्जुन को पीछे से पकड़ कर एक हाथ

में भरे हुए रंग से पूरी तरह रंग दिए. वह वही जड़ हो गया. होश आया तोह उसकी छुपाई हुई रंगो की 2 बाल्टी उसके ऊपर गिर चुकी

थी. और अब वह बुरी तरह घिर चूका था. "ऋतू इसको छोड़ना मत.", इतना बोलकर माधुरी दीदी ने दो पैकेट रंग लेकर अर्जुन को सर से

लेकर पाँव तक ाचे से रगड़ा. उसकी टीशर्ट उठा के पूरी छाती और पेट पर भी रंग लगाया. कोमल ने भी थोड़ा रंग लगाया लेकिन अलका

ने थोड़ा सा लाल गुलाल अर्जुन के गाल पे लगाया और दूर कड़ी हो गई.

कोमल ने अब ऋतू को पकड़ लिए जो कबसे सूखी हे थी. "दीदी नहीं मई होली नहीं खेलती प्लीज." वो चिल्लाई लेकिन कोमल ने उसकी एक ना सुनी

और पूरे चेहरे पे पीला रंग भर दिए. माधुरी ने भी यही किआ और अलका ने एक बाल्टी पानी दाल दिए उसके ऊपर.

"ये आपने ठीक नहीं किआ दीदी.", वो बेचारी बस रो हे पड़ी थी. "जब खेलती नहीं तोह अर्जुन को क्यों पकड़ के रंगा तूने?", कोमल ने ये बात

कही तोह वह चुप्प हो गई और थोड़ी देर बाद बोली, "वह उसने शर्त लगाईं थी न के बदले में वो एक विश पूरी करेगा तोह इसलिए."

"अर्जुन चल तू भी ले ले इस से बदला.", कोमल ने ये बात कही तोह पहली बार अर्जुन ने ऋतू दीदी को देखा. उसकी टीशर्ट बुरी तरह से चिपकी

हुई थी और चूचियों के निप्पल भी नुमाया हो रहे थे. इन सब को अनदेखा कर वो धीरे धीरे आगे बढ़ा तोह ऋतू की धड़कन तेज़ हो गई.

दोनों हे एक दूसरे की आँखों में हे देख रहे थे. ऋतू आँखों से हे अपने छोटे भाई को रुकने की प्राथना कर रही थी लेकिन अर्जुन अब उस से बस

कुछ हे इंच दूर खड़ा था. "हैप्पी होली दीदी." इतना बोलकर उसने एक चुटकी गुलाल ऋतू के गाल से लगा दिए. "और है आप मुझसे अब कुछ भी

मांग सकती हे, मई मन नहीं करूँगा आपकी किसी भी विश को." इतना बोलकर वह घर से बहार चल दिए. इधर ऋतू की आँखों में आंसू आ गए

थे जो उसके सर से टपकते पानी की वजह से किसी को नहीं दिखाई दिए. बाकी तीनो बहने भी बहार आँगन में चली गई क्योंकि अलका की

सहेलिया भी आने वाली थी.

ऋतू बाथरूम में लगे शावर के निचे कड़ी थी और सारा रंग उतर कर फर्श से बेहटा हुआ जा रहा था. उसका दिल भारी हो रहा था यही

सोचकर के ये क्या हो रहा है. जितना वह अर्जुन को खुद से दूर करती है वह क्यों उसके दिल में और गहरा होता जाता है. उसका हाथ अपने गाल

के उस हिस्से पे गया जहा अर्जुन ने रंग लगाया था. ऋतू को महसूस हुआ के हाथ गाल पे लगा था लेकिन छु उसकी आत्मा को गया. गीली हे वो

अपने कमरे में चली गई थी.

"आजा तेरा हे इन्तजार था." जैसे हे अर्जुन बहार निकला ज्योति ने उसके ऊपर रंग दाल दिए. अर्जुन ने भी बड़े प्यार से ज्योति के गालो पे रंग

लगाया और फिर संदीप से गले मिलकर बधाई दी. ज्योति अर्जुन के घर में चली गई और संदीप अर्जुन को लेकर घूमने चले दिए. ऐसे हे

दोनों पास की मार्किट में चले गए. हर तरफ सड़क पर रंग फैले थे. लोग स्कूटर्स के सीलेंसर उतार कर घर के बहार खड़े लोगो पर

पानी के गुब्बारे और अंडे फेंकते जा रहे थे. दोनों ने वही खुली एक दूकान से जीरा लेमन की बोतल पी और फिर घूमते हुए एक पार्क में

बैठ गए. कुछ जान पहचान वालो ने उनको रंग लगाया और उन्होंने उनको. एक घंटे बाद दोनों वापिस घर की और चल दिए. संदीप के

गांव से रिश्तेदार भी आये हुए थे. संदीप क घर के बहार से हे अर्जुन वापिस अपने घर की और चल दिए. अब आँगन का नजारा बदल

गया था. नुसरत, आशा, अलका, कोमल, माधुरी दीदी और 5-6 देखि हुई लड़कीअ एक दूसरी को खूब रंग रही थी. नुसरत और आशा ने जैसे

हे अर्जुन को देखा वह उसकी और चल दी.

"वाह हीरो तू तोह बड़ा दिलेर है. अपनी माशूका के घर हे आ गया होली खेलने." आशा ने ये बात बड़ी धीर से कही थी फिर उन दोनों

ने अर्जुन को बड़े प्यार से रंग लगाना शुरू किआ. मुँह पे, गले पे, छाती पे फिर बचा हुआ उसके सर पे दाल दिए. अर्जुन ने भी दोनों के

गाल पर थोड़ा थोड़ा रंग लगा दिए. "कभी अकेले मिलना फिर पक्का रंग लगाउंगी." नुसरत ने अपने बड़े दूध अर्जुन की छाती से रगड़ते

हुए ये बात उसके कान में कही थी. "यही ऑफर मेरी तरफ से भी ओपन है." इतना बोलकर आशा ने भी आँख मार दी. अर्जुन मुस्कुरा दिए

लेकिन इस बीच एक जोड़ी आँखें उसको बड़े ध्यान से देख रही थी दूसरी मांजी की जाली वाली खिड़की से. अर्जुन ने देख के अनदेखा किआ और

अंदर चल दिए. बाथरूम में जाकर रगड़ के अपना चेहरा और हाथ धोये. रसोई से पानी की बोतल लेकर पानी पिया और ऊपर चल दिए.

अपने कमरे में जाकर उसने अपनी ख़राब शर्ट उतरी फिर पेण्ट भी, और एक साफ़ टीशर्ट पेण्ट निकली और बाथरूम में जाकर नहाया. और सीधा

तीसरी मंजिल पर चला गया. ऋतू दीदी संजीव भैया के कमरे से उसकी साड़ी हरकत देख रही थी. वो भी कुछ देर बाद ऊपर चल दी.

अर्जुन छत्त पर पिछली दिवार के पास खड़ा था, जहा घर के पीछे का भाग था. घाना जंगल सा था वह सरकारी जमीन पर.

"मुझे माफ़ करदे मेरे भाई. मैंने तुझे बड़ा दुःख पहुंचाया है." उसके पीछे जा कर ऋतू लिपट कर रो पड़ी. अर्जुन घूम गया लेकिन

वैसे हे खड़ा रहा.

"जब तू बोर्डिंग चला गया तोह मेरे तोह जैसे सब अरमान हे टूट गए थे. और फिर जब भी तू आया कभी मेरे पास नहीं रहा. हर रात

मेरे साथ सोया था और एक हे बार में मुझे अकेला छोड़ गया." वो बोलती रही और अर्जुन से लिपटी रोटी रही.

"मेरी जिंदगी हमेशा से हे तेरे साथ थी. तुझे मैंने कभी अकेला नहीं छोड़ा था लेकिन तू मुझे 9 साल के लिए छोड़ गया. फिर क्यों बात

करती मई तेरे साथ.? एक बार भी तूने मुझसे प्यार से बात नहीं करि. मेरा प्यार इतना कमजोर था क्या?" उसके आंसुओ की रफ़्तार और तेज

हो चुकी थी और फिर अचानक उसकी आवाज बंद हो गई थी. अर्जुन ने पहली बार पिछले 9 साल में आज उसको अपनी बाहो में भर लिए था. उसका

छोटा भाई अब इतना बड़ा हो गया था की उसको बाहो में भर अपने सीने में छुपा रहा था. अर्जुन की आँखों से भी आंसू चालक आये और

जैसे हे ये ऋतू को महसूस हुआ उसने अपना चेहरा ऊपर करके अपने भाई को देखा. जिसकी आँखों में उसके लिए सिर्फ प्यार हे था. और उस से

बिछड़ने का दर्द भी. ऋतू सेहम सी गई अपने छोटे भाई के हालत देख. और उसके चेहरे को अपनी छाती से लगा लिए. जब आंसू बह गए

तोह एक बार फिर दोनों ने एक दूसरे को देखा और इस बार अर्जुन ने अपनी बड़ी बहिन को अपनी बाहों में ऊपर उठा लिए. "आप मेरी जान हो दीदी.

मई खुद को भूल सकता हु लेकिन आपको हलकी सी भी पीड़ा होती है तोह मेरी रूह तड़प उठती है. आप जिंदगी भाई भी मुझे ताने दो

तोह भी मुझे बुरा नहीं लगेगा. प्यार में जरुरी तोह नहीं के हांसिल हो हे जाये." अर्जुन ने जब इतना कहा तोह ऋतू ने अपने हाथ उसके कंधे

पर रख उसके होंठो पर अपने होंठ रख दिए. अर्जुन अभी भी ऋतू को ऊपर उठाये था. वो अपने भाई को पागलो की तरह चूम रही थी.

आखिर यही तोह था उसका पहला प्यार. और जब सब धूल गया तोह दोनों अलग हुए. अर्जुन ने बड़े प्यार से अपनी बहिन को निचे उतारा तोह एक बार और ऋतू उसके गले लगी और गाल चूमकर निचे भाग गई.

अर्जुन जब घर के सामने की तरफ आया तोह देखा के अब नजारा बेहद हसीं हो गया था. किसी स्वर्णमृगनि के जैसी अलका दीदी और ऋतू दीदी

सबपे रंग फेंक रही थी और ढोल की थाप पर नाच रही थी. और अर्जुन बस मुस्कुरा दिए उनको देख कर.
 
अपडेट 13

माधुरी मिलान

दोपहर 2 बजे तक सब लोग घर के अंदर आ चुके थे होली खेल कर. घर की औरतों ने नाहा धो कर साफ़ कपडे पहन लिए थे और

अब वह रसोई में लग गई थी. कोमल दीदी बहार वाले बाथरूम में अपना रंग उतारते हुए नाहा रही थी और अंदर वाले बाथरूम में अलका दीदी

और उनकी सहेलिया थी. ऋतू दीदी ने अभी आँगन में लगे नलके पर हे जितना हो सका उतना रंग उतारा और उनके साथ आशा थी. रेखा जी

ने आशा और नुसरत के लिए भी कपडे निकल कर आँगन में लगी तार पर दाल दिए थे.

माधुरी दीदी ऊपर के बाथरूम में जाने का बोलकर दूसरी मंजिल पर पहुंच गई. ड्राइंग रूम में बैठे अर्जुन को एक दिलकश सी स्माइल देती

वो उसके सामने हे बाथरूम में घुस गई. दरवाजा खुला हे था और अर्जुन को पानी गिरने की आवाज आई. सब तरफ देख कर उसने मुख्या दरवाजा

बंद किआ और वह भी घुस गया बाथरूम के अंदर. दृश्य इतना कामुक था का अर्जुन का लुंड एक सेकंड में अपनी औकात पर आ गया. माधुरी

दीदी का कमीज फर्श पर गिरा हुआ था और वह एक पुराणी ब्रा पहने हुए शावर के निचे झुकी हुई थी. अर्जुन ने पीछे से जाकर दीदी गांड

पर अपनी कमर भिड़ते हुए दोनों मोठे ढूढ़ पकड़ लिए. माधुरी दीदी ने भी कोई कोशिश न की अर्जुन को हटाने की. धीरे धीरे उसने अपना

दीदी की नंगी कमर और गर्दन पर घूमना शुरू कर दिए. माधुरी दीदी ने भी दोनों हाथ पीछे ले जाकर ब्रा का हुक खोल अपने फुटबॉल जैसे

बूब्स आजाद कर दिए. "साबुन लगा कर मसल भाई. इनपे भी काफी रंग लगा है." बेहद कामुक आवाज में उन्होंने ये बात कही तोह अर्जुन ने

अपनी टीशर्ट और पेण्ट वही गिरा दी और दोनों हाथो में साबुन रगड़ उनके मुलायम बड़े चुके मसलने लगा. "आह भाई प्यार से कर ज्यादा जोर

से नहीं", इतना बोलकर वो खुद भी अपनी गांड उसके खड़े लुंड पर रगड़ने लगी. "दीदी कितने बड़े और मोठे मोठे बूब्स है आपकी." इतना बोलकर

अर्जुन ने दीदी को अपनी तरफ घुमा लिए और निचे झुक कर उनके एक पपीते को मजे से पीने लगा. उसका दूसरा हाथ दीदी की गीली गांड को

महसूस कर रहा था. "इसको भी उतार दे भाई.", अपनी दीदी की बात सुनकर उसने सलवार भी एक झटके में उनके तन से अलग कर दी. अब अर्जुन

मोठे दूध को पीते हुए अपने दोनों हाथो से उनकी गांड की दरारों को भी फैला रहा था. उसको उन्हें दबाने में अलग हे मजा आ रहा था.

अब माधुरी दीदी ने भी अर्जुन की छाती पर साबुन रगड़ना शुरू किआ और फिर अपने हाथ उसके कच्चे के अंदर दाल उसका खड़ा लुंड सहलाने

लगी. "भाई तेरा ये डंडा कितना बड़ा और गरम है. हाय देख कैसे अकड़ रहा है मेरे हाथो में." इतना बोलकर वो उसके लुंड को

दोनों मुथिओ में भर के दबाने लगी. "दीदी आपकी वह भी तोह कुछ गरम नहीं." बोलते हुए अर्जुन ने उनकी कच्ची जो गांड की दरार में

बुरी तरह से फांसी हुई थी बहार निकल के निचे कर दी.

"वाह दीदी. आपने छूट कब साफ़ की?" वो तोह उस चिकनी फूली हुई छूट में हे खो गया

"भाई मई तोह कल हे तुझे ये दिखने वाली थी लेकिन चल आज सही." इतना बोलकर माधुरी दीदी ने भी अर्जुन का लुंड कच्चे से आजाद

कर दिए. अर्जुन का लुंड इस समय पूरे दैत्याकार रूप में खड़ा था. उसके लाल सुपडे का आकर बड़े टमाटर सा हो चूका था और पूरे

लुंड पर नसे उभर आई थी..

"दीदी देखो ये कैसे तड़प रहा है आपके लिए.", इतना बोलकर अर्जुन ने माधुरी दीदी को बाहों में भरकर पागलो की तरह चूमना

शुरू कर दिए. उनके दोनों बड़े चूचे अब अर्जुन की छाती से रगड़ रहे थे. और उन पर लगे भूरे निप्पल अर्जुन को छाती में धसते

महसूस हुए. उसका लुंड भी दीदी के पेट पर रगड़ रहा था. क्योंकि वह कुछ ज्यादा लम्बा था अपनी दीदी से.

"आप निचे लेट जाओ.", इतना बोलकर अर्जुन ने माधुरी दीदी को वही फर्श पर लिटा दिए और उनके ऊपर लेट गया. पानी अभी भी चल रहा

था. अपने दोनों हाथो में उनके मोठे बूब्स दबाते हुए वह दीदी के होंठ कुचलने लगा और अपना लुंड उनकी चिकनी छूट पर रगड़ने लगा.

"भाई देख अभी टाइम ज्यादा नहीं है तू एक काम कर मई कड़ी होती हु और तू पीछे आ." ये बोलकर माधुरी दीदी दिवार के सहारे कड़ी हुई

और झुक कर अपनी बड़ी गांड बहार निकल ली. अर्जुन जैसे हे उनके पीछे आया उन्होंने अपने हाथ से उसका मोटा लुंड अपने चूतड़ों की दरार

से निकलते हुए छूट की फैंको के बीच लगा लिए. अर्जुन भी समझ गया के अब क्या करना है. माधुरी दीदी की मोती चिकनी जांघो में उस

लुंड टाइट फसा था. "चल अब आगे पीछे कर. बस ध्यान रखिओ ये अंदर न जाए. वो काम हम रात में करेंगे." दीदी की बात ख़तम

होते हे अर्जुन ने धक्के मारने शुरू कर दिए. दीदी को दिवार से चिपकाये उसने उनके दोनों बूब्स पकड़ कर निचोड़ना शुरू किआ. कभी वह

उनके निप्पल खींचता कभी गांड को फैला कर तेज धक्के लगते हुए उनकी गर्दन चूमता. उसका लुंड छूट की फैंको में कैसा हुआ आगे पीछे

हो रहा था. बिलुल असली चुदाई जैसा महसूस हो रहा था. एक बार उसने पूरा लुंड पीछे खींचा और फिर धक्का दिए तोह लूणदा जा तक्र्य छूट

के छेद से और दीदी की चींख निकलते रह गई. "पागल है क्या?" दीदी ने बोलै और वापिस गांड बहार निकल उसके हाथ अपने चुचो पे

रख लिए. अर्जुन फिर मस्ती में झटके लगाने लगा. उसको तोह ये सपना सा लग रहा था. दिन के समय, घर के बाथरूम में, अपनी इस गदराई

बड़ी बहिन की गांड क निचे लुंड फसाये उसके मोठे ढूढ़ दबाना. उसका जोश बढ़ता हे जा रहा था और माधुरी दीदी की छूट भी रिसने

लगी थी अब उसके हाथ दीदी के बूब्स पर कुछ ज्यादा हे कास गए थे और धक्के भी तेज हो गए थे.

"आह ... आह .. भायी.. आराम से.. मई गयी...." दीदी झड़ने लगी थी लेकिन अर्जुन तोह तूफानी गति से लगा रहा और 20-25 तेज

धक्को के बाद उसकी पिचकारिआय भी छूटने लगी.. कुछ दीदी की छूट के बहार गिरी कुछ सामने की दिवार पर.

माधुरी दीदी ने उसके एक बार खुद से चिपका कर उसके होंठ ाचे से चूमे और बहार निकल दिए. मुस्कुराती हुई दीदी के चेहरे पे

अब अलग हे नूर आ गया था. खुद को साफ़ कर कपडे पहन वह निचे चल दी. कुछ देर बाद अर्जुन भी वही बैठा था. आशा और नुसरत

जा चुकी थी.

"ले बीटा तू शुरू कर." ललित जी ने उसकी प्लेट लगाई तोह ऋतू भी अर्जुन की बगल में आ बैठी.

"मई भाई की प्लेट में हे khaungi."Itna बोलकर उसने अर्जुन के साथ हे खाना शुरू कर दिए.

सब हैरत से उन दोनों को देख रहे थे और अर्जुन अपनी बड़ी दीदी को अपने हाथो से खिला रहा था. रेखा जी तोह ये देख कर बस भगवन

का शुक्रिया ऐडा कर रही थी. अर्जुन के दूसरी तरफ जब अलका आकर बैठी तोह अर्जुन एक बुर्की बनाकर उसके भी मुँह में डालने लगा लेकिन

शर्म से अलका ने छोटा सा मुँह खोला. "आपने नहीं खाना मेरे हाथ से?" अर्जुन की बात सुनते हे अलका ने एक झटके में उसका हाथ अपने मुँह

में ले लिए. "आउच. पहले तोह कहती नहीं हो फिर ऊँगली भी काट ली.", अर्जुन ने छेड़ा तोह अलका किसी nav-byahta की तरह शर्मा गई.

"अब इसको क्या हुआ है?", ऋतू ने ये बात कह तोह दी लेकिन कुछ कुछ उसको भी समझ आ गया था. फिर वह अलका की तरफ देख एक इशारे

में मुस्कुराई तोह अब अलका ने शर्म से नजरे हे झुका ली थी. "वाह मेरी बन्नो.", ऋतू ने बड़ी धीमी आवाज में ये बात कही जिसे सिर्फ

अर्जुन और अलका ने हे सुना था. अब बारी अर्जुन की थी नजर झुकाने की क्योंकि अलका तोह इतना सुनकर वह से उठ रेखा जी के पास हे बैठ

गई थी. अर्जुन ने फिर से ऋतू दीदी को खिलाया तोह उन्हें खुद के लिए भी अर्जुन की नजर में वही दिखा जो अलका के लिए था. "अब बस भाई

मेरा पेट भर गया." इतना बोलकर उठते हुए ऋतू दीदी ने अलका की तरफ देखते हुए अर्जुन की ऊँगली चूस ली. ऋतू अपने कमरे में गई हे थी

की अलका भी खाने की थाली ले उसके पीछे चल पड़ी.

अर्जुन कुछ देर बाद खाना ख़तम कर ऊपर चला गया अपने कमरे में आराम करने. जैसे हे वो वह दाखिल हुआ ड्राइंग रूम में कोमल दीदी

बैठी टेलीविज़न पर गाने देख रही थी. अर्जुन भी जाकर उनकी बगल में बैठ गया. कोमल ने उसको देखा फिर टेलीविज़न की तरफ देख

मुस्कुराने लगी. "कल से देख रहा हु आप बात नहीं कर रही." अर्जुन ने जब इतना कहा तोह कोमल ने फिर उसको देखा और फिर नजर फेर ली.

Alka-00.jpg


(कोमल दीदी)

"क्या बात करू?", और फिर कोमल मंद मंद मुस्कुराने लगी. अर्जुन ने बड़े प्यार से उनका चेहरा अपनी तरफ घुमाया तोह वह बिना जोर दिए

उसकी और घूम गई. दोनों एक दूसरे को देखते रहे फिर मिल गए दोनों के लैब एक दूसरे से. अर्जुन ऐसे हे कोमल दीदी को झुकाये उनके ऊपर

लेट गया सोफे पर हे. दोनों बड़े हे इत्मीनान से एक दूसरे को चूम रहे थे कोई जल्दी नहीं थी उनको. कोमल हे थी जिसके चूचे माधुरी

को टक्कर देते थे लेकिन अभी इन दोनों का ध्यान कामवासना से परे हे था. कुछ 2 मिनट बाद अर्जुन ने ये चुम्बन तोडा और ऊपर से उठ गया.

मई चला सोने दीदी एंड थैंक यू फॉर थिस स्वीट ट्रीट. कोमल भी प्रतिउत्तर में बस मुस्कुरा दी.

शंकर जी लगभग 5 बजे आये थे और फिर सबसे मिलकर और अर्जुन को सोया देख वापिस निकल गए अपनी नौकरी वाले शहर. ताऊजी भी सो

चुके थे घर आने के बाद. घर में ज्यादातर लोग आराम कर रहे थे लेकिन ये 2 हुस्न की देविया कमरे में बंद गुफ्तगू कर रही थी.

"अब मुझे सब बता. और कुछ भी छुपाया तोह फिर तू मुझे जानती है.", ऋतू ने अपने पाँव पे तकिया रख बैठे हुए हे वही लेती अलका

से कहा. एक आर्डर की तरह लेकिन आवाज बिलुल मंद थी.

"यार देख तुझसे मैंने आजतक कुछ नहीं छुपाया लेकिन पता नहीं तू समझेगी भी या नहीं.", अलका ने थोड़े चिंतित स्वर में बात कही

"तू बस पूरी बात बता मेरे समझने न समझने की बात भूल जा.", अब ऋतू ने थोड़ा प्यार से कहा. अलका को डर था के कही ऋतू उसके

प्यार को रुस्वा न कर दे.

"देख ऋतू जबसे मई बड़ी हुई हु मुझे कभी लड़को में इंटरेस्ट नहीं था. फिर कॉलेज में लड़किओं के कई किस्से सुने थे के उसके बर्फ ने

ये किआ, वो किआ. किसी को धोका दिए तोह किसी को अपने दोस्तों के साथ हे सुला दिए. इन सब बातों से मेरे दिल में दर बैठ गया था."

"जो पुछा ये वह बात नहीं है." ऋतू ने थोड़ा तुनक कर बोलै

"पूरी बात सुनेगी या फिर मई चली जाऊ?", पहली बार अलका ने उसको गुस्सा दिखाया था तोह ऋतू भी शांत हो गई.

"अब सुन. जब हर तरफ मैंने देखा की लड़के सिर्फ एक हे चीज देखते है हर लड़की में तोह मैंने मूड बना लिए के कभी बर्फ नहीं

बनाउंगी. फिर क्लास में कुछ लड़किओं ने मेरा मजाक उड़ाना शुरू कर दिए. के बहार से इतनी सुन्दर है लेकिन शायद अंदर हे कुछ

कमी होगी जो इसका का बर्फ नहीं है. कुछ ने तोह ये भी कहना शुरू कर दिए के मुझे लड़कीअ हे पसंद है. चल मान भी लू की मुझे

तू पसंद है. तेरा साथ मेरे लिए एक वरदान जैसा है. लेकिन इसका ये तोह मतलब नहीं हुआ के मुझमे कुछ कमी है. ऐसी बातें हर

रोज होने लगी. फिर अभी 2 दिन पहले मई अर्जुन को ले गई अपने कॉलेज, एग्जाम फीस डिपाजिट करवाने और फाइल सबमिट करवाने. वह सभी

लड़कीअ बस अर्जुन को हे देख रही थी लेकिन उसने किसी की तरफ नहीं देखा. मैंने अपनी 2 फ्रेंड्स को भी इशारा किआ अर्जुन को छेड़ने के

लिए लेकिन अर्जुन ने उनको भी नजरअंदाज कर दिए. जब वो मेरा हाथ पकड़ कर कैंटीन ले जा रहा था तब सभी लड़कीअ मुझे जलन से

देख रही थी. लेकिन अर्जुन सिर्फ मेरे साथ था. वह भी उसने मुझे कुर्सी से उठना न दिए, बिल भी खुद दिए एक अचे लवर की तरह."

कुछ रुक कर अलका ने फिर बात आगे बधाई जो ऋतू अब शांति से सुन रही थी. उसकी दिलचस्पी और बढ़ चुकी थी. "जब मेरी फ्रेंड्स

ने मेरे बर्थडे का जिक्र किआ और उसको मेरा बर्फ कहके पुकारा तोह उसने कुछ नहीं कहा. घर आने से पहले मुझे लेकर मॉडल टाउन मक्त चल दिए.

अपनी पसंद से मुझे ऐसे कपडे दिलाये जो सिर्फ मई टीवी पर देखती थी और वह सब बातें करि जो हर प्रेमी करता है. मेरा इतना ख्याल

रखा की अगर गले में रोटी भी फांसी तोह पीठ सहलाते हुए सबके सामने मुझे अपने हाथो से पानी पिलाया. और सबसे बड़ी बात जो उसने

एक असली प्रेमी की तरह की वह की अपने दिलाये कपडे सबसे पहले उसको दिखाऊ और वो भी 12 बजे रात को. ताकि वो सबसे पहले मुझे विश

करे. यहाँ तक की उसने सजीव भैया को भी रात में बहार भेज दिए." आखिरी बात उसने अपनी तरफ से हे कही थी. इतना सब सुनकर तोह

ऋतू की आँखें फटी रह गई. उसको यकीन हे नहीं था के उसका छोटा भाई ऐसा कुछ भी कर सकता है. अलका ने फिर आगे बात बधाई

"और जब मई उसके पास रात को गई तोह किसी राजकुमारी सा एहसास दिलाया उसने मुझे. उसके होंठ जब मेरे लबो पे जुड़े तोह मुझे एहसास

हुआ के मर्द का प्यार क्या होता है."

"ोये. क्या तूने सबकुछ कर लिए उसके साथ?", ऋतू ने हैरान होते हुए पुछा.

"चुप कर पागल कही की. मैंने कहा न के ये प्यार है. मई ऊपर से नंगी थी उसके सामने लेकिन उसने मुझे सिर्फ प्यार किआ. कोई जबरदस्ती

नहीं की. उसमे कोई वासना नहीं थी, सिर्फ प्यार था. जब उसने मेरे गाल को सहलाया तभी मेरी रूह उसमे समां चुकी थी. कोई नंगी लड़की

को नहीं छोड़ता अगर वो उसके बिस्तर पर पड़ी हो. लेकिन देख उसका प्यार की सिर्फ प्यार से चूमने के अलावा उसने कुछ किआ हे नहीं. सिर्फ हम

दोनों थे वह और सारा घर सोया हुआ था. लेकिन अर्जुन ने मेरी इज्जत की. और वह अगर उस समय मेरे साथ कुछ भी करता तोह मई उसको

एक बार भी नहीं रोकती लेकिन उसका प्यार बहते हुए पानी की तरह साफ़ है." ये सब कहते कहते अलका की रुलाई फुट पड़ी थी लेकिन अब

उसको ऋतू ने अपनी बाहो में भर लिए था. "अरे पगली रो मत तू. मैंने कहा था न के मुझे तोह सिर्फ सब सुन न है. और मेरी तरफ देख

और बिलकुल भी बूरा मत मानिओ मेरी बात का. मुझे तेरे और अर्जुन के रिश्ते से कोई हर्ज नहीं. उल्टा मई तोह खुश हु के तूने सही इंसान

को चुना है अपने पहले प्यार के रूप में. लेकिन इसमें भी एक पेंच है. ये प्यार भी बराबर बटेगा.", ऋतू ने इतना कहा हे था के अलका

ने दोनों हाथो से उसका सर पकड़ के उसके होंठो को चूम लिए. "मुझे शुरू से पता है तेरा भी प्यार वही है जो मेरा है. जो तू उस से

दूर रहने का दिखावा करती थी न वो सिर्फ एक नाराजगी थी. उस से जिसे तू सबसे ज्यादा प्यार करती है. लेकिन मैंने तेरे लिए अर्जुन की आँखों

में सिर्फ और सिर्फ प्यार हे देखा है. शायद मुझ से भी ज्यादा.", इतना बोलकर वह वही लिपट गई एक दूसरे से.

"वैसे एक बात तोह बता तूने कभी मुझे तोह अपने कपडे उतार के नहीं दिखाए.", अब ऋतू ने अलका की तंग खींचते हुए कहा

"क्योंकि तेरे पास भी वही है न जा मेरे पास है. लेकिन उसके पास जो है न वह तोह बसससससससस." इतना बोलकर दोनों खिलखिला पड़ी. और एक

दूसरे से लिपट कर लेट गई. मन बिलकुल हल्का हो चूका था दोनों का. और रिश्ता ज्यादा मजबूत हो गया था. प्यार जो एक हे इंसान से हुआ

था.

.

.

रात को सब हल्का फुल्का खा कर अपने कमरों में आ गए थे. अर्जुन रामेश्वर जी के पाँव दबा रहा था और कौशलया जी भी सो चुकी थी.

संजीव आज रात भी बहार था क्योंकि अगले दिन उसको दूसरे शहर में कंपनी का काम था. कोमल आज अपनी माँ के कमरे में लेती थी क्योंकि

रेखा जी को हल्का भुखार था. ऋतू और अलका भी सो चुकी थी दिन भर की थकान से. अपने दादा जी सोते हे अर्जुन भी सीढिया चढ़ दूसरी

मंजिल पर चल दिए.

"बड़ी देर लगा दी सनम आते आते", अर्जुन ने जब ये लाइन सुनी तोह देखा के माधुरी दीदी हाथ में चद्दर और तकिये लेके कड़ी थी .

उसने मुस्कुराते हुए अपने कमरे से गद्दा उठाया और चल दिए छत्त पर. निचे वापिस आकर सजीव भैया के बीएड से एक और गद्दा लेकर वापिस

ऊपर आ गया. दोनों चुप थे. माधुरी दीदी ने दोनों गद्दे बिछाये और उनपे एक पुराणी चद्दर बिछा दी. फिर 3 तकिये गड्डो के ऊपर रख

वो निचे चली गई. अर्जुन वही बैठ उनका इन्तजार कर रहा था. कोई 15 मिनट बा वह आई तोह उनके हाथ में कुछ था और अब शरीर पे

एक ढीली मैक्सी पहनी हुई थी. मतलब वह नाहा कर आई थी और सलवार कमीज उतार दिए था. उनके एक हाथ में कटोरी और दूसरे में एक छोटी

बोतल थी. जैसे हे वह गद्दे पर बैठी अर्जुन की सांस बड़ी अध्भुत खुशबु से भर उठी. "वाह." इतना बोलकर वो दीदी की गर्दन से आती

महक को सूंघने लगा. माधुरी दीदी के गीले बाल भी महक रहे थे.

"दीदी लगता है आज मार हे डालोगी.", इतना बोलते हे उसने माधुरी दीदी के गाल चूम लिए. अब दीदी ने भी उसको अपने से लगा के उसकी गर्दन

पर चुम्बन की झड़ी लगा दी. उनका पूरा शरीर महक रहा था. खाल इतनी मुलायम हो राखी थी जैसे मलाई हो. अर्जुन होल होल दीदी की

बाँहों को सहलाने लगा और गर्दन से लेकर होंठो तक धीरे धीरे चूम रहा था. माधुरी दीदी ने पूर्ण समर्पण कर दिए और लेट गई गद्दे

पे. चाँद की रौशनी में उनके उभार मैक्सी में से हिलते दिख रहे थे. अर्जुन ने अपनी कमीज उतर कर रख दी और सिर्फ पाजामे में उनके ऊपर आ

गया. दोनों बेसुध हो एक दूसरे को चूमने लगे.

"भाई आज कोई रोक नहीं है तुझ पर. आज अपनी दीदी को इतना प्यार दे की कभी भूल न पाव." इतना बोलकर माधुरी दीदी फिर लीपर गई अर्जुन से

उनके हाथ अपने भाई की पीठ सेहला रहे थे, हो बिलुल चिकनी और सख्त थी. जब अर्जुन थोड़ा ऊपर उठा तोह दीदी ने अर्जुन की चेस्ट पर जीब

लगा दी और उसकी छाती को चूमने लगी. "दीदी ये क्या कर रही हो. मुझे बर्दाश्त नहीं हो रहा." मजे के सैलाब में उड़ते हुए अर्जुन को जब

कुछ नहीं सूझा तोह उसने कपडे के ऊपर से दीदी के गुब्बारे दबा लिए जो अंदर बिलुल आजाद थे. निप्पल फूल चुके थे और तने हुए थे.

अर्जुन ने दोनों निप्पल अपने दोनों हाथो की एक ऊँगली और अंगूठे के बीच कास लिए.

"आह भाई. आज इतना दर्द दे की फिर कभी दर्द न हो. खींच इन्हे और खूब दबा . इनकी साड़ी अकड़ ख़तम कर de."Itna बोल माधुरी दीदी

पाजामे के ऊपर से हे अर्जुन का लुंड सहलाने लगी. और दोनों के होंठ कुश्ती करने लगे आपस में. सेहलते हुए हे दीदी ने अर्जुन का पजामा खोल

दिए. उसका लुंड किसी स्प्रिंग की तरह सीधा आ लगा उनकी थोड़ी से. "कितना सुन्दर है ये तेरा लुंड मेरे भाई. और कितना बड़ा. पता नहीं क्या

होगा लेकिन आज ये तेरी दीदी को चाहिए." इतना बोलकर वह अपने एक हाथ से अर्जुन की कमर थाम दूसरे हाथ से उसका लुंड सहलाने लगी. मुठी

में पूरा लुंड समां नहीं रहा था. और उसका टॉप तोह उस से भी कही ज्यादा मोटा था.

"दीदी, कड़ी हो जाओ.", इतना बोल कर अर्जुन सीधा हुआ और अपनी दीदी को खड़ा कर उनकी मैक्सी उतर कर गद्दे पे फेंक दी. एक कपडे के निचे माधुरी

दीदी पूरी नंगी थी. उनकी सुडोल मोती जाँघे आपस में चिपकी हुई थी जिस से उनकी छूट दिखाई नहीं दे रही थी. गदराई कमर, और उस से

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(माधुरी दीदी)

ऊपर 2 बड़े पहाड़ से चूचे. अर्जुन ये नजारा देख अपनी दीदी से खड़े खड़े हे चिपक गया. उसका लुंड दीदी की नाभि पर ठोकर मार रहा

था उत्तेजना इतनी ज्यादा थी की रह रह के लुंड में झटके लग रहे थे. माधुरी दीदी सरकते हुए निचे बैठ गई और एक बार फिर अर्जुन के

लुंड को सहलाने लगी. फिर उन्होंने वह छोटी बोतल उठाई और उसमे से लोशन निकल लुंड की मालिश करने लगी. अर्जुन मजे से बेहाल हो रहा

था. "दीदी, आप लेट जाओ न." इतना बोलकर उसने अपनी दीदी को लिटा दिए

"अर्जुन बोतल से लोशन लेकर तू भी मेरी छूट की थोड़ी मालिश कर जैसे तेरे लुंड की मई कर रही हु", दीदी ने कहा तोह अर्जुन ने ढेर

सारा लोशन लेकर उनकी टंगे फैलाई और छूट के ऊपर ऊँगली से लगाने लगा. छूट फूलकर ब्रेड जैसी हो रही थी. उसमे से दीदी का कॉमर्स

भी बह रहा था. फिर अर्जुन ने दो उंगलिअ छूट की दरार में घुमाई और उन्हें चिकना करने लगा. बचा हुआ लोशन उसने दीदी के दोनों

बड़े गुब्बारों में मसल दिए. "चल भाई अब मेरे ऊपर आजा और जैसे मई कहु वैसे हे करना. देख तेरा बहोत बड़ा है कोई गलती नै."

दीदी की आवाज में थोड़ा डर सा था लेकिन हिम्मत भी थी.

अर्जुन उनके पूरे शरीर पर चा सा गया था. घुटने जमीन पर रख दीदी की फैली हुई टांगो के बीच उसने अपने लुंड का टोपा

दीदी के छूट पर रगड़ना शुरू किआ और अपने दोनों हाथो से उनके पपीते आते की तरह घुठने लगा. इस दोहरी मार से माधुरी दीदी

की सिसकरिअ निकलने लगी और उन्होंने अपने हाथ से अर्जुन का लुंड छेद पर टिका लिए. "भाई मेरे होंठ अपने होंठो में दबा ले और जैसे हे

मई इशारा दू तू धक्का मार डीओ.", ये बात बड़ी हिम्मत से कही उन्होंने तोह अर्जुन ने भी सर हिला दिए. दीदी अपने हाथ से हे उसका लुंड छूट

की लकीर में रगड़ रही थी. फिर एकदम छूट के छेद पर लुंड का सूपड़ा टिका दोनों ने होठ से होठ जोड़ दिए.

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दीदी ने अर्जुन की गांड पर हलकी चपत से इशारा किआ तोह एक करारा धक्का लगा दिए अर्जुन ने. न चाहते हुए भी एक तेज चीक उनके मुँह से निकल

गई जो ज्यादा तोह अर्जुन क मुँह में दबी रही पर फिर भी कुछ बहार निकल हे गई. "Aaaaahhhhhhhhhhhhh मई मररररर गइईईई" और वो अपनी गर्दन

इधर उधर हिलने लगी. अर्जुन ऐसे हे रुक गया था. उसके लुंड का सूपड़ा पूरा अंदर जा चूका था और कुछ गरम तरल सा लुंड पे महसूस

हुआ. अर्जुन को ज्योति के साथ किआ सेक्स याद आ गया और वह झुक कर दीदी के बूब्स चूसने लगा और सर को सहलाने लगा. उसका लुंड छूट में

फंस चूका था. कुछ 5 मिनट बाद दीदी शांत हुई. "भाई थोड़ा धीमे से लगा इस बार.' एक बार फिर अर्जुन ने दीदी के होंठ दबाये और पहले

जितना हे तेज धक्का मारा. लुंड सभी रुकावट तोड़ता 6 इंच तक जाकर बैठ गया था छूट में. इस बार दोनों की चींख निकल गई थी. दीदी

की टाइट छूट ने उसका लुंड चील दिए था और लुंड का टंका पूरी तरह से टूट गया था.

"दीदी बस हो gaya."usne गाल थपथपाते हुए कहा और उनके दूध रगड़ने लगा. माधुरी दीदी की तोह बस जान निकालनी बाकी रह गई थी.

ऐसे हे चुके दबाते चूसते अर्जुन ने उनका दर्द काम करने की कोशिश की जो सफल भी रही.

"देख अब बिलकुल धीरे धीरे अंदर बहार कार्यो और जितना गया है उतना हे दाल कर छोड़ मुझे.", दीदी ने इतना बोलै और अर्जुन लुंड बहार

खींचने लगा. लुंड के साथ छूट की दीवारे भी बहार खींचने लगी. दीदी के शरीर में फिर दर्द की लेह दौड़ गई. लेकिन अर्जुन ने अब

दिल मजबूत करके धीरे धीरे लूणदा थोड़ा थोड़ा अंदर बहार करना शुरू किआ. उनकी छूट में भी संकुचन होने लगा था. इतने दर्द के बाद

भी वो उत्तेजित हो रही थी और उसका सबूत था पानी छोड़ती उनकी छूट. अजुन ने बोतल से हे थोड़ा लोशन बहार निकले लुंड पर गिराया और

फिर अंदर बहार करने लगा.

पांच मिनट की इस धीमी चुदाई से कुछ रहत मिली माधुरी को अब उसके चूतड़ भी ऊपर उठने लगे. ये देख अर्जुन ने भी थोड़ा ज्यादा लुंड

बहार निकल कर अंदर करना शुरू कर दिए.

"है भाई बस ऐसे हे .. ाः ऐसे हे कर मेरे भाई. मई निहाल हो गई तेरे जैसा भाई पाकर. कितने प्यार से चुदाई कर रहा है." और ऐसे

सिसकरिअ गूंजने लगी छत्त पर. अर्जुन की टाँगे थकने लगी तोह उसने थोड़ा तेज रफ़्तार से चुदाई शुरू कर दी. अब वह लुंड को सुपडे तक निकलता

और उतना हे अंदर थोक देता. साथ हे साथ वो उनके चूचे भी बेदर्दी से मसल रहा था काट रहा था.

"आह दीदी. कितनी प्यारी छूट है आपकी. अंदर से एकदम गरम जेली जैसी. मेरा लुंड फसा फसा जा रहा है."

"भाई रुक तू थक गया होगा." माधुरी को एहसास हो गया था के अर्जुन के घुटने दर्द करने लगे होंगे. और तकिए उसकी तरफ सरकाया.

अर्जुन ने एक तकिए अपने घुटनो के निचे रखा और दो तकिये दीदी की गांड के निचे सरका दिए. अब छूट ऊपर उठ गई थी. अर्जुन ने अब

दीदी की जांघो को थोड़ा ऊँचा किआ और दीदी के होंठ मुँह में लेकर आखिरी जोरदार धक्का दे मारा. लुंड सीधा बच्चेदानी से जा लगा.

और फिर बिना रुके वह धक्के मारता रहा. अब दीदी की गु गु की आवाज और दोनों की जांघो से पैट पैट की आवाज निकल रही थी. 5 मिनट

तक अर्जुन किसी घोड़े के तरह उनकी छूट को पेलता रहा फिर झुक कर उनके होंठ छोड़ दूध पिने लगा.

"तू तोह पागल हे हो गया थे भाई. जान निकल जाती. पता है अभी तू रुका है फिर भी पेट तक दर्द हो रहा है. "

"दीदी ऐसे तोह ये दर्द कभी ख़तम न होता. इसलिए एक बार ऐसा करना जरुरी लगा मुझे." मुट्ठी में चुके दबाता अर्जुन बोलै

तोह दीदी के आँखें बंद हो गई. "दीदी, आप घुटनो पे आ जाओ न.", और इसके साथ हे उसका लुंड छूट से बहार आ गया. सोडा की बोतल

खुलने पर जैसी आवाज आती है वैसी आवाज आई छूट से. माधुरी भी हिमायत वाली थी. जल्दी हे अपने घुटनो पर हो भाई की लिए गॉधी

बन गई. अर्जुन ने लुंड के सुपडे पर थोड़ा लोशन और लगाया और निशाने पर सटाकर पेल दिए.

"आह भाई दर्द होता है धीरे नहीं दाल सकता था."

"दीदी अभी पूरा कहा गया है थोड़ा बहार है. और आपकी ये मखमली गांड कितनी बड़ी है." कहते हुए अर्जुन ने गांड पकड़ के बचा खुचा

लुंड भी पेल दिए छूट के अंदर.

"यह भाई बस अब मत रुक. जोर लगा के पेल अपनी बहिन को फाड़ दे इस छूट को .. बड़ा तंग किआ है इसने मुझे.", अर्जुन भी अब सटासट पेले जा

रहा था पीछे से. हाथ बढ़ा के उसने दीदी के बूब्स पकड़ रखे थे. सन ऐसा था जैसे किसी दुधारू अमेरिकन गए पर कोई जंगली सांड

चढ़ा हुआ हो. हर धक्के पर लुंड छूट की अंतिम गहराई तक जा रहा था. और ये तीसरी बार दीदी की छूट में संकुचन हुआ था. पहली दो

बार तोह दर्द के कारण वह झड़ते झड़ते रह गई थी लेकिन अब जिस रफ़्तार से अर्जुन चुदाई कर रहा था दीदी बेहोशी की हालत में जा रही थी

आखिरी धक्के ताबड़तोड़ लग रहे थे और दीदी की छूट ने फौवारा छोड़ना शुरू कर दिए. अर्जुन ने भी जड़ तक लुंड फसा कर दीदी की छूट

को अपने वीर्य से भरना शुरू कर दिए. करीब 1 मिनट तक उसका लुंड पिचकारियां मारता रहा और वो उनके ऊपर हे गिर गया. कुछ देर बाद लुंड

खुद से हे बाहर निकल गया. दीदी तोह मूर्छित अवस्था में थी और अर्जुन उनपे लुढ़का हुआ था.

"उठ मेरे ऊपर से भाई." कुछ देर बाद दीदी की आवाज से वह साइड में लुढ़क गया.

"मुझे निचे ले चल रे. सफाई करनी है. मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा." अपना पेट पकड़ती माधुरी दीदी ने अर्जुन से कहा तोह उसने अपनी

बहिन को किसी बची की तरह गौड़ में उठा लिए और अपने कमरे में ले आया. लाइट जलाते हे अर्जुन दीदी की हालत देख कर सेहम गया.

"आह देख केस फाड़ी है तूने मेरी. दीदी ने छूट की तरफ इशारा किआ तोह अर्जुन को फटी हुई खून और वीर्य से भरी छूट दिखी. जो

सुबह किसी माखन की डाली सी थी. जगह जगह उसके दांत के निशा ने थे. चूचे लाल पद गए थे. अर्जुन ने गीले कपडे से दीदी की छूट

साफ़ की और उसपे फ्रिज से निकल के बर्फ रगड़ ने लगा. छूट सुंन्हो गई तोह दीदी का दर्द कुछ काम हुआ.

"भाई देख जरा भैया के कमरे में मेडिकल बॉक्स होगा जरा.", इतना बोलकर दीदी सोफे पर लेट सी गई और अर्जुन भाग के साथ वाले कमरे से

मेडिसिन बॉक्स ले आया, जो हमेशा भैया के बीएड के साथ वाली मज़े पर रहता था. दीदी ने जबतक दवा ली, अर्जुन बाथरूम से उनका सलवार कमीज

उठा लाया. बड़े प्यार से उसने पहले पजामा पहनाया और फिर उनके ऊपर कमीज डाला. माधुरी दीदी भी अपने छोटे भाई का इतना प्यार देख

भावुक हो गई.

"चल अब परेशां मत हो. 2 दिन तक सब ठीक हो जायेगा. एक बार तोह होना हे था ये दर्द.", माहौल को हल्का करते हुए जब माधुरी दीदी ने

ये बात कही तोह अर्जुन ने उन्हें वापिस उठा लिए और ऊपर ले चला. पहले दीदी को लिटाया और फिर उनको अपनी बाहो में भर खुद भी लेट गया.

दीदी ने प्यार से एक गीला चुम्बन उसके होंठो पर किआ और किसी छोटे बचे सी उसकी बाहो में सिमटी सो गई. इस सब में रात के 2 बज गए थे.
 
अपडेट 14

समर्पण


अलका की नींद आज समय से पहले हे खुल गई थी. उसने करवट बदली तोह ऋतू को अपनी तरफ मुँह कर के लेता पाया. वो इस समय बिलुल किसी

छोटी बची की तरह घुटने मोड़ के सोइ हुई थी. अलका ने बीएड के किनारे राखी छोटी गढ़ी की तरफ देखा तोह पाया अभी 4 हे बजे है. वो ऋतू

की तरफ खिसकी और उसको कास के वापिस लेट गई. ऋतू के शरीर से निकलती गर्मी ने उसको जैसे कुछ आराम दिए. फिर ऐसे हे अलका ने पलके

बंद कर ली. बहार अभी अँधेरा हे चाय हुआ था. इधर छत्त पर भी माधुरी दीदी अर्जुन से बिलुल चिपक कर सो रही थी. उनका चेहरा भी

शांत और मासूम था इस पल में. हलकी ठण्ड थी तोह दोनों भाई बहिन के जिस्म जैसे एक हो रखे थे. अर्जुन की आँख चिडियो के शोर से खुली

शायद कही पास में बिजली के खम्बे की तार टूटी थी. आँखें खोली तोह अपनी बड़ी बहिन को अपनी छाती से चिपका पाया. कुछ सोच कर उसने

अपनी जगह एक तकिया रखा और बड़े आराम से चद्दर से बहार आकर वापिस दीदी पर चद्दर ुधा दी. पास में पड़ी एक और चद्दर भी उनपे

दाल कर वह निचे आकर फ्रेश हुआ और तैयार होकर समय से पहले हे दौड़ने चल दिए. अभी तोह रामेश्वर जी भी नहीं उठे थे.

बीती रात को याद करके वो बस धीमी गति से भाग रहा था. सिर्फ 2 घंटे की नींद लेने के बावजूद आज उसका शरीर खुद उसको ऊर्जा से

भरपूर लग रहा था. और एक बात हुई आज. अर्जुन जहा रोज आबादी से दूर नए सेक्टर की तरफ दौड़ लगाने जाता था, आज वह अपने हे सेक्टर

की मैं सड़क के किनारे दौड़ लगा रहा था. कुछ आगे चलने पर उसने देखा के कुछ बुजुर्ग एक पार्क में बैठे व्यायाम और योग कर रहे थे.

एक 5-6 लोगो का झुंड haasya-yog कर रहा था. जहा वह लोग जोर जोर से हंस रहे थे. बड़े बड़े वृक्षों पर बैठे पंछियो की चेहचाहट

इस वातावरण को और मधुर बना रही थी. अर्जुन पार्क के अंदर चला गया और किनारे बने फुटपाथ पर फिर से दौड़ लगाने लगा. लगभग 800

गज लम्बाई के इस बाग़ के 4 चक्कर लगा वो वापिस घर की और निकल चला. अब काफी लोग आने लगे थे वह तोह उसके भी टाइम का अंदाजा हो

गया था. आसमान हल्का नीला सफ़ेद हो चला था. जैसे हे घर में दाखिल हुआ तोह देखा की दादाजी नाहा कर बैठक से अंदर जा रहे थे.

वो भी सीधा ऊपर चल दिए बिना कोई आवाज किये. अपने कमरे में जूते उतार कर उसने कपडे बदल कर घर की चप्पल पहनी और तीसरी मंजिल

पर पहुंच गया. माधुरी दीदी की कपडे की गठरी की तरह चद्दर के अंदर सिमटी हुई थी. फिर उसका ध्यान गया निचे बिछे गद्दे पर.

उलटे 'व्" के आकर में एक फुट के करीब गहरा laal-bhoora धब्बा बना हुआ था वह उस पुराणी चद्दर पर. ये देखते हे अर्जुन को माधुरी

दीदी की चुदाई से फटी हुई छूट याद आ गई. उसने दीदी के मुँह से कपडा हटा कर अपना हाथ उनके माथे पर रखा, जो बुरी तरह तप रहा था.

"दीदी, उठिये और आप निचे चल कर आराम कीजिये. देखो आपको तेज बुखार है.", उसने प्यार से माधुरी दीदी को जगाया. अपनी बड़ी बड़ी आँखों

से माधुरी ने अपने छोटे भाई को अपने पास बैठे देखा. उनकी आँखें भी कुछ लाल हो राखी थी, शायद चुदाई के दर्द और नींद की कमी से.

"भाई तू कब उठा?", इतना बोलकर जैसे हे उठने की कोशिस करि पूरे शरीर में दर्द की तेज लहर दौड़ गई.

"आराम से दीदी. कोई जल्दी नहीं है. और मई एक घंटा पहले हे उठ गया था. और अभी सब सो हे रहे है तोह आप भी निचे अपने कमरे में हे

सो जाओ. ये सब मई उठा लूंगा यहाँ से. चलो मई ले चलता हु आपको निचे.", इतना बोलकर अर्जुन ने दीदी को दोनों बाजु पकड़ के आराम से खड़ा

किआ तोह हिम्मत कर के वह भी कड़ी हो गई. 2 कदम चली तोह फिर रुक गई. "हाय भाई ऐसा लग रहा है जैसे अंदर से छूट कट गई है."

"आप रुको." इतना बोलकर उसने बड़े आराम से दीदी को अपनी बाहो में लिए और धीरे धीरे सीढ़ियां उतरता निचे चल दिए. दूसरी मंजिल से निचे

देखा तोह ताऊजी, कोमल और माँ के कमरे के किवाड़ अभी बंद हे थे. उसी तरह माधुरी को उठाये वह निचे आया और उन्हें उनके कमरे में ले जाकर

लिटा दिए. फिर माथा चूमकर, "आप अभी आराम करो और अगर कोई पूछे तोह बोल देना पानी की वजह से बुखार आ गया है और रात को पाँव स्लिप

हो गया था." "ी लव यू सो मच भाई", अर्जुन के गले में अपनी बाँहों का हार दाल माधुरी दीदी ने एक तगड़ा चुम्बन किआ और फिर लेट गई. अर्जुन

बहार जाते हुए उनका दरवाजा ढलका गया.

छत्त पर जाकर सभी सामान अपनी जगह रख वह खून से सनी चद्दर छुपा कर वह निचे वापिस आ गया. ऋतू दीदी के कमरे का दरवाजा हल्का

खुला हुआ देख थोड़ा हैरान हुआ. "इतनी जल्दी तोह ये कभी नहीं उठती. और अभी थोड़ी देर पहले तोह ये भी बंद हे था." मन में सोचता हुआ

अर्जुन उस कमरे की तरफ चल दिए. हल्का दरवाजा खोला तोह देखा अलका दीदी बीएड से तक लगाए कुछ सोच रही है और उनके हाथ में पानी का गिलास

था. "कुछ खो गया है क्या दीदी?", अर्जुन की आवाज ने अलका की तन्द्रा भांग की तोह वो उसको देख कर मुस्कुरा उठी. पास में ऋतू वैसे हे लेती थी

जैसे पहले थी. "कुछ नहीं भाई. कल शाम को ज्यादा हे सो लिए था फिर रात भी तोह थोड़ा जल्दी उठ गई थी."

"फिर तोह मेरे से हे गलती हो गई. आपको भी अपने साथ हे पार्क ले जाता. दिन शायद और हसीं हो जाता मेरा.", ये कहकर अर्जुन भी दोनों बहने के

बीच लेट गया सीधा. "कुछ भी बोलता है भाई.", वापिस शर्म ने आ घेरा था उन्हें. और अर्जुन को मौका मिल गया था उन्हें छेड़ने का. "वैसे

एक बात कहु दीदी, आप न मेरे साथ सोया करो. क्या पता मुझे और मेरे इस दिल को भी थोड़ा सकूं मिल जाये.", और अलका के पेट पर हाथ रख दिए

अब अलका दीदी ने भी कुछ नहीं कहा और झुक कर खुद हे पहले अर्जुन का गाल चूमा फिर उसके होंठ. अलका दीदी के खुले बालो से उसका पूरा चेहरा

धक् गया था. दोनों प्यार से एक दूसरे के होंठ चूस रहे थे कभी ऊपर वाला तोह कभी निचे वाला. और यहाँ ऋतू ने अपना हाथ अर्जुन के छाती

पर रखा और चिपक गई उस से. अलका और अर्जुन दोनों कुछ देर बाद अलग हो चुके थे. वो वही बैठी बस मुस्कुरा रही थी. अर्जुन अब न उठ सकता

था और न हिल सकता था.

ऋतू कोई खास सपना देख रही थी जो एकदम उसने अपनी एक लात उठा कर सीधे लेते अर्जुन के ऊपर रख दी. अपना मुँह उसकी गर्दन पे. अर्जुन दम

साढ़े लेता रहा. "बुरा फसा आज अलका दीदी के चक्कर में. अब ऋतू दीदी उठ गई तोह मेरे पास कोई जवाब नहीं होगा के यहाँ उनके बिस्तर पर मई

क्या कर रहा हु." अर्जुन यही सोच रहा था और उसके चेहरे पे फैले इस हलके से डर को अलका देख कर हंसने लगी. यहाँ ऋतू शायद यही नींद

में अलका समझकर अर्जुन के ऊपर आधी लेट चुकी थी. दोनों की होंठ हलके हलके छु रहे थे. ऋतू दीदी की उंगलिया अर्जुन की बाहो पर कासी और

नींद में हे उन्होंने अर्जुन के होंठ अपने होंठ से पकड़ लिए. लेकिन जैसे हे हाथ छाती पर आया तोह वो बिलकुल सख्त जगह थी. ऋतू ने आधी सी

नींद में अपनी आँखें खोली तोह निचे अर्जुन को पाया. और इसको सपना समझ फिर से उसके होंठ चूमने लगी. ऋतू दीदी ने अंदर कोई ब्रा तोह पहनी

नहीं थी. उनके बूब्स की चुहान से अर्जुन का लुंड भी सख्त होकर ऋतू की जांघ से ऊपर टकराने लगा. एक बार फिर आँखें खोली तोह निचे अर्जुन

और उसके बराबर में हंसती हुई अलका को पाया. ऋतू को जब कुछ समझ में आया तोह वो शर्म और घबराहट से विपरीत दिशा में पलट गई. बिना हे

उन दोनों की तरफ देखे अलका से पुछा, "ये यहाँ कब आया?"

"तू हे तोह रात को इसके साथ कमरे में आई थी. और फिर पूरी रात तू इसके ऊपर सोती रही. देख ये आज अपनी दौड़ लगाने भी नहीं जा पाया.",

अलका ने सीरियस होकर कहा. "और तोह और मुझे तोह ठीक से सोने भी नहीं दिए तूने. और ये तोह रात से गूंगा हुआ लेता है तेरे साथ.", अभी

चची या माँ आ जाती कमरे में तोह बस हो गया था न हमारा काम". अलका ने और मिर्च मसाला लगाया

ऋतू की तोह आँखें भीग हे गई ये सब सोच कर. नींद में कभी कभी चलने की समस्या थी उसको. ये ज्यादा पढ़ने और देर रात तक जागने से

उसको लगी थी. "यार मई सच कह रही हु मुझे कुछ याद नहीं. तू भी जानती है न मेरी प्रॉब्लम, तू अर्जुन को बता मई ऐसी नहीं हु." अभी भी

ऋतू दीदी अर्जुन की तरफ मुँह करने से घबरा रही थी. अर्जुन को लगा शायद अब ज्यादा हो गया और उसने अपने हाथ से ऋतू दीदी को अपनी तरफ

घुमाया और करीब करते हुए उनके माथे को चूमकर बोलै, "अरे मेरी प्यारी दीदी. आपको लगता है के ऐसा कर सकती हो? नहीं न. मई तोह खुद अभी

5-10 मिनट पहले आया था और यहाँ आके लेटकर अलका दीदी से बात कर रहा था. और आप क्यों घबराती है जब मई हु आपके साथ." और इतना बोलकर

उसने एक छोटा सा किश जड़ दिए दीदी के गुलाबी होंठो पर. ऋतू भी प्यार और शर्म से लिपट गए अपने भाई से. "वाह मतलब अब हमारी तोह कदर हे

नहीं.", अलका ने मुस्कुरा कर ये बात कही तोह ऋतू भी बोली, "अर्जुन इस गरीब को भी थोड़ा प्यार दे हे दे. देख कैसे जल कर लाल हो चुकी है."

अर्जुन ने हँसते हुए अलका दीदी को पकड़ना चाहा तोह वह भाग कड़ी हुई और दरवाजे पर पहुंच के बोली, "मेरे हिस्से का मई पहले हे ले चुकी हु.

सुना नहीं था क्या अर्जुन 10 मिनट से यहाँ था तेरे जागने से पहले." और हंसती हुई भाग गई बहार. 5 मिनट दोनों भाई बहिन ऐसे हे लेते रहे

फिर ऋतू दीदी ने एक और छोटा सा किश किआ और कड़ी हो गई. यही पर अर्जुन की नजर दीदी की टीशर्ट में चोंच दिखा रहे खड़े निप्पल्स पे चली गई

और ऋतू को भी पता चल गया की उसका छोटा भाई क्या देख रहा है. शर्म से दोहरी होती वह मुद गई और अर्जुन भी हँसता हुआ बहार आँगन में आ

गया. "पागल है ये दोनों और मुझे भी कर दिए है." खुद से इतना बोलै और सामने शीशे में अपने ब्रैस्ट देख ऋतू मुस्कुरा उठी. "उसका हे तोह है सब"

.

.

"माधुरी नहीं दिख रही ललिता. कुछ काम कर रही है क्या?", कौशल्या देवी ने अपनी बहु से पुछा क्योंकि इस टाइम ज्यादातर रसोईघर में माधुरी

दीदी हे काम करती दिखती थी. अर्जुन के भी कान खड़े हो गए जो वही बैठा खाना हे खा रहा था अपने ताऊजी के साथ.

"वो माँ जी उसको बुखार आया है एंड फिर रात को पानी पिने के लिए कमरे से निकली तोह फिसल गई थी. पाँव में मोच भी आई हुई है." ललिता जी ने

चिंतित स्वर में हे कहा. अब अलका और ऋतू को भी पता चला के उनकी बड़ी दीदी क्यों गायब थी वह से.

"मई देखती हु मेरी बची को. और बीटा कोमल अपनी माँ को भी कमरे में हे खाना दे आ. उसको भी आराम करने दे.", इतना बोलकर कौशल्या जी उठ गई

"माँ को क्या हुआ है तेजी?", खाना बीच में छोड़ कर अर्जुन ने कोमल दीदी के हाथ से थाली ली और थोड़ा घबराया सा अपनी माँ की तरफ चल दिए बिना

अपनी ताईजी का जवाब लिए. अंदर आया तोह रेखा जी बिस्टेर पर लेती थी. "माँ, क्या हुआ आपको? और आप उठो खाना खा लो फिर मई डॉ को बुला लता हु."

अपने बेटे को इस तरह परेशां देख रेखा जी उठ गई और उसके सर पर हाथ फेरती बोली, "अरे मेरे राजा बेटे मुझे कुछ नहीं हुआ. वो मौसम बदल रहा

है न बस इसलिए थोड़ा बुखार आ गया था रात में. लेकिन अब ठीक हु. तू परेशां मत हो कुछ नहीं हुआ मुझे. रात कोमल ने ध्यान रखा मेरा ाचे से."

बात कह रही थी रेखा जी की कोमल और ऋतू भी अंदर चली आई. "यहाँ तोह मुन्ना अभी भी माँ से चिपका है. जाने कब बड़ा होगा ये?", ऋतू ने अपने

माथे पर हाथ रखते हुए सीरियस चेहरा बनाते हुए ये कहा और फिर अर्जुन को छोड़ कर सब हंस पड़े.

"माँ देखो न दीदी को", अर्जुन ने भी झूठी शिकायत लगाई.

"ाचा ाचा तुम दोनों बहार जा कर लड़ाई करो और माँ को खाना खाने दो. फिर दवा भी देनी है.", कोमल ने दोनों को बहार कर दिए.

कौशल्या जी भी माधुरी दीदी के कमरे से वापिस आ गई थी. "अभी ठीक है पहले से वह. बुखार तोह उतर गया है शाम तक ठीक हो जाएगी."

उन्होंने ललिता जी को बताया. ऐसे हे नाश्ता और रोज का काम ख़तम हुआ. सभी अपने रोज के काम कर रहे थे. 11 बजे के करीब संजीव भैया

घर आये और सीधा Alka/Ritu के कमरे के बाहर थपथपाया. अलका बहार आई और भैया ने उसके हाथो में 2 चाबियां रख दी और मुस्कुरा के

वापिस बहार की तरफ चल दिए. "ऋतू, चल बहार देख हमारी स्कूटरी आ गई." वह लगभग चीखते हु बोली तोह ऋतू भी उसके साथ उछलती हुई

निकल गई.

"वाओ. ये बेस्ट प्रेजेंट है भैया.", ऋतू ने संजीव भैया को सनी पे बैठे देखा तोह कहा.

"वैसे ये तोह मेरा बर्थडे प्रेजेंट है न?", अलका ने ऋतू से कहा

"याद कर अपनी खुद की कही बात", और उसके हाथ से चाबी लेकर सनी के चारो तरफ गोल घूमने लगी

"हँ.", और अलका छोटी बची सी नाराजगी दिखने लगी..

"अले अले मिली बची. तुझे टॉफ़ी मिलेगी, स्कूटरी नहीं.", ऋतू ने फिर चिढ़ाया

"और है भैया इस अलका ने खुद हे कहा था के आप जो भी प्रेजेंट इसको लेकर डोज वो मई राखु.", अब ऋतू ने भैया को पूरी बात बताई

"फिर तोह ठीक बात है. इसको ऋतू हे रखेगी.", भैया आज मजाक के मूड में थे

"कोई बात नहीं. मुझे नहीं चाहिए कुछ भी." और वो जैसे सच में रूठ गई

"अरे मेरी प्यारी दीदी. जो मेरा है वो आपका, और जो आपका वो मेरा. हम में कोनसा बंटवारा है.", ये बात ऋतू ने आँख मारते हुए कही जिसको

संजीव भैया नहीं देख पाए. "वैसे भाइये एक बात कहूंगा, आपने बन्दर को अदरक लेकर दे दी है." अर्जुन अपने दादा जी के साथ बैठा ये

ड्रामा देख रहा था और आखिर में बोल हे पड़ा. भैया और दादाजी तोह हंस पड़े लेकिन ऋतू और अलका दीदी को बात समझ नहीं आई.

"क्या कहा इसने? मुझे बन्दर कहा?", ऋतू ने तैश में नखरे से कहा

"बीटा इसका मतलब है के तुम दोनों को साइकिल चलनी तोह आती नहीं इस स्कूटरी को कैसे चलोगी.", दादा जी दोनों के चेहरे देखे.

"भैया, आप हमे सिखाओगे न?", और दोनों संजीव भाई से निवेदन करने लगी

"गुड़िया मुझे तोह कल से बिलकुल भी टाइम नहीं मिलेगा. 3 शहर और मेरे अंडर आ गए है तोह मई तोह घर भी रोज नहीं आ पाउँगा."

"फिर तोह एक हे काम करते है बीटा के ये स्कूटरी हम अर्जुन को दे देते है.", दादा जी की बात सुनकर दोनों चौंक गई और अर्जुन दोनों को चिढ़ाने

लगा.

"अब तोह फिर ये यही हम दोनों को सिखाएगा नहीं तोह मई पापा को फ़ोन लगा देती हु अभी.", ऋतू ने इतना कहा तोह अब दादा जी ने भी बात ख़तम

करने के हिसाब से कहा. "दोनों एक दिन छोड़ कर बरी बरी से इसके साथ जाओगी रोज सुबह और ये एक घंटा तुम दोनों को हे स्कूटरी सिखाएगा.",

फिर दोनों ने कुछ बात करि आपस में और अलका बोली, "कल ऋतू जाएगी और परसो मई. यही सचेडूले रहेगा रोज सुबह 7 बजे."

"नहीं बीटा नहीं. कुछ पाने के लिए खोना पड़ता है. 7 बजे नहीं 6 बजे और जिस दिन जो 10 मिनट लेट हुआ वो उस दिन घर हे रहेगा." रामेश्वर

जी बोलकर उठ गए. उन्हें पता था के दोनों हे 7 बजे तक उठती है.

संजीव भैया वापिस काम पर चले गए और Ritu/Alka पढाई करने अपने कमरे में. अर्जुन को बस आज की हे आज़ादी थी कल से उसको भी स्टेडियम

जाना था बॉक्सिंग सीखने के लिए. एक बार माधुरी दीदी से मिलकर वो अपने कमरे में बैठ गया. बहार कही जाना नहीं था तोह निक्कर और टीशर्ट

पहन ली आराम करने के हिसाब से. टेलीविज़न चलाया और गाने चला कर बड़े सोफे पर हे आँख बंद कर के लेट गया. थोड़ी देर बाद किसी फिल्म

की आवाज से उसकी आँख खुली तोह अपने पाँव के पास अलका दीदी को बैठे पाया जो थोड़ी थोड़ी देर बाद उसके हे चेहरे को देख रही थी. उन्हें लगा

की वो सो रहा है तोह मैं मार के बैठी रही. "अपने बर्फ के बिना दिल नहीं लग रहा था न.?", अर्जुन ने अलका दीदी को खींच कर अपने ऊपर लिटा

लिए. हैरानी के साथ हे खुश होते हुए वो भी पूरी उसपे लेट गई. "सही कहा भाई. पता नहीं निचे मैं नहीं लग रहा था. तेरी याद आई तोह

यहाँ चली लेकिन तू तोह सो रहा था." कहते हुए खुद हे उन्होंने के किसिंग स्टार्ट कर दी. अर्जुन ने बखूबी साथ देते हुए अपने हाह उनके मटकी

जैसे कूल्हों पर रख दिए. कूल्हों को मसलते हुए हे उसने दीदी के ऊपर के होंठ को पकड़ कर चूसना शुरू कर दिए. फिर हाथ ऊपर आये और एक

हाथ इलास्टिक वाली सलवार के अंदर से उनके नरम चूतड़ को मसलने लगा. दीदी अब अपनी जीभ चुसवा रही थी अर्जुन से और उनके मुँह का स्वाद

अर्जुन को शहद सा मजा दे रहा था. साइड से उसने दुसरे पंजे में उनका एक दूध पकड़ लिए. मजे से दोनों पागल हो रहे थे लेकिन अर्जुन के ये

नहीं पता था के अलका दीदी को ऋतू दीदी ने हे भेजा था और वो खिड़की से दोनों की रासलीला देख रही थी.

"दीदी आपका स्वाद तोह फ्रूट्स जैसा है. मीठा और ऊर्जा से भरा. और आपके ये दोनों अंग कितने सॉफ्ट है. मेरा दिल हे नहीं करता आपको छोड़ने का."

अर्जुन का इशारा समझ अलका दीदी ने वापिस किसिंग पे ध्यान लगा लिए. मजे में उन्होंने अपनी कमर अर्जुन के खड़े लुंड पर रगड़नी शुरू कर दी.

"भाई ये क्या है? बड़ा गरम और गोल है. किसी मोठे डंडे जैसा." जब अलका से रहा न गया तोह कमर हिलना रोक उन्होंने पुछा

"दीदी खुद हे देख लो न आप. मई आपके किसी अंग को पूछ के थोड़ी पकड़ता हु. "

अलका ने झिझकते हुए बहार से हे उसके लुंड पर हाथ रखा और जब रहा नहीं गया तोह निक्कर निकलने की कोशिश करने लगी. लुंड फसा हुआ था

खड़ा होने से और निचे से निक्कर दबी हुई थी. अर्जुन ने कमर उचका कर दीदी का काक आसान कर दिए. किसी स्प्रिंग की तरह अर्जुन का 8 इंची लुंड

अलका दीदी क होंठ से जा लगा.

"हे भगवन. ये क्या है अर्जुन?", उसके आकर से हैरान होते हुए दीदी ने कहा. इधर बाहर कड़ी ऋतू दीदी की भी सांस अटक सी गई थी. उन्हें

थोड़ा किताबी ज्ञान था और कुछ सहेलियों के मुँह से सुना था क लड़के का पेनिस ऐसा होता है वैसा होता है लेकिन ये तोह उसकी हर कल्पना से

परे थे. "ये जाएगा कैसे?" अर्जुन के लुंड को देख उन्हें अपनी छूट का ध्यान आया और वो हिल गई. अंदर भी अलका का यही हाल था.

"क्यों दीदी, क्या सबका ऐसा नहीं होता?", उसने भी गंभीर होकर ये बात कही, लेकिन ये उसकी चुहलबाजी थी

"वो बात नहीं है भाई. मैंने अपनी फ्रेंड्स से सुना था लेकिन ये तोह उनकी बात से बिलकुल हे अलग है."

"दीदी सबका ऐसा हे होता है." अर्जुन वापिस दीदी के बूब्स मसलने लगा. इधर ऋतू ने कुछ इशारा किआ तोह अलका ने एक बार अर्जुन का लुंड सहलाया

और वापिस अंदर दाल कर उसको एक मीठी चुम्मी देती हुई फुर्र से निकल गई.

"आज तूने मरवा हे दिया न ऋतू की बची.", उखड़ती हुई साँसों को सँभालते हुए अलका ने ऋतू से कहा. दोनों कमरे में बैठी थी.

"अरे सच कह रही हु मर्डर हे जाएगी तू अगर उसका तेरे अंदर गया. हे भगवन कितना बड़ा और मोटा है उसका." ऋतू अभी सदमे में थी.

"उसुअल्ल्य 4.5-6.5 इंच के बीच हे पेनिस होते है लेकिन उसका तोह कलाई जितना मोटा और एक गीत का लग रहा था. अलका गलती से भी उसके निचे

न आ जैव."

"एक न एक दिन तोह आना हे है. अब वो रुकेगा नहीं क्योंकि मैंने तोह खुद हे निकला था उसका बहार." अलका सोचते हुए बोली फिर ऋतू को देखते हुए

कहा, "यार तेरा पजामा उतार जरा."

"ये क्या कह रही है तू? नशे में है?" ऋतू हँसते हुए बोली.

"अरे उतार तोह सही एक बार कुछ देखना है." अलका ने विश्वास से कहा और अगले हे पल ऋतू का पजामा निचे पड़ा था. एक पतली सी सफ़ेद कच्ची

पहनी थी बस. "तेरे तोह बाल हे नहीं उगते यार. इधर आ जरा." ये कहते हुए अलका ने ऋतू को कच्ची से पकड़ कर अपनी तरफ खींचा और वह

भी मुस्कुराती हुई आ गई उसके पास. अब ऋतू की कच्ची भी घुटने तक निचे थी. "तेरी तोह मेरे से भी छोटी लग रही है. ऋतू की छूट थी कमाल

की. फक्क सफ़ेद और तराशे हुए मोठे होंठ, कोई 3 इंच लम्बा गुलाबी चीरा, बिलकुल गेहूं के दाने जैसी. कही कोई बाल का रोया तक न था. ख़ास

बात ये थी की उसकी जांघ भी छूट के रंग जैसी हे थी. अलका का मुँह कुछ 6-7 इंच हे दूर था.

"क्यों तेरी ऐसी नहीं है?" ऋतू ने मस्ती करते हुए कहा तोह अलका ने भी अपनी सलवार कच्ची समेत निचे कर दी. दोनों की छूट बिलकुल एक सामान थी

फरक था तोह सिर्फ 2 बातो का. जहा ऋतू की छूट के बहरी होंठ गोर थे अलका के हलके गुलाबी, बालो का निशाँ वह भी नहीं था. लेकिन अलका

की छूट के होंठ इतने फूले हुए थे की चीरा अंदर धसा हुआ था और करीब से देखने पर हे लकीर दिखती थी.

"वाह मेरी बन्नो तेरी तोह मेरे से भी फूली हुई है." ऋतू ने आँख मारी और उसकी छूट पर ऊँगली फेर दी.

"कामिनी मत कर ये. मेरा छूट देखने का मतला कुछ और था. उसका लुंड आगे से इतना मोटा है." अलका ने अपनी ऊँगली और अंगूठे से स जैसा

बनाया. "इतना बड़ा पेनिस और इतनी सी वागिना. सोच टाँगे चौड़ी हो जाएँगी न?" बोलते बोलते ऋतू की छूट को खोल कर देख भी लिए जो लगभग

पूरी बंद हे थी. "तू कहना क्या चाहती है?" ऋतू ने अब गंभीरता से पुछा.

"तुझे याद है 3 दिन पहले कोमल और माधुरी दीदी यहाँ कमरे में तुझ से बातें कर रही थी. मई भी बहार से सुन रही थी साड़ी बात."

"ओह तेरी. याद आया अब. उन्होंने कहा था के किसी का 8 इंच का हो सकता है? और ये सब कैसे होता है. दर्द, सेक्स ेट्स." ऋतू की नजरो में

अलका के लिए प्रशंशा थी.

"और आज दीदी को बुखार है. पाँव में मोच. वो कमरा मेरा भी है तोह 12 बजे दीदी वह नहीं थी. सुबह 4 बजे भी नहीं थी."

"मतलब कोई मोच वॉच नहीं है. उन्होंने..." ऋतू ने बात बीच में हे छोड़ दी. उसकी आँखे बड़ी हो चुकी थी

"एक्साक्ट्ली मेरी जान. बस अब एक काम करना है के हम दोनों को थोड़ी नजर रखनी है."

"क्यों? तुझे बुरा लगा क्या ये सोचकर की अर्जुन और दीदी के बीच कुछ है?"

"तू पागल है ऋतू. नजर से मतलब है के बैठकर तोह हमको कुछ एक्सपीरियंस होने वाला नहीं. अगर दीदी ने उसका लिया है तोह वो फिरसे करेंगे."

अब ऋतू की समझ में आया तोह उसने खुसी से अलका को बहो में लेकर चूम लिए. दोनों की नंगी छूट टकराई तोह करंट सा लगा. अलका ने जल्दी से

सलवार ऊपर करि और बिस्टेर पर बैठ गई.

"कुछ भी बोल अगर तेरी सब बात सही है तोह दीदी है बहुत जिगरवाली. इतना बड़ा झेल कर भी ज़िंदा है." ऋतू ने कहा

"जेहल तोह हम भी लेंगी. और उनसे भी जल्दी बस ये डर काम करना है. तेरी और मेरी हाइट ज्यादा है उनसे. तोह गुफा भी तोह लम्बी होगी."

अब दोनों हंसने लगी और आगे का प्लान बनाने लगी.

शाम हुई और फिर वही सब. खाने के बाद अर्जुन दादा जी पाँव दबा कर सीधा छत्त पर जाकर लेट गया. समय कुछ ज्यादा नहीं हुआ था लेकिन

उसका ध्यान किसी गहरी सोच में था. संजीव भैया अपने कमरे में जा चुके थे. अलका और ऋतू भी एक साथ पढ़ने बैठी थी. माधुरी दीदी

के कमरे में आज ताईजी थी. उनकी तबियत पहले से बहुत ठीक हो चुकी थी. फिर भी दादी जी के कहने पे आराम कर रही थी. रेखा जी भी अब

बिलकुल ठीक थी. इस तरह घर पूरी तरह से शांत था और वही ऊपर अकेला लेता हुआ अर्जुन बस सितारों को देख कर कुछ सोच रहा था. 10:30

बजे तक़रीबन कोमल दीदी अपना बिस्टेर लेकर वही आ गई. उन्होंने बिस्टेर बिछा भी लिए लेकिन अर्जुन को कोई आभास नहीं था उनके होने का.

"क्या सोच रहा है मुन्ना?", उसके साथ हे लेट कर कोमल दीदी ने अर्जुन से पुछा

"दीदी कभी कभी सोचता हु के पहले कैसी जिंदगी थी मेरी. जैसे बचपन से हे फ़ौज की तैयारी शुरू हो चुकी हो. घर से दूर, प्यार से दूर

और सिर्फ हर साल कुछ नए लक्ष्ये थे. कोई नहीं पूछता था के मई कैसा हु, मुझे घर से दूर क्यों किआ. और आज देखो इतना प्यार मिल रहा है

के थोड़ा डर भी लगा रहता है. जैसे ये जल्दी फिर से ख़तम न हो जाये. कही ये एक अवकाश तोह नहीं अगली लड़ाई से पहले?"

उसकी बातों को गौर से सुनकर कोमल दीदी ने अपने छोटे भाई को अपने से लगा लिए. "कुछ भी सोचता रहता है. इतना मत सोचा कर भाई. हम सब है

यहाँ तेरे साथ. तुझे हमसे कोई दूर नहीं कर सकता." और अपनी उंगलिअ उसके बालो में चलने लगी.

"एक और बात है दीदी जो परेशां भी कर रही है लेकिन उसमे कुछ खुशियां भी छुपी है. जब घर से दूर था तब ऐसा कुछ एहसास कभी नहीं

हुआ था. लेकिन जब भी आप या ऋतू दीदी मेरे करीब होती हो मुझे ऐसे लगता है जैसे मई पहले अधूरा था लेकिन आपने मुझे पूरा कर दिए.

मुझे नहीं पता इस एहसास को क्या नाम दू लेकिन जब भी आप मेरे करीब होती हो दिल करता है आपको अपनी बाहों में रख लू. अगर ऐसा मुमकिन होता

के मई किसी में समां सकू या किसी को खुद में समां लू तोह वह आप होती. लेकिन ये है क्या? और क्या ये सब जो भी मेरे साथ हो रहा है वह सही है?"

"प्यार. यही तोह प्यार है मेरे भाई जो किसी अधूरे को पूरा कर देता है. जिसमे कुछ सही गलत नहीं होता लेकिन एक दूसरे के लिए इज़्ज़त, समर्पण

और कुछ भी कर गुजरने की चाहत होती है. और मई जब भी तुझे देखती हु मेरा भी यही हाल होता है. लेकिन जरुरी तोह नहीं के इसको सबके

सामने आने दिया जाये. लोग हर रिश्ते को एक नाम दे देते है लेकिन जरुरी तोह नहीं के उनको रिश्ता जाहिर किआ जाये. दुनिया वैसी नहीं है अर्जुन

जैसी दिखती है. लेकिन एक मासूम दिल से बढ़कर कुछ नहीं. मई तेरे पास होती हु तोह फिर वह ये समाज नहीं होता सिर्फ हम दोनों होते है."

दीदी की बात सुनकर अर्जुन को उसके कई जवाब मिल गए थे. उसने दीदी की कमर पर हाथ रख खुद से सत्ता लिए था. उनकी आँखों को चूम कर वो

शान्ति से लेता रहा. और कोमल दीदी भी अपने भाई की धड़कन महसूस करती रही. कुछ पल के बाद दोनों एक दूसरे को देखने लगे. कोमल उसकी

पीठ सहलाते हुए खुद हे उसका निचला होंठ पीने लगी. और फिर उसकी चौड़ी छाती पे अपना हाथ रख गले पे अपनी सांसें गिराने लगी.

अर्जुन भी दीदी की कमर को सहलाता हुआ उनकी नाभि पे हाथ रख उनके प्यार को महसूस करने लगा. जाने कितनी हे देर दोनों ऐसे प्यार के रंग

भरते रहे. अर्जुन के हाथ जब दीदी की खुली कमीज में पेट से होते हुए उनके चुचों पर गए तब एक पल के लिए कोमल दीदी ने किश करना रोका.

फिर वापिस वो अर्जुन के मुँह में अपनी जीभ दाल उसकी कूल्हे सहलाने लगी. किसी ठोस रबर की गेंद के जैसे उन्नत दूध को दबाते हुए अर्जुन भी

नशे में डूब चूका था. दीदी ने खुद से अपनी कमीज गले तक ऊपर कर दी थी. ब्रा तोह पहले हे नहीं पहनी थी तोह दोनों दूध बेपर्दा हो गए.

किसी छोटे बचे की तरह अर्जुन उनके दूध पी रहा था, हलके हलके निप्पल काट रहा था. कोमल दीदी भी आहे भर्ती हुई बस अर्जुन को सेहला

रही थी. जब दोनों का खुद से काबू ख़तम होने लगा तोह अर्जुन ने दीदी का पजामा निचे सरका दिए और कोमल दीदी अपनी छूट उसके कड़े लुंड

पर रगड़ने लगी. दीदी के एक दूध अब आगे पीछे हो रहे थे जिस से अर्जुन की पकड़ उनके नंगे चूतड़ों पर बढ़ गई. वो उन्हें आते की तरह

गूंथ रहा था और उनका लुंड दीदी की छूट पे जोर से रगड़ खा रहा था. कोमल ने भाई का लुंड पाजामे से आजाद कर दिए और अपनी गीली छूट

का चीरा उसपर घिसने लगी. ऐसे लेते हुए दोनों को परेशानी हो रही थी तोह कोमल अपने भाई के ऊपर लेट कर चिपक गई. उसकी पूरी छूट

अपने छोटे भाई के बड़े डंडे पर अब कास के फिसल रही थी और निचे लेता हुआ अर्जुन बस दीदी के लटक कर झूलते मोठे बूब्स को देख कर मजे

ले रहा था. पूरा लुंड छूट की चिकनाई से गीला हो चूका था के तभी दीदी उसकी छाती पर गिर कर हांफने लगी और उनकी छूट से ढेर सारा

शहद अर्जुन के लुंड पर टपकता रहा. अभी तक दोनों चुप हे थे. अर्जुन ने दीदी को पलट कर अपने निचे ले लिए और दीदी भी आ गई उसके लुंड के

निचे. उनकी छूट के शहद से भीगा लुंड अर्जुन ने वापिस छूट पर टिकाया और घिसने लगा. सूपड़ा अब छूट के दोनों होंठ ाचे से फैलते हुए

पेट की तरफ आ जा रहा था. कोमल दीदी की सिसकारी तेज हो चुकी थी और उन्हें शांत करने के लिए उन्होंने अरजुन को मुँह अपने अपने मुँह में भर लिए

अर्जुन अब उनके बड़े चूचे कुचलता हुआ तेज तेज घिसाई कर रहा था. एक समय पर उसका लुंड अपनी दिशा से भटक कर छूट के छेड़ पर लगा तोह

कोमल अंदर तक हिल गई. अब उसको एहसास हुआ था अर्जुन के लुंड की मोटाई का. लेकिन अर्जुन ने वापिस घिसाई करना हे ठीक समझा. माधुरी दीदी की

हालत उसके दिमाग में बस चुकी थी और अब वह कोमल दीदी को भी वह दर्द नहीं देना चाहता था. तक़रीबन 25 मिनट के बाद हे अर्जुन क लुंड ने लावा

उगला, जो दीदी के पेट, चुचों और छूट के ऊपर गिरा था. पास में राखी अपनी टीशर्ट से उसने खुद दीदी को साफ़ किआ और उनको नंगे बदन हे खुद

से चिपका कर लेट गया. दोनों भाई बहिन अब नींद के आगोश में थे, जहा लुंड छूट से चिपका था और चूचे भाई की छाती से.
 
अपडेट 15

नया दिन- नए अनुभवग - Part 1


ललिता जी एक खुली सी मैक्सी पहन कर बाथरूम में घुसी. अगले हे पल वह उस एक मात्र कपडे से बहार शावर के निचे कड़ी अपने तपते शरीर

पर ठंडा पानी गिरा रही थी. इस उम्र में भी उनके बड़े गुब्बारे ज्यादा नहीं झुके थे, ऊपर से उनकी केहर ढाती बड़ी गांड जो उनके हिलने

से और भी थिरक रही थी. इतने खूबसूरत शरीर वाली औरत के मुँह पर उदासी घिरी थी. वो संस्कारी महिला थी लेकिन फिर भी हर शरीर

की एक जरुरत और खुराक होती है. अगर वो न मिले तोह उसका हाल बुरा हे होता है. और यही आज उनके साथ एक बार फिर हुआ था. राजकुमार जी

को 5 दिन के लिए बहार जाना था तोह उन्होंने जाने से पहले अपनी गदराई बीवी को गरम करने के बाद अधूरा हे छोड़ दिए था. वो तोह 4 बजे

निकल गए दूसरे शहर और जाने से पहले अपनी बीवी की नींद ख़राब कर गए. पिछले 4-5 साल से उनका यही हाल था. राजकुमार जी खुद 2-3

मिनट में ख़तम हो जाते थे लेकिन ललिता जी तड़पती रह जाती थी. इस बात का असर उनके स्वभाव पर काफी गहरा हुआ था. वो ज्यादा नहीं

बोलती थी और ज्यादातर गुमसुम अकेली रहती थी अपने कमरे. सिर्फ घर के काम करते समय हे वो खुश रहने का मुखौटा ओढ़ लेती थी. आज भी

हाल कुछ ऐसा हे थे. पानी के निचे खड़े होकर भी जब शरीर की गर्मी काम न हुई तोह उन्होंने अपने हाथ से अपनी छूट रगड़नी शुरू कर

दी और दूसरे हाथ से खुद हे अपने बूब दबा रही थी. ऊपर पानी बह रहा था निचे पानी निकालने ने की कोशिश हो रही थी.

अर्जुन की आँख आज फिर टाइम से पहले हे खुल गई थी. उसने देखा उसका लुंड दीदी की छूट से चिपका खड़ा हुआ था लेकिन वह नज़रअंदाज कर

खड़ा हुआ. अपनी दीदी को हिला कर कपडे पहन ने के लिए बोल निचे आ गया. कोमल जैसे तैसे कपडे पहन वापिस सो गई. इधर जूते पहन कर

अर्जुन पिछली सीढ़ियां पकड़ रसोईघर में पानी पीने लगा और उधर ललिता जी को ऊँगली से भी आराम न मिला तोह वह बदहवास सी नंगी हे अपने

कमरे की तरफ चल दी. यहाँ वो बहार निकली उधर अर्जुन, और दोनों हे अब एक दूसरे के सामने खड़े थे. ललिता जी तोह पत्थर हो गई थी और उनके

इस भरे हुए शरीर को देख अर्जुन उसमे हे डूब गया था. ज्यादा रौशनी नहीं थी लेकिन इतनी थी की दोनों को एक दूसरे का भरपूर नजारा हो रहा

था. किसी कमरे में अलार्म बजने से दोनों होश में आये तोह अर्जुन अपने रस्ते चल दिए और ललिता जी अपने. दोनों में कोई संवाद नहीं हुआ था. लेकिन

ललिता जी ने अपने भतीजे की आँखों की चमक ाचे से पढ़ ली थी.

6 बजे तक वही हुआ जो बाकि दिन रहता था लेकिन आज अर्जुन को ढूंढ़ती ऋतू दीदी बगीचे में आ कड़ी हुई थी. यहाँ दादा पोता दोनों मिलकर पेड़-

पौधों को पानी दे रहे थे.

"चलो माली अब अपनी मेमसाब को स्कूटरी सीखने का टाइम हो गया है. नहीं तोह दादा जी कह कर पगार कटवा दूंगी.", दादाजी ने ऋतू की बात

सुन अर्जुन को बहार किआ.

"चलिए मेमसाब", और अर्जुन स्कूटरी को किकस्टार्ट कर गेट से बहार लेकर ऋतू को पीछे बिठाया.

"दीदी हम अगले सेक्टर चलते है वह बड़ा ग्राउंड है और पूरा खाली."

"ठीक है चलो फिर. और कोई शॉर्टकट नहीं, ाचे से सीखना."

"वादा करता हु आपको एक्सपर्ट बना कर हे दम लूंगा." अर्जुन ने बात तोह सीढ़ी की थी लेकिन ऋतू जानबूझ कर उसका गलत मतलब सोचने लगी.

"है अब तोह एक्सपर्ट बन हे जाउंगी अगर तू प्यार से सिखाएगा."

ऐसे हे दोनों उस ग्राउंड में पहुंच गए. ये जगह पूरी वीरान थी और जमीन भी समतल साफ़ थी.

"दीदी देखो ये रेस है. अपने हाथ से इसको पीछे करोगी तोह स्कूटरी आगे चलने लगेगी. लेकिन ध्यान रहे की इसको ज्यादा नहीं खींचना.

बिलकुल आराम से. इसके आगे जो ये रोड है ये अगले टायर के ब्रेक है. सिर्फ इमरजेंसी में हे दबाना. ये लेफ्ट साइड वाला रोड पिछले ब्रेक है.

स्कूटरी को इस से रोकना बेहतर है. जब भी ब्रेक लगाना हो तोह रेस नहीं देना. आज मई आपको बैलेंस बनाना सिखाऊंगा और कुछ नहीं."

ऋतू सब धयान से देख सुन रही थी और फिर अर्जुन सीट पर पीछे सरक गया. ऋतू दीदी आगे बैठी तब अर्जुन ने उनके हाथ हैंडल पर

रख अपने हाथ उनके ऊपर रखे. धीमी रेस दी तोह स्कूटरी आगे बढ़ने लगी.

"दीदी बिलकुल घबराना नहीं. ये हैंडल बस सीधा रखना और जितना रेस अभी है उतने पे रहने देना. मई आपके साथ हु." अर्जुन ऋतू दीदी

से बिलकुल चिपक कर बैठा था और हैंडल पे उसके हाथ बस हलके से हे रखे थे. ऋतू को साइकिल चलनी आती थी तोह काफी हद तक

वो ठीक कर रही थी. जब भी घूमना होता तोह अर्जुन उनके हाथ पकड़ कर खुद स्कूटरी मोड़ देता. ऐसे टाइम पर ऋतू के मुलायम दूध

उसकी बाजु से डाब जाते और ऋतू को ाचा लगता ये नया एहसास. कुछ 15 मिनट बाद वो बस अपनी गांड पर अर्जुन के लुंड की गर्मी और बूब्स

पर उसकी बाहो क स्पर्श का मजा ले रही थी. अर्जुन तोह जब से उठा था तभी से उत्तेजित था और अब इस गर्मी को ऋतू दीदी ने और भड़का दिए

था. कुछ टाइम बाद उसने ग्राउंड के आखिरी कोने में स्कूटरी रोक दी. उसके दोनों पेअर जमीन पर लगे थे और उसने दीदी के कंधे पर अपना

सर टिका उनके दोनों अनार पीछे से हे हाथो में थाम लिए. "मई यही तोह चाहती हु भाई. नहीं तोह स्कूटरी के लिए कोण इतनी सुबह उठेगा."

अपने भाई द्वारा बूब्स दबाये जाने पर ऋतू ने मन में यही बोलै और बहार एक हलकी सिसकी निकल गई. उस मजे की आवाज को सुनकर अर्जुन उनकी

गर्दन पर चूमने लगा. अपने पेअर से उसने साइड स्टैंड लगा दिए था. ऋतू ने भी अपनी कमर पीछे धकेल दी जिसके निचे अर्जुन का खड़ा लुंड

डाब गया. अपनी गांड पर अर्जुन के मोठे लुंड को एहसास होते हे ऋतू ने गरदारन घुमाई और भाई को चूमने लगी. टीशर्ट खुली थी तोह अब

अर्जुन के हाथ ब्रा पर पहुंच गए थे. वो उस नरम कपडे क ऊपर से हे उनके बूब्स मसल रहा था. पजामी की अंदर कच्ची नहीं थी तोह नरम

गांड पर गरम लुंड का भी असर होने लगा था. वो दोनों बस ऐसे हे ऊपर ऊपर से एक दूसरे को खुश करने में लगे थे और ऋतू को अपनी छूट

में दबाव सा बनता महसूस हुआ. अर्जुन ने अपने लुंड को और आगे किया तोह वह ऋतू के छूट क होंठो के निचले हिस्से पर चुभने लगा. इसके

साथ हे वो बुरी तरह से अकड़ गई और दीदी की छूट के पानी को अर्जुन ने अपने लुंड पर भी महसूस किआ. उसने हाथो की हरकत रोक दी बस

बूब्स पकडे रखे. जब 2 मिनट बाद ऋतू नार्मल हुई तोह अर्जुन पीछे से उठकर आगे आकर बैठा, स्कूटरी ों करि और वापिस घर की तरफ

चल दिए. दोनों चुप थे लेकिन मुस्कान गहरी थी उनके चेहरे पे. ऋतू को तोह आज पता लगा था के "ओर्गास्म" क्या होता है.

"भाई बस ऐसे हे सिखाता रह मुझे. एग्जाम ख़तम होते हे तेरा पूरा न ले गई तोह मई ऋतू शर्मा नहीं.", उसने मन में ये बात कही और फिर

खुद हे अपनी बात पे हंसने लगी.

"दीदी उतरो, घर पहुंच गए.", ये बात सुनते हे ऋतू बिना मुड़े स्कूटरी से उतर कर तेजी से अंदर दौड़ गई. उसकी छूट गीली थी और सलवार

भी. अर्जुन को ये पता था तोह वह बस मुस्कुरा भर दिए. "दीदी भी न, कमाल हे है." और अंदर आ गया.

"मजा आय तुझे आज?", अर्जुन जब खाने की मज़े पर बैठा तोह बराबर में हे बैठी अलका ऋतू से पूछ रही थी

"इतना के बता नहीं सकती. तू खुद हे पता कर ले." दोनों धीमी आवाज में बात कर रही थी लेकिन अर्जुन के कान वही लगे थे.

"ोये हे. पहले हे दिन तू बारिश में भीग आई."

"कल तू अपने बादल बरसा लेना. कौन रोक रहा है." ऋतू ने मस्ती में जवाब दिए.

"अरु, चल भाई खाना शुरू कर. ठंडा हो रहा है." माधुरी दीदी ने ये कहा तोह अर्जुन उन्हें ऊपर से निचे तक निहारने लगा.

"आप ठीक हो?" अर्जुन ने सिर्फ इतना कहा और माधुरी दीदी ने हाँ में गर्दन हिलाई

ऋतू और अलका ने सब देख लिए था और फिर वह भी खाना खाने लगी.

"ताऊजी नजर नहीं आ रहे. न हे भैया." खाने के दौरान हे अर्जुन ने ये बात कही तोह ताई जी ने झिझकते हुए जवाब दिए

"बीटा वो तोह सुबह 4 बजे चले गए थे पंजाब, 5-6 दिन तक आएंगे. और तेरा भाई भी अब रविवार तक हे वापिस आएगा."

आज तोह गुरूवार है. मतलब आज मुझे भी स्टेडियम जाना है." अर्जुन को याद आ गया था के आज से उसका भी टाईमटेबल बदल रहा है.

"भाई कल मेरा एग्जाम है तोह तू ध्यान रखिओ." अलका ने ऋतू के साथ अपने कमरे में जाते समय कहा. कोमल और माधुरी दीदी भी अब उनकी

जगह बैठ कर नाश्ता कर रही थी. अर्जुन दोनों हे बहनो को देख रहा था. "भगवान् ने भी बिलकुल सही जोड़ी बनाई है. माधुरी दीदी और

कोमल दीदी दोनों कितनी भरी भरी और गदराई हुई है. ऋतू दीदी और अलका दीदी गोरी, लम्बी और मस्ती से लबरेज है." वो मन हे मन तुलना

कर रहा था. "लेकिन सभी को भगवन ने फुर्सत से हे बनाया है. दिल भरता हे नहीं."

अपने भाई को यु मंद मंद मुस्कुराते देख कोमल और माधुरी दीदी भी खुश हो गई.

"वो ऊपर मेरी अलमारी सेट कर देना माँ अगर आपको समय हो जब भी. मेरे कपडे शायद अभी निचे हे है. और भैया के कमरे को भी देख लेना."

इतना बोलकर अर्जुन दूसरी मंजिल पर ड्राइंग रूम में बैठ गया. एक किताब उसको दादाजी ने दी थी, सामान्य ज्ञान की तोह वह उसको हे पढ़ने लगा.

एक घंटे बाद दरवाजे पर दस्तक हुई तोह देखा ताईजी कड़ी थी बहार. उनके हाथ में झाड़ू था और पूछे की बाल्टी उन्होंने बहार हे रख दी

थी.

"ताई जी मुझे आवाज दे देते मई ऊपर ले आता. आपने कष्ट क्यों किआ ऊपर तक बाल्टी लेके आने का.?" उसने अपनी ताईजी की फ़िक्र करते हुए कहा

"बीटा इतना भी कोई खास वजन नहीं है. चल तू पंखे बंद कर पहले मई झाड़ू दे देती हु.." "ठीक है ताईजी. आप आओ अंदर."

अर्जुन ने ड्राइंग रूम का पंखा बंद कर दिए. बाकी दोनों पंखे बंद हे थे. ताईजी पहले भैया के कमरे में गई. अपनी साड़ी जो अभी तक सर

पे पल्लू सी लिपटी थी उन्होंने अपनी कमर में ठूंस ली. और निचे झुक कर सफाई करने लगी. अर्जुन बहार सोफे पर हे बैठ था.

"बीटा जरा पलंग सरकावा दे." ताईजी की आवाज से वो वह गया तोह ताईजी झुक कर पलंग हिलने की कोशिश कर रही थी. उनका ब्लाउज उनके

भारी खजाने के समेत नहीं पा रहा था. वो बहार निकलने को जैसे मचल रहे थे. अर्जुन ने नजारा लेने के बाड़ा पलंग सरका दिए.

"यहाँ से साफ़ कर दू फिर वापिस वही कर देंगे इसको." और ताईजी फिर झाड़ू लगाने लगी. जब सामने होती तोह उनके गोर पपीता दिखने लगते

और जब घूम जाती तोह उनकी बड़ी गांड नजर आने लगती. अर्जुन का तोह बुरा हाल हो चूका था. पंखे बंद थे और हवा न चलने से ताईजी

को पसीना भी आ रहा था. उनकी चूचियों की खाई के बीच में पसीने के बुँदे समां रही थी. ये दृश्य इतना कामुक था के अब लुंड पाजामे

से बहार नजर आने लगा था. ताईजी कनखीओं से अपने मुन्ने की हरकत देख रही थी लेकिन वो चुप थी. शायद उनके संस्कार रोक रहे थे.

"चल अब तेरे कमरे में आजा." वह का कूड़ा ड्राइंग रूम की तरफ कर वह अर्जुन की कमरे में सफाई करने लगी. मैले कपडे समेत कर बहार

सोफे पर रखे और गद्दा दिवार के साथ सत्ता के खड़ा कर दिए. इस दौरान भी अर्जुन बस उनको आगे पीछे से देख कर हे उत्तेजित हो रहा था.

कुछ हे पल में वो कमरा भी साफ़ हो गया. ताईजी ने अगले 5 मिनट में ड्राइंग रूम भी साफ़ कर सारा कूड़ा बहार कर दिए.

फिर बहार झाड़ू रख पूछा बाल्टी उठा अंदर आ गई. अर्जुन ने भी तीनो पंखे चला दिए. बाल्टी ड्राइंग रूम में रख ताईजी पूछा गीला

कर भैया के कमरे में चली गई. अर्जुन ने खुद को कण्ट्रोल करने के लिए सोफे पर हे बैठना ठीक समझा. थोड़ी देर बाद जैसे हे उसकी नजर

भैया के कमरे की तरफ गई जो हिस्सा ड्राइंग रूम से दीखता था, अर्जुन की खोई उत्तेजना झटके से वापिस लौट आई. ताई जी की गोरी पिण्डलिया

चमक रही थी. और बैठकर हिलने से साड़ी के अंदर उनकी जांघ तक नजर आ जाती थी. अब एक बात और हुई के ताईजी के ब्लाउज का एक बटन

खुल चूका था. जैसे हे वह झुकती उनके बड़े दूध के साथ अंदर पहनी सफ़ेद ब्रा के कप भी नजर आ जाते. मोठे चुचों के बीच सोने का

मंगलसूत्र तोह उन्हें काम की देवी बना रहा था. ललिता जी को पता था के अर्जुन क्या देख रहा है बस वह धीमे धीमे उसके सामने हे काम

करती रही. फिर अर्जुन के कमरे में भी पूछा दिए और आ गई ड्राइंग रूम में. "जरा ये सोफे थोड़े हिला दे यहाँ से" उन्होंने बोलै और अर्जुन ने

हटा दिए. वो उसके सामने जब इस बार झुकी तोह उनके मुँह से कराह निकल गई. "आई मा.." अर्जुन ने भी ये सुना और जब देखा तोह अपनी ताईजी

के चेहरे पे दर्द दिखाई दिए.

"क्या हुआ ताईजी.? आप यहाँ बैठो.", और अर्जुन ने उनको सहारा देखर सोफे पे बिठाया.

"बीटा लगता है की कमर में मोच आ गई है या कोई नस चढ़ गई है." और एक कराह निकल गई

"आप कहो तोह मई माँ को बुलाता हु?"

"नहीं बीटा अपनी माँ को क्यों परेशां करता है. बस 2 मिनट में ठीक हो जायेगा ये दर्द." वो पसर सी गई थी सोफे पर. उनकी सांस के साथ उनके

ढूढ़ भी हिल रहे थे. साड़ी अब साइड में लटक रही थी ऊपर से. ऐसे हे थोड़ी देर बाद वह उठी और निचे चल दी धीमी चाल से. कुछ देर बाद

कोमल दीदी ने बाकी सफाई करि और वह भी चली गई.

सोफे अपनी जगह वापिस सेट किये और गद्दा ठीक कर वो वही लेट गया. 3 दिन से ठीक से सो नहीं पा रहा था रात को तोह वह कुछ हे देर में

ढेर हो गया.

दोपहर के समय कोमल और माधुरी दीदी ने बहार वाले आँगन में कपडे धोने की मशीन लगा राखी थी. माधुरी दीदी मैले कपडे मशीन में

दाल कर साफ़ कर रही थी और कोमल कपड़ो को निचोड़ आँगन में लगी रस्सी पर सूखने के लिए दाल रही थी.

"कोमल तू यहाँ मशीन पे नज़र रख मई जरा बाथरूम होकर आई." माधुरी दीदी को पेशाब लगी थी.

"है दीदी मई यही हु."

माधुरी दीदी ने वही बहार वाले बाथरूम के कमोड पर बैठते हुए अपनी salwar-kachi नीचे करि और बैठ गई. चररर की आवाज से धार निकलने

लगी. "कमीने ने एक हे बार करके सीटी की आवाज हे बदल दी.", माधुरी दीदी अपनी हे पेशाब की बदली हुई आवाज सुनकर शर्मा गई थी. उनको फिर

अर्जुन के लुंड की याद आ गई. अपनी छूट को पानी से साफ़ करते हुए उन्होंने ध्यान से देखा तोह वो अब उसके होंठ और मॉटे हो गए थे और बीच

का चीरा हल्का खुल गया था जो पहले हर वक्त चिपका रहता है. इतने में उनकी छूट में खुजली होनी शुरू हो गई. "हाय राम लगता है अब चैन

ऐसे नहीं आएगा."

"दीदी, आपको ताईजी बुला रही है.", कोमल की आवाज सुनकर माधुर दीदी ने अपनी कच्ची और सलवार ऊपर करि और घर के अंदर चल दी.

"बीटा दिन का खाना आज तू अपनी चची के साथ बना लेना. तेरी माँ की कमर और जांघ में नस खिंच गई है." कौशल्या जी माधुरी की माँ के

पास बैठी थी और अपनी बहु की पीठ पर टिल के तेल से मालिश कर रही थी.

"है तोह दादी इसमें क्या बड़ी बात है. मई कर लुंगी."

"मेरी सबसे प्यारी बची है ये. घर का सारा काम खुद हे संभल लिए. जब ये चली जाएगी तोह पता नहीं Ritu/Alka क्या हाल करेंगी." दादी ने

लाड से ये बात बोली तोह माधुरी दीदी बहार को निकल चली बोलती हुई, "दादी मई कही नहीं जाने वाली. यही रहूंगी.", हंसती हुई रेखा जी के

पास बैठ गई जो सब्जी काट रही थी. हलके पीले रंग की काली पट्टी वाली साड़ी और काले ब्लाउज में रेख जी किसी नै ब्याही युवती लग रही थी.

उनका सफ़ेद सपाट पेट काले तंग ब्लूज़ के नीचे और आकर्षक लग रहा था.

"चाची क्या लगाती हो आप.? 3 बचे होने के बाद भी मेरी हमउम्र लगती हो", माधुरी ने आता चांटे हुए चाची को गौर से देखते हुए पुछा.

वो खुदकी तुलना चाची जी से कर रही थी.

इस उम्र में भी चची कमाल की है. बड़े गुलाबी होंठ, लम्बे काले घुंगराले बाल जो ज्यादातर बंधे रहते थे, भारी कूल्हे जो किसी भी हाल में

उसके कूल्हों से काम न थे, चूचे शायद एक साइज काम थे लेकिन फिर भी अकड़े हुए रहते थे.

"कभी तोह अपनी चुहलबाजी बंद कर दिए कर. मेरी उम्र ज्यादा हो चली है तोह अब मजाक उड़ाने लगी?", रेखा जी ने ये बात ऊपर ऊपर से हे कही

थी. उनको भी माधुरी की बात सुनकर ाचा लगा था.

"अब आपने नहीं बताना तोह रहने दीजिये. लेकिन जो सच है वही कहा मैंने. खुद हे देख लीजिये वह ज्योति की माँ आपकी उम्र की है लेकिन कहा वो

50 की लगती है और आप अभी भी 25 की."

"अररि पागल कुछ भी नहीं है बस जो मेरा रूटीन है वही है. और तेरे चाचा जी भी मेरा ाचे से ख़याल रखते है. तेरी शादी हो जाने दे

तुझे खुद पता चल जायेगा." रेखा जी ने बात तोह कह दी कहने को लेकिन माधुरी की आँखों के सामने उस रात वाला मंजर आ गया. चाचा क्या

मजे से चाची की चुदाई कर रहे थे और चाची भी कुछ काम नहीं थी. उसको अब समझ आया के चची की सुंदरता का राज क्या है.

"चल ला ये आता मुझे दे और सब्जी चढ़ा दे चूल्हे पर."

"है लीजिये."

"कोमल तू जा अपने भाई को जगा दे. उसने फिर जाना भी है.", रेखा जी ने गलियारे में आती कोमल को आवाज दी.

"जी माँ."

.

.

खाने से फ्री होने के बाद अर्जुन ने कपडे बदले. ट्रैक पजामा और टीशर्ट पहन कर अपने जूते कास वो दादा जी के कमरे में आया.

"वो कोच सर ने कोई जरुरी सामान तोह नहीं बताया था दादा जी साथ लाने को?", रामेश्वर जी ने अख़बार निचे रख अपने पोते को समय से पहले

हे तैयार देखा और उन्हें नाज हुआ उसके अनुशाशन को देख.

"नहीं बीटा. वो क्या है के अभी तोह आज और कल ऐसे हे जाना है. फिर सोमवार को क्या करना है वही तुझे बता देंगे. जो भी लेना हो मुझे बता

देना या अपनी दादी को. और सिर्फ अपने काम में ध्यान लगाना." उन्होंने ने नसीहत भी दे हे दी. थोड़ी चिंता रहती थी उनको क्योंकि अर्जुन अनजान

जगह ज्यादा कभी गया नहीं था.

"है दादा जी आप निश्चिन्त रहिये. ाचा अब चलता हु. पहला दिन है तोह थोड़ा जल्दी जाना ठीक रहेगा."

ये स्टेडियम राष्ट्रीय स्तर का था और लगभग हर खेल की कोचिंग यहाँ होती थी जहा पूरे देश के कोने कोने से प्रतिभाशाली बचे और खिलाडी

आते थे. क्रिकेट, जुडो, हॉकी, टेनिस, बैडमिंटन, कुश्ती, बॉक्सिंग और एथलेटिक्स के तोह rashtriya/antarstriya मैच और प्रतियोगिता यहाँ होती रहती

थी. लम्बी चौड़ी लिस्ट थी यहाँ कोचिंग देने वाले बड़े बड़े खिलाडी रह चुके व्यक्तियों की. हर खेल का उच्च स्तरीय सामान और सहूलियत थी. अर्जुन

को सिर्फ पहचान की वजह से आसानी से दाखिला मिल गया था.

"वाह. ये तोह पूरा हे शहर है गेट के भीतर." अर्जुन लाजवाब हो गया जैसे हे अंदर आया. अपनी साइकिल लगा कर बॉक्सिंग प्रैक्टिस एरिया की पूछताछ

करने के लिए वो किसी खली इंसान को ढून्ढ रहा था. सब तरफ तोह खिलाडी प्रैक्टिस हे कर रहे थे. जहा वह खड़ा था वह पर बास्केटबाल और

टेनिस के लगभग एक डोज़ेन कोर्ट थे जहा सब पूरी म्हणत से लगे हुए थे. लड़के और लड़कीअ सभी. बस उनके कोर्ट अलग अलग थे. तभी उसकी नजर

एक हट्टे काटते लड़के पर गई जो सिर्फ निक्कर और बनियान पहने था. देख कर हे पहलवान लग रहा था और शायद गांव से था.

"सर, ये बॉक्सिंग विभाग किस तरफ है.?", अर्जुन ने उसके पास जाट हुए पुछा. वो लड़का रुक कर पहले तोह अर्जुन को गौर से देखने लगा फिर थोड़ा मस्ती

से बोलै, "क्यों भाई तेरा कोई रिश्तेदार है वह.?"

"नहीं सर वो मुझे कोच जोगिन्दर जी से मिलना था."

"देख भाई पहली बात तोह मई कोई सर नहीं हु. और दूसरी मेरा नाम है विकास पुनिअ. और तेरे काम की बात ये के मई भी उधर जा रहा हु. चल."

अर्जुन भी विकास के साथ हे चल दिए. "मेरा नाम अर्जुन शर्मा है और आज से हे मई अपनी कोचिंग शुरू करूँगा."

बातचीत की शुरुआत करनी चाही उसने तोह देखा की विकास अपने दोनों हाथो पर गरम पट्टी बांध रहा था चलते चलते.

"देख छोटे भाई तेरा पहला दिन है तोह कोच साहब से पहले मई हे एक ज्ञान की बात बता दू. गांठ बांध लिओ. यहाँ पर सिर्फ अपने काम से काम रखिओ

और किसी से ज्यादा बातचीत न कार्यो. खास कर किस छोरी से. और तू शरीफ लड़का है उम्र भी कच्ची है तेरी. ज्यादातर खिलाडी या तोह पागल होते है

या फिर बदमाश. बच के रहियो. आ गया तेरा बॉक्सिंग जोन."

"थैंक यू विकास भैया." जाते हुए अर्जुन ने जब भैया कहा तोह पहलवान भी मुस्कुरा के चल दिए. उसका प्रैक्टिस पॉइंट आगे था.

"सर, मुझे श्री रामेश्वर जी ने यहाँ भेजा है और श्री जोगिन्दर जी से मिलना है." अर्जुन ने एक दाढ़ी वाले 50 साल के आदमी से ये बात कही जो

अकेला कुर्सी पर बैठा था. कुछ हे दुरी पर 15-16 लड़के बॉक्सिंग के प्रैक्टिस कर रहे थे.

"अर्जुन. यही नाम है बीटा? मई हे हु जोगिन्दर सिंह. आओ मेरे साथ." अर्जुन ने हाथ जोड़े जब उन्होंने खुद हे अपना परिचय दिए. कुछ देर वो अर्जुन

बॉक्सिंग की साधारण सी बातें समझते रहे और जो भी bache/khiladi प्रैक्टिस कर रहे थे उनके बारे में बताते रहे.

"देख बीटा पंडित जी ने बहुत कुछ बताया है तेरे बारे में और देखकर हे पता चलता है के तू अनुशाषित भी है और फिट भी है. तुझे बस

अपनी फुर्ती और कंधे की मजबूती पर काम करना है. ये टाइल वाली सड़क देख. ये यहाँ से गोलाई में जाती हुई वापिस आती है. तू एक चक्कर लगा

कर शरीर गरम कर. फिर आगे की बात करते है."

"जी सर." कहते हे अर्जुन चल दिए उस सीमेंट की 6 फ़ीट चौड़ी पट्टी पर. 50 कदम बाद हे वह गति से भागने लगा जैसा सुबह करता था.

"पट्ठा बाप से भी तगड़ा है." जोगिन्दर जी ने अर्जुन की तुलना अपने दोस्त और उसके बाप शंकर जी से की थी. ये बात अर्जुन को नहीं पता थी

की कोच उसके पिता जी के बचपन के दोस्त है.

पट्टी के दोनों हे तरफ अलग अलग खेलो के प्रशिक्षण हो रहे थे. ज्यादातर अर्जुन से बड़ी उम्र के हे थे. ये पट्टी भी एक कम से ऊपर हे थी लम्बाई में

आगे हॉकी का मैदान भी था जहा पर कुछ 20 लड़कीअ स्कर्ट पहन कर प्रैक्टिस कर रही थी. उन्होंने अर्जुन को देख सीटी बजाई तोह अर्जुन और तेज भाग

लिए. "बाप रे. पहली बार देखा की लड़कीअ भी लड़को के मजे लेती है." वो मैं में सोचता हुआ वापिस वही पहुंच गया जहा शुरू हुआ था.

"बलबीर, इसको अपने साथ लेजा और मशीन और रोड लगवा." जोगिन्दर जी ने वही से अर्जुन को एक 20-22 साल के लड़के जिसका नाम बलबीर था के साथ भेजा.

.

.

"भाई तू चिकना लड़का बॉक्सिंग में कहा से आ गया?" बलबीर ने ये बात कही तोह अर्जुन को अजीब सा लगा.

"जी दादाजी कोच साहब को जानते है." बलबीर ने अगले हे पल तमीज की चादर ओढ़ ली.

"भाई मेरा मतलब था के तेरे जैसे लड़के को क्रिकेट, फूटबाल खेलना चाहिए. ये तोह खेल हे शकल बिगड़ देगा. ले आ गए गयम में."

ये बहोत बड़ी गयम थी एक ऑडिटोरियम जैसी जगह में. और इसके 2 भाग थे, लड़को का और लड़कीओ का. तक़रीबन 100 लोग थे फिर भी गयम आधी खाली हे

दिख रही थी.

"थोड़ा हाथ पेअर हिला ले जबतक मई मशीन रोकता हु. नहीं तोह नंबर नहीं आएगा." अर्जुन भी बलबीर की बात सुनकर स्ट्रक्चिंग करने लगा और कुछ

पुषप भी लगाए. इतने में हे मशीन पर से बलबीर नई आवाज लगाई. "भाई यहाँ आजा."

ये एक 15 प्लेट वाली कसरत की मशीन थी जिसके ऊपर एक रोड लटक रही थी और ठीक निचे एक गद्दी वाला स्टूल रखा था.

"देख छोटे भाई ये किल्ली यहाँ ऐसे फिट करनी है, जितना तू वजन उठा सके और फिर ऐसे ऊपर निचे करना है धीरे धीरे रोड को दोनों सिरे से पकड़

कर." अर्जुन को ये सब पता था लेकिन उसने सिर्फ हां में गर्दन हिलाई. पहले बलबीर ने 20 बार दोहराया फिर अर्जुन ने. जब बलबीर दूसरी बार कसरत कर

रहा था तोह अर्जुन ने पाया की उनसे कुछ 10 कदम मशीन के पीछे से 2 लड़कीअ उसको हे देख रही थी. वो दोनों हे कड़ी होकर बाजू की कसरत कर रही

थी और उसकी तरफ बेशर्मी से देख रही थी. "चल अब तेरी बारी."

ऐसे हे उन्होंने कुछ और कसरत की फिर वापिस कोच क पास आ गए. "पानी पी कर 2 मिनट सां लेना. फिर बलबीर तुम्हे बताएगा की अपना मुक्का दुरुस्त

कैसे करना है. कोच वापिस प्रैक्टिस कर रहे खिलाड़िओ के बीच चले गए. किसी किसी ने लाल या नीले रंग के सेफ्टी गार्ड भी मुँह पर लगाए हुए

थे. ये दोनों अब एक कोने में थे और बलबीर अर्जुन को समझा रहा था के कंधे का प्रयोग सही से कैसे करना है मुक्का चलते वक्त. और हवा में प्रैक्टिस

करवाने लगा. तक़रीबन 20 मिनट बाद बलबीर ने उसको और भी बहुत कुछ बताया की कैसे क्या करना होता है और क्या नहीं. और जोगिन्दर जी ने दूर से हे

बस करने का इशारा दिए.

"आराम करना घर जा कर. सुबह दौड़ काम हे लगाना क्योंकि शरीर कसरत के बाद आराम मांगता है. कल भी यही करना है तुम्हे." जोगिन्दर जी कह रहे

थे तोह कुछ लड़के आये उनके पेअर स्पर्श करने लगे लाइन से. उन्होंने भी सभी को आशीर्वाद दिए. अर्जुन ये सब ध्यान से देख रहा था. फिर हाथ जोड़कर

उसने भी आज्ञा ली और साइकिल स्टैंड की तरफ चल दिए.

"नया है क्या यहाँ?" अर्जुन टाला खोल रहा था साइकिल का और उस से 3 साइकिल दूर अपनी साइकिल स्टैंड से बहार निकलती लड़की ने उस से पुछा.

"जी. आज पहला दिन था मेरा बॉक्सिंग का यहाँ." उसने भी साइकिल बहार निकल ली. ये लड़की अर्जुन के बराबर हे कद की थी. उभरी सख्त टाँगे, लड़कीओ से हल्का

चौड़ा सीना जिसपे शायद मुट्ठी से कुछ बड़े हे उभर थे. सांवली लेकिन ाचे नैन नक्श वाली लड़की थी वह.

"सीनियर हु तेरी यहाँ स्टेडियम में. बास्केटबॉल, हरयाणा और नाम है मेरा मंजूबाला." चल अब उसने अपना सुर एकदम बदल कर कहा तोह अर्जुन भी बिना उसकी तरफ

देखे साइकिल के पैदल बढ़ा निकल गया.

उस लड़की के पीछे आती दूसरी लड़की ने कहा, "किसी को तोह छोड़ दे मंजू. ये भी डरा दिए तूने बेवजह."

अरे न सुमन. ये लड़का अलग है. अगर कल दिखा तोह थोड़ा नरमी से बात करुँगी." आँख मारते हुए वो हंस दी.

शहर से गुजरते हुए अर्जुन सब तरफ देखता जा रहा था. साइकिल भी हलकी स्पीड में थी. हर तरफ दुकाने, गाडीअ और ट्रैफिक था. कही जोड़ी में

लड़का लड़की फुटपाथ पर चल रहे थे तोह कही मोटरसाइकिल पर. ये सब देखता वह अपने सेक्टर से गुजरा. सुबह वाला पार्क अब बचो और महिलाओं से भरा

था. लोगबाग सैर कर रहे थे, बचे खेल रहे थे. 20 मिनट बाद वह अपने घर था. आज का एक्सपीरियंस उसके लिए बिलुल अलग था. जैसे की एक नै दुनिया.
 
अपडेट 16

नया din-Naye अनुभव (Part 2)


"चल पहले जा कर नाहा ले बीटा. मई तेरे लिए दूध तैयार करती हु.", दादी जी ने अर्जुन को मज़े पर बैठे देख कहा.

"है दादी जी अब पसीना सूख गया तोह जा रहा हु नहाने." उठकर वो अंदर वाले बाथरूम में हे घुस गया तौलिए लेकर.

ये बाथरूम बहार वाले से लगभद दुगना बड़ा था और इसमें हर तरह के शैम्पू साबुन रखे थे, एक बड़ा शीशा भी लगा था हाथ धोने की जगह.

दरवाजे के पीछे तौलिया रखते हुए उसको कुछ कपडे टंगे दिखे. ये शायद ललिता जी और ऋतू दीदी के थे. काली मैक्सी और सफ़ेद टीशर्ट. अर्जुन ने

ध्यान से देखा तोह मैक्सी के निचे कपडे के अलग पट्टी भी लटक रही थी. उसने मैक्सी हटाई तोह निचे एक सफ़ेद रंग की सूती ब्रा थी. उसके कप थोड़े

बड़े और इलास्टिक ढीला सा था. हक्क के पास कुछ लिखा था "38-डी". "ओह ये है ताईजी का साइज." न जाने उसको क्या हुआ उसने अपना मुँह ब्रा के कप से

सत्ता दिए. बड़ी ाची सी महक आ रही थी उसमे से. हलकी पसीने और गुलाब जैसी. अर्जुन के लुंड में तनाव आने लगा. वापिस वही रखकर वो शावर

के निचे खड़ा हो गया और दिवार पे लगी स्लैब से एक साबुन उठा पूरे शरीर पर मलने लगा. ये साबुन भी अलग थी और अब पूरा बाथरूम वैसी हे

खसबू से महकने लगा जैसी ब्रा से आ रही थी. अर्जुन ने उस साबुन को अपने लुंड पे भी रगड़ा जो आधा खड़ा हो चूका था. अभी नहाते हुए कुछ हे

देर हुई थी की कोई दरवाजा पीटने लगा. "आ रहा हु भाई. 2 मिनट बस हो गया मेरा नहाना." फिर कोई आवाज न आई. नहाकर सिर्फ तौलिया लपेट वो

बहार आया तोह ताईजी कड़ी थी. "वो बीटा मुझे बाथरूम जाना था.", उसके ऊपरी नंगे जिस्म को एक बार ाचे से देख ललिता जी अंदर घुस गई. कुछ

देर बाद साफ़ पजामा तशीर पहनकर अर्जुन वापिस रसोईघर में आ बैठा और दूध पीने लगा. उसकी माँ रेखाजी भी वही बर्तन धो रही थी.

"मुन्ना, तू आज अपनी ताईजी के कमरे में सो जाना. तेरे ताऊजी तोह अभी कुछ दिन होंगे नहीं और संजीव भी 2 दिन काम से काम नहीं आने वाला. और एक बार

सोने से पहले अपनी ताई की पीठ पे टिल के तेल से मालिश कर डीओ. बेचारी न आराम से बैठ प् रही है न चल.", दादी जी ने चावल साफ़ करते हुए

कहा. "है सो जाऊंगा बस कल 5 बजे से पहले मत उठाना दादी मुझे. वो कोच सर ने कहा है के सुबह दौड़ लगाना कर करना है जिस से शाम को शरीर

म्हणत के लिए तैयार रहे."

"मई ललिता को बोल दूंगी. वो उठ जाती है इस टाइम पर."

"ठीक है दादी." अर्जुन वही बैठा रहा. कभी अपनी माँ से बात करता तोह कभी दादी से. जब माधुरी दीदी अंदर आई तोह दादी जी और अर्जुन बहार

चल दिए. रोटी में अभी टाइम था थोड़ा और वैसे भी अर्जुन दादा दादी के बाद हे खता था तोह वो ऊपर टेलीविज़न देखने लगा.

"ोये हीरो, कहा था सारा दिन?, ये ऋतू दीदी थी जो सुबह से अपने कमरे में एक्साम्स की तैयारी कर रही थी.

"आज से वो बॉक्सिंग सीखने जा रहा हु तोह 3 घंटे तोह वही हो गए. और दीदी आप हे तोह कमरे में बैठी पढ़ रही थी."

"है भाई मंडे को मेरा एग्जाम है न तोह उसमे हे बिजी थी. अलका का कल है." सोफे पर अर्जुन के साथ बैठकर वो बातें करने लगी

ऐसे हे कुछ देर बाद दोनों साथ में निचे आ गए जहा अलका उनका इन्तजार कर रही थी.

"कल मेरे साथ जाना है. याद है न?" अलका ने फिर अर्जुन को याद दिलाया

"है ाचे से याद है. लेकिन कल स्कूटरी सीखने नहीं जाना. परसो चलेंगे. कल सिर्फ पेपर." अर्जुन ने भी खाना शुरू करते हुए कहा

"भाई तू टाइम से सो जाना." माधुरी दीदी ने ये बात कही लेकिन उनका मतलब न समझ अर्जुन ने जब बतया के वो आज ताईजी के साथ सोयेगा तोह माधुरी

दीदी के साथ साथ कोमल दीदी का भी चेहरा एक पल के लिए उदास हो गया.

"ाची बात है. माँ का ध्यान रखिओ और अगर उन्हें कुछ जरुरत हो तोह मुझे बुला लेना.", सफाई से बात बदल दी उन्होंने.

थोड़ी देर अपने दादाजी के पेअर की मालिश की और उन्हें अपने आज के दिन के बारे में बता कर वह ऊपर आया. रात को कच्चा नहीं पहनता था पाजामे के

अंदर तोह वही उतरने आया था. डाट साफ़ किये और आधा घंटा वही सामान्य ज्ञान की किताब पढ़ने के बाद निचे आया. सब अपने कमरे में जा चुके

थे. रसोईघर में माँ खाने के बाद के बरतर साफ़ कर रही थी तोह वह वही आ गया.

"माँ, आप सुबह से लगी हुई हो. लाओ मई साफ़ कर देता हु आप आराम करो." अपनी माँ को इतना काम करते देख वो बर्तनो के पास हे आ गया.

"बस बीटा इतना भी कोई ज्यादा काम नहीं है. हो हे गया है. और ये सब काम मई अपने बेटे से तोह नहीं करौंगी." उन्होंने एक प्यारी से हंसी से अर्जुन

को जवाब दिए.

"माँ, वैसे आपकी ज़िन्दगी कितनी व्यस्त है न. सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक काम हे काम. कोई आराम नहीं है. कभी बुरा नहीं लगता."

अपने बेटे को इतनी फ़िक्र करता देख रेखा जी को बड़ी ख़ुशी हुई. "बीटा दिन में खली समय में आराम भी तोह कर लेती हु. तेरी चारों दीदी भी तोह

मेरी मदद करती है. और तेरी ताईजी तोह मुझे कुछ ज्यादा काम करने हे नहीं देती अपने सामने. है जब तेरी बीवी आ जाएगी तब मई आराम कर लुंगी"

और अर्जुन को देख मुस्कुराने लगी. उन्हें अपने बेटे के साथ ाचा लग रहा था. ऐसा बहुत काम होता था के वो कभी ऐसे बातें करते थे. शायद

पिछले एक साल में 5-6 बार. दोनों का अपना व्यस्त समय रहता था. रेखा को बहुत बार ऐसा लगता था के जो प्यार उसको अपने बेटे को देना चाहिए था

वो कभी दे हे नहीं पाई थी. और कभी कभी उसको ये सब सोचकर दिल में कसक सी होती थी की वह अपने बेटे की ाची माँ नहीं बन पाई.

"माँ मई शादी नहीं करूँगा. आप दीदी लोगो की शादी कर देना फिर मई अकेला हे रहूँगा. आपका सारा प्यार फिर मुझे हे तोह मिलेगा."

इस बात ने रेखा की दुखती राग पर हाथ रख दिए. एक हे पल में चेहरे की ख़ुशी की जगह आँखों की नमी ने ले ली थी. अर्जुन को अजीब सी घबराहट

हुई जब माँ के हाथ बर्तन साफ़ करते रुक गए और चेहरा भी निचे हो गया.

"क्या हुआ माँ?" अपनी माँ को उसने पलटाया तोह उनका वो खूबसूरत चेहरा आंसुओ से भीगा हुआ था. "आप रो क्यों रही हो माँ? मैंने अगर कुछ गलत कहा

हो तोह प्लीज मुझे माफ़ कर दीजिये न. लेकिन आपको रट देख मुझे दर्द हो रहा है." बेटे की इतनी बात सुनते हे रेखा जी ने उसको अपने सीने से लगा

लिए. "नहीं मुन्ना तू कभी कुछ गलत कह हे नहीं सकता रे. मई हे अभागन हु जिसने तेरा बचपन तक ठीक से नहीं देखा. और आज भी जब सोचती हु के

तेरे हिस्से का प्यार तुझे दू तोह खुद को मजबूर मानती हु."

"माँ कौन कहता है के मुझे प्यार नहीं मिला? सुबह आपको देखने के बाद हे तोह मेरा दिन सही मायने में शुरू होता है. और रही बात मेरे बोर्डिंग

की, तोह वो फैसला आपने तोह नहीं किआ था न माँ. मेरे जाने का सबसे ज्यादा दुःख आपको हे था. क्या ये प्यार नहीं है आपका?" बेटे की इतनी समझदारी

देख रेखा नई उसको एक बार फिर सीने से चिपका कर उसका माथा चूम लिए. अर्जुन ने अपने हाथ से माँ का चेहरा साफ़ किआ.

"वैसे आप जब मुस्कुराती हो तोह दिव्या भर्ती लगती हो बिलकुल." अपने बेटे की ये बात सुनकर खोई हुई मुस्कान वापिस आ गई थी उनके चेहरे पैर

"चल अब सो जा जाकर. तेरी ताईजी भी इन्तजार कर रही होंगी. मेरा काम भी हो हे गया बस."

"जब संजीव भय वापिस आ जायेंगे फिर मई आपके साथ सोऊंगा माँ. 10 साल हो गए सुकून से सोये हुए मुझे."

"है बीटा मई भी यही तोह चाहती हु बस सोचती थी क तुझे अब आदत नहीं रही होगी. तू अभी भी मेरे लिए मेरा मुन्ना हे तोह है."

"हाहाहा. माँ ये मुन्ना अब 6 फ़ीट का हो गया. चलो गूडनिघत."

बेटे को बहार जाते हुए रेखा जी देखती रही. सही बात तोह थी उसकी. छोटा सा मुन्ना अब अपने बाप से भी लम्बा हो चूका था. फिर खुद हे सर झटकती

काम में लग गई.

"आ गया बीटा तू? चल लेट जा." कमरे में आते हे बिस्टेर पर लेती उसकी ताईजी ने उसको इशारे से अपनी दूसरी तरफ बुलाया.

"पहले आपकी मालिश फिर मई सोऊंगा. नहीं तोह नहीं."

"बीटा अब मई ठीक हु बिलकुल. तू आराम कर वैसे भी तू थका होगा." ललिता जी ने सोचते सोचते ये बात कही थी.

"ऐसा तोह कुछ किआ नहीं मैंने जिस से थकान हुई हो. आप मुझे बस तेल बताओ कहा रखा है."

"वो वह ड्रेसिंग के उप्पर रखा है बीटा. देख अगर तू थका हुआ है तोह रहने दे. वैसे भी मई ठीक हु.", ललिता जी ने फिर कहा लेकिन अर्जुन ने

तेल की शीशी उठाई और उनके करीब आ बैठा. ताईजी ने अभी एक हलकी साड़ी पहनी हुई थी जो की वो कभी भी सोते हुए नहीं पहनती थी.

ज्यादातर वो रात में petikot/blouse या salvar/kameej पहनती थी. जब ताऊजी घर होते तोह कभी कभी मैक्सी भी. "चलिए उलटी लेट जाइये." हुकुम सा

दिए अर्जुन ने तोह करवट के बल लेती हुई ललिता जी पेट के बल हो गई. उनकी गांड पूरी उभरी हुई थी. ब्लाउज और पेटीकोट के बीच कमर बिलुल साफ़

थी. अर्जुन ने थोड़ा तेल अपने हाथो में लगाया हे था के वो bola,"Taaiji ये साड़ी हलके रंग की है कही तेल लगने से खराब न हो जाये."

कुछ सोचने के बाद ललिता जी ने कहा, "बीटा सोच तोह मई भी यही रही थी, लेकिन फिर मुझे लगा के ये ाचा नहीं लगेगा."

"ओफ्फो. आप भी न. चलिए चेंज कर लीजिये मई वेट करता हु."

"तू दरवाजा लगा दे और जीरो को बल्ब जला दे. ये बड़ी लाइट बंद कर मई साड़ी बदलती हु.", अर्जुन ने वैसा हे किया और चिटकनी चढ़ा दी दरवाजे की

फिर तुबेलिघ्त बंद कर के बल्ब ों कर दिए. ये जीरो का सफ़ेद बल्ब था जिसकी रौशनी ज्यादा नहीं थी लेकिन फिर भी कुछ हद तक साफ़ दिख जाता था.

जैसे हे स्विचबोर्ड से मुँह घुमाया तोह ताईजी को बिना साड़ी के बिस्तर पर जाते देखा. उनका पेटीकोट बिलकुल फसा हुआ था पीछे से कूल्हों पर. शायद

उनके कूल्हे माधुरी दीदी से भी बड़े था. इतनी देर में हे उसके कान गरम हो गए थे. वो धीरे से चलता हुआ बीएड पे वही आकर बैठ गया और ताईजी

के चेहरे की तरफ देखा जो उन्होंने तकिये पर रखा हुआ था और मुँह दूसरी तरफ था. फिर से तेल हाथो पर लगा कर उसने झिझकते हुए तै जी की कमर

पर हाथ रखे. हलके हाथो से वह उनकी कमर पर मालिश करने लगा. ताईजी की कमर पर ढलान सी थी. ब्लाउज के पास से हाथ जब निचे आते तोह

ये ढलान पता लगती फिर जहा पेटीकोट का नाडा था वह एकदम से ऊपर उठान थी. उनके कूल्हे कुछ ज्यादा हे बहार को निकले थे.

"वो बीटा ध्यान रखना के कही ब्लाउज ख़राब न हो जाये. ये उस साड़ी के साथ का हे है." ताई जी की आवाज से वो वापिस होश में आया.

"कोशिश तोह कर रहा हु ताई जी लेकिन निचे यहाँ ये आपका स्कर्ट कमर पे आया हुआ है और आपका ब्लाउज इतना लम्बा है के कुछ हिस्सा कमर पे है."

"हाहाहा. बीटा ये स्कर्ट नहीं पेटीकोट है. और अब बूढी हो गई हु तोह ब्लाउज तोह ऐसे हे पहनूंगी. है रेखा जितनी जवान रहती तोह शायद मई भी

थोड़ा ध्यान रखती अपना." ये बात उन्होंने अजीब लहजे में कही थी. और अर्जुन को कुछ ज्यादा समझ नहीं आया तोह उसने ऐसे हे जवाब दे दिए. "ताई जी

आप कहा से बूढी हो गई? आप तोह खुद अभी माधुरी दीदी की बहिन लगती हो. शायद आप अपने आप पर अब ध्यान नहीं देती."

"किसके लिए ध्यान दू रे अब?" बड़ी हलकी आवाज में कही ये बात उसके कान में सही तरह से नहीं गई थी.

"कुछ कहा ताई जी आपने?"

"वो बीटा थोड़ा ब्लाउज ऊपर सरका दे. और पेटीकोट भी. टिल का तेल है लग गया तोह फिर दाग नहीं जाएंगे." फिर अर्जुन ने जैसे हे ब्लाउज ऊपर करना चाहा

तोह वह तोह बुरी तरह फसा हुआ था. "रुक जरा." ललिता जी ने अपना सीना ऊपर किआ और निचे के दो हक्क खोल दिए. कमर के पास जहा पेटीकोट को नाडा था

वो ढीला कर दिए. "ले बीटा अब कर दे ऊपर और निचे." फिर से ये बात dwi-arthi कही थी उन्होंने. कुछ तोह चल रहा था आज उनके मन में. और अर्जुन ने

उनका ब्लाउज ाचे से उपरकर दिए पीठ तक और जैसे हे पेटीकोट को ऊपर करने लगा उसकी ऊँगली ललिता जी की गांड की दरार से छु गई. "शहहह. " उनके मुँह

से निकली ये हलकी सी सिसकारी अर्जुन को भी सुनाई दी. "क्या यही दर्द है ताई जी?"

"है बीटा ज्यादा दर्द तोह यही है बस बता नहीं पा रही थी. तू एक काम कर मेरे दोनों तरफ टांग कर ले और फिर ातच से रगड़ कर मालिश कर दे. अपना ज्यादा

बोझ मत डलिओ मुझ पर." अर्जुन का ध्यान अपनी ताईजी की बात पर गया तोह वह चहक कर ऊपर आ गया. "एक और काम कर ये तेरा शर्ट भी निकल दे नहीं

तोह पसीना आएगा तोह दुर्गन्ध आएगी."

"ठीक है ताई जी." और टीशर्ट उतर कर वो अपने घुटने चची की दोनों तरफ गांड के ऊपर से टिका कर उनकी मालिश करने लगा. हाथ ऊपर जाते तोह

उसका लुंड गांड की दरार में आगे की तरफ जाता और हाथ निचे आते तोह पीछे. कुछ हे देर में उसका लुंड अपनी औकात पर आ गया था. और अब आगे होते

समय उसका शरीर थोड़ा झुकता तोह लुंड का दबाव ललिता जो को अपनी गांड पर कपडे के ऊपर से हे पता लग रहा था. "इतना भी छोटा नहीं रहा ये अब."

वो मैं में यही सोच रही थी. वैसे तोह दिन में हे सफाई के समय उसका उभार दिख गया था. और उसका हे नतीजा था ये कमर दर्द का नाटक. उनकी आग

जो राजकुमार जी पिछले 5 साल में काम करने की जगह भड़का चुके थे, एक खतरनाक हद्द तक. जिसका नतीजा ये था की आज वह इसमें जलती हुई पहली बार

सही गलत भूल चुकी थी. अर्जुन का दिमाग भी लुंड जैसा हो चूका था, मोटा और खाली. अब उसका लुंड ज्यादा घिस रहा था और हाथ काम.

"बीटा यहाँ की तोह हो गई है." इतना बोलकर ललिता जी चुप हो गई. उनकी गांड की दरार अब पेटीकोट से कुछ बहार निकल आई थी. "आपकी तंग में भी दर्द

था न ताईजी?", अर्जुन का मैं अभी भरा नहीं था. ऊपर से उसका लुंड आज तीसरी बार खड़ा हुआ तोह और हल्का दर्द भी करने लगा था.

"है बीटा दर्द तोह है लेकिन कही तुझे बुरा न लगे वह मालिश करने में." ललिता जी ने गंभीरता से कहा. और अपना अगला डाव खेल दिए

"मुझको तोह ाचा लगेगा आपकी सेवा करके. आप बस बताओ और बाकी मई कर लूंगा."

"वो बीटा थोड़ा दर्द यहाँ दोनों बाजु के निचे है और दाई जांघ की नस पर." उन्होंने इतना कहकर वापिस सर तकिये पर टिका लिए.

"मई हाथ रखता हु आप बता देना कहा दर्द है. लेकिन ब्याह के निचे तोह आपका ब्लाउज है न. आप इसको उतर कर कोई बनियान पहन लो."

"बीटा बनियान तेरे ताऊजी की तोह मुझे आएगी नहीं तू एक काम कर लाइट बंद कर दे मई ब्लाउज उतार देती हु." अर्जुन ने जीरो बल्ब भी बुझा दिए और वापिस

आने लगा. अँधेरा चाय था अब कमरे में तोह अंदाजे से वह बिस्टेर तक आया तोह उसका हाथ अँधेरे में किसी मुलायम चीज से टकराया. "एक मिनट बीटा बस."

ललिता जी को अर्जुन का हाथ अपनी ब्रा के ऊपर निकले उभार पर सुखद एहसास दे गया. वो वापिस लेट गई थी. अर्जुन ने टटोलते हुए अपने हाथ फिर चलाये तोह

उसके हाथ ताईजी की गांड पर लगे. बिना कोई बात किये वह वापिस पुराणी जगह बैठ गया. "ताईजी तेल पता नहीं कहा रख दिए."

"कोई बात नहीं बीटा, वैसे भी हाथो में बहुत लगा होगा. तू बस मालिश कर."

अर्जुन ने अपने दोनों हाथ कमर की साइड से ले जाते हुए आगे बढ़ाये तोह ब्रा की पट्टी दोनों तरफ महसूस हुई. "ये तोह अभी भी बीच में आ रही है ताईजी"

"रुक बीटा मई हक्क खोल देती हु वैसे भी अँधेरा तोह है." और उन्होंने पीछे हाथ करके ब्रा खोल दी जो उनकी छाती की निचे पड़ी थी अब. यहाँ अर्जुन के

हाथ उनकी मखमली गुदाज शरीर पर चलने लगे थे. उल्टा लेटने से उनके बड़े चुके थोड़े बहार को आ चुके थे जिनपे उसकी उंगलिअ रगड़ कह रही थी.

और झुकने से उसका मोटा लुंड बार बार उनकी गांड की दरार में धंसता. दोनों चुप थे लेकिन मजा बराबर आ रहा था. निचे दबे हुए निप्पल भी सख्त

होने लगे थे. इतनी कामुक मालिश पूरे जीवन में ललिता जी को नसीब नहीं हुई थी. अर्जुन भी अब जोश में कभी उनके थोड़े से बहार निकले चुचो पर हाथ

रोक देता था और उनकी गांड की गर्मी लुंड पर महसूस कर मजे ले रहा था.

किसी सयाने बन्दे ने एक बात खूब कही है, "लुंड और पानी अपनी जगह बना लेते है. घोडा और लौड़ा दोनों बिना सिखाये हे दौड़ सकते है."

यहाँ कुछ ऐसा हे हो रहा था. पेटीकोट तोह अब आधा गांड से खिसक गया था और ललिता जी ने निचे कच्ची नहीं पहनी हुई थी. जब अर्जुन का लुंड नंगी

दरार में रगड़ खता तोह ललिता जी को ऐसा लगता जैसे उसका लुंड भी नंगा हे है.

दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे. अब अर्जुन उनके बहार को निकले चुचो के हिस्सों को भी दबा रहा था. दोनों किसी और हे दुनिया में थे. लेकिन ललिता जी ने फिर

से कमान अपने हाथ में ले ली. "बीटा एक बार उठ मई सीढ़ी हो जाऊ तू फिर जांघ की मालिश कर के सो जाना." अर्जुन उठा तोह वो पलट कर सीढ़ी हो गई

ब्रा निचे हे दबी थी तोह अब उनके मॉटे मॉटे बूब्स खुली हवा में सांस ले रहे थे. अर्जुन ने फिर जैसे हे पेटकोट पर हाथ रखा जांघ दबाने के लिए

उन्होंने फिर वही बात kahi,"Beta कपडे के अंदर से दबा". अर्जुन के हाथ अपनी ताईजी की मोती सुडोल जांघो से टकराये तोह लुंड पत्थर हे हो गया था.

इतनी मुलायम और मोती जांघ थी के एक बार तोह हाथ हे फिसल गया. "बीटा यहाँ से ऊपर की तरफ तो जोर लगा कर." उत्तेजना ललिता जी पर भी हावी

हो चुकी थी. इतनी देर से जो ये मस्ती चल रही थी वह अब ऐसी जगह आ चुकी थी की आगे बढे और दूरिया ख़तम. अर्जुन तोह नासमझ था लेकिन अब

ललिता भी छूट से सोच रही थी, जो आज कई साल बाद ऐसे रास बहा रही थी. उसके हाथ मोती जांघो को मसलते हुए ऊपर जाते और फिर वैसे हे

निचे आ जाते. थोड़ी देर बाद जब हाथ आसानी से चलने लगे तोह और ऊपर जाने लगे. अर्जुन की ऊँगली किसी मुलायम सी जगह से टकराई तोह उसको पता

चल गया के ये कोनसी जगह थी. और ताईजी की सिसकी निकल गई. उनको कुछ न कहता देख वो बार बार अपने हाथ को उस जगह पर ले जाने लगा. छूट

के दोनों होंठ मोठे रास भरे थे लेकिन उनके यहाँ भी बाल नहीं थे. अर्जुन को इतना खुलकर मजे लेते देख ललिता जी ने उसका हाथ पकड़ अपने ऊपर

खींच लिए. वह भी बिना ऐतराज उनके ऊपर चा गया. ललिता जी के सारे संस्कार छूट की आग में जल चुके थे और वो अर्जुन के होंठ अपने मुँह में

लेकर चूसने लगी. इतना तगड़ा किश तोह अर्जुन ने पहले कभी नहीं किआ था. उसकी ताईजी खुद से हे उसकी जीभ और होंठ अपने मुँह में लेकर चूस रही

थी. उनका पूरा जिस्म तप रहा था और अपने निचे उनके नंगे चूचे देख कर अर्जुन भी लगा उन्हें मजे से भींचने..

"दबा बीटा और जोर से दबा इन्हे. बहोत दर्द दिए है इन्होने आज इनकी साड़ी अकड़ निकल दे. आह खा जा इन्हे." उसको चूमना छोड़ वो खुद अपने दूध

उसके मुँह में डालने लगी. पेटीकोट तोह घुटनो पर पड़ा था और छूट नंगी. ललिता जी ने अपने हाथ से खुद छूट को रगड़ना शुरू कर दिए.

"बहुत सताया है रे इस निगोड़ी ने. जीना हराम कर रखा है बीटा मेरा. साड़ी रात जलती रहती हु और तेरे ताऊजी बस इस आग को जला कर चले

जाते है. आज तू मुझे निराश मत कार्यो." अर्जुन को बोलते हुए उन्होंने अपनी 2 उंगलिअ छूट में घुसा दी जो पहले हे रो रही थी. दूसरे हाथ को जैसे

हे उन्होंने उसके पाजामे के ऊपर रखा , लुंड पकड़ते हे उनको झटका लगा. लेकिन उनकी हाथ फिर कास गया उस तगड़े लुंड पर.

"इतनी सी उम्र में तू पूरा घोडा हो गया है मेरे बेटे." अर्जुन के हथियार से प्रभावित हो चुकी थी पूरी तरह. और ये भी सोच रही थी की ये

इतनी देर से खड़ा रहने के बाद भी झाड़ा नहीं था. उन्होंने उसका पजामा खोला तोह अर्जुन ने करवट लेकर पूरा उतार दिए. और अब पेटीकोट भी वह से

गायब था. वो वापिस अपनी ताईजी के ऊपर लेट गया और उनके दूध चुस्कने लगा. ललिता जी की नरजो में तोह वो नादान था तोह उन्होंने खुद कमान अपने

हाट में ली. "रुक बीटा आज तुझे सब सिखाती हु ाचे से.", उसको निचे लिटा वह उसकी कमर पर झुक गई. अर्जुन को करंट सा लगा जब ताईजी ने

उसके लुंड के सुपडे को चूम कर मुँह में भर लिए. उसने ऐसा बस संदीप के घर उस किताब में देखा था.

"कितना मोटा है रे तेरा. अंदर हे नहीं जा रहा." मुँह से निकल कर वह पूरे लुंड को जीभ से चाटने लगी. बीच बीच में उसको थूक से गीला

भी कर रही थी.

"चल बीटा मई निचे लेट टी हु तू मेरी टैंगो के बीच आ." अर्जुन ने वैसा हे किआ. "देख जब मई कहु तोह आगे को धक्का डीओ. और है रुकने को कहु

तोह रुक जैव. तेरे ताऊजी की इस से 5 उंगल छोटा है और मोटाई तोह आधी होगी." उनको पता था की आज छूट का फटना तय है लेकिन वो तैयार थी.

अपने हाथ से उन्होंने उसका गीला लौड़ा अपनी छूट के मुँह पर रखा. थोड़ा घिसने के बाद खुद हे छेद पर दबाया. "देख मुझे दर्द होगा. लेकिन

आधा डालने तक रुकना nahi."Aur अपनी ब्राब मुँह में दबा ली. "हाँ" की आवाज सुनते हे अर्जुन ने अपनी कमर को एक प्रचंड धक्का दिए और उसका लुंड

सुपडे सहित 3 इंच अंदर. छूट इतनी कास गई थी के सूपड़ा हल्का चिल गया था. माधुरी दीदी को तोह छोड़ते समय दोनों के अंग लोशन से चिकने

थे. और यहाँ सिर्फ लुंड पे थोड़ा सा थूक लगा था. ललिता जी चींख किसी तरह ब्रा में हे दबी रह गई. अर्जुन ने बिना समय गवाए एक और झटका

दे दिया. 2 इंच लुंड और अंदर चला गया. लेकिन अब ललिता जी अपना सर पटक रही थी. उनके पति का लुंड इस जगह तक हे गया था लेकिन अर्जुन के

लुंड इस तंग गली को हाईवे बना दिए था. वो ताईजी के ऊपर झुक कर उनके होंठ पीने लगा. साथ हे साथ उनके बूब्स दबाने लगा. निप्पल को कास

कर खींचने से छूट का दर्द काम होने लगा क्योंकि अब निप्पल भी दर्द करने लगे थे. थोड़ी देर में उनकी सांस दुरुस्त हुई तोह ब्रा को निकल दिए मुँह

से. "तेरा लुंड सच में घोड़े का है रे. फाड़ हे डाली तूने तोह मेरी, अब इसमें तेरे ताऊजी का तोह पता भी नहीं चलेगा. चल अब अपनी कमर हिला, लेकिन

आराम से." इतना तोह अर्जुन को पता हे था. शुरू में वह हलके हलके और छोटे धक्के दे रहा था. छूट की खाल खींच रही थी हर धक्के के साथ.

"है बीटा ऐसे हे. अब ाचा लग रहा है. दर्द के साथ ये मजा. आह्हः... मेरे लाल ऐसे हे करता रह."

"ताईजी ये क्या मजा दिला दिए आपने. मुझ से रुका नहीं जा रहा." इतना बोलकर अर्जुन ने आधे लुंड से हे तेज धक्के देने शुरू कर दिए. अब बंद कमरे

में ललिता जी की आवाज गूँज रही थी. "हाय राम. थोड़ा धीरे कर बीटा.. ऐसे तोह पूरी फट जाएगीइइइइइ.. आह माआ...... मार दिए रे.. है बीटा

कर लगा ऐसे हे धक्के." अब उनकी भी ताल मिलने लगी थी अर्जुन क साथ. झटके खाट हुए हे उनके हाथ तेल की शीशी लग गई. "बीटा रुक. ये ले और

अपना लुंड थोड़ा सा अंदर रख कर बाक हिस्से पर तेल लगा ले." उन्होंने वह शीशी अर्जुन को पकड़ा दी. और यही गलती हो गई उनसे. तेल ाचे से लगते

हे अर्जुन ने एक करारा झटका दे मारा और लुंड छूट को किसी कपडे की तरह फाड़ता हुआ अंदर जा धसा. "ूई माँ रे.. मर गई मई कमीने कुत्ते.. फाड़

डाली तूने तोह." उनकी आँखों से आंसू निकल पड़े और छूट ठंडी पद गई दर्द की वजह से. लेकिन कसावट की वजह से लुंड अंदर और फूलने लगा

अर्जुन ने अब ताईजी की परवाह न करते हुए धक्के लगाने शुरू कर दिए. हर धक्के के साथ वो उनके बूब्स को नोच रहा था और होंठ काट रहा था.

लुंड जड़ तक अंदर जा रहा था और उसके अंडकोष ताईजी की गांड से लग रहे थे. "आह कितनी गरम है आपकी अंदर से. मेरा लुंड जैसे जल रहा है

ताईजी." ताईजी की छूट ज्यड्ड हे फूली हुई थी. ऐसी गद्देदार छूट का मजा सबसे ज्यादा था. इतनी तोह माधुरी दीदी की भी नहीं थी.

"बीटा अब फाड़ तोह दी है बस जान न निकल डीओ. हाय राम ... गलती हो गई.. आह थोड़ा धीरे से कर बीटा... तेरी ताई की जान निकल रही है."

लेकिन अर्जुन तोह सुपडे तक लुंड खींचता और फिर पूरा थोक देता. जब ताईजी को मजा आने हे लगा था के वह रुक गया.

"अरे क्या हुआ बीटा?"

"ताईजी रुक कर करते है न. ऐसे तोह पीठ दर्द करने लगी."

"बीटा तू एक बार लुंड निकल बहार." जैसे हे लुंड बहार आया ताईजी को लगा जैसे अंदर से जान भी निकल गई हो. वह जल्दी से घोड़ी की तरह हो

गई अपनी बड़ी गांड बहार निकल कर बिस्तर क किनारे और अर्जुन को पीछे खड़े होने को कहा जमीन पर. "अब यहाँ से लुंड जरा निशाने पे लगा बीटा

ऐसे तेरी पीठ दर्द नहीं करेगी." उसने वैसा हे किआ. यहाँ से तोह लुंड और भी कसके अंदर जा लगा. एक हे झटके में अर्जुन का लुंड पूरा अंदर

अब कमरे में बस ताईजी की सिसकरिअ और उनकी गांड पर पड़ते धक्को से निकलती पत् पत् की आवाज गूँज रही थी. अर्जुन के लिए ये अब तक की

सबसे मस्त चुदाई थी. कभी वह उनकी मोटी गांड को दबाता तोह कभी लटकते ढूढ़ पकड़ के खींचता. "आह बीटा मई तोह गई रे... " इतने में

ताईजी का सर बीएड से टिक गया. वो एक के बाद एक 5-6 बार लगातार झड़ी थी. इतने सालो से सूखी पड़ी उनकी छूट में आज बाढ़ आ चुकी थी.

मजे से दोहरी होती वह बेहोश सी हो गई. और इस सबमे उनकी गांड ऊपर उठ गई थी. अर्जुन फिर से छोड़ने लगा उनकी गांड को ऊपर उठा कर. लुंड

अब इतना अंदर तक जा रहा था जितना कभी नहीं गया था. 5 मिनट बाद ताईजी फिर से सिसकने लगी.. "बस कर रे बीटा. अब तोह चूत भी दुखने

लगी है. भगवन बचा ले इसके हब्शी लुंड से... एक करारा झटका मार के वह ताईजी की गांड से चिपक कर झड़ने लगा. उसके मुँह से हांफने

की आवाज निकल रही थी. "हाँ... "और इतनी पिचकारिया छोड़ी उसके लुंड ने की छूट भर गई और उठी गांड से भी उसका पानी बहार निकलने लगा.

"धम्म" की आवाज से वह बिस्टेर पर लुढ़क गया और ताईजी भी. रात के 1 बज चुके थे. उनकी चुदाई मालिश के बाद पूरे एक घंटे चली थी.

ललिता जी का शरीर भी साथ छोड़ गया तोह वह भी नंगी हे सो गई बस सोने से पहले उन्होंने अर्जुन को बिस्टेर पर सही से खींच लिए और अपने

सीने से चिपका पसर गई.
 
अपडेट 17

उन्माद के बाद जिज्ञासा


गाला सूखने की वजह से नींद टूट गई लेकिन अपनी छाती पे एक हाथ महसूस हुआ तोह थोड़ी देर अर्जुन ध्यान से समझने की कोशिश करने लगा.

"रात मई ताईजी के साथ था और फिर वो सब हुआ. आह मजे से शायद मई गिर हे गया था." सब याद कर वो आराम से ताईजी का हाथ बिस्टेर पर

रख उठ खड़ा हुआ. आराम से चिटकनी खोली, वापिस दरवाजा ढला बहार से और रसोईघर में फ्रिज की और चल दिए. अभी भी अँधेरा था और

आँगन में ाची ठंडक थी, ताज़ी हवा की वजह से. पानी निकल कर वही बहार में खड़े होकर पीया और बोतल मज़े पर रख कर वापिस अंदर

आ कर जीरो का बल्ब जलाया. 4 बजने में अभी 10 मिनट बाकी थे और घर पे सबसे पहले उठने वाले रामेश्वर जी भी 4:30 के बाद हे उठते थे.

अब कमरे में इतनी रौशनी थी के सब दिख रहा था. वापिस बिस्टेर पर आया तोह अब ताईजी को ध्यान से देखने लगा. थोड़ा गोलाई लिए हुआ चेहरा,

भरे हुए गाल, मोठे होंठ, गोरी और मांसल गर्दन. कुल मिलकर उनका चेहरा इस उम्र में भी आकर्षक था. नजर गर्दन से निचे गई जहा वह

उलटी लेती थी और एक बाजु अभी वही थी जहा कुछ देर पहले अर्जुन सोया हुआ था. हलके चौड़े कंधे, मुलायम पीठ के निचे पहाड़ जैसे उठे

हुए कूल्हे, जो घर का काम करनी की वजह से अभी तक ाचे आकर में थे, कही कोई ढीलापन न था. उनके निचे चिकनी और आपस में जुडी जाँघे

उनके इस शरीर को और कामोत्तेजक बना रही थी. गोरी गोल पिण्डलिया और छोटे खूबसूरत पाँव. तक़रीबन 5 फ़ीट से कुछ ऊपर लम्बाई होगी. उनको

देखते देखते वो साथ में लेट गया. ब्याह के निचे से उनका बाय बड़ा चुका बाहर निकला हुआ था और उसका निप्पल बिस्टेर की तरफ छुपा हुआ था.

"वाह कितने मुलायम है ये. और अब तोह नरम है, रात की तरह कठोर नहीं लग रहे." धीरे से उसने अपना हाथ लगभग आधे चूचे पर फिराया.

फिर अपना बाय हाथ निचे लेजा कर बिस्टेर पर ठीके भाग को हथेली में ले ले. ललिता जी गहरी नींद में थी और अर्जुन अब उनके चूचे को ाचे

से अपने हाथ लेकर मसल रहा था. वो बड़ा सा नरम मॉस का गोला अर्जुन को वापिस वही ले जा रहा था जहा रात को वो बेहोश हुआ था. हलके हलके

मसलने से अब उनका बड़ा सा भूरा निप्पल फूल कर सख्त होने लगा और ताईजी ने मस्ती में एक अंगड़ाई ली. अब वो सीढ़ी बिस्टेर पर लेती थी और

उनके विशाल पहाड़ो पर लगे मटर के दाने जितने निप्पल छत्त की तरफ देख रहे थे. अर्जुन ने झुक कर दाए वाला जो उसकी तरफ हो गया था

उसको अपने मुँह में हलके से लिए और दूसरे वाले को अपनी मुट्ठी में भरने की कोशिश करने लगा. ये इतना बड़ा था की उसका हाथ जितना ऊपर था,

चूचा दोनों तरफ से उतना बहार था. शरीर पर सिर्फ पजामा था जो उसने बूब से हटाकर निचे सरका दिए. अब वो बिना बोझ दिए ताईजी के ऊपर

आ गया लेकिन दंड पेलने जैसी स्थिति में. सिर्फ उसके पंजे बिस्टेर पर थे और कोहनिया दोनों उभारो की बहार की तरफ. ताईजी की जाँघे आपस

में सटी थी.

"ऐसा स्वाद मुँह में आ रहा है जैसे कोई रास सा निकल रहा हो इनमे से." दोनों उभारो को प्यार से पीते हुए उसने मैं में ये बात कही. अपनी एक

टांग ताईजी की दोनों टैंगो के बीच ले जाकर उसने उनको जांघो को अलग करने की कोशिश कर. सफल भी हो गया वो, अब ताईजी की टाँगे थोड़ी

दूर हो गई थी. चूचे पीना छोड़ वह घुटनो पर बैठ कर उनकी छूट को देखने लगा जो रात के अँधेरे में दिखी नहीं थी.

"ताईजी की छूट कितनी फूली हुई है.", दोनों मॉटे होंठ और उनके बीच लाल रंग सा छेद उसको सही से दिख रहा था. रात की चुदाई से बहार

तक वो लाल दिख रही थी और शायद इतना बड़ा लुंड खाने से हे डबल रोटी जैसे फूल गई थी. अपने हाथ से खड़ा लुंड उसने छूट के चीरे

पर फिराया तोह नींद में हे ताईजी के चेहरे पर मजे के भाव आ गए. 4-5 बार आराम से सूपड़ा उस लकीर में फिरने के बाद अर्जुन ने निचे की

और झुकते हुए अपने होंठ अपनी ताईजी के होंठो पर रख दिए, थोड़े मजबूती से. इधर ताई जी शायद ऐसा हे मजेदार सपना देख रही थी, उन्होंने

भी अब नींद में हे अर्जुन के मुँह में जीभ घुमानी शुरू कर दी. अगले हे पल उनकी आँखें खुल गई और सांस रूकती सी महसूस हुई. उनकी आँखों के

सामने अर्जुन का चेहरा था और छूट में उसका खूंटा गड चूका था. उनकी तरफ आराम से देखते हुए अर्जुन ने फिर एक धक्का दिए और जितना लूणदा

अंदर घुस चूका था उसी से ताईजी को छोड़ने लगा. ललिता जी को पहले तोह कुछ समझ नहीं आया सिवाए फ़ैल चुकी छूट और उसमे हुए दर्द से

फिर उन्होंने अपनी आँखे बंद कर ली और अर्जुन के आधे लुंड से हे छोड़ने के मजे लेने लगी. अंदर से छूट पूरी गीली थी और लुंड सख्ती से

फिसल रहा था. एक बार फिर जोर से उनके पपीते पकड़ कर ऐसा धक्का लगाया की जड़ तक लुंड अंदर. इतने बड़े लुंड से ललिता जी पहली बार सिर्फ

4 घंटे पहले हे चूड़ी थी और उनकी छूट अभी उभर भी नहीं पाई थी की अर्जुन के लुंड ने फिर से उसको फाड़ना शुरू कर दिए था.

"कितना बेदर्द है रे तू. तुझे मुझ पर जरा तरस नहीं आया जो सोती हुई मुझे ऐसे रंडी की तरह छोड़ने लगा.", कराहती हुई ताईजी ने पहली

बार इतने गंदे लफ्जो में बात करि थी. वो गांव से थी तोह उन्हें इन सबका पता जरूर था लेकिन इस परिवार में कभी उन्होंने किसी से ऐसी बात तोह

दूर ऊँची आवाज भी नहीं सुनी थी.

"वो ताईजी जब मई उठा तोह आप सोइ हुई इतनी प्यारी लग रही थी. रात को आपका जिस्म देख नहीं पाया था और अब देखने के बाद रुका नहीं गया."

उसकी ऐसी बात सुनकर ललिता जी को एक बार तोह अपने भतीजे पर बड़ा प्यार आया और खुद की तारीफ सुनकर ख़ुशी भी हुई, लेकिन फिर वापिस

हलके गुस्से और दर्द से कहा, "तोह मतलब मुझे नंगी देखकर कही भी छोड़ देगा?"

"क्या करू ताईजी अब आपने ऐसा मजा दिए है तोह फिर रुका हे नहीं गया." अर्जुन अब उन्हें धीरे से छोड़ रहा था वो भी ज्यादा लुंड अंदर बहार किये.

"चल फिर जल्दी से अपना काम ख़तम कर." ताई जी ने बात ख़तम करते हे तेज सिसकी ली और इधर अर्जुन वापिस बुरी तरह से उनकी चुदाई में लग गया.

"हाय ताईजी ये आपने क्या सीखा दिए. इतना मजा है ने इसमें के कभी ज़िन्दगी में ऐसा मजा नहीं मिला. और ये आपके दूध हिलते हुए कितने सुन्दर लगते

है."

"हाय.. मेरी जान निकल रहा है और बेशर्मी से ऐसी बातें भी कर रहा है. बातें मत कर, ये मजा अब वापिस कभी नहीं मिलेगा." इतराती और

सिसकती ललिता जी ने अपने हाथ अर्जुन के चूतड़ों पर रखे और ऊपर हो अपनी छातियां उसके बदन से चिपका चुदाई का मजा लेने लगी.

"अब तोह मई जब भी आप अकेली मिलोगी यही करूँगा."

गांड तक उसके अखरोट टकरा रहे थे और छूट किसी नदी की तरह बहार तक पानी निकाल रही थी. दोनों की सिसकारियों से कमरा गूँज रहा था.

ऐसे हे 20-22 मिनट तक छोड़ने के बाद अर्जुन ने उनकी दोनों टंगे उठा कर लुंड जड़ तक अंदर भर दिए. उसके सुपाड़ी से गुजरता हुआ गरम लावा

सीधा ललितजी की बच्चेदानी में उतरने लगा.

"हाय माँ. कितना भरेगा मेरी छूट को? इस उम्र में माँ बन गई तोह ज़िन्दगी ख़राब हो जाएगी." अपने ऊपर झाड़कर गिरे हुए अपने भतीजे के सर

पर प्यार से हाथ फेरते हुए उन्होंने चिंता जताई.

"क्या एक हे बार में आप माँ बन जाओगी?"

"हो सकता है बन भी जाऊ. लेकिन अभी मेरा मास्की 4 दिन पहले ख़तम हुआ है तोह उम्मीद काम है. पर याद रखना आगे से अंदर नहीं डालेगा."

"ठीक है मेरी प्यारी ताईजी. और अब पता चल गया के आगे से आप मुझे रोकेगी नहीं." उनकी होंठ चूमने के बाद आँख मारकर वो उठ के

पजामा पहन बहार भाग गया.

"बदमाश. पूरी छूट को फाड़ गया. लेकिन इतना मजा भी तोह दे गया." दर्द में मुस्कुराती हुई ललिता जी ने अपनी फटी हुई छूट से भतीजे का

गाढ़ा वीर्य बेहटा देखा तोह चेहरे पर चमक आ गई. इतना दर्द तोह पहली चुदाई में भी नहीं आया था लेकिन मजा भी पहली चुदाई से ज्यादा

आज 27 साल बाद मिला था. अपनी ब्रा से छूट साफ़ कर फिर लेट गई वो बिस्टेर पर और अर्जुन तैयार होकर पार्क की तरफ चल दिए. 5 बज चुके थे.

माधुरी दीदी उठी और बाथरूम से फ्री होकर अपने और अलका के लिए कॉफ़ी बनाने लगी, जिसका आज इम्तिहान था. जितनी बार वह पेशाब करती

उनका दिल उतना हे चुदाई के लिए तड़पता. रसोईघर में भी उन्होंने अपनी छूट को पाजामे पर से सहलाया और सीसिया गई. "जल्दी कुछ करना पड़ेगा

नहीं तोह मरने जैसी हालत हो जाएगी. अब सहा नहीं जाता रे अर्जुन एक बार फिर से दीदी को जी भर के प्यार कर de."Mann में सोचती हुई भी वो

अर्जुन को पुकार रही थी. "दीदी बन गई कॉफ़ी?" ालक की आवाज आई जो अंदर आ गई थी.

"है तू अंदर चल मई लेके आ गई बस 2 मिनट में." वापिस मुड़कर अलका को देखा जो एक गुलाबी टीशर्ट और पाजामे में थी. उसके उभार भी बड़ी

दीदी पर हे जा रहे थे. लेकिन लम्बाई ज्यादा और पतली कमर और तीखे नैन नक्श उसको बिलकुल अलग दिखते थे. थोड़ी देर बाद दोनों अपने

कमरे में बैठी कॉफ़ी पी रही थी और रेखा जी आँगन की सफाई कर रही थी. रेखा जी सुबह की चाय अपनी जेठानी ललिता जी के साथ पीती थी

लेकिन वो अभी तक कमरे से बहार नहीं आई थी. "दीदी, आप उठ गई तोह मई चाय बनाऊ?" वही से उन्होंने ललिता जी को आवाज दी जो अभी वैसे हे लेती

थी. "है रेखा मई आती हु अभी बहार." जैसे तैसे हिम्मत कर वो उठी और शरीर पर कपडे पहन जैसे हे निचे पेअर रखा, उनकी छूट से लेकर

पेट तक दर्द और मजे की लहर दौड़ गई. "ये मरवा देगा मुझे. गलती कर दी जो इस घोड़े के नीचे आई. लेकिन हाय कितना मजबूत है और इतना

लम्बा टिकता है. अभी हे हाल है तोह 2-3 साल बाद तोह मेरा पेट फाड़ देगा." धीरे से बहार निकलती हुई वो सोचती रही. हर कदम पर उनकी

सिसकी निकल रही थी. टाँगे थोड़ी फ़ैल गई थी. कमोड पर बैठी तोह छूट से निकलते पेशाब ने तोह घी में आग का काम कर दिए. उनकी सिसकी

इतनी तेज निकली की रेखा ने भी सुन ली थी. "दीदी, क्या हुआ? अभी भी दर्द है क्या?" चिंतित रेखा ने वही से आवाज लगाईं.

"नहीं रे. वो तोह बस थोड़ा झटका आ गया था कमर में बैठ ते हुए." तेरे बेटे ने भुर्ता बना दिए इस छूट का क्या ये बताऊ तुझे. ऐसा लग

रहा है जैसे छूटे के अंदर तक चील दिए हो."

हलके हलके कदमो से चलती वह कुर्सी पर बैठ गई. चाय भी बन गई थी तोह रेखा 2 कप लेकर वही उनके पास आ बैठ गई. "रेखा एक दर्द की

गोली तोह ला जरा. चाय के साथ ले लेती हु नहीं तोह सारा दिन ख़राब हो जायेगा."

दवाई लेकर कुछ देर वही बैठी रही वह. इतने में रेखा जी नाहा कर कपडे बदलने वापिस कमरे में चली गई थी. किसी को पास न देख कर वो

उठकर अपने कमरे की तरफ चलने लगी और उनकी ख़राब किस्मत. "माँ तुम ऐसे क्यों चल रही हो.? दर्द तोह कमर में था लेकिन आपकी टाँगे फैली

हुई है?" अलका की बात सुनकर ललिता जी के पेअर वही रुक गया. "अरे बीटा वह तेरी मम्मी का पेअर आज बाथरूम में मुद गया था. मैंने दवा दे दी

है कुछ देर में वापिस थी हो जायेगा." कमरे से बहार आती रेखा जी ने उसको पूरी बात बताई. अलका फिर बाथरूम में घुस गई. वो संतुष्ट नहीं थी

चाची के जवाब से.

पार्क के 2 चक्कर लगाने के बाद आज अर्जुन उन बुजुर्ग मण्डली से थोड़ी दूर वही घास पर बैठ गया. 5 लोग haasya-yog कर रहे थे और एक अकेले

शीर्षासन की मुद्रा में सर घास पे और पाँव ऊपर कर खड़े थे. उनकी नजर भी इस नए मेहमान पर रुक गई थी. अपना आसान 30 सेकंड करने के

बाद वह खड़े होकर वही अर्जुन के पास आ गए. "दूसरी बार देख रहा तुम्हे यहाँ. हम जैसे बूढ़े लोगो को देख कर क्या मिलेगा. जवान हो तोह

वैसा हे करो जो जवान लोग करते है. आगे वाले हिस्से में कई हमउम्र लड़कीअ दिखेंगी तुम्हे." वो जैसे अर्जुन को टटोल रहे थे. तक़रीबन 6'2"

कद और चेहरे पे लाली चाय थी. बाल बर्फ से सफ़ेद लेकिन शरीर किसी 40 साल के तंदरुस्त व्यक्ति सा था.

"वो ऐसा है न अंकल की मैंने एक बुक पढ़ी थी प्राणायाम और योग का महत्व, उसमे जैसा कुछ लिखा था आप लोग भी वैसा हे कुछ कर रहे थे.

बस यही देख मई आप लोगो की तरफ चला आया. मुझे माफ़ कीजिये अगर मैंने यहाँ आकर आप लोगो को डिस्टर्ब किआ हो." वो विस्तार से आने का कारण

बता उठने लगा तोह उस बुजुर्ग ने उसके कंधे को थपका कर वापिस निचे बैठने का इशारा किआ और खुद भी उसके सामने बैठ गया.

"समझदार और काफी जिज्ञासा वाले नौजवान हो. सेहत भी ाची है तुम्हारी. देख कर अठचा लगा के तुम सीखने वाले बचे हो. क्या नाम है?"

"जी अर्जुन शर्मा. अब कक्षा ग्यारह में जाऊँगा. और क्या आप मुझे कुछ बताएँगे इस सब के बारे में? मई किसी को ज्यादा जानता नहीं हु?"

परिचय देकर अपनी जिज्ञासा उसने इन व्यक्ति को कही.

"बीटा मेरा नाम आचार्य प्रमोद शास्त्री है और मई 3 साल पहले इस शहर में आया हु. तक़रीबन 46 साल से मई योग, Hathh-yog और प्राणायाम सीख

और सिखाता आ रहा हु. तुम्हे अभी ये सब विस्तार से नहीं जान न चाहिए. लेकिन मुझे लगता है के शायद कुछ तुम्हारे काम का थोड़ा बहुत मई

तुम्हे बता सकता हु."

"ाची बात है, सर. मई भी अभी कुछ हद्द तक हे सीखना चाहता हु क्योंकि अगले महीने से स्कूल भी शुरू हो जायेंगे और टाइम भी काम मिलेगा.

प्रमोद जी उसकी ऐसी भोली बात सुनकर हंस दिए क्योंकि उन्हों ने बात जैसे कही थी अर्जुन को वैसी समझ नहीं आई थी. काम उम्र का होने का शयद

ये हे नुकसान था.

"बीटा ध्यान से सुनो. योग मतलब जोड़ (+). जो ये शरीर है हमारे चलने से चलता है, लेते से लेट जाता है लेकिन ये सब तोह हरेक इंसान कर

लेता है. परन्तु जो योग है ये एक शरीर और उसकी आत्मा या कह सकते हो दिमाग का तालमेल है. दोनों के जुड़ने से तुम कुछ अलग हांसिल कर सकते

हो. ाचा यहाँ देखो फिर शायद समझ जाओगे." जब उन्हें लगा के ये बातें इस नन्हे दिमाग पर ज्यादा जोर ना दाल दे उन्होंने उसको बताने से दिखाना

उचित समझा. अपना एक हाथ बैठे हुए उन्होंने पावो की चौकड़ी से अंदर करते हुए जमीन पर रखा और पूरा शरीर धीरे धीरे जमीन से ऊपर सिर्फ

उस एक हाथ पर संतुलित हो गया. इतने पर हे वो नहीं रुके और फिर दोनों टैंगो को जमीन के सामानांतर हवा में कर दिए.

"वाह. ये सब आपने कैसे किआ. " अर्जुन अचंभित सा उनकी इस मुद्रा को देखता और कभी उनके शांत चेहरे को.

"ये दिमाग है न हम इसके काबू में रहते है. जब ये कहता है भूख लग रही है तोह हम खा लेते है, जब सोने को बोलता है तोह सो जाते है. और

यही हमको रोकता है इस शरीर के सारे राज जान ने से. एक बार इसको काबू कर लिया बीटा तोह तुम फिर सबकुछ हांसिल कर सकते हो." फिर कुछ रुक कर

कहा, "अभी इतना कुछ नहीं करने की जरुरत है तुम्हे. सिर्फ अपने खाली समय में कोशिश करो ड़याँ लगाने की. अपनी आँखें बंद कर आसपास की सब

आवाज, शोर को सुनो. धीरे धीरे वही ध्यान लगाओ. जब ऐसा लगे की सब शांत हो गया है तोह कुछ देर उस मुद्रा में रहने की कोशिश करना. सब

सीखने में समय लगेगा. और यहाँ बैठकर ताज़ी हवा में ज्यादा से ज्यादा ऑक्सीजन अपने फेंफड़ो में भरना भी एक ाचे शरीर के लिए बहुत सही कसरत है."

अब हम कल मिलेंगे, नमस्कार."

"नमस्कार और थैंक यू वैरी मच."

.

.

"चल भाई जल्दी चल आज पहला पेपर है." लाल सूट में किसी गुलाब सी अलका ने अर्जुन को कुर्सी से उठाया और वो भी मुस्कुराता हुआ उनके पीछे चल

दिए

"वैसे दीदी इम्तिहान आपका और सजा मुझे. ये क्या बात हुई?", अर्जुन को वे रुकना भी था इतनी देर जबतक पेपर ख़तम नहीं होना था.

"सजा के बाद हे तोह फिर मजा मिलता है." इठलाती हुई वो चुन्नी सर पर कर जा लगी अर्जुन की पीठ से और स्कूटर चल दिए कॉलेज की तरफ.

"वैसे आज कुछ और प्लान है क्या आपका पेपर के बाद?", अर्जुन स्कूटर चलते हुए भी अलका दीदी में खोया था. आज तोह उसका दिल कर रहा था की बस

उनको बाहो में भर ले साड़ी दुनिया से बचा कर.

"क्यों? ऐसा तोह कुछ नहीं है. पेपर हे देना है फिर वापिस घर." ये बात भी अलका दीदी ने छेड़ते हुए कही

"ठीक है."

"ओह तोह बर्फ को बुरा लग गया? वैसे मई सोच रही थी के पेपर के बाद तेरे साथ ढेर साड़ी बातें करुँगी. लेकिन अगर तेरे करे में मेरे लिए जगह

नहीं है तोह फिर मई क्या कर सकती हु." अपने छोटे भाई को मनाते हुए अलका उसके पेट पर हाथ फेरने लगी.

थोड़ी देर में दोनों कॉलेज में थे. अर्जुन वही पार्क में बैठ गया और दीदी सामने वाली बिल्डिंग में चली गई.

आज पार्क लगभग काली था. शायद एक हे क्लास का पेपर था. पिछली बार के विपरीत इस बार तोह कैंटीन की तरफ भी सन्नाटा हे पसरा था. कुछ 40-45

मिनट बाद एक जानी पहचानी आवाज सुनाई दी. "हीरो आज यहाँ अकेले अकेले." ये नुसरत थी जो एक बिलकुल हे तंग सूट पहने उसके पास आ गई थी.

"आज आपका पेपर नहीं है क्या?", उसने ऊपर से निचे तक नुसरत को देखने के बाद पुछा. नुसरत ने भी अर्जुन की आँखों की हरकत देख ली थी.

"अरे ये सब्जेक्ट मेरा ऑप्शनल था तोह पास होने लायक करके बहार आ गई. बाकी सब तोह अभी डेढ़-2 घंटे तक नहीं आने वाली." फिर वही बैठ

कर पुछा, "कैंटीन चलेगा मेरे साथ? यहाँ कुछ करने को है नहीं तोह चल आज मई तुझे जूस पिलाती हु." अपने होंठ चबाती अगले पल वो उठ

कड़ी हुई तोह अर्जुन भी साथ हो लिए. पूरी कैंटीन हे उजाड़ पड़ी थी. काउंटर पर भी एक लड़का था जो शायद सामान ठीक कर रहा था. नुसरत ने

बिलकुल आखिर की टेबल चुनी और अर्जुन को अंदर धकेलते सी हुई उसके साथ हे बैठ गई. "क्या लेगा बता. आज तेरी सेवा मई करुँगी."

अर्जुन कुछ ज्यादा सोच नहीं प् रहा था. ये गलत हो रहा है या सही लेकिन अगले हे पल उसने धीमे से कहा, "एक्सक्यूज़ में. हैवे तो जो वाशरूम. डोंट मंद"

बोलकर वह बहार की तरफ निकला और नुसरत ने अपने अनार उसकी कमर से रगड़ दिए. ऐसे हे वह कैंटीन क गेट के साथ बने वाशरूम में गया और अपना

मुँह पानी से धो कर बहार आया. रुमाल से साफ़ करते हुए काउंटर पर जा कर उसने एक जूस और एक कोला लिए. वापिस वही आकर बैठ कर नुसरत की तरफ

कोला की बोतल कर दी. अब दोनों आमने सामने थे. नुसरत अर्जुन के इस रवैये से हैरान और चुप थी. वो भी 2 घूँट लेने के बाद वाशरूम चली गई और

यहाँ अर्जुन ने जूस ख़तम किआ और कॉलेज के बहार आकर खड़ा हो गया. आधे घंटे बाद उसको अलका दीदी बाकी सब लड़कियों क साथ हे बाहर आती दिखी.

आशा और नुसरत भी उनके साथ हे थी.

"तू बहार क्यों आकर खड़ा हो गया? अंदर मई तुझे सब तरफ देख कर आई हु."

"वो वह ज्यादा कुछ करने को था नहीं तोह मैंने सोचा के बहार हे घूम लू. ये जगह भी कुछ खास बुरी नहीं है." उसने अपना ध्यान सिर्फ अलका दीदी

पर हे रखा और वही नुसरत और आशा उसको एकटुक देख रही थी. "चलो यहाँ से मुझे कही जरुरी काम भी जाना है." जब अर्जुन को लगा की इस से

पहले की नुसरत कोई बात शुरू करे वो यहाँ से चल दे यही बेहतर रहेगा.

"ठीक है. चल. Bye Nusrat-Bye आशा." इतना बोलकर अलका दीदी भी ताज्जुब से उसके पीछे बैठ गई.

.

.

"किसी ने कुछ कहा क्या?"

"अपनी उस फ्रेंड को बोल देना के मुझ से थोड़ा दूर रहे. जिस तरह से वो मुझे देखती है और पास आने की कोशिश करती है मुझे जरा भी पसंद नहीं."

भाई की ये थोड़ी गुस्से में कही बात अलका ने सुनकर दोनों हाथ उसकी कमर में डालकर पीछे से हे उसके गाल को चूम लिए.

"और अगर ये सब मई करू तोह क्या तू मुझे भी दूर करेगा?"

"आप तोह मेरी जान हो दीदी. और मई खुद ये चाहता हु के आप हे मेरे साथ ये करो."

"वैसे अर्जुन, वो इतनी भी बुरी नहीं है." अपनी बाहे थोड़ा और कस्ते हुए अलका दीदी ने जब ये बात कही तोह अर्जुन ने अब थोड़े हलके मूड में जवाब दिए

"मैंने आपको ये तोह नहीं कहा के वो बुरी है. बस एक सीमा होती है किसी भी चीज की. और ये हर इंसान के लिए अलग होती है. आपका तोह मेरी जान

पर भी हक़ है लेकिन वह आपकी दोस्त है बस यही मई मानता हु."

"ाचा बाबा अब गुस्सा मत कर और मुझे किसी ऐसी जगह ले चल जहा सिर्फ हम दोनों हो और आराम से बातें कर सके." उनकी ये मीठी बात सुनकर अर्जुन

ने स्कूटर नए सेक्टर की तरफ जाने वाली बहार की सड़क पर ले लिए. 15 मिनट बाद एक पेड़ के निचे स्कूटर डबल स्टैंड पर लगा था और अलका दीदी

सीट पर बैठी थी. अर्जुन उनके सामने खड़ा था बिलुल पास. यहाँ इस वक़्त तोह दूर तक कोई परिंदा भी नहीं था लेकिन पेड़ होने से धुप उन दोनों पर नहीं

गिर रही थी.

"वैसे जगह ाची लेकर आया है तू. यहाँ कब आया?"

"वो रोज सुबह आया हु न दौड़ लगाने तोह यही तक आता हु. और मुझे लगा के इस से शांत कोनसी जगह होगी." अलका बड़े प्यार से अर्जुन को देख रही थी

जिसका सर बिलकुल उसके मुँह के ऊपर था. अर्जुन भी खड़े हुए दीदी को हे देख रहा था. उनके बाल एक रबर बंद के निचे बिलकुल सीधे थे और खुले होने

के बावजूद सलीके से बिलकुल पीठ की सीध में थे. लाल सूट इतना टाइट था की उनके उभर ज्यादा बाहर निकले थे और पेट बिलुल अंदर लग रहा था.

ऊपर वाला होंठ देख अर्जुन ने दीदी का सर दोनों हाथो में थम हलके से दोनों होंठो में लेकर चूम लिए.

"ये क्या हरकत थी?" ऐसे खुले में अपने भाई द्वारा चूमने से दीदी थोड़ा घबरा गई लेकिन उन्हें उसकी हिम्मत और प्यार देख कर ाचा भी लगा.

"दीदी यहाँ आओ आप." इतना कहकर वह उन्हें पेड़ के पीछे बने पेड़ो के बड़े से झुण्ड के बीच ले गया. तक़रीबन 15-16 सफेदे के सीधे लम्बे और मोठे

पेड़ एक साथ थोड़े से हिस्से में लगे थे. आसपास छायादार पेड़ भी थे जो इन सफेदो के सामने थे. अर्जुन ने दीदी को एक पेड़ से सत्ता दिए.

"यहाँ से तोह हमे कोई नहीं देखेगा न?" अभी इतना हे कहा था उसने की दीदी ने उसको ऐसे खड़े हुए हे अपने पर खींच लिए. और बेहद जोश से उसके

पूरे चेहरे को चूमने के बाद अब वो उसके होंठ चूमने लगी. अर्जुन का एक हाथ खुद हे अपने एक उभर पर रख दिए. दोनों जैसे दुनिया भुला

कर एक दूसरे का मुखरास पीने लगे. ये चुम्बन इतना गहरा और लम्बा था के कब अर्जुन के हाथ सलवार क अंदर जा अलका दीदीद के चूतड़ मसलने लगे

उन्हें पता हे न चला. इधर अलका दीदी के हाथ भी टीशर्ट के अंदर से अर्जुन की पीठ को दबाते हुए उसको अपने सीने से भींच रही थी. जब सांस

उखाड़ने लगी तोह दोनों अलग हुए लेकिन अर्जुन के हाथ वही थे. और अब तोह वो हलके हलके से गांड की दरार में दोनों हाथ दाल कर अलग अलग हिस्से

को टटोल रहा था दबा रहा था. उसका लुंड अलका दीदी की छूट से थोड़ा ऊपर ठोकर मार रहा था.

सलवार थोड़ी खुली थी निचे से तोह हाथ चूतड़ों से निचे जाकर छूट के अंतिम सिरे तक आ गए. यहाँ दीदी की कच्ची जो पीछे से गांड की दरार

में फांसी थी ठीक छूट के ऊपर थी.

"आह भाई मत कर यहाँ. अभी ये ठीक नहीं है.", अलका दीदी तोह कबसे चाहती थी के अर्जुन उन्हें दबाये, कपडे उतार के उन्हें चूमे, चूहे और जी भर

के प्यार करे. लेकिन एक तोह ये वैसी जगह नहीं थी और दूसरा वो चाहती थी की उनकी चुदाई आराम से हो और बिस्टेर पर हो न की किसी सुनसान जंगल

सी जगह जहा लेटने की जगह भी न हो.

"मई तोह बस हाथ लगा कर देख रहा था के आपकी वह से कैसी है. उस दिन आपने मेरे किआ था जैसे." और फिर एक बार दोनों एक लम्बे चुम्बन में उलझ

गए. अलग होने के बाद सांसें दुरुस्त कर दोनों स्कूटर पर बैठ गए. अलका दीदी ने अपना सूट भी ठीक किआ जो अर्जुन के मसलने से थोड़ा अपनी जगह

से उठ गया था. "अब चले दीदी?" और उनकी हाँ सुनते हे दोनों घर चल दिए..
 
अपडेट 18

संतुलन (बैलेंस)


(बड़ा हे छोटा सा एक शब्द है "संतुलन" जिसको इंग्लिश में "बैलेंस" कहते है. जैसे की एक ाचे शरीर के लिए ाचा आहार, पर्याप्त नींद और

कड़ी मेहनत जरुरी होती है उतना हे जरुरी है इंसान की ज़िन्दगी में संतुलन का होना. ज्यादा भोजन, जरुरत से अधिक या काम नींद और बिना म्हणत

किआ शरीर रोगी हो जाता है वैसे हे ज़िन्दगी बिना सही संतुलन के एक ऐसा पेंडुलम बन जाती है जिसकी कोई दिशा नहीं होती. कोई लक्ष्य हांसिल

नहीं होता और अगर कुछ होता है तोह सिर्फ ज़िन्दगी बर्बाद.)

दोपहर को दादाजी ने एक प्लेट में कई फलों (फ्रूट्स) को काटकर अर्जुन के सामने रख दिए. "अब ये भी खाने जरुरी है तुम्हारे लिए. देखो एक ाची

खुराक हे एक ाचा शरीर देती है. और अधिक म्हणत मतलब ज्यादा ाची खुराक और उतना हे आराम." अर्जुन को भी उनकी बात सही लगी क्योंकि पिछले

3 दिन से वह कुछ ज्यादा हे म्हणत कर रहा था. और उसको शाम को भी नींद गहरी आ जाती थी. फल खाट हुए उसने अपनी बात कुछ इस तरह राखी.

"दादा जी मई कुछ पूछना चाहता हु."

"है बीटा अगर मुझे पता होगा तोह जरूर तुम्हारी बात का जवाब दूंगा."

"वो बात ऐसी है की मई आजकल शाम को कुछ ज्यादा हे सोने लगा हु. लेकिन फिर रात को मेरी नींद 4 घंटे में हे पूरी हो जाती है. कही ये कुछ

गलत तोह नहीं."

रामेश्वर जी गौर से उसकी बात सुनकर बोले, "बीटा ये शरीर जो है ये कई बार खुद निर्णय लेता है. जैसे जब हम काम करते है तोह न चाहते हुए

भी नींद जल्दी आ जाती है. लेकिन अगर वही काम हम 2 हिस्सों में करे तोह शरीर भी थोड़े समय में इसके लिए तैयार हो जाता है. फिर वो भी 2 छोटे

हिस्सों में इस नींद को पूरा कर देता है. है बिना म्हणत ऐसा होना तोह सिर्फ किसी रोग की निशानी होता है. तुम चिंता मत करो हम इसके बारे में भी

सोचेंगे." उनकी बात सुनकर वह निश्चिन्त होकर वापिस खाने में लग गया और प्लेट खली करने के बाद रसोईघर में रख अपनी साइकिल वाली बोतल में

ग्लूकोस मिला पानी भर स्टेडियम चल दिए.

"सही टाइम से आये हो बेटे. चलो कल वाला हे सब आज भी दोहराओ. बलबीर, अर्जुन के साथ ट्रेनिंग शुरू करो." साइकिल स्टैंड में कड़ी कर अर्जुन बस

बॉक्सिंग अकादमी क अंदर आया हे था के बिना किसी बातचीत के कोच जोगिन्दर जी ने उसको बलबीर के साथ गयम भेज दिए. और वह भी चुपचाप चल दिए

"यही सोच रहे हो की सीधा कसरत करने आ गए?" बलबीर ने चलते हुए हे अर्जुन के मैं की बात उसको बता दी.

"है. पर उन्होंने ऐसा क्यों किआ?"

"देखो छोटे भाई जैसे तुम साइकिल चला कर आये हो तोह शरीर अभी गरम हे है. अब और दौड़ लगाने से कोई फायदा नहीं. तोह जितना जरुरी है उतना

हो गया. अब चलो." अर्जुन को बात समझ आ गई थी. वही गयम के बहार विकास एक और पहलवान से बात कर रहा था. उसको देख कर बलबीर नजर निचे

कर अंदर चल दिए लेकिन अर्जुन ने विकास को अपनी तरफ देखते पाया तोह हाथ हिला कर अभिवादन किआ. "कैसे हो भैया?" विकास ने भी उसके सर पर

हाथ फेर दिए. "दिल लगा के सिर्फ म्हणत कर. ऑलवेज स्टे फोकस्ड." आखिरी बात उसने इंग्लिश में कही थी. मतलब ये तगड़ा गांव का दिखने वाला पहलवान

पढ़ा लिखा इंसान था. "जी भैया." और वो अंदर आ गया.

"छोटे भाई तू इनको कैसे जानता है.?" अब बलबीर ने बात चेदि जो विकास और अर्जुन की बात सुनकर हैरान सा था. अर्जुन ने जमीन पर push-up लगते

हुए हे जवाब दिए, "क्यों भैया वो कोई गलत इंसान है?"

"धीरे बोल मेरे भाई. कोई सुन न ले. लेकिन विकास पुनिअ कोई ऐसा वैसा शख्स नहीं है और वो सिर्फ उन्ही से बात करता है जो उसके साथ ट्रेनिंग लेते

है. न वो हँसता है और न ज्यादा बोलता है. लेकिन तेरे साथ दोनों किये."

"है वो मुझे ाचे इंसान लगे और उन्हें शायद मई भी." अर्जुन ने सरलता से जवाब दिए और फिर दोनों मशीन की और चल दिए.

"ये कुश्ती में 2 बार का नेशनल गोल्ड है. और अब एशियाई चैंपियनशिप के लिए तैयार हो रहा है." बलबीर की बात सुनकर अब चौंकने की बारी अर्जुन की

थी. बात को वही ख़तम कर दोनों कसरत करने लगे. बेंच पर रोड से वजन लगते हुए फिर से वही कल वाली लड़कीअ दिखाई दी जो आज उनकी तरह कंधे

की कसरत कर रही थी मशीन पर. थी तोह कमाल की दोनों लेकिन अर्जुन के दिमाग में वापिस विकास की बात आ गई. "फोकस" और वो सब नजर अंदाज कर

अपने 3 सेट पूरे कर बहरा आने लगा. तरकपांत से रुमाल निकल पसीना साफ़ कर वो बलबीर के साथ हे बॉक्सिंग एरिया में आ गया. जोगिन्दर जी एक लड़के का

हाथ पकड़ कर खड़े थे और वो थोड़ा दर्द में था शायद. जिज्ञासा से अर्जुन उनकी तरफ बढ़ गया.

"नजर हटी और दुर्घटना घाटी" उन्होंने ये बात अर्जुन की तरफ देख कर कही और वह लड़का चीख पड़ा.

"अब यहाँ ाचे से गरम पट्टी बांध ले सोमबीर और हमेशा याद रखना के हर काम का सही तरीका एक हे होता है. मुक्का गलत लगा तोह खुदका हे

नुक्सान हो सकता है." और वह लड़का अपने साथी की तरफ चल गया पट्टी बंधवाने.

"देखो बचे. ये हाथ सिर्फ हवा में नहीं चलने. खुद को महसूस होना चाहिए के ये कितनी दूर जा रहे है और कितनी तेज. अभी देखा इस लड़के को?

सीधा हाथ दे मारा किट पर और इसका कन्धा उतर गया. आज का तुम्हारा पहला लेसन यही है. "राइट एफ्फोर्ट्स इन राइट डायरेक्शन". चलो जाओ."

अर्जुन फिर से बलबीर के साथ लग गया लेकिन अब थोड़ा जोश था और वह गौर से हर बात समझ रहा था बलबीर जो भी बता रहा था.

"हाथ इस से आगे नहीं. अपना पेअर इतना आगे और फिर उसके दूसरी साइड वाला हाथ इस तरह." हर बारीक बात वो अर्जुन को समझा रहा था.

"देख छोटे भाई आज की प्रैक्टिस तोह हो गई. कोच साहब ने भी तुझे कुछ समझाया तोह एक बात मेरी भी सुन ले. जोर जो है वह सांड में भी होता

है लेकिन एक हल्का सा चीता उसको एक मिनट में जमीन पर लिटा लेता है. कैसे?

"अपने नुकीले दांतो से" अर्जुन ने फटाक से बात कही तोह बलबीर हंस दिए. "वो उसकी साँस की नाली, गर्दन के निचे, पीठ पर या पेट पर वार करता है

लेकिन समय, जगह और अपनी ताकत और दिमाग से. तोह मेरा कहने का मतलब है की जोर काम भी हो तोह चलता है लेकिन दिमाग सही जगह रहना चाहिए.

कब, कहा और कैसे सबसे जरुरी है. कब करना है, कहा करना है कैसे और कितना करना है ये मायने रखता है." बलबीर की बातें समझ में आई

तोह अर्जुन का दिमाग बहार निकलते हुए एक बात की तरफ गया. "बीटा यहाँ, बीटा बस इतना, बीटा धीरे, बीटा जोर से..." उसको ताईजी की बात याद आ गई

चुदाई के वक्त की. फिर सुबह कभी प्रभाकर जी की भी और स्टेडियम आने से पहले कही दादाजी की बात भी. कोच साहब ने और विकास भाई ने भी तोह

इस से जुडी बात हे कही थी. एक ने कहा था फोकस मतलब 'ध्यान बनाये रखना' और दूसरे ने कहा था 'सही म्हणत सही दिशा में' इन सब बातों का

मूलमंत्र एक हे तोह था संतुलन (बैलेंस).

"ऐ हीरो ऐसे हँसता हुआ क्यों घूम रहा है? कंपनी बाग़ में घूम रहा है क्या तू?", इस जोरदार जानना आवाज को सुनकर अर्जुन के पेअर रुक गए.

"गुड इवनिंग मिस. वह बस कोच साहब ने कुछ समझाया था लेकिन समझ में अभी आया तोह खुसी हुई थी की समझ में आ गया. सॉरी अगर ये गलत

लगा आपको."

"नीरा हे चिकना घड़ा है ये लड़का तोह." मंजूबाला ने मैं में सोच फिर थोड़ा नरमी से बोली, "कोई बात नहीं. तू कौनसा खेल खेल रहा यहाँ?

"जी बॉक्सिंग में हु."

"ाचा. और तू रहता कहा है? हॉस्टल का तोह तू है नहीं."

"जी यही इसी शहर के #### सेक्टर में." ऐसे हे सवाल जवाब हो रहे थे के एक टेनिस बाल उनकी तरफ आकर अर्जुन क पैरो में रुक गई.

"ए hello. जस्ट पास थिस बॉल िफ़ यू don't मंद." बड़ी मीठी आवाज आई दोनों के कान में तोह अर्जुन और मंजूबाला दोनों ने आवाज की तरफ देखा तोह

ये एक बेहद आकर्षक सी लड़की थी लगभग अलका दीदी जितनी लम्बाई, घुटनो से ऊपर हरे रंग की स्कर्ट, टाइट कासी हुई सफ़ेद टीशर्ट और gore-gulabi

चेहरे पे दिलकश सी मुस्कान. टीशर्ट और चेहरे पर पसीना आया हुआ था. जहा मंजू उस लड़की की तरफ गुस्से में देख हे रही थी के अर्जुन ने बॉल

उसकी तरफ उछलते हे कहा, "It's ऑलराइट मिस." और वह से जवाब आया, 'थैंक्स, सीय."

थोड़ा आगे जाकर एक बार फिर पीछे मुड़कर अर्जुन को देख मुस्काई और वापिस खेलने में लग गई.

"ये रांड ने मूड की ऐसी तैसी फेर दी.", गुस्से में मंजूबाला लाल हो गई थी "चल लड़के अब निकल यहाँ से." उसने थोड़ी बेरुखी से बोलै लेकिन अर्जुन

ने उसकी तरफ छोटी सी मुस्कान से देखते हुए कहा, "Bye, कल बात करेंगे मिस."

"वाह मंजू तू इसके चक्कर में थी और ये तेरा हे चक्कर काट के निकल लिए." पास आती हुई सुमन जो इनदोनो पर हे नजर गड़ाए थी बोली

"कुछ भी बोल सुमन लड़का न शरीफ भी है और पक्का भी. आज तोह वह विकास भी इसके सर पे हाथ फेर रहा था. और ये टेनिस वाली अँगरेज़ भी इस्पे

लाइन मारने लगी है." उस लड़की की इंग्लिश के चक्कर में मंजू ने उसका नाम अँगरेज़ रख दिए था. दोनों हंसने लगी और इधर अर्जुन साइकिल निकल चल

दिए गेट की तरफ. तक़रीबन एक कम आगे आया था, जोकि आज थोड़ी स्पीड से साइकिल चला रहा था इतने में उसके बराबर में एक स्कूटरी साथ चलने लगी.

"तोह बाइसिकल से रोज आते हो स्टेडियम?" ये वही टेनिस वाली थी. पीछे कंधे पर टेनिस राकेट टेंगा था बैग में और माथे पे बालो को आगे आने

से रोकने के लिए एक सफ़ेद हैरबंद. कंधे तक भूरे बालो की एक छोटी बना राखी थी. "hi. मेरा नाम प्रीती है और इस साल हे अंडर 19 टेनिस में

आई हु. 2 साल पहले की अंडर 16 की runner-up." अब अर्जुन ने भी गर्दन हिलाई hello में. "मेरा नाम अर्जुन शर्मा है और यहाँ स्टेडियम में मेरा दूसरा

दिन था, बॉक्सिंग."

"वैसे लगते नहीं हो के बॉक्सिंग टाइप वाले होंगे." ये बात कह कर जो उसकी खिलखिलात देखि अर्जुन ने वो बस उसके मोती जैसे दांत और गुलाबी होंठ

देखता रह गया.

"आगे देखो ऐसे तोह तुम घर की जगह हॉस्पिटल पहुंच जाओगे."

"हां. सॉरी. वो ऐसा है की मई ये सब प्रोफेशनल नहीं कर रहा. सिर्फ कोचिंग ले रहा हु वो भी मेरे दादा जी के कहने पर. गेम तोह मुझे सिर्फ

2 हे पसंद है. एक बैडमिंटन और एक क्रिकेट. लेकिन यहाँ नया हु और अब तोह खेले हुए भी एक साल होने को आया. बोर्डिंग में 5 साल मई स्कूल टीम

में था." उसने अब ध्यान सड़क पर रखते हुए कहा. दोनों माध्यम गति से चला रहे थे.

"तोह बोर्डिंग से वापिस घर आये हो. अगर बुरा न मनो तोह रहते कहा हो तुम?"

"जी #### सेक्टर में."

"कमाल की बात है. वही मेरा घर है." प्रीती ने थोड़ा हैरानी से कहा. ये सेक्टर ज्यादातर बड़े सरकारी लोगो या फिर रईस लोगो से भरा था.

"इसमें कमाल की क्या बात हुई. एक शहर है तोह कही तोह रहेंगे हे. कमाल तोह तब होता है जब आपका घर पास में hota."Ye बात अर्जुन ने वैसे

हे कही थी.

"ाचा तोह हाउस नंबर बताओ." जब प्रीती ने इतनी बात कही तोह अर्जुन थोड़ी देर चुप कर गया.

"अरे यही सोच रहे हो न के पहली बार हे इस लड़की को देखा और आज हे घर का एड्रेस पूछने लगी." और हंसने लगी..

"नहीं वह बात नहीं है. मेरा घर का नंबर है 7-8." झेंपते हुए अर्जुन ने कहा क्योंकि वह वही सोच रहा था जो प्रीती ने बोलै था.

"तुम पंडित अंकल की फॅमिलिय से हो?" दोनों अब अपने हे सेक्टर की खली सड़क पर आ चुके थे.

"आप दादाजी को कैसे जानती हो.?" अर्जुन ने ब्रेक लगा कर साइकिल वही रोक दी तोह प्रीती ने थोड़ा सा आगे.

"5 नंबर घर है हमारा. छोल पूरी मेरे दादा जी है. और 12तह चंडीगढ़ से करने के बाद अभी मई यही आ गई हु." फिर अर्जुन को छेड़ते हुए बोली

"मतलब ये हुआ के ये तोह फिर कमाल हे हो गया." और अर्जुन ये बात सुनते हे शर्मा कर वापिस साइकिल चला आगे बढ़ा. प्रीती ने उनके घर के सामने

ब्रेक लगा लिए तोह अर्जुन भी संकोचवश रुक गया की ऐसी कैसे अपने घर के अंदर चला जाऊ एक लड़की को बहार छोड़ कर.

"आप भी आइये घर me."Aupcharikta से उसने पुछा

"नहीं अभी नहीं लेकिन जल्दी हे आउंगी." इतना हे कहा था के बगीचे से रामेश्वर जी के साथ छोल पूरी बहार आते दिखे.

"चले दादू."

"चलो बेटी मई बस आ रहा हु पंडित जी के साथ."

अर्जुन ने उन्हें प्रणाम किआ तोह छोल पूरी रामेश्वर जी से बोले. "पता तोह मजबूत होता जा रहा है. फ़ौज की तैयारी तोह नहीं."

रामेश्वर जी मुस्कुरा दिए और bole,"Fauj में 8 घंटे की नींद नहीं मिलती इसलिए मेरा पोता नै जायेगा." दोनों दोस्त हंस दिए और अर्जुन खिसिया कर

अंदर चला गया.

घर में आया तोह अंदर आँगन में ज्योति बैठी थी कोमल दीदी के साथ और पास में हे रेखा जी और ललिता जी बैठ कर रात के खाने के लिए सब्जी

का रही थी. ज्योति ने अर्जुन को देखते हे एक आह सी ली जो किसी को नहीं दिखी.

"आ गया मेरा बीटा. चल नाहा ले फिर दूध देती हु tujhe."Rekha जी ने प्यार से अर्जुन को बोलै तोह वह वही अंदर वाले बाथरूम में हे चल दिए तौलिए

ले कर.

"आंटी कहा रहता है आजकल ये.? संदीप तोह सारा दिन या तोह घर में पड़ा रहता है या बिना वजह घूमता फिरता है." ज्योति जान न चाहती थी के

अर्जुन उनके घर क्यों नहीं आ रहा

"बेचारे के पास टाइम कहा है. सुबह प्रैक्टिस, फिर अपनी बहनो को स्कूटरी सीखना, कॉलेज ले जाना, स्टेडियम भी शुरू करवा दिए इसका और अब वही

से आ रहा है. थोड़ी देर सोयेगा फिर घर के काम और आधी रात से पहले सोना." बेटे की पूरी दिनचर्या उन्होंने बता दी

"और आधी रात की बाद अपनी ताई की छूट खुली करना." ये बात ललिता जी ने मैं में कही.

"कुछ भी कहो आंटी जी आपका बीटा अभी भी बिलकुल शरीफ है. नहीं तोह मैंने तोह अपने घर में हे देखा है. संदीप सारा दिन कहा रहता है कुछ

पता नहीं. वैसे काम तोह वो भी कोई गलत नहीं करता लेकिन दोस्त बहुत है उसके."

"बीटा इसके तोह दोस्त हे सब घर में हे है." ये बात ताईजी ने कही थी. कुछ देर बाद ज्योति उठ कर चली गई तोह ऋतू दीदी ने अलका को कुछ इशारा

किआ और उसने भी सर झटक दिए.

अर्जुन बाथरूम से निकल बाहर आया तोह ऊपर का हिस्सा बेपर्दा था, जोकि नै बात नहीं थी लेकिन ऋतू, कोमल और ललिता जी तीनो उसके चौड़े सीने

को आँखों में भर रही थी. "माँ मेरा दूध ऊपर हे दे देना. मई कपडे पहन रहा हु अपने कमरे में."

"ठीक है तू चल ऊपर"

.

.

एक मिनट हुआ होगा ऊपर आये की ऋतू कमरे का दरवाजा हल्का सा ढलका के दूध ड्राइंग रूम में रख अर्जुन के कमरे में दबे पाँव घुस गई. और पीछे

से लिपट गई. अर्जुन ने अभी तौलिया खोलने के लिए बस हाथ बढ़ाया हे था और ये घटना घाट गई.

"कोण?"

"भाई और कोण होगा?" लेकिन इसके बाद दोनों हे चुप हो गए. निचे से तौलिया निकल कर जमीन पर था और घूमने के वजह से वह हल्का अकड़ा हुआ सीधा

ऋतू दीदी की दोनों जांघो के बीच पाजामे से उनकी छूट पर जा लगा था. लुंड आधा हे खड़ा था तोह अब ऐसे लग रहा था के एक डंडा दोनों के बीच

कनेक्शन बना रहा हो. पतले कपडे के ऊपर से छूट पर मोटा गरम लुंड लगते हे ऋतू दीदी की सांस रुक गई. लेकिन उस से बड़ी गलती हो गई जब वो

डर से अर्जुन के गले जा लगी. लुंड छूट को कसके रगड़ता हुआ गांड के निचे पहुंच गया. और दूसरे हे पल छूट ने एक बूँद भी टपका दी.

"दीदी सॉरी वह मुझे पता नहीं था के आप हो नहीं तोह मई कपडे बस पहन हे रहा था." माहौल को इतना शांत और दीदी को डरा हुआ देख अर्जुन कुछ

भी बोल रहा था. "तू सॉरी मत बोल bhai."Abhi भी वो वैसे हे कड़ी थी लेकिन अब लुंड सर उठाने लगा तोह वह अपनी एड़ी ऊपर कर पंजे के भर

कड़ी होने लगी. दोनों के होंठ पास आ गए. कहा तोह ऋतू दीदी लुंड से बचने के लिए ऊपर हुई थी. और अब लुंड खड़ा होकर उनकी गांड की दरार में

कसने लगा था. छूट तोह पूरी उसपर टिक सी गई थी. "ाः.. मजे की सिसकी से होंठ खुले तोह ऋतू दीदी ने अर्जुन को हे चूम लिए.

"भाई तुझे बुरा लगा क्या?"

"दीदी बुरा तोह नहीं लगा लेकिन मई नंगा हु. या तोह आप कपडे उतार लो नहीं तोह मई पहन लेता हाउ." उसने ये बात कही तोह मजाक में थी लेकिन

अगले हे पल वह बिस्टेर पर था और उसके ऊपर दीदी लेती हुई उसके होंठ चूस रही थी. लुंड अब खुलकर झटके ले रहा था उनकी छूट और गांड पर

"भाई हम ऐसे भी ठीक है न." दीदी ने ये बात कही तोह अर्जुन ने पाजामे के अंदर हाथ दाल कर उनके कूल्हे वैसे हे पकड़ लिए जैसे दिन में अलका

दीदी के पकडे थे. फरक इतना था के ऋतू दीदी ने निचे कच्ची नहीं पहनी हुई थी और उनके चूतड़ तोह बिलुल हे गद्देदार और मुलायम थे. गांड की

फांक को अलग करते उसके हाथ जब छूट की तरफ बढे तोह वही पर उसका लुंड चिपका हुआ था.

"आह भाई. ये कैसी आग लगा रहा है. " ऋतू दीदी मजे की लज्जत में तड़प उठी. पहली बार उनकी गांड पर किसी मर्द का हाथ लगा था, वो भी

अपने उस छोटे भाई का जिस से वह तब से प्यार करती थी जब मतलब भी नहीं पता था. इस एहसास में डूबकर ऋतू दीदी ने अपनी कमर उसके लुंड

पर हिलनी शुरू कर दी और दोनों के होंठ चुम्बक की तरह चिपक गए. थोड़े हाथ बहार निकल अर्जुन ने दीदी का पजामा जांघो से निचे सरका दिए

और लुंड वापिस स्प्रिंग सा उछलता हुआ छूट पर जा लगा. लुंड के थप्पड़ से ऋतू दीदी उचक सी गई. "हाय. क्या कर रहा है. तू आराम से नहीं लेता

रह सकता. मुझे करने दे तू कुछ मत कर." इतना बोलकर वो अर्जुन को बिस्टेर पर हे टिकाये थी और खुद कड़ी हो गई. लुंड अब अर्जुन के पेट की तरफ

आ चूका था. "बाप रे ये इतना बड़ा कैसे हो सकता है." ये बात एक बार फिर ऋतू दीदी के मुँह से निकली. लाल टमाटर सर सूपड़ा और बांस सी मोटाई

जैसा लुंड और इधर छोटी सी दीदी की छूट. कोई मेल हे नहीं था दोनों का. फिर दीदी लुंड की लम्बाई पर छूट रख कर वापिस बैठ गई और अपनी छूट

की लकीर को उसपर घिसने लगी. अर्जुन तोह मजे से आँखें बंद किये पड़ा था. "भाई तेरे हाथ यहाँ रख." दोनों हाथो में अपने सख्त बूब्स पकड़ा कर

ऋतू ने सामने खिड़की तरफ देखा तोह अलका भी देख कर मजे ले रही थी. उसको दिखते हुए ऋतू दीदी ने अपनी टीशर्ट गले तक उठा ली. उनके दूध से

गोर और बिलुल किसी बड़ी बॉल जैसे सख्त चूचे अब अर्जुन के सामने थे. वो अपनी जीभ से उनके लाल चेरी जैसे निप्पल चुभलाने लगा. और बारी

बारी होंठो से खेंचने लगा. छूट बुरी तरह बह रही थी और लुंड को चमका रही थी. "भाई जल्दी कुछ कर न प्लीज. मर्डर जाउंगी इस आग से. बस

अंदर नहीं करना. बाकी जो मर्जी कर." दीदी को यु तड़पता देख अर्जुन ने उन अपनी जगह लिटाया और फिर उसने ढेर सारा तेल छूट के बहार गिरा कर लुंड

से घिसना शुरू कर दिए. जोरदार घिसाई के बावजूद छूट के होंठो से परे उसका मुँह नहीं दिख रहा था. बस एक लाल छोटी सी बिंदी छूट के बीच में

चिपकी लग रही थी. "है ऐसे हे रगड़ भाई. मजा आ रहा है. और इन्हे भी मसल दोनों हाथो से." वो अर्जुन का जोश बढाती जा रही थी और अर्जुन तेल

से साणे लौड़े को चिकनी छूट के होंठो के बीच घिसे जा रहा था. गोर चूचे में अब इतनी सख्ती से मसले जाने से लाल पद गए थे. फिर अर्जुन

ने एकदम से सख्ती काम कर दी और निचे झुक बिलकुल प्यार से खड़े निप्पल चाटने लगा. ऐसे हे उसने दोनों मोठे चुके जीभ से चाट कर गीले कर

दिए. ये वाला एहसास बड़ा रोमांचक था. बूब्स ठन्डे हो रहे थे और छूट ज्यादा पानी निकल रही थी. लुंड अब ज्या दबाव लेकिन माध्यम गति से चल

रहा था. सूपड़ा इस दबाव से फूल चूका था और जब वह छूट के छेद से टकराता तोह दोनों हे मजे से सिसकरिअ भर उठ ते. यहाँ ऋतू दीदी की कमर

हवा में उठी उधर अर्जुन के लुंड ने पूरी तेजी से पिचकारी उड़ाई जो सीधा दीदी के थोड़ी और होंठ पर जा लगी. अगली 3 पिचकरिअ बूब्स और पेट पर

बाकि बचा हुआ माल छूट के होंठो पर गिरा. दीदी की छूट देख कर ऐसा लगा जैसे उन्होंने पेशाब कर दिए हो. शायद ये उनका पहला भरपूर झड़ना

हुआ था. वही साइड में अर्जुन पलट कर सांस ठीक करने लगा और बड़बड़ाया, "सिर्फ उतना जितना जरुरी हो. संतुलन बना रहेगा." कुछ देर में वह चूका

था और यहाँ ऋतू दीदी खुद की हालत देख शर्मा गई. थोड़ा वीर्य जीभ से लग कर मुँह में भी चला गया था. लेकिन उन्होंने सिर्फ अपने आप को साफ़ किआ

और कपडे पहन दरवाजा ढाल कर भर निकल गई जहा अब अलका कड़ी इन्तजार कर रही थी. बहार अँधेरा हो चला था.
 
अपडेट 19

बेहतर होने की शुरुआत


"तोह बीटा आज तुम्हारी मुलाकात हो गई पंडितजी के पोते से. कैसा लड़का है?", छोल पूरी यहाँ अपने कमरे में थे और उनके सामने हे कुर्सी पर प्रीती

बैठी हुई थी. छोल पूरी एक रोबदार व्यक्ति थे. ाची शकल सूरत और कद काठी के धनि. उनके व्यक्तित्व को घनी सफ़ेद मूछे और भी बेहतर

बनती थी. इनका एक बीटा और एक बेटी थे. बीटा अमेरिका रहता था अपनी बीवी संग लेकिन उनकी पौती यही उनके साथ रहकर पढाई के साथ साथ अपने

दादा जी का भी ख्याल रखती थी. ये परिवार थोड़ा समय से आगे था या ये कहे की शिक्षित भी था और पश्चिमी सभ्यता का थोड़ा असर भी दिखाई

देता था इनके रहने और जीने के तौर तरीके पर. प्रीती की माँ एक खूबसूरत पढ़ी लिखी ग्रीक महिला थी और नाम था रोमिला (रोमा शार्ट). ब

प्रोग्राम के लिए जब प्रीती के पिताजी लंदन थे तब वही दोनों की मुलाकात हुई फिर प्यार और छोल पूरी की रजामंदी मिलने से दोनों ने शादी कर ली

थी. समय से इनके 2 बचे हुए प्रीती और उस से 4 साल छोटा बीटा जोएल, जो अपने maa-baap के साथ हे रहता था.

छोल साहब की बेटी उनकी जान थी जिसका विवाह उन्होंने एक आर्मी के कप्तान से करवाया था जो अब मेजर के ओहदे पर देहरादून पे पोस्टेड था. बेटी तक़रीबन

36-37 साल की थी जिसका नाम रेणुका था और पति मज. कौशल, इनके एक हे बीटा है जो देहराहूं आर्मी स्कूल में पढता है. महीने में एक

बार रेणुका अपने पिता से मिलने जरूर आती थी. वापिस कहानी की तरफ आते है.

"ाचा लड़का है दादाजी लेकिन ऐसा लगता है शायद आज तक वह अपने आप में हे खोया है. मेरा मतलब है की शायद उसको लाइफ के बारे में उतना नहीं पता जितना इस

उम्र के लड़को को पता है." प्रीती अपने दादा छोल पूरी को व्हिस्की की घूँट भरते देख बोली.

"है बीटा. मेरा दोस्त जो मुझसे कुछ छुपता नहीं है. उसने हे ये बात कही थी मुझसे की पहली बार वो ऐसी स्टेडियम जैसी एक अलग दुनिया में जा रहा

है जहा हर तरह के लोग मिलते है लेकिन अर्जुन जो 9 साल सिर्फ हॉस्टल, वो भी किसी आर्मी के जैसी अनुशाशन वाला, में पढ़ा है. उसको तोह अपने

शहर, लोगो, ाचै बुराई का भी नहीं पता. इतने सालो में शायद वह बचपन भी भूल चूका है" गंभीरता से उन्होंने सब बताया अपनी होणार लाड़ली को.

"9 साल वो भी बचपन और इस युथ के?", एक तड़प और दर्द से प्रीती ने बात दोहराई

"है बीटा. पंडित जी बड़े नेक इंसान है लेकिन जैसे हे मई तुहारे लिए परेशान होता हु वैसे हे वो भी अपने इस बचे के लिए रहते है. तुम खुद

हे देखो की तुम खुद कितनी अलग हो यहाँ के लोगो से. लेकिन तुम फिर भी बहार से अलग हो वो बेचारा अंदर से भी अलग है. बड़ी मुश्किल से बचा तोह

वो जब पैदा हुआ था. और फिर अर्जुन के बाप ने उसको घर से दूर भेज दिए वो भी इतने समय के लिए. देखा जाये तोह जितना उसको बताया जाता है वो

उतना हे समझता है. अब तुम्हे थोड़ा साथ देना है मेरी बची इस लड़के को दुनिया में खड़ा करने में. पंडित जी मेरे लिए भाई से बढ़कर है और उनकी

हे वजह से आज तुम्हारा ये दादा जिन्दा भी है और इसकी वर्दी बेदाग भी." एक बड़ा घूँट लेकर खाली गिलास वही टेबल पर रख वो रात के खाने के

लिए डाइनिंग टेबल की तरफ चल दिए और पीछे रह गई सोच में डोबी हुई प्रीती. छोल साहब के घर का सारा बहार का काम नौकर मुकेश करता था

और घर का खाना, सफाई और देखभाल उसकी पत्नी पारवती करती थी. दोनों के लिए ऊपर एक कमरा बनवा दिए थे छोल पूरी ने.

इनका घर भी अंदर से काफी आलिशान था. 5 कमरे और एक बड़े ड्राइंग रूम वाले इस घर में सुख सुविधा की हर चीज थी. महंगा टेलीविज़न, बड़े

सोफे, झूमर, बेहतरीन कालीन, प्रीती के कमरे में एक ख़ास बीएड लगा था और एक कंप्यूटर भी, जो उस समय सिर्फ किसी अमीर घर में हे होता था. घर

के पिछले हिस्से को ऊपर से कवर किआ हुआ था और यहाँ एक 15क्ष10 का स्विमिंग पूल बना हुआ था. कुलमिलाकर घर अपने आप में खूबसूरती की मिसाल था.

वही रामेश्वर जी के घर रात के इस पहर सब सोने की तैयारी कर रहे थे लेकिन अर्जुन अभी बिस्टेर से उठा था. अब उसका सर हल्का और शरीर ऊर्जा

से भरपूर था. समय देख कर वो निचे आया रसोईघर में जहा उसकी माँ रेखा जी फ्रिज में सामान रख रही थी सफाई करते हुए और कोमल दीदी

माधुरी दीदी की बर्तन साफ़ करने में मदद कर रही थी.

"कितना सोता है बीटा तू? तुझे कोमल 2 बार उठाने गई थी लेकिन तू सोया रहा. अब भूख लगी होगी?" रेखा जी ने बेटे को एक बार सीने से लगाया फिर

खाने के लिए पुछा.

"नहीं माँ. पेट भरा है मई तोह बस पानी पीने आया था.." इतना बोलकर सीधा बोतल से पानी पीने लगा तोह रेखा जी ने फिर भी जबरदस्ती उसको

एक मुट्ठी मेवे के साथ बड़ा गिलास दूध का पीला हे दिए. फिर बिना किसी की तरफ देखे वह पानी की बोतल हाथ में लिए तीसरी मंजिल पर चला गया.

"अब थोड़ा आचार्य जी की कही बात को देखा जाये." ये सोचकर वो खुले आसमान के निचे वही छत्त पर बैठ गया. आँखे बंद कर के सिर्फ अपने कान

लगा लिए वातावरण पर. ठंडी हवा और एक दम शांत समां था. कही कुछ ज्यादा आवाज नहीं थी. अभी कुछ देर हे हुई थी उसको ऐसे बैठे हुए की

उसको बहुत हे धीमी रेडियो पर गाने की आवाज आई. सो कर उठने के बाद से हे उसका मैं तोह बिलकुल शांत था. उसमे कोई सवाल, परेशानी और विचार

नहीं थे तोह उसको भी ध्यान लगाने में कोई दिक्कत न हुई. थोड़ी देर बाद उसको बहुत धीमे कदमो की आहात भी हुई. रेडियो की आवाज से ध्यान अब इधर

आ लगा था. आवाज धीरे धीरे तेज हो रही थी फिर उसको लगा के कोई ऊपर आ चूका है लेकिन अपनी आँखें नहीं खोली. ऊपर जो कोई भी आया था वो भी

चुपचाप खड़ा था उसेक पीठ के पीछे. उखड़ी हुई उस इंसान की साँसों तक को इस शांत वातावरण में वो सुन पा रहा था.

"भाई तू यहाँ अकेला बैठा क्या कर रहा है." ये माधुरी दीदी थी.

"कुछ नहीं दीदी बस थोड़ा खुद पर फोकस कर रहा था. कुछ दिन से ज्यादा हे भागदौड़ हो रही है तोह बस यहाँ बैठ कर इस ठंडी हवा से खुद को

राहत दे रहा था. आप नहीं सोइ अभी तक.?", अर्जुन के सवाल से माधुरी दीदी की चेतना वापिस आई.

"अरे मई तोह इसलिए ऊपर आई थी के आज हम दोनों यहाँ सोयेंगे." उनसे ये तोह कहते नहीं बना के छूट कुलबुला रही 2 दिन से लुंड लेने के लिए और

भाई तू इसको छोड़ कर शांत कर दे. उन्होंने बेस यही कह दिए.

"मुझे अभी कहा नींद आएगी दीदी. और फिर आप तोह सारा दिन काम करती हो, आप आराम कीजिये. मई आपके लिए अभी बिस्टेर लगा देता हु. " इतनी देर

से अर्जुन ने एक बार भी दीदी की तरफ मुँह नहीं किआ था. लेकिन उसकी बात सुनकर माधुरी ने बस इतना हे कहा, "चल मई भी तेरे साथ चलती हु."

दोनों निचे आये, जहा आज भी संजीव भैया नहीं थे और दोनों कमरे खाली थे.

"कहा सोना चाहेंगी दीदी? ऊपर छत्त पर यहाँ भैया के कमरे में.?"

"ऊपर हे चलते है भाई. यहाँ तोह मुझे भी ाचा नहीं लगता." उनकी बात सुनकर इतनी देर में पहली बार अर्जुन मुस्कुराया था. 2 गद्दे अपने कंधो

पर उठा वो बहार निकला और दीदी भी हाथ में चद्दर और तकिये लिए उसके पीछे चल दी कमरे बंद कर के.

"दीदी, लो चादर बिछा दो अब." दोनों गद्दे जाड कर बिछा वह सामने कड़ी माधुरी दीदी को बोलै. मिलकर उन्होंने एक डबल चादर बिछाई.

"मई बस अभी आती हु एक बार निचे बहार वाले गेट को टाला लगा कर और बाथरूम होकर." वो खड़े होते हुए बोली. उनके नीचे जाने के बाद

अर्जुन छत्त के किनारे टहलने लगा. उनके घर के साथ एक तरफ तोह अग्गरवाल जी, जो की आधात का काम करते थे, उनका घर था. दूसरी साइड जहा

अभी वो देख रहा था प्लाट खाली था जिसके साथ हे था 5 नंबर बांग्ला. "प्रीती का घर कितनी पास में है और एक मई हु जिसको अपने पड़ोस का हे

कुछ खास नहीं पता." उसने यही सोचा और उसको थोड़ा बुरा भी लगा के एक साल में सिर्फ उसको वही पता है जो घर वालो ने बोलै. स्कूल, दीदी का

कॉलेज, भैया की दिखाई मार्किट, पड़ोस के 2-3 परिवार और अब स्टेडियम. सारा समय बस घर और स्कूल में हे निकल गया. "कोई बात नहीं अब धीरे

धीरे सब देखूंगा. ये शहर इतना बुरा तोह है नहीं."

छोल साहब की छत्त लाइट जाली तोह उसने एक लड़की उसको वह से जाती दिखी. और ऊपर बने कमरे में 2 लोग चले गए.

"चल आजा अब आराम कर ले." माधुरी दीदी ऊपर आ चुकी थी. अर्जुन ने उनको देखा तोह अब वो एक मैक्सी पहने थी उन्होंने जो नहाकर बदली थी. मुस्कुराता

हुआ वह उनकी तरफ बिस्ते पर आ गया. बिस्टेर पर सीधा लेता था तोह दीदी उसकी तरफ हो गई. एक हाथ उन्होंने अर्जुन के ऊपर रख दिए. दोनों के सर

की निचे तकिये थे. "दीदी कुछ पूछना था आपसे?" अर्जुन को भी पता था के दीदी अगर उसके पास है तोह शायद वो दोनों फिर वही करे जो 2 रात पहले

हुआ था. "हां तोह पूछ न भाई." उसका पेट और छाती सहलाती दीदी ने कहा. उनके बीच में अभी भी थोड़ी दुरी थी. चिपके नहीं थे.

"दीदी जो भी हमने उस रात किआ था, आप उस सब के बारे में कितना जानती हो?" अर्जुन के इतने सरलता से और बिना हे कोई नाम लिए पूछने से माधुरी

दीदी भी मुस्कुरा उठी. कितना भोला था उनका छोटा भाई. शरीर से बढ़ गया था लेकिन मैं से तोह अभी वह कच्चा हे था.

"भाई जो हमने किआ था उसको आम भाषा में सेक्स कहते है और देहाती भाषा में चुदाई. एक लड़का और एक लड़की की जिस्मानी मिलान में बहुत कुछ होता है.

और इसके लिए भगवान् ने ये दो अलग जिस्म बनाये. कुछ अलग अंग दिए है दोनों को जिनक अहम् किरदार होता है एक पूर्ण मिलान में. एक लड़का और लड़की

इस मिलान से हे प्यार करते है और अपनी दुनिया बनाते है."

"थोड़ा सा विस्तार से समझाएंगी? कर तोह लिए था एक बार लेकिन ऐसा लगता है जैसे कुछ सीखना और पता होना बाकी है."

"है भाई. देख जो ये तेरा लुंड जिसको तू लिंग कहता था ये वो बीज भरता है लड़की की छूट के अंदर जिस से वो एक बचे को जनम दे सके. छूट के

अंदर हे बच्चेदानी या गर्भ होता है जहा इसका कुछ हिस्सा जाता है और फिर लड़की और लड़के के पानी से एक नया जीवन वह जनम लेता है. ये

जो लड़की के सीने पर नरम मॉस के गोले होते है जिनको बूब्स कहते है इनमे हे उस बचे के लिए दूध बनता है उसके जनम लेने के समय. तभी तोह

ये ऐसे होते है. जो ये निप्पल अभी छोटे और पतले है, बचे के जनम लेने के बाद थोड़े बड़े हो जाते है और उसके पीने से मॉटे भी. लेकिन बचा

तब तक नहीं ठेआहर्ता जबतक अंदर लड़की का पानी भी लड़के के पानी से ना मिले. सिर्फ लड़का अपना काम कर ले और इसमें लड़की को मजा ना आये तोह वो

सिर्फ वासना पूरी करना होता है. दोनों अगर प्यार करते है, एक दूसरे के दिल को समझकर सेक्स करते है और एक दूसरे के अंगो को मजा देकर मिलान करते

है तभी वो पूर्ण सहवास या लव मेकिंग कहलाता है. किसी भी लड़की का शरीर तभी तैयार होता है जब उसके ये बूब्स दबाये jaaye,honth को चूमा जाए

और छूट को चुदाई से पहले ाचे से तैयार किआ जाए. कुछ लोग तोह एक दूसरे के सभी अंगो को मुँह में लेकर, चूसकर भी चुदाई के लिए तैयार करते

है." दीदी की इतनी बात सुनकर अर्जुन को अपने दोस्त संदीप के घर देखि किताब याद आ गई जिसमे लड़की लुंड चूस रही थी, गांड में ले रही थी और

कला आदमी उसकी छूट को चूस रहा था. और फिर ताईजी ने भी उसका लुंड मुँह में लेके गिला किआ था.

इन सब बातों के दौरान दोनों के शरीर भी गरम होने लगे थे. अब माधुरी दीदी अर्जुन के बाजू पर सर रख उस से चिपक चुकी थी. उनकी एक तंग

उसके लुंड के उभार के पास मुड़ी हुई ऊपर थी और उनके मोठे चुके उसके सीने पर.

"क्या बचा एक बार में पैदा हो जाता है? अगर ऐसा है तोह अब तुम क्या करोगी?" ये बात में चिंता भी थी

"होने को हो जाता है भाई. लेकिन उस रात तूने जब अंदर किआ था तोह मेरे मासिक ख़तम हुए 5 दिन हो चुके थे. ये टाइम पर बचा गर्भ में नहीं

रुकता. और इस से बचने के कई उपाए भी है. लड़के अपने लुंड पर निरोध चढ़ा कर कर सकते है, स्खलित होने के वक्त वीर्य बहार निकाल सकते है

और लड़की अगर बचा नहीं चाहती तोह वह रोज एक गर्भनिरोधक गोली खा सकती है." गोली के बारे में उसने हिंदी की एक पत्रिका में पढ़ा था और उनकी

शादीशुदा सहेलिया भी ये लेती थी जो उन्होंने हे इनको बताया था.

अर्जुन उनकी सब बातें सुनता उनके दूध भी सेहला रहा था. वो बहुत कुछ जान चूका था आज चुदाई के बारे में. फिर कुछ याद आया और उसने अपने

हाथ मैक्सी के ऊपर से हे उनके चूतड़ों पर रख दिए. निचे और कोई कपडा नहीं था, उनकी गांड अंदर से बिलकुल नंगी थी. "और दीदी यहाँ." उसने बस

गांड की दरार में एक हाथ की उंगलिअ फेरते हुए पुछा. "भाई वह नहीं. वो उन्नातुराल सेक्स होता है. गांड चुदाई बहुत से लोग करते है और कुछ

लड़कीअ ये करवाती भी है. लेकिन गांड का छेड़ अलग होता है. छोटा और टाइट जबकि छूट किसी रबर की तरह होती है जो खुद पानी छोड़ती है

तोह गीली होने पर लुंड झेल लेती है और वापिस वैसे हे हो जाती है. गांड मारना अलग होता है. यहाँ कोई चिकनाई नहीं होती तोह लोग तेल या

क्रीम प्रयोग करते है. ये उन्हें पूरी चुदाई में करना पड़ता है नहीं तोह दोनों के अंग ख़राब या जख्मी हो सकते है. और इसमें सिर्फ मर्द को हे ज्यादा

मजा आता है. छूट तोह एक बार हे खून बहती है जब सबसे पहली बार उसकी झिल्ली फैट टी है. लेकिन गांड का चला लुंड के हिसाब से कई बार फैट

सकता है और खून भी निकलता है. वह जख्म होता है लेकिन छूट में ऐसा कुछ नहीं. " बातें होती रही और अर्जुन के हाथ दीदी की मैक्सी को ऊपर

करते गए . उनकी गांड अब बेपर्दा थी और अर्जुन करवट ले उनकी तरफ देखता गांड को सेहला रहा था. माधुरी दीदी ने भी अब उसको गले लगा लिए

छूट जो नंगी पड़ी थी उसके होंठो पर भी अर्जुन निचे वाला हाथ फेरने लगा. दोनों आराम से होंठ चूम रहे थे और दीदी पाजामे में हाथ दाल कर

छोटे भाई के बड़े लुंड को पकड़ कर ऊपर निचे कर रही थी. सीढ़ी हो कर उन्होंने अपनी मैक्सी उतार दी और उनकी तरफ देख अर्जुन भी नंगा हो कर वापिस

बीएड पे लेट गया. दीदी उसकी कमर से थोड़ा निचे अपनी टंगे चौड़ी कर बैठ गई. ऊपर झुकते हुए वो एक हाथ से अर्जुन का लुंड सेहला रही थी और दूसरा

उसकी गर्दन के पिच ले जाकर उसको थोड़ा ऊपर कर रही थी. अर्जुन भी ऊपर हुआ. दीदी अब एक तरह से उसकी गौड़ में बैठी थी. अपने दोनों हाथो में उनके

बड़े पपीते पकड़ कर दबाते हुए वह उनको चूमने लगा. "हाँ भाई ऐसे हे कर." गरदारन जीभ से चाट ते हुए वह निचे मुँह ले जा रहा था. फिर एक

चूचे को हाथ में लेकर अपने मूढ़ की तरफ खींच पीने लगा. दीदी सिसकिया लेती अपनी कमर उसके लुंड क साथ रगड़ रही थी..

"आह भाई अठचा लग रहा है. पी ले मेरे ये दूध, निचोड़ दाल इनको देख जरा कितने भारी हुए जा रही है. " खुद अपना चुका भाई के मुँह में

ठेलते हुए उसकी गांड हिल रही थी.

खुले आसमान के निचे, साड़ी दुनिया से अलग ये दोनों इस कदर खोये थे की कोई होश नहीं था इन दोनों को. इनकी ये मुद्रा बड़ी कामुक थी जैसे कामसूत्र

को देख कर दोनों वही सब आजमा रहे हो. माधुरी दीदी भी एक भरपूर यौवन की मिसाल थी. 38 साइज के खरबूजे जितने बड़े बूब्स, उनके निचे गदराई

हुई कमर, मोती फूली हुई छूट और एक छोटे माटेक जैसे गोल और उभरे उनके दोनों चूतड़. पूरा शरीर बिना बालो के एक दम साफ़ और मुलायम. ऐसा यौवन

जो किताबो में हे पढ़ा हो या खजुराहो के चित्रों में दिखाई देता है. उस शरीर को भोगने वाला भी काम आकर्षक नहीं था. सख्त, गौरवर्ण और लम्बे

कद का धनि ये लड़का जिसका सबसे ख़ास अंग इस छोटी उम्र में हे 8 इंच पार कर रहा था. सूपड़ा भी एक माध्यम ालो के सामान बड़ा और टमाटर सा लाल.

"भाई तू सीधा लेट जा." दीदी नई उसके ऊपर बैठे हुए हे उसको तकिये की तरफ धकेल दिए. खुद थोड़ा पीछे हुई और अपने दोनों हाथो में उसका लुंड

पकड़ कर उसपर झुक गई. एक बार सुपाड़ी पर छोटा सा चुम्बन कर फिर जीब से चाटने लगी लिंगमुण्ड को. दोनों हाथ लगाने के बावजूद अर्जुन का लुंड तक़रीबन

2 इंच बहार निकल रहा था जिसको उसकी बड़ी दीदी मजे से चाट रही थी.

"दीदी ये क्या कर रही हो? मेरे अंदर एक मजा सा उठ रहा है, पेट अकड़ रहा है. हाय.." मजे में उसकी आँख बंद हुई तोह उसने ऐसे हे उसके ऊपर

झुकी अपनी बड़ी बहिन की टांगो के बीच अपना हाथ छूट पर रख दिए. जहा अब वो पर्याप्त गीली हो चुकी थी. सेहलताते हुए अपनी चार उनलगिए छूट

के निचे रख अर्जुन ने अपना अंगूठा उनकी छूट में घुसा दिए. "आह भाई आराम से. तेरा तोह अंगूठा हे बड़ा मजे दे रहा है. बस करता रह रुकना मत."

दूसरा हाथ हवा में झूलते हुए एक चूचे को दबा रहा था. अब दीदी सिर्फ एक हाथ से लुंड पकड़ कर लुंड को सूपड़ा लगभग मुँह में लेकर चूस रही

थी जो उनको और भी फूलता महसूस हो रहा था. मुँह जितना चौड़ा आज खुला था उठा तोह पहले कभी उन्होंने सोचा नहीं था के खुल भी सकता है.

अर्जुन ने मजे में कमर हलकी ऊपर धकेल दी तोह दीदी ने लुंड बहार निकाल तेज तेज सांसें लेना शुरू कर दिए. "हे भगवन अगर कुछ देर और ये

करती तोह शायद दम घुट जाता मेरा." वो कहती हुई सिसक भी रही थी क्योंकि अब उनकी छूट भी झड़ने को थी.

"भाई जल्दी कुछ कर. ऐसे तोह आएग और बढ़ती जा रही है." दीदी की बात सुनकर मजे में लेता अर्जुन खड़ा हुआ और अपनी जगह दीदी को लित्य और उनकी

जांघो को फैला कर वह बैठ गया. एक बार छूट को अपने हाथ से फैलाया और सूंघा. कुछ अजीब से स्मेल थी लेकिन छूट बिलकुल मुलायम और नरम

थी. उसने सिर्फ एक चूमा किआ उसपे हर अपना अकड़ा हुआ लुंड भिड़ा दिए उसके मुँह पर. "तैयार हो दीदी?" "हाँ"

कच्छ से अर्जुन का सूपड़ा उस हलके तेज धक्के से छूट को चौडाता हुआ अंदर जा घुसा. "आई माँ.. दुखता है रे. मुझे तोह लगता है तेरा लुंड हर बार

हे ऐसे मेरी जान निकलेगा." दीदी को इस झटके से दर्द भी हुआ लेकिन छूट का मुँह भरने से मजा भी आया. उनके बूब्स रगड़ते हुए अर्जुन वापिस होंठ चूसने

लगा. एक हाथ से दीदी की तंग को थोड़ा ऊपर उठा कर सहलाते हुए हे एक करारा धक्का दे दिए. मुँह बंद था तोह दीदी चीख न पाई लेकिन छूट तोह अकड़

गई थी उनकी. "बस बस दीदी हो गया. अब दर्द नहीं दूंगा." उसने प्यार से दीदी के माथे को सहलाया और झुक कर वापिस एक चुम्बन जड़ दिए उनके माथे पर

धीरे धीरे वो 6 इंच लुंड से हे उन्हें छोड़ने लगा.. "आह भाई ऐसे हे कर.. मेरी परवाह मत कर बस धक्के lagate...aaah.. रह.. आह ाचा लग रहा है.

दीदी के नाख़ून अर्जुन के चूतड़ों पर गड़े हुए थे और वह अब मजे से उनके पेले जा रहा था. "दीदी अब पलट जाओ जरा." उसने झटके में लुंड बहार निकला

तोह दीदी को फिर दर्द हुआ.. "आह bhai...sala ये डंडा जब अंदर जाता है तब भी दर्द देता है और बाहर आते हुए भी..' भाई की बात समझकर वो किसी

चौपाये जानवर से हो गई कोहनी और घुटनो के भार. अर्जुन भी उनके पीछे घुटनो पर खड़ा हो गया. "दीदी तुम्हारे चूतड़ कितने बड़े और गद्देदार है न.

इतने तोह किसी के नहीं होते. मुलायम भी है और यहाँ से खूब गरम भी." चूतड़ों की दरार में अपने लुंड को मोटा सूपड़ा जैसे हे उसने घुसाते हुए फिराया

तोह निचे आते हुए एक बार उसका मुँह गांड के छेद पर रुक गया. "ओह भाई.. एक दो बार ऐसे हे कास के फिर यहाँ पर तेरा लुंड.. दीदी की बात सुनते हुए

इस बार हलके दबाव से लुंड वह फिराया तोह उनकी छूट ने और पानी छोड़ दिए.. उसका मोटा लुंड दीदी को अपनी गांड के छेड़ पर एक अलग सा मजा दे गया

था. इतने में हे अर्जुन ने लुंड निचे छूट पर टिकाया और फिर एक हे झटके में पहले जितना अंदर कर दिए. दीदी कराह उठी लेकिन बोली कुछ नहीं. दोनों तरफ

से गांड की दरार और नरम जांघो से टकराता लुंड किसी पीसतिओं सा अंदर बहार हो रहा था. इस मुद्रा में छूट के मोठे होंठ भी बिलकुल कैसे हुए थे उस

मोठे लुंड को.. "दीदी आपकी छूट तोह अंदर से ऐसी है जैसे पिघला हुआ माखन हो और हाय.. मेरा लुंड कैसा हुआ चल रहा है.."

"भाई मई गइईईई.. हाय रे... आह ." पिछली चुदाई से कही ज्यादा झड़ी थी इस बार उनकी छूट. पूरा लुंड भीग गया था अर्जुन का. दीदी की सर गद्दे

पर झूल गया और जब उनकी गांड भी निचे होने लगी तोह अर्जुन ने दोनों हाथो से उनकी कमर थाम ली. "दीदी अभी नहीं.. मेरा नहीं हुआ अभी.. "और फिर उसके

प्रचंड धक्के उनकी गांड पर पड़ने लगे.. गीली छूट में अंदर बहार होता हु लुंड फुच फुच की आवाज दे रहा था और गांड पे पड़ते हुए धक्को से पैट पैट

की आवाज सब तरफ फ़ैल रही थी. इतने मधुर संगीत में खोया वह बस अपनी धुन में दीदी को छोड़ता रहा जो वापिस मस्ती में आ कर सीसीएनए लगी थी. अपने

बूब्स एक हाथ से दबाती अब वो चुड़ते हुए आगे को सर उठाये हुए थी.. अर्जुन ने उनकी गर्दन पीछे मोदी और उनके होंठ चूसते हुए लुंड कास कर पेलने लगा.

उसके अंडकोष भी अब वीर्य से भरने लगे थे. लुंड को छूट में फूलता महसूस कर माधुरी दीदी एक बार और चरमसुख की तरफ बढ़ चली.. "भाई, अंदर

नहीं डालना तेरा पानी.. मेरे ऊपर गिरा देना.. आह भाई मजा आ रहा है. और तेज मेरे प्यारे भाई.. ऐसे हे ाः.. इस बार जैसे हे उनकी छूट ने लुंड को

भिगोया, अर्जुन ने भी 5-6 तगड़े धक्के मार कर लुंड उनकी गांड पर रगड़ना शुरू कर दिए.. "आह दीदी.. मेरा बी हो गया.. आह.. " पूरी गांड और दोनों चूतड़

उसके वीर्य से सन्न चुके थे. पीछे से हे उनके दोनों बूब्स सहलाते हुए वह साँसे ठीक करता रहा. दीदी भी उसके चरम के सुख को खुद महसूस कर सकूं

से उस से चिपकी थी... भाई तू लेट यहाँ मई खुद को साफ़ करके आती हु. बिस्टेर से कड़ी हुई तोह 2 जोड़ी आँखें उनको देख दबे पाँव वह सीढ़ियों से निचे

अँधेरे में गायब हो गई. "तेरे इस जालिम लुंड ने तोह मेरी चाल हे बदल दी रे.." वो कराह उठी अपने पैरो पर कड़ी होते हे. जाँघे चौड़ा कर धीमे कदमो

से वह निचे चल दी. अर्जुन ने भी अपना लुंड बोतल के ठण्ड पानी से धोया और बिस्टेर पर पजामा पहन कर लेट गया. जब तक दीदी वापिस ऊपर आती वो नींद

में जा चूका थी. माधुरी दीदी भी दोनों के ऊपर चादर दाल अपने भाई से लिपट कर सो गई. अब उनकी छूट में वह खुजली नै थी.. बस मीठी मीठी चीज़

थी जो इस भयंकर चुदाई से मिली थी.

"देख लिए सब. अब चल कामिनी मेरे साथ बाथरूम में. पूरा पजामा गन्दा हो गया मेरा. "

"तेरा हे आईडिया था न नज़र रखने का. मिल गया सुकून अब? और सिर्फ तेरा पजामा नहीं मेरा भी गन्दा हो गया है."

ऋतू और अलका दोनों आँगन में बने बाथरूम में एक साथ घुस गई साफ़ करने के लिए. ये दोनों पिछले डेढ़ घंटे से अर्जुन और माधुरी दीदी का कार्यक्रम देख

रही तह. सफाई के बाद दोनों हे कमरे में जा कर मीठी नींद में खो गई. उनकी छूट ने इस डेढ़ घंटे में जांघो तक गीला कर दिए था उनको. लेकिन देखने

का एहसास भी इनको कुछ काम नहीं लगा. उल्टा वो दोनों एक साथ झड़ने का सुख उठा निहाल हो गई थी. इसके साथ हे अब पूरा घर शांत हो चूका था.
 
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