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अब तक...
कारन : रघु मुझसे हर्र डिटेल शेयर करता था. इन्क्लूडिंग डिटेल्स अबाउट यू. मुझे पता चला है की कई बार रघु ने दीदी को तुम्हारे साथ देखा है, वो भी मुस्कुराते हुए. दीदी मुस्कुरा रही थी. वो खुश थी. सो... ी वांट तो तेल्ल यू अबाउट समथिंग. क्या तुम सुनोगे? It's अबाउट हेर.
वीर (फ्रोंस) : ....
कारन : ....
वीर (शिघ्स) : फाइन... टॉक!
अब आगे...
19 इयर्स एगो...
एक बेहद hi ख़ूबसूरत और आलिशान से बंगले के बाहर बने एक पार्क में बेहद hi प्यारी सी बच्ची अपनी दो सहेलियों के संग खेल रही थी.
"करा! ये देख ये वाला फूल, कितना अच्छा है न? कितनी खुशबु आ रही है इस से?"
उसकी एक प्यारी सी सहेली ने मुस्कुराते हुए कहा.
"सच सोनू? मुझे भी दिखा न!"
करा जल्दबाज़ी में नज़दीक आयी और उसने अपनी सहेली के हाथो से वो फूल लिए और उसकी खुशबू सूंघते hi मानो जैसे उसका मैं प्रफुल्लित हो उठा.
"कितना प्यारा फूल है हाहाहा~" वो khil-khilaayi.
उसकी मुस्कान इतनी प्यारी थी की किसी भी कठोर से कठोर आदमी का दिल जीत ले. वो नादानी, वो चंचलता, वो बचपना और ख़ास कर वो चाँद जैसा प्यारा चेहरा जो किसी को भी उस पर प्यार लुटाने पर मजबूर कर दे.
कुछ ऐसी थी करा.
"मुझे भी देखना है." कहते हुए उसकी दूसरी सहेली आगे आयी और फूल की सुगंध का जायज़ा लेने लगी. पर तभी...
"करा!!! करा!!!!"
अचानक आयी अंदर से तेज़्ज़ आवाज़ सुनते hi करा एकदम सचेत हो गयी और पलटी तोह उसने देखा की अंदर से उसके पिता बाहर गार्डन में आ रहे थे.
पर वो अकेले नहीं थे. उसने देखा की उनके साथ साथ उसकी माँ भी आ रही थी. लेकिन और भी चौंका देने वाली बात ये थी की उसके माता पिता के साथ कोई 2 अन्य लोग भी थे जो उनके साथ आ रहे थे. इसके पहले करा ने उन् आदमियों को पहले कभी नहीं देखा था. कौन थे ये लोग भला?
वो नए अनजान आदमी धोती कुरता पहने हुए थे. उनमे से एक जवान था और एक बूढ़ा. जब चारो लोग आके करा के नज़दीक खड़े हुए तोह करा के पिता उससे देख उस बूढ़े आदमी से बोले.
"ये है हमारी लाड़ली गुरु जी! इसका नाम है करा!"
"सुन्दर! बड़ा hi प्यारा नाम है. करा का तोह मतलब hi अनोखा होता है. अनूठा! अद्वितीय!"
वो अनजान बूढ़ा आदमी इतना बोल फिर मुस्कुराते हुए आगे आया और करा के सर्र पर प्यार से हाथ फेर्रा और अपनी आँखें बंद कर लिया.
"अध्भुत! अविश्वसनीय! अलौकिक! एकदम उत्कृष्ट!"
"हँ!? K-Kya हुआ गुरु जी! करा सच में बहुत hi होनहार निकलेगी न?" उसके पिता ने गुरु जी से पूछा.
"होनहार निकलेगी? अरे! करोडो में से एक निकलेगी ये बच्ची! इतना हुनर मेने आज तक किसी बच्ची में नहीं देखा."
बदले में गुरु जी मुस्कुराते हुए बोले और फिर कुछ और बातें भी कही, "ये बच्ची, हीरा है हीरा किशोर! तुम्हारी ये बच्ची, इतना आगे जाएगी की पूछो मत. केवल तेज दिख रहा है मुझे इसकी आँखों में. कभी भी कोई भी इसके रास्ते में आकर इसका अड़ंगा नहीं बन सकता. अपना रास्ता ये लड़की खुद बनाएगी. और सबसे सर्वश्रेष्ठ hi बनेगी."
"K-Kya!? ः~ ये तोह... ये तोह बड़ी hi अच्छी बात है गुरु जी! आपने ऐसा कह के मानो जैसे मेरी साड़ी चिंताए दूर कर दी!"
करा के पिता किशोर खुश होते हुए गुरु जी के पाँव पड़ने लगे तोह गुरु जी ने उन्हें उनकी ब्याह पकड़ उठाया.
"अरे! ठीक है बच्चा! खुश रहो! खुश रहो!"
"सच में गुरु जी! आपकी बातो से मेरा भी मैं अब हल्का हो गया है. धन्यवाद! और इस नन्हे बच्चे का जब जन्म होगा तोह में चाहती हु की आप hi इसका नाम कारन करे." करा की माँ ने अपना उभरा हुआ पेट सहलाते हुए कहा.
तोह गुरु जी भी हाँ में सर्र हिलाये, "ठीक है बेटी! में ज़रूर एक अंतिम बार इस शहर आऊंगा केवल तुम्हारे नवजात शिशु के लिए. मेने तब hi बताया था किशोर को की शहर की ज़िन्दगी मुझे पसंद नहीं. मेरा घर तोह कुदरत में है. फिर भी एक अंतिम बार ज़रूर आ जाऊंगा."
"धन्यवाद गुरु जी! में जानता हु की आप को ये सब क्यों पसंद नहीं है. वो तोह ये मेरी किस्मत थी जो मेरे कहने पर आप यहाँ मेरे घर तक आये. वर्ण उस दिन तोह मेने देखा था की आप किसी के बुलाने पर कही नहीं जाते."
"सही कहा तुमने किशोर! मेने उस दिन hi तुम्हारी आँखों में देख लिया था. की तुम्हे मेरी सख्त ज़रुरत थी."
"जी! धन्यवाद गुरु जी! अरे में भी न... कहा आपको यहाँ बातो में लगा लिया. आइये न भोजन तैयार है!" किशोर ने हाथो से इशारा कर अंदर चलने के लिए कहा. "और बीटा सोनू और अवा बेटी, जाओ अब तुम दोनों घर ठीक!? करा अभी खाना खाएगी."
"Okay अंकल!" और दोनों hi बच्चिया करा को bye बोल अपने घरो की ऑर्डर चली गयी.
"क्या ये दोनों करा बेटी की सहेलिया थी!?" गुरु जी ने पूछा.
"जी हाँ! गुरु जी! वो काले बालो वाली सोनिआ है, प्यार से सोनू कहते है सब उससे. और वो जो विदेशी सी प्रतीत हो रही थी, पीले रंग के बालो वाली, वो अवा है. दोनों hi हमारे दो अच्छे पड़ोसियों की बेटी है. अवा की माँ विदेशी है, और पिता हिंदुस्तानी. इसलिए वो..."
"ओह्ह्ह!! समझा!! पर तुम्हारी ये लड़की बोहत आगे जाएगी किशोर! एकदम अलग स्टारर पे रहेगी ये बच्ची..."
गुरु जी हस्ते हुए बोले तोह उनके बगल से खड़े उस नौजवान व्यक्ति ने उनकी ब्याह खींच उनके कानो में खुसपुसाते हुए कहा, "गुरु जी! कुछ ज़्यादा नहीं हो गया? कही हमने कुछ ज़्यादा झूठ तोह नहीं कह दिया? ये आदमी छोटा मोटा आदमी नहीं है. मुझे तोह डर लग रहा है गुरु जी."
गुरु जी जैसे अपने शिष्य, रमन की बात सुन्न सचेत हो गए. पर फिर मुस्कुराते हुए रमन को देखे और धीरे से बोले, "तुम अभी भी कच्चे खिलाड़ी हो रमन. इसलिए में तुमलोगो का गुरु हु और तुमलोग मेरे चेले."
"पर गुरु जी, आपने इस बच्ची के बारे में बोहत कुछ कह दिया है. यदि ये बच्ची भविष्य में वैसी नहीं निकली जैसा की आपने इसका वर्णन किया है तोह फिर तोह, सब को पता चल जाएगा की हम ढोंगी है."
रमन ज़ाहिर सी बात थी की डर गया था. वो गुरु जी का नया शिष्य था. और गुरु जी को काम करते देख उससे बस इस बात की चिंता सताये जा रही थी की कही गलती से उनकी पोल न खुल जाए. वर्ण सब कुछ धरा का धरा रह जाएगा.
"तुम हमेशा hi मंद बुद्धि रहोगे रमन!" गुरु जी ने मुस्कुराते हुए कहा. वो देख रहे थे की किशोर और उसकी पत्नी अंदर की ऑर्डर जा रहे थे. खाने की तैयारी करने.
और नन्ही करा उन्हें अपनी प्यारी सी आँखों से बड़ी hi जिज्ञासा से घर रही थी.
"M-Mein कुछ समझा नहीं गुरु जी!?"
गुरु जी ने रमन को देखा और फिर दरवाज़े की तरफ जहा एक 40-45 की उम्र का व्यक्ति एक बटलर के कपडे पहने हुए खड़ा था. और उन् दोनों को hi घर के देख रहा था.
वो मुस्कुराते हुए करा के नज़दीक आये और प्यार से उसके सर्र पैट हाथ फेरर रमन से धीरे से बोले,
"अरे! मेरे मंद बुद्धि वाले शिष्य. यदि गधे को भी बार बार, लगातार कोई चीज़ सिखाई जाए तोह गधा भी होशियार बन्न जाता है. फिर ये तोह इंसान की बच्ची है."
"M-Mein कुछ समझा नहीं अभी भी गुरु जी!"
रमन आगे कुछ और कह पाटा की तभी अंदर से किशोर निकल कर बाहर आया और गुरु जी से बोलै,
"अरे!? आप यही है अब तक गुरु जी? खाना लग hi चूका है. अंदर आइये न."
"दरअसल! में कुछ सोच रहा था!" गुरु जी ने जवाब दिया.
"K-Kya सोच रहे थे आप?"
"करा बिटिया के बारे में."
"करा के बारे में? क्या हुआ?"
"तुम्हारी पत्नी साथ में थी इसलिए मेने साड़ी बात नहीं बतायी थी."
"S-Saari बात? गुरु जी साफ़ साफ़ कहिये न."
"हम्म! देखो किशोर! तुम्हारी ये बच्ची निकलेगी तोह बोहत होनहार पर..."
"P-Par? पर क्या गुरु जी?"
"पर ये की... इसके जीवन में कई साड़ी अड़चने आएंगी. और ऐसा भी हो सकता है की उन् अड़चनों के चलते ये अपनी दिशा से भटक जाए और अपनी ज़िन्दगी में कुछ भी हासिल न कर पाए." गुरु जी ने एकदम सीरियस होते हुए कहा तोह बेचारे किशोर के चेहरे का रंग hi उड़द गया.
"M-Mein कुछ समझा नहीं गुरु जी! कृपया कर खुल के समझाइये!"
"सरल भाषा में hi कह रहा हु किशोर. हर्र व्यक्ति के जीवन में परेशानिया आती hi है. में बस इतना कहना चाह रहा हु की... करा बिटिया के जीवन में कुछ ज़्यादा hi अड़चने आएंगी. और यदि करा बिटिया ज़रा भी उन् अड़चनों में फास्सी. तोह वो कुछ भी हासिल न कर पाएगी. उन् परेशानियों का मुअकाबला इससे खुद hi करना होगा."
"ये सब!?? T-Toh में क्या करू गुरु जी? K-Koi हल तोह होगा hi आपके पास!?"
"है न बच्चा! पर... थोड़ा मुश्किल रहेगा."
"आप बताइये बस गुरु जी!"
"तुम्हे इस पर ध्यान देना होगा. बोहत ज़्यादा ध्यान. इसकी अड़चने ज़ाहिर है की तभी आएंगी जब ये कही जाएगी. सरल भाषा में, तुम्हे करा बिटिया से उसकी थोड़ी आज़ादी chheen'ni पड़ेगी. उससे सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रदान करनी होगी. पर ये सब बाहर न हो. तुम समझ रहे हो न किशोर?"
किशोर तोह जैसे गुरु जी की बात सुन्न स्तब्ध सा मूर्ति बन्न के रह गया था. कुछ देरर मौन रहने के बाद वो बोलै,
"गुरु जी! आइये! अंदर चल के विस्तार से बात करते है. मेरी पत्नी को भी jaan'na ज़रूरी है."
"ठीक है बच्चा! चलो!"
और गुरु जी किशोर के साथ अंदर जाने लगे. बाहर बगीचे में खड़ा रमन गुरु जी को देखता रहा बस और मैं hi मैं सोचने लगा.
'तोह ये मतलब था गुरु जी का. की गधे को भी बार बार सिखाओ तोह वो होशियार बन्न जाता है. मतलब गुरु जी इस नन्ही सी बच्ची को बचपन से hi बाहरी दुनिया से दूर रख के केवल इससे पढ़ाई में लगवा देंगे. और ऐसे में ज़ाहिर है की ये लड़की आगे चल के होशियार hi निकलेगी. वाह! मान गए गुरु जी को! पर अभी किशोर राज़ी नहीं हुआ है. देखते है गुरु जी कैसे करते है ये सब?!'
कुछ देरर तक अंदर सभी लोग भोजन करते रहे. काफी समय गुज़र चूका था. और करा के बारे में सब कुछ गुरु जी ने बता दिया था किशोर और उसकी पत्नी को. अब निर्णय करना किशोर के हाथ में था. क्या वो गुरु जी की बात को मानेगा? या नहीं?
वो अपना फैसला सुनाने hi वाला था जब बाहर बगीचे से करा की एक ज़ोरदार चींख उन् सबको सुनाई दी.
"Aaaaaaaaaaaaaaaa...."
घबराते हुए वो सब उठे और बाहर की ऑर्डर भागे.
जैसे hi किशोर और बाकी सब वह पहुचे तोह जो नज़ारा उन्होंने देखा उससे देख सबकी रूह काँप गयी. उनके रौंगटे खड़े हो गए.
"आआह्ह्ह!"
करा की माँ जो गर्भवती होने के कारण थोड़ा धीरे धीरे चलते हुए वह आयी, उन्होंने सामने का मंज़र देखते hi अपना चेहरा अपने हाथो से धक् लिया.
नीचे ज़मीन पर उनके यहाँ जो माली काम करता था वो खून से लटपट पड़ा हुआ था.
उसके सीने पर चुर्री के गोपने के घाव थे जिनमे से खून निकल कर पूरा उसकी शर्ट को लहू लुहान कर चूका था. उसकी खुली डरावनी आँखें जो अनदेखी और अनकही कुछ घटना के बारे में व्यक्त करना चाह रही थी.
"अर्चना! करा को लेकर अंदर जाओ फौरन...!"
अपने पति की बात सुन्न अर्चना ने करा को पकड़ा और उस नन्ही सी दर्री हुई बच्ची को वो फौरन hi अंदर ले गयी.
"अनर्थ! घोर अनर्थ! बाप रे! हे भगवान्!!! ये आज मेने क्या देख लिया?" गुरु जी दररते हुए बोले.
"माधव!! ू माधव! जल्दी आओ इधर!"
किशोर ने आवाज़ लगाई तोह वही 40-45 वाली उम्र का आदमी जो बटलर की यूनिफार्म में पीछे hi खड़ा था वो सामने आया. और उससे जैसे पता था की क्या करना है.
उसने झुक के उस माली को चेक किया और फिर किशोर से कहा. "साहब! ये तोह मर्डर चूका है."
और ये सुनते hi गुरु जी और रमन की सिटी पित्ती गुल हो गयी.
पर जैसे उन्हें अभी और एक झटका लग्न बाकी था.
जैसे hi सबकी नज़र सामने की दिवार पर गयी तोह सब के सब एक बार फिर मौन रह गए.
सामने सफ़ेद दिवार पर बड़े बड़े अक्षरों में पेंट से लिखा हुआ था.
"किल्ड बी स्लोगन"
ये भूरे पेंट से लिखा हुआ था. वो माली पौधों के गमलो में पेंट कर रहा था. और शायद हत्यारे ने उसी पेंट से ये सब लिखा था.
ये देखने के बाद तोह जैसे किशोर एकदम डर गया.
"देखा तुमने किशोर!?" गुरु जी बोले.
"H-Huh!??"
"मेने तुमसे कहा था न? करा बिटिया के जीवन में अड़चने आएंगी! धेरर साड़ी! और देखो... हे भगवान्! इतना बड़ा घोर अनर्थ! इतना बड़ा अपराध! बेचारी करा बिटिया इतनी सी उम्र में क्या क्या देख बैठी. मेने कहा था न किशोर! तुम्हे बोहत ध्यान देना पड़ेगा. मुझे अब मेरी आँखों की शुद्धि करनी होगी. न जाने क्या देख लिया ये मेने आज. भगवान् रेहम कर!!!"
और किशोर ने फिर एक पल भी नहीं गवाया और बोलै,
"आपने एकदम सही कहा गुरु जी! आज से hi... करा कही नहीं जाएगी. उसकी पढ़ाई के लिए... में सर्वश्रेष्ठ प्रोफेस्सोर्स को घर hi बुलवाऊंगा और उससे घर पर hi पढवाउन्ह. वो अपने एक्साम्स घर से hi देगी. में अपनी बच्ची को खोना नहीं चाहता. आज से उसका खेलना कूदना बंद. केवल उसको ग्रोथ पर hi मेरा पूरा ध्यान होगा. पूरा ध्यान... मेरी करा..."
रमन जो खड़े खड़े सब देख रहा था. वो मैं hi मैं अपने गुरु जी की तारीफों के पल बाँध रहा था.
'मान गए गुरु जी आपको. किसी भी परिस्थिति को अपने फायदे के लिए कैसे उपयोग करना है कोई आपसे सीखे. यहाँ किसी की हत्या हो गयी और आपने अपना काम निकलवा लिया. वाह! मान गए आपको!'
पर वही दूसरी ऑर्डर किशोर सामने स्लोगन लिखे नाम को पढ़ के और भी घबराया हुआ था.
'K-Kaun है ये? मेरी तोह किसी से भी दुश्मनी नहीं है. कौन है ये स्लोगन? कौन हो सकता है ये?'
"माधव! P-police को जल्द से जल्द बुलाओ."
"जी साहब!"
कहते हुए माधव अंदर चला गया टेलीफोन से फ़ोन करने.
"अब में चलता हु किशोर! मुझे जल्द से जल्द मंदिर जाना होगा. वर्ण में अपना ये विचलित मैं शांत नहीं कर पाउँगा."
कहते हुए गुरु जी जाने लगे तोह किशोर ने उन्हें बुलाया. पर वो तोह जैसे किसी की सुने hi नहीं और अपनी hi धुन में आगे बढ़ वह से निकल गए.
अब वह केवल किशोर और रमन hi बचे हुए थे.
"गुरु जी ऐसे hi है. बोहत पवित्र है. उन्हें तोह अब मंदिर का वातावरण और भगवन के भजन hi शांत कर सकते है. न जाने क्या देख लिया आज उन्होंने." रमन बोलै.
"M-Mujhe माफ़ करना. ऐसे मेरे घर पर... गुरु जी को..."
"अरे!? नहीं नहीं! इसमें आपकी कोई गलती नहीं है. ये तोह ज़िन्दगी है. कब कहा पे न जाने किस के साथ क्या हो जाए. अच्छा! अब में चलता हु."
"अरे? पर गुरु जी की दसखीना?"
"दक्षिणा? गुरु जी तोह अपने नाम पर आज तक एक रूपया नहीं लिए. वो तोह वैसे hi कुदरत में रहना पसंद करते है. हाँ! पर कभी कभी कुछ दिलेर लोग उनके शिष्यों को राशि थमा देते है. और बदले में गुरु जी उस राशि को समाज के कामो में लगा देते है. यही है बस हमारा तोह..."
"हाँ! तोह, रुकिए न आप..." कहते हुए किशोर फौरन hi अंदर गया और उसने पैसो की कुछ गद्दी अलमारी से निकाली और ला कर रमन के हाथो में थमा दी.
"ाररीी!? Y-Ye... ये क्या कर रहे है आप? इतने सारे पैसे?"
"देखिये! ये मेरी तरफ से है. गुरु जी को धन्यवाद कहियेगा. और आप इन् राशि का मुझे पता है नेक काम के लिए hi इस्तेमाल करेंगे."
"P-Par...!?!"
"देखिये! ना मत कहियेगा! और माफ़ी चाहता हु में थोड़ा जल्दी में हु. इतना बड़ा हादसा हो गया घर में. घर का मुखिया होने के नाते मुझे hi सब देखना होगा."
और कहते हुए किशोर वह से निकल गया. पुलिस आ चुकी थी और साड़ी जांच पड़ताल करि.
पर उसके पहले hi रमन वह से अपनी थैली में वो पैसे लिए निकल चूका था.
'हाहाहाहा~ मान गए गुरु जी को. ये तोह लाख से भी ज़्यादा है. बाप रे!!! ये इतना रईस आदमी कहा से मिल गया गुरु जी को?'
वो सोचते सोचते बस स्टैंड पोहचा और एक बस में सवार हो गया. और अंदर hi एक सीट पर उसके गुरु जी बैठे हुए थे. जैसे मानो वो उसका hi इंतज़ार कर रहे थे.
वो पैसे, ज़ाहिर है की किसी नेक काम में इस्तेमाल नहीं होने वाले थे. बल्कि उन् पैसो का इस्तेमाल तोह दारू, और अन्य ऐशो आराम के लिए इस्तेमाल होने वाला था. गुरु जी और उनके शिष्य मिल कर कितना बड़ा ढोंग रच रहे थे दुनिया के लोगो के साथ ये बात कोई नहीं जानता था.
शायद, अभी तक किसी ने भी गुरु जी को नहीं पकड़ा था. और ऐसे hi उनकी ज़िन्दगी ऐशो आराम से भर चुकी थी.
पर...
जहा गुरु जी और अन्य लोग मस्ती में लगे थे वही दूसरी ऑर्डर बेचारी नन्ही करा की ज़िन्दगी जैसे उजाड़ के रख दी थी गुरु जी ने.
किशोर ने उसका स्कूल जाना सख्त बंद कर दिया था.
पहले तोह करा को बात समझ नहीं आयी. क्युकी वो काफी छोटी थी. पर जैसे जैसे वो बड़ी हुई, और उससे पता चला की उसकी सहेलिया सभी बाहर निकल के घूमने फिरने स्कूल जाती थी तोह जैसे उससे समझ में आया.
वो ज़िद्द करती, और किशोर उसकी बातें इग्नोर कर देता. वो रोटी, बिलखती, की उससे भी बाहर जाना है. पर कोई फायदा नहीं.
वो एक बंद पिंजरे में किसी चिड़िया की तरह बन्न के रह गयी थी. बेशक! उससे ुच्छ शिक्षा प्रदान की जा रही थी. हर्र एक विषय का होनहार प्रोफेसर आके उससे पढ़ाता था.
पर...
क्या फायदा था ऐसी शीसखा का? जहा उससे कोई आज़ादी तक नहीं थी. वो बस उस आलिशान से बंगले में क़ैद रहके खिड़की के बाहर अन्य बच्चो को रास्ते से हस्ते खेलते हुए गुज़रते देखा करती थी.
उसकी सहेलिया ज़रूर कभी कभी आती थी. सोनू और अवा.
पर जैसे धीरे धीरे उनसे भी उसका टच ख़तम हो रहा था.
दोस्त क्या होते है, शायद ये भी वो अब भूलने लगी थी.
एक समय ऐसा भी आया जब उसकी माँ का देहांत हो गया. और तब से वो जैसे और शांत सी हो गयी.
बाप, जो उसकी बात सुनता hi नहीं था. केवल उसकी पढ़ाई की बात करता था. माँ, जो वक़्त से पहले चल बसी.
और एक छोटा भाई, जो अभी काफी छोटा था इन् सब बातो को समझने के लिए.
जब करा 8तह एसटीडी में थी तब उसकी पडोसी सहेली अवा, वह से चली गयी विदेश. हमेशा के लिए.
और जाने से पहले भी, वो दोनों hi एक दूसरे से केवल एक बार hi मिल पाए.
अवा : I'm गोइंग करा!
करा : हम्म~
अवा : T-Tum... तुम कब तक ऐसे रहोगी? घर में?
करा : जब तक डैड अल्लोव नहीं करते.
अवा : तुम्हे अपने डैड से बात करनी चाहिए. रियली!
करा : ी विल!
अवा आगे बढ़ी और उसने करा के हाथ में एक ब्रेसलेट पहनाया और उसके गले से लग गयी.
अवा (क्रिस) : ी विल नेवर फॉरगेट यू. गुडबाय!
पर करा की आँखों से ासु न निकले. उससे समझ में hi नहीं आ रहा था की उससे रोना चाहिए या नहीं. उससे पता hi नहीं था कुछ. क्युकी वो बचपन से hi इन् सब फीलिंग्स से जैसे वंचित रह गयी थी.
एक छोटे बच्चे को आप बचपन में जो सिखाओगे, बड़े होने के बाद वो उसी को फॉलो करता है. और उसके लक्षण भी देखने को मिलते है.
करा के साथ भी कुछ ऐसा hi था. उससे फीलिंग्स के बारे में कुछ सिखाया hi नहीं गया था. उसका दिन शुरू होता था सुबह 5 बजे. नौकर आके उसके कपडे बदलते थे. नाश्ता होता था डाइनिंग टेबल पर. सुबह सुबह उसकी गुड मैनर्स की एक क्लास लगती. उसके बाद सुबह से रात तक अलग अलग विषय के टीचर्स आके उससे पर्सनली पढ़ाते थे.
बीच बीच में उठ वो अपना लंच करती और रात में डिनर और बस फिर उसका दिन ख़तम हो जाता. और अगले दिन से फिर वही रूटीन शुरू.
उसके दोस्त नहीं थे. जो थे वो भी अब नहीं आते थे. अवा जा चुकी थी. सोनू hi हमेशा बीच बीच में ज़िद्द कर के आ जाती थी और उस से बात करती.
कभी कभी तोह सोनू उसके डैड से भी लड़ गयी थी.
वो करा से सवाल करती की क्यों वो अपने आप को यु क़ैद करके रखे हुए है.
तोह करा बस एक hi जवाब देती, "डैड मुझे कामयाब होते देखना चाहते है."
और बस, वही डिस्कशन ख़तम हो जाय करता था.
वो एक रोबोट की तरह बन चुकी थी. जिससे बस काम करवाने के लिए बनाया जा रहा था.
जब उसका जन्मदिन आता तोह बस एक केक काटा जाता था और बस हो गया उसका जन्मदिन.
अपने भाई कारन से कभी कभी करा को जलन होती थी. क्युकी उसका भाई स्कूल भी जाता था और दोस्तों के साथ खेलने भी. उससे कोई मनाही नहीं थी.
पर जैसे उसका ये इमोशन भी गायब हो गया. एक प्रकार से उससे बस अब बिज़नेस करना आता था. क्युकी वो बिज़नेस संभालने के लिए hi पढ़ रही थी अब तक.
बाकी साड़ी चीज़े जैसे वो भूलती जा रही थी.
जब उसने स्कूल से ग्रेजुएट किया तोह किशोर ने उससे पहली बार विदेश भेजा यूनिवर्सिटी ज्वाइन करने के लिए. पर वह भी, वो एक बंगले में रहती थी. यूनिवर्सिटी नहीं जाती थी. और वही से उसने यूनिवर्सिटी में टॉप भी किया था.
सोनिआ उर्फ़ सोनू, उसकी बचपन की दोस्त उस से जलती थी. क्युकी हमेशा hi करा उस से आगे रहती थी. आखिर इतना नॉलेज कोई व्यक्ति लेगा तोह ज़ाहिर है की वो अन्य लोगो से आगे hi रहेगा.
पर सोनिआ को जब ये बात समझ आयी की उसकी दोस्त उस पर ज़रा भी ध्यान नहीं देती. तोह सोनिआ ने जैसे ये मक़सद बना लिया था अपना.
वो भी शामे यूनिवर्सिटी जाएगी. वो भी शामे प्रतिस्पर्धा में भाग लेगी और करा को हराएगी. ताकि उसकी दोस्त उस पर ध्यान दे.
कभी कभी करा कुछ कॉन्टेस्ट्स में आती थी. पर कॉन्टेस्ट्स ख़तम होते hi वो गायब.
और ऐसे hi उसकी ज़िन्दगी एक नर्क के सामान हो चुकी थी.
एक खिला हुआ गुलाब ऐसे मुरझा के रह गया था.
***
कारन : और ये है... दीदी की सच्चाई.
जब कारन ने साड़ी बातें बता कर अपनी बात ख़तम करि तोह वीर की मुट्ठी गुस्से में कस गयी.
"दमन ितत्तत्त!!!!"
*थुड़*
उसने जोरर से अपना मुट्ठी बेंच पर मारी तोह लोहे की वो बेंच पे एक डेंट पद गया.
कारन उसके गुस्से को देख ताजुब था.
वीर : सो that's थे रीज़न... That's थे रीज़न व्हाई शी... दमन आईटी!!!!
वीर को याद आया की करा की मुलाक़ात उस से पहली बार कब हुई थी. क्लब में...
और उससे जैसे समझ आ चूका था की क्यों करा वाया आयी थी. शी जस्ट वांटेड तो क्नोव थिंग्स आउट...
वो तोह बेचारी बस ये देखने आयी थी की क्लब की लाइफ किसी होती है. क्या होता है वह? अपनी क्यूरोसिटी को ख़तम करने आयी थी वह वो. और उस दिन hi आतिश ने वह हमला कर दिया था. और फिर वीर और उसका यु आपस में इंटरकोर्स करना...
बेचारी! हर्र जगह तोह झेला hi था उसने. ये सब सोचते hi मानो वीर के मैं में करा के प्रति रिस्पांसिबिलिटी और बढ़ चुकी थी.
वीर : तुम्हे कैसे पता चली ये सब बातें!? तुम तोह तब पैदा भी नहीं हुए थे!?
कारन : यदि वफादारी का कोई दूसरा नाम है तोह वह है माधव अंकल! उन्होंने hi मुझे सब कुछ बताया था जब में फॉरेन जाने वाला था. और इसलिए तब से hi में रघु के कांटेक्ट में हु. कुछ भी होता है वो मुझे बताता है.
वीर : हम्म~ तोह माधव अंकल उस गुरु जी के बारे में जानते थे.
कारन : माधव अंकल की नज़र तेज़्ज़ है लोगो को परखने में. उन्हें समझ आ चूका था की वो आदमी ढोंगी था. उन्होंने डैड को बताया भी पर डैड ने विश्वाश नहीं किया. वो इन् सब में कुछ ज़्यादा hi विश्वाश करते है.
वीर : इतने बड़े आदमी होने के बावजूद इन् सब पे...!?
कारन : हर्र बड़ा आदमी किसी न किसी अंधविस्वाश पे यकीन करता hi है वीर. कुछ लोगो नुमेरोलोग्य पर यकीन करते है. की उनका लकी नंबर ये है. वगैरह वगैरह...
वीर : ी सी! वेल!? तोह ये सब क्यों बताया तुमण्ड मुझे!?
कारन : बिकॉज़ ी थिंक यू कैन चेंज हेर.
वीर : हँ!?
कारन : तुम्हे पता है मेने किसी किसी सीटुएशन्स में दी को देखा है? उनका बड़े था लास्ट ईयर. और डैड ने उन्हें विश तक नहीं किआ था. वो काम में इतना बिजी थे. ऊपर से वो दी को मीटिंग्स पर टाइम पर पहुचने के लिए कह रहे थे. और दी ने कोई कंप्लेंट नहीं की. फिर रात में मेने डैड से थोड़ा ुचि आवाज़ में बात की तब जाके उन्हें याद आया और उन्होंने दी को विश किया था. तुम समझ रहे हो न?
वीर : ....
[That's quite sad...]
कारन (शिघ्स) : जब मुझे पता चला की दी ने तुम्हे एप्रोच किया और तुमसे बात करते हुए उनके चेहरे पर स्माइल आ जाती है. तहत मीन्स यू अरे समवन स्पेशल. दीदी फ़ालतू लोगो से कभी इम्प्रेस्सेड नहीं रहती. कोई स्पेशल hi होता है जो उन्हें इम्प्रेस कर सके.
वीर : O-Ohhh!
कारन : सो? कैन यू हेल्प हेर?
वीर (स्माइल्स) : यदि तुमने नहीं भी कहा होता तोह भी में कर रहा होता.
कारन (स्माइल्स) : हम्म~ पर ध्यान रहे, िफ़ ी फंड यू टेकिंग एडवांटेज ऑफ़ हेर. तोह मुझसे बुरा कोई न होगा.
वीर : *स्माइल्स*
और तभी कारन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया.
कारन : सो? फ्रेंड्स?
और पल भर के लिए वीर को जैसे कुछ याद आया.
गोलू!!!!
ऐसे hi तोह उसने दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया था. और क्या हुआ था उसके साथ?
ये याद आते hi वीर की नज़रे नीचे झुक गयी और वो पलट गया.
वीर : ी don't मेक फ्रेंड्स...
कहते हुए वो वह से निकल गया. और बेचारा कारन उससे बस प्रश्न भरी निगाहो से जाते हुए देखता रहा.
***
अगली सुबह हुई. आज वीर को अपने फ़ूड ट्रक का बंदोबस्त करना था. और यही सोच आज वो जल्दी उठ गया.
पर तभी...
*नॉक नॉक*
उसके दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी.
उठते हुए उसने जैसे hi दूर खोला तोह सामने सुमन कड़ी हुई थी.
पर...
पर उसके बगल से कोई और भी खड़ा हुआ था.
वीर : ???
सुमन मुस्कुरा रही थी और अपने बगल में खड़े व्यक्ति को उसने धक्का देके अंदर कमरे में धकेला और खुद अंदर आके दरवाज़ा बंद कर ली.
सुमन : मेने कहा था न? कल आपको एक उपहार मिलेगा!?! ये है आपका उपहार!
वीर : ेहठ!?
.
.
.
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.
.
आज के लिए इतना hi गाइस!
Don't फॉरगेट तो लिखे एंड शेयर योर थॉट्स!
धन्यवाद!
अब तक...
कारन : रघु मुझसे हर्र डिटेल शेयर करता था. इन्क्लूडिंग डिटेल्स अबाउट यू. मुझे पता चला है की कई बार रघु ने दीदी को तुम्हारे साथ देखा है, वो भी मुस्कुराते हुए. दीदी मुस्कुरा रही थी. वो खुश थी. सो... ी वांट तो तेल्ल यू अबाउट समथिंग. क्या तुम सुनोगे? It's अबाउट हेर.
वीर (फ्रोंस) : ....
कारन : ....
वीर (शिघ्स) : फाइन... टॉक!
अब आगे...
19 इयर्स एगो...
एक बेहद hi ख़ूबसूरत और आलिशान से बंगले के बाहर बने एक पार्क में बेहद hi प्यारी सी बच्ची अपनी दो सहेलियों के संग खेल रही थी.
"करा! ये देख ये वाला फूल, कितना अच्छा है न? कितनी खुशबु आ रही है इस से?"
उसकी एक प्यारी सी सहेली ने मुस्कुराते हुए कहा.
"सच सोनू? मुझे भी दिखा न!"
करा जल्दबाज़ी में नज़दीक आयी और उसने अपनी सहेली के हाथो से वो फूल लिए और उसकी खुशबू सूंघते hi मानो जैसे उसका मैं प्रफुल्लित हो उठा.
"कितना प्यारा फूल है हाहाहा~" वो khil-khilaayi.
उसकी मुस्कान इतनी प्यारी थी की किसी भी कठोर से कठोर आदमी का दिल जीत ले. वो नादानी, वो चंचलता, वो बचपना और ख़ास कर वो चाँद जैसा प्यारा चेहरा जो किसी को भी उस पर प्यार लुटाने पर मजबूर कर दे.
कुछ ऐसी थी करा.
"मुझे भी देखना है." कहते हुए उसकी दूसरी सहेली आगे आयी और फूल की सुगंध का जायज़ा लेने लगी. पर तभी...
"करा!!! करा!!!!"
अचानक आयी अंदर से तेज़्ज़ आवाज़ सुनते hi करा एकदम सचेत हो गयी और पलटी तोह उसने देखा की अंदर से उसके पिता बाहर गार्डन में आ रहे थे.
पर वो अकेले नहीं थे. उसने देखा की उनके साथ साथ उसकी माँ भी आ रही थी. लेकिन और भी चौंका देने वाली बात ये थी की उसके माता पिता के साथ कोई 2 अन्य लोग भी थे जो उनके साथ आ रहे थे. इसके पहले करा ने उन् आदमियों को पहले कभी नहीं देखा था. कौन थे ये लोग भला?
वो नए अनजान आदमी धोती कुरता पहने हुए थे. उनमे से एक जवान था और एक बूढ़ा. जब चारो लोग आके करा के नज़दीक खड़े हुए तोह करा के पिता उससे देख उस बूढ़े आदमी से बोले.
"ये है हमारी लाड़ली गुरु जी! इसका नाम है करा!"
"सुन्दर! बड़ा hi प्यारा नाम है. करा का तोह मतलब hi अनोखा होता है. अनूठा! अद्वितीय!"
वो अनजान बूढ़ा आदमी इतना बोल फिर मुस्कुराते हुए आगे आया और करा के सर्र पर प्यार से हाथ फेर्रा और अपनी आँखें बंद कर लिया.
"अध्भुत! अविश्वसनीय! अलौकिक! एकदम उत्कृष्ट!"
"हँ!? K-Kya हुआ गुरु जी! करा सच में बहुत hi होनहार निकलेगी न?" उसके पिता ने गुरु जी से पूछा.
"होनहार निकलेगी? अरे! करोडो में से एक निकलेगी ये बच्ची! इतना हुनर मेने आज तक किसी बच्ची में नहीं देखा."
बदले में गुरु जी मुस्कुराते हुए बोले और फिर कुछ और बातें भी कही, "ये बच्ची, हीरा है हीरा किशोर! तुम्हारी ये बच्ची, इतना आगे जाएगी की पूछो मत. केवल तेज दिख रहा है मुझे इसकी आँखों में. कभी भी कोई भी इसके रास्ते में आकर इसका अड़ंगा नहीं बन सकता. अपना रास्ता ये लड़की खुद बनाएगी. और सबसे सर्वश्रेष्ठ hi बनेगी."
"K-Kya!? ः~ ये तोह... ये तोह बड़ी hi अच्छी बात है गुरु जी! आपने ऐसा कह के मानो जैसे मेरी साड़ी चिंताए दूर कर दी!"
करा के पिता किशोर खुश होते हुए गुरु जी के पाँव पड़ने लगे तोह गुरु जी ने उन्हें उनकी ब्याह पकड़ उठाया.
"अरे! ठीक है बच्चा! खुश रहो! खुश रहो!"
"सच में गुरु जी! आपकी बातो से मेरा भी मैं अब हल्का हो गया है. धन्यवाद! और इस नन्हे बच्चे का जब जन्म होगा तोह में चाहती हु की आप hi इसका नाम कारन करे." करा की माँ ने अपना उभरा हुआ पेट सहलाते हुए कहा.
तोह गुरु जी भी हाँ में सर्र हिलाये, "ठीक है बेटी! में ज़रूर एक अंतिम बार इस शहर आऊंगा केवल तुम्हारे नवजात शिशु के लिए. मेने तब hi बताया था किशोर को की शहर की ज़िन्दगी मुझे पसंद नहीं. मेरा घर तोह कुदरत में है. फिर भी एक अंतिम बार ज़रूर आ जाऊंगा."
"धन्यवाद गुरु जी! में जानता हु की आप को ये सब क्यों पसंद नहीं है. वो तोह ये मेरी किस्मत थी जो मेरे कहने पर आप यहाँ मेरे घर तक आये. वर्ण उस दिन तोह मेने देखा था की आप किसी के बुलाने पर कही नहीं जाते."
"सही कहा तुमने किशोर! मेने उस दिन hi तुम्हारी आँखों में देख लिया था. की तुम्हे मेरी सख्त ज़रुरत थी."
"जी! धन्यवाद गुरु जी! अरे में भी न... कहा आपको यहाँ बातो में लगा लिया. आइये न भोजन तैयार है!" किशोर ने हाथो से इशारा कर अंदर चलने के लिए कहा. "और बीटा सोनू और अवा बेटी, जाओ अब तुम दोनों घर ठीक!? करा अभी खाना खाएगी."
"Okay अंकल!" और दोनों hi बच्चिया करा को bye बोल अपने घरो की ऑर्डर चली गयी.
"क्या ये दोनों करा बेटी की सहेलिया थी!?" गुरु जी ने पूछा.
"जी हाँ! गुरु जी! वो काले बालो वाली सोनिआ है, प्यार से सोनू कहते है सब उससे. और वो जो विदेशी सी प्रतीत हो रही थी, पीले रंग के बालो वाली, वो अवा है. दोनों hi हमारे दो अच्छे पड़ोसियों की बेटी है. अवा की माँ विदेशी है, और पिता हिंदुस्तानी. इसलिए वो..."
"ओह्ह्ह!! समझा!! पर तुम्हारी ये लड़की बोहत आगे जाएगी किशोर! एकदम अलग स्टारर पे रहेगी ये बच्ची..."
गुरु जी हस्ते हुए बोले तोह उनके बगल से खड़े उस नौजवान व्यक्ति ने उनकी ब्याह खींच उनके कानो में खुसपुसाते हुए कहा, "गुरु जी! कुछ ज़्यादा नहीं हो गया? कही हमने कुछ ज़्यादा झूठ तोह नहीं कह दिया? ये आदमी छोटा मोटा आदमी नहीं है. मुझे तोह डर लग रहा है गुरु जी."
गुरु जी जैसे अपने शिष्य, रमन की बात सुन्न सचेत हो गए. पर फिर मुस्कुराते हुए रमन को देखे और धीरे से बोले, "तुम अभी भी कच्चे खिलाड़ी हो रमन. इसलिए में तुमलोगो का गुरु हु और तुमलोग मेरे चेले."
"पर गुरु जी, आपने इस बच्ची के बारे में बोहत कुछ कह दिया है. यदि ये बच्ची भविष्य में वैसी नहीं निकली जैसा की आपने इसका वर्णन किया है तोह फिर तोह, सब को पता चल जाएगा की हम ढोंगी है."
रमन ज़ाहिर सी बात थी की डर गया था. वो गुरु जी का नया शिष्य था. और गुरु जी को काम करते देख उससे बस इस बात की चिंता सताये जा रही थी की कही गलती से उनकी पोल न खुल जाए. वर्ण सब कुछ धरा का धरा रह जाएगा.
"तुम हमेशा hi मंद बुद्धि रहोगे रमन!" गुरु जी ने मुस्कुराते हुए कहा. वो देख रहे थे की किशोर और उसकी पत्नी अंदर की ऑर्डर जा रहे थे. खाने की तैयारी करने.
और नन्ही करा उन्हें अपनी प्यारी सी आँखों से बड़ी hi जिज्ञासा से घर रही थी.
"M-Mein कुछ समझा नहीं गुरु जी!?"
गुरु जी ने रमन को देखा और फिर दरवाज़े की तरफ जहा एक 40-45 की उम्र का व्यक्ति एक बटलर के कपडे पहने हुए खड़ा था. और उन् दोनों को hi घर के देख रहा था.
वो मुस्कुराते हुए करा के नज़दीक आये और प्यार से उसके सर्र पैट हाथ फेरर रमन से धीरे से बोले,
"अरे! मेरे मंद बुद्धि वाले शिष्य. यदि गधे को भी बार बार, लगातार कोई चीज़ सिखाई जाए तोह गधा भी होशियार बन्न जाता है. फिर ये तोह इंसान की बच्ची है."
"M-Mein कुछ समझा नहीं अभी भी गुरु जी!"
रमन आगे कुछ और कह पाटा की तभी अंदर से किशोर निकल कर बाहर आया और गुरु जी से बोलै,
"अरे!? आप यही है अब तक गुरु जी? खाना लग hi चूका है. अंदर आइये न."
"दरअसल! में कुछ सोच रहा था!" गुरु जी ने जवाब दिया.
"K-Kya सोच रहे थे आप?"
"करा बिटिया के बारे में."
"करा के बारे में? क्या हुआ?"
"तुम्हारी पत्नी साथ में थी इसलिए मेने साड़ी बात नहीं बतायी थी."
"S-Saari बात? गुरु जी साफ़ साफ़ कहिये न."
"हम्म! देखो किशोर! तुम्हारी ये बच्ची निकलेगी तोह बोहत होनहार पर..."
"P-Par? पर क्या गुरु जी?"
"पर ये की... इसके जीवन में कई साड़ी अड़चने आएंगी. और ऐसा भी हो सकता है की उन् अड़चनों के चलते ये अपनी दिशा से भटक जाए और अपनी ज़िन्दगी में कुछ भी हासिल न कर पाए." गुरु जी ने एकदम सीरियस होते हुए कहा तोह बेचारे किशोर के चेहरे का रंग hi उड़द गया.
"M-Mein कुछ समझा नहीं गुरु जी! कृपया कर खुल के समझाइये!"
"सरल भाषा में hi कह रहा हु किशोर. हर्र व्यक्ति के जीवन में परेशानिया आती hi है. में बस इतना कहना चाह रहा हु की... करा बिटिया के जीवन में कुछ ज़्यादा hi अड़चने आएंगी. और यदि करा बिटिया ज़रा भी उन् अड़चनों में फास्सी. तोह वो कुछ भी हासिल न कर पाएगी. उन् परेशानियों का मुअकाबला इससे खुद hi करना होगा."
"ये सब!?? T-Toh में क्या करू गुरु जी? K-Koi हल तोह होगा hi आपके पास!?"
"है न बच्चा! पर... थोड़ा मुश्किल रहेगा."
"आप बताइये बस गुरु जी!"
"तुम्हे इस पर ध्यान देना होगा. बोहत ज़्यादा ध्यान. इसकी अड़चने ज़ाहिर है की तभी आएंगी जब ये कही जाएगी. सरल भाषा में, तुम्हे करा बिटिया से उसकी थोड़ी आज़ादी chheen'ni पड़ेगी. उससे सर्वश्रेष्ठ शिक्षा प्रदान करनी होगी. पर ये सब बाहर न हो. तुम समझ रहे हो न किशोर?"
किशोर तोह जैसे गुरु जी की बात सुन्न स्तब्ध सा मूर्ति बन्न के रह गया था. कुछ देरर मौन रहने के बाद वो बोलै,
"गुरु जी! आइये! अंदर चल के विस्तार से बात करते है. मेरी पत्नी को भी jaan'na ज़रूरी है."
"ठीक है बच्चा! चलो!"
और गुरु जी किशोर के साथ अंदर जाने लगे. बाहर बगीचे में खड़ा रमन गुरु जी को देखता रहा बस और मैं hi मैं सोचने लगा.
'तोह ये मतलब था गुरु जी का. की गधे को भी बार बार सिखाओ तोह वो होशियार बन्न जाता है. मतलब गुरु जी इस नन्ही सी बच्ची को बचपन से hi बाहरी दुनिया से दूर रख के केवल इससे पढ़ाई में लगवा देंगे. और ऐसे में ज़ाहिर है की ये लड़की आगे चल के होशियार hi निकलेगी. वाह! मान गए गुरु जी को! पर अभी किशोर राज़ी नहीं हुआ है. देखते है गुरु जी कैसे करते है ये सब?!'
कुछ देरर तक अंदर सभी लोग भोजन करते रहे. काफी समय गुज़र चूका था. और करा के बारे में सब कुछ गुरु जी ने बता दिया था किशोर और उसकी पत्नी को. अब निर्णय करना किशोर के हाथ में था. क्या वो गुरु जी की बात को मानेगा? या नहीं?
वो अपना फैसला सुनाने hi वाला था जब बाहर बगीचे से करा की एक ज़ोरदार चींख उन् सबको सुनाई दी.
"Aaaaaaaaaaaaaaaa...."
घबराते हुए वो सब उठे और बाहर की ऑर्डर भागे.
जैसे hi किशोर और बाकी सब वह पहुचे तोह जो नज़ारा उन्होंने देखा उससे देख सबकी रूह काँप गयी. उनके रौंगटे खड़े हो गए.
"आआह्ह्ह!"
करा की माँ जो गर्भवती होने के कारण थोड़ा धीरे धीरे चलते हुए वह आयी, उन्होंने सामने का मंज़र देखते hi अपना चेहरा अपने हाथो से धक् लिया.
नीचे ज़मीन पर उनके यहाँ जो माली काम करता था वो खून से लटपट पड़ा हुआ था.
उसके सीने पर चुर्री के गोपने के घाव थे जिनमे से खून निकल कर पूरा उसकी शर्ट को लहू लुहान कर चूका था. उसकी खुली डरावनी आँखें जो अनदेखी और अनकही कुछ घटना के बारे में व्यक्त करना चाह रही थी.
"अर्चना! करा को लेकर अंदर जाओ फौरन...!"
अपने पति की बात सुन्न अर्चना ने करा को पकड़ा और उस नन्ही सी दर्री हुई बच्ची को वो फौरन hi अंदर ले गयी.
"अनर्थ! घोर अनर्थ! बाप रे! हे भगवान्!!! ये आज मेने क्या देख लिया?" गुरु जी दररते हुए बोले.
"माधव!! ू माधव! जल्दी आओ इधर!"
किशोर ने आवाज़ लगाई तोह वही 40-45 वाली उम्र का आदमी जो बटलर की यूनिफार्म में पीछे hi खड़ा था वो सामने आया. और उससे जैसे पता था की क्या करना है.
उसने झुक के उस माली को चेक किया और फिर किशोर से कहा. "साहब! ये तोह मर्डर चूका है."
और ये सुनते hi गुरु जी और रमन की सिटी पित्ती गुल हो गयी.
पर जैसे उन्हें अभी और एक झटका लग्न बाकी था.
जैसे hi सबकी नज़र सामने की दिवार पर गयी तोह सब के सब एक बार फिर मौन रह गए.
सामने सफ़ेद दिवार पर बड़े बड़े अक्षरों में पेंट से लिखा हुआ था.
"किल्ड बी स्लोगन"
ये भूरे पेंट से लिखा हुआ था. वो माली पौधों के गमलो में पेंट कर रहा था. और शायद हत्यारे ने उसी पेंट से ये सब लिखा था.
ये देखने के बाद तोह जैसे किशोर एकदम डर गया.
"देखा तुमने किशोर!?" गुरु जी बोले.
"H-Huh!??"
"मेने तुमसे कहा था न? करा बिटिया के जीवन में अड़चने आएंगी! धेरर साड़ी! और देखो... हे भगवान्! इतना बड़ा घोर अनर्थ! इतना बड़ा अपराध! बेचारी करा बिटिया इतनी सी उम्र में क्या क्या देख बैठी. मेने कहा था न किशोर! तुम्हे बोहत ध्यान देना पड़ेगा. मुझे अब मेरी आँखों की शुद्धि करनी होगी. न जाने क्या देख लिया ये मेने आज. भगवान् रेहम कर!!!"
और किशोर ने फिर एक पल भी नहीं गवाया और बोलै,
"आपने एकदम सही कहा गुरु जी! आज से hi... करा कही नहीं जाएगी. उसकी पढ़ाई के लिए... में सर्वश्रेष्ठ प्रोफेस्सोर्स को घर hi बुलवाऊंगा और उससे घर पर hi पढवाउन्ह. वो अपने एक्साम्स घर से hi देगी. में अपनी बच्ची को खोना नहीं चाहता. आज से उसका खेलना कूदना बंद. केवल उसको ग्रोथ पर hi मेरा पूरा ध्यान होगा. पूरा ध्यान... मेरी करा..."
रमन जो खड़े खड़े सब देख रहा था. वो मैं hi मैं अपने गुरु जी की तारीफों के पल बाँध रहा था.
'मान गए गुरु जी आपको. किसी भी परिस्थिति को अपने फायदे के लिए कैसे उपयोग करना है कोई आपसे सीखे. यहाँ किसी की हत्या हो गयी और आपने अपना काम निकलवा लिया. वाह! मान गए आपको!'
पर वही दूसरी ऑर्डर किशोर सामने स्लोगन लिखे नाम को पढ़ के और भी घबराया हुआ था.
'K-Kaun है ये? मेरी तोह किसी से भी दुश्मनी नहीं है. कौन है ये स्लोगन? कौन हो सकता है ये?'
"माधव! P-police को जल्द से जल्द बुलाओ."
"जी साहब!"
कहते हुए माधव अंदर चला गया टेलीफोन से फ़ोन करने.
"अब में चलता हु किशोर! मुझे जल्द से जल्द मंदिर जाना होगा. वर्ण में अपना ये विचलित मैं शांत नहीं कर पाउँगा."
कहते हुए गुरु जी जाने लगे तोह किशोर ने उन्हें बुलाया. पर वो तोह जैसे किसी की सुने hi नहीं और अपनी hi धुन में आगे बढ़ वह से निकल गए.
अब वह केवल किशोर और रमन hi बचे हुए थे.
"गुरु जी ऐसे hi है. बोहत पवित्र है. उन्हें तोह अब मंदिर का वातावरण और भगवन के भजन hi शांत कर सकते है. न जाने क्या देख लिया आज उन्होंने." रमन बोलै.
"M-Mujhe माफ़ करना. ऐसे मेरे घर पर... गुरु जी को..."
"अरे!? नहीं नहीं! इसमें आपकी कोई गलती नहीं है. ये तोह ज़िन्दगी है. कब कहा पे न जाने किस के साथ क्या हो जाए. अच्छा! अब में चलता हु."
"अरे? पर गुरु जी की दसखीना?"
"दक्षिणा? गुरु जी तोह अपने नाम पर आज तक एक रूपया नहीं लिए. वो तोह वैसे hi कुदरत में रहना पसंद करते है. हाँ! पर कभी कभी कुछ दिलेर लोग उनके शिष्यों को राशि थमा देते है. और बदले में गुरु जी उस राशि को समाज के कामो में लगा देते है. यही है बस हमारा तोह..."
"हाँ! तोह, रुकिए न आप..." कहते हुए किशोर फौरन hi अंदर गया और उसने पैसो की कुछ गद्दी अलमारी से निकाली और ला कर रमन के हाथो में थमा दी.
"ाररीी!? Y-Ye... ये क्या कर रहे है आप? इतने सारे पैसे?"
"देखिये! ये मेरी तरफ से है. गुरु जी को धन्यवाद कहियेगा. और आप इन् राशि का मुझे पता है नेक काम के लिए hi इस्तेमाल करेंगे."
"P-Par...!?!"
"देखिये! ना मत कहियेगा! और माफ़ी चाहता हु में थोड़ा जल्दी में हु. इतना बड़ा हादसा हो गया घर में. घर का मुखिया होने के नाते मुझे hi सब देखना होगा."
और कहते हुए किशोर वह से निकल गया. पुलिस आ चुकी थी और साड़ी जांच पड़ताल करि.
पर उसके पहले hi रमन वह से अपनी थैली में वो पैसे लिए निकल चूका था.
'हाहाहाहा~ मान गए गुरु जी को. ये तोह लाख से भी ज़्यादा है. बाप रे!!! ये इतना रईस आदमी कहा से मिल गया गुरु जी को?'
वो सोचते सोचते बस स्टैंड पोहचा और एक बस में सवार हो गया. और अंदर hi एक सीट पर उसके गुरु जी बैठे हुए थे. जैसे मानो वो उसका hi इंतज़ार कर रहे थे.
वो पैसे, ज़ाहिर है की किसी नेक काम में इस्तेमाल नहीं होने वाले थे. बल्कि उन् पैसो का इस्तेमाल तोह दारू, और अन्य ऐशो आराम के लिए इस्तेमाल होने वाला था. गुरु जी और उनके शिष्य मिल कर कितना बड़ा ढोंग रच रहे थे दुनिया के लोगो के साथ ये बात कोई नहीं जानता था.
शायद, अभी तक किसी ने भी गुरु जी को नहीं पकड़ा था. और ऐसे hi उनकी ज़िन्दगी ऐशो आराम से भर चुकी थी.
पर...
जहा गुरु जी और अन्य लोग मस्ती में लगे थे वही दूसरी ऑर्डर बेचारी नन्ही करा की ज़िन्दगी जैसे उजाड़ के रख दी थी गुरु जी ने.
किशोर ने उसका स्कूल जाना सख्त बंद कर दिया था.
पहले तोह करा को बात समझ नहीं आयी. क्युकी वो काफी छोटी थी. पर जैसे जैसे वो बड़ी हुई, और उससे पता चला की उसकी सहेलिया सभी बाहर निकल के घूमने फिरने स्कूल जाती थी तोह जैसे उससे समझ में आया.
वो ज़िद्द करती, और किशोर उसकी बातें इग्नोर कर देता. वो रोटी, बिलखती, की उससे भी बाहर जाना है. पर कोई फायदा नहीं.
वो एक बंद पिंजरे में किसी चिड़िया की तरह बन्न के रह गयी थी. बेशक! उससे ुच्छ शिक्षा प्रदान की जा रही थी. हर्र एक विषय का होनहार प्रोफेसर आके उससे पढ़ाता था.
पर...
क्या फायदा था ऐसी शीसखा का? जहा उससे कोई आज़ादी तक नहीं थी. वो बस उस आलिशान से बंगले में क़ैद रहके खिड़की के बाहर अन्य बच्चो को रास्ते से हस्ते खेलते हुए गुज़रते देखा करती थी.
उसकी सहेलिया ज़रूर कभी कभी आती थी. सोनू और अवा.
पर जैसे धीरे धीरे उनसे भी उसका टच ख़तम हो रहा था.
दोस्त क्या होते है, शायद ये भी वो अब भूलने लगी थी.
एक समय ऐसा भी आया जब उसकी माँ का देहांत हो गया. और तब से वो जैसे और शांत सी हो गयी.
बाप, जो उसकी बात सुनता hi नहीं था. केवल उसकी पढ़ाई की बात करता था. माँ, जो वक़्त से पहले चल बसी.
और एक छोटा भाई, जो अभी काफी छोटा था इन् सब बातो को समझने के लिए.
जब करा 8तह एसटीडी में थी तब उसकी पडोसी सहेली अवा, वह से चली गयी विदेश. हमेशा के लिए.
और जाने से पहले भी, वो दोनों hi एक दूसरे से केवल एक बार hi मिल पाए.
अवा : I'm गोइंग करा!
करा : हम्म~
अवा : T-Tum... तुम कब तक ऐसे रहोगी? घर में?
करा : जब तक डैड अल्लोव नहीं करते.
अवा : तुम्हे अपने डैड से बात करनी चाहिए. रियली!
करा : ी विल!
अवा आगे बढ़ी और उसने करा के हाथ में एक ब्रेसलेट पहनाया और उसके गले से लग गयी.
अवा (क्रिस) : ी विल नेवर फॉरगेट यू. गुडबाय!
पर करा की आँखों से ासु न निकले. उससे समझ में hi नहीं आ रहा था की उससे रोना चाहिए या नहीं. उससे पता hi नहीं था कुछ. क्युकी वो बचपन से hi इन् सब फीलिंग्स से जैसे वंचित रह गयी थी.
एक छोटे बच्चे को आप बचपन में जो सिखाओगे, बड़े होने के बाद वो उसी को फॉलो करता है. और उसके लक्षण भी देखने को मिलते है.
करा के साथ भी कुछ ऐसा hi था. उससे फीलिंग्स के बारे में कुछ सिखाया hi नहीं गया था. उसका दिन शुरू होता था सुबह 5 बजे. नौकर आके उसके कपडे बदलते थे. नाश्ता होता था डाइनिंग टेबल पर. सुबह सुबह उसकी गुड मैनर्स की एक क्लास लगती. उसके बाद सुबह से रात तक अलग अलग विषय के टीचर्स आके उससे पर्सनली पढ़ाते थे.
बीच बीच में उठ वो अपना लंच करती और रात में डिनर और बस फिर उसका दिन ख़तम हो जाता. और अगले दिन से फिर वही रूटीन शुरू.
उसके दोस्त नहीं थे. जो थे वो भी अब नहीं आते थे. अवा जा चुकी थी. सोनू hi हमेशा बीच बीच में ज़िद्द कर के आ जाती थी और उस से बात करती.
कभी कभी तोह सोनू उसके डैड से भी लड़ गयी थी.
वो करा से सवाल करती की क्यों वो अपने आप को यु क़ैद करके रखे हुए है.
तोह करा बस एक hi जवाब देती, "डैड मुझे कामयाब होते देखना चाहते है."
और बस, वही डिस्कशन ख़तम हो जाय करता था.
वो एक रोबोट की तरह बन चुकी थी. जिससे बस काम करवाने के लिए बनाया जा रहा था.
जब उसका जन्मदिन आता तोह बस एक केक काटा जाता था और बस हो गया उसका जन्मदिन.
अपने भाई कारन से कभी कभी करा को जलन होती थी. क्युकी उसका भाई स्कूल भी जाता था और दोस्तों के साथ खेलने भी. उससे कोई मनाही नहीं थी.
पर जैसे उसका ये इमोशन भी गायब हो गया. एक प्रकार से उससे बस अब बिज़नेस करना आता था. क्युकी वो बिज़नेस संभालने के लिए hi पढ़ रही थी अब तक.
बाकी साड़ी चीज़े जैसे वो भूलती जा रही थी.
जब उसने स्कूल से ग्रेजुएट किया तोह किशोर ने उससे पहली बार विदेश भेजा यूनिवर्सिटी ज्वाइन करने के लिए. पर वह भी, वो एक बंगले में रहती थी. यूनिवर्सिटी नहीं जाती थी. और वही से उसने यूनिवर्सिटी में टॉप भी किया था.
सोनिआ उर्फ़ सोनू, उसकी बचपन की दोस्त उस से जलती थी. क्युकी हमेशा hi करा उस से आगे रहती थी. आखिर इतना नॉलेज कोई व्यक्ति लेगा तोह ज़ाहिर है की वो अन्य लोगो से आगे hi रहेगा.
पर सोनिआ को जब ये बात समझ आयी की उसकी दोस्त उस पर ज़रा भी ध्यान नहीं देती. तोह सोनिआ ने जैसे ये मक़सद बना लिया था अपना.
वो भी शामे यूनिवर्सिटी जाएगी. वो भी शामे प्रतिस्पर्धा में भाग लेगी और करा को हराएगी. ताकि उसकी दोस्त उस पर ध्यान दे.
कभी कभी करा कुछ कॉन्टेस्ट्स में आती थी. पर कॉन्टेस्ट्स ख़तम होते hi वो गायब.
और ऐसे hi उसकी ज़िन्दगी एक नर्क के सामान हो चुकी थी.
एक खिला हुआ गुलाब ऐसे मुरझा के रह गया था.
***
कारन : और ये है... दीदी की सच्चाई.
जब कारन ने साड़ी बातें बता कर अपनी बात ख़तम करि तोह वीर की मुट्ठी गुस्से में कस गयी.
"दमन ितत्तत्त!!!!"
*थुड़*
उसने जोरर से अपना मुट्ठी बेंच पर मारी तोह लोहे की वो बेंच पे एक डेंट पद गया.
कारन उसके गुस्से को देख ताजुब था.
वीर : सो that's थे रीज़न... That's थे रीज़न व्हाई शी... दमन आईटी!!!!
वीर को याद आया की करा की मुलाक़ात उस से पहली बार कब हुई थी. क्लब में...
और उससे जैसे समझ आ चूका था की क्यों करा वाया आयी थी. शी जस्ट वांटेड तो क्नोव थिंग्स आउट...
वो तोह बेचारी बस ये देखने आयी थी की क्लब की लाइफ किसी होती है. क्या होता है वह? अपनी क्यूरोसिटी को ख़तम करने आयी थी वह वो. और उस दिन hi आतिश ने वह हमला कर दिया था. और फिर वीर और उसका यु आपस में इंटरकोर्स करना...
बेचारी! हर्र जगह तोह झेला hi था उसने. ये सब सोचते hi मानो वीर के मैं में करा के प्रति रिस्पांसिबिलिटी और बढ़ चुकी थी.
वीर : तुम्हे कैसे पता चली ये सब बातें!? तुम तोह तब पैदा भी नहीं हुए थे!?
कारन : यदि वफादारी का कोई दूसरा नाम है तोह वह है माधव अंकल! उन्होंने hi मुझे सब कुछ बताया था जब में फॉरेन जाने वाला था. और इसलिए तब से hi में रघु के कांटेक्ट में हु. कुछ भी होता है वो मुझे बताता है.
वीर : हम्म~ तोह माधव अंकल उस गुरु जी के बारे में जानते थे.
कारन : माधव अंकल की नज़र तेज़्ज़ है लोगो को परखने में. उन्हें समझ आ चूका था की वो आदमी ढोंगी था. उन्होंने डैड को बताया भी पर डैड ने विश्वाश नहीं किया. वो इन् सब में कुछ ज़्यादा hi विश्वाश करते है.
वीर : इतने बड़े आदमी होने के बावजूद इन् सब पे...!?
कारन : हर्र बड़ा आदमी किसी न किसी अंधविस्वाश पे यकीन करता hi है वीर. कुछ लोगो नुमेरोलोग्य पर यकीन करते है. की उनका लकी नंबर ये है. वगैरह वगैरह...
वीर : ी सी! वेल!? तोह ये सब क्यों बताया तुमण्ड मुझे!?
कारन : बिकॉज़ ी थिंक यू कैन चेंज हेर.
वीर : हँ!?
कारन : तुम्हे पता है मेने किसी किसी सीटुएशन्स में दी को देखा है? उनका बड़े था लास्ट ईयर. और डैड ने उन्हें विश तक नहीं किआ था. वो काम में इतना बिजी थे. ऊपर से वो दी को मीटिंग्स पर टाइम पर पहुचने के लिए कह रहे थे. और दी ने कोई कंप्लेंट नहीं की. फिर रात में मेने डैड से थोड़ा ुचि आवाज़ में बात की तब जाके उन्हें याद आया और उन्होंने दी को विश किया था. तुम समझ रहे हो न?
वीर : ....
[That's quite sad...]
कारन (शिघ्स) : जब मुझे पता चला की दी ने तुम्हे एप्रोच किया और तुमसे बात करते हुए उनके चेहरे पर स्माइल आ जाती है. तहत मीन्स यू अरे समवन स्पेशल. दीदी फ़ालतू लोगो से कभी इम्प्रेस्सेड नहीं रहती. कोई स्पेशल hi होता है जो उन्हें इम्प्रेस कर सके.
वीर : O-Ohhh!
कारन : सो? कैन यू हेल्प हेर?
वीर (स्माइल्स) : यदि तुमने नहीं भी कहा होता तोह भी में कर रहा होता.
कारन (स्माइल्स) : हम्म~ पर ध्यान रहे, िफ़ ी फंड यू टेकिंग एडवांटेज ऑफ़ हेर. तोह मुझसे बुरा कोई न होगा.
वीर : *स्माइल्स*
और तभी कारन ने अपना हाथ आगे बढ़ाया.
कारन : सो? फ्रेंड्स?
और पल भर के लिए वीर को जैसे कुछ याद आया.
गोलू!!!!
ऐसे hi तोह उसने दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया था. और क्या हुआ था उसके साथ?
ये याद आते hi वीर की नज़रे नीचे झुक गयी और वो पलट गया.
वीर : ी don't मेक फ्रेंड्स...
कहते हुए वो वह से निकल गया. और बेचारा कारन उससे बस प्रश्न भरी निगाहो से जाते हुए देखता रहा.
***
अगली सुबह हुई. आज वीर को अपने फ़ूड ट्रक का बंदोबस्त करना था. और यही सोच आज वो जल्दी उठ गया.
पर तभी...
*नॉक नॉक*
उसके दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी.
उठते हुए उसने जैसे hi दूर खोला तोह सामने सुमन कड़ी हुई थी.
पर...
पर उसके बगल से कोई और भी खड़ा हुआ था.
वीर : ???
सुमन मुस्कुरा रही थी और अपने बगल में खड़े व्यक्ति को उसने धक्का देके अंदर कमरे में धकेला और खुद अंदर आके दरवाज़ा बंद कर ली.
सुमन : मेने कहा था न? कल आपको एक उपहार मिलेगा!?! ये है आपका उपहार!
वीर : ेहठ!?
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आज के लिए इतना hi गाइस!
Don't फॉरगेट तो लिखे एंड शेयर योर थॉट्स!
धन्यवाद!
