Incest Katha Chodampur Ki - Page 15 - SexBaba
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Incest Katha Chodampur Ki

अनुज ने बहार निकल क्र मोटरसाइकिल निकली और फिर दोनों लोग निकल गए.

हम लोग गेट बंद करके घर के अंदर आये और फिर मैं आकर खत पर बैठ गया माँ थोड़ी चिंता में लग रही थी फिर उनकी नज़र मुझ पर गयी

तो माँ ने बोलै तुझे भी भूख लगी होगी तेरे लिए भी नाश्ता ला देती हूँ....

अपडेट 91

मैं जाकर आंगन में बैठ गया सच में बहुत तेज़ भूख लगी थी सुबह से दो बार झाड़ चूका था माँ ने आलू के परांठे बनाये थे जो दही के साथ में जल्दी जल्दी लपेटने लगा.. उधर माँ रसोई का काम निपटा रही थी मैंने भरपेट खा लिए तो शांति मिली झूठे बर्तन उठाकर रसोई में ले गया और रख दिए... खैर पेट पूजा तो हो चुकी थी अब मेरी नज़र माँ पर गयी तो माँ अब भी थोड़ी चिंता में लग रही थी मौसी की वजह से...

मैंने माँ को पीछे से जाकर गले लगा लिया...

माँ- हाँ बीटा...

में- तुमने नाश्ता किआ माँ?

माँ- हाँ बीटा तेरे पापा और अनुज के साथ खा लिया था थोड़ा...

मैं माँ से पीछे से चिपका हुआ था और उनकी गांड की गर्मी पाकर मेरा लुंड जागने लगा और मेरे अरमान भी...

में- माँ तुम कितनी प्यारी हो..

और ये कहकर मैं उनकी गर्दन को चूमने लगा माँ उस वक़्त चूल्हा साफ़ कर रही थी...

माँ- कर्मा अभी नहीं बीटा मेरा बिलकुल भी मन नहीं है...

में- मैं जनता हूँ माँ मौसी की वजह से ना... पर माँ तुम्हारे या मेरे परेशां होने से थोड़े hi कुछ होगा... होगा वही जो होना है तो इतना मत सोचो..

माँ- ऐसे कैसे न सोचूं कर्मा... बहन है वो मेरी... वैसे hi बेचारी को दुखो की कमी नहीं ऊपर से मुये उसके ससुराल वाले...

में- माँ सब ठीक हो जायेगा तुम परेशां मत हो...

और मैंने माँ का पल्लू पकड़ कर उनके सीने से नीचे गिरा दिया और अपने हाथ उनके नंगे पेट पर फिरने लगा साथ hi पीछे से उनकी गर्दन को चूमते हुए उन्हें समझा रहा था...

माँ- उम्मीद तो यही है की सब ठीक हो जाये और बेचारी को और परेशां न होना. पड़ा ..

माँ ने चूल्हे से हाथ हटाकर एक मेरे हाथ के ऊपर पेट पर रख लिया और दूसरा ऊपर लेकर मेरे गाल पे और सहलाने लगी...

में- नहीं होगी माँ और उनका साथ देने के लिए हम लोग हैं न तुम क्यों चिंता करती हो हम लोग मौसी को किसी भी परेशानी में नहीं पड़ने देंगे...

मैं जैसे जैसे बोल रहा था मेरे हाथ माँ के नंगे पेट और कमर पर घूम रहे थे....

माँ- अब काम करने दे बीटा...

में- काम तो होता रहता है माँ... अभी थोड़ा तुम्हे प्यार तो करने दो...

और मैंने अपनी एक उंगली माँ की नाभि में घुसेड़ दी और छेड़ने लगा साथ hi ब्लाउज में पीछे नंगी पीठ को चाटने लगा.

माँ- तेरा बस चले तो हर समय प्यार hi करता रहे...

मैंने कुछ नहीं कहा और सीधा होकर माँ के चेहरे को एक तरफ करके अपने होंठो को उनके होंठो पर रख दिया.. माँ ने भी अपने होंठो को खोलकर मेरा साथ दिया और हमारे होंठ आपस में धीरे धीरे कुश्ती करने लगे...

मेरा एक हाथ माँ के पेट और कमर को मसल रहा था तो दूसरा माँ की नाभि में उंगली दाल कर उसे छेड़ रहा था.. लेकिन सब कुछ धीरे धीरे आराम से हो रहा था मुझे कोई जल्दी नहीं थी और मैं आराम से अपनी माँ के मदहोश और गदराये बदन का मज़ा ले रहा था... मेरा लुंड पूरी तरह तन चूका था और पीछे से माँ की गांड में घुसना छह रहा था...

मैं माँ के रसीले होंठों का रास पि रहा था और होंठो के साथ जीभ कब खेल में शामिल हो गयी हमें भी पता नहीं चला.. कभी मैं माँ की जीभ को अपने मुँह में लेकर चूसता तो कभी माँ मेरी... माँ जब अपने कोमल और रसीले होंठों से मेरी जीभ और होंठो को चूसती तो एक बेहद हस्सें आनंद मिलता.. माँ मेरी जीभ को ऐसे चूस रही थी जैसे वो मेरा लुंड चूसती है..





माँ और बेटे के प्यार का ऐसा कामुक और उत्तेजक रूप बहुत काम hi देखने को मिलता होगा...

हमारे होंठों और जीभ की कुश्ती का असर पूरे शरीर पर हो रहा tha...maa के हाथ मुझे चूमते हुए मेरे बालों में चल रहा था तो दूसरा अभी भी मेरे हाथ के ऊपर था जो की का की कमर के कोमल गदराये हुए मॉस को मसल रहा था... और मेरा दूसरा हाथ अब माँ की साड़ी के एक छोर को पकड़ कर धीरे धीरे से उसे माँ के बदन से अलग करने की कोशिश कर रहा था...

हालाँकि पीछे से मेरे चिपके होने की वजह से निकलना मुश्किल हो रहा था पर एक पल के लिए भी मैं माँ से अलग नहीं होना छह रहा था... फिर भी किसी तरह कोशिश कर कर के मैं माँ की साड़ी को ढीला करता जा रहा था... ये सब होने के बाद भी हमारे होंठ आपस में जुड़े हुए hi थे... और मैं चाहता भी था की ये होंठो का मिलान बस चलता hi रहे...

खैर माँ की जीभ को चूसते चूसते और कोशिश करते करते मैंने माँ की साड़ी को उनकी कमर से ज़्यादातर ढीला कर दिया था...

और अंत में एक झटके से मैंने साड़ी को खींचा और वो माँ की कोमल और गदराई हुई कमर से अलग हो गयी...





और अब माँ की चिकनी कमर, नंगा पेट और गहरी नाभि सामने आ गयी...

अब माँ सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे सामने कड़ी थी.... हालाँकि मैं माँ को पीछे से पकड़े हुए था और सामने से देख नहीं प् रहा था पर फिर भी मेरे और माँ के बीच से कपड़ो की एक दीवार काम हो चुकी थी...

जब साड़ी नीचे कदमो थी तब जाकर हमारे होंठ अलग हुए और माँ तो इतनी खो गयी थी मेरी जीभ चूसने में की उन्हें अपनज साड़ी खुलने का अंदाज़ा भी नहीं हुआ... माँ भी इतनी देर की होंठो की जुगलबंदी से गरम हो गयी थी...

माँ- बदमाश तूने मेरी साड़ी भी उतर दी और मुझे पता भी नहीं चलने दिया...

में- कमसे काम एक कपडा तो काम हुआ हमारे बीच में...

माँ- ाचा कपडे काम करके क्या करना है तुझे...

में- प्यार करना है माँ बहुत सारा...

और फिर मैं माँ के पीछे घुटनो पर बैठ गया और उनकी पीठ के नंगे हिस्से जो ब्लाउज और पेटीकोट के बीच था उसे चाटने लगा...

माँ मेरे होंठों को अपने बदन पर महसूस कर सिहर उठी...

माँ- हममममममममम ललललाआआअ...

मैंने जब पीठ के नंगे हिस्से को चाट चाट कर गीला कर दिया तो फिर माँ को अपनी तरफ घुमा लिए और मेरे सामने माँ की नंगा पेट और नाभि आ गयी... पता नहीं माँ के साथ ये सब करने की वजह से था या माँ के बदन का हर अंग इतना कामुक और खूबसूरत था की मेरा उनके जिस्म के किसी भी हिस्से को छोड़ने का मन नहीं करता था...

और इस समय तो मेरे सामने मख्हन जैसा कोमल और गदराया हुआ पेट और कमर थी... मैंने समय न गंवाते हुए अपने होंठों को माँ के मखमली पेट पर रख दिया और चाटने लगा... माँ के हाथ खुद बा खुद मेरे बालों पर आ गए और मेरे सर को पकड़ लिया माँ ने

मैंने भी अपने दोनों हाथ पेटीकोट के ऊपर से माँ के दोनों गद्देदार चूतड़ों पर रख दिए और उनके गुड़गुड़ेपन का मज़ा पेटीकोट के ऊपर से hi दबा कर लेने लगा... साथ hi मैं माँ की कमर और पेट के पूरे हिस्से को कहते जा रहा था... और फिर जब मैं संतुष्ट हो गया की मैंने पूरे हिस्से को अपने थूक से गीला कर दिया है मैंने अपनी जीभ माँ की नाभि में घुसा दी और चूसने लगा...

Maa-aahhhhh अह्ह्ह्हह्ह्ह्ह कर्माआआआ aaaahhhhhhhhhhhhh..

माँ मेरी जीभ के प्रहार से गरम होकर सिसकियाँ ले रही थी...

नाभि को चूसते हुए hi मैं अपने हाथों को माँ के चूतड़ों से उठाकर ब्लाउज के सामने लाया और फिर एक एक करके माँ की ब्लाउज के हुक खोलने लगा... ब्लाउज के खुलते hi मैंने दोनों पतों को अलग कर दिया जिससे माँ के पेट का थोड़ा और हिस्सा मेरे सामने आ गया जिसे मैंने चाटने लगा...

और फिर चाटते चाटते.... मैं ब्रा के ऊपर से माँ की बड़ी बड़ी छूछीयों को दबाने laga...aur फिर हाथ हटाकर माँ के ब्लाउज को पूरी तरह निकल दिया अब माँ सिर्फ पेटीकोट और ब्रा में कड़ी थी मेरे सामने रसोई में...

मैंने माँ को एक बार फिर से घुमा दिया और फिर से उनके पीछे से चिपक gaya...aur अपना लुंड एक बार फिर से माँ की गांड की दरार में पेटीकोट के ऊपर से hi फंसा दिया.. और पीछे से माँ की बड़ी बड़ी मुलायम दूध की थैलियों को दबाने लगा... साथ hi साथ उनकी गर्दन को भी चूम रहा था बीच बीच में..

माँ- अह्हह्ह्ह्ह ummmmmmmmmmmmmm लललललाहा ारायअम्म्मम्म्म्म सीईए...

में- माँ तुम हमेशा ब्रा क्यों पहनती हो.. परेशानी नहीं होती...

मैंने ब्रा के ऊपर से hi दबाते हुए पुछा...

Maa-ummmmmmmmmmmmmm होती है बेटा पर मेरे दूध बड़े हैं ना अह्ह्ह्ह तो बिना ब्रा के संभालेंगे नही...

मैंने फिर माँ की ब्रा को नीचे खिसका दिया और उनकी नंगी छूछीयों को अपने हाथों से मसलने लगा...





माँ की नरम नरम छूछीयो को मसलने में बहुत मज़ा आ रहा था ऐसा लग रहा था जैसे रुई के दो बड़े बड़े गोले मेरे हाथो में हो...

में- तो क्या हुआ माँ ब्लाउज तो होगा hi न फिर सँभालने की क्या बात है..

माँ- ुहम्म्म्म ऐसे hiiiiiiiiiiiiiiiiiiii लल्ला... बिना ब्रा के काफी नज़र आएंगे और ऊपर से निप्पल भी दीखता है ब्लाउज से तो...

में- तो क्या हुआ माँ घर में तो रह hi सकती हो बहार जाना तो ब्रा पहन लेना...

माँ- ाचाहहह तू चाहता है तेरी माँ की छूछीयो को और कोई भी देखे... घर में तेरे अलावा अनुज भी है और बहार से भी लोग आते जाते रहते हैं.

में- कैसे दिखेगी माँ ब्लाउज के ऊपर साड़ी का पल्लू भी तो रहता है.. और तुम्हारी छुछियां इतनी मस्त हैं की हर कोई देखना चाहेगा जो जी भर के देखले उसका तो मज़ा आ जाये..

मैंने माँ की छूछीयो को मसलते हुए कहा साथ hi माँ की गर्दन पर भी चूम लिया

माँ- ाचाहहह तो तू क्या चाहता है सबको अपने दूध दिखती फिरू..?

में - अरे माँ तुम भी न मैं इसलिए कह रहा हूँ की तुम्हे तकलीफ नहीं होगी और घर घर में क्या बुराई है...

माँ- ाचा ठीक है सोचूंगी अगर ठीक लगेगा तो नहीं बिना ब्रा के तो नहीं पहनूंगी...

में- ये हुई न बात और ये कहकर मैंने माँ की ब्रा को पीछे से खोल दिया और उसे भी ब्लाउज के ऊपर फ़ेंक दिया..

और माँ को फिर से अपनी तरफ घुमाया और अपने होंठ उनके होठों पर रख कर एक बार फिर से चूमने लगा साथ hi मेरे हाथ उनकी नंगी छूछीयों पर चल रहे थे...

करीब 2-3 मिनट्स तक माँ के होंठों को चूसने के बाद मैंने होंठ अलग किये और फिर उनकी छूछीयों की तरफ सर को झुका दिया और मुँह खोल कर एक छुच्छी को मुँह में भरा hi था की कोई हमारा गेट बजाना लगा...

माँ और मैं चौंक गए वहीं मैं किलास भी गया की साला इतने सही टाइम पर किसने अपनी गांड मरवाली... इतना मज़ा आ रहा था... माँ अपनी सारी और ब्लाउज उठा कर अपने कमरे में चली गयी...

माँ- जा कर्मा तू गेट पर देख...

मैंने गेट खोला तो सामने जग्गू खड़ा था सेल को देखकर गुस्सा तो बहुत आ रहा था की सेल को सुबह hi छूट और गांड का स्वाद चखाया और अब मेरे और माँ के बीच में आ गया... एहसान फरामोश कहीं का....

मन ऐसी अजीब सी बातें सोचते हुए मैंने पुछा- क्या हुआ बे?? कैसे परेशां हो रहा है..

जग्गू- अबे सेल वो गाड़ी वाला तेरे बाघ के पास खड़ा है गाड़ी लेकर तुझे फ़ोन कर रहा हूँ तो तू उठा नहीं रहा..

में- गाड़ी वाला आ गया? बड़ी जल्दी.. और मेरा फ़ोन शायद कमरे में था इसलिए पता नहजी चला.. रुक मैं माँ को बोलकर और फ़ोन लेकर आता हूँ..

जग्गू- जल्दी आ..

मैं अंदर गया अपने कमरे से फ़ोन लिए और फिर माँ के कमरे में गया तो वो साड़ी लपेट रही थी..

में- माँ वो गाड़ी वाला आ गया है.. मैं जा रहा हूँ...

माँ- ठीक है लल्ला और आराम से कार्यो ..

में- ठीक है माँ...

और ये कहकर मैं जग्गू के साथ निकल गया... पहले अपने बैग पहुंचा वहां से मैं और जग्गू गाड़ीवाले के साथ हमारे खेत वाले कमरे पर पहुंचे पापा ने एक खेत के किनारे एक कमरा बनवा रखा था फसल रखने के लिए... उसे गोदाम की तरह इस्तेमाल करते थे वहां पहुँच कर गाड़ी ठीक से लगवाई और फिर शुरू हुई बेलदारी... काम से काम 200-300 किलो आलू था ट्रक में चढ़ाते चढ़ाते जान निकल गयी मेरी और जग्गू की साथ hi गाड़ीवाले की भी... उसके बाद जब मेरे आलू रख गए तो फिर गाड़ी लेकर जग्गू के खेत पहुंचे वहां भी.. यही काम शुरू हो गया.. उतने hi आलू फिर से ट्रक में रखवाने थे... बहुत म्हणत करने के बाद वहां का भी काम ख़तम हुआ पर हम लोग बुरी तरह थक चुके थे...

और फिर वहीं बैठकर पानी वगेरा पि रहे थे...

जग्गू- और भैया अब तो किसी के आलू नहीं उठाने न यहाँ से..

गाड़ीवाला- अरे उठाने हैं भैया गेंदपुर में से..

गैंदपुर सुनके मेरे कान खड़े हो गए...

में- गैंदपुर में किसके यहाँ से?

गाड़ीवाला- नाम तो मुझे नहीं पता भैया... बस घर देखा है..

Me-acha घर किधर है...

गाड़ीवाला- बस गाओं में घुसते hi दूसरा माकन है उलटे हाथ पर...

जो कान खड़े हुए थे वो फिर बापिस बैठ गए...

में- ाचा... ठीक है.. चलें जग्गू थक गए बहुत..

जग्गू- हाँ यार चलते हैं

ऐसे hi थोड़ी देर बाद गाड़ीवाला गाड़ी लेकर निकल गया और हम दोनों भी खेत से चल दिए..

जग्गू- चल कर्मा घर चल चाय वगेरा पिटे हैं..

वैसे भी उसके खेत से उसका घर पास था तो मैं उसके साथ hi चल दिया..

में- ठीक है चल... यार वैसे भी गांड पहात गयी आलू चढ़ाते चढ़ाते...

जग्गू- देखले कहीं पह्मा लाल न हो गया हो...

में- सेल बाप के साथ मजाक करता है...

जग्गू- सेल काम बोल अभी फटी हो या न फटी हो अब जरूर पहाड़ दूंगा तेरी गांड...

ऐसे hi लड़ते झगड़ते हम लोग जग्गू के घर पहुंचे...

घर पर हमेशा की तरह भग्गू गायब था ताऊ जी भी नहीं थे भाभी और तै थी घर पर...

तै जी बहार खत पर बैठी बैठी सब्जियां छील रही थी भाभी कहीं दिख नहीं रही थी...

मंजू तै- अरे आ गए तुम दोनों बच्चा... चढ़ा दिए सरे आलू..

जग्गू- हाँ मम्मी सरे चढ़ा दिए...

मंजू तै- चलो बढ़िया.. हाय थक गए आज तो दोनों बछुआ..

Me-are तै साडी जान निकल गयी...

और मैं वहीं तै के बगल में खत पर धम्म से गिर कर लेट गया...

मंजू तै- हाँ बच्चा थक तो गए होंगे इतना आलू चढ़ा कोई हलकी बात थोड़े hi न है... चलो चाय बनवाती हूँ तुम्हारे लिए... ऐ प्रेमा आरी ो प्रेमा चाय रखले 4 कप..

अंदर से प्रेमा भाभी की आवाज़ aai...theek है मम्मी..

जग्गू- ऐ कर्मा आगे हो मुझे भी लेटना है...

मंजू तै- आजा कर्मा तू इधर खिसक आ..

मंजू तै ने सब्जियां का बर्तन खत से उठा कर नीचे रख दिया और मैं उनकी तरफ खिसक कर लेट गया...

और मेरे बगल में जग्गू भी मगरमच्छ की तरह पसर गया...

मंजू तै- ले बच्चा आराम से अपना सर रख ले इधर अब लेट...

और तै ने मेरा सर अपनी गॉड में रख लिए... अह्ह्ह बड़ा आराम मिला ऐसे लेटने में गॉड में सर रखकर सोने में तकिये से भी ज़्यादा आराम मिलता है...

मैंने उनकी गॉड में सर रख लिए और वो मेरे सर पर हाथ फिरने लगी... मुझे तो बेहद आराम मिलने लगा...

मंजू tai-thak गया बछुआ हमार...

थोड़ी देर hi हुई थी की जग्गू बोल पड़ा...

जग्गू- ऐ कर्मा थोड़ा उधर हो तेरे घुटने लग रहे हैं मुझे..

में- तुझे भी चैन नहीं है.. आराम नहीं करने दे रहा

मंजू तै- तू इधर घूमजा कर्मा फिर जगह बन जाएगी..

अब तक मेरा चेहरा बहार की तरफ था फिर घूमने से अब मेरा चेहरा तै के पेट की तरफ हो गया...

जिससे जग्गू ने एक और ाचा काम कर दिया और अब मेरी आँखों के सामने तै का नंगा गोरा पेट और गहरी नाभि आ गयी उनका पल्लू हमेशा की तरह कंधे पर साइड में लटका हुआ था...

हाय देखने में hi कितना ाचा लग रहा था तै का गदराया हुआ पेट उनकी कमर और गहरी नाभि मेरे नूह में तो देख कर hi पानी आने लगा था... मैंने सोचा वाह क्या किस्मत पाई है रे कर्मा सीधा गॉड में आ गया तै की... मेरा मन कर रहा था उनके पेट को चूम्लूं उनकी नाभि में जीभ घुसेड़ कर चूस लूँ... और मैंने सोचा भी क्यों न इस मौके का पूरी तरह फायदा उठाया जाये...

इतना ाचा मौका दोबारा कब मिले नहीं पता तो सोच कर्मा सोच क्या कर सकते हैं... मेरे मन में एक ख्याल आया और मैंने बिना सोचे समझे चेहरा पीछे किआ और जग्गू से बोलै- अब तो ठीक से लेता है तू ले और आराम से लेट्जा....

और ये बोलकर मैं जानकार आगे बढ़ गया जिससे अब मेरा चेहरा तै के पेट से चिपक गया और मैंने जानकर अपना हाथ उनकी नंगी कमर पर रख लिए जिससे ऐसा लगे की मैं उनको पकड़ कर लेता हूँ....

उनकी नरम नरम पेट की त्वचा मेरे चेहरे पर बहुत अछि लग रही थी बेहद कोमल और गद्देदार पेट था तै का... कुछ देर ऐसे hi लेते रहने के बाद मैंने आगे बढ़ने की सोची...

और तै के पेट को अपने होंठ खोलकर हलके से चूम लिए... और रुक गया देखने के लिए की तै की क्या प्रतिक्रिया होती है... तै ने कोई खास प्रतिक्रिया नहीं वैसे hi मेरे बालों में हाथ फिरत रही... मैंने फिर से उनके पेट को चूम लिए और फिर रुक के देखा फिर से कोई प्रतिक्रिया नहीं... तो मेरी हिम्मत बढ़ने लगी और मैं तै के पेट को चूमते हुए अपनी जीभ भी इस्तेमाल करने लगा साथ hi मैंने अपना हाथ उनकी कमर पर फिरना शुरू कर दिया...

तभी तै चहक से बोल पड़ी- क्या कर रहा है कर्मा...

मैं दर गया की अब क्या होगा कहीं तै गुस्सा तो नहीं हो गयी.. कहीं जग्गू के सामने बोलै तो वो गुस्सा तो नहीं हो जायेगा...

इतने में तै ने आगे लाइन बोली- गुदगुदी हो रही है बच्चा...

मैंने जब उनकी पूरी बात सुनी तो थोड़ा चैन आया तै गुस्सा नहीं थी उनका हाथ अब भी बालों में चल रहा था न hi उन्होंने मेरे उनके पेट चूमने को गलत लिए बस गुदगुदी हो रही थी तो बोली...

में- ाचा लग रहा है तै तुम्हारा पेट नरम और मुलायम है...

Jaggu-kya नरम और मुलायम है कर्मा...

मंजू तै- अरे कर्मा को हमारा पेट मुलायम लग रहा है... तभी कैसे छू छु कर देख रहा है...

Jaggu-mujhe भी देखना है...

और जग्गू उठकर तै के बगल में आकर बैठ गया और अपना हाथ उनकी कमर पर रख दिया... पर मैं भी ज़िद्दी था मैंने अपना हाथ और मुँह ज़रा भी नहीं हटाया साला मेरी नक़ल करता है...

मंजू tai-tum दोनों hi बच्चे रहोगे हमेशा जो एक को करेगा वो दूसरा भी करेगा... पागलो कहीं के...

तै जग्गू के बालों में दूसरा हाथ डालकर सहलाने लगी... पर ाचा hi हुआ अब मैं खुल कर उनके पेट को चूम सकता था और मैं चूमने भी लगा साथ hi उनकी कमर को मसल रहा था... वहीं जग्गू भी अपनी मम्मी की कमर को दबाते हुए मज़े ले रहा था...

मैं तै के पेट को चूमते हुए... उनकी नाभि की और बढ़ने लगा मेरा बड़ा मन था उनकी नाभि में जीभ डालकर चूसने का... और मैं तै की नाभि के बिलकुल करीब पहुंच गया और अपनी जीभ उनकी नाभि में डालने hi वाला था की एक आवाज़ आई और तै उठ गयी..

प्रेमा भाभी- लो सब लोग चाय पि लो...

ले मेरी फूटी किस्मत... पर क्या क्र सकते थे उठना पड़ा भाभी ने चाय के साथ नमकीन दी... चाय पीते पीते सबने मिल बैठकर बातें की मैंने उन्हें मौसी जे बारे में बताया तो दोनों hi बोली बेचारी के साथ गलत हो रहा है चैन से जीने नहीं देते लोग तै तो तै थी एक कदम आगे बढाकर मौसी के ससुराल वालो को गली देने lagi...phir बोली की माँ से मिलने जाएँगी... भाभी बोली मैं भी चलूंगी.. इसी तरह चाय ख़तम हुई...

.. एक उम्मीद थी की चाय ख़तम करने के बाद फिर से शायद मौका मिले पर चाय ख़तम होने के बाद तै और भाभी अपने अपने काम में लग गयी.. मेरा मूड ख़राब हो गया तो मैंने सोचा अब चलना चाहिए और जग्गू से बोलकर घर से निकल लिए...

रस्ते में जा hi रहा था की पीछे से एक आवाज़ आई...

इसके आगे क्या हुआ जानिए अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत शुक्रिया
 
.. एक उम्मीद थी की चाय ख़तम करने के बाद फिर से शायद मौका मिले पर चाय ख़तम होने के बाद तै और भाभी अपने अपने काम में लग गयी.. मेरा मूड ख़राब हो गया तो मैंने सोचा अब चलना चाहिए और जग्गू से बोलकर घर से निकल लिए...

रस्ते में जा hi रहा था की पीछे से एक आवाज़ आई...

अपडेट 92

पीछे से आवाज़ आई- अरे ओह्ह लात साब रुको ज़रा...

मैंने पीछे मुद कर देखा तो ममता चची मुझे बुला रही थी और उनके साथ रज्जो चची भी थी... और दोनों के हाथ में सब्ज़ी से भरा हुआ एक एक थैला था...

ममता चची- कर्मा घर जा रहा बच्चा?

में- हाँ चची...

म चची- बहुत अचे बच्चा ये थैला ले लिओ हमसे तो उठ hi नहीं रहा...

रज्जो चची- हमरा भी ले लिओ बच्चा.. हाथ दर्द करने लगा पकडे पकडे...

मैंने मन में सोचा हाँ तुम्हारा नौकर हूँ न पर फिर चेहरे पर झूठी हंसी लेकर कहा

में- हाँ हाँ लाओ न चची मैं ले चलता हूँ...

और फिर दोनों के हाथों से थैले ले लिए और मजदूरी शुरू हो गयी एक बार और.... आज hi इन्हे मिलना था जब इतना थका हुआ हूँ पहले से ही .

खैर वो दोनों आपस में बातें करते हुए आगे आगे चल रही थी और मैं उनके पीछे पीछे उनके हिलते हुए चूतड़ों को देखता हुआ खुद को घसीट रहा था... शायद चूतड़ hi थे उनके जीनव कारन मैं वजन उठा कर चल रहा था वर्ण कब का गिर गया होता...

मैं साड़ी में कैद दोनों की गांड को देखकर सोच रहा था की अगर ये दोनों नंगी चल रही होती तो कैसे इनके चूतड़ हिल रहे होते कैसे हर कदम के साथ थिरक रहे होते और उनकी नंगी गंडो को इमेजिन कर रहा था





कैसे दोनों छुटद आपस में घिस रहे होंगे चलते हुए... वैसे ममता चची की गांड तो मैं देखना क्या मार भी चूका था पर इन ख़याली पुलाव का भी अलग hi मज़ा है... खैर ये hi सब सोचते सोचते गली आ गयी और पहले रज्जो चची का घर आ गया...

मैंने ममता चची का थैला बहार. रखा और रज्जो चची का उठा कर अंदर घुस गया...

अंदर घुसते hi सामने लड़ो दिखी...

लड़ो- अरे वाह भैया आज हमारी सब्ज़ी तुम लाये हो..

Me-haan लानी पड़ी क्या करूँ तू कहती hi बहुत है...

Lado-acha सब मैं hi खा जाती हूँ जैसे...

Me-dekh अब तू खुद hi बोल रही है...

लड़ो- भैया बहुत बुरे हो तुम..

Me-thankyou...

Lado-acha ये तो बताओ मम्मी कहाँ हैं मेरी...

में- यहीं बहार ममता चची से बतिया रही हैं...

Lado-ohho एक तो इनका बतियाना ख़तम नहीं नोटा कभी.. यहाँ से भी साथ गयी थी बतियाते हुए बापिस भी आईं बतियाते हुए और अब भी रुक कर बात hi कर रही हैं... न जाने कहाँ से आती हैं इन्हे इतनी बातें...

में- बीटा तू काम बतखोर बन अभी चची ने सुन लिए न तो पीठ तोड़ देंगी तेरी...

Lado-are भैया मेटा चलता रहता है... ये बताओ पानी या चाय कुछ लॉन?

Me-nahi अब चलता हूँ नीतू कहाँ है?

लड़ो- अभी तो यहीं थी शायद दीदी... शायद छत पर होंगी बुलाऊँ क्या?

में- नहीं रहने दे... ाचा चलता हूँ..

तभी नीतू की आवाज़ आ गयी..

नीतू- अरे भैया रुको तो सही कहाँ चल दिए..?

में- बस घर जा रहा था...

नीतू- ाचा शाम को कुछ काम तो नहीं है तुम्हे?

में- ऐसा कुछ खास याद तो नहीं आ रहा क्यों क्या हुआ?

Neetu-are शाम को मुझे गैंदपुर जाना है एक सूट देने तो तुम ले चलना..

मैं तो गैंदपुर का नाम सुनके hi कान खड़े हो गए..

में- हाँ हाँ बिलकुल अभी चल na...abhi चलते हैं कोई दिक्कत नहीं है..

नीतू- नहीं भैया शामको hi चलेंगे..

में- अभी भी शाम hi है वैसे... चल कोई नई जब तू कहेगी तब चल लेंगे...

नीतू- ठीक है भैया तुम्हे फ़ोन कर दूंगी आ जाना...

में- हाँ ऐसा कर लेते है. नंबर तो है hi तेरे पास कर दियो...

लड़ो- मुझे तो कभी नहीं कहीं ले जाते भैया...

में- अरे मेरी बहना तुझे तो ज़रूर ले जाऊंगा.. बड़े प्यार से अचे से ले जाऊंगा...

लड़ो- हैं सच्ची कहाँ??

में- जहन्नुम में...

लड़ो ने बुरा सा मुँह बना लिए और झाड़ू लेकर मेरे पीछे पद गयी वहीं नीतू हँसते हुए उसे रोक रही थी...

खैर भागते हुए जान बचा कर मैं वहां से निकला और एक बार फिर से मजदूर बन गया. और चची का थैला उठाया... और फिर मेरे पीछे पीछे चची भी चलने लगी.. उनके घर जाकर उनका थैला आंगन में रखा और देखा नज़र घुमा कर तो पल्ली रसोई में काम कर रही थी.. मैंने सोचा यहाँ काम बन सकता है...

और चुपचाप जाकर पल्ली को पीछे से पकड़ लिया.. पल्ली अचानक से पकड़ने से दर गयी...

में- चुप चिल्ला मत...

पल्ली- भैया डरा दिया मुझे... जान hi निकल जाती मेरी तो...

में- तू तो मेरी जान है तेरी जान कैसे निकलने देता...

पल्ली- बातें मत बनाओ.. चाय पियोगे..?

Me-pahle ये बता चाचा कहाँ हैं?

पल्ली- कहीं बहार गए हैं काम से

में- फिर तो पियूँगा..

पल्ली- क्या...

पल्ली ने इतना hi बोलै था और मैंने उसको चुप करा दिया और उसके होंठों को चूसने लगा... उसने एक t-shirt और पजामा पहना हुआ था घर पर अक्सर वो यही पहनती थी.... मैंने एक हाथ उसकी पर लेजाकर उसकी टीशर्ट के अंदर घुसेड़ दिया और उसके नंगे पेट कमर और पीठ पर फिरने लगा... रसीले होंठों को चूसते हुए उसके चिकने बदन पर हाथ फेरने में बड़ा मज़ा आ रहा था... फिर हाथ थोड़ा ऊपर ले जाकर उसके एक संतरे को दबाने लगा.. पल्ली मेरी पकड़ मैं कसमसाने लगी... उसकी पकड़ मेरे होंठों पर कास गयी... वहीं अब उसका एक हाथ भी नीचे गया और मेरे पाजामे को ततलोटे हुए उसमे घुस गया और फिर धीरे से पजामा और कच्चा दोनोनीचे सरका दिए और मेरा कड़क डंडा बहार निकल आया... जिसे उसने अपने हाथो में थाम लिआ....

मेरे लुंड को उसके हाथ में जाकर बड़ा आराम मिला... वहीं अब वो मेरी जीभ को इतनी बुरी तरह से चूस रही थी जैसे मेरे मुँह से उखड hi लेगी...

तभी पीछे से चची की आवाज़ आई- तुम दोनों को ज़रा भी शर्म नहीं है कहीं भी शुरू हो जाते हो... जो करना है कमरे में करो यहाँ कोई देख लेगा ...

तो मैं और पल्ली अलग हुए और मैंने चची को पकड़ा और उन्हें लेकर उनके कमरे में आ गया साथ hi पल्ली भी आ गयी... मैंने अपना पजामा और कच्चा पूरी तरह से उतर दिया और बीएड पर फ़ेंक दिया और पल्ली को कंधे से दबाकर अपने सामने नीचे बिठा दिया जिससे उसके चेहरे के सामने मेरा लुंड आ गया जिसे उसने तुरंत hi चूम लिए और फिर मुँह में भर के चूसने लगी...

आह्ह्ह्हह मुझे जैसे सुकून मिल गया हो उसके मुँह में...

मैंने चची की करीब खींच लिए और उनके होंठो को चूसने लगा... चची के होंठ और पल्ली के होंठों में बस इतना फ़र्क़ था की चची के थोड़े भरे हुए थे बाकि रसीले तो माँ बेटी दोनों के hi बराबर थे... नीचे बैठकर बेटी मेरा लुंड चूस रही थी और ऊपर मैं माँ के होंठों को चूस रहा था... कहते हैं बेटियां अपनी माँ से ज़्यादा खुली होती हैं और बेटी की सबसे पहली दोस्त माँ hi होती है... पर जब बेटी और माँ इतनी खुल जाएं जितनी पल्ली और चची थी.. तो माँ बेटी का रिश्ता एक अलग hi स्टार पर पहुँच जाता है...

खैर ज्ञान बाद में छोडूंगा अभी पल्ली का मुँह छोड़ लेता हूँ...

मैं चची के होंठों को चूसते हुए नीचे हाथ लेजाकर उनके पीछे से उनके बड़े बड़े चूतड़ों को मसलने लगा.... चची मेरा पूरा साथ दे रही थी होंठो को चूसने में...

मैं साड़ी के ऊपर से hi उनकी गांड की दरार में हाथ फिरा रहा था... साथ hi कमर हिला हिलाकर पल्ली के मुँह में लुंड अंदर बहार कर रहा था...

फिर चची और मेरे होंठ अलग हुए तो चची भी नीचे बैठ गयी मेरे सामने.. एक तरफ माँ तो उसके बगल में बेटी... चची ने मेरे लुंड को जड़ से पकड़ लिए और फिर अपनी बेटी के मुँह से निकल कर अपनी तरफ मोड़ लिए और मुँह में भर लिए... पल्ली अपना मुँह खली होने से थोड़ा परेशां हुई पर फिर चची ने हाथ बढाकर उसका चेहरा मेरी गोलियों की तरफ मोड़ दिया जिन्हे पल्ली चाटने लगी...

मेरा मज़ा दोगुना हो गया... माँ के मुँह में लुंड था और बेटी के मुँह में ाँद और मुझे क्या चाहिए... और दोनों hi पूरी शिद्दत से अपने मुँह में भरे मेरे अंगो को चूम और चाट रही थी...

और मैं आराम से खड़ा होकर माँ बेटी की मेहमाननवाज़ी का मज़ा ले रहा था..

पल्ली मेरी गोलियों को बदल बदल कर चूस रही थी पहले एक को मुँह में भर के चूसती फिर दूसरी को... ऐसे hi पल्ली ने जैसे hi मेरी एक गोली को मुँह से निकला वैसे hi चची ने भी मेरा लुंड मुँह से निकल दिया और अपना चेहरा आगे कर के पल्ली के होंठों को अपने मुँह में भर लिए और चूसने लगी... पल्ली भी अपनी मम्मी के साथ साथ उनके होंठो को तो कभी जीभ को चूस रही थी...

माँ बेटी के प्यार का ये कामुक रूप देखकर मेरा लुंड और तन गया... कुछ पल बाद दोनों अलग हुए... और चची ने फिर से पल्ली का चेहरा पकड़ा पर इस बार पल्ली का मुँह मेरी गोलियों पर लगाने की जगह थोड़ा नीचे कर के टिका दिया और जैसे hi उसके होंठ मेरे शरीर से टकराये..

मेरे शरीर में सनसनी फ़ैल गयी... चची ने पल्ली का मुँह पीछा से मेरी गांड के छेड़ पर रख दिया था.. मैं हैरान भी था और बेहद उत्तेजित भी कैसे एक माँ अपनी बेटी का मुँह मेरी गांड पर रख रही है... उसपर से पल्ली ने मुझे और भी हैरान कर दिया उसने अपनी जीभ निकली और मेरे गांड के छेड़ पर फिरने लगी... मैं तो उसकी जीभ को महसूस करके झटपटाने लगा वहीं साथ में चची मेरा लुंड चूस रही थी...

इस दो तरफा हमले से मेरा बुरा हाल था... मेरी उत्तेजना बढाती जा रही थी... जीसर बढ़ने में चची और पल्ली कोई कसार नहीं छोड़ रहे थे... पल्ली तो अपनी जीभ से मेरी गांड को कुरेद रही थी साथ hi अपनी जीभ को नुकीला कर मेरी गांड में घुसेड़ रही थी...

मेरी गांड में उसकी जीभ से मैं इतना गरम हो गया था साथ hi आक्रामक भी मैंने चची का सर पकड़ लिया और उनके ऊपर आके अपना लुंड उनके मुँह में अंदर बहार करने लगा... या यूँ कहूं उनका मुँह छोड़ने लगा... जिससे चची को थोड़ी तकलीफ हो रही थी पर जैसा होता आया है बेटी या बेटे की किये की सजा माँ को hi मिलती रही है और अभी भी मिल रही थी...

पीछे से पल्ली जितनी ज़ोर से अपनी जीभ मेरी गांड में घुसती मैं उतनी hi ज़ोर से अपना लुंड चची के गले में मारता..





मुझे कुल मिलकर बेहद मज़ा आ रहा था... गांड में जीभ डालकर कोई कहते तो एक अलग hi सनसनी होती है जब माँ करती हैं तो बहुत hi ज़्यादा अलग लगता था पर अभी इसलिए और मज़ा आ रहा था की गांड में जीभ के साथ साथ मेरा लुंड भी किसी के गले में था तो दोनों तरफ से मज़ा मिल रहा था और जो मज़ा दे रहे थी वो भी माँ और बेटी थी... तो इससे उत्तेजित करने वाला दृश्य क्या हो सकता था...

मैं बेहद खुश था की सुबह से अंदर दबी हुई साडी गर्मी लुंड की साडी अकड़ निकलने के लिए मुझे क्या सही जगह छेड़ मिल गए थे कहाँ सुबह से एक के लिए तरस रहा था और यहाँ दो दो... ये hi सोचते हुयी मैं जोश में आ गया और अपना लुंड चची के गले में जड़ तक घुसेड़ दिया और कुछ देर रुक गया... जाव चची साँस के लिए छटपटाने लगी तो बहार निकल लिए और फिर अचानक से मैं पलट गया और अपना लुंड पल्ली के मुँह में घुसेड़ दिया और चची के सामने मेरी गांड आ गयी और चची ने भी अपनी बेटी की तरह hi अपनी जीभ निकली और मेरी गांड के छेड़ को अपनी जीभ से छूने के लिए अपना चेहरा आगे किया और फिर चची की जीभ जैसे hi मेरी गांड पर टच हुई वैसे hi मैंने पल्ली का चेहरा अपने लुंड पर दबा दिया और मेरा लुंड उसके मुँह में जड़ तक समां गया...

तभी बहार से खत खत खत खत की आवाज़ आने लगी... और चची ने अपनी जीभ हटाई मेरे चेहरे से और अपने कपडे ठीक करने लगो वहीं पल्ली ने भी मेरा लुंड मुँह से निकाल दिया...

तभी चची boli-Palli तेरे पापा आ गए हैं तुम दोनों कपडे ठीक करके बहार आओ मैं गेट खोलती हूँ...

मैं तो बूत बना बस सब देखे जा रहा था लुंड अब भी खड़ा का खड़ा hi रह गया था सरे अरमान टूट गए... मेरे साथ एक बार और खड़े लुंड पे धोखा हो गया खैर किसी तरह जज़्बातो को सँभालते हुए अपने कपडे पहने बड़ी मुश्किल से खड़े लुंड को पाजामे में एडजस्ट किआ और बहार आ गया...

जब तक बहार आया तब तक चाचा आंगन में खत पर बैठ चुके थे.

राजन चाचा - अरे कर्मा तू कब आया...

म चची- वो मैं सब्जी ला रही थी तभी रस्ते में मिल गया तो मेरे साथ थैला उठाकर लाया रखवाने के लिए...

राजन चाचा - अरे वाह बहुत hi नेक लड़का है अपना कर्मा भगवन करे तेरी जल्दी से शादी हो और तू सुखी रहे...

Me-(man में) कोई सुखी रहने दे तो रहूँगा न.. आ गए बीच में...

में- अरे चाचा सुखी रहने के लिए ब्याह की क्या ज़रुरत है... और ब्याह करने से सब सुखी थोड़े हो जाते हैं...

राजन चाचा- ये बात तो सही कही कर्मा ब्याह करने से सुख कहाँ hi रह जाता है...

म चची- अच्छा कर्मा की आड़ में अपने मन की बोल रहे हो..

राजन चाचा- मैंने तो कुछ कहा hi नहीं...

पल्ली- नहीं मम्मी पापा ने कहा की वो सुखी नहीं हैं...

पल्ली की बात सुनकर अचानक से मुझे कुछ याद आया जिसके बारे में मुझे उससे पूछना था पर अभी सही समय और जगह भी नहीं थी... तो फिर खैर उनकी नोकझोक चालू हो गयी जिसे सुनकर मैं और पल्ली मज़े ले रहे थे... ऐसे hi थोड़ी देर बाद मैं उनके घर से निकल लिया... एक बार फिर से मायूसी से भरा मन थकान से भरा शरीर और वीर्य से लबालब भरी गोलियां लेकर मैं चल पड़ा अब आखिरी ठिकाना अपना घर hi था... एक आखिरी उम्मीद बस माँ hi थी... तो उसी उम्मीद को लेकर घर चल पड़ा... हालाँकि मैं इतनी बार चल पड़ा चल पड़ा कर रहा हूँ घर उसी गली में था सिर्फ 100 मीटर की दूरी पर...

मैंने जाकर गेट खटखटाया तो दरवाज़ा खुला और सामने देखा तो छान से मेरी आखिरी उम्म्मीद भी गिर कर नीचे बिखर गयी... क्यूंकि गेट अनुज ने खोला था मतलब अब मतलब क्या hi बताऊँ मतलब यही था की मेरा एक बार और काट गया...

खैर मैं अंदर आया तो आंगन में माँ बैठी थी और उनके सामने कोई और बैठा था जिसकी पीठ मेरी और थी.. तो मैं भाग कर सामने गया और देखा तो मेरे चेहरे पर मुस्कान आ गयी

माँ- ले कर्मा भी आ गया .

सामने मेरी मौसी बैठी थी मैंने जल्दी से झुक कर उनके पेअर छुए और उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरा मुझे देख कर उनके चेहरे पर हमेशा की तरह ख़ुशी थी मौसी ने मेरे हाथ अपने हाथों में पकड़े उन्हें चूमकर अपने पास में बिठा लिया...

मौसी- आ गया मेरा लल्ला मेरा राजा बीटा...

में- कैसी हो मौसी...

मौसी- अब तुझे देख लिए तो चैन आ गया लल्ला...

में- बढ़िया किया तुम आ गयी मौसी बहुत याद आती थी तुम्हारी...

मौसी- चल झूठे याद आई तो आया क्यों नहीं मुझसे मिलने...

Me-kya बताऊँ मौसी बाघ और पढाई से टाइम hi नहीं बचता... बचा था तो बुआ के यहाँ शादी में निकल गया...

मैं जान बूझ कर मौसी से उनकी ससुराल के बारे में बात नहीं कर रहा था मैं नहीं चाहता था की बेचारी दुखी ho...wo hi बात याद कर कर के...

(अरे हाँ मैं तो आप सबको मौसी के बारे में बताना hi भूल गया...

मेरी माँ 4 भाई बहन हैं जिसमे दो भाई हैं और दो बहाने हैं माँ सबसे बड़ी फिर मौसी और फिर दोनों छोटे भाई...

मौसी का नाम शालू है और उम्र 39 होगी लम्बाई में माँ से एक इंच ज़्यादा होगी बस... मौसी दिखने में बेहद सुन्दर हैं अपनी बहन की तरह hi उन्हें भी खूबसूरती भर भर के मिली है.. बड़ी बड़ी नीली आँखें, गोरा रंग बेहद खूबसूरत चेहरा, मौसी का बदन भरा हुआ है.. उनके बदन में सबसे खास हैं उनकी छुछियां कमसे काम 42 की होंगी hi... हो उनके छोटे से शरीर पर बहुत बदु लगती हैं, 32 की कमर पर सपाट पेट मोटापा नहीं है और 36 की गांड... तो कुल मिलकर ऐसी हैं मेरी मौसी शालू..





अब मौसी से मिलवा दिया है तो उनके पति यानि मौसा जी से भी परिचय करवा देता हूँ

मौसाजी नाम शैलेश, उम्र 43.

फ़ौज में हैं, हत्ता कट्टा शरीर है, हंसमुख हैं और हम दोनों भाइयों को अपने बच्चों की तरह प्यार करते हैं..

मौसा मौसी के जीवन में सरे सुख हैं बस एक को छोड़कर संतान सुख.. साडी कोशिश कर चुके हैं.. शहर शहर के डॉक्टर, विशेषज्ञ, फ़क़ीर, आयुर्वेद विशेषज्ञ सब को दिखाया है न जाने कितने टेस्ट करा लिए दवाई करवाली पर आज तक संतान नहीं हुई ..हैरानी की बात ये है की जितने भी डॉ ने देखा टेस्ट किये सब यही बोलते हैं की किसी में कोई कमी नहीं है न मौसी में न मौसा में फिर भी न जाने क्यों बच्चा नहीं हो रहा... बाकि की जानकारी कहानी में मिलती जाएगी.. अब बापिस चलते हैं)

मौसी- अरे हाँ शादी थी न शशि दीदी के यहाँ कैसी रही?

माँ- सब बढ़िया हुआ ख़ुशी से बीड़ा हुई लड़की... परिवार भी ाचा मिला है...

मौसी- और दीदी अम्मा से बात करती रहती हो?

माँ- हाँ कभी हो जाती है हफ्ते दस दिन में..

मौसी- ाचा है करते रहा करो..

माँ और मौसी बात कर रहे थे तो मैंने उन्हें बात करने दी और अनुज को उठकर साइड में ले गया और उससे पुछा

में- क्या हुआ वहां प्?

अनुज- भैया जितना मुझे समझ आया की वो लोग मौसा के हिस्से के खेतों पर खेती करते हैं अलग होने के बाद भी और साथ hi कुछ नहीं देते... न फसल में हिस्सा न नई कुछ अलग से paisa..to इसी बात पर मौसा की उनके भाइयों से बहस हुई उनके भाइयों का कहना है की तुम नौकरी करते हो तुम खेत पर खेती तो कर नहीं paoge..to क्या करना है खेतो का हमें hi करने दो...

में- ये क्या बात हुई ऐसे थोड़े hi होता है..

अनुज- भैया इसी बात पर कहा सुनी हो गयी और बात बढ़ाते बढ़ाते ठाणे तक आ गयी...

Me-thane में क्या हुआ...

अनुज- वो hi सब पुलिस वाला बोल रहा है आपद में बैठ कर सुलझा लो मामला पर मौसा बोल रहे हैं की मैं सब समझ लूँ पर ये सेल मेरे खेतों में खेती करते हैं खुद को मेरा भाई कहते हैं पर पीठ पीछे मेरी बीवी को पूरे गाओं में बाँझ कहते फिरते हैं... कुछ महीने पहले मौसी की तबियत ख़राब थी तो और मौसा ड्यूटी पर थे रो कोई बाँदा एक बार देखने भी नहीं आया या पानी तक नहीं पुछा.. नानी के यहाँ से मां. ममी आये हफ्ते भर रहे जब मौसी ठीक हो गयी तब गए... इसी बात पर मौसा बोले की जो सेल मेरे दुःख मैं नहीं आ सकते जो बीमारी में पूछ नहीं सकते उन्हें मैं ज़मीन का एक टुकड़ा भी क्यों इस्तेमाल करने दूँ.

Me-theek बात hai..phir अभी पापा और मौसा कहाँ हैं...

अनुज- ठाणे में तो ऐसा कुछ फैसला निकला नहीं है बस यही बोलै की मुकद्दमा हो जायेगा तो कोर्ट के चक्कर काटते रहोगे तो देखलो सुलह करके hi...phir पापा और मौसा ने बोलै मुझे की मौसी को लेकर घर चला जॉन वो लोग बाद में या कल आएंगे...

में- चल ठीक है तू जा बैठ उनके पास..

मैं थोड़ी देर पूरे मामके के बारे में सोचता रहा की क्या सही होगा क्या नहीं... फिर मैंने फ़ोन निकला और पापा को फ़ोन किआ ...

पापा- hello हाँ बीटा बोल...

में- पापा सब ठीक है वहां?

पापा- हाँ सब ठीक hi है...

में- मौसाजी साथ में हैं?

पापा- हाँ यहीं हैं क्यों क्या हुआ...

में- बात करवाना एक बार या फिर फ़ोन स्पीकर पर रखलो...

Papa-ruk एक मिनट... हाँ कर्मा तेरे मौसा जी हैं साथ में बोल अब...

में- मौसा जी नमस्ते...

मौसा- नमस्ते बीटा ठीक हो...

Me-haan मौसा जी आप ठीक हो...

Mausa-haan बीटा मैं ठीक हूँ..

में- ैगा मौसा जी इस मामले के बारे में एक बात करनी थी आपसे

मौसा- हाँ बोल न बीटा...

में- अगर आपको बुरा न लगे तो हम ऐसा नहीं कर सकते...

मौसा- कैसा

और फिर में उन्हें पूरा प्लान बागा दिए और अचे से समझा दिया ... बाकि उनके ऊपर छोड़ दिया सोचने के लिए...

मौसा- ठीक है बीटा मैं एक वार तेरी मौसी से बात कर लूंगा फिर बताता हूँ औरर खुद भी सोचता हूँ इस बारे में...

में- ठीक है आराम से सोचके देखो मौसा जी... नमस्ते

Mausa....namaste बीटा...

इतने में फ़ोन कट गया और मैं बापिस जाकर मौसी और माँ के पास बैठ गया...

इसके बाद क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट... बहुत बहुतत्त शुक्रिया
 
ा बिट बिजी नाउ विल तरय तो पोस्ट अस सून अस पॉसिबल...
 
में- ठीक है आराम से सोचके देखो मौसा जी... नमस्ते

Mausa....namaste बीटा...

इतने में फ़ोन कट गया और मैं बापिस जाकर मौसी और माँ के पास बैठ गया...

अपडेट 93
माँ- कर्मा चाय पियेगा? या कुछ खायेगा?

में- हाँ माँ खाऊंगा भूख तो लगी है मौसी तुमने खाया कुछ?

माँ- कहाँ बीटा तबसे बोल रही हो कुछ खाके खा ले ये बस बोले जा रही है की मन नहीं है...

में- अरे माँ तुम ले आओ मैं और मौसी एक साथ खाएंगे... और मौसी और मैं hi क्यों तुम भी माँ साथ में खाएंगे.. अनुज से भी पूछ लो...

मौसी- हाँ ये ठीक रहेगा सब साथ खाएंगे तो मज़ा आएगा..

माँ- बढ़िया सब के लिए खाना लगाती हूँ मैं.. अनुज बीटा साथ चल ज़रा खाना लगवा दे...

फिर अनुज और माँ रसोई में खाना लेने चले गए... मैं और मौसी साथ में बात करते रहे अगले कुछ hi मिनट्स में चारो के लिए माँ ने खाना लगा दिया था... और हम सब साथ बैठकर बातें करते हुए खाने लगे...

इतना सारा काम करने. के बाद भूख लगी थी तो खाना खाने में बहुत मज़ा आया माँ में बड़ा स्वादिष्ट खाना बनाया था हमेशा की तरह... वहीं सबके साथ खाने से स्वाद और बढ़ गया था... बात करने से मौसी का मन भी अभी शांत लग रहा था और थोड़ी खुश नज़र आ रही थी जिससे माँ और हम सब भी खुश थे..

खैर खाना ख़तम हुआ तो अनुज सरे बर्तन उठा कर रसोई में ले गया और मैं वहीं खत पर लेट गया काफी थका हुआ जो था मौसी ने मेरा सर उठाकर अपनी गॉड में रख लिया और मेरे बालों में हाथ फेरने लगी... और न जाने क्या जादू था मौसी की गॉड में की मैं तुरंत hi सो गया.....

न जाने कितनी देर सोता रहा पर मेरे फ़ोन की आवाज़ से मेरी नींद खुली देखा तो मैं खाट पर अकेला था... मेरे सर के नीचे तकिया लगा हुआ था... मैंने फ़ोन उठाकर देखा तो नंबर था कोई.. मैंने फ़ोन उठाया..

में- Hello..

सामने से आवाज़ आई- hello भैया हाँ नीतू बोल रही हूँ..

में- हाँ हाँ नीतू बोल न...

नीतू- चलना नहीं है...

में- हाँ चलना है न...

नीतू- आधे घंटे में आ जाओ घर मोटरसाइकिल लेकर.

में- ठीक है आता हूँ...

नीतू- ठीक है लेट मत करना..

मैंने फ़ोन काट दिया और चेहरा घुमा कर इधर उधर देखा आंगन में कोई नहीं था.. मेरा चाय पीने का मन था तो माँ को ढूंढ रहा था उठा और रसोई में झांक कर देखा तो वहां भी माँ नहीं थी... न hi मौसी दिख रही थी.. और न hi अनुज..

फिर मैंने सोचा माँ को उनके कमरे में होंगी वहां जाकर देखा तो वहां भी नहीं थी फिर सोचा अनुज से पूछता हूँ... और अनुज के कमरे की तरफ चल दिया जैसे hi उसके कमरे के पास पंहुचा और थोड़ा ध्यानसे आवाज़ को सुना तो मैं तो जैम hi गया.. मेरे पेअर एक hi जगह पर जैम गए.. मेरा दिल तेज़ी से धड़कने लगा...

अंदर से आ रही आवाज़ जैसे सीधा मेरे सीने में लग रही थी.. अंदर से माँ की आवाज़ आ रही थी उनकी चूड़ियों की उनके बोलने की.. साथ hi अनुज की भी..

माँ- अह्हह्ह्ह्ह आराम से कर बेटाहः..

और फिर से चूड़ियां खांकि और एक बार फिर से माँ की आवाज़- आह्ह्ह्हह अनुज दर्द हो रहा हीी...

अनुज- बस माँ होने वाला है थोड़ा सा और...

मेरे दिमाग में आवाज़ को सुनकर तसवीरें बनने लगी... कमरे के अंदर क्या हो रहा होगा माँ और अनुज किस हालत में होंगे.. वहीं खड़े खड़े सरे अनुमान लगा रहा था... पर इतनी हिम्मत नहीं हो रही थी की आगे जाकर अंदर देखूं.. कभी मन करता की गेट खोलकर सीधा अंदर घुस jaun..phir ख्याल आता क्या गेट खुला होगा या अंदर से कुण्डी लगी होगी... मेरा दिमाग जितनी तेज़ चल रहा था मेटा शरीर उतना hi स्थिर हो गया था न मैं हिल प् रहा था और न कुछ कर पा रहा था...

तभी माँ की एक और आवाज़ आई- आह्हः बस्सस अनुजज....

और मैं जैसे अपनी सोच से बहार आ गया..

तभी अनुज की आवाज़ आई- बस माँ हो hi गया रुको ना...

मेरा मन किआ दरवाज़ा तोड़कर अभी अंदर घुस जॉन... मैं हिम्मत करके दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगा ... वो तीन कदम मुझे 300 कम जैसे लग रहे थे हर कदम के साथ मेरे दिल की धड़कन बढाती जा रही थी ऐसा लग रहा था की मैं कहीं गिर न जॉन...

मैं दरवाज़े के पास पहुंचा अब सबसे मुश्किल काम था क्या दरवाज़ा खटखटा कर देखूं या धक्का देकर खोलने की कोशिश करूँ... कहीं दरवाज़ा खुल गया तो जो देखूंगा उसके लिए मैं तैयार हूँ... इसी उधेड़बुन में मैं लगा हुआ था...

बीच बीच में माँ और अनुज की आवाज़ें आ रही थी पर वो आवाज़ें मेरे दिमाग में चल रही आवाज़ों से धीमे थी... खैर किसी तरह मैंने हिम्मत करके मैंने दरवाज़े को थोड़ा सा धक्का दिया और वो थोड़ा पीछे हो गया इसका मतलब कुण्डी नहीं लगी थी...

मैं दरवाज़े को खोलने लगा साथ hi मेरा मन बैठा जा रहा था... पर डरते डरते hi सही मैंने दरवाज़े को धक्का दे दिया और वो खुल गया..

हिम्मत करके मैंने बीएड की तरफ देखा तो हैरान रह गया...

बीएड पर माँ पेअर लटका कर बैठी हुई थी और अनुज उनके सामने नीचे ज़मीन पर बैठा था अनुज के हाथ में माँ का पेअर था... और उसकी उंगलियां माँ के पेअर की उँगलियों को खींच रही थी...

मैं तो जैसे देखकर एक बार फिर जैम सा गया... एक तरफ मन में ख़ुशी थी तो दूसरी तरफ पछतावा और साथ hi मन में बहुत से सवाल...

तभी माँ की नज़र मुझपर पड़ी- उठ गया बीटा तू...

उनकी आवाज़ से मैं थोड़ा ठीक हुआ और सोच को साइड रखकर बोलै

Me-haan माँ तुम लोग क्या कर रहे हो...

माँ- कुछ नहीं बीटा वो पैरों की उँगलियों में थोड़ी अकड़न सी थी तो अनुज वो hi चटका रहा था... कुछ चाहिए तुझे?

में- अभी ठीक हैं उंगलियां माँ?

अनुज- अरे इतने अचे से चटकाई हैं डॉ अनुज ने ठीक कैसे नहीं होंगी....

Maa-bada आया डॉक्टर अनुज...

मेरे चेहरे पर भी एक मुस्कान आ गयी उसकी बातें सुनकर..

Me-maa चाय पीने का मन था...

माँ- हाँ मन तो मेरा भी है बीटा चल बनती हूँ... और डॉक्टर अनुज आप चाय पियोगे..?

माँ की बात सुनकर सबके चेहरे पर हंसी आ गयी तभी पीछे से आवाज़ आई- क्या हुआ भाई किस बात पर हंसी आ रही है...

मैंने पीछे मुद कर देखा तो मौसी कड़ी थी?

में- आरर मौसी तुम कहाँ थी तबसे कहीं दिखी hi नहीं..

मौसी- छत पर थी बीटा नानी से बात कर रही थी..

माँ- चलो अब सब आँगन में बैठ कर चाय पीते हैं..

फिर सब लोग आँगन में आये मैं बाथरूम में गया हाथ मुँह धोने के लिए और तब मैंने एक चीज़ पर गौर किआ की अभी जो ब्बि कुछ हुआ उसकी वजह से मेरा लुंड बिलकुल टाइट था मेरे पाजामे में पता नहीं किसी ने बहार ध्यान दिया हो या न दिया हो पर साफ़ दिख रहा था... मैं हैरान था की ऐसा क्यों ऐसी परिस्थिति में लुंड क्यों खड़ा हुआ क्या ऐसे hi कई सवाल मन में थे पर अभी समय नहीं था कुछ सोचने का तो मैंने जाकर हाथ मुँह धोये और दुसरे साफ़ कपडे पहने आखिर ससुराल जो जाना था और तैयार होकर बहार आ गया माँ ने बहुत मस्त और कड़क चाय बनाई.. चाय पीते हुए भी मेरे दिमाग में अभी जो हुआ वो सब चल रहा था... कुछ सोचने की ज़रुरत थी कई सवालों का जवाब भी चाहिए थे मुझे खुद से hi...

तब्बी बीच में मेरा फ़ोन बजा..

मैंने देखा तो नीतू का नंबर था मैंने उठाया

में- हाँ नीतू..

नीतू- हाँ नीतू क्या आये नहीं अभी तक आधा घंटा हो गया..

Me-bas आ गया चाय पि रहा था...

Neetu-jaldi आओ...

मैंने फ़ोन काटा...

माँ- कहाँ जा रहा है और नीतू कौन ये पंडिताइन की बड़ी लड़की?

Me-haan माँ वो उसको गैंदपुर में कुछ काम था तो बोली मुझे ले चलना...

माँ- अच्छा अब तो यहीं आ गयी न सुना है लड़का देख रहे हैं उसके लिए..

Mausi-acha अपनी गली वाली पंडिताइन... वो जो बहुत बोलती हैं..

मौसी की बात सुनकर सब हंसाने लगे..

में- हाँ मौसी वही जो बहुत बोलती hain...acha माँ चलता हूँ ... अनुज चाबी कहाँ है मोटरसाइकिल की...

Anuj-deewar पर तंगी है.. पर जाना कहाँ है?

में- तू बहरा है तो मैं क्या करूँ अभी बताया नहीं था...

अनुज- गैंदपुर इतना तैयार होकर जाने की क्या ज़रुरत है?

में- तुझसे मतलब जा अपना काम कर...

माँ- ये दोनों फिर शुरू हो गए.. जस कर्मा तू जा...

मैंने दीवार से चाबी उठाई और मोटरसाइकिल लेकर नीतू के घर के बहार पहुंचा और उसे आवाज़ लगाई...

नीतू भी तुरंत एक हाथ में थैला लेकर बहार आई साथ hi रज्जो चची भी आई...

नीतू पीछे बैठने लगी साथ hi रज्जो चची भी शुरू हो गयी..

रज्जो चची- अरे बच्चा तनिक आराम से जाए... ीे लड़की भी तुमको hi परेशां करती है.. हम बोले रहे की कल सरजू के हाथों भिजवा दे पर मानी hi नहीं...

में- कोई नई चची सरजू जाये या मैं क्या फ़र्क़ पड़ता है... ाचा चलता हु..

मैंने जल्दी से मोटरसाइकिल चालू की और निकल पड़ा अगर रुकता तो चची की बातें hi ख़तम नहीं होती...

गली के बहार पहुंचा तो नीतू बोली- मम्मी से पीछा छूटा रहे थे भैया...

में- नहीं तो...

नीतू- अरे भैया समझती हूँ मैं पूरा दिन उनके साथ रहती हूँ. तुम समझ नहीं पाओगे मेरी हालत...

ये कहकर हंसाने लगी..

में- हैट पागल चची के बारे मैं ऐसा बोलती है. उन्हें पता चलेगा तो छोटी काट लेंगी तेरी...

नीतू- हाँ खतरनाक हैं मम्मी मेरी... एक दिन तो चाकू लेकर बिरजू के पीछे पद गयी थी कह रही थी आज ीका गाला काट देई हम..

में- तू बचके रहिओ...

नीतू- मैं तो बची हूँ भैया सबस ज़्यादा दांत बिरजू पर hi पड़ती है और लाड लाडो पर...

में- नाम भी तो लाडो है.. लाड तो मिलेगा hi...

खैर इसी तरह हंसी मज़ाक करते हुए हम गैंदपुर पहुँच गए...

अपनी ससुराल के बहार मोटरसाइकिल रोकी और मन hi मन बोलै बहार आकर swagat.karo सालो दामाद जी आये हैं.. नीतू उतरी और फिर मैं साथ hi गेट तक पहुंचे नीतू ने गेट खटखटाया तो थोड़ी देर बाद गेट खुला...

सामने एक लड़का था..

लड़का- अरे दीदी आ जाओ अंदर..

नीतू अंदर घुसी तो लड़का मुझसे बोलै आओ भैया तुम भी अंदर आओ...

मैंने मन में बोलै- हरामखोर जीजाजी बोल भैया नहीं...

में- जी..

नीतू- अंजलि कहाँ है?

लड़का- दीदी तो कहीं बहार गयी hai...papa के साथ...

मेरे मन में तो आया सेल का मुँह तोड़ दूँ.. साला आज सरे काम बिगड़ क्यों रहे हैं मेरे...

नीतू ने मेरी आँखों में देखा और थोड़ा मुस्कुरा दी जैसे कह रही हो भैया तुम्हारी किस्मत... और बात तो सही थी किस्मत झांट जैसी हो गयी थी...

लड़का- आओ दीदी बैठो न..

Me(man में)- सेल अब बिठा कर क्या फायदा जिसे बिठाना चाहिए था वो पता नहीं कहाँ है..

खैर लड़का हमें हॉल में ले गया वहां सोफे रखे हुए थे वह हमें बिठा दिया... नीतू तो खुली हुई थी आती जाती रहती थी सबको जानती थी तो वो तो ीछल कर बैठ गयी मैं शर्माता हुआ इधर उधर देखता हुआ बैठा जा कर... नज़रें घुमा कर देख रहा था घर काफी ाचा था और अचे से सजाया हुआ था जो चीज़ जहाँ होनी चाहिए वहीं थी... गाओं से ज़्यादा शहर का घर लग रहा था... हमारे यहाँ मेहमानो को खत या पलंग पर बिठाते थे यहाँ सोफे थे... कुलमिलाकर ज़रुरत की साडी चीज़ें दिख रही थी... कुलमिलाकर ाचा घर था साफ़ और सुसज्जित...

नीतू- ये अंजलि को दे डीओ...

नीतू ने थैला लड़के की और बढ़ाते हुए कहा..

लड़का- मेरे लिए है?

Neetu-haan भाई तेरे लिए hi है पहन कर देखले...

लड़के ने थैले के अंदर झांककर देखा और बुरा सा मुँह बना लिए..

Neetu-kyun पहनेगा नहीं..

Ladka-hatttt... चाय बनाऊं?

नीतू- तू बनाएगा... तै कहाँ है?

Ladka-wo तो मां के यहाँ गयी है भैया के साथ तो घर पर मैं दीदी और पापा hi हैं...

Neetu-nahi रहने दे तेरी बनाई चाय पीकर मरना नहीं है मुझे..

लड़का- अरे दीदी बहुत अछि बनता हूँ मैं चाय...

Neetu-nahi रहने दे बस पानी पिलदे...

लड़का रसोई की तरफ चला गया...

नीतू- भैया घर ाचा है न...

में- हाँ घरतो ाचा है और साफ़ भी है...

Neetu-tumhe तो ाचा लगेगा hi...

मैं कुछ बोलता उससे पहले hi वो पानी लेकर आ गया और हमारी तरफ बढ़ा दिया हमने पानी पिया फिर नीतू बोली- ाचा वो तो पता नहीं कब आएगी हम निकलते हैं...

Ladka-are रुक जाओ दीदी थोड़ी देर...

Neetu-nahi भाई थोड़ा काम भी है तो बाद में आउंगी फिर...

फिर हम दोनों खड़े हुए और गेट के करीब पहुंचकर मैंने गेट खोला और जैसे hi गेट खुला मेरा दिल उछलने लगा... लगा की मनो भगवन को मुझपर तरस आ hi गया... सामने अंजलि थी जैसे hi मैंने गेट खोला था ुसंव भी बहार से गेट खोलने के लिए हाँथ बढ़ाया था... उसने मुझे देखा तो थोड़ी हैरान हुई और फिर मेरे पीछे नीतू को देखा और उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी...

और मेरा दिल एक्सप्रेस बन गया उसकी मुस्कान देखकर... उसके चेहरे को देखे जा रहा था ऐसा खूबसूरत नज़ारा कहीं देखा hi नहीं था...

वो मेरे साइड से निकली और नीतू के गले लग गयी और मेरे सामने एक आदमी खड़ा था हाथ में सामान लेकर... देखने में थोड़ा पड़ा लिखा लग रहा था चेहरे पर चश्मा नज़र वाला... शर्ट पंत पहना हुआ और चेहरे पर थोड़ा रौब था...

आदमी ने मुझे देखा और घूरते हुए bola-aap कौन हैं जनाब?

नीतू- मेरे भैया हैं ताऊजी... मुझे लेकर आये थे...

आदमी- ाचा ाचा... आओ बैठो बीटा नीतू बैठ..

और ये कहता हुआ आदमी सामान लेकर अंदर चला गया...

ाचा तो ये ससुरजी हैं... साला खूबसूरत लड़किओं के बाप ऐसे खूसट hi होते हैं...

नीतू- ाचा अंजलि अब हम निकलते हैं...

Anjali-pagal है क्या अभी मैं आई हूँ और अभी जाएगी तू...

नीतू- सूट देने आई थी वो दे दिया hai...ab फिर आ जाउंगी कभी...

मैं मन hi मन सोच रहा था नीतू कुटिया मन क्यों कर रही है रुकजा न... मैं उन दोनों को बातें करता हुआ सुन रहा था...

अंजलि- हट थोड़ी देर में चल jana..abhi रुकजा..

नीतू- अरे मैं अकेली नहीं हूँ भैया भी हैं साथ में उन्हें भी काम होगा..

और फिर अंजलि की नज़र मुझपर padi..aur मैं एक बार फिर से मेरा दिल धक् धक् करने लगा न जाने क्या था इस लड़की में एक नज़र में hi मेरा बुरा हाल कर देती थी..

उसने मेरी आँखों में dekha..aur बोली- रुक जाइये थोड़ी देर...

में- जीई हाँ जीई कोई दिक्कत नहीं है...

मन में सोचा मेरी जान तुम रोको तो हमेशा के लिए रुक जॉन....

मेरी बात सुनकर वो खुश हो गयी...

अंजलि- थैंक्यू... नीतू अब तो चल अंदर...

फिर मेरी तरफ देखकर बोली- आइये न अंदर...

हाय यहाँ मैं पिघल गया अरे पिघलना क्या पिघल तो मैं पहली बार देखकर hi गया था... आज तो मैं पानी बनकर बाह गया समझो...

में- हाँ हाँ चलिए..

हम फिर से अंदर आ गए मैं फिर से सोफे पर अपनी जगह पर बैठ गया... अब तक जो घर ाचा लग रहा था अब उसके आने से महल लग रहा था लग रहा था हर एक चीज़ में जान आ गयी हो...

वो नीतू को लेकर अंदर एक कमरे की तरफ चली गयी.. मैं बैठा देख रहा था जब तक वो दिखना बंद नहीं हो गयी..

फिर बहार अकेले बैठा मुस्कुरा रहा था...

तभी वो आदमी आया मतलब मेरे ससुरजी और मेरे सामने आकर बैठ गए अब कपडे बदल कर कुरता पजामा पहना हुआ था......

मैं नज़रें नीचे कर के चुपचाप बैठा हुआ था..

आदमी- क्यों भाई क्या नाम है तुम्हारा?

में- ग कर्मा...

आदमी- नीतू के भाई हो..

में- ग हाँ वो मेरी गली में रहती है... तो भाई hi लगता हूँ...

Aadmi-acha मतलब नीतू के सेज भाई नहीं हो...

में- नहीं मुँह बोलै कह सके हैं...

आदमी- क्या करते हो...

मैंने सोचा लगता है आज hi रिश्ता पक्का कर देंगे ससुर जी इतने सवाल पूछ रहे हैं...

में- जी पढाई करता हूँ B.A फिनॉल ईयर है...

Aadmi-kaunse कॉलेज से?

में- ग अपने कैसे वाले से...

आदमी- और फादर क्या करते हैं आपके...?

में- ग खेती करते हैं साथ hi, तुबेल है हमारा और एक आम का बाघ भी है.

Aadmi-acha इतना सब कुछ, काफी म्हणत का काम है..

में- ग पापा, मैं और मेरा भाई मिलकर संभल लेते हैं.

Aadmi-ghar में कितने लोग हैं.?

में- पापा मम्मी मैं और मेरा छोटा भाई..

Aadmi-bahan नहीं है?

में- ग नहीं है...

इससे आगे वो पकाते की नीतू और अंजलि आ गयी... मैंने चैन की सांस ली, दोनों के हाथ में एक एक ट्रे थी.. अंजलि के हाथो में चाय और नीतू के बिस्कुट और नमकीन वगेरा..

अंजलि- लो सब लोग चाय पियो...

उसने एक कप उठाया और पकौ ससुरजी को दिया और दूसरा उठाया और मुझे देते हुए बोली- लीजिये चाय...

मैंने कांपते हाथों से उसके हाथ से कप लिया और बोलै- थैंक्यू..

नीतू मेरी तरफ देखकर मुस्कुरा रही थी...

नीतू- भैया बिस्कुट और नमकीन भी लो न..

नीतू ने बिस्कुट की प्लेट उठाकर अंजलि की तरफ की और अंजलि ने उससे लेकर मेरे सामने कर दी...

मैंने उसमे से एक बिस्कुट उठाया और फिर उसे थैंक्यू बोलै..

वो हल्का सा मुस्कुरा दी...

और फिर प्लेट टेबल पर रख दी और फिर वो दोनों कमरे की और जाने lagi...main चाहता था वो भी यहीं रहे पर वो अपने कमरे की तरफ चली गयी और मैं उन्हें जाते हुए देख रहा था..

की एक आवाज़ से मेरा ध्यान बापिस आया- चाय ठंडी हो जाएगी...

आदमी ने मुझे उन दोनों की और देखते हुए देखा और थोड़ा रूखे अंदाज़ में कहा...

में- ग ग अभी पिता हूँ...

और मैंने ध्यान चाय पर लगाया.... और सोचा कर्मा ये खूसट ससुरा तेरा कुछ नहीं होने देगा... और ये hi सोचते हुए सोचे चाय hi pi.le अंजलि न सही उसकी बनाई हुई चाय hi sahi...pahli बार मेरे जान को हाथों की चाय पि रहा था...

और मैंने एक घूंठ चाय सड़क ली...

और जैसे hi वो घूँट मेरे अंदर गया... एक मिनट ये चाय... ये स्वाद...

मैं थोड़ा हैरान हो गया क्यूंकि इस चाय स्वाद बिलकुल जैसी चाय माँ बनती थी और अभी पीकर भी आया था बिलकुल वैसा hi था.. मैं पूरी तरह निश्चित होकर कह सकता था की बिलकुल एक जैसा स्वाद था...

मैंने मन hi मन बोलै- वाह भगवन क्या बहु दी है माँ को चाय भी उनके जैसी hi बनती है... उधर आदमी ने मुझे सोचते देखा और bola-kya हुआ चाय अछि नहीं लगी...

में- ग नहीं बहुत अछि है...

आदमी- ाचा आगे का क्या सोचा है.

में- ग किस बारे में...

Aadmi-aage ज़िन्दगी में क्या करोगे?

में- ग ये B.A होने के बाद M.A करूँगा..

Aadmi-acha क्या बनना चाहते हो?

तभी मेरे दिमाग में कुछ आया..

में- ग टीचर बनना चाहता हूँ... माँ के बाद b.ed करूँगा...

मेरा जवाब सुनकर उनके चेहरे के भाव थोड़े बदल गए...

आदमी- बहुत सही सोचा है... वैसे किस विषय में रूचि है तुम्हारी?.

मुझे कुछ समझ नहीं आया क्या बोलू पर मुँह से निकल गया- ग हिस्ट्री.

आदमी- वाह बहुत बढ़िया आजकल बच्चो को इतिहास में रूचि hi कहाँ है... ाचा लगा जानकार की तुम्हे है...

में- ग बचपन से hi है..

Aadmi-acha है तैयारी करते रहो तो ज़रूर टीचर बनोगे...

और फिर उन्होंने इतिहास के बारे में पूछ पूछ कर और बता बता कर जो पकाना शुरू किआ... सच में अगर ये अंजलि के पिता नहीं होते तो सर फोड़ देता मैं ईंट मार के..

अंत में नीतू और अंजलि ने आकर मेरी जान बचाई....

नीतू- चलें भैया?

में- हाँ चलते हैं...

मैं जल्दी से उठ खड़ा हुआ... और गेट की तरफ चलने लगा मेरे पीछे पीछे नीतू थी और हम दोनों को गेट तक छोड़ने मेरी जान अंजलि आयी थी...

गेट पर आकर दोनों गले मिली...

अंजलि- अब कब आएगी?

Neetu-tu भी आ जाया कर कभी...

अंजलि ने मेरी तरफ एक बार देखा और बोली- मुझे कोई लाने लेजाने वाला नहीं है तेरी तरह..

नीतू- लेन लेजाने वाला मैं भेजदूँगी...

अंजलि- कोई नहीं मैं आ जाउंगी... तू भी कोशिश करियो की तू hi आ जाये..

Neetu-theek है चलते हैं अब..

मैं आकर मोटरसाइकिल पर बैठ गया नीतू भी आकर मेरे पीछे बैठी अंजलि गेट पर खड़े होकर देख रही थी... मेरा मन न जाने क्यों भरी हो रहा था वहां से जाने से... खैर जाना तो था hi नीतू ने अंजलि को हाथ हिलकर bye बोलै जिसपर अंजलि ने भी हाथ हिलकर bye किआ और फिर मेरी तरफ देखा और मुझे भी bye बोलै...

मैंने भी ख़ुशी से उसे bye किआ और फिर मोटरसाइकिल बढ़ा दी उसने भी गेट बंद कर किआ और मैं और नीतू घर की तरफ चल पड़े...

इसके आगे क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत शुक्रिया
 
खैर जाना तो था hi नीतू ने अंजलि को हाथ हिलकर bye बोलै जिसपर अंजलि ने भी हाथ हिलकर bye किआ और फिर मेरी तरफ देखा और मुझे भी bye बोलै...

मैंने भी ख़ुशी से उसे bye किआ और फिर मोटरसाइकिल बढ़ा दी उसने भी गेट बंद कर किआ और मैं और नीतू घर की तरफ चल पड़े...

अपडेट 94

सूरज डूब चूका था, मैं और नीतू मोटरसाइकिल से घर चल पड़े थे..

नीतू- भैया बड़े खुश लग रहे हो..

में- क्यों तुझे ऐसा क्यों लग रहा है..

नीतू- तुम्हारा चेहरा बता रहा है... वैसे होना भी चाहिए आज हाथों से बानी हुई चाय जो पीकर आये हो..

में- मज़ाक उदा रही है मेरा?

Neetu-nahi मैं तो जो है वो बोल रही हूँ...

में- वैसे चाय बहुत अछि बनाई थी...

नीतू- ओह्हो हाँ तुम्हे तो अछि लगेगी hi भैया... आखिर तुम्हारी उसने जो बनाई थी...

में- अरे नहीं वैसी बात नहीं है सच बता तुझे अछि नहीं लगी..

नीतू- भैया मैं न जाने कितनी बार उसके हाथों की चाय और खाना खा चुकी हूँ तो मुझे तो हर चीज़ का पता है और ये भी पता है वो कितना ाचा खाना बनती है...

में- कितनी अछि है न.. सुन्दर भी है और खाना भी ाचा बनती है... पड़ी लिखी भी है और व्यवहार भी ाचा है...

Neetu-bas बस... वो सुन्दर है तो मैं सुन्दर नहीं लगाती तुम्हे.?

Me-are नहीं नहीं तू तो सबसे ज़्यादा सुन्दर है... तेरी तो बात hi अलग है...

नीतू- तो मेरी तारीफ तो नहीं करते भैया तुम...

में- तू अलग है वो अलग है.. जैसे उसे देखता हूँ वैसे तुझे नहीं देख सकता न.

नीतू- क्यों नहीं देख सकते?

में- अरे पगली तू बहन है न...

नीतू- तो बहन सुन्दर नहीं होती..

में- अरे उसे मैं एक लड़की की नज़र से देखता हूँ और तुझे बहन की...

नीतू- पर बहन भी तो लड़की hi होती है भैया...

में- होती है पर तू समझ नहीं रही..

ऐसे hi बहस करते करते हम लोग घर पहुँच गए मैंने उसे गेट पर उतरा और वो उतर गयी..

Neetu-acha ड्राइवर अब फिर से कहीं जाना होगा तो बुलाऊंगी..

में- ग मेम साब अब आप अंदर जाइये नहीं तो चची आपको अचे से मैडम बना देंगी...

नीतू हंसती हुई चली गयी और मैं घर आ गया...

घर के अंदर आया तो मौसी ांदन में टीवी पर सीरियल देख रही थी और माँ और अनुज रसोई में थे...

मैं जाकर मौसी के पास बैठ गया और फिर से मेरे दिमाग में माँ और अनुज को रसोई में देखकर दोपहर वाला हादसा घूमने लगा...

मुझे समझ नहीं आ रहा था ये सब मेरे दिमाग में बार बार क्यों आ रहा है.. कुछ गलत नहीं है फिर भी अजीब सा लग रहा है... क्या करूँ कैसे सवाल हैं ये इनका जवाब कैसे मिलेगा....

इसी उधेड़बुन में लगा था की मौसी ने मेरा ध्यान तोडा..

Mausi-karma बीटा क्या हुआ सब ठीक है न? परेशां सा लग रहा है...

में- वो हाँ मौसी सब ठीक है... कुछ भी नहीं है..

मौसी- ाचा चल फिर टीवी देख मेरे साथ...

में- ठीक है मौसी.. चलो देखते हैं..

मुझे सीरियल वगेरा बिलकुल पसंद नहीं हैं पर मौसी के साथ के लिए देख रहा था साथ में मौसी मुझे कहानी और किरदारों के बारे में बताती भी जा रही थी...

ऐसे hi सीरियल देखते देखते थोड़ा टाइम पास हुआ तभी अनुज भी हमारे पास बैठ गया... वो भी टीवी देखने लगा...

थोड़े टाइम बाद माँ आई..

माँ- खाना खाओ सब अब बन गया है...

मौसी- हाँ बच्चो चलो खाना खाया जाये...

सबने मिलकर खाना खाया फिर माँ ने पापा को फ़ोन करके पुछा की उन्होंने और मौसा जी ने खाया की नहीं.. ..

फिर माँ और मौसी रसोई में चली गयी साफ़ सफाई करने और मैं और अनुज टीवी पर फिल्म देखने लगे....

माँ और मौसी अपना काम ख़तम करके माँ के कमरे में चले गए थे मैं और अनुज अब भी फिल्म देख रहे थे..

थोड़ी देर बाद मौसी की आवाज़ aai-Karma यहाँ आ बीटा...

मैं आंगन से उठ कर माँ के कमरे में गया... देखा तो माँ और मौसी बीएड पर बैठी थी दोनों hi थोड़ी गंभीर दिख रही थी..

में- हाँ मौसी क्या हुआ...

माँ- तेरी मौसी तुझसे कुछ बात करना चाहती है...

में- हाँ मौसी बोलो न..

इतने में अनुज भी आ गया कमरे में...

Anuj-maa गेट लगा दिया है... चाबी वहीं तंगी है...

Maa-theek है बीटा बैठ जा..

तो अनुज भी बीएड पर बैठ गया मेरी नज़र मौसी पर थी...

मौसी- तूने अपने मौसाजी को जो उपाय दिया है उस बारे में बात करनी थी...

माँ- उपाय कैसा उपाय?

Me-mausa जी ने बताया तुम्हे मौसी सब?

मौसी- हाँ बताया सब.

में- तो तुम्हे क्या लगता है फिर सही या नहीं.

माँ- अरे भाई मुझे भी कुछ बताओगे या नहीं?

मौसी- जीजी वहां के किये कर्मा ने उपाय दिया है की इसके मौसा तो ड्यूटी पर चले जाते हैं मुझे अकेले रहना पड़ता है...

माँ- हाँ वो तो है.

मौसी- दूसरा ये है की वो लोग खेतों पर भी हक़ जमाते रहते हैं भले hi खेत हमारे नाम पर हैं तब भी..

माँ- हाँ नासपीटे हैं सरे... कीड़े पड़ेंगे करमजलों को..

में- माँ तो मैंने मौसाजी को बोलै है क वहां के सरे खेत और घर जल्दी से जल्दी बेच dein...aur उन पैसों से यहाँ चोदामपुर में ज़मीन खरीद लेते हैं... और दोनों लोग यही. रहने लग जाएं वहां वैसे भी कोई नहीं है जो इतना मौसी या मौसा से ताल्लुक रखता हो यहाँ पर रहेंगी मौसी तो हम लोग होंगे मन भी लगा रहेगा मौसाजी के ड्यूटी पर जाने के बाद भी...

माँ- वाह कर्मा बहुत हु ाचा सोचा है ये सही है.. मैं भू चाहती हूँ ये हमारे साथ hi रहे वहां कौन है hi वैसे भी..

मौसी- मैं भी यही चाहती हु जीजी तुम्हारे और बच्चों के साथ रहकर मैं भी खुश रहूंगी पर कर्मा क्या ये ज़मीन बेचना इतनी आसानी से हो पायेगा वो लोग अड़चन नहीं करेंगे...

अनुज बड़े गौर से सबकी बातें सुन रहा था और कभी किसी का मुँह देखता तो कभी किसीका

Me-mausi ज़मीन मौसा जी के नाम पर है तो वो बेचे या रखें इससे कोई क्या कर सकता है...

अनुज- अरे वाह इसका मतलब मौसी भी अब हमारे साथ rahengi..balle बल्ले मज़ा आएगा..

सब उसकी हरकत देखकर हंसने लगे

माँ- अरे सही बोल रहा कर्मा शालू... मुझे तो ये hi सही लग रहा है और मैं खुश भी हूँ की तू हमारे साथ रहेगी..

मौसी- सच में कर्मा तूने बहुत सही सोचा है यहाँ तुमलोगो के साथ मुझे रहत रहेगी वहां कितना अकेला महसूस करती थी मैं.. घर काटने को दौड़ता था ऊपर से समाज के तने...

कहते हुए मौसी की आँखें भर आई...

मैंने आगे बढ़कर मौसी को गले लगा लिए...

Me-meri प्यारी मौसी हम लोग हैं न अबसे तुम्हे कोई परेशानी नहीं होगी.. और तुम्हे रोना भी नहीं है...

मौसी ने भी अपने हाथ मेरी पीठ पर लेजाकर मुझे अपने सीने से चिपका लिया... इतने में माँ उठी और उन्होंने मुझे और मौसी दोनों को अपनी बाँहों में भर लिए... सबको देखकर अनुज भी उठा और दूसरी तरफ से उसने मुझे और मौसी को गले लगा लिए....

माँ- मैं बहुत खुश हूँ.... अब तू हमेशा हमारे साथ रहेगी..

अनुज- मैं भी..

मौसी- पता है जीजी तुम सब मुझसे कितना प्यार करते हो.. और मैं भी तुम सब को बहुत चाहती हूँ..

फिर हम सब अलग हुए..

माँ- ये सब मेरे लल्ला की वजह से... और माँ मेरे सर पर हाथ फिरने लगी...

अनुज- अरे माँ मैं भी यही सोचने वाला था.

में- हाँ तीस साल बाद न..

फिर सब लोग हंसने लगे..

माँ- अरे वो सब तो ठीक है शालू तू ये बता भैया ने क्या कहा वो राज़ी हैं न उनका मन्ना भी तो ज़रूरी है..

मौसी- बोल रहे थे कर्मा कह तो सही रहा है और करना भी यही सही रहेगा हम दोनों के लिए... पर थोड़ा दुःख भी है की अपने माँ बाप का गाओं छोड़ना पद रहा है..

में- तो मौसाजी से बोल्डेन की घर न बेचें सिर्फ खेत बछड़े जिससे एक निशानी तो बानी रहेगी...

मौसी- हाँ मैं भी यही सोच रही थी बिलकुल नाता न तोडा जाये गाओं से आखिर इनका बचपन बीता है वहां...

में- ठीक है फिर मौसी तुम मौसाजी को ये बोल्डेन.....

मौसी- अपनो के साथ कितना ाचा लगता है साडी मुश्किलें काम होने लगती हैं...

Maa-mushkilen काम हो या न हो पर साडी मुश्किलों का सामना एक साथ करते हैं...

Mausi-bilkul सही कहा जीजी...

माँ- तो चलो अब सोया जाये फिर..

Anuj-ohho माँ कितना ाचा लग रहा है बातें करते हुए बाद में सोयेंगे न...

माँ- नहीं, फिर तेरी आँख नहीं खुलती सुबह और अब सब साथ रहने वाले हैं तो बातें कभी भी हो जाएँगी...

में- मन तो मेरा भी था पर चलो सोते हैं..

मौसी- जीजी चटाई निकाल दो.. मैं नीचे सोऊंगी..

में- क्यों मौसी?

Maa-kyun पागल है क्या नीचे क्यों सोयेगी..

मौसी- अरे जीजी कमर में दर्द है बिस्तर पर सोऊंगी तो और बढ़ जायेगा...

माँ- अगर कमर दर्द है तो मालिश करवा ले... नीचे किसी कीड़े वीडे ने काट लिए तो... कमर में तो मेरे भी दर्द है पर मैं नीचे थोड़े hi सो रही हूँ...

में- कबसे माँ.. बताया भी नहीं और न hi मौसी तुमने दवाई ले आता...

माँ- लल्ला इतना नहीं हैं.. अभी गरम तेल से मालिश करुँगी तो ठीक हो जायेगा... पहले तेरी कर देती हूँ शालू...

मौसी- जीजी अगर तुम मेरी मालिश करोगी और फिर मैं तुम्हारी तो मालिश का फायदा hi क्या मालिश के बाद तो आराम मिलना चाहिए न..

Maa-phir क्या करें?

मौसी- बच्चे हैं न इनसे करवा लेंगे..

माँ- हाँ ये भी ठीक है वैसे भी इनका बड़ा मन था जागने का अब जागो...

अनुज- काम के लिए जगाने को बोल रही हो माँ नहीं तो अभी सोने को बोल रही थी..

माँ- अब ज़्यादा बकवास मत कर जा और रसोई से गरम तेल लेकर आ...

अनुज- ला रहा हूँ माँ

और अनुज चला गया..

मौसी- दीदी साड़ी निकालनी पड़ेगी क्या?

माँ- हाँ निकल दे बेकार में तेल लग जायेगा...

मौसी- सही है आज ऐसे बिना साड़ी के hi सोयेंगे.. सिर्फ बच्चे hi हैं तो कोई परेशानी भी नहीं..

माँ ने एक बार मेरी तरफ देखा और मुस्कुरा कर बोली- बच्चे भी अब बड़े हो गए हैं शालू..

मौसी- हमारे तो बच्चे hi रहेंगे... चलो जीजी उतर देते हैं साड़ी...

मैं बीएड पर बैठा बैठा ये सारा क्रियाकलाप देख रहा था..

मौसी बीएड से उठी और एक साइड जाकर उन्होंने अपनी साड़ी निकल दी.. मौसी वैसे भी खूबसूरत थी अब साड़ी निकल जाने से ब्लाउज और पेटीकोट में बेहद कामुक लग रही थी... उनकी नंगी कमर, गोरा पेट, गहरी नाभि ब्लाउज से झांकती chuchhiyan...ahhh क्या दृश्य था...





हालाँकि पहले कभी मैंने मौसी को ऐसी नज़र से नहीं देखा था पर पहले में और अब में बहुत फ़र्क़ आ चूका था.. और मैं तो खूबसूरती का मुरीद था, गदराये जिस्म का दीवाना था फिर चाहे वो मौसी का हो बुआ का या माँ का.. लुंड तो खड़ा हो hi जाता था... खैर अभी मैंने किसी तरह से छुपा के बैठा tha...aur मौसी के गदराये बदन से आँखें सेंक रहा था

मौसी बापिस आकर बीएड पर बैठ गयी...

मौसी- जीजी तुम भी उतर दो...

फिर मेरी गदराई माँ भी उठी और बड़े कामुक अंदाज़ में उन्होंने साड़ी को अपने बदन से अलग कर दिया... माँ का नंगा पेट कमर सब आँखों के सामने आ गया... न जाने कितनी बार माँ को ऐसे या नंगा भी देख चूका था पर माँ का बदन कुछ ऐसा था की मैं कितनी बार भी देखलु बस एक नज़र और लुंड तन तना तन...

माँ ने साड़ी उतारदी और अपने खुले बालों को बांधने लगी





सच कहूं तो माँ इतनी कामुक लग रही थी की मन किया सब भूल जॉन और अभी माँ को पकड़ कर बिस्तर पर पटक दूँ और छोड़ दूँ... लुंड भी पाजामे के अंदर से माँ को देखकर ठुमके मार रहा था...

माँ भी आकर बिस्तर पर बैठ गयी इतने में अनुज भी तेल लेकर आ गया... कमरे में घुसते hi उसकी नज़र माँ और मौसी पर पड़ी और उन्हें बिना साड़ी के देखकर वो इतना हिल गया की तेल गिरते गिरते बचा...

में- आराम से अनुज...

अनुज ने तो मनो भूत hi देख लिए tha...khaur कैसे भी अपने आप को संभल कर अनुज बीएड तक पहुंचा...

अब सवाल ये था की कौन किसकी मालिश करेगा...

और इसका जवाब भी अनुज ने खुद दे दिया...

बीएड पर बैठते हुए hi बोलै- मौसी मैं तुम्हारी मालिश करूँ..

मौसी- हैं बीटा कर न...

में- लेट जाओ दोनों लोग...

फिर माँ और मौसी बीएड के एक एक तरफ अपने पेट पर लेट गयी.... दोनों की पेटीकोट से उभरे उभरे बड़े चूतड़ देखकर मेरा मन डोलने लगा... और लुंड और मजबूत हो गया...

अनुज ने एक कटोरी में तेल दाल दिया और मुझे दे दी. मैं माँ के बगल में बीएड पर घुटनो पर बैठ गया और थोड़ा सा तेल अपनी उँगलियों पर लिए तेल थोड़ा गरम था और फिर अपने हाथों में चुपड़ कर हाथ माँ की नंगी कमर पर रख दिए और दबाने लगा... उधर अनुज भी मौसी के बगल में बैठ गया था और उनकी कमर और पीठ पर तेल लगा रहा था...

मेरे हाथ माँ की कमर से छूटे hi मेरा लुंड बिलकुल कड़क हो हाय था... और होना भी था जिस तरह के आज धोखे पर धोखे मिले थे... लुंड को राहत मिली hi नहीं थी...

मैंने धीरे धीरे से माँ की पीठ पर बाथ चलने शुरू किये उधर अनुज ने भी मौसी की नंगी कमर पर हाथ फेरने चालू कर दिए...

मेरी हालत तो वैसी थी की भूखे के सामने खाना है पर खा नहीं सकता लुंड पजामा फाड़ने को तैयार था...

मौसी- कितना ाचा लग रहा है न जीजी... अनुज बीटा ऐसे hi...

माँ- हाँ बड़ा सुकून सा मिल रहस्य है...

Mausi-mujhe तो लग रहा है मैं सो जाउंगी... अनुज ज़्यादा देर मत करना अगर मैं सो जॉन तो...

Anuj-theek है मौसी... अब आप मालिश का मज़ा लो...

मेरी नज़र अनुज पर गयी और फिर अचानक से उसके पाजामे पर... उसके पाजामे में भी टेंट बना हुआ था.. और हो भी क्यों न इतनी गदरायी हुई दो औरतें सामने पेटीकोट और ब्लाउज में हो तो किस का लुंड नहीं खड़ा होगा....

माँ- सही कह रही है तू... बड़ा आराम मिल रहा है... नींद तो आ hi जाएगी...

Me-to सो जाना माँ क्या दिक्कत है.. हम लोग तुम्हारे सोते hi चले जायेंगे...

अनुज- हाँ माँ और मौसी.. सो जाना दोनों लोग...

Maa-are ये क्या हुआ... इस लाइट को भी अभी जाना था...

अनुज- मैं लैंप जलाता हूँ..

में- रहने दे न अभी क्या ज़रुरत है मालिश करता रह जब हमें जाना होगा तो फ़ोन की टोर्च जला कर चले जायेंगे..

Mausi-haan अभी लैंप का कोई काम नहीं है बस तू तेल मत फैला डीओ अनुज...

अनुज- नहीं मौसी वो सीडर में रखा है.. और मेरे होते हुए तेल फ़ैल जाये कैसे हो सकता है..

Maa-anuj अब बातें काम और मालिश पर ध्यान दे...

पूरे कमरे में कला अँधेरा था सिर्फ हमारी आवाज़ें आ रही थी...

मैं माँ की कमर और पीठ को हाथो से मसल मसल कर दबा रहा था... और मेरा लुंड उतना hi उतावला होता जा रहा था...

फिर मैं मालिश करते हुए उठा और साइड से उठ कर माँ के पैरों पर बैठ गया उनकी जांघों पर...

Maa-haan ऐसे सही से कर पायेगा तू....

Mausi-kya हुआ जीजी?

Maa-are वो लल्ला जगह बदल रहा था... टैंगो पर बैठकर अचे से ताकत लग पति है न..

Anuj-haan मैं भी ऐसे hi करता हूँ और फिर अनुज के थोड़ा हिलने की आआज़ आई और फिर मौसी- हाँ अब कर आराम से...

अब मैं माँ की जांघो पर बैठकर उनके बड़े बड़े चूतड़ों से ज़रा सा नीचे बैठकर उनकी मालिश कर रहा था

मेरे शरीर का तापमान बढ़ता जा रहा था अगर मौसी और अनुज बगल में नहीं होते तो अब तक तो माँ चुद रही होती...

अब मैं हाथ बढ़ाते हुए कमर के आगे पेट तक ले जाने लगा जितना जा सकता था माँ के लेते लेते और फिर उनके पेट और कमर की कोमल चर्बी को मसल देता...

अनुज और मौसी को देख नहीं प् रहा था सिर्फ मौसी की हम्म्म हम्म सुनाई दे रही थी...

माँ के इतने पास होने से लुंड कड़क हो चूका था और अब पाजामे में होने से दर्द कर रहा था... और जब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैंने एक रिस्क लेने का सोचा और अपना पजामा चुपचाप से नीचे खिसका कर अपना लुंड बाहर निकाल लिए...

अह्ह्ह थोड़ा सुकून मिल गया और फिर मैं ऐसे hi धीरे धीरे मालिश करने लगा मेरा लुंड अब सीधा होकर माँ के दोनों चूतड़ों के बीच पेटीकोट के ऊपर से घिस रहा था जिसे मुझे भी मज़ा आ रहा था...

में- माँ पीठ की भी मालिश करनी है क्या... ?

माँ- नहीं बीटा रहने दे.. इतना hi बहुत hai...tu भी थक गया होगा..

Me-nahi माँ कोई दिक्कत नहीं है मुझे करवालो अगर मन हो तो..

मौसी- अरे जीजी करवालो वैसे भी कौनसा रोज़ रोज़ करवाते हैं हम मालिश... अनुज बीटा मेरी पीठ भी कर देना..

Anuj-theek है मौसी कमर की करके करता हूँ..

माँ- चल ठीक है लल्ला करदे फिर...

में- माँ फिर ये ब्लाउज यव तो तेल से ख़राब हो जायेगा..

मौसी- हाँ जीजी ब्लाउज खोलना पड़ेगा पीछे से...

माँ- अरे मेरा पीछे डोरी वाला नहीं है तेरे जैसा मेरे आगे hi हुक हैं...

मौसी- तो थोड़ा उठ के खोल्दो न... अँधेरा हो रहा है कौन देख रहा है..

माँ- बच्चे हैं न...

Mausi-jeeji इतना अँधेरा है की अपना हाथ न दिखे और बच्चे hi तो हैं बस यहाँ...

Maa-phir भी..

Mausi-kya जीजी लो देखो मैंने तो डोरी खोल भी दी पीछे से अपने ब्लाउज ki...le अनुज अब कर आराम से...

माँ- चल ठीक है.. कर्मा थोड़ा उठ बीटा..

मैं माँ के पैरों से उठा तो फिर माँ थोड़ी हिलती हुई महसूस हुई और फिर शांत हो गयी...

माँ- अब आजा...

में- हाँ माँ..

और फिर मैं माँ के पैरों को महसूस करके दोबारा उन पर बैठ gaya...aur फिर कमर पर दोबारा हाथ लगाया तो ब्लाउज गायब था मेरी गदराई माँ अब सिर्फ पेटीकोट और ब्रा में मेरे नीचे लेती थी और बगल में उनकी बहन थी जिसका भी कुछ कुछ ये hi हाल था थोड़ा और ऊपर ले गया तो ब्रा की पट्टी थी.. जिसे मैंने बिना पूछे hi खोल दिया और दोनों तरफ अलग कर दिया..

मेरे अचानक ब्रा खोलने से माँ थोड़ा चौंकी- लल्ला...

Mausi-kya हुआ जीजी?

माँ- कुछ नहीं बस ऐसे hi...

अब माँ की पूरी पीठ नंगी थी जिसपर मैं ऊपर नीचे हाथ फेरने लगा... दबा कर मालिश करने लगा... मेरे मालिश करने की वजह से मैं आगे पीछे हो रहा था और उसी वजह से मेरा लुंड भी पेटीकोट के ऊपर से माँ की गांड की दरार में घिस रहा था...

जिसे शायद माँ ने भी महसूस किया होगा पर अभी तक कुछ कहा या किआ नहीं था उस बारे में...

अनुज- उम् वो मौसी तुम्हारी ये... क्या कहते हैं बनियान आ रही है बीच में..

मौसी- वो वो तो आएगी hi लल्ला..

माँ- खोल्दे न जब करवा रही है तो सही से करवा न...

Mausi-theek है बीटा अनुज उठ ज़रा.

और कुछ आवाज़ हुई शायद मौसी उठी थी...

मेरी अचानक से लालसा हुई मौसी को ऐसे देखने की... तो मैंने अपने साइड से फ़ोन उठाया और उसकी स्क्रीन को ों करके मौसी और अनुज की तरफ किआ...

तो स्क्रीन की लाइट से सामने जो नज़ारा दिखा बेहद हसीं था...





मौसी का ब्लाउज खुला हुआ था और पूरी पीठ पर सिर्फ ब्रा की पट्टी थी मौसी ऐसे बेहद कामुक लग रही थी मुझे कहीं न कहीं अनुज से जलन भी हो रही थी... इतना हुआ hi था की अनुज बोल पड़ा...

Anuj-kya हुआ भैया...

में- कुछ नहीं वो कटोरी नहीं मिल रही थी..

और फिर मुझे फ़ोन की स्क्रीन बंद करनी पड़ी.. पर जितना भी देख पाया उसने लुंड को और कड़क कर दिया..

और फिर थोड़ी आवाज़ आई. शायद मौसी के बापिस लेटने की थी.. उन्होंने अपनी ब्रा भी अब पीछे से खोल दी थी... जिसे महसूस करके hi अनुज ने कहा...

Anuj-haan अब ठीक है...

Mausi-ab आराम से कर...

अब माँ और मौसी पूरी पूरी नंगी पीठ और पेटीकोट के साथ हमारे नीचे लेती हुई थी... मेरा लुंड ये सोच सोच कर ठुमके मार रहा था माँ की गांड की दरार में...

दो शादीशुदा संस्कारी बहनें हम दोनों भाइयों के नीचे आधी नंगी लेती हुई थी....

मुझसे अब सहना बहुत मुश्किल होता जा रहा था... मैं माँ की नंगी पीठ पर जितना हाथ चलता मेरी उत्तेजना उतनी hi बढ़ जाती... मैं अब थोड़ा रिस्क और लेने की सोचने लगा... मैं धीरे से माँ की जांघ से उठा और एक हाथ से माँ के घुटनो को थोड़ा ऊपर उठाया और दुसरे हाथ से उनका पेटीकोट जाँघों तक खींच लिए... अब उनकी पूरी टांगें जांघों तक नंगी थी पेटीकोट सिर्फ चूतड़ों को छुपा रहा tha...main बापिस जांघों पर बैठ गया और पीठ की मालिश करने लगा दोबारा..

माँ ने जब ये महसूस किआ तो नीचे हाथ लेकर मेरे पेअर पर हल्का सा मारा शायद ये कहना छह रही थी की मैं ये न करूँ... पर मेरी उत्तेजना इतनी बढ़ चुकी थी की मुझसे काबू नहीं हो रहा था...

और फिर धीरे धीरे पीठ और कमर की मालिश करते हुए मैं पीठ पर कंधे से नीचे हाथ पूरा माँ की कमर के निचले हिस्से तक लता और फिर बापिस ऊपर उनके गले तक ले जाता और ऐसा करने से मेरा लुंड भी उनकी बड़ी और गद्देदार गांड पर चुभता...

पर इसके साथ साथ मैं जब भी नीचे हाथ लता और फिर ऊपर ले जाता तो माँ के पेटीकोट को थोड़ा ऊपर खिसका देता...

जिससे कुछ hi देर में पेटीकोट माँ के चूतड़ों से हटकर उनकी कमर तक पहुंच चूका था और माँ के बड़े बड़े चूतड़ मेरे सामने नंगे थे.. हालाँकि मुझे दिख नहीं रहे थे फिर भी मेरी माँ की गांड मेरे नीचे नंगी थी... और अब मेरा लुंड माँ के नंगे चूतड़ों के बीच ऊपर नीचे घिस रहा था..

माँ ने अपना हाथ नीचे लेकर मेरी जांघ को दबाकर मुझे ये न करने के लिए चेताया... पर जिसकी माँ नंगी उसके नीचे लेती हो उससे कहाँ काबू होता है...

मेरी माँ अपने सेज बेटे के नीचे नंगी लेती हुई थी जबकि बगल में माँ की सगी बहन और बीटा थे... ये जितना बड़ा पाप और अश्लील दृश्य था उतना hi उत्तेजक और कामुक... मेरे शरीर का सारा खून तो ये सोच सोचकर दौड़ कर मेरे लुंड में इकठ्ठा हो रहा था..

जितना ज़्यादा पकड़े जाने का दर था उतनी hi उत्तेजना थी...

पर फिर भी मुझे ख्याल था की बगल में अनुज और मौसी हैं अगर पकडे गए तो संभालना मुश्किल हो जायेगा...

पर साथ hi मैं माँ के बदन को भोगने से खुद को रोक नहीं पा रहा tha...maa बेचारी चुपचाप लेती हुई थी न कुछ बोल रही थी न कुछ और बस मुझे रोकने की इशारो से करती बीच बीच में...

मैंने फिर माँ की कमर को थोड़ा बीएड से उठाया और फिर उनकी कमर में अटका हुआ पेटीकोट उनके सर की तरफ से निकल दिया... माँ थोड़ा दर गयी और चौंक भी गयी..

माँ- कर्मा...??

Anuj-kya हुआ माँ?

Me-are कुछ नहीं वो मैंने माँ की ठीक उसी जगह पर दबा दिया जहाँ दर्द tha...maa अब कैसा लग रहा है?

माँ बेचारी क्या बोलती..

माँ- ाचा लग रहा है बीटा...

Me-dard काम हुआ माँ?

Maa-haan काम हो गया...

मौसी- सचमें जीजी मुझे तो अभी भी है थोड़ा...

अनुज- भैया कैसे किया तुमने मुझे भी बताओ मैं भी वैसे hi करूँगा..

में- अरे बहुत आसान है अभी लाइट है नहीं तो बस मैं अपनी आँखें बंद करके माँ को मालिश कर रहा हूँ उनके दर्द वाली जगह महसूस करके उसे दबा रहा हूँ..

अनुज- मैं भी कोशिश करता हूँ...

मैंने सोचा यही सही मौका है देखने का?

में- तू भी आँखें बंद करके कर रहा है..

अनुज- हाँ, भैया.. क्यों मौसी आँखें बंद करके hi करूँ न..

मैंने जल्दी से फ़ोन उठाया और फिर से स्क्रीन ों करके लाइट मौसी और अनुज पर डाली... अनुज के हाथ मौसी की मखमली नंगी पीठ पर घूम रहे थे उसकी आँखें बंद थी पर चेहरे पर भाव कुछ और थे... मैंने अनुज के पाजामे पर नीचे देखा तो तम्बू और बढ़ा हो चूका था... मैंने स्क्रीन लॉक लगा कर फिर से फ़ोन रख लिए..

मौसी- हाँ बीटा जैसा भी तुम दोनों को ठीक लगे क्यों जीजी?

माँ- हाँ अब जैसे ये बच्चे करना चाहें?

Mausi-waise आराम तो काफी मिला है मुझे भी अनुज काफी अचे से मालिश कर रहा है...

माँ- थोड़ी देर और करवा ले बिलकुल ठीक हो जाएगी...

मौसी- तुम भी करवाती रहो जीजी.. वैसे भी आजकल के बच्चो की सेवा बड़े नसीब वालो को मिलती है...

माँ- हाँ करवा hi रही हूँ सेवा.. देखते हैं कब तक सेवा मिलेगी...

Me-maa मैं तो तुम्हारी सेवा हमेशा hi करता रहूँगा... बिलकुल ऐसे hi...

ये कहकर मैंने माँ की पीठ से हाथ उठाकर माँ के दोनों गद्देदार और कोमल चूतड़ों को पकड़ लिए और उन्हें मसलने लगा...

माँ- ahmmmmmmmmmmm हैं..

Mausi-pahle सब बोलते हैं लल्ला एक बार बहु आ जाती है तो सब माँ बाप को भूल जाते हैं...

में- नहीं मौसी ऐसा हो hi नहीं सकता मैं माँ की हमेशा बिलकुल ऐसे hi सेवा करता रहूँगा चाहे बहु आ जाये या कोई भी...

मैं थोड़ा आगे खिसक गया और सीधा हुआ अपने पाजामे को नीचे खिसका कर पैरों से चुपचाप निकल दिया अब मैं नीचे से बिलकुल नंगा था माँ की तरह साथ hi मैंने अपनी टीशर्ट को भी ऊपर सीने पर लपेट लिए न जाने मैं ऐसा क्यों कर रहा था और पकडे जाने का इतना रिस्क भी था पर मुझे उतना hi उत्तेजक और कामुक महसूस हो रहा था जिससे मैं जो मन में आ रहा था करता जा रहा था फिर मैं माँ के चूतड़ों के ऊपर सात कर बैठ गया और अपने लुंड को माँ के दोनों चूतड़ों के बीच फंसा लिए और दोनों चूतड़ों को हाथों से दबा कर लुंड के लिए और गहरा रास्ता बना लिए और फिर धीरे धीरे लुंड को आगे पीछे करते हुए उनके चूतड़ों के बीच घिसने लगा...

माँ- लल्ला...

मौसी- बड़ा प्यार आ रहा है जीजी लल्ला पर... अभी से भरोसा मत करो पहले ब्याह हो जाने दो..

मौसी मज़ाक करते हुए बोली.. पर उन्हें क्या पता माँ मुझे प्यार से पुकार रही थी या वासना से या दोनों से..

माँ- नहीं मुझे बच्चो पर भरोसा है ये हमेशा हमारी सेवा करेंगे..

में- जैसे अभी कर रहा हूँ हैं न माँ?

और मैं थोड़ी गति और बढाकर माँ के चूतड़ों के बीच लुंड घिसने लगा...





मेरे लुंड के चूतड़ों पर घिसने से और मौसी और अनुज के बगल में होने के बावजूद भी ये सब करने से माँ भी गरम हो गयी थी पर साथ hi पकड़े जाने से दर भी रही थी.. इसलिए साथ भी नहीं दे रही थी खुलकर...

माँ- हाँ बीटा ऐसे hi करते रहना हमेशा...

माँ अपनी सांसो को काबू में रखते हुए बोल रही थी...

मौसी- मैं जानती हूँ जीजी... हमारे दोनों बच्चे hi हीरे हैं... अनुज बीटा थक गया क्या?

Anuj-nahi मौसी बिलकुल भी नहीं..

मौसी- ाचा वो एक हाथ से कर रहा था न इसलिए मुझे लगा...

मैंने चुपचाप से फ़ोन उठाकर स्क्रीन लाइट ों करके अनुज और मौसी की तरफ डाली और ध्यान से देखा तो हैरानी वाली बात थी भी और नहीं भी...

अनुज का एक हाथ मौसी की नंगी पीठ पर था और दुसरे हाथ में खुद का लुंड था जिसे हिला रहा था आँखें बंद थी और चेहरा ऊपर की तरफ था...

हैरानी वाली बात इसलिए थी की अनुज ने इतनी हिम्मत कर्ली की हम सब के होते हुए मौसी के ऊपर बैठकर अपना लुंड बहार निकल कर हिला रहा था..

और हैरानी की बात इसलिए नहीं थी की अगर उनके ज़रा सा बगल में देखा जाये तो मैं और माँ तो उनसे कहीं आगे निकल गए थे और वो बेचारा भी मौसी के मखमली गदराये बदन के आगे कब तक खुद पर काबू रख पाटा?...

मैंने फ़ोन बापिस रख दिया और फिर माँ पर ध्यान दिया...

में- दोनों हाथ से कर अनुज जैसे मैं माँ की कर रहा हूँ..

Anuj-haan भैया करता हूँ वो खुजली हो रही थी पेअर में इसलिए खुजा रहा था...

Mausi-koi नई खुजा ले तू आराम से बीटा...

मौसी को क्या पता वो कौनसी खुजली मिटा रहा था...

वैसे अनुज के इस बहादुरी भरे कारनामे ने मुझे भी और जोश से भर दिया और मैं और भी ज़्यादा उत्साहित हो gaya...sath hi गरम भी वहीं मेरा लुंड भी अब ऐसा लग रहा था कभी भी फैट जायेगा...

तो मैंने अब माँ के चूतड़ों को फैलाया और लुंड को पूरी तरह ऊपर नीचे घिसने की वजाये अपने लुंड के टोपे को दरार में ऊपर नीचे घूमने लगा... ऐसे बिना देखे अँधेरे में लुंड से चुकार महसूस करने में अलग hi मज़ा आ रहा था.. लुंड को गांड के छेड़ से घिसते हुए माँ की छूट की तरफ लाया तो पता चला का कितनी गरम हो गयी और उनकी छूट कितनी गीली .

मेरे लुंड के टोपे के छूट पर टच होते hi...maa के मुँह से सिसकारी निकल गयी...

Maa-ahhhhhh कर्मआहहह...

Mausi-kya हुआ जीजी?

माँ- अह्ह्ह हननननननन वो ये कर्मा अचे से कर रहा है न तो इसलिए मज़ा आ रहा है...

Me-aise hi और अचे से करूँ माँ?

मौसी- हाँ बीटा कर न और मज़ा दे अपनी माँ ko...anuj तू भी और अचे से कर कर्मा की तरह..

अनुज- ग मौसी...

मैं मौसी की बात को कैसे टालता तो मैंने माँ के दोनों हाथ पकड़कर नीचे लाया और दोनों चूतड़ों पर रख दिए और उन्हें चूतड़ों को फैलाने का इशारा किआ...

माँ हे वैसे hi किआ और अपने दोनों चूतड़ों को फैला लिए... मैंने लुंड के टोपे को ऊपर से नीचे नीचे से ऊपर, गांड से छूट और छूट से गांड तक... तक फिरा रहा था और फिर मैं अचानक से एक जगह रुका जहाँ मुझे थोड़ा लुंड के आस पास गीला सा महसूस हुआ... मुझसे फिर और खुद को रोका नहीं गया और मैंने धीरे से धक्का लगा कर कमर को आगे बढ़ा दिया... और मेरे लुंड का टोपा माँ की छूट के गीले होंठो के बीच में घुस गया...





और मुझे तो जैसे सुकून मिल गया पूरे दिन की बौखलाहट, गर्मी, सब मेरा लुंड के माँ की छूट में घुसते hi गायब हो गए...

माँ- ुहम्म्म्म्माआआअह्ह्ह्ह कर्माआआआ...

Mausi-jeeji को तो बहुत मज़ा आ रहा है...

मौसी की इस बात का जवाब न माँ ने दिया न मैंने..

हम दोनों अपनी अलग hi वासना की कामुकता की नदी में डूबे हुए थे... मेरा लुंड मेरी माँ की छूट में था जबकि बगल में hi मेरी मौसी और मेरा भाई थे...

इस के बारे में सोचकर hi मेरा लुंड माँ की छूट में ठुमके मार रहा था... और उधर माँ की गरम छूट मेरे लुंड को अपने रास से गीला कर रही थी... कुछ देर मैं और माँ ऐसे hi रुके रहे.. इस पाप का जो एक माँ बेटे को बिलकुल नहीं करना चाहिए उसे करने का आनंद उठा रहे थे...

मैं अपने लुंड पर माँ की छूट की गर्मी को महसूस कर रहा था तो माँ मेरे लुंड की सख्ती का...

कुछ पल बाद जब थोड़ा शांत हुए तो मैंने धीरे धीरे से माँ की छूट में धक्के लगाने शुरू किये...

मैं अपनी माँ को छोड़ रहा था मेरी मौसी और मेरे भाई के बगल में... माँ अपने सेज बेटे से चुद रही थी वो भी परिवार के सदस्यों के साथ में होते हुए भी...

में- माँ कैसा लग रहा है अब?

माँ- अह्हह्ह्ह्ह बेटा ऐसे हीईई करता रह...

मौसी- वाह जीजी मुझे लगता है मुझसे ज़्यादा तो मालिश की ज़रुरत तुम्हे थी...

में- हाँ मौसी माँ को मेरी सेवा की बहुत ज़रुरत थी...

मैं माँ की छूट में धीमे मगर लम्बे धक्के लगते हुए बोलै

Anuj-aur मौसी को मेरी...

Maa-mujhe तो ऐसी सेवा की हमेशा hi ज़रुरत रहेगी बीटा...

मौसी- तो हैं तो बच्चे जीजी तुम्हारी सेवा करने के लिए करने के लिए खूब karwao...waise समय कितनी जल्दी बीतता है जीजी... मनो कल की hi बात लगती है जब कर्मा पैदा हुआ था.. और आज देखो कितना बड़ा हो गया है...

माँ- ओह्ह्ह हाँ ुहम्म याद है मुझे तब तू भी यहीं थी ना..

मौसी- हाँ कितनी ख़ुशी हुई थी न सबको जब पता चला था की तुम्हारी कोख में बच्चा है...

माँ- मुझे तो लगता है ये अभी भी मेरी कोख में hi हैई...

माँ ने मेरे लुंड के झटके को अपनी कोख तक महसूस करते हुए कहा...

Mausi-kya बोल रही हो जीजी अब कोख में कैसे हो सकता है दस्खती नहीं कितना बड़ा हो गया है...

माँ- हाँ. बड़ाआ बड़ा तो बहुत हो गया है... पारर बच्चा जितना बड़ा भी हो जाये माँ के लिए उतना hi बड़ा रहता है जितना पहलु बार उसकी कोख में था...

मैं माँ और मौसी की बातों से उत्तेजित होकर माँ को और तेज़ी से छोड़ने लगा...

मौसी- सही कहा जीजी हुए बच्चे अचे निकल जाएं तो माँ की 9 महीने की तपस्या समझ को सफल हो गयी...

माँ- मेरी तो सफल हो गयी शालू.. पर ाव भी मन करता है अपने लल्ला को अपने अंदर समां कर रखूं...

मौसी- तेरी मालिश में तो जादू है रे कर्मा तेरी माँ को कितना प्यार आ रहा है तुझपर.. एक मालिश के बाद hi..

में- मेरी मालिश है hi ऐसी मौसी अगली बार तुम्हारी करूँगा.

मौसी- वैसर अनुज भी बहुत अचे से कर रहा है...

अनुज- हैं न मौसी तुम्हे ाचा लग रहा है...

मौसी- हां बीटा बहुत अच्छा..

Me-maa तुम्हे कैसा लग रहा है...

माँ- बहुत अच्छा बीटा ऐसे hi करता जा..

Me-to ठीक है माँ अब थोड़ी तेज़ी से करूँगा जिससे तुम्हारा कमर का दर्द बिलकुल भाग जायेगा..

माँ- कर बीटा जल्दीए कर..

और फिर मैंने माँ की कमर को थाम लिए और फिर तेज़ी से धक्के लगाने लगा.... और माँ को छोड़ने लगा...





Mausi-thoda आराम से बीटा कर्मा पूरा बीएड हिल रहा है...

Me-theek है मौसी थोड़ा धीरे करता हूँ...

और मैंने अपनी गति काम कर्ली..

माँ तो बस आह आह की सिसकारियां निकल रही थी...

और बेटे से छोड़ने के मज़े ले रही थी

मैंने सेफ रहने के लिए एक बार और फ़ोन उठा कर देखा और स्क्रीन लाइट फिर से अनुज और मौसी पर डाली तो देखा अनुज की आँखें बंद थी एक हाथ मौसी की पीठ पर था तो दूसरा अपने लुंड पर तेज़ी से चल रहा था और उसके हाव भाव देखकर लग रहा था वो झड़ने वाला है और हुआ भी वैसा hi.. अगले hi पल उसके लुंड से रास की पिचकारी निकलने लगी जो मौसी की नंगी पीठ पर गिरी और इसके बाद एक और एक और मौसी की पीठ पर गिर रही थी रास की धार...

पर मुझे लगा अब अनुज की आँखें खुल सकती हैं तो मैंने फ़ोन बापिस बंद कर लिए... और अपना ध्यान माँ की छूट में लगा लिए और आगे झुक कर माँ के ऊपर लेट गया और उनके काँधे को चूमते हुए उन्हें छोड़ने लगा ..

कुछ पल बाद मौसु बोली- अरे अभी तेल बचा था अनुज मुझे लगा ख़तम हो गया और अब भी गरम है...

अनुज- थोड़ा हांफते हुए bola-bas इतना hi बचा था मौसी...

मौसी- चल इसे और लगदे फिर तुम दोनों भी जाओ सोने... क्यों दीदी तुम्हारी मालिश भी हो गयी न..

माँ- अह्ह्ह्हह हैं क्या?

मौसी- क्या हुआ सो गयी थी क्या?

Maa-haan थोड़ी आँख लग गयी थी..

मैंने मन में सोचा की आँख नहीं माँ की आँख लग गयी थी मेरे लुंड पर

मौसी- मैं बोल रही अब बच्चो को जाने देते हैं सोने बाहर देर से म्हणत कर रहे हैं बेचारे..

माँ- हाँ हाँ जैसा सही लगे...

अब न मैं चाहता था न hi माँ चाहती थी अलग होना पर मौसी कुछ और hi चाहती थी ऊपर से मुझे टेंसन हो गयी की अभी भी मैं झाड़ा नहीं था कहीं पूरे दिन की तरह कलपद तो नहीं हो जायेगा...

अनुज- कोई नई मौसी हम ठीक हैं...

Mausi-theek है बीटा पर रात बहुत हो गयी है ाव तुम लोग भी सो जाओ जाकर..

Anuj-theek है मौसी जैसा तुम कहो..

Mausi-karma तू भी जा सो जा जीजी को भी नींद लग रही है बार बार..

Me-jee मौसी बस हो गया..

मुझे लगा कुछ जल्दी सोचना पड़ेगा नहीं तो गड़बड़ हो जाएगी..

इसके बाद क्या हुआ अगली अपडेट ने जानिये आपको क्या लगता है कर्मा के साथ एक बार फिर कलपद होगा या कुछ न कुछ जुगाड़ से बच जायेगा...

प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट बहुत बहुत शुक्रिया
 
सुग्गेस्टियन्स और फीडबैक के लिए सब का शुक्रिया... एंड यस आपके मन में जो भी विचार या सुग्गेस्टियन्स आएं आप ज़रूर रखें और फीडबैक तो ज़रूर दें.. बाकि स्टोरी के अकॉर्डिंग जो भी सही होगा मैं उसे ज़रूर उसे करूंगा... और बाकि जल्दी से जल्दी अपडेट देने की कोशिश कर रहा हूँ...
 
अनुज- कोई नई मौसी हम ठीक हैं...

Mausi-theek है बीटा पर रात बहुत हो गयी है ाव तुम लोग भी सो जाओ जाकर..

Anuj-theek है मौसी जैसा तुम कहो..

Mausi-karma तू भी जा सो जा जीजी को भी नींद लग रही है बार बार..

Me-jee मौसी बस हो गया..

मुझे लगा कुछ जल्दी सोचना पड़ेगा नहीं तो गड़बड़ हो जाएगी..

अपडेट 95

कुछ सोच कर्मा अनुज उठेगा तो कुछ न कुछ ज़रूर देख लेगा... मैंने तभी कुछ सोचा और माँ की छूट से लुंड न चाहते हुए भी निकला और माँ के ऊपर चादर डालकर उन्हें धक् दिया...

लुंड को छूट से निकलने पर माँ थोड़ा कुलबुलाई पर क्या कर सकते थे मैं सीधा हुआ

और उठ खड़ा हुआ और बोलै- ठीक है अनुज चल मैं भी सुसु करके आता हूँ..

मौसी- हाँ बीटा चलो अब जाओ दोनों सो जाओ..

माँ वैसे hi आँखें बंद किये लेती रही बिना कुछ बोले

मैं बिना लाइट जलाये दीवार को पकड़ते हुए माँ के कमरे के बाथरूम में घुस gaya...ab इससे ये हो गया की अनुज को माँ और मैं नंगे नहीं दिखते... बाथरूम का दरवाज़ा थोड़ा सा खोलकर मैं सुनता रहा तभी बीएड से अनुज के उठने की आवाज़ आई फिर अचानक से कमरे में रौशनी हुई जो के अनुज के फ़ोन की थी... अनुज ने बीएड पर काफी अचे से रौशनी रखकर माँ और मौसी को देखा मौसी अब भी वैसे hi नंगी पीठ लिए पेट के बल लेती थी.... उनका पेटीकोट उनकी चूतड़ों के बीच फंसा हुआ था... दोनों बड़े बड़े चूतड़ बहुत कामुक लग रहे थे वहीं माँ के ऊपर चद्दर पड़ी थी तो उनके कंधो से नीचे का कुछ नहीं दिख रहा था... और फिर लाइट बीएड से हटी और दरवाज़े की तरफ गयी... और फिर धीरे धीरे कदमो की आवाज़ के साथ अनुज गेट के बहार चला गया... और एक बार फिर कमरे में अँधेरा हो गया..

मैं धीरे से बाथरूम से बहार निकला और फिर बीएड के पास टटोलते हुए पहुंचा बीएड पर हाथ फिरकर अपना फ़ोन लिए स्क्रीन ों करके अपने कपडे उठाये बीएड के पास से... और फिर ऐसा नंगा hi अपने कमरे में आ गया...

एक बार फिर मेरा लुंड खड़ा रह गया tha...sala आज का दिन hi ख़राब है... खैर बीएड पर लेट गया और सोने की कोशिश करने लगा..

पर लुंड खड़ा का खड़ा था नींद नहीं आ रही थी करवट बदल बदल कर कोशिश कर रहा था... पर ये लुंड साला बैठने के नाम hi नहीं ले रहा था.. छूट और गांड की ऐसी लत जो लग गयी थी इसे..

इधर उधर दिमाग दौड़ता रहा... आज अंजलि के यहाँ जो हुआ वो सोचा.. काफी ाचा सा लगा उसके बारे में सोचकर... पर काफी देर बाद भी नींद नहीं आई...

फिर अंत में हारकर मैं खड़ा हुआ अपना पजामा और टीशर्ट पहना और फ़ोन लेकर अपने कमरे से निकल गया... अनुज के कमरे में फ़ोन की स्क्रीन जलाकर झांककर देखा तो सो रहा tha..phir दबे पाऊँ माँ के कमरे की तरफ बढ़ गया...

दरवाज़े के पास जाकर फ़ोन की स्क्रीन से कमरे के अंदर देखा तो ज़्यादा अचे से तो नहीं दिखा पर अंदाज़ा हो गया... माँ जैसी मैं छोड़कर गया था वैसे hi पेट के बल लेती हुई सो रही थी चद्दर अब भी उनके ऊपर थी..

वहीं मौसी माँ से दूसरी तरफ एक और करवट लेकर सो रही थी पर एक बात थी की मौसी का ब्लाउज और ब्रा पीछे से अब भी खुली हुई थी...

उनको देखकर मेरा लुंड और झटके खाने लगा... खैर मैं धीरे धीरे कमरे के अंदर आया और बहुत सावधानी से बीएड के एक किनारे पहुँच गया... जिधर माँ सो रही थी...

मैंने फिर माँ के ऊपर पड़ी चादर को पकड़ कर हटा दिया और फ़ोन की रौशनी माँ के बदन पर डाली... माँ पूरी नंगी थी जैसा छोड़कर गया था... मेरा लुंड पजामा फाड़कर बहार आने की कोशिश करने लगा मैंने भी उसका साथ दिया और पाजामे को पूरी तरह उतर दिया...

वासना के नशे में मैं इतना डूब चूका था की ये भी नहीं सोच रहा था की अगर मौसी मुझे और माँ को इस हालत में देख लें तो क्या होगा...

पर खड़ा लुंड ये कहाँ सोचता है.. मैंने माँ के चेहरे पर रौशनी की सोती हुई बेहद प्यारी लग रही thi...man किआ की उन्हें ऐसे hi देखता रहूं पर लुंड नाराज़ हो गया की सिर्फ देखना नहीं हैं..

मैंने लुंड को पकड़ा और थोड़ा झुककर टोपे को माँ के होंठों पर रख दिया...

हालाँकि माँ सो रही थी और उनके होंठ भी बंद थे पर फिर भी माँ के होंठों के लुंड से टकराने भर से पूरे शरीर में करंट दौड़ गया...

मैं लुंड को माँ के होठों पर घूमने लगा साथ hi दुसरे हाथ से उनके चूतड़ों के ऊपर हाथ फिरने लगा...

पर मेरा जोश बढ़ता जा रहा था तो मैं लुंड को माँ के मुँह में डालने की कोशिश कर रहा था पर माँ के मुँह के बंद होने से मुमकिन नहीं हो प् रहा था...

खैर मैं कोशिश करता रहा और फिर धीरे धीरे मैं माँ के मुँह को उँगलियों से और लुंड से थोड़ा खोलने लगा.. थोड़ी देर की म्हणत के बाद मैं थोड़ा कामयाब भी हो गया और माँ का मुँह खुल गया था पता नहीं माँ जग रही थी या नींद में थी... पर मुझे मज़ा आने लगा मैंने माँ के सर को पकड़ा और अब अचे से लुंड माँ के होंठों से अंदर बहार करने लगा...





आह्हः क्या सुकून मिल रहा था माँ के मुँह में लुंड को. और सुकून के आगे मैं सब भूल गया था की माँ सो रही है या जाग रही है, पास में hi मौसी भी सो रही हैं... अभी मेरा ध्यान सिर्फ अपने लुंड और माँ के मुँह पर था जिसे मैं छोड़ रहा था...

माँ के मुँह को मैं बिलकुल छूट की तरह इस्तेमाल कर रहा था...

मैं इस समय इतना मतलबी हो चूका था सिर्फ अपने सुकून और वासना को पूरा कर रहा था....

माँ के मुँह को छोड़ने में मुझे इतना ाचा लग रहा था जिसे बताना मुश्किल था पर इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की कुछ पल बाद hi मुझे लगने लगा की मैं झड़ने वाला हूँ... जिसके लिए मैं सुबह से परेशां था वो सुकून मुझे माँ के गरम मुँह में मिलने वाला था... मेरी आँखें बंद हो गयी और चेहरा ऊपर उठ गया...

कुछ 4-5 झटके hi हुए थे की मेरे लुंड ने माँ के मुँह में अपनी धार छोड़नी शुरू कर दी... कुछ धार के बाद hi मुझे माँ का मुँह भरता हुआ महसूस हुआ तो मैंने लुंड उनके मुँह से निकल लिए और लुंड की पिचकारियां उनके चेह्रर पर मरने लगा और कुछ hi पालो में माँ का चेहरा मेरे रास से भीग गया था पर फिर भी मेरा लुंड पिचकारियां छोड़ रहा था और माँ के चेहरे को भीगा रहा था...





कुछ पल बाद मेरा झड़ना ख़त्म हुआ तो मैंने फ़ोन जलाकर माँ के चेहरे की तरफ किआ और जो देखा हैरान रह गया...

माँ का पूरा चेहरा मेरे रास से भीगा हुआ था और उनके चेहरे से रास बाह रहा था दूसरी तरफ हैरानी की बात ये थी की माँ की आँखें खुली हुई थी और माँ मुझे देखने की कोशिश कर रही थी...

मुझे पता hi नहीं चला की माँ जगी हुई थी और कबसे ये भी नहीं... कही गुस्सा न हो जाएं मैं ये hi सोच रहा था क्यूंकि भावनाओ में बहकर मैंने कुछ ज़्यादा hi रिस्क ले लिए था... माँ पालक झपका झपका कर देखने की कोशिश कर रही थी जितना भी अँधेरे में देख सकती थी...

फिर माँ उठ कर बैठ गयी और फिर मेरे हाथ से फ़ोन अपने हाथ में लिए फिर एक बार मेरव चेहरे की तरफ रौशनी की और फिर मेरे लुंड पर रौशनी की जो झड़ने के बाद भी वैसे hi खड़ा था जैसे कुछ हुआ hi न हो...

माँ मेरे फ़ोन की रौशनी से नंगी hi उठकर बाथरूम में चली गयी मैं वहीं शांति से बैठकर लुंड सहला रहा था... कुछ दिख नहीं रहा था पर ये ज़रूर लग रहा था की मौसी सो रही है...

कुछ देर बाद माँ मेरा फ़ोन लेकर बाथरूम से आई और मेरे पास आकर मुझे फ़ोन दिया मैंने फ़ोन लेकर रौशनी माँ की तरफ की तो देखा माँ ने चेहरा साफ़ कर लिए था... फिर मौझे इशारे से जाकर सो जाने को बोल रही thi...par मैंने माँ को पकड़ कर खुद से चिपका लिया और उनके होंठों को चूसने लगा.... माँ ने थोड़ी ना नुकुर की पर साथ भी देने लगी.. ऐसे hi करीब 2-4 मिनट तक हम एक दुसरे के होंठों और जीभ से खेलते रहे...

माँ ने फिर मुझे धक्का देकर अलग किया पर मैंने फिर पीछे से माँ को पकड़ लिए और उनसे चिपक गया, मेरा लुंड उनके चूतड़ों के बीच घुस गया

माँ और मैं कुछ बोल नहीं सकते थे क्यूंकि मौसी के जागने का दर था..

माँ इशारे से लगातार मुझे जाने को बोल रही थी... पर जिसकी बाँहों में माँ जैसी गदराई घोड़ी हो वो इतनी आसानी से कैसे जा सकता है...

मैं माँ के बदन को मसलने लगा मेरा लुंड माँ के चूतड़ों की गर्मी से और कड़क हो गया... मैंने माँ की पीठ को चूमते हुए उन्हें थोड़ा आगे की और झुकाया और फिर नीचे हाथ लेजाकर मेरे प्यासे कड़क लुंड को माँ की रसीली छूट के कोमल होंठों से मिला दिया...

इसके बाद जैसे लुंड में अपनी खुद की जान आ गयी और मेरी कमर अपने आप आगे हो गयी और मेरा लुंड मेरी माँ की छूट में सरक गया...

मेरा और माँ दोनों का मुँह कुछ पल के लिए खुला रह गया इस परमानन्द की प्राप्ति से.. कुछ पल बाद माँ ने हाथ ऊपर लेकर मेरे गाल पर एक हलकी सी चपत मरी शायद मौसी की वजह से वो दर रही थी पर मेरे लुंड का दर्द मौसी के दर से कहीं ज़्यादा था तो मैंने एक हाथ से माँ की गर्दन को पकड़ा और दुसरे हाथ से उनकी कमर और फिर धीरे धीरे से कमर हिलाकर लुंड को उनकी छूट में अंदर बहार करने लगा...





मैं माँ को उनके कमरे में उनकी बहन के होते हुए नंगा करके छोड़ रहा था... मेरा लुंड मेरी सगी माँ की छूट में अपनी प्यास बुझा रहा था...

मेरे हर धक्के पर माँ के गदराये चूतड़ हिल रहे थे...

आज पहली बार ऐसे अँधेरे में मैं और माँ चुपके चुदाई कर रहे थे, न एक दुसरे को देख प् रहे थे और न hi कुछ बोल सकते थे बस एक दुसरे के जिस्म को महसूस करके अपनी वासना को शांत कर रहे थस...

माँ अपनी रसीली गरम छूट में अपने बेटे का यानि मेरा कड़क लुंड अंदर बहार होता हुआ महसूस कर रही थी वहीं मैं अपने लुंड पर माँ की गरम छूट की पकड़ और गर्मी महसूस करके पागल हुआ है रहा था... हम बिलकुल भी आवाज़ न करने की कोशिश कर रहे थे... पर फिर भी थोड़ी थप थप की आवाज मेरी जांघों और माँ के चूतड़ों के टकराने से आ रही थी...

अब मैं और मेरा लुंड पूरा चुदाई के मूड में थे... वैसे कब नहीं रहते थे...

मैंने माँ की गर्दन और कमर से हाथ हटाए और दोनों हाथों को माँ की बड़ी बड़ी छूछीयों पर रख लिया... और फिर उन्हें खुद से चिपका लिए और छूछीयो को मसलते हुए माँ को छोड़ने लगा...





माँ भी अब सब भूल कर मेरा साथ दे रही थी और मेरी जांघों और चूतड़ों पर हाथ फिरते हुए.. मुझे और उकसा रही थी छोड़ने के लिए...

मुझे माँ की छूट में सुकून मिल रहा था... ऐसा सुकून जो लुंड को सिर्फ एक माँ की छूट hi दे सकती है... माँ को छोड़ते हुए ऐसा लगता था जैसे लुंड बापिस अपने घर में आ गया हो... माँ की छुछियां और छूट दोनों को hi मैं भोग रहा था और दोनों से hi बड़ा गहरा नाता था मेरा...

इन्ही नरम नरम बड़ी छूछीयों से बचपन में दूध पीकर मैं बड़ा हुआ था और आज इतना बड़ा हो गया की... बरसों पहले जिस छूट से निकला था आज उसी छूट में बापिस समाया हुआ था... उसी छूट में अंदर तक मेरा लुंड चोट मार रहा था और कोख में बापिस जाने की पूरी कोशिश कर रहा था....

यही सब सोच सोचकर मेरी उत्तेजना बढाती जा रही थी और मैं और आक्रामक होता जा रहा था...

मैंने माँ की छूछीयो से हाथ हटाया और उन्हें थोड़ा आगे की तरफ झुका दिया साथ hi उनके दोनों हाथों को पकड़ लिए और लम्बे लम्बे धक्के लगाकर माँ को छोड़ने लगा मेरा लुंड जड़ तक माँ की छूट में समता और फिर बहार आता...





माँ पूरी कोशिश कर रही थी की उनके मुँह से सिसकी न निकले, माँ के चूतड़ हर धक्के के साथ ऐसे लहार रहे थे जैसे उनमे सुनामी आ गया हो... मेरा भी हर धक्के के साथ जोश और बढ़ता जा रहा था, हमारी चुदाई की ठप्प्प ठप्प की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी जिसे सुनकर मौसी कभी भी जाग सकती थी...

मेरे दिमाग में यही चल रहा था की मौसी अभी जाग गयी और उन्होंने हमें इस हालत में देख लिए तो...

कैसे उनकी सगी बहन अपने खुद के बेटे से पूरी नंगी होकर चुदाई करवा रही है... अपनी छूट से निकले बेटे का लुंड बापिस अपनी छूट में ले रही थी...

क्या क्या सोचेंगी मौसी मेरे और माँ के बारे में... ये hi सब सोचते हुए मेरा जोश और बढ़ता जा रहा tha...wohin माँ की छूट भी अब ज़्यादा hi मेरे लुंड पर कास रही थी... साथ hi रास भी छोड़ रही थी..

जिससे मेरा लुंड और कड़क हो गया... और लुंड का टोपा भी फूल गया... तभी अचानक माँ का शरीर अकड़ने लगा और माँ पीछे हो कर मुझसे चिपक गयी मैंने भी उनका पेट और सीना पकड़ कर उन्हें संभाला... अगले hi पल माँ का शरीर कंपनी लगा और फिर मेरे लुंड पर माँ की छूट कास गयी और फिर मुझे लुंड पर रास बहता हुआ महसूस हुआ और इसे ने मुझे भी शिखर पर पहुंचा दिया...

मैंने माँ को खुद से चिपका लिए और फिर दो टीम झटके माँ की कोख में लम्बे लम्बे धक्के मरे और फिर लुंड को जड़ तक माँ की छूट में गाड़ दिया और फिर मेरे लुंड से रास की धार निकलने लगी जो माँ की छूट को भरने लगी.... धार के बाद धार मेरे लुंड से गिर रही थी और माँ की गरम छूट को ठंडा कर रही thi...maa मेरी बाहों में मुझसे चिपकी हुई बिलकुल शांत थी उनकी पीठ मेरे पेट से चिपकी हुई थी... मेरा लुंड अब भी रास की धार माँ की छूट में गिराए जा रहा था... और तब तक मैंने लुंड को माँ की छूट में घुसाए रखा जब तक लुंड की एक एक बूँद माँ की रसीली छूट में न निचुड़ गयी हो...

तब तक माँ भी थोड़ी शांत हो चुकी थी और जब मेरा झड़ना बंद हुआ तो माँ आगे हो गयी और लुंड उनकी छूट से निकल गया... लुंड निकलते hi मेरा और माँ का रास मिलकर उनकी छूट से बहकर उनकी जांघों पर बहाने लगा...... माँ ने मुड़कर मुझे होंठों पर चूमा और फिर धक्का देते हुए गेट से बहार निकल दिया खैर हो सुकून मैं ढूंढ रहा था वो माँ की छूट में और मुँह में झड़ने के बाद मिला था. वहीं माँ भी बीएड पर लेट गई और अपने ऊपर चद्दर दाल लिए हालाँकि माँ ने कपडे अभी भी नहीं पहने आउट ऐसे hi सोने लगी...

इधर मैं भी खुश होकर अपने कमरे में आया... और बीएड पर गिर गया मगरमच्छ की तरह और कब सो गया मुझे पता hi नहीं चला...

इसके आगे क्या हुआ अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट...

दोस्तों बिजी होने के कारन थोड़ा लेट हुआ अपडेट देने में आगे भी आप इसी तरह प्यार बनाएं रखें ... मैं जल्दी से अपडेट देता हूँ अगला
 
इधर मैं भी खुश होकर अपने कमरे में आया... और बीएड पर गिर गया मगरमच्छ की तरह और कब सो गया मुझे पता hi नहीं चला...

अपडेट 96

रात को माँ की चुदाई करने के बाद बड़ी अछि नींद आई, सुबह आँख खुली तो देखा मौसी मेरे कंधे हिला हिला कर मुझे जगा रही थी..

मौसी- उठ कर्मा बीटा 8 बजने को हैं ले चाय पि ले...

मौसी मुझे उठाने की कोशिश कर रही थी.. आँख खुलते hi मेरी नज़र उनके प्यारे से चेहरे पर पड़ी उनको देखते hi मुझे रात का दृश्य याद आ गया उनकी नंगी चिकनी पीठ.

में- ुहममम क्या हुआ मौसी..

Mausi-hua क्या बीटा उठ अब 8 बज गए हैं... उठ कर चाय पि ले मेरा राजा बीटा...

मौसी मेरे बीएड पर बैठकर झुककर मेरे चेहरे पर हाथ फिरने लगी...

झुकने की वजह से मौसी का पल्लू उनके सीने से नीचु सरक हाय... और मेरी आँखों के सामने उनकी ब्लाउज बहार झांकती छुछियां और गोरा नंगा चिकना पेट आ गया.. जिसे देखते





जिससे मौसी को. तो कोई ज़्यादा फ़र्क़ नहीं पड़ा और उन्होंने बापिस पल्लू उठाकर सही कर लिए पर उनका ऐसा नज़ारा देखकर मेरा लुंड ठुमके मरने लगा..

लुंड??? एक मिनट लुंड से याद आया की रात को तो मैं नंगा hi सो गया था तो मैंने जल्दी से थोड़ा सीधा हुआ और देखा की मेरे ऊपर सीने तक मैंने एक चादर ओढ़ राखी है जिससे नीचे का हिस्सा छुपा हुआ था और मेरे घुटने मुड़े होने की वजह से लुंड का उभर भी नहीं दिख रहा था...

मेरी जान में जान आई...

मौसी- ले अब चाय पि ले.. ये कहकर मौसी ने चाय उठाकर मुझे दी...

और मैं चाय पीने लगा उधर मौसी ने मेरे सर पर एक दो बार और प्यार से हाथ फेरा और फिर मुझे उठकर आने को नाश्ते के लिए बोलकर चली गयी जाते हुए उनकी बड़ी गांड देखकर मेरा मन फिर से डोलने लगा और मैंने लुंड को सहला दिया...

चाय ख़तम करने के बाद में बाथरूम में घुसा... हुग्ना वगेरा kia...brush वगेरा करके बहार आया.. आँगन में अनुज बैठा खा रहा था... मौसी भी वहीं बैठी thi...maa वहीं ज़मीन पर बैठी बैठी सब्ज़ियां छील रही थी... मैं भी वहीं जाकर बैठ गया खाट पर...

माँ- आ गया तू.. शालू इसका नाश्ता दे दे लाके...

मौसी- अभी लाइ जीजी..

मौसी उठकर रसोई की तरफ चली गयी

में- माँ पापा से बात हुई क्या कब तक आएंगे वो लोग...

माँ- नहीं बीटा अभी तो नहीं हुई रात को hi हुई थी....

में- ाचा कोई नई अभी कर लेना..

तभी सब्ज़ी काटते काटते माँ का पल्लू भी उनके सीने से सरक गया... और सामने आ गया एक बेहद कामुक और हसीं नज़ारा.. मैंने सोचा ये दोनों बहनें लगता है मेरे लुंड की जान लेकर hi छोड़ेंगी...

माँ के पल्लू गिरने से उनके ब्लाउज मैं बहार नंगी छुछियां उनका गदराया पेट... जिसमें पड़ी सिलवटें सब नंगे होकर आँखों के सामने आ गए...





माँ ने तो पल्लू ठीक करने की भी म्हणत नहीं की और उसे वहीं छोड़ दिया... रात को hi मैंने माँ को छोड़ा था पूरा नंगा करके पर अभी सिर्फ पल्लू के हटने से मेरा लुंड दोबारा तन गया माँ के लिए.. इतनी कामुक और गदराई थी माँ.. जिसे जितना छोड़लो वो इतनी hi और कामुक हो जाती thi...aisa लगता था की चुदाई उनकी खूबसूरती और कामुकता दोनों को बढ़ा देती थी ..

खैर मैं उस नज़ारे के दर्शन करते हुए अपने लुंड को संभाले उनसे बातें कर रहा था...

लेकिन सिर्फ मैं hi नहीं था जो इस कामुक और हसीं नज़ारे का लुत्फ़ उठा रहा था... मेरे बगल में बैठे अनुज की आँखें तो जैसे माँ के सीने और नंगे पेट पर जैम hi गयी थी... वो अपना खाना पीने भूल गया था और सिर्फ माँ को घूरे जा रहा था... उसका एक हाथ प्लेट पर था तो दूसरा उसकी गॉड में पाजामे के ऊपर जो उसके तने हुए लुंड को हल्का हल्का सहला रहा था ... ाचा हुआ माँ का ध्यान मुझपर था नहीं तो वो देख भी सकती थी...

इतने में hi दरवाज़े पर दस्तक हुई...

माँ- अनुज देख ज़रा कौन है...

माँ की आवाज़ से वो थोड़ा होश में आया और न चाहते हुए भी दरवाज़ा खोलने गया उठकर...

उधर तब तक मौसी भी नाश्ता ले आई मेरे लिए... अनुज ने गेट खोल्दिया सामने पल्ली ममता चची और उनके साथ राजन चाचा भी थे वो लोग अंदर आ गए उन्हें देखकर... माँ जल्दी से कड़ी हुई और अपना पल्लू संभाला...





Maa-are अरे Mamta...Palli आओ... बैठो भैया...

म चची- जीजी हमने सुना शालू आई है तो मिलने आ गए...

माँ- बहुत ाचा किआ... तुम लोगो ने आओ आओ.. भैया बैठो..

ममता चची- कैसी है शालू...

पूछते हुए वो मौसी के गले लग गयी...

मौसी- मैं ठीक हूँ जीजी तुम बताओ...

ममता चची- चलो काम से काम तुझे देख तो लिए इतने दिन हो गए थे..

फिर मौसी पल्ली से मिली..

Mausi-are पल्ली बिटिया तो देखो कितनी बड़ी हो गयी है...

पल्ली ने मौसी के पेअर छुए...

पल्ली- नमस्ते मौसी..

मौसी- जग जग जिओ बीटा.. नमस्ते जीजाजी कैसे हो ?

राजन चाचा- हम बहुत अचे है. शालू तू बताओ बड़े दिनों बाद चक्कर लगा..

मौसी- हाँ जीजाजी क्या hi बातें समय या मौका hi नहीं मिलता...

इसके बाद माँ ने सबको बिठा दिया...

माँ- चलो मैं सबके लिए चाय नाश्ता लती हूँ सब आराम से बातें करो...

में- माँ मैंने खा लिए चलो मैं तुम्हारी मदद कर देता हूँ...

बाकि सब बातों में मगन थे तो उनका इतना ध्यान नहीं गया... अनुज और पल्ली का नैन मटक्का चल रहा था...

तो मैं और माँ रसोई में आये और मैंने अपने बर्तन रसोई में रखे माँ के पल्लू गिरने से मैं पहले hi गरम हो चूका था और फिर अभी माँ को रसोई में पास देखकर मेरा लुंड तन्ने लगा मैंने आंगन में देखा की कोई हमें देख सकता है की नहीं और फिर एक कोने की तरफ जाकर माँ को पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिए..

माँ फुसफुसाई- कर्मा पागल है क्या छोड़ सब बहार बैठे हैं...

में- माँ बस एक मिनट न बहुत मन कर रहा है...

Maa-nahi न रात को hi किआ था न और अभी कोई भी आ सकता है...

में- बस एक मिनट माँ?

माँ- क्या करेगा एक मिनट में..?

माँ ने इतना hi बोलै था की मैंने अपने होंठों को माँ के रसीले होंठों से जोड़ दिया और चूसने लगा... हालाँकि माँ मन कर रही थी पर जैसे hi मैंने चूसना शुरू किआ माँ भी पूरी तरह साथ देने लगी... मैं और माँ पूरी शिद्दत से एक दुसरे के होंठों को चूस रहे थे





मेरा लुंड पाजामे के अंदर से माँ के पेट से टकरा रहा था मेरे हाथ माँ के गदराये चूतड़ों पर पहुंच गए थे और तभी माँ मुझसे अलग हो गयी...

माँ- जा हो गया तेरा एक मिनट...

में- माँ तुम भी न..

माँ मुस्कुराते हुए बोली- हाँ मैं भी क्या?

में- बहुत प्यारी हो.. और गदराई हुई भी..

Maa-ab जायेगा या बेलन उठाऊं...

Me-acha ठीक है जा रहा हूँ हथियार उठाने की क्या ज़रुरत है..

मैं रसोई से निकल कर आंगन में बैठ गया सब की बातें चल रही थी... मौसी से सब कुछ न कुछ पूछ या बता रहे थे ख़ुशी का माहौल था... थोड़ी देर मैं बैठा फिर मैंने सोचाकी थोड़ा जग्गू की और घूम आता हूँ उससे मिल लूंगा... तो मैं घर से निकल लिया... और जग्गू के घर की और चल दिया... जैसे hi मैं जग्गू की गली में पंहुचा मुझे जग्गू के दरवाज़े से कल्लू निकलता हुआ दिखा...

मैंने मन में सोचा ये जग्गू के घर से फिर से कहीं इसने फिर से भाभी के साथ कुछ.... नहीं नहीं घर में सबके होते हुए ऐसा कुछ नहीं करेगा वो...

मैं तेज़ी से चलते हुए घर के अंदर घुस गया... देखा तो आंगन में कोई नहीं था...

मैंने जग्गू की आवाज़ लगाई.. एक दो मिनट बाद भाभी कमरे से निकल कर आई उनका चेहरा देखकर मेरी चिंता बढ़ गई... और मेरा मन सोचने लगा की हे भगवन कुछ गलत न हुआ हो..

भाभी की आँखों में आंसू थे.. हमेशा की तरह साड़ी में hi थी...

में- भाभी क्या हुआ सब ठीक तो है न... वो कल्लू अभी घर से निकला कहीं उसने कुछ...

भाभी रोये जा रही थी... बिलख बिलख कर..

में- भाभी क्या हुआ बताओ तो सही... और रो मत चुप हो जाओ..

मैं भाग कर गया और भाभी के लिए उनकी रसोई से पानी लेकर आया.. और उन्हें पानी पिलाया...

भाभी ने पानी पिया और फिर रोने लगी तो मैंने उनकी पीठ पर हाथ रख लिए और उन्हें सांत्वना देने लगा साथ hi उन्हें सहारा देते हुए उनके कमरे में ले गया और बिस्तर पर बिठा दिया...

भाभी मेरे सहारे की वजह से मुझसे टिक कर बैठी थी मेरा एक हाथ उनकी पीठ पर था और दूसरा उनके चेहरे कस आंसू पांच रहा था...

में- भाभी शांत हो जाओ और बताओ क्या हुआ...? कल्लू ने कुवह किआ?

भाभी ने ना में सर हिलाया..

में- फिर क्या हुआ बताओ तो सही...

भाभी बेचारी किसी तरह सुबकती हुई बोली

प भाभी- वो कल्लू कल्लू आया था अभी..

में- हाँ मैंने देखा उसे क्या किआ उस हराम के जाने ने एक बार बताओ तुम भाभी...

भाभी- मुम्ममय और पापाजी बहार गए हैं जग्गू भी साथ गया है राशन लेने तो उनके घर में न होने का फायदा उठा कर ये. घर में घुस गया...

मैं रसोई में थी तो अचानक से पीछे से आकर पकड़ लिए... मैं बहुत दर गयी इसने मेरा पल्लू भी नीचे गिरा दिया तुरंत और ब्लाउज के ऊपर से मेरी छातियां दबाने लगा...

और साथ hi बोल भी रहा था

कल्लू- कहाँ थी मेरी जान तीन दिन से तुझे फोर कर रहा हूँ उठती hi नहीं..

भाभी- मुझे छोड़ दो कोई आ गया तो बदनामी होगी मेरी...

Kallu-bhabhi जी पहले बताओ तो सही की फ़ोन क्यों नहीं उठाया मेरा..

Bhabhi-wo मेरी तबियत ख़राब थी और फ़ोन जग्गू के पास था...

कल्लू- देखो भाभी हमको चलाओ मत तुम.. इतने दोनों से देख रहे hain...par कोई नई आज तो मौका सही है आज कोईनहीं है मुझे रोकने वाला...

और फिर उसने मुझे धक्का देकर नीचे लिटा दिया और मेरे ऊपर आ गया मुझे चूमने की कोशिश करने लगा मैंने किसी तरह उसको धक्का दिया और अलग हुई...

मैंने भाग कर कमरे में जाने की कोशिश की तो उसने फिर से पीछे से पकड़ लिया तो मैंने छूटने के लिए उसे चांटा मार दिया जिससे वो गुस्से में आ गया और मेरे बालों को पकड़ लिए और गलियां देने लगा और बोलै- साली भें की लोदी मुझ पर हाथ उठती है... बहुत हो गया तेरा... तूने ये चांटा मार के बहुत वादी गलती की है... देख क्या हालत करता हूँ मैं तेरी..

ये सब बोलते हुए भाभी मेरे कंधे पर सर रखकर सुबकते हुए बोल रही थी... मैं अपने हाथ से उनकी पीठ सहला रहा था मुझे कल्लू पर बहुत गुस्सा आ रहा था...

में- फिर क्या हुआ भाभी...

भाभी- उसने उसने बोलै की- एक आखिरी मौका दे रहा हूँ तुझे कल सुबह 4 बजे उसके खेत के पास वाले तुबेल के कमरे में आ जा... बिना किसी चालाकी के... अगर नहीं आई तो समझ ले ये वीडियो गाओं के हर बन्दे के पास होगी साथ hi तेरे सास ससुर को भी दिखा दूंगा... फिर तुझे वो घर से निकल देंगे और फिर तुझे मैं रंडी बनाऊंगा अपनी... बहुत नाटक करती है न फिर देख तू की गाओं के कितने मर्द तुझ पर रोज़ चढ़ेंगे...

फिर उसने मेरे बालों को छोड़ दिया और जाने लगा पर गेट के पास जाकर पलट कर बोलै- कल सुबह 4 बजे नहीं आई तो देख तेरा क्या हाल होता है..

भाभी ये कहते हुए फूट फूट कर रोने लगी..

प भाभी- लल्ला मुझे बचा लो लल्ला... वो मुझे बर्बाद कर देगा...

में- भाभी चुप चुप हो जाओ मैं हूँ न मेरा भरोसा करो कुछ नहीं होगा...

मैंने भाभी को दोनों हाथो से बाहों में भर लिए वो मेरे सीने में सर छुपकर रो रही थी मैं उनकी पीठ पर हाथ फेरते हुए उन्हें समझा रहा था कुछ देर बाद मेरे समझने से भाभी ने रोना बंद किआ बस मेरे गले से लगी रही..

Bhabhi-mujhe दर लग रहा है लल्ला..

में- भाभी डरो मत मैं हूँ न तुम्हारे साथ... और आज के बाद कल्लू तुम्हे परेशां नहीं करेगा ये मेरा वादा है...

Bhabhi-sachhiiiiiii लल्ला..? क्या ऐसा हो सकता है...?

Me-bilkul होगा..

भाभी ये सुनकर मुझसे और लिपट गई जिससे हम दोनों hi बिस्तर पर पीछे की तरफ गिर गए... दोनों के पेअर बिस्तर के नीचे लटक रहे थे भाभी अभी भी लेती हुई मेरे सीने से लगी हुई थी...

प भाभी- लल्ला तुम्हारा ये एहसान मैं कैसे चुकाऊँगी..

में- भाभी अपनो पर एहसान नहीं करते और मैं भी तुमपर कोई एहसान नहीं कर रहा कभी भी मुझे जग्गू से रिश्ते ने काम मत समझना..

प भाभी- नहीं लल्ला कभी नहीं समझा तुम और जग्गू हमेशा बराबर रहे हो मेरे लिए वो थोड़ा झिझकता है तो उससे इतनी आसानी से हर बात नहीं कह पति जितना तुमसे कह लेती हूँ..

में- मैं जनता हूँ भाभी सबका स्वाभाव अलग होता है थोड़ा..

प भाभी- लल्ला पर कल्लू का करोगे क्या कुछ सोचा है...

में- एक चाय अंदर जाते hi प्लान बहार आ जायेगा भाभी...

मैंने मज़ाक करते हुए कहा पर भाभी तुरंत मुस्कुरा कर बोलने लगी- अभी बनती हूँ..

और ये कहकर जाने लगी... मैंने उन्हें रोकने के लिए हाथ आगे बढ़ाया और उनका हाथ पकड़ना चाहा उन्हें रोकने के लिए पर हाथ की जगह उनकी साड़ी का पल्लू हाथ में आ गया जिससे वो उनके सीने से हैट गया और भाभी का नंगा पेट और ब्लाउज उसमे कासी हुई छुछियां मेरे सामने आ गए...





हाय क्या माल थी प्रेमा भाभी.. इतना चिकना सपाट पेट उसके बीच में गोल गहरी नाभि ऊपर ब्लाउज में क़ैद दो मुलायम से पहाड़.. गोरा रंग... कल्लू क्या कोई भी भाभी को छोड़ना चाहता... और मेरी बात से लुंड पूरी तरह सहमत था...

भाभी पल्लू हटते hi थोड़ा झिझक के रुक गयी मैंने भी देखा की मेरे हाथ में पल्लू है तो मैंने छोड़ दिया जिसे भाभी ने शरमाते हुए बापिस सही किआ और फिर रसोई में चली गयी..

मैं बैठ कर सोचने लगा की इस मादरचोद कल्लू का अब कुछ तो जुगाड़ करना पड़ेगा और ज़्यादा समय भी नहीं है साला साला नशेड़ी है क्या पता किसी को वीडियो दिखा hi दे.. तो सबक तो सीखना पड़ेगा पर कैसे ये hi समस्या थी... कल सुबह 4 बजे क्या किआ जाये...

ये hi सब सोच रहा था की तब तक भाभी चाय लेकर आ गयी और मुझे दी साथ hi खुद भी मेरे साथ बैठ गयी और चाय पीने लगी...

प भाभी- लल्ला कुछ समझ आया क्या? मैं आज hi मायके चली जॉन क्या?

में- उससे क्या होगा भाभी?

प भाभी- मैं यहाँ रहूंगी hi नई तो क्या करेगा..

में- ाचा बापिस नहीं होगी फिर..

प भाभी- आउंगी न...

Me-bhabhi तुमने कुछ गलत किया है?

प Bhabhi-nahi...

Me-to फिर तुम्हे जाने की क्या ज़रुरत है.. जो गलत है वो जाये...

प भाभी- समझ नहीं आ रहा लल्ला क्या करें?

Me-abhi तुम चाय पियो भाभी...

हमारी चाय ख़तम हुई तो मैंने कप नीचे रखा और भाभी से पुछा भाभी तुम्हारे पास दो एक जैसी साड़ी हैं क्या?

प Bhabhi-ek जैसी बिलकुल तो नहीं हैं पर हाँ रंग एक जैसा होगा और ध्यान से न देखो तो एक जैसी hi लगती हैं...

में- अभी हैं तुम्हारे पास?

प Bhabhi-haan दिखाऊं तुम्हे?

में- हाँ दिखाओ न..

भाभी कड़ी हुई और अलमारी के सामने जाकर कड़ी हो गयी... अलमारी जहाँ मैं बैठा था उसके सामने hi थी पर थोड़ी पुराणी सी थी तो वो ज़ोर लगाकर खोलने लगी.. जैसे hi अलमारी खुली उसके अंदर से एक चूहा निकल कर कूड़ा और भाभी डरके पीछे हो गयी और गिरने लगी पर मैंने उन्हें पकड़ लिए जिससे वो मेरे ऊपर या यूँ कहो मेरी गॉड में बैठ गयी....

उनकी साड़ी का पल्लू फिर से नीचे गिर गया... भाभी मेरे ऊपर थी उनके बड़े बड़े नरम चूतड़ मेरे लुंड के ऊपर और जिनका स्पर्श पते hi लुंड खुश होकर सर उठाने लगा...





मुझे तो जैसा जो चाहिए था वो मिल गया... पहले तो मैंने खुद पर काबू किया फिर सोचा इतना ाचा मौका है कैसे जाने दूँ..

तो मैंने अपने दोनों हाथों को उठाकर उनकी नंगी कमर पर रख दिया... हाय कितनी नरम और कोमल कमर थी भाभी की... कमर को छूटे hi पूरे शरीर में करंट दौड़ गया और लुंड भी टाइट हो चूका था.. मैंने एक बार हाथ उनके पेट पर फिरा कर उनके पेट को मसल दिया..

भाभी के नरम और बड़े बड़े चूतड़ों के बीच मेरा लुंड ज़रूर hi उन्हें चुभा होगा जिससे वो कड़ी हो गयी

पर मुझे न जाने क्या हुआ मैं उनसे अलग नहीं होना चाहता था.. तो मैं भी भाभी के साथ खड़ा हो गया.. अब भी पीछे से उनसे चिपका हुआ था मेरे हाथ अब भी भाभी के पेट पर घूम रहर थे... भाभी की साँसे थोड़ी भरी होने लगी थी... भाभी ने अपने दोनों हाथ मेरे दोनों हाथों के हाथों पर रखे हुए थे और मेरे हाथ उनके नरम गदराये पेट पर चल रहे थे...





मेरा कड़क लुंड पीछे से उनके चूतड़ों में घिस रहा था...

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प भाभी- लल्ला साड़ी निकालनी हैं.

में- हाँ निकालो न भाभी..

भाभी अभी झिझक रही थी या शर्मा रही थी तो सीधा नहीं बोल नहीं रही थी छोड़ने को या यूँ कहें की हम में से कोई भी जाताना नहीं छह रहा था जो भी अभी हमारी हालत थी उसे..

मैं भाभी को अपने साथ साथ आगे चलते हुए अलमारी के सामने ले गया... पर मैं उनसे चिपका रहा और मेरे हाथ उनके पेट से.. उनका पल्लू भी नीचे लटका हुआ था..

Me-lo भाभी अब निकल लो...

प भाभी- ुहम्म हाँ..

भाभी ने अपने हाथ मेरे हाथों से हटाए और अलमारी में चलने लगी... और मैं खुल के उनके पेट को मसल रहा था तो कभी सहला रहा था साथ hi मेरा लुंड भी पीछे से उनके चूतड़ों में चुभ रहा था...

न जाने क्यों भाभी मुझे रोक रही थी और न hi खुल कर कुछ बोल रही थी... जिसका फायदा मैं उठा रहा था...

भाभी ने दोनों साड़ी अपने हाथ में लेली..

प भाभी- लल्ला मिल गयी दोनों साड़ी..

में- हम्म्म भाभी दिखाओ...

मैंने बोल तो दिया पर भाभी से अलग नहीं हुआ तभी आंगन में से किसी की आवाज़ आई और भाभी अचानक से मुझे पीछे धक्का देकर दूर हो गयी... साड़ी भी नीचे गिर गयी दोनों ..

उन्होंने मेरी तरफ एक बार देखा एयर फिर अपना पल्लू सही किया और बहार भाग गयी.

मैंने नीचे गिरी हुई दोनों सारे को उठाया और बीएड पर अगल बगल रखकर देखने लग गया... मैंने ध्यान से देखा और फिर लगा के काम बन सकता है.. तभी कमरे में भाभी और उनके साथ जग्गू आये..

जग्गू - अरे तू कब आया... और ये साड़ी लेके क्यों बैठा है..

में- आओ दोनों लोग बैठो एक प्लान समझ ने आया है..

Jaggu-kya प्लान कुछ हुआ है क्या?

फिर भाभी ने उसे कल्लू के आने की साडी बात बताई जिसे सुनकर जग्गू तो आग बबूला हो गया और उसे जान से मरने की सोचने लगा...

मैंने उसे समझाया की शांत रहे और आगे क्या करना है वो सुने..

फिर मैंने पूरा प्लान जग्गू और भाभी को समझाया...

प भाभी- पर लल्ला क्या ये करना सही होगा..

जग्गू- सब सही है भाभी जो वो कर रहा है उसे रोकने के लिए सब सही है..

में- भाभी सही गलत का हम क्या hi कर सकतव हैं हमारा काम आपको बचाना है वो हम बचाकर रहेंगे...

प भाभी- अगर तुम दोनों नहीं होते तो मैं तो न जाने क्या करती..

Jaggu-aise कैसे नहीं होते भाभी... तुम भाभी हो हमारे परिवार का हिस्सा हो और परिवार की इज्जत पर हाथ कैसे आने दे सकते हैं..

आज जग्गू पूरे जोश में था इतने जोश में की उसने ये सब बोलते हुए भाभी को गले लगा लिए... और ये शायद पहली बार था जब जग्गू और भाभी गले लगे हों.. जब जग्गू को थोड़ा होश आया तो भाभी से अलग हुआ और दोनों मेरी तरफ देखकर शर्मा रहे थे...

Me-kyun शर्मा रहे हो देवर भाभी में भी शर्म होती है क्या?

Jaggu-are वो कुछ नहीं कर्मा...

Me-rahne दे ाचा अब मैं चलता हूँ और तू भी जा और जो बोलै है वो देखकर और साडी जुगाड़ करके आ तब तक मैं अपना काम निपटता हूँ..

प भाभी- दोनों लोग ख्याल रखना की सब अचे से हो जाये मुझे चिंता हो रही है..

में- भाभी सब अचे से होगा चिंता मत करो...

और फिर मैं और जग्गू उनके कमरे से बहार निकले बहार आंगन में मंजू तै बैठी थी जाकर उनके पेअर छुए...

मंजू Tai-are बच्चा तू कब आया...

में- अभी थोड़ी देर पहले तुम लोग नहीं थे तो भाभी से बात कर रहा था...

मंजू tai-ud करमजली को बातों के अलावा कुछ आता कहाँ है?

Me-tai तुम फिर शुरू हो गयी एक बार उन्हें अपनी बहु न समझकर बेटी समझ कर देखो...

मंजू तै- उससे क्या होगा..

Me-jo तुम बोल रही हो वो नहीं बोलोगी..

मंजू तै- मेरे समझने से क्या होता है वो मुझे माँ मानेगी..

में- तै तुम सुबह उठके सूरज पे जल चढ़ती हो?

मंजू तै- हाँ रोज़ चढ़ती हूँ...

में- तो सूरज भगवन कभी बापिस तुमपर जल चढ़ाते हैं...

मंजू Tai-pagal है क्या सूरज देवता मुझ पर क्यों जल चढ़ाएंगे...

Me-tum कभी सूर्य देवता से ये कहती हो की पहले तुम मुझे जल चढ़ाओ फिर मैं चढ़ाउंगी..

जग्गू खड़ा खड़ा दोनों की तरफ देख रहा था बिना कुछ बोले...

मंजू तै- तू सच में ब्यौरा गया है कर्मा... मैं सूर्य देव से कुछ नहीं मांगती बस अपना काम करती हूँ ..

Me-wohi तै... तो यहाँ भी अपना काम करो न बिना कुछ मांगे पहले तुम तो बेटी मनो उन्हें वैसे hi रखो.. जब सूर्य देव से कुछ नहीं मांगती तो भाभी से क्यों मांगती हो... तुम अपना काम करो... बापिस वो क्या करती हैं वो उनका काम है...

मेरी बात को सुनकर तै खामोश हो गयी और नीचे देखकर कुछ सोचने लगी... मैंने जग्गू की तरफ देखा तो उसने इशारा किआ खिसकने का... मुझे भी लगा कहीं तै के सामने ज़्यादा ज्ञान तो नहीं छोड़ दिया.. और बदले में कहीं बेलन पद जाएं... मैं और जग्गू चुपचाप से खिसकने लगे वहां से मुझे एक तरफ साया दिखा किसी का मुद कर देखा तो भाभी थी... उनकी आँखों में आंसू थे... और हमारी तरफ hi देख रही थी...

मैंने सोचा ये साला औरतों को समझना hi मुश्किल है अब ये क्यों रो रही हैं..

खैर मैंने रुकना सही नहीं समझा और जग्गू के साथ बहार आ गया.. बहार आते hi जग्गू ने मेरी पीठ थपथपाकर बोलै- ज्ञान बड़ा ाचा पेलते हो बाबा कर्मानन्द...

Me-aur तुम बकचोदी बहुत करते हो बाबा छुटियानन्द...

जग्गू- सेल हरामी..

Me-bakwas मत कर और जो बोलै है वो ध्यान से कर जेक.. मैं भी काम निपटा कर आता हूँ..

तो क्या काम है जग्गू और कर्मा का जानिये अगली अपडेट में प्लीज कमैंट्स करके ज़रूर बताएं कैसी लगी अपडेट.... सुग्गेस्टियन्स देते रहे, बहुत बहुत शुक्रिया..
 
काफी ाचा कोइंसिडेन्स है की 300 पेजेज और 25लैस व्यूज साथ hi हुए हैं ये सब आप सब की वजह से है तो

आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया 300 पेजेज और 25 लैस व्यूज तक के सफर के लिए आशा है इसी तरह ये सफर और कथा आगे चलते रहेंगे आपके साथ साथ..
 
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