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**घर की आग**
Episode 9: अलविदा लाहौर और बंद केबिन का नशा
सुबह 5:45 ऍम - लाहौर रेलवे स्टेशन:
स्टेशन की bheed-bhaad और सूलीयों का shor-o-gul था, लेकिन उस्मान और सीमा के दरमियान एक गहरी ख़ामोशी थी. रशीद साहिब उन्हें छोड़ने आये थे. नसीम ने रुक्सती के वक़्त सीमा के सर पर हाथ रखा, मगर उसकी उँगलियाँ सीमा के कान के पीछे उस जगह को सेहला गयी जहाँ उस्मान के होंठो के निशाँ अब भी ताज़ा थे.
"अपना ख्याल रखना सीमा... और उस्मान, अपनी बहन की हर 'ज़रुरत' का ध्यान रखना," नसीम ने सरगोशी की, जिसका मतलब सिर्फ वह दोनों समझ सकते थे.
ट्रैन ने सीटी बजायी. उस्मान और सीमा एक बिज़नेस क्लास के केबिन में दाखिल हुए. केबिन छोटा था, दो aamne-saamne की बर्थ और एक दरवाज़ा जो अंदर से लॉक हो सकता था. जैसे hi ट्रैन ने रफ़्तार पकड़ी, उस्मान ने उठ कर दरवाज़ा बंद किया और उसकी कुण्डी (लॉक) चढ़दी.
सीमा खिड़की के पास बैठी बहार गुज़रते पेड़ों को देख रही थी. उसका दिल डर और मज़्ज़े के बीच झूल रहा था.
"सीमा एपीआई... अब हम अकेले हैं," उस्मान ने उसके बराबर में बैठते हुए कहा. केबिन की ठंडी एक हवा में सीमा के जिस्म पर रोइंगट खड़े हो रहे थे.
उस्मान ने अपना हाथ सीमा की रनो (तइस) पर रखा. सीमा ने एक झलक दरवाज़े की तरफ देखि. "उस्मान... कोई देख लेगा, वेटर आ सकता है."
"मैंने बहार 'दो नॉट डिस्टर्ब' का बोर्ड लगा दिया है. अगले 6 घंटे तक कोई नहीं आएगा," उस्मान ने सीमा का दुपट्टा उसके कंधे से निचे गिरा दिया. सीमा ने आज एक गहरे नीले रंग का सूट पहना था, जिसकी फ़िटने उसके भरे हुए जिस्म को मज़ीद उभार रही थी.
उस्मान ने सीमा को पीछे खिड़की से लगा दिया और उसकी गर्दन पर अपने गरम होंठ रख दिए. सीमा ने आँखें बंद कर ली. ट्रैन की हरकत (वाइब्रेशन) उसके जिस्म में एक अजीब सी थरथराहट पैदा कर रही थी.
"तुम्हे पता है, ट्रैन में करने का मज़ा hi अलग है," उस्मान ने सरगोशी की और सीमा की कमीज के निचे हाथ दाल कर उसके नरम पेट को मसलने लगा.
घर का मंज़र (Lahore/Model टाउन कनेक्शन):
उधर घर में, रशीद साहिब ऑफिस जा चुके थे. आयेशा और हिरा कॉलेज निकल गयी थीं. घर में सिर्फ नसीम और हमजा रह गए थे.
हमजा अपने कमरे में किताबें खोल कर बैठा था, मगर उसका ध्यान कल रात के उन मंज़रों में अटका था जो उसने दरवाज़े की झिर्री से देखे थे. सीमा एपीआई का वह नंगा बदन और उस्मान भाई के हाथ... उसके दिमाग में धमाके हो रहे थे.
"हमजा... बीटा, नाश्ता नहीं किया तुमने?"
नसीम कमरे में दाखिल हुई. आज उसने थोड़ा हल्का और बारीक दुपट्टा लिया था. वह हमजा के पास बैठ गयी, इतनी पास के हमजा को उसकी खुशबु साफ़ महसूस हो रही थी.
"जी अम्मी... बस पढ़ रहा था," हमजा ने नज़रें झुका ली. उसका लुंड उसके पजामा में तना हुआ था, और उसे डर था के अम्मी देख न लें.
नसीम ने देखा के हमजा बेचैन है. उसने धीरे से हमजा के बाल सँवारे. "तुम बोहोत थके हुए लग रहे हो. क्या रात को नींद नहीं आयी? या कुछ देख लिया था जिसने नींद उदा दी?"
हमजा का दिल धक् से रह गया. "N-nahi अम्मी... ऐसा कुछ नहीं."
नसीम ने मुस्कुरा कर हमजा का चेहरा ऊपर उठाया. "मुझसे क्या छुपाना? मैं तुम्हारी माँ हूँ. मैं जानती हूँ के इस घर में क्या हो रहा है. और मैं यह भी जानती हूँ के मेरा छोटा बीटा अब बड़ा हो गया है."
नसीम ने उठते वक़्त amadan(deliberately) अपना दुपट्टा हमजा के कंधे से रगड़ा और उसके पास रुक कर सरगोशी की,

"दोपहर को मेरे कमरे में आना... मुझे अपनी पीठ पर थोड़ा तेल (आयल) मालवण है, बोहोत दर्द है."
हमजा सुन्न रह गया. अम्मी की आँखों में वही चमक थी जो उसने कल रात उस्मान भाई की आँखों में देखि थी.
ट्रैन का केबिन (थे हीट रिसेस):
ट्रैन अब पूरी रफ़्तार से दौड़ रही थी. केबिन के अंदर की गर्माहट बहार की गर्मी को मात दे रही थी. उस्मान ने सीमा की कमीज उतार कर फेंक दी थी. सीमा सिर्फ अपनी काली ब्रा और सलवार में थी.
उस्मान ने सीमा को सीट पर लिटा दिया. ट्रैन के झटकों के साथ सीमा के मम्मी oopar-neeche हो रहे थे. उस्मान ने उन्हें अपने हाथों में भरा और बेहरमी से मसलने लगा.
"आह... उस्मान... धीरे... ट्रैन की आवाज़ बहार जाती है," सीमा ने कराहते हुए कहा.
"जाने दो... सब समझेंगे के कोई थका हुआ मुसाफिर सो रहा है," उस्मान ने सीमा की सलवार का नारा (स्ट्रिंग) धीरे से खोला और उसे नीचे खिसकना शुरू किया.
सीमा का नंगा बदन अब ट्रैन की ठंडी एक में पसीने से चमक रहा था. उस्मान ने उसकी दोनों टांगों को फैलाया और उसके बीच की गीली जगह को अपनी ज़बान से छुवा.
"ऊऊह्ह्ह... माआ!" सीमा ने अपने दांत भींच लिए और सीट के कोशिश को ज़ोर से पकड़ लिया. ट्रैन की रफ़्तार और उस्मान की ज़बान का नशा उसे किसी और दुनिया में ले जा रहा था.

उस्मान ने अपना लुंड nikaala—woh लोहे की तरह सख्त और गरम था. उसने सीमा के होंठों पर एक गहरा चुम्बन दिया और फिर एक zor-daar धक्के के साथ उसके अंदर दाखिल हो गया.
"आआआहहह... हाय... उस्मान... मेरा दम निकल जायेगा!" सीमा ने ट्रैन के शोर में अपनी चीख दबा दी.


हर बार जब ट्रैन पटरी बदलती, उस्मान का धक्का और गहरा हो जाता. सीमा ने अपनी टांगें उस्मान की कमर के गिर्द कास ली थीं. वह दोनों इस वक़्त bhai-bahen नहीं थे, बल्कि दो ऐसे जिस्म थे जो हर रिश्ते की मर्यादा को पामाल कर चुके थे.
हराम दरख्वास्त (थे फोर्बिडन रिक्वेस्ट):
घर में सन्नाटा था. हमजा ने दबे पाऊँ नसीम के कमरे का रुख किया. दरवाज़ा हल्का सा खुला था.
नसीम बिस्तर पर उलटी लेती थी. उसने अपनी क़मीज़ पीछे से ऊपर कर राखी थी, उसकी गोरी और चिकनी पीठ हमजा की नज़रों के सामने थी. उसने सिर्फ एक पतली सी ब्रा पहनी थी जिसका हुक पीछे से साफ़ दिख रहा था.
"आ गए हमजा? तेल वहां टेबल पर रखा है... थोड़ा मॉल दो," नसीम ने बिना मुद्दे कहा.

हमजा के हाथ काँप रहे थे. उसने तेल लिया और नसीम की नंगी पीठ पर डाला. जैसे hi उसने मालिश शुरू की, नसीम के मुंह से एक हलकी सी सिसकी निकली.
"हम्म... वैसे hi... थोड़ा नीचे... कमर के पास..."

हमजा का हाथ dheere-dheere नीचे की तरफ जा रहा था, जहाँ नसीम की सलवार शुरू हो रही थी. उसने महसूस किया के उसकी माँ का जिस्म भी गरम हो रहा था.
नसीम ने पलट कर हमजा की तरफ देखा. उसके चेहरे पर एक अजीब सा नशा था. "हमजा... क्या तुमने कभी किसी औरत को ऐसे नंगा देखा है?"
हमजा की ज़बान गुंग हो गयी. नसीम ने उसका हाथ पकड़ा और धीरे से अपनी ब्रा के हुक की तरफ ले गयी. "इसे खोल दो... मुझे सांस लेने में तकलीफ हो रही है."
Episode 9 ख़तम.
क्लिफहैंगर: ट्रैन में उस्मान और सीमा अपने जूनून की आखरी हड्डों को छू रहे हैं. उधर घर में हमजा और नसीम के बीच एक नया और खतरनाक सिलसिला शुरू होने वाला है. क्या हमजा अपनी माँ की ब्रा का हुक खोल पायेगा? और हैदराबाद पहुँच कर बिलाल के सामने सीमा कैसे बेहवे करेगी?
Episode 9: अलविदा लाहौर और बंद केबिन का नशा
सुबह 5:45 ऍम - लाहौर रेलवे स्टेशन:
स्टेशन की bheed-bhaad और सूलीयों का shor-o-gul था, लेकिन उस्मान और सीमा के दरमियान एक गहरी ख़ामोशी थी. रशीद साहिब उन्हें छोड़ने आये थे. नसीम ने रुक्सती के वक़्त सीमा के सर पर हाथ रखा, मगर उसकी उँगलियाँ सीमा के कान के पीछे उस जगह को सेहला गयी जहाँ उस्मान के होंठो के निशाँ अब भी ताज़ा थे.
"अपना ख्याल रखना सीमा... और उस्मान, अपनी बहन की हर 'ज़रुरत' का ध्यान रखना," नसीम ने सरगोशी की, जिसका मतलब सिर्फ वह दोनों समझ सकते थे.
ट्रैन ने सीटी बजायी. उस्मान और सीमा एक बिज़नेस क्लास के केबिन में दाखिल हुए. केबिन छोटा था, दो aamne-saamne की बर्थ और एक दरवाज़ा जो अंदर से लॉक हो सकता था. जैसे hi ट्रैन ने रफ़्तार पकड़ी, उस्मान ने उठ कर दरवाज़ा बंद किया और उसकी कुण्डी (लॉक) चढ़दी.
सीमा खिड़की के पास बैठी बहार गुज़रते पेड़ों को देख रही थी. उसका दिल डर और मज़्ज़े के बीच झूल रहा था.
"सीमा एपीआई... अब हम अकेले हैं," उस्मान ने उसके बराबर में बैठते हुए कहा. केबिन की ठंडी एक हवा में सीमा के जिस्म पर रोइंगट खड़े हो रहे थे.
उस्मान ने अपना हाथ सीमा की रनो (तइस) पर रखा. सीमा ने एक झलक दरवाज़े की तरफ देखि. "उस्मान... कोई देख लेगा, वेटर आ सकता है."
"मैंने बहार 'दो नॉट डिस्टर्ब' का बोर्ड लगा दिया है. अगले 6 घंटे तक कोई नहीं आएगा," उस्मान ने सीमा का दुपट्टा उसके कंधे से निचे गिरा दिया. सीमा ने आज एक गहरे नीले रंग का सूट पहना था, जिसकी फ़िटने उसके भरे हुए जिस्म को मज़ीद उभार रही थी.
उस्मान ने सीमा को पीछे खिड़की से लगा दिया और उसकी गर्दन पर अपने गरम होंठ रख दिए. सीमा ने आँखें बंद कर ली. ट्रैन की हरकत (वाइब्रेशन) उसके जिस्म में एक अजीब सी थरथराहट पैदा कर रही थी.
"तुम्हे पता है, ट्रैन में करने का मज़ा hi अलग है," उस्मान ने सरगोशी की और सीमा की कमीज के निचे हाथ दाल कर उसके नरम पेट को मसलने लगा.
घर का मंज़र (Lahore/Model टाउन कनेक्शन):
उधर घर में, रशीद साहिब ऑफिस जा चुके थे. आयेशा और हिरा कॉलेज निकल गयी थीं. घर में सिर्फ नसीम और हमजा रह गए थे.
हमजा अपने कमरे में किताबें खोल कर बैठा था, मगर उसका ध्यान कल रात के उन मंज़रों में अटका था जो उसने दरवाज़े की झिर्री से देखे थे. सीमा एपीआई का वह नंगा बदन और उस्मान भाई के हाथ... उसके दिमाग में धमाके हो रहे थे.
"हमजा... बीटा, नाश्ता नहीं किया तुमने?"
नसीम कमरे में दाखिल हुई. आज उसने थोड़ा हल्का और बारीक दुपट्टा लिया था. वह हमजा के पास बैठ गयी, इतनी पास के हमजा को उसकी खुशबु साफ़ महसूस हो रही थी.
"जी अम्मी... बस पढ़ रहा था," हमजा ने नज़रें झुका ली. उसका लुंड उसके पजामा में तना हुआ था, और उसे डर था के अम्मी देख न लें.
नसीम ने देखा के हमजा बेचैन है. उसने धीरे से हमजा के बाल सँवारे. "तुम बोहोत थके हुए लग रहे हो. क्या रात को नींद नहीं आयी? या कुछ देख लिया था जिसने नींद उदा दी?"
हमजा का दिल धक् से रह गया. "N-nahi अम्मी... ऐसा कुछ नहीं."
नसीम ने मुस्कुरा कर हमजा का चेहरा ऊपर उठाया. "मुझसे क्या छुपाना? मैं तुम्हारी माँ हूँ. मैं जानती हूँ के इस घर में क्या हो रहा है. और मैं यह भी जानती हूँ के मेरा छोटा बीटा अब बड़ा हो गया है."
नसीम ने उठते वक़्त amadan(deliberately) अपना दुपट्टा हमजा के कंधे से रगड़ा और उसके पास रुक कर सरगोशी की,

"दोपहर को मेरे कमरे में आना... मुझे अपनी पीठ पर थोड़ा तेल (आयल) मालवण है, बोहोत दर्द है."
हमजा सुन्न रह गया. अम्मी की आँखों में वही चमक थी जो उसने कल रात उस्मान भाई की आँखों में देखि थी.
ट्रैन का केबिन (थे हीट रिसेस):
ट्रैन अब पूरी रफ़्तार से दौड़ रही थी. केबिन के अंदर की गर्माहट बहार की गर्मी को मात दे रही थी. उस्मान ने सीमा की कमीज उतार कर फेंक दी थी. सीमा सिर्फ अपनी काली ब्रा और सलवार में थी.
उस्मान ने सीमा को सीट पर लिटा दिया. ट्रैन के झटकों के साथ सीमा के मम्मी oopar-neeche हो रहे थे. उस्मान ने उन्हें अपने हाथों में भरा और बेहरमी से मसलने लगा.
"आह... उस्मान... धीरे... ट्रैन की आवाज़ बहार जाती है," सीमा ने कराहते हुए कहा.
"जाने दो... सब समझेंगे के कोई थका हुआ मुसाफिर सो रहा है," उस्मान ने सीमा की सलवार का नारा (स्ट्रिंग) धीरे से खोला और उसे नीचे खिसकना शुरू किया.
सीमा का नंगा बदन अब ट्रैन की ठंडी एक में पसीने से चमक रहा था. उस्मान ने उसकी दोनों टांगों को फैलाया और उसके बीच की गीली जगह को अपनी ज़बान से छुवा.
"ऊऊह्ह्ह... माआ!" सीमा ने अपने दांत भींच लिए और सीट के कोशिश को ज़ोर से पकड़ लिया. ट्रैन की रफ़्तार और उस्मान की ज़बान का नशा उसे किसी और दुनिया में ले जा रहा था.

उस्मान ने अपना लुंड nikaala—woh लोहे की तरह सख्त और गरम था. उसने सीमा के होंठों पर एक गहरा चुम्बन दिया और फिर एक zor-daar धक्के के साथ उसके अंदर दाखिल हो गया.
"आआआहहह... हाय... उस्मान... मेरा दम निकल जायेगा!" सीमा ने ट्रैन के शोर में अपनी चीख दबा दी.


हर बार जब ट्रैन पटरी बदलती, उस्मान का धक्का और गहरा हो जाता. सीमा ने अपनी टांगें उस्मान की कमर के गिर्द कास ली थीं. वह दोनों इस वक़्त bhai-bahen नहीं थे, बल्कि दो ऐसे जिस्म थे जो हर रिश्ते की मर्यादा को पामाल कर चुके थे.
हराम दरख्वास्त (थे फोर्बिडन रिक्वेस्ट):
घर में सन्नाटा था. हमजा ने दबे पाऊँ नसीम के कमरे का रुख किया. दरवाज़ा हल्का सा खुला था.
नसीम बिस्तर पर उलटी लेती थी. उसने अपनी क़मीज़ पीछे से ऊपर कर राखी थी, उसकी गोरी और चिकनी पीठ हमजा की नज़रों के सामने थी. उसने सिर्फ एक पतली सी ब्रा पहनी थी जिसका हुक पीछे से साफ़ दिख रहा था.
"आ गए हमजा? तेल वहां टेबल पर रखा है... थोड़ा मॉल दो," नसीम ने बिना मुद्दे कहा.

हमजा के हाथ काँप रहे थे. उसने तेल लिया और नसीम की नंगी पीठ पर डाला. जैसे hi उसने मालिश शुरू की, नसीम के मुंह से एक हलकी सी सिसकी निकली.
"हम्म... वैसे hi... थोड़ा नीचे... कमर के पास..."

हमजा का हाथ dheere-dheere नीचे की तरफ जा रहा था, जहाँ नसीम की सलवार शुरू हो रही थी. उसने महसूस किया के उसकी माँ का जिस्म भी गरम हो रहा था.
नसीम ने पलट कर हमजा की तरफ देखा. उसके चेहरे पर एक अजीब सा नशा था. "हमजा... क्या तुमने कभी किसी औरत को ऐसे नंगा देखा है?"
हमजा की ज़बान गुंग हो गयी. नसीम ने उसका हाथ पकड़ा और धीरे से अपनी ब्रा के हुक की तरफ ले गयी. "इसे खोल दो... मुझे सांस लेने में तकलीफ हो रही है."
Episode 9 ख़तम.
क्लिफहैंगर: ट्रैन में उस्मान और सीमा अपने जूनून की आखरी हड्डों को छू रहे हैं. उधर घर में हमजा और नसीम के बीच एक नया और खतरनाक सिलसिला शुरू होने वाला है. क्या हमजा अपनी माँ की ब्रा का हुक खोल पायेगा? और हैदराबाद पहुँच कर बिलाल के सामने सीमा कैसे बेहवे करेगी?













