Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN - SexBaba
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Incest JANNAT TERI BAHON (TANGO) MEIN

**डिस्क्लेमर (इम्पोर्टेन्ट – पढ़ना ज़रूरी है)**



ये कहानी **100% काल्पनिक / फिक्शनल** है.

इसमें जो भी नाम आये हैं, वो सब मेरे दिमाग की उपज हैं, किसी भी रियल व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं.

स्थान, घर, होटल, कॉलेज, farm-house, सब बनाये हुए हैं.

कोई भी धर्म, जाती, समुदाय या पारिवारिक रिश्ता इस कहानी से जुड़ा नहीं है.

ये कहानी **bhai-behan, कजिन, और क्लोज रिलेटिव्स के बीच इन्सेस्ट / तबू रिलेशनशिप** पर बेस्ड है.

अगर आपको इन्सेस्ट, फोर्स्ड सेडक्टिव, ब्लैकमेल या एडल्ट एक्सप्लिसित कंटेंट से सख्त परहेज है, या ये चीज़ आपको मेंटली डिस्टर्ब करती है, तो **काइंडली इस थ्रेड को अभी छोड़ दें**.

इससे आगे पढ़ने का मतलब है की आप 18+ हैं और आप अपनी मर्ज़ी से फंतासी कंटेंट पढ़ रहे हैं.

कोई भी रियल लाइफ में ऐसे काम गलत, gair-kanuni और नैतिक रूप से घटिया होते हैं.

ये सिर्फ एक एडल्ट dark-fantasy स्टोरी है, जो सिर्फ एंटरटेनमेंट और इमेजिनेशन के लिए लिखी गयी है.

कंसेंट, रेस्पेक्ट और क़ानूनी उम्र का हमेशा ध्यान रखें रियल लाइफ में.

अब जो भी आगे पढ़ेगा, वह अपनी ख़ुशी और अपने रिस्क पे पढ़ेगा

एन्जॉय थे स्टोरी, बूत रियल लाइफ में बिलकुल तरय न करें!



~ ऑथर ️मम
 
PART - 1🕰️ पाँच साल पहले...: जब एक परिवार की रौशनी बुझ गईराजनगर नामक एक काल्पनिक शहर की कहानी, जिसका केंद्र बिंदु है आनंद मित्तल का भरा-पूरा परिवार। आनंद मित्तल जी अपने जीवन के मूल्यों और सिद्धांतों के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी दौलत थी उनका परिवार और उनकी पत्नी श्वेता।

कहानी की शुरुआत एक भयानक मंज़र से होती है। शहर की सड़कों पर एक गाड़ी तेज़ी से भाग रही है, जिसके अंदर हर कोई बेतहाशा डरा हुआ है। गाड़ी की पिछली सीट पर आनंद जी की पत्नी श्वेता जी लेटी हैं, जिनकी हालत पल-पल बिगड़ती जा रही है। उनका बेटा मानिक मित्तल (जो उस समय लगभग 17 साल का था) गाड़ी चला रहा है, उसके चेहरे पर डर और जल्दबाज़ी का भाव साफ़ झलक रहा है।

साथ में बैठी उनकी सबसे बड़ी बेटी अनु (उस समय 20 साल की) अपनी माँ के ठंडे पड़ चुके हाथों को पकड़े हुए थी। उसके पिता, आनंद जी, बगल में बैठे लगातार श्वेता जी को सांत्वना देने की कोशिश कर रहे थे।

एक तेज़ मोड़ पर, जब गाड़ी हिचकोले खाती है, अनु अपनी माँ के शरीर में कोई हलचल महसूस नहीं कर पाती। एक पल के लिए उसे लगा जैसे श्वेता जी ने रास्ते में ही अपने प्राण त्याग दिए हैं, पर उसके भीतर एक उम्मीद बाकी थी — शायद यह सिर्फ़ उसका वहम हो, शायद अस्पताल पहुँचकर डॉक्टर कोई चमत्कार कर दें। इस गहरी आशंका को छिपाकर उसने यह बात अपने भाई और बापू को नहीं बताई। उसने हिम्मत बटोरी और अपनी प्रार्थनाओं में ध्यान लगा दिया।

लेकिन नियति को कुछ और मंज़ूर था।

जैसे ही वे शहर के मुख्य अस्पताल पहुँचे, मानिक और आनंद जी जल्दी से श्वेता जी को स्ट्रेचर पर ले गए। डॉक्टर ने तेज़ी से जाँच की। चंद मिनटों की ख़ामोशी के बाद, डॉक्टर ने भारी मन से उन्हें मृत घोषित कर दिया।

यह शब्द सुनते ही मानिक और अनु का रो-रोकर बुरा हाल हो गया। उनका संसार जैसे एक पल में उजड़ गया। मानिक ज़मीन पर बैठ गया और अनु दहाड़ें मारकर रोने लगी, जैसे उस उम्मीद का महल गिर गया हो जिसे उसने रास्ते भर सँभाल कर रखा था। आनंद जी ख़ुद टूटे हुए थे, लेकिन उन्हें एहसास था कि उन्हें ही अपने बच्चों को सँभालना है। उन्होंने मज़बूती से मानिक और अनु को अपने गले लगा लिया, और उस दुख की घड़ी में तीनों ने एक दूसरे का सहारा लिया। श्वेता जी का जाना, मित्तल परिवार के जीवन में एक गहरा शून्य छोड़ गया।



🏘️ वर्तमान: पाँच साल बाद की धड़कन (संशोधित)पाँच साल बीत चुके हैं। समय ने ज़ख़्म थोड़े भरे ज़रूर हैं, पर श्वेता जी की यादें आज भी घर के हर कोने में मौजूद हैं। आनंद मित्तल के घर में अब चार युवा सदस्य हैं, जो अपने-अपने जीवन के लक्ष्यों की ओर बढ़ रहे हैं:



  • अनु (25 साल): एक सख़्त संरक्षिका

    वह परिवार में सबसे बड़ी है। माँ को खोने के बाद उसने घर और छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली है, जिससे उसका स्वभाव काफ़ी सख़्त और दिशा-निर्देश देने वाला हो गया है। वह एक माँ की तरह अपने भाई-बहनों पर निगरानी रखती है और पढ़ाई, अनुशासन या घर के काम में कोई लापरवाही बर्दाश्त नहीं करती। उसके लिए, नियम पहले हैं। परिवार में उसकी शादी की बातें होती हैं, लेकिन वह हर बार यह कहकर टाल देती है कि "जब तक यह तीनों अपने पैरों पर खड़े नहीं हो जाते, मैं घर नहीं छोड़ सकती।"

  • मानिक मित्तल (22 साल): सपनों का वारिस

    वह चार्टर्ड अकाउंटेंसी (CA) की पढ़ाई कर रहा है। वह ज़िम्मेदार है, लेकिन घर में सबसे छोटा बेटा होने के कारण उसे हमेशा से थोड़ा 'एक्स्ट्रा' प्यार और छूट मिली है, जो अनु और दिव्या को कभी-कभी खटकता है। वह अपनी पढ़ाई में व्यस्त रहता है, जिसका एक कारण अतीत की यादों से दूर रहना भी है।

  • दिव्या (23 साल): विद्रोही गंभीरता

    परिवार की दूसरी बेटी दिव्या, डॉक्टर बनने का सपना देखती है और अपनी पढ़ाई में पूरी तरह समर्पित है। वह स्वभाव से गंभीर और अक्सर तनाव में रहती है, जिसका एक बड़ा कारण उसके मन में मानिक के प्रति नाफ़रत का भाव है। उसे लगता है कि मानिक को सिर्फ़ "घर का लड़का" होने की वजह से परिवार और बापू से ज़रूरत से ज़्यादा लाड और सहूलियतें मिलती हैं, जबकि उसे (दिव्या को) और अनु को हमेशा अधिक त्याग करना पड़ा है। यह भावना उसे अक्सर मानिक से दूरी बनाए रखने पर मजबूर करती है।

  • परी (18 साल): सबसे छोटी और लाड़ली

    सबसे छोटी परी $+2$ (बारहवीं कक्षा) में पढ़ रही है। वह घर की लाडली है और अपनी किशोरावस्था की दुनिया और पढ़ाई में खोई हुई है। वह अक्सर अपनी बड़ी बहन अनु की सख़्त निगरानी और दिव्या की गंभीर चुप्पी के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती है।

आनंद मित्तल जी आज भी परिवार के मुखिया हैं, पर अब उनकी भूमिका एक मार्गदर्शक की ज़्यादा है। इस तरह, यह परिवार श्वेता जी की यादों, अनु के सख़्त नियमों और दिव्या के आंतरिक असंतोष के बीच, राजनगर में अपने नए भविष्य की ओर बढ़ रहा है।



💼 वर्तमान: अनु और मल्लिका की दुनिया और घर की उलझनें🌸 "शादी की डोली" – अनु और मल्लिकापाँच साल बीतने के बाद, अनु ने अपने दुख को किनारे रखकर अपना करियर बनाया। वह अपनी बचपन की दोस्त मल्लिका के साथ मिलकर एक सफल मैरिज प्लानिंग फर्म, "शादी की डोली" चलाती है। दोनों ने छोटी उम्र में ही इस व्यापार में काफ़ी तरक्की हासिल कर ली है।

इन दोनों दोस्तों का स्वभाव एकदम विपरीत है।



  • मल्लिका (Bold and Frank): मल्लिका खुली सोच वाली, बेबाक और बोल्ड है। वह बिज़नेस में नए प्रयोग करने से नहीं डरती और क्लाइंट्स के साथ बेझिझक मज़ेदार बातचीत कर लेती है। वह जानती है कि आधुनिक इवेंट मैनेजमेंट के लिए खुले विचार रखना कितना ज़रूरी है।
  • अनु (Narrow-minded but Sharp): वहीं, अनु अपनी माँ की ज़िम्मेदारियों और घर के मूल्यों से बंधी हुई, स्वभाव में काफ़ी संकीर्ण सोच वाली (Narrow-minded) है। हालाँकि वह काम में बहुत तेज़ है और अकाउंट्स, लॉजिस्टिक्स तथा प्लानिंग के सूक्ष्म विवरण (minute details) में माहिर है। उसका कठोर और सख़्त स्वभाव यहाँ भी दिखता है, जहाँ वह मल्लिका के ज़्यादा खुलेपन पर अक्सर आपत्ति जताती है।
आज शाम दोनों एक हाई-प्रोफ़ाइल क्लाइंट की मीटिंग से लौटी थीं और अपने दफ़्तर में बैठी थीं।

मल्लिका ने सोफ़े पर आराम से पैर फैलाए, "यार अनु, मिस्टर खुराना की बेटी की शादी में हमें थीम थोड़ी और मॉडर्न रखनी चाहिए थी। मैंने कहा था, 'हॉलीवुड रीजेंसी,' पर तू 'ट्रेडिशनल राजस्थानी' पर अड़ गई।"

अनु ने फ़ाइलों को करीने से जमाया और सख़्ती से कहा, "ज़रूरी नहीं कि हर चीज़ में 'मॉडर्न' घुसड़ना ही तरक्की हो, मल्लिका। हमारा क्लाइंट बेस मध्यम आयु वर्ग के संभ्रांत लोग हैं, और वे 'परंपरा' को ज़्यादा महत्व देते हैं। और हाँ, काम के वक़्त तू अपनी हँसी और फ़्लर्टिंग ज़रा कंट्रोल किया कर।"

मल्लिका हँस पड़ी, "ओह! मैडम अनु, अगर मैं थोड़ी मीठी बात कर लेती हूँ तो इसका मतलब फ़्लर्टिंग नहीं है, यह 'नेटवर्किंग' है। तू थोड़ा खुल जा, ज़िंदगी में हर चीज़ को रूल्स और कैलकुलेशन से मत देख। पर ठीक है, तेरी 'नैरो-माइंडेड' प्लानिंग से भी हमें बहुत मुनाफ़ा हो रहा है।"



अनु ने उसकी आँखों में देखा, "मेरा दिमाग़ खुला हो या संकीर्ण, पर तेरी तरह लापरवाह नहीं है। इसलिए बिज़नेस का सारा फ़ाइनेंशियल कंट्रोल मेरे पास है। अब चल, घर जाना है। दिव्या का ट्यूशन का वक़्त हो गया होगा।"
 
Part -2





👔 आनंद मित्तल और सविता ग्रोवर की उलझनउधर, आनंद मित्तल, जो एक बड़ी कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) हैं, अपने दफ़्तर में थे। वह एक गंभीर और प्रतिष्ठित व्यक्ति हैं, लेकिन अपनी पत्नी श्वेता के जाने के बाद वह भावनात्मक रूप से काफ़ी अकेले पड़ गए थे।

उनके दफ़्तर में उनकी रीजनल HR हेड, सविता ग्रोवर, आई। सविता एक तेज़-तर्रार, आकर्षक और बहुत ही काबिल पेशेवर महिला थीं।

सविता ने दरवाज़ा बंद किया और अंदर आते ही एक ख़ास, अनकहा तनाव कमरे में फैल गया।

सविता (फाइल टेबल पर रखते हुए): "सर, हमने उत्तरी क्षेत्र (Northern Region) के लिए नई भर्ती की प्रक्रिया पूरी कर ली है। आपके कहने पर मैंने सारे चेक खुद किए हैं।"

आनंद जी ने सिर हिलाया, "धन्यवाद, सविता। मैं जानता हूँ, तुम हमेशा चीज़ों को त्रुटिहीन रखती हो।"

बातें जल्दी ही दफ़्तर के काम से हटकर निजी बातों की ओर मुड़ गईं। आनंद जी को श्वेता की याद सताती थी, और इस भावनात्मक रिक्ति (emotional vacuum) को भरने के लिए वह सविता के साथ एक अनूठा रिश्ता रखते थे। यह रिश्ता उनकी शारीरिक ज़रूरतों पर आधारित था, जिसमें सविता उन्हें केवल हैंड जॉब तक ही सीमित रखती थी। आनंद जी इस रिश्ते में भावनात्मक जुड़ाव और श्वेता जी की अनुपस्थिति को महसूस करते थे।

आनंद जी ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, "सविता, मुझे पता है कि मैं तुम्हारे काम के बदले में तुम्हें ज़्यादा तवज्जो देता हूँ... तुम्हारी हाल की तरक्की..."

सविता ने उन्हें बीच में ही काट दिया। उसकी आवाज़ में एक सख़्त आत्म-सम्मान था।

सविता: "सर, मेरी तरक्की इसलिए हुई है क्योंकि मैं काबिल हूँ। मैं बाज़ार के रुझानों को आपसे बेहतर समझती हूँ और मैंने पिछले तीन वर्षों में रीजनल उत्पादकता (regional productivity) में $20\%$ की वृद्धि की है। मैं यह सब इसलिए नहीं करती कि मैं आपकी दिवंगत पत्नी श्वेता की दोस्त की बहन हूँ, और आपको भावनात्मक सहारे की ज़रूरत है... मैं यह इसलिए करती हूँ क्योंकि मेरा काम ही मेरी पहचान है।"

यह सुनकर आनंद जी कुछ पल के लिए चुप हो गए।

सविता (थोड़ा नरम होकर): "श्वेता मेरी बहन की सबसे अच्छी दोस्त थी, और मैं जानती हूँ कि आप कैसा महसूस करते हैं। मैं आपको यहाँ 'हेल्प' ज़रूर कर सकती हूँ, क्योंकि आप उस तनाव से बाहर निकल सकें जो आप पर बीता है, लेकिन अपनी तरक्की के लिए मुझे किसी की 'हेल्प' की ज़रूरत नहीं है। मैं अपनी जगह अपनी मेहनत से बनाती हूँ।"

सविता के ये शब्द आनंद जी को यह एहसास दिलाते थे कि वह एक कमज़ोर भावनात्मक पलों में हैं, जबकि सविता एक मज़बूत पेशेवर है। वह दोनों एक जटिल डोर से बंधे थे: भावनात्मक सहारा, शारीरिक ज़रूरत, और श्वेता के नाम पर एक अनकहा कर्ज़।

सविता का पति विनोद ग्रोवर भी शहर की एक दूसरी बड़ी कंपनी में मैनेजर था, और वह अपने रिश्ते की प्रकृति को लेकर काफ़ी सतर्क रहती थी। उसका काम और व्यक्तिगत सम्मान उसके लिए सबसे ऊपर था, यहाँ तक कि आनंद मित्तल जैसे शक्तिशाली व्यक्ति के सामने भी।



💔 आनंद और सविता: एकतरफ़ा चाहत और बेरुख़ी का रिश्ता🥵 दफ़्तर में बढ़ती बेचैनीअगले सप्ताह, आनंद मित्तल और सविता ग्रोवर के बीच का अजीब रिश्ता और भी ज़्यादा तनावपूर्ण हो गया था। आनंद जी को श्वेता के जाने के बाद जिस भावनात्मक और शारीरिक नज़दीकी की तलाश थी, वह सविता में मिल तो रही थी, लेकिन वह हमेशा एक लक्ष्मण रेखा खींच देती थी।

एक शुक्रवार की शाम, दफ़्तर में लगभग ख़ामोशी थी। आनंद जी ने सविता को अपने केबिन में बुलाया। उन्होंने अपनी कुर्सी घुमाई और खिड़की से बाहर देखती शाम की धुंध को निहारने लगे।

आनंद जी (दबी हुई आवाज़ में): "सविता... पिछले कुछ महीनों से... तुम मेरी सिर्फ़ एक दोस्त या HR हेड नहीं हो। मैं... मैं तुम्हारी तरफ़ आकर्षित महसूस करता हूँ। तुम मेरी ज़िंदगी में एक रौशनी की तरह आई हो।"

सविता (शांत, मगर सख़्त लहजे में): "सर, मैं आपकी भावनाओं की कद्र करती हूँ। आप अकेले हैं, और मैं समझती हूँ। लेकिन जैसा मैंने पहले कहा, हमारे रिश्ते की एक सीमा है।"

आनंद जी ने अपनी कुर्सी घुमाकर उसकी ओर देखा। उनकी आँखों में उदासी और बेताबी साफ़ दिख रही थी। "मुझे यह सीमा समझ नहीं आती, सविता। तुम मुझे हैंड जॉब तक सीमित क्यों रखती हो? जब हम इतने करीब आ जाते हैं, तो मुझे लगता है कि तुम भी... तुम भी आगे बढ़ना चाहती हो। मैं तुमसे चुदाई (chut marna) करना चाहता हूँ, सविता।"

सविता ने अपनी भौहें चढ़ाईं। उसकी पेशेवर मुखौटा (professional mask) टूट गया, लेकिन उसने तुरंत ख़ुद को संभाला।

सविता: "आप मेरी क्षमताओं और मेरी इज़्ज़त को एक बार फिर कम आँक रहे हैं, आनंद जी। मैंने जो कुछ किया है, वह सिर्फ़ इसलिए कि मैं आपको भावनात्मक रूप से स्थिर देखना चाहती हूँ, क्योंकि आप मेरी बहन की सहेली के पति हैं। मैं आपके निजी काम आती हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं आपकी हर ज़रूरत पूरी करने के लिए बाध्य हूँ।"

आनंद जी ने बेचैन होकर मेज पर हाथ मारा। "लेकिन एक बार... एक बार तुमने मुझे लिप किस किया था! वह क्या था? क्या वह भी महज़ एक 'भावनात्मक सहारा' था?"



💋 एहसान का बोझसविता ने धीरे से सिर हिलाया। "हाँ, वह एक बार हुआ था। और मैं आपको बता दूँ, वह मैंने इसलिए किया था ताकि आप उस पल का भावनात्मक बोझ कम कर सकें जो आप पर बीता था। उस एक किस के बाद आपने मुझसे हफ़्तों बात नहीं की थी, आप शर्मिंदा थे। और हाँ, उस पर मैं एहसान भी जताती हूँ।"

उसने सीधे आनंद जी की आँखों में देखते हुए कहा।

सविता: "आनंद जी, मुझे कोई ज़रूरत नहीं है कि मैं अपनी तरक्की या अपनी सुरक्षा के लिए आपके साथ शारीरिक रूप से और आगे जाऊँ। मैं सक्षम हूँ। मैं जानती हूँ कि आप मेरी सुंदरता और मेरी नज़दीकी से तड़पते हैं, और मैं आपको यह तड़प इसलिए देती हूँ ताकि आप ज़मीन पर रहें। मैं आपको हर पल यह एहसास कराती हूँ कि मैं यहाँ हूँ, लेकिन सिर्फ़ अपनी मर्ज़ी से।"

आनंद जी के चेहरे पर लाचारी का भाव आ गया। वह जानते थे कि सविता सही कह रही है। वह सचमुच तड़प रहे थे — उसकी नज़दीकी उन्हें भावनात्मक शांति देती थी, लेकिन उसकी लगाई सीमाएं उन्हें और भी ज़्यादा बेचैन कर देती थीं। वह चाहते थे कि यह रिश्ता पूरी तरह से शारीरिक हो जाए, ताकि उनकी तन्हाई मिट जाए, पर सविता उन्हें बस किनारे पर रखती थी।

सविता खड़ी हुई। "सर, मैं जा रही हूँ। अगले सप्ताह आपके लिए एक नया समझौता (new contract) तैयार है, जिसमें आपका कमीशन बढ़ाया गया है। मैंने यह किया है, क्योंकि आप इसके काबिल हैं। न कि इसलिए कि आपने मुझसे और कुछ करने की उम्मीद रखी थी।"

यह कहकर, सविता बिना किसी भावना को दर्शाए कमरे से बाहर निकल गई।

आनंद जी अपनी कुर्सी पर बैठ गए। उन्हें महसूस हुआ कि वह इस महिला के हाथों में पूरी तरह से तड़प रहे हैं। वह उसे अपनी पत्नी की तरह चाहते थे, पर वह उन्हें बस एक मजबूर क्लाइंट की तरह डील कर रही थी, जिसे वह 'हेल्प' कर रही थी, लेकिन अपनी शर्तों पर।



उनका दिल दर्द से भरा था, उन्हें मालूम था कि वह जो चाहते थे, वह कभी नहीं मिलेगा। उनकी यह एकतरफ़ा चाहत उन्हें दिन-ब-दिन और भी अकेला महसूस करा रही थी।
 
Part -3🌑 पाँच सालों की तड़प: आनंद और एक अनचाहा प्रस्ताव

पिछले पाँच सालों से, आनंद मित्तल की ज़िंदगी एक अजीब भावनात्मक और शारीरिक सूखे से गुज़र रही थी। अपनी पत्नी श्वेता के जाने के बाद, वह अंदर से बुरी तरह टूट गए थे। काम और बच्चों की देखरेख ने उन्हें व्यस्त रखा था, लेकिन बिस्तर की हर रात और दिन का हर एकांत पल उन्हें श्वेता की कमी और अपनी शारीरिक तड़प का एहसास कराता था।

सविता ग्रोवर का उनकी ज़िंदगी में आना इस तड़प को कम करने के बजाय और बढ़ा गया था। सविता उन्हें भावनात्मक सहारे के नाम पर नज़दीकी देती थी, लेकिन उनकी सीमाओं ने आनंद को हमेशा किनारे पर रखा। वह जो अंतरंगता (चूत मारने की चाहत) चाहते थे, वह उन्हें कभी नहीं मिली। वह सविता के दिए हुए 'एहसान' के एक लिप किस और 'हैंड जॉब' के बीच फँसकर रह गए थे, जहाँ उन्हें सिर्फ़ तड़पाया जा रहा था।

🤝 दोस्त का प्रस्ताव

एक शाम, आनंद जी अपने सबसे पुराने दोस्त और अपनी कंपनी के चेयरमैन, दीपक कोहली के साथ एक एक्सक्लूसिव क्लब में डिनर कर रहे थे। दीपक, जो आनंद की स्थिति से भली-भाँति परिचित था, उसे कुछ ज़्यादा ही शांत और बुझा हुआ महसूस कर रहा था।

दीपक ने अपना ग्लास नीचे रखा और गंभीरता से आनंद की ओर देखा। दीपक: "आनंद, हम बचपन के दोस्त हैं। मैं तुम्हें ऐसे और नहीं देख सकता। तुम अंदर से मर रहे हो। तुम इतने बड़े MD हो, करोड़ों का बिज़नेस संभालते हो, पर अपनी निजी ज़िंदगी में ख़ुद को सज़ा दे रहे हो।"

आनंद जी ने धीमी आवाज़ में कहा, "यह सज़ा नहीं है, दीपक। यह... श्वेता के प्रति मेरा सम्मान है।"

दीपक हँस पड़ा, थोड़ी झुंझलाहट के साथ। दीपक: "सम्मान! पांच साल हो गए, यार! श्वेता स्वर्ग में तुम्हारी ख़ुशी चाहती होगी। और यह सविता क्या कर रही है? वह तुम्हें 'ज़रूरत' के नाम पर बस बेवकूफ़ बना रही है! वह तुम्हें भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल कर रही है, और तुम एक हैंड जॉब के लिए उसके एहसानों का बोझ ढो रहे हो। यह सरासर ग़लत है!"

दीपक ने चारों तरफ़ देखा, फिर अपनी आवाज़ धीमी करते हुए कहा: दीपक: "देखो, मैंने आज रात तुम्हारे लिए इंतज़ाम कर दिया है। शहर में एक नया बुटीक अपार्टमेंट खुला है, जहाँ बहुत ही उच्च श्रेणी की एस्कॉर्ट्स (Escorts) हैं। कोई 'नॉर्मल' नहीं, ये हाई-प्रोफ़ाइल, पढ़ी-लिखी और समझदार लड़कियाँ होती हैं। तुम्हारी पहचान ज़ाहिर नहीं होगी।"

आनंद जी का चेहरा फीका पड़ गया। उन्होंने अचानक अपनी प्लेट से नज़रें हटा लीं।

आनंद जी (झटके से): "नहीं, दीपक। मैं... मैं यह नहीं कर सकता।"

दीपक: "क्यों नहीं कर सकते? तुम्हें चूत की ज़रूरत है, आनंद! यह कोई पाप नहीं है। तुम पुरुष हो! तुम्हारी ज़रूरतें हैं। और अगर तुम्हारी सविता जैसी 'आधुनिक देवी' तुम्हारी इस ज़रूरत को पूरा नहीं कर रही, तो इसे पैसे देकर पूरा करने में क्या हर्ज है? वे पेशेवर हैं, कोई ड्रामा नहीं, कोई भावनात्मक एहसान नहीं।"



🛑 आनंद का इनकारआनंद मित्तल उठे, उनके हाथ मेज के नीचे काँप रहे थे। उनकी आवाज़ में दुख और दृढ़ता का अजीब मिश्रण था।

आनंद जी: "तुम सही कह रहे हो, दीपक। मुझे ज़बरदस्त तड़प है। पिछले पाँच साल एक-एक दिन करके काटे हैं। सविता ने जो कुछ किया, उसने मुझे तड़पाया ज़रूर, पर उसने कभी मुझे इतना नीचे नहीं गिरने दिया।"

वह रुके, लंबी साँस ली।

आनंद जी: "श्वेता मेरी पत्नी थी, दीपक। वह मेरी प्रेमिका थी। मैं किसी भी रिश्ते को उसके नाम और सम्मान से ऊपर नहीं रखता। मैं यह नहीं कह रहा कि मैं कभी किसी और से प्यार नहीं करूँगा, लेकिन मैं पैसे देकर एक एस्कॉर्ट के साथ अपनी शारीरिक ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता।"

उनकी आँखों में एक अजीब सी लाचारी और उदासी थी।

आनंद जी: "मैं एक रात के लिए... सिर्फ़ अपनी शारीरिक तड़प मिटाने के लिए... अपने आप को और श्वेता के सम्मान को किसी ऐसी औरत के सामने बेचना नहीं चाहता, जिसके साथ कोई भावनात्मक रिश्ता नहीं है। सविता मुझे तड़पाती है, लेकिन उसके अंदर भी एक सम्मान है, जिसे वह बेचती नहीं है। और यही वजह है कि मैं उसे छोड़ नहीं पाता।"

दीपक ने निराशा में सिर हिलाया। दीपक: "तुम बहुत जटिल हो, आनंद। बहुत जटिल।"

आनंद जी ने अपना कोट उठाया। "शायद हूँ। पर मैं अपने बच्चों की आँखों में गिरना नहीं चाहता। मेरी बेटी अनु... वह माँ के जाने के बाद घर और संस्कारों को एक सख़्त रस्सी से बाँधे हुए है। अगर उसे पता चला कि मैं एस्कॉर्ट्स के पास जा रहा हूँ, तो वह टूट जाएगी।"

"तुमने जो ऑफ़र किया, उसके लिए धन्यवाद, दीपक। पर मैं अपनी तड़प के साथ जीना सीख लूँगा। किसी पेशेवर औरत के हाथों की कठपुतली बनने से बेहतर है कि मैं अपनी तन्हाई में तड़पूँ।"

वह तेज़ी से क्लब से बाहर निकल गए, अपनी 'तड़प' और 'सम्मान' के बोझ को एक बार फिर अपने कंधे पर लादकर। उनकी कार शहर की सन्नाटे भरी सड़कों पर दौड़ रही थी, लेकिन उनकी आत्मा में शोर और बेचैनी भरी थी।



💥 घर का युद्धक्षेत्र: मानिक-दिव्या की तकरार और अनु की बेचैनीमित्तल परिवार का घर बाहर से जितना संभ्रांत (Sophisticated) दिखता था, अंदर से उतना ही तनाव और खींचतान से भरा हुआ था। इसका मुख्य कारण था मानिक और दिव्या के बीच का कभी न ख़त्म होने वाला टकराव। दिव्या की आँखों में मानिक के लिए जो नफ़रत थी — लड़के होने के कारण मिली 'एक्स्ट्रा' तवज्जो को लेकर उपजा असंतोष — वह हर छोटी बात पर भड़क उठती थी।



⚔️ भाई-बहन की जंगआज सुबह का माहौल भी कुछ अलग नहीं था। मानिक CA की पढ़ाई के लिए अपनी नोट्स बुक को ढूंढ रहा था, जो उसे नहीं मिली।

मानिक (चिल्लाते हुए): "दिव्या! मेरी अकाउंट्स की फ़ाइल कहाँ रखी है? तुम जानती हो न कि कल मेरा टेस्ट है!"

दिव्या, जो अपने कमरे में बैठकर डॉक्टरी की मोटी किताबें पढ़ रही थी, तुरंत तल्ख़ होकर बाहर आई।

दिव्या (तेज़ आवाज़ में): "ज़रा ऊँची आवाज़ में बात मत करना, मानिक! और मुझे क्या पता तेरी फ़ाइल कहाँ है? क्या मैं तेरी निजी असिस्टेंट हूँ? या तेरी देखभाल करने वाली नौकरानी?"

मानिक: "ओह! ये ही तो प्रॉब्लम है। तुम हमेशा एक मरीज़ जैसी शक्ल बनाकर बैठी रहती हो। क्या फ़र्क पड़ता है अगर मैं तुमसे पूछ लूँ? तुम्हें तो वैसे भी बापू से ज़्यादा तवज्जो मिलती है, थोड़ा काम तो कर लिया कर।"

दिव्या (गुस्से से लाल): "बस यहीं रुक जा! मुझे ज़्यादा तवज्जो मिलती है? हाँ? यह मत भूल कि तुम्हारी $50,000$ की कोचिंग फ़ीस बापू ने बिना पूछे भर दी थी, जबकि मेरे NEET के ट्यूशन के लिए मुझे हर बार लड़ना पड़ता है! तुम घर के 'हीरो' हो, इसलिए तुम कुछ भी कह सकते हो।"

मानिक (ताने मारते हुए): "और तुम! तुम घर की 'शहीद' हो। हमेशा ये साबित करने की कोशिश करती रहती हो कि तुम कितनी मेहनत करती हो। जाकर पढ़ो, डॉक्टर साहिबा! शायद उससे तुम्हारा स्वभाव थोड़ा ठीक हो जाए।"

तभी, सबसे छोटी परी (18) बीच में आई। वह हमेशा अपने भाई का पक्ष लेती थी, क्योंकि मानिक उसके लिए बाहर से चॉकलेट और उसकी पसंद की चीज़ें लाता था, और वह उसे 'प्यारा भाई' मानती थी।

परी (दिव्या को चिढ़ाते हुए): "दीदी, क्यों मानिक भैया से रोज़ लड़ती हो? वह तो बस पूछ ही रहे थे। तुम ही हमेशा हर बात को इतना बढ़ा देती हो।"

दिव्या का ग़ुस्सा अब परी पर भी उतर आया। दिव्या को हमेशा लगता था कि परी मानिक की तरफ़दारी इसलिए करती है क्योंकि उसे मानिक से छोटे-मोटे फ़ायदे मिलते हैं।

दिव्या (परी को घूरते हुए): "तुम बीच में मत बोलो, परी! तुम हमेशा अपने प्यारे भैया का पक्ष लोगी ही, क्योंकि वह तुम्हें हर दूसरे दिन महंगे गैजेट्स लाकर देता है। तुम भी उसी की तरह हो — सिर्फ़ फ़ायदा देखती हो। तुम तीनों के कारण ही इस घर में शांति नहीं है।"

परी की आँखें भर आईं। मानिक ने तुरंत परी का हाथ पकड़ लिया।

मानिक: "अब बहुत हो गया, दिव्या! परी को कुछ मत कहना। अगर तुम्हें कोई प्रॉब्लम है, तो मुझसे बात करो। तुम ख़ुद को इतनी गंभीर बनाकर क्यों रखती हो कि तुम किसी को भी पसंद नहीं करती?"



😔 अनु की बढ़ती बेचैनीयह सारा शोर और ड्रामा घर की सबसे बड़ी बेटी अनु (25) के लिए रोज़ाना का सिरदर्द बन गया था। अनु अपने दफ़्तर 'शादी की डोली' के तनाव और घर के नियमों को लेकर पहले से ही सख़्त थी। इन झगड़ों से वह और भी ज़्यादा परेशान और खींची-खींची रहती थी।

अनु अपने कमरे से तेज़ी से बाहर आई, उसके चेहरे पर गहरी झुंझलाहट थी।

अनु (ज़ोर से): "बस! क्या हो रहा है यह सब? यह घर है या मछली बाज़ार? तुम तीनों को ज़रा भी लिहाज़ नहीं है कि बापू दफ़्तर जा रहे हैं, और घर में कोई शांति होनी चाहिए?"

उसकी सख़्त आवाज़ सुनकर तीनों एक पल के लिए चुप हो गए।

अनु (दिव्या से): "दिव्या! तू बड़ी है, तुझे पता है कि मानिक का टेस्ट है। तू चुपचाप उसकी मदद कर सकती थी या कम से कम अपनी पढ़ाई पर ध्यान देती। तेरे डॉक्टर बनने का क्या फ़ायदा अगर तेरा स्वभाव ही किसी मरीज़ को डरा दे?"

अनु (मानिक से): "और मानिक! तुम छोटे भाई हो। तुम क्यों दिव्या को उकसाते हो? तुम्हें पता है कि वह क्यों नाराज़ रहती है।"

अनु (परी से): "परी! तुम्हारा काम सिर्फ़ पढ़ना है। किसी की लड़ाई में तुम्हें जजमेंट देने की ज़रूरत नहीं है।"

उसने गहरी साँस ली, "मैं पागल हो जाऊँगी तुम लोगों के कारण। मैं बाहर की दुनिया संभालती हूँ, क्लाइंट्स को शांत करती हूँ, और तुम लोग घर को 'युद्धक्षेत्र' बनाकर रखते हो! अगर अगली बार मैंने यह शोर सुना, तो मैं बापू को तुम्हारी सारी सहूलियतें बंद करने को कह दूँगी। अब मानिक, अपनी फ़ाइल ढूंढो, और दिव्या, अपने कमरे में जाओ!"

मानिक और दिव्या एक दूसरे को घूरते हुए अपने-अपने रास्ते चले गए, लेकिन उनके चेहरे पर अब भी पुरानी दुश्मनी की लकीरें खिंची हुई थीं। परी डर कर चुपचाप अपने कमरे में चली गई।



अनु अकेली खड़ी रही। उसने अपने माथे को सहलाया। उसे महसूस हुआ कि माँ के जाने के बाद उसने घर की व्यवस्था तो सँभाल ली है, लेकिन वह अपने भाई-बहनों के बीच के भावनात्मक संतुलन को कभी नहीं सँभाल पाई। यह रोज़ की तकरार उसके सख़्त स्वभाव को और ज़्यादा कठोर बना रही थी।
 
दोस्तों ये कहानी कुछ डिफरेंट है इसलिए इसे हिंदी फॉण्ट में लिखा है, पता नहीं आपको पसंद भी आएगी या नहीं क्यूंकि ये मेरी रूटीन की कहानियों से अलग है थोड़ा
 
### PART-1

🕰️ पांच साल पहले… जब एक फॅमिली की रौशनी बुझ गयी

राजनगर नाम का एक फिक्शनल सिटी.

इसके सेण्टर में था आनंद मित्तल का खुशहाल परिवार. आनंद जी अपने वैल्यूज और प्रिंसिपल्स के लिए फेमस थे, लेकिन उनकी सबसे बड़ी दौलत थी उनका फॅमिली और उनकी वाइफ श्वेता.

स्टोरी शुरू होती है एक भयंकर सन से…

शहर की सड़क पर एक गाडी तेज़ी से भाग रही थी. अंदर सब दर के मारे काँप रहे थे.

बखसैत पर श्वेता जी लेती हुई थी, उनकी हालत pal-pal बिगड़ती जा रही थी.

उनका बीटा माणिक मित्तल (तब 17 साल का) गाडी चला रहा था, चेहरे पर डर और जल्दी का एक्सप्रेशन साफ़ दिख रहा था.

बगल में बैठी बड़ी बेटी अनु (तब 20 साल) माँ के ठन्डे पड़ते हाथों को पकडे बैठी थी.

पापा आनंद जी बैठ कर श्वेता जी को baar-baar तसल्ली दे रहे थे.

एक तेज़ मोड़ पर गाडी झटका कहती है…

अनु को माँ के बदन में कोई हिलचाल नहीं महसूस होती.

एक पल को लगता है जैसे श्वेता जी ने रास्ते में hi डैम तोड़ दिया, लेकिन दिल में एक उम्मीद बची थी… शायद हॉस्पिटल पहुँचते hi डॉक्टर कोई चमत्कार कर दे.

इस डर को छुपा कर उसने बात baap-bhai को नहीं बताई. बस आँखें बंद कर प्रार्थना में लग गयी.

लेकिन किस्मत को कुछ और hi मंज़ूर था.

हॉस्पिटल पहुँचते hi माणिक और आनंद जी ने श्वेता जी को स्ट्रेचर पर उठाया.

डॉक्टर ने जल्दी चेक किया… कुछ मिनट की ख़ामोशी के बाद बड़े भरी दिल से अन्नोउंस किया,

“सॉरी… वे couldn’t सेव हेर.”

ये सुनते hi माणिक और अनु का बुरा हाल हो गया.

माणिक ज़मीन पर बैठ गया, अनु दहाड़ mar-mar कर रोने लगी… जैसे साड़ी उम्मीद का महल एक पल में ढह गया.

आनंद जी खुद टूट चुके थे, लेकिन बच्चों को संभालना था. उन्होंने दोनों को गले लगा लिया… उस दुःख भरी घडी में तीनो ने एक दुसरे का सहारा लिया.

श्वेता जी का जाना… मित्तल फॅमिली के दिल में एक गहरा खली पैन छोड़ गया.

🏘️ प्रेजेंट – पांच साल बाद

टाइम ने ज़ख्म तो भर दिए, लेकिन श्वेता जी की यादें आज भी घर के हर कोने में ज़िंदा हैं.

अब घर में चार यंग मेंबर्स हैं, हर कोई अपने सपनों के पीछे भाग रहा है:

- अनु (25) – घर की स्ट्रिक्ट गार्डियन

सबसे बड़ी है. माँ के जाने के बाद घर और छोटे bhai-behenon की ज़िम्मेदारी उठा ली. स्वाभाव सख्त और rule-oriented हो गया. घर में कोई लापरबाही बर्दाश्त नहीं. शादी की बातें चलती हैं, लेकिन हर बार ताल देती है – “जब तक ये तीनो अपने पैरों पर नहीं खड़े हो जाते, मैं घर नहीं छोड़ सकती.”

- माणिक मित्तल (22) – सपनों का वारिस

का की पढाई कर रहा है. रेस्पोंसिबल है, लेकिन लड़का होने की वजह से हमेशा से थोड़ी एक्स्ट्रा पम्पेरिंग और छूट मिल जाती है, जो अनु और दिव्या को खटकती है.

- दिव्या (23) – सीरियस रिबेल

डॉक्टर बनने के सपने देख रही है, पढाई में फुल डेडिकेटेड. स्वाभाव सीरियस और स्ट्रेस्ड. माणिक से नफरत करती है क्यूंकि उसे लगता है “सिर्फ लड़का है” इसलिए baap-babuji से एक्स्ट्रा laad-pyaar और फैसिलिटीज मिलती हैं, जबकि उसे और अनु को हमेशा सैक्रिफाइस करना पड़ा.

- पारी (18) – सबसे छोटी लाड़ली

12तह में पढ़ रही है. घर की छोटी प्रिंसेस. अनु की स्ट्रिक्टनेस और दिव्या की सीरियस साइलेंस के बीच बैलेंस बनाने की कोशिश करती रहती है.

आनंद जी आज भी हेड ऑफ़ फॅमिली हैं, लेकिन अब ज़्यादा गाइड बन गए हैं.

💼 प्रेजेंट – अनु और मल्लिका की दुनिया

पांच साल बाद अनु ने अपना दुःख साइड में रख कर करियर बना लिया.

अपनी चाइल्डहुड फ्रेंड मल्लिका के साथ “शादी की डोली” नाम का सक्सेसफुल वेडिंग प्लानिंग बिज़नेस चला रही है. दोनों ने छोटी उम्र में hi काफी नाम कमा लिया.

दोनों का नेचर बिलकुल अपोजिट:

- मल्लिका – बोल्ड, फ्रैंक, बेबाक. बिज़नेस में नए एक्सपेरिमेंट्स से नहीं डर्टी, क्लाइंट्स के साथ ओपनली masti-mazaak कर लेती है.

- अनु – Narrow-minded लेकिन शार्प. माँ की रेस्पॉन्सिबिलिटीज़ और घर के वैल्यूज से बंधी हुई. काम में तेज़, accounts-logistics के मिनट डिटेल्स में मास्टर. मल्लिका के ज़्यादा ओपन बिहेवियर पर हमेशा ऑब्जेक्शन लेती है.

आज शाम को दोनों एक high-profile क्लाइंट मीटिंग से लौट कर ऑफिस में बैठी थी.

मल्लिका सोफे पर पेअर फैला कर:

“यार अनु, मर. खुराना की बेटी की शादी में थीम थोड़ा मॉडर्न रखना चाहिए था न. मैंने बोलै था हॉलीवुड रीजेंसी, तू ट्रेडिशनल राजस्थानी पर अड़ गयी.”

अनु फाइल्स सीढ़ी करते हुए सख्ती से:

“हर चीज़ में मॉडर्न घुसेड़ना ज़रूरी नहीं, मल्लिका. हमारा क्लाइंट बेस middle-aged इलीट लोग हैं, उन्हें ट्रेडिशन ज़्यादा पसंद है. और हाँ, काम के टाइम थोड़ी फ्लिर्टिंग कण्ट्रोल में रख ुसेड तो करती है न.”

मल्लिका हंस पड़ी:

“ओह मैडम अनु! अगर मैं थोड़ी स्वीट बात कर लेती हूँ तो फ्लिर्टिंग नहीं, नेटवर्किंग है! तू थोड़ा खुल जा, ज़िन्दगी को रूल्स और कॅल्क्युलेशन्स से नहीं जीते.”

अनु:

“खुला हो या सख्त, लपरबाह नहीं हूँ इसलिए फाइनेंसियल कण्ट्रोल मेरे पास है. चलो अब घर चलते हैं, दिव्या का ट्यूशन टाइम हो गया होगा.”

### Part-2

👔 आनंद मित्तल और सविता ग्रोवर का कॉम्प्लिकेटेड रिश्ता

इधर आनंद जी अपने ऑफिस में थे. बड़ी कंपनी के मद हैं, रेस्पेक्टेड इंसान, लेकिन श्वेता के जाने के बाद इमोशनली बिलकुल अकेला पद गए.

उनके केबिन में रीजनल हर हेड सविता ग्रोवर आयी. सविता tez-tarraar, अट्रैक्टिव और सुपर कपबले लेडी थी.

सविता ने दरवाज़ा बंद किया और आते hi रूम में एक अनकही टेंशन फ़ैल गयी.

सविता (फाइल रख कर):

“सर, नॉर्थेर्न रीजन की नई रिक्रूटमेंट कम्पलीट हो गयी. आपके कहने पर मैंने सारे चेक्स खुद किये हैं.”

आनंद जी:

“थैंक यू सविता, तुम हमेशा फ्लॉलेस काम करती हो.”

बात जल्दी hi ऑफिस से पर्सनल हो गयी.

श्वेता के जाने के बाद आनंद जी को जो इमोशनल वैक्यूम और फिजिकल नीड थी, उसका एक वीयर्ड सलूशन था सविता.

उनका रिश्ता पुरेली फिजिकल था, लेकिन सविता ने लिमिट राखी थी – सिर्फ hand-job तक. आनंद जी को इसमें भी इमोशनल अटैचमेंट चाहिए था, लेकिन सविता स्ट्रिक्टली बौंडरीएस में रहती थी.

आनंद जी थोड़ी झिझक से:

“सविता… मुझे पता है मैं तुम्हे काम के बदले एक्स्ट्रा अटेंशन देता हूँ… तेरी रीसेंट प्रमोशन…”

सविता ने बीच में काट दिया, आवाज़ में self-respect:

“सर, मेरी प्रमोशन मेरी कपाबिलिटी की वजह से हुई है. मैंने लास्ट तीन साल में रीजनल प्रोडक्टिविटी 20% बधाई है. मैं ये सब इसलिए नहीं करती की मैं श्वेता की दोस्त की बेहेन हूँ और आपको इमोशनल सपोर्ट चाहिए. मैं अपने काम से अपनी पहचान बनती हूँ.”

आनंद जी कुछ पल चुप रहे.

सविता थोड़ी सॉफ्ट हुई:

“श्वेता मेरी बेहेन की बेस्ट फ्रेंड थी, मैं जानती हूँ आप कैसा फील करते हैं. मैं यहाँ हेल्प कर सकती हूँ ताकि आप स्ट्रेस से बहार निकले, लेकिन मेरी तरक्की के लिए मुझे किसी की ‘हेल्प’ की ज़रूरत नहीं.”

सविता का हस्बैंड विनोद ग्रोवर भी बड़ी कंपनी में मैनेजर था, और वो अपने रिश्ते को लेके सुपर कौटिओउस रहती थी.

### 💔 आनंद और सविता – एक तरफ़ा चाहत और बेरुखी

अगला हफ्ता टेंशन और बढ़ गया.

एक फ्राइडे इवनिंग, ऑफिस ऑलमोस्ट खाली. आनंद जी ने सविता को केबिन में बुलाया.

आनंद जी (धीमी आवाज़):

“सविता… लास्ट फ्यू मोनथस से तुम सिर्फ कलेग या हर हेड नहीं हो. मैं… मैं तुम्हारी तरफ अत्त्रक्टेड हूँ. तुम मेरी ज़िन्दगी में एक किरण बन कर आयी हो.”

सविता (शांत लेकिन सख्त):

“सर, मैं आपकी फीलिंग्स की रेस्पेक्ट करती हूँ. आप अकेले हैं, मैं समझती हूँ. लेकिन हमारे रिश्ते की एक सीमा है.”

आनंद जी:

“मुझे ये सीमा समझ नहीं आती सविता. तुम मुझे hand-job तक क्यों रखती हो? जब हम इतने क्लोज हो जाते हैं, लगता है तुम भी आगे बढ़ना चाहती हो. मैं तुमसे चुदाई करना चाहता हूँ सविता.”

सविता की भौंह चढ़ी, लेकिन कण्ट्रोल किया.

सविता:

“आप फिर से मेरी कपाबिलिटी और रेस्पेक्ट को काम अहाँक रहे हैं. जो मैंने किया सिर्फ इमोशनल स्टेबिलिटी के लिए किया क्यूंकि आप मेरी बेहेन की सहेली के हस्बैंड हैं. इसका मतलब मैं आपकी हर ज़रूरत पूरी करने के लिए बाउंड नहीं हूँ.”

आनंद जी ने टेबल पर हाथ मारा:

“लेकिन एक बार तुमने मुझे lip-kiss किया था! वो क्या था? सिर्फ इमोशनल सपोर्ट?”

सविता:

“हाँ वो एक बार हुआ था, ताकि आप उस पल के बर्डन से बहार निकले. उसके बाद आप हफ्ते भर मुझसे नज़र नहीं मिला पाए थे, शर्मिंदा थे. और हाँ, उस एक किश का मैं एहसान भी लेती हूँ.”

फिर सीधे आँखों में देख कर:

“मुझे अपनी सेफ्टी या प्रमोशन के लिए आपके साथ आगे जाने की ज़रूरत नहीं. मैं कपबले हूँ. मैं जानती हूँ आप मेरी खूबसूरती से तड़पते हैं, और मैं ये तड़प देता हूँ ताकि आप ज़मीन पर रहे. मैं हर पल याद दिलाती हूँ की मैं यहाँ हूँ, लेकिन सिर्फ अपनी मर्ज़ी से.”

आनंद जी के चेहरे पर लाचारी आ गयी. वो जानते थे सविता बिलकुल सही कह रही है.

सविता कड़ी हुई:

“सर मैं जा रही हूँ. अगले हफ्ते नया कॉन्ट्रैक्ट रेडी है जिसमे आपका कमीशन बढ़ा दिया है – क्यूंकि आप डेसेर्वे करते हैं, नाकि इसलिए की आपने मुझसे कुछ एक्सपेक्ट किया.”

कहा और बिना इमोशन दिखाए निकल गयी.

आनंद जी कुर्सी पर धस्स गए. उन्हें लगा वो इस औरत के हाथों में पूरी तरह तड़प रहे हैं. वो उसे अपनी वाइफ की तरह चाहते थे, लेकिन वो उन्हें बस एक हेल्पलेस क्लाइंट की तरह ट्रीट कर रही थी.

### Part-3

🌑 पांच सालों की तड़प और एक अनचाहा प्रपोजल

श्वेता के जाने के बाद आनंद जी की ज़िन्दगी इमोशनल और फिजिकल दरोघट बन गयी थी.

सविता ने तड़प को काम करने के बजाये और बढ़ा दिया था – नज़दीकी देती थी लेकिन पूरी फिजिकल इंटिमेसी नहीं.

एक शाम आनंद जी अपने ओल्डेस्ट फ्रेंड और कंपनी चेयरमैन दीपक कोहली के साथ एक्सक्लूसिव क्लब में डिनर कर रहे थे.

दीपक:

“आनंद, हम बच्चपन के दोस्त हैं. मैं तुझे ऐसे मरते नहीं देख सकता. तू इतना बड़ा मद है लेकिन पर्सनल लाइफ में खुद को सजा दे रहा है.”

आनंद जी:

“ये सजा नहीं दीपक, श्वेता के प्रति रेस्पेक्ट है.”

दीपक हंस पड़ा (थोड़ी इर्रिटेशन के साथ):

“रेस्पेक्ट? पांच साल हो गए यार! श्वेता हेवन से तेरी ख़ुशी चाहेगी. और ये सविता क्या कर रही है? तुझे ज़रूरत के नाम पर बेवक़ूफ़ बना रही है. एक hand-job के लिए तू उसके एहसानों का बोझ उठा रहा है!”

फिर आवाज़ धीमी कर के:

“सुन, मैंने आज रात तेरे लिए अरेंजमेंट कर दिया है. शहर में नया बुटीक अपार्टमेंट खुला है जहाँ high-profile, एडुकेटेड एस्कॉर्ट्स हैं. तेरी आइडेंटिटी सेफ रहेगी.”

आनंद जी का चेहरा उतर गया.

आनंद जी:

“नहीं दीपक… मैं ये नहीं कर सकता.”

दीपक:

“क्यों नहीं? तुझे छूट की ज़रूरत है आनंद! ये पाप नहीं है. तू मर्द है! अगर तेरी सविता तेरी ज़रूरत पूरी नहीं कर रही तो पैसे देकर पूरी करवाने में क्या बुराई?”

आनंद जी खड़े हो गए, हाथ काँप रहे थे.

आनंद जी:

“तू सही कह रहा है, मुझे ज़बरदस्त तड़प है. लेकिन सविता ने मुझे इतना नीचे नहीं गिरने दिया. मैं पैसे देकर किसी एस्कॉर्ट के साथ अपनी फिजिकल नीड पूरी नहीं कर सकता. श्वेता मेरी वाइफ थी, मेरी लवर थी. मैं किसी भी रिश्ते को उसके रेस्पेक्ट से ऊपर नहीं रख सकता.”

उनकी आँखों में लाचारी:

“मेरी बेटी अनु… माँ के जाने के बाद घर को सख्त रूल्स से बाँध रखा है. अगर उसे पता चला की मैं एस्कॉर्ट्स के पास जा रहा हूँ, वो टूट जाएगी.”

“थैंक्स फॉर थे ऑफर दीपक, लेकिन मैं अपनी तड़प के साथ जीना सीख लूंगा. किसी पेड औरत की कटपुतली बनने से बेहतर है अपनी तन्हाई में तड़पना.”

वो तेज़ी से क्लब से निकल गए, अपनी तड़प और रेस्पेक्ट का बोझ कंधे पर उठा कर.

💥 घर का बटलेफील्ड – माणिक वस दिव्या और अनु की बेचैनी

मित्तल हाउस बहार से कितना सोफिस्टिकेटेड दीखता था, अंदर से उतना hi टेंशन भरा.

आज भी सुबह वही हंगामा…

माणिक (चिल्लाते हुए):

“दिव्या! मेरी एकाउंट्स फाइल कहाँ राखी? कल मेरा टेस्ट है!”

दिव्या अपने रूम से निकली, तेज़ आवाज़ में:

“ज़रा ऊंची आवाज़ में मत बोल! मुझे क्या पता तेरी फाइल कहाँ है? क्या मैं तेरी पर्सनल असिस्टेंट हूँ?”

माणिक:

“वही तो प्रॉब्लम है, तू हमेशा सीरियस पेशेंट जैसा मुँह बना कर बैठी रहती है. कुछ पूछा तो क्या हो गया?”

दिव्या गुस्से से लाल:

“मुझे ज़्यादा अटेंशन मिलती है?? तू भूल मत, तेरी 50क कोचिंग फीस बाबूजी ने बिना पूछे भर दी, मेरे नीट ट्यूशन के लिए हर बार लड़ना पड़ता है! तू घर का हीरो है न!”

तभी पारी बीच में आयी:

“दीदी, रोज़ क्यों लड़ती हो माणिक भैया से? बस पूछ रहे थे…”

दिव्या का गुस्सा पारी पर भी:

“तुम मत बोलो पारी! तुम भी उसी के साइड लोगी क्यूंकि वो तुम्हे हर दुसरे दिन एक्सपेंसिव गैजेट्स ला कर देता है!”

पारी की आँखें भर आयी.

तभी अनु रूम से तेज़ क़दमों से आयी, फुल गुस्सा मोड:

अनु:

“बस! ये क्या तमाशा लगा रखा है? घर है या मछली बाजार? बाबूजी ऑफिस जा रहे हैं और तुम लोग शोर मचा रहे हो!”

फिर तीनो को ek-ek कर के सुनाया,

दिव्या को, माणिक को, पारी को.

लास्ट में:

“मैं पागल हो जाउंगी तुम लोगों के वजह से. मैं बहार क्लाइंट्स संभालती हूँ, घर आकर ये ड्रामा? अगली बार ये शोर सुना तो बाबूजी से साड़ी फैसिलिटीज बंद करवा दूंगी!”

सब apne-apne रूम में चले गए, लेकिन पुराणी दुश्मनी अब भी साफ़ दिख रही थी.

अनु अकेली कड़ी रह गयी, माथा सहलाया.

उसने महसूस किया माँ के जाने के बाद घर तो संभल लिया, लेकिन bhai-behenon के बीच का इमोशनल बैलेंस कभी नहीं संभल पायी.



(तो बे कॉन्टिनोएड…)
 
### Part-4

🙈 शादी के वेन्यू में अनएक्सपेक्टेड हंगामा: मल्लिका की बेबाकी और अनु की बेचैनी

आज “शादी की डोली” के लिए सुपर इम्पोर्टेन्ट दिन था.

शहर के सबसे बड़े पुराने रईस सेठ धर्मपाल की बेटी का ग्रैंड वेडिंग five-star होटल में हो रहा था, और पूरी प्लानिंग की ज़िम्मेदारी अनु और मल्लिका के कन्धों पर थी. इस प्रोजेक्ट की सक्सेस से उनका ब्रांड स्काई हाई जा सकता था.

दोनों ने कई दिनों से raat-din म्हणत की थी.

अनु हर छोटी से छोटी डिटेल को स्ट्रिक्टली चेक कर रही थी, और मल्लिका ने अपने बोल्ड और बेबाक स्टाइल से डेकोरेशन और एंटरटेनमेंट संभल रखा था.

👗 मल्लिका का पर्सनल जलवा

शाम ढल चुकी थी, फंक्शन अपने पीक पर था.

अनु अपने लाइट प्रोफेशनल सूट में फुल वर्क मोड में थी, लेकिन मल्लिका तो मल्लिका थी… आज उसने deep-cut गोल्डन डिज़ाइनर साड़ी पहनी थी, जो उसके बोल्ड पर्सनालिटी को 440 वाल्ट दिखा रही थी. लग रही थी किसी सेलिब्रिटी से काम नहीं, हर कोई मुँह fer-fer कर देख रहा था.

मल्लिका को पता था की अनु उसकी इस over-dressing से खुन्नस खा रही है, क्यूंकि अनु का फंदा था की इवेंट प्लानर को बैकग्राउंड में रहना चाहिए, लाइमलाइट नहीं चुरानी चाहिए.

मल्लिका (अनु के पास आकर हंस के):

“क्या बात है मैडम narrow-minded? आज भी black-black? मुझे देखो न, दुल्हन की सहेलियां भी jal-bhun कर राख हो रही हैं!”

अनु (आँखें सिकोड़ते हुए):

“मल्लिका, तुझे यहाँ काम करने की सैलरी मिलती है, लोगो का अटेंशन खींचने की नहीं. अगर कोई क्लाइंट कम्प्लेन कर दे न…”

मल्लिका:

“अरे चिल करो यार! वैसे भी मैं तुझे एक सरप्राइज देने वाली हूँ. मेरा नया बॉयफ्रेंड आया है, नाम है रोमित. म्यूजिशियन है.”

अनु:

“बॉयफ्रेंड?? यहाँ?? मल्लिका ये हमारा सबसे बड़ा इवेंट है, यहाँ पर्सनल ड्रामा नहीं चलेगा!”

🚪 कॉमन रूम में फुल हंगामा

अनु की वार्निंग का मल्लिका पर जीरो असर हुआ.

कुछ देर बाद जब अनु बैकस्टेज फाइनल चेक्स करने गयी, मल्लिका अपने नए बर्फ रोमित का हाथ पकड़ कर खींचते हुए उस छोटे से कॉमन रूम में घुस गयी जो उन्हें इमरजेंसी बेस के तौर पर दिया गया था.

ये रूम बहुत क्रिटिकल था… यहाँ ओरिजिनल इनविटेशन कार्ड्स, last-minute पेमेंट चेक़ुएस, इम्पोर्टेन्ट फाइल्स, दुल्हन का इमरजेंसी मेकअप किट, सब कुछ पड़ा था.

अनु को कुछ पेपरवर्क के लिए रूम में जाना था. उसने दरवाज़ा खटखटाया, अंदर से कोई जवाब नहीं आया. सोचा शायद मल्लिका फ़ोन पर है.

दरवाज़ा खोला…

अंदर का सन देख कर अनु के तो होश उड़ गए!

मल्लिका और रोमित कार्नर के सोफे पर full-on रोमांस कर रहे थे. रोमित का हाथ मल्लिका की पीठ पर, दोनों एक दुसरे को बेइंतेहा चूम रहे थे और चाट रहे थे… पूरा रूम गरम हो चूका था.

अनु (फुल गुस्से और शॉक में):

“मल्लिका!! ये क्या बकवास है??”

Mallika-Romita एक दुसरे से अलग हुए. मल्लिका की गोल्डन साड़ी idhar-udhar हो गयी थी, रोमित शर्मा के मरे खड़ा हो गया.

मल्लिका (साड़ी ठीक करते हुए, बेपरवाह स्टाइल में):

“ओह्हो अनु, तू? तू तो बैकस्टेज थी न? थोड़ी प्राइवेसी नहीं दे सकती थी क्या?”

अनु का चेहरा गुस्से से लाल:

“प्राइवेसी?? मल्लिका तुझे होश है तू कहाँ है? ये क्लाइंट का इमरजेंसी रूम है! यहाँ सारा इम्पोर्टेन्ट सामान पड़ा है! ये हमारा ऑफिस नहीं है! तू अपने पर्सनल काम के लिए जगह कैसे उसे कर सकती है?”

मल्लिका (आँख मारते हुए):

“अरे बस थोड़ी देर का ब्रेक चाहिए था, यहाँ सबसे शांत जगह थी. क्या फरक पड़ता है? समाना को हाथ नहीं लगाया न!”

अनु:

“फरक पड़ता है मल्लिका, बहुत फरक पड़ता है! हमारी ब्रांड की क्रेडिबिलिटी डाव पर है. अगर कोई क्लाइंट ने तुझे इस हालत में देख लिया होता या तुझे ज़रूरत के वक़्त न पाया होता तोह? ये तेरी बेवकूफी और लापरबाही की हद्द है!”

रोमित बीच में बोलने की कोशिश करता है, अनु एक झटके में चुप करा देती है.

अनु:

“तुम! बहार निकलो अभी! और मल्लिका, काम पर ध्यान दो! तेरा ये चिलदिश बोल्ड बेहेवियर पूरे इवेंट की सीरियसनेस को बर्बाद कर रहा है!”

मल्लिका ने कंधे उचका दिए. उसे अनु का इतना परेशां होना फनी लग रहा था, लेकिन समझ गयी की इस बार अनु सीरियसली गुस्सा है. रोमित चुपचाप निकल गया.

अनु ने दरवाज़ा बंद किया, दिवार से तक लगा कर लम्बी सांस ली.

वो अपनी दोस्त मल्लिका की बेबाकी से सच में परेशां थी, लेकिन ये भी जानती थी की बिज़नेस में मल्लिका जैसी तेज़ और क्लाइंट मैगनेट लड़की कोई और नहीं.

अनु (धीमी आवाज़ में):

“तू मेरी दोस्त है इसलिए बच गयी. अगली बार काम की जगह को डेटिंग स्पॉट बनाया न, तोह पार्टनरशिप ख़तम.”

मल्लिका थोड़ी सीरियस हुई:

“ठीक है बॉस! माफ़ कर दो. अगले 15 मिनट तक मैं दिखाउंगी नहीं, सिर्फ काम hi काम!”

अनु ने मुँह फेर लिया और फाइल्स उठा ली.

माथे पर शिकन थी, लेकिन दिल में एक बात पक्की थी,

मल्लिका के इस पागलपन के बावजूद “शादी की डोली” उसके बिना अधूरी थी.



(तो बे कॉन्टिनोएड…)
 
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