अपडेट. 194
यहाँ सोफिया को जल्दी वाशरूम जाना था
सोफिया ......माफ कीजियेगा हमें पैर हमें अभी जल्दी है थोड़ी
सूर्य ........ क्या मतलब जल्दी है
सोफिया को आवर कुछ सुजा नहीं तो वह कोमल का हाथ पकड़ कर एक आवर ले जा कर कान में कुछ बोलती है
जिसे सुन कोमल की भी हंसी चुत जाती है
सोफिया .....कोमल बजी प्लेसेस
कोमल ........ok बाबा सॉरी तुम मेरे साथ चलो आवर मर. आप निचे जाइये आपकी सोफी आपसे बाद में मिलेगी
कोमल सोफिया को लिया सूर्य के रूम में गेस जाती है
बेचारे सूर्य का तो आते हे सोफिया ने पोपट कर दिया
सूर्य भी वह से निचे की आवर चल देता है जहा बाकि सभी पुरुष बे थे थे बैठक में ..................
अब आगे .........
शिव ....... क्या बात है बीटा सूर्य तुम यहाँ पे कैसे वो भी इस वक़्त रात 11 बजे
शालिनी जी ....... क्या हुआ बीटा सूर्य तुम अभी तक सोये नहीं
सूर्य ....... वो माँ मेरा रूम पूरा बुक हो चूका है वह कोमल ने कब्ज़ा कर लिया है
शिव ........ अभी सदी हुई नहीं आवर तुम दोनों की आवर कोमल ने रूम से भी निकल दिया
शालिनी जी ....... लगता है शिव आज आपका बहार सोने का मन है
तुम ीदार आओ मेरे पास बैठो आवर बताओ बात क्या है
सूर्य ....... ऐसा कुछ नहीं है माँ वो सुनिधि कोमल आवर सोफिया मेरे रूम में सोने चली आई तो मैं आपके पास आ गया सोने के लिया
शिव ....... तू पक्का मुझे आज बहार सुलाएगा बीटा
सूर्य ....... ऐसा कुछ नहीं है पापा मैं छठ पे चला जाता हूँ
शिव .....उसकी कोई जरुरत नहीं है बीटा वैसे भी बहुत कमरे है हवेली में मैं उनके से किसी एक में सो जाता हूँ तुम अपनी माँ के पास सो जाओ
शिव जो कुछ लिख रहे थे सब कुछ समेत कर अलमारी में रख कर सूर्य के माथे पे किश कर नाईट के लिया अपने कपडे ले कर रूम से निकल जाते है
सूर्य उनने रोकता भी है पैर वो गुड नाईट बोल कर निकल गए
शालिनी जी ....... जानने दो उनने सूर्य वो चाहते है की तुम सुकून से सो सको मेरे साथ
शालिनी जी अपनी अलमारी से निघटजोन निकल कर बाथरूम में चेंज कर रूम को लॉक कर सूर्य के बगल में आ कर लेट जाती है
सूर्य शालिनी जी की आवर करवट ले कर लेट जाता है
आवर शालिनी जी के सीने के निचे से हाथ दाल उनसे चिपक जाता है
सूर्य को ऐसा किसी छोटे बचे जैसा भारतव करते देख शालिनी जी को सूर्य का बचपन जो दोनों ने साथ में बिताया था वो बचपन की यादें फिर से शालिनी जी मंद में आँखों के सामने से गुजर जाती जिनसे शालिनी जी के चेहरे पे भी ख़ुशी बिखेर जाती है
शालिनी जी ........ तुमने अभी तक अपने बचपन की आदते बदली नहीं सूर्य
सूर्य ....... माँ वो बचपन की आदते है जिनमे आपका प्यार आपकी यादें समायी है उन्हें कैसे बदल सकता हूँ
जब कभी बिज़नेस के चलचलते पापा घर नहीं आते रात को तब आप हे तो थी जिनसे लिपट कर मैं चैन से सो पता था
शालिनी जी ........ पैर अब तुम बड़े हो गए हो परषो तुम्हारी सदी है कुछ महीनो बाद तुम भी पापा बन जाओगे
सूर्य ....... Hello माँ आप कहा से कहा पहुंचने गई
आप तो अभी से पोते पोती के सपने देख रहे हो
शालिनी जी ....... फिर उस दिन क्या हो रहा था मुझे तो क्यूट से स्वीटी चाइये ये तुमने हे कहा था न स्वीटी से
सूर्य ....... माँ वो सब मजाक था वैसे सॉरी माँ
शालिनी जी ........ सॉरी किस लिया बोल रहे हो बीटा
सूर्य ......वो मैंने आवर स्वीटी ने आपसे एक बात चौपाई है
शालिनी जी ...... कोई बात नहीं बीटा तुम्हे आवर स्वीटी ने चौपाई है तो बात को छिपाने की बझा भी रही होगी
सूर्य ....... माँ हम नहीं चाहते थे की किसी को ये बात पता चले पैर आप ये बात अपने तक हे रखना
शालिनी जी ...... अगर ऐसी बात है तो रहने दे बीटा क्युकी जाने अनजाने ऐसी बाते मुँह से निकल हे जाती है चल अब सो जा चुपचाप सुबह बहुत से काम है
सूर्य शालिनी जी को अपनी आवर करवट करवा कर अपना सर उनकी छाती से लगा कर लेट जाता है
शालिनी जी के निरंतर सूर्य के सर में चलते हाथो से सूर्य जल्दी हे गहरी नींद में चला जाता है
शालिनी जी ने जो निघटजोन डाला था वो फुल साइज था जिस से उनने परेशानी हो रही थी क्यों की नाईट में सॉर्ट निघ्त्य दाल कर सोने की आदत जो थी शालिनी जी को
कुछ 1 घंटे बाद शालिनी जी उठी आवर दूसरी जो आरामदायक निघ्त्य थी वो दाल कर वैसे हे लेट गई
काफी लेट तक शालिनी जी सूर्य को निहारती रही
फिर न जाने कब ुंखी आँख लगी जिस कारन सुबह शालिनी जी की आँखे रोज के समय से थोड़ी लेट खुली
उन्हें भी अपने बेटे के साथ सोने में सुकून मिला था
सूर्य अभी ुशी फरहा लेता था बस हाथ कमर के पे न हो कर शालिनी जी ब्लैक पेंटी में काशी मुलायम नितम्ब पे थे जिनका आभाष शालिनी जी को जागने पे हुआ
शालिनी जी ...... अच्छा हुआ सूर्य अपने टाइम पे नहीं उठा वर्ण वो खुद शर्मिंदा हो जाता नींद में हुए इस गलती की वजह से
सूर्य का एक पेअर शालिनी जी के दोनों पैरो के बिच निघ्त्य के ऊपर से उनकी योनि को छू रहा था
जिसे अपने पैरों के बिच से हटाने के लिया शालिनी जी अपना हाथ बढ़ा कर सूर्य का पेअर जांघों के पास से पकड़ा तो उनका के पुरे सरीर में जुरजूरी से दौड़ जाती है
शालिनी जी को जैसी किसी ने पत्थर की मूरत में बदल दिया हो
उनकी सांसे तेज हो जाती है जिस से उनका सीना ऊपर निचे होने लगता कुछ पल वैसे रुकने के बाद शालिनी जी निकट जूता कर अपनी गर्दन उठा कर देखती है तो सामने शार्ट सहित सूर्य का कामदण्ड शालिनी की योनि से चिपका हुआ था आवर उसका लिंगमुण्ड शालिनी जी के नाभि से थोड़ा निचे अपने रुद्ररूप में होने का आभाष शालिनी जी के नाभि के निचे वह योनि के ऊपर हिस्शे पे थपकी दे रहा था
दरशल पहले ऐसा नहीं था शालिनी जी ने जब सूर्य का पेअर नहीं खुष्काया था उस से पहले सूर्य के पेअर के जैसे हे सूर्य का कामदण्ड भी उनकी योनि से लगा हुआ था पैर जब पेअर थोड़ा पीछे हुआ को कोबरा उछलते हुए शालिनी जी की योनि को रगड़ते हुए उनकी योनि के पूरी भाग जिसने आम भाषा में पेडू भी कहा जाता जो भाग योनि के ऊपर शीशे में उभरा हुआ होता है
किसी तरह खुद को थोड़ा पूछ कर सूर्य को सीधा कर शालिनी जी बीएड से निचे उतर जाती है
अपनी नाईट ठीक कर सूर्य को देखती है जो अभी भी आराम से सोया हुआ था
सूर्य को देखते हुए उसके नंगे ऊपरी भाग से होते हुए शालिनी जी की नजर वही पे आतम जाती है
शालिनी जी को सुबह सुबह अपनी योनि में रिसाव सा महसूस होने लगता है उनके सामने सूर्य के साथ जो बाथरूम में इंसिडेंट हुआ था वो याद आते हे शालिनी जी फ़ौरन बाथरूम घुसा जाती
नहाने वह फ्रेश होने में कोई अदा घटा लगा शालिनी जी को
खुद को मिरर के सामने त्यार कर जब गेट खोलने के लिया जाने लगी क्यों की बहार से काफी आवाजे जो आ रही थी
तभी शालिनी पता नहीं क्या सोच कर सूर्य के पास पहुंची आवर उसके माथे पे किश करती है आवर निचे की आवर जूख्ट हुए हलके से शालिनी जी अपने होंठ सोये हुए सूर्य के होंटो पे रख 2 ,3 बार चुम लेती है
फिर पलट कर तेजी से गेट के पास जा कर लम्बी लम्बी सांसे लेती है आवर गेट खोल कर बहार निकल जाती है
शालिनी जी के बहार जाते हे सूर्य अपनी आँखे खोल देता आवर सीधा उठ कर मिरर के सामने जाता है
अपने हों तो पे लगी हाली रेड लिपस्टिक के नीसाण को देख कर
सूर्य ...... मतलब माँ ने सच में मेरे हों तो पे किश किया है ये कोई सपना नहीं था पैर ऐसा उन्होंने पहले तो कभी नहीं किया
सूर्य गौर से फिर से मिरर में खुद को देखता है
तभी उसकी नजर अपने शार्ट में बने तम्बू पे पड़ती है
सूर्य ....... हो सहित इसका मतलब माँ ने इस हे भी नोटिस किया होगा कही माँ के ऐसे किश करने की वजह से तो ये ऐसा नहीं हुआ होगा
मैं भी न सुबह सुबह कैसी बेहूदा बाते सोचने लगा
वो mom.hai मेरी क्या अपने बेटे को किश भी नहीं कर सकती
पैर आज से पहले तो उन्होंने ऐसा कुछ भी नहीं किया
तभी रूम में शालिनी जी को खोजते हुए फातिमा जी आती है
सूर्य अभी भी ऊपर से नंगा हे मिरर के सामने खड़ा था
फातिमा जी ..... बीटा सूर्य आपकी अम्मी कहा है
फातिमा जी की आवाज सुन सूर्य पीछे पलट कर देखता है
फातिमा जी की नजर सूर्य के चोदे सीने से होते हुए
जब शार्ट में बने तम्बू पे पड़ती है तो उनकी आँखे बस वही आतम जाती है
सूर्य ......आंटी जी माँ तो कुछ देर पहले हे बहार गई है रूम से आपको बहार मिल जाएँगी
सूर्य के जबाब देने के बाद भी जब फातिमा जी का कोई रिएक्शन नहीं आया तो सूर्य ने उनकी निगाहों का पीछा किया जो उसके शार्ट में बने उभर पे अटकी हुई थी
सूर्य वही अलमारी से अपने डैड का टॉवल ले कर सीने पे दाल लिया जिस से कुछ हद तक सीना आवर उभर दोनों चुप जाते है तब जा कर फातिमा जी की तन्द्रा भांग होती है
सूर्य ...... क्या हुआ आंटी जी माँ से कुछ जरुरी काम था क्या
तभी मेनका जी रूम में आती है
मेनका जी ....... भाबी जी आप यहाँ पे है कुछ काम था क्या
सूर्य .....बुआ सा आंटी जी माँ को खोज रही है
मेनका जी ....... शालिनी भाबी को क्यों कुछ काम था तो मुझे बताइये वो माँ सा के साथ बहार कुछ काम देख रही है आवर तुम जल्दी से फ्रेश हो जाओ पैर नहाना नहीं ठीक है
सूर्य ...... क्या हुआ आप नहाने से मन क्यों कर रही है बुआ सा मैं तो अभी नहाने हे जा रहा था
मेनका जी सूर्य के गालो को हलके से खींचते हुए हस्ते हुए सूर्य को जबाब देती है
मेनका ji.....Kal तेरी सदी है आज तेरी हल्दी की रसम है आज सुबह साम आवर कल सुबह तीनो वक़्त हल्दी लगेगी तुझे
सूर्य ...... ठीक है बुआ सा
कह कर सूर्य मुस्कुराते हुए चल दिया बाथरूम में बाकि के करते निपटने
उदार बहार हल्दी की सभी तयारिया हो चुकी थी
सूर्य के बहार निकलते हे कोमल सामने हे कमर पे हाथ रखे कड़ी थी
कोमल ....... चलिए आपको सब बहार बुला रहे है
सूर्य .....पहले कुछ चाय कॉफ़ी तो पीला दो
कोमल ........ वो सब बाद में पहले हल्दी का उप्टन लगेगा आपको फिर हे कोई चाय कॉफ़ी मिलेगी
सूर्य ...... ये नैनीनसाफ़ी है कोमल
सूर्य बात करते हुए कोमल के पास पहुँचता है आवर उसकी कमर में हाथ दाल अपनी आवर खिवहता है जिस से कोमल के होंटो पे मुस्कान आ जाती है
सूर्य कोमल को डोर से थोड़ा साइड में दिवार से चिपका ते हुए कोमल कोमल होंटो को चूमने लगता है
सूर्य कुछ देर किश करने के बाद मोके की नजाकत को समझते हुए अलग हो जाता है
कोमल खुद से हलके से सूर्य के होंटो को हलके से चुम कर सूर्य को बहार लोने में ले जाती है जहा बाकि सभी लड़कियों के साथ साथ हवेली में मौजूद आवर आस प्रदोष की भैया आवर महिलाएं भी मौजूद थी जो हल्दी रसम के दौरान गए जाने वाले लोक गीत गए रही थी
सूर्य को कोमल सभी के बिच से ले जा कर चौकी पे बैठा देती है
मेनका जी आगे भाड़ हल्दी रसम की सुरुहत करती है मेनका जी सूर्य का उप्टन लगा कर दूर्वा ( दुब से ) सूर्य के सर कंधे पेअर आदि पे तेल ( आयल ) लगती है
सूर्य अपने गालो पे लगी हल्दी अपने हाथो में ले कर पास कड़ी कोमल के गालो से लगा देता है
मेनका जी ...... सुधर जा अब तो तेरी सदी होने वाली है अपनी आदतों से बाज आ जा
सूर्य ....... मैं तो ऐसा हे रहूँगा भू फिर चाहे सदी एक हो या 10 मैं नहीं सुधरने वाला है अगर आप सुधर सकती हो तो सुधर देना
मेनका जी ...... राधा चल हल्दी की रसम पूरी कर तू भी बुआ है सूर्य की
अब राधा पीछे खिसकने लगती है
आस पदोष की महिलाएं राधा को रसम पूरी करने को कहती है पैर राधा दादी जी आवर शालिनी जी को देखने लगती है
दादी जी के गर्दन है में हिलने से राधा उदाश मन से आगे बढ़ती है आवर उप्टन ले सूर्य को लगाने के लिया हाथ बढाती है
राधा का बिलकुल भी मन नहीं था की राधा बुआ के हक़ से सूर्य को उप्टन लगाए
सूर्य राधा का हाथ अपने गालो तक पहुंचने से पहले हे पकड़ लेता है आवर खुद हे राधा के हाथो में लगे उप्टन को राधा के गालो से लगा कर राधा का हाथ अपने गाल पे रख देता है
इस तरह करने से कुछ महिला या जहा बुआ भतीजे का प्यार समाज खुश हो रही थी तो कुछ रूढ़िवादी रीती रिवाजो को सब कुछ मैंने वाली महिलाओ की खुसुर फुसर चालू हो जाती है
सूर्य को इस से कोई फरक नहीं पड़ें वाला था उसे तो बस राधा का मुस्कुराता हुआ ख़ुशी से दमकता चेहरा नजर आ रहा था
जैसे जैसे सभी बड़ी महिलाएं इस रसम को पूरी कर अलग हो गई अब वह केवल लड़किया ौरभभी आ बची थी जो असली हल्दी रसम सूर्य के साथ करने लगी
सूर्य शार्ट के भीतर का छोड़ कर ऐसा कोई हिस्सा नहीं बचा जहा लड़कियों आवर भाबियों ने उप्टन न लगाई हो राधिका सानिया माया तीनो ने जरुरत से ज्यादा हे सूर्य के सीने वह पीठ को सहलाया था
करीब एक जानते चली इस रसम में सूर्य को सबने मिल कर पीला बन्दर बना दिया था
असुरलोक ..........
द्वारिका इस वक़्त असुर महल से बहुत दूर एक निर्जन वन में था जहा कोई तम्सिन तांत्रिक पूजा कर रही थी
वह कुछ आवर भी लोग मौजूद थे जो की पूरी तरह काळा कपड़ो से सखे हुए थे उनके चेहरे के स्थान पे केवल कंकाल थे आवर उन कंकालों से कला दुन्वा निकल रहा था
कुछ देर बाद द्वारिका के सामने काले दुंवे में एक साया प्रकार होता है जिसने देख द्वारिका आवर वह मौजूद कंकाल साये सभी अपने गूथ no पे आ जाते है
द्वारिका ........ महामहिम को उनकी गुलाम दरसतिका ( मायावी द्वारिका रियल नाम )का परनाम स्वीकार हो
महामहिम ....... उठो दृश्टिका हम तुमसे बहुत परशान है तुमने हमारे उद्देश्य को बिना किसी विज्ञानं के अंतिम चरण तक पहुंचा दिया है
दृश्टिका ...... गुलाम आपकी सेवा में हाजिर है महामहिम आज्ञा दीजिये
महामहिम ....... असुरगुरु देवी की उपासना में लगा हुआ है डोगरा हे वह तुम्हारी कैद से मस्ट हो जायेगा उसके मुक्त होने से पूर्व तुम्हे किसी भी तरह दोनों का विवाह कंटकासुर वह नागसूर से करवाना होगा आवर उन्हें किसी अव्यक्त स्थान पे भेजना होगा जहा असुरगुरु की दृस्टि भी न पहुंच सके उन तक
दृश्टिका ...... गुलाम की गुस्ताखी माफ हो तो कुछ कह सकती हूँ महामहिम
महामहिम ..... कहो दृश्टिका
दृश्टिका ....... महामहिम आप असुरगुरु को समाप्त क्यों नहीं कर देते है उसे कैद में रखने के स्थान पे समाप्त बेहतर हल नहीं
महामहिम ...... नहीं दृश्टिका का ये सत्य है की असुरगुरु एक असुर है किन्तु एक सत्य ये भी है की उनका करम दिव्या है केवल असुर होते तो उन्हें आसानी से मृत्यु दी जा सकती थी वो देवी पटल भैरवी के पदम् भक्त है इस वक़्त उन्हें अपने मार्ग से दूर रखने का केवल एक हे मार्ग है उन्हें जितना ज्यादा कैद में रखा जाये उतना हमारे उद्देश्य के लिया उचित है वैसे भी असुरगुरु के साथ साथ वो भविष्य में होने वाला पितामाह है मेरे उनकी हत्या मैं नहीं कर सकता
दृश्टिका ......... असली द्वारिका उसका क्या महामहिम
महामहिम .... वो हमारी कैद से मस्ट नहीं हो सकती है हमारी इच्छा के बिना तुम सिगरा हमारी योजना को पूर्ण करो
दृश्टिका ....... जो आज्ञा महामहिम
महामहिम ....... ये तरल तुम नगीना आवर विसुद्धि को समय समय पे पिलाती रहना
आवर ये लाल तरल कंटकासुर को जिस से वो इस योग्य हो जाये की मेरी आत्मा के लिया जो सरीर उनके घरब से जनम लेगा वो मुझे ददन करने योग्य बन सके
दृटिका....... किन्तु कंटकासुर को क्यों महामहिम
महामहिम ....... कंटकासुर का सरीर इतना सशक्त नहीं की वो हमारी पूरी काली ऊर्जा को दर्जन कर सके ये उसके लिया है
इतना बोल महामहिम नाम का वो साया वह से लुप्त हो जाता है
दृश्टिका ....... तुम सभी पुरे असुरलोक में फ़ैल जाओ आवर हर छोटी से छोटी घटना का विवरण मुझे दो
तुम लोगो की किसी भी अव्यक्त के चलते इस कार्य में असफलता मिली तो महामहिम तुम सभी का अस्तित्वा हे मिटा देंगे भारमंद से
सभी साये ........ नहीं नहीं हम अपने कार्य में सतर्क रहेंगे
दृश्टिका ....... अब जाओ आवर अपने कार्य में लग जाओ
सभी एक एक कर वह से गायब हो जाते है
कुछ देर बाद द्वारिका भी वह से गायब हो अपने महल के कक्ष में प्रकट होती है
द्वारिका सैनिक द्वारा कंटकासुर को कक्ष में आने का आदेश देती है
असुर सैनिक सन्देश कंटकासुर को जा कर देता है
कुछ हे देर बाद कंटकासुर अपने कक्ष से द्वारिका के कक्ष की आवर निकल जाता है
वातापी ....... आज कल स्वामी ज्यादातर समय नगीना विशुद्धि के साथ साथ द्वारिका के साथ में समय बिता रहे है जभी स्वामी जानते है की द्वारिका उनकी माता नहीं है फिर ऐसा क्या है जिसके चलते इनकी नजदीकियां इतनी भाड़ गई है मुझे पता करना होगा
कंटकासुर के अपने कक्ष से निकलते हे वातापी खुद को अदृश्य कर अपनी माया का प्रयोग बहुत हे सूक्षम जिव का अदृश्य रूप धार कंटकासुर के साथ द्वारिका के कक्ष में पहुँचती है
द्वारिका ....... हमारे साथ आओ हमारे पीछे पीछे
बोल कर द्वारिका अपने कक्ष की दिवार पे कोई मंत्र उच्चारण कर पुंक मरती है जिस से कुछ हे देर में वह एक मायावी द्वार बन जाता है
द्वारिका उस गुप्त द्वार में प्रवेश कर जाती है पीछे पीछे कंटकासुर भी ( उसके साथ में व तपी भी थी जो अदृश्य रूप में थी )
कंटकासुर ....... ये कोनसा स्थान है आवर हम यहाँ क्यों आये है
द्वारिका के इसारे पे वो महावीर द्वार फिर से बंद हो जाता है पैर वह उसके द्वार के स्थान पे द्वारिका का मुख्या कक्ष साफ साफ नजर आ रहा था ( जैसे वो द्वार न हो कर कोई बड़ा टीवी हो जिसपे द्वारिका के के रूम से सब लाइव दिख रहा हो )
द्वारिका ....... मेरा वास्तविक परिचय से तुम अनजान हो कंटकासुर मेरा वास्तविक परिचय है महामहिम की गुलाम दृश्टिका हूँ
कहते हुए दृश्टिका अपने वास्तविक रूप में आ जाती है जो की बहुत हे ज्यादा मसल गदराया हुआ था
दृश्टिका ...... महामहिम ने तुम्हारे लिया उभर भेजा है जिस से तुम ग्रहण कर उनकी समस्त सक्तियो को दर्जन करने योग्य हो जाओगे
कहते हुए दृश्टिका वो लाल तरल की सीसी कंटकासुर के सामने रख देती है
कंटकासुर ...... ये तो बहुत हे हर्ष का अवसर है मेरे लिया किन्तु ये जो दूसरी सीसी है ये किस लिया है
दृश्टिका ....... इसमें जो तरल है वो द्वारिका आवर नगीना के लिया है तुम्हारे जरिया जो महामहिम के अंश को नगीना आवर विशुद्धि दर्जन करेगी उसके योग्य बनने के लिया महामहिम ने ये उपहार भेजा है
कनकसुर बात दृश्टिका से कर रहा था पैर साथ हे उसके भरी भरकर गदराये हुए सरीर को अपने आँखों से हे भोग रहा था
दृश्टिका की दृस्टि से कंटकासुर की अपने सरीर के पार्टी हवश देख दृश्टिका के चेहरे पे कुटिल मुस्कान आ जाती है
दृटिका ....... तुम बस मागमाहिं की आज्ञा का पालन करते रहो तो सब कुछ तुम्हारे कदमो में होगा ये असुरलोक हे नहीं बाकि सभी लोक तुम्हारे सामने गुलामो की तरह जुखे होंगे तुम जिसे चाहो जब चाहो भोग सकोगे
कहते हुए दृश्टिका कंटकासुर का हाथ अपनी भरी भरकम 40, 42 की चूचियों पे रख देती है
कंटकासुर तो कब से इसी पल की तलाश में था जैसे हे दृश्टिका ने कंटकासुर को में स्वीकृति दी कंटकासुर अगले हे पल में खुद वह दृश्टिका को निर्वस्त्र कर उसके अंगो पे वहशी जानवर की तरह टूट पड़ा
जैसे दृश्टिका कंटकासुर का भोजन हो
कंटकासुर अपना मुख में दृश्टिका के चूचक भर के चूसने लगता है आउट दूसरे हाथ से दृश्टिका को बालो से भरी योनि में अपने हाथ की उँगलियाँ चलने लगता है
वही ुशी कक्ष में मौजूद वातापी इस दृश्य को देख अंदर हे अंदर कंटकासुर पे क्रेडिट थी
साथ हे उसकी आँखों से अश्रु धरा भी बाह रही थी
ीदार कंटकासुर दृश्टिका के अंगो कके साथ खेल रहा था

कुछ देर बाद दृश्टिका कंटकासुर के सामने गुथनो पे बेथ उसके जुलते हुए एक फिट लम्बे लिंग को अपने मुँह में भर चूसने लगती है

कुछ देर बाद कंटकासुर दृश्टिका को उठा कर वही िस्थित बिस्तर पे लिटा कर दृश्टिका की योनि राशि को चूसता है
दृश्टिका को इस सब में बहुत मज़ा आ राग था
वह अपने पैरो खो खोले कंटकासुर के साथ इस सम्भोग किरिया का आनद ले रही थी
जब एक बार दृश्टिका अपना चरम सुख प्राप्त कर लिया तो कंटकासुर ने अपना मुख हटा कर अपना लिंग दृश्टिका की योनि पर रख एक तेज जानकारी प्रहार दृश्टिका की योनि पे करता है

कंटकासुर द्वारा ऐसे तीव्र प्रहार से जैसे दृश्टिका को आनंद प्राप्त हुआ हो न की दर्द या कोई पीड़ा
कैकट्सुर निरंतर बिना रुके दृश्टिका कज योनि में अपने लिंग से पत्थर करता था रहा

ीदार डेरे डेरी इस सम्भोग के कारन वातापी का गुस्सा भी भाड़ रहा था अपने पति को अपनी आँखों के सामने किसी आवर स्त्री को भोगते देख
वातापी गुस्से में थी उसे कुछ समाज नहीं आ रहा था की क्या करे
तभी वातापी की नजर वह राखी उन दो सीसियो पे पड़ती है
वातापी अपनी माया का प्रयोग कर उनके से हारे तरल वाली ( जो नगीना आवर विसुद्धि के लिया थी ) थी उसे वह से उठा कर उसके स्थान पे ुशी तरह की दूसरी सीसी रख देती है
इन सब से अनजान कंटकासुर दृश्टिका को ास्वा स्वस्थ में लिटा कर पीछे से दृश्टिका की योनि भेदन में संलिप्त था

कंटकासुर दृश्टिका की बड़े बड़े नितम्बों को थामे आँखे बंद किये हुए किसी वहशी जानवर के जैसे दृत्का की योनि में लगा हुआ था

ये सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक कंटकासुर ने अपने लावे से दृश्टिका के योनि कुंड को अपने वीर्य से लाभालाभ भर नहीं दिया
इनका ये सम्भोग 1 हर से भी ऊपर चला
थोड़ो कुछ देर वही आराम कर अपने अपने वस्त्र दाल बहार जाने को त्यार थे
दृश्टिका ....... कंटकासुर अभी तुम्हारी इच्छा पूर्ण हो चुकी है अब तुजे प्रतिदिन इस तरल का सेवन करना है आवर साथ हे नगीना वह विसुद्धि को इसका प्रतिदिन देवन करवाना है
कंटकासुर ....... उचित है आप चिंता न करे किन्तु अगर उचित हो तो आप हे नगीना आवर विशुद्धि को इस तरल का देवन करवाए
आप द्वारिका बन ये कार्य बहुत हे सरलता से कर सकती है
दृटिका ...... उचित है फिर नगीना आवर विसुद्धि को मुज पे छोड़ दो सिगरा हे दोनों का विवाह मायावी असुरो से हो जायेगा जो की सबकी नजरो में दल झोखने के लिया है वास्तविकता तो ये है की दोनों को तुम्हे हे भोगा है
कंटकासुर ...... क्या पिता श्री गुफा की कैद से मुक्त हो गए
दृटिका ...... अभी नहीं पैर महामहिम का कहना है की वो कैद में हे देवी पटल भैरवी की साधना में लीं है सिगरा हे वो मुक्त हो जायेंगे इस लिया हमें ये विवाह सिगरा हे करवाना होगा आवर फिर तुम 5 को किसी अज्ञान्त स्थान पे जाना होगा जहा तुम्हारे पिता की दृस्टि bhi.Tum पे न पड़े
दृटिका आवर कंटकासुर की बात सुन कर वातापी की सांसे भरी होने लगती है
उसे यकीं हे नहीं हो रहा था की कंटकासुर अपने हे पिता को कैद में रखा हुआ है
वाटीपी ......पिता श्री कैद में है तो फिर यहाँ जो असुरगुरु है वो कोण है
मुझे जल्दी हे उन्हें कैद से मुक्त करवाने के लिया कुछ करना होगा ये कोई बहुत हे बड़ा षड़यंत्र रचा जा राग है जिसमे खुद स्वामी भी शामिल है केवल पिता श्री हे कुछ कर सकते है मुझे कुछ करना हे होगा .............
अपडेट पोस्टेड फ्रेंड्स .............
रीड एंड एन्जॉय फ्रेंड्स ...................