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- Dec 5, 2013
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अपडेट - 69 ~ थे ग्रैंड बैंक्वेट!
अब तक...
इंटरमीडिएट मार्टिकल आर्ट स्किल!!!
नीचे प्राइस लिखा hi था~
400 पॉइंट्स!
और वीर ने एक बार में hi परचेस के ऑप्शन पे क्लिक किया और...
*डिंग*
[Intermediate Martial Art Skill is now available.]
और ये नोटिफिकेशन सुनते hi वीर मुस्कुराते हुए वापस से अपनी दोनों सेविकाओं के बीच लेत गया.
'प्रांजल! I'm प्रेपरिंग ा सरप्राइज फॉर यू!!!'
अब आगे...
"आउच आउच!!!!"
"बोलो अब? अब कभी करोगे ऐसा? हाँ?"
"N-Nahi! बिलकुल नहीं!"
"हम्म! चलो माफ़ किया! पर अहिंदा से ध्यान रखना. Okay!?"
"ऑफ़ कोर्स!"
ये आवाज़ थी वीर की जो अपने आप को चुर्राने की कोशिश कर रहा था रागिनी के हाथो से. क्युकी रागिनी उसके कान को पकडे हुए आज उसकी खबर ले रही थी.
डॉक्टर मृणाल के घर से तोह ठीक होक आ गया था वीर. पर अब तक उसने अपनी रागिनी भाभी को पूरी बात नहीं बतायी थी. जैसा की रागिनी ने पहले hi उससे कह के रखा था की वो उसके ठीक होने के बाद उसकी अच्छे से परीक्षा लेगी. तोह बस, वही पाठ चल रहा था अभी. वीर की क्लास लग रही थी.
और उसकी ऐसी हालत देख आभा और सोनाली दोनों hi दूर से हस्ते हुए मज़े ले रही थी. वही सुमन बेचारी अपने मालिक को देख बस असहाय वाली मुस्कराहट hi दे पा रही थी. इसमें वो कुछ नहीं कर सकती थी.
अंत में रागिनी ने भी धीरे से मुस्कुराते हुए वीर के कान को चोर्रा और बोली, "अपना ख़याल रखा करो वीर पहले. पहले खुद की जान है, फिर दुसरो की."
रागिनी उससे आज की दुनिया का ज्ञान पढ़ाना चाह रही थी. और ठीक hi तोह कह रही थी वह. आज की इस स्वार्थ सी भरी दुनिया में आदमी पहले अपनी जान की परवाह करता है. बाद में दूसरे की. सोचते हुए उससे जैसे विवेक की हरकत की याद आ गयी.
पर वीर की तोह जैसे अलग hi सोच थी. वो भी मुस्कुराया और बोलै, "में विवेक भैया की तरह नहीं भाभी! मेरे लिए अपने पहले है. फिर में खुद."
*बेदुम्प*
और पल भर के लिए रागिनी का दिल एक धड़कन जैसे फांद गया.
"H-Huh!?" वो जोरर से सांस खींचते हुए वीर को आश्चर्य भरे भाव से देखि.
वीर को भी जैसे ध्यान आया की शायद उससे विवेक का नाम ऐसे बीच में नहीं लाना चाहिए था. तोह उसने अगले hi पल माफ़ी मांगी.
रागिनी : नहीं वीर! इसमें माफ़ी मांगने की कोई ज़रुरत नहीं. और वैसे भी, सही hi तोह कहा तुमने.
इस बार उसकी नज़रे झुक गयी. और आवाज़ में मायूसी भी थी.
रागिनी : सुमन जी! K-Kya आप सब बाहर जा सकते हो? M-Mujhe वीर से अकेले में कुछ बात करनी है.
सुमन : जी रागिनी जी! आभा बेटी, सोनाली, चलो बाहर.
और सुमन उन् दोनों को लेकर बाहर चली गयी.
कमरे में केवल वीर और रागिनी hi थे अब. अभी सुबह के 8:30 बज रहे थे और रागिनी बस नाहा के नाश्ता hi बनाने जा रही थी जब उससे याद आया की वीर से उसने वो बातें पूछी hi नहीं. तोह इसलिए वो आज वीर से साड़ी बात jaan'ne के लिए आयी थी उसके कमरे में.
उसके घने बाल, अभी भी पानी से हलके भीगे हुए थे और खुले हुए थे. क्युकी वो विवेक के साथ उसके घर पे नहीं रहती थी अब तोह उससे सारे कपडे pehn'ne की छूट थी. वो टॉप भी पहनती थी, साड़ी भी, कुरता, सूट, सलवार सब कुछ.
और आज रागिनी एक पिंक और ब्लैक कलर कॉम्बिनेशन की साड़ी पहनी हुई थी जिसमे वो हुस्न की मल्लिका लग रही थी. ये कहना की वीर रागिनी से अत्त्रक्टेड नहीं था जब से वो घर में आयी थी तोह ये गलत था. जब से विवेक की शादी हुई थी, वीर हमेशा से रागिनी के संग बातें करना चाहता था.
कौन नहीं चाहेगा की आपके साथ एक ख़ूबसूरत भाभी हो जो आपसे बातें करे? पर रागिनी उस समय वीर को भाव नहीं देती थी. और आज देखो, आज किस्मत ऐसी थी वीर की, की वो रागिनी के संग रह रहा था, रागिनी खुद उस से ुपत के बातें करती थी, यहाँ तक की उसकी बेहद परवाह और उसका ख़याल भी रखती थी. शायद इसलिए समय को सबसे शक्तिशाली माना गया है.
लेकिन रागिनी के मैं में इधर जैसे अभी भी कुछ बेचैनी थी.
रागिनी : वीर?
वीर : हम्म?
रागिनी : तुम... तुमने सच में माफ़ कर दिया है न मुझे? में तुमसे बात भी नहीं करती थी पहले. फिर धीरे धीरे हम दोनों की बीच सलाह हो गयी. दूरिया हट गयी. पर... पर कही तुम ये तोह नहीं सोचते न की तुम्हारी ये भाभी, मौका देख के पलट गयी और अब तुम्हारे संग अच्छे से पेश आने लगी. कही तुम ऐसा तोह नहीं सोचते न? बोलो?
रागिनी की इन्सेक्युरित्य, वीर देख पा रहा था. वो देख पा रहा था की रागिनी इस बात को लेकर बेहद चिंतित थी. तोह उसने फौरन hi जवाब दिया.
वीर : भाभी! यदि ऐसी बात होती तोह में आपसे कभी इतना फ्रेंडली होक पेश आता hi नहीं. इसलिए आप ये बात मैं से निकाल दीजिये. ऐसी कोई बात नहीं है. और वैसे भी, आपका कोई ज़्यादा दोष था भी नहीं. मेरे दिमाग में उन् लोगो के नाम अच्छे से मौजूद है जिनका सबसे ज़्यादा कसूर था.
वीर की कही गयी बात से रागिनी मुस्कुरायी और एक चेन्न की सास ली. वो शीशे के सामने जाके कड़ी हुई और नज़रे झुकाते हुए बोली,
रागिनी : तुम्हारी यही बात तोह मुझे सबसे अच्छी लगती है वीर. और... कही तुम्हे बुरा तोह नहीं लगता न? मेरी बातो का? मेरी हरकतों का? मेने आज सबके सामने तुम्हारे कान खींचे, तुमसे बातें बुलवाई. कही तुम बुरा तोह नहीं मानते न?
वो वीर का जवाब sunn'ne के लिए इंतज़ार कर hi रही थी की जब अचानक hi उससे अपने नंगे पेट पर किसी का हाथ महसूस हुआ.
"हाआआअह्ह्ह्हह!?"
जोरर से सिसकते हुए रागिनी ने जैसे hi शीशे में देखा तोह पाया की वीर उसके ठीक पीछे था और अपनी ठुड्डी को उसके कंधे पर रख उससे पीछे से अपनी ऑर्डर खींच लिया.
'थिस... थिस...! आह!'
रागिनी बेचारी भौचक्की सी आँखें फाड़े शीशे में देख रही थी, जिसमे उससे खुद की आकृति तोह दिख hi रही थी पर साथ hi साथ उसके पीछे से चिपके हुए वीर की भी आकृत नज़र आ रही थी.
वीर के हाथ का टच अपने नग्न पेट पर पाते hi रागिनी की सासें तेज़्ज़ हो चुकी थी. वीर की हथेली विवेक की हथेली सी कई गुना अलग थी. या यु कहे की बेहतर थी. रागिनी को गर्म सा एहसास हो रहा था अपने पेट पर.
इतनी लड़ाईयों में भिड़ने के बाद वीर की हथेली अब पहले की तरह नरम नहीं थी. उनमे हलकी हलकी खरोंचे थी, कुल मिलाके उसकी त्वचा सख्त, और थोड़ी रफ़ थी. पर यही रफ़ सी स्किन रागिनी को एक प्रोटेक्टिव और मर्दाना फीलिंग दे रही थी आज जो फीलिंग विवेक उससे कभी नहीं दे पाया था.
न चाहते हुए भी, रागिनी का मैं दोल रहा था आज. वो अपनी सासें काबू में hi नहीं कर पा रही थी. ऐसा कुछ तोह उसने आज तक फील नहीं किया था.
वीर के हाथ का टच उससे उस रात को याद दिला रहा था जिस दिन वीर उससे बचाने आया था. उसकी हथेली का मात्र स्पर्श hi रागिनी को सबसे सुरक्षित अनुभूति प्रदान कर रहा था. जैसे मानो दुनिया में इस से सेफ जगह कोई और हो hi नहीं सकती थी.
वीर तोह अनजाने में ये कर रहा था. वो तोह बस सांत्वना देना चाहता था रागिनी को की वो उसकी बात का बुरा नहीं मानता है.
और उसके बाद hi, रागिनी की सासें उनकंट्रोलबले हो गयी जब वीर ने अचानक hi...
*छू~*
रागिनी के गाल को चुम लिया.
"Aaaaaaaaaahhhhhh!"
रागिनी हड़बड़ाते हुए पलटी और वीर को देख वो फटाफट वह से अपने सुर्ख लाल गाल लेते हुए निकल के भाग गयी.
"हम्म?"
वीर बेचारा बस देखता hi रह गया. उससे इस बात का कोई अंदाजा नहीं था की रागिनी अपने मैं में इस वक़्त क्या क्या सोच रही थी उसको लेकर.
***
****** हॉस्पिटल...
"देखिये! हमने X-Ray निकाला है. हम आपकी भलाई के लिए hi कह रहे है. इसका ठीक होना असंभव है. आप बात मानिये और...."
"नहीं!!!!!"
*थुड़*
"!???"
एक बड़ा hi सज्जन डॉक्टर इस वक़्त सामने खड़े आदमी को अपनी बात समझा रहा था. पर सामने खड़े व्यक्ति ने उसकी बात सुनते hi अपने दोनों हाथ उसकी टेबल पर पटक दिए.
जी हाँ! ये व्यक्ति और कोई नहीं, बलहार hi था जो कल वीर के हाथो अपना दाया हाथ खो बैठा था. क्युकी उसका वह हाथ अब किसी काम का नहीं था.
ये चौथा जाना माना डॉक्टर था शहर का जिससे आज बलहार अपना हाथ दिखाने आया था. पर यहाँ भी वही जवाब मिला उससे.
उसका गुस्सा सातवे आसमान पर था.
बलहार : बेवकुफो!!! काहे का डॉक्टर हो सालो? एक हाथ भी पहले जैसा नहीं कर सकते? नहीं करवानी मुझे कोई सर्जरी... मुझे मेरा यही हाथ चाहिए समझे!??? कोई आर्टिफीसियल हाथ नहीं!!
डॉक्टर : देखिये! Y-Ye इम्पॉसिबल है. ये बियॉन्ड रिपेयर है. में आपकी भलाई के लिए hi...
इस से पहले की डॉक्टर कुछ कह पाटा, बलहार ने उसकी कल्लोर पकड़ उससे उसकी चेयर से उठाया और ुचि आवाज़ में चिल्लाया,
बलहार : देख बहनचोद!!! तू कुछ भी कर, जिससे भी बुलाना है बुला पर मेरा ये हाथ ठीक कर. समझा?
डॉक्टर : देखिये! A-Aap तमीज से बात कीजिये! Y-Ye इम्पॉसिबल है. आप... आपकी लिंब इस तरीके से मुड़ी हुई है की इससे वापस से सीधा करना असंभव है. ये... ये कोई रबर नहीं है. ये हाथ है. ज़रा सी भी चूक हुई तोह दर्द तोह होगा hi, साथ hi पूरी तरीके से हड्डी टूट सकती है.
"Aaaaaarrrrghhhhhhhhhh!" बलहार गुस्से में चिल्लाया और उस डॉक्टर को वही धक्का देकर बाहर निकल गया.
मैं में उसके वीर के वही शब्द गूंज रहे थे.
"तेरा जो ये हाथ है न. तू दुनिया के किसी भी डॉक्टर के पास hi क्यों न चला जाए. चाहे उससे कितने भी पैसे क्यों न दे दे. तेरा ये हाथ दुनिया में कोई रिपेयर नहीं कर सकता. सिवाए मेरे!"
अब शायद, बलहार को वीर की बात का विस्वाश हो रहा था. वो चार बड़े से बड़े शहर के डॉक्टर्स के पास हो आया था. पर कभी भी उससे उम्मीद नज़र नहीं आयी. यदि ऐसे hi चलता रहा तोह...!?
"नहीं!!! M-Mein अपना हाथ नहीं खो सकता."
उसने अभी तक स्लोगन या किसी अन्य को वीर के बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी. वो इसलिए क्युकी पहले वो कन्फर्म करना चाहता था की वीर की बात सही है भी या नहीं? लेकिन वीर की बात अब उससे सच होती नज़र आ रही थी.
"टछहः!" दातो को मीस्ते हुए उसने अपना निर्णय फौरन hi ले लिया.
और वो था...
वो स्लोगन की साड़ी खबरे वीर को देने वाला था!
***
Veer's ओल्ड हाउस...
11:30 ऍम...
"सब मौजूद है न?" मनोरथ कहते हुए सिंगल सीट सोफे पर विराजमान हो गए.
"जी दादा जी! सब यही है!" मनोरथ के बगल में खड़े प्रांजल ने कहा.
आज मनोरथ अपना फैसला अपनी जायदात को लेकर सुनाने वाले थे.
घर में आज सभी मौजूद थे. वीर चुप चाप अपनी आँखें बंद किये, दोनों हाथ मोड एक सोफे पर बैठा हुआ था. उसके बगल से आरोही और काव्य दोनों hi बैठी हुई थी.
तोह वही बृजेश और करुणेश एक साथ विराजमान थे. विवेक अपनी माँ सुमित्रा के साथ बैठा हुआ था. और भूमिका और श्वेता दोनों माँ बेटी अलग से एक सीट में.
मनोरथ फोर्मल्ली ये डिसों सुना रहे थे. तोह वकील से लेके डाक्यूमेंट्स सब मौजूद थे. सारा काम आज hi शुरू होने वाला था. वो जल्द से जल्द इस जायदात से छुटकारा पाना चाहते थे.
बृजेश ने एक झलक वीर की ऑर्डर देखा और वीर ने भी उससे देखा. पर दोनों में से किसी ने कुछ कहा.
प्रांजल दादा जी के बगल से hi बैठ गया.
और फिर मनोरथ बोलना शुरू किये,
मनोरथ : तोह में बातो को ज़्यादा घुमाऊंगा नहीं. सीधा मुद्दे पर आता हु. मेरी साड़ी जायदात को आज में अपने पोते पोतियो में बाटने जा रहा हु. और हाँ, ये में पूरे होश में रहके सुना रहा हु. जायदात में से कोई भी चीज़ बृजेश, करुणेश और उनकी धर्म पत्नियों को नहीं बाटी जाएगी. ये केवल मेरे पोते पोतियो के लिए hi है. और वो भी उनके लिए जो मुझे लगता है सही तरह से इस जायदात का उपयोग कर पाएंगे.
मनोरथ की बात सुन्न सभी शांत थे. पर सभी के दिल की धड़कन ज़र्रों से धड़क रही थी. खासकर विवेक, और श्वेता की.
मनोरथ : तोह मेरा फैसला तय रहा...
कहते हुए मनोरथ ने हर्र एक वह बैठे शख्स पर नज़रे घुमाई. वीर को कोई मतलब नहीं था. उसके हिसाब से दादा जी को ये काम अभी नहीं करना चाहिए था. इसलिए, वो बस चुप चाप साइड में बैठा रहा.
सब की नज़रे मनोरथ की ऑर्डर hi थी. और तभी मनोरथ ने अपना फैसला सुनाया जिससे सुनके वह मौजूद सभी के होश उड़द गए.
मनोरथ : मेरी 40% जायदात... में वीर के नाम करता हु.
*बूम*
जैसे एक बेम फटा वह बैठे लोगो पर.
वीर : हँ?
[Hahaha~ Ye hui na baat ab! Just look at their faces.]
प्रांजल अभी भी शांत बैठा हुआ था. पर उसके माथे पर पसीना ज़रूर झलक रहा था.
मनोरथ : और 40% जायदात... में अपने पोते प्रांजल के नाम करता हु.
जो पसीना प्रांजल के माथे पर था. ये सुनते hi उसने वो पसीना पॉच लिया. बाकी सब बस अपने गले में अटका हुआ थूक hi गुटक के रह गए.
मनोरथ : बाकी की बची हुई 20% जायदात में से... में 10% अपनी पोती आरोही और बाकी की 10% अपनी सबसे छोटी पोती काव्य के नाम करता हु.
श्वेता : H-Huh!? Y-Ye?
विवेक : !???
मनोरथ : यही है मेरा पूरा फैसला.
श्वेता जिसके चेहरा का रंग hi उड़द चूका था फैसला सुन्न के वो फौरन hi अपनी जगह से उठ कड़ी हुई.
श्वेता : P-Papa जी!? ये... ये आप क्या कह रहे है?
मनोरथ : सही कह रहा हु.
श्वेता : H-Huh? P-Par मेरी बेटी भूमिका. वो... वो भी तोह आपकी पोती है न? और वो भी सबसे बड़ी पोती... T-Toh उसका नाम कहा है? आपने उससे कुछ क्यों नहीं दिया?
मनोरथ : कुछ समय पहले, मेने इन् सभी को अपने कमरे में बुलाया था. तब में इनसे ये नहीं पूछना चाह रहा था की जायदात किस्से दी जाए. में इन् सभी का व्यक्तित्व परख रहा था. जिसकी परीसखा में विवेक और भूमिका दोनों hi फ़ैल हो गए.
भूमिका का ये बात सुन्न अपने आप सर्र झुक गया. वो नाराज़ नहीं थी. न hi गुस्सा थी. उससे जैसे वाक़ई कोई ग़म नहीं था. काफी कलम थी वह.
पर यही बात उसकी माँ श्वेता के लिए नहीं कही जा सकती थी. श्वेता का तोह बेचैनी के चलते पूरा शरीर ठिठुर रहा था.
श्वेता : ये... ये आप!?? ऐसा कैसे कर सकते है? A-Arohi और K-Kavya को तोह दी न आपने? फिर बेचारी मेरी भूमिका hi कई रह गयी?
मनोरथ : में बताता हु की क्यों भूमिका और विवेक को रत्ती भर भी जायदात नहीं मिल पायी. क्युकी जब विवेक से मेने पूछा था की जायदात कितने हिस्सों में किस्से बाटी जाए. तोह विवेक ने सभी का नाम लिया था. सिवाए वीर के. जिस भाई को अपने सबसे छोटे भाई की फिक्र तक न हो उससे भला में ये जायदात कैसे दे सकता हु? यही कारण भूमिका का भी है. भूमिका बिटिया ने एक बार भी अपने भाई वीर का ज़िक्र नहीं किया था.
मनोरथ की बात सुन्न, श्वेता का दिमाग hi सन्न रह गया. उस दिन खुद उसी ने तोह भूमिका को पट्टी पढ़ा के भेजा था की अपने दादा जी से डायरेक्टली अपना हक़ मांग लेना. और देखो क्या हो गया आज. श्वेता को अपनी गलती का आभास होते hi इतना ज़्यादा पछतावा हो रहा था की उसकी मुट्ठी में साड़ी का भाग पूरा निचुड़ के रह गया. यहाँ तक की आँखों के कोनो में हलके हलके ासु भी उत्पन्न हो चुके थे.
विवेक वही बैठे अपने मैं में खुद को hi कोस रहा था. उससे लगा था की शायद वीर का नाम नहीं लेते हुए दादा जी ने उसकी बातो को ज़्यादा ध्यान नहीं दिया होगा. पर वो गलत था. बस मैं में गाली hi निकल रही थी उसके.
मनोरथ : वही दूसरी ऑर्डर, प्रांजल आरोही, और काव्य तीनो ने hi वीर को अपने ध्यान में रख उसका नाम लेते हुए उससे जायदात देने को कहा था. आरोही बिटिया तोह अपना पूरा हिस्सा वीर को देना चाहती थी. तोह वही काव्य को कुछ नहीं चाहिए था. वो भी यही कही थी की जायदात वीर को दे दी जाए. और प्रांजल बेटे का भी यही कहना था.
वीर ने palat'te हुए दोनों hi आरोही और काव्य को देखा तोह दोनों hi बहनो ने उससे एक स्माइल पास की.
मनोरथ : आरोही सही मायनो में हक़दार नहीं थी. क्युकी जायदात उससे hi सही फैलती है जो इसका उपयोग सही से करना जाने और एक इच्छा रखे. आरोही बिटिया के मैं में कोई इच्छा नहीं थी. उससे कोई मतलब नहीं था. यही कारण है की उससे केवल 10% hi जायदात का हिस्सा मिला. वो इसलिए, क्युकी उससे अपने भाई वीर का ध्यान था. ध्यान था की वो इस घर से दूर था.
आरोही : ....
मनोरथ : वही काव्य को ये जायदात का 10% इसलिए दिया गया क्युकी वो घर की सबसे छोटी पोती है मेरी. और सबसे प्यारी. अभी उससे उतनी समझ नहीं. ऐसा हो सकता है की आगे जा के उससे और समझ आये तोह कही उससे पछतावा न हो. इसलिए उसके जेब में कुछ तोह होना चाहिए न? ये 10% की जायदात अब वो जैसे चाहे उपयोग करे, ये उसके ऊपर है.
श्वेता और विवेक दोनों hi मनोरथ की बात विस्तार से sunn'ne के बाद वही जम्म के रह गए. ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके मुँह में निम्बू निचोड़ दिया हो. ऐसा मुँह हो गया था दोनों का.
और फिर श्वेता जैसे भड़क उठी,
श्वेता (चिलाते हुए) : ये गलत है. ये सरासर अन्याय है... ये गलत है! आप... आप ऐसा नहीं कर सकते. आपने गलत निर्णय लिया है. ये मेरी बेटी के साथ छल है. सबको आपने कुछ न कुछ दिया पर मेरी बेटी के लिए एक रूपया भी नहीं छूता आपके हाथ से? K-Kya कमी रह है मेरी बेटी में?
क्यों किया आपने ऐसा!? हैं?
श्वेता की लड़खड़ाती हुई आवाज़ सुन्न, वह बैठा बृजेश उससे बॉहे सिकोड़ के देखने लगा. तोह वही भूमिका अपनी माँ के कंधो को थाम उससे रोकने का प्रयत्न करने लगी. पर आज जैसे श्वेता बिलकुल भी नहीं बैठने वाली थी.
श्वेता (स्क्रीम्स) : आपने गलत किया है! आप गलत हो!!!! आपने मेरी बेटी से उसका हक़ छीना है!!!!!
उसकी चींखे पूरे हॉल में गूँज रही थी. और उसका चेहरा पूरा लाल हो चूका था. और आँखों से ासु बहते हुए गाल पर बिखर चुके थे. भूमिका भी सेहमते हुए अपनी माँ को रोकने की कोशिश कर रही थी.
बार बार समझाने पर भी जब श्वेता न चुप हुई तोह इस बार बृजेश नहीं रुका. वो उठा और तेज़्ज़ कदमो के साथ श्वेता के समीप आया.
बृजेश (चिल्लाते हुए) : श्वेताऑ!!!
श्वेता : !!?
बृजेश : मेने तुम्हारे लिए कितना कुछ नहीं किया? अरे इतनी बड़ी होटल तुम्हारे और भूमिका के नाम पर है. फिर तुम पापा जी से ऐसी बातें क्यों कर रही हो? और क्या चाहिए तुम्हे? यहाँ तोह हम सभी घरवाले है न? फिर अब और क्या चाहिए तुम्हे? क्या तुम इतने से भी संतुष्ट नहीं हो? सब कुछ तोह दे hi रहा हु न में तुम्हे!? फिर पापा जी से क्यों ज़बान लड़ा रही हो?
श्वेता (स्क्रीम्स) : क्युकी ये ढोंगी है!!!! ये बस मीठी मीठी बातें करते है! इन्हे मेरी बच्ची की कोई परवाह नहीं!!! ये ढोंगी है....!!!!
बस, श्वेता का इतना चिल्लाना hi था की तभी...
*Chataaaaaaaaaaaaaaak*
एक ज़ोरदार थप्पड़ की गूँज पूरे हॉल में फेल गयी.
श्वेता : !!!?
श्वेता अपने गाल को पकड़ एक तरफ चेहरा झुकाये हैरत के मारे खड़े रह गयी. बृजेश ने उससे एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया था.
और मानो वह जैसे सन्नाटा सा छ गया.
मनोरथ समेत सभी अपनी जगह से हैरत के मारे खड़े हो गए.
भूमिका : M-Mom!!!!!
श्वेता ने फिर बृजेश को वही रोटी हुई सूरत से देखा. आज जैसे उसके अंदर कुछ टूट चूका था.
बृजेश जैसा भी था. वो अपने पिता की बोहत इज़्ज़त करता था. हाँ, कभी कभी उसकी अपने पिता से कहा सुनी हो जाती थी. पर कभी पलट के जवाब नहीं देता था बृजेश. पर आज...
आज उसकी hi पत्नी उसके पिता को सबके सामने ढोंगी कह के बुला रही थी? क्या कमी रह गयी थी उसकी और उसकी बेटी की परवरिश में?
बृजेश : अभी के अभी अंदर जाओ. भूमिका!!!! लेके जाओ अपनी माँ को.
श्वेता तोह जैसे सन्न सी पद गयी थी. वो भूमिका के साथ कब हॉल चोरर के बाहर निकल गयी उससे पता hi नहीं चला.
बृजेश : पापा जी! यदि सब कुछ हो गया हो तोह क्या...
मनोरथ : तुम्हे हाथ नहीं उठाना था बहु पे. औरत पे हाथ उठाना...
बृजेश : M-Mein जानता हु. पर उस समय मुझे वो ज़रूरी लगा.
मनोरथ ने तोह जैसे ये पल पहले hi परख लिया था. इसलिए वो शांत हो गए.
मनोरथ : आज में अपनी साड़ी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो चूका हु. तोह इसलिए, कल मेने इसकी ख़ुशी में एक भव्य दावत राखी है 5 स्टार होटल में. कल सभी को वह टाइम से रात में मौजूद होना है. और... बहु को मन लेना. में नहीं चाहता वो वह पर न मिले.
बृजेश : J-Jii!!
मनोरथ : ये प्रोग्राम मेने इसलिए रखा है. क्युकी में चाहता हु की वीर और प्रांजल दोनों hi वह अपनी काबिलियत दिखाए. अब क्युकी वो दो बड़े हिस्सों के मालिक है. तोह वह धेरर सारे बड़े बड़े लोगो का आगमन होगा. वो सारे मेरे पहचान के है. उनसे अच्छे रिश्ते बनाओगे तोह आगे जल्दी बढ़ोगे. अब देखना ये है की तुम दोनों में से कौन अच्छे से रिश्ते बना पाटा है. समय और जगह रात तक तुम लोगो को मैसेज द्वारा बता दिए जाएंगी. पारिवारिक बैठक यही समाप्त होती है. तुम सब जा सकते हो.
और फिर जो भी डाक्यूमेंट्स के काम थे, उन्हें निपटने के बाद वीर भी अपने घर आ गया.
यहाँ प्रांजल अपने रूम की ऑर्डर जा रहा था जब विवेक ने उससे पीछे से थाम के पलटाया.
विवेक : छोटे!!! ये वार तोह उल्टा hi पद गया मेरे लिए. मुझे नहीं लगा था की...
प्रांजल (स्माइल्स) : अब कुछ नहीं हो सकता भैया! आप ने अपने खुद के परर पर कुल्हाड़ी मार ली.
विवेक : हँ?
प्रांजल : चलता हु.
विवेक : एक... एक मिनट! तुझे 40% मिली है न... तोह...
प्रांजल : हाँ तोह? ये 40% मुझे मिली है. आपको भी मिलती. यदि आपने वीर का ध्यान रखा होता तोह. अब इसमें में कुछ नहीं कर सकता भैया.
विवेक प्रांजल की बात सुनते hi इतना आग बबूला हो गया की उसने फौरन hi अपने छोटे भाई की कल्लोर पकड़ ली. साला इस छोटे भाई के लिए इतना रिस्क उठा रहा था वह? उससे लगा था की 40 काम से काम प्रांजल को तोह मिली hi है. वो आधी तोह दे hi देगा. आखिर वो दोनों पार्टनर्स थे. पर...
देने की तोह बात चोर्रो, प्रांजल ने साफ़ इंकार कर दिया कुछ भी देने से. गुस्सा आना तोह स्वाभाविक था.
विवेक : में तुझे हर्र कदम पर साथ लेके चला. और तूने ये किया? भूल मत छोटे! की मेने hi तुझे इस प्लान में शामिल किया था. यदि में न होता तोह तुझे ये सब...
प्रांजल : हाहाहाहा~
प्रांजल ने हस्ते हुए अपनी कल्लोर से विवेक के हाथ हटाए और मुस्कुराते हुए उससे देखते हुए बोलै,
प्रांजल : कमाल करते हो भैया! इतनी बड़ी कंपनी के मालिक हो. डैड ने आप पे न जाने कितना पैसा फूका होगा. उसके बाद अब जब इतने जीवन में मुझे कुछ मिल रहा है तोह वो भी आपको hi चाहिए? न भैया न! बिलकुल नहीं! आपने न केवल भाभी को खोया, बल्कि खुद के hi परर में कुल्हाड़ी मार आपने ये जायदात भी खो दी. खर्र, जैसा जिसका नसीब... चलता हु!
और वो विवेक से दूर हट अपने कमरे की ऑर्डर निकल गया. इधर विवेक बस अपनी मुट्ठी को गुस्से में कस्ता hi रह गया.
"छोटे!!!"
कमरे में आते hi प्रांजल की जो मुस्कान थी वो गायब हो चुकी थी. वाश बेसिन के पास आते hi उसने अपने चेहरे पर पानी के छीटे मारे और सामने लगाए शीशे में खुद को देखने लगा.
'व्हाट वेंट रॉंग???'
मनोरथ का डिसिशन उसकी प्रेडिक्टिबिलिटी से बिलकुल अलग था. उसने सोचा था की उसके दादा जी 50% उससे, 30% वीर और 10-10% आरोही और काव्य को बाटेंगे.
पर वो गलत था.
वीर भी उतने hi प्रतिशत का मालिक था जितना की वह खुद. और इसी के चलते उसके मैं में ढेर्रो सवाल आ रहे थे. उसका प्लान फ़ैल हो चूका था.
'सब कुछ तोह सही कर रहा था में. गलती कहा रह गयी? दमन आईटी!!! वीर भी मेरा इक्वल का पार्टनर है. मुझे...
हम्म!!! मुझे जल्द से जल्द आरोही दी और काव्य से उनका हिस्सा कैसे भी करके लेना होगा. ात लीस्ट तब में 60% का मालिक तोह कहला पाउँगा. बाकी की जायदात वीर से कैसे हड़पनी है. उसके बारे में बाद में सोचूंगा. कल मेजर गाथेरिंग राखी है दादा जी ने. बड़े बड़े लोग आएँगे. में किसी भी हालत में वीर को उनसे मिलने के चान्सेस नहीं दे सकता. मुझे उसके सारे चान्सेस इंटरसेप्ट करने होंगे. कल! कल में उसकी साड़ी इज़्ज़त का ऐसा फालूदा बनाऊंगा की पराये तोह क्या उसके अपनों के बीच उसकी इज़्ज़त मिटटी में मिलके रह जाएगी!'
वो खुद से इतना सोच चला गया कपडे बदलने.
***
अगली रात आज बैंक्वेट का दिन था. भव्य दावत राखी गयी थी मनोरथ द्वारा 5 स्टार होटल में.
एक से एक लोग आये थे. भले hi वीर की फॅमिली करा या सोनिआ जितने लेवल की नहीं थी. पर काफी लोग उनके hi स्टैण्डर्ड के आये हुए थे. वो इसलिए क्युकी मनोरथ ने अपनी गुज़रती लाइफ में इनसे कांटेक्ट बनाये थे.
मनोरथ को चोरर के उसके घर से सभी होटल में आ चुके थे. वैसे तोह ये प्रोग्राम श्वेता के होटल में hi रखा जा सकता था. पर...
कल की घटना के चलते और साथ hi साथ ये सोचके चलते की श्वेता फिर होटल के कामो में बिजी हो जाएगी. इसलिए, फिर ये बैंक्वेट एक 5 स्टार होटल में आयोजित किया गया.
महंगी से महंगी कार्स की पार्किंग होती जा रही थी. और आदमी औरत महंगे महंगे कपडे पहने हुए अंदर जा रहे थे. मनोरथ ने इस बार कोई कमी नहीं दिखाई थी. लाखो रुपये खर्च किये थे उन्होंने आज की इस दावत में.
बृजेश और करुणेश अंदर hi साथ में सूट पहने खड़े हुए आपस में बातें कर रहे थे.
करुणेश : लो बोलो! पापा जी हमे समझाते थे की पार्टी मत करो, पार्टी मत करो. और अब खुद को देखो. ऐसी पार्टी फेकि उन्होंने की क्या hi कहे अब...
बृजेश : वो पापा जी है. कुछ भी कर सकते है.
वही दूसरी ऑर्डर, आरोही और काव्य हसिनायो जैसी सजी हुई वीर का hi वेट कर रही थी जब एक कार पार्किंग में आकर रुकी. और उसमे से वीर निकला.
शानदार एक टुक्सेडो पहने आज वो भी पूरी तरह से तैयार होक आया था.
क्युकी वो जानता था, की इस बैंक्वेट में उससे कई सारे रिलेशनशिप बनाने है बड़े लोगो से.
और ऊपर से... उसने अपने 200 पॉइंट्स का उपयोग भी स्टैट्स में उसे कर लिया थे. उसने 60 पॉइंट्स स्ट्रेंथ में, 30 पॉइंट्स इंटेलिजेंस में, 30-30 पॉइंट्स अगिलिटी और ेंदुराने में और बाकी के 50 सीधे अपीयरेंस में दाल दिए थे.
'पारी'
[Hmm?]
'शो में माय फुल स्टेटस!'
[Okay!]
*डिंग*
[Name : Veer
आगे : 21
स्टेटस : स्टूडेंट
स्टैट्स :
स्ट्रेंथ - 96/100
इंटेलिजेंस - 95/100
अगिलिटी - 65/100
ेंदुराने - 65/100
अपीयरेंस - 75/100
स्किल्स :
1) सेक्स प्रोटेक्शन : ों (सिल्वर टियर स्किल)
2) बेसिक मार्टिकल आर्ट्स स्किल (ब्रोंज टियर स्किल) अपग्रेडेड तो इंटरमीडिएट मार्टिकल आर्ट्स स्किल (सिल्वर टियर स्किल)
3) हव्कये (डायमंड टियर स्किल)
4) लीम्बो (सिल्वर टियर स्किल)
5) बेसिक एनिमी ट्रैकर (ब्रोंज टियर स्किल)
6) अब्सोलुटे शेफ (गोल्ड टियर स्किल)
7) बेसिक ड्राइविंग स्किल्स (ब्रोंज टियर स्किल)
System's इंटरनल फीचर्स :
Check-I, Check-II, पथ ट्रैकर, अल्फा ट्रेट, पास्ट इलस्ट्रेशन, ट्रांसलेटर, क्वेस्ट हंट, स्लॉट.
रिलेशनशिप्स :
1) सुमन : लॉयल स्लेव (फवौराबिलिटी : 92)
2) आभा : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 68)
3) सोनाली : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 45)
4) रागिनी : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 70)
5) निधि : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 54)
6) श्रेया : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 65)
7) जूही : बेस्ट फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 89)
8) सुहाना : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 62)
9) सोनिआ : गुड फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 64)
10) काव्य : वैरी क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 85)
11) आरोही : गुड फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 66)
12) भूमिका : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 30)
13) श्वेता : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 5)
14) करा : बेस्ट फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 72)
सिस्टम लेवल : लेवल 5
(120 ऍक्स्प मोरे तो रीच लेवल 6)]
और स्टैट्स में अपीयरेंस 75 देखते hi वीर के अंदर काफी कॉन्फिडेंस था आज. क्युकी उससे पता था की अंदर जाते hi क्या होने वाला था.
'Let's जो!'
[Yeah!!!]
.
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आज के लिए इतना hi गाइस!
धन्यवाद! थिस अपडेट कंटैन्स मोरे थान 4.7क वर्ड्स. मेगा अपडेट के काफी नज़दीक है ये वाला. तोह अपना अपना काम कर के जाने का और अपनी समीक्षा रखने का.
अब तक...
इंटरमीडिएट मार्टिकल आर्ट स्किल!!!
नीचे प्राइस लिखा hi था~
400 पॉइंट्स!
और वीर ने एक बार में hi परचेस के ऑप्शन पे क्लिक किया और...
*डिंग*
[Intermediate Martial Art Skill is now available.]
और ये नोटिफिकेशन सुनते hi वीर मुस्कुराते हुए वापस से अपनी दोनों सेविकाओं के बीच लेत गया.
'प्रांजल! I'm प्रेपरिंग ा सरप्राइज फॉर यू!!!'
अब आगे...
"आउच आउच!!!!"
"बोलो अब? अब कभी करोगे ऐसा? हाँ?"
"N-Nahi! बिलकुल नहीं!"
"हम्म! चलो माफ़ किया! पर अहिंदा से ध्यान रखना. Okay!?"
"ऑफ़ कोर्स!"
ये आवाज़ थी वीर की जो अपने आप को चुर्राने की कोशिश कर रहा था रागिनी के हाथो से. क्युकी रागिनी उसके कान को पकडे हुए आज उसकी खबर ले रही थी.
डॉक्टर मृणाल के घर से तोह ठीक होक आ गया था वीर. पर अब तक उसने अपनी रागिनी भाभी को पूरी बात नहीं बतायी थी. जैसा की रागिनी ने पहले hi उससे कह के रखा था की वो उसके ठीक होने के बाद उसकी अच्छे से परीक्षा लेगी. तोह बस, वही पाठ चल रहा था अभी. वीर की क्लास लग रही थी.
और उसकी ऐसी हालत देख आभा और सोनाली दोनों hi दूर से हस्ते हुए मज़े ले रही थी. वही सुमन बेचारी अपने मालिक को देख बस असहाय वाली मुस्कराहट hi दे पा रही थी. इसमें वो कुछ नहीं कर सकती थी.
अंत में रागिनी ने भी धीरे से मुस्कुराते हुए वीर के कान को चोर्रा और बोली, "अपना ख़याल रखा करो वीर पहले. पहले खुद की जान है, फिर दुसरो की."
रागिनी उससे आज की दुनिया का ज्ञान पढ़ाना चाह रही थी. और ठीक hi तोह कह रही थी वह. आज की इस स्वार्थ सी भरी दुनिया में आदमी पहले अपनी जान की परवाह करता है. बाद में दूसरे की. सोचते हुए उससे जैसे विवेक की हरकत की याद आ गयी.
पर वीर की तोह जैसे अलग hi सोच थी. वो भी मुस्कुराया और बोलै, "में विवेक भैया की तरह नहीं भाभी! मेरे लिए अपने पहले है. फिर में खुद."
*बेदुम्प*
और पल भर के लिए रागिनी का दिल एक धड़कन जैसे फांद गया.
"H-Huh!?" वो जोरर से सांस खींचते हुए वीर को आश्चर्य भरे भाव से देखि.
वीर को भी जैसे ध्यान आया की शायद उससे विवेक का नाम ऐसे बीच में नहीं लाना चाहिए था. तोह उसने अगले hi पल माफ़ी मांगी.
रागिनी : नहीं वीर! इसमें माफ़ी मांगने की कोई ज़रुरत नहीं. और वैसे भी, सही hi तोह कहा तुमने.
इस बार उसकी नज़रे झुक गयी. और आवाज़ में मायूसी भी थी.
रागिनी : सुमन जी! K-Kya आप सब बाहर जा सकते हो? M-Mujhe वीर से अकेले में कुछ बात करनी है.
सुमन : जी रागिनी जी! आभा बेटी, सोनाली, चलो बाहर.
और सुमन उन् दोनों को लेकर बाहर चली गयी.
कमरे में केवल वीर और रागिनी hi थे अब. अभी सुबह के 8:30 बज रहे थे और रागिनी बस नाहा के नाश्ता hi बनाने जा रही थी जब उससे याद आया की वीर से उसने वो बातें पूछी hi नहीं. तोह इसलिए वो आज वीर से साड़ी बात jaan'ne के लिए आयी थी उसके कमरे में.
उसके घने बाल, अभी भी पानी से हलके भीगे हुए थे और खुले हुए थे. क्युकी वो विवेक के साथ उसके घर पे नहीं रहती थी अब तोह उससे सारे कपडे pehn'ne की छूट थी. वो टॉप भी पहनती थी, साड़ी भी, कुरता, सूट, सलवार सब कुछ.
और आज रागिनी एक पिंक और ब्लैक कलर कॉम्बिनेशन की साड़ी पहनी हुई थी जिसमे वो हुस्न की मल्लिका लग रही थी. ये कहना की वीर रागिनी से अत्त्रक्टेड नहीं था जब से वो घर में आयी थी तोह ये गलत था. जब से विवेक की शादी हुई थी, वीर हमेशा से रागिनी के संग बातें करना चाहता था.
कौन नहीं चाहेगा की आपके साथ एक ख़ूबसूरत भाभी हो जो आपसे बातें करे? पर रागिनी उस समय वीर को भाव नहीं देती थी. और आज देखो, आज किस्मत ऐसी थी वीर की, की वो रागिनी के संग रह रहा था, रागिनी खुद उस से ुपत के बातें करती थी, यहाँ तक की उसकी बेहद परवाह और उसका ख़याल भी रखती थी. शायद इसलिए समय को सबसे शक्तिशाली माना गया है.
लेकिन रागिनी के मैं में इधर जैसे अभी भी कुछ बेचैनी थी.
रागिनी : वीर?
वीर : हम्म?
रागिनी : तुम... तुमने सच में माफ़ कर दिया है न मुझे? में तुमसे बात भी नहीं करती थी पहले. फिर धीरे धीरे हम दोनों की बीच सलाह हो गयी. दूरिया हट गयी. पर... पर कही तुम ये तोह नहीं सोचते न की तुम्हारी ये भाभी, मौका देख के पलट गयी और अब तुम्हारे संग अच्छे से पेश आने लगी. कही तुम ऐसा तोह नहीं सोचते न? बोलो?
रागिनी की इन्सेक्युरित्य, वीर देख पा रहा था. वो देख पा रहा था की रागिनी इस बात को लेकर बेहद चिंतित थी. तोह उसने फौरन hi जवाब दिया.
वीर : भाभी! यदि ऐसी बात होती तोह में आपसे कभी इतना फ्रेंडली होक पेश आता hi नहीं. इसलिए आप ये बात मैं से निकाल दीजिये. ऐसी कोई बात नहीं है. और वैसे भी, आपका कोई ज़्यादा दोष था भी नहीं. मेरे दिमाग में उन् लोगो के नाम अच्छे से मौजूद है जिनका सबसे ज़्यादा कसूर था.
वीर की कही गयी बात से रागिनी मुस्कुरायी और एक चेन्न की सास ली. वो शीशे के सामने जाके कड़ी हुई और नज़रे झुकाते हुए बोली,
रागिनी : तुम्हारी यही बात तोह मुझे सबसे अच्छी लगती है वीर. और... कही तुम्हे बुरा तोह नहीं लगता न? मेरी बातो का? मेरी हरकतों का? मेने आज सबके सामने तुम्हारे कान खींचे, तुमसे बातें बुलवाई. कही तुम बुरा तोह नहीं मानते न?
वो वीर का जवाब sunn'ne के लिए इंतज़ार कर hi रही थी की जब अचानक hi उससे अपने नंगे पेट पर किसी का हाथ महसूस हुआ.
"हाआआअह्ह्ह्हह!?"
जोरर से सिसकते हुए रागिनी ने जैसे hi शीशे में देखा तोह पाया की वीर उसके ठीक पीछे था और अपनी ठुड्डी को उसके कंधे पर रख उससे पीछे से अपनी ऑर्डर खींच लिया.
'थिस... थिस...! आह!'
रागिनी बेचारी भौचक्की सी आँखें फाड़े शीशे में देख रही थी, जिसमे उससे खुद की आकृति तोह दिख hi रही थी पर साथ hi साथ उसके पीछे से चिपके हुए वीर की भी आकृत नज़र आ रही थी.
वीर के हाथ का टच अपने नग्न पेट पर पाते hi रागिनी की सासें तेज़्ज़ हो चुकी थी. वीर की हथेली विवेक की हथेली सी कई गुना अलग थी. या यु कहे की बेहतर थी. रागिनी को गर्म सा एहसास हो रहा था अपने पेट पर.
इतनी लड़ाईयों में भिड़ने के बाद वीर की हथेली अब पहले की तरह नरम नहीं थी. उनमे हलकी हलकी खरोंचे थी, कुल मिलाके उसकी त्वचा सख्त, और थोड़ी रफ़ थी. पर यही रफ़ सी स्किन रागिनी को एक प्रोटेक्टिव और मर्दाना फीलिंग दे रही थी आज जो फीलिंग विवेक उससे कभी नहीं दे पाया था.
न चाहते हुए भी, रागिनी का मैं दोल रहा था आज. वो अपनी सासें काबू में hi नहीं कर पा रही थी. ऐसा कुछ तोह उसने आज तक फील नहीं किया था.
वीर के हाथ का टच उससे उस रात को याद दिला रहा था जिस दिन वीर उससे बचाने आया था. उसकी हथेली का मात्र स्पर्श hi रागिनी को सबसे सुरक्षित अनुभूति प्रदान कर रहा था. जैसे मानो दुनिया में इस से सेफ जगह कोई और हो hi नहीं सकती थी.
वीर तोह अनजाने में ये कर रहा था. वो तोह बस सांत्वना देना चाहता था रागिनी को की वो उसकी बात का बुरा नहीं मानता है.
और उसके बाद hi, रागिनी की सासें उनकंट्रोलबले हो गयी जब वीर ने अचानक hi...
*छू~*
रागिनी के गाल को चुम लिया.
"Aaaaaaaaaahhhhhh!"
रागिनी हड़बड़ाते हुए पलटी और वीर को देख वो फटाफट वह से अपने सुर्ख लाल गाल लेते हुए निकल के भाग गयी.
"हम्म?"
वीर बेचारा बस देखता hi रह गया. उससे इस बात का कोई अंदाजा नहीं था की रागिनी अपने मैं में इस वक़्त क्या क्या सोच रही थी उसको लेकर.
***
****** हॉस्पिटल...
"देखिये! हमने X-Ray निकाला है. हम आपकी भलाई के लिए hi कह रहे है. इसका ठीक होना असंभव है. आप बात मानिये और...."
"नहीं!!!!!"
*थुड़*
"!???"
एक बड़ा hi सज्जन डॉक्टर इस वक़्त सामने खड़े आदमी को अपनी बात समझा रहा था. पर सामने खड़े व्यक्ति ने उसकी बात सुनते hi अपने दोनों हाथ उसकी टेबल पर पटक दिए.
जी हाँ! ये व्यक्ति और कोई नहीं, बलहार hi था जो कल वीर के हाथो अपना दाया हाथ खो बैठा था. क्युकी उसका वह हाथ अब किसी काम का नहीं था.
ये चौथा जाना माना डॉक्टर था शहर का जिससे आज बलहार अपना हाथ दिखाने आया था. पर यहाँ भी वही जवाब मिला उससे.
उसका गुस्सा सातवे आसमान पर था.
बलहार : बेवकुफो!!! काहे का डॉक्टर हो सालो? एक हाथ भी पहले जैसा नहीं कर सकते? नहीं करवानी मुझे कोई सर्जरी... मुझे मेरा यही हाथ चाहिए समझे!??? कोई आर्टिफीसियल हाथ नहीं!!
डॉक्टर : देखिये! Y-Ye इम्पॉसिबल है. ये बियॉन्ड रिपेयर है. में आपकी भलाई के लिए hi...
इस से पहले की डॉक्टर कुछ कह पाटा, बलहार ने उसकी कल्लोर पकड़ उससे उसकी चेयर से उठाया और ुचि आवाज़ में चिल्लाया,
बलहार : देख बहनचोद!!! तू कुछ भी कर, जिससे भी बुलाना है बुला पर मेरा ये हाथ ठीक कर. समझा?
डॉक्टर : देखिये! A-Aap तमीज से बात कीजिये! Y-Ye इम्पॉसिबल है. आप... आपकी लिंब इस तरीके से मुड़ी हुई है की इससे वापस से सीधा करना असंभव है. ये... ये कोई रबर नहीं है. ये हाथ है. ज़रा सी भी चूक हुई तोह दर्द तोह होगा hi, साथ hi पूरी तरीके से हड्डी टूट सकती है.
"Aaaaaarrrrghhhhhhhhhh!" बलहार गुस्से में चिल्लाया और उस डॉक्टर को वही धक्का देकर बाहर निकल गया.
मैं में उसके वीर के वही शब्द गूंज रहे थे.
"तेरा जो ये हाथ है न. तू दुनिया के किसी भी डॉक्टर के पास hi क्यों न चला जाए. चाहे उससे कितने भी पैसे क्यों न दे दे. तेरा ये हाथ दुनिया में कोई रिपेयर नहीं कर सकता. सिवाए मेरे!"
अब शायद, बलहार को वीर की बात का विस्वाश हो रहा था. वो चार बड़े से बड़े शहर के डॉक्टर्स के पास हो आया था. पर कभी भी उससे उम्मीद नज़र नहीं आयी. यदि ऐसे hi चलता रहा तोह...!?
"नहीं!!! M-Mein अपना हाथ नहीं खो सकता."
उसने अभी तक स्लोगन या किसी अन्य को वीर के बारे में कोई जानकारी नहीं दी थी. वो इसलिए क्युकी पहले वो कन्फर्म करना चाहता था की वीर की बात सही है भी या नहीं? लेकिन वीर की बात अब उससे सच होती नज़र आ रही थी.
"टछहः!" दातो को मीस्ते हुए उसने अपना निर्णय फौरन hi ले लिया.
और वो था...
वो स्लोगन की साड़ी खबरे वीर को देने वाला था!
***
Veer's ओल्ड हाउस...
11:30 ऍम...
"सब मौजूद है न?" मनोरथ कहते हुए सिंगल सीट सोफे पर विराजमान हो गए.
"जी दादा जी! सब यही है!" मनोरथ के बगल में खड़े प्रांजल ने कहा.
आज मनोरथ अपना फैसला अपनी जायदात को लेकर सुनाने वाले थे.
घर में आज सभी मौजूद थे. वीर चुप चाप अपनी आँखें बंद किये, दोनों हाथ मोड एक सोफे पर बैठा हुआ था. उसके बगल से आरोही और काव्य दोनों hi बैठी हुई थी.
तोह वही बृजेश और करुणेश एक साथ विराजमान थे. विवेक अपनी माँ सुमित्रा के साथ बैठा हुआ था. और भूमिका और श्वेता दोनों माँ बेटी अलग से एक सीट में.
मनोरथ फोर्मल्ली ये डिसों सुना रहे थे. तोह वकील से लेके डाक्यूमेंट्स सब मौजूद थे. सारा काम आज hi शुरू होने वाला था. वो जल्द से जल्द इस जायदात से छुटकारा पाना चाहते थे.
बृजेश ने एक झलक वीर की ऑर्डर देखा और वीर ने भी उससे देखा. पर दोनों में से किसी ने कुछ कहा.
प्रांजल दादा जी के बगल से hi बैठ गया.
और फिर मनोरथ बोलना शुरू किये,
मनोरथ : तोह में बातो को ज़्यादा घुमाऊंगा नहीं. सीधा मुद्दे पर आता हु. मेरी साड़ी जायदात को आज में अपने पोते पोतियो में बाटने जा रहा हु. और हाँ, ये में पूरे होश में रहके सुना रहा हु. जायदात में से कोई भी चीज़ बृजेश, करुणेश और उनकी धर्म पत्नियों को नहीं बाटी जाएगी. ये केवल मेरे पोते पोतियो के लिए hi है. और वो भी उनके लिए जो मुझे लगता है सही तरह से इस जायदात का उपयोग कर पाएंगे.
मनोरथ की बात सुन्न सभी शांत थे. पर सभी के दिल की धड़कन ज़र्रों से धड़क रही थी. खासकर विवेक, और श्वेता की.
मनोरथ : तोह मेरा फैसला तय रहा...
कहते हुए मनोरथ ने हर्र एक वह बैठे शख्स पर नज़रे घुमाई. वीर को कोई मतलब नहीं था. उसके हिसाब से दादा जी को ये काम अभी नहीं करना चाहिए था. इसलिए, वो बस चुप चाप साइड में बैठा रहा.
सब की नज़रे मनोरथ की ऑर्डर hi थी. और तभी मनोरथ ने अपना फैसला सुनाया जिससे सुनके वह मौजूद सभी के होश उड़द गए.
मनोरथ : मेरी 40% जायदात... में वीर के नाम करता हु.
*बूम*
जैसे एक बेम फटा वह बैठे लोगो पर.
वीर : हँ?
[Hahaha~ Ye hui na baat ab! Just look at their faces.]
प्रांजल अभी भी शांत बैठा हुआ था. पर उसके माथे पर पसीना ज़रूर झलक रहा था.
मनोरथ : और 40% जायदात... में अपने पोते प्रांजल के नाम करता हु.
जो पसीना प्रांजल के माथे पर था. ये सुनते hi उसने वो पसीना पॉच लिया. बाकी सब बस अपने गले में अटका हुआ थूक hi गुटक के रह गए.
मनोरथ : बाकी की बची हुई 20% जायदात में से... में 10% अपनी पोती आरोही और बाकी की 10% अपनी सबसे छोटी पोती काव्य के नाम करता हु.
श्वेता : H-Huh!? Y-Ye?
विवेक : !???
मनोरथ : यही है मेरा पूरा फैसला.
श्वेता जिसके चेहरा का रंग hi उड़द चूका था फैसला सुन्न के वो फौरन hi अपनी जगह से उठ कड़ी हुई.
श्वेता : P-Papa जी!? ये... ये आप क्या कह रहे है?
मनोरथ : सही कह रहा हु.
श्वेता : H-Huh? P-Par मेरी बेटी भूमिका. वो... वो भी तोह आपकी पोती है न? और वो भी सबसे बड़ी पोती... T-Toh उसका नाम कहा है? आपने उससे कुछ क्यों नहीं दिया?
मनोरथ : कुछ समय पहले, मेने इन् सभी को अपने कमरे में बुलाया था. तब में इनसे ये नहीं पूछना चाह रहा था की जायदात किस्से दी जाए. में इन् सभी का व्यक्तित्व परख रहा था. जिसकी परीसखा में विवेक और भूमिका दोनों hi फ़ैल हो गए.
भूमिका का ये बात सुन्न अपने आप सर्र झुक गया. वो नाराज़ नहीं थी. न hi गुस्सा थी. उससे जैसे वाक़ई कोई ग़म नहीं था. काफी कलम थी वह.
पर यही बात उसकी माँ श्वेता के लिए नहीं कही जा सकती थी. श्वेता का तोह बेचैनी के चलते पूरा शरीर ठिठुर रहा था.
श्वेता : ये... ये आप!?? ऐसा कैसे कर सकते है? A-Arohi और K-Kavya को तोह दी न आपने? फिर बेचारी मेरी भूमिका hi कई रह गयी?
मनोरथ : में बताता हु की क्यों भूमिका और विवेक को रत्ती भर भी जायदात नहीं मिल पायी. क्युकी जब विवेक से मेने पूछा था की जायदात कितने हिस्सों में किस्से बाटी जाए. तोह विवेक ने सभी का नाम लिया था. सिवाए वीर के. जिस भाई को अपने सबसे छोटे भाई की फिक्र तक न हो उससे भला में ये जायदात कैसे दे सकता हु? यही कारण भूमिका का भी है. भूमिका बिटिया ने एक बार भी अपने भाई वीर का ज़िक्र नहीं किया था.
मनोरथ की बात सुन्न, श्वेता का दिमाग hi सन्न रह गया. उस दिन खुद उसी ने तोह भूमिका को पट्टी पढ़ा के भेजा था की अपने दादा जी से डायरेक्टली अपना हक़ मांग लेना. और देखो क्या हो गया आज. श्वेता को अपनी गलती का आभास होते hi इतना ज़्यादा पछतावा हो रहा था की उसकी मुट्ठी में साड़ी का भाग पूरा निचुड़ के रह गया. यहाँ तक की आँखों के कोनो में हलके हलके ासु भी उत्पन्न हो चुके थे.
विवेक वही बैठे अपने मैं में खुद को hi कोस रहा था. उससे लगा था की शायद वीर का नाम नहीं लेते हुए दादा जी ने उसकी बातो को ज़्यादा ध्यान नहीं दिया होगा. पर वो गलत था. बस मैं में गाली hi निकल रही थी उसके.
मनोरथ : वही दूसरी ऑर्डर, प्रांजल आरोही, और काव्य तीनो ने hi वीर को अपने ध्यान में रख उसका नाम लेते हुए उससे जायदात देने को कहा था. आरोही बिटिया तोह अपना पूरा हिस्सा वीर को देना चाहती थी. तोह वही काव्य को कुछ नहीं चाहिए था. वो भी यही कही थी की जायदात वीर को दे दी जाए. और प्रांजल बेटे का भी यही कहना था.
वीर ने palat'te हुए दोनों hi आरोही और काव्य को देखा तोह दोनों hi बहनो ने उससे एक स्माइल पास की.
मनोरथ : आरोही सही मायनो में हक़दार नहीं थी. क्युकी जायदात उससे hi सही फैलती है जो इसका उपयोग सही से करना जाने और एक इच्छा रखे. आरोही बिटिया के मैं में कोई इच्छा नहीं थी. उससे कोई मतलब नहीं था. यही कारण है की उससे केवल 10% hi जायदात का हिस्सा मिला. वो इसलिए, क्युकी उससे अपने भाई वीर का ध्यान था. ध्यान था की वो इस घर से दूर था.
आरोही : ....
मनोरथ : वही काव्य को ये जायदात का 10% इसलिए दिया गया क्युकी वो घर की सबसे छोटी पोती है मेरी. और सबसे प्यारी. अभी उससे उतनी समझ नहीं. ऐसा हो सकता है की आगे जा के उससे और समझ आये तोह कही उससे पछतावा न हो. इसलिए उसके जेब में कुछ तोह होना चाहिए न? ये 10% की जायदात अब वो जैसे चाहे उपयोग करे, ये उसके ऊपर है.
श्वेता और विवेक दोनों hi मनोरथ की बात विस्तार से sunn'ne के बाद वही जम्म के रह गए. ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने उनके मुँह में निम्बू निचोड़ दिया हो. ऐसा मुँह हो गया था दोनों का.
और फिर श्वेता जैसे भड़क उठी,
श्वेता (चिलाते हुए) : ये गलत है. ये सरासर अन्याय है... ये गलत है! आप... आप ऐसा नहीं कर सकते. आपने गलत निर्णय लिया है. ये मेरी बेटी के साथ छल है. सबको आपने कुछ न कुछ दिया पर मेरी बेटी के लिए एक रूपया भी नहीं छूता आपके हाथ से? K-Kya कमी रह है मेरी बेटी में?
क्यों किया आपने ऐसा!? हैं?
श्वेता की लड़खड़ाती हुई आवाज़ सुन्न, वह बैठा बृजेश उससे बॉहे सिकोड़ के देखने लगा. तोह वही भूमिका अपनी माँ के कंधो को थाम उससे रोकने का प्रयत्न करने लगी. पर आज जैसे श्वेता बिलकुल भी नहीं बैठने वाली थी.
श्वेता (स्क्रीम्स) : आपने गलत किया है! आप गलत हो!!!! आपने मेरी बेटी से उसका हक़ छीना है!!!!!
उसकी चींखे पूरे हॉल में गूँज रही थी. और उसका चेहरा पूरा लाल हो चूका था. और आँखों से ासु बहते हुए गाल पर बिखर चुके थे. भूमिका भी सेहमते हुए अपनी माँ को रोकने की कोशिश कर रही थी.
बार बार समझाने पर भी जब श्वेता न चुप हुई तोह इस बार बृजेश नहीं रुका. वो उठा और तेज़्ज़ कदमो के साथ श्वेता के समीप आया.
बृजेश (चिल्लाते हुए) : श्वेताऑ!!!
श्वेता : !!?
बृजेश : मेने तुम्हारे लिए कितना कुछ नहीं किया? अरे इतनी बड़ी होटल तुम्हारे और भूमिका के नाम पर है. फिर तुम पापा जी से ऐसी बातें क्यों कर रही हो? और क्या चाहिए तुम्हे? यहाँ तोह हम सभी घरवाले है न? फिर अब और क्या चाहिए तुम्हे? क्या तुम इतने से भी संतुष्ट नहीं हो? सब कुछ तोह दे hi रहा हु न में तुम्हे!? फिर पापा जी से क्यों ज़बान लड़ा रही हो?
श्वेता (स्क्रीम्स) : क्युकी ये ढोंगी है!!!! ये बस मीठी मीठी बातें करते है! इन्हे मेरी बच्ची की कोई परवाह नहीं!!! ये ढोंगी है....!!!!
बस, श्वेता का इतना चिल्लाना hi था की तभी...
*Chataaaaaaaaaaaaaaak*
एक ज़ोरदार थप्पड़ की गूँज पूरे हॉल में फेल गयी.
श्वेता : !!!?
श्वेता अपने गाल को पकड़ एक तरफ चेहरा झुकाये हैरत के मारे खड़े रह गयी. बृजेश ने उससे एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया था.
और मानो वह जैसे सन्नाटा सा छ गया.
मनोरथ समेत सभी अपनी जगह से हैरत के मारे खड़े हो गए.
भूमिका : M-Mom!!!!!
श्वेता ने फिर बृजेश को वही रोटी हुई सूरत से देखा. आज जैसे उसके अंदर कुछ टूट चूका था.
बृजेश जैसा भी था. वो अपने पिता की बोहत इज़्ज़त करता था. हाँ, कभी कभी उसकी अपने पिता से कहा सुनी हो जाती थी. पर कभी पलट के जवाब नहीं देता था बृजेश. पर आज...
आज उसकी hi पत्नी उसके पिता को सबके सामने ढोंगी कह के बुला रही थी? क्या कमी रह गयी थी उसकी और उसकी बेटी की परवरिश में?
बृजेश : अभी के अभी अंदर जाओ. भूमिका!!!! लेके जाओ अपनी माँ को.
श्वेता तोह जैसे सन्न सी पद गयी थी. वो भूमिका के साथ कब हॉल चोरर के बाहर निकल गयी उससे पता hi नहीं चला.
बृजेश : पापा जी! यदि सब कुछ हो गया हो तोह क्या...
मनोरथ : तुम्हे हाथ नहीं उठाना था बहु पे. औरत पे हाथ उठाना...
बृजेश : M-Mein जानता हु. पर उस समय मुझे वो ज़रूरी लगा.
मनोरथ ने तोह जैसे ये पल पहले hi परख लिया था. इसलिए वो शांत हो गए.
मनोरथ : आज में अपनी साड़ी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो चूका हु. तोह इसलिए, कल मेने इसकी ख़ुशी में एक भव्य दावत राखी है 5 स्टार होटल में. कल सभी को वह टाइम से रात में मौजूद होना है. और... बहु को मन लेना. में नहीं चाहता वो वह पर न मिले.
बृजेश : J-Jii!!
मनोरथ : ये प्रोग्राम मेने इसलिए रखा है. क्युकी में चाहता हु की वीर और प्रांजल दोनों hi वह अपनी काबिलियत दिखाए. अब क्युकी वो दो बड़े हिस्सों के मालिक है. तोह वह धेरर सारे बड़े बड़े लोगो का आगमन होगा. वो सारे मेरे पहचान के है. उनसे अच्छे रिश्ते बनाओगे तोह आगे जल्दी बढ़ोगे. अब देखना ये है की तुम दोनों में से कौन अच्छे से रिश्ते बना पाटा है. समय और जगह रात तक तुम लोगो को मैसेज द्वारा बता दिए जाएंगी. पारिवारिक बैठक यही समाप्त होती है. तुम सब जा सकते हो.
और फिर जो भी डाक्यूमेंट्स के काम थे, उन्हें निपटने के बाद वीर भी अपने घर आ गया.
यहाँ प्रांजल अपने रूम की ऑर्डर जा रहा था जब विवेक ने उससे पीछे से थाम के पलटाया.
विवेक : छोटे!!! ये वार तोह उल्टा hi पद गया मेरे लिए. मुझे नहीं लगा था की...
प्रांजल (स्माइल्स) : अब कुछ नहीं हो सकता भैया! आप ने अपने खुद के परर पर कुल्हाड़ी मार ली.
विवेक : हँ?
प्रांजल : चलता हु.
विवेक : एक... एक मिनट! तुझे 40% मिली है न... तोह...
प्रांजल : हाँ तोह? ये 40% मुझे मिली है. आपको भी मिलती. यदि आपने वीर का ध्यान रखा होता तोह. अब इसमें में कुछ नहीं कर सकता भैया.
विवेक प्रांजल की बात सुनते hi इतना आग बबूला हो गया की उसने फौरन hi अपने छोटे भाई की कल्लोर पकड़ ली. साला इस छोटे भाई के लिए इतना रिस्क उठा रहा था वह? उससे लगा था की 40 काम से काम प्रांजल को तोह मिली hi है. वो आधी तोह दे hi देगा. आखिर वो दोनों पार्टनर्स थे. पर...
देने की तोह बात चोर्रो, प्रांजल ने साफ़ इंकार कर दिया कुछ भी देने से. गुस्सा आना तोह स्वाभाविक था.
विवेक : में तुझे हर्र कदम पर साथ लेके चला. और तूने ये किया? भूल मत छोटे! की मेने hi तुझे इस प्लान में शामिल किया था. यदि में न होता तोह तुझे ये सब...
प्रांजल : हाहाहाहा~
प्रांजल ने हस्ते हुए अपनी कल्लोर से विवेक के हाथ हटाए और मुस्कुराते हुए उससे देखते हुए बोलै,
प्रांजल : कमाल करते हो भैया! इतनी बड़ी कंपनी के मालिक हो. डैड ने आप पे न जाने कितना पैसा फूका होगा. उसके बाद अब जब इतने जीवन में मुझे कुछ मिल रहा है तोह वो भी आपको hi चाहिए? न भैया न! बिलकुल नहीं! आपने न केवल भाभी को खोया, बल्कि खुद के hi परर में कुल्हाड़ी मार आपने ये जायदात भी खो दी. खर्र, जैसा जिसका नसीब... चलता हु!
और वो विवेक से दूर हट अपने कमरे की ऑर्डर निकल गया. इधर विवेक बस अपनी मुट्ठी को गुस्से में कस्ता hi रह गया.
"छोटे!!!"
कमरे में आते hi प्रांजल की जो मुस्कान थी वो गायब हो चुकी थी. वाश बेसिन के पास आते hi उसने अपने चेहरे पर पानी के छीटे मारे और सामने लगाए शीशे में खुद को देखने लगा.
'व्हाट वेंट रॉंग???'
मनोरथ का डिसिशन उसकी प्रेडिक्टिबिलिटी से बिलकुल अलग था. उसने सोचा था की उसके दादा जी 50% उससे, 30% वीर और 10-10% आरोही और काव्य को बाटेंगे.
पर वो गलत था.
वीर भी उतने hi प्रतिशत का मालिक था जितना की वह खुद. और इसी के चलते उसके मैं में ढेर्रो सवाल आ रहे थे. उसका प्लान फ़ैल हो चूका था.
'सब कुछ तोह सही कर रहा था में. गलती कहा रह गयी? दमन आईटी!!! वीर भी मेरा इक्वल का पार्टनर है. मुझे...
हम्म!!! मुझे जल्द से जल्द आरोही दी और काव्य से उनका हिस्सा कैसे भी करके लेना होगा. ात लीस्ट तब में 60% का मालिक तोह कहला पाउँगा. बाकी की जायदात वीर से कैसे हड़पनी है. उसके बारे में बाद में सोचूंगा. कल मेजर गाथेरिंग राखी है दादा जी ने. बड़े बड़े लोग आएँगे. में किसी भी हालत में वीर को उनसे मिलने के चान्सेस नहीं दे सकता. मुझे उसके सारे चान्सेस इंटरसेप्ट करने होंगे. कल! कल में उसकी साड़ी इज़्ज़त का ऐसा फालूदा बनाऊंगा की पराये तोह क्या उसके अपनों के बीच उसकी इज़्ज़त मिटटी में मिलके रह जाएगी!'
वो खुद से इतना सोच चला गया कपडे बदलने.
***
अगली रात आज बैंक्वेट का दिन था. भव्य दावत राखी गयी थी मनोरथ द्वारा 5 स्टार होटल में.
एक से एक लोग आये थे. भले hi वीर की फॅमिली करा या सोनिआ जितने लेवल की नहीं थी. पर काफी लोग उनके hi स्टैण्डर्ड के आये हुए थे. वो इसलिए क्युकी मनोरथ ने अपनी गुज़रती लाइफ में इनसे कांटेक्ट बनाये थे.
मनोरथ को चोरर के उसके घर से सभी होटल में आ चुके थे. वैसे तोह ये प्रोग्राम श्वेता के होटल में hi रखा जा सकता था. पर...
कल की घटना के चलते और साथ hi साथ ये सोचके चलते की श्वेता फिर होटल के कामो में बिजी हो जाएगी. इसलिए, फिर ये बैंक्वेट एक 5 स्टार होटल में आयोजित किया गया.
महंगी से महंगी कार्स की पार्किंग होती जा रही थी. और आदमी औरत महंगे महंगे कपडे पहने हुए अंदर जा रहे थे. मनोरथ ने इस बार कोई कमी नहीं दिखाई थी. लाखो रुपये खर्च किये थे उन्होंने आज की इस दावत में.
बृजेश और करुणेश अंदर hi साथ में सूट पहने खड़े हुए आपस में बातें कर रहे थे.
करुणेश : लो बोलो! पापा जी हमे समझाते थे की पार्टी मत करो, पार्टी मत करो. और अब खुद को देखो. ऐसी पार्टी फेकि उन्होंने की क्या hi कहे अब...
बृजेश : वो पापा जी है. कुछ भी कर सकते है.
वही दूसरी ऑर्डर, आरोही और काव्य हसिनायो जैसी सजी हुई वीर का hi वेट कर रही थी जब एक कार पार्किंग में आकर रुकी. और उसमे से वीर निकला.
शानदार एक टुक्सेडो पहने आज वो भी पूरी तरह से तैयार होक आया था.
क्युकी वो जानता था, की इस बैंक्वेट में उससे कई सारे रिलेशनशिप बनाने है बड़े लोगो से.
और ऊपर से... उसने अपने 200 पॉइंट्स का उपयोग भी स्टैट्स में उसे कर लिया थे. उसने 60 पॉइंट्स स्ट्रेंथ में, 30 पॉइंट्स इंटेलिजेंस में, 30-30 पॉइंट्स अगिलिटी और ेंदुराने में और बाकी के 50 सीधे अपीयरेंस में दाल दिए थे.
'पारी'
[Hmm?]
'शो में माय फुल स्टेटस!'
[Okay!]
*डिंग*
[Name : Veer
आगे : 21
स्टेटस : स्टूडेंट
स्टैट्स :
स्ट्रेंथ - 96/100
इंटेलिजेंस - 95/100
अगिलिटी - 65/100
ेंदुराने - 65/100
अपीयरेंस - 75/100
स्किल्स :
1) सेक्स प्रोटेक्शन : ों (सिल्वर टियर स्किल)
2) बेसिक मार्टिकल आर्ट्स स्किल (ब्रोंज टियर स्किल) अपग्रेडेड तो इंटरमीडिएट मार्टिकल आर्ट्स स्किल (सिल्वर टियर स्किल)
3) हव्कये (डायमंड टियर स्किल)
4) लीम्बो (सिल्वर टियर स्किल)
5) बेसिक एनिमी ट्रैकर (ब्रोंज टियर स्किल)
6) अब्सोलुटे शेफ (गोल्ड टियर स्किल)
7) बेसिक ड्राइविंग स्किल्स (ब्रोंज टियर स्किल)
System's इंटरनल फीचर्स :
Check-I, Check-II, पथ ट्रैकर, अल्फा ट्रेट, पास्ट इलस्ट्रेशन, ट्रांसलेटर, क्वेस्ट हंट, स्लॉट.
रिलेशनशिप्स :
1) सुमन : लॉयल स्लेव (फवौराबिलिटी : 92)
2) आभा : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 68)
3) सोनाली : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 45)
4) रागिनी : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 70)
5) निधि : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 54)
6) श्रेया : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 65)
7) जूही : बेस्ट फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 89)
8) सुहाना : क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 62)
9) सोनिआ : गुड फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 64)
10) काव्य : वैरी क्लोज फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 85)
11) आरोही : गुड फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 66)
12) भूमिका : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 30)
13) श्वेता : फेमिलिअर (फवौराबिलिटी : 5)
14) करा : बेस्ट फ्रेंड (फवौराबिलिटी : 72)
सिस्टम लेवल : लेवल 5
(120 ऍक्स्प मोरे तो रीच लेवल 6)]
और स्टैट्स में अपीयरेंस 75 देखते hi वीर के अंदर काफी कॉन्फिडेंस था आज. क्युकी उससे पता था की अंदर जाते hi क्या होने वाला था.
'Let's जो!'
[Yeah!!!]
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आज के लिए इतना hi गाइस!
धन्यवाद! थिस अपडेट कंटैन्स मोरे थान 4.7क वर्ड्स. मेगा अपडेट के काफी नज़दीक है ये वाला. तोह अपना अपना काम कर के जाने का और अपनी समीक्षा रखने का.


