Incest Katha Chodampur Ki - Page 39 - SexBaba
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Incest Katha Chodampur Ki

विनीत ये कहते हुए बिस्तर पर लेट गया तो ममता ने विनीत के ऊपर आकर उसका लुंड अपनी गांड में लेकर बैठ गयी, लुंड गांड में घुसते hi सूजन सिंह ने उसके पैरों के बीच जगह ली और अपना लुंड उसकी छूट में घुसा दिया, और दोनों ताऊजी और भतीजा धीरे धीरे ले बनाने लगे ममता की दोहरी चुदाई की, और उसे दोनों और से छोड़ने लगे,

ममता भी हर झटके पर आहें भरते हुए चिल्ला कर उनका उत्साह बढ़ने लगी, अब आगे...



अपडेट 236
जहाँ विनीत तो अपने ताऊजी के साथ मिलकर ममता की दोहरी चुदाई करने लगा था वहीँ सभ्य पेशाब करने के बाद बाहर आई तो उसने आँगन में खुद को अकेला पाया, हालाँकि सभ्य को सरे hi कमरों से आहें सुनाई दे रही थी तो सभ्य ने सोचा शायद विनीत अपनी मम्मी के कमरे में चला गया होगा, यही सोच सभ्य अपनी ननद शशि के कमरे की और बढ़ी और दरवाज़े के पास पहुँच कर दरवाज़े को खोल कर देखती है तो सामने का नज़ारा देख कर चेहरे पर मुस्कान आ जाती है,

सामने उसकी ननद शशि उसके बेटे कर्मा के लुंड पर उछाल रही होती है, कर्मा बिस्तर के किनारे टांग लटका कर लेता है और शशि उसका लुंड लिए वैसे hi टांगें लटका कर उसके ऊपर उछाल रही होती है,





शशि की नज़र भी अपनी भाभी पर पड़ती है जो बिलकुल नंगी होकर दरवाज़े से झाँक रही है,

शशि- अंदर आ जाओ भाभी क्या झाँक रही हो,

शशि की बात सुनकर सभ्य अंदर आती है,

सभ्य- अरे वाह यहाँ तो बुआ भतीजे का प्यार दिख रहा है,

सभ्य ने पास आकर शशि की मोती छुछियां पकड़ते हुए कहा,

शशि- ननद भाभी का भी दिखने लगेगा तुम कहो तो,

शशि हाथ आगे बढ़ा कर सभ्य को खुद से चिपका लेती है, कर्मा नीचे लेट कर लगातार धक्के लगता रहता है अपनी बुआ की छूट में,

सभ्य- मैं तो चाहती हूँ इतनी प्यारी ननद से प्यार नहीं मिला तो भाभी का जीवन बेकार है,

ये कहकर सभ्य अपने होंठ शशि के होंठों से भिड़ा देती है और दोनों पागलों की तरह एक दुसरे के होंठों को चूसने लगती हैं, कर्मा भी अपनी बुआ और माँ का कामुक मिलान देख और उत्तेजित होकर बुआ की छूट में धक्के लगाने लगता है,

दोनों ननद भाभी काफी देर तक एक दुसरे के होंठों को चूसती हैं, और जब दोनों के होंठ अलग होते हैं तो दोनों के hi चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान होती है, सभ्य शशि के होंठों से नीचे सरकते हुए उसकी गर्दन को चूमने लगती है तो शशि माँ बेटे के हमलो से आहें भरने लगती है,

सभ्य थोड़ा और नीचे सरकती है और शशि के एक छूछे को मुँह में भर कर चूसने लगती है और दुसरे को हाथ से मसलने लगती है, शशि अहहैं भरते हुए सभ्य के सर को पकड़ कर अपनी चूचियों पर दबाने लगती है.

शशि- अह्हह्ह्ह्ह मेरिइइइइइ राहाँदददद भाभीयी अह्हह्ह्ह्ह कितिया पी जा मेरा दूध सारा पीजा,

सभ्य- ओह्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म...

सभ्य- अह्हह्ह्ह्ह भाभीयी तुम्हारे साथ ये सबबबब करने के लिए मैं न जाने कब से बेचैन थी अह्ह्ह्हह्हह ाजजज मौका मिलाआहहह हैई,

कर्मा- अह्हह्ह्ह्ह buaaaaahhhhhhhhhh सही कहा, तुम दोनों को एक साथ छोड़ने का मौकाअहह मुझे भी पहली बार मिलने वल्लाह है,

सभ्य- ुहम्म्म्म मैंन तो अपनी रंडी ननद का स्वाद आअज अचे से चखूंगी.

सभ्य अपना मुँह पल भर के लिए शशि की चुकी से हटा कर कहती है और फिर से उसे मुँह में भर लेती है,

कर्मा अपनी बुआ की कमर को थामे लगातार धक्के लगता रहता है, और उसे अपने लुंड पर उछलता रहता है, सभ्य कुछ देर शशि की चुकी चूसने के बाद उसके पेट और नाभि को चाटती हुई नीचे बैठती चली जाती है और नीचे बैठ कर पहले तो शशि की छूट के दाने को अपनी जीभ से सहलाती है जिससे शशि की हालत ख़राब होने लगती है. और शशि अपने चरम की और बढ़ जाती है, शशि की झड़ने के करीब देख सभ्य उसकी छूट से जीभ हटती है और अपने बेटे की गलियों को चाटने लगती है जो की हर धक्के के साथ ऊपर नीचे हो रही होती हैं,





कर्मा- अह्हह्ह्ह्ह माहहहह बुआहहहहह ओह्ह्ह्हह्ह मज़ाआ आ रहा है,

कर्मा भी दोहरे मज़े से सिहरने लगता है, सभ्य पर इतने पर hi नहीं रूकती और कर्मा की टांगें थोड़ी और फैला कर अपनी जीभ को नुकीला कर कर्मा के गांड के छेड़ को कुरेदने लगती है जिससे कर्मा का पूरा बदन hi अकड़ने लगता है,

कर्मा- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह माआहहहह अह्ह्ह्हह्हह,

शशि को भी अचानक से कर्मा का लुंड अपनी छूट में फूलता हुआ महसूस होता है,

कर्मा गुर्राते हुए दो चार तगड़े धक्के अपनी बुआ की छूट में लगता है जिससे शशि भी अपने चरम पर पहुँच जाती है उसी समय कर्मा भी बुआ की छूट में झड़ने लगता है अपने रास से बुआ की छूट को भरने लगते है..

दोनों का झड़ना ख़त्म होता है तो सभ्य अपने बेटे का लुंड अपनी ननद की छूट से निकलती है और उसे मुँह में भर कर साफ़ करती है, लुंड साफ़ करने के बाद सभ्य शशि को कर्मा के ऊपर से हटा कर उसके बगल में hi बिस्तर के किनारे लिटा देती है

शशि- दोनों को एक साथ झड़वा दिया भाभी तुमने.

सभ्य- तभी तो तुम दोनों का मिला हुआ रास चखने को मिल रहा है मुझे.

ये कहकर सभ्य अपना मुँह शशि की छूट में घुसा देती है और जीभ घुसा घुसा कर अपने बेटे और ननद के मिश्रित रास को चाटने लगती है,

कर्मा शांत होते हुए इस नज़ारे को देखता है, वहीँ शशि अपनी भाभी की जीभ का आनंद लेते हुए दोबारा गरम होने लगती है,

सभ्य जब संतुष्ट हो जाती है तो शशि की छूट से मुँह हटती है पर अब शशि पूरी तरह से उत्तेजित हो चुकी होती है और वो अपनी भाभी पर टूट पड़ती है और सभ्य की चूचियों को चूसने लगती है...

शशि तो पागलों की तरह अपनी भाभी के बदन को चाटती चूमती है जिससे हर पल सभ्य की आहें तेज़ होती जाती hain.itne में कर्मा का लुंड भी दोनों की कामुक हरकतें देख सर उठाने लगता है, तो दोनों औरतों का ध्यान खड़े लुंड पर जाता है,

शशि- इधर आ बीटा इस मोठे लुंड को हमारे पास ला,

बुआ मेरे लुंड को घूरते हुए कहती हैं

सभ्य- अह्हह्ह्ह्ह रंडी अभी मन नहीं भरा तेरा मेरे बेटे के लुंड से.

शशि- तेरा भरा आज तक रैंड?

दोनों की कामुक बातों को सुनते हुए कर्मा उनके पास जाकर लुंड आगे कर देता है और दोनों hi उसके लुंड पर टूट पड़ती हैं





एक साथ दो जोड़े गरम होंठ कर्मा के लुंड पर चलने लगते हैं जिससे कर्मा सिसकने लगता है.

कर्मा- अह्हह्ह्ह्ह माहहहह बुआहहहहह ओह्ह्ह्हह्ह मज़ाआ आए रहा है, कबसे दोनों को एक साथ छोड़ने की इच्छा थी अह्हह्ह्ह्ह आअज पूरी हो रही है.

(कर्मा की ज़ुबानी)

शशि- बेटाःह्ह्ह आज तेरी बुआ और माँ तुझे जन्नत की सैर कराएंगी.

बुआ ने मेरा लुंड अपने मुँह से निकल कर माँ के मुँह में घुसते हुए कहा, कुछ देर ऐसे hi लुंड चूसने के बाद बुआ बोली- ुहम्म भाभी अब लल्ला के लुंड की सवारी करो मुझे भी देखना है कैसे चुदती हो अपने बेटे से,

सभ्य- मेरी छूट तो वैसे भी लुंड के लिए कुलबुला रही थी,

शशि- ाहहब तो अब मितवती हूँ तुम्हारी खुजली अपने भतीजे के लोडे से,

बुआ माँ को पकड़ कर मेरे ऊपर चढ़ा देती हैं और माँ भी तुरंत मेरा लुंड पकड़ कर अपनी छूट में घुसा लेती हैं, मैं माँ के चूतड़ों को पकड़ कर नीचे अपने लुंड पर उछलने लगा वहीँ बुआ भी माँ के चूतड़ों को मसलने लगी,





शशि- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह भाभी कैसा लग रहा है अपने बेटे से चुद कर,

सभ्य- ओह्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्हह्हह ननद रानी, माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आए रहा है, अह्ह्ह्ह अह्ह्ह्ह ऐसी हीई,

शशि- अह्हह्ह्ह्ह बेटे का लुंड होता hi माँ की सेवाआआअह्ह्ह्ह के लिए है. कर्मा कैसी लग रही है तेरी माँ की छूट.

में- बुआहहहहह ओह्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्हह्हह हर बेटे के लिए उसकी माँ कीई चूऊत्त जन्नत का द्वार होतीय है,

शशि- बेटाःह्ह्ह माँ तेरे जैसी हो तो बीटा उस जन्नत के द्वार की सैर ज़रूर करता है,

ये कहते हुए बुआ माँ और मेरी टैंगो के बीच बैठ गयी और अपनी जीभ आगे कर माँ की गांड चाटने लगी, माँ का मज़ा दोहरा होने लगा, माँ अहहैं भरने लगी.

सभ्य- ओह्ह्ह्हह्ह ऐसी हीईई शशी घुसा दे अपनी जीभ मेरी गांड में अह्ह्ह्ह दोनों बुआ भतीजा मिल कर छोड़ो मुझे,

हम दोनों कर भी वही रहे थे, मैं लुंड माँ की छूट में चला रहा था तो बुआ अपनी जीभ माँ की गांड में, कुछ देर माँ को छोड़ने के बाद मैंने उन्हें ऊपर से हटाया और बुआ और माँ दोनों को नीचे एक दुसरे के बगल में पीठ पर लिटा दिया और बुआ की टांगो के बीच में आकर अपना लुंड उनकी छूट में घुसा कर तेजी से छोड़ने लगा,

माँ भी बुआ के चेहरे पर हाथ फिरते हुए उनकी टांगो को थामे बुआ की चुदाई में मेरी मदद कर रही थी,





शशि- अह्हह्ह्ह्ह लल्लाहहहह अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हॉँण्णन ईई ऐसी hi.

सभ्य- ुहम्म्म्म लल्लाहहहह छोड़ और तेज छोड़ अपनी रैंड बुआ को,

में- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हॉँण्णन अह्हह्ह्ह्ह माह बड़ी मस्त छूट हीी बाः की.

सभ्य- जानती हु बेटाःह्ह्ह तभी तो तेरे पापा भी सालों पहले अपनी बहन को छोड़ने से रोक नहीं पाए.

शशि- अह्हह्ह्ह्ह लल्लाहहहह अह्हह्ह्ह्ह तेराअहहह लुंडडडड तो हमेशा की तरह hi मज़ेदार है अह्हह्ह्ह्ह...

सभ्य- लुंड तो मज़ेदार होगा hi जब बुआ की छूट मज़ेदार होगी तो,

ये कहकर माँ ने चेहरा आगे कर अपने होंठों को बुआ के होंठों से मिला दिया और दोनों बड़े कामुक ढंग से एक दुसरे के होंठों को चूसने लगी, होंठों को चूसते हुए दोनों के बीच का प्यार साफ़ दिख रहा था, साथ hi उन्हें देख कर मुझे मज़ा आ रहा था, मेरी कामुक माँ और चुड़क्कड़ बुआ मेरे सामने बिलकुल नंगी हो कर इतने कामुक तरीके से एक दुसरे के होंठों को चूस रही थी और मेरा लुंड मेरी बुआ की गरम छूट में था, इससे अछि ज़िन्दगी क्या hi हो सकती थी, पर इससे ाचा भी हुआ होंठों को चूसते हुए जल्दी hi वो एक दुसरे की जीभ चूसने लगी, माँ बुआ की जीभ को किसी लुंड की तरह होंठों में लेकर चूसने लगी.





ये नज़ारा देख कर तो मेरे झटके अपने आप तेज हो गए और लुंड फूलने लगा, मुझे लगा मेरा रास दोबारा से लुंड की और बहने लगा है तो खुद को शांत करने के लिए मैंने लुंड को बुआ की छूट से निकाल लिए,

पर उन दोनों को जैसे कोई फ़र्क़ hi नहीं पड़ा और वो लगातार एक दुसरे के होंठों को चूसने में लगी हुई थी, मैंने कुछ पल दोनों को यूँ hi देखा और फिर अपना लुंड माँ के पैरों के बीच आकर उनकी छूट में पेल दिया और छोड़ने लगा,

पर इससे भी उनका चुम्बन टूटा नहीं बल्कि और गहरा hi हुआ, मैं उन्हें देखते हुए माँ की छूट में धक्के लगाने लगा,

माँ ने तो जैसे आज ठान लिए था की बुआ की जीभ का सारा रास चूस कर hi रहेंगी और लगातार बुआ की जीभ को चूसे जा रही थी, बुआ भी माँ का पूरा साथ दे रही थी, एक पल के लिए दोनों के होंठ अलग होते पर अगले hi पल फिर से जुड़ जाते, मुझे देखकर जब इतना मज़ा आ रहा था तो उन्हें कितना आ रहा होगा ये वो दोनों hi जानती होंगी.





मैंने उन्हें देखते हुए hi ना की छूट से बापिस लुंड निकला और बुआ के पैरों के बीच आकर उनकी गांड में घुसा दिया, जिससे बुआ थोड़ी मछली ज़रूर पर उन्होंने माँ से अपने होंठ अलग नहीं किये, मुझे दोनों की लगन देख कर बड़ा ाचा लगा, साथ hi बुआ की गांड में लुंड घुसा कर भी बहुत ाचा लग रहा था,

मैं लम्बे लम्बे धीमे धक्कों से बुआ की गांड मारने लगा, और हाथ ऊपर कर उनकी चूचियों को मसलने लगा, वही दुसरे हाथ से माँ की एक छुच्छी को, दो गदराई औरतों को एक साथ छोड़ने का मुझे भरपूर मज़ा मिल रहा था और जब दोनों गदराई औरतें अपनी माँ और बुआ हो तो मज़ा कई गुना बढ़ जाता है, और ऐसा hi मेरे साथ हो रहा था, बुआ की गांड कुछ देर मरने के बाद मैंने उनकी गांड से लुंड निकला और बापिस माँ की छूट में घुसा दिया और दददद उन्हें छोड़ने लगा. माँ और बुआ का छपाम्णा अभी भी जारी था, मेरा लुंड माँ की छूट में किसी मशीन की तरह अंदर बहार हो रहा था. बुआ अपने एक हाथ से अपनी छूट को सहलाते हुए माँ के होंठों को चूम रही थी,





एक बार फिर से मुझे मेरे लुंड में उबाल आता हुआ महसूस हुआ तो मैंने उसे रोका नहीं बल्कि और तेज माँ को छोड़ने लगा, और कुछ पल बाद माँ की छूट से लुंड निकल कर बापिस बुआ की छूट में घुसा दिया और तेज तेज छोड़ने लगा, ऐसे hi बदल बदल कर मैं दोनों की छूट छोड़ता रहा और दोनों को hi उनके चरम पर ला दिया,

माँ और बुआ एक साथ झड़ने लगी तो मैं भी खुद को रोक नहीं पाया और जैसे hi मेरा निकलने को हुआ तो मैंने दोनों की चूचियों और पेट को निशाना बनाया और उन्हें अपने रास से रंग दिया.. और बिस्तर पर लेट कर लम्बी लम्बी सांसें लेने लगा,

इधर बुआ और माँ एक दुसरे के बदन से मेरा रास चटनी की तरह चाट रही थी, कभी बुआ माँ की चूचियां और पेट चाटती तो कभी माँ बुआ की, फिर दोनों ने रास को एक दुसरे के साथ होंठों से होंठ मिला कर बांटा, आउट फिर दोनों मेरे बगल में आ कर लेट गयी,

शशि- आह्ह्ह्हह्ह थक गए.

सभ्य- हाँ थकना तो था hi इतनी चुदाई करने के बाद,

में- मुझे तो नींद आ रही है,

शशि- सही कहा लल्ला सो जाते हैं हम लोग भी कल भी जल्दी उठना है बहुत काम हैं,

सभ्य- हाँ सो जाते हैं अब,

हम तीनो वैसे hi एक दुसरे से चिपक कर सो गए.

चोदामपुर

कर्मा और उसका परिवार साथ hi किरण, शैलेश और ममता तो रिश्तेदारी में चले गए थे शाम का वक़्त हो चूका था,

गुंजन- सबको गए कुछ घंटे hi हुए हैं और घर में बिलकुल सूना सा लग रहा है, हैं न जीजी,

गुंजन ने रसोई में काम करते हुए कहा,

शालू- सही कहा तूने गुंजन, जीजी जीजा और बच्चों के बिना ये घर अधूरा सा लगता है,

गुंजन- वही तो, अरे जीजी बाबा ने चाय बनवाई थी बन गयी है छान के दे दो न, मैं बर्तन धो रही हूँ.

शालू- हाँ अभी छान देती हूँ पर पता नहीं अब पिएंगे भी की नहीं?

गुंजन- अरे खुद hi तो बोले थे बनाने को पिएंगे की नहीं,

शालू- आ दिखाती हूँ क्यों नहीं पिएंगे.

शालू गुंजन को बाजू से पकड़ कर रसोई के बाहर की और लाकर आंगन की और इशारा करती है, गुंजन सामने देखती है और मुस्कुराने लगती है,

गुंजन- अब तो मुश्किल hi पिएंगे, तुम hi पि लो जीजी अब नहीं तो ठंडी हो जाएगी,

गुंजन सामने देखते हुए हुए कहती है जहाँ आँगन में पड़ी खाट पर कर्मा के नाना बिलकुल नंगे पेअर लटकाये लेते हैं और उनके ऊपर कर्मा की प्यारी रज्जो चची पूरी नंगी होकर उनका लुंड अपनी छूट में लिए हुए उछाल रही हैं.





कुछ पल दोनों इस अद्भुत नज़ारे को देखते हैं फिर अपने काम पर लग जाते हैं.

रज्जो- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हॉँण्णन अह्हह्ह्ह्ह चच्चा आह्हः,

रज्जो उछालते हुए आहें भर्ती है,

नाना- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बितीयआह्ह्ह्ह अह्हह्ह्ह्ह बहुतत्त मस्त्त्त बडंण है तेराअहहह आह्ह्ह्ह क्या छूट पाई है तूने,

रज्जो- अह्हह्ह्ह्ह चचहहहःजीईई बड़ीई इच्छ्हा थी मेरिइइइइइ अह्ह्ह्ह अपनी बाप से छुड़वाने कीई अह्ह्ह पर वो तो नाहीई रही अह्हह्ह्ह्ह पर तुमसे छुड़वा कर यही लगता है अपनी बाप से छुड़वा रही हुन्न्न्नन्नन्न...

नाना- अह्हह्ह्ह्ह बितीयआह्ह्ह्ह तुह्ह्ह ममताहहह मँजूह गुंजन हमारी बेटियां hi तो होऊ, अह्हह्ह्ह्ह हमारे लुंड के पैदाइश नहीं तो क्या हुआहहह तुम सब कोह्ह्ह्ह छोटी और बड़ी जितना hi लाआहहहहड्द करते हैं हम्म्म्म...

रज्जो- अह्हह्ह्ह्ह चचहहहःजीईई तुमहारी बितीयआह्ह्ह्ह बनकर अह्ह्ह्ह बड़ीई खुषीयी हो रही हीी.

नाना- अह्हह्ह्ह्ह मैंन तो कहूंगाःह चुहठ भी मुझे चाचा नाहीइ अह्ह्ह बबआ hi कहा कर,

रज्जो ये सुनकर खुश भी हुई और भावुक भी और नाना की और देख बोली- ओह्ह्ह्हह्ह babaaaahhhhhhhhhhhhhhh छोड़ो और तेज़्ज़ज़ अपनीइ रज्जो बितीयआह्ह्ह्ह को,

नाना ये सुनकर रज्जो को ऊपर से उठा कर नीचे लिटाते हैं और खुद ऊपर आ कर दनादन धक्के लगाने लगते हैं.

दोनों hi चुदाई के आनंद में आहें भरते हुए एक दुसरे का उत्साह बढ़ाते हैं और फिर

जल्दी hi दोनों अपने अपने चरम पर एक साथ पहुँच कर झाड़ जाते हैं, झड़ने के बाद नाना को याद आता है की उन्होंने चाय मंगवाई थी तो गुंजन को आवाज़ देते हैं,

नाना- अरे बहु हमारी चाय बनाई का?

इतने में शालू निकल कर आती है और कहती है- बनाई थी बाबा पर तुम रज्जो जीजी के साथ प्यार के पल बिता रहे थे इसलिए नहीं दी.

ये सुन रज्जो भी मुस्कुराने लगती है,

नाना- तो अब दे दे.

शालू- नहीं अब नहीं मिलेगी, अब खाना खाओ सीधा चाय पियोगे तो भूख मर जाएगी,

रज्जो- हाँ बाबा सही कह रही है शालू,

रज्जो ने अपने कपडे पहनते हुए कहा,

शालू- और जीजी तुम कहाँ कपडे पहनने लगी, उतारो और तुम भी बैठो अपने बाबा के साथ खाने,

रज्जो- अरे घर जाना है शालू काम पड़ा होगा सारा,

गुंजन- कुछ नहीं पड़ा होगा जीजी, नीतू और लाडो हैं तो और नहीं होगा तो मैं करवा दूंगी जा कर तुम खाने बैठो.

नाना- अरे ये ाचा रहेगा आजा रज्जो साथ में खाते हैं,

रज्जो ने भी ज़्यादा ज़िद्द नहीं की और नंगी hi नाना के साथ बैठ गयी, और दोनों को शालू और गुंजन ने खाना खिलाया, वो खाना खा कर उठ hi पाए थे की बाकी लोग भी यानी सागर, जमुना और राजन पल्ली भी आ गए.

रज्जो को नंगा देख कर सबके मन में अरमान ज़रूर जगे पर शालू और गुंजन ने सबको पहले खाने के लिए बैठा दिया,

रज्जो ने इतने में कपडे पहन लिए और बोली- बाबा अब तुम मेरे साथ चलो, आज रात मेरे घर रहोगे.

नाना- अरे बिटिया ये भी तो तेरा hi घर है.

रज्जो- वो मुझे नहीं पता तुम एक बार भी नहीं गए अभी तक अब चलो,

नाना- अच्छा ठीक है.

शालू- जाओ बाबा रज्जो जीजी से भी सेवा करवाओ थोड़ी.

रज्जो- और क्या तभी तो ले जा रही हूँ.

रज्जो नाना को लेकर चली गयी, बाकी सब ने खाना खाया, शालू पल्ली और गुंजन तीनो ने मिलकर सारा कान निपटा लिया,

शालू- जीजा, बाबा तो रज्जो जीजी के यहाँ गए तो कौन कैसे सोयेगा.

शालू ने अपने पल्लू से हाथ पोंछते हुए कहा.

राजन- एक आदमी का तो बैग में सोना ज़रूरी है तो हम बाग़ में सो जायेंगे,

शालू- अकेले hi?

राजन- हाँ अकेले क्या दिक्कत है?

शालू- तुम्हे कोई दिक्कत नहीं है इसे तो होगी,

शालू ने हाथ बढाकर लुंगी के ऊपर से hi उनका लुंड मसलते हुए कहा,

राजन- हाँ इसे तो दिक्कत होती hi है हमेशा.

राजन ने भी हाथ बढाकर शालू की भरी चुकी को ब्लाउज के ऊपर से hi मसल दिया,

शालू- मैं चल लेती हूँ न साथ,

राजन- तू क्या करेगी वहां?

शालू- मैं क्या करुँगी, दोनों करेंगे, खुले में छोड़ना अपनी साली को,

इधर सब की बातें चल hi रही थी की दरवाज़े पर खटखटाने की आवाज़ आई तो सागर ने जाकर खोला तो सामने मंजू और प्रेमा थी,

सागर- आओ बुआ आओ भाभी.

सागर ने दोनों को अंदर लेते हुए कहा,

मंजू और प्रेमा आँगन में आ गए.

शालू- अरे जीजी आओ बैठो, खाना लगाऊं.

मंजू- अरे खाना वगेरा सब निपटा कर आई हूँ, तुम लोगो ने खा लिया?

गुंजन- हाँ जीजी खा लिए सारा कान निपटा लिया,

प्रेमा- नाना नहीं दिख रहे?

शालू- वो तो रज्जो जीजी लिवा गयी उन्हें रात के लिए अपने साथ,

मंजू- कल मैं ले जाउंगी, अब बोलेन वो बिटिया अरे वो.

इस पर सब हंसने लगे,

राजन- अरे तुम्हारे सामने कौन बोल सकता है भाभी. तुम्हारे आगे तो भैया नहीं बोलते.

मंजू- तुम तो बोल रहे हो देवर जी,

राजन- देवर भाभी के सामने hi बोल सकता है,

मंजू- ाचा अब सुनो, ऐ गुंजन तू पल्ली को लेकर घर चली जा, तेरे जीजा बड़ा बोल रहे हैं की सलहज से नहीं मिले,

गुंजन- ठीक है जीजी चली जाती हूँ, जीजा की सेवा भी कर दूंगी,

मंजू- क्यों जमुना भेज दूँ तेरी लुगाई को, याद तो नहीं आएगी तुझे रात में,

जमुना- अरे जीजी तुम्हारे होते हुए किसी और की याद क्यों आएगी.

मंजू- चल फिर देर न करो पल्ली जा बीटा मामी को लेजा अपनी.

पल्ली- ठीक है तै, चलो मामी,

गुंजन- हाँ चल बिटिया.

पल्ली और मामी निकल जाते हैं,

राजन- चलो फिर हम भी चलते हैं,

मंजू- तुम कहाँ चले देवर जी,

राजन- अरे भाभी वो बाग़ में सोयेंगे सामान खुला पड़ा है न इसलिए,

शालू- हाँ जीजी मैं भी जा रही थी जीजा के साथ hi कहीं अकेले न पद जाएँ इसलिए.

मंजू- ाचा ाचा, वैसे तो तुम लोग रुकते तो मज़ा आता पर कोई नहीं जाना भी ज़रूरी है.

शालू- मज़े के लिए जमुना और सागर है न जीजी खूब देगा तुम्हे,

राजन- प्रेमा को तो मिलने भी लगे,

राजन ने एक और इशारा करके कहा तो सबने देखा तो पाया की सागर ने प्रेमा का ब्लाउज खोल लिए है और उसकी चूचियों को पि रहा है,

शालू- चलो हम लोग भी चलते हैं.

राजन- हाँ.

कुछ hi पलों में शालू और राजन भी निकल गए, इधर सागर ने प्रेमा को तब तक पूरा नंगा कर दिया था और खुद भी अपने कपडे उतारने लगा, जमुना ने प्रेमा के नंगे बदन को देखा तो उसे अपनी और खींच बाहों में भर लिया, वहीँ सागर खुद नंगा हुआ और फिर अपनी मंजू बुआ के होंठों पर टूट पड़ा, मंजू भी सागर का पूरा साथ देने लगी, सागर मंजू के होंठों को चूसते हुए उनके कपडे उतरने लगा और जल्दी hi मंजू भी बाकी सब की तरह पूरी नंगी हो चुकी थी, सागर ने होठों को चूसने के बाद अपना ध्यान मंजू की मोती चूचियों पर लगाया और उसे चूसने लगा,

मंजू- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बच्चाः ऐसी हीई खा जाए बुआ की छुछियां अह्हह्ह्ह्ह,

सागर भी वही कर रहा था, दूसरी और जमुना भी प्रेमा के होंठों को चूसते हुए उसकी चूचियों को मीनजह रहा था, प्रेमा अपने रास से भरे होंठों का स्वाद जमुना को बड़ी लगन से दे रही थी, जल्दी hi दोनों के होंठ अलग हुए तो जमुना ने प्रेमा की चुकी को मुँह में भर लिया और पागलों की तरह चूसने लगा,

प्रेमा- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह मामाहः ुहम्म्म्म

प्रेमा जमुना का सर अपनी चूचियों में दबाते हुए आहें भरने लगी, उसने आँगन में दूसरी और देखा तो पाया उसकी सास अपने घुटनों पर बैठी है और उनके सामने सागर खड़ा है और उसकी सास का मुँह छोड़ रहा है,





सागर- अह्हह्ह्ह्ह सआईईईई रनडीईई बुहाहह क्या गरम मुँह है तेराअहहह ahhhhhhhhhh,

सागर मंजू का मुँह छोड़ते हुए बड़बड़ाया.

जमुना- ऐ, ऐसे बात करते हैं बुआ से,

जमुना ने अपने बेटे को हड़काते हुए कहा साथ hi प्रेमा को बिस्तर पकड़ कर झुका दिया और खुद उसके पीछे आकर उसके चूतड़ों को मसलने लगा, और फिर चूतड़ों को फैलाकर खुद घुटनों पर बैठ कर अपना मुँह प्रेमा में चूतड़ों के बीच घुसा दिया और उसकी छूट और गांड चाटने लगा,

सागर- ठीक है पापा, वो थोड़ा बहक गया था, माफ़ कार्डो बुहाहह,

मंजू ने ये सुनकर उसका लुंड मुँह से निकला और बोली- ऐ जमुना, मेरे लल्ला को क्यों डांटा अपनी बुआ के साथ hi तो कर रहा है, और चुदाई के वक़्त वो गाली दे सकता है मुझे मज़ा आता है,

ये कहकर मंजू ने दोबारा सागर का लुंड मुँह में भर लिया,

जमुना- ठीक है जीजी पर देखना तुम्हारे लाड में ये बिगड़ न जाये,

जमुना ने बापिस अपना मुँह प्रेमा के चूतड़ों में घुसाते हुए कहा,

सागर- अरे पापा मुझे पता है कब क्या बोलना है.

प्रेमा- और काहहह सागर भैया समझदार हैं अह्ह्ह्हह्हह मामाहः ऐसी hi,

प्रेमा ने अपनी गांड में जमुना की जीभ घुसते हुए महसूस कर सिसकते हुए कहा..

इधर सागर ने भी अपने लुंड को मंजू के मुँह से निकला और उसे भी झुका कर उसकी छूट चाटने लगा,

मंजू- अह्ह्ह्ह लल्लाहहहह अह्हह्ह्ह्ह माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आए रहा है ऐसी hi घुमा जीभ.

जहाँ सागर छूट चाट रहा था उसके पापा तो आगे बढ़ चुके थे टी

उन्होंने प्रेमा की गांड पहले तो खूब अचे से छाती और फिर उसे बिस्तर के किनारे लिटाकर अपना लुंड उसकी गांड में घुसा दिया और धीमे धीमे लुंड अंदर बाहर करने लगे,





प्रेमा भी अपनी गांड मरवाते हुए आहें भरने लगी थी.

प्रेमा- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह मामाहः ऐसी hi ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह पूरा घुसादो अब,

जमुना- अह्हह्ह्ह्ह बहूऊऊह्ह्ह अह्ह्ह्हह बड़ीईई मस्त्त गांड हीी टेरिइइइइइ अह्हह्ह्ह्ह इतनी कस्यी हुई और गरमममम. आह्हः लिए पुराहहह

ये कह जमुना ने अपना पूरा लुंड जड़ तक प्रेमा की गांड में घुसा दिया, और प्रेमा और वो दोनों मज़े से आहें भरने लगे.

जमुना ने प्रेमा की गांड मारते हुए अपने बेटे की और देखा अब वो भी चुदाई के खेल में आगे बढ़ चूका था और अभी मंजू को पीछे रसोई की स्लिप से टिका कर खड़े खड़े hi उसकी एक तंग को कंधे पर रख कर दनादन उसको छोड़ रहा था,





मंजू भी जवान लुंड से छुड़वाते हुए खूब तेजी से आहें भर रही थी और सागर को चुदाई के लिए और उकसा रही थी.

मंजू- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बच्चाः ऐसी hi ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह ऑर्डर तेजज छूवोड्ढड्ड अपनीईईई चुड़क्कड़ buaaaaahhhhhhhhhh को.

सागर- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हॉँण्णन बुआहहहहह लिए सआईईईई..

प्रेमा- अह्हह्ह्ह्ह मामाहः देखूहहह कैसी तुम्हारा बेटाःह्ह्ह मेरिइइइ चुड़क्कड़ रनडीईई सास को छोड़ रहा है अह्हह्ह्ह्ह.

जमुना- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह हॉँण्णन बहूऊऊह्ह्ह चू भी तेरी सास की तरह पूरी रैंड हैई,

जमुना ने प्रेमा की गांड में धक्के लगाते हुए कहा,

इधर मंजू को उस आसान में तकलीफ होने लगी तो उसने सागर को बदलने को कहा, तो सागर उसे अपने पापा और प्रेमा के पास ले आया और दोनों बाप बेटे ने मिलकर सास बहु को एक दुसरे के ऊपर 69 के आसान में लिटा दिया और खुद एक एक छोर पर आकर अपना अपना लुंड दोनों की गांड में पिरो दिया वही सास बहु एक दुसरे की छूट पर अपनी जीभ फिरने लगी, मंजू की गांड में जमुना का लुंड था और प्रेमा की गांड में सागर का,

दोनों की गांड मारते हुए बाप बेटे ने एक दुसरे की और देखा और मुस्कुरा पड़े दोनों hi जानते थे की रात अभी लम्बी चलने वाली है,

इधर बाग़ में इस समय राजन और शालू इस समय बिस्तर पर तो नहीं थे बल्कि खुले आस्मां के नीचे ठंडी हवा ने उनकी उत्तेजना को और भड़का दिया था और अभी उसी उत्तेजना वस् शालू पूरी नंगी होकर एक पेड़ के सहारे कड़ी हुई थी और उसके पीछे राजन भी पूरे नंगे थे और शालू की छूट में अपना लुंड पिरो रहे थे,





शालू- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह जीजा आह्हः ऐसी खुले में बड़ा मज़ा आ अह्ह्ह्ह रहा ही.

राजन- खुले में चुड़ाईयाहज काहहह माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह hi अलग हीी रानी ुहममम.

राजन शालू के होंठों को चूमते हुए बोले साथ hi उनका लुंड शालू की गरम छूट में लगातार अंदर बहार हो रहा था, शालू की मोती छुछियां हर झटके पर झूल रही थी...

जारी रहेगी.
 
शालू- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह जीजा आह्हः ऐसी खुले में बड़ा मज़ा आ अह्ह्ह्ह रहा ही.

राजन- खुले में चुड़ाईयाहज काहहह माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह hi अलग हीी रानी ुहममम.

राजन शालू के होंठों को चूमते हुए बोले साथ hi उनका लुंड शालू की गरम छूट में लगातार अंदर बहार हो रहा था, शालू की मोती छुछियां हर झटके पर झूल रही थी.



अपडेट 237
चोदामपुर

पल्ली गुंजन को लेकर जल्दी hi जग्गू के घर पहुंची और दरवाज़ा खटखटाया तो जग्गू ने खोला,

पल्ली- लो भैया तुम्हारे लिए पार्सल आया है,

जग्गू- चल अंदर आ पार्सल वाली मेम.

जग्गू ने उसे और गुंजन को हँसते हुए अंदर किया और दरवाज़ा बंद कर दिया.

गुंजन- जीजा कहाँ है जग्गू, वो hi तड़प रहे थे मिलने को अपनी सलहज से,

जग्गू- कमरे में हैं मामी जाओ मिल लो,

गुंजन- क्यों तुम नहीं मिलोगे मामी से जग्गू?

जग्गू- मिलेंगे मामी पर आज की रात पापा के साथ कोई और भी मिलने को तैयार बैठा है तुमसे.

गुंजन- अरे ऐसा कौन है?

पल्ली- हाँ भैया कौन है?

जग्गू- तू मेरे साथ चल तुझे सब बता दूंगा,

पल्ली- चलो कहाँ मेरी अभी 5 दिन no एंट्री है,

पल्ली ने अपनी छूट की और इशारा करके कहा,

जग्गू- अरे पता है बाबा, तभी बोल रहा हूँ सरजू के यहाँ चलते हैं तेरा जितना मन हो उतना कार्यो नहीं तो सो जइयो.

पल्ली- हाँ ये ठीक रहेगा,

जग्गू- मामी दरवाज़ा लगा लो हम जाते हैं.

गुंजन- अरे तुम दोनों सही हो मुझे छोड़ कर जा रहे हैं.

पल्ली- ाचा है न छोड़ कर जा रहे हैं तभी तो ताऊजी छोड़ पाएंगे,

गुंजन- धत्त बदमाश कैसे बोलती है.

जग्गू और पल्ली के जाने के बाद गुंजन ने दरवाज़ा बंद kia,aur अंदर कमरे की और चली तो उसे थोड़ी हिचकिचाहट हो रही थी क्यूंकि अब तक राजपाल से उसकी कोई ऐसी बात चीत नहीं हुई थी आज से पहले और फिर आज ये सब उसे समझ नहीं आ रहा था कैसे क्या होगा कैसे सामने जाए, और उनके साथ भी कोई है.

फिर उसने खुद को समझाया की तू भी क्या फालतू की बात सोचती है गुंजन अपने भांजे से बेटे से यहाँ तक की ससुर से चुद चुकी है और अब शर्मा रही है, ये सोच कर गुंजन ने कुछ सोचा और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी,

कमरे के अंदर राजपाल के साथ और कोई नहीं बल्कि रज्जो चची के पति दीं दयाल थे, दोनों ने योजना बनाई थी की आज मिलकर सलहज के मज़े लूटेंगे,

दीनू- अरे दरवाज़ा तो बजा था पर कोई आया नहीं भैया.

दीनू ने बेसब्री से कहा.

राजपाल- अरे आ जाएगी तू भी न बहुत बेसब्र है.

दीनू- अरे भैया, गुंजन चीज़ hi ऐसी है सबर नहीं होता,

इतने में hi दरवाज़ा खुला और दोनों की नज़र सामने गयी,

राजपाल- लो आगा..

राजपाल इतना बोलते बोलते रुक गए क्यूंकि सामने का नज़ारा देख दोनों की आँखें जैम गयी क्यूंकि सामने का नज़ारा hi कुछ ऐसा था, सम्मे गुंजन पूरी नंगी होकर कड़ी थी और उनकी और कामुकता से देखते हुए अपनी छूट मसल रही थी.





गुंजन- क्या बातें कर रहे हो जीजा,

गुंजन भोलेपन से अपनी छूट खुजाते हुए बोली,

राजपाल और दीनू की तो आँखें hi फटी की फटी रह गयी थी गुंजन का गदराया बदन नंगा देख कर उसकी बड़ी बड़ी चूचियां, गदराया मांसल सपाट पेट और फिर रास बहाती छूट, मोती जांघें, गुंजन औरत नहीं काम की मूरत लग रही थी,

कुछ पल लगे दोनों को hi सँभालने में फिर राजपाल बोले - अरे सलहज तुम्हारा hi इंतज़ार हो रहा था आओ आओ.

गुंजन ये सुन मुस्कुरा कर अंदर आयी वहीँ दीनू से तो रुका नहीं गया और उठकर गुंजन को बाहों में भर लिया और उसके होंठों को चूसने लगे, गुंजन भी तुरंत पूरा साथ देने लगी,

राजपाल- अरे रुक जा साड़ी मलाई तू अकेले hi खायेगा क्या,

जिस पर हँसते हुए दीनू ने गुंजन के होंठों को छोड़ा और बोले- अरे भैया बहुत मलाई है हम दोनों के लिए, सलहज का पूरा बदन hi मलाईदार है,

गुंजन- जीजा तुमने अपने खाने का hi सोचा है या मुझे भी कुछ खिलाओगे,

गुंजन ने दोनों की धोती के ऊपर से उनके लौडों को सहलाते हुए पूछा,

राजपाल- अरे गुंजन तुम्हारे लिए केले हैं मोठे मोठे खाओगी न?

गुंजन- ज़रूर खाउंगी पर पहले दिखाओ तो कैसे हैं.

गुंजन की बात सुनकर दोनों ने अपनी अपनी धोती उतर दी और अपने खड़े लुंड गुंजन के आगे कर दिए जिन्हे सहलाते हुए गुंजन नीचे बैठ गयी और दोनों के लुंड को हाथ में लेते हुए बड़ी कामुकता से एक एक करके मुँह में भरके चूसने लगी





राजपाल और दीनू दोनों के मुँह से hi अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म अह्हह्ह्ह्ह की आहें निकलने लगी जिससे पता चल रहा था की दोनों को कितना मज़ा आ रहा है.

दीनू- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह गुंजन अह्ह्ह्हह्हह क्या सलहज अह्हह्ह्ह्ह क्या गरम मुँह है,

राजपाल- अह्हह्ह्ह्ह सच में सलहज तो पूरी राबड़ी है,

दीनू- फिर क्या आज पूरी रात राबड़ी खाएंगे स्वाद ले केकर.

राजपाल- गुंजन एक मिनट अपना ये गरम मुँह तो छोड़ने दो,

गुंजन राजपाल के कहे अनुसार मुँह खोलकर रुक गयी तो राजपाल उसके मुँह में लुंड घुसा कर गले तक धक्के लगाने लगे. ऐसा hi फिर दीनू ने किआ, गुंजन के गले से गुकक्क गुक्क्क्क की आवाज़ें दोनों को और उत्तेजित कर रही थी, राजपाल और दीनू दोनों hi गुंजन के कामुक चेहरे की और देख रहे थे गुंजन भी अपना मुँह छुड़वाते हुए दोनों की और देखते हुए सोच रही थी की आज ये दोनों पूरी रात अचे से मेरे बदन का स्वाद लेने वाले हैं.

और हुआ भी कुछ ऐसा hi, रात भर hi दोनों छेड़ और आसान बदल बदल कर गुंजन को छोड़ते रहे.

कबब्ज गुंजन की छूट में राजपाल का लुंड होता तो मुँह में दीनू का,





तो कभी गांड में राजपाल का और छूट में दीनू का और दोनों मिलकर उसकी दोहरी चुदाई करते और गुंजन आहें भर्ती रहती



तो कभी गांड में दीनू का लुंड होता और छूट में राजपाल का, बस एक चीज़ थी की गुंजन के बदन में दो लुंड लगातार अंदर बहार हो रहे थे





कभी दीनू ने अपना रास गुंजन की गांड में भरा तो राजपाल ने उसके मुँह में



इसी तरह चुदाई करते हुए तीनो की पूरी रात गुज़री, तीनो hi आपस में अचे से परिचित हो गए थे साथ hi दीनू और राजपाल के लुंड भी गुंजन के छेदों से, इसी तरह चुदाई करते करते तीनो सो गए.

जग्गू और पल्ली जब रज्जो के यहाँ पहुंचे तो लाडो ने दरवाज़ा खोला और दरवाज़ा खोलते hi जैसे hi जग्गू अंदर आया वो तुरंत नीचे बैठ कर जग्गू का लुंड निकल कर चूसने लगी. पल्ली उसकी उत्सुकता देख हंसने लगी और उसने दरवाज़ा बंद किआ,

पल्ली- क्यों लाडो ज़्यादा hi भूखी है तू,

पल्ली ने अंदर की और बढ़ाते हुए

लाडो ने उसका कोई जवाब नहीं दिया बल्कि लुंड चूसने में लगी रही जग्गू भी उसके सर पर हाथ लगा कर उसका मुँह छोड़ने लगा,

पल्ली ने कमरे के अंदर जाकर देखा तो खुश हो गयी अंदर का प्रोग्राम देख कर,

अंदर एक बिस्तर पर माँ बेटों का प्यार दिखाई दे रहा था जहाँ पर सरजू और बिरजू दोनों मिलकर अपनी माँ यानि रज्जो की दोहरी चुदाई कर रहे थे. सरजू का लुंड अपनी माँ की छूट में था तो बिरजू अपनी माँ की गांड मार रहा था,





रज्जो भी आहें भर्ती हुई अपने दोनों बेटों को उकसा रही थी और दोनों भी उत्तेजित होते हुए अपनी माँ को ले बनाकर छोड़ रहे थे,

दूसरी और पल्ली ने देखा की कर्मा के नाना यानि बलराज सिंह जवान नीतू का बदन पाकर बड़े खुश थे और अभी उसकी टांगों के बीच बैठकर उसकी कासी हुई गांड में लुंड पिरो रहे थे,





नीतू भी पहली बार इतने उम्र दर्ज आदमी से चुद रही थी और उनकी छोड़ने की छमता देख हैरान भी हो रही थी, साथ hi उत्तेजित होते हुए नाना से गांड मरवाते हुए अपनी छूट को रगड़ रही थी,

नीतू- अह्हह्ह्ह्ह नाना बहुत माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आ रहा है.

नाना- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह हम तो तेरी गांड मारकर धन्य हो गए अह्हह्ह्ह्ह कितनी कासी हुई और गरम गांड है तेरी,

इतने में hi पल्ली आगे बढाती है और नीतू के ऊपर झुक कर उसकी चुकी को मुँह में भर लेतीई है,

नीतू- अह्हह्ह्ह्ह पल्ली मेरी गुड़िया अह्ह्ह्हह्हह.

नीतू ये कहकर पल्ली का चेहरा अपनी चूचियों से हटाकर अपने चेहरे के पास लाती है और उसके होंठों को चूसने लगती है, पल्लवी भी उसका पूरा साथ देने लगती है, नाना हाथ आगे बढ़ा कर नीतू की चूचियों को मसलते हुए उसकी गांड मरने लगते हैं, इतने में hi पीछे से लाडो की आहों की आवाज़ आती है तो नाना और बाकि सब गर्दन घुमा के देखते हैं तो पाते हैं जग्गू लाडो को अपने लुंड पर टाँगे हुए उछलता हुआ अंदर ले आया है, लाडो उसका लुंड छूट में लेकर अपनी बाहें उसके गले में दाल कर उछाल रही है.





पल्ली- लो इसने बिना चूड़े जग्गू भैया को अंदर तक नहीं आने दिया,

लाडो- अह्हह्ह्ह्ह कुटिया तू नहीं समझेगी इतनी खुजली हो रही थी छूट में अह्ह्ह्ह

पल्ली- जंतु hi तेरी छूट में कितनी आग लगी रहती है,

पल्ली ने उठ कर उसके पास जाते हुए कहा इतने में जग्गू भी बिस्तर पर बैठ गया और लाडो उसके ऊपर कूदने लगी और पल्ली भी दोनों के पास आई और दोनों की टांगो के बीच बैठ गयी और अपना मुँह आगे कर लाडो की गांड चाटने लगी,

लाडो दोहरे मज़े से सिसकने लगी, इसी तरह चुदाई का खेल काफी देर तक चला नाना ने रज्जो और उसकी दोनों बेटियों के हर छेड़ का स्वाद चखा तो सरजू बिरजू ने भी अपनी माँ और बहनों को बदल बदल कर छोड़ा, पल्ली चुद तो नहीं सकती थी पर उसने लुंड चूस कर और छूट और गांड चाटकर सबका पूरा साथ दिया और फिर सब एक साथ थक कर सो गए.



विनीत के यहाँ

(कर्मा की ज़ुबानी)

माँ और बुआ को रात में देर तक छोड़ने के बाद मैं थोड़ा देर से hi उठा या कहो की पूर्वी दीदी ने उठाया,

पूर्वी- अरे उठजा कर्मा और कितना सोयेगा, चल बहुत काम पड़ा है फिर निकलना भी है,

में- हाँ दीदी उठ रहा हूँ, इधर आओ,

मैं आँख मलते उठा और फिर उन्हें अपनी बाहों में खींच लिए और उनके होंठों को चूसने के लिए मुँह आगे बढ़ाया तो उन्होंने मेरा मुँह हाथ से पीछे की और धकेल दिया और बोली- छही बासी मुँह से मैं नहीं करने वाली कुछ जा पहले कुल्ला कर जा के नाहा धो कर तैयार हो. अनुज से सीख कुछ सुबह hi उठकर तैयार होकर निकल भी गया,

में- कहाँ के लिए निकल गया?

पूर्वी- कायमगंज गया है तेरे जीजा कहीं काम में फंस गए हैं बहार hi तो सीधा सरलपुर hi आएंगे वो तो मेरी ननद को लेने गया है वो हमारे साथ चल लेगी.

में- चलो कुछ काम तो कर रहा है,

पूर्वी- अरे बहुत काम करता है मेरा अनुज बुराई मत कर उसकी, और जा अब तैयार हो जा.

मैं हँसते हुए उठा और बाथरूम मैं घुस गया, और शौच आदि निपटा कर नाहा धो कर बाहर निकला, घर में काफी चहल पहल थी, कोई कुछ ढूंढ रहा था तो कोई कुछ कर रहा था, एक जगह औरतों की बहस चल रही थी.

शशि- अरे भाभी ये सही नहीं है,

माँ- सही नहीं का, अब वहां सब औरतों की क्या ज़रुरत है, पक्की करने में. तुम बच्चों को लेकर चली जाओ.

सावित्री- और का, मैं भी यही कह रही हूँ, साड़ी औरतों का वहां क्या काम, ऊपर से घर भी नहीं छोड़ सकते,

पहुपज्ज- अरे तुम लोग भी न हर बात पर बहस करने लगते हो,

में- अरे किरण चाय तो पीलादे ये बहस लम्बी चलने वाली है,

किरण मेरे लिए चाय लेने चली गयी.

पापा- किस बात की बहस हो रही है,

पापा भी पास में आते हुए बोले,

तो बुआ ने उन्हें पूरी बात बताई,

पापा- ये भाई तुम औरतें hi जानो हम नहीं पड़ेंगे इसके बीच,

पूर्वी- अरे तै सबसे बड़ी हैं तै hi फैसला करेंगी,

सावित्री- हम तो बोल रहे हैं हम रुक जाते हैं, सभ्य बहु भी बोल रही है तो वो और हम घर में रहते हैं.

शशि- ठीक है, ममता भाभी तुम तो चलोगी,

ममता- हाँ बिलकुल चलूंगी मैं इन दोनों की तरह बुढ़िया थोड़े hi हुई हूँ,

इस पर सब हंसने लगे वहीँ माँ ने ममता चची को गाली दी- कुटिया कहीं की.

फूफाजी- चलो कौन कौन जायेगा ये तो तय हो गया अब तैयारियां करलो,

शशि- अरे सुनो तयारी से याद आया एक दो सारी और लेनी थी,

फूफाजी- अरे यार जब सामान लेने गए थे तो बोलै था मैंने एक साथ ले लो तब क्यों नहीं ली,

शशि- तब ध्यान नहीं रहा,

मौसा- अरे रस्ते में कोई क़स्बा वगेरा पड़ेगा तो वहां से ले लेंगे क्या परेशानी है,

बड़े फूफाजी- हाँ भाई बाकी सब तैयारियां karo,aur पूर्वी अनुज से फ़ोन करके पूछ कहाँ पहुंचा वो.

(लेखक की ज़ुबानी)

पूर्वी- जी ताऊजी पूछती हूँ अभी,

पूर्वी अनुज को फ़ोन लगाती hai,idhar अनुज मोटरसाइकिल रोक कर फ़ोन उठता है

अनुज- हाँ दीदी?

पूर्वी- कहाँ पहुंचा तू?

अनुज- कायमगंज hi पहुँच गया हूँ दीदी बस बताये हुए पते पर जा रहा हूँ.

पूर्वी- ठीक है जब निकले तो फ़ोन कर दियो.

अनुज- ठीक है.

अनुज जल्दी hi पूछता पछता हुआ पूर्वी की ससुराल के सामने पहुँच जाता है, मोटरसाइकिल को एक और कड़ी करता है

अनुज दरवाज़ा खटताता है तो कुछ hi पल बाद प्रीती दरवाज़ा खोलती है, अनुज उसके सुन्दर चेहरे को देख कर पल भर के लिए खो सा जाता है, वैसे तो पूर्वी की शादी में दोनों मिले थे पर तब दोनों hi बच्चे थे और अब तक एक दुसरे की शकल भी भूल चुके थे,

प्रीती सामने खड़े अनजान लड़के को देखती है और उसे खुद को घूरता हुआ पाकर थोड़ा अकड़ के बोलती है- ऐ कौन हो तुम क्या चाहिए?

अनुज- वो जी आप चाहिए.

प्रीती- क्या?

प्रीती गुस्सा होते हुए कहती है तो अनुज को समझ आता है उसने क्या बोल दिया तो वो बात को सँभालते हुए बोलता है- जी वो मैं अनुज हूँ, पूर्वी दीदी ने भेजा है आपको लाने के लिए.

उसकी बात सुनकर प्रीती को समझ आता है तो उसका गुस्सा तुरंत उतर जाता है- ाचा तुम अनुज हो, सॉरी मैंने गलत समझ लिया आओ अंदर आओ,

प्रीती दरवाज़ा बंद कर अनुज को अंदर हॉल लाती है और सोफे पर बैठती है.

इतने में अंदर से रेनू अपने बालो को बांधती हुई आती है- अरे कौन है बीटा?

प्रीती- वो भाभी के यहाँ से मुझे लेने अनुज,

अनुज भी तुरंत उठ कर रेनू के पाऊँ छोटा है,

रेनू भी उसके सर पर हाथ फिरते हुए बैठने को कहती है- अरे बैठो बीटा खुश रहो, लगता है जल्दी निकल गए सुबह.

अनुज- हाँ बुआ, वो फिर जाना भी है न इसलिए,

रेनू- सही किआ बीटा ठन्डे ठन्डे में आ गए, प्रीती तू जा तब तक तैयार हो जा मैं चाय वगेरा बना देती हूँ.

प्रीती- ठीक है मम्मी, लो पानी पि लो,

प्रीती अनुज को पानी का गिलास पकड़ा कर चली जाती है अनुज भी उसे जाते हुए एक बार पलट कर देखता है और फिर रेनू की और देख कर कहता है,

अनुज- बुआजी भाई पीकर hi आया था. रहने दीजिये.

रेनू- अरे ऐसे कैसे रहने दूँ, इतने सालों बाद तो तू आया है ऊपर से चाय नाश्ता भी नहीं करेगा तो मैं गुस्सा हो जाउंगी.

अनुज- नहीं ंशी बुआ गुस्सा मत हो फिर मैं चाय पि लूंगा,

अनुज ने हँसते हुए कहा तो वो भी हंसने लगी, और रसोई की और बढ़ गयी,

रेनू- मम्मी पापा कैसे हैं बीटा?

अनुज- सब अचे हैं बुआ जी.

रेनू- अरे बहुत समय हो गया सबको देखे, ब्याह में hi देखा था,

रेनू ने रसोई से hi बात करत्ते हुए पूछा,

अनुज- तो अभी चलो न बुआजी सबसे मिल भी लेना,

अनुज भी सोफे से उठा और रसोई के सामने hi कुर्सी लेकर बैठ गया,

रेनू- अरे ये सही किआ तूने यहाँ बैठ गया, और चलने की क्या बताऊँ बीटा, मैं चलने वाली थी पर आखिरी मौके पर तेरे फूफाजी के जीजा की तबियत बिगड़ गयी तो उन्हें वहां जाना पड़ा, तेरे जीजा वैसे hi बाहर हैं तो अकेले घर भी नहीं छोड़ सकते,

अनुज- हाँ ये तो है, ऐसे हारी बिमारी में तो जाना ज़रूरी हो जाता है,

रेनू- अरे तुझसे एक बड़ा भी है न क्या नाम है कर्मा,

अनुज- हाँ बुआ कर्मा hi नाम है भैया का,

रेनू- वो तो विनीत की उम्र का hi है अब उसका ब्याह भी करवाना पड़ेगा,

अनुज- हाँ बुआ पहले विनीत भैया का हो जाये फिर उनका ब्बि करा देना,

रेनू- बताओ कितनी जल्दी समय बीतता है, पूर्वी के ब्याह में ये कर्मा विनीत कितने छोटे छोटे लगते थे, और तू भी ज़रा सा था,

अनुज बात करते हुए रेनू के बदन को hi निहार रहा था और जितना उसे नज़र आ रहा था उतना hi पसंद आ रहा था, रेनू की बात सुनके अनुज मन hi मन बोलै- अरे बुआ मुझे भी कहाँ पता था तुम भी इतना सही गदराया माल होगी, अनुज उसके बदन को निहारते हुए सोचने लगा,





अनुज- हाँ बुआजी समय तो जल्दी जल्दी hi निकलता है, इतने में hi प्रीती हाथ में फ़ोन लेकर आती है और कहती है- मम्मी पापा निकल गए हैं दोपहर तक पहुँच जायेंगे तो बोल रहे थे तुम भी जाना चाहो तो जा सकती हो.

रेनू- मैं ऐसे अचानक?

अनुज- अरे बुआ चलो न, और अचानक क्या है जाओ तैयार हो जाओ.

रेनू- अरे बीटा पर ऐसे अचानक कैसे तयारी करूँ?

रेनू हँसते हुए कहती है,

अनुज- अरे चलो नहीं तो मैं बुआ से बात करवाता हूँ उनसे बोल दूंगा की आप आ सकती हो फिर भी नहीं आ रही,

रेनू एक बार प्रीती की और देखती है

प्रीती- चल लो न, वैसे भी जाने तो वाली hi थी न,

रेनू- ाचा ठीक है चलती हूँ, तू तैयार हो गयी?

प्रीती- हाँ यहाँ से क्या तैयार hona,main तो वहां जाकर तैयार होउंगी जब सरलपुर के लिए निकलेंगे, कपडे रखने थे वो रख लिए मैंने,

अनुज- और क्या बुआ तुम भी ऐसे hi चलो,

रेनू- अरे बीटा ऐसे नहीं ाचा नहीं लगता.

प्रीती- हाँ सज धज के समधी को दिखाना है अपने,

प्रीती ने अपनी मम्मी को छेड़ा तो अनुज भी हंसने लगा और रेनू शरमाते हुए प्रीती पर झूठा गुस्सा दिखने लगी ,

रेनू- धत्त बेशरम कहीं की, मैं आती हूँ कपडे बदल कर तू तब तक अनुज को नाश्ता करवा और तू भी कर लिओ

प्रीती- हाँ सब हो जायेगा तुम जाओ अब तैयार हो,

रेनू अंदर चली गयी और प्रीती चाय वगेरा छानने लगी, अनुज बार बार नज़र बचाकर प्रीती को निहार रहा था, उसे खुद भी समझ नहीं आ रहा था क्यों पर जबसे वो यहाँ आया था और जबसे पहली बात उसे देखा था तबसे hi एक अजीब सा आकर्षण उसे प्रीती के लिए हो रहा था,

अपनी उम्र के अनुसार वो कई लड़कियों को छोड़ चूका था, यहाँ तक की औरतों को भी, पर प्रीती को देख जैसी तितलियाँ उसके पेट में गुदगुदी कर रही थी वैसी और किसी के साथ नहीं हुई थी,

अनुज ये सब सोच hi रहा था की प्रीती हाथ में ट्रे लेकर बोली- उधर सोफे पर hi जाओ न नाश्ता कर लेना.

अनुज- जी जी चलो,

प्रीती ने टेबल पर ट्रे रख दी और अनुज के बैठते hi उसके हाथ में चाय का कप पकड़ा दिया, और एक कप खुद लेकर चाय पीने लगी, दोनों के लिए hi थोड़ी असमंजस वाली स्तिथि थी की क्या बात करें, अनुज चाय में देखे जा रहा था सोच रहा था की कहीं प्रीती उसे अपनी और घूरते हुए न पकड़ ले,

प्रीती ने भी अनुज को चुपचाप चाय पीते देखा तो बोली- अरे कुछ खाओ न तुम तो बस चाय पिए जा रहे हो. हेहेहे.

अनुज- हं हाँ हाँ लेता हूँ,

अनुज ने नमकीन उठाई और मुँह में भरते हुए बोलै

अनुज- आप भी लो न,

प्रीती- हाँ हाँ वैसे तुम कौन सी क्लास में हो,

अनुज- अन्तर में और आ मतलब तुम?

अनुज भी थोड़ा सा झिझक खोलते हुए बोलै,

प्रीती- मैं भी, कौनसी स्ट्रीम?

अनुज- आर्ट्स और तुम्हारी?

प्रीती- साइंस.

अनुज- ाचा, पापा तो मुझे भी साइंस लेने को बोल रहे थे पर केमिस्ट्री वगेरा मेरे पल्ले नहीं पड़ती,

प्रीती- अरे ऐसे कैसे नहीं पड़ती सही से पदों तो सब समझ आता है,

अनुज- अरे मैं पढता था पर छह कर भी मैथ और साइंस सर के ऊपर से निकल जाता था.

प्रीती- फिर तुम्हे ाचा क्या लगता है पढ़ने में?

अनुज- हिस्ट्री, पोलिटिकल साइंस, हिंदी लिटरेचर.

प्रीती- अरे वाह, साहित्य में रुचि है,

अनुज- हाँ थोड़ी सी, और तुम्हारी,

प्रीती- वैसे तो मैथ केमिस्ट्री इतने भी बुरे नहीं लगते मुझे जितने तुम्हे लगते हैं पर अगर पसंद की कहूं तो मुझे बॉटनी पसंद है,

अनुज- सीधे शब्दों में कहें तो पेड़ पसंद हैं,

इस पर दोनों हंसने लगे, इसी बीच प्रीती ने नमकीन उठानी चाही तो उसके हाथ से चम्मच छूट कर टेबल के नीचे गिर गयी और उसे उठाने के दोनों ने hi तुरंत टेबल के नीचे हाथ डाला तो अनुज के हाथ में चम्मच आई वहीँ प्रीती के हाथ में अनुज का हाथ,

अनुज के हाथ पर हाथ पढ़ते hi दोनों को कुछ हुआ और दोनों ने नज़रें उठा कर देखा तो दोनों की नज़रें मिल गयी, बिलकुल फिल्मों जैसा दृश्य बन गया, दोनों एक दुसरे की आँखों में मानो खो से रहे थे की तभी पीछे से रेनू की आवाज़ आई तो दोनों चौंकाते हुए अलग हुए,

रेनू- चलो भैया तुम लोगो ने ज़िद्द करके हमें भी तैयार करवा दिया,

अनुज- अरे सही किआ बुआ, लाओ ये थैला दे दो,

अनुज ने रेनू से थैला ले लिए,

रेनू- अरे प्रीती सरे दरवाज़े एक बार देखले और ताला लगा कर चाबी बगल वाली चची के यहाँ दे आ,

प्रीती- ठीक है माँ,

प्रीती ने टेबल से बर्तन उठाये चाय वगेरा के उन्हें रसोई में रख कर अपनी माँ के कहे अनुसार काम करने लगी, वहीँ रेनू और अनुज बहार आ गए अनुज ने रेनू का थैला पीछे बांध दिया, और मोटरसाइकिल मोड़ कर चलने को तैयार हो गया,

तब तक प्रीती भी आ गयी,

रेनू- बैठ प्रीती,

प्रीती को पता था की बीच में वो hi बैठेगी क्यूंकि मम्मी तो सारी में बीच में बैठने से रही,

प्रीती को भी न जाने क्यों अनुज से थोड़ी शर्म और हिचकिचाहट हो रही थी जबसे वो चम्मच वाला किस्सा हुआ था, खैर उनको एक और करते हुए वो अनुज के कंधे को पकड़कर मोटरसाइकिल पर बैठ गयी, वो कोशिश तो कर रही थी अनुज से जितना दूर हो सके वैसे बैठे, उसके बैठते hi रेनू भी पीछे से चढ़ी तो प्रीती की साड़ी कोशिश बेकार हो गयी और वो अनुज की पीठ से सात गयी, दोनों को छूटे hi एक अजीब सा एहसास हुआ जो की शायद दोनों hi पहली बात महसूस कर रहे थे,

प्रीती की माध्यम अकार की चूचियां अनुज की पीठ में लगी तो दोनों की hi एक हलकी सिसकी निकल गयी,

खैर अनुज ने मोटरसाइकिल आगे बढ़ा दी और सफर शुरू हो गया, रस्ते भर रेनू दोनों से बातें करती रही और दोनों का hi ध्यान आधा रेनू की बातों पर था तो आधा एक दुसरे पर, खैर जल्दी hi अनुज ने मोटरसाइकिल बुआ के घर के सामने रोक दी और रोकते hi रेनू उतरी और अंदर की और चल दी,

प्रीती ने भी उतर कर अंगड़ाई लेकर बदन को थोड़ा खींचा की तभी उसकी नज़र अनुज पर पड़ी और वो चौंक गयी, साथ hi थोड़ा परेशां भी हो गयी क्यूंकि उसने देखा की अनुज की क्रीम रंग की शर्ट पर पीठ पर पसीने के निशाँ छापे हुए थे और वो पसीने के निशाँ बिलकुल उसकी चूचियों जैसा क्या चूचियों के hi थे,

प्रीती का मारे शर्म के बुरा हाल हो गया वो ये भी नहीं चाहती थी की अनुज ऐसे hi घूमे क्यूंकि फिर सबकक पता है वो किसके साथ आया है और सबको पता चल जायेगा, पर उसे ये भी समझ नहीं आ रहा था की अनुज से बोले कैसे और क्या बोले,

अनुज ने जल्दी hi थैला खोल लिए और उसे हाथ में लेकर अंदर की और चलते हुए प्रीती से बोलै- चलो,

प्रीती भी झिझकती हुई उसके साथ चल दी प्रीती को समझ नहीं आ रहा था क्या करे,

दरवाज़े के पास पहुँच कर आखिर में हार कर प्रीती बोली- रुको अनुज वो,

अनुज- हाँ क्या हुआ,

प्रीती लम्बी सांस लेते हुए बोली- वो तुम अपनी शर्ट बदल लो जल्दी से.

अनुज- क्यों क्या हुआ मेरी शर्ट में?

प्रीती- अरे वो पसीने के निशाँ बन गए हैं पीठ पर,

अनुज- हाँ गर्मी है न, चलो बढ़ाओ लूंगा.

प्रीती- अरे पर ध्यान देना की कोई पीठ पर देखे नहीं,

प्रीती ने शरमाते हुए कहा...

अनुज- ऐसा कैसा निशान है, पकड़ना तो,

अनुज ने प्रीती को थैला पकड़ाया और तुरंत अपनी शर्ट उतरने लगा, प्रीती को लगा नहीं था की अनुज तुरंत hi शर्ट उतरने लगेगा, जल्दी hi अनुज ने शर्ट उतारी तो प्रीती पसीने से भीगे उसके बदन को देख थोड़ा अलग सा महसूस करने लगी एक आकर्षण सा उसे अनुज के लिए होने लगा, हालाँकि अनुज की हीरो जैसी बॉडी नहीं थी पर ख़राब भी नहीं दीखता था,

अनुज ने शर्ट उतर कर तुरंत पलट कर पीठ का हिस्सा देखा तो उस पर दो गोले दिखे जिन्हे देख कर कुछ पल बाद वो समझ गया की प्रीती इतना शर्मा क्यों रही थी, एक बार फिर से दोनों की नज़रें मिली तो प्रीती ने शरमाते हुए नज़रें नीचे कर्ली, उधर अनुज ने एक बार शर्ट की और देखा और बोलै- ाचा इसकी बात कर रही थी तुम, पर ये दाग तो अचे हैं,

अनुज की ये बात सुनकर प्रीती शर्मा के अंदर की और भाग गयी साथ hi भागते हुए उसके चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान थी अनुज की बात सुनकर.

अनुज ने उसे अंदर की और भागते देखा तो वो भी मुस्कुराने लगा और फिर ख़ुशी से हौले हौले हो जायेगा प्यार गाते हुए शर्ट को कंधे पर दाल कर अंदर चल दिया,

अंदर जाकर देखा तो रेनू सब औरतों के साथ बैठ कर बातों में लग चुकी थी उसके बगल में hi प्रीती बैठी थी किरण ने दोनों को पानी लाकर दिया था,

अनुज घर में घुसा तो उसे देख पूर्वी बोली- ोये बेशरम कहाँ नंगा पुंगा घूम रहा है,

अनुज- अरे कुछ नहीं दीदी वो शर्त ख़राब हो गयी पसीने से गर्मी बहुत है न,

पूर्वी- हाँ गर्मी तो है पर जा दूसरी पहन ले नंगा मत घूम नहीं तो किसी ने पसंद कर लिए तो विनीत से पहले तेरा ब्याह करना पड़ेगा.

पूर्वी बातें अनुज से कर रही थी पर सुनकर प्रीती को शर्म आ रही थी,

अनुज- हाँ दीदी जाता हूँ अभी,

ये कहकर अनुज ने शर्ट ली और उसे फैलाकर जहाँ पसीने के hi निशान थे वहीँ पर अपना चेहरा साफ़ किआ, और ये सब प्रीती भी देख रही थी, अनुज की ये हरकत देख उसे मन hi मन एक गुदगुदी सी हुई, अनुज ने भी चेहरे से शर्ट हटा कर प्रीती की और hi देखा तो पल भर को दोनों की नज़रें मिली पर फिर प्रीती ने शर्मा के हटा ली, और अनुज भी अंदर चला गया, इतने में कर्मा विनीत भी बाहर से कोई काम निपटा कर आ गए. दोनों ने hi रेनू के पेअर छुए, और प्रीती से मिले.

साथ hi सूजन सिंह भी सब पर जल्दी जल्दी तैयार होने के लिए चिल्लाने लगे.

सूजन सिंह- अरे जल्दी जल्दी करो भाई सब log.karma विनीत अनुज जाओ तैयार होकर आओ.

कर्मा- हमें तो दो मिनट लगने हैं फूफाजी, औरतों को बोलो इन्हे hi टाइम लग्न है,

किरण- कहीं टाइम नहीं लग्न भैया बस दो मिनट में तैयार हो जायेंगे.

पूर्वी- अरे किरण प्रीती को भी ले जा तेरे साथ तैयार हो जाएगी,

किरण- हाँ दीदी, चलो प्रीती,

बाकी लोग भी तैयारी में लग गए, कर्मा विनीत अनुज और बाकी मर्द भी तैयार होने लगे और कुछ hi देर में तैयार होकर आंगन में इकठा होने लगे,

कर्मा- मैंने कहा था न औरतें hi देर लगाएंगी,

प्रदीप- धीरे बोल बीटा नहीं तो सब तेरे ऊपर चढ़ जाएँगी आता चावल सब लेकर,

कर्मा- ये तो सही कहा फूफाजी.

सूजन सिंह- एक बात समझ नहीं आ रही तेरी बड़ी बुआ और तेरी माँ तो जा नहीं रही तो ये लोग कहाँ व्यस्त हैं?

शैलेश- ये लोग तैयार करवा रहे होंगे, हमारी तरह थोड़े hi औरतों को समय और म्हणत दोनों hi ज़्यादा लगते हैं.

इस पर सब हंसने लगे, इतने में सबसे पहले पूर्वी तैयार होकर निकली और खड़े होकर सबको देखने लगी वहीँ सब लोग उसे देखते hi रह गए, और देखे भी क्यों न पूर्वी ने जो कपडे पहने थे वो थे hi कुछ ऐसे hi, ऊपर एक कैसा हुआ ब्लाउज और नीचे एक छोटी सी चुनरी जैसा कुछ बंधा हुआ था जिसमे से उसकी एक जांघ पूरी दिखाई दे रही थी.





कर्मा- दीदी तुम एक्सीडेंट करवाऊंगी लगता है कई,

पूर्वी- क्यों कैसी लग रही हूँ मैं,

पापा- बिटिया ये मत पूछ और बाकि औरतों को भी बुला नहीं तो लेट हो जायेंगे,

पूर्वी- अभी लाती हूँ, पहले इन दोनों लड़कियों को देखती हूँ क्या कर रही हैं ये अब तक,

पूर्वी सीढ़ी ऊपर के कमरे में गयी जहाँ दोनों तैयार हो रही थी,

पूर्वी- अरे तुम लोग तैयार नहीं हुई अभी तक?

प्रीती- मैं तो तैयार hi हूँ भाभी,

प्रीती अपना पल्लू सेट करते हुए बोली,





पूर्वी- हाय ये गोरी कमर ननद रानी आज कहाँ बिजली गिराएगी? बड़ी सुन्दर लग रही है साड़ी में,

इस पर प्रीती ने नज़र उठाकर अपनी भाभी की और देखा तो देख कर हैरान रह गयी,

प्रीती- हाय भाभी क्या लग रही हो, ऐसे जाओगी तो कहीं बीच में हो लोग तुम पर कूद न पड़ें,

पूर्वी- तो क्या हुआ ननद भाभी आधे आधे संभल लेंगे,

इस पर प्रीती शर्मा गयी.

प्रीती- भाभी तुम भी न,

पूर्वी- ाचा शर्माना छोड़ ये बता ये किरण कहाँ है,

पूर्वी ने इतना पूछा hi था की किरण बाथरूम से निकल कर बोली- किरण यहाँ है,

पूर्वी ने किरण की और देखा और ऊपर से नीचे देख बोली- हाय दिया नज़र न लग जाये बिलकुल पारी लग रही है,

प्रीती- हैं न भाभी मैंने भी इससे ये hi बोलै था,

किरण- नहीं दीदी तुम और प्रीती तो मुझसे भी बहुत सुन्दर दिख रहे हो,

पूर्वी- ाचा अब चलो बाकी बातें नीचे करेंगे ताऊजी चिल्ला रहे हैं

प्रीती- हाँ चलो,

तीनो कमरे से निकलते हैं तो प्रीती कहती है भाभी तुम चलो हम दोनों आते हैं,

पूर्वी- क्यों क्या हुआ,

प्रीती- किरण इतनी प्यारी लग रही है इसकी एक फोटो तो बनती है.

किरण- हाँ फोटो तो लेनी hi है चाहे प्यारी लागूं या नहीं हेहही.

पूर्वी- ाचा जल्दी आना, वैसे बड़ी जल्दी दोस्ती हो गयी तुम्हारी

किरण- छोटे छोटे शहरों में बड़ी जल्दी दोस्ती होती रहती है, सेनोरिटा.

पूर्वी- जल्दी आना नीचे नौटंकी.

ये कह पूर्वी नीचे चली गयी,

प्रीती- किरण उधर बालकनी की तरफ कड़ी हो,

किरण बालकनी पर प्रीती के कहे अनुसार कड़ी हो गयी,





प्रीती ने उसकी प्यारी प्यारी कई साडी फोटोज ली उसके बाद किरण ने प्रीती की भी, और फिर दोनों साथ में नीचे आ गयी,

दोनों के देख कर मर्दों के मन और पंत में. कुछ हलचल हुई, वहीँ प्रीती को तो अनुज देखता hi रह गया, प्रीती की नज़र भी अनुज से मिली तो उसे अपनी और ऐसे मुँह खोले घूरते देख उसे शर्म और हंसी दोनों आ गयी,

किरण- देख प्रीती तू मेरी दोस्त तो बन गयी hai,bas ऐसे hi शर्माती रह भाभी भी बन जाएगी,

प्रीती शर्मा कर और हैरान हो कर उसको देखती है और कहती है- हॉट क्या बोल रही है तू,

किरण- अरे देख रही हूँ मेरा भाई लट्टू हो रहा है तुझ पर तो भाभी तो बनेगी न तू,

प्रीती- हट ऐसा कुछ नहीं होने वाला,

प्रीती ने शर्मा के बोलै तो किरण उसको चिढ़ाते हुए बोली- बस ऐसे hi सुहागरात पर शर्माना.

दोनों की ऐसे hi नोकझोंक और अनुज से प्रीती की आँख मिचौली के बीच बाकी औरतें भी तैयार हो कर आ गयी और साड़ी hi एक से बढ़कर एक लग रही थी,

दो गाड़ियां जाने वाली थी तो मौसा वाली गाडी कर्मा चला रहा था, विनीत उसके बगल में बैठा था, वहीँ बीच वाली सीट पर पूर्वी, किरण और प्रीती बैठे थे वहीँ सबसे पीछे अनुज था और थोड़ा बहुत सामान रखा हुआ था,

दूसरी गाडी मौसा चला रहे थे उनके साथ कर्मा के बड़े फूफाजी बैठे थे बीच में तीन लेडीज थी शशि, ममता और रेनू, और पीछे नीलेश और प्रदीप यानि विनीत के पापा बैठे थे, घर पर सभ्य और सावित्री रह गए थे,

कर्मा वाली गाडी में बच्चे बातें करते हुए चल रहे थे, वहीँ प्रीती और अनुज का नैन मटक्का चल रहा था, दूसरी गाडी में भी शशि ममता और रेनू की खूब बातें हो रही थी. बातें करते हुए hi शशि को कुछ याद आया और वो बोली- अरे शैलेश भैया वो सारी लेनी हैं तो रोक कर चलना,

शैलेश- हाँ अभी 5 किलोमीटर आगे hi चमनपुरा का बाजार पड़ेगा वहां मिल जाएँगी सारी,

बड़े फूफाजी- अरे छोटे कर्मा को बोल दे की साथ hi रहे,

ये सुन छोटे फूफाजी ने विनीत को फ़ोन करके बोल दिया की साड़ी खरीदनी हैं तो साथ hi रहे थोड़ा रुकना पड़ेगा,

कुछ hi देर में दोनों गाड़ियां चमनपुरा के बाजार में थी, एक सारी की दुकान देख कर शैलेश ने गाडी रोक दी और उसके पीछे कर्मा ने भी लगा दी.

शैलेश- लो जीजी, जंगी लाल वस्त्र भंडार इस पर अछि सारी मिल जाएँगी,

शशि- एक और से उतारते हुए, आओ संधान जी, भाभी पसंद करवा देना, विनीत के पापा तुम भी आना थोड़ा,

तीनो औरतें और फूफाजी दुकान के अंदर बढ़ गए जहाँ गल्ले पर बैठे मालिक ने हंस कर उनका स्वागत करते हुए पूछा- आईये बहन जी क्या दिखाऊं?

शशि- भैया सारी दिखाओ अछि अछि सी,

दूकानदार- अरे बहन जी एक से एक सारी मिलेगी आपको हमारे यहाँ, अभी दिखता हूँ,

शशि ममता और रेनू ने कई साड़ियां देखि और उनमे कुछ पसंद की इसी बीच ममता ने कुछ शशि के कान में कहा और शशि ने अपने पति के,

प्रदीप- अरे भैया लेडीज को बाथरूम जाना था, तो यहाँ आस पास होगा कोई,

जंगी लाल- अरे आस पास क्या मेरा घर hi है, एक मिनट रुकिए, निशा ओह बिटिया,

कुछ hi पल बाद एक लड़की बाहर आई

लड़की- हाँ पापा,

दुकानदार- अरे बीटा ज़रा बहन जी को अपना बाथरूम दिखा दे,

लड़की- आइये आंटी जी.

ममता लड़की के साथ अंदर चली गयी तब तक शशि और रेनू ने सारी भी पसंद कर ली थी, और ममता जब बापिस आई तो फूफाजी सारी का पैसा hi दे रहे थे,

ममता ने उस लड़की के सर पर हाथ रख कर कहा- धन्यवाद् बिटिया

लड़की- अरे इसमें क्या धन्यवाद् बोल रही हैं आंटी जी,

दुकानदार- लगता है किसी प्रोग्राम में जा ईहे हैं भाई साहब,

फूफाजी- हाँ भैया लड़के की पक्की है, उसी के लिए जा रहे हैं

दुकानदार- अरे बहुत बहुत शुभकामनाये भाई साहब, ब्याह के लिए भी यहीं से सारी ली जियेगा आपको बिलकुल खरे दाम पर ाचा माल मिलेगा,

फूफाजी- बिलकुल भाई साहब, अब खरीददारी तो चलती रहेगी,

फिर साड़ी वगेरा ले कर सरे लोग गाडी में आ कर बैठ गए और फिर आगे का सफर शुरू हो गया.

जारी रहेगी.
 
शुभकामनाये भाई साहब, ब्याह के लिए भी यहीं से सारी ली जियेगा आपको बिलकुल खरे दाम पर ाचा माल मिलेगा,

फूफाजी- बिलकुल भाई साहब, अब खरीददारी तो चलती रहेगी,

फिर साड़ी वगेरा ले कर सरे लोग गाडी में आ कर बैठ गए और फिर आगे का सफर शुरू हो गया.


अपडेट 238
सरलपुर

(कर्मा की ज़ुबानी)

लगभग एक घंटे के सफर के बाद हम लोग सरलपुर में घुस चुके थे, मैं तो यहाँ पहली बार आ रहा था, इसलिए विनीत मुझे बताता रहा और हमारी दोनों गाड़ियां उनके घर के बाहर लगी थी, घर के बाहर से hi पता चल रहा था की कोई प्रोग्राम होने वाला है घर को अचे से सजाया हुआ था, दरवाज़े के बाहर hi घर के मुखिया यानी विनीत के ससुर खड़े थे हम सब के स्वागत के लिए, एक एक करके गाडी से सब लोग उतरने लगे, पूर्वी दीदी ने उतरने से पहले एक पैकेट में से निकल कर एक लहंगा जैसा पहन लिए और साथ hi एक चुन्नी भी ऊपर दाल ली,

में- ये क्या कर रही हो, वहां कुछ और पहना था यहाँ कुछ और,

पूर्वी- अरे अंदर का माहौल पता नहीं कैसा हो और कौन कौन हैं, वो कपडे तो बस अपने लोगो के सामने पहनने को हैं.

में- चलो अब तो हो गयी तैयार?

पूर्वी- हाँ चल,

हम दोनों भी गाडी से उतरे सब एक दुसरे को नमस्ते कर रहे थे मैंने भी विनीत के ससुर चरण सिंह को नमस्ते की फिर रमन जीजाजी और उनके भाई को,

वो लोग हम सबको अंदर लेकर गए जहाँ सबके बैठने का इन्तेज़ाआम था हम सबको वहां बैठाया गया, कुछ hi देर में रिमझिम दीदी और उनकी जेठानी सबको नमस्ते करती हुई सबके लिए ठंडा और साथ में नाश्ता वगेरा लाइ, साथ hi उनकी सास माधुरी और साथ में एक और औरत थी जिन्हे मैं नहीं पहचानता था, साथ hi चरण सिंह के साथ ब्बि एक आदमी था अधेड़ उम्र का, जिनका परिचय कुछ hi पलों में चरण सिंह ने करवाया की ये रिमझिम दीदी की जेठानी चंचल के मम्मी बिमला और पापा उदयवीर हैं.

हम सब मर्द कभी चंचल को देखते तो कभी उसकी मम्मी बिमला को दोनों hi बड़ी hi कामुक और भरे बदन की थी, खैर औरतें औरतों से बातों में लग गयीं मर्द मर्दों से और मैं विनीत वगेरा रमन जीजा और उनके बड़े भाई चेतन से, किरण और प्रीती तो पूर्वी दीदी के साथ किसी कमरे में घुस गयीं अपनी नयी भाभी को देख्नने के लिए.

खैर नाश्ता वगेरा हुआ उसी बीच पूर्वी दीदी के पति यानी पंकज जीजा जी भी पहुँच गए, खाना खाया गया खूब साड़ी बातों के साथ और हंसी मज़ाक के साथ फिर सब इकठा हुए तो हम सबको रमन और चेतन ने ऊपर चलने को कहा, उनके पीछे पीछे ऊपर गए तो वहां पर अछि खासी सजावट हो राखी थी, एक और स्टेज बना हुआ था जिसपर एक बड़ी सी कुर्सी राखी थी दो लोगो के बैठने के लिए और सामने कई लाइन से कुर्सियां राखी हुई थी, जिन पर हम लोग जाकर बैठ गए, चंचल डूडी और रिमझिम दीदी ने विनीत को स्टेज पर ले जा कर खड़ा कर दिया, फिर थोड़ी देर में गाने वगेरा बजे और किरण और प्रीती और पूर्वी हमारी होने वाली भाभी ख़ुशी को लेकर आई, सुन्दर सी साडी में तैयार होकर भाभी तो बिलकुल पारी जैसी लग रही थी, वैसे तो रिमझिम दीदी की शादी में मैंने उन्हें देखा था पर अभी की बात hi कुछ और थी,

ख़ुशी भाभी के आते hi सब तालियां बजने लगे, साथ hi फिल्म का कोई प्यार भरा गण बज रहा था, उसी के बीच विनीत ने हाथ बढाकर अपनी होने वाली पत्नी को स्टेज पर चढ़ाया, हम सबने ख़ुशी से तालियां मारी, दोनों hi शर्मा रहे थे,

इसके बाद दोनों की अंगूठी लाइ गयी काफी ख़ुशी भरे माहौल के बीच दोनों ने एक दुसरे की उंगली में अंगूठी पहना कर एक दुसरे को जीवन साथी बनाने का निश्चय किया,

सबने ख़ुशी से फूल बरसाए तो तालियां पीती गयीं, फिर कुछ देर तक नाच गाने का प्रोग्राम हुआ. लड़का लड़की से लेकर लड़का लड़की के माँ बाप को भी नचाया गया, इस प्रोग्राम के होते होते शाम हो चुकी थी,

ये सब होने के बाद फिर सब नीचे आये और सबको खाना पीना खिलाया गया, खाने के बाद हम सब लोग फिर से ऊपर पहुंचे और चरण सिंह फूफाजी को लेकर स्टेज पर चढ़ गए और सबका ध्यान अपनी और खींचते हुए साथ hi फूफाजी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा: मुझे बड़ी ख़ुशी है की हमारी रिश्तेदारी जो पहले से hi इतनी गहरी थी और गहरी होने जा रही है, अब हम लोग दोहरे समधी बनने जा रहे हैं,

ये रिश्ता खास इसलिए भी है क्यूंकि हम सब के परिवार hi साधारण नहीं हैं, आमतौर पर जैसे होते हैं वैसे नहीं हैं, तो अपनी hi जीवन शैली और विचारधारा के लोगो का मिलना और फिर उनसे सम्बन्ध बनना बहुत मुश्किल होता है पर अछि किस्मत से हमारा बन रहा है,

इसलिए ये और ख़ुशी की बात है. अब और समय बर्बाद न करते हुए मैं अपनी पत्नी को स्टेज पर बुलाना चाहूंगा, जल्दी hi उनकी पत्नी माधुरी स्टेज पर थी और कुछ नहीं बल्कि पूरी बदली हुई नज़र आ रही थी, क्यूंकि उन्होंने अपने कपडे जो बदल लिए थे और अभी जो रूप था वो देख कर तो मेरा लुंड उठने लगा,





साड़ी टी वही थी पर ब्लाउज की जगह एक छोटी सी ब्रा थी जो की चूचियों को छुपाने में असमर्थ थी, पल्लू कंधे से ढलका हुआ था और गदराया पेट और गहरी नाभि दिखा रहा था,

चरण सिंह ने अपनी पत्नी का हाथ पकड़ा और पकड़ कर फूफाजी की और बढ़ा दिया, फूफाजी ने भी अपनी संधान को बाहें खोल कर अपनी बाहों में भर लिया तो माधुरी ने शर्मा कर अपना सर फूफाजी के सीने में घुसा लिए,

फूफाजी- अरे संधान जी शर्मा काहे रही हो, तनिक ऊपर देखो,

फूफाजी ने अपनी उँगलियों से माधुरी जी के चहरे को हल्का सा उठाया तो माधुरी ने अपनी समाधी की आँखों में एक पल को देखा पर फिर शर्मा के नज़रें झुका ली, तभी उन्हें अपने होंठों पर गरम साँसों का एहसास हुआ और अगले hi पल, उनके होंठों से फूफाजी के होंठ मिल गए,

चरण सिंह: देखिये ये समधी संधान तो परिचय बनाने भी लगे आप लोग भी अपनी मर्ज़ी जो चाहैं कर सकते हैं.

ये कह चरण सिंह स्टेज से उतरे और उन्होंने बुआ को पकड़ लिया, और बुआ की चूचियों को सारी के ऊपर से hi मसलने लगे, सब लोग धीरे धीरे खुलने लगे थे, मैंने भी नज़रें घुमा कर देखा तो रिमझिम दीदी की जेठानी यानि चंचल को देखा उनका बदला रूप देख कर तो मैं उनके पास जाने से खुद को रोक नहीं पाया,





बदन पर सिर्फ सारी थी ब्लाउज तो गायब हो चूका था, मैंने उनके कररब जाकर उनके मादक पेट कल हाथ से पकड़ लिया तो वो सिहर सी गयी और बोली- अह्हह्ह्ह्ह करमह भैया, तुमसे मिलने की तो बड़ी इच्छा थी,

में- अब मिल लो न दीदी, साड़ी इच्छाएं पूरी कर दूंगा,

मैंने उनके पेट को मसलते हुए कहा, उनका पल्लू नीचे सरक गया तो उनकी चूचियां मेरे सामने आ गयी और मैंने तुरंत झुक कर उनकी चुकी को मुँह में भर लिया, कुछ देर चुकी चूसने के बाद मैंने मुँह हटाया और उनके होंठों को चूसने लगा,

मेरे बगल में hi बैठे मौसा जी की नज़र भी इधर उधर घूम रही थी और फिर रिमझिम दीदी पर पड़ी जिन्होंने शरमाते हुय्र कामुकता से मौसा को देखा





मौसा तो दीदी को इस तरह तैयार देख पहले hi गरम हो रहे थे, दीदी का इशारा पाते hi सो उठ गए और रिमझिम दीदी के पास चले गए और उनके कामुक बदन से खेलने लगे,

बड़े फूफाजी ने चरण सिंह की दूसरी संधान बिमला को एक और खड़े देखा जो की आस पास चल रहे प्रोग्राम को देख गरम हो रही थी,





लाल सारी में गोरा गदराया बदन देख कर बड़े फूफाजी खुद को रोक नहीं पाए और उनकी और आगे बढ़ गए, और पास जाकर उनकी कमर से उन्हें पकड़ लिया और उसे मसलने लगे, बिमला चची भी बड़े फूफाजी से तो पहले से hi .िल चुकी थी और अचे से परिचित थी इसलिए और खुल कर अपना बदन उनके हाथों में सौंप दिया, वहीँ बिमला के पति ने हमारी प्यारी ममता चची को घेर लिया था और उनके गदराये बदन को साड़ी के ऊपर से hi मसल रहे थे,

पंकज जीजा ने किरण के जवान बदन को देखा तो ललचा गए किरण लहंगे के ऊपर से अपनी छूट मसलती हुई इधर उधर चलता हुआ प्रोग्राम देख रही थी, जीजा जी ने ज़्यादा इंतज़ार नहीं किआ और उसके पीछे पहुँच गए,

पंकज- कैसी हो किरण?

किरण- मस्त जीजू, तुम बताओ?

पंकज- हम पहली बार मिल रहे हैं न,

किरण- हाँ जीजू मिल तो पहली बार है, पर यहाँ तो सब लोग बी पहली बार मिल रहे हैं,

किरण ने अपनी बाहें पंकज जीजा के गले में डालते हुए कहा, पंकज जीजा ने भी तुरंत उसे बाहों में उठा लिया, और उसके जवान बदन को मसलते हुए उसके होंठों को चूसने लगे,

वहीँ उनकी पत्नी यानी हमारी प्यारी पूर्वी दीदी कहाँ पीछे रहने वाली थी, वो तो कोने में एक टेबल पर झुकी हुई थी, और उनके रमन जीजा पीछे से उनकी छूट में दनादन लुंड पेल रहे थे, दीदी का लहंगा और चुन्नी उनके बदन से लटक रही थी पर अभी किसी को उसकी परवाह नहीं थी,





रमन जीजा पूरे जोश से अपनी साली की चुदाई कर रहे थे,

वहीँ दूसरी और उनके ठीक पीछे एक कुर्सी पर होने वाले पति पत्नी लगे हुए थे, विनीत ने ख़ुशी भाभी को नीचे से बिलकुल नंगा करवा दिया था और उनके बदन पर सिर्फ ब्लाउज था, विनीत खुद पूरा नंगा होकर अपनी होने वाली बीवी को अपने लुंड पर बिठा कर छोड़ रहा था,





दोनों के थापों की आवाज़ अचे सर सब जगह गूँज रही थी, वैसे तो हर और से चुदाई की सिसकियों की hi आवाज़ आ रही थी, इसी बीच कोई ऐसा था जिसका ये सब देख थोड़ा सर घूम रहा था और वो थी पूर्वी की सास रेनू बुआ, हालाँकि उनके यहाँ भी पारिवारिक चुदाई शुरू हो चुकी थी पर अभी वो इस खेल में नयी थी, दूसरा चुदाई का ऐसा खुल्लम खुल्ला नंगा खेल उनकी आँखों के सामने पहली बार हो रहा था,

इतने सरे लोग ख़ुशी से एक दुसरे के सामने एक दुसरे के बदन के साथ खेल रहे थे ये देख उन्हें उत्तेजना भी हो रही थी और थोड़ी शर्म और झिझक भी आ रही थी, फिर अचानक से रेनू बुआ को अपनी बेटी का ध्यान आता है, की प्रीती कहाँ है वो तो यहाँ कहीं नहीं दिख रही, अपना ध्यान भटकने के लिए और वहां से हटने के लिए रेनू बुआ उठी और सीढ़ियों से उतर कर नीचे की और आ गयी और प्रीती को देखने लगी, नीचे हॉल खली पड़ा था इसी बीच उन्हें एक कमरे से खिल खिलने की आवाज़ आई तो वो उस और बढ़ गयी, कमरे के पास पहुंची तो दरवाज़ा खुला हुआ hi था, अंदर झाँक कर देखा तो सामने का नज़ारा देख आँखें चौड़ी हो गयी, उनकी बेटी प्रीती अनुज से चिपक कर लेती थी, और सिर्फ ब्रा पंतय में थी, दोनों बड़ी लगन से एक दुसरे के होंठों को चूस रहे थे साथ hi अनुज की उंगलियां पंतय के ऊपर से hi उसकी छूट को मसल रही थी,





रेनू झांकते हुए अपनी बेटी को देख गरम होने लगी एक पल को वो छह रही थी हैट जाएँ पर उनका मन नहीं हुआ, वो वैसी hi देखती रही,

अनुज ने आगे बढ़ कर प्रीती की ब्रा को ऊपर खिसका दिया और प्रीती की गोरी गोरी माध्यम अकार की चूचियां उसके सामने नंगी हो गयी जिन्हे तुरंत अनुज झुक कर मुँह में भरते हुए चूसने लगा,





प्रीती की सिसकियाँ मुँह से निकलने लगी, जो की रेनू बुआ के कानो में पढ़ कर उन्हें और उत्तेजित करने लगी,

रेनू बुआ का तो अपनी बेटी की हरकतें देख कर बुरा हाल हो रहा था हालाँकि पीछे एक हफ्ते में hi प्रीती को कई बार अपने पति और बेटे से चुड़ते देखा था रेनू बुआ ने पर अभी की बात कुछ अलग लग रही थी,

इसी बीच उन्हें अपनी कमर पर एक हाथ महसूस हुआ तो उन्होंने चौंक कर मुद कर देखा तो वो पापा थे,

पापा- क्या हुआ संधान जी कुछ चाहिए क्या?

रेनू- हैं न नहीं नहीं भाई साहब, का कुछ कुछ नहीं,

रेनू बुआ ने खुद को सँभालते हुए कहा,

पापा- फिर आप यहाँ क्या कर रही हैं?

पापा ने अंदर झांकते हुए कहा,

पापा- ाचा तो यहाँ बच्चे एक दुसरे को जान रहे हैं.

रेनू बुआ ये सुन थोड़ा शर्मा गयी और नज़रें झुका कर बोली- ग वो हाँ भाई साहब,

पापा- तो आप ऐसी अलग थलग क्यों घूम रही हैं सबके साथ क्यों नहीं हैं?

पापा ने दरवाज़े से हटते हुए कहा तो रेनू बुआ भी हैट गयी और दोनों hi हॉल में पड़े सोफे की और आ गए,

रेनू- वो भाईसाहब पता नहीं अभी इतना खुली नहीं हूँ मैं, तो थोड़ी सी हिचकिचाहट हो रही है इतने लोगो के बीच,

पापा- हाँ वो होना तो स्वाभाविक है वैसे इतने लोगो के बीच न सही अकेले में तो आप खुल hi सकती हैं?

रेनू- जी मैं समझी नहीं,

पापा- जैसे हमारे बच्चे एक दुसरे को जान रहे हैं हम भी एक दुसरे के साथ जान पहचान बढ़ा सकते हैं,

रेनू बुआ ये सुन कर शर्मा गयी और नीचे देख कर मुस्कुराने लगी.

कमरे के अंदर अनुज और प्रीती की गति काफी अछि थी, और जल्दी hi अनुज ने प्रीती को अपने ऊपर बिठाकर उसकी पंतय के ऊपर से hi उँगलियों से उसकी छूट को छेड़ रहा था, और प्रीती तड़प रही थी.





प्रीती- अह्ह्ह्हह्हह माहहहह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह अनुज्जज घुसा दूऊओह्ह्ह ना,

अनुज- अह्हह्ह्ह्ह याअररर बहुत्तत्त गरम हो तुमममम.

अनुज ने उसकी पीठ को सहलाते हुए कहा, पर प्रीती के लिए एक पल रुकना भी मुश्किल हो रहा था, और उसी बेचैनी में उसने अपनी पंतय को एक तरफ खिसकाया और बिना अनुज से कुछ बोले अगले hi पल लुंड को अपनी छूट में घुसा लिया, दोनों के मुँह से एक साथ आह्ह्ह्हह्ह निकल गयी,

अनुज- अह्हह्ह्ह्ह तुंहारी छूट तो तुमसे भी ज़्यादा गरम है,

प्रीती- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म और तुम्हारा लुंड तुम्हारी hi तरह प्यारा और मस्त,

धीरे धीरे प्रीती अनुज के लुंड पर उछलने लगी, अनुज भी नीचे से धक्के लगते हुए प्रीती की चूचियों को मसलने लगा,





प्रीती अपने चूतड़ों को उछाल उछाल कर अनुज से छोड़ने लगी,

अब बीटा इतना तेज हो सकता है तो बाप कैसे पीछे हो सकता है, पापा भी प्रीती की मम्मी यानि रेनू को मन कर एक कमरे में ले आये थे और उनकी उत्तेजना को और भड़कते हुए उन्हें बिस्तर पर बिठा कर उनके रसीले होंठों का स्वाद ले रहे थे, साथ hi पापा के हाथ उनके मांसल पेट और कमर पर भी चल रहे थे,

भले hi रेनू का अपने परिवार के अलावा किसी और मर्द के साथ ये पहला मौका था पर फिर भी उत्तेजना और जोश काम नहीं थे, और वो भी पापा का पूरा साथ दे रही थी,





पापा भी एक नया गदराया माल पाकर खुश होकर उनके बदन के उतार चढ़ाव को नाप रहे थे, कुछ देर बाद दोनों के हांफते हुए होंठ अलग हुए,

पापा- अह्ह्ह्हह्हह बड़े रसीले होंठ हैं संधान तुम्हारे.

ये सुनकर रेनू थोड़ा शर्मा गयी, और नज़रें नीचे किये हुए hi बोली- तुम्हारा भी जोश काम नहीं है समधी जी,

पापा- अभी तो जोश तुमने देखा hi कहाँ है संधान,

ये कहते हुए पापा बिस्तर से उतरे और अपना कुरता और पजामा उतार दिया और सिर्फ एक कच्चे में रह गए, और फिर नीचे से hi हवस भरी निगाहों से रेनू को देखते हुए उनकी सारी के पल्लू को पकड़ लिया और खींचने लगे, रेनू भी हँसते हुए उनका साथ देने के लिए बिस्तर पर hi कड़ी हो गयी और गोल गोल घूम कर अपनी सारे उतरवाने लगी.

जल्दी जी सारी उनके बदन से अलग होकर नीचे गिरी हुई थी, और रेनू पापा के सामने पेटीकोट और ब्लाउज में थी. पापा उनके गदराये बदन को नशीली आँखों से देखते हुए बापिस बिस्तर पर चढ़ गए और उन्हें पीछे सिरहाने की दीवार से चिपका कर उनके पेट को चूमने चाटने लगे,

रेनू की सिसकियाँ पूरे कमरे में गूंजने लगी, पापा जैसे जैसे उनके पेट को चूमते वो मचलने लगती,

जी भर के पेट चाटने के बाद पापा रेनू के पेटीकोट को ऊपर की और उठाने लगे, साथ hi उनके पेट को भी चूमते रहे लगातार.





रेनू तो पापा की हरकतों से पागल हुए जा दही thi.aur पापा को अपने बदन से खेलने दे रही थी, पापा ने अगला हमला उनकी नाभि पर किआ और अपनी जीभ नाभि में घुसा कर चूसने लगे तो रेनू का बदन मचलने लगा,

वो सिसकियाँ भरते हुए पापा के सर को अपने पेट में दबाने लगी, कुछ देर नाभि को चूसने के बाद पापा बिस्तर से नीचे उतरे और रेनू को भी नीचे उतार लिया और फिर रेनू के पेटीकोट का नाडा पकड़ कर खींच दिया, और अगले hi पल पेटीकोट नीचे टांगो में था, इसके बाद पापा ने रेनू को पीछे से दबोच लिया और पीछे से अपना लुंड उनकी पंतय में क़ैद चूतड़ों पर घिसने लगे वहीँ साथ hi पेट को मसलते हुए फिर ब्लाउज के ऊपर से hi उनकी चूचियां दबाने लगे,





पापा- अह्ह्ह्हह्हह संधान जी तुम्हारा बदन तो एकदम मलाई जैसा है अह्ह्ह्हह्हह,

रेनू- तुम्हारा भी तो बिलकुल कठोर है समधी जी,

रेनू ने हाथ पीछे कर कच्चे के ऊपर से hi पापा के लुंड को मसलते हुए कहा,

पापा- अह्ह्ह्हह्हह जब सामने तुम्हारे जैसी मलाई हो तो ये तो अपने आप सख्त हो hi जाता है.

रेनू- ुहम्म्म्म बातें भी बड़ी मज़ेदार करते हो समधी जी,

पापा- और भी बहुत कुछ ऐसा करते हैं संधान जी की तुम्हे मज़ा आ जायेगा,

रेनू- अच्छा ऐसा क्या करते हो समधी जी करके दिखाओ न,

पापा- दिखाएंगे अभी दिखाएंगे पर पहले थोड़ा दूध तो पि लें मुँह सूख रहा है,

ये कहते हुए पापा उनके ब्लाउज के हुक खोलने लगे,

रेनू- भूख तो मुझे भी लग रही है समधी जी मुझे भी केला खाने का मन हो रहा है,

रेनू ने पापा के लुंड को मसलते हुए कहा,

पापा- बिलकुल केला तो तुम्हे खिलाएंगे hi संधान, वो भी हर और से,

पापा ने ये कहते हुए उनका ब्लाउज खोल दिया और ब्लाउज खोल कर बाजुओं से निकाल भी दिया...





पापा- अह्ह्ह्हह्हह संधान सच में बड़ी कामुक हो तुम,

पापा ब्रा पंतय में पूर्वी की सास को देख कर बोले,

रेनू- अब तुमने तो ब्लाउज भी खोल दिया समधी जी हमें भी केला खिलाओ न,

रेनू पापा के लुंड की गर्मी को हाथ में महसूस करते हुए तड़पते हुए बोली,

पापा- केला तो तुम्हारा hi संधान निकालो और खालो,

रेनू ये सुन शरमाते हुए पापा के सामने बैठ गयी और बड़ी कामुकता से पापा की आँखों में देखते हुए उनके कच्चे के नाड़े को अपने दांतो में दबा कर खींचा और नाडा खुल गया





जिसके बाद अगले hi पल कच्चे को नीचे सरकाया तो पापा का लुंड फुदकते हुए बाहर आ गया जिसे रेनू आँखें चौड़ी कर देखने लगी,

नंगे लुंड को रेनू ने अपने हाथों में थाम लिया और उसकी गर्मी को हाथों में महसूस कर पूरे बदन में सिहरन होने लगी, पापा ने झुककर उनकी पीठ से उनकी ब्रा का हूँ भी खोल्दिया,

पापा- संधान हमें तो पूरा नंगा कर दिया और तुम अपना बदन छुपा रही हो,

रेनू- अरे समधी जी अब छुपाने जैसा कुछ बचा hi नहीं है,

ये कहते हुए रेनू ने खुली हुई ब्रा को अपने बदन से अलग कर दिया और फिर अपनी पंतय को भी नीचे सरका कर उसे भी निकल दिया और पूरी नंगी हो गयी, उनका नंगा बदन देख कर पापा अपने लुंड को मुठियाने लगे तो उन्होंने पापा के हाथ को लुंड से झटक दिया,

रेनू- इसे छोडो समधी जी ये हमारे खाने की चीज़ है,

ये कहते हुए उन्होंने पापा को पीछे धक्का देकर बिस्तर पर गिरा दिया और फिर खुद भी पापा की टांगो के बीच आ गयी और उनके लुंड को थाम कर अपना चेहरा उसके ऊपर लाइ फिर होंठों को खोल कर अपने मुँह में भर लिए

पापा- अह्ह्ह्हह्हह संधान अह्हह्ह्ह्ह,

रेनू को देख कर लग hi नहीं रहा था की वो पहली बार पापा से मिली थी, पूरे जोश में आकर वो पापा के मोठे लुंड को मुठियाते हुए चूसने लगी

पापा- अह्ह्ह्हह्हह संधान अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह कितना गरम मुँह है तुम्हारा अह्ह्ह्हह्हह ओह्ह्ह्हह्ह ऐसी हीईई,

रेनू को भी पापा की सिसकियाँ और उत्तेजित कर रही थी और वो और जोश के साथ पापा का लुंड चूसने लगी... कुछ देर लुंड चुसवाने के बाद पापा ने उनकी आँखों में देखा और कहा,

पापा- अह्ह्ह्हह्हह संधान अब और रुका नहीं जाता, बस ये बताओ यहाँ चुड़ोगी ये सबके साथ?

इस पर रेनू ने पापा के लुंड को अपने मुँह से निकला और मुस्कुरा कर देखने लगी,

अब जहाँ माँ का जोश इतना था तो बेटी कैसे पीछे रह सकती थी, वो भी पूरे जोश में अनुज से चुद रही थी, या यूँ कहें की अनुज उसकी जवान कासी हुई छूट का पूरा आनंद ले रहा था, और अभी दोनों एक करवट लेते हुए थे और अनुज प्रीती के पीछे से उसकी टांग उठा कर पीछे से लुंड उसकी रसीली गरम छूट में डालकर छोड़ रहा था,





हर धक्के के साथ दोनों की सिसकियाँ निकल रही थी, साथ hi प्रीती की चूचियां झूल झूल कर माच रही थी,

अनुज- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह प्रीती आह्हः तुम्हे छोड़कर माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आ गया, ओह्ह्ह..

प्रीती- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह तुममममम भीईई मस्त्त छोड़ते हुआआह्ह्ह्ह ऐसी हीई,

अनुज- अह्हह्ह्ह्ह कीतनीई केसीईई हुई हैईईई,

प्रीती- होगी hi, अह्ह्ह्हह्हह मेरे भैयाहः और पापा के बाद सिर्फ तुम्हारा लुंड गया है मेरी छूट में,

अनुज ने ये सुनकर उसके होंठों को अपने होंठों में भर लिया और तेज़ तेज़ धक्के लगाने लगा,

प्रीती भी उसका साथ देने लगी, दोनों का hi जोश अपने चरम पर था, दोनों को hi एक दुसरे के प्रति एक अलग सा hi आकर्षण था और एक अलग सा भाव भी आ रहा एक दुसरे के लिए, दोनों का तालमेल भी जल्दी hi ाचा बैठ गया था और उसी तालमेल का प्रदर्शन करते हुए दोनों एक साथ अपने चरम पर पहुँच गए और झड़ने लगे, अनुज ने अपने रास की पिचकारी प्रीती की छूट में भर दी तो वहीँ प्रीती ने भी अपने रास से अनुज के लुंड को नहला दिया,

झड़ने के बाद दोनों कुछ पल यूँ hi लेते हुए एक दुसरे के होंठों को चूसते रहे, दोनों के होंठ अलग हुए तो अनुज बोलै- सबके पास चलें?

प्रीती- हाँ अब मुझे छोड़ लिया अब तो सबके साथ जाओगे hi, दूसरी छूट जो चाहिए?

अनुज- अरे ऐसा नहीं है, मैं तो बस ऐसे hi बोल रहा था, तुम कहो तो बस ऐसे hi लेक्टर तुम्हे देखता रहूँगा,

प्रीती- पर मुझे तो जाना है, मेरी लाइफ की पहली ऐसी पार्टी है खुल कर मज़े लुंगी.

प्रीती ने खिलखिलाते हुए कहा..

अनुज- ाचा, मुझे चिढ़ा रही थी.

प्रीती- हाँ थोड़ा सा,

ये कहकर प्रीती ने अनुज के होंठों को दोबारा कुछ पल के लिए चूमा और फिर उठाते हुए बोली- अब चलो चलो.

अनुज भी हँसते हुए उसके साथ उठा और दोनों एक दुसरे का हाथ पकड़ कर नंगे hi ऊपर चल दिए सबके पास,

सीढ़ियों से hi उन्हें चुदाई की भरपूर आवाज़ें सुनाई दे रही थी, दोनों जल्दी से सीढ़ियां चढ़ाते हुए ऊपर पहुंचे, और ऊपर पहुँच कर चारों और चल रहे चुदाई के खेल को देखने लगे, तभी प्रीती की नज़र एक और पढ़ी और उसकी आँखें चौड़ी हो गयीं, क्यूंकि उसके सामने का नज़ारा hi कुछ ऐसा था, सामने उसकी मम्मी रेनू पूरी नंगी होकर पापा के लुंड पर बैठी थी और बड़ी कामुकता से अपनी कमर हिला हिला कर चुद रही थी,

अपनी मम्मी का यूँ खुला रूप देख कर तो प्रीती हैरान रह गयी, तभी अनुज ने पीछे से उसे थोड़ा आएगी की और चलने के लिए धकेला, वो आगे बढ़ी और सीढ़ी अपनी माँ का पास पहुंची तो रेनू की नज़र भी अपनी बेटी से मिली एक पल को दोनों hi शर्मा गयी, पर फिर शर्म को एक और करके, प्रीती ने झुककर अपनी माँ के होंठों से अपने होंठ मिला दिए, दोनों माँ बेटी एक दुसरे के होंठों को चूसने लगी,

कुछ पल बाद रेनू के होंठ बेटी के होंठों से अलग हुए की अगले hi पल अनुज ने अपना लुंड उनके मुँह में घुसा दिया. जिसे रेनू तुरंत hi चूसने लगी, प्रीती अनुज को अपनी मम्मी से लुंड चुसवाते देख उसकी और देख कर मुस्कुराने लगी, इतने में उसके पीछे से किसी ने उसकी चूचियों को पकड़ लिया और दबाने लगा, वो कोई और नहीं बल्कि उसके भैया पंकज थे, प्रीती ने मुद कर अपने भैया को देखा तो पंकज ने अपनी बहन के होंठों को चूम लिया, और फिर होंठ अलग हुए तो प्रीती बोली- भैया मम्मी को देखो,

पंकज ने भी अपनी मम्मी को पापा और अनुज के लुंड को एक साथ खुश करते देखा, दोनों भाई बहन कुछ पल अपनी माँ को एक साथ दो दो लुंड से खेलते हुए देखने लगे,

पंकज- अब मम्मी को मज़े लेने दे आ चल तुझे मैं और लोगो से मिलवाता हूँ,

ये कह पंकज उसका हाथ लेकर आगे बढ़ गया, पूरे हॉल में चुदाई का प्रोग्राम पूरे चरम पर था हर कोई किसी न किसी के साथ चुदाई के खेल में लगा हुआ था.





हर तरफ से आह्ह्ह्हह्ह ओह्ह्ह्हह्ह अह्ह्ह्हह्हह की आवाज़ें आ रही थी

एक तरफ सोफे पर अलग चुदाई चल रही थी, जहाँ सीडी के बगल में hi मैं खड़ा था और मेरा लुंड किरण और चंचल जीजी चूस रहे थे, वहीँ किरण को चेतन जीजा पीछे से छोड़ रहे थे, उनके पीछे सोफे पर मौसा बैठे थे और उनका लुंड रिमझिम दीदी चूस रही थी, मौसा के बगल में hi रमन जीजाजी मामी को झुका कर छोड़ रहे थे और उनके बगल में पूर्वी दीदी उदयवीर चाचा के लुंड पर उछाल रही थी,





किरण और चंचल जीजा का मुँह एक साथ मेरे लुंड पर चल रहा था, एक गोलियां चाट रही थी तो एक लुंड चूस रही थी, किरण की छूट में पीछे से पड़ते हुए चेतन जीजा के धक्के उसे मेरा लुंड और जोश से चूसने पर मजबूर कर रहे थे,

इसी बीच चेतन जीजी मेरे पीछे की और आई और मेरे चूतड़ों को फैलाकर अपनी जीभ मेरी गांड के छेड़ पर फिरने लगी, मैं तो बिलबिला उठा और अपना लुंड जड़ तक किरण के मुँह में ठूंस दिया जिससे उसकी आँखों से आंसू बाह निकले,

मैंने सँभालते हुए उसके मुँह से लुंड निकला और वो खांसने लगी, इधर चंचल जीजी लगातार मेरी गांड चाट रही थी,

मैं खुद को रोके हुए थे, क्यूंकि अभी चुदाई काफी चलने वाली थी और मैं इतनी जल्दी झड़ना नहीं चाहता था.


जारी रहेगी.
 
इसी बीच चेतन जीजी मेरे पीछे की और आई और मेरे चूतड़ों को फैलाकर अपनी जीभ मेरी गांड के छेड़ पर फिरने लगी, मैं तो बिलबिला उठा और अपना लुंड जड़ तक किरण के मुँह में ठूंस दिया जिससे उसकी आँखों से आंसू बाह निकले,

मैंने सँभालते हुए उसके मुँह से लुंड निकला और वो खांसने लगी, इधर चंचल जीजी लगातार मेरी गांड चाट रही थी,

मैं खुद को रोके हुए था, क्यूंकि अभी चुदाई काफी चलने वाली थी और मैं इतनी जल्दी झड़ना नहीं चाहता था. अब आगे


अपडेट 239

मैंने चंचल जीजी को कुछ देर और अपनी गांड में जीभ चलने दी और फिर मुद कर उन्हें उठा लिया और उनकी मोती छुछियां चूसने लगा वो भी हाथ नीचे लेजाकर किरण के थूक में सना हुआ मेरा लुंड पकड़ कर मुठियाने लगी, इधर चेतन जीजा किरण को लेकर एक और कुर्सी पर गए और उसे झुका कर छोड़ने लगे, ये देख मैंने भी चंचल जीजी की चूचियों को मुँह से निकला और उन्हें भी किरण के सामने बिलकुल उसी की तरह झुका दिया और पीछे से उनकी गरम छूट में लुंड घुसा दिया और छोड़ने लगा,





मैं जीजा के सामने उनकी बीवी को छोड़ रहा था तो वो मेरे सामने मेरी बहन को, किरण और चंचल जीजी बीच बीच में एक दुसरे की जीभ और होंठों को चूस लेते थे,

में- अह्हह्ह्ह्ह जीजी अह्हह्ह्ह्ह तुम्हारे मोठे चूतड़ों के बीच लुंड पेलने में मज़ा आ रहा है,

चंचल - आह्ह्ह्हह्ह कर्मा तेराअहहह लोढ़ा आह्ह्ह्हह्ह इतना मस्त है की पूछ मत आह्ह्ह्हह्ह बस अपनी जीजी को छोड़ता रह.

चेतन- हाँ कर्मा छोड़ और तेज छोड़ मेरी प्यासी बीवी की छूट को अह्हह्ह्ह्ह, इसको चुड़ते देख मुझे ख़ुशी मिलती है, अह्ह्ह्ह.

किरण- हाँ जीजाहः तुम्हारी खुशियी मेरी चुत में मुझे महसूस हो रहियी हीीीाहहह.

चंचल जीजी को छोड़ते हुए मैंने इधर उधर नज़र दौड़ाई, हर तरफ चुदाई का माहौल बना हुआ था, हर तरफ से थप थप की साथ hi आहों की आवाज़ आ रही थी,

स्टेज पर hi फूफाजी ने एक गद्दा दाल लिए रहा और उस गद्दे पर माधुरी जी यानी ख़ुशी की मम्मी और उनकी संधान को लिटा कर वो उनकी छूट में दनादन लुंड पेल रहे थे उनकी एक तंग पकड़ कर, तो संधान का मुँह बंद करने का काम मौसा जी कर रहे थे और दोनों मिलकर माधुरी के गदराये बदन को कास कर पेल रहे थे





अपनी नयी संधान का बदन पाकर वैसे कौन hi खुद को रोक पायेगा.

उनके थोड़ा आगे hi पापा ने रेनू को छोड़ा था तो अब अनुज ने उनको पकड़ लिया था और अभी उन्हें सोफे के एक कोने पर लिटाकर खुद उनकी टांगों के बीच आकर उनकी छूट में लुंड पेल रहा था, उन्हें ऐसे चुड़ते देख कर रिमझिम दीदी अपनी बहन की सास के मुँह पर आकर बैठ गयी और अपनी छूट उनके मुँह पर रखड़ी, अनुज के लिए तो ये नज़ारा और मज़ेदार हो गया क्योंकि उसके झटकों से रेनू बुआ के चुके तो झूल hi रहे थे पर अब उसके साथ साथ रिमझिम दीदी के चूतड़ भी हिचकोले खा रहे थे,

अनुज भी नयी नयी चुत पाकर बहुत खुश था पर काफी सावधानी से चुदाई कर रहा था ताकि जल्दी झाड़ न जाये.

दूसरी और विनीत अपनी होने वाली पत्नी ख़ुशी की गांड मार रहा था तो उसके hi बगल में रमन जीजा पूर्वी दीदी की गांड मार रहे थे, दोनों एक दुसरे के सामने एक दुसरे की बहनो की गांड मार रहे थे, किरण भी उन्हें देख कर मेरे सामने से उठ कर चली गयी और उनके बीच में झुककर अपनी गांड को उँगलियों से खोलते हुए अपनी गांड की उँगलियों से मालिश जैसी करते हुए चेतन जीजा को अपनी और बुलाने लगी,





पर इससे पहले चेतन जीजा उसके पास जाकर उसकी कासी गांड भरते, उनकी जगह उनके ससुरजी ने छीन ली, और उदयवीर चाचा ने अपना लुंड किरण की कासी गांड में उतार दिया. अब बिस्तर पर अगल बगल तीन तीन गांड मारी जा रही थी, एक और ख़ुशी थी जिसकी गांड में विनीत का लुंड था, बीच में किरण थी जिसकी गांड में उदयवीर चाचा लगे हुए थे और उनके बगल में पूर्वी जीजी थी जिनकी गांड में रमन का लोढ़ा अंदर बहार हो रहा था.

एक और चंचल की माँ यानि बिमला चची को पापा अपने लुंड पर बिठा कर नीचे से छोड़ रहे थे, तो उनके बगल में hi प्रीती झुकी हुई थी और उसके भैया यानि पंकज जीजा उसे छोड़ रहे थे, बिमला चची एक और झुक कर प्रीती क्र रसीले होंठों को चूसने से खुद को रोक नहीं पा रही थी,





प्रीती के लिए तो ये पहला मौका था जब वो किसी ऐसी जगह ऐसे प्रोग्राम में शामिल हुई थी तो उसकी छूट तो इतनी चुदाई देखकर hi लगातार पानी बहा रही थी, और वो खुद भी पूरी तरह से मज़े ले रही थी,

उनके सामने की और एक सोफे पर चरण सिंह सोफे पर बैठे हुए थे और नीचे से दनादन हमारी प्यारी ममता चची की गांड मार रहे थे, ममता चची भी अपनी गांड मरवाते हुए अपनी छूट रगड़ते हुए अपने चरम पर पहुँच रही थी,





उनके बगल में hi रिमझिम दीदी थी जो रेनू बुआ के मुँह से उठ कर उनकी एक तंग उठा कर उनकी छूट चाट रही थी और आएगी की चुदाई के लिए उन्हें तैयार कर रही थी, जो की जल्दी hi शुरू होने वाली थी क्योंकि चेतन जीजा जो की किरण की गांड लेने से चूक गए थे उन्होंने अपना लुंड रेनू बुआ की छूट खली देख उसमे घुसा दिया और उन्हें वहीँ झुककर छोड़ने लगे,

इधर चेतन जीजा जो किरण की गांड मारने से चूक गए थे उन्होंने बुआ की छूट में जगह बना ली थी और उनकी तंग कंधे पर रख कर दनादन उन्हें छोड़ रहे थे,





वहीँ उनके बगल में hi विनीत ने चेतन की माँ माधुरी यानि अपनी सास को अपने लुंड पर बैठा रखा और उछाल रहा था, दोनों अगल बगल में एक दुसरे की माँ छोड़ रहे थे,

इसके कुछ पल बाद hi बड़े फूफाजी आगे आये और आकर विनीत की टैंगो के बीच जगह ली तो विनीत ने भी अपने ताऊजी के लिए अपनी सास की छूट में दकके लगाने रोके और उसके चूतड़ों को फैलाकर अपने ताऊजी के सामने परोस दिया जिसे बड़े फूफाजी ने तुरंत आगे बढ़ कर अपना लुंड माधुरी तै की गांड के छेड़ पर रखा और फिर थोड़ा ज़ोर लगाकर अंदर सरका दिया, जिससे विनीत की सास की एक चीख निकल गयी,

माधुरी- अह्ह्ह्हह्हह ताऊ भतीजा मिलकर मेरी चटनी बना डोज आज अह्ह्ह्हह्हह.

बड़े फूफाजी- अरे संधान चटनी बनाएंगे भी और खिलाएंगे भी.

दूसरी और मेरे आस पास भी अब थोड़ा दृश्य बदल चूका था, एक और मौसा ने रिमझिम दीदी को अपने लुंड पर बैठा लिया था और उन्हें छोड़ रहे थे, उनके बगल में hi फूफाजी चंचल जीजी को अपने लुंड पर बैठा कर उछाल रहे थे और साथ hi उनकी चूचियां मसल रहे थे, वहीँ उनके बगल में मैं था मेरे लुंड पर विनीत की होने वाली पत्नी यानि ख़ुशी उछाल रही थी, वहीँ मेरे मुँह पर प्रीती अपनी गरम छूट रख कर चटवा रही थी.





उसकी गरम और कासी हुई छूट का स्वाद मुझे बहुत पसंद आ रहा था, मैं तो कुछ बोल नहीं सकता था क्योंकि प्रीती की छूट जो मुँह पर थी, पर ख़ुशी भाभी और प्रीती दोनों की आहें बता रही थी उन्हें कितना मज़ा आ रहा है, ख़ुशी भाभी का उछालना और चुदाई का तरीका देख कर समझ गया था विनीत ने सही लड़की चुनी है परिवार के लिए, अचे से सब का ख्याल रखेगी,

ख़ुशी भाभी झुककर प्रीती के छूछे मुँह में लेकर चूसते हुए अपने चूतड़ों को मेरे लुंड पर नचा रही थी.

इतने में hi अनुज भी हमारे पास आया और चंचल जीजी को फूफाजी के ऊपर से उठाया और फिर घुमा कर बैठा दिया, फूफाजी का लुंड दोबारा चंचल जीजी की छूट में समां गया तो अनुज ने उनके पीछे जगह ली और अपना लुंड चंचल जीजी की गांड में उतार दिया और चंचल जीजी की दोहरी चुदाई होने लगी,





चंचल जीजी दोहरी चुदाई के मज़े लेते हुए हर झटके पर आहें भरने लगी और फूफाजी और अनुज को और तेज़ छोड़ने के लिए उत्साहित करने लगी.

उनके बगल में hi मैं ख़ुशी भाभी के नीचे से उठा और उन्हें घोड़ी बना कर पीछे से लुंड उनकी छूट में घुसा दिया साथ hi प्रीती भी उसके ऊपर झुककर अपना चेहरा ख़ुशी के चूतड़ों पर रखकर मेरा लुंड ख़ुशी की छूट में अंदर बाहर होते हुए ध्यान से देखने लगी,

प्रीती- अह्ह्ह्हह्हह कितना मस्त लग रहा है भाभी की छूट में लुंड जाता हुआ,

में- हाँ बड़ी मस्त छूट है नयी भाभी की.

ख़ुशी- ओह्ह्ह्हह्ह भैयाहः क्या मस्त लुंड है, अह्हह्ह्ह्ह इसे तो मैं खूब छोड़ने वाली हूँ,

में- देवर के लुंड पर भाभी का पूरा हक़ होता है भाभी, घर की सब औरतों का ख्याल रखता हूँ तुंहारा भी रखूँगा.

ये कहते हुए मैंने उनकी छूट से लुंड निकला और निकल कर ऊपर प्रीती के मुँह में घुसा दिया, प्रीती ने भी मुँह खोल कर लुंड भर लिए, फिर मैं ऐसे hi करने लगे, एक बार लुंड ख़ुशी भाभी की छूट में घुसता फिर निकलकर प्रीती के मुँह में और फिर बापिस ख़ुशी भाभी की छूट में





इसी तरह करते हुए थोड़ी थोड़ी देर मैं भाभी की छूट और प्रीती का मुँह छोड़ता रहा और फिर मैंने प्रीती को भी भाभी के ऊपर hi झुका दिया और अपना लुंड उसकी जवान छूट में घुसा दिया, थोड़ी तकलीफ हुई पूरा लुंड घुसाने में वो चीखी भी थोड़ा पर अंत में पूरा समां गया तो आहें भरने लगी, काफी कासी हुई छूट थी उसकी जिससे पता चल रहा था की ज़्यादा चुदाई नहीं हुई है उसकी, मुझे उसकी छूट में मज़ा आने लगा तो मैं दनादन शॉट लगाने लगा और वो आहें भरते हुए मज़े लेने लगी,

ख़ुशी भाभी उसके नीचे से निकली तो उन्हें उनके पापा ने पकड़ लिए और बोले- अरे बहु तू बहुत सुन्दर है अपने मां ससुर की सेवा नहीं करेगी.

ख़ुशी- बिलकुल मां जी, आओ न,

ये कहते हुए ख़ुशी उनके सामने बैठ कर उनका लुंड चूसने लगी,

हमारे सामने वाले सोफे पर भी मस्त माहौल बना हुआ था,

रमन जीजा सोफे के ऊपर खड़े होकर ममता चची का मुँह छोड़ रहे थे वहीँ उदयवीर चाचा ममता चची की टांगो के बीच बैठ कर उनकी छूट चाट रहे थे,

रमन जीजा लुंड चुसवाते हुए रेनू बुआ की छूट में तेजी से उंगलियां अंदर बहार कर रहे थे,





बुआ भी लगातार आहें भर रही थी. कुछ देर बाद उदयवीर चाचा उठे और रेनू बुआ की टांगो के बीच आये और अपना लुंड उनकी छूट में घुसा कर छोड़ने लगे वही रमन जीजा ने भी अपना लुंड ममता चची के मुँह से निकल कर उनकी छूट में घुसा दिया,

मेरे बगल में hi आसान और साथी जल्दी जल्दी hi बदल रहे थे, मेरे बगल में hi चरण सिंह ताऊ के लुंड बुआ बैठी हुई थी और वो नीचे से दनादन उनकी छूट में धक्के लगा रहे थे, मैं भी उन्ही की तरह नीचे बैठा था और प्रीती की छूट में नीचे से धक्के लगा रहा था अपने ऊपर बैठा कर, पर हम अकेले नहीं थे, किरण प्रीती की पीठ पर बैठी हुई अपनी छूट रगड़ रागी थी, पूर्वी दीदी हमारे बगल में बैठ अपनी ननद को छुड़वाते देख रही थी, और उसका साथ दे रही थी.





मेरे से सीधे हाथ की और जहाँ ख़ुशी भाभी बैठ कर पापा का लुंड चूस रही थी, इतने में hi पंकज जीजा चंचल जीजी को छोड़ते हुए उनके पास पहुंचे तो पापा चंचल जीजी के होंठों को चूसने लगे, नीचे चंचल की ननद बैठ कर पापा का लुंड चूस रही थी और पीछे से पंकज जीजा उनकी छूट में एक तंग उठा कर लुंड पेल रहे थे,





पापा ने फिर ख़ुशी भाभी के मुँह से लुंड निकला और फिर उन्हें झुककर उनकी छूट में लुंड उतार दिया और छोड़ने लगे,

पापा- अह्ह्ह्हह्हह बहु, तू जितनी सूंदर है तेरी छूट भी उतनी hi मस्त है,

चंचल- अह्हह्ह्ह्ह हाँ ममः जी, बड़े नाज़ों से पाली है अह्हह्ह्ह्ह हमारी ननद रानी, इनका ख्याल रखना, इसकी अहह चुत कभी खाली मत रहने देनाअहह.

ख़ुशी- ओह्ह्ह्हह्ह भाभीयहह तुम भी नाहः.

पापा- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह ऐसी चुत कौन खाली छोडेगाहह,


एक और अनुज अब विनीत की सास यानी माधुरी तै को दनादन पेल रहा था तो उसके बगल में hi मौसा रिमझिम दीदी की चूचियों को छोड़ रहे थे,





कुछ पल बाद मौसा ने दीदी की चूचियों को छोड़ा और उन्हें झुककर अपना लुंड उनकी गांड में फंसा दिया और छोड़ने लगे,

पूरे हॉल में चुदाई पूरे चरम पर थी, और लोग अपने अपने चरम पर hi थे, कहीं से औरतों की चरमसुख की चीखें सुनाई दे रही थी तो कहीं मर्द अपनी पिचकारी की धार छूट या गांड में छोड़ रहे थे तो कहीं अपने रास से किसी का चेहरा रंग रहे थे, जो स्खलित होते जा रहे थे वो कुछ पल का आराम और कुछ खा पि रहे थे ताकि फिर से शरीर में ऊर्जा प्राप्त कर सकें, मैंने भी अपने रास की धार प्रीती की जवान छूट में छोड़ कर चुदाई का पहला दौर ख़तम किआ था वो भी चुड़ते हुए कई बार झाड़ चुकी थी,

खैर चुदाई का पहला दौर ख़तम हुआ तो सब लोग कुछ खान पान लेने लगे, और साथ hi आपस में बातों का दौर चल रहा था, सब जानते थे अभी प्रोग्राम लम्बा चलने वाला है, धीरे धीरे दोबारा से लुंड कड़क होने लगे तो विनीत ने कहा की थोड़ा अलग सा करते हैं इस बार अलग तरह की अलग अलग रिश्तों में चुदाई देखते हैं,

सबको ये सुझाव पसंद आया तो सबसे पहले माँ बीटा की चुदाई का प्रस्ताव आया जिसमे जो भी माँ बेटे के जोड़े वहां मौजूद थे सबके सामने चुदाई में लग गए, रमन और चेतन जीजा अपनी माँ की दोहरी चुदाई कर रहे थे तो, पंकज जीजा रेनू बुआ को घोड़ी बना कर छोड़ने लगे, विनीत ने भी बुआ को अपने लुंड पर बिठा रखा था और उछाल रहा था,

माँ बेटे की चुदाई ख़तम हुई तो फिर बाप बेटी की शुरू हुई जिसमे चरण सिंह ताऊ ख़ुशी भाभी को अपने लुंड पर उछाल रहे थे तो, उनके बगल में hi उदयवीर चाचा चंचल जीजी को छोड़ रहे थे, उनके बगल में बड़े फूफाजी रिमझिम जीजी को छोड़ रहे थे तो छोटे फूफाजी पूर्वी जीजी को, बाकी सब अपने अपने लुंड मसलते हुए ये कामुक दृश्य देख रहे थे,

बाप बेटी के बाद नंबर आया भाई बहन का, जिसमे भी कई जोड़ियां थी, जैसे ख़ुशी भाभी की दोहरी चुदाई होने लगी रमन और चेतन जीजा से तो बगल में विनीत पूर्वी दीदी को छोड़ रहा था, पंकज जीजा ने प्रीती को अपने लुंड पर टांग लिए था और उछाल रहे थे, उनके बगल में hi पापा ने बुआ को झुका कर उनकी गांड में लुंड घुसा दिया और अपनी बहन की गांड मरने लगे, उनके बगल में hi अनुज ने किरण को झुका कर उसकी छूट में लुंड उतार दिया और छोड़ने लगा, अब बात तो सही थी सगी न सही ममेरी बहन तो थी, तो उसी को देख मैंने भी रिमझिम जीजी को उन दोनों के बगल में ले जा कर छोड़ने लगा, क्योंकि बहन तो वो भी मेरी लगती थी,

भाई बहनो की चुदाई के बाद नंबर आया सास और दामाद की जोड़ी का, विनीत अपनी सास को अपने लुंड पर लेकर बैठ गया तो पंकज जीजा ने बुआ को उसके बगल में घोड़ी बना लिए, वहीँ चेतन जीजा ने अपनी सास बिमला चची की गांड में लुंड घुसा दिया, खैर सास दामाद की चुदाई का सबने ख़ुशी से लुत्फ़ उठाया, आखिरी में जो जोड़ी बानी वो थी समधी संधान की जिसमे बुआ को चरण सिंह ने पकड़ कर झुका लिए और अपना लुंड बुआ की गांड में उतार दिया, बड़े फूफाजी ने चरण सिंह की पत्नी माधुरी को भी उसी तरह बगल में झुकाया और उनकी गांड में लुंड उतार दिया, फूफाजी ने अपनी संधान रेनू को पकड़ा और उनके साथ वही किआ और झुककर उनकी गांड में अपना लौड़ा घुसा दिया, उदयवीर चाचा ने अपना लुंड बड़े फूफाजी के साथ hi माधुरी के मुँह में घुसा दिया,

पापा ने बिमला चची को पकड़ लिए ये कहकर की दूर की hi सही संधान तो हो, और अपना लुंड उनकी गांड में घुसा दिया, कुल मिलकर सब संधानो की गांड मारी जाने लगी, हम बच्चे दूर से ये सब देखते हुए गरम हो रहे थे और एक दुसरे के लुंड और छूट से खेल रहे थे, खैर हम लोगो से भी ज़्यादा देर नहीं रुका गया और सब लोग चुदाई में शामिल हो गए, मैंने अपनी होने वाली भाभी की गांड का स्वाद चखते हुए अपना लुंड उनकी गांड में उतार दिया, वहीँ विनीत ने मेरे बगल में hi प्रीती को घोड़ी बनाया और उसकी छूट में लुंड पेल दिया आखिर बहन की ननद को छोड़ने का मज़ा भी अलग hi होता है, अपनी चुदती हुई बहन के बगल में hi पंकज जीजा ने ममता चची को अपने ऊपर बैठा लिया और उनकी चुदाई करने लगे, अब हमें देख रमन जीजा भी आ गए और किरण की छुछियां चूसते हुए उसे अपने लुंड पर बैठा लिया... चेतन जीजा ने पूर्वी जीजी को पकड़ लिए और छोड़ने लगे, मौसा ने चंचल जीजी को नीचे लिटा दिया और उनके ऊपर लेटकर उनके होंठों को चूसते हुए अपना लुंड उनकी छूट में घुसा दिया, चंचल जीजी के बगल में hi उनकी देवरानी रिमझिम की गांड में अनुज का लोढ़ा अंदर बहार हो रहा था और रिमझिम जीजी तेजी से आहें भर रही थी,

पूरा हॉल फिर से चुदाई की आवाज़ों से गूंजने लगा, क्योंकि सब पहले भी एक दो बार झाड़ चुके थे इसलिए ये चुदाई भी लम्बी चल रही थी, मुझे ख़ुशी भाभी की गांड मरने में बड़ा मज़ा आ रहा था और उनकी आहों से लग रहा था उन्हें भी आ रहा था, विनीत भी हमारे hi बगल में प्रीती को घोड़ी बनाकर छोड़ रहा था, और अपनी होने वाली पत्नी के होंठों को झुककर चूस रहा था जो की मुझसे गांड मरवा रही थी, वही प्रीती के मुँह में ममता चची की चूचियां थी जिन्हे वो बड़ी लगन से चूस रही थी, ममता चची की गांड में उसके भैया का लुंड अंदर बाहर जो रहा था, विनीत ने ख़ुशी भाभी के होंठों को छोड़ा और प्रीती की छूट में दो चार धक्के लगाए और फिर अपने लुंड को उसकी छूट से निकला और उस पर थूका और फिर लुंड को प्रीती की गांड के छोटे से छेद पर रखा और अंदर घुसाने के लिए ज़ोर लगाने लगा तो प्रीती ने अपनी गांड अलग कर्ली. विनीत थोड़ा हैरान हुआ तो इसका जवाब पंकज जीजा ने दिया

पंकज- अरे साले साहब उसकी गांड नहीं मिलेगी, अभी किसी के नसीब में नहीं है, प्रीती ने तय किआ है की गांड तो अपने होने वाले जीवन साथी को hi देगी.

विनीत ये सुनकर मुस्कुराने लगा और अपना लुंड बापिस उसकी छूट में घुसते हुए बोलै- बहुत सही फैसला है प्रीती.

प्रीती ने बिना ममता चची की चुकी मुँह से निकाले ुहम्म्म्म की आवाज़ की और अपने चूतड़ों को विनीत की और बापिस फेंक कर अपनी सहमति जताई.

तभी हॉल के दूसरी और से एक तेज़ आवाज़ आई तो सबका ध्यान उस और गया वो आवाज़ प्रीती की माँ यानि रेनू बुआ की थी क्योंकि फूफाजी के साथ साथ, बड़े फूफाजी ने अपना लुंड रेनू बुआ की छूट में घुसा दिया था, एक साथ अपने दोनों छेदों में लुंड लेकर रेनू बुआ की चीख निकल गयी थी. पंकज जीजा और प्रीती दोनों hi अपनी माँ की दोहरी चुदाई देख कर और गरम हो रहे थे, और अपनी अपनी चुदाई का मज़ा ले रहे थे,

इतने में पूर्वी जीजी की आवाज़ आई - कोई इस रंडी के मुँह में लुंड दो बहुत चिल्लाती है.

अपनी सास के बारे में ऐसा बोलते हुए सुन कर सब हंसने लगे, पर चेतन जीजा ने पूर्वी जीजी की बात को गंभीरता से लिया और अपना लुंड जाकर रेनू बुआ के मुँह में घुसा दिया और अब रेनू बुआ की एक साथ टिहरी चुदाई होने लगी,

पूर्वी जीजी भी अपनी सास के पास जाकर अपनी छूट मसलते हुए उनकी टिहरी चुदाई देखने लगी, रेनू बुआ के लिए ये पहली टिहरी चुदाई थी वो भी इतनी ज़बरदस्त तो ज़्यादा देर तक वो सह नहीं पाई और झड़ने लगी, और ऐसा झड़ी की बिलकुल बेजान सी होकर एक और लेट गयी, फूफाजी और बड़े फूफाजी साथ hi चेतन जीजा ने उन्हें छोड़ दिया तो फूफाजी और बड़े फूफाजी तो सीधा चेतन की माँ यानि माधुरी तै के पास गए जिनकी गांड उदयवीर चाचा मार रहे थे और जल्दी hi माधुरी की भी टिहरी चुदाई hi रही थी,

फूफाजी का लुंड माधुरी तै की गांड में था, बड़े फूफाजी का छूट में और उदयवीर चाचा उनका मुँह छोड़ रहे थे,





माधुरी चची के बदन में एक साथ तीन तीन लुंड अंदर बाहर हो रहे थे, इधर बुआ को छोड़ते हुए चरण सिंह ने अपनी पत्नी की टिहरी चुदाई देखि और बगल में अपने बेटे को खड़ा देखा तो उसे अपने पास बुलाते हुए बोले- आ चेतन संधान की भी वैसी hi सेवा करते हैं जैसी तेरी माँ की हो रही है,

चेतन जीजा ने ये सुनते hi तुरंत आगे बढ़ कर अपना लुंड बुआ के मुँह में घुसा दिया और बुआ का मुँह छोड़ने लगे, नीचे से उनके पापा बुआ जी गांड अपने लुंड पर उछाल रहे थे,





रमन जीजा ने भी जब ये देखा तो उन्होंने भी किरण को छोड़ा और फुर्ती में जाकर बुआ की छूट में अपना लुंड घुसा दिया और तीनो बाप बेटे मिलकर बुआ की टिहरी चुदाई करने लगे,

दोनों संधानो की एक साथ टिहरी चुदाई होते देख ाचा लग रहा था, इसी बीच पापा ने बिमला तै को छोड़ते हुए अनुज को और मुझे आवाज़ दी तो मैं ख़ुशी भाभी को और अनुज रिमझिम जीजी को छोड़कर पापा की और गए वैस्व तो हम समझ गए थे की पापा क्या चाहते हैं बाकि उनके इशारे ने समझा दिया हमारे उनके पास पहुँचते hi पापा ने बिमला चची को खुद लेटकर अपने ऊपर ले लिया और लुंड छूट में घुसा लिया, वहीँ मैंने बिमला चची की गांड में लुंड घुसा दिया तो अनुज ने मुँह में और बिमला चची की भी टिहरी चुदाई होने लगी,





अब एक साथ तीन तीन गदराई औरतों की टिहरी चुदाई हो रही थी जो की आपस में एक दुसरे की संधान लगती थी, ऐसा दृश्य शायद hi कभी किसी ने देखा होगा, हम तीनो बाप बेटे मिलकर बिमला चची के तीनो छेदों की जबरदस्त चुदाई करने लगे,

रेनू बुआ तो पहले hi टिहरी चुदाई करवा कर पास्ट हो चुकी थी बाकी तीन औरतों की अभी हो रही थी, ममता चची पहले से hi पंकज जीजा के लुंड पर उछाल hi रही थी, इसी बीच मौसा और विनीत में कुछ इशारे हुए और कुछ hi पलों में दृश्य कुछ ऐसा था की ममता चची मौसा का लुंड अपनी छूट में लेकर उनके ऊपर बैठी थी, और विनीत का लुंड उनके मुँह में था और पंकज जीजा उनके पीछे से उनकी गांड में लुंड पिरो रहे थे,





एक साथ चार चार टिहरी चुदाई हो रही थी, अगर इस चीज़ के लिए कोई अवार्ड होता तो हमें ज़रूर मिलता,

बाकि साडी लड़किया या औरतें जो बची थी वो अपनी अपनी छूट रगड़ कर या एक दुसरे से चतवते चुसवाते हुए ये सब देख रही थी, ख़ुशी भाबी प्रीती की छूट और गांड चाट रही थी, तो पूर्वी दीदी किरण की, रिमझिम जीजी ने अपना मुँह लेती हुई अपनी बहन की सास यानी रेनू बुआ की टैंगो के बीच घुसाया हुआ था, तो चंचल जीजी रेनू बुआ के मुँह पर बैठी हुई थी और रेनू बुआ से छूट चटवा रही थी,

रेनू बुआ भी झड़ने के बाद अब थोड़ा शाहदारन हो चुकी थी और दोनों का साथ दे रही थी, पर उनके चेहरे पर एक संतुष्टि का भाव दिख रहा था और दिखे भी क्यों न इतनी जबरदस्त टिहरी चुदाई जिसकी होगी उसके हाव भाव तो बदलेंगे hi,

खैर अभी तो माधुरी तै के हाव भाव बदले हुए थे क्योंकि वो अपने तीनो संधियों के लोदों के बीच फंसकर अपने चरम पर पहुँच चुकी थी और कंपते हुए झाड़ रही थी, बेचारी बोलना चाहती थी पर मुँह में लुंड होने की वजह से आवाज़ निकल नहीं पा रही थी, खैर उनके झड़ने के बाद फूफाजी बड़े फूफाजी और उदयवीर चाचा ने उन्हें अपने बीच से हटा कर एक और लिटा दिया, उनके हटते hi फुर्ती दिखते हुए अपनी माँ की जगह ख़ुशी भाभी ने ली और अपने तीनो छेदों को लुन्डों से भरवा लिया और अपने ससुर और ताऊ ससुर को ये दिखाया की बहु बनकर वो कितने काम आने वाली है, फूफाजी बड़े फूफाजी और उदयवीर चाचा मिलकर ख़ुशी भाभी के गरम छेदों को छोड़ने लगे,





माधुरी तै के तुरंत बाद hi बुआ भी झड़ने लगी, जिन्हे चरण सिंह ताऊ अपने दोनों बेटों के साथ मिलकर छोड़ रहे थे बुआ के झड़ने पर तीनो न्र अपने अपने लुंड निकले और उन्हें भी एक और लिटा दिया, इधर उनके हटते hi पूर्वी जीजी ने अपनी माँ की जगह ले ली और फिर से तीनो लुंड को अपने अंदर समां लिए, रमन चेतन जीजा अपने पापा के साथ मिलकर फिर पूर्वी जीजी की टिहरी चुदाई करने लगे,





पूर्वी जीजी मज़े लेती हुई टिहरी चुदाई करवाने लगी, इधर बिमला चची भी मेरे अनुज और पापा के बीच कंपकपा रही थी और फिर झड़ने लगी, झड़ते हुए उनका मूट भी निकल गया जिसने पापा के लुंड और गोलियों को नहला दिया, मैंने अनुज ने और पापा ने अपने अपने लुंड उनके अंदर से निकले और उन्हें बीच से हटा कर एक और लिटा दिया, उनके हटते hi बिमला चची की प्यारी बेटी चंचल जीजी ने उनकी जगह ली और हमारे लुन्डों को अपने छेदों में जगह दी, पापा ने इस बार गांड में लुंड घुसाया तो अनुज को छूट मिली और मुझे उनका प्यारा सा मुँह जिसमे मैंने अपना लुंड घुसा दिया और उनका मुँह छोड़ने लगा





उनके हमारे ऊपर बैठते hi बगल में ममता चची झड़ने लगी थी, उनके झड़ने पर उनके हटते hi रिमझिम जीजी ने उनकी जगह ली और विनीत, मौसा और पंकज जीजा के लुंड अपने अंदर ले लिए और उनकी भी टिहरी चुदाई होने लगी, मौसा का लुंड उनकी गांड में था तो पंकज जीजा का छूट में वहीँ विनीत का बड़े प्यार से वो चूस रही थी,





इधर प्रीती और किरण एक दुसरे की छूट को सहलाते ये सब देख रही थी, और उत्तेजित हो रही थी, जब उनसे कुछ देर तक नहीं सहा गया तो किरण प्रीती के होंठों पर टूट पड़ी और दोनों एक दुसरे के होंठों को चूसने लगी और फिर प्रीती भी किरण की और घूम गयी और दोनों एक दुसरे की आँखों में देखते हुए अपनी अपनी छूट एक दुसरे की छूट से रगड़ने लगी जिसमे दोनों को hi बहुत मज़ा आ रहा था,





प्रीती- अह्ह्ह्हह्हह माहहहह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बड़ा अच्छा लग रहा है अह्हह्ह्ह्ह,

किरण- ओह्ह्ह्हह्ह मुझे भी अह्हह्ह्ह्ह

प्रीती- मैं एई पहलियी बार कर रहीए हूँ अह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह,

किरण- मैंने भी अभी हाल hi में सीखा है,

दोनों की छूट घिसाई चल रही थी इधर चार चार जगह टिहरी चुदाई चल रही थी, जिसमे सबसे पहले हार मानी होने वाली नयी बहु ख़ुशी भाभी ने, पर वो अकेले नहीं झड़ी बल्कि फूफाजी, बड़े फूफाजी और उदयवीर चाचा ने एक साथ अपना रास उसके छेदों में छोड़ दिया, और फिर सब अलग हो गए, कुछ hi पलों में पूर्वी जीजी भी झाड़ रही थी साथ hi चेतन रमन जीजा और उनके पापा ने भी अपना रास पूर्वी जीजी के छेदों में उढेल दिया,

इधर चंचल जीजी के साथ हम तीनो बाप बेटों ने भी ऐसा hi कुछ किआ और उनके छेदों को अपने अपने रास से भर दिया और अलग हो गए, विनीत, पंकज जीजा और मौसा ने रिमझिम जीजी को अपने अपने रास से भर कर अलग हो गए,

कुछ hi पलों में किरण और प्रीती भी छूट घिसाई से चिल्लाते हुए झाड़ रही थी.

सब लोग झाड़ चुके थे, और अब किसी के अंदर और चुदाई करने की हिम्मत नहीं दिखाई दे रही थी, खैर थोड़े आराम के बाद नाश्ता वगेरा परोसा गया और फिर नाश्ते के बाद हम सब लोग तैयार हुए, हालाँकि चरण सिंह ताऊ और उनका परिवार बहुत ज़िद्द कर रहा था रोकने के लिए पर सबका जाना ज़रूरी था इसलिए शगुन वगेरा एक दुसरे को देकर सबसे विदा लेकर निकल लिए, पंकज जीजा भी आते हुए हमारे साथ hi आये,

खैर रस्ते भर ज़्यादा तर लोग सोते हुए आये, और करीब रात 11 बजे के बाद हम लोग बुआ के घर पहुंचे, सब बुरी तरह से थके हुए थे तो माँ और बड़ी बुआ से मिलकर सब लोग जल्दी hi सो गए.


जारी रहेगी.
 
हालाँकि चरण सिंह ताऊ और उनका परिवार बहुत ज़िद्द कर रहा था रोकने के लिए पर सबका जाना ज़रूरी था इसलिए शगुन वगेरा एक दुसरे को देकर सबसे विदा लेकर निकल लिए, पंकज जीजा भी आते हुए हमारे साथ hi आये,

खैर रस्ते भर ज़्यादा तर लोग सोते हुए आये, और करीब रात 11 बजे के बाद हम लोग बुआ के घर पहुंचे, सब बुरी तरह से थके हुए थे तो माँ और बड़ी बुआ से मिलकर सब लोग जल्दी hi सो गए. अब आगे..

अपडेट 240


सुबह मैं देर तक सोता रहा, और पूर्वी दीदी के जगाने से जगा,

पूर्वी- अरे उठ जा अब कर्मा, नाश्ता तैयार है चल आजा ब्रश वगेरा करके,

में- आता हूँ दीदी,

दीदी मुझे जगा कर चली गयी तो मैं भी उठा और शौच वगेरा निपटा कर आँगन में पहुंचा जहाँ सब नाश्ता कर रहे थे,

बुआ- बैठ जा लल्ला, आज तेरी पसंद के पालक के पकोड़े बनाये हैं मैंने,

बुआ ने रसोई से hi कहा, वो और माँ दोनों रसोई में लगे हुए थे,

प पूर्वी- आजा मेरे साथ hi बैठ जा न, भाई बहन साथ में खाएंगे. मम्मी बस इसकी चाय दे दो,

में- हाँ साथ खाऊंगा दीदी के.

बुआ जल्दी hi मेरे लिए भी चाय ले आई,

बुआ- सब कर रहे हैं नाश्ता ये अनुज और प्रीती दिखाई नहीं दे रहे,

किरण- अरे वो लैला मजनू एक साथ होंगे कहीं, अब प्यार में भूख कहाँ लगती है.

किरण ने हँसते हुए कहा,

पंकज- अरे अभी बताता हूँ इन दोनों को,

पंकज जीजा ने मज़ाक में hi उठाते हुए कहा,

पूर्वी- ाचा क्या बताओगे? मेरे भाई को कुछ बोल मत देना,

पंकज- देखो तो तुरंत आ गयी अपने भाई को बचने, पता नहीं क्या करेगा तुम्हारा भाई मेरी प्यारी सी बहन के साथ.

पति पत्नी की ऐसी नोकझोक देख सब हंस रहे थे,

पूर्वी- क्या करेगा, ज़्यादा से ज़्यादा तुम्हारी बहन छोड़ देगा,

इस पर तो सब ठहाका मार के हंसने लगे, पंकज जीजा की मम्मी यानि रेनू बुआ भी खूब खिलखिलाते हुए हंस रही थी,

पंकज- अरे ऐसे कैसे बहन छोड़ देगा?

पूर्वी- क्यों तुम नहीं छोड़ते हो उसकी बहन?

ममता चची- ये बात तो बिलकुल सही कही बिटिया, क्यों दामाद जी तुम भी तो रोज़ हपक कर छोड़ते हो हमारी बिटिया को,

पंकज- अरे मामी ये तो हमारी पत्नी है.


पूर्वी- तो क्या हुआ अनुज और प्रीती का भी ब्याह करवा देंगे, वो भी उसकी पत्नी बन जाएगी.

किरण- अरे वाह्ह्ह्ह ये बढ़िया रहेगा, प्रीती hi मेरी भाभी बननी चाहिए.

बड़ी बुआ- और का अभी पक्की कर लेते हैं संधान भी यही हैं, क्यों संधान लड़का पसंद है तुम्हे?

रेनू बुआ सवाल सुनकर थोड़ा झेंप गयी और शरमाते हुए बोली- अरे अब हम क्या बताएं जो आप सब को पसंद हो,

बुआ- लो दुल्हन से ज़्यादा तो उसकी माँ शर्मा रही है,

ये सुनकर तो रेनू बुआ का चेहरा hi लाल हो गया,

बुआ- अरे संधान जी क्या शर्मा रही हो, अभी बात कर लो नए समधी संधान भी यही हैं.

पंकज- देखो तो सब लोग कैसे मेरी बहन का रिश्ता करने में लग गए,

पूर्वी- क्यों क्या गलत है, क्या खराबी है मेरे भाई में, तुम्हे तो बस एक बात का दर होगा,

पंकज- दर किस बात का दर?

पूर्वी- यही की फिर तुम भी विनीत, अनुज और कर्मा के साले बन जाओगे,

इस पर सब तेजी से हंस पड़े, यहाँ तक की पंकज जीजा को खुद हंसी आ गयी,

में- अरे पर विनीत है कहाँ? वो भी नहीं दिख रहा?

फूफाजी- अरे वो डेरी पर है, दूध वगेरा देकर आ जायेगा,

में- ाचा, ब्याह की बात क्या हुई लड़का काम करने लगा...

ममता चची- क्यों संधान बताया नहीं कैसा लगा रिश्ता?

रेनू- अब हम क्या बताएं हमें तो पसंद है पर बिटिया के पापा से पूछना पड़ेगा न,

फूफाजी- अरे उसमे क्या है अभी पूछ लेते हैं, विनीत मेरा फ़ोन उठा तो,

रेनू- अरे अभी से, थोड़ी बहुत देर में घर जाकर पूछ लेते आराम से,

बुआ- घर कौन जा रहा है घर?

रेनू- अरे घर तो जायेंगे hi न, निकलेंगे थोड़ी देर में,

बुआ- देखो संधानजी साफ़ साफ़ बता देती हूँ, आज तो कोई जाने से रहा,

रेनू- अरे पर वहां प्रीती के पापा अकेले हैं न तो जाना तो पड़ेगा न संधान जी.

बुआ- पूर्वी के पापा तुम फ़ोन कार्डो समधी जी को, वो कर लेंगे कुछ न कुछ.

ये सुन फूफाजी फ़ोन लेकर बात करने चले जाते हैं,

बुआ- अब ठीक है? अब तो उनकी आज्ञा भी मिल जाएगी.

रेनू- अरे वो पर ऐसे ाचा नहीं लगता न वो वहां पर अकेले रहे.

बड़ी बुआ- अरे संधान क्या ाचा नहीं लगता, पति की याद सत्ता रही है क्या तुम्हे?

ममता चची- अरे ये भी कोई बात हुई यहाँ इतने लोग हैं कोई भी पूरी कर देगा कमी, बताओ किसे बनाना है दामाद जी के दुसरे पापा?

इस पर सब हंसने लगे और पंकज जीजा मज़ाक में ममता चची को पकड़ कर दबोचने लगे.

पंकज- मामी तुम बड़ी ख़राब हो, बताओ मेरे लिए दुसरे पापा बना रही हो,

ममता चची- अरे ख़राब क्या हम तो तुम्हारी मम्मी की कमी पूरी कर रहे थे,

रेनू- अरे हमने कब कहा की कमी है कोई हम तो बस जाने की कह रहे थे,

बुआ- संधान जी तुम ऐसे नहीं मानोगी लगता है दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा,

रेनू- कैसा तरीका,

बुआ- अभी बताते हैं संधान जी, पूर्वी पकड़ तो अपनी सास को

ये कहकर बुआ ने बड़ी बुआ और माँ को इशारा किआ,

रेनू- अरे संधान जी नहीं, पूर्वी तू बहुत पिटेगी बता रही हूँ अगर पास आई तो,

रेनू एक और चिल्लाते हुए भागी पर पूर्वी दीदी से बचने के चक्कर में बड़ी बुआ की और चली गयी और बड़ी ने लपक कर उन्हें पकड़ लिए, बड़ी बुआ के पकड़ते hi पीछे से बुआ ने घेर लिए और लगे हाथ पूर्वी दीदी और किरण भी एक एक और से लग गयी, अगले कुछ पल तो रेनू बुआ के सिर्फ हंसने और चीखने की आवाज़ आई बस,

पंकज जीजा ममता चची के पेट और चूचियां मसलते हुए अपनी मम्मी के साथ ये अत्याचार होता देख रहे थे,

कुछ देर बाद जब छतों हटी तो बेचारी रेनू बुआ के बदन पर एक कपडा भी नहीं था सबके सामने खुद को नंगी पाकर रेनू बुआ ने तुरंत पूर्वी दीदी के हाथ से अपनी सारी ली और उसे तौलिया की तरह अपनी कमर से लपेटने लगी पर बेचारी क्या क्या छुपाती ऊपर से तो नंगी hi थी उनकी मोती छुछियां सबके सामने थी और वो अपने नीचे के सामान को शरमाते हुए बचा रही थी,





हम सब मर्दों की नज़र तो उनकी मोती चूचियों पर hi थी और सब अपने होंठो पर जीभ फिरा रहे थे,

रेनू- अरे देखो क्या किआ संधान जी सबके सामने hi ये सब,

रेनू बुआ शरमाते हुए बोली हालाँकि अंदर hi अंदर उन्हें भी एक उत्तेजना महसूस हो रही थी ऐसे सबके सामने नंगे होने में,

बुआ- अरे संधान अब हो hi गयी हो नंगी तो क्या कहना खज़ाना छुपा रही हो इसे भी दिखाओ,

ये कहकर बुआ ने फिर से सारी खींच दी और रेनू बुआ एक बार फिर से नंगी हो gayi,par इस बार उन्होंने अपनी सारी को छोड़ा और बुआ को पकड़ लिए और उनकी सारी पकड़ के खींचने लगी,

रेनू- हमें नंगा करके खुद कपडे पहन के घूम रही हो संधान,

रेनू बुआ भी अब थोड़ा और खुलते हुए बोली,

बुआ- अरे हमने कब मन किआ है संधान आओ उतार लो,

इतने में फूफाजी भी अंदर आये और बोले- लो भाई समधी जी से बात हो गयी है पर यहाँ तो तुमने कुछ और hi प्रोग्राम चालू कर दिया भाई,

बड़ी बुआ- संधान hi नहीं मान रही थी बड़ी ज़िद्द कर रही थी,

रेनू- ाचा मैं नहीं मान रही थी या तुम लोगो ने मिलकर हुम्ला कर दिया मुझपर.

इतने में फूफाजी का फ़ोन दोबारा बजा तो वो उठाते हुए फिर से कमरे की और चले गए,

रेनू दोनों हाथों से बुआ के कपडे उतारते हुए बोली, बुआ लगभग नंगी hi हो चुकी थी सिर्फ बदन पर पेटीकोट का नाडा था जिसे भी रेनू ने खींच कर खोल दिया और बुआ बिलकुल नंगी हो गयी,

बड़ी बुआ- लो भाई अब हुई दोनों संधान नंगी,

दोनों को नंगा देख कर सब मर्दों के लुंड टनटनाने लगे थे,

नंगी होकर बुआ ने रेनू की चूचियों को पकड़ लिए और धीरे धीरे दबाते हुए बोली- हाय संधान तुम्हारी छाती देख कर तो मुँह में पानी आ रहा है,

अब रेनू बुआ भी खुल चुकी थी तो उन्होंने भी हाथ बढाकर बुआ की मोती छुछियां पकड़ ली और बोली- खुद तो दूध की इतनी बड़ी बड़ी थैलियां लिए घूमती हो और मेरी देख कर पानी आ रहा है,

बुआ- पानी तो तुम्हारे रसीले होंठों को भी देख कर आ रहा है संधान इनका रास पीला दो,

रेनू- रोका किसने है संधान जी पि लो न,

बस फिर क्या था दोनों के होंठ मिल गए और दोनों एक दुसरे के होंठों को चूसने लगी,

बड़ी बुआ- अरे भाई इन दोनों संधानो का प्यार देख कर तो हमें गर्मी लगने लगी,

वैसे बुआ सही कह रही थी सिर्फ उन्हें hi नहीं बल्कि सरे मर्दों को hi कुछ कुछ हो रहा था, मेरा लुंड भी पूरी तरह से तन चूका था,

पूर्वी- अब क्यों चुप हो, अब देखो अपनी मम्मी को कैसे मेरी माँ के होंठों को चूस..

पूर्वी दीदी अपने पति की और दिखते हुए बोली पर जैसे hi उनकी नज़र अपने पति पर पड़ी वो बोलते बोलते रुक गयी क्योंकि सामने पंकज जीजा ने ममता चची का ब्लाउज कब उतर दिया किसी को खबर hi नहीं थी और अभी ममता चची को दीवार से लगा कर उनका गदराया पेट मसलते हुए चूम चाट रहे थे

ममता चची भी उनके हर चुम्बन पर मचलते हुए आहें भर रही थी,





पूर्वी- लो अपनी माँ को छोड़ ये तो मामी में लग गए हैं,

बड़े फूफाजी- अब मामी hi ऐसी हैं तो लग्न तो था hi,

इधर बुआ और रेनू बुआ ने एक दुसरे के होंठों को छोड़ा तो फिर अगला धावा एक दुसरे की चूचियों पर बोल दिया दोनों बड़ी आक्रामक होकर एक दुसरे की चूचियों को मसलते हुए चूस रही थी, कभी रेनू बुआ की चूसती तो कभी बुआ रेनू की, दोनों संधानो का प्रेम देख कर सबके लुंड कड़क हो रहे थे तो छूटें नाम,

किरण ने भी ये सब देखा तो उसे शरारत सूझी और वो पूर्वी दीदी का ब्लाउज पकड़ कर उतरने लगी,

पूर्वी- ये क्या कर रही है तू?

किरण- अरे तुम्हारी माँ, सास सब hi तो लगे पड़े हैं तो तुम क्यों पीछे रहो दीदी,

किरण की बातें सुन कर पूर्वी दीदी हंसने लगी इतने में किरण ने पूर्वी दीदी के ब्लाउज को पूरी तरह से उतार दिया था और पूर्वी दीदी ने भी खिलखिलाते हुए उसका पूरा साथ दिया,

ब्लाउज उतरने के बाद किरण ने दीदी की ब्रा को पकड़ कर खींचा तो वो फैट गयी,

पूर्वी- धत्त देख मेरी ब्रा फाड़ दी तूने, देखो मां तुम्हारी लाड़ली ने मेरी ब्रा फाड़ दी,

पूर्वी दीदी अपनी सारी का पल्लू पकडे हुए अपने गर्दन से लटकती फटी हुई ब्रा को पापा को दिखते हुए बोली,





पर मैं इतना पूरे विश्वास से कह सकता था की अभी पापा या किसी की भी नज़र दीदी की ब्रा पर तो बिलकुल नहीं थी, सब उनकी मोती चूचियों को hi देख रहे थे जिन पर किरण झपट पड़ी और अपना मुँह लगा दिया,

पापा के बगल में बैठे मौसा बोले अब मुझसे तो रुका नहीं जा रहा और उठ कर पूर्वी दीदी की दूसरी चूची में उन्होंने अपना मुँह लगा दिया साथ hi हाथ से उनके पेट को सहलाने लगे,

पूर्वी- अह्हह्ह्ह्ह शैलेश मामाआहह ऐसी hi खा जाओ मेरी चूचियों को,

मौसा का इरादा तो कुछ ऐसा hi लग रहा था,

मौसा के उठने के बाद पापा से भी नहीं रह गया और वो सीधे उठ कर बड़ी बुआ के पास पहुंचे, और बड़ी बुआ को पीछे से बाहों में जकड लिए,

पापा- जीजी बस तुमसे hi ठीक से मिलना रह गया है हमारा,

बड़ी बुआ- हाँ नीलेश बच्चो के लुंड तो हमने बहुत ले लिए अब उनके बाप का भी तो चख कर देखूं,

ये कहते हुए बुआ अपने चूतड़ पापा के लुंड पर घिसने लगी, पापा ने भी जोश में आते हुए बुआ के ब्लाउज को पकड़ कर खींच दिया तो ब्लाउज आवाज़ के साथ फैट गया और बड़ी बुआ की पापीती जैसी चूचियां बाहर आ गयी,

बड़ी बुआ- अह्ह्ह्हह्हह इतने बेसबर हो अपनी बहन की चूचियों को देखने के लिए,

पापा- इतनी मोती छुछियां देख कर सबर कहाँ होता है जीजी,

पापा उनकी चूचियों को मसलते हुए बोले,

बड़ी बुआ- ुहम्म्म्म ऐसी hi मसल दो भैयाहः अपनी बहन की चूचियां अह्ह्ह्हह्हह,

इधर अपनी पत्नी को अपनी चूचियां मसलवटे हुए कुछ पल देख बड़े फूफाजी ने अपनी नज़र बापिस किरण मौसा और पूर्वी दीदी को और की, जिन्हे वो काफी देर से देख रहे थे, खासकर किरण को, फ्रॉक में उसके गोल मटोल चूतड़ों को देख बड़े फूफाजी का लुंड ठुमके मार रहा था और फिर कुछ पल बाद खड़े हुए और आगे बढ़ कर किरण के पीछे जाकर खड़े हो गए और फ्रॉक के ऊपर से hi उसके चूतड़ों को सहलाने लगे, किरण ने अपने चूतड़ों पर हाथ महसूस किआ तो पूर्वी दीदी की चुकी को मुँह से निकल कर चेहरा घुमा कर देखा और सामने बड़े फूफाजी को देख मुस्कुराने लगी,

बड़े फूफाजी- किरण बिटिया, अपने बड़े फूफाजी से नहीं मिली तू ठीक से,

किरण- अब मिल लेती हूँ, फूफाजी,

ये कहकर किरण घूम गयी और उछाल कर बड़े फूफाजी की गॉड में चढ़ गयी बड़े फूफाजी ने उसे गॉड में उठाया और लेकर एक और बिस्तर पर बैठ गए, आउट किरण के चूतड़ों को सहलाने लगे वहीँ किरण के होंठों से भी अपने होंठ जोड़कर उसकी जवानी का स्वाद लेने लगे, उनके हाथ फ्रॉक के अंदर से किरण के चूतड़ों को मसल रहे थे,

इधर मेरा पेट भर गया था तो मैंने अपने नाश्ते के बर्तनों को एक और सरकाया और अपने सामने चल रहे, दोनों संधानो के खेल को देखते हुए, अपना पजामा और टीशर्ट उतर कर पूरा नंगा हो गया, और फिर उनकी और बढ़ गया, बुआ और रेनू बुआ एक दुसरे की छूट को उँगलियों से मसलते हुए एक दुसरे के होंठों को चूस रही थी मैंने आगे बढ़ कर दोनों के होंठों के बीच अपना लुंड रख दिया तो दोनों ने एक बार लुंड को महसूस कर मेरी और देखा फिर एक दुसरे की आँखों में देख कर मुस्कुराई और फिर मेरे लुंड को चूमने लगी, जैसे एक दुसरे को चूम रही थी,

उनकी गरम जीभ टोपे पर पड़ते hi मेरे मुँह से तो एक गरम अह्ह्ह्हह्हह निकल गयी, जीभ चलते हुए बुआ ने मेरा लुंड मुँह में भर लिए तो मेरी आँखें मज़े से बंद हो गयी, वहीँ रेनू बुआ मेरी गोलियों को चाटने लगी, कुछ पल बाद बुआ ने अपने थूक से सना हुआ लुंड निकला तो रेनू बुआ ने अपने मुँह में भर लिए, दोनों बदल बदल कर मेरा लुंड चूसने लगी, और मैं तो जैसे जन्नत में था, कुछ पल ऐसे hi चूसने के बाद बुआ ने मुझे पलटने का इशारा किआ मैं पलट गया तो मुझे अपने चूतड़ों पर उनके हाथ महसूस हुए और फिर उनके होंठ भी मेरे चूतड़ों को चूमने लगे, चूतड़ों को चूमते हुए उन्होंने दोनों को फैलाया तो मैं समझ गया क्या होने वाला है अगले hi पल मुझे अपनी गांड की दरार में गरम और गीला एहसास हुआ जो की बुआ की जीभ थी, मेरे मुँह से फिर से सिसकी निकल गयी, बुआ अपनी जीभ मेरी गांड की दरार में चलने लगी और मैं सिसकने लगे,

में- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म बाआहहहहहहहह..

कुछ पल बाद बुआ की जीभ मेरी गांड की दरार से हटी और फिर अगले hi पल फिर से मेरी दरार में जीभ आ गयी, मैंने आगे थोड़ा झुककर दीवार पर हाथ लगा लिए ताकि बैलेंस बना रहे कुछ पल बाद बुआ मेरे सामने आई टांगो के बीच और मेरा लुंड मुँह में भर लिए, तब जाकर मुझे पता चला की अभी मेरी गांड रेनू बुआ चाट रही थी, दोहरे हमले से मैं तो सिहर उठा, एक जीभ गांड पर चल रही थी, लुंड बुआ के मुँह में था जिसे वो पूरे जोश से चूस रही थी और मेरी आँखें बंद थी मज़े से,

दूसरी और पंकज जीजा ने भी ममता चची को घोड़ी बना रखा था ममता चची के बदन पर सिर्फ एक पेटीकोट था वो भी कमर पर पर इकठा हो रखा था, पंकज जीजा ममता चची के मोठे चूतड़ों को फैला कर अपना मुँह उनके बीच फैलाकर उनकी गांड और छूट को चाट रहे थे, ममता चची भी सिसकते हुए उनका हौसला बढ़ा रही थी

ममता- अह्ह्ह्हह्हह दामाद जी अह्हह्ह्ह्ह घुस जाओ हमारी गांड में अह्हह्ह्ह्ह अह्हह्ह्ह्ह तुम भी अपनी माँ आह्हः पर गए हूँ, अह्ह्ह्हह्हह देखो वो रनडीईई कैसे कर्मा की गांड चाट रही है, अह्हह्ह्ह्ह.

पंकज जीजा का जोश अपनी माँ के बारे में सुन सुन कर और बढ़ रहा था, और उस जोश के साथ वो चची की गांड में जीभ घुसा रहे थे,

इधर उनकी पत्नी यानि हमारी पूर्वी दीदी मौसा के साथ बिलकुल नंगी थी और अभी 69 के आसान में उनका लुंड चूस रही थी, मौसा नीचे लेते उनके चूतड़ों को मसलते हुए अपनी जीभ दीदी की छूट में चला रहे थे वहीँ दीदी मौसा का लुंड जड़ तक मुँह में भर कर चॉऊस रही थी, साथ hi अपनी एक उंगली से मौसा के गांड के छेड़ को कुरेद रही थी जिससे मौसा और जोश में आकर उनकी छूट चाट रहे थे,

उनके थोड़ा पीछे hi बड़े फूफाजी बिस्तर पर टांग लटकाये बैठे थे और किरण उनकी टैंगो के बीच बैठकर उनका लुंड चूस रही थी, बड़े फूफाजी को तो यकीन नहीं हो रहा था की ये इतनी सुन्दर और भोली सी दिखने वाली लड़की उनका लुंड ऐसे चूस रही थी की उनके मुँह से बार बार सिसकियाँ निकल रही थी,

वहीँ उनके बगल में hi पापा बैठे थे उन्ही की तरह और बड़ी बुआ उनके पैरों में बैठ कर पापा का लुंड चूस रही थी,

बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह नीलेश बाबू ये लड़की अभी से इतनी खतरनाक है ब्याह के बाद क्या hi करेगी,

पापा- अह्ह्ह्हह्हह अपनी माँ और बुआ के कदमो पर चल राहीईई हीीीाहहह अह्हह्ह्ह्ह जीजी,

(लेखक की ज़ुबानी)

इतने में फूफाजी फ़ोन पर बात ख़तम करके बापिस आये और सबको देखा चुदाई में लगे हुए और फिर बोले- अरे सब यहीं हैं ये अनुज और प्रीती कहाँ है, ये बोलकर वो ऊपर चल दिए सोच कर शायद ऊपर के कमरे में होंगे दोनों,

जैसे hi ऊपर पहुंचे तो कमरे के पास पहुँचते hi उन्हें अंदर से सिसकियों की आवाज़ सुनाई देने लगी वो समझ गए दोनों यही हैं, फूफाजी ने आगे बढ़कर दरवाज़े से अंदर झाँका तो सामने का दृश्य देख थोड़े हैरान हुए और अंदर कदम बढ़ाते हुए बोले- अरे भाभी तुम भी यही हो?

फूफाजी सामने का नज़ारा देखते हुए बोले जहाँ बिस्तर पर प्रीती अपनी पीठ पर लेती हुई थी और अनुज उसके ऊपर था और दनादन उसकी छूट में धक्के लगा रहा था वहीँ प्रीती के मुँह पर सभ्य बैठी थी आगे को झुककर, प्रीती सभ्य की छूट चाट रही थी नीचे से तो अनुज पीछे से अपना मुँह अपनी माँ के चूतड़ों में घुसा कर उसकी गांड चाट रहा था,





सभ्य अपने बेटे और प्रीती के द्वारा किये जा रहे दोहरे हमले से आहें भरते हुए सिसक रही थी और सिसकते हुए hi उसने सामने खड़े नन्दोई को जवाब दिया- अह्हह्ह्ह्ह हांण भैयाहः मैं तो इन्हे नाश्ता आह्ह्ह्हह्ह देने आई थी इन लोगोऊ ने मुझे भी अपनी साथ लगा लियाः,

फूफाजी की आँखें चौड़ी हो राखी थी वो पहली बार अपनी सलहज को ऐसे देख रहे थे जिसे छोड़ने के बारे में उन्होंने न जाने कितनी बार सोचा था, सभ्य को नंगा देख कर उनका पहले से खड़ा लुंड ठुमके मारने लगा,

फूफाजी- ाचा हुआ भाभी नहीं तो हमें ये नज़ारा देखने को कहाँ मिलता,

फूफाजी ने आगे बढ़ते हुए कहा और बिस्तर के पास पहुँच कर सभ्य की नंगी पीठ पर हाथ फिरने लगे, अनुज और प्रीती लगातार अपने अपने काम में लगे हुए थे,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म क्या अह्ह्ह्हह्हह नज़ारा मिलाहहःममम

सभ्य आगे बोलती की इससे पहले फूफाजी ने अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए और रसीले होंठों को चूसने लगे, सभ्य भी तुरंत hi अपने नन्दोई का पूरा साथ देने लगी, एक साथ तीनो छेदों पर मुँह होने से सभ्य तो उत्तेजना में उड़ रही थी, होंठो को चूमते हुए फूफाजी के हाथ सभ्य के बदन पर चलने लगे और पीठ से होकर जल्दी hi सभ्य की मोती चूचियों पर आ गए जिन्हे पकड़कर वो मसलने लगे,

साथ hi होंठों की लड़ाई जारी थी, कुछ पल तक यूँ होंठों की चूसै जारी रही उसके बाद फूफाजी ने सभ्य के होंठों को छोड़ा और उसके गले छाती को चूमते हुए उसकी चूचियों तक पहुँच गए और जोश में आकर मुँह में भर भर के चूचियों को बदल बदल कर चूसने लगे, सभ्य भी वैसे hi इतनी उत्तेजित थी वो उनका चेहरा अपनी छाती में दबा कर उनका जोश और बढ़ने की कोशिश कर रही थी, सभ्य तिहरे हमले से इतनी उत्तेजित हुई की वासना के शिखर पर पहुँच गयी और झड़ने लगी, उसकी छूट ने प्रीती के मुँह में अपना रास छोड़ दिया जिसे प्रीती बड़े चाव से गटकने लगी, सभ्य तीनो के बीच कांपते हुए झाड़ रही थी झड़ने के बाद फूफाजी ने उसकी छुछियां छोड़ी तो अनुज ने भी अपना मुँह अपनी माँ की गांड से हटा लिया वहीँ फूफाजी ने पकड़ कर सभ्य को प्रीती के मुँह से हटा लिया. सभ्य के हटते hi अनुज ने प्रीती के मुँह से अपने होंठ लगा दिए और दोनों सभ्य की छूट और गांड का स्वाद एक दुसरे से बांटने लगे,

कुछ पल बाद सभ्य झड़ने के बाद शांत हुई तो फूफाजी सभ्य के नंगे बदन को सहलाते हुए बोले- भाभी बच्चों को मज़े लेने दो तुम हमारे साथ चलो,

सभ्य- हाँ चलो नन्दोई जी बस एक मिनट,

ये कहकर सभ्य बिस्तर के नीचे पड़ी अपनी ब्रा उठाकर पहनने लगी और ब्रा चढ़ाते hi जैसे hi पेटीकोट उठाने के लिए झुकी तो फूफाजी ने उन्हें रोक लिए और बोले- अरे भाभी काहे पहन रही हो इनकी ज़रुरत है, हमें भी अपना ये गदराया बदन अचे से देखने दो,

फूफाजी ने सभ्य को पीछे से बाहों में भरते हुए कहा, तो सभ्य ने भी पेटीकोट को छोड़ दिया,

सभ्य- अब नन्दोई जी की बात तो माननी hi पड़ेगी,

ये कह सभ्य मुस्कुराते हुए फूफाजी के साथ बदन पर सिर्फ एक ब्रा पहने हुए कमरे से बाहर निकल गयी,

(कर्मा की ज़ुबानी)

नीचे की चुदाई अपने पूरे जोश पर थी, मैंने रेनू बुआ को घोड़ी बना रखा था और पीछे से उनकी छूट में लुंड पेल रहा था वहीँ बुआ उनके सामने बैठी थी और रेनू बुआ का मुँह अपनी चूचियों में दबा रही थी,

रेनू बुआ भी अपनी छूट मरवाते हुए बुआ की चूचियों को चाट रही थी,

बुआ- अह्ह्ह्हह्हह संधान चूस लो मेरी चूचियां अह्ह्ह कर्मा छोड़ संधान को और तेज धक्के लगा इस रंडी की छूट में, साली बहुत नखरे करती है आज सारे नखरे निकाल दे इसके.

बुआ अपनी संधान को गरियाते हुए हमारा उत्साह बढ़ा रही थी,

दूसरी और से पंकज जीजा अपनी माँ की चुदाई होते देख रहे थे साथ hi अपना लुंड ममता चची की गांड में अंदर बाहर कर रहे थे,

ममता चची- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह दामाद जी मारो हमारी गांड अह्हह्ह्ह्ह घुसा घुसाहहह कर,

पंकज- अह्ह्ह्हह्हह मामीई बिनाह मारे अब रहाः भी नहीं जाएगाःह्ह्ह,

उनके ठीक सामने hi मौसा उनकी पत्नी यानी पूर्वी दीदी की गांड मार रहे थे या सच कहें तो पूर्वी दीदी खुद गांड मरवा रही थी, मौसा नीचे लेते थे और पूर्वी दीदी उनका लुंड अपनी गांड में लिए हुए अपने चूतड़ उस पर पटक रही थी,





मौसा तो हर धक्के के साथ और पूर्वी दीदी का जोश देख सिसक रहे थे,

एक तरफ पापा ने बड़ी बुआ की छूट को भेद रखा था पर वो बड़ी बुआ की चुदाई कुछ अलग ढंग से कर रहे थे, कुछ देर तक वो उनकी छूट में धक्के लगते और फिर लुंड निकल कर बुआ की गांड में घुसा देते और फिर कुछ देर गांड मारते ऐसे बदल बदल कर वो दोनों छेदों का मज़ा ले रहे थे,

दोनों के बगल में बड़े फूफाजी तो किरण से बड़े खुश थे और उसे अपने लुंड पर उछाल रहे थे किरण उनका मोटा लुंड अपनी छूट में लेकर उछाल रही थी,

बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह क्याह गरम चुदाई करवाती है तू, अह्ह्ह्हह्हह ऐसी छूट है टेरिइइइ अह्ह्ह्हह...

किरण- अह्ह्ह तुम्हारा यह लुंड भी बहुत्तत्त मस्त्त है फूफाजी अह्ह्ह्ह बहुत माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह दे रहा है,

इधर मैंने थोड़ा हासन बदल लिए था और साथी भी, अभी मैं बिस्तर पर पेअर लटका कर बैठा था और बुआ मेरे ऊपर मेरा लुंड अपनी छूट में लेकर बैठी थी और अपने मोठे चूतड़ों को मेरे लुंड पर उछाल रही थी.

हमारे बगल में hi रेनू बुआ बैठी थी जो मेरे द्वारा की हुई चुदाई की थकावट को दूर करने के लिए थोड़ा आराम कर रही थी पर हमारी चुदाई देख कर खुद की छूट को सहलाने से नहीं रोक पा रही थी,

दोनों संधानो की चुदाई करने में मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था, खासकर ये सोचकर की रेनू बुआ अनुज की सास भी बन सकती है तो एक अलग उत्साह था उनकी चुदाई में करने में,

खैर आँगन में काफी देर तक चुदाई का दौर चलता रहा,

पंकज जीजा ने ममता चची के दोनों छेदों को अचे से छोड़ के hi छोड़ा, वहीँ मौसा ने भी पूर्वी दीदी के मखमली बदन का पूरा आनंद उठाया और उनके हर छेड़ को आसान बदल बदल कर छोड़ा,

इधर बड़े फूफाजी भी किरण को अपने लुंड पर खूब उछाल उछाल कर छोड़ रहे थे और किरण ने उन्हें एक बार हैरान जब किआ जब उनके लुंड को उसने पकड़ कर अपनी गांड के छेड़ पर रखा और फिर नीचे हो गयी उनका लुंड अपनी गांड में भर लिए, और धीरे धीरे उछलने लगी,





बड़े फूफाजी नीचे से उसकी कमर थामे उसकी गांड में धक्के लगते हुए आहें भरने लगे,

बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह तूने तो आज मुझे खुश कर दियाहहह इतनी कासी हुई गांड है तेरी अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह.

किरण- फूफाजी तुम्हीी खुशःह्ह्ह करना हीई टूओ हम बच्चों का काम है अह्हह्ह्ह्ह मारते राहू मेरी गंडड,

बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह हांण

उनके बगल में hi पापा बड़ी बुआ की गांड में ऐसे धक्के लगा रहे थे मानो उनसे किसी बात का बदला ले रहे हो, पर हैरान की बात ये थी की बड़ी बुआ सिसकियाँ लेती हुई उनका हौसला और बढ़ा रही थी.

पापा अपना लुंड बाहर खींचकर इतनी ज़ोर से बुआ की गांड में धक्का लगते की बुआ का पूरा बदन आगे हो जाता





बुआ बहुत्तत्त मस्त्त होकर अपनी गांड मरवा रही थी,

दूसरी और मैं अभी भी बुआ और रेनू बुआ को लगातार छोड़ रहा था और उनकी आसान बदल बदल कर चुदाई कर रहा था और तब तक करता रहा जब तक हम तीनो hi संतुष्ट ना हो गए,

बुआ के बाद रेनू बुआ को मैंने फिर छोड़ा और कुछ देर तक उनकी छूट की चुदाई की तब तक बुआ उन्हें अपनी चूचियों से छेड़ रही थी

उनकी छूट के बाद मैंने अपना लुंड उनकी गांड में घुसा दिया जिसे लेकर उनकी चीख निकल गयी पर वो चीख घुट के रह गयी क्योंकि बुआ उनके मुँह पर जो बैठी हुई थी,

रेनू बुआ के बाद बारी आई बुआ की गांड की जिन्हे मैंने अपने लुंड पर बिठाया और उन्होंने मेरा लुंड अपनी गांड में लिए, बुआ मुझसे गांड नैरा रही थी वही रेनू बुआ उसी समय बुआ की छूट चाट रही थी,

बुआ तो दोहरे हमसे से बिलकुल बिलबिला उठी और कुछ देर में hi झाड़ गयी, इसके बाद रेनू बुआ की भी ऐसी hi सेवा हुई जिसमे मैंने उनकी गांड मारी और बुआ ने उनकी छूट छाती और उनका हाल भी बुआ जैसा hi हुआ और अंत में वो भी झाड़ गयी , लेकिन मैं नहीं झाड़ा था इसलिए मैंने बापिस बुआ को पकड़ लिए और अपना लुंड उनकी गांड में घुसा कर छोड़ने लगा बुआ भी गरम होकर साथ देने लगी कुछ देर बाद रेनू बुआ भी उठ गयी और हम लोगो का साथ देने लगी कभी बुआ की छूट से खेलती तो कभी चूचियों से

इस बार मुझसे और रुका नहीं गया और मुझे अपना रास लुंड में भरता हुआ महसूस किआ,

में- अह्ह्ह्हह्हह बाआहहहहहहहह मेरा निकलने वाला है,

ये सुनकर बुआ तुरंत उठ गयी और रेनू बुआ का चेहरा मेरे लुंड की और दबा दिया रेनू बुआ ने भी मेरा लुंड मुँह में भर लिए, मैं भी जोश में था उनके बाल पकड़ कर उनका मुँह छोड़ने लगा, और कुछ hi पलों में मेरे लुंड ने रास छोड़ दिया जो की रेनू बुआ के मुँह में भर गया और कुछ उनके मुँह से टपक कर छाती पर गिरने लगा, झड़ने के बाद मैंने लुंड उनके मुँह से निकला तो रेनू बुआ ने अपना मुँह खोल कर मेरा रास बुआ को अपने मुँह में भरा हुआ दिखाया और फिर जातक गयी,

गटकने के बाद बड़े प्यार से मेरा लुंड चाट कर साफ़ किआ, मुझे यकीन नहीं हो रहा था ये वही पूर्वी दीदी की सास हैं जो मुझे थोड़ी खड़ूस लगती थी, पर यहाँ देखो ये बिलकुल रंडी की तरह थी मेरे सामने, खैर अब मैं शांत हो चूका था और उनके ऊपर से हटा, मेरे हटते hi वो और बुआ उनकी छाती पर लगे रास को चाटने लगी,

हटते हुए मेरी नज़र पंकज जीजा से मिली, वो भी बैठे हुए आराम कर रहे थे, और मेरे चेहरे के भाव देख कर शायद उन्हें अंदाज़ा था की मैं क्या सोच रहा हूँ

पंकज- क्यों कैसी लगी बदली बदली मेरी मम्मी, बिलकुल तेरी बुआ जैसी हो गयी हैं न,

में- ये तो पूरी तरह बदल चुकी हैं, हाँ पर बुआ जैसी हुई है नहीं इसके लिए एक चीज़ देखनी रह गयी है,

पंकज- वो क्या?

मैं उनकी तरफ देख मुस्कुराया और फिर अपना लुंड पकड़ दोनों की और किआ और अगले hi पल मेरे लुंड से मूट की धार निकल पड़ी और उनके ऊपर गिरने लगी, पहले तो दोनों hi चौंकी पर फिर बुआ को जैसे hi आभास हुआ तो उन्होंने अपना मुँह खोल दिया और मेरी धार अपने मुँह में लेने एक दो पल बुआ के मुँह में मूतने के बाद मैंने अपनी धार रेनू बुआ के चेहरे पर की, चेहरे पर धार पड़ते hi रेनू बुआ ने भी अपना मुँह खोल दिए और मेरा मूट अपने मुँह में भरने लगी, ये देख मैं पंकज जीजा की और देख मुस्कुराया और बोलै- अब हो गयी है बिलकुल.

पर वो हमारी तरफ hi आ रहे थे और हमारे पास आकर उन्होंने भी बुआ और रेनू बुआ पर मूतना शुरू कर दिया, मेरे मूट की धार धीमी पड़ने लगी और तो धार उनके मुँह में न पढ़कर उनकी चूचियां भिगाने लगी और अंत में ख़तम हो गयी तो मैं पीछे हैट कर बैठ गया, पंकज जीजा अब भी अपनी माँ और सास पर मूट रहे थे,

मेरे हटते hi मौसा ने जगह ली और वो भी दोनों पर मूतने लगे, मौसा के बाद पापा और बड़े फूफाजी ने भी दोनों को अपने अपने मूट से नहलाया, और अंत में पूर्वी दीदी और किरण ने भी अपनी छूट की धार उन पर मारी जब वो हटी तो ममता चची ने भी वही किआ इतने में hi प्रीती और अनुज ऊपर से उतर रहे थे, प्रीती ने अपनी मम्मी को ऐसे मूट में नहाते देखा तो हैरान रह गयी पर अनुज ने तुरंत आगे बढ़ कर अपनी धार उन पर मारनी शुरू कर दी, पहले तो प्रीती को अजीब लगा पर अनुज को करते देख और सब के कहने पर उसने भी अपने मूट की धार अपनी मम्मी और अपनी भाभी की सास पर छोड़ दी,

अंत में दोनों मूट से पूरी तरह नहीं हुई थी आँगन भी मूट से महक रहा था,

बुआ- चलो संधान नहाने चलते हैं.

पूर्वी- हाँ तुम लोग नहा लो तब तक हम आँगन साफ़ कर लेते हैं.

बुआ- ठीक है अरे पर एक मिनट भाभी और तेरे पापा कहाँ हैं?


जारी रहेगी
 
बुआ- चलो संधान नहाने चलते हैं.

पूर्वी- हाँ तुम लोग नहा लो तब तक हम आँगन साफ़ कर लेते हैं.

बुआ- ठीक है अरे पर एक मिनट भाभी और तेरे पापा कहाँ हैं?


अपडेट 241
( लेखक की ज़ुबानी)

अनुज- अरे माँ और फूफाजी तो साथ में हैं,

प्रीती- हाँ वो हमारे साथ थी पहले फिर वो ले गए,

ममता- ाचा कोई नहीं करने दो नन्दोई सलहज को मज़े तब तक हम काम निपटाते हैं,

बुआ- हाँ चलो संधान साथ में नहाने का मज़ा लेते हैं,

नीचे सब लोग अपने काम में लग गए, वही ऊपर सभ्य फूफाजी के साथ hi थी दुसरे कमरे में जो पहले रिमझिम का होता था,

और अभी सभ्य अपने नन्दोई की गॉड में झुकी हुई थी और उनके मोठे लुंड को मुँह में लेकर चूस रही थी, वहीँ फूफाजी अपनी गदराई सलहज के गरम मुँह का आनंद ले रहे थे, सभ्य के बदन पर वही ब्रा थी जो उसने कमरे में आने से पहले पहनी थी पर उसकी चूचियां तो ब्रा से बाहर hi लटक रही थी वो ब्रा बस नाम भर के लिए उसके बदन पर थी वही फूफाजी के बदन पर तो एक कपडे का रेशा भी नहीं था.





फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह भाभीयहह ओह्ह्ह्हह्ह तुम्हारा मुँह बड़ा गरम है,

सभ्य- ुहम्म्म्म ुघ्ठाष्ठ.

फूफाजी- आह्हः ओह्ह्ह्हह्ह भाभी तुम्हारे सठह ये सब करने की इच्छाआहहह तो अपने ब्याहहह से थिई,

सभ्य ने उनका लुंड पल भर के लिए मुँह से निकला और बोली- अरे कोई नहीं अब बेटे के ब्याह में पूरी करलो,

और ये कहकर बापिस मुँह में भर लिआए,

ये सुनकर फूफाजी हंसने लगे और फिर से सभ्य के गरम मुँह का आनंद लेने लगे, कुछ देर तक यूँ hi लुंड चुसवाने के बाद आसान बदले और फूफाजी ने सभ्य को बिस्तर पर झुका दिया और फिर सभ्य के मोठे चूतड़ों को देख कर वो खुद को रोक नहीं पाए और अपना मुँह उसके चूतड़ों में घुसा दिया और चाटने लगे,





सभ्य भी अपनी नन्दोई की जीभ की हरकतों से सिसकियाँ लेने लगी, फूफाजी अपनी जीभ कभी उसकी गांड के छेड़ में घुसाते तो कभी छूट में और सभ्य अह्ह्ह्हह्हह करके रह जाती,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म भैयाहः ओह्ह्ह्हह्ह बड़ीई मस्तट्ठत जीएएबभःहः चलाते होओओओ अह्ह्ह्हह्हह माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आ रहा है.

फूफाजी इस पर कुछ बोले नहीं बल्कि और जोश ने आकर चाटने लगे और फिर जब अपने काम से संतुष्ट हो गए तब जाकर सीधे हुए और फिर अपना लुंड उन्होंने अपनी सलहज की छूट में पीछे से घुसा दिया और उसकी गरम छूट छोड़ने लगे,





सभ्य भी नन्दोई का लुंड लेकर आनंद की सिसकियाँ लेने लगी,

फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह भाभीयहह ओह्ह्ह्हह्ह तुम्हारी छुट्ट्ट्ट जैसी सोचींईईई थिई उससे भी मस्तट्ठत हीी अह्ह्ह्हह

फूफाजी धक्के लगते हुए बोले,

सभ्य- ुहम्म्म्म भैयाहः तुम्हारा आह्हः लुंड भीई कम्मं नाहीई हीीीाहहह छोड़ती राहू भाभीयहह कोऊ.

फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह सोचता हूँ ऐसाह चुदाई का माहौल पहले बन जाता तो कितना सही रहता इतने साल चुदाई करते हुए निकलते,

सभ्य- तो बनाया hi नहीं तुमने भैयाहः वो तो बच्चों का शुक्र मनाओ जो उन्होंने ये सब कर दिया,

फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह हैं आज कर्मा की वजह से hi उसकी माँ छोड़ने को मिल रही है.

इस पर दोनों हंसने लगे, कुछ देर तक यूँ hi चुदाई करने के बाद एक बार फिर से आसान बदला गया और फूफाजी बिस्तर पर लेट गए और सभ्य उनके लुंड की सवारी करते हुए अपने चूतड़ों को उनके लुंड पर पटकने लगी





दोनों आहें भरते हुए चुदाई कर रहे थे, फूफाजी अपना चेहरा उठा कर सभ्य की चूचियों को चूसने लगे वहीँ सभ्य अपने चूतड़ों की थिरकन की कला उनके लुंड पर दिखा रही थी,

इतने में hi बड़ी बुआ सावित्री उनके कमरे में झाड़ू लेकर पहुँच गयी

बड़ी बुआ- अरे यहाँ लगे हैं नन्दोई और सलहज.

सभ्य- ुहम्म्म्म अह्हह्ह्ह्ह जीजी हाँ सोचा नन्दोई जी से भी थोड़ी सेवा करवालुं.

फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह भाभी वैसे भी सलहज को छोड़ने की फ़िराक में तो हम कबसे थे,

बड़ी बुआ- चलो आज मनसा पूरी हो गयी, तुम लोग लगे रहो हम झाड़ू बाद में लगा देंगे,

सभ्य- अरे जीजी कहाँ जा रही हो, यही बैठो न,

बड़ी बुआ- अरे नहीं बहुरिया, हम रुके तो हमारा भी मन कर जायेगा और काम नहीं हो पायेगा.

ये सुनकर सभ्य और फूफाजी हंसने लगे,

सभ्य- अरे रुको न काम होता रहेगा,

बफी बुआ- लो भाई रुक गए अब बताओ,

बड़ी बुआ ने सामने पड़ी कुर्सी पर बैठते हुए कहा, तो सभ्य भी फूफाजी के लुंड से उठी और फिर घूम कर बड़ी बुआ की और मुँह करके फिर से फूफाजी का लुंड छूट में लेकर बैठ गयी, और बड़ी बुआ से बातें करने की कोशिश करने लगी, पर फूफाजी नीचे से उनकी छूट में दनादन धक्के लगा रहे थे तो सभ्य के मुँह से सिर्फ आहें निकल रही थी,





सभ्य- ुहम्म्म्म अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह दामाद जी अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह ऐसी होई.

फूफाजी गुर्राते हुए सभ्य की छूट में धक्के लगा रहे थे, बड़ी बुआ भी दोनों की चुदाई देख कर बड़ी बुआ की छूट भी गीली होने लगी और वो साड़ी के ऊपर से hi अपनी छूट को सहला रही थी,

इधर अपनी सलहज की गरम छूट की उत्तेजना के घोड़े पर सवार होकर फूफाजी अपनी मंज़िल की और तेजी से बाद रहे थे, वही उनके लोडे की थापों से चुड़ते हुए सभ्य भी अपने स्खलन के करीब थी और कुछ hi पलों में अपने नन्दोई के लुंड पर पानी छोड़ने लगी, अपने लुंड पर सलहज की छूट का पानी पड़ते hi फूफाजी भी खुद को संभल नहीं पाए और झड़ने लगे, और सभ्य की छूट के रास के साथ अपना रास मिला दिया, झड़ने के नाद जैसे hi सभ्य फूफाजी के लुंड से उठी तो बड़ी बुआ तो मानो इसी के इंतज़ार में बैठी थी और तुरंत आगे बढ़ कर अपना मुँह सभ्य की छूट में घुसा दिया और उससे बहते रास को चाटने लगी. इधर सभ्य ने झुककर फूफाजी के लुंड को मुँह में लेकर साफ़ किआ साथ hi बड़ी बुआ से अपनी छूट साफ़ करवाती रही.

खैर इसके बाद सब काम और बातों में hi लग गए और पूरे दिन कुछ ऐसे hi बीत गया, उधर चोदामपुर में भी दिन वैसा hi बीता जैसा अक्सर होता था कुछ चुदाई से भरा तो कुछ काम और हंसी मज़ाक से, सबने अनुज और प्रीती को खूब चिढ़ाया शादी के लिए तो दोनों hi बुरी तरह शर्मा रहे थे,


जब से आपस में चुदाई से खुले थे ये परिवार और करीब आ गए थे, आज इसी आपसी प्रेम का परिचय देते हुए कर्मा की मंजू तै ने आज तीनो या कहें चारों परिवारों का रात का खाना अपने यहाँ बनवाया था, साडी औरतों ने मिलकर खाना बनाया था, सरे मर्द और बच्चे भी वहीँ इकठे थे, और सब साथ में खाना खा रहे थे,

मंजू- अरे गुंजन वहां बात हुई कब आ रहे हैं ये लोग बापिस?

गुंजन- हाँ छोटे जीजा से हुई थी तो आज निकलने वाले थे पर शशि जीजी ने किसी को जाने hi नहीं दिया अब कल सवेरे hi निकलेंगे.

राजन- हमें पता था शशि इतनी जल्दी आने hi नहीं देगी,

रज्जो- क्यों तुम्हे ममता रानी की याद सत्ता रही है क्या?

राजन- अरे तुम्हारे होते हुए हमें किसी की याद सत्ता सकती है का भाभी,

राजन ने रज्जो को बाहों में भर कर कहा,

दीनू- अरे यारर बड़ा मन है शशि को छोड़ने का ब्याह से पहले आएगी तो बिना चोदे जाने नहीं देंगे,

राजपाल- अरे इतना मन था तुम भी चले जाते,

दीनू- अरे कोई बात नहीं भैया, अपनी बहन के लिए थोड़ा और इंतज़ार सही.

पल्ली- पता नहीं क्या हो रहा होगा वहां पर अभी,

सरजू- हो क्या रहा होगा वही हो रहा होगा जो यहाँ होने वाला है खाने के बाद.

इस पर सब हंस पड़े, वैसे सरजू गलत भी नहीं था शशि की ससुराल में कुछ ऐसा hi हो रहा था, आज खाना पीना जल्दी निपटा कर सब ने hi अचे से रात भर चुदाई का प्लान बनाया था, क्यूंकि सुबह सबको hi निकलना था पर इस बार सबकी चुदाई अलग अलग कमरे में होने वाली थी, तो सब लोग अपने अलग अलग साथियो के साथ थे,

एक कमरे में कर्मा के मौसा थे और उनके साथ रेनू थी जिन्हे वो बुरी तरह से छोड़ रहे थे और थोड़े आक्रामक होकर रेनू बुआ को गाली देते हुए छोड़ रहे थे,

शैलेश- आह्ह्ह्हह्ह साली रंडी क्या गजब की छूट है तेरी अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह...

रेनू- अह्ह्ह्हह्हह तो छुड़ड्डूओ ना इस रनडीईई को ाःह छोड़ छोड़ड़ड़ के इस रनडीईई की छूट की प्यास बुझाकड़ो,

रेनू को भी मौसा की आक्रामकता बहुत भ रही थी और वो उनका जोश बढ़ाते हुए और तेज छोड़ने को उत्साहित कर रही थी.

दुसरे कमरे में उनकी संधान यानि कर्मा की शशि बुआ थी जो आज अपने छोटे भतीजे अनुज के साथ थी, और अनुज अपनी बुआ के मोरे चूतड़ों के बीच अपना लुंड घुसा कर पीछे लेटकर बुआ की गांड मार रहा था,





शशि- अह्ह्ह्हह्हह लल्लाहहह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह मार अपनी बुआ की गरम गांड आह्ह्ह्हह्ह...

अनुज- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बाआहहहहहहहह इस्सस गंडड का तो मैं हमेशा से दीवाना रहा हूँ आह्ह्ह्हह्ह,

बुआ भतीजे की चुदाई अपने पूरे जोश में चल रही थी, हर झटके पर शशि की चूचियां झूम रही थी,

वहीँ एक कमरे में अनुज के पापा यानि नीलेश सिंह थे जो की बड़ी बुआ यानी सावित्री को पूरा नंगा करके घोड़ी बना कर पेल रहे थे, और अपना लुंड उनकी छूट में दनादन चला रहे थे,





सावित्री भी नीलेश को भैयाहः और तेज और तेज कहकर उनका उत्साह बढ़ा रही थी, कुछ देर छूट मरने के बाद नीलेश ने अपना लुंड सावित्री की गांड में घुसा दिया और गांड मरने लगे और फिर छूट, इसी तरह दोनों छेदों को बदल बदल कर छोड़ रहे थे.

दुसरे कमरे में विनीत आउट कर्मा एक साथ थे और उनके साथ दोनों कुंवारी सहेलियां प्रीती और किरण थी, कर्मा और विनीत दोनों को बिस्तर पर एक एक और लिटाकर छोड़ रहे थे वहीँ किरण और प्रीती एक दुसरे के होंठों को चूस रही थी,





किरण की छूट में विनीत का लुंड अंदर बाहर हो रहा था तो प्रीती की छूट में कर्मा का, कुछ पल बाद दोनों भाइयों ने छूट बदल ली और विनीत प्रीती को छोड़ने लगा और कर्मा किरण को, दोनों सहेलियां भी बदल बदल कर बड़ी मस्ती से छुड़वा रही थी,

ऊपर के एक कमरे में पंकज यानि प्रीती के भैया थे जो की हमारी प्यारी और कामुक ममता चची को पूरा नंगा कर उन्हें सस्मने लिटा कर उनकी गांड में लुंड चला रहे थे, ममता चची भी अपनी गांड मरवाते हुए अपनी छूट में उंगलियां करते हुए पंकज का जोश बढ़ा रही थी





पंकज- ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह माआहंम्मी सही कहूं तो तुम जैसीईई गरम ौरतततत नाहीई देखियई मैनी अह्हह्ह्ह्ह.

ममता- अह्ह्ह्हह्हह दामाद जी, अभियई तुमने कुछ देखा hi कहाँ हीीीाहहह, एक बार चोदामपुर आए कर देखू कितनी गर्मी है,

पंकज- ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह माआहंम्मी बिलकुल अब तो आना hi पड़ेगा आह्हः....

दोनों एक दुसरे से बातें करते हुए मस्त हुए जा रहे थे,

वहीँ उनके बगल वाले कमरे में hi दोनों भाई थे यानि बड़े फूफाजी और फूफाजी और उनके साथ मामी भांजी की जोड़ी थी यानी पूर्वी अपनी मामी सभ्य के साथ थी और अपनी मामी के साथ मिलकर अपने पापा और ताऊजी की सेवा कर रही थी,

सभ्य के बदन पर एक छोटी सी मैक्सी hi थी जो असल में पूर्वी की hi थी जो इतनी छोटी थी की सभ्य की नाभि तक भी ढँक नहीं पा रही थी वहीँ सभ्य की मोती चूचियां तो पूर्वी ने पहले hi बाहर निकल राखी थी, सभ्य के बदन पर उसके अलावा और कोई कपडा नहीं था मतलब वो नीचे से बिलकुल नंगी थी, वही वैसी hi छोटी सी निघ्त्य पूर्वी ने हुई पहन राखी थी, बाकि बड़े फूफाजी और फूफाजी दोनों भाई बिलकुल नंगे थे और अभी बिस्तर के बगल में खड़े होकर आहें भर रहे थे क्यूंकि उनके नीचे बैठकर सभ्य और पूर्वी उनके लुंड चूस रही थी,





सभ्य के मुँह में बड़े फूफाजी का लुंड था तो पूर्वी के मुँह में उसके पापा का, मामी और भांजी दोनों hi मिलकर लुंड को बड़े अचे से चूस रही थी, लुंड को अचे से चुसवाने और थूक से गीला करने के बाद बड़े फूफाजी ने सभ्य को और छोटे ने अपनी बेटी को अपने अपने सामने लिटा लिया और उनकी छूट चाटने लगे,

अब आहें भरने की बारी दोनों औरतों की थी, और दोनों औरतें खुल कर सिसकते हुए अपनी अपनी छूटें चटवा रही थी, इसी बीच पूर्वी ने अपना हाथ बढाकर अपनी मामी के चेहरे को अपनी और खींच लिए और फिर अपने होंठो को मामी के होंठों से मिला दिया, दोनों एक दुसरे के ऊपर के होंठों को चूसने लगी वहीँ नीचे के होंठों को दोनों फूफाजी चूस रहे थे,

बड़े फूफाजी को सभ्य की छूट का स्वाद बहुत भ रहा था तो जीभ दाल दाल कर चाट रहे थे वहीँ फूफाजी अपनी बिटिया रानी की, कुछ देर बाद जब दोनों hi छूट चाट कर संतुष्ट हुए तो दोनों ने अपनी अपनी साथियों को बिस्तर पर hi झुका दिया और फिर पीछे से अपना अपना लुंड उनकी छूट में घुसा दिया और छोड़ने लगे, बड़े फूफाजी का लुंड सभ्य की छूट में अंदर बहार हो रहा था, और फूफाजी का उनकी बिटिया की छूट में.





बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह सलहज राहनीय अह्ह्ह्हह्हह बहुत्तत्त सुनाआहहह था तुम्हारे बारे में अह्ह्ह्हह आअज पटाहहह चलाआहहह सब सहिई था,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म क्याह सुनाआहहह था नन्दोई जीईई अह्ह्ह्हह्हह,

पूर्वी- मैं बाताहहःती हूँ मामी, यही सुनाआहहह था की तुम्हारी छूट मखमली हीीीाहहह तुम्हारा बदन गदराया हुआ है,.

बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह बिलकुल सही बोला अह्ह्ह तुणीऐ अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म बहुत्तत्त मस्त्त माखन जैसीई छूट है सलहज तुम्हारी,

सभ्य- तो मारोहहहह नाहहह अपने मोठे लुंड से नन्दोईइइइइ जीईईई,

कुछ देर तक यूँ hi चुदाई चली उसके बाद दोनों छूटों से लुंड निकले और डाल बदल कर छूटों में घुस गए, फूफाजी ने सभ्य को अपने लुंड पर पीठ करके बैठा लिया वहीँ पूर्वी अपने ताऊजी के लुंड पर बैठ गयी, दोनों भाई नीचे से धक्के लगाकर दोनों को छोड़ने लगे





पूर्वी अपने हाथों का सही इस्तेमाल करके अपनी मामी की मोती चूचियां दबाते हुए उन्हें चूसने लगी, नीचे से दोनों भाई अपने ऊपर की छूटों में दनादन धक्के लगा रहे थे,

जल्दी hi आसान बदले गए और साथी भी और छेड़ भी मतलब अब फूफाजी के सामने फिर से सभ्य थी और बड़े फूफाजी के सामने उनकी भतीजी थी, सभ्य ने फूफाजी के ऊपर जगह ली और उनके लुंड को पकड़ कर अपनी गांड के छेड़ पर लगाया और नीचे होकर उसके टोपे को अपनी गांड में फंसा लिए और उत्तेजित होकर अपनी छूट मसलने लगी,





फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह भाभीयहह ओह्ह्ह्हह्ह तुम्हारी गंडड तो तुम्हारिई छूट से भी ज़्यादा गरम है अह्ह्ह्हह,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह भैयाहः तुम्हाराः लुंड भी बड़ा मोटाआहहह हीीीाहहह,

पूर्वी- अह्हह्ह्ह्ह मामी मोटाआहहह तो ताऊजी काअह्ह्ह्ह भी हीीःहःहः अह्ह्ह्हह्हह गंडड चीर रहाःहठ हीीीाहहह.

बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह टेरिइइइ गांडडडड hi आईसीई हीीीाहहह कीतनीई भी मारोहहहह कसी रहती है,

पूर्वी की गांड में लुंड चलाते हुए बड़े फूफाजी ने कहा,

और साथ hi उसकी चूचियां दबाते हुए तेजी से उसकी गांड मारने लगे,





पूर्वी- अह्हह्ह्ह्ह ताऊजी अह्ह्ह्हह्हह छोड़ूऊह्ह्ह अपनीई बितीयआह्ह्ह्ह को अह्ह्ह्हह मारो मेरिइइइ गांडडडड अह्ह्ह मार मार के फैलाआहहह दोऊ,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह तेरे पापा आह्ह्ह्हह्ह भी मेरिइइइ गांडडडड को अपनी लोडे से फैलाआहहह रहे हैं अह्ह्ह्हह्हह,

फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह भाभीयहह ओह्ह्ह्हह्ह आईसीई गांडडडड हो तूऊओह्ह मार मार के फैलाआहहहने में hi मज़ा आह्हः हैई,

बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह ahhhhhhhhhhh,

चारों की तगड़ी चुदाई चल रहियी थी इसी बीच पूर्वी ने अपने ताऊजी को रुकने को कहा तो बड़े फूफाजी ने अपना लुंड उसकी गांड में रोका और फिर निकाल लिए जिसके निकलते hi पूर्वी ने उठ कर अपनी गांड से निकले लुंड को मुँह में भर लिए और चूसने लगी कुछ देर तक अचे से चाटकर साफ़ करने के बाद पूर्वी ने लुंड को मुँह से निकला और फिर अपने ताऊजी के लूँ को पकडे hi उन्हें आगे की तरफ बढ़ाया और लुंड को अपने पापा के लुंड पर उछलती अपनी मामी सभ्य की छूट की और कर दिया और फिर सभ्य का उछालना एक पल रोक कर उसकी छूट में लुंड को फंसा दिया, जिसके बाद बड़े फूफाजी ने भी धक्का देकर अपने लुंड को सभ्य की छूट में घुसा दिया और दोनों भाई के लुंड एक साथ सभ्य की छूट और गांड में समां गए,

पूर्वी- अह्हह्ह्ह्ह ताऊजी पापा अब मिल कर छोड़ो मामी कोअहहह,

पूर्वी ने पीछे होकर अपनी छूट मसलते हुए कहा,

फूफाजी और बड़े फूफाजी दोनों मिलके अपनी गदराई गरम सलहज की दोहरी चुदाई करने लगे,





पूर्वी भी एक हाथ से अपनी छूट सहला रही थी और दुसरे से सभ्य की चूचियों जो मसलते हुए उसका उत्साह बढ़ा रही थी,

पूर्वी- क्यों माहमी कैसे लग रहे हैं अपने दोनों नन्दोईयों के लुंड एक साथ लेकर,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह बितीयआह्ह्ह्ह अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह दो लुंड एक साठः लेने में तो हमेशा hi माज़ाअह आता है ऑर्डर अह्हह्ह्ह्ह जब लुंड नन्दोईयों के हूँ तो बात hi निराली हीीीाहहह.

बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह ऐसी सलहज हो तो नन्दोई दूर hi नहीं रह सकताःह अह्ह्ह्ह,

फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह सहिई कहाहहह दादायहहहह,

बड़े फूफाजी- अह्ह्ह्हह्हह छोटे अब सलहज की गांड का स्वाद ज़रा मुझे भी चखने दे,

फूफाजी- अह्ह्ह हाँ दादा लो बिलकुल,

इसके साथ hi सभ्य को पलट कर फूफाजी के लुंड पर बैठा दिया गया जो अब तक उनकी गांड में था उसे छूट में लेकर फिर बड़े फूफाजी ने पीछे से सभ्य की ताजा चूड़ी हुई गांड में आसानी से अपना लुंड पिरो दिया और सभ्य की दोबारा से दोहरी चुदाई होने लगी,





पूर्वी अपना चेहरा आगे कर उत्तेजित होते हुए पास से अपने पापा और ताऊजी का लुंड अपनी मामी की गांड में अंदर बाहर होते हुए देख रही थी, खैर जल्दी hi सभ्य के बाद जल्दी hi उसका नंबर भी आ गया और फिर उसके पापा और ताऊ ने मिलकर उसके दोनों छेदों में भी अपने अपने लुंड पेल दिए, और उसकी भी आसान बदल बदल कर दोहरी चुदाई हुई,

जिसमे सभ्य ने उसका पूरा साथ दिया वहीँ उसके ताऊजी और पापा ने ने बनाकर उसके छेदों को भेदा,





दोनों तब तक पूर्वी की दोहरी चुदाई करते रहे जब तक पूर्वी की छूट ने और दोनों के लुंड ने अपना अपना पानी नहीं छोड़ दिया,

खैर इसी तरह इस कमरे में भी और बाकी कमरों में भी चुदाई का खेल काफी देर तक चला और फिर सब सो गए, सुबह सुबह उठ कर काफी चहल पहल थी, क्यूंकि सबको जाना था तो नाश्ता करके सब लोग निकलने लगे, अनुज और प्रीती एक दुसरे से बिछड़ कर थोड़ा उदास थे पर दोनों ने एक दुसरे का नंबर ले लिए था और साथ hi सभ्य ने पंकज और रेनू से वादा भी ले लिया था की वो लोग जल्दी hi चोदामपुर आएंगे, और फिर सब अपने अपने रस्ते चल पड़े,

करीब दो घंटे के सफर के बाद कर्मा और उसका परिवार चोदामपुर पहुँच चूका था, घर पहुँच कर शालू और गुंजन समेत साड़ी औरतों ने सवालों की झड़ी लगा दी की कैसा हुआ प्रोग्राम उसके बारे में पूछ पूछ कर,

कर्मा ने भी अपने प्यार अंजलि को बापिस आने के बारे में बता दिया, अगले दो चार दिन ऐसे hi बीत गए सबके चुदाई और काम के बीच, कर्मा और अंजलि की कहानी भी ज़ोरों पर चल पड़ी थी, कर्मा जैसे जैसे अंजलि को अपने परिवार और रिश्तेदारों की चुदाई की कहानियां बताता अंजलि उतनी hi गरम होती चली जाती थी, दोनों hi जानते थे की वो समय दूर नहीं जब वो लोग पागलों की तरह एक दुसरे के बदन पर टूट पड़ेंगे,

इसी तरह एक दिन अंजलि और कर्मा की बात हो रही थी फ़ोन पर कर्मा बाघ में hi टहलते हुए बात कर रहा था,

अंजलि- अरे सुनो यार भैया का सोच कर परेशां हूँ मैं,

कर्मा- क्यों क्या हुआ?

अंजलि- यार वो घर पर रहते हैं, शहर से जब से आये हैं तो यहाँ कोई उनका दोस्त भी नहीं है, उनका टाइम पास नहीं होता,

कर्मा- अरे इतनी मस्त भाभी है तुम्हारी, और क्या चाहिए टाइम पास के लिए,

अंजलि- धत्त तुम भी न हर वक़्त दिमाग में एक hi बात चलती क्रांति है,

कर्मा- ाचा समझ गया, कोई बात नहीं साले साहब से दोस्ती कर लेंगे हम तो उनका भी मन लगने लगेगा,

अंजलि- सच में?

कर्मा- और क्या उनसे दोस्ती होगी तभी तो भाभी के दर्शन होंगे,

अंजलि- हॉट तुम भी न,

कर्मा- ाचा वो मुझे जानते तो हैं hi तो उन्हें मेरा नंबर दे देना और फ़ोन करने को बोलना बाकी मैं संभल लूंगा,

अंजलि- ठीक है, थैंक्यू कर्मा.

कर्मा- अरे थैंक्यू से काम नहीं चलेगा.

अंजलि- फिर किस्से चलेगा जी,

कर्मा- भाई की दोस्ती करवाने के लिए बहन को छूट देनी पड़ेगी,

अंजलि- छही यार इतना गन्दा क्यों बोलते हो तुम.

कर्मा- क्यूंकि तुम्हे मज़ा आता है,

ये सुनकर अंजलि हंसने लगी और बोली- हाँ आता तो है, वैसे छूट भी दे दूंगी तुम अपना काम करो,

कर्मा- ठीक है मेरा नंबर दे देना,

अंजलि- ठीक है ाचा मैं थोड़ी देर में करती हूँ ठीक है,

कर्मा- ठीक है जानेमन,

अंजलि- ok बीटा bye लव यू,

अंजलि ये कह कर फ़ोन रख देती है, इधर कर्मा ने फ़ोन कान से हटाया hi था की उसे सामने से अंजलि के मम्मी पापा आते हुए दीखते हैं,

वो देख कर चौंक जाता है क्योंकि अंजलि ने तो उसे ऐसा कुछ नहीं बताया तो ये लोग यहाँ अचानक कैसे?


जारी रहेगी
 
कर्मा- क्यूंकि तुम्हे मज़ा आता है,

ये सुनकर अंजलि हंसने लगी और बोली- हाँ आता तो है, वैसे छूट भी दे दूंगी तुम अपना काम करो,

कर्मा- ठीक है मेरा नंबर दे देना,

अंजलि- ठीक है ाचा मैं थोड़ी देर में करती हूँ ठीक है,

कर्मा- ठीक है जानेमन,

अंजलि- ok बीटा bye लव यू,

अंजलि ये कह कर फ़ोन रख देती है, इधर कर्मा ने फ़ोन कान से हटाया hi था की उसे सामने से अंजलि के मम्मी पापा आते हुए दीखते हैं,

वो देख कर चौंक जाता है क्योंकि अंजलि ने तो उसे ऐसा कुछ नहीं बताया तो ये लोग यहाँ अचानक कैसे?



अपडेट 242


कर्मा दोनों को पास आते देख नमस्ते करता है,

कर्मा- नमस्ते चची जी, नमस्ते चाचा जी.

महिपाल Singh(Anjali के पिता)- नमस्ते बीटा तुम्हारे पापा और मौसा जी कहाँ हैं,

कर्मा- यहीं बाघ में हैं चलिए मिलवाता हूँ,

महिपाल सिंह- हाँ चलो,

दोनों कर्मा के साथ जाते हैं जहाँ नए घर का काम हो रहा होता है वहीँ उसके पापा और मौसा बैठे होते हैं,

नीलेश- अरे अरे नमस्कार भाई साहब, नमस्कार भाभी जी, आओ आओ,

इसी तरह सब एक दुसरे को प्रणाम नमस्कार करते हैं,

नीलेश उन्हें सामने कुर्सी पर बैठने के लिए जगह देते हैं तो दोनों बैठ जाते हैं, कुछ देर नए घर की बात होती है फिर महिपाल सिंह थोड़ा गंभीर होते हुए बोलते हैं,

महिपाल सिंह- तो नीलेश भाई साहब मैं आपके पास एक किसी ख़ास कारण से आया हूँ,

नीलेश- जी पर आप अपना कारण बताएं उससे पहले हमारी एक बात भी मानोगे तो ाचा लगेगा,

महिपाल सिंह- हाँ हाँ कहिये क्या बात है,

नीलेश- आगे की बातें घर चलकर चाय के साथ करें?

इस पर महिपाल सिंह और सविता( अंजलि की माँ) दोनों हंसने लगते हैं,

महिपाल सिंह- अरे क्यों नहीं भाई साहब,

इसी तरह सब लोग साथ में घर आते हैं, कर्मा पहले hi चुपचाप से फ़ोन करके माँ को बता चूका था मेहमानो के बारे में ताकि घर पर कोई कुछ और तरह का काम हो रहा हो तो वो समेत सकें, जल्दी hi सब लोग कर्मा के घर में होते हैं और चाय की चुस्कियां लग रही होती हैं,

नीलेश- हाँ भाई साहब अब कहिये क्या बताने वाले थे आप?

माँ- उससे पहले बहन जी तुम हमारे साथ आओ, कहाँ मर्दों की बातें सुनकर परेशां होती रहोगी,

सविता- हाँ ये तो बिलकुल सही कहा,

सविता भी उठ कर सभ्य के साथ चल देती है और साड़ी औरतें एक कमरे में जाकर बैठ कर बातें करने लगती हैं वहीँ आँगन में नीलेश, कर्मा, शैलेश होते हैं,

बाकी सब बाहर थे,

नीलेश- हाँ भाई साहब बताओ अब.

शैलेश- हाँ भाई साहब इससे पहले कोई और रोके बता hi दो,

महिपाल सिंह- हाहाहा हाँ सही कहा, तो भाई साहब मैं एक प्रस्ताव लेकर आपके सामने आया हूँ,

नीलेश- कैसा प्रस्ताव बताएं,

महिपाल सिंह- आपने चोदामपुर का बस अड्डा है जो उसके बगल में दो खाली खेत हैं वो तो देखे होंगे,

नीलेश- सीधे हाथ वाले न जो गैंदपुर की और हैं,

महिपाल सिंह- हाँ हाँ वही भाई साहब, वो दोनों खेत मेरे hi हैं, पर आप जानते हैं मैं शिक्षक आदमी तो खेती तो मुझसे होती नहीं इसलिए खाली पड़े रहते हैं,

नीलेश- हाँ वो तो हमेशा हमने खाली hi देखे हैं,

महिपाल सिंह- तो भाई साहब मेरा प्रस्ताव ये है की क्यों न उस ज़मीन पर मिलकर हम लोग एक स्कूल खोलें, ज़मीन हमारे पास है hi, बस पूँजी hi लगानी है, तो उसी हिसाब से हिस्सेदारी करके हम स्कूल खोल सकते हैं,

ये सुन कर नीलेश और शैलेश दोनों थोड़ा सोचते हैं,

शैलेश- भाई साहब सुझाव तो आपका बहुत बढ़िया है,

नीलेश- हाँ क्यूंकि आस पास 10 किलोमीटर तक कोई स्कूल नहीं है पल्ली अनुज को भी शहर hi जाना पड़ता है, तो आस पास के सभी गाओं के बच्चे पढ़ सकेंगे.

महिपाल सिंह- हाँ भाई साहब सोचा तो मैंने ये काफी पहले था पर आप जानते हैं की ये काम हम जैसे आम आदमी के अकेले के बस का तो नहीं है.

शैलेश- ये बात तो सही कही आपने भाई साहब पूँजी भी तो लगती है,

महिपाल सिंह- तो भाई साहब मेरा प्रस्ताव यही है की हम मिलकर चाहे तो आगे बढ़ सकते हैं पर आप चाहे तो ना भी कर सकते हैं मेरी तरफ से किसी भी चीज़ के लिए बाध्य नहीं हो आप,

नीलेश- जी बिलकुल भाई साहब पर आपका सुझाव इतना ाचा है की इसके बारे में अचे से सोचना hi पड़ेगा, इसमें गाओं की भी भलाई होगी और हमारी भी,

शैलेश- सही में अब हमारे बच्चे भी पढ़े लिखे हैं तो उन्हें शुरुआत में hi बच्चों को पढ़ने का मौका भी मिल जायेगा,

महिपाल सिंह- बिलकुल कर्मा अंजलि और नीतू यहाँ तक की मेरी बहु भी बच्चों को पढ़ा सकती है,

नीलेश- हाँ ये तो है, क्या कहते हो शैलेश बाबू.

शैलेश- भैया मुझे तो ठीक लग रहा है,

नीलेश- महिपाल भाई साहब एक काम करना है फिर आपको, एक खाका तैयार करो की इस सब में कितनी पूँजी लग सकती है उसके बाद देखते हैं की हम लोग कितना कर सकते हैं,

शैलेश- हाँ बिलकुल सही कहा भैया, एक अनुमान मिल जायेगा तो आगे बात बढ़ाएंगे.

महिपाल सिंह- हाँ बिलकुल भाई साहब मैं आज शाम से hi इस काम पर लग जाता हूँ,

नीलेश- आज से नहीं भाई साहब कल से करना, आज कुछ और करना है,

महिपाल सिंह- मतलब मैं समझा नहीं,

नीलेश- देखिये भाई साहब घुमा फिरा कर तो बोलना आता नहीं इसलिए सीधा बोल रहा हूँ, अब अगर हमें इस साझेदारी के रिश्ते को आगे बढ़ाना है तो एक दुसरे से मेल जॉल भी बढ़ाना होगा एक दुसरे से अचे से परिचित होना पड़ेगा,

महिपाल सिंह वो बात समझे नहीं तो असमंजस में शैलेश की और देखने लगे, शैलेश ने भी इशारे से उन्हें समझा दिया तो समझ में आया तो हंसने लगे,

नीलेश- क्यों भाई साहब लेते हो?

महिपाल सिंह- हाँ भाई साब लेते तो थे पर बहुत समय हो गया, आखिरी बार दोस्त यारों के साथ hi पि थी, यहाँ तो न दोस्त है तो फिर कभी मन hi नहीं किया,

शैलेश- लो भाई साब तो बस एक पंथ दो काज हो जायेंगे फिर तो,

महिपाल- मतलब ?

शैलेश- मतलब आज पि भी लोगे, और साथ में पि ली तो दोस्ती भी हो जाएगी अपने आप.

महिपाल- ये बात तो बिलकुल सही कही आपने,

नीलेश- बस ये देख लो भाभी जी को तो कोई परेशानी नहीं.

महिपाल- अरे परेशानी तो हर बीवी को होती है पर इतने दिनों बाद मन तो नहीं करेगी, वैसे आपकी मैडम को होती है परेशानी?

शैलेश- अरे बरस पड़ती हैं अचे से.

महिपाल- अरे फिर कैसे करेंगे?

नीलेश- अरे आज आपके नाम का सहारा ले लेंगे मान जाएंगी.

इस पर तीनो हंसने लगे,

महिपाल- चलो ये ाचा रहेगा पर भाई साहब मेरी भी एक इच्छा है,

नीलेश- हाँ कहिये न?

महिपाल- आज का प्रोग्राम मेरे घर पर होगा, देखिये आप लोग एक भी बार आये भी नहीं हैं तो ये बात आपको मेरी माननी पड़ेगी.

नीलेश- अरे भाई साब आपके यहाँ हो या हमारे एक hi बात है, वहां रहने दीजिये यहीं कर लेते हैं,

महिपाल- नहीं भाई साहब इसे हमारी ज़िद्द समझिये या कुछ भी पर होगा हमारे यहाँ hi,

नीलेश- अरे वहां पर आपको भी दिक्कत होगी और खुल कर हम भी आनंद नहीं ले पाएंगे.

महिपाल- अरे ऐसे कैसे हमें कोई दिक्कत नहीं होगी भाई साहब अब बस आप हमारी इच्छा मान लीजिये,

नीलेश- चलिए ठीक है आपकी इच्छा सर आँखों पर,

शैलेश- तो मैं भेज देता हूँ कर्मा को बोतल लेने, वैसे भाई साहब कुछ फरमाइश है या हमारी तरह अल्ल्रौन्देर,

महिपाल- जो आप करें वही कर लेंगे,

नीलेश- तो ठीक है फिर ज़रा अपनी अपनी पत्नियों को बता दें नहीं तो बाद में भड़केंगी.

शैलेश- हाँ सही बोल रहे हो भैया, अभी बुलाता हूँ, शालू, भाभी सुन्ना तो,

कुछ hi देर में सभ्य, शालू और सविता बाहर आती हैं,

शालू- हाँ क्या हुआ,

शैलेश- हाँ भैया बोलो,

नीलेश- अरे तुम सही हो यार आवाज़ तो ऐसे लगाई जैसे खुद hi बता डोज अब हमें आगे कर दिया,

सभ्य- क्या हो गया किस्मे आगे कर दिया?

नीलेश- अरे बात ये है की भाई साहब ने आज अपने यहाँ प्रोग्राम बनाया है तो उसी के लिए बता रहे थे,

सभ्य- ाचा भाई साहब ने बनाया है या तुमने,

नीलेश- अरे तुम खुद पूछ लो भाई साहब ने बनाया है अब उनकी इच्छा है की उनके घर पर हो,

सविता को कुछ समझ नहीं आता तो वो धीरे से शालू से पूछती है प्रोग्राम का मतलब तो शालू उसको बताती है तो वो भी हंसने लगती है.

सविता- कोई बात नहीं बनाया है तो बनने दो फिर एक काम करते हैं हम औरतें भी अपना प्रोग्राम बनाएंगी,

शैलेश- मतलब?

सविता- मतलब भाई साहब आप मर्दों का प्रोग्राम होगा तो हम औरतें क्यों पीछे रहे, मैं भी शालू और सभ्य बहनजी को बुलाऊंगी साथ में.

सभ्य- अरे पर हम लोग क्या करेंगे?

सविता- ये लोग बोतल खोलेंगे और हम लोग अपनी बातों की पोटली, इनकी दोस्ती हो सकती है तो हमें भी तो बढ़ानी चाहिए,

शालू- हाँ ये भी ठीक कहा जीजी, और वैसे भी इन दोनों लोगो पर नज़र रखने के लिए भी हमें जाना पड़ेगा जीजी नहीं तो ये लोग पीते hi जायेंगे रुकेंगे hi नहीं.

शैलेश- अरे तुम भी न,

नीलेश- देखो हमारा प्रोग्राम तय है तुम्हारा जो तुम्हे ाचा लगे वो करो, क्यों भाई साहब ?

महिपाल- हाँ और क्या हमें भी कोई तकलीफ नहीं है,

सविता- ठीक है तो तय रहा फिर, मर्दों के साथ साथ मर्दों का भी प्रोग्राम होगा.

सभ्य- और क्या,

महिपाल- तो फिर चलते हैं तैयारियां वगेरा भी करनी होंगी,

सविता- हाँ हाँ चलते हैं, और बहन जी जल्दी hi मिलते हैं बहुत सी बातें करनी हैं,

सभ्य- ठीक है बहनजी मिलते हैं,

सविता और महिपाल एक बार और सबको आमंत्रित करके चले जाते हैं,



(कर्मा की ज़ुबानी)



अंजलि के माँ बाप के जाने के बाद मौसा ने मुझे बुलाया और दारु के लिए पैसे दिए, मैं भी तुरंत मोटरसाइकिल निकल कर निकला hi था की फ़ोन बजने लगा तो मैंने उठाया किसी अनजान नंबर से था,

में- Hello कौन?

सामने से आवाज़ आई- हाँ कर्मा मैं पियूष बोल रहा हूँ अंजलि का भाई...

में- अरे हाँ पियूष भाई कैसे हो?

पियूष- ठीक हूँ, बस बोर हो रहा हूँ.

में- अरे बोर मत हो, अपनी गली के कोने पर मिलो 5 मिनट्स में.

पियूष- अभी?

में- और क्या अभी आओ जल्दी.

पियूष- चल ठीक आता हूँ,

5 मिनट्स बाद मैं उसकी गली के कोने पर पहुँचता हूँ तो वो वहीँ खड़ा मिलता है,

में- आओ पियूष भाई बैठो,

पियूष- कहाँ चल रहे हैं,

वो पीछे बैठते हुए कहता है,

में- सब पता चल जायेगा बस थोड़ी देर में,

बातें करते हुए हम लोग कुछ देर में ठेके पर पहुँच जाते हैं,

पियूष- अरे ठेके पर क्यों लाया है, पहली बार में hi ठेका दिखा दिया,

उसने हँसते हुए कहा,

में- अरे आज मेरे मौसा, पापा और तुम्हारे पापा का प्रोग्राम है तुम्हारे घर तो उसी का सामान लेने आया हूँ,

पियूष- ाचा पापा भी पिएंगे सही है यार मुझे तो याद भी नहीं उन्होंने कब पि थी आखिरी बार सही है उनकी दोस्ती हो रही है,

में- सिर्फ वो hi नहीं पिएंगे,

पियूष- क्या मतलब?

में- अभी आता हूँ,

मैं ठेके पर जाता हूँ और कुछ hi पलों में उसके सामने होता हूँ दारु की बोतलों के साथ बियर के कैन की पति लेकर,

पियूष- बियर किस लिए?

में- अब वो पिएंगे तो हम क्या सूखे रह जायेंगे,

मैंने उसे पकड़ते हुए कहा और फिर खुद मोटरसाइकिल पर बैठ गया पीछे वो भी सामान लेकर बैठ गया,

पियूष- अरे पर उनके सामने नहीं पि सकता मैं,

में- वैसे आईडिया बुरा नहीं है पर आज उनके सामने का प्लान भी नहीं है,

पियूष: तू मस्त है यार,

में: अरे अभी मस्ती देखि कहाँ है भैया, मेरे साथ रहोगे तो मज़े में रहोगे,

सामान लेकर हम लोग चोदामपुर आते हैं, जहाँ मैं बियर की पति को बाघ में रख कर मौसा को बोतलें देता हूँ और वो कुछ hi देर में माँ मौसी और पापा के साथ गाडी से निकल जाते हैं,

उनके जाने के बाद मैं पियूष को और बियर को लेकर राजन चाचा के खेतों के बीच बानी हुई झोपडी तक पहुँचता हूँ,

पियूष- अरे यार ये सही जगह है खेतों के बीच में झोपडी, किसकी है?

में- राजन चाचा की है तो अपनी hi समझो, तो पियूष भाई अब बापिस शहर जाना तो होगा नहीं?

पियूष- नहीं यार उस हादसे के बाद मम्मी पापा नहीं जाने देंगे, और सही कहूं तो मेरा भी मन नहीं है अलग रहने का,

में- सही भी है, परिवार से दूर रहकर कोई फायदा नहीं और जो आनंद अपने गाओं की हवा में है वो और कहीं नहीं,

ऐसे hi हम लोग बातें करते रहते हैं और इसी बीच जग्गू और सरजू भी कुछ खाने को लेकर आ जाते हैं फिर हम चारों मिलकर बियर खोलते हैं, धीरे धीरे थोड़ा थोड़ा नशा सब पर होता है, पियूष भी अब काफी खुल कर बात कर रहा था और उसे देख कर लग रहा था की उसे मज़ा भी आ रहा है, हम तीनो से hi उसकी अच्छी पैट रही थी.

दूसरी और उसके घर में भी बोतल खुल चुकी थी और पापा मौसा और उसके पापा छत पर बैठ कर पकोड़े वगेरा के साथ जाम से जाम टकरा के पि रहे थे, वहीँ खाना वगेरा बनाने की ज़िम्मेदारी अंजलि और उसकी भाभी निभा रही थी, और उसकी मम्मी, मेरी माँ और मौसी अपनी बातों में लगी हुई थी,

सविता- बड़ा ाचा लगा बहन जी आप लोग आये हमारे यहाँ,

माँ- अरे बहन जी तुम भी कहाँ औपचारिकता में पद रही हो, अब सहेली हो तो सहेलियों जैसी बातें करो,

सविता- ये भी सही है,

मौसी- पर जीजी हमें बीच बीच में इन लोगो पर भी नज़र डालनी पड़ेगी नहीं तो ज़्यादा न पि जाएँ कहीं,

सविता- अरे तो क्या हो गया घर में hi तो हैं पि लेंगे तो सो जायेंगे, कौनसा रोज़ पिटे हैं.

मौसी- अरे नहीं जीजी ये hi तो बात है ये लोग पीकर सोते hi तो नहीं हैं

मौसी ने हँसते हुए कहा,

सविता- सोते नहीं हैं मतलब तो क्या करते हैं,

इसका जवाब देने की जगह मौसी हंसने लगती हैं और माँ की और देखती हैं,

सविता- अरे ऐसी क्या बात है मुझे तो बताओ,

माँ- बतादे शालू अब तो ये भी हमारी सहेली hi हैं,

मौसी- अरे जीजी क्या है न की पीने के बाद ये लोग न कुछ ज़्यादा hi प्यार जताने लगते हैं,

सविता- अरे ये तो अछि बात है अपनी पत्नी से प्यार hi तो जताते हैं इसमें क्या गलत है, फिल्मों में भी तो हीरो नशे में हीरोइन से प्यार जताते हैं खूब.

माँ- अरे ये गाओं के आदमी हैं इनके प्यार जताने का मतलब तुम नहीं समझती बहन,

सविता- तो तुम समझाड़ो,

माँ- मतलब इन लोगो के प्यार जताने का मतलब होता है खूंटा गाड़ना,

सविता- खूंटा गाड़ना?

और फिर जैसे hi उसकी समझ आती है वो तेजी से हंसने लगती है,

सविता- हैं सही में?

शालू- और क्या जीजी, फिर तो छोड़ने का नाम hi नहीं लेते,

सविता- वैसे ये तो फिल्मों के हीरो से भी ाचा है, वो तो नकली प्यार जताते हैं असली तो ये है,

मौसी- जितनी बोतल उधर खाली होती हैं उतना दर्द हमें मिलता है,

इस पर तीनो तेजी से हंसने लगती हैं,

सविता- वैसे एक बात बड़ी अछि लगी की तुम दोनों लोग बहनें हो फिर भी आपस में खुली हुई हो खुलकर बातें कर लेती हो,

माँ- हम बहनें हैं पर साथ में सहेलियां भी हैं और सहेलियों से कौन सोच कर बोलता है?

सविता- ये बात तो बिलकुल सही कही.

मौसी- तो फिर तुम भी बताओ जीजी तुम कब खूंटा गढ़वाती हो,

मौसी के ऐसे सवाल से सविता शरमाते हुए हंसने लगी,

माँ- अरे वाह दुल्हन की तरह शर्मा रही हो,

सविता- अरे वो पूछा hi ऐसे तो,

मौसी- तो पूछा है तो बताओ भी, सहेलियों से नहीं छुपाते,

सविता- अब जब खूंटा तैयार होता है गढ़वा लेती हूँ,

माँ- तुम्हे देख कर तो खूंटा तैयार hi रहता होगा,

सविता- धत्त, वैसे सही बोलूं तो ये बात तुम दोनों पर बैठती है,

मौसी- नहीं जीजी इतना काम मत हाँको खुद को, बहुरिया की बड़ी बहन लगती हो सास तो बिलकुल नहीं लगती.

सविता- धत्त कुछ भी बोलती हो तुम शालू, वैसे मुझे तो इंतज़ार है की दोनों भाई साहब आज कैसे प्यार जताएंगे नशे mein.dekhne लायक होगा,

मौसी- तुम्हे बड़ा मज़ा आ रहा है सोच कर जीजी कहो तो तुम्हे hi आगे कर दें,

सविता- हवववव देखो तो कैसे बोल रही हो,

माँ- अब सहेली हो इतना तो कर hi सकती हो,

सविता- तुम दोनों बहनें एक से बढ़कर एक हो,

सविता हँसते हुए कहती है, की तभी दरवाज़ा खोल कर अंजलि और रानी अंदर आ जाते हैं,

रानी- मम्मी सारा काम हो गया है ऊपर भी पकोड़े वगेरा सब दे दिए हैं आप लोगो के लिए लाऊँ कुछ?

माँ- नहीं बहुरिया खाने से तो पेट भर गया है तुम्हारी मम्मी को कुछ और चाहिए,

इस पर सविता शर्मा जाती है और खुद को सँभालते हुए कहती है- नहीं बीटा तुम दोनों सो जाओ अब, पियूष आया क्या?

अंजलि- नहीं मम्मी वो भैया आज कर्मा और सरजू भैया के साथ है तो सुबह hi आएंगे,

माँ- अरे कोई नहीं वहां रहने दो आज बच्चों के साथ मन लगा रहेगा.

सविता- ठीक है फिर तुम दोनों जाकर सो जाओ,

तो अंजलि और रानी दोनों सबको शुभ रात्रि बोलकर चली जाती हैं,

उनके जाते hi सविता माँ से बोलती है: क्या बहन जी तुम तो बहु के सामने भी शुरू हो गयी,

मौसी- तो क्या हुआ जीजी बहु भी तो सब जानती है, उसे नहीं पता होगा की उसकी सास क्या पटाखा है,

ये सुनकर तो सविता की हंसी छूट जाती है, और वो भी थोड़ा खुलकर मज़ाक करने लगती है, वहीँ ऊपर तीनो पर अब नशे का सुरूर चढ़ने लगा था,

महिपाल- सच कहूं भाई साहब आप दोनों जैसे इंसान मिलना बहुत मुश्किल हैं सच में,

पापा- ऐसा नहीं है भाई साहब आप भी तो हमारे hi जैसे हैं, हेहही.

मौसा- और क्या तभी तो हम साथ बैठ कर पि रहे हैं,

महिपाल- भाई साहब बस एक बात समझ नहीं आ रही,

पापा- कौनसी?

महिपाल- जब मैंने यहाँ प्रोग्राम रखने को कहा तो आप यहाँ की मन क्यों कर रहे थे,

पापा- अरे वो तो बस ऐसे hi.

महिपाल- देखिये भाई साहब अब तो आपने हमें दोस्त कह दिया है तो सच बताओ कोई तो बात ज़रूर है तब आपने बोलै था की खुल के आनंद नहीं ले पाएंगे बताओ कोई कमी रह गयी है?

मौसा- अरे नहीं महिपाल भाई, कोई कमी नहीं है, साडी चीज़ एक दम लल्लन टॉप हुई हैं,

महिपाल- फिर बात क्या थी शैलेश भाई,

पापा- अरे शैलेश बाबू अब महिपाल भाई हमारे यार हैं इनसे अपनी कमी क्या छुपाना,

महिपाल- कमी कैसी कमी?

पापा- वो क्या है न महिपाल भाई की पीने के बाद न हम दोनों लोगो के hi टावर खड़े हो जाते हैं और उसके बाद हमारा मन करता है बस की, बाकी आप समझदार हो,

महिपाल सिंह वैसे तो बात समझ hi गए थे फिर भी मौसा ने बात और सरल कर दी और कहा: हमारा तो टावर खड़ा भी हो गया यार,

मौसा पाजामे के ऊपर से hi लुंड को दबाते हुए कहते हैं तो पापा भी अपना दबाते हैं,

पापा- साला पीते हम हैं और चढ़ती इन्हे हैं,

इस पर तीनो हंसने लगते हैं.

महिपाल: अरे भाई साहब तुम दोनों बड़े मज़ेदार आदमी हो यार,

पापा- ज़िन्दगी में और क्या रखा है भाई साब मज़े लो और मज़े दो,

महिपाल- ये तो सही कहा भाई साहब तुमने,

मौसा- अह्ह्ह्हह्हह अब तो साला तकलीफ देने लगा हमारा लोढ़ा,

पापा- इसीलिए तो घर की बोल रहे थे भाई साहब इतने में तो हम चढ़ जाते अपनी अपनी बीवियों पर,

कुछ दारु के नशे की वजह से और कुछ बातों से महिपाल भी थोड़ा उत्तेजित हो रहे थे,

महिपाल- तो भाई साहब ये भी तो आपका घर hi है, पत्नियां भी यहीं हैं,

पापा- अरे नहीं यार पहली बार तुम्हारे घर आये हैं और ये सब ाचा नहीं लगता,

मौसा- हाँ भाई साहब और घर में बहु है बिटिया है,

महिपाल- अरे वो लोग तो अपने कमरे में सो चुके होंगे, घर में कई कमरे खली पड़े हैं,

पापा- अरे नहीं भाई साहब आज रहने देते हैं,

महिपाल- अरे नहीं भाई साहब आप हमारे यहाँ आये और बिना मज़े के चले जाएं तो मुझे ाचा नहीं लगेगा,

मौसा- अरे तो क्या हुआ कभी कभी चलता है,

महिपाल- भाई साहब सच कहूं तो आपकी बातें सुनकर मेरा भी टावर खड़ा हो गया है और अब आप लोगो से ज़्यादा मन तो मेरा है,

इस पर तीनो हंसने लगते हैं,

पापा- अरे तो ये बात है, अब खुल कर बात की है भाई साहब तुमने,

मौसा- और क्या तो पहले तुम hi शुरुवात करो भाई साहब हम भी तुम्हे देख कर लग जायेंगे,

पापा- हाँ ये तो सही कहा, महिपाल भाई तुम आगे आगे हम पीछे पीछे,

महिपाल- अरे यार आप लोगो ने तो फंसा दिया, चलिए अब दोस्तों की ज़िद्द तो पूरी करनी पड़ेगी,

और कभी महिपाल में इतनी हिम्मत नहीं होती पर दारु के नशे में हिम्मत भी बढ़ रही थी और उत्तेजना भी,

पापा- तो फिर चलें या यहीं बुलाओगे,

महिपाल- अरे नहीं चलते हैं नीचे यहाँ खुले में कोई देख लेगा तो गड़बड़ हो जाएगी,

पापा- ठीक है चलते हैं,

तीनो लोग खड़े होते हैं और बहकते कदमो से धीरे धीरे सीढ़ियों से नीचे आते हैं, एक मंजिल सीढ़ियां उतरने के बाद महिपाल एक कमरे के बाहर से देखते हैं और फुसफुसा कर कहते हैं- लगता है बहु और बेटी सो गयी है, ाचा है चलो नीचे,

पापा- अरे ये तो ाचा हुआ चलो चलते हैं, काम आसान हो गया

महिपाल- हाँ चलो.

तीनो फिर सीढ़ियों से नीचे आते हैं और महिपाल के कमरे से hi औरतों की बातों की और खिलखिलाने की आवाज़ आ रही थी, महिपाल आगे बढ़कर दरवाज़ा खोलते हैं और तीनो अंदर आ जाते है,

महिपाल- अरे आप लोगो की बातें hi चल रही हैं,

सविता- हाँ क्यों तुम्हारा प्रोग्राम हो गया पूरा,

मौसा- हाँ भाभी जी अब तो दुसरे प्रोग्राम की बारी है,

मौसा नशे में कहते हैं और फिर तीनो हंसने लगते हैं,

माँ सविता को धीरे से कहती है: कहा था न दूसरा प्रोग्राम क्या है,

ये सुनकर सविता शर्मा जाती है,

महिपाल- अरे मैंने आज इन्हे यही रोक लिए है यहीं सो जायेंगे.

सविता- तो सोना तो है hi मैं इतनी रात को वैसे भी किसी को नहीं जाने देती.

महिपाल- हाँ तो कमरे तैयार हैं?

सविता- हाँ हाँ कमरे तो तैयार हैं पर मैं क्या सोच रही हूँ अब आप लोग भी आ गए हो तो बैठकर थोड़ा बात चीत करते हैं ाचा लगेगा,

ये सुनकर तो तीनो मर्दों के चेहरे का रंग थोड़ा बदल गया, वहीँ माँ और मौसी सविता के इस दांव से खुश हो रही थी, उन्हें मर्दों को तरसने में मज़ा आ रहा था,

महिपाल- अरे तुम भी न क्या रात को बातें लेकर बैठ गयी इन लोगो को भी नींद आ रही है सुबह कर लेना बातें,

मौसी- नहीं हमें तो नींद नहीं आ रही, क्यों जीजी तुम्हे आ रही है क्या?

माँ- नहीं मुझे भी नहीं आ रही,

पापा- पर,

मौसी- पर वॉर कुछ नहीं तुम लोगो ने अपना प्रोग्राम तो कर लिए न अब हमारी बात भी माननी पड़ेगी,

मौसा- ठीक है भाई मानली तुम्हारी बात,

सविता- तो फिर आ जाओ यहीं बैठते हैं, डबल बीएड है बहुत जगह है,

अब मर्दों को छह कर भी बात माननी पड़ी और फिर तीनो जोड़े बना कर बैठ गए, बिस्तर के सिरहाने माँ और पापा एक चादर ओढ़कर अपनी पीठ बिस्तर से टिका कर बैठ गए, तो दीवार की तक लगा कर मौसा और मौसी बैठे थे एक चादर ओढ़कर वहीँ महिपाल और सविता बिस्तर के दूसरी किनारे पर एक चादर ओढ़कर बैठ गए,

सविता- जगह काम तो नहीं है सब आराम से बैठे हैं न,

माँ- हाँ सब आराम से हैं क्यों अनुज के पापा?

पापा- हाँ कोई दिक्कत नहीं है भाभी जी,

सविता- तो अब सुनाओ कुछ अपनी बातें शुरू की,

मौसी- नहीं जीजी तुम सुनाओ हमने सुना तुम्हारा प्रेम विवाह हुआ है तो कैसे मिले क्या हुआ सब बताओ,

उसके बाद सविता ने अपनी और पति की प्रेम कहानी शुरू की महिपाल भी कुछ कुछ बातें अपनी तरफ से बताने लगे, इधर पापा और मौसा को उनका लुंड परेशां कर रहा था तो उन्होंने अपने घुटनो को हल्का सा मोड़ा और पापा ने माँ का हाथ चादर के अंदर लुंड पर रख दिया, माँ भी समझ गयी क्या करना है और उनकी बातें सुनते हुए पापा के लुंड को मुठियाने लगी,

इधर मौसा पापा से भी एक कदम आगे थे वो छुपा कर मौसी से अपना लुंड तो सहलवा hi रहे थे बल्कि खुद भी सारी के ऊपर से hi उनकी छूट को मसल रहे थे.

सविता और महिपाल को भी हल्का हल्का अनुमान तो हो रहा था की चादरों के नीचे कुछ तो हो रहा है क्यूंकि नशे में पापा और मौसा अपने चेहरे के भावों को इतने अचे से नहीं छुपा प् रहे थे, इधर मौसी माँ और सविता में भी आँखों hi आँखों में इशारा हो रहा था,

तीनो hi मिलकर मर्दों को जानकार तड़पा रहे थे, वैसे भी औरतों को इसमें एक अलग hi मज़ा आता है, पापा और मौसा के साथ साथ महिपाल भी उत्तेजित थे पर अभी कुछ नहीं कर सकते थे,

माँ और मौसी के हाथ पापा और मौसा के लुंड पर चल तो रहे थे पर हाथ चलने से दोनों की उत्तेजना शांत होने की जगह बढ़ और रही थी, वहीँ सविता और महिपाल तो बेचारे कुछ नहीं कर पा रहे थे और उत्तेजित हो रहे थे,

कुछ देर तक सविता ने अपनी प्रेम कहानी और सुनाई और तब तक तो पापा और मौसा का बुरा हाल हो गया उनका लुंड बिलकुल कड़क हो कर माँ और मौसी के हाथ में ठुमक रहा था और अब तो औरतों की छूट भी लुंड की गंध पाकर खुजाने लगी थी,

महिपाल- चलो अब तो अपनी प्रेम कहानी भी सुना दी अब तो इन्हे सोने दो,

सविता- ठीक है चलते हैं, भाई साब और बहन जी आप लोग यहीं सो जाओ, शालू और शैलेश भाई साहब आओ तुम्हे दूसरा कमरा दिखती हूँ,

Mausi-haan चलो जीजी,

उठने से पहले मौसा ने अपने लुंड को नीचे की और दबा दिया, और फिर चादर से निकले, और फिर चरों माँ पापा को छोड़ कर कमरे से निकल गए, उनके जाते hi पापा माँ पर कूद पड़े और उनके होंठों को चूसने लगे,

दूसरी और सविता और महिपाल ने मौसा मौसी को एक कमरे में ठहरा दिया और फिर खुद एक कमरे में पहुँच गए, आउट अंदर घुसते hi महिपाल ने अपनी बीवी को दबोच लिए,

सविता- अरे अह्हह्ह्ह्ह क्या हो गया आज तुम्हे?

महिपाल- कुछ नहीं बस तुम पर प्यार आ रहा है बहुत,

सविता- ओह्ह्ह्हह्ह तुम्हारा प्यार तो मुझे चुभ भी रहा है पीछे से,

महिपाल- अभी तो बिना कपड़ों के चुभेगा तुम्हे ये,

सविता- वैसे अचानक से इतने प्यार की वजह क्या समझूँ मैं दारु या कुछ और?

महिपाल- कुछ भी समझ लो जानेमन बस अब रुका नहीं जा रहा,

और ये कह महिपाल सविता को बिस्तर के सहारे झुका देता है और उसकी सारी को पीछे से कमर तक उठा देता है, और अपनी बीवी के नंगे मोठे चूतड़ों को देख उन्हें मसलने लगता है,

सविता- अह्ह्ह्हह्हह इतना जोश लगता है प्रोग्राम ज़्यादा हो गया तुम्हारा,

इधर महिपाल कुछ ज़्यादा hi जोश में होता है और सविता की बात पर ध्यान नहीं देता बल्कि अपने लुंड को निकल कर पीछे से सविता की छूट पर रख कर धक्का लगता है, जिससे सविता की चीख निकल जाती है,

सविता- अह्ह्ह्हह्हह क्या कर रहे हो आह्ह्ह्ह सूखा hi घुसा दियाहहह मुझे दर्द हो रहाः हीी,

महिपाल- अरे बस एक मिनट में तुम्हारी भी गीली हो जाएगी फिर माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आने लगेगा, अह्ह्ह्हह्हह

महिपाल उसकी बातों का जवाब देते हुए कमर पकड़ कर धक्के लगाने लगता है, सविता हर धक्के के साथ आहें भरने लगती है, क्यूंकि आज महिपाल के धक्के कुछ ज़्यादा hi तगड़े लग रहे थे, थोड़ी देर की चुदाई के बाद सविता की छूट भी नाम हो जाती है और उसे भी मज़ा आने लगता है अपने पति की आक्रामक चुदाई में, और वो मज़े लेकर छुड़वाने लगती है पर इसी बीच महिपाल उसकी छूट में दो चार धक्के लगता है फिर गुर्राते हुए अपना रास उसकी छूट में भरने लगता है,

अपना रास निकलने के बाद महिपाल आगे होकर बिस्तर पर लेट जाता है और नशे में सोने लगता है, पर बेचारी सविता बीच में अटकी रह जाती है, जब उसे मज़ा आना शुरू हुआ तब तक तो पति झड़ने के बाद सोने लगे थे, वो लम्बी सांसें लेकर खुद को शांत करती है, और फिर अपने कपडे ठीक करती है, उसे अपनी जांघों पर पति का रास बहता हुआ महसूस होता है तो उसे धोने और साथ में मूतने के लिए कमरे से बाहर निकलती है और बाथरूम जाकर पेशाब करती है और फिर अपने आप को साफ़ करके बापिस अपने कमरे की और बढाती है तभी उसे कुछ हलकी हलकी आवाज़ें सुनाई देती है जो सिसकियों की होती है वो सुनकर समझ जाती है की किस चीज़ की आवाज़ है और उसके चेहरे पर एक मुस्कान भी आ जाती है,

उसे आवाज़ मौसा और मौसी के कमरे से आती हुई लगती है, खैर वो फिर अपने कमरे की और बढ़ने लगाती है और फिर दरवाज़े के पास जाकर रुक जाती है,

हर इंसान की तरह उसके मन में द्वन्द चलने लगता है, उसका मन होता है की वो एक बार पास जाकर सुने और देखे क्या हो रहा है, साथ hi अधूरी चुदाई की खुजली उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रहे थे,

वो धीरे धीरे अपने कदम मौसी मौसा के कमरे की और बढाती ह है, और सिसकियों की आवाज़ें और अचे से सुनाई देने लगती हैं, कुछ hi पलों में वो कमरे के बाहर होती है, दरवाज़ा बंद नहीं होता क्यूंकि रौशनी की एक पतली सी लकीर गैलरी में पद रही होती है जिसे देख वो समझ जाती है, एक मन उसका अभी भी उसे बापिस जाने को कहता है वहीँ दूसरा मन आगे बढ़ने को, वो आगे होती है और दरवाज़े की हलकी सी दरार में अपनी आँख टीकाकार अंदर देखती है और अंदर का नज़ारा देख उसकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं, उसके पैरों टेल ज़मीन खिसकने लगती है उसे समझ नहीं आता की जो वो देख रही है वो सब क्या है, सामने मौसी बिस्तर पर झुककर पापा और मौसा दोनों का लुंड एक साथ अपने मुँह में घुसाए हुए थी, और एक साथ चूस रही थी.





तीनो बिलकुल नंगे थे, पापा और मौसा के लुंड मौसी के थूक से साणे हुए थे,

सविता ये देखती है और तुरंत पीछे हो जाती है, उसे यकीन नहीं हो रहा था जो वो देख रही थी उस पर, उसकी छूट और गीली होने लगती है, उसे यकीन नहीं हो रहा था की शालू अपने पति और जीजा के साथ एक साथ ये सब कर रही है?

शैलेश भी अपनी पत्नी को अपने साडू के साथ कैसे अपने सामने ये सब करने दे रहे हैं,

सविता के मन में एक साथ बहुत से प्रश्न उठने लगते हैं, और प्रश्नों के साथ साथ उसकी उत्तेजना भी बढ़ने लगती है,

वो बापिस अपना चेहरा दरवाज़े के बीच लाती है और अंदर देखने लगती है, वो देखती है की उसके सामने hi मौसी दोनों के लुंड को अपने मुँह से निकालती है और फिर बिस्तर पर घोड़ी बन जाती है जिसके बाद पापा मौसी के पीछे आकर अपना लुंड पीछे से उनकी छूट में घुसा देते हैं वहीँ मौसा सामने से आकर अपनी बीवी का मुँह छोड़ने लगते हैं.





सविता को तो समझ नहीं आ रहा था वो क्या करे, वो ये सब जो देख रही थी ये कैसे हो सकता था, वहीँ उसका बदन अपने आप hi जो वो देख रही थी उस पर प्रतिक्रिया दे रहा था, उसका हाथ अपने आप सारी के ऊपर से hi उसकी छूट को सहलाने लगा था वहीँ दूसरा हाथ उसकी छातियों को हल्का हल्का मसल रहा था,

अंदर जितनी तगड़ी चुदाई चल रही थी उसके बदन में उतनी hi गर्मी बढाती जा रही थी, साड़ी के ऊपर से hi वो अपनी छूट मसलते हुए शांत करने की कोशिश कर रही थी, इसी बीच उसे अपने कंधे पर किसी के छूने का एहसास हुआ दर के वो चौंकाने hi वाली थी की उसके मुँह पर एक हाथ कास गया और उसकी आवाज़ बंद हो गयी उसने चेहरा घुमा कर देखा तो और चौंक गयी क्यूंकि सामने माँ थी,

माँ उसकी हालत समझ गयी उन्होंने भी एक बार कमरे में झांक कर देखा और फिर उसे उसका हाथ पकड़कर अपने कमरे की और ले गयी, और वहां ले जाकर बिस्तर पर बैठा दिया,

सविता के चेहरे पर हैरानी के भाव साफ़ नज़र आ रहे थे,

सविता- वो सब शालू और दोनों,

माँ- शांत हो जाओ, जानती हूँ तुम्हारे मन में बहुत से प्रश्न होंगे, और हम उस बारे में बात भी करेंगे पर पहले तुम अपने आप को शांत करो,

सविता थोड़ी देर तक सोचती रहती है माँ उसके चेहरे को ध्यान से देख कर उसके बगल में बैठ कर उसके भावों को पढ़ रही थी,

सविता- तो क्या तुम्हे ये सब पता है?

माँ- हाँ मुझे पता है,

सविता ये सुनकर थोड़ा सोचती है,

सविता- पर वो तुम्हारे पति हैं और वो तुम्हारी सगी बहन ये गलत है न,

माँ- देखो सबके लिए गलत सही की परिभाषा अलग होती है, हो सकता है जो तुम्हारे लिए गलत हो वो मेरे लिए न हो,

सविता- मतलब तुम्हे ये गलत नहीं लगता,

माँ- देखो समाज के हिसाब से देखा जाए तो बिलकुल गलत है, पर तुम खुद सोचो क्या हम लोग सब कुछ समाज के हिसाब से करते हैं, और क्या हमारी ख़ुशी के लिए समाज कुछ करता है? तुम्हारे साथ भी कुछ ऐसा हुआ होगा जिसमे तुम्हारी ख़ुशी कुछ और होगी और समाज की कुछ और.

सविता हां में सर हिलाती है और कहती है- हाँ जब मैंने प्रेम विवाह का फैसला किआ था तो सारा समाज मेरे खिलाफ था,

माँ- पर फिर भी तुमने किआ, क्यूंकि उसमे तुंहारी ख़ुशी थी है न?

सविता- हाँ,

माँ- इसी तरह मेरा भी मन्ना है अपनी और अपने परिवार की ख़ुशी ज़्यादा मायने रखती है समाज का क्या है, और जो तुमने देखा उसमे तुम्हे सब कितने खुश नज़र आ रहे थे, और मेरे लिए सही या गलत होने से ज़्यादा अपने लोगो की ख़ुशी ज़रूरी लगती है,

सविता माँ की बात को ध्यान से समझते हुए बोलती है- हाँ ये तो है पर वो लोग खुश हैं तो क्या तुम भी खुश हो, जलन नहीं होती अपने पति को किसी और के साथ देख कर..?

माँ मुस्कुराते हुए जवाब देती हैं: नहीं बिलकुल भी नहीं,

सविता की आँखें चौड़ी हो जाती हैं और उसे खुद बा खुद कुछ समझ आता है और कहती है- मतलब तुम भी उनके साथ मिलकर करती हो और अभी भी उसी कमरे में जा रही थी,

माँ- हाँ अब सही पकड़ी हो,

सविता ये सुन फिर से कुछ सोचने लगती है और फिर विचार कर कहती है- कुछ अजीब नहीं लगता अपनी बहन के सामने hi उसके पति के साथ और अपने पति के सामने अपने बहन के पति के साथ करना, इस वजह से आपस में कोई लड़ाई झगड़ा नहीं होता,

माँ- लड़ाई झगड़ा वहां होता है जहाँ विश्वास न हो, हम लोग एक दुसरे से कुछ छुपाते hi नहीं है, दूसरा मुझे तो लगता है की इस कारण से हम लोग और खुल कर करीब और आये हैं, एक दुसरे से खुल कर अपनी बातें कर पाते हैं.

सविता माँ की एक एक बात को अचे से विचार कर रही थी,

माँ- आज के ज़माने में जहाँ भाई भाई का दुश्मन है, बहन बहन की नहीं बनती, वहीँ मेरा परिवार देख लो, तो मेरे लिए तो ये गलत चीज़ hi बहुत अछि है.

सविता- हाँ तुम्हारा परिवार तो सच में बहुत ाचा है सबमें बहुत प्रेम है, एक चीज़ पूछूं?

माँ- हाँ पूछो न,

सविता- इस सब की शुरुआत कैसे हुई,

माँ- ये तो लम्बी कहानी है,

सविता ये सुनकर मुस्कुराते हुए कहती है- मुझे नींद नहीं आ रही,

फिर माँ उसे अपनी तरफ से बना कर एक झूठी कहानी सुना देती है थोड़ा मसाला लगा कर की कैसे वो चारो लोग एक साथ चुदाई करने लगे और सिर्फ वो hi नहीं राजन चाचा और ममता चची भी, माँ की कहानी पूरी होने तक सविता इतनी उत्तेजित हो गयी थी की बिस्तर पर बिलबिला रही थी,

माँ- लगता है तुम्हे गर्मी कुछ ज़्यादा hi लग रही है,

सविता- अह्ह्म्म इतनी गरम तो मैं कभी नहीं हुई समझ नाहीइ आ रहा क्या करूँ,

माँ- मुझे पता है क्या करना है...

माँ ये कहके मुस्कुराती है,

जारी रहेगी...
 
बिजी हु आज कल से स्टार्ट करूँगा लिखना
 
एक साथ चुदाई करने लगे और सिर्फ वो hi नहीं राजन चाचा और ममता चची भी, माँ की कहानी पूरी होने तक सविता इतनी उत्तेजित हो गयी थी की बिस्तर पर बिलबिला रही थी,

माँ- लगता है तुम्हे गर्मी कुछ ज़्यादा hi लग रही है,

सविता- अह्ह्म्म इतनी गरम तो मैं कभी नहीं हुई समझ नाहीइ आ रहा क्या करूँ,

माँ- मुझे पता है क्या करना है...

माँ ये कहके मुस्कुराती है,



अपडेट 243


सविता- क्या?

सविता हैरानी से सभ्य की और देखती है,

सभ्य- तुम्हारे पास कई सरे विकल्प हैं,

सविता- कैसे विकल्प?

सभ्य- पहला विकल्प तो मैं जाती हूँ कमरे में उन लोगो के पास दरवाज़ा खुला रखूंगी और तुम पीछे से आना और हमारा खेल देखना,

सविता- और?

सभ्य- दूसरा विकल्प तुम भी चलो कमरे में और हम सब मिलकर तुम्हारी सेवा करेंगे अचे से,

सविता- ुहममम मेरी सेवा

सविता थूक गटकते हुए बोली,

सविता- हाँ दो दो मोठे मोठे लुंड हैं सोचो तुम्हारे छेदों का क्या हाल करेंगे,

सविता ये सुनकर मानो मचल उठी पर फिर भी खुद को सँभालते हुए बोली- पर मैं इन्हे धोखा नहीं देना चाहती,

सभ्य- ाचा फिर तो एक विकल्प ये है की हम ये साडी बातें भूल जाएँ और तुम कमरे में जाकर सो जाओ और मैं उस कमरे में चली जॉन.

सविता ये सुनकर भी चुप हो गयी वो इतनी उत्तेजित हो चुकी थी की अभी सोने का ख्याल भी उसके मन में नहीं आ रहा था.

सविता- समझ नहीं आ रहा क्या करूँ,

सविता साड़ी क्व ऊपर से hi अपनी चूचियों को दबाते हुए बोली,

सभ्य- एक और तरीका है,

सविता- क्या?

सभ्य आगे होती है और उसके हाथ उसकी चूचियों से हटा देती है और खुद दोनों हाथों से उसकी चूचियों को पकड़ लेती है,

सभ्य- कभी किसी औरत के बदन को छुआ है,

सभ्य सविता के बेहद करीब आकर बोलती है दोनों के होंठ लगभग एक इंच hi दूर होते हैं,

सविता ना में सर हिलाती है,

सभ्य और नहीं रूकती और सविता के कंपते होंठों से अपने होंठों को मिला देती है, सविता अचानक से चौंक जाती है और सभ्य को धक्का देकर अलग कर देती है,

सभ्य सविता के धक्के से चौंक जाती है और फिर पीछे होकर जाने लगती है, पर दो कदम बाद hi सविता उसका हाथ पकड़ लेती है और उसे रोकती है,

सभ्य कुछ कहने वाली होती है की सविता इस बार उसे चौंकाते हुए अपने होंठ उसके होंठों से मिला देती है, सभ्य पीछे होकर दीवार से सात जाती है वही सविता सभ्य के होंठों को पागलों की तरह चूसने लगती है सभ्य भी सविता का पूरा साथ देने लगती है.





दोनों पागलों की तरह एक दुसरे के होंठों का रास चूस रही थी. सभ्य भी काम नहीं थी उसने आगे बढ़ाते हुए सविता के मुँह में अपनी जीभ घुसा दी तो सविता जैसे अब पीछे नहीं हटना चाहती थी और वो सभ्य की जीभ चूसने लगी, तो कभी अपनी जीभ सभ्य की जीभ से लड़ाने लगी, कुछ देर तक यूँ hi होंठों से होंठ मिले रहे और फिर अलग हुए तो दोनों हांफ रहे थे,

सभ्य ने आगे बढ़कर सविता का पल्लू पकड़ा और फिर खींचकर उसकी साड़ी उतारने लगी सविता ने भी पूरी मदद की साड़ी उतारने में और अपनी सारी उतारते hi उसने सभ्य की साड़ी को पकड़ लिया और उसे खींचने लगी कुछ पल बाद सभ्य की साड़ी भी नीचे पड़ी हुई थी, अब दोनों सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में थी, सभ्य नीचे बैठी और सविता के पेट को चाटने लगी तो सविता उसके सर में हाथ फिराते हुए आहें भरने लगी, पेट चाटते हुए सभ्य हाथ ऊपर लाइ और सविता का ब्लाउज खोलने लगी, जिसमे कुछ hi पल बाद वो सफल हो गयी और सविता का ब्लाउज खुल चूका था जिसे सविता ने खुद अपने बदन से उतार कर अलग फ़ेंक दिया, सभ्य ने सविता की नाभि को चूमना जारी रखा साथ hi उसकी चूचियों को ब्रा के ऊपर से hi मसलने लगी,

सविता तो उत्तेजना से पागल हो रही थी उसका बदन मचल रहा था, सभ्य पेट चाटते हुए ऊपर की और बढ़ने लगी सविता की ब्रा के ऊपर से hi चूचियों को चाटते हुए ऊपर उसकी गर्दन को चूमते हुए सीढ़ी हो गयी एक बार फिर से दोनों की नज़रें मिली तो होंठ अपने आप मिल गए, पर एक दुसरे के होंठों को चूसते हुए भी दोनों के हाथ चल रहे थे, जहाँ सविता सभ्य का ब्लाउज खोल रही थी तो सभ्य अपने हाथ सविता की पीठ पर लेजाकर उसकी ब्रा का हुक खोल रही थी, जैसे hi सभ्य ने ब्रा को पीछे से खोला तब तक सविता उसका ब्लाउज खोल चुकी थी, जिसे सविता ने तुरंत hi सभ्य की बाहों से निकलवा दिया और निकलते hi उसने सभ्य को दूसरी और घुमा दिया और उसकी पीठ को चूमने लगी, पीठ को चूमते चाटते हुए उसने सभ्य की ब्रा को भी खोल दिया, ब्रा खुलते hi सभ्य घूम गयी अब दोनों की hi ब्रा खुली हुई थी बस उनके बदन से अटकी हुई थी, दोनों ने hi एक साथ हाथ बढाकर एक दुसरे की ब्रा को पकड़ कर अलग कर दिया और दोनों hi ऊपर से नंगी हो गयी,

सविता की आँखें सभ्य की मोती छुछियां देख कर फैल गयी तो सभ्य को भी सविता की चूचियां भ रही थी, सविता ने पहल की और झुककर सभ्य की चुकी पर मुँह लगा दिया और दूसरी चुकी को चूसने लगी, सभ्य उत्तेजित होकर आहें भरने लगी, सविता भूखों की तरह सभ्य की चूचियां चूस रही थी, एक को चूसती तो दूसरी को मसलती और फिर बदल कर दुसरे को चूसती, काफी देर तक चूचियों को चूसने के बाद वो नीचे सर्कि और सभ्य के गदराये पेट को चाटने लगी, पूरे पेट को चाटने के बाद उसने अपनी जीभ सभ्य की नाभि में घुसा दी तो सभ्य की एक तेज आह्ह्ह्हह्ह निकल गयी,

सभ्य की नाभि को चूसते हुए सविता हाथ नीचे लाइ और सभ्य के पेट पर फिरते हुए नीचे उसके पेटीकोट तक ले गयी और फिर पेटीकोट की किनारी के पास उंगली घुमाते हुए उसने पेटीकोट के नाड़े को पकड़ लिया और बिना अपनी जीभ सभ्य की नाभि से हटाए हुए नाड़े की गाँठ को खोल दिया और अगले hi पल सभ्य का पेटीकोट उसके पैरों में पड़ा हुआ था और सविता के सामने सभ्य पूरी नंगी कड़ी थी,

सविता ने तब जाकर अपना मुँह उसकी नाभि से हटाया और चेहरा पीछे कर सभ्य की छूट को देखने लगी जो की गीली नज़र आ रही थी, सभ्य की छूट को देख कर सविता ने ऊपर उसकी आँखों में देखा तो सभ्य मुस्कुराई और फिर सभ्य ने सविता के सर पर अपने हाथ लगाए और उसे अपनी छूट में घुसा दिया, सविता इतना तो जानती थी उसे क्या करना है, उसने अपना मुँह खोल दिया और अपनी जीभ को सभ्य की छूट में घुसा दिया, सभ्य उसका सर पकड़ कर अपनी छूट उसके मुँह पर घिसने लगी,

कोई सोच भी नहीं सकता था की दोनों समाज की इतनी शुशील लगने वाली औरतें बंद कमरे में ऐसा कुछ कर रही होंगी, सविता अपना हर प्रयास कर रही थी सभ्य की सेवा करने का और उसका प्रयास सफल भी हो रहा था सभ्य अपने छूट चतवते हुए बहुत गरम हो रही थी और जल्दी hi उसने अपना पानी सविता के मुँह पर छोड़ दिया था, सविता भी सभ्य का स्वाद पाकर अपने होंठों को चाट रही थी,

झड़ने के बाद सभ्य ने सविता को उठाया और उसे बिस्तर पर लेजाकर गिरा दिया और खुद उसके ऊपर आकर उसके होंठों को चूसने लगी,





होंठों को चूसते हुए सभ्य नीचे बढाती है और सविता की गर्दन को चूमती है और फिर चूचियों को चूसने लगती है, सविता भी सभ्य की हर हरकत पर अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म करके सिसकने लगती है, सभ्य भी पागलों की तरह उसकी छुछियां चूसती है और फिर नीचे बढ़ाते हुए उसकी टांगें फैला देती है

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह तुम्हारी छूट से तो नदी बाह रही है बहन,

सभ्य सविता की छूट को सहलाते हुए कहती है

सविता- ुहममम अह्ह्ह्हह्हह हॉँण्णन,

सविता सभ्य के स्पर्श से hi आहें भरने लगती है,

सभ्य सविता को मचलते हुए देखती है और फिर उसकी आँखों में देखते हुए अपनी जीभ निकलती है और फिर सविता की छूट को चाटती है तो सविता तो मानो पागल सी हो जाती है उसकी कमर हवा में उठ जाती है, वो बिस्तर को कसकर पकड़ लेती है, सभ्य भी उसकी बेचैनी को समझती है और पूरी लगन से उसकी छूट की गहराइयों में डुबकी लगा देती है और चाटने लगती है,

कुछ देर तक सविता की आहें hi सुनाई देती हैं और फिर सविता का बदन अकड़ने लगता है उसकी कमर ऊपर उठने लगती है पर सभ्य अपना मुँह उसकी छूट से नहीं हटती और फिर सविता थरथरते हुए झड़ने लगती है और बिस्तर पर गिर जाती है, तब जाकर सभ्य उसकी छूट से मुँह हटाती है, और खुद भी उसके बगल में लेट जाती है, कमरे में कुछ देर तक सिर्फ सन्नाटा रहता है,

कुछ देर बाद सविता सन्नाटा तोड़ते हुए कहती है- मैंने आज तक कभी ऐसा महसूस नहीं किआ.

ये कहते हुए वो सभ्य की और करवट लेती है और उसके पेट पर हाथ फिरने लगती है,

सभ्य- इससे पहले कभी ऐसा कुछ किआ भी तो नहीं न,

सभ्य ने भी उसकी और करवट लेकर मुस्कुराते हुए कहा, और फिर दोनों के होंठ पल भर के लिए मिले,

सविता- अब?

सभ्य- अब तुम बताओ, चाहो तो अपने कमरे में जाकर सो जाओ,

सविता- मेरा तो यहाँ से जाने का मन नहीं कर रहा,

सविता उसके चूचियों पर हाथ फिरते हुए बोली,

सभ्य- तो यहीं रुक जाओ पर थोड़ी देर में कर्मा के पापा आएंगे और तुम्हे देख कर तो उन्हें मज़ा hi आ जायेगा,

सविता- और तुम्हे,

सभ्य- मेरे तो हर हालत में मज़े हैं, तुम रुकी तो तुम्हे छुड़वाते हुए देखूंगी,

सविता- और नहीं रुकी तो?

सभ्य- तो खुद छुड़वा लुंगी,

सविता- मुझे तुम्हे चुड़ते हुए देखना है,

सभ्य- मुझे ह्म्मम्न ये भी हो सकता है,

सविता- कैसे?

सभ्य- उस कमरे में जाती हूँ तुम देख लेना जैसे शालू को देख रही थी,

सविता- कितना सही है तुम्हारा, काश सब के साथ ऐसा hi होता,

सभ्य- हो सकता है जो चाहे उसके साथ हो सकता है बस अपने आप को समाज के हिसाब से मत बांधो और वो करो जो खुद को ाचा लगे,

सविता- ुहममम कह तो सही रही हो तुम पर जितना आसान कहना है उतना करना नहीं है,

सभ्य- जानती हूँ, पर मज़े चाहिए तो म्हणत तो करनी पड़ती है.

सविता- हाँ चलो मैं जाती हूँ अगर रुकी तो खुद को रोक नहीं पाऊँगी और कुछ न कुछ गलत कर बैठूंगी.

सभ्य- सही गलत छोडो जो ाचा लगे वो करो,

ये कहकर सभ्य उसके होंठों को एक बार और चूम लेती है, सविता बोल तो रही थी बार बार जाने को पर उसका मन नहीं हो रहा था, और फिर से वो उत्तेजित होती जा रही थी, सभ्य उसके होंठों को चूम कर होंठों को पीछे करती है तो सविता नहीं करने देती और लगातार उसके होंठों को चूसती रहती है, सभ्य हाथ नीचे लेजाकर सविता के चूतड़ों को मसलने लगाती है,

इतने में hi कमरे का दरवाजा खुलता है तो सविता चौंक कर उठ जाती है देखती है तो सामने नीलेश खड़े होते हैं जो की खुद भी सविता को इस हालत में देख चौंक जाते हैं.

सविता तुरंत चादर से अपने बदन को ढंकती है,

नीलेश- अरे माफ़ करना भाभी जी, मुझे लगा ये यहाँ अकेली होगी.

सभ्य- क्यों क्या हुआ,

नीलेश- अरे मैं तो तुम्हे देखने आया था तुम अभी तक आई नहीं इसलिए.

सभ्य- मैं तो सविता बहन के साथ बातें कर रही थी, क्यों बहन?

सविता तो बेचारी शर्म के मारे ज़मीन में गाड़ी जा रही थी, और उसे समझ नहीं आ रहा था क्या बोले,

सविता- मैं चलती हूँ,

सभ्य- अरे रुको न, अब इतना होने के बाद भी शरमाओगी, तुम्हे मेरी चुदाई देखनी थी न,

सविता- ुहममम पर वो मैं कैसे?

सभ्य- चिंता मत करो तुम्हारी मर्ज़ी के बिना ये तुम्हे छुएंगे तक नहीं, क्यों जी?

नीलेश- हाँ हाँ भाभी जी बिलकुल,

सभ्य- तो आओ न जी सविता बहन को दिखाओ की तुम मुझे कैसे छोड़ते हो, कैसे मेरी छूट में अपना मोटा लुंड दाल कर अंदर तक मारते हो,

सभ्य जानकार गन्दी गन्दी बातें कर रही थी जिनका असर सविता पर भरपूर हो रहा था, वो बिस्तर के एक कोने में चादर में लिपटी हुई बैठी थी पर उसकी छूट फिर से गीली हो रही थी,

नीलेश- नेकी और पूछ पूछ.

ये कहकर नीलेश जो पजामा उस कमरे से पहन कर आये थे तुरंत उतारते हैं और पूरे नंगे हो जाते हैं, सविता की नज़र नीलेश के लुंड पर थी जो की खड़ा होकर ऊपर नीचे हो रहा था,

सभ्य उन्हें बिस्तर के पास बुलाती है और पास आने पर चेहरा आगे कर उनका लुंड मुँह में भर लेती है और फिर निकल कर बड़ी कामुकता से कहती है- इस पर तो मेरी बहन की छूट का रास लगा हुआ है,

और ये कहकर जीभ से लुंड को चाटने लगती है,

सविता जो देखती है और सुनती है उससे तो उसका रोम रोम मचलने लगता है,

नीलेश- हाँ क्यूंकि अभी तुम्हारी बहन की रसीली छूट की सैर करके hi तो आ रहा है ये मेरी रानी,

सभ्य ये सुनकर और स्वाद ले लेकर चाटने लगती है, सविता की नज़र उसी पर होती है कैसे सभ्य अपने पति का लुंड चाट रही होती है, कुछ देर की लुंड चूसै के बाद सभ्य मुँह से लुंड निकलती है और कहती है- अब और सबर नहीं हो रहा कर्मा के पापा, घुसा दो अपना मोटा लुंड मेरी छूट में,

ये कहकर सभ्य घूम जाती है और बिस्तर के किनारे hi घुटनो और कोहनी पर घोड़ी बन जाती है, नीलेश नीचे खड़े होकर hi अपनी पत्नी के चूतड़ों को अपनी सुविधा अनुसार थोड़ा नीचे सेट करते हैं और फिर अपना लुंड सभ्य की छूट के मुहाने रख कर अंदर घुसा देते हैं जिसके साथ hi एक साथ तीनो की आह निकल जाती है, सविता को तो यूँ लगता है ये लुंड उसकी छूट में hi घुसा था, उसके बदन में गर्मी बढ़ने लगती है, उत्तेजना से बुरा हाल हो रहा होता है, इधर निकेश उसकी अपनी पत्नी की कमर को पकड़ कर धक्के लगाने लगते हैं,





हर धक्के पर सभ्य सिसक रही थी, चुदाई सभ्य और नीलेश कर रहे थे पर उत्तेजना सविता की भी बढाती जा रही थी, सभ्य चुड़ते हुए सविता की आँखों में देख रही थी, सभ्य के चेहरे पर आते कामुकता के भाव और आँखों में वासना के डोरे सविता की छूट को बहा रहे थे, सविता का बदन मचल रहा था उसकी छूट में खुजली हो रही थी जो उससे सही नहीं जा रही थी,

सभ्य- अरे बहनहह अब क्याहहह शर्मा रही हो, इन्होने जो देखना था देख लिए, वैसे भी मैंने कहा न ये तुम्हे बिना मर्ज़ी के छुएंगे तक नहीं.

नीलेश- हाँ अह्हह्ह्ह्ह भाभी जिआहह, आप चिन्ताः मत करो और शर्माओ मत्तट ुहममम,

सविता वैसे भी उत्तेजित hi इतनी थी उसे उनके सुझाव में कोई बुराई नहीं दिखती और वो सीढ़ी होती है और अपने बदन से चादर हटा देती है, उसका नंगा सुन्दर कामुक बदन देख कर नीलेश की आँखों में चमक आ जाती है और वो और तेज़ धक्कों से अपनी पत्नी को छोड़ने लगते हैं,

सविता का हाथ अपने आप उसकी छूट पर चला जाता है है वो धीरे धीरे अपनी छूट को मसलते हुए सभ्य और नीलेश की चुदाई देखने लगती है, उसका दूसरा हाथ उसकी चूचियों से खेलने लगता है,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म सविता बहनंन ऐसी हीईई खेलल्लूओ अपनीइ चुत सीए अह्हह्ह्ह्ह दिखाओ एई किटनीय प्यासी हीी लुंदड़ के लियी,

सभ्य की बातें सुनकर सविता और गरम हो जाती है और अपनी छूट में दो उंगलियां एक साथ घुसा देती है और उन्हें अंदर बहार करने लगती है,

सविता- ुहममम हॉँण्णन बहुत्तत्त प्यासी हीी,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह इन्हे भी बताओ नाह तुम्हारी छूट किटनीय प्यासी है, कितनी भूखी है मोठे लुंड के लिए.

सविता- ुहममम हॉँण्णन भाई साहब, अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह देखू नाहहहह मेरी छूट किटनीय प्यासी हीी..

एक पराये मर्द से ये बोलने से सविता खुद इतनी उत्तेजित हो जाती है की तेजी से अपनी छूट छोड़ने लगती है साथ hi अपनी चूचियां भी मसलती है,





अपने पति के अलावा आज तक वो किसी भी मर्द के सामने वो नंगी नहीं हुई थी पर अभी पराये मर्द के सामने नंगी तो थी hi बल्कि रंडियों की तरह अपनी छूट में उंगली भी करके दिखा रही थी, वासना इंसान से क्या क्या नहीं करवा लेती,

वही दूसरी और सभ्य को अपने पति से चुड़ते हुए बहुत मज़ा आ रहा था, साथ hi वो हर प्रयास कर रही थी की सविता को भी पूरा मज़ा आये, इसीलिए सभ्य ने अपने पति को रोका और बिस्तर पर आगे की और खिसकी और आगे जाकर सविता की फैली हुई टैंगो के बीच जगह ली और उसकी उँगलियों को उसकी छूट से हटा दिया, आउट अपना मुँह लगा दिया, सविता की फिर से एक आह्ह्ह्हह्ह निकल गयी, सभ्य अपनी जीभ और उँगलियों से सविता की छूट की सेवा करने लगी, वहीँ उसने पीछे अपना हाथ अपने चूतड़ों पर मारकर अपने पति को भी आगे बढ़ने का इशारा किआ,

नीलेश ने सभ्य का इशारा समझा और बिस्तर पर चढ़ गए और एक बार फिर से अपना लुंड सभ्य की छूट में घुसा दिया, फ़र्क़ सिर्फ इतना था की इस बार सभ्य की जीभ सविता की छूट में थी,

सभ्य एक साथ दोनों को hi सुख दे रही थी, अपनी छूट से अपने पति को तो जीभ से सविता को, सविता भी सभ्य की जीभ की कारीगरी से मचल रही थी उसकी छूट में एक अलग hi तूफ़ान सा मचाया हुआ था सभ्य की जीभ ने, नीलेश को भी सविता का नंगा बदन देखते हुए अपनी पत्नी को छोड़ने में बड़ा मज़ा आ रहा था.

इसी बीच सविता और नीलेश की नज़रें मिली, पर इस बार सविता शरमाई नहीं और ना hi उसने अपनी नज़रें नीलेश से चुराई, उसकी आँखों में शर्म नहीं बल्कि वासना दिखाई दे रही थी जिसे नीलेश अछि तरह पहचानते थे,

नीलेश- मस्त चाटती है न सभ्य भाभी जी,

सविता- ुहममम हॉँण्णन भाई साहब अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बहुत्तत्त मस्त्त ऐसाह माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कभी नाहीई आगयाह,

सविता कह भी सही रही थी उसने सोचा भी नहीं था की कभी ऐसा होगा की कोई औरत उसकी छूट चाट रही होगी और अपने पति से छुड़वा रही होगी और उसका पति उससे बातें करेगा छोड़ते हुए, पर एक hi रात में उसे बहुत कुछ देखने को मिल रहा था,

नीलेश- ुहम्म्म्म आह्हः इसी देख के हीई लग रहाःहठ है की इसे बहुत्त माज़ाअह आ रहा है तुम्हारी छूट चाटने में भाभी जी, तुम्हारी छूट का स्वाद इसे पसंद आ गया है,

नीलेश जानकार और कामुक और गन्दी बातें कर रहे थे ताकि सविता और उत्तेजित भी हो और उसके अंदर की शर्म भी मर जाए,

सविता- ुहममम हॉँण्णन भाई साहब पर स्वाद तो सभ्य बहन की छूट का बहुत मस्त है तुम्हे भी बहुत मज़ा आ रहा होगा अह्हह्ह्ह्ह छोड़ने में,

नीलेश- अह्ह्ह्हह्हह हॉँण्णन भाभीयहह बहुत मज़ा आता है तभी तो रोज़ इसे छोड़ता हूँ, बिना चोदे लुंड शांत hi नहीं होता है,

सविता- अह्ह्ह्हह्हह फिर छोड़ो न भाई साहब दिखाओ कैसे छोड़ते हो अपनी बीवी कोऊअहभ..

सविता गरम होते हुए सभ्य का मुँह अपनी छूट में दबाते हुए कहती है,

सभ्य की जीभ का जादू एक बार और उसकी छूट पर चल जाता है और वो फिर से थरथरते हुए झड़ने लगती है, सभ्य उसके छूट रास को सारा जातक जाती है, झड़ने के बाद सविता शांत हो पाती है की सभ्य को खुद की छूट उमड़ती हुई महसूस होती है और कुछ hi पलों में वो अपने पति के लुंड पर झड़ने लगती है, झड़ते हुए सभ्य आगे होकर गिर जाती है सविता के ऊपर, सविता भी उसे बाहों में भर लेती है, कुछ पल यूँ hi रहने के बाद सभ्य सविता के एक और लेट जाती है और उसकी और करवट लेकर उससे चिपक कर लेट जाती है, सभ्य के हाथ सविता के गदराये पेट पर हलके हलके घुमते हैं, वहीँ सविता भी अपना हाथ सभ्य की पीठ और चूतड़ों पर चला रही होती है,

नीलेश क्यूंकि एक बार पहले hi शालू की छूट में झाड़ चुके थे इसलिए खुद को रोकते हैं और कुछ पल का आराम लेने की सोच कर वो भी आगे होकर सिरहाने से तक लगा कर बैठ जाते हैं, बिस्तर के एक और नीलेश बैठे थे तो उनसे थोड़ा सा हैट कर उनके बगल में सविता लेती थी और उसके बगल में उससे चिपक कर सभ्य थी.

कुछ पल कमरे में यूँ hi सन्नाटा रहता है फिर सविता अपना चेहरा आगे कर सभ्य के होंठों को चूमती है, नीलेश दोनों को फिर से एक दुसरे के होंठों को चूसते देखते हैं तो उनका पहले से सख्त लुंड ठुमके लगाने लगता है,

नीलेश- अरे तुम्हारा आपस में प्यार हो गया हो तो ज़रा इस पर भी ध्यान दो,

ये सुनकर सभ्य और सविता दोनों मुस्कुराते हैं सभ्य हाथ बढाकर नीलेश का लुंड पकड़ लेती है और उसे अपनी और खींचती है तो नीलेश भी आगे खिसकते चले जाते हैं, और जल्दी hi नीलेश सविता के बिलकुल बगल में घुटनो पर होते हैं, वहीँ सभ्य उनके लुंड को मुठियाते हुए सविता को चूमती है,

सविता के चेहरे के ठीक ऊपर hi सभ्य नीलेश के लुंड को मुठियाती है और सभ्य इतनी पास से नीलेश का लुंड देखती है तो एक बार फिर से उसके बदन में सिहरन होने लगती है, इधर सभ्य उसके होंठों को छोड़ती है और उसके चेहरे के ऊपर hi उसकी आँखों के सामने अपने होंठ आगे बढाकर अपने पति का लुंड मुँह में भर लेती है, वैसे इसमें कुछ गलत नहीं हो रहा था बस सविता के लिए मुश्किल ये थी की सभ्य नीलेश का लुंड उसके चेहरे से बाद कुछ इंच ऊपर चूस रही थी, सविता को लुंड की गंध तक आ रही थी, उसकी छूट फिर से गीली हो जाती है, इधर सभ्य का एक हाथ उसकी चूचियों को मसल रहा था जो की उत्तेजना को और बढ़ता है,

सभ्य जानकार सविता को तड़पा रही थी, वो छह रही थी सविता खुद से अपनी उत्तेजना को समझे और फिर फैसला करे, नीलेश को भी ये खेल पसंद आ रहा था वो अपनी पत्नी को अपनी मर्ज़ी का करने दे रहे थे, लुंड चूसने के कारण पूरा सभ्य के थूक से सं गया और चमक रहा था जो की सविता को और ाचा लग रहा था देखने में तभी लुंड के टोपे से सभ्य के लार की एक बूँद टपकी जो की सीढ़ी सविता के होंठों पर गिरी और सविता को मानो लगा की उसका पूरा बदन जल उठा, सविता ने तुरंत hi जीभ से होंठों के ऊपर से उस बूँद को चाट लिया, सभ्य और नीलेश का ध्यान जाये बिना,

सभ्य ने कुछ देर चूसने के बाद लुंड को छोड़ा और फिर अपने होंठ सविता के होंठों से मिला दिए, सविता को लगा मानो वो सभ्य के होंठों पर नीलेश के लुंड का स्वाद चख रही हो, और ये सोच उसका पूरा बदन मचलने लगा, सभ्य बार बार ऐसा hi करने लगी, एक पल नीलेश के लुंड को चूमती और फिर सविता के होंठों को चूसती इससे सविता और नीलेश दोनों hi उत्तेजना से पागल हो रहे थे,

सविता सोच रही थी अब कमी hi क्या रह गयी लुंड का सारा स्वाद तो ऐसे hi मेरे मुँह में आ गया है, पर सभ्य ने उसे तड़पना जारी रखा और अपना चेहरा सविता के होंठों पर रखा नीलेश का लुंड अपने मुँह में घुसा लिए सविता के होंठ सभ्य के गाल पर थे और गाल के अंदर नीलेश का लुंड था, सविता के मुँह और नीलेश के लुंड के बीच सिर्फ सभ्य इ गाल की खाल थी,

सविता के लिए हर पल मुश्किल बढ़ती जा रही थी, उसके सबर का बांध टूट रहा था वो जानती थी की ये सब गलत है पर उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी की वो उठे या सभ्य को रोके, क्यूंकि ऐसा कुछ उसने कभी महसूस नहीं किआ था और उसे दर लग रहा था न hi आज के बाद कभी कर पाएगी.

सभ्य ने अगली चाल चलते हुए नीलेश के लुंड के टोपे को चेतना शुरू किआ और उस पर जीभ फिरते हुए वो टोपे को सविता के होंठों के बेहद करीब ले आई, सविता के होंठों और नीलेश के लुंड के बीच एक इंच का भी फैसला नहीं रह गया, सविता के होंठ तो लुंड को इतने पास देख फड़फड़ाने लगे, पर चाट अभी भी उसे सभ्य रही थी, सभ्य की जीभ कभी उसके होंठों से छूती तो कभी नीलेश के लुंड से, सविता को समझ नहीं आ रहा था वो क्या करे , उसे पता था वो जब चाहे ये रोक सकती थी, कमरे से बाहर जा सकती थी पर वो ऐसा कुछ भी नहीं कर पा रही थी, बस अपनी आँखों के सामने सभ्य को अपने पति का मोटा लम्बा लुंड चाटते हुए देख तड़प रही थी, एक पल को तो सभ्य लुंड को सीधा सविता के होंठों की और लाइ तो सविता ने अपने होंठ स्वागत के लिए अपने आप खोल दिए, पर सभ्य ने एक बार और तड़पाया और बीच में hi अपने मुँह में भर लिए, सविता के मुँह में पानी आ रहा था ये सब देख देख कर,

सविता को समझ नहीं आ रहा था की सभ्य उसे इस तरह क्यों तड़पा रही है, क्यों इतना तरसा रही है, तभी उसे अचानक से सूझा की सभ्य क्या चाहती है, सभ्य चाहती है की मैं खुद से फैसला करूँ आगे बढ़ने का, वो दिखा रही है की आगे क्या होगा पर फैसला मुझे hi करना है,

सविता कुछ देर तक इसी बारे में सोचती रहती है, पर तब तक सभ्य उसके बगल से उठ जाती है और उसके ऊपर आ जाती है, और उसे ऊपर आकर चूमने लगती है, नीलेश भी उसके बगल से उठ कर दोनों की टैंगो के बीच जगह लेते हैं और एक बार फिर से अपना लुंड सभ्य की छूट में घुसा कर छोड़ने लगते हैं, सभ्य भी हर झटके के साथ और कामुकता के साथ सविता के होंठो को चूसने लगती है,





सविता भी हाथ नीचे करके अपनी छूट को मसलते हुए सभ्य का पूरा साथ देती है, सविता को ऐसा काग रहा था की जैसे नीलेश उसकी टैंगो के बीच उसकी चुदाई कर रहे हैं क्यूंकि हर झटके पर सभ्य के साथ साथ उसका बदन भी पूरा हिल रहा था बस फ़र्क़ इतना था की लुंड उसकी छूट में नहीं था, इसी बीच सभ्य अपने घुटनो को सीधा कर अपने पेट आउट छूट को और नीचे कर लेती है अब तो दोनों की छूट एक दुसरे से चिपक जाती है और हर झटके पर घिसती भी है जिससे दोनों के मुँह से सिसकियाँ निकलने लगती हैं, सविता को तो सभ्य की छूट में लुंड अंदर बाहर होता भी महसूस हो रहा था, अगले hi पल नीलेश ने और गहरे धक्के लगाने शुरू कर दिए और सविता को अपनी छूट पर नीलेश की गोलियां टकराती हुई महसूस होने लगी और वो पागल होने लगी,

पर ऐसा ज़्यादा देर नहीं चला क्यूंकि सभ्य कुछ पल बाद hi उसके ऊपर से उठ गयी, और बगल में अपने चूतड़ों को उठा कर घोड़ी बन गयी,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह कर्मा के पापा गांड में भी खुजली हो रही है गांड नहीं मारोगे क्या?

नीलेश- बिना गांड मारे मुझे नींद कहाँ आती है मेरी रैंड बीवी, अह्हह्ह्ह्ह ुहम्म्म्म

ये कहते हुए नीलेश सभ्य के पीछे आते हैं और अपना चेहरा झुका कर सभ्य के चूतड़ों के बीच घुसा देते हैं और सभ्य की गांड चाटने लगते हैं,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म अह्हह्ह्ह्ह कर्मा के पापा अह्हह्ह्ह्ह ऐसे hi जीभ घुसा कर चाटो और गीली कार्डो मेरी गांड फिर अपना मोटा लोड़ाआठ घुसा कर सविता बहन को दिखाओ कैसे गांड मारते हो तुम मेरी,

सविता को थोड़ा ाचा नहीं लगा था जब सभ्य उसके ऊपर से हैट गयी थी पर दोनों की कामुक बातों को सुनकर वो सब भूल कर आगे क्या होने वाला है वो सोचने लगी,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह बहन देखना चाहोगी मेरी गांड में इनका मोटा लोड़ाआठ?

सविता- ुहममम हॉँण्णन

सविता ने अपनी जगह से उठाते हुए कहा और आगे खिसकते हुए सभ्य के बिलकुल पास आ गयी,

नीलेश ने कुछ देर अपनी पत्नी की गांड को छाता और फिर सीधे होकर अपने लुंड को उसकी गांड के छेड़ पर टिकाया और फिर धक्का लगा कर अंदर घुसा दिया, जिसके साथ hi सभ्य की आह्ह्ह्हह्ह निकली तो सविता का मुँह भी खुल गया,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म बहुत मोटा है अह्हह्ह्ह्ह देखो बहन कैसे कास के जा रहा है मेरी गांड में,

सविता भी गरम होकर उसका साथ दे रही थी और उत्साह बढ़ने लगी- ुहम्म हानंन्न बहन तुम्हारी कासी हुई गांड को पूरा फैला रहा है,

ये कहते हुए सविता और आगे खिसकी और सभ्य के नीचे से हाथ लेजाकर उसकी छूट को अपनी उँगलियों से सहलाने लगी, सभ्य को तो और मज़ा आने लगा,

सविता अब शर्म वगेरा सब भूल कर दोनों की चुदाई में पूरा साथ दे रही थी,

सविता- ुहममम तुम्हारी छूट तो बहुत गीली है बहन,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह इतना मोटा लुंड गांड में है छूट तो गीली होगी hi,

सविता सभ्य की छूट को सहलाते हुए कभी उसकी चूचियों को मसलती तो कभी चूतड़ों को और उसकी उत्तेजना और बढ़ा रही थी,

नीलेश लगातार अपनी पत्नी की गांड ने धक्के लगाए जा रहे थे,





नीलेश- अह्ह्ह्हह्हह सालिई रनडीईई कुटिया अह्ह्ह अह्ह्ह्ह क्या गांडडडड हीी टेरिइइइ इतनी मारीई है फिर भी मन नाहीइ भरता,

सविता नीलेश को यूँ अपनी पत्नी से बोलते देख हैरान भी हो रही थी और उत्तेजित भी,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह टूवू मारूओ नाहहहह वोऊ गड्ड्ढड hi क्याह जिससे मर्डदद का मन भरररर जाईए, क्यों बहनणणन अह्हह्ह्ह्ह भाई साहब मारते हैं तुम्हारिई????

सविता को ऐसे प्रश्न की आशा नहीं थी पर सुनकर उसे अच्छा भी लगा

सविता- ुहममम हॉँण्णन कभी कभी मारते तो हैंण्ण्न,

सभ्य- तुम्हे मज़ा आ आता है गांड मरवाने में,

सविता- हैं मज़ा तो आता है बस थोड़े नखरे दिखने पड़ते हैं की दर्द है नहीं तो वो गण्ड के hi पीछे पद जाएँ,

नीलेश- अह्ह्ह्हह्हह भाभी जी गांड चीज़ hi ऐसी है की मर्द का पीछे पड़ना तो तय hi ही, चाहे काम बच्चा हो या बूढ़ा, गांड तो हर मर्द की कमज़ोरी होती हीीःहःहः.

नीलेश सभ्य की गांड मरते हुए बोले,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह कर्मा के पापा लेट कर मारो पेअर दुःख रहे हैं,

नीलेश तुरंत बिना लुंड उसकी गांड से निकाले एक और को लेकर लेट जाते हैं और पीछे से उसका पेअर उठाकर लगातार गांड मरते रहते हैं, सविता के लिए भी ये और ाचा मौका बन जाता है वो भी आगे खिसक कर सभ्य के पेट पर अपना सर टिका देती है और उसकी छूट को सहलाते हुए करीब से नीलेश का लुंड उसकी गांड में अंदर बाहर होते हुए देखती है,





सविता- अह्ह्ह्हह्हह कितना मस्त लग रहा है तुम्हारी गांड में लुंड आते जाते हुए,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह ऐसे hi उंगलिया करती रहो छूट में मज़ा आ रहा है बहन,

सविता- अच्छाह फिर इससे तो और मज़ा आएगा तुम्हे,

सविता ये कहते हुए अपना चेहरा और आगे करती है और जीभ निकल कर सभ्य की छूट पर फेरने लगती है, उसकी जीभ और नीलेश के लुंड में जो सभ्य की गांड से अंदर बहार हो रहा था कुछ फैसला नहीं रह जाता, पर जितनी काम दूरी उतनी ज़्यादा उत्तेजना,

इसी बीच धक्के लगते हुए अचानक से नीलेश का लुंड सभ्य की गांड से निकल गया और सीधा सविता की जीभ से टकराया, अपनी जीभ पर लुंड का स्वाद पाते hi सविता के पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गयी, नीलेश ने लुंड निकलने के बाद अपना हाथ नीचे किआ लुंड को पकड़ कर दोबारा गांड में घुसाने के लिए पर इससे पहले की वो लुंड को पकड़ते उन्हें लुंड पर एक गरम एहसास हुआ, सभ्य ने भी नीचे देखा तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी क्यूंकि उसकी गांड से निकले लुंड को सविता अपने मुँह में भर कर चूस रही थी, सविता पागलों की तरह नीलेश के लुंड को चूसने और चाटने लगी कभी मुँह में भर्ती तो कभी टोपे पर जीभ फिराती,

उसके सबर का बांध टूट पड़ा था और अब वो रुकना नहीं चाहती थी, काफी देर से तड़प रही थी और अब जब लुंड मुँह में आया तो उसने मौका नहीं छोड़ा, और अब मानो भूखी शेरनी की तरह लुंड पर टूटी पड़ी थी,

नीलेश- अह्ह्ह्हह्हह भाभीयहह ओह्ह्ह्हह्ह क्या गरम मुहहह है तुम्हारा,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह देखो तो कितनी भूख है सविता बहन में लुंड की,

सभ्य ने सविता के बदन पर हाथ फिरते हुए कहा, पर सविता के पास अभी किसी भी बात का जवाब देने का समय hi कहाँ था, वो तो बस लुंड को चूसे जा रही थी, सभ्य का हाथ घुमते हुए जल्दी hi सविता की टांगो के बीच पहुँच गया और उसकी छूट को सहलाते हुए बोली- तुम्हारी छूट भी उतनी hi भूखी लग रही है लुंड के लिए, जितना तुम्हारा मुँह,

ये कह सभ्य ने दो उंगलियां उसकी छूट में घुसा दी तो जाकर सविता ने आह्ह्ह्हह्ह भरते हुए नीलेश के लुंड को मुँह से निकला और सभ्य की और देखा,

सविता- तुम्हे कोई परेशानी तो नहीं होगी?

सभ्य ये सुन मुस्कुराई और ना में सर हिला दिया,

सविता तुरंत hi उठी और नीलेश के पैरों की और मुँह करके उनके ऊपर आ गयी और नीचे हाथ कर उनका लुंड पकड़ कर अपनी छूट के मुहाने रखा और फिर सभ्य की आँखों में देखते हुए नीचे हो गयी और नीलेश का लुंड उसकी छूट में समां गया,

सविता के मुँह से एक गरम और गहरी सिसकी निकली साथ hi नीलेश के मुँह से भी, सविता धीरे धीरे नीलेश के लुंड पर आगे पीछे होने लगी तो सभ्य भी मदद को आगे आई और उसकी छूट के दाने को घिसने लगी,





सविता- ुहममम हॉँण्णन अह्हह्ह्ह्ह बहुत बड़ा है अह्हह्ह्ह्ह छूट को अंदर तक भर दियाहहह,

सभ्य- मज़ा आ रहा है मेरे पति का लुंड लेकर?

सविता- ुहममम हॉँण्णन बहुत्तत्त मस्त्त हीीीाहहह इतना अंदर तक महसूस हो रहा हीीःहःहः,

सभ्य- क्यों जीई तुम्हे कैसी लग रही है सविता बहन की छूट?

नीलेश- अह्ह्ह्हह्हह भाभीयहह ओह्ह्ह्हह्ह बड़ीई गरमममम ऑरररर केसीई हुई हीीीाहहह,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह तो अब इस गरम छूट को छोड़ो जी, तगड़े धक्के लगा कर अपने लुंड की ताकत दिखाओ सविता रानी को,

नीलेश भी सभ्य की बात मान कर तेज़ी से धक्के लगाने लगते हैं,

सविता- ुहममम हॉँण्णन भाई साहब ओह्ह्ह माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आ रहा है,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह कर्मा के पापा ऐसी होई छोड़ो सविता बहन को रंडी की तरह, छोड़ छोड़ के रंडी बना लो अपनी,

नीलेश- अह्ह्ह्हह्हह हॉँण्णन अह्हह्ह्ह्ह

सविता- ुहममम हॉँण्णन भाई साहब छोड़ूऊओ मुझे,

सभ्य सविता का मुँह पकड़ कर चूमती है और फिर पूछती है- कैसे छोड़ना है तुम्हे सविता बहन बोल कर बताओ...

सविता- ुहममम रंडी की तरह, अह्ह्ह रंडी की तरह छोड़ो मुझे,

सविता चुदाई से बेहद उत्तेजित हो रही थी, और सब कुछ करने के लिए तैयार थी,

सभ्य- किसकी रंडी बन कर सविता बहन,

सविता- ुहममम तुम्हारी ऑरररररर भईईई साहब कीईई रनडीईई,

सविता ये कहते हुए बहुत उत्तेजित हो रही थी और तेज तेज अपनी छूट को नीलेश के लुंड पर पटक रही थी, उत्तेजना का असर कुछ ऐसा हुआ की कुछ hi पलों में उसका बदन कंपनी लगा वो झड़ने लगी उसके थरथराने से नीलेश का लुंड उसकी छूट से निकल गया और अगले hi पल उसकी छूट से मूट की एक तेज़ धार निकली, सभ्य ने उसका मुँह तुरंत दबाया ताकि उसकी चीख डाब जाए, सविता का बदन कांपता रहा उसकी कमर झटके ले रही थी और हर झटके पर उसकी छूट से मूट की धार निकल रही थी वो तो ाचा था की लोग लगभग बिस्तर के किनारे hi थे नहीं तो पूरा बिस्तर मूट से गीला हो जाता, उसके स्खलन का वेग देख कर सभ्य और नीलेश भी हैरान थे, खैर झड़ने के बाद सविता बापिस ढेर होकर नीलेश के ऊपर गिर गयी तो सभ्य ने अपने पति का लुंड बापिस उसकी छूट में घुसा दिया और नीलेश ने भी कुछ देर नीचे से धक्के लगाए और फिर अपने रास से सविता की छूट को भर दिया, सविता को तो जैसे होश hi नहीं था,

नीलेश ने उसे अपने ऊपर से हटा कर एक और लिटा दिया, कमरे में कुछ पल शांति रहती है, फिर सभ्य बोलती है- सविता बहन की चुदाई देख कर तो मेरी छूट फिर से गीली हो गयी जी,

नीलेश- तो चूस के खड़ा कार्डो, तुम्हारी छूट की खुजली मिटाये तो नहीं सोयेंगे,

सभ्य- हाय इतना प्यार है अभी तक मुझसे,

ये कहकर सभ्य उठ कर अपने पति के होंठों को चूसती है और फिर उनकी टांगो के बीच आकर उनके ढीले हो रहे लुंड को मुँह में भर लेती है साथ hi हाथों से उनकी गोलियों को सहलाने लगती है, कुछ पलों के होंठों के जादू के बाद नीलेश का लुंड फिर से पूरी तरह खड़ा होता है, जिसके सख्त होते hi सभ्य उस पर बैठ जाती है अपनी छूट में लेकर और उछलने लगती है,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह जीई तुम्हारे लोडे जैसा माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह और कहींनन नाहीई,

नीलेश- अह्ह्ह्हह्हह मेरिइइइ रानीई तुम्हारीई चुत काअह्ह्ह्ह भी तो कोई मुक़ाबला नहीं है,

इधर सविता भी अब स्खलन के असर से बाहर आ रही थी उसे आवाज़ें तो सुनाई दे रही थी पहले से hi पर अब उसने आँखें खोल कर देखा तो सभ्य को नीलेश के लुंड पर उछलता पाया, सविता कुछ देर तक यूँ hi देखती रही, वो सोचने लगी इन दोनों पति पत्नी ने क्या जादू किआ है मुझ पर ऐसा तो मेरे साथ कभी नहीं हुआ जैसे अभी हुआ, झड़ते हुए आज तक मूट की एक बूँद नहीं निकली और आज तो धार के बाद धार निकल रही थी, पर ऐसा मज़ाआ भी कभी नहीं आया, ये सब सोचते हुए वो फिर से हलकी हलकी अपनी छूट को सहलाने लगी, पर ज़्यादा देर वो खुद को रोक नहीं पाई और फिर उठ कर सभ्य के पीछे पहुंच गयी और उसे पीछे से गले लगा लिया,

सभ्य- अरे बहन तुम सोइ नहीं मुझे लगा तुम सो गयी,

सविता- नहीं अब रंडी बनाया है तो रंडी इतनी जल्दी कैसे सो जाएगी,

सभ्य- ाचा तो फिर और क्या इरादा है,

सविता- तुम्हारी सेवा करने का,

ये कहकर सविता अपने हाथों से पीछे से hi सभ्य की चूचियों और छूट को मसलने लगती है,





सभ्य को भी और मज़ा आने लगता है,

सविता- कैसाह लग रहाःहठ है बहनणननं,

सविता सभ्य की गर्दन को चूमते हुए कहती है,

सभ्य- अह्ह्ह्हह्हह ुहम्म्म्म अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह बहनजीई बहुत्तत्त माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आ रहा हीीीाहहह,

सविता- ुहममम बहनणणन नाहीई रनडीईई बोलो सुनने में मज़ा आता है,

सभ्य- ठीक है मेरी रनडीईई अह्हह्ह्ह्ह

नीलेश- अह्ह्ह्हह्हह रनडीईई भाभीयहह इधर तो आओ अपनी छूट आह्हः और गांड का स्वाद मुझे भी चखाओ.

सविता ये सुनकर तुरंत आगे बढाती है और पहले नीलेश के होंठों को चूमती है और फिर उनके मुँह पर अपनी छूट रख कर बैठ जाती है, नीलेश भी दोनों हाथो से उसके चूतड़ों को फैलाकर उसकी छूट और गांड को चाटने लगते हैं, वही सभ्य भी लगातार अपने पति के लुंड पर उछाल रही होती है और कुछ hi देर में झाड़ भी जाती है, उसके हटते hi सविता झुक कर नीलेश का लुंड मुँह में ले लेती है और उसे चूसने लगती है, कुछ पल चूसने के बाद छोड़ती है और फिर सभ्य की जगह लेते हुए फिर से लुंड को अपनी छूट में लेने के लिए नीलेश के ऊपर आती है और उनके लुंड को पकड़ कर अपनी छूट पर लगाती है, पर बीच में hi सभ्य उसे रोक देती है,

सभ्य- अरे मेरी रांड कब तक छूट मरवायेगी, अब लुंड को अपनी गांड की गर्मी भी दिखाओ,

सविता सभ्य की बात सुनकर रुक जाती है और मुस्कुराती है और फिर लुंड के टोपे को छूट से खिसका कर गांड पर लगा लेती है,

सभ्य- ये हुई ना बात अब ले लो इसे गांड में,

सभ्य ये कहती है तो सविता सर हिलती है और फिर धीरे धीरे नीचे होने लगती है, लुंड का टोपा उसकी गांड के छेड़ को फैलते हुए अंदर घुसने लगता है तो सविता की आँखें बढ़ी होने लगती हैं, दर्द को सहने के लिए वो अपने दांत पीस लेती है, और फिर और नीचे होने लगती है, उसके चेहरे पर आ रहे भावों से पता चल रहा था की उसे तकलीफ हो रही थी, पर वो लुंड लेने का मन बना चुकी थी, अभी भी उसके हाथ ने लुंड को नीचे से थमा हुआ था, लुंड थोड़ा और घुसा तो उसकी एक अह्ह्ह निकल गयी,

सभ्य- अरे वाह्ह्ह्ह आधा तो ले hi लिया है मेरी रैंड बहन, कर्मा के पापा ऐसे hi अंदर बाहर करो..

सविता- ुहममम बहनणणन अह्हह्ह्ह्ह इतना मोटाआहहह हीीीाहहह ीीेहःहः

सभ्य- कोई बात नाहीइ अब तो घुस गया है अब मज़ा hi मज़ा आएगा,

सभ्य ने उसके गाल को चूमते हुए उसे सांत्वना दी, नीलेश ने भी नीचे से धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए, सविता अभी भी नीलेश के लुंड को नीचे से पकडे हुए थी ताकि वो अचानक से पूरा लुंड न घुसा दें, वहीँ सभ्य उसकी छूट सहलाते हुए उसे शांत करने की कोशिश कर रही थी, नीलेश धीरे धीरे से नीचे से धक्के लगाकर सविता की गांड मरने लगे





सभ्य भी बिलकुल करीब से ये देख रही थी और सविता की छूट को लगातार सहला रही थी, सविता ने भी नीलेश के लुंड से हाथ हटा लिया ताकि वो और अचे से गांड मार पाएं, नीलेश नीचे से लम्बे और गहरे धक्के लगाकर सविता की गांड मरने लगे,

सविता- ुहममम अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह इतना मोटाआहहह लुंदड़ है भैई साहब अह्हह्ह्ह्ह गांडडडड चीरडीई मेरिइइइइ तुह्ह्ह

सभ्य- जितना मोटा लुंदड़ उतना hi माज़ाअह मेरी रंडी, भाई साहब का ऐसा नही है,

सब्ब्या

सविता- उनका भी अच्छाह है पर इतना लम्बा और मोटा नाहीई हीीीाहहह,

सभ्य- कोई बात नहीं अब तो ले लिए है ना अब मज़ा hi मज़ा है,

और होता भी ऐसा hi है कुछ hi देर में सविता को दर्द की जगह एक अद्भुत आनंद मिलने लगता है अपनी गांड मरवाने में, सभ्य भी कभी उसकी छूट चाटती है तो कभी उसकी चूचियों को चूसती है, नीलेश भी काफी देर तक सविता की गांड मरते हैं आसान बदल बदल कर और सविता का तो ये हाल था की वो चाह रही थी की ये रात कभी ख़तम न हो,

दोनों पति पत्नी की म्हणत से वो दो बार और झड़ती है और फिर नीलेश भी उसकी गांड को भी अपने रास से भर देते हैं, तीनो अब बुरी तरह थक चुके थे, सविता को तो मानो होश hi नहीं था की वो कहाँ है,

कुछ देर यूँ hi लेटने के बाद नीलेश सविता को अपनी गॉड में उठाते हैं वही सभ्य सविता के कपडे समेटती है और फिर दोनों उसे लेकर उसके कमरे में आते हैं जहाँ उसका पति महिपाल सो रहा होता है, नीलेश उसे नंगा hi बिस्तर पर उसके बगल में लिटा देते हैं और सभ्य उसके कपडे वहीँ रख देती हैं और दोनों बापिस अपने कमरे में लौट आते हैं, सभ्य बाथरूम से एक बाल्टी ने पानी और पौंछा लाकर कमरे में सविता का मूट पांच देती है और फिर दोनों सो जाते हैं.

जारी रहेगी.

 
कुछ देर यूँ hi लेटने के बाद नीलेश सविता को अपनी गॉड में उठाते हैं वही सभ्य सविता के कपडे समेटती है और फिर दोनों उसे लेकर उसके कमरे में आते हैं जहाँ उसका पति महिपाल सो रहा होता है, नीलेश उसे नंगा hi बिस्तर पर उसके बगल में लिटा देते हैं और सभ्य उसके कपडे वहीँ रख देती हैं और दोनों बापिस अपने कमरे में लौट आते हैं, सभ्य बाथरूम से एक बाल्टी ने पानी और पौंछा लाकर कमरे में सविता का मूट पांच देती है और फिर दोनों सो जाते हैं.



अपडेट 244


जहाँ घर के बड़ों ने अलग तरीके से रात बीते तो कर्मा और उसके दोस्तों की थोड़ी अलग रही, बियर से थोड़ा बहुत hi सुरूर बनने के बाद धीरे धीरे बातें होने लगी, पियूष भी धीरे धीरे उनकी मंडली में शामिल होने की कोशिश कर रहा था..

(कर्मा की ज़ुबानी)

सरजू- अरे यार कर्मा साला चढ़ने के बाद तो बदन में तरंगें उठने लगती हैं,

जग्गू- अरे यार तो बियर पीकर तरंगे तो उठेंगी hi इसमें नया क्या है?

में- अबे ये नशे की तरंगो की बात नहीं कर रहा, ये.

जग्गू- तो फिर,

में- हवस की तरंगो की बात कर रहा है.

ये सुनकर सब हंसने लगे, पियूष भी खूब मज़े ले रहा था, उसको सच में दोस्तों की ज़रुरत भी थी आखिर अकेला कोई कितना hi रह सकता है,

सरजू- सही में यार नशे में चुदाई करने का मज़ा hi अलग है,

जग्गू- सही कहा यार अब तो मेरा भी मन कर रहा है,

में- हम में एक के पास hi लाइसेंस है उन्ही से पूछते हैं, क्यों पियूष भैया कभी पीकर ली है भाभी की?

मेरे इस सवाल से पियूष थोड़ा चौंका पर हल्का सुरूर और फिर ऐसी बातें सुन वो भी मूड में आ चूका था और मुस्कुराते हुए बोलै- अब तुमसे क्या छुपाना, ली तो है मैंने बियर पि कर भी और दारु पि कर भी,

जग्गू- अरे वाह भैया तुम तो हमारे यारी निकले,

पियूष- अरे सिर्फ इतना hi नहीं, तुम्हारी भाभी को भी पीला कर ली है.

सरजू- हैं सही में भैया? मज़ा आ गया होगा तुम्हे तो.

पियूष- अरे बस यार पूछो मत,

पियूष बियर का घूँट गटकते हुए बोलै.

में- नशे में तो कोई भी औरत और कामुक हो जाती है,

पियूष- बिलकुल सही कहा तूने कर्मा, तुझे भी काफी अनुभव लगता है.

में- अरे भैया बस जहाँ दूध मिल जाये मुँह मार लेते हैं.

इस पर फिर से सब हंसने लगे,

सरजू- अरे यार मेरा तो अभी मन होने लगा मुँह मरने का ये देखो.

सरजू अपने पाजामे में उभर दिखते हुए बोलै,

जग्गू- हाल तो मेरा भी कुछ ऐसा hi है यार.

पियूष- अरे ये लोग तो भरे पड़े हैं.

में- भरे तो पड़े हैं पर अभी हिलने के अलावा और कोई चारा नहीं बीटा, इस टाइम कोई जुगाड़ नहीं हो सकता.

सरजू- ये hi तो दिक्कत है साड़ी..

जग्गू- कोई नहीं अपना हाथ है साथ में हिला hi लेंगे.

ये कहकर जग्गू ने तो अपना लुंड बाहर निकल लिए, और उसे देख कर सरजू ने भी, पियूष को ये देख थोड़ी हैरानी हुई.. पर वो हँसते हुए सबके साथ का आनंद उठा रहा था,

पियूष- अरे तुम लोगो ने तो अपने अपने हथियार बाहर निकल लिए पर चलाओगे किस पर.

सरजू- अरे भैया अभी तो बस हवाई फायर होगा.

इस पर सब फिर से हंसने लगे, मैंने भी अपने लुंड को बाहर निकल कर सबका साथ दिया.

जग्गू- पियूष भाई तुम गोलियां बचा के रखोगे क्या?

पियूष ने ये सुनकर बियर की बोतल एक और राखी और अपना लुंड बाहर निकल लिए और बोलै- दोस्तों के साथ हवाई फायर का भी अलग hi मज़ा आएगा.

सरजू- अरे तुम लोग किस को सोच कर हिलाओगे?

सरजू धीरे धीरे अपने लुंड को मुठियाते हुए बोलै..

जग्गू- ये भी बताना है क्या?

जग्गू ने भी अपने हाथ चलने शुरू कर दिए थे.

में- तू मत बता तेरी तो हमें पता है? किसकी सोच कर हिलायेगा.

पियूष- अरे मुझे भी बताओ भाई, जग्गू किसके लिए गोलियां खली कर रहा है,

में- ये तो अपनी भाभी के लिए hi चलाएगा गोलियां.

पियूष- क्या सच में अपनी भाभी के लिए? बहुत तेज हो रहा है जग्गू तू तो,

सरजू- अरे भैया इसकी गलती नहीं है यार, प्रेमा भाभी है hi ऐसी की ये क्या कोई भी मजबूर हो जाये.

में- सही में ऐसी भाभी नसीब वालो को मिलती है,

पियूष- सच में जग्गू ऐसा है क्या?

जग्गू- अब क्या बोलूं पियूष भाई, खैर अब तुम मंडली में शामिल हो चुके हो तो तुमसे छुपाना भी क्या, साला भाभी को देख कर लुंड कड़क hi रहता है,

पियूष- कुछ ज़्यादा hi कामुक हैं क्या?

जग्गू- अरे तुम्हे दिखता हूँ, उस दिन रील के बहाने से मैंने नाचने को बोलै था काफी कोशिश के बाद मान गयी.

ये कह जग्गू फ़ोन निकलता है और फिर सबको भाभी की एक वीडियो दिखता है,





सबने भाभी की थिरकती कमर को देखा तो सबके hi लुंड में हलचल हुई, हालाँकि हम सब भाभी को न जाने कितनी बार छोड़ चुके थे पर भाभी का कामुक नाच देख फिर से अरमान जागने लगे, पियूष भी भाभी के बदन को ध्यान से देख रहा था और अपने लुंड को मसल रहा था,

कुछ पल दिखने के बाद जग्गू ने बापिस अपना फ़ोन रख दिया.

जग्गू- अब बताओ भैया मेरी गलती है कोई?

पियूष- यार वैसे समाज के लिए तो गलत है, पर भाभी ऐसी हो तो सही रह कर भी क्या फायदा,

में- वही तो पियूष भाई, भाभी को देख कर हम सबका कड़क हो जाता है,

सरजू- पियूष भाई का सही है इनके पास तो अपना जुगाड़ है,

पियूष- अरे तुम लोग भी न वैसे है तो...

जग्गू- कैसी हैं भाभी देखने में?

में- अरे मास्स...

मैं इतना बोल कर पियूष की और देख कर चुप हो गया,

पियूष ने एक बार मुझे देखा और मुस्कुराने लगा और बोलै- अरे बोलदे बोलदे, मुझे पता है मेरी बीवी कैसी है,

में- अरे मैं तो बस ऐसी hi,

जग्गू- अरे पियूष भाई तुम hi बताओ न कैसी हैं,

पियूष- अरे बताना क्या दिखा hi देता हूँ,

इस पर पियूष फ़ोन निकलता है, और निकलते हुए कहता है- उसे भी कभी कभी रील बनाने का शौक़ चढ़ता है ये देखो,

ये कहकर पियूष फ़ोन की स्क्रीन सामने कर देता है और हमारी आँखें फ़ोन पर जैम जाती हैं





रानी भाभी को वैसे तो मैंने भी देखा था पर उनका ये रूप देख तो मेरा लुंड ठुमके मारने लगा, पल्लू को समेत कर छोटा कर रखा था, गोल गहरी नाभि ऊपर नीचे होती हुयी दिख रही थी और सबसे बड़ी बात उनका ब्लाउज तो ब्लाउज जैसा नहीं बल्कि ब्रा जैसा था जो की दो दूरियों से कन्धों से बंधा हुआ था जिसमे से उनकी बड़ी बड़ी चूचियां आधी झांक रही थी ऊपर से वो अपनी चूचियों को hi ऊपर नीचे करके नाच रही थी,

उनकी ऐसी वीडियो देख कर तो हम सबका hi मुँह सूखने लगा,

पियूष- क्यों भाइयों कैसी लगी भाभी,

जग्गू- अरे भैया क्या hi बोलूं ये तो बड़ी सुन्दर हैं,

जग्गू अपने लुंड पर हाथ चलते हुए बोलै

सरजू- सच में यार भाई तुम बड़े भाग्य वाले हो,

सरजू अपना लुंड मसलते हुए अह्ह्ह्हह्हह भरते हुए बोलै.

में- वैसे भाभी को तो मैंने कई बार देखा है पर ये वाला रूप पहली बार देख रहा हूँ,

पियूष- ये वाला रूप कभी कभी दिखती है वो,

जग्गू- भैया फ़ोन अंदर करलो सरजू तो भाभी के नाम की hi मरने लगेगा नहीं तो,

सरजू- अरे चुप बे चुतिये ऐसा नहीं है,

पियूष- अरे लड़ो मत और मारता है तो मार लेने दो आखिर भाभी के नाम की नहीं मारेगा तो किसकी मारेगा,

जग्गू- क्यों भाई तुम्हे बुरा नहीं लगेगा?

पियूष- अरे मेरी बीवी सुन्दर है मैं जनता हूँ, जब मटकत वगेरा जाता हूँ उसे लेकर तो लोग कैसे ताड़ते हैं वो भी देखता हूँ कुछ तो आहें भरते हैं कुछ अपना औज़ार मसलते हैं मैं देखता हूँ, अब सब की आँखें तो नहीं फोड़ सकता न,

में- ये बात भी सही है,

पियूष- अरे बल्कि मैं तो ाचा महसूस करता हूँ की जिसको देख लोग आहें भरते हैं मैं उसे रोज़ बिस्तर पर भोगता हूँ,

जग्गू- सही सोच है भाई, लोगों को जलाकर अलग hi मज़ा मिलता है,

पियूष- और क्या और रही बात उसको देख कर हिलने की तो इसे मैं अभी रोक लूंगा पर बाद में सोच कर हिलने से तो नहीं रोक पाउँगा, और वैसे भी अब हम एक मंडली हैं तो इतना तो बनता है.

सरजू- अरे भाई क्या बात कही, अह्हह्ह्ह्ह अब रुका नहीं जा रहा,

ये कहते हुए भाभी की वीडियो देख कर सरजू तेज़ी से लुंड हिलने लगता है आउट हम सब उसे देख मुस्कुरा रहे होते हैं, कुछ hi देर मैं वो अपने नीचे की ज़मीन पर अपना रास गिरते हुए हांफने लगता है,

जग्गू- हो गया इसका काम.

सरजू- अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह भाई अह्हह्ह्ह्ह माज़आआह्ह्ह्हह्ह्ह्ह आ गया, ऐसा लग रहा है पूरी जान hi निकल गयी.

पियूष- चल हो गया तू शांत.

सरजू- हाँ यार भाई, अब तो मुझे नींद आ रही है,

सरजू ये कहते हुए अपनी पंत ऊपर की और फिर पीछे पेड़ से लग कर लेट गया,

में- चलो भाई ये तो सोयेगा हम चलते हैं मूट कर आते हैं,

जग्गू- हाँ चल,

पियूष- चलो मूट तो मुझे भी आ रहा है

सरजू को वहीँ छोड़ हम तीनो खेत के बाहर आकर मूतते हैं और फिर बापिस हैट कर मेड के सहारे बैठ जाते हैं,

पियूष- अरे क्या हुआ उसके पास नहीं चलना वो अकेला सो रहा होगा,

जग्गू- अरे उसका हो गया पर हमारा अभी बाकी है.

में- हाँ यार लुंड तबसे अकड़ा हुआ है.

पियूष- क्यों तुम लोग उसके सामने नहीं हिला सकते क्या?

जग्गू- अरे भैया जो देख कर हम हिलाएंगे वो उसने देख लिए न तो पागल हो जायेगा वो,

पियूष- अरे ऐसा क्या है?

जग्गू- रुको दिखता हूँ.

ये कहकर जग्गू फिर से फ़ोन निकलता है और कुछ पल ढूंढने के बाद फ़ोन को पियूष की और कर देता है, पियूष पहले तो कुछ पल देखता रहता है और फिर जब उसे समझ आ जाता है तो उसकी आँखें चौड़ी हो जाती हैं,

पियूष- अरे यार ये तो ये तोह..

जग्गू- रज्जो चची हैं उसकी माँ,





पियूष- पर तूने उनकी ये वीडियो कैसे बनाई,

पियूष ने फ़ोन पर नज़र गड़ाए हुए कहा,

में- अरे वो तो बना hi ली पर तुम बताओ कैसी लगी चची?

पियूष- अबे यार तुम लोग भी ये क्या बोल रहे हो वो उसकी माँ हैं, ये सब सही नहीं है,

जग्गू- पियूष भाई सही गलत छोडो तुम ये बताओ नज़र हैट रही है तुम्हारी,

पियूष ये सुनकर मुस्कुरा उठा और बोलै- नहीं यार, बड़ा गजब का बदन है चची का मैंने तो कभी ध्यान hi नहीं दिया,

में- पर हैं न ध्यान देने वाली चीज़,

पियूष- अरे यार ध्यान क्या सब कुछ देने वाली चीज़ है,

पियूष गरम होकर लुंड सहलाते हुए बोलै,

जग्गू- ये हुई न बात अब आये तुम जोश में,

पियूष- अरे यार तुमने चीज़ hi ऐसी दिखादि, चची के दूध तो देखो. ब्लाउज में कितने बड़े लग रहे हैं.

में- हाँ भाई पूरा बदन hi मस्त है चची का देख कर लुंड खड़ा हो जाता है,

पियूष- सही में यार पर उसे पता चला किसी दिन तो,

जग्गू- अरे वो बहुत ठरकी है भैया उसने भी अपनी माँ को ऐसे देख लिया तो वो भी मुठियाने लगेगा,

पियूष- अरे क्या बोल रहा है यार अपनी माँ के लिए कोई कैसे मुठिया सकता है.

जग्गू- अरे भैया हवस सब करवा देती है और माँ होती तो औरत hi है और अगर मस्त हो तो लुंड तो खड़ा होगा hi न देखकर.

पियूष- अरे यार तेरी बात तो सही है पर मैं नहीं मान सकता की माँ के लिए भी ऐसे ख्याल आ सकते हैं,

में- कोई बात नहीं, जग्गू इन्हे वो दिखा फिर पूछते हैं.

जग्गू- क्या वो? नहीं यार वो सब नहीं.

पियूष- ऐसा क्या है भाई जो ये मन कर रहा है.

जग्गू- भाई कुछ बड़ी बात है वो किसी के सामने नहीं आणि चाहिए नहीं तो गड़बड़ हो जाएगी.

में- हाँ पर पियूष भाई तो अब अपने hi हैं वो थोड़े hi कुछ किसी को बताएँगे...

पियूष- यार तुमने बोलकर मेरे अंदर की जिज्ञासा को और बढ़ा दिया है ऐसा क्या है?

जग्गू कुछ नहीं कहता बस कभी मेरी और तो कभी पियूष की और देखता है,

में- अरे दर मत कुछ नहीं होगा.

पियूष- कसम से यार जो बात होगी मुझ तक hi रहेगी.

जग्गू- ठीक है पियूष भाई तुम्हे अपना मान कर विश्वास कर रहे हैं.

पियूष- चिंता मत कर यार तुम लोगो को भी मैं अपना hi मंटा हूँ.

जग्गू फिर फ़ोन में कुछ निकल कर उसके सामने स्क्रीन कर देता है और पियूष की नज़रें स्क्रीन पर जैम जाती हैं और फिर बिलकुल आँखें फटी की फर्जी रह जाती है,

पियूष- अबे ये....



फ़ोन पर एक वीडियो चल रही थी जिसमे रज्जो चची लगभग पूरी नंगी थी और किसी के ऊपर बैठी थी और उस आदमी का लुंड अपनी छूट में भर कर उछाल रही थी, बदन पर सिर्फ एक ब्रा थी वो भी सिर्फ नाम के लिए क्यूंकि मोती चूचियां तो बाहर थी और झूल रही थी,

पियूष की आँखें तो ये देख कर ज़मी हुई थी, एक बार वीडियो ख़तम हुई तो उसने दोबारा से चला कर देखि और कई बार देखि, और फिर जाकर जग्गू ने फ़ोन जेब में रख लिए, कुछ देर के सन्नाटे के बाद पियूष बोलै

पियूष- अरे यार ये तो तगड़ा काण्ड है, भाई रज्जो चची तो किसी ब्लू फिल्म की हीरोइन से काम नहीं छुड़वाने में. यार क्या चूचियां की बदन है क्या मस्त छूट है...

जग्गू- अब बताओ भाई ऐसी माँ हो तो क्या करोगे? कोई बीटा रोक पायेगा क्या?

पियूष ये सुन थोड़ा सोच में पद गया और बोलै- अब समझ आया मादरचोद गाली कैसे पड़ी,

हम तीनो hi हंस पड़े,

में- भाई लुंड थोड़े hi देखता है छूट किसकी है वैसे hi इसको बस घुसने से मतलब है.

पियूष- ये तो सही कहा तूने, रिश्ते तो समाज के बनाये हुए हैं.

जग्गू- और क्या.

पियूष- अरे जग्गू एक बार और दिखा न वीडियो चची वाली.. अब हिलाये बिना रहा नहीं जा रहा.

जग्गू- हाँ ये लो.

जग्गू फिर से वीडियो चलता है और इस बार हम तीनो hi उसे देख लुंड हिलने लगते हैं.

जल्दी hi तीनो अपना अपना पानी ज़मीन पर गिरा देते हैं. और अपने अपने लुंड कपड़ो के अंदर करके बापिस झोपडी की और चल देते हैं.

पियूष- अरे यार एक सवाल तो रह hi गया,

में- क्या?

पियूष- रज्जो चची उछाल किसके ऊपर रही थी.

ये सुनकर मैं और जग्गू मुस्कुराने लगते हैं.

पियूष- अरे मुस्कुरा क्या रहे हो बताओ न यार.

में- मेरे पापा के...

पियूष ये सुन कर बिलकुल चौंक जाता है. और हम लोग झोपड़ी की और बढ़ जाते हैं.

(लेखक की ज़ुबानी)

अगले दिन दोपहर का समय हो रहा था और सभ्य रज्जो और ममता बाग़ से गोबर के कंडे बना कर घर की और बातें करते हुए चली जा रही थी, सबसे पहले रज्जो का घर पड़ता था तो द्वार पर खड़े होकर बातें करने लगी,

रज्जो- अरे जीजी चलो न अंदर बैठ लो,

सभ्य- अरे अभी कहाँ इतना काम पड़ा होगा, गोबर की बॉस आ रही है नहाना भी है.

रज्जो- कहीं नहीं पड़ा होगा, अब तो गुंजन और शालू हैं सब निपटा लेती हैं चलो, बाद में नाहा लेना,

ममता- ाचा तो इन्हे ले जाओ हमें तो काम है,

रज्जो- अरे दारी ज़्यादा तेज न बनो अंदर चलो चुप चाप,

ममता- अरे पर घर का काम?

रज्जो- अरे पल्ली है अभी घर पर और नीतू को भेज दे रहे अभी निपटा देंगी सब दोनों मिलकर.

रज्जो की ज़िद्द से हार कर दोनों उसके साथ अंदर चली जाती हैं.

नीतू- अरे तै आओ आओ बैठो,

रज्जो- हाँ बिटिया बड़ी गर्मी लग रही सबके लिए शरबत बना दे ज़रा और लाडो कहाँ है?

नीतू- हाँ तो सब लोग पंखे में बैठो, और लाडो कहाँ होगी किरण के साथ hi होगी,

ममता- इनकी जोड़ी अछि जमी है एक दुसरे का साथ नहीं छोड़ती.

सभ्य- सही है दोनों का मन लगा रहता है,

तीनो अंदर जाकर बैठते हैं तो नीतू सबके लिए शरबत बनाकर ले आती है, तीनो औरतों की गैप बाजी फिर से शुरू हो जाती है, नीतू शरबत देकर रज्जो के कहे अनुसार ममता के यहाँ निकल जाती है, इतने में थोड़ी देर में hi दीं दयाल और दोनों लड़के सरजू और बिरजू खेत से आ जाते हैं, और सब लोग आँगन में hi बरामदे में पंखे के नीचे बैठ जाते हैं.

दीनू- अरे प्रणाम भाभियों आज तो धन्य कर दिया हमारे घर को भी.

सभ्य- अरे इसमें धन्य की क्या बात है भैया, अपना घर है,

दीनू- अरे बिलकुल भाभी घर क्या हम भी तो तुम्हारे hi हैं,

दीनू ने मज़ाक करते हुए कहा,

ममता- ऐसे न बोलो देवर जी तुम्हारी लुगाई बुरा मान जाएगी,

रज्जो- अरे हम काहे बुरा मानेंगे, तुम देवर भाभी की बातों का, वैसे भी तुम्हारे hi हैं ये हमें नहीं चाहिए.

ममता- लो भैया तुम्हारी लुगाई ने तो तुम्हे ठुकरा दिया,

दीनू- तो क्या हुआ भाभी तुम दोनों हो अपना लो.

सभ्य- अरे देखो तो लोगो से एक तो संभालती नहीं ये दो दो छह रहे हैं.

ममता- दो दो भौजी संभालना के लिए बहुत जान चाहिए देवर जी,

दीनू- अरे भौजी तुम मौका तो दो जान तो अपने आप आ जायेगी तुम्हारे पास आते hi,

रज्जो- ऐसी बातें करके संकित गरम कर डोज तुम लोग देखो बेचारे बच्चों के पाजामे उठने लगे,

ममता- तो बच्चो के लिए उनकी माँ बहन हैं न सँभालने के लिए,

दीनू- और क्या भाभी तुम तो बस हमें सम्भालो,

सभ्य- अरे तुम्हे भी संभल लेंगे भैया, ऐ बिरजू इधर आ देख तो बालों में धुल भरी पड़ी है.

सभ्य बिरजू को पास बुला कर उसका सर झड़ने लगी,

बिरजू- हाँ तै अब नहाऊंगा, वो खेत में हल चला था न आज,

रज्जो- अरे तो बैठा क्यों है नाहा ले उठ कर नहीं तो हर जगह धुल कर देगा,

बिरजू- हाँ मम्मी जा रहा हूँ, तुम तो सांस भी नहीं लेनी देती.

बिरजू ये कह कर उठजाता है, और अपने कपडे उतर कर सिर्फ कच्चे में नल से पानी भरने लगता है,

दीनू- अरे हमारी भाभियों को कुछ पिलाया की नहीं?

ममता- हाँ देवर जी हम ने तो पि लिए तुम्हे पीना हो तो बताओ,

दीनू- हाँ बिलकुल पिएंगे तुम पिलाओगी तो,

दीनू ने ममता को छेड़ते हुए ब्लाउज की और इशारा करते कहा,

ममता भी कहाँ काम थी,

ममता- अरे बिलकुल पिलायेंगे मुँह खोलो नमकीन शरबत पिलाते हैं,

इस पर सबकी हंसी निकल गयी,

दीनू- अरे भाभी तुमसे बहस में कोई नहीं जीत सकता, अरे फ़िलहाल तुम शरबत hi बना दो,

रज्जो- ठीक है लाती हूँ,

इतने में बाहर से बिरजू की आवाज़ आती है- मम्मी ओह मम्मी थोड़ा पीठ रगड़ दो न और सर से मिटटी भी नहीं निकल रही,

रज्जो- अरे अब इनका शरबत बनाऊं या उसकी सुनु.

सभ्य- तुम भैया के लिए शरबत बनाओ, मैं नहला देती हूँ बिरजू को.

रज्जो- अरे जीजी तुम क्यों परेशां होगी,

सभ्य- अरे घर जाकर नहाना hi तो है हमें भी जाओ तुम शरबत बना दो.

सभ्य उठकर बाहर आंगन में आ जाती है और रज्जो रसोई में चली जाती है. सभ्य बिरजू की पीठ मलने लगती है,

सभ्य- अरे देख तो कितना मेल जमा पड़ा है तेरी पीठ पर.

बिरजू- अरे क्या करूँ तै पीठ पैट हाथ hi नहीं पहुँचता और मम्मी हैं की नहलाती नहीं हैं,

सभ्य- चल कोई नहीं आज मैं साफ़ कर देती हूँ,

बरामदे में ममता और दीनू का मज़ाक चल रहा था, कुछ hi देर में रज्जो शरबत ले और दीनू और सरजू को दिया जो तुरंत जातक गए,

रज्जो शरबत देकर आँगन में गयी और सभ्य को बिरजू को नहलाते देखा.

रज्जो- अरे जीजी तुम तो पूरी भीग गयी इसे नहलाते नहलाते, ऐसा करो तुम यहीं नाहा लो हमारी सारी पहन लेना,

सभ्य- अरे साड़ी तो पहन लेंगे पर तुम्हारा ब्लाउज कहाँ आएगा हमारे,

रज्जो- तो एक काम करती हूँ सरजू को भेज कर मंगवा लेती हूँ,

ममता- अरे वो बेचारा अभी थक कर आया है कहाँ उसे भगाओगी, चलो हम दोनों hi चलते हैं, ले आईने तुरंत,

रज्जो- हाँ ये भी ठीक रहेगा, चलो,

सभ्य- हाँ कोई हलकी सी साड़ी ले आना, शालू से मांग लेना,

रज्जो- अरे अभी ले आएंगे जीजी, चिंता मत करो.

ये कह कर दोनों द्वार से निकल जाते हैं,

रज्जो- हाय दिया ये धुप तो लगता है जला hi देगी,

ममता- सही में बन्नो इतनी गर्मी हो गयी है अब तो सहना मुश्किल हो रहा है.

रज्जो- वो hi तो तभी बच्चे थक जाते हैं खेत में काम करके,

ऐसे hi बातें करते हुए दोनों जल्दी hi कर्मा के घर पहुँच जाते हैं, दरवाज़ा खटखटाने पर किरण जल्दी hi दरवाज़ा खोल कर उन्हें अंदर लेती है, और फिर जल्दी से अंदर भाग जाती है,

रज्जो- अरे इसे क्या हुआ ये कहाँ भाग गयी.

ममता- पता नहीं इन लड़कियों के दिमाग में क्या चलता रहता है, दोनों अंदर की और बढ़ाते हुए कहती हैं, और जैसे hi आंगन में आती हैं दोनों को समझ आ जाता है की किरण क्यों भागी थी,

आंगन में hi एक खत पर दोनों सहेलियां एक दुसरे के बगल में थी पूरी नंगी और एक दुसरे के होंठों को चूस रही थी पर साथ hi दोनों hi एक साथ अलग अलग लुंड पर उछाल भी रही थी, किरण अनुज के लुंड पर थी तो वहीँ लाडो सागर के ऊपर थी,





दोनों लड़के भी अपने अपने लुंड को उनकी गरम छूटों में चलते हुए आहें भर रहे थे,

रज्जो- अब पता चला इनके दिमाग में क्या चलता रहता है,

रज्जो ने ममता को इशारा करते हुए कहा,

ममता- वैसे ये तो सिर्फ उनके hi दिमाग में थोड़े hi चलता है,

दोनों हंसाने लगी इतने में hi शालू की आवाज़ आई- अरे जीजी आ गयी तुम लोग, जीजी कहाँ हैं?

रज्जो- अरे जीजी मेरे यहाँ है,

ये कह रज्जो ने शालू को साड़ी बात समझे,

शालू- ाचा अभी निकल देती हूँ साड़ी, और जीजी तुम बैठो न बच्चे दे आएंगे साड़ी,

रज्जो- अरे नहीं बच्चे लगे पड़े हैं तो लगे रहने दो वैसे भी तेरे जीजा अभी आये हैं खेत से,

ममता- और हमारी गुंजन रानी कहीं नज़र नहीं आ रही,

शालू- गुंजन रानी सेवा करवा रही हैं उधर वाले कमरे में हैं,

शालू इशारा करके बताती है और खुद साड़ी निकलने दुसरे कमरे में चली जाती है, रज्जो और ममता शालू के इशारे वाले कमरे की और जाकर दरवाज़े को हल्का सा खोल कर देखते हैं, तो दोनों के चेहरे पर मुस्कान आ जाती है क्यूंकि कमरे के अंदर का नज़ारा hi कुछ ऐसा था,

एक टेबल पर गुंजन अपना नंगा गदराया बदन लिए पूरी नंगी लेती थी, उसकी टांगें हवा में थी, वहीँ गुंजन तीन और से बिलकुल नंगे मर्दों के बदन से घिरी हुई थी, उसकी टांगो के बीच कर्मा था जो उसका एक पेअर अपने कंधे पर रख कर अपना लम्बा लुंड अपनी मामी की गरम कासी हुई गांड में चला रहा था, वहीँ उसकी मामी के चेहरे के दोनों और कर्मा के पापा और मौसा यानि नीलेश और शैलेश खड़े हुए थे और दोनों के काले मुसल लुंड गुंजन के हाथों में थे जिन्हे वो हाथों से मुठियाते हुए बारी बारी से चूस रही थी, कर्मा अपनी मामी की एक मोती चुकी को मसलते हुए उनकी गांड मार रहा था.





गुंजन की नज़र दरवाज़ा खुलते hi रज्जो और ममता पर गयी,

गुंजन- अह्हह्ह्ह्ह जीजिआहहु ना.

रज्जो- अरे गुंजन रानी लगी रहो तुम, हमें थोड़ा काम है,

गुंजन- अरे जीजी कहाँ झेलूंगी मैं अकेले ये तीन मोठे मोठे मुसल आ जाओ न,

ममता- अह्हह्ह्ह्ह लुंड देख कर तो मेरी भी गीली होने लगी है,

नीलेश- अरे तुम दोनों भी क्या कड़ी हुई देख रही हो आओ न.

नीलेश कदम बढ़ा कर रज्जो का हाथ पकड़ कर अंदर खींच लेते हैं और रज्जो अपने साथ साथ ममता को भी खींच लेती है,

कुछ hi देर के बाद दोनों की सारिआं कमर से ऊपर उठी होती हैं और दोनों hi जिस टेबल पर गुंजन लेती हुई थी उसके दोनों और उसके सहारे झुकी हुई थी और दोनों की hi गांड से लुंड अंदर बहार हो रहा रहा था, ममता की गांड में नीलेश का लुंड था तो रज्जो की गांड में शैलेश का, वहीँ कर्मा अभी भी अपनी मामी की गांड मरने में लगा था, तीनो की सिसकियों और आहों की आवाज़ बाहर तक जा रही थी, जिन्हे सुनकर कुछ पल बाद hi शालू हाथ में सभ्य के कपडे लेकर कमरे में घुसी.

शालू- लो मैं तो कपडे निकल कर लाइ थी और तुम लोग तो यहाँ झुकी पड़ी हो.

रज्जो- ये गुंजन है न अपनी तो मरवाई थी हमारी गांड और मरवा दी,

शालू- अरे सही है एक काम करो जीजी तुम लोग लगे रहो कपडे मैं पहुंचा देती हूँ.

रज्जो- अरे अब यही रास्ता है लग नहीं रहा तेरे मरद का लोढ़ा इतनी जल्दी गांड से निकलने वाला है.

शैलेश- बिलकुल भाभी अब तो आराम से hi जाओगी.

शालू- ठीक है फिर मैं hi जाती हूँ.

शालू कपडे लेकर निकल जाती है रज्जो के घर के लिए, रज्जो के द्वार पहुँच कर दरवाजा खटखटाने वाली होती है की दरवाजा खुल जाता है, तो अंदर वो दरवाज़ा फेर देती है और आंगन की तरफ आती है और आंगन में आकर जब बरामदे में देखती है तो उसके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है...

सामने का नज़ारा hi कुछ ऐसा होता है, बरामदे में पड़ी हुई खत पर बिरजू नीचे लेता होता है और उसका लुंड शालू की बहन यानि सभ्य की गांड में होता है जो बिलकुल नंगी उसके ऊपर लेती होती है, पर बात सिर्फ इतनी नहीं थी, दोनों की टैंगो के बीच और खत से नीचे दीनू खड़े होते हैं और उनका लुंड सभ्य की छूट में अंदर बाहर हो रहा होता है, वही सिरहाने पर सरजू खड़ा था जिसका लुंड सभ्य के मुँह में था जिसे सभ्य मुठियाते हुए चूस रही थी.





तीनो बाप बेटे मिलकर सभ्य के तीनो छेदों को एक साथ मिलके भर रहे थे, तीनो सभ्य को छोड़ने में इतने खोये हुए थे की उन्हें शालू के आने का आभास भी नहीं हुआ,

शालू- अरे जीजी हम कपडा लेकर आये और तुम लोग तो यहाँ कुछ और hi खेल खेलने में लगे हो,

तब जाकर सबका ध्यान शालू की और जाता है,

दीनू- अरे अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह शालू तुम कब आई.

शालू- अभी आई हूँ पर जीजा तुम हमारी बहन छोड़ने में इतने खोये हो की कुछ ध्यान hi नहीं है.

दीनू- आह्हः तुम्हारीई बहनणणन होई आईसीई हीीीाहहह अह्हह्ह्ह्ह की कुछःह ऑरररर ध्यान hi नाहीइ रहता,

दीनू ने सभ्य की छूट में धक्के लगते हुए कहा,

सरजू- सहिई में मौसीय तैई जैसाअहह कोई नाहीइ हीीीाहहह.

सरजू अपना लुंड चुसवाते हुए आहें भरता है,

बिरजू- सही कहा अह्हह्ह्ह्ह तै की गांड तो मानो जैसे मेरा लुंड पिघला रही है,

शालू- चलो तुम लोग करो करो मैं यही हूँ,.

ये कह कर शालू वहीँ बैठ जाती है और अपनी बहन की टिहरी चुदाई होते देख अपनी चूचियां ब्लाउज के ऊपर से hi मसलने लगती है.

सरजू- ुहममम ोये बिरजू अब मुझे भी तै की गांड मरने दे बहुत मन हो रहा है,

बिरजू- अह्ह्ह्हह्हह हाँ भैया आ जाओ नहीं तो मैं झाड़ जाऊंगा अह्हह्ह्ह्ह.

ये सुनकर सरजू और दीनू सभ्य के मुँह और छूट से लुंड निकलते हैं और सभ्य बिरजू के ऊपर से उठती है,

शालू- अरे जीजी तुम तो नहाने वाली थी फिर ये सब,

सभ्य- अरे नहाने hi जा रही थी फिर इन सब का मन किसी और चीज़ का hi हो गया,

दीनू- अरे भाभी तुम्हारा बदन पानी में भीगा देख कर किसीअ मन नहीं बदलेगा,

दीनू ने खत पर लेटते हुए कहा, उनके लेटते hi सभ्य उनके ऊपर उनका लुंड स्पानी छूट में लेकर सवार हो गयी, इसके बाद उनके पीछे सरजू ने जगह ली और सभ्य के चूतड़ों को फैलते हुए अपना लुंड सभ्य के गांड के छेड़ में फंसा दिया, और फिर धीरे से अंदर धकेल दिया, जिसके साथ hi सभ्य के मुँह से एक आठ निकल गयी, पर इससे ज़्यादा कुछ निकलता उससे पहले hi बिरजू ने अपना लुंड उसके मुँह में घुसा दिया, सभ्य ने भी अपने हाथ से उसे मुठियाते हुए चूसना शुरू कर दिया,





सरजू और दीनू दोनों बाप बेटे मिलकर सभ्य की गांड और छूट में ले बना कर लुंड चलने लगे,

सरजू- ुहममम अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह सच्ची टीई अह्ह्ह्हह्हह क्याहहह मस्त्त गाआंनदद्द है तुम्हारिई अह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह इतनी गरमममम अह्हह्ह्ह्ह.

दीनू- अह्हह्ह्ह्ह छूट भी तो कम्मं नाहीइ हीीीाहहह अह्हह्ह्ह्ह लुँड्ड्ड को जकड रखा आ है.

शालू- हहहहहह जीजाहहह ऐसी hi तीनो मिलकर छोड़ो हमारी जीजी को अहह

शालू भी गरम हो रही थी और अपने कपडे धीरे धीरे उतारते हुए अपनी छूट सहला रही थी,

तीनो बाप बेटे मस्ती में सभ्य के मस्त छेदों का आनंद ले रहे थे,

दीनू- अरे बच्चों अब मुझे भी भाभी की कासी हुई गांड का मज़ा लेने दो एक बार झड़ने से पहले.

अब बच्चे बाप की बात कैसे न माने तो एक बार फिर से जगह की अदला बदली हुई वो भी बिना समय गंवाए और कुछ hi पलों में दीनू का लुंड सभ्य की गांड की गहराई में था और दीनू जन्नत में, सरजू नीचे से सभ्य तै की छूट मार रहा था वहीँ बिरजू अभी भी सभ्य के मुँह के सामने था.

एक बार फिर से सभ्य की गांड और छूट में लुंड अंदर बहार होने लगे, दीनू बिना रोके सभ्य की गांड मार रहे थे वहीँ सरजू और बिरजू भी पूरा साथ दे रहे थे,





दूसरी और शालू भी पूरी नंगी हो चुकी थी और अपनी छूट में उंगलियां चला रही थी,

दीनू- हाँ अह्हह्ह्ह्ह ओह्ह्ह्हह्ह्ह्हह सच्ची तुमममम लोगगगग सच कह रही थे, क्याहहह मस्त्त गाआंनदद्द है तुम्हारिई भाभीयहह.

दीनू सभ्य की गांड मरते हुए उत्तेजित होते हुए बोले, गरम तो बाप बेटे तीनो hi हो रहे थे, ऊपर से शालू उन्हें बोल बोलकर तीनो को और गरम कररही थी, जिसका नतीजा ये हुआ की जल्दी hi एक एक करके तीनो ने अपना अपना रास सभ्य के छेदों में छोड़ दिया,

झड़ते hi शालू उठ कर आगे आई और दीनू और सरजू के लुँडो को अपनी बहन के छेदों से निकल कर चाट चाट कर साफ़ किआ, वही बिरजू का लुंड सभ्य ने साफ़ किआ.

सभ्य- आह्हः ाचा रज्जो ने रोका मुझे देख क्या हाल कर दिया,

सभ्य हांफते हुए बोली,

दीनू- अरे ाचा हुआ भाभी इसी वजह से तो हमें ये मस्त मौका मिला तुम्हे भोगने का,

सरजू- सही कहा पापा मेरा लुंड तो फिर से उठने लगा,

दीनू- मन तो हमारा भी हो रहा है, भाभी अब तो अचे से चुद कर hi जाओ,

सभ्य- मैं भी कहाँ रोक रही हूँ, अब देर हो hi गयी है तो अचे से हो जाये,

कुछ hi देर में आसान और जगह फिर से बदले हुए थे सभ्य फिर से अपनी पीठ के बल लेती हुई थी सरजू उसकी टैंगो के बीच था और दनादन उसकी छूट में धक्के लगा रहा था, वहीँ सभ्य अपने पीछे बैठे दीनू के लुंड को सहलाते होते खड़ा कर रही थी.





दीनू का लुंड भी अपने पूरे रूप में लग भाग आ चूका था

सभ्य- आह्हः बछहहाः ह ऐसी होई छोड़ड़ड़ अपनीइ ताआईई को.

सभ्य सरजू का जोश बढ़ाते हुए चुद रही थी.

इधर दूसरी खत पर जग्गू शालू की गांड मार रहा था.

खैर कुछ देर ऐसे hi चुदाई और चलती है एक एक बार सब और झड़ते हैं, तब जाकर शांत होते हैं और उसी समय रज्जो भी घर में आती है और आंगन में आकर देखती है तो उसके मुँह से सिर्फ हाय दिया निकलता है...
 
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