Incest Katha Chodampur Ki - Page 40 - SexBaba
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Incest Katha Chodampur Ki

सभ्य- आह्हः बछहहाः ह ऐसी होई छोड़ड़ड़ अपनीइ ताआईई को.

सभ्य सरजू का जोश बढ़ाते हुए चुद रही थी.

इधर दूसरी खत पर जग्गू शालू की गांड मार रहा था.

खैर कुछ देर ऐसे hi चुदाई और चलती है एक एक बार सब और झड़ते हैं, तब जाकर शांत होते हैं और उसी समय रज्जो भी घर में आती है और आंगन में आकर देखती है तो उसके मुँह से सिर्फ हाय दिया निकलता है...



अपडेट 245

रज्जो की शुरूआती हैरानी ख़तम होने में ज़्यादा समय नहीं लगता और करीब 5 मिनट के बाद hi वो भी शालू और सभ्य के बगल में घोड़ी बानी होती है और उसके बड़े बेटे सरजू का लुंड उसकी गांड से अंदर बहार हो रहा होता है वहीँ उसके पति दीनू उसके बगल में सभ्य की गांड में अपना लुंड चला रहे होते हैं और छोटा बीटा बिरजू शालू की गांड मार रहा होता है, इसी तरह कुछ देर तक चुदाई चलती है और फिर शालू और सभ्य अपने घर चले जाते हैं.

(कर्मा की ज़ुबानी)

ऐसे hi शाम होती है सब अपने अपने काम में लगे होते हैं, इसी बीच मेरा फ़ोन बजता है तो देखता हूँ की पियूष का होता है,

में- हाँ पियूष भाई कैसे हो?

पियूष- कहाँ है?

में- घर hi हूँ, तुम बताओ.

पियूष- मिलेगा अभी?

में- ठीक है आता हूँ, थोड़ी देर में.

पियूष- अरे नहीं तू रहने दे मैं आता हूँ वहीँ, बाघ में मिल अपने आधे घंटे में.

में- ठीक है आ जाओ,

मैं फ़ोन काटता हूँ और नीचे देखता हूँ जहाँ प्रेमा भाभी नीचे लेती थी और मेरा लुंड उनकी छूट में समाया हुआ था,

भाभी- ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह लललललाहहह अब छोड़ू न फ़ोन को छोडो,

में- हाँ भाभी मैं रह नहीं सकता बिना चोदे तुम्हे,

मैं धीरे धीरे भाभी की छूट में धक्के लगाने लगता हूँ और भाभी की आहें निकलने लगती हैं,





करीब 20 मिनट्स तक और भाभी को छोड़ने के बाद मैं उनके मुँह में अपना रास छोड़ कर झाड़ जाता हूँ,

कमरे से बाहर निकलता हूँ तो जग्गू और ताऊजी मिलकर नीतू और तै को पेल रहे होते हैं, मैं उन्हें बता कर घर से निकल जाता हूँ, और कुछ hi देर में बाघ में होता हूँ जहाँ पियूष मेरा इंतज़ार पहले से कर रहा था,

में- अब बताओ क्या हुआ,

पियूष- पेप्सी पियेगा?

में- हाँ चलो,

थोड़ी hi देर में हम लोग हलवाई की दुकान पर होते हैं और पेप्सी और समोसा खा रहे होते हैं,

पियूष कहते हुए कुछ सोचता है और बोलता है- यार रात से hi न एक बात मेरे दिमाग में चल रही है.

में- क्या?

पियूष- वही जो तूने रात को पहले रज्जो चची की वीडियो दिखाई फिर ये बताया की उनका और तेरे पापा का, ये सब जानकर भी तू इतना आराम से कैसे है?

में- तो इसमें परेशां होने वाली बात क्या है?

पियूष- अरे तेरे पापा का तेरे दोस्त की मम्मी के साथ चक्कर है ये परेशां होने वाली बात नहीं है, तेरी मम्मी के साथ धोखा हो रहा है.

में- अरे वो सब छोडो पहले उधर देखो,

मैं पियूष को एक और इशारा करके देखने की कहता हूँ तो पियूष गर्दन घुमा कर उधर देखता है, थोड़ी hi दूर हलवाई की बीवी नल के किनारे बैठ कर बर्तन धो रही होती है. उसका पल्लू सरका हुआ होता है और उसकी चूचियों ककी घाटी नज़र आ रही थी,





पियूष ने उसकी और कुछ पल घूरा और फिर बापिस मेरी तरफ देख कर मुस्कुराने लगा,

पियूष- कितना कमीना है रे तू, बता मैं यहाँ कितनी गंभीर बात कर रहा हूँ और तेरा ध्यान कहाँ है,

में- अरे क्यों तुम्हे अछि नहीं लगी क्या पिक्चर?

पियूष- अब पिक्चर अछि है तो अछि लगेगी hi, पर मैं जिस बारे में बात कर रहा हूँ वो भी तो सुन कर जवाब दे.

में- आओ चलते चलते जवाब देता हूँ, समोसा और पेप्सी ख़तम हो गए हैं.

इसके बाद हम लोग उठे और चलने लगे.

पियूष- हाँ अब बता,

में- तुम यही पूछ रहे हो न की मैं इतना आराम से कैसे हूँ,

पियूष- हाँ

में- ाचा उससे पहले तुम बताओ रज्जो चची का बदन कैसा है, क्या कोई उन्हें छोड़ने का मौका छोड़ेगा? या तुम छोड़ोगे ईमानदारी से बताओ.

पियूष- अरे यार तूने तो उल्टा मुझ पर hi दाल दिया, वैसे ईमानदारी से कहूं तो नहीं यार मैं भी ये मौका नहीं छोडूंगा.

में- तोह फिर जब हम नहीं छोड़ सकते तो उनसे उम्मीद क्यों करते हैं छोड़ने की सिर्फ इसलिए की वो पापा हैं, हम ये भूल जाते हैं की हमारे माँ बाप होने के साथ साथ वो भी इंसान hi हैं उनकी भी इच्छाएं हैं.

पियूष- कह तो तू सही रहा है पर अगर तेरी मम्मी को ये सब पता चला तो घर में कलेश नहीं हो जायेगा तगड़ा वाला.

में- जहाँ तक मैं अपने माँ पापा को जनता हूँ, माँ को भी इस बारे में ज़रूर पता होगा.

पियूष- पता होगा ये तू कैसे कह सकता है और फिर भी उन्हें कोई परेशानी नहीं है.

में- क्यूंकि माँ पापा एक दुसरे से कुछ नहीं छुपाते, और दूसरा माँ ने हमें हमेशा यही सिखाया है की परिवार में एक दुसरे से जलन की कोई जगह नहीं होनी चाहिए, अगर किसी चीज़ से किसी को बिना नुकसान के मज़ा मिल रहा है तो लेने दो.

पियूष- बहुत अलग है यार तेरा परिवार समाज से.

में- यही तो बात है भाई, माँ पापा ने यही सिखाया की समाज के सरे नियम वगेरा घर के बाहर तक सही हैं घर में जो अपने परिवार को ख़ुशी दे वो करो चाहे समाज के लिए सही हो या गलत क्यूंकि अंत में हमें परिवार के साथ hi रहना है हर मुसीबत में परिवार hi काम आता है समाज नहीं.

पियूष- तेरी ये बात तो बिलकुल सही है, मुसीबत में समाज मुँह मोड़ लेता है परिवार hi साथ खड़ा होता है.

में- तभी तो अपने माँ पापा से एक दोस्ती का रिश्ता बना कर रखना चाहिए, ताकि हम अपनी बातें उनसे कर सकें उनकी सुन सकें इससे घर का माहौल ाचा रहता है,

पियूष- यार सच में चाहता तो मैं भी यही हूँ की मेरे और पापा के बीच भी दोस्ती का रिश्ता हो, उनका कोई दोस्त भी नहीं है, और मुझसे सिर्फ उतनी बात होती है जितनी ज़रुरत हो,

में- तो कर लो दोस्ती क्या दिक्कत है?

पियूष- यार इतना आसान नहीं है न, अब तक कुछ नहीं और अचानक से बात करने लग जॉन झिझक होती है,

में- अरे यार जिन्होंने पैदा किआ उनसे क्या झिझक. उनके सामने नंगे घुमते होंगे अब झिझक रहे हो.

इस पर वो हंसने लगा,

पियूष- तो तू hi बता क्या करूँ?

में- करना क्या है थोड़ा समय बिताओ उनके साथ, फिल्म वगेरा देखने जाओ. घूमो फिरो बातें तो अपने आप हो जाएँगी,

पियूष- हाँ यार कह तो तू सही रहा है बहुत दिन हो गए मैं भी घूमा नहीं कहीं

में- तो लेकर जाओ फिर सबको मस्त फिल्म वगेरा दिखाओ.

पियूष- हाँ यार तू चलेगा?

में- अरे पहले सिर्फ परिवार के साथ जाओ हम लोग बाद में चल लेंगे.

पियूष- चल ठीक है ये भी, ाचा तुझसे कुछ बात सांझा कर सकता हूँ

में- हाँ बिलकुल.

पियूष- पर थोड़ी निजी है किसी को बताना मत तुझ पर भरोसा है इसीलिए तुझसे बात कर रहा हूँ.

में- अरे कोई दिक्कत नहीं भाई तुम बेफिक्र बोलो

पियूष- यार मुझे लगता है की मेरे और तेरी भाभी के बीच भी कुछ ठीक नहीं चल रहा.

में- क्यों लड़ाई हुई क्या?

पियूष- अरे लड़ाई नहीं हुई है, बस वो रोमांच सा नहीं लगता जो पहले होता था, चुदाई भी करते हैं वो मन भी नहीं करती पर वो पहले वाली उत्सुकता नहीं दिखती उसके अंदर.

में- बस इतनी सी बात.

पियूष- इतनी सी बात मतलब.

में- मतलब कुछ नहीं बस ये समझो की एक hi चीज़ एक hi तरीके से बार बार करके कोई भी पाक जाता है.

पियूष- फिर क्या करूँ और?

में- थोड़ा नयापन लाओ, कुछ नए तरीके ढूंढो, सिर्फ बिस्तर पर मत करो कभी बाथरूम में करो कभी आँगन में तो कभी छत पर कभी रसोई में,

पियूष- अरे पागल है क्या सब होते हैं घर पर.

में- वही तो रोमांच बढ़ाएगा. थोड़ा छेड़ो बीच बीच में.

पियूष- चल तू कह रहा है तो करके देखता हूँ,

में- ठीक है ज़रूर करना सब सही हो जायेगा,

पियूष- ज्ञानी आदमी है तू इस मामले में तो.

में- वो तो मैं हूँ,

हम दोनों बातें करते हुए बाघ तक आ जाते हैं फिर वो अपनी मोटरसाइकिल लेकर निकल जाता है और मैं घर आ जाता हूँ, और फिर खाना पीना होता है और फिर खा कर सब सो जाते हैं,

मज़ाक कर रहा हूँ चोदामपुर में लोग ऐसे hi सो जाएं कैसे हो सकता है, खाने के बाद चुदाई का दौर चलता है, पहले आँगन में hi सब एक साथ चुदाई करते हैं और फिर अपनी अपनी पसंद अनुसार के साथियों के साथ सोने चले जाते हैं,

मुझे मामी और किरण दोनों माँ बेटी का साथ मिलता है तो अनुज और सागर मिलकर पल्ली को अपने साथ सुलाते हैं, ममता चची को मां और मौसा पकड़ लेते हैं, तो मौसी अपने दोनों जीजा यानी पापा और राजन चाचा के साथ चल देती हैं, इधर नाना तो आँगन में hi सोने वाले थे तो माँ तो नाना के लुंड पर सवार भी हो चुकी थी.





नाना का लुंड माँ की गांड में घुसा हुआ था और नाना नीचे से कमर हिलाकर अपनी बड़ी बिटिया की गांड मार रहे थे..

इसी तरह रात बीती और फिर अगले दो तीन दिन ऐसा hi बीते एक शाम को मेरे पास पियूष का फ़ोन आया और बोलै- अरे सुन यार कल तुझे कहीं जाना तो नहीं?

में- नहीं तो क्यों क्या हुआ?

पियूष- यार कल फॅमिली के साथ फिल्म का प्रोग्राम बनाया है तो गाडी मिल सकती है क्या?

में- हाँ बिलकुल कल सुबह तुम्हारे घर पहुँच जाएगी.

पियूष- फिर ठीक है कल सुबह सबको सरप्राइज देता हूँ.

में- हाँ सब खुश हो जायेंगे.

पियूष- ठीक है फिर कल मिलते हैं.

इतना कहकर वो फ़ोन काट देता है और मैं तुरंत अंजलि को फ़ोन मिलता हूँ और उसे कुछ समझाता हूँ.

अगली सुबह होती है और मैं गाडी लेकर गैंदपुर निकल जाता हूँ,

पियूष मुझे घर के बाहर hi तैयार मिलता है उसके साथ मैं अंदर जाता हूँ तो सबसे नमस्ते करता हूँ,

उसके मम्मी पापा और पत्नी भी तैयार थे पहले से hi, सिर्फ अंजलि नहीं थी क्यूंकि कल मैंने hi उसे कुछ बहाना बनाने को बोल दिया था.

में- सब तैयार हैं पहले से hi?

सावित्री- हाँ बीटा बस अंजलि की तबियत ठीक नहीं तो ये नहीं जा रही है,

रानी- कोई नहीं मम्मी जी थोड़ा आराम करेगी तो हो जाएगी ठीक, हैं न अंजलि?

रानी ने अंजलि की और आंख मरते हुए कहा तो अंजलि ने अपनी भाभी को आँखों से इशारे से hi चुप रहने का इशारा किआ,

सावित्री- और बीटा मम्मी पापा कैसे हैं?

में- अचे हैं आपको याद कर रहे थे,

ये सुनते hi सासु माँ के मन में उस रात के दृश्य ताज़ा हो गए.

सावित्री- अरे याद तो हम भी कर रहे थे.

सावित्री ने थोड़ा शरमाते हुए कहा हालाँकि मैं उस शर्माने के पीछे की वजह जनता था,

पियूष- चलो फिर निकलते हैं हम लोग,

महिपाल सिंह- हाँ समय से निकल चलो तो ाचा है.

पियूष- अरे अंजलि मेरी मोटरसाइकिल की चाबी कर्मा को दे दे ये बापिस उससे चला जायेगा,

अंजलि- दे रही हूँ भैया, पर चाय चढ़ा दी है इनके लिए.

महिपाल सिंह- अरे ाचा किआ बीटा चाय पि कर hi जाना.

में- जी चाचाजी,

पियूष- अरे हम लोग तो निकलते हैं.

सावित्री- हाँ भाई चलो चलो.

जल्दी hi कुछ पलों में सब बाहर आते हैं और फिर गाडी में बैठते हैं और पियूष गाडी लेकर निकल जाता है उनके जाते hi मैं और अंजलि बापिस घर में घुसते हैं अंजलि दरवाज़ा लगाती है और जैसे hi पीछे मुड़ती है मैं उसे बाहों में जकड लेता हूँ, वो थोड़ा खिलखिलाती है और अपनी बाहें भी मेरे बदन पर कास लेती है, कुछ पल बाद hi हम दोनों के होंठ आपस में मिल जाते हैं और एक दुसरे को पागलों की तरह चूमने लगते हैं, उसके रसीले होंठों को चूसने में मुझे जन्नत का मज़ा मिल रहा था सच में एक अलग hi एहसास था उसके होंठों में, मैंने उसे चूमते हुए उठा लिया और बिना होंठों को अलग किये hi उसे आँगन में ले गया और सोफे पर लिटाकर उसे चूसने लगा, वो भी मेरा पूरा साथ दे रही थी, हम दोनों का मन hi नहीं भर रहा था एक दुसरे के होंठों से और हम अलग नहीं हो रहे थे,

कुछ hi पलों में होंठों के बाद जीभ की बारी थी, हम दोनों की जीभ आपस में कुश्ती कर रही थी, काफी देर तक हम एक दुसरे के होंठों और जीभ को चूसते रहे और हांफते हुए अलग हुए कुछ पल एक दुसरे की आँखों में देखा और फिर से होंठ जुड़ गए इस बार भी काफी देर के बाद होंठ अलग हुए,

अंजलि- बहुत चालक हो तुम ये सब करने के लिए सब को भेज दिया.

में- और क्या वो वहां मज़े करेंगे हम यहाँ,

अंजलि- ाचा और मैं मज़े न करने दूँ तो.

में- तो कोई बात नहीं मेरे लिए तुम्हारे साथ रहना hi बहुत है,

अंजलि- सच्ची?

में- मुछि...

ये सुन कर वो कड़ी हो गयी और मेरी आँखों में देखते हुए मेरी शर्ट के बटन खोलने लगी, शर्ट के बटन खोलते हुए वो मेरे सीने पर चूमने लगी तो मुझे बदन में सरसरी होने लगी, मेरी शर्ट के बटन खोल कर उसने मेरी शर्ट को मेरी बाहों से निकल दिया मैं ऊपर से नंगा हो गया, फिर वो मेरे बदन को जगह जगह चूमने लगी, मेरा बदन उत्तेजना में तपने लगा, शर्ट के बाद उसने मेरी पंत भी निकली अब उसके सामने मैं कच्चे में था मेरा लुंड कच्चे में तम्बू बनाये हुए था,

अंजलि- इसे देखो कैसे सर उठाये खड़ा है,

वो कच्चे के ऊपर से hi मेरे लुंड को सहलाते हुए बोली तो मेरी आह्ह्ह्हह्ह निकल गयी,

अंजलि- बहुत किस्से सुने हैं बच्चू तुम्हारे अब जाकर दर्शन होंगे,

ये कहकर उसने मेरा कच्चा नीचे सरका दिया और मेरा लुंड उसके चेहरे के सामने झूलने लगा,

अंजलि उसे देख हैरान हो गयी और कुछ पल बस झूलते हुए लुंड के साथ उसकी आँखें ऊपर नीचे होने लगी उसका हाथ अनायास hi आगे बढ़ा और मेरे लुंड पर उसकी उँगलियों ने स्पर्श किआ तो मेरे मुँह से एक गरम अह्हह्ह्ह्ह निकल गयी,

अंजलि- अह्हह्ह्ह्ह कितना गरम और सख्त है ये,

ये कहकर वो अपनी उँगलियों से उसे महसूस करने लगी और मेरी आँखें मज़े से अपने आप बंद हो गयी,

अंजलि- आँखें जब तक मैं न बोलू बंद hi रखना,

में- छ्हम्म ठीक है.

कुछ पल बाद मुझे अंजलि कुछ हरकतें करती हुई महसूस हुई उसका हाथ भी मेरे लुंड से हैट गया, और कुछ पल बाद उसने आँखें खोलने को कहा तो मैंने उसे देखा और हैरान रह गया, वो मेरे सामने अपने घुटनों पर बैठी थी, मेरा लुंड उसके हाथ में था और उसके चेहरे के सामने था पर मेरे लिए हैरानी का कारण कुछ और था और वो कारण था की उसके बदन पर एक भी कपडा नहीं था वो पूरी नंगी मेरे सामने थी, मेरी नज़र तो उसके बदन पर hi जैम गयी वहीँ वो मेरी आँखों में देखते हुए बोली - कैसा लगा सरप्राइज?

में- इससे ाचा कुछ भी नहीं,

अंजलि- और ाचा दिखाऊं?

में- हाँ,

उसने अपना चेहरा आगे किआ और अपनी जीभ निकल कर मेरे लुंड के टोपे पर फिरै और मैं उसकी जीभ के स्पर्श से सिहरने लगा पूरे बदन में कंपकंपी सी दौड़ गयी,

में- ohhhhhhhhhh माआहह.

अंजलि मेरी इस प्रतिक्रिया पर मुस्कुराई और फिर मेरे लुंड को अपने मुँह में भर लिए और चूसने लगी,

मेरी आँखें एक बार फिर से आनंद के मरे बंद हो गयी वो अपना मुँह मेरे लुंड पर चलने लेगी, मैंने कुछ पल बाद आँखें खोल कर देखा तो वो मेरा लुंड पूरा अपने गले तक लेने की पूरी कोशिश कर रही थी और ये देख मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी, मैं सोचने लगा मैंने अपने लिए बिलकुल सही लड़की चुनी है.





अंजलि ने काफी देर तक मेरा लुंड चूसा और लगातार मेरी आहें निकलती रही, जब मुझे लगा की अब रुक जाना चाहिए नहीं तो रास निकल जायेगा तो मैंने उसे रोक दिया और उसे खड़ा किआ और फिर उसके होंठों को चूसते हुए उसे उठाया और सोफे पर लिटा दिया और खुद उसके ऊपर चढ़कर उसकी गर्दन और चेहरे को चूमने लगा और फिर नीचे सरकते हुए उसके सीने पर आ गया,

उसके संतरे की आकर की चूचियां उसके बदन का अनुसार बिलकुल सही अकार की थी मैंने एक चुकी को अपने हाथ में थमा तो हम दोनों की सिसकी निकल गयी मेरी उसकी कोमल चुकी की वजह से तो उसकी मेरे स्पर्श से, मुझसे और फिर रुका नहीं गया और मैं उसकी चूचियों पर टूट पड़ा, अह्हह्ह्ह्ह कितना मज़ा आ रहा था उसकी चूचियों को चूसने में,

वही वो भी मेरे सर पर हाथ फिरते हुए कराह रही थी, मैं बदल बदल कर उसकी चूचियां पि रहा था, चूचियों को अचे से जी भर के चूसने के बाद मैं और नीचे उसके पेट और नाभि को चूसने लगा तो उसका बदन कंपनी सा लगा, उसकी नाभि मुझे बहुत रसीली लग रही थी, जिस मैं खूब स्वाद लेकर चूस रहा था और वो मज़े से तड़प रही थी,

पेट और नाभि के बाद छूट की बारी थी उसकी छूट के सामने हैकर कुछ पल तो मई बस उसकी सुंदरता को निहारता रहा, सच मैं बहुत प्यारी छूट थी उसकी देखते hi मेरे मुँह से पानी बहने लगा, मैंने खुद को और उसे ज़्यादा नहीं तड़पाया और अपना मुँह उसकी छूट पर लगा दिया और पागलों की तरह चाटने लगा, वो नीचे लेती हुई मचलने लगी, मैं तो वर्षों के भूखे की तरह उसकी छूट पर टूट पड़ा वो तो ऐसे सिसक और आहें भर रही थी जैसे उसकी जान निकलने वाली हो,

ाचा था घर में कोई नहीं था क्यूंकि पूरे घर में उसकी आहें गूँज रही थी,

कुछ पल बाद hi मुझे उसकी छूट की चासनी अपने मुँह में बहती हुई महसूस हुई और वो मचलते हुए शांत हो गयी, मैंने उसकी जांघों के बीच से मुँह हटाया और उसके चेहरे की और देखा वो हांफते हुए मुझे देख कर मुस्कुरा रही थी, मैं वैसे hi खड़ा हुआ मेरा लुंड तो कब से तैयार था असली खेल के लिए,

हम दोनों की साड़ी बातें आँखों में hi हो रही थी न मैं कुछ बोल रहा था और न वो, माईनस उसके पैरों में जगह ली और लुंड को पकड़ कर टोपे को छूट के ऊपर रखा तो हम दोनों को hi एक सिरहन हुई,

मैंने उसकी आँखों में देखते हुए आँखों से hi पूछा तो उसने आगे बढ़ने का इशारा किया तो मैंने धीरे से धक्का लगाया पर लुंड उसकी छूट में नहीं घुसा क्यूंकि वो बहुत कासी हुई थी, मैंने उसकी टैंगो को थमा और फिर लुंड को छूट के द्वार में फंसते हुए ज़ोर लगा कर धक्का लगाया तो लुंड उसकी छूट को चीयर कर थोड़ा अंदर घुस गया और उसकी चीख निकल गयी.

अंजलि- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह कर्मा आह्हः रुक जोऊ अब नाहीई बहुत दर्द हो रहा है.

में- बस थोड़ा सा फिर नहीं होगा.

ये कहकर मैं धीरे धीरे छोटे छोटे धक्के लगता रहता हूँ और लुंड उसकी छूट में धीरे धीरे घुसता रहता है, फिर मैं लुंड को हल्का सा बाहर खींचता हूँ और फिर उसकी कमर को थम कर एक धक्का लगता हूँ तो लुंड उसकी छूट को चीरता हुआ अंदर घुस जाता है और वो बड़ी तेज़ी से चीखती है,

उसकी आँखों से आंसू बाह रहे होते हैं, मैं कुछ पल यूँ hi रुक जाता हूँ और उसे चुप करने की कोशिश करता हूँ उसकी चूचियों को चूसता हूँ उसके बदन को सहलाता हूँ तब जाकर वो थोड़ी शांत होती है, मैं धीरे धीरे से अपना लुंड थोड़ा बाहर खींचता हूँ तो मुझे उस पर खून लगा दीखता है जो की उसके कुंवारेपन की निशानी था, मैं लुंड को निकल कर एक कपडे से पोंछता हूँ और फिर से लुंड को दोबारा उसकी छूट में घुसा देता हूँ और इस बार लुंड बिना किसी तकलीफ के घुसता चला जाता है,

अंजलि- अह्हह्ह्ह्ह कितने गंदे हो तुम इतना दर्द हुआ मुझे.

में- अरे मेरी जान जितना दर्द हुआ उससे ज़्यादा अब मज़ा भी तो आएगा न,

अंजलि- बड़े आये मज़ा देने वाले इतना मोटा घुसा दिया एक hi झटके में.

में- ाचा माफ़ कार्डो,

अंजलि- अब माफ़ी मत मांगो और जो मज़े की बोल रहे हो वो देकर दिखाओ.

उसने मुस्कुराते हुए कहा तो मैंने झुककर उसके होंठों को चूसा और फिर धीरे धीरे से अपने लुंड को उसकी छूट में चलना शुरू कर दिया वो भी आहें भरते हुए अपनी पहली चुदाई का आनंद लेने लगी,

अंजलि- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह सच्ची बहुत्तत्त माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आ रहा है,

में- मैंने कहा था न मेरी जान बहुत मज़ा आएगा.

अंजलि- अह्हह्ह्ह्ह हाँ सुना तो था पर इतना आएगा ये कभी नहीं सोचायहहह था ऐसे hi छोड़ते रहो,

अंजलि खुद की छूट के दाने को रगड़ते हुए बोली और मैं उसकी छूट में ढके लगते हुए उसकी चूचियों को हाथ बढाकर दबाने लगा.





मैं उसे इसी तरह लगातार छोड़ता रहा फिर कुछ पल बाद hi उसने मुझसे आसान बदलने को कहा और मुझे नीचे लिटाकर खुद मेरे ऊपर आ गयी और मेरे लुंड को अपनी छूट में भर कर अपने चूतड़ों को उछलने लगी,

अब वो खुलकर चुदाई का मज़ा ले रही थी, देख कर लग hi नहीं रहा था की कुछ देर पहले hi उसकी सील टूटी है, हम दोनों के बदन पसीने से तर होकर चमक रहे थे





मुझे भी उसके साथ एक अलग hi आनंद आ रहा था जो की आज तक नहीं आया था, उसकी उत्तेजना और गरमी देख कर मुझे लग रहा था मैंने सही लड़की से प्यार किआ है, जो हर तरह से मेरा साथ देगी,

कुछ देर के चुदाई के बाद वो थोड़ी थकी और झुक कर धीरे धीरे अपने चूतड़ों को चलने लगी तो मैं भी नीचे से उसे छोड़ने लगा,





Anjali- ahh pata hota tumhara lund itna mazaaaaahhhhhhhh dega to ab tak ise kab ka apani choot mein bhar leti.

Me- ab bhi der nahi hui hai meri jaan ab bahut mauke milenge,

Anjali- ahh ab main thak rahi hun tum chodo na.

Uska itna kahna tha ki maine uski kamar ko thama aur phir tabadtod dhakke lagane shuru kar diye. Wo lagatar aahein bhar rahi thi aur mera lund piston ki tarah uski choot mein andar baahar ho raha tha kuch der ki aisi hi dumdar chudai ke baad hum dono hi bahut uttejit ho gaye the aur na maine aur na usne khud ko rokne ki koshish ki aur jaldi hi main aur wo ek saath jhad rahe the maine apane ras ki pichkari uski choot mein bhar di aur phir uske bagal mein hanfate huye let gaya hum dono ek doosre ki baahon mein kuch der yun hi lipte hute lete rahe kuch pal ke araam ke baad uthe tp usne mere honthon ko choosa aut phir meri aankhon mein dekh kar boli- I love you।

Me- I love you too,

Ek baar phir se maine use chooma phir wo mere badan ko choomti hui neeche sarakne lagi aur mere pairon ke beech baith gayi,

Mera lund jo thoda shant pada hua tha use usne apani ungaliyon mein thaama to jaise usme jaan aane lagi, aur phir usne jhuk kar apane muh mein bhar lia to maano meri jaan nikalte huye bachi, meri aankhon mein dekhte huye usne pahle jeebh se lund ke tope ko chaata to maano main sihar utha aur phir use apane honthon mein bhar lia,





Mera lund to turant hi apane poore aakaar mein aa chuka tha main uski is kamukta bhari kala dekh kar aahein bharne laga,

Kuch der tak wo yun hi mera lund choosti rahi aur main aahein bharta raha usne lund tab chhoda jab wo bilkul santusht ho gayi,

Mera lund uske thook se poora sana hua tha use pakad kar seedha kar wo mere upar aai aur ghoom gayi mujhe laga phir se mere lund par is baar chehra doosri or karke aur usne aisa hi kia aur neeche hote huye mera lund pakada aur phir mujhe hairan karte huye lund ko choot par tikane ki jagah apani gand ke chhed par tika diya.

Me- tum ye kya kar rahi ho choot mein itna dard hua gand to bahut dard karegi.

Anjali- ab chaunkane ki baari tumhari hai,

Ye kahkar usne lund ke upar dabav banaya aur phir lund uski gand ko cheerta hua topa andar ghus gaya,

Uske muh se ek halki si cheekh nikli, aur wo gahri saansein lete huye thoda thoda neeche hone lagi aur halka halka lund uski gand mein utarne laga, main ye sab dekh hairan tha kuch pal baad hi mera poora lund uski gand mein samaya hua tha,

Me- ahhhhhhh uhmmmm yaar kitni garam aur makhmali hai ye par itni asaani se tumne lund gand mein ahhhh kaise le luyaaah।

Anjali- ahhhhhhh asaaani se kahan itni chaudhi kar di hai gaaaannddd ahhhhhh main kheere se apaniii gaanddd ko kholtiii thiiiiahhhh usi ka asar hai,

Me- are waahhhh isse mera fayda ho gaya ab tumhari gand mujhe nahi kholni padi,

Anjali- ahh haan choot mein seal tootne ka dar hota tha to gand par hi sab use karti thi।

Me- ahhhh sahi kia Meri Jaan tabhi to mujhe tumhari ye gand mili aaj maarne ko.

Anjali- ahh ab to mil gayi hai aur lund bhi poora ghus gaya hai ab maaro na baabu,

Bas phir kya tha maine bina lund nikale hi use god mein uthaya aur phir zameen par ghodi bana diya aur phir upar aa kar dheere dheere dhakke lagane laga

Anjali- ahh ohhh yeahhh mazaa aa raha hai thoda tez se maaroo naaahhhh.

Bas mujhe yahi sunna tha aur maine uski gand ko kootna shuru kar diya





हर झटके के साथ वो कराह रही थी पर रुक्नु को नहीं बोल रही थी इसी बात का मैं फायदा उठा रहा था, करीब 10 मिनट्स तक ऐसे गांड मरवाने के बाद वो झड़ने लगी और गिर गयी पर मुझसे अब नहीं रुका जा रहा था मैंने उसे उठा कर अपने ऊपर ले लिया और फिर उसकी टांगो को मोड़ कर अपने हाथों के बीच फंसकर हाथों को सर के पीछे कर के मोड़ लिए जिससे वो बिलकुल आधी मुद गयी,

मैंने फिर नीचे से लुंड चलना शुरू किआ और उसकी गांड मरने लगा वो भी आह्ह्ह्हह्ह अह्हह्ह्ह्ह करके चिल्लाने लगी पर मैं रुका नहीं और लगातार गांड मरता रहा,





उसकी गांड में लुंड लगातार मैं मशीन की तरह चलाये जा रहा था,

में- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह अह्हह्ह्ह्ह क्याआ मस्त्त गाआंनदद्द है तुम्हारिई ओह्ह्ह ऐसा माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कभी नाहीई ायाह्ह्ह.

अंजलि- अहह ओह्ह्ह येअहहह मज़ा आ रहा है कर्माआअह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह मारू अह्ह्ह्हम्मम्मम ुह्ह्ह्हह्ह्ह्ह मेरिइइइ गांडड होऊ ओह्ह्ह्हह्ह ममममममिययययययय.

में- अह्हह्ह्ह्ह आजजज कोइइइइइ नाहीई बचाएआ पाएगाआहठ

अंजलि- अह्हह्ह्ह्ह बचनाआ कौंण चाहताऑ है अह्ह्ह्ह छोड़ते राहूऊओऊ,

मैं लगातार उसकी गांड मार रहा था और वो पागलों की तरह चिल्ला रही थी, उसकी छूट से ज़्यादा उसकी गांड ने मुझे जल्दी पिघलने को मज़बूर कर दिया, मेरी पकड़ भी उसके पैरों से ढीली हो गयी मैं किसी तरह उसे थामे बस नीचे से धक्के लगता रहा और तब तक लगता रहा जब तक मेरे लुंड ने उसकी गांड को अपने रास से न भर दिया, झड़ने के बाद मैंने लुंड को उसकी गांड से निकला तो लुंड के पीछे पीछे मेरा रास भी बहकर बाहर आने लगा.





अंजलि भी मेरे साथ साथ झाड़ चुकी थी हम दोनों hi बुरी तरह से हांफ रहे थे, खैर हम थक चुके थे तो थोड़ी देर यूँ hi नंगे एक दुसरे की बाहों में सो गए,

शाम होने तक जब तक उसका परिवार बापिस आने वाला था तब तक मैंने उसे कई बार छोड़ा और वो भी चुदाई में काम नहीं थी हर चीज़ में पूरे जोश से साथ दे रही थी,

उसने मेरे लुंड चूसने के साथ साथ मेरी गांड भी छाती





उसे देख कर लग hi नहीं रहा था की ये सब उसका पहली बार है, पर उसके साथ बहुत मज़ा आ रहा था, उसने मुझे इतना मज़ा दिया तो मैंने भी कोई कमी नहीं छोड़ी उसकी छूट और गांड को जी भर के चूसा और फिर उसकी चुदाई करके उसके चेहरे को अपने रास से रंग दिया,





उसके घरवालों के आने से आधे घंटे पहले मैं उसके घर से निकल गया और फिर करीब घंटे भर बाद उसके भाई का फ़ोन आया तो बापिस उसके घर गया..

जारी रहेगी
 
उसके घरवालों के आने से आधे घंटे पहले मैं उसके घर से निकल गया और फिर करीब घंटे भर बाद उसके भाई का फ़ोन आया तो बापिस उसके घर गया..

अपडेट 246
(लेखक की ज़ुबानी)

जहाँ कर्मा और अंजलि का मिलान हो गया था और वो थक कर लेट गयी थी, इधर उसका परिवार जो सुबह घूमने गया था उनका दिन भी काफी यादगार रहा था, पियूष ने गाडी शहर में लगाई और सबसे पहले दोनों औरतों ने खूब खरीददारी की फिर सबने मिलकर खाना खाया और उसके बाद मॉल में घूमे, घुमते हुए रानी ने फिल्म देखने की इच्छा जताई तो बाकी सब भी राज़ी हो गए,

पियूष ने टिकट काउंटर पर जा कर पूछा और बापिस आकर बोलै की अगला शो दो घंटे बाद है अभी जो फिल्म लगने वाली है वो अंग्रेजी है,

सावित्री: अरे दो घंटे रुकेंगे तो बहुत देर हो जाएगी,

महिपाल- दो अंग्रेजी hi देखलो पूरी अंग्रेजी में है क्या?

पियूष- नहीं पापा दुब है हिंदी में,

सावित्री- फिर तो बढ़िया है चलो देखते हैं,

पियूष चार टिकट लेता है और चरों अपनी स्क्रीन की और चले जाते हैं, पर चरों में से किसी को ये अंदाजा नहीं होता की ये एक एडल्ट फिल्म है,

चरों लोग धीमी रौशनी वाले सिनेमा हॉल में अपनी अपनी सीट पर बैठ गए. जैसे hi शुरुआती दृश्य चला, हवा में एक उम्मीद सी लटकी हुई थी. लेकिन जल्द hi, फिल्म की प्रकृति दिखने लगी, और परिवार पर असहजता की एक लहार दौड़ गयी.

पियूष, कर्मा के साथ अपनी बात को याद कर रहा था की कैसे रानी के साथ अपने रिश्ते में नयापन लाया जाये, उसने शर्मिंदगी और एक बढ़ती हुई जिज्ञासा का अजीब मिश्रण महसूस किया. उसने रानी की और देखा, फिर अपने mata-pita की और, उसके होंठों पर एक घबराहट भरी मुस्कराहट थी. अपने परिवार के साथ ऐसे अंतरंग दृश्य देखने की शुरुआती असहजता स्पष्ट थी. फिर भी, अंदर hi अंदर, उसके भीतर इच्छा की एक धीमी आग जलने लगी.

रानी के गाल शर्म से लाल हो गए जब परदे पर स्पष्ट सामग्री दिखाई दी. उसकी आँखें इधर उधर भटक रही थी, सीधी नज़र से बच रही थी, लेकिन वो तस्वीरें उसके दिमाग में छाप गयी. उसके बदन में एक अजीब सी गर्मी फ़ैल गयी, एक ऐसी अनुभूति जो अनजान भी थी और दिलचस्प भी. उसने अपनी साड़ी को कास कर पकड़ लिया, उसके अंदर शर्म और परदे पर दिख रही दुनिया के प्रति बढ़ती जिज्ञासा के बीच एक संघर्ष चल रहा था.

महिपाल अकड़ कर बैठ गए, उनका चेहरा नापसंदगी का नकाब था. उन्होंने इतनी खुली अंतरंगता को देखकर गहरी बेचैनी महसूस की, खास कर अपनी पत्नी और बहु के बगल में. उनके नैतिक मूल्य उन्हें जो दिख रहा था उसका विरोध कर रहे थे. हालाँकि, अपनी बाहरी नापसंदगी के बावजूद, उनकी आँखें कभी कभी परदे पर चली जाती थी, उनके अंदर एक लम्बे समय से दबी इच्छा की हलकी सी झलक दिखती थी, जो उनके कठोर पिता के रूप के बिलकुल विपरीत थी जिसे वो बनाए रखने की कोशिश कर रहे थे.

सविता, दूसरी और, परदे पर दिख रहे नाटक में इस तरह से खींचती चली गयी जिसे दूसरे पूरी तरह से नहीं समझ प् रहे थे. परदे पर दिख रही तस्वीरें उस गुप्त मुलाकात से मिल रही थी जो उन्होंने कुछ रत पहले नीलेश और सभ्य के साथ की थी. नंगे बदन आपस में लिपटे हुए देखकर, हॉल में गूंजती हुई आनंद की आवाजें, सभी ने उस छुपे हुए रत की जीवंत यादें ताज़ा कर दी. उनके अंदर गहरी, भीतरी उत्तेजना उमड़ पड़ी, फिल्म की स्पष्ट सामग्री से एक गुप्त आग फिर से जल उठी. उनके गुप्त सम्बन्ध का पछतावा उस आनंद के साथ लड़ रहा था जिसे वो अनुभव कर रही थी, जिस कारन वो अपनी सीट पर बेचैनी से हिल रही थी.

उनकी असहजता और उत्तेजना में हॉल के अंदर का वातावरण भी जुड़ गया था. नियमित दर्शकों के बिच कुछ युवा जोड़े भी थे जो फिल्म की प्रकृति से बेपरवाह लग रहे थे. कुछ खुलेआम एक दूसरे को सहलाने लगे, हाथ कपड़ों के अंदर घुस रहे थे, धीमी सिसकियाँ कभी कभी उनके होंठों से निकल रही थी. महिपाल ने एक युवा पुरुष के हाथ को अपनी प्रेमिका के स्तन को पकड़ते हुए देखा, धीमी रौशनी में भी हलचल दिख रही थी. ऐसी खुली आम मोहब्बतों ने परिवार के अंदर तनाव और अन्तर्निहित यौन ऊर्जा को और बढ़ा दिया, जिससे उनका साझा देखने का अनुभव और भी जटिल और बेचैन करने वाला हो गया.

सिनेमा हॉल का अँधेरा एक ऐसी भाठी बन गया जहाँ उनकी हिचकिचाहट और इच्छाएं टकराई. फिल्म एक अनअपेक्षित उत्प्रेरक की तरह काम कर रही थी, उन्हें अपने करीबी रिश्तेदारों की मौजूदगी में अपनी उत्तेजना का सामना करने के लिए मजबूर कर रही थी, जिससे शर्मिंदगी, जिज्ञासा और असंदिग्ध उत्तेजना का एक तेज मिश्रण पैदा हो रहा था जिसे उनमें से कोई भी पूरी तरह से नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था. साझा अनुभव, हालाँकि ावक्वार्ड था, लेकिन असंदिग्ध रूप से परिवार के अंदर के गतिशीलता को बदल रहा था, उन भावनाओं और इच्छाओं को जगा रहा था जो लम्बे समय से दबी हुई थी.

फिल्म देखकर चरों बहार निकले. हॉल से बहार आते hi उनके बीच एक अजीब सी ख़ामोशी और असहजता थी. एक दुसरे से नज़रें मिलाने में सभी शर्म और झिझक महसूस कर रहे थे. जिस उत्तेजना और बेचैनी को उन्होंने अन्दर महसूस किया था, वह अभी भी हवा में घुली हुई थी.


घर पहुँचते hi पियूष ने बहाना बनाया की उसे कर्मा की गाडी वापस देनी है और वह तुरंत निकल गया, शायद उस असहज माहौल से कुछ देर के लिए दूर रहना चाहता था.

महिपाल और सावित्री आंगन में बैठे रहे, दोनों hi चुपचाप और अपने विचारों में खोये हुए. इसी बीच रानी ट्रे में चाय लेकर आयी और दोनों को देने लगी. जब वह महिपाल को चाय देने के लिए झुकी, तोह अनजाने में उसका पल्लू थोड़ा सरक गया.

महिपाल की नज़रें अपने आप hi रानी के गोर, चिकने पेट और उसकी गहरी, गोल नाभि पर चली गयी. उस दृश्य को देखते hi महिपाल के अंदर एक अजीब सी उत्तेजना महसूस हुई. उन्हें फिल्म के दृश्य याद आ गए और अपनी बहु के इस अनदेखे रूप को देखकर उनके अंदर एक दबी हुई इच्छा जग उठी. उन्होंने तुरंत अपनी नज़रें हटा ली, पर वह दृश्य उनके दिमाग में छाप गया था.

महिपाल ने पहले कभी ऐसी उत्तेजना महसूस नहीं की थी. अपनी बहु के पेट और नाभि का वह क्षणिक दर्शन उनके दिमाग में घुमान मचा रहा था. फिल्म के दृश्य, और अब रानी का यह अनदेखा रूप - सब मिलकर उनके अंदर एक अजीब सी बेचैनी पैदा कर रहे थे.

उनका दिमाग इतने विचारों से भरा जा रहा था की उन्हें लग रहा था वह इसके बारे में बिना बात किये नहीं रह पाएंगे. यह बोझ उनके अंदर बढ़ता जा रहा था.

परेशां होकर, महिपाल ने अपनी पत्नी सावित्री से उस बारे में बात करने की सोची. उन्हें लगा शायद वह उनकी उलझन को समझ सके या काम से काम उनका मन हल्का हो जाये.

धीमी आवाज़ में, महिपाल ने सावित्री से कहा, जो अभी भी चाय की चुस्की ले रही थी, "सावित्री..." उनकी आवाज़ में एक अजीब सी अनिश्चितता थी. "आज जो हुआ... वह क्या हुआ समझ नहीं आ रहा."

उनकी बात अधूरी और अस्पष्ट थी, लेकिन उसमें उनके मन की गहराई छिपी हुई थी. अब यह देखना था की सावित्री उनकी इस बात को कैसे लेती हैं और उन्हें क्या जवाब देती हैं. क्या वह उनकी बेचैनी और उत्तेजना को समझ पाएंगी?

सावित्री, जिसके अंदर भी फिल्म देखने के बाद एक अजीब सी उत्तेजना और बेचैनी चल रही थी, महिपाल की बात सुनकर थोड़ी देर सोच में पद गयी. उसने अपनी अंदर की हलचल को दबाते हुए जवाब दिया.

"मुझे तोह लगता है की हमें इस बात को ज़्यादा बड़ा नहीं बनाना चाहिए," सावित्री ने धीरे से कहा. "जो हुआ सो हुआ. पर अगर हम बच्चों के साथ असहज होंगे तोह वह भी शर्म महसूस करेंगे और बीच में फिर दूरियां आ जाएँगी."

उसने पियूष के इरादे को सकारात्मक रूप में देखा. "पियूष ने तोह अच्छा सोचा था और हम लोगों के करीब आने के लिए यह घूमने का प्लान बनाया था." सावित्री को लगा की पियूष परिवार के साथ वक़्त बिताना चाहता था और यह आउटिंग उसी का हिस्सा था.

उसने आगे कहा, "फिल्म ऐसी थी तोह उसमें उसका क्या दोष? हम तोह बड़े हैं, समझ सकते हैं. अगर हम hi इस बात को लेकर बैठे रहेंगे तोह बच्चों को क्या सन्देश जायेगा?" सावित्री चाहती थी की परिवार में एक सहज और खुला माहौल बना रहे.

महिपाल को भी सावित्री की बात में समझदारी दिखाई दी. उन्होंने अपनी सहमति जताते हुए कहा, "सही कह रही हो. वैसे भी वह भी तोह शादीशुदा हैं, वयस्क हैं. अगर ऐसी फिल्म देख भी ली तोह क्या हो गया?" उन्होंने अब इस बात को ज़्यादा टूल देने की ज़रुरत नहीं समझी.

फिर उनके मन में एक नया विचार आया. "और दूसरा, बीटा बड़ा हो जाए तोह बाप बेटे दोस्त हो जाते हैं," उन्होंने आगे कहा. "मुझे भी उसके साथ दोस्ती करनी चाहिए." उन्हें लगा की अब उन्हें अपने बेटे पियूष के साथ अपने रिश्ते को एक नया रूप देना चाहिए, जिसमें ज़्यादा खुलापन और दोस्ती हो. फिल्म देखने के अनुभव ने शायद उन्हें इस बात पर विचार करने के लिए प्रेरित किया था.

सावित्री ने महिपाल की बात सुनकर तुरंत उसका समर्थन किया. "ज़रूर कीजिये," वह मुस्कुराते हुए बोली. "इससे परिवार का माहौल और अच्छा हो जायेगा." उन्हें लगा की पिता और पुत्र के बीच दोस्ती का रिश्ता बनाने से घर में और भी प्यार और समझ बढ़ेगी.

महिपाल थोड़ा सोच में पद गए. "पर समझ नहीं आता कैसे?" उन्होंने अपनी अनिश्चितता व्यक्त की. उन्हें शायद यह नहीं पता था की अपने बेटे के साथ दोस्ती की शुरुआत कैसे की जाये.

सावित्री ने उन्हें सहज तरीके से सुझाव दिया. "ज़्यादा मत सोचिये. जैसे अपनी जवानी में आप अपने दोस्तों के साथ करते थे, वैसा hi करो." उनका इशारा था की महिपाल को स्वाभाविक और खुलकर पियूष के साथ व्यवहार करना चाहिए.

सावित्री की यह बात सुनकर महिपाल के चेहरे पर एक हलकी सी मुस्कान आ गयी. उनके दिमाग में तुरंत एक योजना भी बनने लगी. उन्हें लगा शायद वह पियूष को किसी ऐसी एक्टिविटी में शामिल होने के लिए कह सकते हैं जिसे वह पसंद करता हो, या फिर उसके साथ बैठकर दोस्ती भरी बातें कर सकते हैं. उन्हें अपने बेटे के साथ एक नया रिश्ता शुरू करने का रास्ता दिखाई देने लगा.

महिपाल को रात होने का बेसब्री से इंतज़ार था. उन्होंने अपने बेटे से दोस्ती बढ़ने के लिए शराब को एक माध्यम बनाने का सोचा था, एक ऐसा माहौल बनाने के लिए जहाँ वह खुलकर बात कर सकें.

जैसे hi पियूष घर आया, महिपाल ने उसे अपने पास बुलाया. शुरुआत में दोनों के बीच थोड़ी हिचकिचाहट थी, एक अजीब सी ख़ामोशी छायी हुई थी. लेकिन महिपाल ने पहल की और धीरे धीरे बातें शुरू हो गयीं. पहले तोह वह गाओं के हलचल और पियूष के काम के बारे में बात करते रहे.

फिर, जैसे जैसे रात गहरी होती गयी और शराब का नशा चढ़ने लगा, उनकी बातें और खुलती चली गयीं. आज देखि गयी फिल्म का भी ज़िक्र आया. शुरुआत में तोह hansi-mazak में कुछ दृश्यों की बात हुई, लेकिन धीरे धीरे माहौल कामुक होने लगा.

जब महिपाल ने रानी का ज़िक्र किया, तोह पियूष अपने पिता से अपनी पत्नी के बारे में सुनकर और ज़्यादा उत्तेजित हो गया. उसे याद आया कैसे कर्मा ने रानी के बदन की तारीफ की थी. अपने पिता के मुँह से अपनी पत्नी की सुंदरता और कामुकता सुनकर उसके अंदर एक अजीब सी आग भड़क उठी.

महिपाल ने अपनी शराब का एक बड़ा घूंट भरा और आँखों में हलकी सी शरारत लिए बोलै, "पियूष बीटा, तेरी माँ का बदन... क्या कहु! आज भी जब वह साड़ी पहनती है तोह..." उन्होंने अपनी बात अधूरी छोड़ दी, होंठों पर एक हलकी सी मुस्कान थी.


पियूष, अपने पिता के मुँह से अपनी माँ के बारे में ऐसी बातें सुनकर अंदर hi अंदर एक अजीब सी उत्तेजना महसूस कर रहा था. "हाँ पापा," वह धीमी आवाज़ में बोलै, उसकी आवाज़ में एक अनजान सी बेचैनी थी. "उनकी कमर और वह भरे हुए चुत्तड़... जब चलती हैं तोह..." उसने भी अपनी बात अधूरी छोड़ दी, उसकी नज़रें दूर कहीं खो गयी थी.

महिपाल ने पियूष की आँखों में देखा और हलकी सी हंसी हसे. "और तेरी रानी बहु... उसका बदन भी तोह अभी भर रहा है. जब वह झुकती है तोह..." उन्होंने वह क्षण याद किया जब रानी चाय दे रही थी. उनकी आँखों में एक कामुक चमक आ गयी.

पियूष, अपने पिता के मुँह से रानी के बारे में सुनकर और भी उत्तेजित हो गया. "हाँ पापा," उसने हाँ में सर हिलाया. "उसकी छुछियां... अभी से इतनी भरी हैं, तोह आगे क्या होगा..." उसने एक लम्बी सांस ली. "और उसकी कमर... पतली सी कमर और वह गोल नितम्भ..."

महिपाल ने अपनी गिलास निचे राखी और पियूष की और झुक कर धीमी आवाज़ में बोलै, "और बिस्तर में... वह कैसी है?" उनकी आवाज़ में गहरी जिज्ञासा थी.

पियूष थोड़ा झिझका, फिर आँखों में हलकी सी शर्म और उत्तेजना लिए बोलै, "पापा... वह... वह बहुत गरम है. जब मैं उसे छूटा हूँ तोह..." उसने अपनी बात अधूरी छोड़ दी, उसका गाला सूख रहा था.

महिपाल ने मुस्कुरा कर उसकी पीठ थपथपाई. "अच्छा बीटा, अच्छा. मुझे भी अपनी सावित्री के साथ वह सब दिन याद आते हैं..." उनकी आवाज़ में एक पुराणी यादों की मिठास थी. "लेकिन बहु भी तोह अपनी hi है... उसका भी ख्याल रखना." उनकी आँखों में एक अजीब सा भाव था, जो पियूष समझ नहीं पाया.

पियूष ने एक और घूंट शराब पि और बोलै, "हाँ पापा... वह तोह है hi..." उसकी नज़रें कहीं दूर तक भटक रही थी, उसके दिमाग में अपनी माँ और अपनी पत्नी की कामुक तस्वीरें एक साथ नाच रही थी.

रात गहरी होती जा रही थी, और पिता और पुत्र के बीच की यह कामुक बातें उनके रिश्ते को एक नए, अनोखे मोड़ पर ले जा रही थी. शराब और दबी हुई इच्छाओं ने उनके बीच की दुरी को मिटा दिया था, और अब वह एक ऐसी राह पर चल रहे थे जहाँ शर्म और हिचकिचाहट की कोई जगह नहीं थी.

पियूष ने आँखें बंद कर ली और अपनी माँ के नग्न बदन की कल्पना में खो गया. उसके दिमाग में फिल्म के वह दृश्य घूम रहे थे, और अब उसके मन में अपनी माँ को उस रूप में देखने की एक अनजान इच्छा जाग उठी.

"पापा," वह धीमी, हलकी लड़खड़ाती आवाज़ में बोलै, "कभी कभी... मेरा मन करता है... माँ को... बिना कपड़ों के देखूं." उसके गाल शर्म से लाल हो रहे थे, लेकिन उसकी आँखों में एक गहरी जिज्ञासा थी.

महिपाल ने पियूष की बात सुनकर अपनी शराब का गिलास निचे रख दिया. उनकी आँखें चौंधिया गयी थी. उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था की उनका बीटा ऐसी बात कह रहा है. लेकिन इस विचार से उनके अंदर भी एक अजीब सी उत्तेजना दौड़ गयी. अपने बेटे के मुँह से अपनी पत्नी के नग्न बदन की इच्छा सुनकर उन्हें एक अनोखा आनंद मिल रहा था.

"तुम... तुम क्या कह रहे हो बीटा?" महिपाल ने हलकी हकलाहट के साथ कहा, उनकी आवाज़ में हैरानी और एक दबी हुई उत्तेजना का मिश्रण था.

पियूष ने अपनी आँखें खोली और अपने पिता की और देखा. उसने देखा की उनकी आँखें भी चमक रही हैं. "मेरा मतलब... बस... एक इच्छा है," वह धीरे से बोलै.

महिपाल ने एक पल सोचा, फिर उनके होंठों पर एक कामुक मुस्कान आ गयी. "अच्छा बीटा," वह धीमी आवाज़ में बोले, "अगर तुम्हारी ऐसी इच्छा है... तोह मेरी भी एक इच्छा है."

पियूष ने हैरानी से अपने पिता की और देखा. "आपकी... क्या इच्छा है पापा?"

महिपाल की मुस्कान और गहरी हो गयी. उन्होंने पियूष की आँखों में देखते हुए कहा, "मेरा मन करता है... तुम्हें और रानी को... सम्भोग करते हुए देखूं."

पियूष की आँखें हैरानी से और भी बड़ी हो गयी. वह अपने पिता की बात पर विश्वास नहीं कर प् रहा था. यह सब क्या हो रहा था? उनके पिता... उन्हें और रानी को...

लेकिन उस हैरानी के बीच, पियूष के अंदर भी एक अजीब सी उत्तेजना महसूस हुई. अपने पिता के साथ यह गुप्त इच्छा साँझा करना... यह सब कुछ बहुत hi अनोखा और रोमांचक था.

पियूष अपनी आँखें बंद कर लेता है, उसके दिमाग में एक ऐसी तस्वीर बन रही थी जिसे सोच कर hi उसके अंदर एक बेचैनी सी दौड़ रही थी. अपने पापा के सामने रानी को नंगा छोड़ना... वह कैसा मंज़र होगा? उसकी पत्नी की शर्म से झुकी नज़रें, उसका लाल होता चेहरा... और उसके जिस्म पर उसके पापा की नज़रों का एहसास. यह सोच कर hi उसका लिंग पंत में और भी तन गया.


धीरे से, उसकी आवाज़ में एक दबी हुई कामुकता थी, वह बोलै, "पापा... आपकी वह इच्छा... उसे पूरी करने की मैं पूरी कोशिश करूँगा." उसके दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी, एक अनजान सी एक्ससिटेमेंट उसके अंदर मचल रही थी.

महिपाल, अपने बेटे के मुँह से यह सुनकर उनकी आँखें चमक उठी. उनके अंदर भी एक तीव्र उत्तेजना दौड़ गयी. उनका बीटा... उनकी इच्छा को पूरा करने के लिए तैयार था. उन्होंने हलकी हकलाहट के साथ कहा, "सच बीटा? अगर तुम मेरी इच्छा पूरी करोगे... तोह मैं भी... मैं भी तुम्हारी माँ को... नंगा देखने की तेरी इच्छा पूरी करूँगा." उनकी आवाज़ में एक कामुक कसक थी.

दोनों, उस अनोखे और गुप्त समझौते के बाद, लड़खड़ाते हुए अपने अपने कमरों की और चले गए. उनके पंत में उनके लिंग तने हुए थे, उनकी रातों में अब एक नया, उत्तेजक रहस्य घुल गया था. कमरों में पहुँच कर भी उनके दिमाग में वही कामुक विचार घूम रहे थे, एक दूसरे के रहस्यों को जानने और अपनी इच्छाओं को पूरा करने की बेचैनी उन्हें सोने नहीं दे रही थी. रात अभी बाकी थी, और उनके रिश्तों में एक नया, और कामुक मोड़ आ चूका था.

उसी रात की उत्तेजना पियूष और महिपाल दोनों पर हावी रही. Apne-apne कमरों में पहुंचकर, उन्होंने अपनी पत्नियों को अपनी बाँहों में भर लिया.


पियूष ने रानी को अपनी और खींच लिया, उसकी आँखों में एक ऐसी आग थी जो रानी ने पहले कभी नहीं देखि थी. रानी, जो खुद भी फिल्म देखने के बाद से एक अजीब सी बेचैनी महसूस कर रही थी, अपने पति की बदली हुई मनोदशा को समझ रही थी. उसने भी उस उत्तेजना में उसका साथ दिया, उसके हर स्पर्श का पूरे आनंद के साथ जवाब दिया. उनके बीच की रात पहले से कहीं ज़्यादा पैशनेट और कामुक थी.







महिपाल भी सावित्री के पास पहुंचे, उनकी आँखों में वही चाहत थी जो युवावस्था में हुआ करती थी. सावित्री, जिसके अंदर तोह पहले से hi एक गुप्त उत्तेजना मचल रही थी, अपने पति की आँखों में वही पुराणी चाहत देखकर पिघल गयी. वह भी उनकी हर एक हरकत में शामिल होती चली गयी, उन्हें वही प्यार और आनंद लौटती रही जो वह चाहते थे. उस रात महिपाल और सावित्री का मिलान भी बहुत गहरा और उत्तेजक रहा, उनके बीच की रसायन एक बार फिर से जिवंत हो उठी.







दोनों hi जोड़ों ने उस रात अपनी दबी हुई इच्छाओं को एक दूसरे के साथ व्यक्त किया, बिना किसी शब्द के भी वह एक दूसरे की मनोदशा को समझ रहे थे. फिल्म और pita-putra के बीच हुई गुप्त बातों का असर उनके अंतरंग पलों में साफ़ दिखाई दे रहा था. हर स्पर्श, हर चुम्बन और हर एक आह में वह उत्तेजना और वह रहस्य छिपा हुआ था जो उनकी रातों को और भी मादक बना रहा था.

जारी रहेगी
 
दोनों hi जोड़ों ने उस रात अपनी दबी हुई इच्छाओं को एक दूसरे के साथ व्यक्त किया, बिना किसी शब्द के भी वह एक दूसरे की मनोदशा को समझ रहे थे. फिल्म और pita-putra के बीच हुई गुप्त बातों का असर उनके अंतरंग पलों में साफ़ दिखाई दे रहा था. हर स्पर्श, हर चुम्बन और हर एक आह में वह उत्तेजना और वह रहस्य छिपा हुआ था जो उनकी रातों को और भी मादक बना रहा था

अपडेट 247
लेखक की ज़ुबानी

जैसा की नीलेश और शैलेश को महिपाल ने एक प्रस्ताव दिया था और दोनों ने hi महिपाल को आगे बढ़ने को कह दिया था तो सब का ध्यान उस पर साथ hi नए घर के बनवाने पर था.

अगले कुछ हफ़्तों तक स्कूल की कार्यवाही dheere-dheere आगे बढ़ती रही. महिपाल सिंह ने पूँजी और ज़रूरी चीज़ों का अनुमान लगाकर नीलेश और शैलेश को रिपोर्ट दी. तीनो ने मिलकर पैसे जमा करने और काम शुरू करने पर बात की. गाओं के लोगों में भी नया स्कूल खुलने की बात से ख़ुशी थी.

इस सब के बीच, महिपाल और पियूष अपने गुप्त समझौते को पूरा करने के लिए अंदर hi अंदर मचल रहे थे.

महिपाल, जब भी रानी घर में अकेले होती या उनके आस पास होती, तोह उसे गौर से देखते. उनकी नज़रें अक्सर उसके उभरते हुए बदन, गोल नितम्ब और पतली कमर पर टिक जाती. उन्हें वह फिल्म वाले सन याद आते और उनका लुंड पंत में तन्ने लगता. उनका मन करता की वह रानी को पकड़ कर उसकी जवानी का रास निचोड़ लें, पर वह अपने बेटे के ख्याल से रुक जाते. 'कब मिलेगा वह मौका जब मैं अपनी यह इच्छा पूरी कर पाउँगा?' वह अंदर hi अंदर सोच रहे थे.

पियूष का हाल भी कुछ अलग नहीं था. अपने पापा के मुँह से अपनी माँ के बदन की तारीफ सुनने के बाद से उसके दिमाग में सावित्री के नंगे जिस्म की तस्वीर बानी रहती थी. जब माँ घर में काम करती, या नहाने के बाद बाल सूखती, तोह पियूष chhup-chhup कर उसे देखता. उसके मन में वही सवाल घूमता रहता, 'कब पापा अपना वडा निभाएंगे और कब मुझे मेरी माँ का वह रूप देखने को मिलेगा?' उसका लुंड तोह बस माँ के ख्याल से hi खड़ा हो जाता था.

एक दिन, जब महिपाल और पियूष अकेले बैठे शराब पी रहे थे, तोह बात फिर उसी तरफ मुद गयी.

महिपाल ने शराब का घूंट भरकर धीमी आवाज़ में कहा, "बीटा पियूष, वह जो बात हुई थी... तुझे याद है न?" उनकी आँखों में एक कामुक चमक थी.

पियूष ने हाँ में सर हिलाया, उसके अंदर एक अजीब सी बेचैनी हो रही थी. "हाँ पापा... मुझे सब याद है."

महिपाल ने आगे कहा, "तोह... क्या सोचा है तूने? मेरी वह इच्छा..."

पियूष थोड़ा झिझका, फिर बोलै, "पापा... मैं... मैं कोशिश कर रहा हूँ. पर... यह सब आसान नहीं है."

महिपाल समझ रहे थे. "हाँ बीटा, मैं समझता हूँ. पर... मेरी भी तोह कब से यह इच्छा है."

पियूष ने हिम्मत करके पुछा, "और... आप अपनी बात कब पूरी करेंगे पापा?"

महिपाल मुस्कुरा दिए. "जल्द hi बीटा... बस सही मौके का इंतज़ार है."

दोनों pita-putra अपनी दबी हुई कामुक इच्छाओं के साथ पीते रहे, वह सही वक़्त का इंतज़ार कर रहे थे जब वह अपने गुप्त समझौते को सच कर सकें. उनके अंदर की आग हर गुजरते दिन के साथ और तेज़ होती जा रही थी.

पियूष और महिपाल दोनों अंदर hi अंदर अपनी इच्छाओं की आग में जल रहे थे. स्कूल का काम तोह चल रहा था, kagaz-patar बन रहे थे, लोगों से बात हो रही थी, पर इन बातों में उनका मैं काम hi लग रहा था. उनके दिमाग में तोह बस वही गन्दी बातें घूमती रहती थी.

महिपाल को तोह हर वक़्त रानी की याद आती. वह कैसे झुकती है, कैसे चलती है, उसके बदन के हर चउरवे को वह अपनी आँखों में कैद कर लेना चाहते थे. . उनका मन करता की अभी उसके कपडे पहाड़ दें और जमकर छोड़ें, पर फिर पियूष का ख्याल आ जाता और वह खुद को रोक लेते. *'बेटे की बीवी है... कैसे करून यह सब?'* यह सोच कर वह करवटें बदलते रहते.

पियूष का भी बुरा हाल था. माँ सावित्री का नंगा बदन जिसकी कल्पना मात्रा उसने की थी उसकी आँखों के सामने नाच रहा था. वह सोचता की अगर वह माँ को बिना कपड़ों के देखेगा तोह क्या होगा. क्या माँ गुस्सा करेगी? या... या फिर वह भी...? यह सोच कर उसका लुंड पतलून में तम्बू बन जाता. वह chhup-chhup कर माँ को देखता रहता, उनकी chaal-dhaal, उनके uthte-baithte... हर हरकत उसके अंदर एक आग लगा देती. *'कब वह दिन आएगा जब पापा अपना वादा निभाएंगे?'* वह बेचैनी से इंतज़ार कर रहा था.

एक शाम, जब महिपाल और पियूष आँगन में बैठे पेग लगा रहे थे, माहौल थोड़ा हल्का हो गया.

महिपाल ने do-teen घूंट अंदर करने के बाद बोलै, "पियूष बीटा... यह जो अंदर की आग है न... यह बहुत बुरी चीज़ है." उनकी आवाज़ में हलकी सी लड़खड़ाहट थी.

पियूष ने भी एक बड़ा घूंट भरा. "हाँ पापा... सही कह रहे हो. रात भर नींद नहीं आती."

महिपाल ने पियूष की तरफ देखा, उनकी आँखों में एक शरारती सी चमक थी. "तोह क्या करें इस आग का?"

पियूष समझ गया की पापा किस तरफ इशारा कर रहे हैं. उसके गाल हलके से लाल हो गए. "आप hi बताओ पापा... आप तोह बड़े हो."

महिपाल हसे. "बड़ा तोह हूँ... पर यह मामला hi ऐसा है की..." वह थोड़ा रुके. "देख बीटा... वह तेरी बीवी है तू उसे जनता है जो करना है तुझे करना है. मैं... मैं कैसे..." उनकी आवाज़ में झिझक थी.

पियूष ने हिम्मत जूता कर बोलै, "पर आपने तोह कहा था पापा... कुछ न कुछ सोचेंगे, कैसे आगे बढ़ें?

महिपाल ने बात काट दी. "हाँ मैंने कहा tha...par कैसे करूँ तू hi बता मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा. सोच सोच के सर फैट रहा है.

तभी, पियूष के दिमाग में एक आईडिया आया. "पापा... अगर... अगर रानी और माँ खुद चाहे तोह?"

महिपाल की आँखें चौंधिया गयी. "क्या मतलब है तेरा?"

पियूष ने थोड़ा और खुलकर बोलै, "मेरा मतलब है... अगर रानी और माँ को भी... अगर ऐसे hi थोड़ा खोला जाये उनकी उत्तेजना बधाई जाये तो?

महिपाल कुछ देर चुप रहे, उनके दिमाग में बहुत कुछ चल रहा था. फिर धीरे से बोले, "हाँ ये हो तो सकता है

पियूष- वही तो मुझे तो यही सही लग रहा है

महिपाल- योजना तो ठीक है पर ये सब होगा कैसे?

पियूष- मैंने सब सोच लिए है पापा बस देखते जाओ, अब धीरे धीरे मैं रानी की उत्तेजना बढ़ाऊंगा, उसका ढंग बदलूंगा उसे चुदाई के नए नए रूप दिखाऊंगा, पापा तुम भी माँ को ऐसे hi धीरे धीरे खोलो.

दोनों बाप बेटे नयी योजना को सोच सोच कर आपस में चर्चा करते हैं.

अगले कुछ दिन पियूष ने अपने प्लान पर काम करना शुरू कर दिया. वह रानी से और प्यार से बात करने लगा, उसे घूमने ले जाने लगा और बिस्तर में भी naye-naye तरीके आज़माने लगा. रानी को भी यह बदलाव अच्छा लग रहा था. उसे लग रहा था की पियूष उसे पहले से ज़्यादा छह रहा है. वह अंदर hi अंदर गरम हो रही थी, उसकी छूट में halki-halki गीली हो रही थी.

वो रानी को नयी नयी तरह की कामुक वीडियो दिखता और फिर उस बारे में उसकी प्रतिक्रिया देखता जैसे खुले में चुदाई करना, तो कभी रसोई में कभी छत पर और जितना संभव होता वो उतना कर भी रहा था, कभी वो आक्रामक होकर रानी के बदन पर टूट पड़ता,

और ये सब रानी को भी भ रहा था, उसकी उत्तेजना हर दिन के साथ बढाती जा रही थी अभी भी रानी खाना बना कर हटी hi थी की पियूष ने पीछे से आकर उसके ब्लाउज को ऐसे खींचा था की उसके बटन टूट गए थे और पियूष बिना उसकी परवाह किये उसकी चूचियों को मसलने लगा,





रानी चौंकाती ज़रूर थी पर उसे ये सब ाचा लग रहा था, शुरू में जब उसने गाओं आने का फैसला सुना था तो थोड़ा झिझक हुई थी की गाओं में कैसे मन लगेगा पर अभी पति का ये रोऊ देख वो बहुत खुश थी कुछ hi पलों में उसकी साड़ी कमर पर थी और वो चुद रही थी,

पियूष- अह्ह्ह्हह्हह साली रंडी अह्ह्ह्हह्हह लिए .

रानी- ओह्ह जी आह्ह्ह्हह्ह बहुत गरममम लग रहे हो आज तो

पियूष- तुझे देख कर अपने आप हो जाता हूँ मेरी रानी.

इधर पियूष अपनी पत्नी को छोड़ रहा था तो उसके पापा भी अपने काम के किये काफी गंभीर थे.

महिपाल भी अपने तरीके से सावित्री को गरम करने में लगा था. वह उसकी तारीफ करता, उसके लिए chote-mote तोहफे लाता और रात को बिस्तर में उसे पहले से ज़्यादा प्यार करता. सावित्री को भी अपने पति का यह बदला हुआ रूप अच्छा लग रहा था. उसे लग रहा था जैसे उनकी शादी की पुराणी गर्मी फिर से लौट रही है. वह अंदर hi अंदर मचल रही थी, उसकी छूट भी अपने आप गीली हो जाती थी जब महिपाल उसे छूटा था.

दोनों baap-bete apne-apne तरीके से अपनी पत्नियों को गरम करने में लगे थे. उन्हें पता था की जब यह दोनों औरतें पूरी तरह से गरम हो जाएंगी तोह उनकी गन्दी इच्छाएं पूरी होने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी...

जारी रहेगी
 
दोस्तों मुझे बड़े दुःख के साथ कहना पद रहा है की यह कहानी अपने अंतिम चरण में पहुँच गयी है कर्मा का विवाह होते hi यह कहानी एक हैप्पी एंडिंग के साथ हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी अब बस आखिरी के लगभग 30 उपदटेस की कहानी बची है उसके बाद इस कहानी का अंत हो जायेगा इसलिए मुझे थोड़ा समय चाहिए ताकि मैं इस कहानी को बेहतर तरीके से पूरा कर सकूँ लेकिन लेकिन लेकिन.............

आपको दुखी होने की कोई जरुरत नहीं है जल्दी hi मैं एक नयी सोच के साथ एक नयी कहानी की शुरुआत करने जा रहा हूँ तो फिर मिलते हैं नए थ्रेड पर!
 
Hello फ्रेंड्स, we're बैक आफ्टर थिस लॉन्ग ड्रामा, थैंक्यू आल फॉर बीइंग सो पेशेंट एंड लोविंग, we'll स्टार्ट अगेन वेयर वे स्टोप्पड़, कीप सपोर्टिंग.

थैंक्यू सो मच
 
अपडेट 248

(रिवाइज्ड - कर्मा की ज़ुबानी और लेखक की ज़ुबानी)


इधर चोदामपुर में भी काफी कुछ घटित हो रहा था, मंजू तै आज कर्मा के घर आई थी और सभ्य उनका आशीर्वाद ले रही थी,

मंजू- अरे अब बस कर बहुरिया निचोड़ hi लेगी का,

ये सुनकर सभ्य ने मंजू की टांगो के बीच से सर निकला जो की मंजू की छूट के रास से सना हुआ था,

सभ्य- बहुत स्वाद है जीजी,

सभ्य उठ कर बगल में खत पर बैठते हुए बोली,

मंजू- स्वाद तो तेरे होठों में ऋ,

ये कहकर मंजू ने सभ्य के होंठों को चूस लिए, कुछ hi पल बाद गुंजन हाथ में चाय लेकर आ गयी,

गुंजन- अगर देवरानी जेठानी का लाड ख़तम हो गया हो तो चाय पि लो,

मंजू- लो इस बुर छोड़ी को बहुत जलन हो रही है.

सब उनकी गाली सुन कर हंस पड़े,

चाय की चुस्की लगाती हुई मंजू बोली- अरे बहुरिया सुन जो बात है वो रह hi जाएगी,

सभ्य- हाँ बताओ न जीजी,

कुछ अमावस बाद वही शुभ नक्षत्र पद रहे हैं,

सभ्य- सही में, शालू ओह शालू इधर आओ.

शालू भी बाहर आ जाती है पर नंगी,

मंजू- लो तूने इसका काम रोक दिया बेचारी को बीच में hi. बुला लिया

तभी पीछे पीछे सागर भी आजाता है अपने लुंड को सहलाते हुए और कहता है- कोई नहीं बुआ काम यही हो जायेगा,

और शालू को झुककर फिर से लुंड उसकी छूट में घुसा कर धक्के लगाने लगता है,

मंजू- हाँ सुन अमावस के बाद का नक्षत्र है तो नदी किनारे जा कर पूजा करनी होगी,

सागर- किस का नक्षत्र है बुआ,

मंजू- अरे लल्ला तुझे नहीं पता होगा हम लोग कालक गाओं गए थे वहां से जो फल मिले थे तेरी भाभी और मौसी की गॉड भरने के लिए अब उन्हें लेने का समय आने वाला है.

सभ्य- ऊपर वाला करे इन फलों का फल मिल जाये,

मंजू- ज़रूर मिलेगा हमने पुजारी से पूछ लिए है साडी बात पता कर ली है हमारे पीहर (मायके) के पास hi है नदी भी है और मंदिर भी तो सोच रही हूँ दो दिन पहले hi चले जाएं वहां रुक जायेंगे और सारा काम हो जायेगा.

सभ्य- बिलकुल सही रहेगा जीजी,

मंजू- तो कौन कौन चलेगा,

सभ्य- तुम तो जाओगी न?

मंजू- हाँ.

सभ्य- फिर सही है तुम सब संभल hi लोगी, तुम शालू प्रेमा और शैलेश चले जायेंगे, भाई साहब भी जायेंगे का?

मंजू- नहीं सोच रहे जग्गू को ले जाएं ये तो खेत देखेंगे तो उनका खाना पीना देख लेना, घर पर वही रह जायेंगे बस. भग्गू शहर में है.

सभ्य- अरे जीजी ये भी कहने की कोई बात है तुम चिंता मत करना,

शालू- अह्ह्ह्हह्हह ठीक है जीजी मैं इनसे बोल देती हूँ, कब चलने की बोलूं.

मंजू- परसो भोर में hi निकल लेंगे,

सभ्य- और पूजा के लिए सामान वगेरा वो लिखवा दो न माँगा लेंगे,

मंजू- अरे वो जग्गू को लिखा दिया है कल कर्मा और वो जाकर ले आएंगे,

मंजू तै ने ये बोलै hi था की सागर ने शालू की छूट से लुंड निकला और उनके मुँह में घुसा दिया और आहें भरते हुए झड़ने लगा, मंजू ने भी अपना मुँह खोल कर उसे गटकने लगी, शालू भी नीचे बैठ गयी खट्ट पर.

सभ्य- सागर तू भी न बात कर रही थी न बुआ.

सागर- अरे बड़ी बुआ को मेरा रास बहुत ाचा लगता है सागर हांफते हुए बोलै और फिर अपने लुंड को मंजू के मुँह से निकला,

मंजू- अरे सही कह रहा है बहुत स्वाद है इसका रास,

सभ्य- चलो फिर कल साडी तयारी कर लेंगे.

मंजू- हाँ कर लेना अब हमारे काम की भी तो सुन बहुरिया.

सभ्य- बोलो न जीजी.

मंजू- बोलना क्या है अब अपनी छूट का स्वाद नहीं चखाएगी.

सभ्य ये सुन कर हंसने लगती है,

कुछ देर बाद hi आँगन का दृश्य ऐसा था की सभ्य पूरी नंगी होकर खत पर लेती थी और उसकी टांगें फैली हुई थी टैंगो के बीच मंजू का चेहरा था जो की उसका काम रास चाट रही थी,

मंजू का पिछवाड़ा उठा हुआ था उसमे से नाना का मोटा लुंड अंदर बहार हो रहा था,

वहीँ सभ्य के मुँह में भी राजन चाचा का हथियार घुसा हुआ था.

चोदामपुर की एक और हसीं शाम की शुरुआत हो चुकी थी,

इसे अचे से पढ़ कर साथ पिछली उपदटेस के अनुसार कहानी को आगे बढ़ाओ

दूसरी तरफ जब मैं पापा और बाकी लोगों के साथ घर पहुंचा, तो एक अलग hi दृश्य नज़र आ रहा था.

आँगन में कामुकता का माहौल था, जहाँ हर कोने से आहें और सिसकियों की आवाज़ें गूँज रही थी. माँ पूरी नंगी होकर खत पर लेती थी, उसकी टांगें फैली हुई थी, और उनके टैंगो के बीच मंजू तै का चेहरा था, जो उनका काम रास बड़े स्वाद के साथ चाट रही थी.

मंजू तै का पिछवाड़ा उठा हुआ था, और उसमे नाना का मोटा लुंड andar-bahar हो रहा tha—Nana हर धक्के के साथ मंजू तै की गांड मार रहे थे, उनकी सिसकियाँ आँगन में गूँज रही थी, "आह्हः… नाना… ओह्ह्ह… कितना मोटा है… आह्हः." वहीँ माँ के मुँह में राजन चाचा का हथियार घुसा हुआ था, जिसे वह बड़े मज़े से चूस रही थी, उसके मुँह से गुलगुलाहट की आवाज़ें निकल रही थी, "ममम… ओह्ह्ह… आह्हः."

ये सब देखकर तोह मेरा लुंड पतलून में तन गया, और बाकी सब का भी हाल कुछ अलग नहीं था. अनुज ने तोह सीधा मौसी के मुँह में अपना लुंड घुसा दिया, और मां ने आगे बढ़कर मौसी के चूतड़ों में अपना मुँह घुसा दिया, उनकी गांड को चाटने लगे. मौसी सिसकियों के साथ मज़े ले रही थी, "आह्हः… ओह्ह्ह… धीरे… आह्हः."

इधर हमारी आवाज़ सुनकर मामी भी रसोई से बाहर आयी, और पापा और मौसा दोनों उस पर टूट पड़े. कुछ hi पलों में मामी नंगी थी और झुकी हुई थी, उनके चूतड़ों के पीछे पापा थे, जिन्होंने अपना लुंड उनकी छूट में घुसा दिया था. मौसा ने अपना लुंड मामी के मुँह में दाल दिया, और मामी दोनों तरफ से चुदाई का मज़ा ले रही थी, उसके मुँह से दबी हुई सिसकियाँ निकल रही थी, "ममम… आह्हः… ओह्ह्ह."

मैं भी किसी को देखने लगा जो खली मिले. कमरे में जाकर देखा तो किरण कान में ईरफ़ोन लगा कर फ़ोन में फिल्म देख रही थी. मैंने अपना लुंड बाहर निकला और उसके मुँह के आगे कर दिया. उसने नज़र उठा कर मेरे चेहरे को भी नहीं देखा और लुंड को मुँह में भर लिया, उसकी जीभ मेरे लुंड के टोपे पर घूमने लगी.

मैंने उससे आँगन में चलने को कहा, तोह वह मेरे साथ आँगन में आ गयी. मैंने पजामा उतर कर खत पर बैठ गया, किरण ने सबको एक बार देखा और मेरा लुंड चूसने लगी. वह बड़े मज़े से लुंड को गले तक ले रही थी, और मेरे मुँह से सिसकियाँ निकल रही थी, "आह्हः… किरण… ओह्ह्ह… और चूस… कितना मज़ा आ रहा है… आह्हः." किरण ने एक बार लुंड मुँह से निकला, मेरा रास उसके होठों पर लगा था, और वह मुस्कुरा कर बोली, "अह्ह्ह… भैया… तुम्हारा रास… कितना स्वादिष्ट है… आह्हः," और फिर लुंड चूसने लगी.

मौसा ने मामी के मुँह से लुंड निकला और खत के पास जाकर माँ की टैंगो को पकड़ लिया. उन्होंने माँ को मंजू तै के सामने से हटाकर अपनी और घुमा लिया, और अपना लुंड माँ की छूट में घुसा दिया. माँ ने राजन चाचा का लुंड चूसते हुए hi एक दबी हुई आह ली, "आह्हः… ममम… ओह्ह्ह," और फिर बापिस उनका लुंड चूसने लगी. मौसा माँ की कमर को थाम कर उन्हें छोड़ने लगे, माँ की चूचियां हर धक्के के साथ उछलने लगी. मौसा के हर झटके के साथ माँ की सिसकियाँ तेज़ हो रही थी, "आह्हः… ओह्ह्ह… और तेज़… आह्हः." मंजू तै अब नाना के लुंड पर बैठ गयी थी, और अपने चूतड़ों को uchal-uchal कर चुद रही थी, "आह्हः… चचा… ओह्ह्ह… कितना मोटा है… आह्हः." नाना भी नीचे से धक्के लगा रहे थे, "अह्ह्ह… मंजू… तेरी गांड… ओह्ह्ह… कितनी गरम है… आह्हः."

मां ने मौसी को घोड़ी बनाकर उनकी गांड मारने लगे थे, जबकि अनुज मंजू तै और नाना के साथ शामिल हो गया. अब तै की दोहरी चुदाई हो रही thi—Nana का लुंड उनकी छूट में था, और वह नाना के ऊपर लेती थी, जबकि अनुज का लुंड उनकी गांड में था. तै अपनी गांड hila-hila कर दोनों को एक साथ मज़ा दे रही थी. अनुज गालियां दे रहा था, "आह्हः… तै… साली रंडी कुटिया… आह्हः… ऐसे hi मरवा अपनी गांड… रनडीई." अनुज की गालियां सुन कर माँ ने उसे एक नज़र भर देखा, और वह चुप हो गया, पर तै को जैसे कोई असर hi नहीं पड़ा था, वह बस मज़े में डूब गयी थी, "आह्हः… ओह्ह्ह… और तेज़… आह्हः."

उधर पापा मामी को अकेले छोड़ रहे थे, तभी सागर, जो कुछ देर पहले जाकर लेट गया था और सोने की कोशिश कर रहा था, बाहर की आवाज़ों से जग गया. वह उठ कर बाहर आया, और नज़ारा देख उसका लुंड फिर से तन गया. वह भी आगे बढ़ गया, और अपनी माँ, यानि मां, और अपने फप्फाजी,

यानि मेरे पापा के पास पहुँच गया. कुछ देर बाद मामी की भी दोहरी चुदाई हो रही thi—ek लुंड छूट में जो बेटे का था, और एक गांड में जो नन्दोई का था. मामी हर धक्के के साथ सिहर रही थी, "अह्ह्ह्ह… नन्दोई जी… अह्ह्ह्ह… बहुत मोटा है तुम्हारा लोढ़ा… अह्ह्ह्ह… गांड भर देता है." पापा बोले, "अह्ह्ह्ह… गुंजन… ओह्ह्ह्ह… तेरी गांड भी तोह एक दम कासी हुई और गरम है… अह्ह्ह… सागर, तेरी माँ लाखों में एक है." सागर ने भी जवाब दिया, "अह्ह्ह्हह्हह… ये तोह सही कहा फप्फाजी… अह्ह्ह्ह… सच में मम्मी जैसी… आह्हः."

दूसरी और मौसा ने माँ की छूट से लुंड निकल लिया था, और चाचा ने मुँह से. उन्होंने माँ को भी दोहरी चुदाई के लिए सही जगह पर सेट किया, और अब वह दोनों मिलकर माँ की चुदाई कर रहे थे. मौसा का लुंड माँ की छूट में था, तो चाचा का माँ की गांड में. दोनों लगातार माँ को मिलकर छोड़ रहे थे. माँ भी dheere-dheere और उत्तेजित हो रही थी, "अह्ह्ह्हह्हह… भैया… अह्ह्ह्ह… ऐसी hi छोड़ो दोनों अपनी भाभी को… अह्ह्ह." चाचा बोले, "अह्ह्ह्हह्हह… भाभी… तुम्हे तोह हमेशा hi छोड़ने की योजना है… अह्ह्ह्हह्हह." मौसा ने भी कहा, "अह्ह्ह्हह्हह… क्या मस्त गांड है भाभी तुम्हारी… अहह… मन करता है मरता hi रहूं… आह्हः."

मैंने भी किरण को नंगा कर अपने लुंड को उसकी गांड में घुसा दिया, और उछलने लगा. उसकी कासी हुई गांड मेरे लुंड को जकड़े हुई थी, और हर धक्के के साथ किरण सिसकी, "आह्हः… भैया… ओह्ह्ह… कितना मोटा है… आह्हः… धीरे… ओह्ह्ह." मैंने तेज़ी से धक्के लगाए, "अह्ह्ह… किरण… तेरी गांड… ओह्ह्ह… कितनी टाइट है… आह्हः."

इसी तरह चुदाई का दौर तब तक चला जब तक सब झाड़ नहीं गए. पहले अनुज और नाना झाड़ गए, उन्होंने मंजू तै की छूट और गांड में अपना रास भर दिया, और तै भी साथ में झाड़ गयी, "आह्हः… ओह्ह्ह… मैं गयी… आह्हः." पापा और सागर भी मामी के साथ झाड़ gaye—Papa ने मामी की गांड में, और सागर ने छूट में अपना रास छोड़ा. मामी हफ्ते हुए लेट गयी, "अह्ह्ह… बस… अब नहीं… आह्हः." मौसा और चाचा ने माँ की दोहरी चुदाई की, और दोनों एक साथ माँ की छूट और गांड में झाड़ गए, "अह्ह्ह… भाभी… ओह्ह्ह… ले… आह्हः." माँ भी झाड़ गयी, "आह्हः… ओह्ह्ह… मैं भी… आह्हः." मैंने किरण की गांड में तेज़ी से धक्के लगाए और उसकी गांड में झाड़ गया, "आह्हः… किरण… ओह्ह्ह… ले मेरा रास… आह्हः." किरण भी साथ में झाड़ गयी, "आह्हः… भैया… ओह्ह्ह… कितना गरम है… आह्हः."

झड़ने के बाद मैं लेता hi था की मेरे पास अंजलि का फ़ोन आया, साथ में फ़ोन पर नीतू भी थी. उन दोनों ने मुझे बताया की उन्होंने एक फॉर्म भरा था, उसका एग्जाम दो दिन बाद है किसी चमनपुरा में, तोह वह चाहते हैं मैं भी साथ चलूँ.

मैंने पूछा, "अरे मुझे कोई दिक्कत नहीं, नीतू की भी नहीं, पर तुम्हारे घरवाले मानेंगे?"

अंजलि ने बताया, "उसका प्लान मैंने बना लिया है, मैंने बताया है उन्हें की तुम्हारी जान पहचान है वहां पर और तुम्हारे कोई रिश्तेदार रहते हैं, तो तुम्हारे साथ जाना सही रहेगा, और वह लोग मान भी गए."

मैंने खुश होकर कहा, "अरे वाह, फिर तोह बढ़िया है, मैं रेडी हूँ."

नीतू बोली, "एक दिन पहले जायेंगे, दोपहर में पेपर है, फिर उस रात को रुक कर अगली सुबह निकल लेंगे."

मैंने कहा, "ठीक है, चलेगा." अंजलि और नीतू बहुत खुश थी और बोली, "चलो फिर बाद में फ़ोन करते हैं, तुम भी घर पर पूछ लो." मैं उनसे बात करके नीचे आया और सबको सब बता दिया. Maa-Papa ने भी तुरंत अनुमति दे दी.

अगली शाम को मैं अंजलि और नीतू के साथ निकल गया, और उसकी अगली सुबह मौसा, मौसी, मंजू तै, प्रेमा भाभी, और जग्गू मंजू तै के मायके गाओं की और निकल गए.

लेखक की ज़ुबानी: गैंदपुर

उधर गैंदपुर में दोनों baap-bete अपने समझौते को पूरा करने के लिए बेचैन थे. महिपाल अपनी बहु रानी को सम्भोग करते देखना चाहता था, और पियूष अपनी माँ सावित्री के नंगे जिस्म को देखने के लिए तड़प रहा था. पिछले कुछ दिनों से दोनों अपने प्लान पर काम कर रहे the—apni पत्नियों को गरम करना, उनकी कामुकता को जगाना, ताकि वह खुद hi इस नए खेल में शामिल हो जाएं.

पियूष ने रानी के साथ अपना व्यवहार बदल दिया था. वह उससे ज़्यादा प्यार से बात करता, उसके लिए chhoti-chhoti चीज़ें लाता, और बिस्तर में naye-naye तरीके आज़मा रहा था.

इधर महिपाल भी सावित्री को उत्तेजित करने में लगा था. दोपहर को जब सावित्री कपडे सूखने आँगन में आयी, महिपाल उसके पास गया, महिपाल ने उसके कंधे पर हाथ रखा और धीरे से उसकी कमर पर हाथ फेरते हुए बोलै, "सच कह रहा हूँ… तेरी यह कमर, यह भरे हुए नितम्भ… आज भी मुझे पागल कर देते हैं."

सावित्री के गाल लाल हो गए, उसने नज़र झुका ली, पर उसके बदन में एक गर्मी सी दौड़ गयी. महिपाल ने उसके पेट पर हाथ फेरा और उसके ब्लाउज के ऊपर से चूचियों को हल्का सा दबाया. सावित्री के मुँह से सिसकी निकली, "आह्हः… ाजी, यहाँ… कोई देख लेगा." महिपाल मुस्कुरा कर बोलै, "अरे, यहाँ कौन है? बस थोड़ा प्यार तोह कर लून." सावित्री की सांसें तेज़ हो गयी, उसकी छूट में हलकी सी गर्मी और गीलापन महसूस होने लगा. महिपाल का लुंड भी तन गया, पर वह भी रुक गया. दोनों baap-bete अपनी पत्नियों को dheere-dheere गरम कर रहे थे, ताकि उनकी इच्छाएं अपने चरम पर पहुँच जाएं.

पियूष beech-beech में बातों को कभी सीधा करके तोह कभी ghuma-phira के कर्मा से भी कुछ न कुछ उपाय पूछता रहता था. उसे कर्मा का एक उपाय बहुत पसंद आया,

कर्मा ने उसे बताया था की उसे रानी की गर्मी को बढ़ाना होगा, खुले में चुदाई करने से औरत बहुत जल्दी गरम होती है, उसे थोड़ा अलग एहसास मिलता है. उसने सोचा की अगर रानी को एक अलग एहसास दिया जाये, तोह वह और खुल जाएगी, साथ hi अंजलि भी नहीं है, इससे ाचा मौका नहीं मिलेगा.

उसने रानी से कहा, "आज शाम हम छत पर खाना खाएंगे, थोड़ी ताज़ी हवा भी खा लेंगे." रानी को यह आईडिया पसंद आया, "ठीक है जी, मैं खाना तैयार कर लेती हूँ." पियूष मुस्कुरा दिया, उसके दिमाग में कुछ और hi चल रहा था.

शाम ढलते hi पियूष ने छत पर एक छोटा सा सेटअप kiya—ek चटाई बिछा दी, थोड़ा सा खाना रखा, और एक शराब की बोतल छुपा कर राखी. रानी जब छत पर आयी, तोह उसने एक पतली सी साड़ी पहनी थी, जिससे उसका बदन साफ़ दिख रहा था.

उसका पल्लू हल्का सा सरकाया हुआ था, और उसकी चूचियों की गोलाई ब्लाउज के ऊपर से उभर रही थी. पियूष की नज़र उसके बदन पर तिकी, उसकी पतली कमर, गोल नितम्भ, और वह भरी चूचियां देखकर उसका लुंड पतलून में तन गया. दोनों चटाई पर बैठ गए, खाना खाया, और पियूष ने रानी को शराब ऑफर की, "थोड़ा पि लो, मज़ा आएगा." रानी झिझकी, "जी, मैंने कभी नहीं पि…" पियूष ने उसका हाथ पकड़ा, "अरे, थोड़ा सा… मेरे साथ… मज़ा आएगा." रानी ने शर्मा कर एक घूंट ली, और फिर पियूष ने उसे इसी तरह काफी शराब पीला दी, dheere-dheere शराब का नशा उस पर चढ़ने लगा. उसका चेहरा लाल हो गया, और वह थोड़ी खुल गयी.

पियूष ने मौका देखा और रानी को अपनी गॉड में खींच लिया. उसने रानी के गाल पर एक धीमा सा चुम्बन दिया, "कैसा लग रहा है मेरी रानी?"

रानी शर्मा गयी, "बोहोत ाचा… पर यहाँ… कोई देख लेगा तोह?"

पियूष हंसा, "यहाँ कौन देखेगा? बस हम दोनों हैं." उसने रानी के ब्लाउज के बटन खोल दिए, और उसकी भरी चूचियों को आज़ाद कर दिया. रानी के मुँह से सिसकी निकली, "आह्हः… जी, यहाँ… यह गलत है." पर उसकी आवाज़ में उत्तेजना साफ़ थी. पियूष ने उसकी चूचियों को हाथ में लिया, उन्हें दबाया, और एक निप्पल को मुँह में ले लिया.

रानी सिसकी, "ओह्ह्ह… जी… आह्हः… कितना ाचा लग रहा है." पियूष ने रानी की साड़ी कमर तक उठायी, उसकी जांघों को सहलाया, और उसकी छूट पर हाथ फेरना शुरू किया.

रानी मचलने लगी, "आह्हः… जी… ओह्ह्ह… यह… क्या कर रहे हो… आह्हः." उसकी छूट गीली हो चुकी थी, और पियूष का लुंड अब बर्दाश्त के बहार तन गया था.

पियूष ने अपना लुंड निकला और रानी के हाथ में दे दिया, "इसे पकड़, मेरी जान." रानी ने शरमाते हुए लुंड को मुठिया, उसकी गर्मी को महसूस किया, और फिर धीरे से उसे मुँह में ले लिया. पियूष के मुँह से आह निकली, "अह्ह्ह… रानी, तू तोह सच में रंडी है… आह्हः… और चूस… ओह्ह्ह." रानी ने लुंड को dheere-dheere चूसा, उसकी जीभ लुंड के टोपे पर घुमाई, और पियूष मज़े में डूब गया.

पियूष ने रानी को चटाई पर लिटाया, उसकी साड़ी पूरी उतार दी, और उसकी टांगें फैला दी. रानी नंगी छत पर लेती थी, उसका बदन चांदनी में चमक रहा था. पियूष ने अपना लुंड उसकी छूट पर रखा, एक हल्का सा धक्का दिया, और लुंड उसकी गीली छूट में घुस गया. रानी चिल्लाई, "आह्हः… जी… ओह्ह्ह… और धीरे… आह्हः."

पियूष ने धक्के लगाने शुरू किये, "ले साली… आह्हः… खुले में तुझे छोड़ने का मज़ा hi अलग है… ओह्ह्ह."

रानी के मुँह से आहें निकलने लगी, "आह्हः… जी… और तेज़… ओह्ह्ह… छोड़ दो मुझे… आह्हः."

छत पर दोनों की चुदाई चल रही थी की किस्मत से कुछ ऐसा हुआ की तभी, अचानक बिजली चली गयी. पूरा घर अँधेरे में डूब गया, और गर्मी के कारण महिपाल और सावित्री दोनों ने सोचा की छत पर जाकर थोड़ी हवा खा ली जाये. महिपाल ने सावित्री से कहा, "चलो, छत पर चलते हैं, यहाँ गर्मी से हाल बुरा है."

सावित्री मान गयी, "ठीक है, चलो." दोनों छत की सीढ़ियों पर चढ़ने लगे, पर उन्हें अंदाजा नहीं था की वहां क्या मंज़र देखने को मिलेगा.

छत पर पहुँचते hi, महिपाल और सावित्री के कदम रुक गए. चांदनी की रौशनी में, उन्होंने देखा की पियूष और रानी नंगे एक दुसरे में लिपटे हुए हैं. रानी चटाई पर घोड़ी बानी थी, और पियूष पीछे से उसकी छूट में लुंड पेल रहा था.

रानी की आहें गूँज रही थी, "आह्हः… जी… और तेज़… ओह्ह्ह… छोड़ दो… आह्हः."

पियूष का लुंड उसकी छूट में पिस्टन की तरह andar-bahar हो रहा था, और वह भी सिसकियाँ भर रहा था, "अह्ह्ह… रानी… तेरी छूट… ओह्ह्ह… कितनी गरम है… आह्हः."

रानी के बदन पर पसीना चमक रहा था, उसकी चूचियां झटकों के साथ हिल रही थी, और पियूष उसके नितम्भ पर थप्पड़ मार रहा था.

महिपाल और सावित्री दोनों के मुँह से एक साथ "हाय दिया…" निकला. दोनों के बदन में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गयी. महिपाल की नज़र रानी के नंगे बदन पर tiki—uski पतली कमर, गोल नितम्भ, और वह भरी चूचियां देखकर उसका लुंड पतलून में तन गया. सावित्री भी अपने hi बेटे पियूष के नंगे बदन को देखकर गरम हो गयी, उसकी छूट में गीलापन बढ़ने लगा. दोनों एक दुसरे के सामने अपनी उत्तेजना छुपा नहीं प् रहे थे.

महिपाल ने सावित्री का हाथ पकड़ा और धीरे से बोलै, "सावित्री… देखो न… कितना मज़ा ले रहे हैं यह दोनों."

सावित्री शर्मा गयी, "ाजी… यह क्या कह रहे हो… चलो नीचे चलते हैं."

पर महिपाल कहाँ रुकने वाला था? उसने सावित्री को अपनी बाहों में खींच लिया, "अरे, थोड़ी देर रुक जाओ… हम भी तोह थोड़ा मज़ा कर सकते हैं."

उसने सावित्री के ब्लाउज के बटन खोल दिए, उसकी साड़ी नीचे खिसकायी, और उसकी चूचियों को आज़ाद कर दिया.

सावित्री सिसकी, "आह्हः… यहाँ… यह सब… वह लोग देख लेंगे." महिपाल बोलै, "अरे, वह अपने मज़े में डूबे हैं… हमें कौन देखेगा?"

उसने सावित्री को छत के एक कोने में ले जाया, जहाँ उनके और पियूष के बीच में एक छोटा सा कमरा था जिस पर टंकियां वगेरा राखी होती थी. वहां एक खत पड़ा था, उसने सावित्री को उस पर लिटाया, और उसकी टांगें फैला दी.

महिपाल ने अपना लुंड निकला, जो अब पूरा तन चूका था, और सावित्री की छूट पर रखा. सावित्री की छूट पहले से गीली थी, और महिपाल का लुंड एक hi झटके में अंदर घुस गया.

सावित्री चिल्लाई, "आह्हः… ओह्ह्ह… ाजी… धीरे… आह्हः." महिपाल ने धक्के लगाने शुरू किये, "अह्ह्ह… सावित्री… तेरी छूट… अब भी कितनी टाइट है… ओह्ह्ह." सावित्री के मुँह से आहें निकलने लगी, "आह्हः… हाँ… और तेज़… ओह्ह्ह… कितना ाचा लग रहा है… आह्हः." महिपाल उसकी चूचियों को दबाते हुए उसकी छूट में लुंड पेल रहा था, और सावित्री भी खुलकर मज़ा ले रही थी.

छत पर दो जोड़ों की आहें गूँज रही थी. पियूष और रानी एक तरफ, महिपाल और सावित्री दूसरी taraf—dono अपने मज़े में डूबे थे. कमरे के बाहर बहु और बेटे थे, तो कमरे के अंदर maa-baap—bahut hi बढ़िया और कामुक संजोग था. पियूष ने रानी को घोड़ी बनाकर छोड़ा, फिर उसके ऊपर चढ़ गया और उसकी छूट में तेज़ी से धक्के लगाने लगा.

रानी के मुँह से चीख निकल गयी, "आह्हः… जी… ओह्ह्ह… मैं झाड़ रही हूँ… आह्हः." पियूष भी झाड़ गया, उसने अपना रास रानी की छूट में भर दिया.

इधर महिपाल ने सावित्री की गांड में लुंड दाल दिया, और सावित्री सिसकी, "आह्हः… ओह्ह्ह… ाजी… कितना दर्द हो रहा है… पर मज़ा भी आ रहा है… आह्हः." महिपाल ने तेज़ी से धक्के लगाए, "अह्ह्ह… सावित्री… तेरी गांड… ओह्ह्ह… कितनी गरम है… आह्हः." वह भी झाड़ गया, और सावित्री के ऊपर लेट गया.

पियूष और रानी तो छत पर ऐसे hi सो गए. काफी देर बाद महिपाल और सावित्री ने उन्हें चादर ओढ़ कर सोते देखा तो नीचे आ गए. उनके जाते hi पियूष ने अपने ऊपर से चादर हटाई, और उसके चेहरे पर एक मुस्कराहट thi—jaise वह जानता था की उसका प्लान कामयाब हो रहा है.

जारी रहेगी
 
अपडेट 249

(कर्मा की ज़ुबानी)
मैं, अंजलि और नीतू अँधेरा होने तक चमनपुरा पहुँच चुके थे. वहां के बाजार में hi एक छोटा सा होटल था, जिसमें मैंने दो कमरे बुक karwaye—agal-bagal वाले, ताकि हमें रहत हो. कमरों में जाकर हम तीनो थोड़ा फ्रेश hue—thandi हवा खाकर और चेहरे पर पानी का छींटें, और एक नया एहसास इस नगर में होने का. फिर मैंने दोनों से कहा, "चलो खाना बाहर खा कर आते हैं, इसी बहाने थोड़ा aas-paas घूम भी लेंगे और देख लेंगे कैसा है यह शहर." अंजलि और नीतू को मेरी बात पसंद आयी, और हम तीनो निकल गए.

छोटे शहर के हिसाब से बाजार में अच्छी chahal-pahal थी. बहुत सी दुकानें thi—kapdon की, khane-pekhan की, और थोड़ी सी भीड़ भी. हम chalte-chalte एक कास्मेटिक की दुकान के पास पहुंचे. नीतू की आँखें चमक उठी, और वह बोली, "अरे चलो न, मुझे ब्रा और पंतय लेनी है, साडी कास गयी हैं!" अंजलि ने मज़ाक में उससे छेड़ा, "वो तोह कसेंगी hi, इतनी मरवाती जो है!" दोनों हसने लगी, और मैं भी उनके साथ हँसा. हम दुकान पर पहुंचे, जहाँ एक औरत बैठी thi—bhara हुआ बदन, थोड़ी मोती, पर देखने में कामुक और हंसमुख. एक लड़का, शायद उसका बीटा, वहां फ़ोन पे बिजी था.

अंजलि और नीतू ने औरत से ब्रा और पंतय निकलने को कहा. मैं पीछे खड़ा होकर बस देख रहा था. वह औरत अपनी दुकान में सामान निकाल रही थी, और उसके हाथों में जब ब्लैक और रेड bra-panty आयी, तोह वह Anjali-Neetu से खूब hans-hans कर बातें करने लगी. उसके बदन की गर्मी और मुस्कराहट से माहौल थोड़ा और हल्का हो गया. थोड़ी देर बाद नीतू और अंजलि ने अपने लिए जो chuna—ek एक काली ब्रा और panty—woh ले लिया, और हम लोग खाना खाने चले गए. एक छोटे से ढाबे पर खाना khaya—roti, सब्ज़ी, और ठंडा lassi—phir होटल वापस आ गए.

होटल में दो कमरे तोह नाम के लिए थे; पर हम तीनो एक hi कमरे में घुस गए और बिस्तर पर लेट गए. थकावट थी, लेकिन एक अलग सी उत्तेजना भी. नीतू ने मस्ती में कहा, "अरे अंजलि, चल न, नयी bra-panty पहनकर देखते हैं!"

अंजलि बोली, "हाँ, चल क्यों नहीं?"

मैं बैठ कर उन्हें देख रहा था, सोच रहा था की लड़कियों को नए कपडे लाकर तुरंत पेहेन्ने का यह शौक़ कहाँ से आता है. लेकिन उनकी ख़ुशी देखकर मेरा दिल भी खुश हो रहा था. कुछ hi देर में दोनों बाथरूम से nikli—kali ब्रा और पंतय में. उनका बदन चमक रहा था, और उनके चेहरों पर एक कामुक मुस्कान थी.

दोनों मेरे सामने कड़ी हो गयी और अपना बदन दिखने लगी. नीतू ने पूछा, "क्या कहना है भैया?"

मैं थोड़ी हंसी के साथ बोलै, "मैं क्या कहूं, तुम लोगों को देख कर कुछ कहने का नहीं, पर बहुत कुछ करने का मन हो रहा है."

अंजलि ने शरारती अंदाज़ में कहा, "ाचा जी, पर अभी तुम वही baitho—abhi तुम सिर्फ देख सकते हो, उठना नहीं है."

मैं मुस्कुरा कर बोलै, "जैसा तुम कहो, मालकिन."

अंजलि और नीतू ने एक दुसरे की तरफ देखा, फिर मुझे दिखते हुए एक दुसरे के बदन पर हाथ फेरने लगी.

नीतू ने अंजलि को देखते हुए कहा, "अंजलि मेरी जान, तेरे इस बदन को चखने का तोह मुझे कबसे इंतज़ार था."

अंजलि खिलखिला कर बोली, "तोह अब इंतज़ार ख़तम हो गया मेरी जान. वैसे मैंने सोचा नहीं था किसी लड़की के साथ कभी करुँगी, पर अब रहा नहीं जा रहा. और सबसे पहले तेरे साथ है, इससे अछि बात मेरे लिए हो hi नहीं सकती."

मैं उन्हें देखकर तड़प रहा था, "अरे बातों में hi मत लगा, आगे बढ़ो!" मेरी यह बात सुनते hi दोनों के होंठ जुड़ गए, और वह एक दुसरे के होंठों को चूसने लगी.

यह नज़ारा देखकर मेरा लुंड ठुमके मारने लगा. दोनों एक दुसरे को बिछड़े हुए प्रेमियों की तरह चूम रही thi—unke होंठ एक दुसरे से लिपटे, जीभें एक दुसरे के मुँह में घूम रही थी, और thodi-thodi सी सिसकियाँ निकल रही थी. कुछ देर choomne-chatne के बाद दोनों dheere-dheere मेरे पास आयी. पहले अंजलि ने मुझे एक छोटा सा चुम्बन diya—uske नरम होंठों का स्पर्श मेरे दिल को छू गया. फिर नीतू ने मुझे चूमा, उसकी जीभ एक पल के लिए मेरे होंठों पर घुमाई, और मैं भी उसका स्वाद महसूस करने लगा. फिर हम तीनो एक साथ होंठ मिलाने की कोशिश करने lage—ek अलग सी गर्मी, एक अलग सा आनंद, जहाँ हम तीनो के होंठ एक दुसरे से टकराते और लिपटे.

तीनो के होंठ अलग हुए तो अंजलि और नीतू ने मेरे सामने फिर एक दुसरे को चूमा. उनके होंठ एक दुसरे के साथ खेल रहे थे, और थोड़ी देर बाद अलग हुए.





इसके बाद अंजलि मेरे आगे hi नीचे खिसकी और मेरा पंत खोलने लगी. वहीँ नीतू मेरे होंठों को चूसते हुए मेरी शर्ट के बटन खोलने लगी. नीतू के नरम होंठों का स्वाद पाकर मैं आनंद में डूब gaya—uski जीभ मेरे मुँह में घूम रही थी, और हर चूसै से एक सिहरन दौड़ रही थी. अंजलि ने मेरी पंत के ज़िप को धीरे से खोला, फिर पंत को मेरे पैरों से निकाल दिया. मेरा लुंड अब कच्चे में तम्बू बनाये खड़ा था, और दोनों की नज़र उस पर थी.

अंजलि ने मेरी कच्चे के ऊपर से लुंड को सहलाया, और मैं सिसकिया भरने लगा, "आह्हः… अंजलि… ओह्ह्ह… धीरे… आह्हः." नीतू ने मेरी शर्ट उतार दी, और अब मैं ऊपर से नंगा था. अंजलि ने मेरी कच्चे के इलास्टिक को पकड़ा और dheere-dheere नीचे खिसकायी. जब मेरा लुंड आज़ाद हुआ, तोह वह उनके सामने झूलने laga—sakht, गरम, और तैयार. अंजलि और नीतू दोनों की आँखें चमक उठी, और उनके चेहरों पर एक कामुक मुस्कान फ़ैल गयी.

अंजलि ने मेरे पैरों में जगह ली और मेरे लुंड को पकड़ कर उस पर जीभ फिरने लगी. मैं सिसकियाँ भरने लगा, "आह्हः… अंजलि… ओह्ह्ह… कितनी गरम है तेरी जीभ… आह्हः,"

जबकि नीतू ने अपनी मोती चूचियां मेरे मुँह में ठूंस दी. उनकी नरम और भरी चूचियों का स्पर्श मेरे होंठों पर महसूस हुआ, और मैं उन्हें चूसने laga—badal-badal कर एक निप्पल को मुँह में ले कर उसकी गर्मी को चख रहा था. नीतू मेरे बालों में हाथ फेरते हुए आहें भर रही थी, "आह… भैया… अहह… ऐसे hi चूस डालो… ओह्ह्ह… कितना मज़ा आ रहा है… आह्हः."

अंजलि ने मेरा लुंड चूसना शुरू कर दिया. वह मेरे लुंड को अपने मुँह में भरने की पूरी कोशिश कर रही थी,





उसकी जीभ लुंड के नीचे से ऊपर तक घूम रही थी, और हर चूसै से मेरा बदन सिहर रहा था. मैं सिसकिया भरते हुए बोलै, "आह्हः… अंजलि… ओह्ह्ह… और गहरा ले… आह्हः." नीतू अपनी चूचियों को मेरे मुँह में दबाते हुए अपने बदन को मेरे मुँह पर दबती जा रही थी, "आह्हः… भैया… मेरी चूचियों का रास पी जाओ… ओह्ह्ह, इन्हे निचोड़ लो अह्ह्ह."

कुछ देर बाद मैंने नीतू को ऊपर खिसका लिया और उसके पेट और नाभि को चूसने लगा. मेरी जीभ उसकी नाभि के अंदर घूम रही थी, और वह मेरे ऊपर मचलने लगी, "आह्हः… भइयह… ओह्ह्ह… मेरी नाभि… आह्हः… खा जाओ आह… ओह्ह्ह."

अंजलि लगातार मेरा लुंड चूस रही थी, उसका मुँह मेरे लुंड पर upar-niche हो रहा था, और उसकी सिसकियाँ भी सुनाई दे रही थी, "ममम… आह्हः… ुघठ… ओह्ह्ह."

नीतू ने फिर अपने आप को मेरे ऊपर से हटाया और झुक कर अंजलि के पास पहुँच गयी. अंजलि ने नीतू को पास देखा, अपने मुँह से लुंड निकला, और नीतू के मुँह में फंसा दिया. नीतू ने बिना समय गंवाए तुरंत लुंड को मुँह में भर लिया और चूसना शुरू कर दिया, "ममम… आह्हः… कितना कड़क है… ओह्ह्ह." नीतू मुँह में लेते हुए बोली.





अंजलि ने मेरे लुंड को छोड़ कर मेरी गोलियों को मुँह में भर लिया और उन्हें चूसने लगी. उसकी जीभ मेरी गोलियों पर घूम रही थी, और मैं तोह जैसे जन्नत में था, "अह्ह्ह्हह्हह… अंजलि… नीतू… ओह्ह्ह्हह्ह… बहुत मज़ा आ रहा है… इतना मज़ा… यह… तुम दोनों के मुँह कितने गरम हैं… आह्हः."

दोनों मेरी आहें सुन कर और उत्साहित हो रही थी. नीतू अब पूरी तरह उतर कर अंजलि के बगल में बैठ गयी, और अब दोनों badal-badal कर मेरे लुंड और गोलियों को चूस रही थी. कभी तोह दोनों मेरे लुंड को अपने होंठों के बीच एक साथ फंसा लेती और फिर चूसती, कभी मेरे लुंड को चूसते हुए एक दुसरे के होंठों को चूसने लगती. यह नज़ारा देखकर मैं सिसकिया भर रहा था, "आह्हः… ओह्ह्ह… यह क्या मज़ा है… आह्हः."

मैं तड़पने लगा और बोलै, "अह्ह्ह्हह्हह… अब सहा नहीं जाता… अब आओ, कोई अपनी छूट का मज़ा दो!" यह सुनकर दोनों मुस्कुराई और एक दुसरे को देखा. फिर अंजलि ऊपर चढ़ी, और नीतू ने मेरा लुंड पकड़ कर अंजलि की छूट पर लगाया. अंजलि नीचे बैठ गयी, और हम दोनों के मुँह से एक साथ आह निकली. मैं बोलै, "अह्ह्ह्हह्हह… ये गरम छूट… यह!" अंजलि सिसकी, "तुम्हारा ये मोटा लम्बा लुंड भी तोह बिलकुल अंदर तक भर देता है… आह्हः."

अंजलि मेरी और झुकी और हम दोनों ने एक दुसरे को chooma—uske होंठों का स्वाद मेरे मुँह में घुल गया. फिर अंजलि dheere-dheere अपने चूतड़ों को aage-peechhe करने लगी,





"आह्हः… कर्मा… ओह्ह्ह… कितना ाचा लग रहा है… आह्हः." नीतू बगल में बैठ कर हम दोनों को उत्साहित कर रही थी, "यह… अंजलि, ऐसे hi अपनी गरम छूट में ले मेरे भाई का लुंड… यह… साली कुटिया, दिखा तेरे अंदर कितनी गर्मी है… यह लुंड hi चाहिए था न तुझे?"

अंजलि चिल्लाई, "हाँ… अह्ह्ह्हह्हह… अह्ह्ह्हह्हह… ये hi चाहिए था… अह्ह्ह्हह्हह… बहुत मोटा है… आह्हः."

मैं नीतू की तरफ देखा और बोलै, "नीतू… अह्ह्ह्हह्हह… अपनी छूट का स्वाद चखना!"

नीतू ने यह सुना और अपनी पंतय उतार कर मेरे मुँह पर अपनी छूट रख कर बैठ गयी. मैं उसकी रसीली छूट को जीभ निकल कर चाटने लगा,

"अंजलि ने भी तेज़ी से मेरे लुंड पर उछलना शुरू कर दिया, "आह्हः… कर्मा… ओह्ह्ह… और तेज़… आह्हः." दोनों को मैं एक साथ मज़ा दे रहा tha—ek को लुंड से और एक को जीभ से. दोनों hi आहें भर रही थी,





फिर नीतू आगे झुकी और अंजलि के होंठों को चूमने लगी. दोनों के निचे के होंठ मुझसे जुड़े हुए थे, और ऊपर के आपस mein—ek अलग सी गर्मी और मस्ती. कुछ देर यूँ hi चला, फिर दोनों के बीच इशारा हुआ.

अंजलि मेरे लुंड से उतर गयी, और कुछ hi पलों में उसकी जगह नीतू ने ले ली. अंजलि ने मेरे मुँह पर अपनी छूट रख दी. नीतू अपनी गरम और रसीली छूट मेरे लुंड पर पटकने लगी, "आह्हः… कर्मा भैया … ओह्ह्ह… तुम्हारा लुंड… आह्हः." मैं अंजलि की स्वादिष्ट छूट चाटने लगा,

मेरा मुँह बंद था, लेकिन वह दोनों कभी आपस में बातें करती, "अंजलि, तेरी छूट कितनी गीली है… आह्हः," तोह कभी एक दुसरे को चूमती, "ममम… नीतू… ओह्ह्ह," और कभी आहें भर रही थी, "आह्हः… और… ओह्ह्ह."

मेरा लुंड और मेरी जीभ लगातार उनकी छूट में चल रहे थे. उन दोनों की उत्तेजना हर पल के साथ बढ़ रही थी, और मेरी भी. कुछ देर की चूसै के बाद hi अंजलि ने मेरे मुँह में अपना रास छोड़ दिया, "आह्हः… कर्मा… ओह्ह्ह… मैं आह ओह्ह कर्मा आह ओह्ह hi गयी… आह्हः."

नीतू भी मेरे लुंड पर कांपते हुए झड़ने लगी, "अह्ह्ह्ह… भैया… ओह्ह्ह… मैं गयी… आह्हः," और झड़ने के बाद लुंड से अलग होकर बिस्तर पर गिर गयी.

मैं उठा और अपना लुंड अंजलि की छूट में घुसा दिया. कुछ धक्कों के बाद hi उसकी छूट को अपने रास से भर दिया, "आह्हः… अंजलि… ओह्ह्ह… ले मेरा रास… आह्हः."

मेरे हटते hi नीतू अंजलि की छूट में मुँह लगाकर मेरा रास चाटने लगी, "ममम… अंजलि… ये तो डबल टास्ते हो गया तेरा स्वाद साथ hi भैया का रास … ओह्ह्ह," वो स्वाद ले लेकर तब तक चाटती रही जब तक संतुष्ट न हो गयी.

हम तीनो थोड़ी देर यूँ hi लेते रहे, हांफते हुए. नीतू ने मस्ती में कहा, "मज़ा आया न?" अंजलि बोली, "हाँ, बहुत." नीतू फिर शरारती होकर बोली, "पर अभी तोह खेल शुरू हुआ है… क्यों, मेरे घोड़े थका तोह नहीं?"

मैं हंसा और बोलै, "नहीं मेरी घोड़ी, जब तक घोड़ी नहीं थकेगी, तब तक घोडा भी नहीं थकेगा." हम तीनो हसने लगे.

नीतू ने कहा, "तोह फिर चलो, थोड़ी गांड मस्ती की जाये."

अंजलि ने पूछा, "गांड मस्ती मतलब?"

नीतू बोली, "अभी दिखाती हूँ मेरी जान… पहले जल्दी से घोड़ी बन जा."

अंजलि नीतू का कहना मान कर घोड़ी बन गयी. नीतू उसके ऊपर झुकी और अपना चेहरा झुका कर उसके चूतड़ों के बीच में लाकर अपनी जीभ निकली. वह अंजलि के गांड के छेड़ को चाटने लगी.





अंजलि अपने चूतड़ों को उठाये अपनी सहेली की जीभ महसूस कर आहें भर रही थी, "आह्हः… नीतू… ओह्ह्ह… तेरी जीभ… आह्हः… कितनी गरम है… ओह्ह्ह."

यह नज़ारा देख मेरा लुंड दोबारा से तन गया. मेरी नज़र नीतू की जीभ और अंजलि की गांड के मिलान पर तिकी थी. नीतू की जीभ अंजलि की गांड को भेद रही थी, और अंजलि सिसकिया भर रही थी,





अंजलि आहें भर रही थी: आह्हः… नीतू… ओह्ह्ह… और अंदर… आह्हः."

मैं उन्हें देखते हुए अपना लुंड सहलाने लगा, "अह्ह्ह… यह नज़ारा… ओह्ह्ह… कितना कामुक है… आह्हः."

इसी बीच मेरी नज़र नीतू से मिली, और उसने मुझे अपने पास बुलाया, "आजाओ भैया… अब तुम्हारी बारी है."

नीतू ने अपनी जीभ अंजलि की गांड से हटाई और मेरे लुंड को मुँह में भर लिया. वह उसे अचे से चिकना करने लगी, अपनी जीभ से लुंड को गिला किया और साथ hi अपनी उंगली से अंजलि के गांड के साथ खेलने लगी. अंजलि सिसकी, "आह्हः… नीतू… ओह्ह्ह… तेरी उंगली… आह्हः."

नीतू ने मेरे लुंड को चिकना करने के बाद मुँह हटाया और बोली, "घोड़ी तैयार है घोड़े… चढ़ जाओ. क्यों घोड़ी चढ़वा दूँ तेरे ऊपर?" अंजलि हस्ते हुए बोली, "यह हाँ… ओह… चढ़ जाओ कर्मा… आह्हः."

नीतू ने अपनी उँगलियों को अंजलि की गांड से हटाया और उसके चूतड़ों को अपने हाथों से फैला कर मुझे आगे बढ़ने का इशारा किया. मैंने अंजलि के पीछे जगह ली और अपने लुंड को उसकी गांड के छेड़ पर रखा. मैंने पूछा, "तैयार हो अंजलि?" अंजलि ने सिसकी, "हाँ… घुसा दो… आह्हः."

मैंने फिर dheere-dheere दबाव बढ़ाया, और मेरा लुंड का टप्पा अंजलि की गांड को फैलते हुए अंदर घुस गया.

उसके मुँह से एक चीख निकली, "यह ओह… ये पहले भी लिया है पर और बड़ा लग रहा है… आह्हः."

नीतू हस्ते हुए बोली, "ये लुंड नहीं है लोढ़ा है मेरी जान, इसे लेकर तोह तेरी मम्मी भी चीख पड़ेंगी… आह्हः."

अंजलि हसने लगी, "कुटिया कहीं की… अह्ह्ह्हह्हह!"

मैंने लुंड को पकड़ कर और अंदर घुसा दिया, और अंजलि बिस्तर की चादर को अपने मुँह और हाथों से जकड़ने लगी,





Dheere-dheere मैंने अपने लुंड को aage-peechhe करना शुरू कर दिया और अंजलि की कासी हुई गांड को मारने लगा. नीतू भी हम दोनों का पूरी तरह उत्साह बढ़ा रही थी, "आह्हः… कर्मा, ऐसे hi पेल उसकी गांड… ओह्ह्ह… अंजलि, ले अपने भाई का लोढ़ा… आह्हः." अंजलि सिसकिया भर रही थी, "आह्हः… कर्मा… ओह्ह्ह… कितना मोटा है… आह्हः… और अंदर… ओह्ह्ह."

नीतू अपना चेहरा अंजलि के चूतड़ों पर टिका कर मेरे लुंड को उसकी गांड में andar-bahar होता देख रही थी, "अह्ह्ह… देखो भैया… तुम्हारा लुंड कितनी अछि तरह उसकी गांड को भर रहा है… ओह्ह्ह."





मैं भी उत्तेजित होकर बोलै, "आह्हः… नीतू… तेरी सहेली की गांड… ओह्ह्ह… कितनी टाइट है… आह्हः." अंजलि चिल्लाई, "आह्हः… ओह्ह्ह्हह्ह नीतू… अह्ह्ह साली गांड फड़वा दी तूने मेरी आह्ह्ह्ह,

नीतू हसी और बोली, "साली रंडी… तेरी गांड अब मेरे भाई के लोडे की है अब ये hi तेरा काम है… नीतू और गन्दी बातें करते हुए बोली,

मैं तेज़ी से धक्के लगाने लगा, और अंजलि के मुँह से सिसकियाँ तेज़ हो गयी, "आह्हः… कर्मा… ओह्ह्ह… और तेज़… आह्हः… मैं झड़ने वाली हूँ… ओह्ह्ह!" नीतू ने अंजलि के चूतड़ों पर थप्पड़ मारा, "झाड़ जा… कुटिया… दिखजे तेरी गांड का मज़ा… आह्हः!"

कुछ देर के बाद अंजलि का बदन कांपने लगा, और वह झाड़ गयी, "आह्हः… ओह्ह्ह… बस… आह्हः."

पर मैंने उसकी गांड मारना जारी रखा झड़ने के बाद वो थोड़ी शांत हुई तो मैंने उसकी गांड से लुंड निकला और नीतू के मुँह में घुसा दिया, नीतू ने अपनी सहेली के गांड के स्वाद वाला लुंड तुरंत मुँह में भर लिए, कुछ पल चुसवाने के बाद मैंने लुंड फिर से अंजलि की गांड मैं घुसा दिया, और दो चार झटके लगाने के बाद फिर से निकल कर नीतू के मुँह में, मुझे इसमें मज़ा आ रहा था और मैं ये बार बार करने लगा,





लगातार नीतू के मुँह और अंजलि की गांड का मज़ा ले रहा था बदल बदल कर, अंजलि झड़ने के बाद थोड़ी शांत हो चुकी थी पर नीतू की उत्तेजना बढ़ रही थी और वो बोली: अह्ह्ह्हह्हह अब मुझे चाहिए ये लुंड अपनी गांड में,

अब मुझे इसमें क्या परेशानी हो सकती थी, मैंने अंजलि की गांड से लुंड निकला तो वो वहीँ लेट गयी, मैं उसके बगल में पीठ पर लेट गया, और नीतू मेरे ऊपर आई और मेरी और अपनी पीठ करके मेरी कमर पर बैठी और अपनी कासी हुई गांड में मेरा लुंड लगाया और फिर नीचे हो गयी और मेरा लुंड उसकी गांड में घुसता चला गया, उसकी और मेरी सिसकी एक साथ निकली.

नीतू: अह्ह्ह्हह्हह भइयह सच में तुम्हारा लोढ़ा कितनी बार भी ले लूँ पर हर बार गांड को फैला देता है,

में: नीतू अह्ह्ह तेरी गांड है hi इतनी मस्त हर बार कास जाती हैं ऐसा लगता है पहली बार मार रहा हूँ,

मैं धीरे धीरे गति बढ़ाते हुए नीतू की गांड मारने लगा

हमारी चुदाई देख और बातें सुन कर अंजलि भी उठी और उठ कर अपने चूतड़ों को मेरे मुँह पर रख कर बैठ गयी तो मैं उसकी गांड और छूट चाटने लगा वहीँ अंजलि ने आगे होकर नीतू को पीछे से जकड लिया और नीतू की मोती चूचियां दबाने लगी साथ hi उसके होंठो और गर्दन को चूमने लगी,





मैं नीचे से लगातार नीतू की गांड में धक्के लगा रहा था साथ hi उसकी छूट को भी मसल रहा था, नीतू पर एक साथ कई तरफ से हमला हो रहा था जो उसकी उत्तेजना और आनंद को कई गुना बढ़ा रहा था,

वो लगातार आहें भर रही थी, मैं अपनी जीभ अंजलि की गांड में अंदर बाहर कर रहा था,

नीतू: अह्ह्ह्हह्हह भइयह ओह्ह्ह्हह्ह अंजलि अह्ह्ह्हह्हह तुम लोग मिलकर आह्ह्ह्ह मेरी जान ले लोगे आह्ह्ह्ह अह्ह्ह्हह्हह अह्ह्ह्हह्हह.

अंजलि: जान तो नहीं मेरी रानी पर तेरे भैया तेरी गांड ज़रूर ले रहे हैं और वो भी तेज़ तेज़, भैया की रंडी बहन है न बोल,

नीतू: हैं अह्ह्ह्हह्हह अह्ह्ह्हह्हह भइयह की रंडी बहन हूँ मैं आह्ह्ह्ह, और ज़िन्दगी भर आह्ह्ह्ह इनके लुंड से गांड मरवाउंगी ओह अह्ह्ह्हह्हह अहह,

नीतू और गरम होते हुए बोली,

उसकी उत्तेजना कितनी थी ये साफ़ पता चल रहा था, एक साथ छूट में चलती मेरी उंगलिया, गांड में मेरा लुंड चल रहा था, चूचियां अंजलि दबा रही थी और गर्दन और कंधे चूम रही थी,

थोड़ी देर hi नीतू भी मेरे लुंड पर झाड़ रही थी जिसे मैंने कुछ देर लुंड पर बिठाये रखा और फिर वो नीचे लेटकर आराम करने लगी,

मैंने उसके हटते hi अंजलि को अपने मुँह से हटाया और एक करवट लिटा दिया और खुद उसके पीछे लेट गया और अपना लुंड पीछे से उसकी गांड में घुसा दिया और धीरे धीरे से अंदर बाहर करने लगा,

अंजलि: अह्ह्ह्हह्हह कर्मा ओह ऐसे hi बहुत मज़ा आ रहा है

में- अह्ह्ह्हह्हह अह्ह्ह्हह्हह अंजलि मेरी जान मुझे भी, ओह्ह्ह्हह्ह तुम्हारी गांड कितनी मखमली है,

अंजलि: अह्ह्ह्हह्हह तो फिर मारो न मेरी मखमली गांड को कास के मारो.

अंजलि ने इतना कहा तो मैंने उसकी कमर को थमा और पीछे से दनादन धक्के लगाने लगा और उसकी गांड मरने लगा. पूरे कमरे में थापों और अंजलि की चीखों की आवाज़ गूँज रही थी, नीतू भी उठ गयी थी और हमारे पीछे बैठ कर हमारी चुदाई देख रही थी, मैं लगातार तूफानी धक्के लगा रहा था जो समय के साथ इतने तेज हो गए की अंजलि को मुझे रुकने को बोलना पड़ा,

अंजलि: अह्ह्ह्हह्हह अह्ह्ह्हह्हह अह्ह्ह्हह्हह अह्ह्ह्हह्हह ओह्ह्ह्हह्ह कर्मा अह्ह्ह्हह्हह रुको आराम से अह्ह्ह्हह्हह ढहरेरे,

उसकी आवाज़ सुनकर मैं रुक गया,

अंजलि: आह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह तुम तो मेरी जान hi ले लेते अह्ह्ह्हह्हह,

मैंने उसके चेहरे को पकड़ा और उसके होंठो को चूमा और बोलै: अरे तुम तो मेरी जान हो ऐसे कैसे जान ले लूंगा,





अंजलि: अह्ह्ह्हह्हह अब मुझे थोड़ा आराम दो ओह्ह्ह्हह्ह पूरा बदन hi पीस दिया मेरा तुमने तो, अह्ह्ह नीतू संभल अपने भैया को,

नीतू: अरे बस इतने में hi पास्ट हो गयी तू, ऐसे बनेगी मेरी भाभी,

अंजलि: अरे धीरे धीरे सीख जाउंगी पर अभी तू संभल,

नीतू: हाँ बिलकुल चल हैट मैं दिखती हूँ कैसे सँभालते हैं, आओ भैया,

अंजलि हटी और उसकी जगह नीतू ने ली और मैंने अपना लुंड उसकी गांड में घुसा दिया और फिर नीतू की गांड भी तेजी से मरने लगा, वो भी आह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह की आहें भरने लगी,

नीतू: अह्ह्ह्हह्हह भइयह ओह्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्हह्हह फाड़ दी गांडडडड,

में: तेरई गांड है hi फाड़ने लायक आह्ह्ह्ह,

मैं उत्तेजित होते हुए ताबड़तोड़ धक्के लगा रहा था, कुछ देर बाद नीतू भी मेरे झटको के आगे हारने लगी और झड़ने लगी पर मेरा रुकने का कोई इरादा नहीं था. नीतू भी थक कर मुझसे रुकने को कहने लगी पर मैं नहीं रुक रहा था,

नीतू: अह्ह्ह्हह्हह अह्ह्ह्हह्हह भइयह ओह्ह्ह्हह्ह बस अब रुक जाओ अह्ह्ह्हह्हह, अंजलि कुछ कर,

में: बिना झड़े नहीं रुक पाउँगा मैं अह्ह्ह्हह्हह थोड़ी देर और,

अपनी सहेली की पुकार सुन अंजलि उठी और कुछ सोच कर मेरी टैंगो के बीच अपना चेहरा लाइ और फिर अपना मुँह मेरे चूतड़ों के बीच लाकर जीभ निकाल कर मेरी गांड के छेड़ को कुरेदने लगी तो मेरे तो पूरे बदन में बिजली दौड़ गयी, मेरी गति भी धीरे हो गयी वहीँ अंजलि लगातार मेरी गांड चाटने लगी और मैं नीतू की गांड मार रहा था,





अंजलि की जीभ और नीतू की गांड की गर्मी के आगे मैं ज़्यादा देर नहीं टिक सका और मैंने अपना रास नीतू की गांड में छोड़ दिया, झड़ने के बाद लुंड निकलते hi अंजलि ने मेरे लुंड को मुँह में भर लिया और चाट कर साफ़ करने लगी, उसके बाद अंजलि ने अपनी सहेली की गांड में अपना मुँह घुसा दिया और उसे चाटने लगी और मेरा और उसका रास मिलकर उसका स्वाद लेने लगी मैं एक और लेटकर दोनों को देख रहा था और सोच रहा था क्या किस्मत पाई है मैंने.



जारी रहेगी.
 
अंजलि की जीभ और नीतू की गांड की गर्मी के आगे मैं ज़्यादा देर नहीं टिक सका और मैंने अपना रास नीतू की गांड में छोड़ दिया, झड़ने के बाद लुंड निकलते hi अंजलि ने मेरे लुंड को मुँह में भर लिया और चाट कर साफ़ करने लगी, उसके बाद अंजलि ने अपनी सहेली की गांड में अपना मुँह घुसा दिया और उसे चाटने लगी और मेरा और उसका रास मिलकर उसका स्वाद लेने लगी मैं एक और लेटकर दोनों को देख रहा था और सोच रहा था क्या किस्मत पाई है मैंने.

अपडेट 250


जहाँ अंजलि, कर्मा और नीतू के साथ रात को घमासान करने के बाद सुबह देर तक सो रही थी वहीँ उसके घर पर यानि गैंदपुर में सब लोग उठ चुके थे,

रानी रसोई में कड़ी हुई थी और चूल्हे पर चाय उबाल रही थी, वहीँ उसके मन में विचार उबाल मार रहे थे, रात को जो कुछ हुआ छत पर नशे में उसके और उसके पति के बीच, उसे ऐसा लग रहा था की उसके सास ससुर ने भी देखा था, और अब उसे समझ नही ा रहा था की उनका सामना कैसे करे, इतने में चाय पाक चुकी थी उसने खुद के विचारों को रोका और चाय को छान कर कप में डाला और आँगन में ले कर चल दी जहाँ उसके सास ससुर बैठे हुए थे,





रानी चाय लेकर पहुंची और बीच में टेबल पर राखी, महिपाल की नज़र बहु के बदन पर घूमने लगी, और उसे रात का दृश्य याद आ गया कैसे रानी नंगी होकर चांदनी रात में पियूष से चुद रही थी, ये सोचते hi महिपाल के बदन में सिरहन होने लगी थी,

सावित्री: पियूष नहीं उठा अभी बहु,

सावित्री ने चाय का कप उठाते हुए कहा,

रानी: अभी नहीं मम्मी, बस चाय लेकर जा रही हूँ उठाने,

महिपाल: लगता है रात को देर से सोया था,

महिपाल ने रानी की और देखते हुए साथ hi चाय की चुस्की लगते हुए पूछा, महिपाल के इस प्रश्न से तो रानी शर्म से पानी पानी महसूस करने लगी और उसे कुछ नहीं सूझा तो बोली: मैं उन्हें उठाती हूँ पापा,

और ये कहकर भाग गयी, उसके थिरकते चूतड़ों को देख कर महिपाल के चेहरे पर मुस्कान आ गयी.

सावित्री: अरे तुम भी न ऐसे भी कोई बोलता है बेचारी शर्मा गयी,

महिपाल: अरे मैंने कुछ गलत थोड़े hi बोलै.

इधर रानी रसोई में आई और उसने अपने और अपने पति के लिए चाय डाली और ले कर कमरे में आई जहाँ पियूष पहले hi उठ चूका था और सिरहाने से टिक कर बैठा था, रानी चाय लेकर आई और दोनों की आँखें मिली तो रानी चाय रखते हुए झूठा गुस्सा दिखते हुए बोली: आप तो न बात hi मत करना मुझसे.

पियूष: अरे भाई ऐसा क्या किआ मैंने.

रानी- ाचा तुम्हे नहीं पता?

रानी उसके बगल में बैठते हुए बोली.

पियूष ने भी खिसक कर उसके लिए जगह बनाई , उसकी आँखों में अभी भी रात की थकन और मस्ती दोनों झलक रही थी. उसने चाय का कप लिया और मुस्कुराते हुए रानी को अपनी तरफ खिंचा, रानी ने पहले टोकने की कोशिश की लेकिन उसका बदन khud-ba-khud उसके पास सरक गयी.

पियूष (धीमी आवाज़ में): अरे मेरी जान, अब तोह सुबह हो गयी… अब क्या शर्माना? रात को तोह तुमने खुद hi कैसे सिसकियाँ लेते हुए बोल रही थी की ज़ोर से करो, आवाज़ निकल रही है तोह निकलने दो… अब subah-subah गुस्सा?

रानी ने उसके कंधे पर हलकी सी मुक्का मारा, लेकिन उसकी आँखों में शर्म के saath-saath एक हलकी सी हसी भी थी.

रानी (सर झुककर): तुम्हे कुछ भी शर्म नहीं है न? पता है पापा ने अभी पुछा की तुम देर से क्यों उठे? मुझे लगा मैं मर hi जॉन शर्म से… और ऊपर से पापा की नज़र… कुछ अजीब hi ढंग से देख रहे थे.

पियूष ने चाय का एक घूंट लेते हुए कुछ सोचा और फिर रानी की कमर में हाथ दाल कर उसे सहलाने लगा और उसने उसके कान में फुसफुसाया:

पियूष: अच्छा? तो पापा की नज़र लगी थी तुम पर? क्या देखा उन्होंने… ये gore-gore चुके या ये थिरकती हुई गांड जो रात भर मेरी गॉड में झूल रही थी?

रानी ये सुनते hi चौंक उठी और चाय एक और रख दी, और पियूष की और लपकी, पर पियूष ने तेज़ी दिखते हुए उसे बाहों में भर लिया और उसे खुद के सीने से चिपका लिया,

रानी: क्या बोल रहे हो तुम किसी ने सुन लिया तो, तुम भी न,

पियूष: अरे मेरी जान मज़ाक कर रहा हूँ.

रानी: तुम्हारे मज़ाक ने तो डरा दिया मुझे.

पियूष: डरने की कोई बात नहीं है मेरी रानी… अगर उन्होंने देखा भी तोह क्या? उनके बेटे ने उनकी बहु को प्यार दिया, इसमें बुराई क्या है? वैसे भी… mummy-papa भी ये सब करते आये होंगे.

रानी ने उसकी छाती पर सर रख दिया और धीमे से बोली:

रानी: तुम बड़े बेशरम हो… लेकिन सच कहु, मुझे भी दर नहीं लग रहा अब. बस थोड़ी सी शर्म… और थोड़ा सा एक्ससिटेमेंट की कहीं mummy-papa ने कुछ सुना या देखा तोह…

पियूष ने उसे बिस्तर पर अपने साथ लिटा लिए और उसके होंठों को अपने होंठों से चूसने लगा, रानी भी गरम होते हुए उसका पूरा साथ दे रही थी,





कुछ देर बाद दोनों के होंठ अलग हुए तो पियूष बोलै,

पियूष: वैसे देखा होगा तोह ख़ुशी hi हुई होगी उन्हें… की उनके बहु और बीटा एक दुसरे के साथ कितने खुश हैं.

पियूष ने ये बोलते हुए सिरहाने से टिक कर बैठ गया और चाय लेकर चाय की चुस्कियां ली.

रानी ने शर्माते हुए भी उसके सीने से चिपक कर चाय ख़तम की.

पर पियूष के मन में वही सब चल रहा था, जो रात में हुआ था, रानी तो बस अंदाज़ा hi लगा रही थी पर पियूष को तो पक्का पता था की उसके मम्मी पापा ने उन्हें चुदाई करते देखा था और खुद भी चुदाई की थी.

पियूष कुछ सोचने लगा, वो मन hi मन सोच रहा था की कुछ करना ज़रूरी है, आज hi कुछ करना होगा क्योंकि फिर अंजलि आ जाएगी तो और मुश्किल हो जाएगी.

थोड़ी देर बाद जब दोनों औरतें घर के काम में लगी थी तब दोनों बाप बेटे छत पर खड़े होकर कुछ बातें कर रहे थे.

पियूष: पापा तुमने सब कुछ देखा था न रात को.

महिपाल: हाँ बीटा सब देखा था और क्या कहूं ऐसा कभी महसूस नहीं हुआ जैसा तब हुआ था, मैं और तेरी मम्मी तो खुद को रोक hi नहीं पाए और हम भी चालू हो गए थे,

पियूष: मुझे लगा तो था पापा की तुम भी कर रहे हो, काश अचे से देख पाटा मैं तुम लोगो को,

महिपाल: वो मौका भी आएगा बीटा जल्दी hi,

पियूष: उसी बारे में बात करनी है पापा,

महिपाल: हाँ बता न क्या बात है?

पियूष: पापा कल अंजलि आ जाएगी बस आज का दिन है हमारे पास और हमें उसका पूरा फायदा उठाना होगा.

महिपाल: क्या करें कुछ है तेरे दिमाग में?

पियूष: है तो पर आपको भी पूरा साथ देना होगा,

महिपाल: हाँ बता न मेरा तो पूरा सहयोग मिलेगा बीटा.

पियूष मुस्कुराता है,

थोड़ी देर बाद दोनों बाप बेटे आँगन में थे और सावित्री और रानी भी नाहा चुके थे, रानी फिर से रसोई में जा रही थी और सावित्री अपने गीले बालों को झाड़ रही थी,

महिपाल: अरे बीटा रानी, एक कप चाय और मिल जाएगी क्या?

रानी: अभी ले पापाजी.

महिपाल: ऐसा कर सबके लिए hi बना ले और पियूष तू जा तब तक समोसे ले आ सबके लिए.

सावित्री: अरे वाह आज तो कुछ अलग hi स्वाद छह रहे हो,

महिपाल: हाँ तो क्या हो गया?

सावित्री: वैसे बोलते रहते हो की बहार का मत खाओ पियो,

महिपाल: अरे कभी कभी सब चलता है,

सावित्री: जा बीटा जल्दी जा इससे पहले इनका मन बदले,

इस पर सब हंसने लगे और फिर पियूष बाहर चला गया.

कुछ hi देर में चारो आँगन में बैठे थे और चाय समोसे का आनंद उठा रहे थे,

पियूष: सच में मज़ा आ गया समोसे खा कर तो,

महिपाल: ये बात तो है,

सावित्री: अरे मैं तो इनसे कहती hi हूँ हमेशा की रोज़ एक hi तरह का नाश्ता करके बोरियत हो जाती है, कभी कभी कुछ नया होना चाहिए पर ये सुनते hi नहीं थे.

महिपाल: अरे अब सुन तो ली, देखो धीरे धीरे मैं अपनी सोच बदल रहा हूँ न.

Rani-haan ये तो है पापाजी.

महिपाल: मैं तो अपनी सोच बदल रहा हूँ पर अपनी मम्मी जी को भी तो बोल ये भी सोच बदले.

सावित्री: अरे मैं क्या सोच बदलूँ? मुझे क्या बदलने की ज़रुरत है?

महिपाल: अरे क्यों नहीं ज़रुरत है, थोड़ा मॉडर्न बनो, खुद भी पुराने ख़यालात के कपडे पहनती हो और बहु को भी वैसा hi बना दिया है.

पियूष: हाँ इस बात में तो मैं भी पापा के साथ हूँ, मम्मी तुम्हे कपडे थोड़े मॉडर्न पहनने चाहिए,

सावित्री: अरे अब ये कोई उम्र है मेरी मॉडर्न बनने की, तुम बच्चों की उम्र है.

पियूष: सब सोच का अंतर होता है मम्मी, ाचा अभी तुम कौनसा बूढी हो गयी हो, क्यों रानी मम्मी की उम्र ज़्यादा लगती है क्या?

रानी: नहीं तो, सच में मम्मी जी अभी भी तुम बिलकुल सुन्दर लगती हो, और जवान भी.

सावित्री: तुम लोग भी न मुझे hi छेड़ने लगे.

महिपाल: अरे बच्चे सही कह रहे हैं, कौनसा अभी से बूढी हो गयी तुम, जब हम नहीं हुए तो तुम कैसे हो जाओगी.

इस पर सब हंसने लगते हैं.

सावित्री: अरे तुम भी न कुछ भी बोलते हो,

महिपाल: अरे सच बोल रहे हैं, तुम भी मॉडर्न कपडे पहना करो, क्यों बहु सही बोल रहा हूँ न?

रानी: बिलकुल पापा जी, मम्मी जी पर बहुत जांचेंगे मॉडर्न कपडे,

पियूष: अरे तुम मम्मी को क्या बोल रही हो, तुम भी तो वैसे hi पहनती हो तुम्हे भी मॉडर्न कपडे पहनने चाहिए,

रानी: धत्त.

पियूष: अरे इसमें धत्त क्या?

महिपाल: पियूष सही बोल रहा है तुम दोनों सास बहु को hi मॉडर्न कपडे पहनने चाहिए. और मैं तो कहता हूँ अभी से शुरू कर दो.

सावित्री: अरे तुम लोग समझते नहीं हो, हम लोग गाओं में रहते हैं यहाँ मॉडर्न कपडे पहनेंगे तो लोग बातें बनाएंगे.

पियूष: अरे मम्मी तो गाओं में मत जाना, घर में तो रह hi सकती हो मॉडर्न बन कर. अपने घर में कोई क्या बोलेगा?

महिपाल: सही कह रहा है पियूष,

सावित्री: अरे पर घर में भी बच्चों के सामने मुझसे नहीं होगा.

पियूष: अरे मम्मी तुम खुद hi उस दिन कह रही थी की, जब बीटा बड़ा हो जाये तो दोस्त बन जाते हैं तो दोस्त से कैसी शर्म?

सावित्री: देखो तो कैसी बातें बना रहा है.

महिपाल: ऐसा करो अभी कुछ पहन कर देख लो तुम दोनों, कल अंजलि होगी तो शरमाओगे.

पियूष: और क्या ये सही रहेगा.

Rani-are पर ये सब ज़रूरी है क्या?

पियूष: हाँ बिलकुल ज़रूरी है, देखो तुम जवान होकर आगे नहीं बढ़ेगी तो मम्मी भी नहीं करेंगी.

महिपाल: अरे बीटा इतना मत सोच.

सावित्री: चल बहु इनकी ज़िद्द पूरी करनी hi पड़ेगी मानेंगे नहीं ये लोग.

उसकी बात सुनकर दोनों बाप बेटे खुश हो गए वहीँ रानी के चेहरे पर भी मुस्कान आ गयी,

Rani-chalo मम्मी जी, फिर मेरे कमरे में hi चलते हैं.

दोनों उठ कर चलती हैं और पियूष और रानी के कमरे में आ जाती हैं,

सावित्री (अलमारी खोलते हुए थोड़ी परेशां): अरे बहु, तेरे पास कुछ मॉडर्न कपडे हैं क्या?

रानी (सर झुका कर मुस्कुराते हुए): नहीं माजी, मेरे पास तो अब कुछ भी नहीं है.

सावित्री: अरे फिर क्या पहनेंगे? इन लोगों को मॉडर्न कपड़ों में देखना है हमें.

रानी (तेज़ मुस्कान के साथ): हाँ माजी, पर माजी… साड़ी भी तो मॉडर्न hi होती है!

सावित्री (कन्फ्यूज्ड): सारी? अरे साडी मॉडर्न कैसे?

रानी ( आँखों में चमक): माजी, सब पहनने का तरीका है. आजकल कितनी औरतें साड़ी को भी बहुत मॉडर्न स्टाइल में पहनती हैं.

सावित्री (उत्साह से): अच्छा? वो कैसे, ज़रा बता तो सही!

रानी (थोड़ी शर्मा कर): माजी, सब कुछ साड़ी बाँधने के तरीके पर देपेंद करता है. अगर आप चाहो तो मैं दिखा भी सकती हूँ… पर मुझे लगता है थोड़ा ज़्यादा हो जायेगा. मुझे तो शर्म आ जाएगी.

सावित्री (हस्ते हुए बहु के कंधे पर हाथ रख कर): अरे शर्माती क्यों है? इन लोगों ने hi तो हमें मॉडर्न बनाने को कहा है न! तू मत शर्मा, खुल के रह. जब ये लोगों को बुरा नहीं लग रहा, तो तू क्यों शर्माएगी? अब जल्दी बता… और दिखा भी दे!

रानी (गाल लाल करते हुए बड़ी मुस्कान): तोह सुनिए माजी…

(उसी वक़्त दूसरी तरफ आँगन में)

महिपाल और पियूष कुर्सियों पर बैठे चाय पी रहे हैं, दोनों के चेहरे पर बड़ी सी शैतानी स्माइल है, दिल से दिल तक ख़ुशी दौड़ रही है.

पियूष (चाय का कप नीचे रख कर):

पियूष- अरे पापा यकीन नहीं हो रहा हमारी योजना इतनी आसानी से काम कर जाएगी.

महिपाल- हाँ बीटा पर अभी तो बस शुरुवात है पूरी कोशिश करनी है.

Piyush-haan पापा बिलकुल.

दोनों बाप बेटे बात hi कर रहे होते हैं की उसके कमरे का दरवाज़ा खुलता है और थोड़ी देर में hi दोनों हॉल में उनके सामने आती हैं सामने का नज़ारा देख कर दोनों की आँखें फ़ैल जाती हैं,

दोनों सास बहु सामने तैयार कड़ी थी, दोनों ने साड़ी ऐसे पहन राखी थी जिससे उनका गोरा पेट और नाभि दिख रही थी, कैसे हुए ब्लाउज में चूचियां जैसे बाहर आने को बेताब थी, उन्हें देख कर दोनों के hi लुंड में तनाव आने लगा, दोनों सास बहु सामने पड़ी खत पर बैठ जाती हैं,





सावित्री- क्यों जी इतना मॉडर्न बहुत है.

महिपाल कुछ बोलने वाला था की पियूष ने उसे आँख मारी और फिर महिपाल उसका इशारा समझते हुए hi बोलै- अरे ठीक है पर ऐसे सारी तो गाओं में भी सब पहनते हैं इसमें मॉडर्न क्या है.

पियूष- हाँ पापा सही कह रहे हैं, मम्मी ये तो बिलकुल hi आम है आज कल, अब अगर कोशिश कर hi रही हो तो कुछ ऐसी करो की जो थोड़ी हटके हो, क्यों पापा?

महिपाल- हाँ बिलकुल सही कहा.

सावित्री- अरे तो अब और क्या पहनें?

रानी- हाँ घर पर तो बस साड़ियां hi हैं.

Piyush-socho कुछ न कुछ समझ आ जायेगा.

रानी- ठीक है चलो मम्मी जी.

दोनों फिर से कमरे के अंदर चली जाती हैं और दोनों बाप बेटे बेसब्री से बाहर उनका इंतज़ार करते हैं,

कमरे के अंदर दोनों सोच में होती हैं की अब क्या पहनें,

सावित्री- अब क्या पहनें बहु?

रानी- मैं भी यही सोच रही हूँ माजी, ाचा इन लोगो को कुछ अलग चाहिए न.

Savitri-haan, तेरे दिमाग में है कुछ.

रानी- है तो.

रानी मुस्कुराते हुए बोली,

बाहर हॉल में बाप बेटे खुश होते हुए इंतज़ार कर रहे थे,

Mahipal-mujhse तो सबर नहीं हो रहा है अब.

पियूष- थोड़ा सा करलो पापा फिर देखना मज़े hi मज़े हैं, और सुनो योजना के हिसाब से चलना है पिघलना नहीं है.

Mahipal-haan हाँ बिलकुल, तू चिंता मत कर.

तभी कमरे का दरवाज़ा खुलता है और फिर से दोनों सास बहु के चलने की आवाज़ आती है और दोनों सामने से आती दिखती हैं, दोनों बाप बेटे नज़र उठा कर देखते हैं और बस देखते रह जाते हैं, इस बार दोनों ने पुराणी सरीयां पहनी हुई थी पर पहनने का तरीका ऐसा था की देखते hi दोनों का लुंड ठुमके मरने लगे थे, सावित्री ने साड़ी नाभि से नीचे बांध राखी थी और पल्लू पीछे से था जिससे पूरा पेट दिख रहा था और ऊपर ब्लाउज hi नहीं था बल्कि उसकी जगह एक पुराणी ब्रा पहनी हुई थी, वहीँ रानी ने भी साड़ी और ब्रा hi पहनी हुई थी पर उसने साड़ी का पल्लू सर पर ले रखा था जिससे वो संस्कारी और कामुकता का मिश्रण लग रही थी.





दोनों सामने आकर कड़ी हो गयी, दोनों मर्दों की नज़र उन पर hi जमी हुई थी,

सावित्री: अब कैसे लग रहे हैं?

Mahipal-han? हाँ ये ाचा है,

महिपाल सावित्री के साथ साथ अपनी बहु के बदन पर नज़र डालते हुए बोलै, वहीँ पियूष भी अपनी पत्नी के साथ साथ अपनी अपनी मम्मी के बदन को छुप छुप के देख रहा था,

Piyush-haan ये पहले से ाचा है, पर ये पुराणी सारी क्यों पहनी है?

Mahipal-haan ये तो काफी पुराणी साड़ी हैं?

Rani-are वो तो हम देख रहे थे की पुराणी साड़ी भी मॉडर्न तरीके से पहन सकते हैं.

Savitri-haan क्यों अछि नहीं लग रही क्या?

Mahipal-achi है,

Piyush-haan मम्मी अछि लग रही है पर ये पुराणी सारी नहीं नयी होनी चाहिए.

सावित्री- अरे अब दोबारा पहने?

महिपाल ने पियूष की और देखा और फिर कहा: हाँ दोबारा पहनो नयी कोई.

Savitri-are ये क्या बात हुई? इतनी म्हणत करवा रहे हो तुम लोग.

Rani-aur क्या इस म्हणत के बदले हमें क्या मिलेगा?

सावित्री- सही बात है तुम लोग तो आराम से बैठे हो और हम लोग यहाँ बार बार कपडे बदल रहे हैं.

Piyush-are तो तुम्हे क्या चाहिए अब?

Rani-kuch तो मिलना चाहिए म्हणत का इनाम.

Savitri-haan सही बोली बहु.

Mahipal-acha क्या चाहिए बादलमे में बताओ तो सही,

रानी- क्या मांगे मम्मी जी?

सावित्री- जो तुझे भाये मांग ले बीटा,

रानी- हाँ तो हमें फिल्म देखने जाना है.

महिपाल- बस इतनी सी बात आज hi चलते हैं

रानी- सच्ची पापा जी?

Mahipal-haan सच्ची पर शर्त सुनी है न.

Savitri-haan सुनी है.

रानी- चलो मम्मी जी अब अचे से मॉडर्न बन कर आते हैं.

और दोनों फिर से कमरे में चले जाते हैं,

Piyush-bahut सही बोलै पापा, अब फिल्म के चक्कर में ये लोग और मन से करेंगे,

महिपाल- अरे मुझे सही समय पर दिमाग में आ गया, अब देखते हैं की क्या होता है,

Piyush-haan पापा देखने लायक होगा, ब्रा में मम्मी की बड़ी बड़ी चूचियां देख कर मज़ा hi आ गया,

पियूष ने झिझकते हुए बोलै तो महिपाल ने उसकी पीठ को थपथपाया और बोलै झिझक मत खुल कर बोल. वैसे बहु का जवान बदन भी क्या लग रहा था.

दोनों बातें करते रहे की एक बार फिर से दरवाज़ा खुला और दोनों फिर से बाहर आये, बाप बेटे की नज़र एक बार फिर से दोनों के बदन पर जैम गयी, इस बार दोनों ने गहरे हरे रंग की साड़ी पहनी थी और साथ में ब्रा थी, दोनों के पेट बिलकुल नंगे दिख रहे थे बीच में गोल गहरी नाभि और ब्रा से आधी बाहर झांकती चूचियां, पर तभी पियूष की नज़र ऐसी जगह पड़ी की उसका लुंड ठुमके मरने लगा और बुरी तरह कड़क हो गया, उसकी मम्मी ने जो ब्रा पहनी थी उसके कप थोड़े पारदर्शी थे, उसे याद था की वो रानी के लिए उसे खरीद कर लाया था, और सावित्री का निप्पल उसमें से हल्का हल्का नज़र आ रहा था, जिसे देख कर पियूष की उत्तेजना बढ़ रही थी, वहीँ हालाँकि रानी की ब्रा ऐसी नहीं थी पर फिर भी उसे देख कर महिपाल से काबू नहीं हो रहा था और मन कर रहा था की उसके मखमली बदन पर टूट पड़ें.





सावित्री- क्यों अब कैसा लगा? सावित्री ने मुस्कुराते हुए पूछा.

महिपाल- अब लगी मस्त ये नयी सारी तुम दोनों पर जाँच रही हैं.

पियूष- सच में सुन्दर भी लग रही हो और मॉडर्न भी.

Savitri-to तुम लोगो को पसंद आया?

महिपाल- हाँ पसंद आया.

रानी - इसका मतलब फिल्म देखने चल रहे हैं,

रानी ने उत्सुकता से कहा,

महिपाल- हाँ बीटा चल रहे हैं.

पियूष- ऐसे hi चलोगी या तैयार होगी.

रानी- धत्त ऐसे बाहर थोड़े hi जायेंगे.

सावित्री- कुछ भी बोलता है.

महिपाल- जाओ दोनों लोग तैयार हो जाओ हम भी हो जाते हैं और फिर चलते हैं फिल्म देखने.

कुछ देर बाद चारों शहर की और निकल पड़े थे, शहर पहुँच कर मॉल गए वहां पियूष ने फिल्म देखि कौन कौन सी लगी हैं, और फिर बापिस सबके पास आया,

रानी- कौन सी देखेंगे?

पियूष- दो फिल्में लगी हैं एक एक्शन फिल्म है मार धार वाली और एक बाहर की पर एडल्ट.

सावित्री- अरे हमें ये मार धाड़ वाली बिलकुल नहीं भाति.

सावित्री ने बिना सोचे hi बोल दिया,

महिपाल और पियूष ये सुन मन hi मन खुश हुए,

रानी- मम्मी जी पर दूसरी वैसी फिल्म है, अंग्रेजी वाली और वैसी.

सावित्री- वैसी कैसी?

रानी- वैसी मम्मी जी जैसी उस दिन थी, उसमें वैसे सन होंगे.

सावित्री- है ढैय्या,

पियूष- अरे तो क्या हुआ, सब बड़े हैं देख सकते हैं.

महिपाल- हाँ हाँ जब उस दिन देख ली तो आज क्या परेशानी है,

सावित्री- अरे नहीं नहीं उस दिन तो पता नहीं था,

महिपाल- तो आज पता है इसलिए देख लेते हैं.

सावित्री- अरे पर तुम लोग समझते नहीं हो बेटे बहु के साथ बैठकर ऐसी फिल्म देखेंगे हमें तो शर्म आएगी.

पियूष- अरे तो ये किसने कहा की साथ बैठ कर देखो मैं अलग अलग जगह की सीट लूंगा तुम और पापा अलग बैठना मैं और ये अलग.

महिपाल- हाँ ये ठीक रहेगा.

रानी- हाँ ये ठीक है.

पियूष- मम्मी फिर क्या बोलती हो.

सावित्री- ठीक है फिर देख hi लेते हैं.

पियूष ने योजना अनुसार टिकट्स ली और चारों अपनी अपनी सीट पर बैठ गए भीड़ काम hi थी कुछ और जोड़े थे जो सब एक दुसरे से थोड़ी थोड़ी दूरी बना कर बैठे थे, पियूष और रानी बिलकुल पीछे थे तो महिपाल और सावित्री आगे की सीट पर थे, कुछ hi देर में अँधेरा हुआ और फिल्म शुरू हो गयी थी, और उम्मीद अनुसार उसमें शुरू से hi कामुक और नंगे सन एंड लगे, जिन्हे देख कर उन्हें देखने वाले उत्तेजित होने लगे, जिसमें ये चारों भी शामिल थे, महिपाल और पियूष ने अपनी योजना अनुसार अपनी अपनी पत्नियों के बदन को सहलाना भी शुरू कर दिया था,

महिपाल ने सावित्री की कमर को छुआ तो उसने हाथ हटा दिया

सावित्री- अरे हटो जी क्या कर रहे हो तुम भी.

महिपाल- जो सब कर रहे हैं,

सावित्री ने सर घुमा कर इधर उधर देखा तो पाया, की कुछ जोड़े तो फिल्म छोड़ कर आपस में hi लगे हुए थे, वहीँ कुछ चुम्मा छाती कर रहे थे थे,

सावित्री- हाँ पर बहु और बीटा भी तो हैं वो देख लेंगे.

महिपाल- अरे वो जवान लोग हैं वो आपस में व्यस्त होंगे की हमें देखेंगे.

सावित्री- अरे फिर भी मुझे ठीक नहीं लग रहा,

महिपाल- ाचा तुम खुद मुद कर देखो की वो लोग क्या कर रहे हैं,

पहले तो सावित्री ने न नुकुर की पर उसका भी मन था तो उसने बड़ी सावधानी से अपनी गर्दन घुमाई और पीछे देखा तो पाया की उसका बीटा और बहु भी बाकी की तरह एक दुसरे के होंठों को चूस रहे थे,





ये देख सावित्री के चेहरे पर हलकी सी मुस्कान आई और वो सीढ़ी हो गयी,

महिपाल- क्यों क्या हुआ, क्या कर रहे हैं.

सावित्री- धत्त कुछ भी नहीं.

सावित्री ने शरमाते हुए बोलै, और अपनी आँखें बापिस स्क्रीन पर लगाडी. पर महिपाल ने इसे आगे बढ़ने का इशारा माना और अपने हाथ को पत्नी के पेट पर रख लिया और धीरे धीरे सहलाने लगा.

सावित्री ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, स्क्रीन पर भी कुछ कामुक सन चल रहा था जिसे देख कर उसके मन में उत्तेजना बढ़ रही थी, महिपाल ने अपना चेहरा आगे कर उसके गाल और गले को चूमना शुरू किआ तो सावित्री सिहरने लगी, उसने भी अपना चेहरा अपने पति की और मोड़ दिया और फिर दोनों के होंठ मिल गए और दोनों एक गहरे चुम्बन में लग गए, महिपाल सावित्री का पेट सहलाते हुए चूमने लगा,





सावित्री भी उसका पूरा साथ दे रही थी, इतने लोगो के बीच खुले में ये सब करने में उसे बहुत अलग मज़ा और उत्सुकता हो रही थी,

काफी देर बाद दोनों के होंठ अलग हुए,

महिपाल- अह्ह्ह्हह्हह मज़ा आ गया तुम्हारे होंठों मशीन रास भरा हुआ है.

सावित्री- ाचा अभी तक इतने सैलून में रास निचोड़ hi नहीं पाए.

महिपाल- निचोड़ना hi किसे है, हमें तो चखना है,

सावित्री- बहुत बातें बना रहे हो, कुछ ज़्यादा hi जवानी छ रही है तुम पर.

महिपाल- तो तुम्हे क्या लगा मैं बुद्धा हो गया हूँ. मैं भी सबकी तरह जवान hi हूँ,

सावित्री- हाँ तुम्हारी जवानी तो मुझे महसूस हो रही है.

सावित्री ने महिपाल की पंत के ऊपर से hi उसके कड़क लुंड को टटोलते हुए कहा,

महिपाल- अह्ह्ह्हह्हह ऐसे hi करो मज़ा आ रहा है.

सावित्री अपने हाथ चलने लगी और महिपाल ने इतने में hi पीछे मुद कर देखा अपने बेटे और बहु की तरफ तो पाया पियूष अभी भी पत्नी के होंठों को चूसते हुए उसके पेट और छाती को सहला रहा था कपड़ो के ऊपर से hi,





महिपाल ने बापिस सर घुमा लिए और अपनी पत्नी पर ध्यान लगाया और उसके हाथ को अपने लुंड पर महसूस करते हुए स्क्रीन की और देखने लगा,

उधर पियूष और रानी तो एक दुसरे में खोये हुए थे और पागलों की तरह एक दुसरे के होंठों को चूस रहे थे, और काफी देर बाद दोनों के होंठ अलग हुए तो दोनों हांफ रहे थे,

की तभी पियूष का फ़ोन बजा उसने निकल कर देखा तो अंजलि का था, उसने रानी को बोलै की मैं एक मिनट में बात करके आता हूँ, और तुरंत फुर्ती में थिएटर से बाहर आ गया, और अंजलि से बात की जो उसे अपनी एग्जाम के बारे में बता रही थी और भी कुछ बात करने के बाद फ़ोन रख दिया और पियूष बापिस थिएटर में गया,

बापिस सीढ़ियों से ऊपर जाते हुए उसने अपने माँ बाप को ढूँढा जो अपने hi मज़े में व्यस्त थे और जिसे देख पियूष की उत्तेजना और बढ़ गयी,





महिपाल, सावित्री के पल्लू को एक और करके उसके पेट को सहला रहे थे साथ hi ब्लाउज के ऊपर से hi उसकी मोती चूचियों को भी. सावित्री भी गरम सांसें भर रही थी, स्क्रीन की हलकी लाइट में सावित्री का गोरा पेट चमक रहा था.

पियूष ने धीरे धीरे आगे बढ़ते हुए अपने माँ बाप को ऐसे देखा और उत्तेजित होते हुए अपनी सीट पर पहुँच गया और अपने बाप की राह पर चलते हुए उसने भी अपना हाथ अपनी पत्नी की पीठ से दूसरी और लाते हुए उसका पल्लू एक और किआ और रानी के गोर पेट को सहलाते हुए मसलने लगा, उसका हाथ भी पेट से लेकर छाती तक चल रहा था,





रानी भी पति का हाथ बदन पर पाकर गरम हो रही थी, उसे भी एक नयी उत्तेजना हो रही थी ये सोचकर की अभी कोई भी पीछे मुद कर उसे इस हालत में देख सकता था,

उसकी सांसें गरम होती जा रही थी,

पियूष- हाय मेरी जान तेरा ये मखमली बदन तो मेरी जान ले लेता है,

रानी- अहह जान तो तुम भी ले लेते हो मेरी. अपने जोश से, ओह्ह आराम से.

पियूष- तुम्हे पता है मम्मी पापा भी पूरे जोश में हैं,

रानी- मतलब?

पियूष- मतलब वो भी फिल्म के पूरे मज़े ले रहे हैं सबकी तरह हमारी तरह,

रानी ये सुन थोड़ी हैरान हो मुस्कुराने लगती है.

रानी- तुमने देखा क्या?

पियूष- हाँ.

रानी- शर्म नहीं आती अपने माँ बाप को ऐसे देखते हुए,

पियूष- शर्म नहीं मज़ा आता है. तुम भी देखोगी?

रानी- पर यहाँ से नहीं दिखेगा,

पियूष- थोड़ा आगे तक जाओ और देख कर आओ दिखेगा,

रानी- अरे नहीं.

पियूष- जाओ तो सही.

रानी के मन में भी उत्सुकता थी तो वो उठ कर कड़ी हो गयी और पियूष के कहे अनुसार आगे बढ़ने लगी, उसने नज़र घुमा कर देखा तो लगभग सब जोड़े इसी तरह लगे हुए थे जो कुछ अकेले थे वो hi फिल्म देख रहे थे, उसने थोड़ा आगे जाकर देखा और उसकी नज़र अपने सास ससुर पर पड़ी





उसके ससुर ब्लाउज के ऊपर से hi उसकी सास की चूचियों को दबा रहे थे और साथ hi दोनों एक दुसरे के होंठों को चूस रहे थे, ये नज़ारा देख तो रानी सिहर उठी और फिर बापिस अपनी सीट पर आ कर बैठ गयी,

पियूष- क्यों कैसा लगा.

रानी- मम्मी पापा तो हमसे भी आगे हैं.

पियूष- तो हम क्यों पीछे रहे.

ये कह दोनों फिर से एक दुसरे पर टूट पड़े पहले से ज़्यादा जोश के साथ,

इधर महिपाल और सावित्री को बहुत मज़ा आ रहा था, महिपाल ने सावित्री की चूचियों को ब्लाउज के ऊपर से मसलते हुए उसे काफी देर चूमा और फिर जब होंठ अलग हुए तो उसने नज़र पीछे घुमाई और अपने बेटे और बहु को देख कर उसकी आँखें चौड़ी हो गयी, उसकी बहु का पल्लू उसकी गॉड में पड़ा था, उसका ब्लाउज खुला हुआ था और बहु की बड़ी बड़ी सुन्दर चूचियां नंगी थी जिन्हे पियूष अपने हाथों से मसल रहा था और रानी के होंठो को चूम रहा था





रानी की प्रतिक्रिया से पता चल रहा था वो भी कितनी उत्तेजित हो चुकी थी, वहीँ बहु की नंगी चूचियां देख कर महिपाल का लुंड झटके मार रहा था उसकी उत्तेजना और बढ़ने लगी थी, हलकी रौशनी में रानी की चूचियां चमक रही थी. महिपाल का तो ये देख कर hi बुरा हाल हो गया था, कुछ पल बाद जब थोड़ी रोशनी काम हुई तो उसने नज़र हटाई, और अपना ध्यान अपनी पत्नी पर लगा दिया,

इधर पियूष का लुंड भी ठुमके मार रहा था, अपनी पत्नी को इस तरह आधा नंगा करना उसे बहुत उत्तेजित कर रहा था और उससे भी अधिक रानी को जो इतने लोगो के बीच आधी नंगी थी और बाकि की उत्तेजना उसका पति उसकी चूचियों को मसल कर बढ़ा रहा था, उसकी हलकी हलकी सिसकियाँ निकल रही थी, उसकी छूट भी पनिया चुकी थी, पियूष ने झुक कर उसकी एक चुकी को मुँह में भर लिया और चूसने लगा और फिर रानी से बर्दाश्त करना मुश्किल हो गया, ज्यों ज्यों पियूष जी की जीभ उसके निप्पल को छेड़ रही थी उसकी कमर अकड़ रही थी और फिर कुछ पल बाद उसका मुँह खुला का खुला रह गया उसकी कमर झटके खाने लगी और वो स्खलित हो गयी. उसके झड़ने के बाद पियूष ने उसकी चूचियों को छोड़ा तो हफ्ते हुए उसने अपने ब्लाउज को बंद करना शुरू किआ और अपने कपडे ठीक किये.

पियूष- चलो न आगे बैठते हैं और देखते है मम्मी पापा क्या कर रहे हैं.

रानी- हट ये गलत होगा.

पियूष- तुम नहीं चाहती देखना सच बताओ.

रानी मुस्कुरा देती है, पियूष उसका हाथ पकड़ कर उठता है और वो आगे जा कर अपने मम्मी पापा की सीट के आगे जा कर बैठ जाते हैं और फिर पीछे देखते हैं तो सामने का नज़ारा देख पियूष की आँखें फ़ैल जाती हैं,

सामने उसकी मम्मी का ब्लाउज खुला हुआ है उनकी दोनों मोती मोती चूचियां नंगी थी और उसके पापा उन्हें अपने हाथों में लेकर मसल रहे, साथ hi उसकी मम्मी को चूम रहे थे, उसकी मम्मी की तो आँखें मज़े से बंद हैं और मुँह से सिसकियाँ निकल रही हैं,





गोरा बदन रोशनी में चमक रहा है, ये देख पियूष का लुंड फिर से झटके मरने लगा, वहीँ रानी भी अपनी सास को इस हालत में देख फिर से गरम होने लगी, इसी बीच महिपाल ने भी झुक कर अपनी पत्नी की एक चुकी को मुँह में भर लिया और चूसने लगा. जिससे सावित्री का मुँह और खुल गया और झटके से उसकी आँखें भी, वो अपना हाथ अपने पति के सर पर फिराते हुए अपनी चूचियां चुसवाने लगी, इसी बीच चेहरा मज़े से इधर उधर घूमते हुए उसकी नज़र अपने बेटे और बहु से मिली, और उसकी आँखें वहीँ जैम गयी, उसे तो लगा था की वो लोग पीछे बैठे थे पर अभी वो उसके आगे बैठकर उसे और उसके पति का ये खेल देख रहे थे, जिसके बारे में महिपाल को तो पता hi नहीं था, ये सब सोचते हुए hi सावित्री का बदन अकड़ने लगा, उसकी उत्तेजना अपने चरम पर पहुंच गयी उसकी नज़रें उसके बहु और बेटे पर जमी हुई थी जो उसे आधी नंगी हालत में देख रहे थे,

सावित्री ने उत्तेजना वश अपने पति को अपनी छाती पर ज़ोरों से दबा दिया साथ hi उसकी आँखें फिर से बंद हो गयी उसका मुँह खुल गया जिसे उसने अपने दुसरे हाथ से ढँक लिए ताकि उसकी आवाज़ न निकले और फिर सावित्री झड़ने लगी,

अपनी माँ और सास को झड़ते देखना पियूष और रानी के लिए भी एक नया एहसास था उनका बदन सिहर उठा, झड़ने के बाद सावित्री शांत हुई तो उसने अपने कपडे ठीक किये और तभी इंटरवल भी हो गया, झड़ने के बाद उसे एक बेहद शर्म और अजीब सा एहसास हो रहा था, की वो अपने बेटे और बहु के सामने इस हालत में थी.

इसलिए इंटरवल होते hi वो महिपाल के साथ बाहर निकल गयी, पियूष और रानी भी उन्हें बाहर जाता देख बाहर निकलने लगे, लॉबी में पहुँच कर देखा तो सावित्री बाथरूम जा रही थी तो पियूष ने रानी को भी भेजा उसके पीछे और खुद भी पुरुषों के बाथरूम की और बढ़ा तो उसे एक आदमी ने रोका,

आदमी- सर आप अकेले हैं या किसी के साथ हैं?

पियूष- जी साथ हूँ क्यों?

आदमी- सर कपल्स के लिए हमारा एक डीलक्स लौंगे है, जिसमें से आप एक अलग तरीके से फिल्म का लुत्फ़ उठा सकते हैं, बिना किसी रुकावट के,

पियूष- पर भाई हमने पहले hi टिकट्स ले ली हैं, और अब इंटरवल के बीच दूसरी टिकट थोड़े hi लेंगे,

आदमी: सर वो लौंगे टाइम के हिसाब से मिलता है, तीन घंटे के लिए, स्क्रीन आपको यही दिखेगी, सर एक बार लेकर देखिये आपको ऐसा मज़ा कभी नहीं मिला होगा,

पियूष: अभी बीच से भी देख सकते हैं?

आदमी: सर स्क्रीन आपकी यही रहेगी बस बैठना लाऊंगा में होगा.

पियूष: और उसका कितना खर्चा होगा?

आदमी: 2000 रस पैर कपल है सर, पर सर अगर आप ले लोगे एक बार तो आपको ये रुपये काम hi लगेंगे.

पियूष कुछ सोचता है और कहता है ठीक है, और उसे दो हज़ार रुपये दे देता है, आदमी उसे एक पास देता है,

पियूष पास लेकर कुछ सोचता है और कहता है सुनो एक पास और दे दो,

आदमी- सर ये पास कपल के लिए है आपको मैडम के लिए अलग से नहीं लेना,

पियूष- नहीं मुझे किसी और के लिए चाहिए.

आदमी- ठीक है सर पर याद रखना कपल hi होना चाहिए अकेले एंट्री नहीं मिलेगी,

पियूष- ठीक है,

पियूष उसे 2000 रुपये देता है और एक पास और ले लेता है, और बाथरूम में घुस जाता है जहाँ महिपाल पेशाब करके हाथ धो रहा होता है, पियूष उसे एक पास पकड़ता है और फुसफुसा कर कहता है की दोनों लोग मेरे पीछे आना और ये पास दिखा देना.

महिपाल को कुछ समझ तो नहीं आता पर पास लेकर निकल जाता है, कुछ देर बाद पियूष बाथरूम से बाहर आता है तो उसे दूर खड़े महिपाल और सावित्री दीखते हैं और थोड़ी सी पास रानी,

पियूष रानी के पास जाता है और फिर उस आदमी को इशारा करता है, आदमी उनके पास आता है,

आदमी- मेरे पीछे आइये सर

और उन्हें एक दुसरे दरवाज़े की और ले चलता है, पियूष महिपाल को इशारा करता है और वो उनके पीछे चल देता है,

आदमी दरवाज़ा खोलता है और पियूष और रानी को अंदर भेज देता है,

अंदर आते hi एक आदमी उनका पास देखता है और उन्हें अंदर की और इशारा करता है पियूष रानी के साथ आगे बढ़ता है और आगे एक दरवाज़ा खोल कर अंदर जाता है तो देखता है एक लौंगे सा था जहाँ कुर्सियां काम थी पर थोड़ी आरामदायक लग रही थी, एक दो जोड़े पहले से hi बैठे थे, साथ hi जिस स्क्रीन पर वो फिल्म देख रहे थे वो उनसे काफी नीचे लग रही थी मतलब ये उनकी सीटों से ऊपर था और ऐसे बना था की नीचे से कोई उन्हें न देख सके.

पियूष रानी के साथ एक और बैठ गया उनके कुछ देर बाद महिपाल और सावित्री भी आये और महिपाल ने इधर उधर देखा और उसकी नज़र पियूष से मिली तो पियूष ने उसे खली सीट जी की और इशारा किआ तो वो सावित्री के साथ वहां बैठ गया. इंटरवल ख़तम हुआ और लाइट हलकी हो गयी तो एक आदमी आया और बारी बारी से सबको कोल्डड्रिंक और नाश्ता वगेरा दे कर बोलै की- आप लोग अब एन्जॉय कीजिये अगले 3 घंटे आपको कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा.

उसके जाने के बाद पियूष को समझ नहीं आ रहा था की इसमें ऐसा खास क्या है जो अलग से इतने पैसे लगे, सिर्फ कोल्डड्रिंक और नाश्ते के, खैर उसने और रानी ने नाश्ता ख़तम किआ उधर महिपाल और सावित्री भी खा रहे थे और उन्हें भी यहाँ बैठना समझ नहीं आ रहा था,

करीब 20 मीन्स बाद जब लगभग सबका खाना ख़तम हो चूका था तो पियूष ने नज़र घूम कर देखा तो पाया लौंगे का मौसम बदलने लगा था, सब जोड़े कुछ न कुछ कर रहे थे, उनके अलावा 4-5 कपल और थे और सब hi फिल्म छोड़ कर कुछ और में व्यस्त थे, कोई किसी के होंठों को चूस रहा था तो कोई अपने साथी की चूचियां मसल रहा था. उन्हें देख कर पियूष भी रानी के होंठों को चूसने लगा, महिपाल और सावित्री भी सब को देख रहे थे, महिपाल का हाथ सावित्री की कमर पर चल रहा था, सावित्री के मन में जो थोड़े समय के लिए ग्लानि आई थी वो भी जा चुकी थी और उसकी जगह जिज्ञासा ने ले ली थी. इसी बीच सावित्री ने अपने उलटे हाथ की और देखा तो उसकी नज़र एक जगह जैम गयी, उसने देखा की एक आदमी और औरत बैठे हुए थे और आदमी का लुंड बाहर था जिसे औरत मुठिया रही थी





ये देख सावित्री के बदन में भी सिहरन होने लगी, उसने तुरंत चेहरा घुमाया वो अपने पति को भी इस नज़ारे को दिखाना चाहती थी पर उसने देखा की वो तो कहीं और hi देख रहे थे, सावित्री ने जब महिपाल की नज़रों का पीछा किआ तो उसकी आँखें फैल गयीं, एक लड़की जो लगभग अंजलि की उम्र की होगी, अपनी hi उम्र के एक लड़के की गॉड में झुकी हुई थी और लड़के के लुंड को चूस रही थी,

लड़का जिसका पंत उसके पैरों में था लड़की के सर को अपने लुंड पर दबा रहा था,

ये देख तो सावित्री का मुँह खुला रह गया, जवान लुंड को देख कर उसके बदन में सिहरन होने लगी.





लड़की का पूरा ध्यान लुंड चूसने पर लगा हुआ था, महिपाल भी उसे देख गरम हो रहा था और सावित्री की कमर को मसल रहा था,

दूसरी और पियूष और रानी काफी देर तक एक दुसरे के होंठो को चूसते रहे और फिर हांफते हुए अलग हुए और इधर उधर देखा तो हैरान रह गए, पियूष ने पीछे की और देखा तो पाया की एक लड़की जिसका टॉप नीचे खिसका हुआ था वो सीट के नीचे बैठी थी और अपने साथी का लुंड चूस रही थी जो शायद उसका बॉयफ्रेंड hi था, ये देख पियूष ने रानी को भी उधर देखने का इशारा किआ और रानी भी उन दोनों को देखने लगी,





रानी- देखो तो कैसे बिना किसी दर और शर्म के चूस रही है,

रानी ने फुसफुसाते हुए कहा,

पियूष- अरे इसमें शर्म कैसी, इसी के तो पैसे दिए हैं खुल के मज़े लेने के,

रानी- तुम्हे भी लेने हैं खुल के मज़े,

रानी ने पंत के ऊपर से hi उसके लुंड को सहलाते हुए कहा,

पियूष- हाँ बिलकुल मेरी जान करना तो है.


रानी मुस्कुराई और फिर पियूष की पंत खोलने लगी और कुछ पल बाद hi रानी के हाथ में पियूष का लुंड था जिसे वो मुठिया रही थी...

जारी रहेगी...
 
रानी- देखो तो कैसे बिना किसी दर और शर्म के चूस रही है,

रानी ने फुसफुसाते हुए कहा,

पियूष- अरे इसमें शर्म कैसी, इसी के तो पैसे दिए हैं खुल के मज़े लेने के,

रानी- तुम्हे भी लेने हैं खुल के मज़े,

रानी ने पंत के ऊपर से hi उसके लुंड को सहलाते हुए कहा,

पियूष- हाँ बिलकुल मेरी जान करना तो है.

रानी मुस्कुराई और फिर पियूष की पंत खोलने लगी और कुछ पल बाद hi रानी के हाथ में पियूष का लुंड था जिसे वो मुठिया रही थी...



अपडेट 251


अपनी पत्नी के हाथों में लुंड देकर पियूष इधर उधर देखने लगा खासकर अपने मम्मी पापा की और उसने देखा की उसके पापा उसकी मम्मी की चूचियों को ब्लाउज के ऊपर से hi मसल रहे हैं और आस पास चल रहे खेल का मज़ा ले रहे हैं दोनों hi, इसी बीच पियूष को एक हलकी सी आठ सुनाई दी उसने नज़र घुमा कर देखा तो पाया जो लड़की नीचे बैठकर लुंड चूस रही थी ये उसकी आह्ह्ह्ह थी और अब वो उस लड़के के लुंड पर सवार हो कर उछाल रही थी, उसने अपनी स्कर्ट को कमर पर इकठ्ठा कर रखा था, चूचियां हर झटके के साथ झूल रही थी,

ये देख तो पियूष और रानी हिल गए उन्हें अब समझ आ रहा था की इतने पैसे किस बात के थे, पियूष का लुंड रानी के हाथ में और कड़क हो रहा था, पियूष ने रानी के सर पर हाथ रखा और उसे नीचे की और दबाने लगा जिससे रानी भी समझ गयी की वो क्या चाहता है, रानी झुक गयी और अपने पति के कड़क लुंड को मुँह में भर लिया, और चूसने लगी

दूसरी और आस पास इतना कुछ होते देख महिपाल और सावित्री की हालत भी ख़राब हो रही थी,

सावित्री- ये सब क्या हो रहा है जी इतनी खुल कर सब कैसे कर सकते हैं.

महिपाल- ये hi तो खुल कर मज़ा लेना कहलाता है, तुम हमें भी ज़्यादा सोचना छोड़ कर खुल कर मज़े लेने चाहिए,

महिपाल अपनी पत्नी की चूचियां दबाते हुए बोलै,

सावित्री- वो देखिये जी,

महिपाल ने सावित्री के इशारा करने पर पीछे की और देखा तो उसकी आँखें चौड़ी हो गयी पीछे की सीट पर नज़ारा hi कुछ ऐसा था,

एक जवान औरत जिसकी सारे अस्त व्यस्त थी और पूरा पेट और चूचियां नंगी थी वो अपने साथी की गॉड में बैठ कर अपनी कमर को घुमा रही थी और उसका साथी उसकी चूचियां मसल रहा था, उस औरत का जवान कामुक बदन देख कर तो महिपाल के मुँह से लार टपकने लगी,





महिपाल- चलो न हम भी पीछे चलते हैं.

सावित्री- पीछे क्यों?

महिपाल- पीछे सबसे काम लोगो की नज़र जाती है इसलिए,

सावित्री- ठीक है चलिए.

दोनों उठाते हैं एक नज़र अपने बीटा और बहु पर डालते हैं, बहु का सर बेटे की गॉड में ऊपर नीचे होता देख समझ जाते हैं क्या हो रहा है और चेहरे पर मुस्कान लिए वो आगे बढ़ जाते हैं, और पीछे की सीट पर जहाँ वो औरत थी उनके कुछ सीटों दूर आकर बैठ जाते हैं. महिपाल भी सावित्री को अलग सीट की जगह अपने ऊपर बिठा लेता है और फिर उसे चूमना शुरू कर देता है, सावित्री भी अब इतनी उत्तेजित थी की वो अब किसी चीज़ के लिए मन नहीं कर रही थी बल्कि उल्टा उसका साथ दे रही थी,

महिपाल ने सावित्री की साड़ी को ऊपर खिसकना शुरू किआ और उसे पेटीकोट के साथ साथ कमर पर इकठ्ठा कर दिया और जांघो को सहलाते हुए उसे चूमने लगा, साथ hi उसके बाद सावित्री के ब्लाउज को भी ऊपर खिसका कर उसकी मोती चूचियों को बाहर निकल लिया,

इधर पियूष आँखें नन्द कर रानी के गरम मुँह का मज़ा ले रहा था, रानी ने उसका लुंड मुँह से निकला और इधर उधर देखा और जिधर उसके सास ससुर बैठे थे उधर देखा तो पाया की वो सीट खली थी,

रानी- सुनिए जी मम्मी पापा कहाँ गए?

पियूष में भी तुरंत आँखें खोल कर देखा और खली सीट देख कर इधर उधर देखने लगा तभी उसे उनके चेहरे पीछे की सीट पर,

पियूष- पीछे हैं,

रानी- ऐसा क्या करना था उन्हें जो हमसे इतनी दूर चले गए,

पियूष- ये तो देखना पड़ेगा, चलो उधर कोने वाली सीट पर से देखते हैं, दोनों कोने की सीट पर खिसक गए और झांक कर देखा तो सामने का नज़ारा बहुत कामुक था,





अपनी मम्मी की नंगी चूचियां और पेट अपने पापा के हाथों मसलवाता देख पियूष और गरम होने लगा वहीँ रानी का भी यही हाल था,

रानी- अह्ह्ह्हह्हह देखो मम्मी पापा को कितना खुल कर मज़े ले रहे हैं.

पियूष- हाँ ाचा लग रहा है उन्हें देख कर.

रानी- मम्मी की चूचियां कितनी बड़ी बड़ी है न बहुत अछि लग रही है.

पियूष रानी की इस बात से खुश होते हुए बोलै- हाँ बड़ी और मुलायम भी कितनी लग रही हैं, पापा के हाथों में,

रानी- हाँ बड़ा मज़ा आ रहा है उन्हें इस तरह देख कर.

पियूष- तुम भी तो थोड़ा खुले न,

ये कह पियूष रानी का ब्लाउज ऊपर करने लगा और उसकी चूचियों को बाहर निकल लिया, और उन्हें दबाने लगा, रानी भी उसके ऊपर चढ़ गयी, पियूष ने उसे चूमते हुए उसकी साड़ी को ऊपर खिसकना शुरू कर दिया और कुछ hi पलों में रानी की गोरी जांघें दिख रही थी, रानी भी गरम होते हुए अपने पति की गॉड में चढ़ गयी और उसे चूमने लगी, पियूष उसके बदन को सहला रहा था,





दोनों एक दुसरे में उत्तेजना वश खोते जा रहे थे, पियूष के हाथ कभी रानी की जांघों को मसल रहे थे तो कभी उसके चूतड़ों को,

दूसरी और महिपाल ने सावित्री को अपने ऊपर से उठाया और अपनी पंत की और इशारा किआ सावित्री समझ गयी और घूम कर अपने पति की पंत खोलने लगी, और खोल कर तुरंत उसके कड़क लुंड को बाहर निकल लिया जो की पूरा गरम था, सावित्री ने मुस्कुराते हुए महिपाल की और देखा और फिर उसकी आँखों में देखते हुए hi उसे चाटने लगी, महिपाल की आँखें इस मज़े से बंद हो गयी.

दूसरी और चोदामपुर में नीलेश के नए घर का काम तेज़ी से चल रहा था, घर पर थोड़ी शांति थी क्योंकि कर्मा, शालू, शैलेश नहीं थे, कर्मा के नाना, मां और नीलेश बाघ में थे नए घर का काम देख रहे थे, नीलेश फ़ोन पर बात कर रहे थे, और कुछ देर बाद फ़ोन रख कर सबके पास आये,

मां- क्या हुआ जीजाजी हो गयी पूजा?

पापा- नहीं अब शुरू होने वाली है मुहूर्त थोड़ा लेट का था शैलेश बाबू वही बता रहे थे,

बलराज- इनकी पूजा ठीक से हो जाये और उसका फल मिल जाये तो साडी चिंता ख़तम हो जाएगी.

पापा- चिंता तो अब भी नहीं है बाबा, कर्मा, अनुज, पल्ली, सागर और किरण सब उन्ही के बच्चे हैं.

मां- बिलकुल सही कहा जीजाजी,

नाना- अरे जमाई बाबू, हमें लगता है सीमेंट दो दिन के बाद की जगह आज hi लाना पड़ेगा नहीं तो कल का काम रुक जायेगा.

पापा- हाँ बाबा हमें भी यही लग रहा था, जमुना एक काम कर मोटरसाइकिल माँगा किसी बच्चे से हम अभी निकल जाते हैं, ट्रेक्टर में डलवा लाते हैं सारा.

मां- अरे जीजाजी तुम क्यों जाओगे, हम जाते हैं न,

नाना- हाँ जमुना तुम hi चले जाओ किसी बालक को ले जाओ साथ में,

मां- हाँ हम hi जाते हैं,

पापा- ठीक तो घर जा तैयार होजा और अपनी जीजी से पैसे ले लिओ तब तक मैं लिस्ट बना देता हूँ सामान की.

जमुना यानि कर्मा के मां घर की और चल देते हैं और घर पहुँचते हैं, जहाँ अनुज अपनी माँ को किसी चीज़ के लिए मन रहा था,

अनुज- माँ मान जाओ न, बस एक दिन की बात है.

माँ- ऐसे अचानक कहीं नहीं जाते लल्ला, वो भी अकेले,

अनुज- अरे अचानक कहाँ जा रहा हूँ, पूर्वी दीदी ने खुद बुलाया है, और अकेले कहाँ सागर को ले जा रहा हूँ साथ में.

ममी- ओह्हो बहुत समझदार इंसान को ले जा रहे हो बाबू.

इस पर सब हंसने लगते हैं,

सागर- अरे मम्मी बस करो.

अनुज- माँ जाने दो न. पूर्वी दीदी के यहाँ एक बार भी नहीं गया हूँ.

किरण- बुआ ये कोई पूर्वी दीदी की वजह से नहीं जा रहे, बल्कि उनकी ननद है न प्रीती उसकी वजह से जा रहे हैं.

अनुज- तू चुप कर किरण. माँ बताओ न.

माँ- देख लल्ला मुझसे मत पूछ मुझे बहुत काम पड़े हैं, अभी मंजू जीजी के घर में झाड़ू भी नहीं लगी है तो मैं जा रही हूँ वहां तू अपने पापा से पूछ जाकर.

मां- अरे जीजी वो पैसे देते जाओ सामान लेने जा रहा हूँ शहर,

माँ- हाँ तो गुंजन से बोल दे वो निकल कर दे देगी,

सभ्य घर से निकलते हुए कहती है, और दरवाज़ा भेद के चली जाती है,

सागर- अब क्या करें बुआ ने तो कुछ बताया hi नहीं,

मां- अरे अनुज हमारे साथ चलो तुम लोग बाघ में जीजा से पूछ लेना फिर हमारे साथ शहर तक चल लेना और वहां से आगे चले जाना.

सागर- हाँ अनुज ये सही रहेगा चल,

अनुज- मां तुम भी पापा से थोड़ी सिफारिश कर देना,

मां- अरे बिलकुल अपने भांजे के लिए नहीं बोलेंगे तो किसके लिए बोलेंगे बीटा, बस तैयार हो जाने दे फिर चलते हैं,

कुछ hi देर में तीनो नीलेश की सहमति से गाओं से शहर के लिए निकल चुके थे,

दूसरी और थिएटर में नज़ारा बदला हुआ था, सब तरफ सिर्फ सिसकियों की आवाज़ आ रही थी, पीछे की सीट पर तो नज़ारा काफी कामुक हो चूका था,





एक औरत जिसके बदन पर सिर्फ उसकी साड़ी लिपटी हुई थी अस्त व्यस्त तरीके से वो एक आदमी के लुंड पर उछाल रही थी, आदमी औरत की दोनों मोती चूचियों को थामे हुए नीचे से धक्के लगा रहा था, दोनों hi जिस सीट पर बैठे थे उनसे एक सीट छोड़ कर hi महिपाल और सावित्री बैठे हुए थे और उनकी चुदाई देख कर गरम हो रहे थे, सावित्री तो औरत की हिम्मत देख कर हैरान भी थी और उत्तेजित भी की कैसे वो खुल कर सबके सामने चुद रही है.

हालाँकि सावित्री भी आधी नंगी थी और अपने पति की गॉड में बैठी हुई थी पर फिर भी उसे वो औरत खुद से एक कदम आगे hi दिख रही थी, तभी उस औरत की नज़र सावित्री से मिली तो औरत ने उछालते हुए hi एक कामुक मुस्कान सावित्री की और देख कर दी जिसे देख सावित्री एक पल को असहज हुई पर फिर वो भी मुस्कुरा दी,

वहीँ इस नज़ारे को देख कर गरम होने वाले सिर्फ सावित्री और महिपाल नहीं थे बल्कि पियूष और रानी भी थे, आगे से मुद मुद कर बार बार देख रहे थे,

पियूष- यार कुछ करना पड़ेगा ऐसे देखने में मज़ा नहीं आ रहा,

रानी- हम भी पीछे चलें? पर मम्मी पापा के सामने शर्म आएगी.

रानी के इस सुझाव से तो पियूष के मन में लड्डू फुट पड़े,

पियूष- अरे कुछ नहीं होगा यहाँ कौन शर्मा रहा है आज के लिए सब भूल जाओ,

ये कह वो रानी को उठता है और लेकर सबसे पीछे की सीट पर जहाँ उसके मम्मी पापा थे उनसे एक सीट छोड़ कर उसी तरह बैठ जाता है और रानी को अपने ऊपर बैठा लेता है,

रानी के लिए ये और उत्तेजित करने वाली बात थी की उसके सास ससुर बिलकुल बगल में hi हैं उनके, वहीँ पियूष उसकी चूचियां हो की पहले से hi बाहर थी उन्हें और उसके पेट को मसलने लगता है वहीँ रानी भी उत्तेजना में उसके ऊपर बैठे हुए मचलती है.





बहु की सिसकियाँ सुन दोनों का ध्यान उधर जाता है और वो उनकी और देख हैरान और उत्तेजित दोनों हो जाते हैं, महिपाल तो अपनी बहु की चूचियों और उसके बदन को इतने पास से देख तड़प उठता है, और सावित्री के लिए भी ये नज़ारा उतना hi उत्तेजित करने वाला था, दोनों आँखें पहाड़ कर अपने बेटे और बहु को देख रहे थे जो अभी वासना के खेल में व्यस्त थे,

इसी बीच पियूष एक बार महिपाल की और देखता है और उसे चुपके से आँख मरता है जैसे बता रहा हो सही मौका है फायदा उठा लो,

महिपाल भी बेटे की और देख मुस्कुराता है फिर अपने होंठों को अपनी पत्नी के कानो के पास ले जाता है और धीमे से फुसफुसाता है, जिसकी नज़र बेटे और बहु पर hi थी,

महिपाल- अह्ह्ह्हह्हह देखो हमारे बेटे और बहु को कितना खुल कर मज़े ले रहे हैं इस पल का, बिलकुल हमारे बगल में तुम्हे कैसा लग रहा है.

सावित्री बहुत उत्तेजित हो चुकी थी वो सिर्फ सिसकियाँ ले कर रह जाती है,

महिपाल- चलो हम भी उन्हें दिखा दें की उनके माँ बाप हैं हम इस खेल में भी,

महिपाल सावित्री की चूचियों और पेट को मसलते हुए कहता है.

सावित्री- ओह्ह्ह्हह्ह हाँ जी,

सावित्री कांपते हुए फुस फुसती है.

महिपाल- तो ऊपर उठो और मेरा लुंड अपनी छूट में लेकर दिखाओ.

सावित्री ये सुन थोड़ी हैरान रह जाती है पर उत्तेजना भी उस पर हावी थी.

महिपाल- चुड़ोगी अपने बेटे और बहु के सामने, अपनी गीली छूट में लुंड लेकर उन्हें भी दिखाओ न की उनकी मम्मी कितनी चुड़क्कड़ है, कितनी गरम छूट वाली है.

ये सुन कर तो सावित्री के सबर का बांध टूट जाता है और वो थोड़ा उठती है और अपने पति के लुंड को पकड़ कर अपनी सारी को और ऊपर कमर तक करती है और लुंड को छूट के द्वार पर लगा कर बैठ जाती है, और उसके मुँह से एक सिसकी निकलती है साथ hi महिपाल के भी.

दोनों की सिसकी सुन पियूष और रानी उनकी और देखते हैं, और अगले hi पल सावित्री अपनी कमर को उछलने लगती है, हालाँकि साड़ी की वजह से लुंड और छूट नहीं दीखते पर हर कोई जनता था की क्या हो रहा है.





अपने मम्मी पापा को अपने बगल में चुदाई करते देख कर तो दोनों hi हैरान भी थे और खुश भी खासकर पियूष जिसकी योजना उसे सफल होती नज़र आ रही थी.

पियूष- अह्ह्ह्हह्हह रानी देखो मम्मी पापा तो कितने चुड़क्कड़ निकले अह्ह्ह्हह्हह ये तो चुदाई कर रहे हैं.

रानी- अह्ह्ह्हह्हह हाँ मम्मी को देखो कैसे उछाल उछाल कर चुद रही है,

पियूष- तुम्हे ाचा लग रहा है देख कर?

रानी- हाँ बहुत, उनका ये रूप देख कर मज़ा आ रहा है.

पियूष- तो और गन्दा बोलो न खुलकर जितना गन्दा हो सके.

रानी- गन्दा,

पियूष- हाँ गन्दा,

रानी- देखो हमारी चुड़क्कड़ मम्मी को कैसे अपनी छूट में पापा का मोटा लुंड लेकर कूद रही हैं. उनकी गरम छूट में पापा का लुंड अंदर बहार हो रहा है.

पियूष- और पापा का मोटा लुंड कैसा लग रहा है तुम्हे?

रानी- अह्ह्ह्हह्हह बहुत मस्त, अह्ह्ह्हह्हह मम्मी की छूट के रास में नहाया हुआ आह्ह्ह्ह मुझसे रुका नहीं जा रहा,

ये कह रानी उठती है और अपनी सास की तरह hi अपने पति का लुंड निकलती है और उस पर बैठ जाती है लुंड को अपनी छूट में लेकर और अपनी कमर को उछलने लगती है,





पियूष अपनी पत्नी की कमर को पकड़ कर उसे उछालते हुए उसकी गरम छूट के मज़े ले रहा होता है,

अब दोनों सास बहु की सिसकियाँ एक साथ आने लगती हैं, अपनी बहु की आवाज़ सुन महिपाल और सावित्री भी दोनों की और देखते हैं चुदाई करते हुए, और उन्हें देख उत्तेजना से भर जाते हैं, ये सोचकर की वो और उनके बेटे बहु एक साथ चुदाई कर रहे हैं एक दुसरे के सामने...

चारों के लिए hi ये एहसास बहुत उत्तेजित करने वाला था अगले कुछ समय तक कोई कुछ नहीं बोलता सिर्फ सिसकियों की आवाज़ आती रहती है और फिर चारों hi एक साथ झड़ने लगते हैं जैसे चारों उत्तेजना की डोर से बंधे हो,

झड़ने के बाद थोड़ा शांत होकर सावित्री कपडे ठीक करते हुए सोचने लगती है की अभी उसने क्या किआ है बच्चों के सामने, ये सब, उधर रानी को भी उत्तेजना के बाद थोड़ा अजीब सा एहसास हो रहा था और वो अपने कपडे सही करने लगती है,

इतने में उन्हें बगल से एक आवाज़ आती है: अरे आप लोग अभी से कपडे पहनने लगे अभी तो डेढ़ घंटा और बाकि है,

ये वही औरत थी जो सावित्री और महिपाल के दूसरी और चुदाई करवा रही थी, वो भी झाड़ चुकी थी और अपने पति के बगल में नंगी hi बैठ कर सांसें भर रही थी.

सावित्री कपडे ठीक करते हुए उसकी बात सुन सिर्फ मुस्कुराई,

औरत- लगता है आप लोग यहाँ पहली बार आये हैं इसलिए इतना सकुचा रहे हैं, चिंता मत करो ये जगह बिलकुल सुरक्षित है, हम लोग तो कई बार आ चुके हैं.

उसके साथ का आदमी भी बोलता है- हाँ जबसे ये शुरू हुआ है तबसे आ रहे हैं.

महिपाल- जी ये तो बहुत अछि बात है, हम तो पहली बार आये हैं.

आदमी- कोई नहीं भाई साहब यहाँ का मज़ा कुछ ऐसा है की बार बार आओगे...

महिपाल- अब ये तो आगे देखते हैं क्या होता है,

आदमी- ाचा लगता है अपने जैसे लोगों से मिलकर जो समाज को छोड़कर खुल कर जीने में विश्वास रखते हैं,

महिपाल- ये बात तो आपने सही कही भाई साहब,

महिपाल और सावित्री को अजीब लग रहा था की कैसे वो नंगी हालत में एक अनजान आदमी और औरत से जिन्हे पहली बार देख रहे थे उनसे बात कर रहे थे,

पियूष और रानी भी उनकी बातें सुनते हुए आराम कर रहे थे झड़ने के बाद, हालाँकि रानी दोनों ने hi अपने कपडे ठीक से पहन लिए थे,

आदमी- अभी भी काफी समय है मज़े लीजिये, देखिये आपके बगल में एक जवान जोड़ा भी है.

आदमी ने पियूष की और देख कर इशारा किआ तो पियूष भी उसकी और देख मुस्कुरा दिया,

सावित्री और महिपाल सोचने लगे की अगर इसे पता चले की ये हमारे बेटे और बहु हैं तो क्या होगा,

इतने में उस आदमी के साथ जो औरत थी वो बोली- अरे तुम भी न बातें hi करने लगे उन्हें मज़े लेने दो और तुम अपने मुँह का सही इस्तेमाल करो,

औरत ने बगल की सीट पर बैठ कर अपनी टांगें फैलाकर कहा, तो आदमी एक बार महिपाल की और देख मुस्कुराया फिर औरत के पैरों के बीच अपना सर घुसा कर चाटने लगा औरत की सिसकी निकल गयी, वो आदमी का सर पकड़ कर छूट पर दबाने लगी.

सावित्री और महिपाल सकुचाते हुए उन्हें देख रहे थे, और कहीं न कहीं फिर से गरम भी हो रहे थे,

सावित्री फिर भी खुद सँभालते हुए बोली- सुनो जी अब चलते हैं बहुत कुछ हो गया अब.

महिपाल समझ गया की सावित्री के मन में ग्लानि के भाव आ रहे हैं और अगर उन्हें सच में अपनी योजना को अंजाम देना है तो उसे किसी तरह उसे रोकना होगा

महिपाल- हाँ मैं जनता हूँ पर अब समय पूरा होने पर hi चलते हैं न, वैसे भी आधा समय तो निकल चूका है और तुम खुद बताओ तुम्हे मज़ा नहीं आया?

सावित्री ने कुछ सोचते हुए हाँ में सर हिलाया,

महिपाल- तो जब मज़ा आया तो खुल कर मज़े लो, जब तक हम यहाँ हैं फिर जो जैसा था वैसा हो जायेगा.

सावित्री ने महिपाल की बात सुनकर सोचा की उसके पति की बात सही लगी वैसे भी जबसे उसने नीलेश से छुड़वाया था तो उसे एक ग्लानि रहती थी की उसने पति को धोखा दिया है तो वो उसके लिए कुछ करना चाहती थी. और अगर उसे यहाँ रुकना hi पसंद आ रहा था तो ये hi सही, और अगर वो चाहता है की वो खुल के मज़े ले तो वो ये भी करेगी.

दूसरी और रानी और पियूष भी महिपाल और सावित्री की और देख रहे थे की आगे वो लोग क्या करेंगे, तभी उन्होंने देखा की सावित्री घूम कर महिपाल के होंठों को चूसने लगती है तो दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है,

महिपाल सावित्री के होंठो को चूसते हुए फिर से उसका ब्लाउज खोलने लगता है और उसकी बड़ी बड़ी चूचियां बाहर निकाल लेता है.

पियूष रानी के काम में फुसफुसाता है- तुम्हे तो कोई परेशानी नहीं है न,

रानी मुस्कुराते हुए ना में सर हिलती है,

पियूष- बहुत अचे तो अब तुम भी खुल के मज़े लेना चाहे जो भी हो,

रानी- बिलकुल मेरे राजा अब नहीं रुकने वाली मैं,

ये कहते हुए वो भी अपने पति के होंठों से अपने होंठ मिला देती है, जब दोनों के होंठ अलग होते हैं तो वो देखते हैं महिपाल और सावित्री उठ कर कहीं जा रहे हैं वो देखते हैं दोनों hi एक कोने की और पड़े खली सोफे की और जा रहे होते हैं, और वहां पहुँचते hi सावित्री नीचे बैठ जाती है और अपने घुटनो पर और महिपाल अपनी पंत खोल कर अपने कड़क लुंड को निकलता है और सावित्री के मुँह में ठूंस देता है सावित्री भी उसे तुरंत चूसने लगती है. रानी और पियूष दूर से ये देख उत्तेजित हो रहे होते हैं.

रानी- अह्ह्ह्हह्हह मम्मी पापा तो आज पूरे मूड में हैं.

पियूष- हम अपना भी मूड बना लें फिर,

ये कहते हुए पियूष रानी की साड़ी उतर देता है और उसके पेटीकोट को उठाकर कमर पर लपेट देता है, साथ hi रानी के ब्लाउज को भी उतार देता है और ब्रा को नीचे कर उसकी चूचियों को बाहर निकल लेता है और दबाते हुए अपने मम्मी पापा को देखता है, उसकी मम्मी उसके पापा का लुंड चूस रही हैं सबके सामने, उसे यकीन नहीं हो रहा था, तभी उसके दिमाग में कुछ आता है और वो रानी को पकड़ता है और उसके कपडे उठता है और उसे पकड़ कर वहीँ सोफे के पास ले आता है.

रानी को हैरानी होती है पर वो इतनी उत्तेजित होती है की अपने सास ससुर के पास होने का एहसास उसे और गरम करता है, पियूष बहुत सावधानी से और दबे पाऊँ रानी को अपनी मम्मी के बगल में बिठा देता है और अपनी पंत उतर कर अपना लुंड निकल देता है जिसे रानी भी तुरंत मुँह में भर के चूसने लगती है, सास बहु दोनों अगल बगल में बैठ कर अपने अपने पति का लुंड चूस रही थी





सावित्री को तो पता भी नहीं था, महिपाल की भी मज़े से आँखें बंद थी, जब वो आँखें खोलता है तो सामने देख हैरान रह जाता है, उसकी बहु उसके सामने hi आधी नंगी बैठ कर उसके बेटे का लुंड चूस रही है, जबकि उसका खुद का लुंड उसकी बीवी चूस रही होती है.

अपने पीछे से आती आवाज़ें सुन सावित्री भी मुँह से लुंड निकल कर देखती है और हैरान रह जाती है अपने बेटे और बहु को देख कर, इतने करीब से बेटे के लुंड को बहु के मुँह में आता जाता देख कर, कुछ पल यूँ hi देखते रहने के बाद उसके होंठो पर एक बहुत hi हलकी सी मुस्कान आती है और वो बापिस अपने पति का लुंड चूसने लगती है.

सबके hi मन में कहने को बहुत था पर यहाँ आपस में बात करके अपना रिश्ता नहीं बता सकते थे, इसलिए बातें काम थी और काम ज़्यादा हो रहा था, पियूष जनता था की आगे अब उसे hi बढ़ना होगा, उसे hi पहल करनी होगी और ये hi सोचते हुए उसने अपनी शर्ट और पंत उतर दी और पूरी तरह नंगा हो गया, और रानी के मुँह से लुंड निकला और उसे उठाकर सोफे के ऊपर झुका दिया, और झुकाते hi पीछे से अपना लुंड पकड़ कर उसकी छूट में घुसा दिया जिससे रानी की सिसकी निकल गयी, ये देख सावित्री और महिपाल हैरान रह गए वहीँ महिपाल की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था क्योंकि उनकी योजना तो यही थी वो अपनी बहु को अपने सामने छुड़ता देखना चाहता था और वो हो रहा था, उसकी नज़र पियूष से मिली तो पियूष ने उसे आगे बढ़ने का इशारा किआ, महिपाल ने सावित्री के मुँह से लुंड निकला जो की ये सोच रही थी की एक दिन में उसके परिवार में क्या हो रहा है कहाँ सब कुछ साधारण था और अभी देखो उसके बीटा बहु उसके बगल में चुदाई कर रहे हैं, महिपाल इतने में अपनी पंत उतर चूका था और सोफे पर बैठ गया और सावित्री को इशारा किआ,

सावित्री अपनी सोच से बाहर निकली और उसने अपने पति के ऊपर जगह ली उसके लुंड को अपनी छूट के द्वार पर लगाया और अपनी बहु की आँखों में देखते हुए नीचे हो गयी, रानी के होंठो पर भी उसे देख कर मुस्कान आ गयी,

Mahipal-ahhhhhhh ओह्ह्ह्हह्ह हम्म्म्म

रानी- अह्ह्ह्हह्हह जीई ऐसे hi छोडोऊ अह्ह्ह्हह्हह

रानी ने सावित्री की आँखों में देखते हुए पियूष से धीरे से कहा.

पियूष जो अपने माँ बाप की चुदाई इतने करीब से देख कर पहले hi हैरान और उत्तेजित था रानी की कमर पकड़ कर धक्के लगाने लगा, वहीँ सावित्री भी ले बनाते हुए अपने पति के लुंड पर उछाल रही थी.





महिपाल उसकी कमर को थम कर उसे लुंड पर उछलने में सहयोग कर रहा था,

सास बहु चुड़ते हुए बीच बीच में एक दुसरे से नज़रें मिला रही थी, दोनों के लिए hi ये सब बहुत उत्तेजित करने वाला था, वहीँ पियूष मन hi मन ये सोच रहा था की और कैसे आगे बढ़ा जाये वो और क्या कर सकता है ऐसा,

इसी बीच सावित्री उठी और और उसने महिपाल के लुंड को मुँह में भर लिया और कुछ पल के लिए चूसने लगी, पर उसके बापिस बैठने से पहले महिपाल सोफे पर सर पियूष और रानी की और करके लेट गया फिर सावित्री दोबारा उसके लुंड पर सवार होकर उछलने लगी, पियूष ने ये देखा तो उसने भी मौके का फायदा उठाना सही समझा और रानी को आगे धकेल कर बिलकुल सोफे के करीब कर दिया इतना करीब की महिपाल की आँखों से थोड़ा सा ऊपर hi रानी की चूचियां झूल रही थी और ये देख कर तो महिपाल का लुंड सावित्री की छूट में फूलने लगा, उसका बहुत मन कर रहा था की वो हाथ बढ़ा कर उसकी चूचियों को पकड़ ले उन्हें मसाले उन्हें दबाये पर किसी तरह से उसने खुद को रोका.





सावित्री भी ये देख रही थी और उसे भी ये न जाने क्यों बहुत ाचा लग रहा था, ये सब गलत होकर भी न जाने क्यों इतना ाचा लग रहा था की वो खुद को रोक नहीं पा रही थी, रानी के चेहरे के सामने hi उसकी सास की मोती चूचियां थी और वो थोड़ी नज़र नीचे करती तो उसे अपने ससुर का लुंड उसकी सास की छूट में अंदर बहार होता दिख रहा था,

ये नज़ारा उसके लिए जितना नया था उतना hi उत्तेजित करने वाला भी था उसने सपने में भी नहीं सोचा था की कभी ऐसा कुछ होगा जो आज हो रहा था, पर जो भी हो रहा था उसे एक अलग एहसास दिला रहा था, तभी पियूष ने उसकी छूट से लुंड निकला और वो पलटी तो उसे नीचे घुटनो पर बैठा दिया और रानी पियूष का लुंड चूसने लगी, उधर सावित्री उछालते हुए थकने लगी तो वो भी महिपाल के ऊपर से उठ गयी और सोफे के ऊपर झुक गयी और अपनी गांड महिपाल को परोस दी जिसने बिना देर लगाए उसके पीछे जगह ली और लुंड छूट में घुसा दिया, कुछ देर लुंड चुसवाने के बाद पियूष ने उसे रानी के मुँह से निकला और उसकी मोती चूचियों के बीच फंसा दिया रानी ने अपनी दोनों चूचियों को हाथों से थमा और पियूष उसकी चूचियों को छोड़ने लगा, बगल में hi उसके पापा उसकी मम्मी को छोड़ रहे थे.





तभी बगल वाली कुर्सी पर वो आदमी और औरत भी आ गए वो दोनों भी पूरे नंगे थे और आदमी पीछे से औरत को कुर्सी पर झुका कर छोड़ रहा था,

आदमी- अह्ह्ह्हह्हह अह्ह्ह्हह्हह ओह्ह्ह्हह्ह अब खुल कर मज़े कर रहे हो आप लोग,

औरत- अह्ह्ह्हह्हह हाँ असली मज़ा आह्ह्ह्ह तो ये hi हैई, खुल कर साथ में.

महिपाल- हाँ अह्ह्ह्हह्हह ये तो सही कहा, यह यहाँ ऐसे सब अनजान लोगो के सामने बहुत hi अलग एहसास है.

महिपाल सावित्री की छूट में धक्के लगते हुए बोलै,

आदमी- अह्ह्ह्हह्हह वही तो भाई साहब अपने तरह के विचारों वाले लोग मिलना बहुत मुश्किल होता है, अब मिल गए हैं तो खुल के मज़े लेने में क्या बुराई है.

औरत- अह्ह्ह्हह्हह अह्ह्ह्हह्हह और क्या नहीं तो फिर बाकि तो सबकी तरह जीना hi है.

सावित्री- अह्ह्ह्हह्हह हाँ बहन जी सही कह रही हो, ऐसा मज़ा तो सच में कभी नहीं मिला अह्ह्ह.

सावित्री ने गरम होते हुए कहा,

महिपाल की नज़र बात करते हुए उस औरत की चूचियों पर जा रही थी जो हर झटके के साथ झूल रही थी, जो शायद उस औरत ने भी देख लिए.

औरत- आराम से देखिये भाई साहब इसीलिए hi तो हम लोग यहाँ हैं,

आदमी- क्यों भाई साहब मस्त हैं न इसकी चूचियां,

महिपाल को समझ नहीं आ रहा था क्या बोले पहली बार वो ऐसी परिस्थिति में था की कोई आदमी खुद पूछ रहा था की उसकी पत्नी की चूचियां मस्त हैं न, महिपाल मुस्कुरा कर बोलै- जी बहुत मस्त हैं.

इधर पियूष ने अपनी पत्नी की चूचियां की चुदाई छोड़ी और खुद सोफे पर बैठ गया और रानी उसके लुंड पर सवार हो गयी उसकी और पीठ करके,

ये देख महिपाल ने भी अपने बेटे के बगल में जगह ली और सावित्री उसके लुंड पर सवार हो गयी पर उसका मुँह महिपाल की और था, एक बार फिर से चुदाई शुरू हो गयी, बाप बेटे अगल बगल में बैठ कर अपनी अपनी पत्नियों को छोड़ को रहे थे,





ये नज़ारा देखते हुए औरत और आदमी भी उनके सामने चुदाई कर रहे थे,

औरत- वैसे आपके साथ वाला जवान जोड़ा भी काफी जोशीला है, आप लोग जानते हो इन्हे?

पियूष- न नहीं नहीं, हम लोग तो बस यहीं मिले हैं, पियूष ने हड़बड़ाते हुए रानी की छूट में धक्के लगते हुए कहा,

महिपाल- हाँ हाँ यहीं पर मिले हैं, बस थोड़ी देर पहले,

आदमी- बढ़िया किआ है दोस्त, जो अभी इस उम्र में hi ज़िन्दगी को खुल के जी रहे हो, हमारी उम्र तक आते आते सरे मज़े लूट चुके होंगे,

आदमी ने पियूष से कहा,

पियूष- हाँ बिलकुल सोचा तो कुछ ऐसा hi है पियूष ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

महिपाल- हाँ अब तो लगता है काश हमने भी इसी उम्र में शुरू किआ होता,

आदमी- अह्ह्ह्हह्हह हहहहह सही कहा भाई साहब, पर अभी भी देर नहीं हुई है, अभी बहुत कुछ है करने को,

महिपाल- अह्ह्ह्हह्हह हम सही कहा,

आदमी- भाभी जी भी अभी जवान हैं, वैसे भाभीजी एक ीचा है पूरी करेंगी क्या?

अचानक आदमी की इस बात से सावित्री यहाँ तक की महिपाल और बाकि सब भी थोड़ा चौंके, सावित्री ने तो उछालना भी बंद कर दिया,

आदमी- अरे इतना चौंकिए मत ज़्यादा कुछ नहीं है बस आप घूम कर बैठ जाओ न, आपकी चूचियां बड़ी मस्त हैं तो उन्हें उछालते देख मज़ा आएगा,

उसकी बात सुनकर सावित्री के चेहरे पर मुस्कान आ गयी, और वो बिना महिपाल से पूछे hi उठी और पलट कर बैठ गयी, महिपाल को न जाने क्यों सावित्री का ये करना बहुत भैया,

आदमी- ये हुई न बात, आप दोनों की जोड़ी बहुत कमल लग रही है अगल बगल में उछालते हुए.

आदमी ने रानी और सावित्री को अगल बगल में उछालते हुए देखकर कहा,





रानी तो कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थी वो सिर्फ ये सुनकर मुस्कुराई,

पियूष- अह्ह्ह्हह्हह हाँ तभी तो हम लोग इनके पास आ गए, एक अलग सा जुड़ाव महसूस हुआ,

आदमी- हाँ होता है कभी कभी किसी के साथ अपने आप ऐसा महसूस होता है,

महिपाल- हाँ जैसा हमें आपसे भी हो रहा है,

महिपाल ने बात सँभालते हुए और औरत की चूचियों पर नज़र गाड़ते हुए कहा, वो औरत महिपाल को भ रही थी,

औरत- अह्ह्ह्हह्हह ये जानकर ाचा लगा भाई साहब अह्ह्ह्हह्हह अब बहुत हो गयी बातें चुदाई पर ध्यान देते हैं सब.

इस पर सबके चेहरे पर मुस्कान आ गयी और सब अपने अपने काम में लग गए,

थोड़ी देर बाद hi सावित्री और महिपाल ने एक बार जगह और बदली और अब वो सोफे के आगे फ्लोर पर एक और करवट लेकर चुदाई कर रहे थे, सावित्री आगे लेती थी और महिपाल पीछे से उसकी चूचियां थामे उसकी छूट में धक्के लगा रहा था, रानी अभी भी उसी आसान में पियूष के लुंड पर उछाल रही थी,





सब के चेहरे के भाव और प्रतिक्रियाओं से लग रहा था की लोग अपने अपने चरम से अधिक दूर नहीं हैं, सबसे पहले उस आदमी और औरत की सिसकियाँ तेज़ होती सुनाई दी और उनके धक्के भी तूफानी होते हुए दिखे और कुछ hi देर में जब लगा की आदमी झड़ने वाला है तो उसने लुंड औरत को छूट से निकल दिया और औरत नीचे बैठ गयी, और आदमी अपने लुंड को मिथियाते हुए औरत के मुँह पर पिचकारी छोड़ने लगा, एक के बाद एक पिचकारी औरत के चेहरे पर गिर रही थी और औरत का चेहरा आदमी के रास से सना हुआ था, आदमी का झड़ना ख़तम हुआ तो वो कुर्सी पर बैठ गया और हांफने लगा, वहीँ औरत भी अपनी सांसें ठीक करने लगी,

इतने में रानी की सिसकियाँ भी तेज़ हो गयी और कुछ hi पलों बाद वो भी थरथराती हुई झड़ने लगी, उसके झड़ते hi पियूष ने उसे भी नीचे बिठा दिया और उसके मुँह में अपना लुंड घुसा दिया, रानी भी तुरंत चूसने लगी,

इधर महिपाल और सावित्री भी उत्तेजना के शिखर की और बढ़ रहे थे, जोश में आते हुए सावित्री ने अपना ब्लाउज उतार कर एक और फ़ेंक दिया और महिपाल ने उसी जोश का फायदा उठाते हुए आसान बदला और उसे सोफे के ऊपर झुका दिया पर बिलकुल पियूष और रानी के बगल में, और पीछे से उसे छोड़ने लगा, सावित्री के चेहरे से थोड़ी सी दूर hi उसके बेटे का कड़क लुंड था जिसे उसकी बहु चूस रही थी ये देख सावित्री की सांसें भारी होने लगी, वहीँ पियूष भी अपने लुंड के पास अपनी मम्मी के चेहरे को देख संयम खो बैठा और अपनी पत्नी के मुँह में झड़ने लगा, एक के बाद एक पिचकारी छोड़ने लगा, जिसे रानी गटकती गयी





पियूष को झड़ते देखना सावित्री के लिए भी बहुत हो गया और वो भी कांपते हुए झड़ने लगी और उसके साथ साथ महिपाल भी उसकी छूट में अपना रास भरने लगा, कुछ पल बाद सब झाड़ कर बैठ कर अपनी सांसें ठीक कर रहे थे,

और जो हुआ उस बारे में सोच रहे थे, उत्तेजना का नशा उतरा तो वास्तविकता और ग्लानि के विचार छाने लगे, सावित्री और रानी ने अपने कपडे ठीक किये तो उन्हें देख पियूष और महिपाल ने भी, समय भी लगभग पूरा हो चूका था, पियूष ने महिपाल को इशारा किआ की वो सावित्री को लेकर पहले निकले और पीछे से वो लोग आएंगे, महिपाल निकल hi रहा था की वो आदमी और औरत उनके पास आये अब उन लोगो ने भी कपडे पहन रखे थे,

आदमी- भाई साहब ये रख लीजिये, वैसे कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है अगर मन करे तो इसका इस्तेमाल करना नहीं मन करे तो नहीं,

महिपाल ने देखा की उसने एक परचा थमाया था जिसमें एक नंबर लिखा था,

महिपाल- जी देखेंगे,

औरत- बिलकुल देखना भाई साहब पर याद रखना इसके बाद बाहर की दुनिया में न आप हमें जानते हो न हम आपको, बाकि अगर और अचे से जानने का मन हो तो तरीका आप जानते हो.

औरत ने पर्चे की और इशारा किआ और दोनों आगे बढ़ गए, आगे जाकर उन्होंने पियूष से भी थोड़ी बात की और उन्हें भी परचा दिया और बाहर निकल गए, इसके बाद पहले महिपाल और फिर पियूष भी बाहर निकल गए, बहुत से सवाल और मन में अनेक ख्यालों के साथ.



जारी रहेगी.........
 
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