Incest GHAR KI AAG (URDU) - Page 3 - SexBaba
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Incest GHAR KI AAG (URDU)

**घर की आग**

Episode 9: अलविदा लाहौर और बंद केबिन का नशा

सुबह 5:45 ऍम - लाहौर रेलवे स्टेशन:

स्टेशन की bheed-bhaad और सूलीयों का shor-o-gul था, लेकिन उस्मान और सीमा के दरमियान एक गहरी ख़ामोशी थी. रशीद साहिब उन्हें छोड़ने आये थे. नसीम ने रुक्सती के वक़्त सीमा के सर पर हाथ रखा, मगर उसकी उँगलियाँ सीमा के कान के पीछे उस जगह को सेहला गयी जहाँ उस्मान के होंठो के निशाँ अब भी ताज़ा थे.

"अपना ख्याल रखना सीमा... और उस्मान, अपनी बहन की हर 'ज़रुरत' का ध्यान रखना," नसीम ने सरगोशी की, जिसका मतलब सिर्फ वह दोनों समझ सकते थे.

ट्रैन ने सीटी बजायी. उस्मान और सीमा एक बिज़नेस क्लास के केबिन में दाखिल हुए. केबिन छोटा था, दो aamne-saamne की बर्थ और एक दरवाज़ा जो अंदर से लॉक हो सकता था. जैसे hi ट्रैन ने रफ़्तार पकड़ी, उस्मान ने उठ कर दरवाज़ा बंद किया और उसकी कुण्डी (लॉक) चढ़दी.

सीमा खिड़की के पास बैठी बहार गुज़रते पेड़ों को देख रही थी. उसका दिल डर और मज़्ज़े के बीच झूल रहा था.

"सीमा एपीआई... अब हम अकेले हैं," उस्मान ने उसके बराबर में बैठते हुए कहा. केबिन की ठंडी एक हवा में सीमा के जिस्म पर रोइंगट खड़े हो रहे थे.

उस्मान ने अपना हाथ सीमा की रनो (तइस) पर रखा. सीमा ने एक झलक दरवाज़े की तरफ देखि. "उस्मान... कोई देख लेगा, वेटर आ सकता है."

"मैंने बहार 'दो नॉट डिस्टर्ब' का बोर्ड लगा दिया है. अगले 6 घंटे तक कोई नहीं आएगा," उस्मान ने सीमा का दुपट्टा उसके कंधे से निचे गिरा दिया. सीमा ने आज एक गहरे नीले रंग का सूट पहना था, जिसकी फ़िटने उसके भरे हुए जिस्म को मज़ीद उभार रही थी.

उस्मान ने सीमा को पीछे खिड़की से लगा दिया और उसकी गर्दन पर अपने गरम होंठ रख दिए. सीमा ने आँखें बंद कर ली. ट्रैन की हरकत (वाइब्रेशन) उसके जिस्म में एक अजीब सी थरथराहट पैदा कर रही थी.

"तुम्हे पता है, ट्रैन में करने का मज़ा hi अलग है," उस्मान ने सरगोशी की और सीमा की कमीज के निचे हाथ दाल कर उसके नरम पेट को मसलने लगा.

घर का मंज़र (Lahore/Model टाउन कनेक्शन):

उधर घर में, रशीद साहिब ऑफिस जा चुके थे. आयेशा और हिरा कॉलेज निकल गयी थीं. घर में सिर्फ नसीम और हमजा रह गए थे.

हमजा अपने कमरे में किताबें खोल कर बैठा था, मगर उसका ध्यान कल रात के उन मंज़रों में अटका था जो उसने दरवाज़े की झिर्री से देखे थे. सीमा एपीआई का वह नंगा बदन और उस्मान भाई के हाथ... उसके दिमाग में धमाके हो रहे थे.

"हमजा... बीटा, नाश्ता नहीं किया तुमने?"

नसीम कमरे में दाखिल हुई. आज उसने थोड़ा हल्का और बारीक दुपट्टा लिया था. वह हमजा के पास बैठ गयी, इतनी पास के हमजा को उसकी खुशबु साफ़ महसूस हो रही थी.

"जी अम्मी... बस पढ़ रहा था," हमजा ने नज़रें झुका ली. उसका लुंड उसके पजामा में तना हुआ था, और उसे डर था के अम्मी देख न लें.

नसीम ने देखा के हमजा बेचैन है. उसने धीरे से हमजा के बाल सँवारे. "तुम बोहोत थके हुए लग रहे हो. क्या रात को नींद नहीं आयी? या कुछ देख लिया था जिसने नींद उदा दी?"

हमजा का दिल धक् से रह गया. "N-nahi अम्मी... ऐसा कुछ नहीं."

नसीम ने मुस्कुरा कर हमजा का चेहरा ऊपर उठाया. "मुझसे क्या छुपाना? मैं तुम्हारी माँ हूँ. मैं जानती हूँ के इस घर में क्या हो रहा है. और मैं यह भी जानती हूँ के मेरा छोटा बीटा अब बड़ा हो गया है."

नसीम ने उठते वक़्त amadan(deliberately) अपना दुपट्टा हमजा के कंधे से रगड़ा और उसके पास रुक कर सरगोशी की,





"दोपहर को मेरे कमरे में आना... मुझे अपनी पीठ पर थोड़ा तेल (आयल) मालवण है, बोहोत दर्द है."

हमजा सुन्न रह गया. अम्मी की आँखों में वही चमक थी जो उसने कल रात उस्मान भाई की आँखों में देखि थी.

ट्रैन का केबिन (थे हीट रिसेस):

ट्रैन अब पूरी रफ़्तार से दौड़ रही थी. केबिन के अंदर की गर्माहट बहार की गर्मी को मात दे रही थी. उस्मान ने सीमा की कमीज उतार कर फेंक दी थी. सीमा सिर्फ अपनी काली ब्रा और सलवार में थी.

उस्मान ने सीमा को सीट पर लिटा दिया. ट्रैन के झटकों के साथ सीमा के मम्मी oopar-neeche हो रहे थे. उस्मान ने उन्हें अपने हाथों में भरा और बेहरमी से मसलने लगा.

"आह... उस्मान... धीरे... ट्रैन की आवाज़ बहार जाती है," सीमा ने कराहते हुए कहा.

"जाने दो... सब समझेंगे के कोई थका हुआ मुसाफिर सो रहा है," उस्मान ने सीमा की सलवार का नारा (स्ट्रिंग) धीरे से खोला और उसे नीचे खिसकना शुरू किया.

सीमा का नंगा बदन अब ट्रैन की ठंडी एक में पसीने से चमक रहा था. उस्मान ने उसकी दोनों टांगों को फैलाया और उसके बीच की गीली जगह को अपनी ज़बान से छुवा.

"ऊऊह्ह्ह... माआ!" सीमा ने अपने दांत भींच लिए और सीट के कोशिश को ज़ोर से पकड़ लिया. ट्रैन की रफ़्तार और उस्मान की ज़बान का नशा उसे किसी और दुनिया में ले जा रहा था.





उस्मान ने अपना लुंड nikaala—woh लोहे की तरह सख्त और गरम था. उसने सीमा के होंठों पर एक गहरा चुम्बन दिया और फिर एक zor-daar धक्के के साथ उसके अंदर दाखिल हो गया.

"आआआहहह... हाय... उस्मान... मेरा दम निकल जायेगा!" सीमा ने ट्रैन के शोर में अपनी चीख दबा दी.









हर बार जब ट्रैन पटरी बदलती, उस्मान का धक्का और गहरा हो जाता. सीमा ने अपनी टांगें उस्मान की कमर के गिर्द कास ली थीं. वह दोनों इस वक़्त bhai-bahen नहीं थे, बल्कि दो ऐसे जिस्म थे जो हर रिश्ते की मर्यादा को पामाल कर चुके थे.

हराम दरख्वास्त (थे फोर्बिडन रिक्वेस्ट):

घर में सन्नाटा था. हमजा ने दबे पाऊँ नसीम के कमरे का रुख किया. दरवाज़ा हल्का सा खुला था.

नसीम बिस्तर पर उलटी लेती थी. उसने अपनी क़मीज़ पीछे से ऊपर कर राखी थी, उसकी गोरी और चिकनी पीठ हमजा की नज़रों के सामने थी. उसने सिर्फ एक पतली सी ब्रा पहनी थी जिसका हुक पीछे से साफ़ दिख रहा था.

"आ गए हमजा? तेल वहां टेबल पर रखा है... थोड़ा मॉल दो," नसीम ने बिना मुद्दे कहा.





हमजा के हाथ काँप रहे थे. उसने तेल लिया और नसीम की नंगी पीठ पर डाला. जैसे hi उसने मालिश शुरू की, नसीम के मुंह से एक हलकी सी सिसकी निकली.

"हम्म... वैसे hi... थोड़ा नीचे... कमर के पास..."





हमजा का हाथ dheere-dheere नीचे की तरफ जा रहा था, जहाँ नसीम की सलवार शुरू हो रही थी. उसने महसूस किया के उसकी माँ का जिस्म भी गरम हो रहा था.

नसीम ने पलट कर हमजा की तरफ देखा. उसके चेहरे पर एक अजीब सा नशा था. "हमजा... क्या तुमने कभी किसी औरत को ऐसे नंगा देखा है?"

हमजा की ज़बान गुंग हो गयी. नसीम ने उसका हाथ पकड़ा और धीरे से अपनी ब्रा के हुक की तरफ ले गयी. "इसे खोल दो... मुझे सांस लेने में तकलीफ हो रही है."

Episode 9 ख़तम.

क्लिफहैंगर: ट्रैन में उस्मान और सीमा अपने जूनून की आखरी हड्डों को छू रहे हैं. उधर घर में हमजा और नसीम के बीच एक नया और खतरनाक सिलसिला शुरू होने वाला है. क्या हमजा अपनी माँ की ब्रा का हुक खोल पायेगा? और हैदराबाद पहुँच कर बिलाल के सामने सीमा कैसे बेहवे करेगी?
 
कल सूबा 10:30 ऍम - 11: ऍम बीच एक और अपडेट भी देदूंगा.
 
ी वास् रेडी विथ माय अपडेट बूत वास् फेसिंग सम ट्रबल व्हिले फोर्मत्तिंग माय पोस्ट एंड उप्लोअडिंग pics&gifs.

विल तरय अगेन ात 10:00 ऍम.
 
**घर की आग**

Episode 10: देहलीज़ की तपिश और ट्रैन का गरम सफर

लाहौर से हैदराबाद तक की पटरियों पर लोहा लोहे से टकरा रहा था, और इधर घर के बंद कमरों में जज़्बात की गर्मी हर हद्द तोड़ने को तैयार थी.

घर का मंज़र (दोपहर 3:45 पं - 5:00 पं):

हमजा की उँगलियाँ थरथरा रही थीं. उसके सामने उसकी अपनी माँ, नसीम, उलटी लेती हुई थी. उसने ब्रा का हुक pakda—woh ठंडा लोहा हमजा की गरम उँगलियों से टकराया. नसीम ने एक गहरी सांस ली, जिससे उसकी पीठ मज़ीद उभर आयी.

"टिक".

हुक खुल गया. नसीम ने अपने हाथों से ब्रा को आगे से थम लिया.

हमजा की उँगलियाँ नसीम की नंगी पीठ पर तेल मॉल रही थीं.





ब्रा का हुक खुलने के बाद फ़ज़ा में एक अजीब सी bhari-pan आ गयी थी. हमजा का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था के उसे लगा शायद नसीम को सुनाई दे रहा हो.

नसीम ने तकिये में मुँह छुपाये रखा था, मगर उसकी सांसें अब dabi-dabi सिसकारियों में बदल रही थीं. हमजा का हाथ थोड़ा और नीचे गया, जहाँ सलवार की इलास्टिक शुरू होती थी.





"अम्मी... आपकी कमर में बोहोत ज़्यादा दर्द है क्या?" हमजा ने घबराहट में पुछा, मगर उसकी उँगलियाँ रुक नहीं रही थीं.

नसीम ने धीरे से करवट ली. ब्रा अब भी उसके जिस्म पर ढीली पड़ी थी. उसने हमजा की आँखों में dekha—un आँखों में हैरत भी थी और एक अनजानी प्यास भी.

"दर्द सिर्फ कमर में नहीं होता हमजा... कुछ दर्द ऐसे होते हैं जो सिर्फ लम्स (टच) से ठीक होते हैं," नसीम ने सरगोशी की. उसने हमजा का हाथ पकड़ा और उसे धीरे से अपने पेट की तरफ ले गयी.

हमजा सुन्न रह गया. वह अपनी माँ के इतने क़रीब कभी नहीं आया था. मगर इससे पहले के वह अगला क़दम उठता, नीचे main-gate के खुलने की आवाज़ आयी. Khat-khat.

हमजा झट से पीछे हटा. नसीम ने तेज़ी से अपनी ब्रा सही की और क़मीज़ नीचे कर ली. दोनों के चेहरे पसीने से शराबोर थे.

"आयेशा और हिरा आ गयी हैं शायद," नसीम ने भांपते हुए कहा. उसने जल्दी से अपने बाल सँवारे. "हमजा, जल्दी अपने कमरे में जाओ. तेल की बोतल ले जाओ."

हमजा बिना कुछ कहे, थरथराते पैरों से बहार निकला और अपने कमरे में घुस गया. उसका लुंड अभी भी तना हुआ था, और उसके दिमाग में अम्मी की वह नंगी पीठ और उनका गरम लम्स घर कर गया था. वह बिस्तर पर लेट गया, मगर उसकी सांस अब भी उखड़ी हुई थी. यह सिर्फ शुरुआत थी, नसीम ने उसे 'क़ायल' नहीं किया था, बल्कि एक ऐसी राह दिखा दी थी जहाँ से वापसी नामुमकिन थी.

ट्रैन का केबिन (शाम 4:00 पं - 6:30 पं):

ट्रैन लाहौर से काफी दूर निकल चुकी थी. केबिन के अंदर उस्मान और सीमा एक दुसरे के जिस्मों में डूबे हुए थे. पहले धक्के के बाद सीमा का डर ख़तम हो गया था और उसकी जगह हवस ने ले ली थी.

ट्रैन की हरकत (वाइब्रेशन) उनके जिस्मों को एक अजीब सी रदम दे रही थी.





उस्मान ने सीमा की दोनों टांगें अपने कन्धों पर रख ली थीं.





"उस्मान... आह... थोड़ा धीरे... कोई सुन लेगा," सीमा ने सिसकारी ली.

"कोई नहीं सुनेगा एपीआई... ट्रैन का शोर सब दबा देगा," उस्मान ने एक और गहरा धक्का मारा.





सीमा ने अपने दांत उस्मान के कंधे पर गार दिए ताके चीख न निकल जाये.





तक़रीबन आधे घंटे के इस जूनून के बाद, दोनों पसीने में भीगे हुए एक दुसरे से लिपट गए. सीमा का सर उस्मान के सीने पर था.

"अब क्या होगा उस्मान? हैदराबाद पहुँच कर... बिलाल के सामने मैं कैसे रहूंगी?" सीमा ने gham-zada आवाज़ में पुछा.

उस्मान ने उसके बाल सँवारे. "तुम्हे कुछ नहीं करना. बस नार्मल रहना. बिलाल के साथ तुम्हारा रिश्ता सिर्फ दिखावा है, असली नशा तोह यहाँ है."

दोनों ने jaldi-jaldi अपने कपडे सही किये. सीमा ने दुपट्टा सर पर लिया और बिखरा हुआ सुरमा ठीक किया. 6:30 पं तक ट्रैन हैदराबाद स्टेशन पर लग रही थी. जब बिलाल स्टेशन पर दिखा, तोह सीमा का दिल बैठ गया. वह बिलाल के गले तोह लगी, मगर उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी अजनबी को छू रही हो.

घर का रात का मंज़र (10:00 पं - 12:30 ऍम):

घर में रात का खाना हो चूका था. रशीद साहिब, आयेशा और हिरा apne-apne कमरों में जा चुके थे. हमजा अपने कमरे में बैठा किताबें खोल कर बैठा था, मगर ध्यान baar-baar दोपहर वाले मंज़र पर जा रहा था.

रात के 12:15 बज रहे थे जब उसके दरवाज़े पर हलकी सी दस्तक हुई.

नसीम अंदर दाखिल हुई. उसने एक गहरी नीली निघ्त्य पहनी थी, जिस पर एक पतला सा शाल था.

"हमजा... सोये नहीं?" नसीम ने दबे पाऊँ अंदर आते हुए पुछा.

"नहीं अम्मी... नींद नहीं आ रही," हमजा उठ कर बैठ गया.

नसीम उसके पास बिस्तर पर बैठ गयी. घर में पूरा सन्नाटा था, सिर्फ पुराने पंखे की सरसराहट गूँज रही थी.

"दोपहर को... बात अधूरी रह गयी थी," नसीम ने हमजा का हाथ थमा. "तुम्हारे अब्बू सो चुके हैं. आयेशा और हिरा भी गहरी नींद में हैं."

नसीम ने अपना शाल कंधे से निचे गिरा दिया. हमजा ने देखा के नसीम ने अंदर ब्रा नहीं पहनी थी, निघ्त्य के बारीक कपडे से उसके भरे हुए जिस्म की बनावट साफ़ झलक रही थी.

"अम्मी... यह गलत है न?" हमजा ने सरगोशी की, मगर उसने नसीम का हाथ नहीं छोड़ा.

"गलत और सही की देहलीज़ हम दोपहर को hi पार कर चुके थे हमजा," नसीम ने हमजा का हाथ अपने सीने पर रखा.





"अब बस यह देखो के तुम्हारी माँ कितनी अकेली है."

नसीम ने धीरे से अपना सर हमजा के कंधे पर रख दिया. हमजा ने महसूस किया के उसकी माँ का जिस्म तप रहा था. उसने धीरे से नसीम की कमर में हाथ डाला. यह कोई jald-baazi नहीं थी, बल्कि घंटों की बेचैनी का नतीजा था.

हैदराबाद - होटल पर्ल सिटी (रात 1:00 ऍम):

सीमा और बिलाल अपने होटल के कमरे में थे. बिलाल गहरी नींद में था, मगर सीमा की आँखें छत को तक रही थीं. उसका जिस्म अब भी उस्मान के लम्स की गर्मी महसूस कर रहा था.

उसने दबे पाऊँ उठ कर बालकनी का दरवाज़ा खोला. ठंडी हवा उसके जिस्म से टकराई. तभी बगल वाली बालकनी से एक आवाज़ आयी.

"एपीआई... नींद नहीं आ रही?"

उस्मान वहां खड़ा सिगरेट पी रहा था. दोनों बालकनी के बीच सिर्फ एक पतली सी दिवार थी.

"बिलाल सो गया?" उस्मान ने धुंए का काश लेते हुए पुछा.

"जी... सो गए हैं," सीमा ने सरगोशी की.

उस्मान ने अपना हाथ बढ़ाया और सीमा का हाथ पकड़ लिया. "कल रजिस्ट्री है, लेकिन आज रात... अभी बोहोत बाक़ी है. दरवाज़ा खुला है, सीमा."

सीमा ने पीछे मुद कर बिलाल को देखा, और फिर उस्मान की आँखों में देखा. गुनाह की आग अब हैदराबाद की ठंडी रात में भड़कने को तैयार थी.

Episode 10 ख़तम.

क्लिफहैंगर: घर में हमजा और नसीम एक दुसरे की बाहों में हैं, दरवाज़ा बंद है और सन्नाटा गहरा. उधर हैदराबाद में सीमा एक फैसला लेने वाली hai—kya वह अपने सोते हुए शोहर को छोड़ कर अपने भाई के कमरे में जाएगी?

क्या नसीम हमजा को पूरी तरह अपने जाल में फंसा पायेगी, या हमजा डर कर पीछे हैट जायेगा?
 
**घर की आग**

Episode 11: Ehsaas-e-Jurm और अधूरी रात

घर का मंज़र (रात 12:45 ऍम):

हमजा का हाथ नसीम के सीने पर था. निघ्त्य के बारीक कपडे के निचे नसीम की धड़कन इतनी तेज़ थी जैसे कोई परिंदा पिंजरे में phad-phada रहा हो. हमजा ने देखा के नसीम की आँखें बंद थीं, मगर उनकी पलकों पर नमी थी.

"अम्मी... आप रो रही हैं?" हमजा ने सरगोशी की, उसका अपना गाला खुश्क हो रहा था.

नसीम ने झटके से अपनी आँखें खोली. उसने हमजा का हाथ थमा, मगर इस बार उसे दबाया नहीं, बल्कि धीरे से अपने जिस्म से हटा दिया. वह बिस्तर पर थोड़ा पीछे हैट कर बैठ गयी. उसका शाल फर्श पर गिरा हुआ था, मगर अब उसे अपने nange-pan से ज़्यादा अपने रिश्ते का डर सत्ता रहा था.

"हमजा... मैं... मैं क्या कर रही हूँ?" नसीम की आवाज़ काँप रही थी. "मैं तुम्हारी माँ हूँ. मैंने तुम्हे गॉड में खिलाया है. आज नहीं तोह कल अगर तुम्हारे अब्बू जान गए... तोह मैं उन्हें क्या मुंह दिखाउंगी?"

हमजा ने देखा के नसीम का चेहरा डर और शर्म से सुफैद हो गया था. वह खुद भी एक अजीब कश्मकश में था. एक तरफ वह जवान जिस्म की भूक थी जो दोपहर से उसके अंदर आग लगा रही थी, और दूसरी तरफ माँ का वह मोहतरम (रेस्पेक्टेबले) चेहरा जो उसे हर बार टोक रहा था.

"अम्मी, आप hi तोह कह रही थीं के हम देहलीज़ पार कर चुके हैं..." हमजा ने थोड़ा आगे बढ़ने की कोशिश की.

"कह रही थी... मगर दिल नहीं मान रहा हमजा," नसीम ने अपने चेहरे को हाथों में छुपा लिया. "मुझे लग रहा है जैसे घर की दीवारों से सीमा और उस्मान मुझे देख कर हंस रहे हैं. जैसे हर कोना मुझे bad-dua दे रहा है."

हमजा ने नसीम के कंधे पर हाथ रखा. उसने महसूस किया के नसीम का जिस्म बुरी तरह काँप रहा था.





वह जिन्सी तौर पर मायल तोह हो गयी थी, मगर पूरी तरह मुतमईन (सटिस्फीएड) नहीं थी. उसके अंदर की माँ उसके अंदर की औरत से जुंग कर रही थी.

"ठीक है अम्मी... अगर आपको लगता है के यह गलत है, तोह मैं मजबूर नहीं करूँगा," हमजा ने भरी दिल से कहा और बिस्तर से उठने लगा.

नसीम ने फ़ौरन हमजा का पल्लू पकड़ लिया. "नहीं... जाओ मत. अकेली हूँ तोह डर लगता है. बस... बस थोड़ी देर मेरे पास बैठो. कुछ मत करना... बस बैठो."

हमजा वापस बैठ गया.





उस रात, उनके दरमियान हवस तोह थी, मगर डर ज़्यादा गहरा था. नसीम ने हमजा की गॉड में सर रखा और काफी देर तक खामोश रोटी रही.





हमजा उसे सहलाता रहा, मगर उसके दिमाग में वही सवाल tha—kya यह आग ठंडी हो जाएगी, या यह सिर्फ एक तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी है?

हैदराबाद - होटल पर्ल सिटी (रात 1:30 ऍम):

बालकनी की ठंडी हवा सीमा के चेहरे से टकरा रही थी. उस्मान ने उसका हाथ पकड़ा हुआ था. सीमा ने मुद कर अपने सोते हुए शोहर, बिलाल, को देखा. बिलाल be-khabar सो रहा था, शायद सफर की थकन की वजह से.

सीमा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया. "उस्मान... मैं नहीं आ सकती. बिलाल जाग गए तोह क़यामत आ जाएगी. और कल सुबह रजिस्ट्री है... हमें जल्दी उठना है."

उस्मान ने सिगरेट का आखरी काश लिया और उसे नीचे फ़ेंक दिया. वह दिवार के ऊपर से झुका और सीमा के कान के पास सरगोशी की.

"एपीआई... डर रही हो या शर्म आ रही है? ट्रैन में तोह तुम बोहोत बहादुर बन रही थीं. क्या बिलाल के पास आते hi मेरा नशा उतर गया?"

सीमा ने होंठ भींचिये. "ऐसा नहीं है. मगर यहाँ... इस होटल में... डर लगता है."

"ठीक है," उस्मान ने dheet-pan से कहा. "मत आओ. मगर कल रजिस्ट्री के बाद, मैं तुम्हे एक ऐसी जगह ले जाऊंगा जहाँ बिलाल तोह क्या, खुदा भी हमें नहीं देख पायेगा. तब तक... अपने शोहर के साथ सुकून कर लो."

उस्मान अपने कमरे के अंदर चला गया और दरवाज़ा बंद कर दिया. सीमा वही कड़ी रही. उसका जिस्म अब भी उस्मान की तालाब में जल रहा था, मगर इस अनजान जगह ने उसके पैरों में बेड़ियाँ दाल दी थीं. वह वापस कमरे में आयी और बिलाल के बराबर लेट गयी.

बिलाल ने नींद में hi सीमा को अपनी तरफ खिंचा और उसके गले में मुँह छुपा लिया. सीमा को बिलाल की सांस भी अपने जिस्म पर बोझ लग रही थी. उसने आँखें बंद की तोह उसे उस्मान का वह सख्त लम्स याद आया.

घर का मंज़र (सुबह 6:30 ऍम)

सूरज की पहली किरण खिड़की से झांक रही थी. घर में एक अजीब सी ख़ामोशी थी, मगर हमजा के कमरे के अंदर का माहौल अब भी उस bhari-pan से भरा था जो पूरी रात नसीम और हमजा के दरमियान रहा.

नसीम दबे पाऊँ हमजा के बिस्तर से उठी. उसने अपना शाल सही से अपने जिस्म पर लपेटा. पूरी रात वह हमजा के पास बैठी रही, कभी रोटी रही, कभी उसका हाथ पकड़ कर सुकून ढूंढ़ती रही. कुछ 'ऐसा' नहीं हुआ था, मगर माँ और बेटे के दरमियान का वह मोहतरम रिश्ता अब एक ऐसी दलदल में उतर चूका था जहाँ से दोनों hi निकलना नहीं चाहते थे.

नसीम ने धीरे से हमजा के कमरे का दरवाज़ा खोला और कॉरिडोर में क़दम रखा ताके अपने कमरे की तरफ जा सके. उसने सोचा था के सब सो रहे होंगे.

मगर सामने से हिरा आ रही थी, हाथ में पानी का गिलास लिए. दोनों की नज़रें टकरायीं. हिरा वही ठिठक गयी, उसकी आँखों में हैरत और एक गहरा सवाल था.

"अम्मी? आप... इतनी सुबह हमजा के कमरे से?" हिरा ने धीरे से पुछा, मगर उसकी आवाज़ में एक थरथराहट थी.

नसीम का दिल धक् से रह गया, मगर उसने तजुर्बे से काम लिया. उसने अपने चेहरे पर थकन ओढ़ ली.





"वह... बीटा, हमजा को रात को थोड़ा बुखार लग रहा था. उसने मुझे बुलाया था तोह मैं उसे दवाई देने और थोड़ी देर पट्टी करने रुक गयी थी. कब आँख लग गयी, पता hi नहीं चला."

हिरा ने अपनी माँ को सर से पाऊँ तक देखा. नसीम की निघ्त्य के निचे से उसका शाल थोड़ा फिसला हुआ था और उसके बाल बिखरे थे. "लेकिन अम्मी, मैं रात को दो बजे पानी लेने उठी थी... तब तोह हमजा के कमरे का दरवाज़ा अंदर से बंद था."

नसीम के पाऊँ टेल ज़मीन निकल गयी. उसने हिरा की आँखों में dekha—woh सीढ़ी साधी हिरा अब पहले जैसी नहीं लग रही थी. उसने बात सँभालने की कोशिश की. "वह... शायद लैच खुद hi लग गया होगा पुराण है न. चलो, अब तुम जा कर सो जाओ या नाश्ते की तयारी करो."

नसीम तेज़ी से अपने कमरे की तरफ बढ़ गयी, मगर हिरा वही कड़ी रही. उसने देखा के हमजा के कमरे का दरवाज़ा अब भी थोड़ा सा खुला था. उसने झांक कर देखा, हमजा बिस्तर पर बैठा था और उसके चेहरे पर वही 'गिल्ट' था जो नसीम छुपा रही थी.

हिरा किचन की तरफ चली गयी, मगर उसका दिमाग अब मुसलसल पिछले कुछ दिनों की अजीब हरकतों को जोड़ रहा था. सीमा एपीआई का निशाँ, उस्मान भाई की रातों की gayab-bazi, और अब अम्मी का हमजा के कमरे में बंद दरवाज़े के पीछे होना.

हैदराबाद - रजिस्ट्री का दिन (सुबह 10:00 ऍम)

हैदराबाद की धुप तेज़ थी. बिलाल, उस्मान और सीमा रजिस्ट्री ऑफिस में थे. काम ख़तम होने के बाद बिलाल बोहोत खुश था.

"चलो! रजिस्ट्री तोह हो गयी. अब मैं तुम दोनों को हैदराबाद की मशहूर बिरयानी खिलाऊंगा," बिलाल ने ख़ुशी से कहा.

उस्मान ने सीमा की तरफ देखा और फिर बिलाल से बोलै, "बिलाल भाई, आप जाइये और होटल में हमारे लिए टेबल बुक करिये. मुझे सीमा एपीआई को एक पुराणी दरगाह दिखानी है जो यहीं पास में है. उन्होंने लाहौर में कहा था के उन्हें यहाँ की किसी पुराणी जगह जाना है."

बिलाल ने बिना किसी शक के हाँ कह दी. "ठीक है! तुम लोग जाओ, मैं होटल पहुँचता हूँ."

बिलाल के जाते hi उस्मान ने सीमा का हाथ पकड़ा. "एपीआई... अब वह जगह आने वाली है जहाँ कोई नहीं होगा."

सीमा का दिल धड़कने लगा. "उस्मान... हमें होटल जल्दी पहुंचना चाहिए."

"होटल में तोह तुम बिलाल के साथ होती हो," उस्मान ने टैक्सी को इशारा करते हुए कहा, "अभी तुम सिर्फ मेरी हो."

टैक्सी उन्हें शहर के शोर से दूर एक सुनसान पुराने फार्म हाउस की तरफ ले जाने लगी, जो शायद उस्मान ने प्रॉपर्टी डील के सिलसिले में पहले से देख रखा था.

घर का मंज़र (दोपहर 1:00 पं)

घर में नाश्ता ख़तम हो चूका था. रशीद साहिब ऑफिस जा चुके थे. हिरा किचन में बर्तन धो रही थी जब नसीम वहां आयी.

दोनों के बीच एक भरी ख़ामोशी थी. हिरा ने अचानक बर्तन रखा और नसीम की तरफ मुड़ी.

"अम्मी... आपने हमजा के कमरे में कोनसी दवाई दी थी? क्यूंकि हमारे मेडिसिन बॉक्स में तोह बुखार की दवाई ख़तम है."

नसीम के हाथ रुक गए. उसने महसूस किया के घर की ये 'सीढ़ी' बेटी अब इस राज़ की देहलीज़ पर कड़ी है.

"हिरा... तुम बोहोत ज़्यादा सवाल नहीं कर रही हो?" नसीम ने थोड़े सख्त लहजे में कहा.

"सवाल तोह उनसे किये जाते हैं अम्मी जिनका जवाब साफ़ हो," हिरा ने हिम्मत दिखते हुए कहा. "मैंने सब देखा है. उस्मान भाई और सीमा एपीआई को भी... और अब आप और हमजा..."

नसीम सुन्न रह गयी. घर की आग अब सिर्फ कमरों तक महदूद नहीं रही थी, वह अब फैल रही थी.

Episode 11 ख़तम.

क्लिफहैंगर: हिरा ने खुल कर बोल दिया है. क्या नसीम उसे चुप करवाएगी या हिरा भी इस आग में शामिल हो जाएगी? उधर सुनसान फार्म हाउस में उस्मान सीमा के साथ क्या करने वाला है?
 
**घर की आग**

Episode 12: ख़ामोशी की क़ीमत और वीराने का जूनून

लाहौर की ठंडी दुश्मनी और हैदराबाद की ताप्ती दोपहर अब एक ऐसे मोड़ पर आ कड़ी हुई थी जहाँ से हर रिश्ता एक नए इम्तेहान में था.

घर का मंज़र (दोपहर 1:15 पं):

किचन की फ़ज़ा में सन्नाटा इतना गहरा था के नलके से गिरने वाली पानी की हर बूँद एक धमाके की तरह महसूस हो रही थी. नसीम ने बर्तन धोने वाला कपडा थोड़ा कसकर पकड़ा. उसने मुद कर हिरा की आँखों में dekha—woh आँखें जो कभी शर्म से झुकी रहती थीं, आज सवालों की आग उगल रही थीं.

"हिरा... तुम होश में तोह हो? यह क्या बकवास कर रही हो?" नसीम ने अपने लहजे में थोड़ी सख्ती लेन की कोशिश की, मगर उसकी थरथराती आवाज़ ने उसका साथ नहीं दिया.

हिरा ने एक क़दम आगे बढ़ाया. "अम्मी, मैं बची नहीं हूँ. मैंने पिछली रात से पहले भी बोहोत कुछ महसूस किया है. उस्मान भाई का सीमा एपीआई के कमरे में घंटो रहना... और अब आपका हमजा के साथ..." हिरा की आवाज़ थोड़ी धीमी हुई, "क्या इस घर में अब सिर्फ गुनाह hi बचा है?"

नसीम ने देखा के हमजा किचन के दरवाज़े के पास खड़ा सब सुन रहा था. उसका चेहरा पसीने से तर था. नसीम ने एक लम्बी सांस ली और हिरा का हाथ पकड़ कर उसे एक कोने में ले गयी.

"हिरा... सुनो," नसीम की आवाज़ अब सरगोशी में बदल गयी थी, "इस घर की इज़्ज़त सिर्फ एक धागे से बंधी है. अगर तुमने अपना मुँह खोला, तोह तुम्हारे अब्बू की जान चली जाएगी. क्या तुम चाहती हो के हमारा परिवार सड़क पर आ जाये?"

हिरा ने अपनी माँ को घोर से देखा. "तोह इज़्ज़त बचने का रास्ता सिर्फ यह है के हम सब इसमें डूब जाएं? अम्मी... मुझे डर लग रहा है."

नसीम ने हिरा को गले से लगा लिया. "डर मत बेटी... बस खामोश रहना सीखो. इस घर में ख़ामोशी hi सबसे बड़ी ताक़त है."

हमजा ने देखा के कैसे उसकी माँ ने अपनी 'सीढ़ी' बेटी को अपने जाल में लपेटना शुरू कर दिया था. लेकिन हिरा के चेहरे पर अब भी एक अजीब सी कश्मकश thi—pachtawa या शायद... तजस्सुस (क्यूरोसिटी)?

हैदराबाद - सुनसान फार्म हाउस (दोपहर 2:30 पं):

टैक्सी ने उन्हें शहर के शोर से 15 किलोमीटर दूर एक पुराने, लेकिन बड़े फार्म हाउस के सामने उतरा. यह जगह चारो तरफ से घने पेड़ों से घिरी हुई थी. सीमा का दिल zor-zor से धड़क रहा था.

"उस्मान... यहाँ क्यों लाये हो? बिलाल होटल में इंतज़ार कर रहा होगा," सीमा ने दुपट्टा सँभालते हुए कहा.

उस्मान ने पॉकेट से एक चाबी निकाली और फार्म हाउस का बड़ा सा काला दरवाज़ा खोला. "बिलाल को लग रहा है तुम दरगाह में दुआ मांग रही हो. मगर आज... दुआ मैं मांगूंगा और क़ुबूल तुम करोगी."

अंदर दाखिल होते hi उस्मान ने दरवाज़ा अंदर से लॉक कर दिया. पुराण फर्नीचर, धुल और बंद कमरों की महक फ़ज़ा में थी. उस्मान ने सीमा को पीछे से बाहों में भरा और उसका दुपट्टा फर्श पर गिरा दिया.

"यहाँ कोई नहीं है सीमा एपीआई. सिर्फ हम दोनों... और यह सन्नाटा."

उस्मान ने सीमा को एक पुराने मगर बड़े सोफे पर धक्का दिया. उसने सीमा की कमीज के बटन खोलने शुरू किये. सीमा ने रोकने की कोशिश की, मगर उस्मान का जूनून आज हद्द से पार था.

"उस्मान... बिलाल... वह..."

"भूल जाओ उसे!" उस्मान ने गरज कर कहा और सीमा के होंठों को बेहरमी से चूसने लगा. सीमा का जिस्म ट्रैन की थकन और दोपहर की गर्मी में पिघलने लगा. उस्मान ने उसकी सलवार उतार कर दूर फ़ेंक दी. उसके गोर और भरे हुए जिस्म पर पुराने फार्म हाउस की रौशनी एक अजीब सा नशा पैदा कर रही थी.

उस्मान ने अपना सख्त लुंड निकाला और बिना किसी तैयारी के, सीमा की गीली होती हुई फुद्दी पर एक zor-daar धक्का मारा.





"आआआहहह... उस्मान!" सीमा की चीख फार्म हाउस की खामोश दीवारों से टकरा कर वापस आयी. उस्मान ने उसके मुंह पर हाथ रख दिया. "चुप... मज़े लो... आज यहाँ हमें कोई रोकने वाला नहीं."





उस्मान ने जानवरो की तरह धक्के मरने शुरू किये.

सीमा की टांगें सोफे के किनारों से टकरा रही थीं. वह डर रही थी, मगर उसकी हवस उसके डर पर हावी हो रही थी. हर धक्के के साथ सीमा का जिस्म उछाल रहा था.





घर का मंज़र (शाम 5:00 पं):

घर में रशीद साहिब के आने का वक़्त हो रहा था. हमजा अपने कमरे में लेट कर हिरा की बातों के बारे में सोच रहा था. तभी दरवाज़ा खुला और हिरा अंदर आयी.

उसके हाथ में चाय का कप था. उसने दरवाज़ा धीरे से बंद किया.

"हमजा... मुझे sach-sach बताओ," हिरा ने कप टेबल पर रखते हुए पुछा, "रात को अम्मी के साथ... तुमने क्या किया?"

हमजा ने नज़रें चुरा ली. "कुछ नहीं हिरा... मैंने कहा न उन्हें बुखार था."

हिरा हमजा के बिलकुल पास बैठ गयी. उसने हमजा का हाथ थमा. "मुझसे झूट मत बोलो. मैंने अम्मी की आँखों में वह देखा है जो मैंने सीमा एपीआई की आँखों में देखा था. क्या तुम... तुम मुझसे भी कुछ छुपा रहे हो?"

हिरा ने हमजा का हाथ अपने गले के पास रखा. हमजा ने महसूस किया के हिरा का जिस्म भी गरम हो रहा था. क्या हिरा गुस्सा थी, या वह भी इस आग में अपनी जगह ढून्ढ रही थी?

"हिरा... तुम क्या कर रही हो?" हमजा ने घबरा कर पुछा.

हिरा ने मुस्कुरा कर अपना सर हमजा के कंधे पर रख दिया. "मैं बस यह देखना चाहती हूँ के इस घर में सब इतने पागल क्यों हैं."

Episode 12 ख़तम.

क्लिफहैंगर: फार्म हाउस में उस्मान और सीमा अपने जूनून की आखरी हद्द पार कर रहे हैं. उधर घर में हिरा ने हमजा को एक अजीब सी सिचुएशन में दाल दिया है. क्या हिरा हमजा के ज़रिये इस गुनाह का मज़ा चखना चाहती है?
 
**घर की आग**

Episode 13: पहली छेड़खानी और फार्म हाउस का खौफ
लाहौर की ठंडी दीवारों के पीछे पिछले कुछ घंटों से जो खामोश साज़िशें पाक रही थीं, अब उनकी आंच बहार निकलने लगी थी. हर किरदार इस हवस की भट्टी में थोड़ा और झुलसता जा रहा था.

घर का मंज़र (शाम 5:15 पं):

हमजा के कमरे में राखी हुई चाय ठंडी हो रही थी, मगर कमरे का तापमान (टेम्परेचर) बढ़ता जा रहा था. हिरा, जो हमेशा दुपट्टा सर पर ओढ़े रखती थी, आज हमजा के इतने क़रीब बैठी थी के उनके जिस्म एक दुसरे से टकरा रहे थे.

"हिरा... अब्बू आते hi होंगे. तुम बहार जाओ," हमजा ने हिचकिचाते हुए कहा, मगर उसने हिरा का हाथ नहीं छोड़ा.

हिरा ने अपनी नज़रें उठायीं. उन आँखों में पहले वाली मासूमियत नहीं थी, बल्कि एक अजीब सा तंज़ (सर्चसम) था. "अब्बू आएंगे तोह अम्मी के कमरे में जायेंगे... या शायद किचन में. मेरे भाई के कमरे में तोह कोई नहीं झांकता, है न?"

हिरा ने हमजा की हथेली को अपने गले से नीचे उतरा और अपने सीने के ऊपर रखा. हमजा का सांस अटक गया. हिरा ने ब्रा नहीं पहनी थी, सिर्फ एक पतला सा लॉन का सूट था जिसके नीचे से उसके नरम और छोटे मम्मी हमजा की हथेली में साफ़ महसूस हो रहे थे.

"हिरा! यह क्या... तुम पागल हो गयी हो?" हमजा ने सरगोशी की, मगर उसकी उँगलियाँ khud-ba-khud हिरा के जिस्म को मसलने लगीं.

"मैं सिर्फ यह देखना चाहती हूँ के सीमा एपीआई और अम्मी को इसमें क्या मज़ा आता है," हिरा ने आँखें बंद कर ली. उसका जिस्म पहली बार किसी मर्द के लम्स से थरथरा रहा था. "बताओ न हमजा... क्या मैं अम्मी से काम हूँ?"

हमजा ने हिरा को dekha—woh कच्ची काली थी, नरम और नज़ाक़त से भरी. उसने हिरा को अपनी तरफ खिंचा और उसके होंतून के क़रीब अपना मुंह ले गया. हिरा ने डर कर आँखें भींची थीं, मगर वह पीछे नहीं हटी.

तभी बहार हॉल में रशीद साहिब की आवाज़ गूंजी. "नसीम! ज़रा पानी लाना... बोहोत थक गया हूँ आज."

दोनों झटके से एक दुसरे से दूर हुए. हिरा ने जल्दी से अपना दुपट्टा सही किया और बिना हमजा की तरफ देखे तेज़ी से कमरे से बहार निकल गयी. हमजा बिस्तर पर गिर गया, उसके हाथों में अब भी हिरा के नरम जिस्म का एहसास बाक़ी था.

हैदराबाद - फार्म हाउस (शाम 5:30 पं):

फार्म हाउस के अंदर सन्नाटा गहरा था, मगर सोफे पर बिखरे हुए कपडे और सीमा की दबी हुई सिसकारियां एक अलग hi दास्तान सुना रही थीं. उस्मान ने सीमा को घुटनो के बल किया हुआ था और पीछे से बेहरमी से धक्के मार रहा था.

"आह... उस्मान... बस करो... बिलाल को शक हो जायेगा," सीमा ने भांपते हुए कहा. उसका चेहरा पसीने से lath-path था.

"बिलाल को... आज... मैं... भुला दूंगा," उस्मान ने हर लफ्ज़ के साथ एक zor-daar झटका मारा. सीमा की फुद्दी से निकलने वाली 'thap-thap' की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी.

अचानक, बहार से किसी जारी के रुकने की आवाज़ आयी. कररर...

सीमा और उस्मान दोनों ठिठक गए. उस्मान ने झट से अपना लुंड बहार निकला और खिड़की की तरफ भगा. बहार एक टैक्सी कड़ी थी और उसमे से बिलाल निचे उतर रहा था.

"ो तेरी! बिलाल यहाँ कैसे पहुँच गया?" उस्मान ने घबरा कर कहा.

सीमा के पाऊँ टेल ज़मीन निकल गयी. वह नंगी फर्श पर बैठी थी, उसकी सलवार दूर पड़ी थी. "मैंने कहा था उस्मान! वह हमें ढून्ढ लेगा... अब क्या होगा? वह हमें जान से मार देगा!"

"चुप रहो! जल्दी कपडे पहनो!" उस्मान ने अपने कपडे उठाये और तेज़ी से पेहेन्ने लगा. "सीमा, बाथरूम में घुसो और नाहा लो... कहो के तुम्हे गर्मी लग रही थी इसलिए तुम यहाँ रुक गयी नहाने के लिए."

बिलाल बहार से दरवाज़ा khat-khatane लगा. "उस्मान! सीमा! तुम लोग अंदर हो?"

सीमा ने कांपते हाथों से अपनी सलवार पहनी और बाथरूम की तरफ भागी. उस्मान ने एक गहरी सांस ली, अपना चेहरा साफ़ किया और दरवाज़ा खोला.

"अरे बिलाल भाई! आप यहाँ?" उस्मान ने ऐसी एक्टिंग की जैसे वह बोहोत हैरान हो.

बिलाल का चेहरा गुस्से से लाल था. "तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो? मैंने होटल में दो घंटे इंतज़ार किया. फिर मैंने टैक्सी वाले का नंबर निकला जिसके साथ तुम लोग आये थे... वह मुझे यहाँ ले आया. सीमा कहाँ है?"

उस्मान ने मुस्कुरा कर कहा, "बिलाल भाई, दरगाह के पास बोहोत भीड़ थी, सीमा एपीआई को चक्कर आने लगे थे. तोह मैंने सोचा यहाँ मेरे दोस्त का फार्म हाउस है, यहाँ थोड़ा आराम कर लेंगी. वह अंदर नाहा रही हैं, गर्मी बोहोत थी न."

बिलाल ने उस्मान को घोर से देखा. उसके दिमाग में शक की एक किरण जगी, मगर उसने फार्म हाउस के माहौल को देखा. सब कुछ बिखरा हुआ लग रहा था.

घर का मंज़र (रात 9:00 पं):

खाने की मेज़ पर सब खामोश थे. रशीद साहिब अपनी प्रॉपर्टी की बातों में मसरूफ थे, मगर नसीम की नज़रें baar-baar हमजा और हिरा पर जा रही थीं. हिरा हमेशा की तरह नज़रें झुकाये खाना खा रही थी, मगर उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी.

"हिरा, आज तुमने चाय दी थी हमजा को?" नसीम ने अचानक पुछा.

हिरा ने नज़रें उठायीं. "जी अम्मी... क्यों?"

"नहीं... बस पूछ रही थी. आज तुम बोहोत खुश लग रही हो," नसीम ने तंज़ से कहा.

हमजा ने महसूस किया के नसीम को कुछ तोह महसूस हो गया है. वह अपनी बेटी की हर हरकत को पहचान रही थी. क्या नसीम को जलन हो रही थी के उसका बीटा अब हिरा की तरफ झुक रहा है?

रात को जब रशीद साहिब सो गए, नसीम दबे पाऊँ हमजा के कमरे में दाखिल हुई. इस बार उसने दरवाज़ा अंदर से लॉक किया और सीधा हमजा के बिस्तर पर बैठ गयी.

"हमजा... आज शाम को हिरा तुम्हारे कमरे में क्या कर रही थी?" नसीम ने हमजा का कालर पकड़ कर उसे अपनी तरफ खिंचा. उसका लहजा सख्त था.

"अम्मी... कुछ नहीं... वह बस चाय लेकर आयी थी," हमजा ने झूट बोलै.

नसीम ने हमजा के होंठों पर अपनी ऊँगली फेरी. "मुझसे झूट मत बोलो. मैं देख रही हूँ के हिरा की आँखें बदल रही हैं. क्या तुमने उसे भी वैसा hi छुआ है जैसे मुझे?"

नसीम ने अपनी निघ्त्य का गाला थोड़ा नीचे किया. "बताओ हमजा... क्या तुम्हे कच्ची कलियाँ ज़्यादा पसंद आने लगी हैं?"

Episode 13 ख़तम.

क्लिफहैंगर: नसीम को जलन हो रही है! क्या वह हमजा को हिरा से दूर रखने के लिए कोई नया खेल खेलेगी? उधर हैदराबाद में, बिलाल फार्म हाउस के अंदर दाखिल हो चूका hai—kya सीमा बाथरूम से बहार आते hi पकड़ी जाएगी? क्या बिलाल को फर्श पर बिखरे हुए निशाँ मिलेंगे?
 
सॉरी फॉर थे डिले ऑफ़ उप्दतिंग थिस स्टोरी, एक्चुअली आईटी वास् बिकॉज़ ऑफ़ कन्फूसिओं. ी वास् ा बिट कन्फ्यूज्ड तहत, इस थिस स्टोरी प्लाट नॉट गुड एनफ और इस तेरे अन्य प्रॉब्लम इन माय नररातिओं.

ी ट्राइड इन सम डिफरेंट वेज़ बूत आईटी वास् बदली अफ्फेक्टिंग माय स्टोरी.

ी विल दो आईटी अस ी लिकेड आईटी.

ी ऍम नॉट गोइंग चेंज माय स्टोरी और नररातिओं, ी विल दो आईटी इन माय ओन वे.
 
दो दिन से काफी बिजी सचेडूले चलरहा है, बिलकुल भी टाइम नहीं निकल पाया हूँ. सॉरी फॉर थे इंटेररूपतिओं इन थे अपडेट प्रोसेस.
 
अभी एक अपडेट देदूं देने को लेकिन काफी थका हुआ भी हूँ, इसलिए पूरी तरह से अपडेट को अछि तरह संवार कर दोपहर 1:00 पं - 2:00 पं के बीच देने का इरादा है.

साथ बने रहिये.
 
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