अपडेट 9
ज्योति की आग
"Tannnnnnnnnnn Tannnnnnnnnnn" की पहली हे आवाज से अर्जुन उठकर बैठ गया. अलार्म का बटन दबा के उसको बंद किआ और
फिर नज़र गई एक जन्नत से नज़ारे पारा. माधुरी दीदी का पूरा यौवन उसकी आँखों के सामने थे. बड़े ठोस बूब्स जो
बीएड पर ठीके थे, मासूम सा चेहरा, घने काले बाल, विशाल लेकिन गुदाज चूतड़, रेशम से चिकनी जाँघे. फिर खुद को
सँभालते हुए अर्जुन ने अपना हाथ उनके एक पूरे गोल चुके पर लगाया और उनके होंठ चुके धीरे से बोलै, "ी लव यू
दीदी, यू अरे ब्यूटीफुल". और उनको चद्दर से धक् कर पूरा कमरा समेत कर अपने कमरे में आ गया.
फिर वही रोजाना का रूटीन, दौड़, बादाम वाला दूध, nahana-dhona किआ और आ गया रसोई में.
माँ को देखा तोह देखता हे रह गया. आज रेखा जी ने लाल रंग की रेशमी साडी पहनी हुई थी और अन्य दिनों से अधिक
खिली हुई थी.
"आज खुश खास है क्या माँ?" अर्जुन ने जैसे हे ये कहा तोह कौशल्या देवी ने जवाब दिए, "ओह मेरे बुद्धू सपूत,
आज होली का त्यौहार है और कल फाग. कभी कभी त्यौहार का केलिन्डर भी पढ़ लिए कर. और है आज मेरा लाडला भी
आ रहा है घर, तेरा बाप."
एक जगह त्यौहार का सुनकर जहा अर्जुन ख़ुशी से झूम उठा वही जैसे हे अपने पिताजी के आने की खबर सुनी तोह उसकी
साड़ी ख़ुशी choo-mantar हो गई. "ाचा आज पापा आ रहे है? कब तक आएंगे वो?", बुझे मैं से उसने पुछा तोह रेखा
जी ने कहा, "बीटा तेरे पापा तोह 7 बजे हे आ गए थे लेकिन उन्हें तेरे गुलाटी अंकल से कुछ काम था तोह वह आधे घंटे
तक आ जायेंगे.
डॉ. गुलाटी एक सर. सर्जन थे सिविल हॉस्पिटल के और शंकर शर्मा जी के स्कूल के दिनों से मित्र थे. जब भी शंकर जी
अपने शहर आते थे तोह सबसे पहले वह अपने दोस्त से मिलर हे घर आते थे. शाम का प्रोग्राम बना कर. अपने पापा को
याद करते हे अर्जुन की पुराणी यादें तजा हो गई. कैसे उसके पिता जी उसको कड़ी सजा देते थे जब उसके काम नंबर आते
थे, और दादा जी भी उनको कुछ बोल नहीं पाते थे. आखिरी बार वो अपने पिता जी से तब बोलै था जब वो वापिस घर आया
था बोर्डिंग से. शंकर जी का डर हे था के अर्जुन ने कभी भी ज़िन्दगी में ज्यादा दोस्ती नहीं करि थी और सिर्फ अपने लक्ष्य
पर हे ध्यान देता था. फिर सब यादों को भूलकर उसने खाना शुरू किआ. आसपास कोई क्या बोल रहा है उसको कुछ सुनाई नहीं
दे रहा था. बस जल्दी से खाना खाया और उठने लगा कुर्सी से की एक हाथ उसके कंधे पर था. सांसें रुक गई क्योंकि
उसके दिल को एहसास हो गया था के ये किसका हाथ है.
"गूदडडडड मॉर्निंग डैड. हाउ अरे यू? हैप्पी तो सी यू अराउंड?" ये सब उसने बिना पीछे मुड़े हे कहा था. शंकर जी का
सपना था के उनका बीटा उनसे ज्यादा पढ़े और जब भी वो उनसे और उनके दोस्तों से मिले तोह सिर्फ अंग्रेजी में हे बात करे. उन
दिनों ये बहुत काम हे होता था के कोई बचा छोटी उम्र में हे प्रवाह में अंग्रेजी बोले. लेकिन अर्जुन ने इस भाषा पर मजबूत
पकड़ बना ली थी दसवीं तक आते आते.
"यू क्नोव किध, यू अरे माय प्राइड. एंड नाउ I'm मोरे थान हैप्पी तो सी यू आल ग्रोन उप एंड गेटिंग थिस हैंडसम. सोन, टर्न
अराउंड." जैसे हे शंकर जी ने ये बात कही अर्जुन अपने पिता के बिलुल सामने था. उन्होंने आज पहली बार अपने बेटे को अपने
सीने से लगाया. "I've मिस्ड थिस कम्फर्ट थ्रौघोउट माय स्कूलिंग डैड. Don't लीव में फॉर समूहिले." कह कर अर्जुन जोर
से चिपक गया अपने पिता से. उन्होंने भी बेटे को पहली बार महसूस किआ. "डॉ. साहब ी होप यू didn't गोत अन्य ट्रबल रीचिंग
हेरे?" ये आवाज सुनकर दोनों baap-bete अलग हुए और शंकर जी जा लगे अपने पिता रामेश्वर जी के गले.
उन दोनों में कई देर तक गुफ्तगू होती रही और उनको कुर्सी पे बिठाया कौशल्या जी ने.
"मेरा लड्डू". इतना बोलकर कौशल्या जी ने बेटे का माथा चूमा और फिर रेखा जी ने अपने ससुर, सास और पति को पानी दिए.
बार बार शंकर जी अपने बेटे को हे देख रहे थे. और बीटा तोह एकटुक उन्हें देख रहा था. उसको बाप के प्यार का एहसास
आज पहली बार हुआ. वो सब भूल गया जो भी उसने बोर्डिंग स्कूल में सहा था.
"माँ, मुन्ना तोह मुझसे भी लम्बा हो गया इतनी जल्दी. पापा ने बहुत म्हणत करि लगती है इस्पे." उनके शब्दों में प्रशंशा
थी.
"बीटा तेरे पिताजी तोह अभी बहुत कुछ सोचे बैठे है. वो सब छोड़ चल पहले खाना खा नहीं तोह तू फिर भाग जायेगा अपने
दोस्तों के पास."
यही वो तीनो लोग बातें करते खाना खाने लगे और राजकुमार जी भी उनसे आ मिले. दोनों भाई गर्मजोशी से मिले और फिर
एक घंटे तक यही सब होता रहा. अर्जुन कबका सबकी नजर बचा कर अपनी साइकिल लेकर संदीप के घर निकल गया.
सबके रसोई से चले जाने के बाद शंकर जी भी उठ खड़े हुए और चल दिए अपने कमरे में जहा रेखा जी कपडे तेह लगा
रही थी. उन्होंने पीछे से हे उनको अपनी बहो में कास लिए और रेखा के चेहरे पे शर्म की लाली च गई. और इस दौरान कमरे
की कड़ी बंद कर दी थी उन्होंने.
वही माधुरी अपने कमरे में बैठी थी जहा ऋतू और कोमल भी थे. अलका दूसरे कमरे में पढ़ाई कर रही थी. वैसे तोह
चारो बहने आपस में सब बातें कर लेती थी. लेकिन इन्होने कभी भी सेक्स के विषय पर बात नहीं की थी. माधुरी किसी
भी तरह ये सब डिसकस करना चाहती थी तोह उसने बात शुरू के.
माधुरी- यार कोमल तेरे सब्जेक्ट्स क्या थे डिग्री में?
कोमल- दीदी फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और इंग्लिश. वैसे क्या बात है? कुछ पूछना है क्या?
माधुरी- है यार लेकिन बात थोड़ी पर्सनल है तोह किसी और से पूछ नहीं सकती तोह याद आया तेरे पास तोह साइंस था.
कोमल- दीदी आप तोह मेरी बेस्ट फ्रेंड हो. आप बेझिझक कुछ भी पूछ सकती हो.
अब इन दोनों की बात सुनकर ऋतू ने अपनी किताब साइड में रख दी और उनकी तरफ मुँह करके बैठ गई.
माधुरी- यार दादा जी कोई लड़का देख रहे है मेरे लिए, माँ से पता चला. लेकिन यार मुझे तोह इसके बारे में ज्यादा
कुछ पता नहीं की आगे क्या होता है. (चेहरे पे शर्म फ़ैल गई ये सब कहते हुए जो दोनों बहनो से छुपी न रही)
ऋतू- अरे दीदी आप यहाँ बैठो मेरे पास. मई करती हु आपकी प्रॉब्लम का सलूशन. (आँखें मटकते हुए उसने कहा)
माधुरी- यार मेरी 2 सहेलियों की शादी हो चुकी है और 3 साल में एक के तोह 2 बचे भी हो गए. और दोनों कहती है
के बस पति तोह उनको जरुरत का सामान समझता है. इसका क्या मतलब है. और यार ये भी कहा उन्होंने की जान निकल जाती है
(इतना बोलकर माधुरी ने आँखें निचे कर ली)
ऋतू- दीदी ये सब अनपढ़ लोगो की बातें है. आप जिस सब्जेक्ट की बात कर रही है उसको सेक्स बोलै जाता है. और ये एक
इम्पोर्टेन्ट लेसन है ाची लाइफ का. बुक्स के अकॉर्डिंग तोह जो भी है वह सिर्फ रिप्रोडक्शन और सेक्स ऑर्गन्स के बारे
में हे होता.
माधुरी- लेकिन ये सब तोह मैंने भी पढ़ा है. मई प्रैक्टिकल की बात कर रही हु.
ऋतू- दीदी सुनो तोह. देखो हेअल्थी सेक्स लाइफ के लिए सबसे इम्पोर्टेन्ट होता है दोनों के बीच प्यार और अंडरस्टैंडिंग.
फिर सेक्स से पहले फोरप्ले.
माधुरी- कोनसा प्ले? (नासमझ होने का दिखावा करते हुए)
ऋतू- ओहो दीदी पूरा सुनो नहीं तोह मई नहीं बोलती
Maadhuri/Komal एक साथ- अरे नहीं नहीं चल तू बता
ऋतू- वह कोमल दीदी आप भी. हाहाहा. चलो सुनो. फोरप्ले मतलब होता है की दोनों पार्टनर्स का एक दूसरे के शरीर से
पूरा प्यार करना. जैसे किसिंग, स्मूचिंग, ब्रेअस्ट्स रोब्बिंग, गेनिटल्स सकिंग.. मतलब मैं ऑर्गन्स को सहलाना, चूसना
और चेतना ेट्स. जिस से वागिना में फ्लुइड्स रन होने लगे और पेनिस अपनी फुल शेप में आ सके. वह के हेयर भी टाइम से
क्लीन करना जरुरी होता है, जिस से इन्फेक्शन न हो और बाद स्मेल न आये. फोरप्ले के और भी फायदे होते है.
जैसे सेक्स दरशन का इनक्रीस होना. जब ाचे से फोरप्ले हो जाये तब हे इंटरकोर्स करना चाहिए. लिखे पेनिस को वागिना
में डालने में परेशानी नहीं होती और दोनों को मजा आता है.
ऋतू ने इतना सब बोलकर अपने कंधे थोड़े ऊपर उठाये जैसे वह सब जानती हो कामकला के बारे में.
कोमल- लेकिन तूने दीदी की असली बात का जवाब तोह दिए नहीं. लड़की को दर्द क्यों होता है?
ऋतू- देखो दीदी सभी लड़कीओ की विर्जिनिटी का सिंबल उनका हैमेन होता है जो एक तरह का मांस का पर्दा होता है हमारी
वागिना के अंदर. फर्स्ट टाइम पेनिस इन्सर्ट होने से ये टूट जाता है तोह ब्लड निकलता है. सिर्फ तभी दर्द होता है या अगर
वागिना में फ्लूइड न बने तब पैन होता है रफ़ स्किन की वजह से. उसके लिए लोग जेली, ऑयल्स या क्रीम उसे करते है.
माधुरी- यार ये भी बता दे के क्या सभी लड़कीओ की वागिना और लड़को के पेनिस एक जैसे होते है?
ऋतू- हहहह.. दीदी ये कैसा सवाल है? सभी उंगलिया कभी बराबर होती है. देखो आपके ब्रेअस्ट्स कितने हैवी है, कोमल
दीदी के भी हैवी है लेकिन आपसे काम. और मेरे आप सब से छोटे. ऐसे हे बाकी पार्ट्स भी. लड़को के ेस्पेशलय इंडियंस में
एवरेज साइज होता है 4-6 इंच और लड़कीओ की वागिना की डेप्थ होती है 6-8 इंच. उसके पीछे ुरतुरुस जिसको बच्चेदानी बोलते है.
वैसे पेनिस की विड्थ भी अलग होती है. कोई मोटा, कोई पतला किसी का सिर्फ हेड मोटा होता है. ऐसे हे वागिना भी होती है.
किसी की फ़लुफ़्फ़ी, किसी की स्लिम और किसी की ज्यादा हे टाइट हिप बोनस की वजह से. लम्बी हेइ वाली लड़की की वैजिनल डेप्थ भी
ज्यादा होती है या फिर जिसके हिप्स हैवी हो. (और एक लम्बी साँस लेते हुए अपनी बात ख़तम करती है)
माधुरी- यार और किसी का अगर 7-8 इंच लम्बा और कलाई जितना मोटा हो तोह वह तोह जान हे निकल देता होगा?
ऋतू हँसते हुए, "क्या दीदी आपने ऐसा देख लिए क्या कही? वैसे अपने यहाँ ऐसा होना एक्सट्रेमेली रेयर है. बूत जिसको भी ऐसा
हस्बैंड मिलेगा उसकी तोह बस ज़िन्दगी मजे में गुजरेगी. यू क्नोव, "बिग्गेर इस बेटर".. हाहाहाहा.. (और वो अपनी दोनों बड़ी
बहनो की शकल देखने लगी मुस्कुराते हुए)
कोमल- न बाबा. मई तोह इस सब से दूर हे सही. जब शादी होगी तब की तब सोचेंगे. और वह उठकर बाहर आ गई.
ऋतू- दीदी आप किस सोच में गुम हो? देखो हम पक्के फ्रेंड्स है न तोह आप कुछ भी शेयर कर सकती हो.
माधुरी- यार क्या तूने कभी ऐसा किआ है या देखा है? और तुझे इतना कैसे पता? तेरी तोह आने वाली ज़िन्दगी बड़ी
ाची होने वाली है. अपने पति को खुश रखेगी तू.
ऋतू- अरे दीदी ऐसा कहा मेरा नसीब. वो तोह लाइब्रेरी में एक बार कामसूत्र का इंग्लिश वर्शन रीड किआ था. तभी पता
लगा के लव मेकिंग या सेक्स क्या होता है. फॉरेन कन्ट्रीज में तोह सेक्स ाड्डूक्तिओं कंपल्सरी है. बस हम हे बैकवर्ड सोच
वाले है. मेरी कुछ क्लास्स्मेटिस तोह अपने bf's के साथ सेक्स कर चुकी है और कुछ तोह मस्टरबैशन करती है. वो भी कभी
कभी अपने एक्सपीरियंस शेयर करती है. बूत मई ये सब उसके हे साथ करुँगी जिस से सच्चा प्यार होगा. फिर चाहे शादी हो या न.
माधुरी- सही कह रही है तू मेरी बहिन. मुझे हे देख इस सब्जेक्ट में तोह बिलकुल निल हु और 25 की उम्र हो चली है. लेकिन
आज तूने मेरी बड़ी हेल्प करि है.
ऋतू- अरे दीदी आप बोलो तोह अपने कपडे उतार दू. इतना बोलकर वो खिलखिला पड़ी ..
माधुरी- चल बदमाश कही की. और फिर वह भी हँसते हु बहार चल दी जहा उसकी दादी, माँ और चची होली पूजन की तैयारी
में लगी थी. वह भी उनकी मदद करने लगी. शंकर जी थक कर अपने कमरे में सो रहे थे.
दूसरी तरफ जब अर्जुन अपने दोस्त संदीप के घर पंहुचा तोह संदीप उसको लेकर अपने कमरे में आ गया. धर्मपाल जी बहार गए
थे किसी काम से जो शाम को आने वाले थे. और संदीप की माता जी पड़ोस के घर में गई थी होली पूजन की तैयारी करने. जहा
से सभी महिलाये पास के ग्राउंड में जाने वाली थी होलिका दहन के लिए. मतलब इस समय घर पर सिर्फ ज्योति, संदीप और अर्जुन
थे. ज्योति अपने कमरे में कुछ कर रही थी तोह वह दोनों भी टीवी पे वीडियो गेम लगा कर खेल रहे थे और बातें कर रहे थे.
अर्जुन ने बात शुरू की, "यार संदीप क्या तूने कभी सेक्स किआ है?"
संदीप अपने दोस्त की बात सुनकर मुस्कुराते हुआ बोलै, "भाई मुझे देख कर लगता है के मैंने ऐसा कुछ किआ होगा कभी. है तू चाहे
तोह आकांक्षा के साथ कर सकता है."
"नहीं नहीं भाई. मेरा मतलब था के तू क्या जानता है इसके बारे में?" अर्जुन थोड़ा शांत रहने का दिखावा करते हुए बोलै
"देख भाई ये जो सेक्स है न इसमें ज़िन्दगी का मजा है. मई तोह कभी कभी कुलविंदर से कोई सेक्सी किताब लेकर अपने हाथ से हिला
लेता हु. या फिर जब टाइम मिलता है तोह हम वो जो सनी है किरयाने वाला अपने स्कूल के पास, उसके घर में वीसीआर लगा कर नीली
फिल्म देख कर साथ में हे मुट्ठ लगा लेते है. भाई बड़ा मजा आता है. तूने कभी मुट्ठ लगाईं है क्या?"
अर्जुन, "नहीं भाई मुझे ये सब नहीं पता लेकिन किसी दिन चलूँगा जरूर तेरे साथ सनी के घर."
"भाई किसी दिन क्यों, मई अभी तुझे एक गरमा गरम चीज दिखता हु", इतना बोलकर उसने अपने स्कूल के बास्ते से एक अखबार चढ़ी
किताब निकली और दोनों दोस्त साथ में बैठ कर देखने लगे. वीडियो गेम तोह वही रोक दी थी उन्होंने.
"भाई ये क्या है?" जैसे हे संदीप ने पहला पन्ना खोला एक फिरंगी लड़की बिलकुल नंगी थी और उसके मुँह में एक हब्शी का बड़ा
लुंड था.
"भाई ये लौड़ा चूस रही है. अपने देश में ऐसा बहोत काम हे होता है. और इतने बड़े लुंड भी अफ्रीका, अमेरिका के कालिओ के होते
है." इतना बता कर उसने अगला पन्ना पलटा तोह वह 2 चित्र थे. एक में वही फिरंगी लड़की उस हब्शी का कला लुंड अपनी छूट में लिए
थी और उसकी गोरी छूट फैली हुई थी. दूसरे चित्र में उसकी गांड में आधा लुंड था और उसके बड़े चुके हवा में झूल रहे थे.
"भाई ये क्या है? ये तोह वह भी डलवा रही है." अर्जुन ने उस फोटो पे हाथ रख कर पुछा जैसे की वह उसको छु हे लेगा.
"भाई ये भी एक मजा है. बहार की लड़कीअ खास कर जिनकी गांड मोती होती है वह लौड़ा गांड में लेती है मजे से. और लड़के
को भी इसमें बहोत मजा आता है क्योंकि ये छूट से भी टाइट होती है." संदीप इतना बोलकर अपना लुंड सहलाने लगा. ऐसे हे 2-3
पैन पलटने के बाद जब संदीप का जोश ज्यादा बढ़ गया तोह उसने अपना लुंड बहार निकल लिए और आगे पीछे करने लगा. अर्जुन
भी उसको देखने लगा. संदीप का लुंड मुश्किल से 5 इंच का था और 2 उंगलिओ से थोड़ा काम हे मोटा था. अर्जुन ने अब पन्ना उल्टा
तोह ये नजारा देख उसको भी जोश आ गया. वह एक बड़ी डबल पेज फोटो थी. वो फिरंगी लड़की एक काले के लुंड पर बैठी थी
पीछे से दूसरे हब्शी ने उसकी गांड में दाल रखा था और एक उसका मुँह छोड़ रहा था. ये नजारा देख उसने भी अपना लुंड बहार
निकल लिए.
"बाप रे.... ये क्या है बे?" उसका लुंड देख संदीप का तोह मुँह खुल्ला हे रह गया
"भाई वही है जो तेरे पास है." अर्जुन ने हँसते हुए जवाब दिए तोह संदीप उसके लुंड से अपनी तुलना करने लगा
फिर उन्होंने वापिस हिलने पे ध्यान लगाया तोह एक हे पन्ना पलटा था के संदीप के लुंड ने उलटी कर दी और वो मजे से वही लेट
गया. अर्जुन को ऐसे मजा नहीं आ रहा था तोह उसने वापिस अंदर दाल लिए. संदीप ने कागज से अपना 2 बूँद वीर्य साफ़ किआ और
किताब को वापिस बास्ते में छुपा दिए. दोनों अनजान थे के कोई उनपे खिड़की से नजर रखे था काफी देर से. तभी ज्योति की आवाज आई
"संदीप, कमरे में क्या कर रहा है? तुझे मम्मी बुला रही है निर्मला आंटी के घर." इतना बोलकर ज्योति ने दरवाजा पीटा तोह
अर्जुन ने गेम खेलने का नाटक शुरू कर दिए और संदीप ने दरवाजा खोला.
"अर्जुन तू यही रुक मई जरा माँ से मिलकर आता हु." इतना बोलकर वह मैं दरवाजे से बहार दौड़ गया. और ज्योति ने चिटकनी
लगा दी उसके बहार जाते हे.
"कोनसी गेम खेल रहे थे तुम दोनों?" वो जरा हैरत से बोली लेकिन अर्जुन स्पष्ट सा बोलै," क्यों दिख नहीं रहा?" उसने ज्योति की
गतिविधि भांप ली थी और दरवाजे की चिटकनी लगाना भी देख लिए था.
"वाह मेरे शेर. तू तोह एक हे बार में बड़ा हो गया. क्यों अपने हाथ से मजा नहीं आ रहा था?" इतना बोलकर वो वही अर्जुन की
गॉड में आ बैठी. अर्जुन ने भी बिना देर किये उसके पपीते पकडे और होंठो से होंठ मिला दिए. उसका लुंड जो अभी भी खड़ा
था ज्योति को अपने चूतड़ की दरार में चुभता महसूस हुआ तोह वह भी अपनी कमर हिलने लगी.
"तेरा दोस्त नहीं आता 2 घंटे से पहले. वो गया माँ के साथ अगले पार्क में सामान लेकर." इतना बोलकर वह लिपट गई अमरबेल
की तरह अर्जुन के तगड़े शरीर से. अर्जुन ने भी एक झटके में उसकी टीशर्ट खींच के फेंक दी एक तरफ और देखने लगे उसके
सांवले लेकिन कठोर बड़े बूब्स जो एक पुराणी सफ़ेद ब्रा में क़ैद थे. "वाह ये तोह बड़े प्यारे है." इतना बोलकर उसने दोनों
हाथो से उन्हें पकड़ कर किसी हॉर्न की तरह दबाना शुरू कर दिए. ज्योति की तोह गर्दन पीछे लुढ़क गई इतने जोरदार हमले से.
"दीदी, खोल दो no इन बेचारो को." उसने हाथ हटाकर ज्योति से गुहार लगाई. ज्योति ने भी बिना कुछ कहे एक झटके में उतार
फेंकी वो ब्रा. अब उसके मुलायम बड़े बूब्स आजाद थे. "दीदी इनका साइज क्या है? बड़े गोल मटोल है."
"34-स. और अब ज्यादा बोल मत बस मुझे संतुष्ट कर दे" इतना बोलकर उसने अर्जुन की टीशर्ट भी उतर दी.
इधर अर्जुन के मुँह और हाथ ने उसकी कठोर चूचियों को ढीला करना शुरू कर दिए था. वो जितना मुँह में आ सकता था उतना
हिस्सा पकड़ कर पी रहा था और दूसरे वाले को अचे से दबा रहा था . ज्योति के निप्पल भी कड़े हो चुके थे. उसने अर्जुन
को अपनी तरफ खींचा और लगी चूसने उसके होंठ. अब दोनों की नंगी छाती आपस में रगड़ कर करंट पैदा कर रही थी.
"कमीने आग लगा दी तूने मेरे इस बदन में. अब तू हे बुझा नहीं तोह तेरे घर आकर छुड़वा लुंगी मई." काम के नशे में
ज्योति कुछ भी बोले जा रही थी तोह अर्जुन ने उसको अपनी बाजुओं में उठा लिए और बीएड पर पटक दिए. इलास्टिक वाली सलवार अगले
हे पल जमीन पे थी और निचे ज्योति की नंगी बिना बालो वाली गुलाबी छूट उसकी आँखों के सामने थी.
"वाह दीदी क्या छूट है. कभी कोई लुंड लिए है क्या पहले?" अर्जुन ने अपनी ऊँगली ज्योति की छूट पर फिरते हुए पुछा तोह
ज्योति ने ना में गर्दन हिलाई. "बस कभी कभी ऊँगली करती हु और 2-3 बार मोमबत्ती तरय करि है." शर्माती हुई ज्योति ने
जवाब दिए. उसका खजाना अर्जुन क सामने खुला जो पड़ा था.
इतना सुनकर अर्जुन ने भी अपनी पेण्ट उतार दी और बहार निकल लिए अपने शेर पिंजरे से. इस समय तोह उसका लुंड और भी
खतरनाक लग रहा था. पिछले एक घंटे से जो उत्तेजित था वह.
(ज्योति)
एक बार फिर उसने ज्योति के बूब्स को मसलना शुरू
किआ और अपना लुंड छूट के ऊपर घिसने लगा. ज्योति का तोह मुँह हे बंद हो गया था इतना भयंकर लुंड देख लेकिन थी
वो लड़की भी ज़िद्दी. उसकी छूट जब ाची तरह से गीली हो गई तोह ज्योति ने खुद अर्जुन का लुंड पकड़ कर टिका दिए छूट के
मुँह पे. अर्जुन ने भी एक माध्यम गति का धक्का लगा दिए. दोनों के मुँह से हलकी कराह निकल गई. उसका टोपा ज्योति की टाइट
छूट में बैठ गया था और इसके साथ हे अर्जुन के लुंड का टंका भी खुल गया था. लेकिन ज्योति थोड़ी अनुभवी थी. खेल
को उसने अपने कण्ट्रोल में लिए.
"एक मिनट रुक जा. मेरे चुके दबा और पी थोड़ी देर." अर्जुन ने वैसा हे किआ. उसने उतना हे लुंड डाले ज्योति की ढूढ़
निचोड़ने शुरू कर दिए. वो भी अर्जुन के चूतड़ सेहला रही थी. जैसे हे थोड़ा ाचा महसूस होने लगा उसने अर्जुन को
kaha,"Chal अब आराम से एक धक्का मार और फिर रुक जाइओ"
अर्जुन ने भी अपनी कमर को साध के एक मजबूत धक्का लगा दिए. लेकिन इस बार उसका मुँह ज्योति के होंठ दबाये हुए था.
"आह माँ मर्डर गई re...."Ye आवाज किसी तरह फिर भी बहार निकल हे गई. अर्जुन का खूंटा आधा गदा हुआ था ज्योति की
छूट में. और अब वो उसके चारो तरफ मजबूती से लिपटी गई थी रबर के जैसे.
"इस से ज्यादा न ले पाउंगी रे मई तेरा. पूरा छेद भर दिए तेरे लुंड ने." ज्योति ने ये बात कही तोह अर्जुन ने देखा
की उसकी आँखों से आंसू और छूट, जहा उसका लौड़ा फसा हुआ था वह से खून की कुछ बूंदे बहार आ रही थी.
"नहीं डालूंगा इस से ज्यादा. अगर कहती हो तोह ये भी निकल लेता हु. बहुत दर्द हो रहा है? अर्जुन का दिल पसीज गया
"पहले दर्द देता है और अब जब मलहम की बारी आई तोह भागने लगा. चल अब आराम से थोड़ा बहार निकल और फिर वापिस
दाल. धीरे धीरे." ज्योति ने अपने चेहरे पे छोटी सी मुस्कान लेट हुए कहा. उसको भी पता था के अर्जुन बड़ा सीधा
और साफ़ दिल लड़का है. यही सोच कर तोह वह इसके निचे आ गई थी.
अर्जुन ने फिर 3 इंच के करीब निकला, टोपा अंदर हे रहने दिए और फिर उतना वापिस पेल दिए. अपनी कोहनिया उसने बीएड पे टिका
ली थी और शुरू कर दिए हलके धक्के देने. हर धक्के के साथ उसका लुंड ज्योति की छूट की दीवारों से रगड़ता हुआ अंदर
जा रहा था.
"आह मेरे सोहने भाई. थोड़ा तेज कर लेकिन इतने हे लुंड से." ज्योति की सिसकारिअ बढ़ती जा रही थी और अर्जुन भी जोश
से लगा हुआ था. वो अब तक़रीबन 5 इंच तक लुंड अंदर बहार कर रहा था.
ज्योति की चाचियों पे उसके हाथ और दांत के निशान बन चुके थे. होंठ भी ाचे से चबा डाले थे. 15 मिनट के
बाद ज्योति की छूट ने एक और बार पानी बहा दिए था और इस बार ये पानी बीएड तक आ पहुंच था. लेकिन अर्जुन लगा रहा
अब तोह वह उसकी आवाज भी नहीं सुन रहा था. ताबड़तोड़ धक्के मारते मारते 5 मिनट के बाद उसके लौड़े ने भी ज्योति की
छूट में पानी खली करना शुरू कर दिए. तक़रीबन 5-6 पिचकारियां मारने के बाद अर्जुन ने अपना लुंड जैसे हे बहार
निकला "पुक्क" की आवाज हुई और ज्योति दर्द और मजे से दोहरी हो चुकी थी..
"हाय माँ. बड़ा बेदर्द है रे तू. मेरी छूट हे फाड़ दी रे. " जैसे हे उसकी नजर अपनी छूट पे गई तोह देखा के
छेड़ 2 रुपये की सिक्के जितना खुल्ला पड़ा था और उसमे से अर्जुन और उसका खुद का पानी बहार आ रहा था. जांघो
पे खून लगा था.
"दीदी लुंड तोह मेरा भी चील गया है." हँसते हुए अर्जुन बाथरूम में चला गया और अपना लुंड धोकर कपडे पहन
ने लगा. ज्योति अभी भी बीएड पे बैठी थी. अर्जुन ने उसको जैसे हे उठया वह लड़खड़ा गई. रुको. इतना बोलकर उसने
ज्योति को अपनी बाँहों में उठाया और बाथरूम में ले आया. ज्योति ने टूंटी का सहारा लेकर अपनी छूट साफ़ की और बहार
आकर कपडे पहने.
"बड़ा बेदर्द है रे तू. मई तोह तुझे बचा समझती थी. तूने तोह मेरी छूट का हे सत्यानाश कर दिए. अब बहार जा
और फ्रिज पे रखा दवा का डब्बा लेकर आ. " बीएड पे बैठ गई इतना बोलकर ज्योति और अर्जुन डब्बा और पानी लेकर आ
गया.
"ये लो दीदी", अर्जुन ने उसको दिए तोह ज्योति ने एक पेनकिलर निकाल के खाई और वही लेट गई.
"चल अब तू जा. मई संभल लुंगी सब." ज्योति ने जैसे हे इतना कहा अर्जुन ने झुक कर उसके होंठ एक बार फिर चूम
लिए और चूंकि दबा के भाग लिए बहार. अपनी साइकिल लेकर आ गया वापिस घर जहा इस समय शांति पसरी हुई थी.