Incest Pyaar - 100 Baar - SexBaba
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Incest Pyaar - 100 Baar

hotaks

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आप सभी जान को मेरा हार्दिक नमन. काफी समय से मई यहाँ लिखी हुई कहानियों को पढ़ रहा हु. और सभी लेखक अपने स्तर पे बहुत हे ाचे है. आप सभी से प्रेरणा लेकर मई भी यहाँ एक कहानी की शुरुआत कर रहा हु. जिसका शीर्षक है "प्यार 100 बार" . ये एक लम्बी कहानी है जिसमे इन्सेस्ट क साथ बहरी सेक्स भी है. मई कोशिश करूँगा ज्यादा से ज्यादा अपडेट देने की लेकिन इतना जरूर है क सप्ताह में 3 अपडेट जरूर रहेंगी.

आप सभी क सुझाव और प्यार का स्वागत रहेगा.

पहला अपडेट आज रात हे देने की कोशिश रहेगी.

कहानी लम्बी है तोह बस साथ दीजियेगा.

धन्यवाद

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इंडेक्स



अपडेट 1अपडेट 2अपडेट 3अपडेट 4अपडेट 5अपडेट 6अपडेट 7अपडेट 8अपडेट 9अपडेट 10अपडेट 11अपडेट 12अपडेट 13अपडेट 14अपडेट 15अपडेट 16अपडेट 17अपडेट 18अपडेट 19अपडेट 20अपडेट 21अपडेट 22अपडेट 23अपडेट 24अपडेट 25अपडेट 26अपडेट 27अपडेट 28अपडेट 29अपडेट 30अपडेट 31अपडेट 32अपडेट 33अपडेट 34अपडेट 35अपडेट 36अपडेट 37अपडेट 38अपडेट 39अपडेट 39 (B)update 40अपडेट 41अपडेट 42अपडेट 43अपडेट 44अपडेट 45अपडेट 46अपडेट 47अपडेट 48अपडेट 49अपडेट 50अपडेट 50 (B)update 51अपडेट 52अपडेट 53अपडेट 54अपडेट 55अपडेट 56अपडेट 57अपडेट 58अपडेट 59अपडेट 60अपडेट 61अपडेट 62अपडेट 63अपडेट 64अपडेट 65अपडेट 66अपडेट 67अपडेट 68अपडेट 69अपडेट 70अपडेट 71अपडेट 72अपडेट 73अपडेट 73 (B)update 74अपडेट 75अपडेट 76अपडेट 77अपडेट 78अपडेट 79अपडेट 80अपडेट 81अपडेट 82अपडेट 83अपडेट 84अपडेट 84 (B)update 85अपडेट 86अपडेट 87अपडेट 88अपडेट 88 (B)update 89अपडेट 89 (B)update 90अपडेट 91अपडेट 92अपडेट 92 (B)update 93अपडेट 94अपडेट 95अपडेट 96अपडेट 97अपडेट 98अपडेट 99अपडेट 100 & अपडेट 100 (B)update 101अपडेट 102अपडेट 103अपडेट 104अपडेट 105अपडेट 106अपडेट 106 (B)update 107अपडेट 108अपडेट 109अपडेट 110अपडेट 111अपडेट 111 (B)update 112अपडेट 112 (B)update 113अपडेट 114अपडेट 115अपडेट 116अपडेट 117अपडेट 117 (B)update 118अपडेट 118 (B)update 119अपडेट 120अपडेट 121अपडेट 122अपडेट 123अपडेट 124अपडेट 125अपडेट 126अपडेट 127अपडेट 128अपडेट 129अपडेट 130अपडेट7 131अपडेट 132अपडेट 133अपडेट 134अपडेट 135अपडेट 136अपडेट 137अपडेट 138अपडेट 139अपडेट 140अपडेट 141अपडेट 142अपडेट 143अपडेट 144अपडेट 145अपडेट 146अपडेट 147अपडेट 148अपडेट 149अपडेट 149 (B)update 150अपडेट 151अपडेट 152अपडेट 153अपडेट 153 (B)Update 153 (C)Update 154अपडेट 154 (B)Update 155अपडेट 156अपडेट 157अपडेट 158अपडेट 159अपडेट 160अपडेट 160 (B)Update 161अपडेट 162अपडेट 163अपडेट 164अपडेट 165अपडेट 166अपडेट 167अपडेट 168अपडेट 169अपडेट 170अपडेट 171अपडेट 172अपडेट 173अपडेट 174अपडेट 175अपडेट 176अपडेट 177अपडेट 178अपडेट 179अपडेट 180 ौपड़ाते 180 बुपदते 181अपडेट 182 ौपड़ाते182 बुपदते

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अपडेट - 1

प्यार. बड़ा छोटा सा लफ्ज़ है लेकिन ज़िन्दगी बदल जाती है जो एक बार ये हो जाये.

लोग कहते है के ये एक बार होता है और सिर्फ नसीब वालो को मिलता है. दुनिया में

इस से बढ़कर कुछ नहीं. इश्क़ को लोग bhagwan/khuda के बराबर मानते है. लेकिन

क्या सच है ये? क्या प्यार सबसे बड़ा एहसास है? कैसा होता है ये? और क्या दुनिया

प्यार से आगे भी है? और क्या सीमा है इस प्यार की?

शायद सही, शायद गलत. काम से काम एक शक़्स तोह है ऐसा जो मंटा है क प्यार ऐसा

नहीं जैसा लोग कहते है. और इसका एहसास उनको जरा भी नहीं है क्योंकि जो भी प्यार

पे निबंध लिखता है उसको ये कभी हुआ हे नहीं होता. प्यार एक बार नहीं सो बार हुआ.

आज 40 का होने वाला हु तोह अपने अतीत को देख रहा हु. करने को कुछ बचा हे नहीं है.

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"Arjun-Arjun, कहा है तू? उठा या नहीं अभी तक. आज पेपर है तेरा", अर्जुन की माँ रेखा

अपने बेटे को आवाज दे रही थी क्योंकि सुबह क 7 बज रहे थे. और वह गधे घोड़े बेच क सो

रहा था. साड़ी रात जो पढता रहा था वो. फिर माँ के आवाज देने पे उठा और सीधा चला

गया आँगन में बने बाथरूम में.

इंट्रोडक्शन

साल - 1998

ये परिवार है हरयाणा राज्य के एक शहर में बेस प्रतिष्ठित व्यक्ति पंडित रामेश्वर जी का.

रामेश्वर शर्मा - परिवार के मुखिया. रत्द एसएसपी है अभी उम्र है 70 साल. पूरे शहर में इनका

नाम इज़्ज़त से लिया जाता है बड़े हे सुलझे हुए इंसान है. अपने नाम का अनुसरण करते है और

हमेशा सिर्फ सच का साथ देने वाले. अपने टाइम में लाहौर से M.A. किआ था और फिर पुलिस में नौकरी

लग गई. 4 बजे उठ जाते है और रात 10 सो जाना इनकी आदत है. पूजा पथ नियम से करते है और

पुरे परिवार का ध्यान रखते है. सब इन्हे पंडित जी कहते है. कुल मिला कर खुशमिजाज़ इंसान है.

कौशल्या देवी - 68 साल की एक बेहद संस्कारी और धार्मिक महिला है ये. इस घर को घर बनाने वाली

यही है. पति तोह पुलिस की नौकरी में रहे 35 साल लेकिन इन्होने अपने बचो की परवरिश में कोई कमी

नहीं आने दी. सबकी इज़्ज़त करती है लेकिन मिजाज़ से एकदम सख्त औरत है. अनुशाशन, संस्कार और धरम

करम. बस यही इनको पसंद है. रामेश्वर जी से इनको 4 संतान हुई. तीन बेटे और सबसे छोटी एक बेटी

है.

1. राजकुमार शर्मा - ये है रामेश्वर जी के सबसे बड़े बेटे. 50 साल की उम्र है इनकी और पढाई के बाद

इनकी सरकारी विभाग में नौकरी लग गई थी. शरीर दरमियाना है लेकिन सेहतमंद इंसान है. सही उम्र

में रामेश्वर जी ने इनकी शादी पास के हे गांव के एक ाचे परिवार की लड़की से करवा दी थी. इनकी पत्नी

का नाम है ललिता देवी. 46 साल की एक बेहद खूबसूरत महिला है. राजकुमार जी का दिल आज भी इन्ही

के कब्ज़े में है. इनकी 3 संतान है. एक बीटा संजीव (25 साल), बेटी माधुरी (23) और सबसे छोटी अलका

(20 साल). संजय एक प्राइवेट इन्शुअरन्स कंपनी में मैनेजर है. अंतर्मुखी व्यक्ति है. ज्यादा बोलता नहीं

बस काम से काम रखता है. Dada-Dadi की हर बात इसके लिए एक कसम सामान है. सांवला है लेकिन शरीर

एकदम पत्थर है. वही माधुरी अपनी मास्टर्स डिग्री करने के बाद अपनी माँ के साथ घर के काम में हाथ

बँटवाती है और खली समय में सिलाई कढ़ाई करती है. नाचने का शौंक है इनको. खूबसूरत इतनी है

की माधुरी दीक्षित भी पानी भर्ती नज़र आये. राजकुमार जी की लाड़ली अलका भी कुछ काम नहीं है. घर

में kad-kathi तोह सभी ाची है पर ये लड़की तोह अपने भाई से भी 2 इंच ऊँची है. जहाँ माधुरी का

शरीर गठीला और रंग ताम्बे है वही अलका बिलुल गुलाब सी गुलाबी और एकदम नाज़ुक. इसकी हर बात

पूरे घर में सुनी जाती है. दादा जी प्यार से इसको लक्समी बुलाते है.

2. शंकर शर्मा - ये जनाब पूरे शर्मा परिवार में विख्यात है. पेशे से सरकारी डॉक्टर है और

इनकी उम्र है 48 साल. 5'10" की लम्बाई है और आकर्षक व्यक्तित्व के धनि. कॉलेज टाइम में ये

राष्ट्रीय स्तर पे बॉक्सिंग कर चुके है. लेकिन एक भी गुण रामेश्वर जी का नहीं है इनमे सिवाए

शरीर और अनुशाशन के. इनके गुस्से से खुद रामेश्वर जी भी चुप रह जाते है. बचपन से हे

ये अपने Maa-Baap के चाहते थे. जो दिल में आता है वही करते है. सिग्रेटे और शराब के भी शौक़ीन लेकिन

समाज सेवा भी इनके जैसी कोई नहीं करता. गरीब इंसान का इलाज़ उसके घर भी जाकर कर देते है.

लेकिन इनकी धर्मपत्नी जी एकदम शांत महिला है. रेखा शर्मा, उम्र 44 साल और ये इस घर की सबसे

शांत महिला है. अपनी जेठानी को बड़ी बहिन मानती है. इनके बचे हे इनकी दुनिया है. 2 बड़ी लड़कीअ

और सबसे छोटा है इनका बीटा अर्जुन. बड़ी बेटी कोमल 21 वर्ष की है और ग्रेजुएशन लास्ट ईयर में है.

दूसरी बेटी ऋतू 19 साल की है और अभी मब्ब्स के फर्स्ट ईयर में है. जहा कोमल एकदम भरे शरीर की

आकर्षक युवती है है वही ऋतू लम्बी छरहरी काया वाली एक गुस्सैल लड़की. कोमल अपनी माँ रेखा जी

पे गई है और ऋतू अपने पिता शंकर जी की लाड़ली है. सबसे छोटा है अर्जुन (18). ये अभी मीट्रिक में है, बचपन में ख़राब सेहत और देरी से स्कूल में दाखिला लेने की वजह से.

Maa-Baap से ज्यादा ये अपने Dada-Dadi की जान है. अर्जुन मीट्रिक से पहले बोर्डिंग में हे रहा था 8 साल.

और साल में एक बार हे घर आता था. शुरू से हे रामेश्वर जी का अनुसरण करता आया है. पढाई में

पूरे घर में इस जैसा कोई नहीं. बड़ी बहनो को भी इंग्लिश पढ़ा देता है. पूरे 6 फ़ीट की लम्बाई है

इसकी और कसरत का शौक़ीन. रामेश्वर जी खुद इसको 4:30 बजे उठा देते है और 10 कम की दौड़ लगा क आने

के बाद 2 गिलास बादाम का दूध अपने सामने पिलाते है. अर्जुन भी रोज रात को अपने दादा जी और दादी जी

के पेअर दबाता है जितने दोनों सो नहीं जाते. कुलमिलाकर ये लड़का इस घर का तारा है.

3. नरेंदर शर्मा - ये है सबसे छोटे बेटे रामेश्वर जी के. ाची kad-kathi के ज़िन्दगी से भरपूर

इंसान. 46 साल की उम्र में भी ये किसी कॉलेज के युवक सामान है. बहोत हे सरल और हंसमुख व्यक्ति.

इनकी सबसे ज्यादा अपने भाई शंकर शर्मा से निभती है. दोनों भाई एक दूसरे से be-intiha प्यार करते है.

ये पंजाब के एक बड़े शहर में अपने परिवार के साथ रहते है. इनकी पत्नी कृष्णा देवी एक अंतर्मुखी

महिला है. ज्यादातर सेहत ख़राब रहती है इनकी ब्लड प्रेशर की वजह से. लेकिन नरेंदर जी अपनी

बीवी से प्यार बहोत करते है. जिसका परिणाम है इनकी 2 बेहद खूबसूरत बेतिया. प्रियंका (21) और

आरती (19). दोनों हे कॉलेज में है और बिलुल एक जैसी है ये. जवानी से भरपूर, एकदम सही सांचे में

ढली हुई. शहर के लड़के इनके कॉलेज के बहार इन दोनों को हे देखने आते है बस ऐसा समझ लीजिये.

लेकिन ये भी बड़ी अनुशाशन प्रिय और अपने परिवार की इज़्ज़त रखने वाली लड़कीअ है. नरेंदर जी ने इन्हे

कही कोई कमी नहीं होने दी है आजतक. और साल में 2 बार ये सब लोग कुछ दिनों के लिए अपने बड़े घर

जरूर जाते है. गर्मी की छुट्टियों में और दिवाली के समय. ये रामेश्वर जी की बनाई हुई एक परंपरा

है.

4. मधु शर्मा. रामेश्वर जी की सबसे छोटी औलाद और सब को अपने से छोटा समझने वाली महिला. इतना

घमंड शायद रावण में न रहा हो जितना इनमे है. हो भी क्यों न इनके बाप शहर के सबसे बड़े पुलिस

अधिकारी जो रह चुके. ऊपर से इनका विवाह भी रामेश्वर जी ने ऐसे परिवार में कर दिए जहा संस्कार से

ज्यादा पैसा मायने रखता हो. ये रिश्ता करवाया था कौशल्या जी की छोटे भाई हंसमुख ने. मधु शर्मा

की उम्र तोह है 44 साल लेकिन पैसे ने इनको जवान बना रखा है. दिखने में ये बिलखुल खजुराहो की

मूर्ती के सामान है. इनके पतिदेव श्रीमान अशोक वशिस्ट जी की खुद की कंपनी है हिमाचल में जहा

बिजली का सामान बनाया जाता है. अशोक जी का अधिकतर समय कंपनी और टूरिंग में हे रहता है. और

मधु शर्मा रहती है अपने 2 बचो क साथ हिमाचल के एक खूबसूरत शहर में. जहाँ साल में आधा

समय बर्फ हे जमी रहती है. बहोत बड़ा घर है इनका और करने को ज्यादा कुछ है नहीं. एक बेटी है

तारा (20), बिलकुल अपनी माँ पे गई है. खूबसूरत, घमंडी और रॉब झड़ने वाली. बीटा हिमांशु (18)

बिलकुल अलग. होशियार है, प्रकृति प्रेमी और लोगो के बीच खुश रहने वाला. अभी बोर्डिंग स्कूल में

है. वही तारा दिल्ली में फैशन का कोर्स कर रही है. कुल मिलकर ये एक अलग परिवार है रामेश्वर

जी के बनाये संसार से.

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प्यार 100 बार के कुछ विशेष किरदार और उनके परिवार का परिचय

छोल साहब के परिवार के मुख्या पत्र


छोल सतीश पूरी

बेटी रेणुका

बहु रोमिला

पौती प्रीती

पौता जोएल

सोमबीर सिंह के परिवार के मुख्या पत्र

दादी चंद्रो देवी (72) (सोमबीर की धर्मपत्नी)

सुशीला सिंह (50) (बहु और बबिता (32)/बिजेन्दर (30) की माँ)

मल्टी उर्फ़ गुड्डी (47) (बहु और सुदर्शन छोटी (30) की माँ)

मधुलता उर्फ़ मुन्नी(45) (बहु और Ravinder(25)/Richa (24) की माँ)

बिंदिया उर्फ़ बिंदु (45) (छोटी बहु और शबनम (25) की माँ)

शीला देवी (सोमबीर सिंह की सौतेली बीवी)

भीम सिंह (बड़ा बीटा)

मेनका सिंह (बेटी)

चारुलता (भीम सिंह की बीवी)

ऋषभ सिंह (छोटा Beta-Gaud लिए)

मंजूबाला उर्फ़ मंजू (छोटी बहु)

राममेहर सिंह का परिवार

सितारा देवी (राममेहर सिंह की बीवी, 70)

भंवरी (51) (बड़ी बहु, सुकन्या (26) की माँ)

सुशीला (50) (बेटी)

बेला देवी (49) (दूसरी बहु)

मोहर सिंह (48) (छोटा बीटा और अक्षरा (24)/अनुपमा (24) का बाप)

कोच जोगिन्दर सिंह संधू (50) का परिवार

निर्मल कौर (48) बीवी

Charul/Parul (24) बेटियां

अन्य प्रमुख किरदार:

निर्मल सिंह (दिग) और पंडित जी के विश्वास पत्र

तेजपाल शर्मा (इंस्पेक्टर) अर्जुन के मां

विकास पुनिअ (पहलवान और अर्जुन का मुँहबोला बड़ा भाई)

बलबीर (अर्जुन का साथी और बड़े भाई जैसा)

डॉ धर्मवीर सांगवान उर्फ़ बड़े सांगवान (शंकर के गुरु और पिता सामान)

डॉ परमवीर सांगवान उर्फ़ छोटे सांगवान (शंकर का जिगरी)

डॉ मेहुल गुलाटी उर्फ़ पंजाबी (शंकर का जिगरी)

डॉ भूपिंदर सिंह उर्फ़ भुप्पी (रहस्य)

मुस्कान (बास्केटबाल खिलाडी और एक शातिर किरदार)

लकी अरोरा (पुलिस अफसर और संजीव का जिगरी)

डिम्पी अरोरा (लकी की बहिन और एक जरुरी किरदार)

सरोज कश्यप (24) (कश्यप जी की छोटी बहु और अर्जुन की पड़ोसन)

मरस वर्मा (अर्जुन की गणित तीसर, 40)

मिस अन्नू वालिए (अर्जुन की फिजिक्स टीचर और प्रेमिका, 24)

विक्य (प्रीती की ममेरी बहिन, ग्रीस की रहने वाली, 23)

साधू सिंह (गाँव के मुखिया और किसान)

बिमला देवी (साधू सिंह की धर्मपत्नी, 45)

महेन्दर उर्फ़ मिन्दर (साधू सिंह की बीटा 23)

काजल (साधू सिंह की बेटी और अर्जुन की गुप्त प्रेमिका, 18)

सविता (काजल की एकमात्र सहेली और अर्जुन पर आसक्त, 18)

विनय तनेजा (अर्जुन के पडोसी)

सुषमा तनेजा (बीवी, 43)

आकांक्षा तनेजा (बेटी, अर्जुन की प्रेमिका और एक प्रमुख चरित्र, 18)

सोलंकी (खास किरदार)

गीता सोलानी (बीवी और अर्जुन को बीटा मानती है, 42)

पूर्वी सोलंकी (बेटी और अर्जुन की राखी बहिन, 19)

धर्मपाल सिंह (अर्जुन के पडोसी और दोस्त के पिता)

ज्योति (बेटी और अर्जुन की सम्भोग गुरु)

संदीप (बीटा, अर्जुन का खास दोस्त, 18)

चंद्रकांत दीक्षित उर्फ़ चंदू (राज्य मंत्री और रामेश्वर जी के मित्र)

बहन सिंह (लोक दाल पार्टी का खास व्यक्ति और कुख्यात राजनितिक अपराधी)
 
अपडेट - 2

प्रारम्भ (शुरुआत)



पंडित जी को बागवानी का बहोत शोक है. अपनी म्हणत से उन्होंने 1000 गज के अपने घर में 500 गज

जगह में एक खूबसूरत बगीचा बनाया हुआ था जो पूरे घर को और आकर्षक बनता था. गुलाब, गेंदा,

चमेली, अशोक, अमरुद, पपीते, अंगूर और पता नहीं कोण कोण से पौधे लगा रखे थे उन्होंने. अपने

बचो की तरह ध्यान रखते थे वह अपने बगीचे का और उनका पूरा साथ देता था उनके दोनों पोते.

अपने घर का नाम उन्होंने रखा था "संसार" और वाकई में ये एक संसार हे तोह था जिसको उन्होंने

अपनी संगिनी कौशल्या के साथ मिलकर बनाना शुरू किआ था जब उनके बचे भी नहीं हुए थे. और

आज यही घर सिर्फ घर नहीं रहा था. आशियाना था ये एक भरे पूरे संस्कारी परिवार का. लेकिन

समय कब एक सा रहा है.

2 मंजिल का ये घर सबके रहने के हिसाब से हे बनाया गया था. जैसे जैसे सदस्य बढ़ते गए

वैसे वैसे कमरे भी बनते गए. पहली मंज़िल पे सबसे आगे रामेश्वर जी की बैठक थी जहाँ

3 सोफे और एक दीवान सजे रहते थे. और कुछ कुर्सियां. उसके पीछे हे थे उनका और कौशल्या जी का

कमरा जिसके साथ एक मंदिर कक्ष भी जुड़ा था. आँगन और बड़ी रसोई इनसे आगे और फिर आखिर में 4

कमरे और बने थे. एक कमरा थे राजकुँअर जी और उनकी पत्नी का, उसके साथ में उनकी दोनों बेटियों माधुरी और अलका का,

तीसरा कमरा था कोमल और ऋतू का और सबसे आखिर में रेखा और शंकर का. शंकर तोह महीने में

कभी एक या 2 बार हे आते थे. सभी कमरे हवादार और बेहद प्यार से सजाये गए थे.

दूसरी मंज़िल. यहाँ पे जाने के लिए 2 रास्ते थे. एक घर क मुख्या द्वार क पास बानी गोलाकार सीढ़ियों

से और दूसरा पिछले आँगन में बने बाथरूम के साथ बानी सीढ़ियों से. ऊपर तोह कोई आँगन था नहीं

लेकिन वह 2 पार्टिओं थे. सामने वाले भाग में 2 कमरे, एक ड्राइंग रूम, एक बाथरूम और एक रसोई जो अब स्टोर का

हे काम करती थी. पिछले पार्टिओं में 2 कमरे और एक बाथरूम था. ये वाला हिस्सा अधिकतर बंद हे

रहता था. अगले हिस्से में सीढ़ियों के सामने वाले कमरे में संजीव सोता था और दूसरा कमरा था अर्जुन

का. जहा सिर्फ किताबे और एक सिंगल बीएड हे था. पूरे घर में टेलेवसिओं सिर्फ 2 हे थे. एक पहली मंजिल

की बैठक में और दूसरी मंज़िल के ड्राइंग रूम में. संजीव ने वही पे एक छोटी गयम भी बना राखी थी.

इतना संपन्न परिवार था रामेश्वर जी का लेकिन एक और खास बात थी के पुअर घर में कही भी A.C. नहीं

लगवाया गया था. है 4 कूलर जरूर थे. ये वो दिन थे जब बिजली भी बहोत जाती थी और ज्यादा इन्वेर्टर

भी प्रचलन में नहीं थे. गर्मिओं में बड़े लोग तोह निचे दोनों आँगन में सो जाया करते थे और बचे ऊपर

खुली चाट पे.

Aas-pados भी बड़ा शांत और hara-bhara था. घर लगभग सभी बड़े थे तोह dur-dur भी थे. लेकिन

इसके आसपास सभी सहूलियत भी थी. पार्क, थोड़ी दूर पे मार्कीट, 3 बड़े स्कूल और एक कॉलेज भी था.

शहर का सबसे खुला सेक्टर था ये और शांतिपूर्ण भी.

चलिए वापिस कहानी पे चलते है.

अर्जुन नाहा धो के आया और फिर पंडित जी के पास गया आशीर्वाद लेने. आज उसका आखिरी इम्तिहान है

दसवीं कक्षा का. और इसके बाद एक महीने का आराम.

रामेश्वर जी (रस)- मेरा शेर आज कुछ ज्यादा हे सोया लगता है. बरखुरदार इतनी म्हणत भी नहीं करो

की बिस्तर पकड़ लो. साइंस का पेपर है?

अर्जुन - क्या बाबा, आप हे तोह बोलते हो जिनके सपने बड़े हो उन्हें ज्यादा जागना चाहिए उन्हें पूरा करने

के लिए. बस ये परचा आज हो जाये फिर तोह मई आपके साथ रोज नए फूल उगाऊंगा हमारे बगीचे में.

रस- क्यों नहीं बेटे. हम दोनों चलेंगे यूनिवर्सिटी और जो नै किस्मे आई है वो लगाएंगे यहाँ.

फिर कौशल्या देवी ने अर्जुन को Dahi-Shakkar खिला के विदा किया. फिर अर्जुन अपनी माँ और तै

जी के पाँव छु आशीर्वाद ले निकल गया.

घर के पास हे उसके क्लासमेट संदीप का भी घर था. अर्जुन और संदीप साथ चल दिए स्कूल.

संदीप- भाई आज का क्या इरादा है? देख आखिरी दिन है तेरे पास जवाब देने का. मई तेरी जगह होता

तोह कब का खिलाडी बन चूका होता.

अर्जुन- पागल है क्या? भाई अभी ये सब की उम्र नहीं अपनी. और ऊपर से वो मुझे पसंद भी नहीं.

संदीप - देख मेरे भाई आकांक्षा पे पूरा स्कूल जान देता है और वो सिर्फ तुझे देखती है. सुना था

न इंग्लिश वाले पेपर क टाइम राणा और कुलविंदर क्या बोले थे. "अर्जुन की जगह हम होते तोह कब का पेल

दिए होता उस par-kati को". देख आज पेपर के बाद जब वह तुझे बुलाये तोह काम से काम अकेले में एक बार

मिल तोह लिओ उस से. फिर चाहे जो दिल कर वो कार्यो भाई.

अर्जुन- देख भाई ये जो भी है कुछ सही नहीं है. मई तुझे मेरी ज़िन्दगी का लक्ष्य समझा नहीं सकता

लेकिन जो तू मुझे सलाह दे रहा है ये उसमे विघ्न जरूर दाल सकती है. और रही बात सिर्फ मिलने की

तोह चल मई आज मिल लेता हु उस से.

(राणा और कुलविंदर स्कूल के सबसे बदनाम लड़के थे. और वो 2 साल सीनियर भी थे अर्जुन के. हर लड़की

इनको सिर्फ काम की देवी हे लगती थी. लेकिन दिल के साफ़ थे वो दोनों. सामने से किसी को कुछ नहीं कहते थे

लेकिन इनके खुद क फैलाये झूठे किस्सों ने इन्हे बदनाम किआ हुआ था)

बातें करते हुए संदीप और अर्जुन स्कूल पहुंच गए. वह पे कड़ी स्कूल बस से सभी स्टूडेंट्स को

उनके सेण्टर पे लेके जाया जाता था. एक बस देख दोनों चढ़ गए लेकिन यही गलती हो गई. पूरी बस में

सिर्फ 2 सीट खली थी जिसमे से एक पे संदीप बैठ गया और दूसरी सीट जिसके साथ वाली सीट पे एक बेहद

हे खूबसूरत सी लड़की बैठी थी वो खली थी. अर्जुन वही रुक गया बस के गेट पे. लेकिन तभी उनकी

स्कूल टीचर मरस वालिए की आवाज आई.

मरस वालिए - अर्जुन. खड़े क्यों हो. चलो बैठो वह पे आकांक्षा क साइड में.

अर्जुन - यस मम.

ये वही लड़की थी जिसके बारे में संदीप बात कर रहा था. ढूढ़ सी गोरी, आँखों पर एक स्टाइलिश

नज़र का चश्मा, हलके गुलाबी होंठ, भूरी आँखें. लड़की क्या साक्षात् पारी थी वह. और जो मुस्कान

उसके चेहरे पे आई मैडम की बात सुन के बेहद दिलकश. अर्जुन चुपचाप जा कर उसके बगल में बैठ गया.

आकांक्षा- होई (बेहद शालीनता से)

अर्जुन- Hello आकांक्षा

आकांक्षा- नाराज हो. देखो उस दिन मई हार गई थी खुद से और सबके सामने अपने प्यार का इज़हार कर दिए.

मई और कुछ नहीं कहूँगी अर्जुन. तुम्हे मेरा प्यार क़बूल हो या नहीं. बस एक बार पेपर के बाद मुझे

5 मिनट दे देना. और कुछ नहीं चाहिए.

अर्जुन- ठीक है. वापिस स्कूल आने के बाद.

ये दोनों जो भी बात कर रहे थे ये इतनी धीमे हो रही थी की शायद हे किसी को सुनाई दे. एग्जाम का सेण्टर

15 कम दूर था और अभी काफी टाइम बाकी था. दोनों खामोश हो गए थे अब. बाकी स्टूडेंट्स कुछ डिसकस कर

रहे थे कुछ शोर मचा रहे थे. आज आखिरी इम्तिहान जो था. आकांक्षा खिड़की से बहार देख रही थी

अपनी हे विचारो में गम. अर्जुन, जो संयम और अनुशाशन का पाका था आज उसने पहली बार कनखियों से

उस लड़की की तरफ देखा. उसकी गुमसुम सी भोली सूरत, सफ़ेद रबर में बंधे गर्दन तक आते बाल जिनमे

से कुछ आज़ाद होकर हवा से उड़द रहे थे. सफ़ेद स्कूल शर्ट में उसका गुलाबी चेहरा ऐसा लग रहा था

जैसे एक दूध पे रखा गुलाब हो.

"चलो चलो जल्दी करो सब. सब लाइन से एंट्री करेंगे", स्कूल टीचर की आवाज सुनाई दी अर्जुन को.

अर्जुन अपने हे मन में, "ये क्या हुआ. आज एक मिनट में हे सेण्टर पहोच गए."

अर्जुन को पता भी नहीं चला के कितनी देर से वह उस लड़की को देख रहा था. शायद समय हे रुक गया

था. और एहसास तब हुआ जब मैडम की आवाज सुनाई दी.

"हम भी चले बहार, देखो सब उतर गए बस से.", अर्जुन ने देखा उन्ही 2 आँखों को जो उसे शर्मा के

कुछ बोल रही थी.

अर्जुन - (झिझकते हुए) सॉरी - सॉरी. चलिए

झेंपता हुआ वो बिना किसी की तरफ देखे सीधा बिल्डिंग में एंटर हो गया. मन में उथल पुथल मची हुई

थी उसके. ये सब क्या था और ये आज कैसे हो गया. मई तोह कभी उसको पसंद नहीं करता था तोह आज

क्यों मेरा ध्यान उसपे गया. ये सब विचार उसके मैं को हिला रहे थे. जब कुछ भी नहीं सुझा तोह अर्जुन

ने अपनी आँखें बंद की और खुद से कहा, "ये आखिरी इम्तिहान है. लक्ष्य से नहीं भटकना,"

अगले 2 1/2 घंटे उसका ध्यान सिर्फ परीक्षा पत्र और उनके उत्तर लिखने में हे रहा. सभी सवाल हल

करने के बाद एक बार फिर से उसने पूरे prashan-uttar का मिलान किआ और अपनी शीट जमा करवा दी. परीक्षा

कक्ष से बाहर आया तोह कलाई घडी में देखा के अभी भी 20 मिनट बाकि है. वो चुप चाप स्कूल बस की

तरफ चल दिए. वह उसके अलावा कोई भी स्टूडेंट नहीं था. सिर्फ बस क 2-3 ड्राइवर चाय में खड़े बीड़ी का

काश लगा रहे थे. अर्जुन उनको nazar-andaaz करता हुआ बस में आखिरी सीट पे जाकर बैठ गया. मैं

फिर से अशांत हो रहा था उसका. ये कभी ऐसा नहीं हुआ था उसके साथ. फिर आज क्यों ऐसा हो रहा है.

जब धान टूटा तोह देखा के बस पूरी भर गई थी और उसके पास दूसरे सेक्शन क स्टूडेंट्स बैठे थे.

30 मिनट क बाद सभी बस उनके स्कूल के स्टैंड पे कड़ी थी और सभी लोग एक दूसरे से मिल रहे थे.

अर्जुन चुप चाप निकलने की कोशिश में मुख्या द्वार की तरफ चल पड़ा. अभी कुछ हे दूर गया था की

उसकी नज़र विपरीत दिशा में फुटबॉल ग्राउंड के कोने में पेड़ के निचे कड़ी आकांक्षा पर पड़ी जो उसकी

तरफ एकटुक देख रही थी. अर्जुन सम्मोहित सा चल पड़ा उस तरफ बिना कुछ देखे. संदीप दूर खड़ा

सब देख रहा था और मुस्कुरा रहा था.

आकांक्षा- जा रहे थे न बिना मिले?

अर्जुन- नहीं बस संदीप को ढूंढ रहा था. तुम यहाँ अकेली?

आकांक्षा- है मेरी ज्यादा फ्रेंड्स नहीं है स्कूल में. और तुम्हारा दोस्त तोह खुद तुम्हारे हे पीछे चल

रहा था.

अर्जुन नज़र घूमते हुए देखता है के सच में संदीप दूर खड़ा था वही जहा कुछ समय पहले अर्जुन

खड़ा था.

"हाँ वह जरा सर दर्द था तोह ध्यान नहीं दिए." कुछ और नहीं सूझा तोह अर्जुन ने यही बोल दिए

अगले हे पल उसको ऐसा लगा जैसे किसी ने बर्फ रख दी हो उसके सर पे. आकांक्षा का हाथ उसके

माथे पे था.

"तुम ठीक तोह हो?" घबराई सी आवाज में उसने अर्जुन से पुछा..

"यह... है. मई ठीक हु."

10 महीने में पहली बार आज अर्जुन ने आकांक्षा को इतने करीब से देखा था या यु कहे के उसका

स्पर्श महसूस किआ था. उसको ऐसा लगा था के सिर्फ हाथ क स्पर्श से इस लड़की ने उसकी आत्मा को

पकड़ लिए हो. आलोकिक अनुभबव

"तुम्हे कुछ कहना था मुझ से?" अर्जुन ने होश में आते हे सवाल किआ

"मुझे नहीं पता के तुम मेरे बारे में क्या सोचते हो अर्जुन. शायद जैसा बाकी सब सोचते है

के मई एक अमीर, घमंडी, be-gairat लड़की हु तुम भी ऐसा सोचते होंगे. लेकिन मुझे उनके सोचने

से कोई फरक नहीं पड़ता क्योंकि मुझे उनकी परवाह नहीं है. मेरे maa-baap ने कभी प्यार नहीं दिए

लेकिन वो सब दिए जिस से लोग मेरे बारे में गलत अनुमान लगते है. मैंने कभी किसी की तरफ

नहीं देखा लेकिन जब भी तुम्हे देखती हु तोह ऐसा लगता है जैसे बस एक तुम्हारी कमी थी

इस ज़िन्दगी में." बोलते बोलते उस फूल सी खिली लड़की की आँखें नाम हो चुकी थी और ये देख

के आज पहली बार अर्जुन का दिल भी पसीज गया था.

वो फिर boli,"jab मुझे लगा के अब शायद हम न मिल पाए तोह मैंने पिछले एग्जाम में तुम्हे प्रोपोज़

कर दिए और शायद ये भी एक और गलती हो गई मुझ से. मई तुम्हारे सपनो के बीच नहीं आना

चाहती अर्जुन लेकिन मेरा सपना अब तुम हे हो. इसलिए मैंने पहली बार तुम्हारे दोस्त से भी रिक्वेस्ट

की थी की वो तुम्हे एक बार मुझ से बात करने के लिए मन ले." इतना बोल कर आकांक्षा अर्जुन की

तरफ आशा भरी नज़रो से देखने लगी.

"सच कहु आकांक्षा? आज तक मैंने कुछ भी नहीं सोच था. एक साल से मैंने कभी भी तुम पे

गौर नहीं किआ था. आज सुबह मैंने पहली बार तुम्हे देखा था. और अभी मई यहाँ तुम्हारे पास

खड़ा हु. मुझे नहीं पता के इस सबका क्या मतलब है लेकिन इतना कहता हु के मई यहाँ अभी 2 साल

और हु. हम दोस्त बन सकते है और बात कर सकते है." हिम्मत कर के अर्जुन ने उसकी आँखों

में देखते हुए ये सब कहा. लेकिन उसकी बात पूरी होते होते आकांक्षा के चेहरे पे एक छोटी

सी मुस्कान आ चुकी थी. अब तक सभी स्टूडेंट्स जा चुके थे और वह कोई भी नहीं था.

"मुझे भी सिर्फ यही चाहिए अर्जुन." ख़ुशी में वो अर्जुन के गले लग गई थी. और आज ये

एक और नया एहसास था उसकी ज़िन्दगी में. दोनों हे चल पड़े गेट की तरफ जहाँ संदीप खड़ा

इंतज़ार कर रहा था अर्जुन का. फिर मिलने का बोल के अर्जुन चल दिए अपने दोस्त के साथ घर की तरफ.

"वाह चीते! कमाल कर दिए भाई तूने आखिर उस से बात कर हे ली", संदीप ने बात शुरू की

"पता नहीं यार मई घर की तरफ निकल रहा था लेकिन जैसे हे उसको देखा तोह लगा के ये सही

नहीं होगा. बात हे तोह करनी है, कर हे लेता हु. और फिर दोस्त बनाने में क्या बुराई." अर्जुन बोलै

संदीप- भाई वह तुझे पसंद करती है, देखा नहीं कैसे गले लगी थी. और लड़की भी गज़ब है

तेरी तोह लाटरी लग गई."

अर्जुन- क्या कुछ भी बोलता है. ऐसा कुछ भी नहीं होता. चल छोड़ ये सब और बता अब एक महीना

क्या करना है?

"करना क्या है भाई मई तोह आराम करूँगा, गयम शुरू करूँगा और बुक्स लूंगा नेक्स्ट क्लास की."

अर्जुन- कंबाइंड स्टडीज भी कर लेंगे भाई कभी कभी. और गयम तोह शायद मई संजीव भैया

क साथ हे करूँगा."

ऐसे हे बातें करते करते दोनों अपने अपने घर पहुंच गए. शाम को मिलने का प्लान बना के.

घर पहुंचते हे hath-muh धोया और बैठ गया खाने की टेबल पे अर्जुन.

"सब कहा है? कोई नज़र नहीं आ रहा दीदी." अर्जुन ने कोमल से पुछा जो उसका खाना लगा रही थी

"मल्होत्रा अंकल के घर आज पूजा है तोह सभी वही गए है. और बाबा अपने कमरे में सो रहे है

वो भी कुछ देर पहले हे आये थे. बाकि सब शाम तक आएंगे." खाना डालते हुए कोमल ने बताया

घर पे कोमल ज्यादातर कॉटन के सिंपल सूट हे पहनती थी और आज भी उसने वही सिंपल सा नीला

सूट पहना हुआ था. लेकिन शरीर कुछ ज्यादा हे गदराया हुआ था तोह सूट भी छाती से चिपका रहता

था. दुपट्टा लिए नहीं था गर्मी की वजह से तोह जैसे हे वह झुकी तभी अर्जुन की नज़र उसके सूट

से झांकते उभार पर चली गई. उसने शर्मिंदगी से अपनी नज़र निचे कर ली. कोमल भी खाना परोस

के चली गई.

"आज शायद सब कुछ गलत हो रहा है. ऐसा एहसास पहले कभी नहीं हुआ था. लेकिन अभी जो हुआ

वह आकांक्षा वाले एहसास से अलग था. बुरा भी लगा लेकिन नहीं भी." खुद के मैं में हे सोचता हुआ

अर्जुन खाना खा के अपने कमरे में जा कर लेट गया..

नोट: कहानी का असली शुरुवात यही से होगी दोस्तों. मई कोई अनुभवी लेखक नहीं हु तोह

कुछ गलती हो या अपडेट में मजा नहीं आया हो तोह माफ़ कीजियेगा. भरोसा रखिये आगे

कहानी को शानदार रखने का प्रयास करूँगा.

थैंक यू
 
अपडेट 3

भैया ने किआ मार्गदर्शन



आगे अब अर्जुन की जुबानी:

शाम को किसी के हिलने से मेरी आँखें खुली. देखा तोह सामने संजीव भैया खड़े थे.

"छोटे चल खड़ा हो जा. बहार चलते है थोड़ा घूमने." भैया ने मुझे बोलै तोह मई एक झटके में

खड़ा हो गया. कमरे के साथ हे बने वाशरूम में मुँह धोया और चल दिया भैया के पीछे. निचे

आये तोह देख बहार बगीचे में दादा जी अपने कुछ दोस्तों के साथ बैठे थे और माधुरी दीदी चाय

सर्वे कर रही थी. सबको नमस्कार करने के बाद मई भैया के पीछे स्कूटर पर बैठ गया.

संजीव भैया ज्यादा किसी से बात नहीं करते थे लेकिन मुझ से उन्हें बहोत लगाव था. सबके सामने

चुपचाप रहने वाला ये मेरा बड़ा भाई मेरे साथ कुछ हद तक खुला था और मेरी परवाह भी करते थे.

घर से निकल के हम पहोच गए दूसरे सेक्टर की मार्किट में.

"छोटे तू तोह jeera-lemon हे लेगा न? या और कुछ चाहिए?", भैया ने शॉप पे जाने से पहले मुझ से

पुछा. मई पार्किंग में हे फुटपाथ पे बैठ गया.

"नहीं भैया. बस एक jeera-lemon." मैंने बोलै

थोड़ी देर में भैया मेरे लिए एक जीरा और अपने लिए एक कोला और सिग्रत्ते ले आये.

"भैया इसको पीने से सेहत ख़राब होती है. फिर क्यों पिटे हो? मैंने उन्हें बोलै जब वह सिग्रत्ते जला रहे थे

"भाई देखा जाये तोह हर चीज से सेहत ख़राब होती है. खाने से, पिने से, खेलने से, रोने से, सोने से

और प्यार से. तोह फिर क्या फायदा नहीं पिने का." उन्होंने हंस कर मुझे जवाब दिए.

"प्यार. ये कैसे होता है भैया? इसके लिए तोह शादी जरुरी है न?" मैंने पुछा तोह वह हसने लगे

"छोटे तू न सच में छोटा है. चाचा ने तुझे बोर्डिंग भेजा तब भी तू बड़ा नहीं हुआ. प्यार तोह

किस्मत से होता है और वह भी सबको नहीं होता. और जो भी प्यार व्यार करने का ड्रामा करते है वह सिर्फ

जिस्म की प्यास भुजने का काम है." उनका जवाब कुछ समझ नहीं आया मुझे.

"भैया मेरी प्यास तोह ये जीरा लेमन से बुझ गई. पानी से भी बुझ जाती है. ये जिस्म की प्यास मतलब?"

मैंने अगला क्वेश्चन पूछ लिए

भैया bole,"Chal जल्दी ख़तम कर और वीसीआर वाले रिंकू क पास चलते है. कुछ नै फिल्म आई है वो देखेंगे.

कल मेरी भी छुट्टी है और तेरी भी. गुड़िया लोग भी एक फिल्म देख हे लेंगे."

मई भी बिना कुछ कहे चल दिए उनके पीछे स्कूटर पे बैठ के. ये रिंकू भाई का दोस्त हे था बचपन से

लेकिन ज्यादा पढाई नहीं करि तोह अपने भाई के साथ दूकान चलता था वीसीआर की और वीडियो गेम की. हम वह

पहुंचे तोह संजीव भैया रिंकू से बात करने लगे.

"बड़ा आदमी हो गया है संजीव तू तोह.. स्कूटर, नौकरी और छोकरी.." रिंकू भाई को देखते हे बोल दिए

मुझे झटका लगा ये सुनकर "छोकरी"..

कुछ नार्मल बातें कर के संजीव भैया ने उस से पुछा नै फिल्म कोनसी आई है तोह रिंकू ने 6-7 नाम

लिए. मुझे उस समय तक कोई खास लगाव नहीं था टीवी और फिल्म का लेकिन देख लेता था कभी कभी. भैया

ने एक अजय देवगन की फिल्म ली, एक शाहरुख़ की जो दीदी लोगो को पसंद था उस टाइम और एक फिल्म ली जीके

ऊपर कोई नाम नहीं था. वीसीआर मैंने पकड़ा और हम आ गए घर.

8 बजे घर में खाना खाने का टाइम रहता था. घर पहुंचे तोह ताऊ जी, दादा जी, ऋतू दीदी, अलका दीदी

खाना खा रहे थे. दादी जी अपने कमरे में खा रही थी. वीसीआर हम चुपके से पहले हे ऊपर रख आये थे अपने

रूम में. दादा जी ने देखते हे कहा.

"बरखुरदार सिर्फ कल तक कर लो मौज मस्ती. सोमवार से नया टाइम टेबल बनाएंगे आपका."

मैंने भी हँसते हुए कहा "जो हुकुम आपका मालिक". मई अकेला हे था जो दादा जी मजाक कर लेता था.

वो भी हंस दिए.

हाथ धो कर मई और संजीव भैया भी बैठ गए खाना खाने. भैया दीदी लोग से भी ज्यादा बात

नहीं करते थे लेकिन जो भी वो मंगवाती हमेशा ला देते थे. फिर उन्होंने मुझे इशारा किआ किआ मई

चरों दीदी को बता दू क "दिल तोह पागल है" फिल्म देखने आ जाना ऊपर खाना खा के. मैं सिर्फ एक कोमल

दीदी से हे थोड़ा ज्यादा बात करता था. जब वो मुझे रोटी देने आई तोह मैंने उनके कान में बता दिए.

वो मुस्कुराती हुई गई और धीरे धीरे मेरी चारों बहाने मुझे स्माइल देने लगी.

दादा जी के पेअर दबाये और चुप चाप चल दिए अपने कमरे में.

रात तक़रीबन 10 बजे संजीव भैया ने 2ंद फ्लोर के ड्राइंग रूम में वीसीआर लगाया टीवी पे और शाहरुख़ की

फिल्म चला दी. एक सोफे पे भैया बैठे थे, एक पे ऋतू दीदी, बड़े सोफे पे अलका, माधुरी और कोमल दीदी

बैठ गए. मैंने वही निचे मेरा मैट्रेस्स बड़े सोफे के निचे बिछा लिए क्योंकि मेरी नींद का कोई भरोसा

नहीं था. रात में लगभग सभी दीदी लूसे या पुराने सूट में हे रहते थे तोह आज भी कुछ नया नहीं था

फिल्म अछि थी और गाने भी सबको पसंद थे. लेकिन जब भी सांग आता तोह भैया आगे कर देते. करिश्मा

कपूर को देख क मुझे बहोत मजा आ रहा था. 12 बजे तक फिल्म ख़तम हो गई तोह भैया ने अजय देवगन

वाली फिल्म लगा दी. ऋतू दीदी उठ कर निचे पानी पीने चली गई और अलका दीदी सोने. फिर मई भी बड़े

सोफे पे बैठ गया कोमल दीदी और माधुरी दीदी के बीच में. हम फिल्म देखने लगे तोह ऋतू भी आ गई थी.

थोड़ी देर बाद फिल्म में काजोल को देख कर मई उसके शरीर की तुलना कोमल दीदी से करने लगा. दीदी का सीना

काजोल से भी भरी था लेकिन फीचर्स लगभग एक जैसे. पता नहीं क्या हो रहा था मुझे. फिल्म देखते हुए

मई सो गया और मेरा सर कोमल दीदी के कंधे पे टिका था. लगभग एक घंटे बाद संजीव भैया ने मुझे

उठाया तोह देखा के ड्राइंग रूम कोई नहीं था. 2 बज रहे थे और वीसीआर खली था.

"दूर बंद कर उठ के मई एक और कैसेटटे लगता हु. सब गए निचे" भैया ने मुझे कहा तोह मैंने हैरान

होते हुए दरवाजे बंद कर दिए.

थोड़ी देर तो टीवी पे कुछ नहीं आया लेकिन जैसे हे फिल्म शुरू हुई तोह नाम लिखा आया "छमिया"

"भैया ये कोनसी फिल्म है? ये नाम तोह पहले कभी नहीं सुना? कौन हीरो है?"

"बीटा आज तुझे मई असली ज्ञान देता हु जो सिर्फ अँधेरे में हे दिखाई देता है. लोग इसके बारे में ज्यादा बात

नहीं करते. शाम को पुछा था न जिस्म की प्यास, अब देख."

मई उत्सुकता से देखने लगा टीवी. कुछ हे देर में एक लड़की जो हेरोइन थी वह दिखने लगी. किसी से फ़ोन पे बात

करते हुए. थोड़ी देर में सन चेंज. एक लड़का उस लड़की क घर की दूर बेल्ल बजता है और वो लड़की शरीर

पे टोलिया लपेटे हुए दरवाजा खोलती है. दोनों गले मिलते है. यहाँ तक मुझे कुछ अजीब नहीं लगा.

5 मिनट के बाद सन कुछ बदल गया. वो दोनों एक दूसरे को चूमने लगे और लड़के ने धीरे धीरे पूरा

टोलिया निकल दिए. जहा अंदर वो लड़की नंगी थी. ये देख मैंने अपनी आँखें बंद कर ली.

संजीव bhaiya,"Chote आँख खोल और देख. शर्मा मत. ये सब जरुरी है सीखना. ये दोनों प्यार कर रहे

है."

डरते डरते मैंने खोली तोह देखा के वो लड़का उस लड़की के दूध पि रहा था. मुझे मेरे कानो में गर्मी

लगने लगी. आज पहली बार ऐसा कुछ देख रहा था. फिर लड़की ने उस लड़के के सब कपडे निकले और निचे

बैठ कर उस लड़के का पिशाब वाला अंग मुँह में ले लिए.

"ची... ये सब गन्दगी है भैया. ऐसे कोण कर्त है?" मैंने नजर हटा के भाइये से पुछा

"बीटा प्यार करने में कुछ गन्दगी नहीं होती. जब एक दूसरे से प्यार करते है तोह उसकी कोई सीमा थोड़ी

होती है. और वह पिशाब करने वाला अंग लिंग है. जिसको लुंड भी बोलते है. और लड़की के अंग को योनि या

छूट. एक बार देख अगर तुझे फिर भी ाचा नहीं लगा तोह आज के बाद मई खुद कभी नै देखूंगा.?" भैया

ने मुझे बोलै

मई एक बार फिर से देखने लगा सब कुछ भूल कर. अब वो लड़का लड़की एक दूसरे के अंग चाट रहे थे. और

थोड़ी देर बाद उस लड़के ने लड़की को बीएड पे लिटाया और अपना लिंग दाल दिए उसके योनि में. वो लड़की के चेहरे

का हावभाव बिलकुल बदल चूका था. वो लड़का लगा हुआ था धक्के मरने में. थोड़ी देर बाद उसने लड़की

को पैरो के बल किआ और पीछे से धक्के देने लगा. मुझे ऐसा लग रहा था के जैसे मुझे बुखार हो गया

है. और फिर उस लड़के ने अपना लिंग निकला और लड़की के ऊपर सफ़ेद पानी टपकने लगा.

"इसको वीर्य बोलते है भाई. तेरी लैंग्वेज में स्पर्म." भैया ने बताया

"ओह तोह इस से हे बचा होता है." मैंने भी बिना सोचे बोल दिए.

"है भाई. जब ये लड़की की योनि के अंदर छोड़ दो तोह बचा होता है."

"भैया सेक्सुअल रिप्रोडक्शन में पढ़ा था स्पर्म, पेनिस, वागिना.. लेकिन सिर्फ वही पता था. देखा आज है"

फिर संजीव भैया ने मुझे बताना शुरू किआ. बूब्स, किश, वैजिनल सेक्स, अनल सेक्स.. पल्ले कुछ ज्यादा नहीं

पड़ा लेकिन नज़र टीवी पे हे थी. एक बार फिर वैसा हे सन था. यहाँ एक कामवाली अपने मालिक के साथ वही सब

कर रही थी. इसके ब्रेअस्ट्स पहले वाली से बहोत बड़े थे. ये देख भैया ने मुझे बताया के बड़े ब्रैस्ट

वाली लड़की में सेक्स ज्यादा होता है. मैंने भी मान लिए.

थोड़ी देर हम दोनों टीवी देखते रहे. मेरा ध्यान जब भैया की तरफ गया तोह देखा की वो अपनी ज़िप खोल कर

अपने लिंग को सेहला रहे थे. जैसी हालत उनके लिंग की थी ऐसी मेरी कभी कभी सुबह जागने के टाइम होती

थी. वैसी हे हालत फिल्म वाले अंकल के लिंग की थी.

"तू भी हल्का कर ले अपने आप को भाई. बड़ा मजा आएगा. शर्मा मत यहाँ सिर्फ हम दोनों है."

मई चुप रहा और शर्म के मारे वापिस टीवी देखने लगा. भैया की आवाज फिर आई.

"अरे लड़की तोह नहीं है तू?"

मैंने घबरा के बोलै "नहीं नहीं भैया ऐसा तोह मेरे भी पास है लेकिन शर्म आती है."

"अगर तूने आज ज़िप खोल ली तोह मई तेरा प्रैक्टिकल भी जल्दी करवा दूंगा." भैया ने जैसे हे ये बोलै

मैंने झटके में अपना पेण्ट की ज़िप खोल दी. अंडरवियर मई रात में पहनता हे नहीं था.

"साले ये क्या है? भैया अपनी कुर्सी से खड़े हो के मेरे सोफे क पास आ कर देखने लगे

"वही है भैया जो आपके पास है." मैंने अपने लिंग को दोनों हाथ से पकड़ा हुआ था

संजीव भैया ने फिर थोड़ी देर बाद bola,"Bhai ये लिंग नहीं लोढ़ा है. देख तेरे दोनों हाथ से भी बहार

है."

मैंने कहा, "भैया मेरी हाइट लम्बी है शायद इसलिए. सबकी हाइट के अकॉर्डिंग हे तोह होता होगा"

वो एकदम से बोले, "छोटे अपने रूम में जा और स्केल लेके आ."

मई भाग के साथ वाले कमरे से 12 इंच वाला रूलर लेके आ गया. पहले उन्होंने अपने लिंग की जड़ पर

स्केल लगाया तोह उनका लिंग का हेड 5.5 इंच पे था. फिर उन्होंने मुझे वह दिया और बोले ले अब अपना चेक

कर छोटे.

मैंने स्केल टच किआ तोह अलग सा मजा आया. फिर ध्यान दिए तोह देखा 7.5 इंच.

भैया बोले, "देख मेरे भाई तेरा खास है. शायद तू हमेशा सेहत का ध्यान रखता है और गलत काम

नहीं करता. हेल्थ पे और ध्यान देगा तोह ये और मजबूत बनेगा. चल अब अपना लिंग सेहला."

हम दोनों अपनी अपनी जगह बैठ गए वापिस और लग गए लिंग सहलाने. 10 मिनट के बाद मुझे लगा

जैसे मेरी जान निकल रही है. और फिर एक दम से जैसे चिपचिपी गोंड मेरे लिंग से उड़ने लगी. 3-4

बार. और फिर मई ऐसे हे लेट गया. 5 मिनट के बाद भैया भी वैसे हे निढाल हो गए.

"क्यों छोटे मजा आया? भैया ने धीमी आवाज में पुछा

"भैया ऐसा लगा जैसे जान निकल गई. लेकिन फिर एकदम अलग मजा आया जैसे कभी नहीं आया"

"भाई इसको हस्थमैथुन कहते है. हफ्ते में एक दो बार तोह ठीक है ज्यादा मत करना." भैया

उठते हुए बोले. उन्होंने अखबार से जमीन पे पड़ा वीर्य साफ़ किआ और फेंक दिया डस्टबिन में.

4 बज चुके थे सुबह के. दादा जी के तोह जागने का टाइम और आज मई पहली बार इस टाइम सो रहा था.

फिर जो नींद आई तोह ऐसा लगा जैसे पहली बार सोया हु.

आप सभी का बहोत बहोत शुक्रिया. सोने से पहले एक अपडेट और दूंगा.
 
अपडेट - 4

नया सवेरा


सुबह कोई 10 बजे अर्जुन के कमरे में उसको जगाने माधुरी दीदी आई. आज रविवार था तोह लगभग

सभी घर पे हे थे. संजीव अपने दोस्तों से मिलने चला गया था. रामेश्वर जी पड़ोस में अपने दोस्त

मर पूरी, जो एक रिटायर्ड कोलोनेल थे उनके घर गए थे. रेखा जी पिछले आँगन में बने हैंडपंप के

निचे कपडे धो रही थी. कौशल्या जी अपनी बड़ी बहु ललिता जी के साथ तीसरी मंज़िल, जो की छत्त

थी वह पर अचार और मिर्चो को धुप लगवा रही थी. ये मार्च का पहला हफ्ता था तोह यहाँ अभी

भी मौसम हल्का ठंडा था. 3 दिन बाद होली का भी त्यौहार था तोह उसकी भी कुछ तैयारी चल रही

थी. अलका बहार आँगन में पानी दाल रही थी और ऋतू उस पानी को बहार रही थी. राजकुमार जी भी

कही यार दोस्त से मिलने पास में हे गए हुए थे.

जैसे हे माधुरी ने अर्जुन के कमरे में प्रवेश किआ तोह उसने देखा के उसका छोटा चचेरा भाई एक साइड

को लेता है. छाती पे कोई भी कपडा नहीं और निचे एक ढीला पजामा पहना हुआ था. एक बार तोह माधुरी

भी खो सी गई थी सी दृश्य में. मासूम सा चेहरा जिसपे अभी कोई बाल ठीक से नहीं आया था. बाजु

पे मछलिअ बन रही थी, चौड़ी छाती बिलुल बेदाग और फिर जहा नजर गई तोह गाला हे सूख गया.

"अरु बीटा उठ जा देख दोपहर होने को आई है. बाबा पूछ रहे थे तुझे." अपने आप पर काबू कर

माधुरी ने थोड़ा जोर से अर्जुन को हिलाया. शायद अब माधुरी को भी जल्दी पड़ी थी यहाँ से भागने की.

"दीदी, आज तोह पहला दिन है छुट्टी का. सोने दो न प्लीज. ", अर्जुन ने मुँह पर तकिया रखते हुए जवाब

दिए.

"भाई,10 बज चुके है. और शायद आज शंकर चाचा भी आने वाले है." माधुरी ने जैसे हे अर्जुन

के पिताजी का नाम लिए, वो बिजली की रफ़्तार से उठा और सीधा बाथरूम में हे जाकर रुका.

माधुरी हँसते हुए वह से चली गई. वो जानती थी के अर्जुन सिर्फ इस एक नाम से डरता है. और ये

सच भी था.

बाथरूम से फ्रेश होने के बाद जैसे हे अर्जुन निचे आया तोह आँगन में सफाई करती कोमल दीदी दिखाई

दे गई. अपनी नज़र निचे कर वह सीधा रसोई में गया जहा माधुरी खाना गरम कर रही थी. यहाँ भी

अर्जुन की नज़र अपनी सबसे बड़ी बहिन के नितम्भ पे अटक गई.

"हे भगवन ये क्या है? आज सबकुछ अलग क्यों लग रहा है?" मन में बोलता हुआ वह वह से भी निकल

के अपने ताऊ जी के कमरे में बैठ गया.

माधुरी खाने की प्लेट देकर चली गई और अर्जुन एकांत में बैठा खाने लगा. ये बैडरूम ऐसा था

के सामने बिलकुल खली जगह और कपडे की अलमारी थी. और अंदर की तरफ बीएड लगा हुआ था. दरवाजे

से कमरे का बीएड वाला हिस्सा बिलकुल नज़र नहीं आता था. अर्जुन बीएड पे बैठा दिवार से तक लगा खाना

खा रहा था. अभी खाना आधा भी ख़तम नहीं हुआ था के दरवाजे से कोई अंदर आया और दरवाजा बंद

किआ. न अर्जुन ने ध्यान दिए और न हे आने वाले ने. अलका अपने कपडे लेकर अंदर आई थी क्योंकि उसके

कमरे में कोमल सफाई कर रही थी और Komal/Ritu वाले कमरे में ऋतू अपने गीले कपडे बदलने गई थी.

अलका ने जल्दी से अपना भीगा हुआ कुरता उतरा और सलवार निचे करि. उसका मुँह अलमारी की तरफ था

लेकिन अब अर्जुन की जुबान लकवा मार चुकी थी. जैसे हे उसने देखा अलका के शरीर पे सिर्फ एक सफ़ेद

ब्रा और काली चड्डी थी जो उसके नितम्ब की दरारों में फांसी हुई थी. अर्जुन के मुँह में हे निवाला रुक

गया. नजरे इस दिलकश मंजर को देख जड़ हो गई थी.

अलका ने अपने हाथ पीछे किये और उसकी ब्रा भी जमीन पे गिरी पड़ी थी अब. फिर अर्जुन को वह मंजर

दिखा जो आज से पहले उसने कभी नहीं देखा था. अलका ने झुक कर अपनी चड्डी पैरो से निकली तोह

अर्जुन का दिल धड़कना हे बंद हो गया था. एक दम घड़े सी गोलियां थी अलका की, रेशमी चिकनी जांघ

जिनपे कही कोई बाल का रेशा तक नहीं था. लेकिन उसको वो नहीं दिखा जिसे वह देखने की आस लगा चूका

था. अलका की yoni/chut. अलका ने जल्दी से दूसरी ब्रा और चड्डी पहनी. अर्जुन ने जैसे हे ये देखा वह

बीएड पे उल्टा लेट गया. अलका ने सूट बदला और जैसे हे पलटी तोह नज़र पड़ी अर्जुन पे.

"अर्जुन-2.. तू यहाँ क्यों सो रहा है. चल उठ.", न चाहते हुए भी अलका ने ऐसा किआ. ये देखने के

लिए के वाकई वो सो हे रहा था.

"सोने दो न दीदी. साड़ी रात फिल्म ने नहीं सोने दिए. थोड़ी देर में उठता हु."

ये देख अलका कुछ संभल गई और उसको जल्दी उठने का बोल बहार निकल गई.

अर्जुन ने बीएड के निचे से थाली उठाई और खाना ख़तम कर जल्दी से किचन में प्लेट रखने चला गया.

"कैसा था खाना? आज तेरी पसंद के परांठे मैंने बनाये थे." माधुरी ने खली प्लेट लेते हुए बोलै

उसके चेहरे पे एक अलग हे चमक थी.

"ाचा था दीदी. मजा आ गया."

"अकेले हे मजा लिए या मजा दिए भी?" खिलखिलाकर माधुरी ने ये बोलै तोह अर्जुन को कुछ समझ नहीं आया

वो सर खुजाता चल दिए अपने दोस्त संदीप के घर.

"दीदी संदीप है?" अर्जुन ने जैसे हे बेल्ल बजे तोह गेट संदीप की बड़ी सिस्टर ज्योति ने खोला. ज्योति एक

सांवली लेकिन आकर्षक चेहरे मोहरे वाली लड़की थी. 20 साल की उम्र और ऊपर से नै जवानी से भरपूर.

"अंदर आजा अर्जुन. संदीप अभी आ रहा है सामान लेके." ज्योति ने जवाब दिए तोह अर्जुन अंदर चला आया

संडे था तोह आज संदीप के mummy-papa अपने रिश्तेदार से मिलने गए हुए थे और संदीप भी उनके साथ

गया था. ज्योति ने अर्जुन को झूठ बोल कर अंदर बुला लिए था. वो अकेली थी और उसको हमेशा से अर्जुन

पसंद था. आज भगवन ने उसकी सुन ली थी.

संदीप का परिवार एक शिक्षित जाट परिवार था. पिता धर्मपाल जी सिंचाई विभाग में थे और माता रजनी एक

सरकारी टीचर थी. ज्योति अभी कॉलेज के फर्स्ट ईयर में थी. इनका बाकी परिवार गांव में हे बसा हुआ था.

यहाँ सिर्फ ये 4 लोग रहते थे.

"क्या पियेगा बता? संदीप तोह थोड़ी देर में आएगा." कहते हुए ज्योति ने अपनी छाती थोड़ी बहार निकल ली

जैसे कह रही हो के इनको पि ले अर्जुन इन्होने बहोत तंग किआ हुआ मुझे.

"दीदी घर से आ रहा हु क्यों तकलीफ करती हो. फिर मई चलता हु शाम को आऊंगा." जैसे हे अर्जुन ने इतना

कहा ज्योति के अरमान हे टूटने लगे.

"ाचा तोह सिर्फ संदीप का दोस्त है तू? मई कुछ भी नहीं? अकेली को छोड़कर जायेगा ऐसे मुझे?" रूठने

की एक्टिंग करते हु ज्योति ने अपना निशाना लगाया अर्जुन पे. वह तोह वैसे हे भोला था. बैठ गया वही

"क्या दीदी. आप तोह मेरी सबसे प्यारी दीदी हो. कही नहीं जाता, यही हु आपके पास."

ज्योति ने एक चुस्त सलवार के ऊपर एक नार्मल t-shirt पहनी हुई थी. जहा सलवार फिटिंग की थी, T-shirt

थोड़ी घिसी हुई थी. उसके उभर और बहार आ रहे थे. वो अपने कूल्हे मटकती हुई किचन में गई और

अर्जुन के लिए शरबत बना के ले आई, एक गिलास अपने लिए भी. टीवी पे व् चैनल चल रहा था और ज्योति

सोफे पे अर्जुन के साथ सात क बैठ गई.

"सुना है दादा जी तुझे बॉक्सिंग के लिए स्टेडियम में एडमिशन दिलवा रहे है?" ज्योति ने अर्जुन के जांघ पे

हाथ रखते हुए बोलै

"आपको किसने कहा?" हैरान होते हुए अर्जुन ने ज्योति को देखा.

"वो अलका ने बताया आज सुबह जब मई तुम्हारे घर आई थी", ज्योति ने जवाब दिए और अर्जुन की जांघ सहलाने

लगी. एक तरफ से वह अपने स्तन भी उसकी बाजु पे रगड़ रही थी. और अब उसकी t-shirt पे 2 बिंदु बन गए

थे.

"है शायद. बाबा ने कहा था के सोमवार से टाईमटेबल चेंज कर देंगे. यही बात होती." अर्जुन सोच कर बोलै.

उमंग तोह अर्जुन के भी मन में जाग रही थी. कल रात से हे उसने एक नै दुनिया देख ली थी.

"तू इतना तगड़ा लगता नहीं मुझे. अभी भी देख बिलकुल बचा सा है." ज्योति ने अपनी अगली चाल चल दी

"क्या बात करती हो दीदी. 10 कम दौड़ लगता हु. 200 दंड पेलता हु. अब डम्बल भी करता हु." अर्जुन अपना

बचपना दिखने लगा जिसको ज्योति जैसी गरम लड़की ाचे से समझ चुकी थी के बिलुल कोरा है. कोरी तोह

ज्योति भी थी लेकिन उसने अपनी सहेलियों से सब सुना हुआ था. और एक बात थी के वह अपने maa-baap को

प्यार का खेल खेलते देखने लगी थी चुपके चपके.

"ाचा तोह मुझे भी दिखा तेरी बॉडी. देखु कितनी मजबूत है."

"आपको कैसे दिखा सकता हु दीदी." शरमाते हुए अर्जुन बोलै

क्यों. अलका, कोमल, ऋतू ने कभी नहीं देखि जो मुझ से शर्मा रहा है", ज्योति ने तना मारा तोह अर्जुन

भी सोफे से खड़ा हुआ और अपनी शर्ट उतार दी. उसका शरीर सच में मजबूत और दिलकश था. ज्योति ने

देखा तोह उसकी छाती कड़क होने लगे. ज्योति बिलुल उस से सात के कड़ी हो गई और धीरे धीरे अर्जुन की

मांसपेशियों पे हाथ घूमने लगी. दोनों को हो एक अजीब नशा हो रहा था. जहा अर्जुन का पहले कोई एक्सपीरियंस

न था वही ज्योति ने सिर्फ अपने maa-baap को देखा था. अर्जुन ऐसे हे सोफे पे बैठ चूका था और ज्योति उसके

ऊपर आ चुकी थी. कब दोनों के होंठ मिले दोनों को पता हे न चला. अनारी दोनों हे थे तोह अर्जुन ने जितना

रात की फिल्म में देखा उसी तरह ज्योति के होंठ चूसने लगा. अब हाल ये था के ज्योति अर्जुन की गौड़ पे दोनों

तरफ पांव किये बैठी थी और उसकी गर्दन पकड़ के उसे अपने होंठ चुसवा रही थी.

अर्जुन भी होश खो चूका था. उसने ज्योति की जीब से जीब लगाई और अपने एक हाथ से टीशर्ट के ऊपर से हे

उसका एक अनार पकड़ लिए. दोनों को जोर का झटका लगा. रुका कोई भी नहीं. अर्जुन को लगा जैसे उसने कोई नरम

रबर की बॉल पकड़ ली हो और वह उसे हलके दबाने लगा. ज्योति खुद को उसके ऊपर डालने लगी. अब अर्जुन ने अपना

दूसरा हाथ उसके टॉप के अंदर डाला तोह वो और ज्यादा गंगना गया. क्या एहसास था उन नंगी चूचियों का. निप्पल

एकदम कड़े हो चुके थे जिसे उसने अपनी दो उंगलिओ से सेहला दिए. इधर ज्योति भी अपनी छूट को अर्जुन क ज़िप

पर घिस रही थी. 10 मिनट ये खेल ऐसे हे चलता रहा और अब अर्जुन ने ज्योति का टॉप निकल के उछाल दिए.

ज्योति के दोनों अनार सर उठाये खड़े थे. बिलकुल लाल और उनपे आधा इंच के तीखे निप्पल.

"मुँह में ले इन्हे मेरे भाई. चूस.. खा जा इन्हे. बहोत दर्द करते है ये." ज्योति ने इतना बोलै हे था

अर्जुन ने एक चूची को मुँह में भर लिए और लगा चुसकने. दूसरी को वो किसी भोपू की तरह दबा रहा था.

5-5 मिनट बाद वह उन्हें बदल बदल के चुस्त रहा और इधर ज्योति की सलवार जांघ तक गीली हो चुकी थी.

ज्योति ने झुक कर जैसे हे अर्जुन की चैन खोलनी चाही.. "त्रीनगगगगग.. बहार बेल्ल बजी."

उसने जल्दी से अपना टॉप पहना और बिना चेहर ठीक किये गेट खोला..

"अरु यहाँ आया है के?" ये थी कोमल दीदी

"है वो टीवी देख रहा है. बुलाती हु.. अर्जुन कोमल दीदी बुला रही है." ड्रामा क्वीन... अर्जुन अपनी शर्ट

पहन के बाहर आ चूका था.

कोमल कोई बची नहीं थी. उसने देख लिए था ज्योति की हालत को.. उसके नंगे पेट और ast-vyast सलवार को..

लेकिन उसको अर्जुन पर बिलकुल शक नहीं हुआ. वो तोह छोटा बचा जो है.
 
अपडेट 5

Vaasna/Pyaar और भैया का उपहार


दोपहर के 4 बज रहे थे और बैठक में रामेश्वर जी के पास राजकुमार जी और अर्जुन कुर्सी पे बैठे थे.

रामेश्वर जी- राजकुमार कल समय निकल कर अर्जुन को अपने साथ साइकिल दिलवाने ले जाना. और जो इसको पसंद

हो वही लेने देना.

राजकुमार जी - बिलुल ले जाऊंगा. और जैसी साइकिल ये लेना चाहे ले लेगा बाबा.

अर्जुन बीच में हे बोल उठा. "साइकिल क्यों? बाबा आपने बोलै था मुझे दसवीं के बाद संजीव भैया वाला

स्कूटर मिल जायेगा. तोह फिर अब ये साइकिल कहा से आ गई?

रामेश्वर जी ने हँसते हुए बोलै, "बीटा, स्कूटर तोह है हे तुम्हारा लेकिन उसका तुम क्या करोगे? है लेकिन

साइकिल इसलिए क्योंकि गुरूवार से तुम्हे स्टेडियम जाना पड़ेगा रोज शाम को 2-3 घंटे. मैंने वह सब बात

कर ली और मई तोह चाहता था के वह तुम्हे कल से हे बुला ले. लेकिन कोई प्रतियोगिता चल रही है वह

इसलिए अभी 3 दिन और तुम मौज मार लो. और है, साइकिल ऐसी लेना जो तुम्हे समय से वह पंहुचा सके. 10

कम है स्टेडियम यहाँ से."

"बाबा ये तोह गलत बात है. मई स्कूटर भी तोह लेके जा सकता हु न स्टेडियम. और समय भी बचेगा

ऐसे में." बुझे मन से वो बोलै

"जोगिन्दर जी ने बीटा मुझे सख्ती से ये बात कही है. जिस से तुम्हारी कसरत पहले हे हो जाये और बॉक्सिंग

पे ज्यादा ाची तरह ध्यान दे सको.. मुझे स्कूटर से कोई ऐतराज नहीं लेकिन ये सब तुम्हारे भले के लिए

हे तोह कर रहा हु. और हाँ, इस सब में तुम्हारा सुबह का रूटीन वैसा हे रहेगा. स्टेडियम शाम को 4-6 बजे

रहना है." बड़े प्यार से उन्होंने ये बात कही तोह अर्जुन को भी समझ आ गया के दादा जी की बात सही है

"और तुम राजकुमार, अपनी माँ से पैसे ले लेना. ये साइकिल मेरी तरफ से तोहफा है मेरे प्यारे बचे को."

"जी पिता जी."

"अर्जुन.. अर्जुन बीटा जा छत्त पे कोमल के साथ जाकर अचार के मर्तबान उठा ला. और है जो साबुत मिर्च

सूखने राखी है चटाई पे उनको भी जरा हिला देना." कौशल्या जी ने दूसरे कमरे से आवाज देते हुआ कहा.

"चल जा बीटा नहीं तोह थानेदारनी की आवाज फिर से आएगी. और है ये 3 दिन खूब आराम कर कुछ नहीं कहूंगा

लेकिन फिर तेरी एक नहीं सुनूंगा." रामेश्वर जी ने टेबल से अखबार उठाते हुए कहा तोह अर्जुन भी चल दिया.

"कोमल दीदी कहा हो?" आँगन में पहुंच के अर्जुन ने अपनी बड़ी बहिन को आवाज लगाईं. और तभी कोमल अपनी माँ

के कमरे से बहार आकर उसके सामने कड़ी हो गई.

"क्यों चिल्ला रहा है भाई.? यही तोह हु, मई कहा जाती हु कही बहार", कटाक्ष के साथ उसने अर्जुन को छेड़ा

"वो दादी जी ने बोलै है छत्त पर चलने को. अचार के मर्तबान लेकर आने है और मिर्च भी देखने को कहा".

"ाचा -ाचा चल." कोमल ने कहा

जब अर्जुन ने कोमल को आवाज दी थी तब कोमल अपनी माँ से सर की मालिश करवा रही थी. उसने एक पुराण सा

खुले गले का सूट और एक वैसी हे खुली सलवार पहनी थी. शरीर भी एकदम मांसल था तोह वह पुराण

पतला सा कपडा भी गज़ब ध रहा था. दोनों भाई बहिन चल दिए तीसरी मंज़िल पे.

"चल थोड़ा सा हिला इन मर्तबान को." कोमल ने अर्जुन को मर्तबान की तरफ इशारा करते हुए कहा.

इतनी सीढिया चढ़ने की वजह से उसकी सास फूली पड़ी थी. लेकिन अर्जुन बिलुल ठीक था क्योंकि वो तोह रोज

हे 10 कम दौड़ लगता था. लेकिन जैसे हे उसने अपनी बहिन की तरफ देखा उसके होश उड़द गए. हुआ यु की इतना

ऊपर आने की वजह से कोमल के माथे पे कुछ पसीना आ गया था जिसे वह अपने सूट को उठा कर पांच रही

थी. उसके लिए ये कोई नै बात नहीं थी क्योंकि अर्जुन तोह उसके लिए आज भी एक बचा था. लेकिन अब अर्जुन

वह पुराण अर्जुन कहा रहा था कल रात के बाद से.

अर्जुन ने देखा अपनी बड़ी बहिन के मखमली पेट को और गहरी नाभि को जो बेहद दिलकश लग रही थी. और

उसकी त्वचा पे कुछ नमी सी भी थी. ये दृस्य इतना मनमोहक था के उसको कुछ सुनाई हे नहीं दे रहा था.

"अब खड़ा क्या है? चल इनको पकड़ के हिला तभी तेल सही से जायेगा अचार में.."

"हाँ... हाँ करता हु." कहकर अर्जुन ने वह 10-10 किलो के मर्तबान पकड़ कर हिलाये. लेकिन उसका सारा ध्यान

तोह अपनी बहिन पे हे था. सूरज की माध्यम रौशनी में उसका चमकता हुआ रक्तिम चेहर, बड़ी बड़ी आँखें

जैसी कोई काला हीरा हो. बड़े और गुलाबी होंठ.. ये सब देखते देखते उसके पेण्ट में तनाव आने लगा.

"ाचा अब यहाँ सामने आ और जैसे मई कर रही हु वैसे तू भी कर. ये मिर्चे सही से फैलानी है." इतना

बोलकर कोमल झुक गई चटाई पे अपने दोनों पेअर मोड़ कर. और ये नजर तोह कही ज्यादा जानलेवा था अर्जुन

के लिए. ऐसे झुकने से कोमल के दोनों ठोस गुब्बारे लगभग एक तिहाई उसके सूट से बाहर झांक रहे थे.

देख के हे पता लग रहा था के वह कोमल की तरह हे कोमल और तने हुए थे. उसके दाए उभार के ठीक

ऊपर एक बड़ा सा भूरा टिल था जो और भी क़यामत बना रहा था इस मंज़र को.

अर्जुन को काम न करते देख कोमल ने सर उठाया तोह देखा उसके भाई का ध्यान किधर है. एक पल के लिए

वह चौंक गई लेकिन फिर बिना अपनी स्थिति को ठीक किये उसने जरा जोर से उसको आवाज दी. अर्जुन बिना कुछ

कहे अपने दोनों हाथों से मिर्चे फ़ैलाने लगा.

"बस ये हो गया अब एक घंटे बाद मिर्च उठा लेंगे. चल 2 मर्तबान तू उठा और एक मई लेके चलती हु." इतना

बोलकर कोमल ने एक मर्तबान उठाया और अर्जुन को थमा दिए जो उसने अपने दाए हाथ में अपनी छाती से चिपका

लिए. फिर दूसरा थमने लगी तोह उसका दाया उभार पूरी तरह से अर्जुन के बाए हाथ पे फिसल गया. कोमल

के मुँह से एक धीमी आह निकल गई. पर अर्जुन ने कुछ भी जाहिर नहीं किआ.

कोमल आगे चल रही थी और पीछे अर्जुन. उसकी नजरे अपनी बहिन के बड़े बड़े पुष्ट नितम्भो पे हे गढ़ी थी.

उनकी थिरकन देख के अब अर्जुन के मन में हलचल कुछ ज्यादा हे बढ़ गई थी.

"ये क्या कर रहा हु मई. ये दीदी है मेरी. " इतना सोचते हे वो खुद पर शर्मिंदा सा होने लगा. और दोनों भाई

बहिन निचे पहोच गए. सामान रसोई घर में रखने के बाद अर्जुन ऊपर वाले ड्राइंग रूम में जा कर बैठ

गया. उसका दिल कुछ ज्यादा हे अशांत हो रहा था. आज एक हे दिन में उसकी नजरे कितनी बदल गई थी. ये क्या था?

संजीव भाई की बात याद आई तोह उसे ये लगा के ये भी शायद प्यार हे है. लेकिन ऐसा कैसे हो सकता है?

"क्या कर रहा है छोटे?" संजीव भैया अंदर आते हे उस से बोले.

"कुछ नहीं भैया. आप कहा थे. आज तोह मई बोर हो गया. और आपने बोलै था कल कुछ लेकिन आप भूल गए."

अर्जुन ने सवालों की बौछार शुरू कर दी भाई से मिलते हे.

"अरे बस कर भाई. मुझे सब याद है तभी तोह बहार गया था. चल कपडे बदल हम दोनों को अभी जरुरी

जाना है कही." इतना बोलकर वह अपने कमरे में चले गए. और अर्जुन भी कपडे बदलने चला गया. 10 मिनट

बाद दोनों भाई स्कूटर पे निकल दिए पुराने शहर की तरफ. दोनों हे चुप थे. शाम होने लगी थी. थोड़ा

दूर आते हे संजीव ने एक पँवरि के सामने स्कूटर रोका और गोल्ड फ्लैक का एक पैकेट लिए. पास हे एक मेडिकल

स्टोर था. वह अर्जुन को वही रुकने का बोल कर स्टोर में चले गए. बहार आकर स्कूटर स्टार्ट किआ और एक

बार फिर दोनों चल दिए. 20-25 मिनट के बाद दोनों भाई मक क्वार्टर्स के एक क्वार्टर के बहार खड़े थे.

"ये हम कहा आये है भैया? आपका कोई दोस्त रहता है क्या यहाँ?"

"है कुछ ऐसा हे." संजीव ने स्कूटर को डबल स्टैंड पर लगते हुए जवाब दिए और चल दिए घर के भीतर.

अर्जुन भी भाई के पीछे हे चल दिए. घर के अंदर लगी बेल्ल बजाई तोह एक 35-36 साल की महिला ने जाली

वाला दरवाजा खोल उनका स्वागत किआ. ये एक 2 कमरे का छोटा सा क्वार्टर था. सब कुछ बहुत हे करने से सजा

था. एक छोटी सी रसोई थी वही सामने.

"क्या पेश करू जनाब की खातिर में?" बड़ी ऐडा से वह महिला संजीव की गौड़ में बैठ ते हु बोली.

"मालती, ये है मेरा छोटा भाई. लेकिन ये बड़ा हो रहा है तोह सोचा तुमसे कुछ ट्रेनिंग हे दिला दू." कहते

हुए संजीव ने उसकी एक चूची दबा दी.

अर्जुन ये सब देख बड़ा हैरान हुआ. उसे तोह विश्वास हे नहीं हो रहा था के उसके भैया एक हे दिन में उसके

लिए ये सब कर रहे है. फिर उसका ध्यान गया उस औरत पे. सांवली और पतली सी थी वह. हलके से छाती पे

उभार, एकदम सपाट कमर और निचे थोड़े बहार को निकले हुए नितम्भ. कुल मिलकर एक साधारण सी औरत थी.

"डार्लिंग तोह कहा से शुरू करे?" भैया की इस आवाज से अर्जुन का ध्यान हटा तोह देखा भाई नई उसकी चुकी

दबाई हुई थी और मालती पेण्ट के ऊपर से उनका लिंग सेहला रही थी.

"फर्स्ट टाइम है तोह पहले तुम स्टार्ट करो और फिर इसका नंबर आएगा. देखते है इसका इंजन कितना दुमदार है."

मुस्कुराती हुई मालती ने संजीव की शर्ट खोल दी और संजीव ने भी फुर्ती से उसको नंगा करना शुरू कर दिए.

2 हे मिनट के बाद वह दोनों अल्फ नंगे खड़े थे. मालती अपने चूतड़ मटकाती हुई दूसरे कमरे की तरफ चल

दी और संजीव उसके पीछे और सम्मोहित सा अर्जुन भी.

"पहले जरा गिला तोह कर दे मेरी जान, ऐसे मजा नहीं आएगा." कहते हुए संजीव ने अपना खड़ा लिंग मालती

के होंठो की तरफ कर दिए और उसने भी पालक झपकते हे पूरा लिंग उतार लिए अपने गले में. बड़ी ऐडा से

वह संजीव के पूरे लिंग को अपने होंठो से निचोड़ रही थी और वही संजीव उसके बड़े निप्पल खींच रहा

था. 5 मिनट बाद स्थिति अलग थी. मालती बीएड पे टाँगे खोले पड़ी थी और संजीव अपने लिंग पे कंडोम

चढ़ा रहा था.

"ये गुब्बारा क्यों लगा रहे हो भैया?" मासूमियत से अर्जुन ने अपने भाई से पुछा.

"भाई ये निरोध है. अगर माल अंदर गिरा दिया तोह बचा भी पैदा हो सकता है. और कोई बिमारी भी लग

सकती है. ये सेफ सेक्स के लिए होता है."

अब अर्जुन का ध्यान गया मालती की योनि पे जहाँ काल घुंघराले बालो के निचे एक लाल सा छेद था और

उसके बहार लटके हुए 2 होंठ. पहली बार वह एक असली योनि देख रहा था. अब उसका भी लिंग अंगड़ाई ले

चूका था.

"तोह खेल शुरू करे जानेमन?" संजीव ने मालती की टंगे उठाते हुआ पुछा.

"मई तोह कब से तड़प रही यार. घुसा दे पूरा एक हे बार में. और तू वह क्यों खड़ा है, इधर आ." मालती

ने अर्जुन को पास बुलाया.

यहाँ संजीव ने एक जोरदार झटका मारा और उसका पूरा लिंग समां गया उस लाल से चीरे में. मालती के मुँह

से एक आनंद भरी आह निकली. और उसने पेण्ट के ऊपर से हे अर्जुन का लिंग पकड़ लिए. यहाँ संजीव पूरे जोश

में अपने कूल्हे हिला रहा था और उसका लिंग मालती की योनि से अंदर बहार हो रहा था. और मालती ने अर्जुन

की ज़िप खोल के उसका लिंग पकड़ लिए था. जो अब पूरे आकर में सर उठाये खड़ा था. आनंद से उसकी आँखें

बंद हो चुकी थी. कुछ गिला सा महसूस हुआ अपने लिंग पे तोह देखा के उसका लिंगमुण्ड, जो एक बड़े अंडे के

आकर का था वह मालती के मुँह में था. वो तोह इस एहसास से हे मारा जा रहा था. क्या है ये सब? स्वर्ग

शायद यही है.

खुद बा खुद हे उसकी कमर हिलने लगी और जब उसका ध्यान हटा तोह देखा के उसने कुछ ज्यादा हे जोर से

कमर हिला दी थी और मालती अब खांस रही थी.

"क्या हुआ? ाचा लगा मेरे छोटे भाई का हथियार?", भैया ने मालती को तना मारा और जोर से पेलने लगे

मल्टी ने भी अर्जुन के हाथ पकड़ के अपनी चूचियों पर रख दिए थे.

"इनको जोर से मसल बीटा. खींच ले ये निप्पल और लाल कर दे इन चूचियों को", मालती और पता नहीं क्या

बोलती जा रही थी. इधर एकदुम से भैया हट गए और वह गुब्बारे में उनका वीर्य जमा हुआ था.

"चल छोटे आजा यहाँ और ये निरोध पहन." भैया ने अर्जुन को पास बुलाया और एक नया निरोध पकड़ा दिए

उसके हाथ में.

"इधर ला मई पहनती हु इसको. देखु इसका भी जोश कैसा है. तू तोह कभी 10 मिनट टिका नहीं." मालती

थोड़ा अजीब लहजे में बोली संजीव भैया से और फिर रबर की तरह अर्जुन के लिंग पे निरोध चढाने लगी.

"इसको यहाँ रख और बहोत आराम से अंदर दाल. पूरा मत दाल डीओ बहनचोद." वासना की आग में जलती मालती

के मुँह से गाली निकल गई. अर्जुन को बुरा लगा सुनकर तोह वह वह से हटने लगा.

"अरे मुन्ना गुस्सा हो गया? चल नहीं बोलती तुझे कुछ. आजा और कर दे चढ़ाई. वैसे गन्दी बातें करने

से सम्भोग का मजा दोगुना हो जाता है मेरे शेर." उसने फुसलाया अर्जुन को तोह अर्जुन ने अपना लिंगमुण्ड टिका

दिए मालती की खुली हुई छूट पर.

सांस भर के उसने धक्का मारा तोह लिंग फिसल गया. मालती ने हँसते हुए एक हाथ से उसका लिंग पकड़ा और

अपने छेद पर लगा दिए.

"चल अब मार धक्का." उसने इतना हे बोलै था के अर्जुन ने एक करारा झटका मार दिए. लगभग तीन चौथाई

लिंग एक हे बार में अंदर. उसे ऐसा लगा जैसे उसके लिंग को किसी गरम मुट्ठी ने दबा दिए हो और वह

मालती के मुँह से एक मजे के चीख निकल गई..

"हाय रे क्या जानदार डंडा है तेरा. जान हे निकल दी एक बार तोह. जरा रुक साँस लेने दे फिर पूरा दाल

डीओ." मालती ने मजे की आवाज में बोलै और फिर से उसके हाथ अपने चूचियों पर रख दिए. यहाँ अर्जुन ने

महसूस किआ के उसके स्तन एकदम मुलायम है लेकिन उनमे वह मजा नहीं था जो ज्योति के पकड़ने में आया था.

और ये तोह पूरे उसकी मुठी में आ गए थे. ज्योति के इतने बड़े और सख्त थे की दोनों हाथ में भी एक पूरा

न आये. ये सब सोचते सोचते उसने पूरा जोर लगाकर धक्का मार दिए.

"Uiiiiiiiiiiiii Maaaaaaaaaaaaaaaaaa.." ये झटका मालती को उसकी बच्चेदानी तक महसूस हुआ और उसका जिस्म

अकड़ गया.

"रुक जा थोड़ा, इतनी भी क्या जल्दी है तुझे मेरी छूट का भोसड़ा बनाने की." मालती जोर से बोली

अर्जुन को तोह ये भाषा समझ आ नहीं रही थी. लेकिन वह रुक गया और बेमन से मालती की छोटी छोटी

चूचिया दबाने लगा.

"चल आधा निकल फिर दाल और ऐसे हे कर." मालती ने आदेश दिए अर्जुन को तोह वह भी किसी मशीन की

तरह शुरू हो गया. कुछ हे देर में मालती फिर से अकड़ गई तोह उसकी छूट और गीली हो गई. अब अर्जुन

खुद बा खुद तेज तेज धक्के लगाने लगा बिना रुके. हर धक्का मालती की छूट के आखिरी हिस्से से टकरा रहा

था और पूरे कमरे में thapp-thapp की आवाज गूँज रही थी. इतने में हे मालती ने उसका लिंग अपनी छूट से

बहार निकल दिए. अर्जुन हैरान सा उसको देखने लगा तोह मालती बीएड पे घुटनो के बल हो गई और अपने चूतड़

अर्जुन की तरफ कर दिए.

"चल अब यहाँ से कर."

अर्जुन को कुछ समझ नहीं आया तोह उसने अपना लिंग मालती की गुदाद्वार से बीड़ा दिया.

"कमीने वह अभी नहीं. उसके निचे दाल. पहली बार में हे गांड मारने चला है." वो बिदकते हुए बोली

तोह अर्जुन ने अपना लिंग निचे किआ हे था की मालती ने अपने चूतड़ खुद पीछे धकेल दिए और लिंग सटक

से अंदर हो गया. खुद से हे अर्जुन ने उसकी कमर पकड़ ली और शुरू हो गया. स्वचालित पिस्टन की तरह

ुषक पूरा लिंग अंदर बहार हो रहा था. पूरा निरोध चिकनाई से चमक रहा था. एक बार फिर से मालती

का शरीर अकड़ गया लेकिन अर्जुन किसी नशेड़ी की तरह ताबड़तोड़ धक्के लगता रहा. कोई 20 मिनट बाद

उसका शरीर मालती के चुत्तड़ो से जा चिपका और अर्जुन का शरीर रह रह के थिरकने लगा..

"ये कैसा नशा सा है भगवन." आनंद से आखें भींचे अर्जुन अपना पानी निरोध में खली करने लगा.

2 मिनट लगातार पिचकारिअ मरने के बाद जब वह हटा तब भी उसका लिंग कुछ हद्द तक खड़ा था.

"बड़ा भयंकर लड़का है यार तू तोह." मंत्रमुग्ध सी मालती पलट ते हुए अर्जुन से बोली. उसकी पहले से

फैली हुई छूट अब और भी फ़ैल चुकी थी और उसकी छूट से बेहटा पानी उसकी जांघ तक आ चूका था.

"हो गया भाई तेरा?" संजीव कमरे के अंदर सिग्रेटे पिता हुआ आया तोह देखा के अब अर्जुन कुछ शर्मा

रहा था.

"क्या छोड़ा है तेरे भाई ने मुझे संजीव. इसने तोह मुझे मेरी माँ याद दिला दी. आगे चल के बड़ा

खिलाडी बनेगा तेरा भाई. साला अंदर जलन मचा दी इसके लोडे ने तोह मेरी छूट के." बोलती हुई वह

कपडे पहन ने लगी. अर्जुन भी अब अपने कपडे पहन रहा था.

"चल छोटे आज थोड़ा ज्यादा हे टाइम हो गया. घर भी चलना है." ये बोलते हुए संजीव ने अपनी जेब से

100-100 के 5 नोट निकले और मालती को दे दिए.

"अगली बार जब तू आएगा तोह तेरे भाई को भी लेते आना. इसके पैसे नहीं लुंगी मई." अर्जुन को आँख

मारती मालती ने ये बात कही संजीव से तोह वह बिना कुछ बोले बहार निकल गया. अर्जुन कुछ हैरान

सा भाई के पीछे चल दिए.

"क्या हुआ भैया? कुछ काम आ गया क्या आपको?", अर्जुन ने भाई से पुछा जो अब स्कूटर चला रहा था.

"नहीं भाई. थोड़ा बुरा लगा बस के मई तुझे सीखने के चक्कर में इस औरत के पास ले आया. लेकिन याद

रख ये सिर्फ तेरे लिए एक पथ हे था. मालती मेरी हे कंपनी में काम करती है लेकिन पैसे के बदले

में जिस्म का मजा भी देती है. ज़िन्दगी में एक बात गांठ मार ले के कभी भी किसी ऐसी औरत के चक्कर

में नहीं पड़ना जो पैसे के बदले जिस्म का सौदा करे. आज जो भी हुआ बस यही भूल जा और अपनी ज़िन्दगी

संवर." संजीव ने ये बात किसी गहरी सोच में डूब के कही थी अपने छोटे भाई से. कुछ तोह जरूर था

यहाँ जो शायद वह अभी बताना नहीं चाहता था. लेकिन अपने भाई को उसने एक बड़ी सलाह जरूर दे दी थी.

लेकिन क्या अर्जुन ये सलाह मानेगा? आज तोह पहली बार उसने एक परम सुख प्राप्त किआ था. बेशक मालती

कोई सुंदरी नहीं थी लेकिन आज उसके लुंड ने एक छूट का मजा चख लिए था. क्या ये अपनी गर्मी संभल

पायेगा या मालती का अगला शिकार बनेगा.....
 
अपडेट 6

मधुर Raat-Maadhuri के साथ


आज फिर जब दोनों भाई घर पहुंचे तोह खाने का समय चल रहा था. रामेश्वर जी तोह भोजन ग्रहण

कर अपने कमरे में जा चुके थे और राजकुमार जी भी वह नहीं थे.

"आज तोह भैया बचा लेना प्लीज.", अर्जुन ने अपने भैया को धीमी आवाज में कहा

"चिंता मत कर छोटे. मई देख लूंगा बस तू हाथ मुँह धो और चल खाना खाते है." संजीव ने अपने

छोटे भाई के सर पे हाथ फेर कर बड़े प्यार से कहा.

"मुन्ना चल आजा बैठ मई खाना लगाती हु तेरा." ललिता जी ने बड़े प्यार से अर्जुन को पुकारा. उनकी

आवाज सुनकर सभी की गर्दन अर्जुन की तरफ मुद गई जो आँगन में लगे नलके से हाथ धो रहा था.

"कहा था बीटा इतनी देर तक? तेरे दादा जी कई बार पूछ चुके. एक बार मिल लिओ खाने के बाद." ये

आवाज थी रेखा जी की. आखिर माँ थी वह तोह चिंता जायज़ थी उनकी

"चची वो आज मई आपके मुन्ना को स्विमिंग क्लब दिखने ले गया था. गर्मी की छुट्टियों में इसको वह

दाखिल करवाना है न. फिर थोड़ा मेरे दोस्त के घर बैठ गए थे वही पास में." संजीव ने अपनी चची

को बताया.

"बहुत ाची बात है बीटा. तू साथ था तोह मुझे कोई परवाह नहीं. सबसे ज्यादा प्यार तोह तू हे करता है

इस से. लेकिन बस दिल घबराता है जरा क्योंकि अभी ज्यादा कुछ पता भी तोह नहीं इसको din-duniya का." रेखा

जी ने सहानुभूति से अर्जुन को देखते हुए कहा. इतनी हे देर में अलका ने 2 थाली परोस दी टेबल पर. कोमल

और माधुरी भी वही चुपचाप बैठी खाना खा रही थी. शायद दोनों हे अपनी अपनी सोच में कही खोई थी.

"भाई वो कल मेरे कॉलेज चल पड़ोगे मेरे साथ?", रोटी रखते हुए अलका ने संजीव से कहा.

"क्यों गुड़िया, कल क्या है कॉलेज में?, संजीव ने बिना नज़र उठाये हे जवाब दिए.

"भाई कल एग्जाम फीस जमा करवानी है और प्रैक्टिकल सबमिशन है. ऋतू का तोह कल कॉलेज है नहीं तोह

मई अकेले कैसे जाउंगी?", अलका ने बड़ी उम्मीद से अपने भाई की तरफ देखते हुए कहा.

घर में एक कानून और भी था. कोई भी लड़की अकेली कही नहीं जाती थी. कॉलेज भी साथ में हे भेजा जाता

था. माधुरी और कोमल जब कॉलेज जाती थी तोह खुद राजकुमार जी या संजीव हे उन्हें छोड़ने जाते थे.

क्योंकि दोनों हे अकेले अकेले हे कॉलेज गई थी. फिर ऋतू और अलका की उम्र एक सामान थी और क्लास भी तोह

ये दोनों एक साथ हे जाती थी. एक रिक्शा कौशल्या जी ने पक्का किआ हुआ था इनके लिए. लेकिन दोनों के सब्जेक्ट

अलग थे तोह अलका और ऋतू के इम्तिहान आगे पीछे थे और पेपर के बीच काफी गैप था. इसलिए रिक्शा अब

बंद करवा दिए था.

"कोई बात नहीं कल तुझे छोटा ले जायेगा कॉलेज. इसी बहाने ये भी देख लेगा कॉलेज कैसा होता है.

और मुझे कल स्कूटर भी नहीं चाहिए तोह मई पापा के साथ हे ऑफिस चला जाऊंगा." संजीव भैया

की बात सुनकर अर्जुन का चेहरा खिल गया जिसे देख सभी हंसने लगे.

"थैंक यू भैया." चहकते हुए वह भैया से बोलै जो अब अपना खाना खा कर उठ चुके थे. संजीव

रात को काम हे खाना खता था. और कभी कभी तोह खता भी नहीं था. वो आगे बिना कुछ कहे चल

दिए ऊपर अपने कमरे में.

"अर्जुन, बीटा तू छत्त से सामान ले आया था?" ये आवाज थी कौशल्या देवी की.. जिसे सुनकर अर्जुन के

कान खड़े हो गए थे.

"दादी बस खाना ख़तम कर के ले आता हु. आज भैया के साथ बहार गया था तोह लेट हो गया." उसने

वही से जवाब दिए और कोमल की तरफ हाथ जोड़ दिए.

"ाचा ठीक है. और आज तेरे बाबा के मालिश तेरे ताऊ जी ने कर दी है. मिर्चे निचे लेन के बाद

सो जाना. सुबह तुझे जल्दी उठना होता है बीटा." अब आवाज जरा स्नेह से भरी थी.

"जी दादी. जय श्री कृष्णा." और दादी ने भी यही दोहराया और कमरे की लाइट बंद हो गई.

"दीदी, मेरा खाना हो गया. चलो मिर्चे ले आते है निचे नहीं तोह ौस गिर जाएगी." अर्जुन ने

कोमल से गुहार लगाईं..

"मई कही नहीं जा रही. तू माधुरी दीदी को ले जा अपने साथ." झूठे बर्तन उठाते हुए कोमल

ने कहा

"आजा भाई मई चलती हु तेरे साथ. ये तोह है हे सद्दू." इतना बोलकर माधुरी अपनी जगह से कड़ी

हुई और पसीना पोछते हुए अर्जुन के साथ चल दी.

घर में दूसरी मंजिल पे पिछली तरफ कुछ ज्यादा रौशनी नहीं थी. पहली मंजिल की हे लाइट से हे

हल्का उजाला हो रहा था. क्योंकि इस तरफ से संजीव और अर्जुन ज्यादातर दरवाजा बंद रखते थे

और वह घर के सामने वाले रास्ते से हे ऊपर आते जाते थे. लेकिन तीसरी मंजिल का रास्ता यही

से घूम कर जाता था. जैसे हे दोनों ने दूसरी मंजिल पार की, ये सीढिया दिवार जैसे बानी हुई थी

सबसे ऊपर जाने के लिए और कुछ "ल" के अकार में थी. माधुरी आगे थी और वो जैसे हे उन सीडीओ

पे मुड़ी तोह एकदम पलट कर अर्जुन के गले लग गई जोर से.

"बंदरररर..." इतना बोल वो वही चिपक गई अर्जुन की चौड़ी छाती से.

यहाँ घुप्प अँधेरा था तोह कुछ दिखा हे नहीं दोनों को और अर्जुन को अपनी बड़ी बहिन की ठोस चुकी

अपने सीने में धंसती महसूस हुई. "आह.." हलके से उसके मुँह से आनंद भरी सीत्कार निकल हे गई

और उसके दोनों हाथ माधुरी के बड़े बड़े नितम्भो से थोड़ा ऊपर जकड गए.

"कुछ भी नहीं है दीदी. शायद वैसे हे कोई साया होगा लाइट की वजह से." उसने धीमे से अपनी

दीदी के कान में कहा और माधुरी की पीठ को सहलाने लगा. अपने कान पे अर्जुन की गरम सांस

महसूस करके एक बार तोह माधुरी की भी धड़कन तेज़ हो गई थी. उन्माद में आकर उसने और

जोर से अपने स्तन दबा दिए उसकी छाती में. अर्जुन को भी ऐसा लगा जैसे दीदी के ये भरी

भरकम गोले नंगे हो और उसके पेण्ट में फिर से तनाव होने लगा. जो माधुरी की योनि से जरा

ऊपर उसकी नाभि पे गर्मी दे रहा था.

"तू आगे चल. और देख क्या है." काम्पटी हुई आवाज में माधुरी ने अलग होते हुए अपने छोटे

भाई से कहा तोह अर्जुन एक बार फिर अपनी छाती से उसका यौवन दबाता हुआ आगे हो चला.

"ाचा आओ. मई देखता हु कोनसा बन्दर था." इतना बोल वो ऊपर आ गया जहा एकदम ठंडी हवा

ने उन दोनों का स्वागत किआ. निचे जहा थोड़ा उमस का सा वातावरण था यहाँ एकदम ताजा हवा चल रही

थी. तारे आकाश में टिमटिमा रहे थे.

"वाह दीदी, यहाँ ऊपर कितना खुला खुला है न? मजा आ गया ऊपर आकर." अर्जुन ने चहकते हुए कहा

"छत्त पे आकर या मेरे ऊपर आकर मजा आया तुझे." माधुरी ने बड़ी धीमी आवाज ये बात कही थी

और खुद हे उसका हाथ अपनी योनि सेहला गया था. 23 साल की हो चुकी थी और बेचारी अभी भी कुंवारी

थी. ऐसा नहीं था के रामेश्वर जी या माधुरी के पिता लड़का नहीं देख रहे थे. लेकिन उनको अपनी

बेटी के योग्य वर नहीं मिल रहा था. ऊपर से वह मांगलिक भी थी.

"कुछ कहा दीदी आपने?" अर्जुन ने मुड़ते हुए पुछा

"है भाई देख तोह कितना ठंडा मौसम है. कितनी प्यारी हवा चल रही है. और ये आसमान कितना

दिलकश है. निचे कमरे में तोह घुटन सी लगती है." माधुरी ने थोड़ा बहकी हुई सी आवाज में

कहा. लेकिन अर्जुन को इसका जरा एहसास नहीं था के उसकी दीदी को क्या हुआ है. वो भी हां में हां

मिले के बोलै, "सही कहा दीदी. आज तोह मई अपना गद्दा ऊपर हे लगाऊंगा. नींद भी जल्दी खुल जाएगी."

बातें करते करते दोनों ने एक चादर पर मिर्चे इकट्ठी करि और गांठ लगा के निचे चलने लगे.

"मई भी पूछती हु अलका से ऊपर सोने के लिए. तू हम दोनों के गद्दे भी उठा लाएगा क्या भाई?" माधुरी

ने ये बात जब कही तोह उसमे हलकी विवशता भी थी.

"क्यों नहीं. 2 क्या मई तोह 4 गद्दे भी ले आऊंगा. आप तै जी को बोल देना बस." ऐसे हे वह दोनों निचे

आ गए.

"माँ आज मई ऊपर सो रहा हु. एक चद्दर दे दो एक्स्ट्रा. गद्दा और तकिया मेरे कमरे से ले लूंगा मई.

बिछाने की चद्दर भी. ऊपर थोड़ा मौसम ठंडा है तोह ओढ़ने के लिए सूती चद्दर दे दो." अर्जुन

ने अपनी माँ रेखा को प्यार से कहा तोह वह भी मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चली गई अपने बेटे के

लिए चद्दर लेने. वह ललिता जी को भी माधुरी ने मन लिए ऊपर सोने के लिए लेकिन अलका ने मन

कर दिए था. वो आज ऋतू के कमरे में सोने गई थी और कोमल चल दी माधुरी के साथ ऊपर.

कुछ देर में अर्जुन भी पहोच गया सर पे 3 गद्दे लादे हुए और कांख में तकिये -चद्दर दबाये.

वह छत्त पे जाते हे बैठ गया और माधुरी और कोमल लग गई बिस्तर लगाने.

छत्त काफी खुली थी और आसपास घर भी ज्यादा नहीं थे. अभी इतना गरम मौसम भी नहीं था

के और लोग भी अपनी छत्त पर सोने लगते. बस यही तीन थे. अर्जुन इसलिए क्योंकि उसका मैं था,

माधुरी को भी खुले आकाश के निचे सोने का दिल था, कोमल बस अपनी बहिन के साथ गप्पे मरने

के लिए ऊपर आ गई सोने.

गद्दे कुछ इस तरह बिछाये थे की एक तरफ अर्जुन, उसके साथ में माधुरी और सबसे आखिर में कोमल.

वैसे भी सबसे ज्यादा डर माधुरी को हे लगता था तोह वह बीच में सोने का बोल आ बैठी अपनी जगह

कोमल और अर्जुन भी ये जानते थे. दोनों लगे हंसने.

"हंस लो तुम दोनों. जब कोई बन्दर आएगा तोह सबसे पहले किनारे वाले को हे पकड़ेगा." वो बुरा मुँह बनती

हुई दोनों से बोली.

"है है.. बीच में तोह जैसे कांटे लगे है जो बन्दर नहीं आ सकते." कोमल ने थोड़ा चिडया अपनी बहिन

को. ये दोनों बहने पक्की सहेलिया भी थी. और वैसे इस शहर में बंदरो का भी बड़ा दखल था. लेकिन

ज्यादातर वह आबादी से दूर हे रहते थे.

अर्जुन ने अपने सर के निचे तकिया लगाया और पसर गया गद्दे पे. चद्दर नहीं ली थी उसने. दोनों लड़कीअ

हो गई शुरू बातें करना. उन्हें पता था अर्जुन जल्दी हे सो जाता है.

"कोमल, यार देख क्या ज़िन्दगी है हमारी. कॉलेज के बाद तोह बस घर के अंदर हे क़ैद है. न कही आना

न कही जाना." माधुरी ने अपना दुखड़ा रोया.

"सही कहा दीदी. सुबह उठो और घर की सफाई करो. फिर कपडे धोने.. कभी दोपहर को खाना बनाना तोह

कभी रात को. ज्यादा से ज्यादा महीने में 2-3 फिल्म टीवी पे देख लेते है. या संगीत सुन लिए." कोमल ने भी

है में है मिले.

बेचारी दोनों जवानी की मारी संस्कारो की वजह से वो बातें नहीं कर पाती थी जो शायद स्कूल की हर

लड़की आजकल अपनी सहेली से कर लेती है. ऐसे हे बतलाते एक घंटा बीत गया और उन्हें अर्जुन क सोने

की खबर लगी.

"देखो इसको. कितनी जल्दी नींद पकड़ता है. आसपास का कोई होश हे नहीं रहता जरा भी" माधुरी ने

कोमल को अर्जुन की तरफ इशारा किआ.

"टाइम भी 12 हो चूका है दीदी. इसकी क्या गलती. हमे तोह 6 बजे उठना होता है और ये 5 बजे से पहले

हे घर से निकल जाता है कसरत के लिए. और मुझे यहाँ ठण्ड लग रही है. मई चली निचे. आज माँ

के कमरे में सोऊंगी." इतना बोलकर कोमल सिर्फ तकिया उठा निकल गई वह से.

चल ठीक है मई भी लगी सोने." इतना बोल माधुरी ने भी अपने शरीर पे छड्ड कर ली. ये वाली चद्दर

डबल साइज थी. क्योंकि वो माधुरी और कोमल दोनों के लिए हे थी.

5 मिनट बाद हे माधुरी फिर उठी और अपने हाथ पीछे ले जाकर अपनी ब्रा के हक्क खोल दिए जो पता

नहीं कब से उसके यौवन कलश को कैसे हुए थी.

"अब चैन आया. हाय." इतना बोल वो घुस गई अपनी चद्दर में.

मुश्किल से हे एक घंटा बीता होगा के अर्जुन की चद्दर जो उसके पैरो में राखी थी वो हवा से थोड़ी दूर

खिसक गई. वो नींद में हे हाथ चलने लगा. जैसे हे उसकी पकड़ में चद्दर आई उसने अपने ऊपर खींच

लिए उसको. ये चद्दर थी जो माधुरी ने ओढ़ राखी थी. लेकिन ज्यादा बड़ी थी तोह अर्जुन भी अंदर घुस गया

ठण्ड थोड़ी ज्यादा थी लेकिन जब दोनों के शरीर साथ चिपक गए तोह दोनों के हे बदन हलके गरम हो गए.

कुछ हे पल बाद माधुरी ने अपना एक पेअर अर्जुन के पेअर के ऊपर दाल दिए और अपना चेहरा दुबका लिए उसकी

बाहो के अंदर. ये सब बहार की हलकी ठण्ड और दोनों के एक हे चद्दर के अंदर होने की वजह से हे हुआ था.

अन्यथा दोनों हे गहरी नींद में थे. और अब तोह और भी सकूं था. तक़रीबन 3-3:30 पर अर्जुन की नींद हलकी

से टूट गई. उसने माधुरी दीदी को अपने जिस्म से चिपका हुआ देखा तोह ानकेहिं खुल गई.

स्वयं हे उसके हाथ दीदी के मांसल पिछवाड़े पे पहोच गए. उस एहसास से एक मजे की लहर दौड़ गई अर्जुन

के दिल के अंदर तक. एकदम गुदाज़ और नरम पिछवाड़ा था माधुरी का. और साइज भी इतना बड़ा जैसे कोई छोटा

मटका. धीरे धीरे अर्जुन अपनी दीदी के पुष्ट उभार सेहला रहा था और उसका लिंग पाजामे में सर उठा रहा था.

हिम्मत कर के उसने अपना हाथ दीदी के पेट पे रख दिए जाया से सूट ast-vyast था. मखमली रेशम थी वह

जगह. अपनी उँगलियों से वह हर इंच को सहलाने लगा और उसका हाथ खुद बा खुद ऊपर जाने लगा.

ये थोड़ा खुला हुआ पुराण सलवार कमीज था जो सोने के टाइम आरामदायक रहता है. बड़े आराम से अर्जुन का

हाथ वह तक पहुंच गया जहा एक और कपडा था. ये थी उसकी दीदी की ब्रा, लेकिन ये भी उसकी उँगलियों को रोक

न सकीय क्योंकि वो तोह पहले से हे खुली हुई थी. अब जहा अर्जुन का हाथ लगा उसके शरीर का तापमान बुखार

जैसे हो गया. सुडोल, मुलायम और उन्नत वक्ष की शुरुआत पे उसका हाथ पहुंच गया था.

माधुरी नींद की भी बहुत पक्की थी. सारा दिन जो बेचारी इतना काम करती थी के 7 घंटे निश्चिंत सोती थी.

अर्जुन ने इस बाद का फायदा उठाते हुए कमीज के अंदर से हे अपना पूरा हाथ उस स्तन पे रख दिए. और यही

उसके लिंग ने एक जोरदार ठुमका लगाया और जा चिपका कपडे के ऊपर से हे माधुरी की योनि से. धीरे धीरे

अर्जुन ने अपने हाथ को हरकत देनी शुरू kari.Kabhi वह सिर्फ सेहलता तोह कभी थोड़ा दबाता. दीदी का स्तन इतना

बड़ा था के जितना उसके हाथ में थे उतना हे हाथ की दोनों तरफ था. तभी उसका हाथ लगा एक छोटे से बटन

पे. जो हल्का कठोर था और काले चने जितना था. अर्जुन ने उसको अपने अंगूठे और एक ऊँगली से पकड़ कर

सहलाना शुरू किआ तोह वह धीरे धीरे सख्त होने लगा. और उसको महसूस हुआ जैसे दीदी का पूरा स्तन

और कठोर हो रहा हो. मजे की इंतिहा में उसकी कमर भी हलकी चलने लगी. कमीज कमर से काफी ऊपर आ चूका

था. अर्जुन ने हिम्मत से उसको और ऊपर किआ तोह एक तरफ का वक्ष 2/3 बहार आ गया, चूचक के साथ.

काम के नशे में उसने अपने होंठ लगा दिए माधुरी क चूचक से और लगा उसे होंठो से चुबलाने. कभी आराम

से तोह कभी थोड़ा अंदर खींच के. कमर अभी भी गर्शन कर रही थी दीदी की योनि पे. इस नशे में उसने

एक बार तोह जितना मुँह में आ सकता था उतना स्तन पकड़ लिए मुँह से लेकिन यही उसका दांत थोड़ा चूब गया उस

मुलायम स्तन पे और माधुरी की नींद खुल गई. अर्जुन तोह लगा रहा सब कुछ भूलकर अपनी बहिन के निप्पल

चूसने में. बिना दीदी की परवाह किये. माधुरी को एक बार तोह हैरानी हुई लेकिन फिर वो भी चुपचाप लेती

रही मजे.

"देखु तोह सही ये और क्या करता है." माधुरी ने खुद पे काबू किआ और अर्जुन को करने दिए अपना काम

उसकी योनि भी गीली हो चुकी थी लेकिन अर्जुन को अभी इस सब का ज्ञान नहीं था. होता तोह वो कब का चढ़

चूका होता अपनी बड़ी दीदी के ऊपर.

आप अर्जुन ने स्तन से मुँह हटाया और अपने हाथ से उन्हें हल्का दबाते हुए दबा कर घिसने लगा अपने लिंग को

दीदी की गरम योनि पर. थोड़ी जय हे खुमारी में उसने अपना हाथ दीदी के बड़े कूल्हे पे रख कर उन्हें अपने

से और जोर से चिपका लिए. अब तोह माधुरी को अपनी फूली हुई योनि की दरार के बीच में अर्जुन का गरम लिंग

महसूस होने लगा था. उसकी भी सांसें भरी हो चली थी.

"अगर निचे कच्ची न पहनी होती तोह इसने तोह सलवार समेत अंदर दाल देना थे ये डंडा मेरे." मजे में

सोचते हुए माधुरी ने भी अपनी हलकी सी लात चौड़ी कर दी थी. जिसका एहसास तोह अर्जुन को न हुआ लेकिन

अब वह अचे से रगड़ रहा था अपना हथियार अपनी दीदी क kaam-bindu पर. और फिर अर्जुन के शरीर ने झटका

खाया और उसका पूरा पजामा खुद के वीर्य से ख़राब हो गया. और यही पे माधुरी की भी कच्ची गीली हो

कर उसके जिस्म से चिपक चुकी थी.

अर्जुन वह से उठा और दूसरी मंजिल पे अपने कमरे में आ गया. पजामा बदला तोह टाइम देखा. 5:15. मतलब

उसका ये कार्यक्रम 2 घंटे से चल रहा था. रनिंग शूज पहन बिना कुछ बोले वह निकल गया दौड़ लगाने.

और रोमांचक अनुभव के बाद माधुरी डूब गई गहरी नींद में.

देखते हे क्या करवट लेगा अर्जुन की किस्मत का सितारा अगले अध्याय में. नमस्कार.
 
अपडेट 7

दीदी का कॉलेज


आज अर्जुन का दिल नहीं किआ ज्यादा दौड़ लगाने का. वो 3 कम तक दौड़ लगाने के बाद अगले सेक्टर में बने एक

पार्क में बैठ गया एक पेड़ के निचे. यहाँ बड़ा सकूं सा था क्योंकि इस जगह अभी ज्यादा घर नहीं बने थे.

और हर तरफ ाची खासी हरियाली और खली सड़क थी. हलके पीले और सफ़ेद फूल हर तरफ बिखरे थे.

सड़क के

तोह दोनों तरफ एक चौड़ी पट्टी स बानी हुई थी इन फूलो से और ऐसा हे हाल था कुछ पार्क के अंदर.

जाती हुई सर्दिया, एकदम शांत वातावरण और दूर दूर तक कोई नहीं था वह. अर्जुन भी कुछ पल के लिए खो

सा गया था इस आलोकिक दृश्य में लेकिन फिर भी उस के दिल की किसी कोने में एक बेचैनी भी थी.

"आज जो भी हुआ वो नहीं होना चाहिए था. माधुरी दीदी मेरे बारे में क्या सोचेंगी? और कही उन्हें पता

लग गया और उन्होंने घर पे किसी को बता डीओ तोह?" खुद से उलझा हुआ वो मैं में ये सब सोच रहा था.

"आगे से ध्यान दूंगा के मई हर हाल में खुद को नियंत्रण में राखु. और अगर दीदी ने गुस्सा किआ तोह पूरी

कोशिश करूँगा के उन्हें मन लू के वो मुझे माफ़ कर दे. लेकिन कितना हसीं चेहरा है न माधुरी दीदी का

इतना खूबसूरत भी कोई कैसे हो सकता है?", जैसे हे उसका ध्यान फिर से भटकने लगा, अर्जुन अपनी जगह से

खड़ा हुआ और चल दिए वापिस घर की तरफ. 6 बजे वो घर के बहार वाले आँगन में खड़ा था जहा उसके दादा

जी जमीन पर दरी पर बैठ कर अख़बार पढ़ रहे थे.

"आ गया मेरा शेर? लगता है आज कुछ ज्यादा हे थक गया है. 2 दिन का अंतराल हो गया था बीटा तेरे नियम

में.", कहते हुए रामेश्वर जी ने उसको अपने पास हे निचे बिठाया और अर्जुन वही बैठ के अपने जूते खोलने लगा.

"रुक बीटा मई बस तुलसी में जल अर्पण कर दू फिर देती हु तुझे दूध. इतने तू अपनी साँसे दुरुस्त कर." कौशल्या

देवी हाथ में ताम्बे का लौटा लिए बगीचे में जाते हुए ये बात कहती गई.

रामेश्वर जी और कौशल्या देवी अपने नियम के बड़े पक्के थे. 5:30 बजे तक दोनों नाहा धो कर पूजा पथ से भी

फारिग हो जाते थे. आज सोमवार था तोह कौशल्या जी की पूजा थोड़ी ज्यादा लम्बी चली थी.

वह वापिस आई तोह देखा उनका पोता सिर्फ अपने पाजामे में बैठा था और पसीना सूखा रहा था. उनके पतिदेव एक

कटोरी में सरसों का तेल दाल रहे थे पास में राखी शीशी से.

"चल अपने पंजे यहाँ कर.", बोलकर रामेश्वर जी ने अर्जुन का बाय पंजा एक हाथ से पकड़ लिए और दूसरे हाथ

से उसके तलवे और उंगलियों पर तेल मसलने लगे.

मई खुद कर लूंगा बाबा. आप रहने दे", अर्जुन बोलै लेकिन पंडित जी तोह लगे रहे और इतने दोनों पंजो को मलते

रहे जितने उनकी बीवी दूध न ले आई एक लौटा भर के.

"तेरे हाथ देखे है कभी? कितने नाजुक है. इनसे तू कैसे रगड़ सकता है अपने पंजे? और मेरे हाथ देख जरा"

बोलते हुए पंडित जी ने जैसा हे अपना हाथ रखा अर्जुन की हथेली पे तोह अर्जुन भी हैरान हो गया. उनके हाथ

पत्थर जैसे सख्त थे और उंगलिअ भी मोती थी. और जब उसने अपने हे हाथ को देखा तोह वह तोह बिलुल एक आम

नरम हाथ था. लम्बाई जरूर अपने दादा के हाथ से एक इंच ज्यादा थी लेकिन दादा जी का हाथ उसको इतना भरी लग

रहा था जैसे कोई 2 किल्लो का बाटता हो.

"बड़े हे भारी और सख्त हाथ है दादा जी आपके. ऐसे कैसे?"

"इन्होने किआ हे क्या है साड़ी ज़िन्दगी सिवाए चोर मुजरिमो की ठुकाई करने के और कसरत करने के. ये तोह अब

थोड़ा पूजा पथ करने लगे. और अभी भी तोह बगीचे में kassi-khurpi चलने से नहीं हैट ते." तंजीअ लहजे

में कौशल्या देवी ने कहा अर्जुन को दूध का गिलास देते हुए. और वही पंडित जी मुस्कुराये जा रहे थे.

ऐसी मीठी nok-jhonk इन दोनों में उम्र के इस पड़ाव में भी बानी हुई थी. जिसे अर्जुन रोज हे देखता था और

मुस्कुराता था. आज भी वो जब ऐसा कर रहा था तोह उसकी दादी जी उठ कड़ी हुई वह से शर्म और हलके

गुस्से से पंडित जी को देखते हुए. और एक बार फिर दोनों दादा पोता हंस दिए.

दूध ख़तम कर अर्जुन ने phool-paudho को पानी दिया बहार हे लगे रबर के पाइप से. फिर आँगन में रस्सी

पे लटके अपने तौलिये को ले घुस गया वही बने बाथरूम में. 20 मिनट बाद दूसरी मंजिल पे अपने कमरे में

वो कपडे पहन चूका था. समय देखा तोह 7:30 और उसने अपने भैया संजीव को उठाया. ये रोज का हे काम था.

भैया को उठा के वो पिछली सीढ़ियों से निचे आया और सीधा अपनी माँ रेखा जी से मिला. अपनी के पाँव छुए

और माँ ने भी उसके माथे को चूम वही बिठा लिए उसको रसोई में. और अपने हाथ से एक प्लेट लगाई और

गरमा गरम परांठे मक्खन और लस्सी के साथ दिए.

अर्जुन रोज सुबह अपनी माँ के पास हे बैठ खर नाश्ता करता था. यही वो समय होता था जब वो अपनी माँ से

बातें करता था. ललिता जी भी अपने पतिदेव के लिए खाना लगा रही थी और कोमल अपने ताऊजी और भैया

का टिफ़िन लगा रही थी.

"इतना बड़ा हो गया है और आज भी अपनी माँ के पल्लू में घुसा रहता है." ये आवाज थी ऋतू की जो हाथ में

चाय का कप लिए अंदर आई. एक सफ़ेद टॉप और हल्का नीला पजामा पहना था उसने. एकदम किसी सफ़ेद गुलाब स

दिखती थी वह.

"है तोह ये तोह है हे मेरा छोटा सा मुन्ना." माँ ने ये कहते हुए स्नेह से एक बार अर्जुन के सर पे हाथ फिराया

और वापिस लग गई रोटी बेलने में. और अर्जुन ने भी शोखी से बोलै, "दीदी आपको जलन होती है क्या माँ के

मुझे इतना प्यार करने से?"

"6 फुट का लम्बा पेड़ जैसा हो गया है और माँ अभी भी इसको मुन्ना बोलती है. वैसे बात तोह सही है दिमाग

तोह नीरा हे जड़ है." हंसती हुई वह निकल गई बहार और इन दोनों की ये हंसी ठिठोली देख ललिता जी और

रेखा दोनों मुस्कुराने लगी. लेकिन अर्जुन का ध्यान तोह बहार जाती हुई ऋतू की तरफ जम्म गया था. उसका

पजामा जो फंसा हुआ था नितम्भो की दरार में. किसी हीरानी के जैसे पल भर में आँखों से ओझल हो गई

तोह अर्जुन भी कुछ सोचता खड़ा हो गया था अपनी जगह से.

"ताई जी अलका दीदी कहा है? वो आज उनके कॉलेज जाना है न तोह मई हे लेके जाऊंगा उनको." ये बोलते हुए

उसने अपनी ताई जी पर निगाह डाली.

"जा बुला ले उसको. वो राजकुमारी तोह अपने कमरे में हे है एक घंटे से. पता नहीं कितना श्रृंगार करेगी."

"Thak-Thak", अर्जुन ने Alka/Maadhuri दीदी के कमरे का दरवाजा बहार से हे बजाय.

"कौन है?"

"दीदी, तैयार हो गई हो तोह चलो फिर कॉलेज. बाद में मुझे भी ताऊ जी के साथ मार्किट जाना है." अर्जुन

बहार से हे चिल्लाया.

"आ गई बाबा. और वैसे भी दरवाजा खुला हे है. चल अंदर आजा मई इतने अपनी प्रैक्टिकल फाइल्स ले लू."

बोलते हुए अलका खुद को आईने के सामने निहार रही थी और तभी अर्जुन भी अंदर आ गया. जहा उसका स्वागत

इस मनमोहक दृश्य ने किआ. 5'9" लम्बी अलका ने एक नीला पंजाबी सूट और सफ़ेद पजामी पहनी हुई थी. कमीज

पूरी तरह से उसके शरीर से चिपका हुआ था. जहा उसके वक्ष पूरा सर उठाये थे वही कमीज के निचले

हिस्से पे उसके बाहर को निकले कूल्हे अलग हे केहर बरपा रहे थे. अर्जुन की तोह सांस हे अटक गई ये देख

कर. उसका ध्यान जब टूटा जब उसकी बहिन ने अपनी कमर तक आती छोटी को सही किआ और दुपट्टा लेते हुए

बोली, "क्या हुआ तुझे? तेरी सेहत तोह ठीक है जो चुपचाप खड़ा है?"

"हाँ.. है मुझे क्या होना है? बिलकुल फिट खड़ा हु आपके सामने. लेकिन आप तोह दीदी एकदम अप्सरा लग रही हो"

आज पहली बार उसके मुँह से अपनी किसी बहिन के लिए तारीफ के शब्द निकले थे और उसको खुद नहीं पता था

के उसने क्या कहा है. अलका थी हे इतनी हसीं. पतली कमर, पहाड़ जैसी छातियां, उभरे गोलाकार नितम्भ,

लाल सुर्ख होंठ, कमर तक लम्बे भूरे बाल और बड़ी बड़ी भूरी आँखें. यु तोह अर्जुन के चारो हे

बहाने नायाब हुस्न से भरी हुई थी लेकिन एक अलका हे थी जो सब पे भरी थी.

"चल चल जल्दी यहाँ से. कॉलेज को लेट हो रहे है. बाद में कर लेना तारीफ मेरी." थोड़ा रॉब से बोलते हुए

उसने अपने फाइल उठाई तोह अर्जुन सेहम सा गया और बहार की तरफ चल दिए. वही अलका भी मुँह निचे कर मंद

मंद मुस्कुरा रही थी इस अपने छोटे भाई पे.

"दीदी आप ध्यान से बैठना. कही गद्दा वड्डा आया तोह गिर जाओ." अर्जुन जो स्कूटर स्टार्ट कर चूका था अपनी

बहिन अलका से बोलै जब वह बैठने लगी. ये लम्बी सीट वाला लमल स्कूटर था, जिसपे अलका अपने दोनों पेअर एक

हे तरफ कर बैठ चुकी थी. उसने एक हाथ में अपनी फाइल्स और छोटा सा पर्स पकड़ा हुआ था. और दूसरा हाथ

अर्जुन के दाए कंधे पे था. दुपट्टा अब उसके सर के ऊपर से आता हुआ सीने को ढके हुए था. शायद ये भी

एक संस्कार का हे हिस्सा था के घर की कोई भी लड़की बिना सर ढके घर से बहार नहीं निकलती थी.

"बस तू स्कूटर चलने पे ध्यान दे भाई. मई गिरी तोह तुझे भी ले गिरूँगी." खिलखिलाती हुई अलका बोली और

वो दोनों निकल दिए वीमेन कॉलेज की तरफ. ये कोई 4-5 कम था घर से और शहर के सुरक्षित हिस्से में था.

इस कॉलेज का आस पास के कही शहरों में नाम था क्योंकि यहाँ लगभग सभी विषय उपलब्ध थे. और पुलिस

चेक पोस्ट भी थे कॉलेज में दाखिल होने वाले सभी रास्तो पर, बेलगाम मजनुओं की खैर खबर लेने के लिए.

कॉलेज से थोड़ी दूर पहले हे सड़क कुछ ज्यादा हे टूटी हुई थी. शयद कुछ निर्माण चल रहा था वह तोह

स्कूटर ने हलके से झटके खाये. अलका ने अपनेक हाथ से अर्जुन की कमर को कास कर पकड़ लिए. अब उसका एक साइड

को पूरा स्तन अर्जुन की पीठ से चिपका हुआ तोह और वह तोह मजे में हे आ गया अपनी बहिन के इस तरह चिपकने

से.

"ध्यान से चला छोटे यहाँ थोड़ी ज्यादा हे सड़क खराब है." बोलते हुए अलका ने खुद को और आगे कर लिए

बार बार छोटे गधे के आने से अब उसकी पीठ पे अलका दीदी के लगभग दोनों हे नारियल घिस रहे थे.

न चाहते हुए भी अर्जुन के शरीर में कम्पन्न होने लगी थी. ऐसे हे मजे के दौर से होते हुए वह कब कॉलेज

के गेट के सामने पहोच गए पता हे नहीं चला. और जब अर्जुन ने ब्रेक लगाईं तब जाकर अलका का ध्यान

टूटा. वो अभी तक अपने छोटे भाई की पीठ से चिपकी हुई थी.

"चलो दीदी आप जाओ, मई यही बहार आपका इन्तजार करता हु." अर्जुन ने कॉलेज की दिवार क साथ स्कूटर का

स्टैंड लगते हुआ कहा.

"बड़ा आया इन्तजार करने वाला. सीढ़ी तरह चल मेरे साथ अंदर और है मेरी सहेलिया भी होंगी वह तोह

थोड़ा ाचे बचे जैसा व्यहवहार करना." बोलकर उसने अर्जुन का हाथ पकड़ा और ले गई उसको खींचते हुए

कॉलेज के अंदर. वैसे तोह ये महिला महाविद्याला था लेकिन यहाँ पे पढ़ने वाली लड़कियों के सम्बन्धी भी

अंदर आ जा सकते थे. बिल्डिंग के प्रवेश द्वार पे हे अलका ने सुरक्षाकर्मी को अर्जुन की एंट्री करवाई अपने

भाई के नाम से और वो दोनों चल दिए अंदर. अर्जुन तोह आज पहली हे बार किसी कॉलेज में आया था. एक बार

पहले वो कॉलेज तक आया जरूर था लेकिन बहार से ऋतू को लेकर चला गया था. आज जब वह यहाँ अंदर

आया तोह हैरान हे रह गया. हर तरफ सिर्फ लड़कियां हे लड़कियां थी और यहाँ कोई 10 बिल्डिंग थी जो एक

दूसरे से थोड़ी दूर दूर थी. सभी अलग अलग विषय के हिसाब से थी. और चहल पहल भी सिर्फ 2 बिल्डिंग्स

में हे थी. एक तोह जहा वह अभी आये थे. और एक उनसे कुछ हे दूरी पे थी. जहा हर तरफ हस्सेनाओ के झुण्ड

खड़े थे.

"चल पहले एकाउंट्स डिपार्टमेंट का काम निपटा लेते है." अलका की आवाज से अर्जुन का ध्यान वापिस अपनी बड़ी

बहिन पर आया जो अभी तक उसका हाथ थामे थी. यहाँ खुली रौशनी में कड़ी वह पूरे कॉलेज की लड़कियों

को पानी भरने पे मजबूर किये थी. अर्जुन को खुद पे गर्व महसूस हो रहा था जब उसने आसपास देखा के

कई जोड़े आँखों के उन्ही दोनों को देख रहे है. अलका उनकी परवाह किये बिना अर्जुन को लेकर चल दी वही पास

में बने गलियारे में जहा हर दरवाजे के बाहर एक तख्ती लगी थी. 3 कमरों के बाद आया "एकाउंट्स & एडमिशन"

का कमरा. वह कुछ ज्यादा भीड़ नहीं थी क्योनी कॉलेज 8 बजे शुरू हो जाता था और आज जायदातर स्टूडेंट्स का

अवकाश था. अलका का खिड़की पे 6 नंबर था. उन्हें यहाँ 10-15 मिनट तोह लगने हे थे. अर्जुन ने ये देख बात

शुरुआत की.

"दीदी अपनी फाइल आप मुझे पकड़ा दीजिये.", उसने अपना हाथ फाइल्स पर रखते हुआ कहा

अलका ने शुन्य भाव से देखते हुए अपनी फाइल उसको थमा दी. और अर्जुन भी समझ गया के कुछ तोह हुआ है.

अलका ने उसके मैं को भांप लिए और उसके करीब आकर धीमे से कान में बोली, "यहाँ तू मुझे दीदी मत बोल.

सिर्फ अलका बोल या कुछ भी." अर्जुन तोह अपनी दीदी की साँसों की गर्मी से सुन्न हो गया था जो सीधा उसके कान

की लौ पर महसूस हुई. वो कुछ न बोलै और सिर्फ अलका को ऊपर से निचे एक बार देखा और फिर यहाँ वह देखने

लगा. अलका अपने भाई की इस ऐडा पर मुस्कुरा उठी और उसने भी अपना ध्यान सामने की तरफ कर दिए.

"तू कब आई अलका? और ये जनाब कौन है?" एक बड़ी हे सुरीली आवाज पड़ी अर्जुन के कान में तोह उसने देखा के

2 लड़कीअ उसके और अलका दीदी के पास कड़ी है. और जिसकी ये आवाज थी वह एक माध्यम से कद की बेहद गोरी

लड़की थी. एकदम फक्क सफ़ेद सी उस लड़की के कंधे तक तराशे हुए घने खुले बाल थे और उसने एक लाल

टॉप और नीला डेनिम पेण्ट पहना हुआ था. और साथ में जो लड़की थी वो थोड़ी सांवली सी लेकिन भरे हुए शरीर

वाली थी. उसने एक चटख कला कमीज और सलवार पहना था. जहा उस गोरी की छोटी छोटी भूरी आँखें थी,

इस सांवली से लड़की की कुछ ज्यादा हे बड़ी और काली थी. फिर अर्जुन ने संकोचवश नजरे खिड़की की तरफ कर

ली लेकिन कान उन्ही की तरफ थे.

"अर्जुन, इन से मिलो ये है आशा नेगी (गोरी) और ये है नुसरत खान. दोनों हे मेरी क्लास्स्मेटिस और पक्की दोस्त है."

अलका ने जब ये कहा तोह अर्जुन ने अपने दोनों हाथ जोड़ उनका अभिवादन किआ जिसे देख दोनों हंस पड़ी.

"अरे अरे.. ये क्या कर रहे हो? क्या हम दोनों तुम्हे ॉँतिअ लगती है जो हाथ जोड़ रहे हो." ये बात कही थी

नुसरत ने और अपना हाथ आगे कर दिए.

"मेरा वह मतलब नहीं था." झेंपते हुए अर्जुन ने भी हलके से अपना हाथ आगे बढ़ा लिए तो दोनों सुंदरियों ने

बारी बारी से उसका हाथ भींच लिए. "ये हुई न बात." कह दोनों हे उसको ऊपर से निचे देखने लगी.

इधर अलका का नंबर आ गया था तोह वह अपना काम करने लगी गई. यहाँ अर्जुन फंस गया था इन 2 बेबाक लड़किओं

में.

"तोह मर. अर्जुन क्या करते हो तुम?" ये सवाल किआ थे आशा ने, सीधा अर्जुन के चेहरे को देखते हुए.

"जी अभी तोह एक्साम्स दिए है और कुछ हे दिनों में स्पोर्ट्स अकादमी ज्वाइन करूँगा. 10 अप्रैल वापिस पढ़ाई और कोचिंग"

उसने झेंपते हुए जवाब दिए. अर्जुन ज्यादा हे शर्मा रहा था क्योंकि वो दोनों कुछ ज्यादा हे खुलकर उसे ताड़ रही थी.

"ओह तभी इतना लम्बे चौड़े हो. मतलब सिर्फ पढ़ाई और कसरत. कोई और खेल भी खेला है क्या कभी?" आशा के इतना

बोलते हे नुसरत भी खिलखिला के हंस पड़ी. लेकिन तब तक अलका का भी काम हो गया था.

"क्यों सत्ता रही हो मेरे अर्जुन को तुम दोनों मिलकर? ये बिलुल शरीफ और प्यारा लड़का है." बड़ी ऐडा से अलका ने उसका

बाजू अपने दोनों हाथो से थाम लिए.

"तोह हमे भी एक मौका दे इसका प्यार देखने का. फिर पता चलेगा कितना शरीफ है.?" इस बात पे तीनो लड़कीअ हंस

पड़ी. और अलका ने कुछ सोच कर बोलै, "चल यार एक बार प्रैक्टिकल फाइल्स सबमिट करवा देते है फिर कैंटीन में बात

करेंगे. और अर्जुन हम तीनो अभी वापिस आ जाएँगी तब तक तू यही रहना. हमारा डिपार्टमेंट सामने वाला हे है."

ये बोलकर वह तीनो निकल गई और अर्जुन को पीछे छोड़ गई हतप्रभ सा. जो अभी तक यही सोच रहा था के सीढ़ी

दिखने वाली ये लड़कीअ कितना बोलती है. और अलका दीदी ने उसको क्यों मन किआ दीदी बोलने से? फिर अपने विचार वही

ख़तम कर वो इधर उधर टहलने लगा. बिल्डिंग की सब तरफ अशोक, सफेदे और आम के पेड़ लगे थे. हर ब्लॉक में

छोटे छोटे पार्क बने थे जहा बेंच भी लगे थे और ाची घांस भी थी, बिलकुल सलीके से कटी हु. यही टहलता

हुआ वह एक बेंच पे बैठ गया और पार्क में बैठी हुई लड़कीओ को देखने लगा. हर तरफ कई ग्रुप थे और सभी अपने

आप में लगी हुई थी.

"ऐ लड़के तुम यहाँ क्या कर रहे हो?", अर्जुन का ध्यान उसके बिलुल पीछे से आई जोरदार आवाज की तरफ गया तोह उसने

देखा एक 40-42 साल की महिला बेहद हे सलीके से पहनी क्रीम कलर की साडी में कड़ी थी. आँखों पे काले पतले

फ्रेम का चस्मा था और खुले बाल.

"जी मई यहाँ मिस अलका शर्मा के साथ आया हु. वह अभी अपने फाइल्स सबमिट करवाने गई है. B.Sc ईस्ट ईयर के ब्लॉक में."

अर्जुन ने हलकी घबराहट में खड़े होते हुए जवाब दिए. उसको एहसास हो गया था के ये एक टीचर है

और अर्जुन को ऐसे सावधान की मुद्रा में खड़े देख उन मैडम का लहजा थोड़ा नर्म हुआ लेकिन अनुशाषित स्वर में उसने कहा

"ठीक है ठीक है. लेकिन ज्यादा इधर उधर मत जाना. ये गर्ल्स कॉलेज है तोह यहाँ लड़के अल्लोवेद नहीं है."

"जी फिर मई बहार हे खड़ा हो जाऊंगा."

अर्जुन की मासूमियत देख वो मैडम भी मुस्कुरा दी और बोली, "बीटा ऐसी कोई बात नहीं है. तुम शरीफ हो और उम्र भी

ज्यादा नहीं लगती तुम्हारी. वो तोह मई इसलिए कह रही थी की यहाँ का माहोल थोड़ा खराब है. तुम्हारी सावधानी के लिए

मैंने ऐसा कहा. तुम यही आराम से बैठो." मैडम के इतना कहते हे वो वापिस बेंच पर बैठ गया. और तभी वही पे अलका

भी आ गई अपनी दोनों सहेलियों के साथ.

"गुड मॉर्निंग मम. हम तीनो ने आपके सब्जेक्ट्स की प्रैक्टिकल फाइल भी लैब असिस्टेंट को सबमिट करवा दी है. प्लीज थोड़ा

रेहम करना." अलका ने शोखी से ये बात कही तोह उन मैडम ने उसका कान हलके से खींचते हुए कहा, "तुझपे तोह बिलुल

भी रेहम नहीं होगा. लेकिन मुझे पता है मेरी लाड़ली हे टॉप करेगी." इतना कहकर उन्होंने अलका के सर पे हाथ फेरा और

फिर बोली, "क्या अलका इस मासूम से लड़के को तू यहाँ बिठा गई? और तुम दोनों भी तोह थी काम से काम एक तोह इसके पास रह

हे सकता था. तुम्हे तोह पता हे है डेंटल डिपार्टमेंट का हाल."

"सॉरी मम, जल्दी में ध्यान हे नहीं रहा." तीनो ने कान पकडे तोह मैडम ने हँसते हुए विदा ली वह से.

"क्या कह रही थी गुप्ता मैडम अर्जुन?" अलका ने पुछा अर्जुन से लेकिन जवाब मिला आशा से

"और क्या कहेगी दिल आ गया होगा उनका इस्पे. वैसे भी तोह hatt-katta है ये." और फिर हंसी की आवाज गूँज उठी.

"ाचा अब बहुत हुआ तुम दोनों अब कोई मजाक नहीं करोगी." ये बात जब अलका ने कही तोह उसकी आवाज नार्मल लेकिन 2 टूक थी.

और उन दोनों ने भी हाँ में सर हिला दिए. "चल अब थोड़ी देर कैंटीन में चलते है फिर मुझे वापिस भी जाना है और अर्जुन

को भी काम है." बोलकर अलका अर्जुन का हाथ थाम के चल दी पार्क के दूसरी तरफ जहा तीन की चद्दर से ढंकी एक

लम्बी कैंटीन बानी हुई थी. वो दोनों भी साथ चल दी.

कैंटीन का वातावरण भी ऊर्जा से भरपूर था. आमने सामने लगी कुर्सी टेबल्स पर बैठी लड़कीओ का शोर, खाना पीना

और गुप्षुप हो रही थी. ये चारो भी कोने की एक टेबल पकड़ के बैठ गए. अलका ने सबसे पुछा खाने का तोह जहा

नुसरत और आशा ने कोला की फरमाइश राखी, अलका ने कोल्ड कॉफ़ी की. अर्जुन काउंटर पे गया और वह से 2 कोला, एक कोल्ड

कॉफ़ी और अपने लिए ऑरेंज जूस लेकर ट्रे सहित टेबल पे आ गया. उसको हर महीने जेबखर्ची मिलती थी जिसे वह जमा

रखता था. संजीव भैया से 200, 500 दादा जी की पेंशन से, 300 अपने पिता शंकर जी से और 300 हे अपने ताऊजी से. आज

भी वह घर से निकलते हुए 1500 रुपये पर्स में लेके आया था क्योंकि ये शंकर जी की हिदायत थी की अगर कभी मार्किट

जाना हो या स्कूटर से जा रहे हो तोह अपनी जेब में हमेशा कुछ रकम रखनी चाहिए. यहाँ तोह बिल भी कुछ खास नहीं आया

था सिर्फ 60 रुपये.

"तोह आज की ट्रीट अलका के बॉयफ्रेंड की तरफ से है? मुझे तोह लगा था के ये अलका देगी अपने आने वाले जन्मदिन की. क्योंकि

परसो तोह छुट्टी है." नुसरत ने इतना कहा तोह अर्जुन और अलका एक दूसरे को देखने लगे, जो एक दूसरे की विपरीत दिशा में बैठे

थे.

आशा, जो अर्जुन के साथ बैठी थी उसने बात को और बढ़ाते हुए कहा, "अर्जुन जी, इस से काम नहीं चलेगा. हमे तोह पार्टी

चाहिए. अभी इस से काम चला रहे है लेकिन एक्साम्स के बाद हमे अपनी मर्जी की पार्टी देनी पड़ेगी. नहीं तोह भूल जाओ अलका

को." और दोनों लड़कियों ने आपस में ताली मारी. यहाँ अर्जुन झेंप रहा था और उसका गाला खुश्क हो गया था ये सुनकर की

दीदी ने अपनी सहेलियों को उसे अपना बॉयफ्रेंड बताया है.. "अरे बस भी करो अब. और ले लेना पार्टी जैसी मर्जी. क्या याद

करोगी किसी दिलदार से पला पड़ा है." ये बात अलका ने अर्जुन की तरफ स्माइल करते कही थी जिसे सुनकर एक बार फिर अर्जुन

को झटका लगा. उसका जूस गले में हे अटक गया था. "ये सब क्या हो रहा है मेरे साथ. और दीदी भी" बस यही सोच रहा

था वह के तीनो उठ कड़ी हुई. उसने देखा तोह उसका गिलास भी खली हो चूका था.

"ाचा तोह अब हम निकलते है. टाइम भी हो गया है काफी. एक्साम्स में मिलते है नहीं तोह टेलीफोन पर बात हो हे जाएगी."

अलका ने कहा और उन दोनों ने अलका और अर्जुन से हाथ मिलाया. हाथ मिलते हुए नरगिस ने अर्जुन की हथेली सेहला दी और

नजदीक आकर कहा , "तुम भी फ़ोन कर सकते हो. अलका की कॉलेज डायरी के पीछे नंबर है मेरे घर का. रात में अकेली

हे होती हु मई."

अर्जुन तोह बेचारा पानी पानी हो गया था ये सुन कर. वह तोह ाचा हुआ अलका ने उसका हाथ खींचा और चल दिए गेट की

तरफ. दोनों बिलकुल किसी प्रेमी जोड़े की तरह चल रहे थे. जहाँ अर्जुन सीधा चल रहा था वही अलका ने उसके ब्याह को थाम

रखा था. बहार आये तोह एक बार फिर अलका ने सर पे दुपट्टा लिए और अर्जुन के पीछे बैठ गई.

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"भाई तुझे बुरा तोह नहीं लगा आज जिस तरह से मैंने तुझे मिलवाया अपनी फ्रेंड्स से?" स्कूटर के चलते हे अलका ने अर्जुन

के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा. अब वो बड़े हे आराम से उस से चिपक कर बैठी थी.

"देख भाई हमारी दुनिया कुछ ज्यादा बड़ी नहीं है. घर के काम, कॉलेज और घर. बस यही दुनिया है. और वो दोनों भी

बढ़ी ाची लकड़ियां है. है आपस में सब मजाक चलता है लेकिन किसी का भी चरित्र खराब नहीं है." उसने अपनी बात

बधाई.

अर्जुन भी यही सोच रहा था के उसकी चारों दीदी को कितनी थोड़ी सी आज़ादी तोह मिलती है. कही कोई दोस्त नहीं न कही आना

जाना. वो तोह फिर भी घूम लेता है, भैया के साथ बहार चला जाता है. जो भी करना चाहता है उसके दादा जी उसका साथ

देते है. बिना मांगे उसको इतना जेबखर्च और सुख मिलता है. दीदी लोग तोह हर चीज पर निर्भर करती है. कितनी अजीब

है इनकी जिंदगी. लड़की होने का मतलब इतनी बेड़िया, इतनी बंदिगी. पता नहीं उसको क्या सूझा और उसने स्कूटर घूमा दिए

मॉडल टाउन मार्किट की तरफ. जहा बड़े बड़े शोरूम और खाने पिने की ाची मार्किट थी.

"ये हम कहा जा रहे है? ये रास्ता तोह घर की तरफ नहीं जाता भाई? और तू किसी बात का जवाब क्यों नहीं दे रहा?" अलका ने

घबराहट में कई सवाल कर दिए लेकिन अर्जुन बस हल्का हल्का मुस्कुरा रहा था. और 5 मिनट बाद वो दोनों खड़े थे एक बड़े

शोरूम के सामने.

"चलो आप मेरे साथ आओ यहाँ." इतना कहकर अर्जुन ने अलका का हाथ पकड़ा और चल दिए उस शोरूम के अंदर. अलका हैरान होते

हुए खींची चली गई.

"एक ाचा सा girl's टॉप दिखाए जरा." अर्जुन ने काउंटर पे खड़े लड़के से कहा तोह अलका का ध्यान गया. हर तरफ रंग बिरंगे

टॉप्स, तशीरतस, सूट लगे थे. ऐसा नहीं था के रामेश्वर जी के बचो को ाचे कपडे नहीं मिलते थे. लेकिन ज्यादातर सलवार

कमीज, त्यौहार पे साड़ी वैगेरह हे होते थे. बेशक वह महंगे होते थे लेकिन कुछ ज्यादा खुलापन नहीं था. रात के टाइम

या घर में जरूर लड़कियां tshirt/kameej और पजामा पहन लेती थी. लेकिन चुस्त जीन्स, छोटे टॉप्स ऐसा कुछ नहीं मिलता था.

यहाँ अर्जुन ने अपनी मर्जी से 2-3 टॉप सेलेक्ट किये तोह काउंटर वाले लड़के ने एक असिस्टेंट लड़की को बुलाया.

"मम, क्या साइज आता है आपको?" उस लड़की ने पुछा अलका से तोह घबराहट में अलका ने जवाब दिए 36-डी और वह लड़की थोड़ा

हंस दी. "मम मेरा मतला है के लार्ज, मध्यम या स्माल. "

"पता नहीं." अलका ने झिझकते हुए कहा तोह वह लड़की माप लेने वाला फीता लेके बहार आई और अलका के कंधे और छाती

का नाप लेने लगी. "मुझे लगता है आपको 'ल' साइज आएगा. फिट न हो तोह हम बदल देंगे."

इतना कहकर उसने अर्जुन के पसंद किये टॉप्स के 'ल' साइज निकलवाए और अलका को दिखने लगी. "मम पसंद कीजिये."

अर्जुन भी यहाँ अलका की हेल्प करने लगा क्योंकि उसके पास तशीरतस का अम्बार लगा था घर पे.

अलका को एक हल्का गुलाबी टॉप पसंद आया लेकिन इसका गाला थोड़ा ढीला और कमर पे इलास्टिक था. उसके ऊपर कपड़ो की कतरन

लटक रही थी और दोनों कंधो पे कट थे.

"ये वाला पैक कर दीजिये." अर्जुन ने बिना अलका को देखे वह टॉप पैक करवा दिया. "और एक जीन्स भी दिखा दीजिये इनके लिए"

लड़की ने फिर से अलका का माप लिए. "राजू 28 वैस्ट की जीन्स लाना." उस लड़की ने बोलै तोह अर्जुन को पता लगा की अलका दीदी की

कमर 28 है. एक गहरी नीली स्किन फिट जीन्स अर्जुन ने पसंद की और उसको पैक करवा लिए.

"कितना हुआ?" अर्जुन ने मुख्या काउंटर पे पुछा तोह अलका अपना पर्स खोलने लगी.

"1150/-" और अर्जुन ने 1200 रुपये काउंटर पे दे दिए और बैग और छूटता वापिस लेकर बहार आ गया.

"ये सब क्या था अर्जुन?" अलका थोड़ा नाराजगी से बोली

"अब अपनी इतनी खूबसूरत गर्लफ्रेंड के बर्थडे के लिए कुछ तोह प्रेजेंट लेना हे चाइये या नहीं.?" अर्जुन ने जरा मजाक

में ये बात कही तोह अलका का गुलाबी चेहरा एकदम लाल हो चूका था. उसके मुँह से कोई बोल न निकला. ये देख पहली बार अर्जुन

के दिल की धड़कन कुछ अलग सी धड़कती महसूस हुई. जैसे ये मुस्कराहट दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज उसने देखि हो.

प्यार से दीदी के गाल पे हाथ रखते हुए उसने कहा, "चले घर या अभी आपने कुछ और भी लेना है."

"नहीं. चल घर चलते है देख एक बज चूका है." इतना कहते हुए भी अलका का सर निचे था और पेअर की उंगलिअ सैंडिल

को कुरेद रही थी. वो शर्माती हुई सी अर्जुन के पीछे बैठ गई और अर्जुन ने स्कूटर आगे बढ़ा दिए. अब वह बड़े हे आराम

से स्कूटर चला रहा था.

"वैसे दीदी एक बात पुछु? बुरा नहीं मानोगी तोह हे पूछूंगा." अर्जुन ने कुछ सोचते हुए बोलै

"है तेरी बात का बुरा क्यों मानूंगी? पूछ."

"दीदी ये 36-डी क्या मतलब हुआ? जब आपने उस शोरूम वाली लड़की को बोलै तोह मुस्कुराई भी थी."

"इसका कोई मतलब नहीं होता. और मुझे क्या पता वह क्यों मुस्कुरा रही थी." अब तोह अलका का चेहरा लाल भी था और पसीने से

भीग भी गया था.

"कोई बात नहीं. नहीं बताना तोह सीधा मन कर दो. मई नहीं पूछता." इतना बोल अर्जुन चुपचाप स्कूटर चलने लगा. स्पीड

भी थोड़ी तेज़ हो गई थी..

2 मिनट भी अलका को किसी कांटे से चुभ रहे थे तोह वह खुद हे बोल पड़ी. "मेरा प्यारा भाई नाराज है?"

"नहीं तोह मई किस लिए नाराज होऊंगा?" अर्जुन ने स्पॉट सा जवाब दिए.

"भाई देख ये बात कोई लड़की किसी लड़के से नहीं करती. लेकिन मई तुझे नाराज नहीं देख सकती. ये जो मेरा सीना है ये उसका

माप है 36". अलका ने कांपते होंठो से अपनी बात कही तोह अर्जुन से स्कूटर की स्पीड काम हो गई.

"दीदी ऐसे तोह मेरा भी 42" है. लेकिन ये डी क्या होता है." उसने फिर na-samji में सवाल कर दिए.

"वो.. वो लड़कीअ जो अंदर पहनती है ये उसका साइज होता है." शर्म से अलका अंदर गाड़ी जा रही थी ये बात कहते हुए

"क्या अंदर और ये डी हे क्यों होता है.?"

"देख भाई जो हम लड़कीअ सूट के निचे पहनती है उसको ब्रा बोलते है. और ब्रा का साइज सबका एक जैसा नहीं होता. मेरा डी है.

बस इतना हे है ये." अब तोह अलका की सांसें बहक हे गई थी लेकिन अर्जुन के तोह और सवाल पैदा हो गए.

"मतलब सबका डी क्यों नहीं होता? क्या फरक है इसमें?"

"ाचा अब मई जो बोलूंगी उसके बाद कोई सवाल नहीं करेगा. चुप चाप सुनेगा."

ठीक है दीदी."

"देख मेरा सीना भरी है तोह जो ब्रा का कप साइज मुझे आता है वो डी साइज है. और जो मेरे सीने की सरकमफ्रेंस है वह

36 इंच है, जैसे तेरी 42 है. लेकिन लड़कीओ का सीना अलग होता है तोह उन्हें उसके आकर के हिसाब से कप लेना पड़ता है.

ा सबसे छोटा कप होता है, फिर बी, फिर स और ऐसे हे साइज के हिसाब से. ऋतू का 34-स है जो मुझसे छोटा है लेकिन माधुरी

दीदी का 38-फ है क्योंकि उनका हम सब से बड़ा साइज है. अब मिल गए जवाब तोह सीधा घर चल." इतना बोलकर अलका एकदम

शांति से अर्जुन के पीछे चिपक कर बैठी रही. और अर्जुन भी खामोश सा चलता रहा स्कूटर. घर बस थोड़ा हे दूर था

के अर्जुन ने फिर से ये शांति भांग की. "वैसे दीदी आप हो बड़ी खूबसूरत. और आप जैसी लड़की अब मेरी गफ है ये सोच कर

हे दिल झूम रहा है मेरा." उसने ये बात दोनों के बीच फैली गंभीरता को काम करने के हिसाब से कही थी. और ऐसा हुआ भी.

"मई और तेरे जैसे बन्दर की गर्लफ्रेंड. कभी सपना भी मत देखिओ, बड़ा आया बॉयफ्रेंड." बड़ी शोखी से अलका ने ये बात

कही थी लेकिन अंदर हे अंदर उसका दिल जोर से धड़क रहा था. जैसे एक नया अंकुर उगना शुरू हुआ हो उसके दिल में अर्जुन के

नाम का. सुबह जो सब एक मजाक से शुरू हुआ था और फिर अर्जुन का उसकी हर बात मानना, इज़्ज़त देना, बिना गए गिफ्ट दिलाना

और प्यार से उसकी बात समझना. ये सब अलका के दिल में पक्की स्याही से छप्प चूका था. और दोनों घर पहुंच गए. अलका

कपडे वाले बैग लेकर हीरानी से दौड़ती अंदर चली गई और अर्जुन स्कूटर को अंदर खड़ा कर चल दिया घर की बैठक में.

दोपहर के 2 बज गए थे.

"आ गए मेरे सरकार." रामेश्वर जी ने बिना देखे तंज़ किआ क्योंकि बैठक में ऐसे सिर्फ अर्जुन हे आता था.

"बाबा वह दीदी के कॉलेज में टाइम लग गया थोड़ा. सॉरी आगे से नहीं होगा."

रामेश्वर जी अपने पोते के इस जवाब पर मुस्कुरा दिए और सर पे हाथ रख बोले, "अरे बीटा तू तोह मेरा मान है. तू सॉरी

मत बोलै कर किसी बात पे. एक तू हे तोह है जो मेरा ाचा बीटा और मेरा दोस्त है. मई तोह मजाक कर रहा था. तेरा ताऊ

खाना खा रहा है फिर उसके साथ जाकर साइकिल ले आना. जा खाना खा ले."

अर्जुन भी अपने दादा से गले लग कर चल दिया खाने की टेबल पैर.

"आज बड़ा निखार रहा है तू." माधुरी ने जब ये बात कही तोह अर्जुन को रात याद आ गई.

"वो आप मेरा इतना ध्यान जो रखती हो दीदी." बिना संकोच उसने माधुरी की आँखों में देखा तोह पाया के वह भी चमक

रही है.

"रखना तोह पड़ेगा हे. तू भी तोह इतनी सेवा करता है." ये बात बोल वह रहस्यमी मुस्कान दिखा के रोटी लेने चली गई

"दीदी को शायद पता लग गया है रात वाली बात का. लेकिन वह गुस्सा नहीं हुई." अर्जुन ने ये सोचा और फिर उसको जैसे याद

आया अलका का कहा शब्द, "माधुरी दीदी का तोह 38-फ है, सबसे बड़ा." और ये सोचते हे पेंट में हलचल हो गई.

खाना खाने के बाद राजकुमार जी अर्जुन को अपनी कार में लेकर अगले सेक्टर की मार्किट में ले गया. अर्जुन को वह जाते हे हीरो

कंपनी की नै रेंजर और एक पतले टायर वाली साइकिल हॉक नज़र आई.

"अंकल ये साइकिल के टायर इतने पतले क्यों है?" दूकानदार से उसने सवाल किआ. ये साइकिल उसने एक बार कही देखि थी लेकिन

याद नहीं आ रहा था.

"बीटा ये एक अलग साइकिल है जो रेस के काम आती है. और जो लोग साइकिलिंग के शौक़ीन होते है. माहिर लोग तोह इसको 60

की स्पीड पे भी चला लेते है." दूकानदार का जवाब सुनकर उसका दिल आ गया साइकिल पर.

"ताऊ जी यही साइकिल लेनी है मुझे."

"देख ले बीटा. चलनी तुझे है बाद में कुछ मत कहना. और है इसके पीछे तोह कोई बैठ नहीं सख्त." ताऊजी ने जब साइकिल

को ध्यान से देखा तोह ये कहा क्योंकि उसका तोह करियर हे नहीं था.

"मैंने किसे बिठाना है. एक्सरसाइज के लिए तोह चाहिए और इस्पे टाइम भी बचेगा मेरा."

"ठीक है बीटा. तोह भाई साहब इसको ये साइकिल तैयार कर दीजिये और पैसे बताये." ताऊजी ने इतना बोलका पर्स निकल लिए

"शर्मा जी आपसे तोह वही दाम लेंगे जितने में हमारे पास ये आई है. लेकिन इतना कहूंगा के एक ये हेलमेट जरूर ले लीजियेगा.

सावधानी भी जरुरी है." दुकानदार ने बड़े अपनेपन से ये बात अर्जुन को देख कर कही.

"है अंकल दे दीजिये ये हेलमेट और वो पानी की बोतल भी."

ताऊजी ने पैसे दिए और चले गए. दूकान पे काम करने वाले 2 लड़को ने 15 मिनट में हे साइकिल तैयार कर के अर्जुन को दे

दी. हेलमेट जो सिर्फ सर के ऊपर तक हे था लगाया और मार दिया उसने पैदल.

"वाह ये तोह एकदम हलकी है. " सावधानी से थोड़ी दूर चलते हे अर्जुन ने महसूस किआ के ये और साइकिल से बहुत तेज़ है.

10-12 मिनट लगे उसको घर आने में और फिर सबको उसने अपनी नै साइकिल दिखाई. बहार आँगन में हे ताला मार के कड़ी की

और चल दिए अपने कमरे में. आज बहुत थक गया था वह तोह थोड़ा आराम भी जरुरी था.
 
अपडेट - 8

बीच मझदार


मेरे होंठ अलका दीदी के होंठो से चिपके हुए थे. मई उनका लाल निचला होंठ धीरे धीर अपने मुँह से चूस रहा था. उनका

एक हाथ मेरा सर सेहला रहा था और दूसरा मेरी पीठ. मदहोशी से उनकी आँखें बंद पड़ी थी और मेरा एक हाथ उनके कूल्हे

को दबा रहा था और एक गर्दन को. हम दोनों जैसे इस दुनिया से दूर एक अपनी हे दुनिया में थे. उनके मुँह की वह मिठास मुझे

पागल बना रही थी जिसे मई और जोर से पीने लगा था. कूल्हों से सरकता हुआ हाथ कमीज के अंदर से उनके पेट को सेहला रहा

था. अलका दीदी के लिए ये सेहन करना जब मुश्किल हो गया तोह उन्होंने अपना मुँह खोल के मेरी जीब को चूसना शुरू कर दिए था.

अब वह मुझे खुद से चिपका रही थी जैसे मुझे खुद में सम्माहित कर लेना चाहती हो. यहाँ मेरा हाथ अब उनके छाती के उभर

को मसल रहा तोह जो रूई से मुलायम लेकिन रबर से लचीले और सख्त थे. जैसे हे मैंने उनका निप्पल कुरेदा उन्होंने मुझे

चूमना छोड़ मेरा मुँह अपनी गर्दन पर सत्ता दिए. मेरी जीब उनकी सुराईडर गर्दन पर कमाल दिखा रही थी और हाथ उनके स्तन

से ढूढ़ निकलने की कोशिश कर रहे थे. जैसे हे मैंने अपना दूसरा हाथ उनकी सलवार के अंदर किआ.....

"Arjun-Arjun.. अरे कब से हिला रही हु. उठ जा कुम्भकरण?" ये आवाज बीच में कहा से आई और जैसे हे मेरी नज़र सामने पड़ी

तोह माधुरी दीदी मेरे ऊपर झुकी हुई थी. उनका यौवन कमीज से बहार झलक रहा था. उनकी तेज़ आवाज से मेरा होश वापिस आया.

"क्या हुआ दीदी? ऐसे क्यों जिंझोड़ रही हो आप मुझे?" अर्जुन ने सामने कड़ी माधुरी दीदी से पुछा

"4 बजे सोया था तू और अब 8 बज रहे है. चल सब निचे बुला रहे है तुझे", इतना बोलकर वो हंसती हुई बहार निकल गई.

जाते हुए एक बार फिर पीछे मुड़कर देखा और हंसती हुई गायब.

"जाने क्या हुआ है इनको?" लेकिन जैसे हे नज़र पेण्ट पर पड़ी तोह दिखाई दिए सच. वह तम्बू बना हुआ था उस सपने की वजह

से. झेंपता हुआ बाथरूम गया और हाथ मुँह धोकर सूती पजामा और लूसे टीशर्ट पहन अर्जुन निचे चल दिए.

"भाई तू बैठ मई खाना लगाती हु.", कोमल ने उसके लिए कुर्सी खींच कहा. सामने ऋतू और माधुरी बैठे थे. रामेश्वर जी

आज अपने कमरे में हे खाना खा चुके थे कौशल्या जी के साथ और राजकुमार जी उनके पाँव दबा रहे थे. रेखा जी रोटीआं बना रही

थी और अलका उन्हें सेक रही थी.

"माँ, ताई जी और संजीव भैया कहा है? दिख नहीं रहे." अर्जुन ने रोटी का टुकड़ा तोड़ते हुए अपनी माँ रेखा से पुछा.

बीटा वो दोनों तेरी ताई जी के गांव गए है सुबह तक आएंगे. संजीव को वह कुछ काम था ऑफिस का तोह तेरी ताई जी भी

इस बहाने अपने maa-baap से एक रात मिल आएँगी." रेखा ने रोटी बनाते हुए हे जवाब दिए.

"ाचा. और माँ ये ऋतू दीदी कभी रसोई में काम क्यों नहीं करती.?" ये बात अर्जुन ने ऋतू को छेड़ते हुए हे कही थी जो की

खाने में हे गम थी लेकिन अपना नाम सुनकर अर्जुन को गुस्से में देखने लगी थी.

"बीटा उसका वो हे जाने. मई कुछ नहीं कहती जब अपने घर जाएगी तब देखेंगे." उसकी माँ ने ये बात चुहल वाले अंदाज में

कही थी.

"ये हे मेरा घर है और मई यहाँ की मालकिन. और अपने मुन्ने को थोड़ा पल्लू से बहार निकालो माँ नहीं तोह बिलकुल लड़की होता

जा रहा है ये दिन प्रतिदिन." ऋतू भी कहा काम थी

ऐसे हे वो लोग खाना कहते रहे और अलका भी आ गई अपनी प्लेट लेकर. रेखा जी चूल्हे के पास हे बैठ गई अपना खाना खाने.

जैसे हे अर्जुन ने अलका की और मुस्कुराकर देखा, शर्म से उसकी नज़र निचे हो गई और खांसी होने लगी.

"लो दीदी पानी पियो." अर्जुन झट अपना गिलास लेकर उसके सर के पास खड़ा हो गया. जैसे हे अलका ने ये देखा उसका चेहरा चमक

उठा. "थैंक यू, अरु." उसने पानी पीते हे कहा, अर्जुन उसकी पीठ प्यार से सेहला रहा था. "क्या यही प्यार है?" दोनों के

मैं में यही था.

"मुझे तोह आजतक इतने प्यार से तूने पानी नहीं पिलाया. अलका शायद तेरी ज्यादा प्यारी है." अब ऋतू ने फिर से अर्जुन को छेड़ा.

"दीदी प्यारी तोह एक आप हे हो मेरे लिए. लेकिन कहा मई नौकर और कहा आप मालकिन." अर्जुन ने उसकी पहले वाली बात हे सुना दी.

उसकी सभी बहाने ये सुनकर जोर से हंसने लगी और रेखा जी भी बचो के बीच इतना प्यार देख मुस्कुरा रही थी.

"चची आप खाना खा के आराम कीजिये. बर्तन मई कर दूंगी." माधुरी ने टेबल से सभी के बर्तन उठाते हुए कहा.

"ठीक है मेरी बची. बस मई Maa-bubuji को दूध दे औ गरम कर के. और तू भी टाइम से सो जाना सारा दिन काम करती है."

रेखा जी ने माधुरी को माथा चूमते हुए कहा.

"भाई ऊपर वाले टेलेवसिओं पर हम फिल्म देख ले क्या?" कोमल ने अर्जुन से गुजारिश भरे लहजे में कहा.

"अरे दीदी. आपका भी तोह है वह. पूछ क्यों रही हो. और वैसे भी मई तोह दिन भर सो चूका, मई भी देख लूंगा." इतना बोलकर

अर्जुन अपनी माँ का गाल चूम ऊपर कमरे में चल दिए. पीछे पीछे कोमल, अलका और ऋतू आ गई.

"सोनी पे हम दिल दे चुके सनम आ रही है. वही लगा ले ऋतू." अलका ने ऋतू को ये बात कही जिसके हाथ में रिमोट था.

"तूने तोह नहीं दे दिया किसी को दिल. Hahahah.."Kehte हुए उसने वो चैनल लगा दिए और बैठ गई देखने फिल्म.

ऋतू हमेशा सिंगल सोफे पे बैठ कर हे देखती थी और बड़े सोफे पे कोमल और अलका थे. मुँह साफ़ करके अर्जुन भी आ गया

और बैठ गया दोनों बहनो के बीच में. कोई आधे घंटे बाद माधुरी दीदी भी आ गई थी. अब उन्होंने एक खुली टीशर्ट और

पजामा पहना हुआ था. ऋतू भी कुछ ऐसे हे लिबास में थी. सभी फिल्म में खोये हुए थे. बस एक अर्जुन था जो अलका में खोया था.

अर्जुन ने अलका के कान में सरगोशी की. "दीदी नै ड्रेस कब पहन कर दिखा रही हो.?"

"परसो जन्मदिन है तोह तभी देख lena."Usne टेलीविज़न की तरफ देखते हुए शर्मा कर जवाब दिए.

"जन्मदिन तोह कल रात 12 बजे से शुरू होगा न. मई चाहतु हु आपको सबसे पहले मई विश करू. और ज्यादा ाचा लगेगा अगर

आप उस समय मेरे दिए गिफ्ट को पहन कर आओ." अर्जुन ने ये बात ऐसे कही थी जैसे कोई प्रेमी अपनी प्रेमिका से निवेदन कर रहा

हो. अलका ने एक बार प्यार से उसकी तरफ देखो और उसकी आँखों ने कुछ कहा जो सिर्फ अर्जुन को हे दिखा. वो भी खुश हो गया.

अलका उठ गई अपनी जगह से और बोली, "चलो दीदी मई तोह सोने जा रही हु. हो गई फिल्म ख़तम." अर्जुन ने जब देखा तोह सच में

फिल्म ख़तम हो चुकी थी. वो सारा टाइम सिर्फ अलका को हे देख रहा था.

"मई तोह अभी थोड़ी देर और देखूंगी जिसने सोना है वह सो जाये." माधुरी दीदी ने रिमोट लेते हुए कहा

लेकिन कोमल, ऋतू और अलका दीदी चले गए निचे सोने और ऊपर रह गए अर्जुन और माधुरी दीदी.

"आप संजीव भैया के कमरे में हे सो जाना दीदी. वह डबल बीएड भी है." अर्जुन ने चैनल चेंज करती हुई माधुरी दीदी से

कहा तोह उन्होंने पलट कर उसकी तरफ देखा. "मई अकेले नहीं सोऊंगी. है तू भी वही सोयेगा तोह ठीक है. अलार्म वही लगा लिओ."

"चलो ठीक है. लेकिन आप ज्यादा देर टेलीविज़न नहीं देखोगी." अर्जुन ने चेताया क्योंकि 11:30 हो चुके थे.

"बस आधा घंटा भाई." इतना बोलकर वह सोफे पे अर्जुन के साथ जुड़कर बैठ गई. एक तरफ का सोफे खली हे था.

अर्जुन की नज़र जब टेलीविज़न पर गई तोह उसकी आँखें वही जम्म स गई. टाइटैनिक आ रही थी स्टार मूवीज पे. ये वो टाइम थे

जब इंडिया में टेलीविज़न सेंसरशिप नहीं थी. रात 11 के बाद एडल्ट मूवीज आती थी.

फिल्म का सन भी सबसे पॉपुलर चल रहा था. हेरोइन एक सोफे पे लेती थी और हीरो कागज लेकर उसके सामने बैठा था.

धीरे से लड़की ने अपनी ड्रेस उतार दी और लेट गई. कैमरा का फोकस जब उसके स्तनों पे आया तोह दोनों भाई बहिन की धड़कन

बहार तक सुनाई दे रही थी. कमरे की लाइट बंद थी लेकिन टेलेविज़न की रौशनी में चेहरे साफ़ दिख रहे थे. जहा अर्जुन

हेरोइन की सर उठाये गोलियां देख रहा था, वही माधुरी कभी अर्जुन को तोह कभी फिल्म को देख रही थी. बोल कोई भी नहीं

रहा था. कुछ हे शान में सन ख़तम हो गया था लेकिन इन दोनों की हालत ख़राब हो चुकी थी.

"चल भाई अब सोने का टाइम हो गया." बोलते हुए माधुरी बिना पीछे मुड़े संजीव भैया के कमरे में चली गई. अर्जुन ने टीवी

बंद किआ और बाथरूम में जाकर अपना अंडरवियर उतर वापिस पजामा पहन उसी कमरे में चल दिए.

माधुरी चुपचाप एक तरफ करवट लेकर लेती थी और उसकी तरफ हे मुँह करके अर्जुन भी लेट गया. कमरे में लाइट बंद दी

और पंखा चल रहा था. थोड़ी बहोत चाँद की रौशनी आ रही थी खिड़की से जिसमे अर्जुन अपनी बड़ी दीदी के खुल बाल और

सुन्दर चेहरा निहार रहा था. बिलुल चांदनी जैसी लग रही थी माधुरी.

"ऐसे क्या देख रहा है?"

"आप कितनी खूसूरत हो दीदी. ये देखो चाँद की रौशनी में आपकी आँखें कैसे चमक रही है और आपके खुले हुए बाल."

इतना बोल अर्जुन वापिस देखने लगा.

"इतनी भी कुछ खास नहीं हु. अलका और ऋतू को देख वह दोनों कितनी ज्यादा सुन्दर है. और मेरी तोह उम्र भी कितनी ज्यादा हो

गई है." इतना बोलकर माधुरी किसी सोच में डूब सी गई. उसको एहसास तब हुआ जब अर्जुन हाथ उसे अपने कान के पीछे महसूस हुआ

वो उसकी लातो को खोल रहा था. देख रहा था के कितने प्यार है बाल जो उसकी दीदी के गाल को सेहला रहे है.

"क्या हुआ अरु? ऐसे क्या कर रहा है?"

"देख रहा हु दीदी के ये बाल कितने खुशनसीब है जो आपके चेहरे को सहलाते रहते है."

"तू भी तोह सेहला सकता है. तुझे किसने मन kiya."Ye बात माधुरी ने उसकी तरफ सरकते हुए कही थी. बड़ा प्यार आ रहा था

उसको अपने भाई के इस निस्वार्थ प्रेम को देख के.

अब हालत ये थी की दोनों हे एक दूसरे के साथ लेते हुए थे. मुँह से मुँह 4-5 इंच दूर था. शरीर को भी दूसरे शरीर का एहसास

हो रहा था. अर्जुन ने जैसे हे अपना हाथ दीदी के गाल पे रखा उसका रोम रोम गंगना गया. हलके भरे भरे और मुलायम गाल

यही हाल माधुरी का भी था. उसके शरीर में भी उत्तेजना उठ रही थी. माधुरी एक पढ़ी लिखी लड़की थी. जिसको लड़का और

लड़की के काम का भी कुछ किताबी और कुछ सुना हुआ ज्ञान था. उसकी कुछ सहेलियों ने तोह कॉलेज टाइम हे अपना कौमार्य ख़तम

कर लिए था. लेकिन माधुरी ने ऐसा कभी नहीं किआ था. एक-2 बार उसने ऐसी फिल्मे जरूर देखि थी लेकिन किआ कभी कुछ नहीं

था. लेकिन आज आसार कुछ और हे थे.

अर्जुन का एक हाथ खुद हे माधुरी की कमर पर आ गया था. और एक हाथे से वह अपनी दीदी की माथे से बाल पीछे कर रहा था.

अब दोनों कुछ बोल नहीं रहे थे लेकिन उनके शरीर चिपक चुके थे.

माधुरी ने अपनी एक ब्याह उसके ऊपर रख दी जिस से उसके स्तन अब अपने छोटे भाई के सीने में धस रहे थे. जब उसने देखा के

अर्जुन इस से आगे कुछ नहीं कर रहा तोह माधुरी ने धीरे से अपने तपते गरमा होंठ उसके होंठ से चिपका दिए.

मजे से अर्जुन की आँखें बंद हो गई थी और हाथ स्व्यात हे उसकी दीदी के ठोस नितम्भो को सहलाने लगे थे.

ये देख माधुरी का भी जोश बढ़ गया और उसने अपनी मांसल जांघ अर्जुन की तंग पर रख दी. दोनों चुपचाप बस एक दूसरे के

होंठ चूम रहे थे की अर्जुन का हाथ माधुरी क सीने पे आ गया.

"दीदी, मुझे ये सब नहीं आता?" बड़ी मासूमियत से उसने ये बात कही तोह माधुरी मुस्कुराई और बैठ गई. अपने हाथ पीछे ले

जाकर उसने कमीज के अंदर से अपनी ब्रा खोली और गले से निकल दी.

"ाचा भाई ये बता तुझे कितना पता है?"

"मतलब दीदी?" अर्जुन ने धीमे से पुछा.

"यही के औरत और मर्द के बीच ये जो प्यार होता है ये कैसे करते है?" माधुरी ने भी ये बात बहोत प्यार से कही

"दीदी जो अभी हम कर रहे थे वह किश होता है. ये आपके स्तन है (अपना हाथ हलके से माधुरी के सीने पर रखते हुए),

ये आपके नितम्भ है (कूल्हे को सहलाते हुए), यहाँ आपकी योनि होती है (जांघो पे हाथ रखते हुए), ये मेरा लिंग है. बस

इतना मालूम है दीदी." अर्जुन ने भोलेपन से कहा. उस पे उत्तेजना जरूर चढ़ी थी लेकिन वह अपनी बड़ी बहिन से प्यार करता

था और उनका भरोसा नहीं तोडना चाहता था.

"हाहाहा. तुझे कुछ भी नहीं मालूम. ये देख जो ये गुब्बारे है इनको चूचिया, बूब्स, ब्रेअस्ट्स या दूध बोलते है, और जो

तूने नितम्भ बताया उसको कूल्हे, चूतड़ या बूट्स बोलते है. योनि को बोलते है छूट, वागिना या पुस्सी. और तेरे लिंग को कहते

है लैंड, पेनिस या डिक." इतना बोलकर माधुरी ने एक बार फिर अर्जुन के होंठ चूम लिए.

"और जब ये लुंड छूट के अंदर जाता है तोह इसको बोलते है चुदाई, सेक्स या लव मेकिंग." नीरा बुद्धू है तू प्यारे

"दीदी क्या आपने ये सब किआ हुआ है?" भोलेपन से एक बार फिर उसने पुछा

"नहीं भाई कभी किसी को हाथ तक नहीं लगाने दिए है मैंने. मेरी फ्रेंड्स है कुछ जिनोह्णे ये सब किआ. कैयो की तोह शादी

और बचे भी हो चुके है. लेकिन मई आज तक इस अनुभव से दूर हु. लेकिन अब मुझे प्यार करने वाला तू मिल गया है न तोह

मई भी करुँगी. बोल तू अपनी दीदी को प्यार करेगा?" माधुरी ने अपने भाई की छाती सहलाते हुए कहा

"आप बस मुझे सीखा देना. आप जैसा कहोगी मई करूँगा." अर्जुन ने भी अपना हाथ दीदी के स्तन सॉरी चूचे पर रखते हुए

जवाब दिए.

"मेरा प्यारा भाई." और इसके साथ हे माधुरी ने होंठ खोल कर अर्जुन का मुँह चूसना शुरू कर दिए. दोनों की जीभ एक दूसरे

के मुँह में आ जा रही थी. अर्जुन को अपनी बड़ी बहिन का ये मीठा रास एक अलग हे सुख दे रहा था. जब सांस लेना भी मुश्किल

हो गया तोह दोनों अलग हुए और एक दूसरे को देखने लगे. हर सांस के साथ माधुरी के पहाड़ जैसे बूब्स हिल रहे थे. ये

दृश्य इतना कामुक था के अर्जुन से बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया और उसने कमीज के ऊपर से हे उन्हें पकड़ कर दबाना शुरू

कर दिए.

"एक मिनट रुक मेरे भाई." माधुरी की उत्तेजना भी चरम पर पहुंच चुकी थी लेकिन फिर भी उसने अर्जुन को खुद से दूर किआ

और अपने कमीज का एक चौर पकड़ कर कमीज उतार दिए. उसके चूचे इतने बड़े थे जैसे कोई मध्यम आकर की फुटबॉल हो. और

बिलकुल ठोस तने हुए. कामोत्तेजना की वजह से उनपे लगे दोनों निप्पल किसी सुई की तरह खड़े हुए थे. लेकिन निप्पल की मोटाई

एक छोटे चने के डेन जितनी थी. जो बयां कर रही थी के इनको आज से पहले कभी मसला या चूसा नहीं गया. इतने विशाल उभर

देख कर अर्जुन से सबर नहीं हुआ और उसने दोनों हाथ बढ़ा के पकड़ लिए. उनके भर का अनुमान हो गया था अर्जुन को. उसकी दीदी

अपनी छाती पे कितना बोझ उठा के रखती है सारा दिन. ये सब सोचते सोचते वह उन बड़े बड़े खरबूजों को प्यार से दबा भी

रहा था और सेहला भी रहा था. माधुरी की तोह इतने में हे हालत खराब हो चुकी थी. उसको ऐसा लग रहा था जैसे उसकी

छूट से कुछ तरल रईस रहा है और उसकी कच्ची को भिगो रहा है. अगले हे पल अर्जुन ने एक ढूढ़ को अपने मुँह में भर लिए

और मजे से चुसकने लगा. बीच बीच में वह अपने दन्त से निप्पल को भी कड़ा कर देता. उसका दूसरे हाथ का पंजा अब माधुरी

के दूसरे बूब को मसल रहा था. और वो माधोसी में अपने भाई का सर सेहला रही थी. अब अर्जुन ने दूसरा वाला मुँह में लिए और पहले

वाले को हाथ से मसलने लगा. उन दोनों को इसका पता हे नहीं चला कब अर्जुन पूरा माधुरी के ऊपर आ चूका था और वह अब बीएड

पे पीठ के बल लेती मचल रही थी.

"दीदी, ऐसा लग रहा है जैसे इनमे से कुछ निकल रहा है लेकिन दिख नहीं रहा. इनको छोड़ने का दिल हे नहीं कर रहा." अर्जुन

ने एक बार ऊपर होकर अपनी दीदी का मुँह देखा. दोनों खरबूजे अब अर्जुन की लार से साणे हुए थे और उनके निप्पल चमक रहे थे.

Maadhuri.jpg


(माधुरी दीदी)

"भाई तू भी अपने कपडे निकल न." अपनी बहिन की गुजारिश सुनकर अर्जुन ने अपना टीशर्ट और पजामा एक हे पल में शरीर से अलग

कर दिए. वही माधुरी दीदी ने भी अपनी अपनी सलवार पैरो से निकल कर अलग कर दी थी. अर्जुन एक बार फिर अपनी बड़ी दीदी के

ऊपर आ गया. माधुरी ने अपनी टंगे फैला दी थी जिनके बीच में उसके भाई का लुंड घिस रहा था. दोनों एक बार फिर सबकुछ

भुला के पागलो की तरह एक दूसरे को चूमने में लगे थे. अर्जुन की छड़ी छाती के निचे माधुरी के बड़े बड़े ूरोज़ कुचल

रहे थे. दीदी ने अभी तक अपने भाई का लुंड नहीं देखा था और न हे अर्जुन ने अपनी बहिन को कमर से निचे देखा था.

अर्जुन के हाथ फिसल कर जैसे हे निचे आ रहे थे उसको अपनी बहिन की मोती मांसल जंघे सुखद एहसास देने लगी. वो इतनी

मुलायम थी जितने उनके बूब्स थे. अर्जुन ने खुद हे अपनी बहिन की टोनो जंघे विपरीत दिशा में फैला दी थी और अब वह अपना

लुंड ठीक उनकी कच्ची के फूले हुए हिस्से पर घिस रहा था. वो जगह किसी गरम भट्टी के सामान तपने लग रही थी. उसने

ऐसे हे अपनी दीदी की आँखों में देखा तोह माधुरी ने अपनी कमर हलकी से ऊपर उठाई और एक साइड से कच्ची को निचे खींच

दिए. अर्जुन ने बाकी का काम कर दिए उसको पैरो से बहार निकल कर. एक बड़ी तेज और अजीब सी सुगंध उसकी साँसों से टकराई

ये उसकी दीदी का यौवन रास था जो छूट से जाने कब से टपक रहा था.

"दीदी, अब क्या करू?" कांपते हुए अर्जुन ने कहा. माधुरी ने देखा उसका भाई उसकी छूट के ऊपर उगे बालो में उंगलिया फिर

रहा है. माधुरी दीदी ने निचे से आगे होकर अपना हाथ बढ़ाया अर्जुन का लुंड पकड़ने के लिए तोह एक हे झटके में हाथ

पीछे खींच लिए.

"भाई... ये क्या चीज है? खड़ा हो जरा." हैरत से माधुरी दीदी अपनी जगह से उठ कड़ी हुई और अर्जुन के पास आई.

जैसे हे उसकी नजर उस एक गीत के मोठे डंडे पर गई, माधुरी की धड़कन हे रुक गई कुछ पल के लिए. कभी वह निचे

अपनी छूट की तरफ देखती जहा सिर्फ एक पतली से लकीर थी 2 मोठे मोठे फूले हुए होंठो के बीच. और कहा ये दैतियकार

लुंड जिसका अगला हिस्सा एक माध्यम आकर के आलू जितना था. हिम्मत करके उसने सिर्फ इतना कहा, "भाई एक काम कर मेरे ऊपर

लेट कर अपना ये डंडा मेरी छूट के ऊपर आराम से घिस." ऐसा बोलते हुए माधुरी दीदी ने अर्जुन को अपने ऊपर लिटा लिया

और फिर से अपनी टाँगे पूरी खोल ली. अपने हाथ से उसका लुंड जो की पूरी मुट्ठी में नहीं समां रहा था, पकड़ के अपनी छूट

के होंठो पर लंबवत घिसने लगी.

"आह दीदी. आपकी ये फूली हुई छूट कितनी गरम है. और इसका पानी से जब लुंड फिसलता है तोह कितना मजा आता है. आह"

बोलते बोलते अर्जुन दीदी मोठे दूध छाती से राउंड रहा था और अपना लुंड दीदी की पनियाई छूट पे घिस रहा था. बीच बीच

में जब लुंड का अगला हिस्सा हल्का सा छूट के होंठ ज्यादा फैला देता तोह दोनों के मजे की इन्तहा हो जाती थी. दोनों भाई बहिन

के शरीर पसीने से तर हो चुके थे और पूरा कमरा इस उत्तेजक सुगंध से भर उठा था. अब तोह माधुरी की कमर भी

बीएड से ऊपर उठने लगी थी और उसके नाखून अपने छोटे भाई के सख्त चूतड़ों में धंस रहे थे. न जाने ये खेल कितनी देर

चलता रहा लेकिन एक समय के बाद माधुरी का पूरा शरीर ऐंठ गया और उसकी छूट में रह रह के झटके उठने लगे.

छूट में जैसे बाढ़ हे आ गई थी और इतनी गीली छूट पे अर्जुन का लुंड भी फुल स्पीड से फिसल रहा था. उसको भी करंट

लगा जब उसके लुंड ने पानी फेंकना शुरू किआ. पिचकारी इतनी तेज थी की दीदी के बूब्स, पेट, गर्दन तक वह गरम लावा जाकर

गिरा. और अर्जुन ऐसे हे अपनी बड़ी बहिन के बदन पर देह गया. इतना मजा तोह उसे मालती की चुदाई से नहीं आया था जितना

अपनी बड़ी बहिन की छूट पर सिर्फ लुंड घिसाई से आया था. 10 मिनट बाद जब दोनों की सांस कुछ दुरुस्त हुई तोह माधुरी

ने प्यार से अपने छोटे भाई को ऊपर से उठाया और कान में बोलै. "भाई मुझे बाथरूम जाना है, उठ खुद को साफ़ करना है."

अर्जुन की हिम्मत नहीं थी लेकिन वह उठ गया. दीदी ने चद्दर लपेटी और बाथरूम में चली गई. 5 मिनट बाद वह आई तोह

अर्जुन अपना लुंड साफ़ करके वापिस आया और वापिस अपनी दीदी से लिपट गया.

"दीदी, क्या इसको हे चुदाई कहते है?" होंठो पे एक छोटा चुम्बन करने के बाद उसने पुछा

"नहीं बाबा. ये थोड़ी न चुदाई होती है. ये तोह सिर्फ रोब्बिंग थी. तेरा इतना बड़ा है के ऐसे ये मेरी छूट के अंदर नहीं

जायेगा. लेकिन थोड़ा टाइम सबर कर कुछ करुँगी इसका भी हल. और है बीटा ये बात कभी भी भूल के किसी के सामने मत

कर देना. तेरी बहिन बर्बाद हो जाएगी. तू अपनी बहिन के प्यार की हिफाजत करेगा न भाई?" भावुक होते हुए माधुरी लिपट

गई अर्जुन से.

"दीदी आपके लिए मई अपनी जान दे सकता हु. और आप हे मेरा पहला प्यार हो. मई कसम खता हु मई कभी किसी को इसका

आभास नहीं होने दूंगा." और उसने कास कर भींच लिए माधुरी को अपनी बाहों में. माधुरी ने एक बार सर उठाकर टाइम

देखा और फिर धीरे से boli,"Bhai अब सो भी जा देख ढाई बज रहे है. तुझे उठना भी है."

उन्हें पता हे न चला था के वह पिछले ढाई घंटे से प्यार कर रहे थे. अर्जुन ने अपनी बड़ी बहिन, जो की अल्फ नंगी

थी, को बाहो में भरा और दोनों नींद के आगोश में चले गए.
 
अपडेट 9

ज्योति की आग


"Tannnnnnnnnnn Tannnnnnnnnnn" की पहली हे आवाज से अर्जुन उठकर बैठ गया. अलार्म का बटन दबा के उसको बंद किआ और

फिर नज़र गई एक जन्नत से नज़ारे पारा. माधुरी दीदी का पूरा यौवन उसकी आँखों के सामने थे. बड़े ठोस बूब्स जो

बीएड पर ठीके थे, मासूम सा चेहरा, घने काले बाल, विशाल लेकिन गुदाज चूतड़, रेशम से चिकनी जाँघे. फिर खुद को

सँभालते हुए अर्जुन ने अपना हाथ उनके एक पूरे गोल चुके पर लगाया और उनके होंठ चुके धीरे से बोलै, "ी लव यू

दीदी, यू अरे ब्यूटीफुल". और उनको चद्दर से धक् कर पूरा कमरा समेत कर अपने कमरे में आ गया.

फिर वही रोजाना का रूटीन, दौड़, बादाम वाला दूध, nahana-dhona किआ और आ गया रसोई में.

माँ को देखा तोह देखता हे रह गया. आज रेखा जी ने लाल रंग की रेशमी साडी पहनी हुई थी और अन्य दिनों से अधिक

खिली हुई थी.

"आज खुश खास है क्या माँ?" अर्जुन ने जैसे हे ये कहा तोह कौशल्या देवी ने जवाब दिए, "ओह मेरे बुद्धू सपूत,

आज होली का त्यौहार है और कल फाग. कभी कभी त्यौहार का केलिन्डर भी पढ़ लिए कर. और है आज मेरा लाडला भी

आ रहा है घर, तेरा बाप."

एक जगह त्यौहार का सुनकर जहा अर्जुन ख़ुशी से झूम उठा वही जैसे हे अपने पिताजी के आने की खबर सुनी तोह उसकी

साड़ी ख़ुशी choo-mantar हो गई. "ाचा आज पापा आ रहे है? कब तक आएंगे वो?", बुझे मैं से उसने पुछा तोह रेखा

जी ने कहा, "बीटा तेरे पापा तोह 7 बजे हे आ गए थे लेकिन उन्हें तेरे गुलाटी अंकल से कुछ काम था तोह वह आधे घंटे

तक आ जायेंगे.

डॉ. गुलाटी एक सर. सर्जन थे सिविल हॉस्पिटल के और शंकर शर्मा जी के स्कूल के दिनों से मित्र थे. जब भी शंकर जी

अपने शहर आते थे तोह सबसे पहले वह अपने दोस्त से मिलर हे घर आते थे. शाम का प्रोग्राम बना कर. अपने पापा को

याद करते हे अर्जुन की पुराणी यादें तजा हो गई. कैसे उसके पिता जी उसको कड़ी सजा देते थे जब उसके काम नंबर आते

थे, और दादा जी भी उनको कुछ बोल नहीं पाते थे. आखिरी बार वो अपने पिता जी से तब बोलै था जब वो वापिस घर आया

था बोर्डिंग से. शंकर जी का डर हे था के अर्जुन ने कभी भी ज़िन्दगी में ज्यादा दोस्ती नहीं करि थी और सिर्फ अपने लक्ष्य

पर हे ध्यान देता था. फिर सब यादों को भूलकर उसने खाना शुरू किआ. आसपास कोई क्या बोल रहा है उसको कुछ सुनाई नहीं

दे रहा था. बस जल्दी से खाना खाया और उठने लगा कुर्सी से की एक हाथ उसके कंधे पर था. सांसें रुक गई क्योंकि

उसके दिल को एहसास हो गया था के ये किसका हाथ है.

"गूदडडडड मॉर्निंग डैड. हाउ अरे यू? हैप्पी तो सी यू अराउंड?" ये सब उसने बिना पीछे मुड़े हे कहा था. शंकर जी का

सपना था के उनका बीटा उनसे ज्यादा पढ़े और जब भी वो उनसे और उनके दोस्तों से मिले तोह सिर्फ अंग्रेजी में हे बात करे. उन

दिनों ये बहुत काम हे होता था के कोई बचा छोटी उम्र में हे प्रवाह में अंग्रेजी बोले. लेकिन अर्जुन ने इस भाषा पर मजबूत

पकड़ बना ली थी दसवीं तक आते आते.

"यू क्नोव किध, यू अरे माय प्राइड. एंड नाउ I'm मोरे थान हैप्पी तो सी यू आल ग्रोन उप एंड गेटिंग थिस हैंडसम. सोन, टर्न

अराउंड." जैसे हे शंकर जी ने ये बात कही अर्जुन अपने पिता के बिलुल सामने था. उन्होंने आज पहली बार अपने बेटे को अपने

सीने से लगाया. "I've मिस्ड थिस कम्फर्ट थ्रौघोउट माय स्कूलिंग डैड. Don't लीव में फॉर समूहिले." कह कर अर्जुन जोर

से चिपक गया अपने पिता से. उन्होंने भी बेटे को पहली बार महसूस किआ. "डॉ. साहब ी होप यू didn't गोत अन्य ट्रबल रीचिंग

हेरे?" ये आवाज सुनकर दोनों baap-bete अलग हुए और शंकर जी जा लगे अपने पिता रामेश्वर जी के गले.

उन दोनों में कई देर तक गुफ्तगू होती रही और उनको कुर्सी पे बिठाया कौशल्या जी ने.

"मेरा लड्डू". इतना बोलकर कौशल्या जी ने बेटे का माथा चूमा और फिर रेखा जी ने अपने ससुर, सास और पति को पानी दिए.

बार बार शंकर जी अपने बेटे को हे देख रहे थे. और बीटा तोह एकटुक उन्हें देख रहा था. उसको बाप के प्यार का एहसास

आज पहली बार हुआ. वो सब भूल गया जो भी उसने बोर्डिंग स्कूल में सहा था.

"माँ, मुन्ना तोह मुझसे भी लम्बा हो गया इतनी जल्दी. पापा ने बहुत म्हणत करि लगती है इस्पे." उनके शब्दों में प्रशंशा

थी.

"बीटा तेरे पिताजी तोह अभी बहुत कुछ सोचे बैठे है. वो सब छोड़ चल पहले खाना खा नहीं तोह तू फिर भाग जायेगा अपने

दोस्तों के पास."

यही वो तीनो लोग बातें करते खाना खाने लगे और राजकुमार जी भी उनसे आ मिले. दोनों भाई गर्मजोशी से मिले और फिर

एक घंटे तक यही सब होता रहा. अर्जुन कबका सबकी नजर बचा कर अपनी साइकिल लेकर संदीप के घर निकल गया.

सबके रसोई से चले जाने के बाद शंकर जी भी उठ खड़े हुए और चल दिए अपने कमरे में जहा रेखा जी कपडे तेह लगा

रही थी. उन्होंने पीछे से हे उनको अपनी बहो में कास लिए और रेखा के चेहरे पे शर्म की लाली च गई. और इस दौरान कमरे

की कड़ी बंद कर दी थी उन्होंने.

वही माधुरी अपने कमरे में बैठी थी जहा ऋतू और कोमल भी थे. अलका दूसरे कमरे में पढ़ाई कर रही थी. वैसे तोह

चारो बहने आपस में सब बातें कर लेती थी. लेकिन इन्होने कभी भी सेक्स के विषय पर बात नहीं की थी. माधुरी किसी

भी तरह ये सब डिसकस करना चाहती थी तोह उसने बात शुरू के.

माधुरी- यार कोमल तेरे सब्जेक्ट्स क्या थे डिग्री में?

कोमल- दीदी फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और इंग्लिश. वैसे क्या बात है? कुछ पूछना है क्या?

माधुरी- है यार लेकिन बात थोड़ी पर्सनल है तोह किसी और से पूछ नहीं सकती तोह याद आया तेरे पास तोह साइंस था.

कोमल- दीदी आप तोह मेरी बेस्ट फ्रेंड हो. आप बेझिझक कुछ भी पूछ सकती हो.

अब इन दोनों की बात सुनकर ऋतू ने अपनी किताब साइड में रख दी और उनकी तरफ मुँह करके बैठ गई.

माधुरी- यार दादा जी कोई लड़का देख रहे है मेरे लिए, माँ से पता चला. लेकिन यार मुझे तोह इसके बारे में ज्यादा

कुछ पता नहीं की आगे क्या होता है. (चेहरे पे शर्म फ़ैल गई ये सब कहते हुए जो दोनों बहनो से छुपी न रही)

ऋतू- अरे दीदी आप यहाँ बैठो मेरे पास. मई करती हु आपकी प्रॉब्लम का सलूशन. (आँखें मटकते हुए उसने कहा)

माधुरी- यार मेरी 2 सहेलियों की शादी हो चुकी है और 3 साल में एक के तोह 2 बचे भी हो गए. और दोनों कहती है

के बस पति तोह उनको जरुरत का सामान समझता है. इसका क्या मतलब है. और यार ये भी कहा उन्होंने की जान निकल जाती है

(इतना बोलकर माधुरी ने आँखें निचे कर ली)

ऋतू- दीदी ये सब अनपढ़ लोगो की बातें है. आप जिस सब्जेक्ट की बात कर रही है उसको सेक्स बोलै जाता है. और ये एक

इम्पोर्टेन्ट लेसन है ाची लाइफ का. बुक्स के अकॉर्डिंग तोह जो भी है वह सिर्फ रिप्रोडक्शन और सेक्स ऑर्गन्स के बारे

में हे होता.

माधुरी- लेकिन ये सब तोह मैंने भी पढ़ा है. मई प्रैक्टिकल की बात कर रही हु.

ऋतू- दीदी सुनो तोह. देखो हेअल्थी सेक्स लाइफ के लिए सबसे इम्पोर्टेन्ट होता है दोनों के बीच प्यार और अंडरस्टैंडिंग.

फिर सेक्स से पहले फोरप्ले.

माधुरी- कोनसा प्ले? (नासमझ होने का दिखावा करते हुए)

ऋतू- ओहो दीदी पूरा सुनो नहीं तोह मई नहीं बोलती

Maadhuri/Komal एक साथ- अरे नहीं नहीं चल तू बता

ऋतू- वह कोमल दीदी आप भी. हाहाहा. चलो सुनो. फोरप्ले मतलब होता है की दोनों पार्टनर्स का एक दूसरे के शरीर से

पूरा प्यार करना. जैसे किसिंग, स्मूचिंग, ब्रेअस्ट्स रोब्बिंग, गेनिटल्स सकिंग.. मतलब मैं ऑर्गन्स को सहलाना, चूसना

और चेतना ेट्स. जिस से वागिना में फ्लुइड्स रन होने लगे और पेनिस अपनी फुल शेप में आ सके. वह के हेयर भी टाइम से

क्लीन करना जरुरी होता है, जिस से इन्फेक्शन न हो और बाद स्मेल न आये. फोरप्ले के और भी फायदे होते है.

जैसे सेक्स दरशन का इनक्रीस होना. जब ाचे से फोरप्ले हो जाये तब हे इंटरकोर्स करना चाहिए. लिखे पेनिस को वागिना

में डालने में परेशानी नहीं होती और दोनों को मजा आता है.

ऋतू ने इतना सब बोलकर अपने कंधे थोड़े ऊपर उठाये जैसे वह सब जानती हो कामकला के बारे में.

कोमल- लेकिन तूने दीदी की असली बात का जवाब तोह दिए नहीं. लड़की को दर्द क्यों होता है?

ऋतू- देखो दीदी सभी लड़कीओ की विर्जिनिटी का सिंबल उनका हैमेन होता है जो एक तरह का मांस का पर्दा होता है हमारी

वागिना के अंदर. फर्स्ट टाइम पेनिस इन्सर्ट होने से ये टूट जाता है तोह ब्लड निकलता है. सिर्फ तभी दर्द होता है या अगर

वागिना में फ्लूइड न बने तब पैन होता है रफ़ स्किन की वजह से. उसके लिए लोग जेली, ऑयल्स या क्रीम उसे करते है.

माधुरी- यार ये भी बता दे के क्या सभी लड़कीओ की वागिना और लड़को के पेनिस एक जैसे होते है?

ऋतू- हहहह.. दीदी ये कैसा सवाल है? सभी उंगलिया कभी बराबर होती है. देखो आपके ब्रेअस्ट्स कितने हैवी है, कोमल

दीदी के भी हैवी है लेकिन आपसे काम. और मेरे आप सब से छोटे. ऐसे हे बाकी पार्ट्स भी. लड़को के ेस्पेशलय इंडियंस में

एवरेज साइज होता है 4-6 इंच और लड़कीओ की वागिना की डेप्थ होती है 6-8 इंच. उसके पीछे ुरतुरुस जिसको बच्चेदानी बोलते है.

वैसे पेनिस की विड्थ भी अलग होती है. कोई मोटा, कोई पतला किसी का सिर्फ हेड मोटा होता है. ऐसे हे वागिना भी होती है.

किसी की फ़लुफ़्फ़ी, किसी की स्लिम और किसी की ज्यादा हे टाइट हिप बोनस की वजह से. लम्बी हेइ वाली लड़की की वैजिनल डेप्थ भी

ज्यादा होती है या फिर जिसके हिप्स हैवी हो. (और एक लम्बी साँस लेते हुए अपनी बात ख़तम करती है)

माधुरी- यार और किसी का अगर 7-8 इंच लम्बा और कलाई जितना मोटा हो तोह वह तोह जान हे निकल देता होगा?

ऋतू हँसते हुए, "क्या दीदी आपने ऐसा देख लिए क्या कही? वैसे अपने यहाँ ऐसा होना एक्सट्रेमेली रेयर है. बूत जिसको भी ऐसा

हस्बैंड मिलेगा उसकी तोह बस ज़िन्दगी मजे में गुजरेगी. यू क्नोव, "बिग्गेर इस बेटर".. हाहाहाहा.. (और वो अपनी दोनों बड़ी

बहनो की शकल देखने लगी मुस्कुराते हुए)

कोमल- न बाबा. मई तोह इस सब से दूर हे सही. जब शादी होगी तब की तब सोचेंगे. और वह उठकर बाहर आ गई.

ऋतू- दीदी आप किस सोच में गुम हो? देखो हम पक्के फ्रेंड्स है न तोह आप कुछ भी शेयर कर सकती हो.

माधुरी- यार क्या तूने कभी ऐसा किआ है या देखा है? और तुझे इतना कैसे पता? तेरी तोह आने वाली ज़िन्दगी बड़ी

ाची होने वाली है. अपने पति को खुश रखेगी तू.

ऋतू- अरे दीदी ऐसा कहा मेरा नसीब. वो तोह लाइब्रेरी में एक बार कामसूत्र का इंग्लिश वर्शन रीड किआ था. तभी पता

लगा के लव मेकिंग या सेक्स क्या होता है. फॉरेन कन्ट्रीज में तोह सेक्स ाड्डूक्तिओं कंपल्सरी है. बस हम हे बैकवर्ड सोच

वाले है. मेरी कुछ क्लास्स्मेटिस तोह अपने bf's के साथ सेक्स कर चुकी है और कुछ तोह मस्टरबैशन करती है. वो भी कभी

कभी अपने एक्सपीरियंस शेयर करती है. बूत मई ये सब उसके हे साथ करुँगी जिस से सच्चा प्यार होगा. फिर चाहे शादी हो या न.

माधुरी- सही कह रही है तू मेरी बहिन. मुझे हे देख इस सब्जेक्ट में तोह बिलकुल निल हु और 25 की उम्र हो चली है. लेकिन

आज तूने मेरी बड़ी हेल्प करि है.

ऋतू- अरे दीदी आप बोलो तोह अपने कपडे उतार दू. इतना बोलकर वो खिलखिला पड़ी ..

माधुरी- चल बदमाश कही की. और फिर वह भी हँसते हु बहार चल दी जहा उसकी दादी, माँ और चची होली पूजन की तैयारी

में लगी थी. वह भी उनकी मदद करने लगी. शंकर जी थक कर अपने कमरे में सो रहे थे.

दूसरी तरफ जब अर्जुन अपने दोस्त संदीप के घर पंहुचा तोह संदीप उसको लेकर अपने कमरे में आ गया. धर्मपाल जी बहार गए

थे किसी काम से जो शाम को आने वाले थे. और संदीप की माता जी पड़ोस के घर में गई थी होली पूजन की तैयारी करने. जहा

से सभी महिलाये पास के ग्राउंड में जाने वाली थी होलिका दहन के लिए. मतलब इस समय घर पर सिर्फ ज्योति, संदीप और अर्जुन

थे. ज्योति अपने कमरे में कुछ कर रही थी तोह वह दोनों भी टीवी पे वीडियो गेम लगा कर खेल रहे थे और बातें कर रहे थे.

अर्जुन ने बात शुरू की, "यार संदीप क्या तूने कभी सेक्स किआ है?"

संदीप अपने दोस्त की बात सुनकर मुस्कुराते हुआ बोलै, "भाई मुझे देख कर लगता है के मैंने ऐसा कुछ किआ होगा कभी. है तू चाहे

तोह आकांक्षा के साथ कर सकता है."

"नहीं नहीं भाई. मेरा मतलब था के तू क्या जानता है इसके बारे में?" अर्जुन थोड़ा शांत रहने का दिखावा करते हुए बोलै

"देख भाई ये जो सेक्स है न इसमें ज़िन्दगी का मजा है. मई तोह कभी कभी कुलविंदर से कोई सेक्सी किताब लेकर अपने हाथ से हिला

लेता हु. या फिर जब टाइम मिलता है तोह हम वो जो सनी है किरयाने वाला अपने स्कूल के पास, उसके घर में वीसीआर लगा कर नीली

फिल्म देख कर साथ में हे मुट्ठ लगा लेते है. भाई बड़ा मजा आता है. तूने कभी मुट्ठ लगाईं है क्या?"

अर्जुन, "नहीं भाई मुझे ये सब नहीं पता लेकिन किसी दिन चलूँगा जरूर तेरे साथ सनी के घर."

"भाई किसी दिन क्यों, मई अभी तुझे एक गरमा गरम चीज दिखता हु", इतना बोलकर उसने अपने स्कूल के बास्ते से एक अखबार चढ़ी

किताब निकली और दोनों दोस्त साथ में बैठ कर देखने लगे. वीडियो गेम तोह वही रोक दी थी उन्होंने.

"भाई ये क्या है?" जैसे हे संदीप ने पहला पन्ना खोला एक फिरंगी लड़की बिलकुल नंगी थी और उसके मुँह में एक हब्शी का बड़ा

लुंड था.

"भाई ये लौड़ा चूस रही है. अपने देश में ऐसा बहोत काम हे होता है. और इतने बड़े लुंड भी अफ्रीका, अमेरिका के कालिओ के होते

है." इतना बता कर उसने अगला पन्ना पलटा तोह वह 2 चित्र थे. एक में वही फिरंगी लड़की उस हब्शी का कला लुंड अपनी छूट में लिए

थी और उसकी गोरी छूट फैली हुई थी. दूसरे चित्र में उसकी गांड में आधा लुंड था और उसके बड़े चुके हवा में झूल रहे थे.

"भाई ये क्या है? ये तोह वह भी डलवा रही है." अर्जुन ने उस फोटो पे हाथ रख कर पुछा जैसे की वह उसको छु हे लेगा.

"भाई ये भी एक मजा है. बहार की लड़कीअ खास कर जिनकी गांड मोती होती है वह लौड़ा गांड में लेती है मजे से. और लड़के

को भी इसमें बहोत मजा आता है क्योंकि ये छूट से भी टाइट होती है." संदीप इतना बोलकर अपना लुंड सहलाने लगा. ऐसे हे 2-3

पैन पलटने के बाद जब संदीप का जोश ज्यादा बढ़ गया तोह उसने अपना लुंड बहार निकल लिए और आगे पीछे करने लगा. अर्जुन

भी उसको देखने लगा. संदीप का लुंड मुश्किल से 5 इंच का था और 2 उंगलिओ से थोड़ा काम हे मोटा था. अर्जुन ने अब पन्ना उल्टा

तोह ये नजारा देख उसको भी जोश आ गया. वह एक बड़ी डबल पेज फोटो थी. वो फिरंगी लड़की एक काले के लुंड पर बैठी थी

पीछे से दूसरे हब्शी ने उसकी गांड में दाल रखा था और एक उसका मुँह छोड़ रहा था. ये नजारा देख उसने भी अपना लुंड बहार

निकल लिए.

"बाप रे.... ये क्या है बे?" उसका लुंड देख संदीप का तोह मुँह खुल्ला हे रह गया

"भाई वही है जो तेरे पास है." अर्जुन ने हँसते हुए जवाब दिए तोह संदीप उसके लुंड से अपनी तुलना करने लगा

फिर उन्होंने वापिस हिलने पे ध्यान लगाया तोह एक हे पन्ना पलटा था के संदीप के लुंड ने उलटी कर दी और वो मजे से वही लेट

गया. अर्जुन को ऐसे मजा नहीं आ रहा था तोह उसने वापिस अंदर दाल लिए. संदीप ने कागज से अपना 2 बूँद वीर्य साफ़ किआ और

किताब को वापिस बास्ते में छुपा दिए. दोनों अनजान थे के कोई उनपे खिड़की से नजर रखे था काफी देर से. तभी ज्योति की आवाज आई

"संदीप, कमरे में क्या कर रहा है? तुझे मम्मी बुला रही है निर्मला आंटी के घर." इतना बोलकर ज्योति ने दरवाजा पीटा तोह

अर्जुन ने गेम खेलने का नाटक शुरू कर दिए और संदीप ने दरवाजा खोला.

"अर्जुन तू यही रुक मई जरा माँ से मिलकर आता हु." इतना बोलकर वह मैं दरवाजे से बहार दौड़ गया. और ज्योति ने चिटकनी

लगा दी उसके बहार जाते हे.

"कोनसी गेम खेल रहे थे तुम दोनों?" वो जरा हैरत से बोली लेकिन अर्जुन स्पष्ट सा बोलै," क्यों दिख नहीं रहा?" उसने ज्योति की

गतिविधि भांप ली थी और दरवाजे की चिटकनी लगाना भी देख लिए था.

"वाह मेरे शेर. तू तोह एक हे बार में बड़ा हो गया. क्यों अपने हाथ से मजा नहीं आ रहा था?" इतना बोलकर वो वही अर्जुन की

गॉड में आ बैठी. अर्जुन ने भी बिना देर किये उसके पपीते पकडे और होंठो से होंठ मिला दिए. उसका लुंड जो अभी भी खड़ा

था ज्योति को अपने चूतड़ की दरार में चुभता महसूस हुआ तोह वह भी अपनी कमर हिलने लगी.

"तेरा दोस्त नहीं आता 2 घंटे से पहले. वो गया माँ के साथ अगले पार्क में सामान लेकर." इतना बोलकर वह लिपट गई अमरबेल

की तरह अर्जुन के तगड़े शरीर से. अर्जुन ने भी एक झटके में उसकी टीशर्ट खींच के फेंक दी एक तरफ और देखने लगे उसके

सांवले लेकिन कठोर बड़े बूब्स जो एक पुराणी सफ़ेद ब्रा में क़ैद थे. "वाह ये तोह बड़े प्यारे है." इतना बोलकर उसने दोनों

हाथो से उन्हें पकड़ कर किसी हॉर्न की तरह दबाना शुरू कर दिए. ज्योति की तोह गर्दन पीछे लुढ़क गई इतने जोरदार हमले से.

"दीदी, खोल दो no इन बेचारो को." उसने हाथ हटाकर ज्योति से गुहार लगाई. ज्योति ने भी बिना कुछ कहे एक झटके में उतार

फेंकी वो ब्रा. अब उसके मुलायम बड़े बूब्स आजाद थे. "दीदी इनका साइज क्या है? बड़े गोल मटोल है."

"34-स. और अब ज्यादा बोल मत बस मुझे संतुष्ट कर दे" इतना बोलकर उसने अर्जुन की टीशर्ट भी उतर दी.

Jyoti.jpg


इधर अर्जुन के मुँह और हाथ ने उसकी कठोर चूचियों को ढीला करना शुरू कर दिए था. वो जितना मुँह में आ सकता था उतना

हिस्सा पकड़ कर पी रहा था और दूसरे वाले को अचे से दबा रहा था . ज्योति के निप्पल भी कड़े हो चुके थे. उसने अर्जुन

को अपनी तरफ खींचा और लगी चूसने उसके होंठ. अब दोनों की नंगी छाती आपस में रगड़ कर करंट पैदा कर रही थी.

"कमीने आग लगा दी तूने मेरे इस बदन में. अब तू हे बुझा नहीं तोह तेरे घर आकर छुड़वा लुंगी मई." काम के नशे में

ज्योति कुछ भी बोले जा रही थी तोह अर्जुन ने उसको अपनी बाजुओं में उठा लिए और बीएड पर पटक दिए. इलास्टिक वाली सलवार अगले

हे पल जमीन पे थी और निचे ज्योति की नंगी बिना बालो वाली गुलाबी छूट उसकी आँखों के सामने थी.

"वाह दीदी क्या छूट है. कभी कोई लुंड लिए है क्या पहले?" अर्जुन ने अपनी ऊँगली ज्योति की छूट पर फिरते हुए पुछा तोह

ज्योति ने ना में गर्दन हिलाई. "बस कभी कभी ऊँगली करती हु और 2-3 बार मोमबत्ती तरय करि है." शर्माती हुई ज्योति ने

जवाब दिए. उसका खजाना अर्जुन क सामने खुला जो पड़ा था.

इतना सुनकर अर्जुन ने भी अपनी पेण्ट उतार दी और बहार निकल लिए अपने शेर पिंजरे से. इस समय तोह उसका लुंड और भी

खतरनाक लग रहा था. पिछले एक घंटे से जो उत्तेजित था वह.

Jyoti-2.jpg


(ज्योति)

एक बार फिर उसने ज्योति के बूब्स को मसलना शुरू

किआ और अपना लुंड छूट के ऊपर घिसने लगा. ज्योति का तोह मुँह हे बंद हो गया था इतना भयंकर लुंड देख लेकिन थी

वो लड़की भी ज़िद्दी. उसकी छूट जब ाची तरह से गीली हो गई तोह ज्योति ने खुद अर्जुन का लुंड पकड़ कर टिका दिए छूट के

मुँह पे. अर्जुन ने भी एक माध्यम गति का धक्का लगा दिए. दोनों के मुँह से हलकी कराह निकल गई. उसका टोपा ज्योति की टाइट

छूट में बैठ गया था और इसके साथ हे अर्जुन के लुंड का टंका भी खुल गया था. लेकिन ज्योति थोड़ी अनुभवी थी. खेल

को उसने अपने कण्ट्रोल में लिए.

"एक मिनट रुक जा. मेरे चुके दबा और पी थोड़ी देर." अर्जुन ने वैसा हे किआ. उसने उतना हे लुंड डाले ज्योति की ढूढ़

निचोड़ने शुरू कर दिए. वो भी अर्जुन के चूतड़ सेहला रही थी. जैसे हे थोड़ा ाचा महसूस होने लगा उसने अर्जुन को

kaha,"Chal अब आराम से एक धक्का मार और फिर रुक जाइओ"

अर्जुन ने भी अपनी कमर को साध के एक मजबूत धक्का लगा दिए. लेकिन इस बार उसका मुँह ज्योति के होंठ दबाये हुए था.

"आह माँ मर्डर गई re...."Ye आवाज किसी तरह फिर भी बहार निकल हे गई. अर्जुन का खूंटा आधा गदा हुआ था ज्योति की

छूट में. और अब वो उसके चारो तरफ मजबूती से लिपटी गई थी रबर के जैसे.

"इस से ज्यादा न ले पाउंगी रे मई तेरा. पूरा छेद भर दिए तेरे लुंड ने." ज्योति ने ये बात कही तोह अर्जुन ने देखा

की उसकी आँखों से आंसू और छूट, जहा उसका लौड़ा फसा हुआ था वह से खून की कुछ बूंदे बहार आ रही थी.

"नहीं डालूंगा इस से ज्यादा. अगर कहती हो तोह ये भी निकल लेता हु. बहुत दर्द हो रहा है? अर्जुन का दिल पसीज गया

"पहले दर्द देता है और अब जब मलहम की बारी आई तोह भागने लगा. चल अब आराम से थोड़ा बहार निकल और फिर वापिस

दाल. धीरे धीरे." ज्योति ने अपने चेहरे पे छोटी सी मुस्कान लेट हुए कहा. उसको भी पता था के अर्जुन बड़ा सीधा

और साफ़ दिल लड़का है. यही सोच कर तोह वह इसके निचे आ गई थी.

अर्जुन ने फिर 3 इंच के करीब निकला, टोपा अंदर हे रहने दिए और फिर उतना वापिस पेल दिए. अपनी कोहनिया उसने बीएड पे टिका

ली थी और शुरू कर दिए हलके धक्के देने. हर धक्के के साथ उसका लुंड ज्योति की छूट की दीवारों से रगड़ता हुआ अंदर

जा रहा था.

"आह मेरे सोहने भाई. थोड़ा तेज कर लेकिन इतने हे लुंड से." ज्योति की सिसकारिअ बढ़ती जा रही थी और अर्जुन भी जोश

से लगा हुआ था. वो अब तक़रीबन 5 इंच तक लुंड अंदर बहार कर रहा था.

ज्योति की चाचियों पे उसके हाथ और दांत के निशान बन चुके थे. होंठ भी ाचे से चबा डाले थे. 15 मिनट के

बाद ज्योति की छूट ने एक और बार पानी बहा दिए था और इस बार ये पानी बीएड तक आ पहुंच था. लेकिन अर्जुन लगा रहा

अब तोह वह उसकी आवाज भी नहीं सुन रहा था. ताबड़तोड़ धक्के मारते मारते 5 मिनट के बाद उसके लौड़े ने भी ज्योति की

छूट में पानी खली करना शुरू कर दिए. तक़रीबन 5-6 पिचकारियां मारने के बाद अर्जुन ने अपना लुंड जैसे हे बहार

निकला "पुक्क" की आवाज हुई और ज्योति दर्द और मजे से दोहरी हो चुकी थी..

"हाय माँ. बड़ा बेदर्द है रे तू. मेरी छूट हे फाड़ दी रे. " जैसे हे उसकी नजर अपनी छूट पे गई तोह देखा के

छेड़ 2 रुपये की सिक्के जितना खुल्ला पड़ा था और उसमे से अर्जुन और उसका खुद का पानी बहार आ रहा था. जांघो

पे खून लगा था.

"दीदी लुंड तोह मेरा भी चील गया है." हँसते हुए अर्जुन बाथरूम में चला गया और अपना लुंड धोकर कपडे पहन

ने लगा. ज्योति अभी भी बीएड पे बैठी थी. अर्जुन ने उसको जैसे हे उठया वह लड़खड़ा गई. रुको. इतना बोलकर उसने

ज्योति को अपनी बाँहों में उठाया और बाथरूम में ले आया. ज्योति ने टूंटी का सहारा लेकर अपनी छूट साफ़ की और बहार

आकर कपडे पहने.

"बड़ा बेदर्द है रे तू. मई तोह तुझे बचा समझती थी. तूने तोह मेरी छूट का हे सत्यानाश कर दिए. अब बहार जा

और फ्रिज पे रखा दवा का डब्बा लेकर आ. " बीएड पे बैठ गई इतना बोलकर ज्योति और अर्जुन डब्बा और पानी लेकर आ

गया.

"ये लो दीदी", अर्जुन ने उसको दिए तोह ज्योति ने एक पेनकिलर निकाल के खाई और वही लेट गई.

"चल अब तू जा. मई संभल लुंगी सब." ज्योति ने जैसे हे इतना कहा अर्जुन ने झुक कर उसके होंठ एक बार फिर चूम

लिए और चूंकि दबा के भाग लिए बहार. अपनी साइकिल लेकर आ गया वापिस घर जहा इस समय शांति पसरी हुई थी.
 
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