Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery - Page 6 - SexBaba
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Incest Baadshah ~ The Tales of Debauchery

अपडेट - 34 ~ इंटेंस रश

अब तक...

इधर काव्य फुल एक्ससिटेड आरोही के पीछे बैठ चुकी थी. दोनों hi बेहद hi ख़ूबसूरत ड्रेस पहनी हुई थी.

और गाडी में संग बैठ वो रवाना हो गयी.

पर उन्हें नहीं पता था...


की इस वक़्त उनके पीछे कौन आ रहा था.

अब आगे...

एक बेहद hi ख़ूबसूरत से शहर में इस वक़्त धेरर साड़ी झालरों अथवा अन्य प्रकार की लइटिंग्स से सारे घर, दुकाने एवम बिल्डिंग्स जगमगा रही थी. लाल, नीली, पीली न जाने कितने रंगो की लेद लाइट्स से आज हर्र एक घर सजा हुआ था.

दिवाली की इस रात में हर्र जगह खुशियों का माहौल था. और इस समय इसी शहर के एक बड़े से घर में एक औरत बेहद hi ख़ूबसूरत सी साड़ी पहने, थाल लिए, अपने घर में जगह जगह दिए रख रही थी.

होंठो पे मुस्कान सजाये वो गुनगुनाते हुए दियो से अपने घर को रौशन कर रही थी. तभी उसके पीछे से एक कमरे से अत्यंत hi सुन्दर सी लड़की, बड़ी hi आकर्षक सी ड्रेस पहने बाहर आयी और बोली,

"माँ?? टेरेस पे रख दिए आपने दिए?"

औरत : नहीं बीटा! तुम रख आओ. में नीचे रख रही हु.

लड़की : Okay!

और इतना बोल वो jhat-pat ऊपर चली गयी और कुछ देरर में hi दिए रख के नीचे भी आ गयी.

लड़की : हाश!! न जाने कितने दिनों बाद आज इतना फ्री टाइम मिला है फेस्टिवल सेलिब्रेट करने का, है न माँ? वर्ण ऐसा टाइट और बिजी सचेडूले था अपना.

औरत : एकदम सही कहा तुमने बीटा.

लड़की : अच्छा चलो! माँ! आओ बाहर चल के थोड़े पटाखे फोड़े. मेने कुछ खरीदे है.

औरत : क्या तू भी ये ले के बैठ गयी? अब उसमे मेरी क्या ज़रुरत!?

लड़की : वाह! एक तोह साल में एक बार दिवाली आती है. और अब उसमे भी पटाखे न फोड़े? और आप नहीं चलोगी तोह क्या में अकेली बेवकूफो टाइप फुलझड़ी लिए घूमूंगी क्या?

औरत (शिघ्स) : अच्छा बाबा! चल! तू maan'ne वाली तोह है नहीं?

लड़की : वही! हहै~ तोह पहले hi आ जाती...

औरत : हाँ हाँ मेरी माता... अब चल!

और दोनों माँ बेटी निकल के घर के बाहर आ गयी जहा कॉलोनी के सभी लोग बड़े hi धूम धाम से दिवाली मन रहे थे. बड़े जहा खड़े हो कर बात कर रहे थे, एक दूसरे को बधाईया दे रहे थे तोह वही बच्चे पटाखे फोड़ अपने hi आनंद में डूबे हुए थे.

इधर वो लड़की भी फुलझड़ी जलाते हुए अनार एवम चाकरी जला के अपनी माँ को भी आगे आके पटाखे फोड़ने के लिए मन रही थी और साथ hi साथ आस पड़ोस की लड़कियों से बातें भी कर रही थी.

पर उसकी माँ यानी की वो औरत एक मुस्कान लिए बस पीछे कड़ी होक hi सब देख रही थी. ज़मीन चाकरी, अनार से निकली चमकती हुई चिंगारिया उसकी आँखों में प्रतिबिंबित हो रही थी. भले hi आँखों का ध्यान उधर hi था...

पर...

उसके अंतर मैं का ध्यान कही और था...

और धीरे धीरे उसके होंठो से वो मुस्कान अपने आप गायब हो गयी.

'21 साल हो गए... न जाने...'

जब उस लड़की ने कुछ पल बाद पलट के अपनी माँ को देखा तोह उससे एक पल नहीं लगा ये jaan'ne में की उसकी माँ किसी चीज़ को लेकर परेशान है.

वो तुरंत सब कुछ चोरर अपनी माँ के पास आयी और बोली,

"आप परेशान लग रही हो माँ!"

औरत : H-Huh!? नहीं! कुछ भी तोह नहीं!?

लड़की (फ्रोंस) : कभी तोह शेयर कर लिया करो!? हँ!? ऐसी कौन सी बातें है जो सोचती रहती हो और खुद hi गहरे चिंतन में डूब जाती हो? क्या आपको मुझ पे ट्रस्ट नहीं है क्या? हँ?

औरत : एक झापड़ लगाउंगी ऐसी बातें बोली तोह. अपनी बेटी पे ट्रस्ट नहीं होगा तोह किसपे होगा भला?

लड़की : तोह फिर बताती क्यों नहीं की क्या सोचती रहती हो आप अक्सर?

औरत : बस... काम के बारे में बीटा.

लड़की : मुझे पता था आप यही बोलोगी. में चाहे जितनी बार पूछ लू, आपका जवाब यही रहता है. *शिघ्स* खर्र! अच्छा! चलिए अब... देखिये बगल वाली आंटी आपको पूछ रही है... आइये...

औरत : हम्म!

और वो दोनों बाहर निकल पड़ोसियों के साथ gap-shap में घुल मिल गयी.

***

वही यही मुंबई में इस समय भी कुछ ऐसा hi माहौल था.

Harsho-ullaas का महुअल.

और यहाँ भी एक फ्लैट के बाहर एक औरत अपने घर के द्वार के पास दो दिए रख रही थी.

ये और कोई नहीं, निधि hi थी, जो आज लाल रंग की साड़ी में इतनी आकर्षक और हसीं लग रही थी की अगल बगल वाले फ्लैट में रहने वाले लोग भी पलट पलट के देख रहे थे उससे.






आखिरी दिया रख वो उठी और थाल अंदर टेबल पे रख वो अपनी सैंडल्स pehn'ne लगी...

जब अंदर से उसकी लाड़ली जूही दौड़ते हुए बाहर आयी. उसके नन्हे हाथो में एक पैकेट था जिसमे कई सारे पटाखे रखे हुए थे.

जूही : ममममयीय! ममममयीय! चलो न जल्दी! चलो न...

वो ज़िद्द करते हुए निधि के हाथ पकड़ जब हिलाने लगी तोह अंदर से श्रेया जल्दबाज़ी में निकल के आयी,

श्रेया : अरे बाबा रुको न जूही! चल तोह रहे है. ओह गॉड! तुमने इधर से उधर कर के इतना पसीना निकलवा दिया मेरा. कही make-up न खराब हो जाए मेरा.

आज श्रेया भी बेहद सुन्दर लग रही थी. सफ़ेद और गोल्डन कलर की ड्रेस उसपे इतनी ज़्यादा जांच रही थी की उसकी एक hi झलक काफी थी लड़को को अपने ऊपर लट्टू करने के लिए.






श्रेया की बात पे ध्यान देते हुए, निधि जो वही बैठी थी बोल पड़ी,

निधि : हम्म? Anti-sweat वाले मेकअप भी आते है श्रेया.

श्रेया : I-I क्नोव... वो... वो ब्रांडेड वाले थोड़े महंगे आते है दी.

निधि : ओह्ह! M-Mein तुम्हारे लिए ले आउंगी श्री...

श्रेया : No No No No... It's... It's टोटली फाइन दी. में यही प्रेफर करती हु.

निधि : पर!?

श्रेया : मेने कहा न!? It's फाइन दी.

श्रेया इतना बोल अपना मुँह फेरर खुद के विचारो में डूब जाती है,

'दी कितनी प्यारी है. कितनी अच्छी है. शी कनौस की हमारी क्या कंडीशन है. स्टिल... वो चाहे मेरी हो या जूही या माँ डैड की नीड... सभी की नीड्स के बारे में कितना ध्यान रखती है. कभी वो अपने ऊपर ध्यान नहीं देती. न hi सोचती है अपने बारे में. यदि में उन्हें ये साड़ी दिलवाने न ले जाती और यहाँ न होती. तोह पक्के से दी ने अपने ऊपर एक रुपये तक न खर्च किया होता. शी... ी थिंक की अब में बोहत अच्छे से समझ गयी... की क्यों वीर यहाँ से चला गया.'

इधर निधि भी श्रेया की hi तरह अपने विचारो में खोयी हुई थी. और दोनों hi बहने अंदर से ग्लानि को महसूस कर रही थी.

'श्रेया के लिए में इतना भी नहीं कर सकती? ऑफ़ कोर्स में कर सकती हु. पर... मेरी बहिन... मेरी स्थिति देख जान बुझ के पीछे हट रही है. में जानती हु उससे कितना पसंद है make-up से लेके ड्रेसेस तक. सब कुछ ब्रांडेड. पर में ये भी जानती हु की... वो फ़ोन में बस इनकी पिक्स देखती रहती है. और कभी कभी जब मौका मिलता है तब अपने लिए कुछ खरीद लेती है. क्या में अपनी बहिन के लिए... इतना भी नहीं कर सकती? क्या वीर भी... इसलिए यहाँ से गया था? हाँ! में hi शायद... कपबले नहीं हु. में hi...'

वो अपने मैं से और सवाल करती पर तभी जूही की आवाज़ ने दोनों बहनो को होश में ला दिया,

"चलिए न मुम्ममइय्य्य!!! माआससीई!!"

और बस...

फिर क्या था. बच्चो की ज़िद्द के आगे पेरेंट्स हार मान hi जाते है अक्सर.

और यही हुआ. जूही के संग दोनों श्रेया और निधि नीचे आ गयी जहा उनकी सोसाइटी का कैंपस था. और सारे फ्लैट्स में रहने वाले लोग नीचे उतर कैंपस में hi दिवाली का लुत्फ़ ले रहे थे.

निधि भी एक पिलर के पास कड़ी श्रेया और जूही के हस्ते चेहरे देख उनमे खोयी हुई थी.

अचानक hi उसकी नज़र अपने फ़ोन पर गयी जो उसने अपने हाथो में लिया हुआ था, क्युकी अभी अभी उसका फ़ोन विबरते हुआ था.

मैसेज देखा तोह पाया की, उसमे लिखा हुआ था...

'हैप्पी दिवाली Ma'am!!'

और बस... उस एक मैसेज को देख. निधि के होंठो पे बिना उसके जाने hi मुस्कान आ गयी. अपने फ़ोन को कस के भींच उसने टाइप करना शुरू किया...

पर फिर...

उससे जैसे सूझा hi नहीं की क्या रिप्लाई दे. उसने फिरसे कीबोर्ड खोल चाट में कुछ टाइप करने का प्रयास किया... पर... फिर उसकी समझ में ना आया की भला कैसे वो कन्वर्सेशन आगे बढाए.

अंत में उसने 'हैप्पी दिवाली' लिख के बस सेंड कर दिया.

पर सेंड का बटन दबाते hi उससे जैसे अगले hi पल अपने ऊपर इतना गुस्सा आया और खुद को बेवक़ूफ़ भी बोलने लगी.

कारण था... उसका इतना सिंपल सा रिप्लाई भेजना.

'ुग्ग्ग्ठ!!! ये क्या भेज दिया मेने? No स्टीकर... No इमोजी... बस... एक हैप्पी दिवाली? वीर ने आलरेडी देख लिया है. विल हे रिप्लाई? वो मुझसे नाराज़ है. पर... में भी तोह उस से नाराज़ थी. बूत काम से काम... उस दिन के बाद भी... उसने मुझे मैसेज किया. मतलब... वो एकदम नाराज़ नहीं है.'

निधि बीच बीच में वीर की चाट बार बार खोल चेक करती की शायद वीर ने रिप्लाई किया हो कोई फिरसे.

पर...

उसका उसके बाद कोई रिप्लाई नहीं आया.

और पता नहीं क्यों...

ये छोटा सी बात निधि को कही न कही खटक रही थी.

***

मैसेज भेजने के बाद इधर वीर सोफे पे विराजमान था. आज उसने कुरता पायजामा पहना हुआ था जो उसपे बड़ा hi जांच रहा था.

रागिनी संग सुमन और बाकी सभी पूजा करने में व्यस्त थी. पर वीर बाहर hi बैठे अपने ख़ास लोगो को मैसेज कर रहा था.

निधि का रिप्लाई आया ज़रूर. पर बड़ा hi रुखा सा लगा वीर को वो रिप्लाई.

'शायद वो मुझसे अभी भी नाराज़ है.'

[Master! Aapne unko rulaaya. So obviously wo naraaz hai. You must cherish her. She's an angel. Ehehehe~]

'पारी का बेहेवियर न जाने क्यों... बड़ा hi ओड सा लग रहा है. क्या ये मेरा वहां है?? या फिर सही में...!? उस दिन भी... सुहाना जी को जब में रिंग देने गया था... तब भी...'

[Ahh!? W-W-Wha... What are you thinking master? Mein Pari hu aapki. Aapki pyaari Pari. Ehehe~]

'यह! राइट! तुम मेरी मैं की बातें सुन्न सकती हो. तोह मेरा मैं में सोचना hi बेकार है. में जो भी सोचूंगा... यू कैन हेअर आल.'

[R-Right!]

'सिवाए जब तुम स्लीप मोड में होती हो.'

[J-Jii master. Sleep mode me sirf mein deactivate hoti hu. Baaki system shut down nahi hota. Aap mujhse baatein nahi kar sakte. Na hi mein uss waqt aapke mann ki baatein sunn sakti hu.]

'हम्म! लगता है तुम्हारे बारे में मुझे तब hi सोचना पड़ेगा. जब तुम स्लीप मोड में रहोगी.'

[Ahhh!? K-Kya matlab aapka master? Aap mere baare me peeth peeche sochenge? A-Aisa kyu master? K-Kya mene kuch galti ki hai?]

'वाक़ई! में सही हु. पारी इस बेहवींग समूहत स्ट्रेंज...'

[Huh??? No no no no... Master! Mein aapki wahi Pari hu. Aapki pyaari Pari. Your one and only masterrrr.]

वीर एक आह भरते हुए वही बैठा रहा जब अचानक hi पारी ने उससे एक नया झटका दे दिया,

[Oh! I forgot!]

'हँ? क्या?'

[Wo... Wo... Pehle promise kariye aap chillaaoge nahi.]

'हम्म? K-Kya गड़बड़ करि हो अब तुम?'

[Wo Ahahaha~ actually ek in-built function aur unlock hua tha. But mein uski notification nahi de paayi thi. Kyuki already itni saari notification mene eksaath dii thi na... Ahahaha~ So... so... I forgot.]

'व्हाट थे...!?'

[No! Please! Gussa mat hona maasterrr! I love you so much! You love me too right? Pleaaase maaasterrr! Don't scold me. Okay!?]

'पारी का स्क्रू ढीला हो गया है क्या? व्हाट थे हेलल इस थिस? ऐसा तोह कभी बेहवे न करि ये? There's समथिंग रॉंग.'

[Noooo noooo nothing is wrong you stupid master. Ahhhhh!!!! I mean... My lovely master. Kuch bhi gadbad nahi hai. Haan toh mein in-built function ke baare me bataati hu.]

'???????'

[Wo actually... Past Illustration function is available now.]

'H-Huh?'

[In-built function : Past Illustration.


डिस्क्रिप्शन : यू कैन सी थे हिस्ट्री ऑफ़ अन्य पर्सन एंड क्नोव थेइर पास्ट, वन्स यू किल थम.]

डिस्क्रिप्शन पढ़ते hi वीर की आँखें हैरानी के मारे फटी की फटी रह गयी और वो अपनी जगह से हड़बड़ा के उठा खड़ा हुआ.

'Y-Ye...!? ये सब क्या है? परीई!?'

[Yes master. Yadi aap kisi ko maaroge. Toh... Aap uss shaks ka past dekh sakte ho. I mean... Past padh sakte ho. Details status window me likh ke aa jaengi.]

वीर स्तब्ध सा बस डिस्क्रिप्शन को hi देखे जा रहा था. ये सब कुछ जैसे उसके लिए हैंडल करने के लिए बोहत ज़्यादा था.

वो यदि किसी की हत्या करता है तोह उस शख्स का सारा अतीत अब पढ़ पाने में सक्षम हो चूका था वो.

ये किसी जादू से काम नहीं था उसके लिए.

पर उससे शायद अब एक बात दिमाग में डालनी पद सकती थी...

की यदि पारी है...

तोह मुमकिन है...

और अभी वो अपने शॉक से बाहर आ पाटा की तभी एक और आवाज़ ने उसके शॉक को अलग लेवल पे पहुचा दिया...

*डिंग*

[Mission : Save Kavya and Arohi before it gets too late.

Rewards : ?? Points.

Time Limit : 20 minutes.

Location : xxxxxxxx route to xxxxxxx road.

Mission Fail Penalty : 300 Points Deduction.]

'H-Huhhh?? कह दो की ये मज़ाक है.'

[...]

'डायमंत्र ित्तत्त!!'

वीर फिर न कुछ सोचा और वह रुका. उसने अगले hi पल अपनी बाइक निकाल के स्टार्ट की और तेज़्ज़ रफ़्तार में रेप्ट हुए बाइक भगाने लगा.

घर की पूजा और दिवाली चोरर वो यहाँ मिशन पूरा करने निकला था. एक ऐसा मिशन जिससे पढ़ने के बाद उसने एक सेकंड वास्ते करने का नहीं सोचा.

क्युकी वो जानता था. आरोही और काव्य किसी मुश्किल में पद गयी है. ऊपर से मिशन में इस बार पेनल्टी भी थी. वो भी 300 पॉइंट्स. साथ hi साथ टाइम लिमिट केवल 20 मिनट्स.

वो समझ गया था की सिचुएशन कितनी क्रिटिकल थी. वीर एक बात और जान गया था की यदि मिशंस में पेनल्टी दी है तोह मिशन फ़ैल होने पर केवल वही पेनल्टी hi उसपे लगेगी. वो पारी को नहीं खोयेगा.

पर यदि पेनल्टी मेंशनएड नहीं है. तोह इसका मतलब यही है की पेनल्टी पारी है. मिशन फ़ैल, यानी की पारी का उसके शरीर से निकल जाना.

वो गाडी भगाते हुए उसी रूट में जा रहा था जहा की डिटेल्स मिशन में मेंशनएड थी.

एक एक सेकंड उसके लिए कीमती था. उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़्ज़ हो चुकी थी की रास्ते में फूट रहे पटाखों के बाद भी वो अपने सीने में हो रहे विब्रेशन्स को महसूस कर पा रहा था.

*बूम*

*वहुवुस्सष्ठ*

लोग तोह अपने आनंद में डूबे पटाखे फोड़ रहे थे पर वीर इधर...

बेचैनी के मारे मारा जा रहा था. उससे बाइक चलाने में भी दिक्कत जा रही थी. क्युकी कोई न कोई रास्ते में पटाखे फोड़ने आ hi जाता.

'दमन आईटी! दमन आईटी! वो दोनों इस रूट से क्यों आ रही है??'

उसने खीजते हुए गाडी को रेस दिया और तभी...

*रिंग रिंग*

उसका फ़ोन बज उठा...

एक सेकंड न गवाते हुए उसने अपने पायजामे के जेब से फ़ोन निकाला और बाइक चलाते hi अपने कंधे से फ़ोन कान में लगा लिया.

वीर : काव्याआ!???

काव्य : Bh-Bhaiyaaa...

वीर : काव्य... कहा हो तुम? क्या हुआ??

काव्य : भैया.... ोुछहहहह!!!

वीर : कवियययआआ!??

काव्य : डीईई... संभल के... डीई... वो... आ रहे है...

वीर : हेल्ल्लूओ? हलुओ!?? काआव्याआ!!?

काव्य : भैयाआ! में और दी... इधर... क्सक्सक्सक्सक्सक्स रोड से क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स चौक की ऑर्डर जा रहे है. और पता नहीं... कुछ... कुछ दो बाइक वाले हमको फॉलो कर रहे है...

वीर : तुम... तुम बस आगे आती जाओ... में बाहर hi हु... और चौक पर पहुँच hi रहा हु. घबराओ नहीं... चौक के पास पुलिस थाना है. आती जाओ...

काव्य : भैयाआ... हमने... हमने गाडी रोक के एक अंकल आंटी से बताया था और कुछ देरर वही खड़े रहे... पर... जैसे hi थोड़ी देरर बाद हम वह से निकले... वो लोग फिरसे फॉलो करने लगे... भैया... मुझे... डर लग रहा है.

वीर : आरोही दी से कहो की वो बस गाडी चलाती रहे... और उनसे दुरी बना के रहे... में आ रहा हु बहिन... चिंता मत करररर...

काव्य : हेल्ल्लूओ??? भैयाआ... आपकी आवाज़ नहीं आ रही है... ठीक से... हलुओ??? हेल्ल्लूऊओ???

*कॉल एंड्स*

'फूऊऊऊक्ककककक!!!'

वीर घबराते हुए अक्सेलरेशन और बढ़ा दिया. अपनी बहिन की घबराई आवाज़ सुन्न वो अंदाजा लगा सकता था की उसकी बहिन कितना दर्री हुई थी.

काव्य ने जो सिचुएशन बतायी उसका अंदाजा वीर लगा चूका था की माजरा केसा था वह.

शायद कोई 2 बाइक्स में लोग थे जो काव्य और आरोही को पीछे से फॉलो कर रहे थे. और इस बात का आभास शायद आरोही और काव्य को हो गया था जिसके चलते वो बीच रास्ते में hi कही रुकी और कुछ घर के बाहर खड़े लोगो से बात कर उन्हें अपनी परेशानी बतायी.

ज़ाहिर सी बात है की तब वो बाइक वाले कही छुप गए होंगे. और जैसे hi आरोही और काव्य ने वह से चलना सही समझा तब उन् बाइक वालो ने वापस से उन्हें फॉलो करना शुरू कर दिया.

अब सवाल ये था की क्या वो नार्मल स्टॉकर्स थे? या फिर कोई और? और इसका जवाब भी वीर ने ढूंढ लिया था.

वो ये की ये कोई नार्मल स्टॉकर्स नहीं थे. यदि नार्मल स्टॉकर्स होते, तोह वीर को ये मिशन नहीं मिलता और इतनी हैवी पेनल्टी नहीं होती.

ज़रूर...

ज़रूर कुछ न कुछ गड़बड़ थी. और कुछ बोहत hi बुरा होने वाला था.

वीर चौक पहुँच चूका था. यहाँ काफी चहल पहल थी. पर काव्य और आरोही उससे कही नज़र ना आयी.

और जिस रूट से वो आ रही थी. वो आउटर एरिया था. इधर अँधेरा भी रहता था, स्ट्रीट लाइट्स जगह जगह नहीं थी. और रोड के एक साइड कुछ खुला इलाका था जहा पेड़ पौधे लगे हुए थे.

तोह वही रोड की दूसरी तरफ कुछ दुकाने थी पर वो दिवाली के चलते बंद हो चुकी थी.

वीर जानता था की इसी रूट से आरोही और काव्य आने वाली थी. पर...

उसके पास इंतज़ार करने का समय नहीं था.

उसने एक hi झटके में बाइक आगे बढ़ाते हुए उस मोड़ में दाल दी और स्पीड में भगाने लगा.

अँधेरे से भरी वो रोड वीर की गाडी की हेडलाइट से एकदम से जैसे रौशन हो गयी और उस पूरी सड़क में केवल उसकी hi बाइक के चलने की आवाज़ आ रही थी.

गियर बदल उसने और तेज़्ज़ गाडी भगायी की तभी उससे नज़र आया...

दूर से एक पीले रंग की बिंदु सी रौशनी...

जो हर्र एक सेकंड आकार में बड़ी होती जा रही थी.

और उससे समझने में देरर न लगी की ये...

आरोही और काव्य की गाडी थी.

वीर का चेहरा देखते hi काव्य के ासु जो उसने थाम रखे थे वो उसके गालो से बहने लगे और वो चिल्लाई...

"भाआयीयाआ!!!"

बिना समय गवाए वीर ने अपनी बाइक आरोही की स्कूटी के आगे ले जाते हुए बीच रास्ते में आधी कड़ी कर दी.

और वो बाइक से उतर फौरन hi काव्य के समीप आया.

"भैय्याअ!"

काव्य उतर वीर के गले से लग गयी. पर ये मिलान होना ज़्यादा देरर तक संभव न था.

क्युकी अगले hi पल दो और बाइक्स की आवाज़ उन् सभी के कानो में पड़ी.

अपने सीने से काव्य को लगाए वीर गुस्से से आने वाले लोगो को देखा.

हेडलाइट्स के चलते वो ठीक से उनका मुँह नहीं देख पा रहा था.

लेकिन उनके अगले बोल ने जैसे उससे सतर्क कर दिया.

"पकड़ पकड़... पकड़ अकेला है मादरचोद. पकड़ भागने न पाए..."

उनमे से एक बोलै...

कुल 4 लोगो थे. और ये देख वीर की आज पहली बार धड़कन इतनी तेज़्ज़ हो गयी.

उससे डर अपना नहीं था. डर था काव्य और आरोही का.

यदि गलती से भी उन्हें कुछ हो जाता तोह वो कभी भी खुद को माफ़ नहीं कर पाटा.

और अभी काव्य को अपनी बाहो में लिए जो राहत उससे मिल रही थी वो वीर अपने शब्दों में बया नहीं कर सकता था.

पर इसी राहत को... वो बनाये रखना चाहता था.

और उससे बनाये रखने के लिए...

वीर : अरूआहीईई!!

उसने तेज़्ज़ आवाज़ में पीछे कड़ी आरोही को चिल्लाया, जो उसकी आवाज़ सुन्न एक दम सिहर गयी.

कारण था वीर का उससे, उसके नाम से बुलाना.

जबकि वो वीर से एक साल बड़ी थी. और जितनी बार भी वीर उससे बुलाता था, दी कहके hi बुलाता था.

पर आज...

वीर की पीठ देख... वो वीर जो उन् अनजान आदमियों के सामने उसके और काव्य के लिए एक शील्ड बन्न के खड़ा हुआ था. आरोही अपने मैं में आ रहे विचारो को समझ नहीं पा रही थी.

वीर : ारूउहीईई!

एक बार फिर वो चिल्लाया...

और, आरोही का शरीर हिल उठा.

आरोही : हहहह!?

वीर : काव्य को यहाँ से लेके जाओ. भाभी के घर.... फौरन...

आरोही : P-Par!??

वीर : ी साइड गूऊऊ....

काव्य : भैयाआ!?? नूवो भैया... हम आप को अकेला चोरर के कही नहीं जाएंगे...

आरोही : T-Tum...

वीर : वो आ गए है... वे don't हैवे टाइम. Arohiiiiiiiiiii!!! जाआऊआ!!!

उसकी गरजती हुई आवाज़ सुन्न आरोही समझ चुकी थी की उसका यहाँ से जाना कितना ज़रूरी था.

अपना निचला होंठ दबाये वो अपनी असमर्थता व्यक्त कर... फौरन hi काव्य का हाथ थामी और उससे स्कूटी पे बैठा के खुद बैठ उसने स्कूटी चालु कर दी...

आरोही : Y-You... यू विल के बैक...

वो पीछे मुद वीर से बोली. जैसे वो पूछ नहीं बल्कि आर्डर दे रही थी की तुम्हे लौट के आना hi है. और वो भी जल्द hi.

वीर : हम्म!

वीर बिना पीछे मुड़े hi हामी भरा. और...

*वरूँऊऊम्मम्म*

अगले hi पल आरोही स्कूटी को भगा के उस सुनसान सी सड़क से चौक को ऑर्डर जाने लगी.

"भैयाआआआआ!!!!"

पीछे से काव्य की बेचैनी भरी पुकार वो सुन्न पा रहा था. पर...

इस वक़्त उसका पूरा फोकस सामने आये उन् 4 आदमियों पर था.

उसमे ज़्यादा कॉन्फिडेंस नहीं था की वो उन् 4 को हैंडल कर पाएगा. क्युकी...

एक के हाथ में एक लोहे का पाइप था और वही दूसरे के हाथ में लकड़ी की एक मोती स्टिक.

बाकी 2 निहत्ते थे पर...

आखिर थे तोह वो 4 बन्दे.

[Master!? Wo 4 hai. You must run.]

'नूवो! पारी! जितना हो सकेगा. I'll फाइट थम. समय आ गया है की में अपनी मार्टिकल आर्ट्स स्किल को इस्तेमाल कर के देखु.'

"धत्त्त बहनचोद लड़की भाग गयी. तुम दोनों... जाओ पीछा करो... जल्दी... आगे नहीं गयी होगी अभी ज़्यादा..."

उनमे से एक आदमी बोलै तोह दो निहत्ते आदमी एक बाइक पे सवार हुए और बाइक भगा के वो पीछा करने जा रहे थे.

पर...

आखिर निकलना तोह उन्हें वीर के बगल से hi था.

जैसे hi वो बाइक लेके उसके समीप आये...

वीर ने सीधा एक लात ड्राइवर के मुँह पे जड़ी जिसके चलते उनकी बाइक लड़खड़ाई और दोनों hi रोड के उस तरफ पेड़ पौधों वाली जगह में जा गिरे.

'ओह! ी फील स्ट्रांग...'

वो दोनों गालिया बकते हुए खड़े हुए और फिरसे बाइक चालु कर पीछा करने जा रहे थे.

वीर ये देख उन्हें झपटने के लिए हुआ पर...

वो ये कैसे भूल सकता था की पीछे भी 2 आदमी थे जो हथियार लिए थे और उसी की तरफ बढ़ रहे थे.

मजबूरन, उससे पीछे मुड़ना पड़ा और...

*वहुसस्ससहहहह*

एक ने उसके सर्र को एआईएम करके वो पाइप घुमाया पर वीर अपने रिफ्लेक्स के चलते तुरंत झुक गया.

अपनी फिस्ट को कस के उसका पिछले भाग वीर ने फिर सीधा उसके सर्र पर घुमाया और...

*पुऊववववव*

वो वार जाके सीधा उस आदमी के जबड़े से कनेक्ट हुआ और एक पल में hi वो 3-4 कदम दूर जा के धड़ाम से नीचे गिरा.

"मआदारचूडड़ड!!!"

दूसरा चिल्लाया और वीर की टांग पे उसने अपनी स्टिक घुमाई...

*वहूऊओऊस्ससष्ठ*

वीर ने डॉज किया पर...

*वहूउस्सस्सश्ह्ह्हह्ह*

एक बार फिर उसने अपनी स्टिक घुमाई जिससे वीर ने बरेली डॉज किया.

'थिस गाए.... टच!!!'

वीर उसपे पूरी तरह टूट पड़ता की तभी उससे सुनाई दिया,

*वरररओओओओओओओममम*

*वरूआउम्म्म्म्म"

उसने पलट के देखा तोह वो दो आदमी गाडी उठा के आरोही और काव्य का पीछे करने निकल चुके थे.

'फुकककक! आरोही! काव्य! यू मस्ट स्टे सेफ... चाहे कुछ भी हो जाए... Don't गेट सौगत.'

पर ये वक़्त... पीछे नहीं आगे ध्यान देने का ज़्यादा था. क्युकी अगले hi सेकंड...

"ले मदारचोड़ साली..."

उस आदमी ने स्टिक एक बार फिर वीर के सार की तरफ घुमाई और इस बार जैसे hi वीर ने पलट के वापस देखा तोह...

डॉज करने का टाइम नहीं था.

*थुड़*

अपने दोनों हाथो को क्ष की तरह बनाते हुए उसने स्टिक को रोका और कूद के पीछे हो गया.

'दम्मंन!!? तहत हुर्ट्स!'

"उठ बे... जल्दी उठ... साला भागने न पाए."

वीर उतना फ्लुइड्ली लड़ नहीं पा रहा था जितना वो लड़ सकता था. कारण था कुरता और पयजामा.

दूसरा आदमी भी उठ के आया और दोनों आदमी वीर पे टूट पड़े.

वो इधर से उधर हथियार चलाते पर वीर जैसे तैसे कर बच जाता. लेकिन थोड़े बोहत हिट्स उससे भी लग रहे थे.

पर ये ज़्यादा देरर तक नहीं था.

उसकी आँखों में मिटटी फेक पहले आदमी ने पीछे से वीर को डेडलॉक में फसाया और पाइप उसके गले पर टिका के उसकी सास रोकने की कोशिश करने लगा.

तोह वही दूसरा आदमी स्टिक लिए हस्ते हुए सामने से उसके क़रीब आने लगा.

और उसकी नज़र में...

वीर का पेट था जो बिलकुल अनप्रोटेक्टेड था. एक शॉट, और वीर धेरर.

उससे पता था स्टिक कहा मारनी है.

'डायमंत्र ितत्तत्त!! शीत्तट! ायर्घ्हहह!'

वीर चंगुल से छूटने का प्रयास hi कर रहा था.

इतने में उस आदमी ने अपनी स्टिक उठाया और वो मारने hi वाला था की तभी...

*थुड़*

अचानक hi वो अपने आप एकदम से नीचे गिर पड़ा.

'हँ???'

और जब सामने नज़र पड़ी... तोह...

एक युवक पीछे खड़ा हुआ था. जिसने पत्थर फेक उस आदमी के सर्र पे मार, उससे यु गिरा दिया.

पर वीर की नज़र जैसे hi उसपे पड़ी उसकी आँखें हैरत के मारे फैलती चली गयी...

वीर : ग... गोलूउउ!???

गोलू : हँ!?? अरे... T-Tum...!?

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद!

नेक्स्ट अपडेट इस कहानी का अब तक का मोस्ट थ्रिलिंग अपडेट होने वाला है.

सो कीप सपोर्टिंग!

और लिखे करना न भूलना रे. 😁
 
कुछ मैनिंग्स यहाँ पे शेयर कर रहा हु. इंग्लिश को लेकर जिन्हे प्रोब्लेम्स है.

जब भी कहानी में ब्रैकेट में कुछ इंग्लिश शब्द आते है तोह उनका मतलब क्या है? वो यहाँ बता रहा हु. आपको समझने में फिर आसानी जाएगी.

1. (नॉड्स) : मतलब की सर्र हां में हिलाना.

2. (फ्रोंस) : मतलब की bauhe/eyebrows सिकोड़ना.

3. (मुर्मुर्स) : धीमी सी आवाज़ में बुदबुदाना.

4. (स्माइल्स) : मुस्कुराना.

5. (ब्लशेस) : शर्माना.

6. (नजस) : कोहनी से या हाथ से किसी को टटोलना उनका ध्यान पाने के लिए.

7. (शिघ्स) : एक आह भरना या लम्बी सास लेना.

अभी के लिए इतने hi. 😁
 
अपडेट - 35 ~ थे डेडलिएस्ट ट्रैप

अब तक...

और जब सामने नज़र पड़ी... तोह...

एक युवक पीछे खड़ा हुआ था. जिसने पत्थर फेक उस आदमी के सर्र पे मार, उससे यु गिरा दिया.

पर वीर की नज़र जैसे hi उसपे पड़ी उसकी आँखें हैरत के मारे फैलती चली गयी...

वीर : ग... गोलूउउ!???


गोलू : हँ!?? अरे... T-Tum...!?

अब आगे...

*Vrrrrroooooooooooooommmmm*

आज की इस दियो से जगमग रात में जहा जगह जगह लोग त्यौहार का आनंद उठा रहे थे, तोह वही आरोही और काव्य अपनी स्कूटी में बैठ उस सुनसान रास्ते में घर की ऑर्डर भागती जा रही थी.

दोनों की धड़कने ट्रैन के माफिक तेज़्ज़ हो चुकी थी. जब जान पर आती है तोह अच्छे अच्छा की हालत खराब हो जाती है, बदन ठन्डे पद जाते है. फिर यहाँ तोह वो दोनों लड़किया थी. ऊपर से ऐसा कुछ भी उनके साथ पहले कभी घटित नहीं हुआ था और न hi उन्होंने ऐसा कुछ कभी अपने सामने देखा था. एकदम से जब आज इतनी साड़ी वारदाते उनके साथ हुई तोह भयभीत होना तोह स्वाभाविक था.

काव्य सेहमी सेहमी सी ासु बहाते जा रही थी और आरोही के कंधे पर अपनी चीन रखे उसकी कमर में जोरर से हाथ बांधे हुए थी.

तभी अचानक...

*टिप*

'हँ!?'

उससे अपने गाल पे कुछ गीला गीला महसूस हुआ.

मानो जैसे लगा की ऊपर आसमान से पानी की एक बूँद गिरी हो उसके चेहरे पे आ कर.

और एक बार फिर...

*टिप*

'??'

उससे फिर ये अंदाजा लगाने में समय न लगा की ये पानी की बूँद कहा से आ रही थी.

काव्य : D-Dii?? *स्निफ्फ*

ये आरोही के ासु थे. जो हवा के कारण उसके गाल से उड़द के पीछे जा के काव्य के गाल से जा टकराये थे.

ये आभास होते hi की उसकी बड़ी बहिन भी ासु बहा रही है, काव्य और जोरर जोरर से रोने लगी और आरोही को भींच ली.

उनकी स्कूटी अब चौक तक आ चुकी थी. और इस इलाके में आते hi अब जाके दोनों को थोड़ी राहत सी महसूस हुई. क्युकी यहाँ उजाला hi उजाला था, चहल पहल थी, रौनक थी, रास्ते से आती जाती गाड़िया थी, लोग थे जो अपने मनोरंजन में लगे हुए थे.

पास hi उन्हें एक थाना भी दिखा, पर इस वक़्त आरोही सीधे घर जाना चाहती थी. उसने सोच लिया था की एक बार घर पहुँच जाए उसके बाद पुलिस को इन्फॉर्म करेगी ताकि वो जल्द से जल्द वीर के लिए मदद लेके जा सके. वो ये भूली नहीं थी, की वो वीर को वह अकेला किस सिचुएशन में चोरर कर आयी थी.

आज अपने आप उसकी आँखों से ासु बह रहे थे. क्युकी अभी की घटना ने उससे पूरा अंदर तक झकझोर के रख दिया था. भले hi वो अपने चेहरे पर दिखा नहीं रही थी, पर अंदर से वो इतना ज़्यादा दर्री हुई थी इवन काव्य से भी ज़्यादा. पर वो बड़ी थी, और यदि वो hi अपना डर शो करने लगती तोह उसकी छोटी बहिन का क्या होता?

बस इसलिए, आरोही अंदर hi अंदर सब दबाये थी.

अब जब वो उस सिचुएशन से बाहर निकली तोह उससे समझ आया की आखिर कितना अफेक्टेड थी वो उस सिचुएशन में. और वो यदि अभी सही सलामत अपनी स्कूटी पर अपनी बहिन के साथ बैठी हुई थी तोह आज ये केवल एक hi शख्स के कारण मुमकिन हुआ था.

और वो था ~ वीर.

वही वीर जिससे वो हमेशा एक कोल्ड शोल्डर देके चली जाय करती थी. रूखा रूखा व्यवहार करती थी उसके साथ. कभी बातें नहीं करती थी. कभी उसके बारे में नहीं सोचती थी. उसने हमेशा से hi वीर को एक स्ट्रेंजर की तरह ट्रीट किया था.

'आरोही दी!? वो हमारा भाई कहलाने के लायक hi नहीं है.'

'आरोही उस से दूर रहा करो. वर्ण उसके साथ रहना कही तुम्हे भी एफेक्ट न कर दे. हरकते तोह जानती hi हो तुम उसकी.'

'दी! आप hi देखिये. हम सभी भाई बहनो में कितनी अच्छी अच्छी क्वालिटीज़ है. वे अरे टैलेंटेड. बूत उसी जगह वीर को देखिये. क्या वो कही से भी हमारा भाई लगता है? वो एक लोसर है दी. माना की हमारा कजिन है, पर भूमिका दी को देखिये आप उसी जगह. वो भी तोह कजिन है हमारी. पर कितनी अलग पर्सनालिटी है उनकी. इसलिए आप दूर hi रहा करो उस से.'

'आरोही! कभी सोचो की तुम अपनी हाई क्लास फ्रेंड्स के बीच हो और अचानक hi वीर वह आ जाए और कुछ न कुछ हरकत कर दे. क्या सोचेंगी तुंहारी फ्रेंड्स? कितना ेम्बरसेद फील करोगी तुम? तोह ऐसी सिचुएशन कभी न बने उसके लिए बेहतर hi की उस से दूर रहो. देखो, खुद ताऊ जी भी अपने बेटे को पसंद नहीं करते. मतलब गड़बड़ वीर में hi है. ये तोह उसके लिए खुशकिस्मत की बात होनी चाहिए की उसके इस रवैय्ये के बाद भी हम उससे घर पर झेल रहे है... वर्ण...'

अपने दोनों भाई, प्रांजल और विवेक की बातें इस वक़्त आरोही के मैं में गूँज रही थी. और इन्ही बातो को लिए वो आँखों से ासु बहाये रोड में अपनी गाडी भगाये जा रही थी बस.

न जाने कितने बीते सालो से यही बातें उसके मैं में डाली जा रही थी. जिसके चलते, वीर को अनजान की तरह ट्रीट करना उसको अब नार्मल लगने लगा था. उससे कही से भी ये गलत नहीं लगता था. लगता था जैसे वीर को ऐसे hi ट्रीट करना सही है. जैसे मानो किसी समाज का नियम फॉलो कर रही थी वो. कभी कुछ गलत नहीं लगा.

और ये सब आज भी उससे नार्मल hi लगता यदि...

यदि उस दिन उसने कॉलेज में काव्य को वीर की बाहो में न देखा होता तोह...

'ये काव्य को अचानक क्या हो गया?'

उस दिन वो इसी सवाल को लिए पूरी रात टेंशन में थी. भला उसकी छोटी बहिन, जो आज तक उसकी hi तरह वीर से बात नहीं करती थी. वो भला अचानक उसकी बाहो में!? क्यूँउउ???

ये किसी झटके से काम नहीं था उसके लिए...

पर उससे क्या पता था की काव्य घर में चोरी चोरी वीर से थोड़ी बोहत बातें ज़रूर कर लिया करती थी जो वो नहीं करती थी.

उससे याद था कैसे उस दिन वीर काव्य को उसकी क्लास चौररने भी गया था. उससे याद था की उस दिन वो कितना बदला बदला सा लग रहा था.

और उस दिन के बाद तोह जैसे उससे न जाने क्या क्या jaan'ne को मिला था.

काव्य उसके लिए कपडे खरीदने लगी थी, उसके लिए गिफ्ट्स खरीदती. देरर रात रात तक उससे मेस्सगेस भेज बातें करती...

और ये सब कुछ घटित होते हुए वो अपनी आँखों के सामने देख पा रही थी.

'क्यूँउउउउ!??? K-Kya में hi गलत थी? विवेक भैया और प्रांजल क्यों कहते थे ऐसा फिर? क्यों आया वो हमे बचाने? एक कॉल पे hi वो आ गया. वही प्रांजल का फ़ोन बिजी था तोह विवेक भैया ने उठाया नहीं. पर उसने... काव्य का फ़ोन एक रिंग में उठा लिया... और... इतनी जल्दी वो वह पर था. न जाने कितनी तेज़्ज़ बाइक चलाई होगी उसने वह पहुचने के लिए. में... में...'

आज अपने आप उसकी रुलाई चूत पड़ी. आज अपना नाम वीर के मुँह से सुनते वक़्त उसके रौंगटे खड़े हो गए थे. क्युकी वो जानती थी उस आवाज़ में कितनी चिंता थी, कितनी घबराहट थी.

और ये चिंता वीर की उन् दोनों के लिए थी. सवाल वही था.

आखिर क्योऊ???

अनेक प्रश्न लिए वो आखिर कार अपनी मंज़िल पर पहुची...

किस्मत से रागिनी और बाकी सभी पोर्च में hi उससे मिल गयी.

रागिनी : अरे!? आ गयी तुम दोनों!? आओ...! ??? Y-Ye क्या??? तुम दोनों के चेहरे का रंग क्यों उड़ा हुआ है ऐसे? K-Kavya!?? रो क्यों रही हो तुम? आरोही तुम भी!??

जैसे hi उनकी दशा रागिनी ने देखि वो हड़बड़ा के बाहर आयी. वो और सुमन इस वक़्त वीर को hi ढूंढ रही थी क्युकी अचानक वो बिना कुछ बताये घर से निकल गया था और फ़ोन भी नहीं उठा रहा था. ज़ाहिर सी बात थी वो सभी चिंतित थी.

आरोही : Bh-Bhabhi!!! वो...

उसके बाद आरोही ने शुरू से अंत तक साड़ी बात बता दी, जिससे सुन्न कर रागिनी समेत सभी टेंशन में आ गयी.

रागिनी : हे भगवान्! तुम दोनों ठीक तोह हो न? A-Aur वीर??? W-Wo वह अकेला है?? N-Nahi!!

वो अगले पल hi भाग के अपना फ़ोन उठायी और पुलिस को कॉल की.

आज त्यौहार का ये माहौल इतना टेंशन से भर गया. सभी के चेहरे पर बस डर, घबराहट और बेचैनी थी.

और सभी पुलिस का इंतज़ार करने लगे. आरोही और काव्य तोह जैसे तैसे बच गयी थी. पर यही बात वीर के लिए कहना थोड़ा मुश्किल था.

***

"अरे...!? T-Tum!??"

वीर के सामने इस वक़्त एक शख्स खड़ा था, जिस से वीर ट्रैन में मिला था.

~गोलू.

पर ये वक़्त उसके लिए सोचने का नहीं था. गोलू के आने से जो आदमी वीर को पीछे से दबोचे हुए था, उसका ध्यान भी भटक चूका था.

और इसी का फायदा उठाते हुए, वीर ने अपनी कोहनी सीधा उसकी पसली में दे मारी...

"ाआररररह्ह्ह!"

वो दर्द के मारे कराह और अपनी पसली पकड़ झुक गया और...

*पूंऊऊऊऊववववव*

एक ज़ोरदार घुसा उसके गाल पर आके पड़ा जो उससे पूरा हिला के रख दिया.

"फुक्कखकक ोूउउ!" नेक्स्ट सेकंड hi, वीर ने फुल ताकत से एक किक और जड़ दी उसके पेट में.

और वो बाँदा पीछे जा गिरा.

गोलू भागते हुए उसकी तरफ आया. वीर ने देखा की एक साइकिल ज़मीन पर पड़ी हुई थी जिसका पिछले चका हल्का हल्का अभी भी घूम रहा था. मतलब गोलू यहाँ साइकिल से गुज़र रहा था और उसने जैसे hi ये सब देखा तोह मदद के लिए आ पड़ा.

गोलू : अरे भाई... तुम फिरसे?? और ये चक्कर क्या है? सारे आदमी तुम्हारे पीछे क्यों लगे है? ठीक तोह हो? K-Kya था ये सब?

वीर : M-Mein ठीक हु. बोहत बोहत शुक्रिया, मेरी मदद करने के लिए. उस दिन ट्रैन में भी तुमने... पर तुम यहाँ? वेट! क्या hi इत्तेफ़ाक़ है ये...!? उस दिन भी तुमने hi मुझे बचाया था और आज भी...

गोलू : ः~ किस्मत भाई. जब जिसे मिला दे. वैसे नाम तोह याद है न मेरा? तुम्हारा तोह वीर है.

मुझे याद है.

वीर : एंड तुम गोलू!? मुझे भी याद है...

गोलू : हाहाहा~ बिलकुल! चलो याद तोह है काम से काम. पर ये सब!? क्या था?

वीर : कुछ दुश्मनी हक़ मेरी इनसे शायद. जो ये मेरे परिवार के पीछे पड़े है. तेह तक जाना पड़ेगा मुझे इसकी. न जाने कौन है इन् सब के पीछे.

गोलू : ओह्ह्ह!

वीर : पर तुम यहाँ...!? सुनसान रास्ते में!? वो भी... साइकिल में!?

गोलू : अपना क्या है भाई... उस दिन में भी अपने गांव के लिए निकला था, ट्रैन से. क्युकी वही अपनीछ जन्मभूमि है. अपना कोई हैइच नहीं. आश्रम में पला बड़ा, फिर 18 बरस की उम्र के बाद पैसा कमाने इधर मुंबई आ गया. सुना था पैसा कमाना है तोह मायानगरी जाओ. ः~

वीर : ....

गोलू : में इधर hi पीछे एक होटल है. उधर काम करता हु. खाना पीना वही हो जाता है. रहने का कोई न कोई जुगाड़ हो hi जाता है. आज दिवाली की खर्ची लेने गया था. बस अब जाके होटल के hi कुछ दोस्त लोग है उनके साथ दिवाली मनाऊंगा.

वीर : ओह्ह्ह!! तुम्हारी ज़िंदगी भी... काफी...

गोलू : ज़िन्दगी का क्या है भाई. एक दिन ऊपर जाना hi है. तब तक जितने मज़े ले सको ले लो. एक अच्छा जीवन गुज़ारो और क्या. अपना तोह एक hi सपना है...

हमेशा से चाहता था की एक ऐशो आराम की ज़िन्दगी जियु. पर... साला किस्मत हीच गांडू निकली ः~

वीर (स्माइल्स) : किस्मत गांडू hi होती है.

[W-What master!?? Bhuliye mat... Mera aapke andar aana bhi kismat hi thi. Kismat ko aisa na boliye... Master!]

'ओह्ह रियली नाउ!?'

तभी अचानक hi गोलू ने अपना हाथ आगे बढ़ाया और वीर की तरफ किया...

गोलू (स्माइल्स) : वैसे तोह तुम किसी बड़े घर के लगते हो. पर यदि मुझ जेसो से तुम्हे दिक्कत न हो तोह... आज से हम दोस्त!???

'हँ!?'

आज...

आज ये पहली बार था, जब वीर की तरफ किसी ने अपनी तरफ से दोस्ती का हाथ बढ़ाया था. कभी किसी ने भी उसका दोस्त बन्न ने की पहल नहीं करि थी. ये जानते हुए भी की वीर किसी न किसी परेशानी में रहता है और उसके पाला खतरनाक आदमियों से है, फिर भी आज गोलू ने उसकी तरफ ये दोस्ती का हाथ बढ़ाया था.

ऐसे में...

गोलू : हँ?? ू भाई... तुम रो क्यों रहे हो? अरे में इतना बुरा भी न हु यार
... तुम तोह... देखो भाई ऐसी बेइज़्ज़ती न करो यार...

वीर (हस्ते हुए ासु पोछ कर) : नहीं... वो *स्माइल्स* इसके पहले कभी किसी ने मेरा दोस्त bann'ne की कोशिश न करि... आज ये पहली बार है. इसलिए... इसलिए... बिलकुल... आज से हम दोस्त हुए...

और अगले hi पल वीर ने कस के गोलू का हाथ थाम लिया.

गोलू : इतना भावुक नई होते भाई... ज़िन्दगी में चिल मारने का... और किसी ने हाथ नहीं बढ़ाया तोह क्या हुआ? अब मेने तोह बढ़ा दिया है न? ः~

वीर (स्माइल्स) : हम्म्म!

दोनों को आज एक नया दोस्त मिला था. जहा वीर गोलू का आभारी था और उसके रवैय्ये से इम्प्रेस्सेड था वही गोलू भी इस बात से खुश था की वीर जैसा बड़े घर का लड़का आज उसका यु दोस्त बन गया था.

पर जैसे...

दोनों की इस ख़ुशी पर किसी की नज़र लग चुकी थी.

क्युकी अगले hi पल...

झाड़ियों में से 5 से 6 आदमी निकले और वीर और गोलू पे टूट पड़े...

सब कुछ इतनी जल्दी हुआ की दोनों को कुछ सोचने का टाइम hi नहीं मिला. दो से तीन बन्दों को झेलना तोह वीर वैसे भी काफी हद्द तक हैंडल कर लेता. पर 5 से 6!?

ये तोह नामुमकिन जैसा काम था उसके लिए. उसके स्टैट्स अभी इतने नहीं थे.

गोलू भी कोई फाइटर नहीं था. वो दुबला और लम्बा सा लड़का था. लड़ाई भिड़ाई से शुरू से hi दूर रहने वाला.

नतीजा ऑब्वियस था.

जहा गोलू को मार मार के उन्होंने बेहोश कर दिया था तोह वही वीर कुछ पल उनसे लड़ वह उनका सामना करता रहा. पर...

वो ोुट्नुम्बेरेद हो चूका था.

एनएमईएस ज़यादि थी, और वो अकेला.

[Maaaasttteerrrr!!!]

पारी की चिंता जनक आवाज़ आयी तोह संकेत समझ वीर मुदा पर...

*थुड़*

उसके सर्र के पीछे से एक वार आया और वो सर्र पकड़ नीचे गिरने लगा...

[Noooooo
! मायसत्तीएररर!!]

आँखें उसकी बंद होने लगी...

बेहोशी में जाने से पहले उससे बस एक hi आवाज़ मैं में सुनाई दी...

*डिंग*

['मिशन : सेव काव्य एंड आरोही बिफोर आईटी गेट्स तू लेट' है बीन कम्प्लेटेड.]

[40 points have been rewarded.]

'K-Kavya... आरोही...' मैं में वो अपनी बहनो के बारे में सोच... बेहोशी में चला गया.

***

आदमी 1 : वो तोह अच्छा हुआ हम छिपे हुए थे. जल्दी निपट गया मामला.

आदमी 2 : सही कहा! और भौ ने एकदम सही कहा था. की इन् 4 लोगो से काम नहीं हो पाएगा. इसलिए उन्होंने हमे भी भेज दिया. और देखो... उनकी बात एकदम सही निकली.

आदमी 1 : हम्म! अब इनका क्या करना है? मुझे फ़ोन आया उनका, वो बता रहे है की वो दोनों, उन् दोनों लड़कियों को पकड़ने में नाकाम रहे.

आदमी 4 : करना क्या है? भौ ने तोह पहले hi हमे बताया था की हमे इस लड़के को नहीं पकड़ना है. इसके आस पास के लोग यानी इसके चहितो को पकड़ के लाना है.

आदमी 5 : एकदम सही कहा. वो दो लड़किया बच गयी तोह क्या हुआ. ये देखो... ये एक और लड़का पड़ा है यहाँ. इसने इस लड़के की मदद की... मतलब ज़रूर ये इसका कोई ख़ास है, और इससे जानता है. वर्ण ऐसे कोई अपनी जान खतरे में नहीं डालता. और दोनों हाथ भी मिला रहे थे अभी.

आदमी 3 : हाँ! इससे उठाओ.

आदमी 1 : और इस लड़के का क्या!?

आदमी 3 : उससे वही पड़े रहने दो. भौ ने उसके लिए hi तोह जलसा में तैयारियां की है. हमे केवल इस लड़के से मतलब है. अब जल्दी चलो, वो दोनों लड़किया पुलिस को लेकर यहाँ ज़रूर आएंगी.

आदमी 6 : जलसा!?? बाप रे! इस बन्दे की शामत आयी है लगता.

आदमी 4 : हम्म! ज़िन्दगी में कुछ भी कर लो, पर भूल के भी भौ से पन्गा न लो. इस लड़के ने अनजाने में hi एक ऐसी जगह खुद को दाल दिया है, जहा इसका विनाश निश्चित है. अब चलो जल्दी...

और वो सभी आदमी गोलू और अपने आदमियों को वह से उठा के निकल गए.

वीर इधर रोड के किनारे बेसुध सा डाला हुआ था.

***

रात के 10 बज चुके थे. जब अचानक hi वीर को अपने चेहरे पर कुछ गीलापन सा महसूस हुआ.

और वो अपने होश में आया.

देखा तोह पाया की...

वो अपने बीएड पर था. और उसके इर्द गिर्द, रागिनी, काव्य, आरोही, सुमन, आभा, सोनाली ये सभी कड़ी हुई थी.

'हँ??'

[Aap behosh ho gaye the master. Luckily, wo aapko wahi chorr ke chale gaye. You know... I was so worried... *sniff* Mein... Mein... Abhi aap kesa feel kar rahe ho? Wait! Mein khud hi check kar leti hu. You should rest.]

काव्य : भैयाआआआआ!!!!

काव्य आगे बढ़ वीर से लिपट गयी. उसकी आँखों में अभी भी आसुओ की बूंदे सजी हुई थी.

वीर महसूस कर पा रहा था की काव्य के दिल की धड़कन कितनी तेज़्ज़ थी. वो देख पा रहा था की आरोही के चेहरे पर तक आसुओ के निशाँ थे. रागिनी और सुमन की आँखें भी नाम थी. आभा भी चिंतित नज़र से देख र
यही थी. सोनाली भी उससे बॉहे सिकोड़े देख रही थी.

उससे आभास हो रहा था की ये सभी लोग उसकी कितनी परवाह करते है.

काव्य : भैयाआआआ!!! *स्निफ्फ* *स्निफ्फ*

वीर : में यहाँ!?

आरोही (आगे आते हुए) : M-Mein बताती हु...

उसके बाद आरोही ने सब कुछ बताया.

कैसे वो घर पहुची, कैसे पुलिस को रागिनी ने
इन्फॉर्म किया, पुलिस आयी और काव्य आरोही को लेके उस जगह पर पहुची जहा वीर उन्हें बचाना आया था.

कैसे उन् ने वीर को वह बेहोश पाया और यहाँ घर वापस लाये. पुलिस आस्वाशन देते हुए की वो अपनी जांच जारी रखेंगे कह के चली गयी. ये साड़ी बातें आरोही ने वीर को बता दी.

वीर : ी सी...!

आरोही : वो...

वीर : हम्म???

आरोही : N-Nothing... तुम रेस्ट करो.

'मेरे कारण आज ये सभी त्यौहार भी न मन पाए.'

रागिनी : वीर तुम रेस्ट करो. Okay!

वीर : मेरे कारण आप सभी... आज त्यौहार भी...

रागिनी : Don't इवन थिंक अबाउट तहत okay? त्यौहार तोह हर्र साल आता है वीर. तुम ज़्यादा ज़रूरी हो या त्यौहार!? रेस्ट करो okay!?

काव्य : भैया! आप बिस्तर से नहीं निकलोगे. रेस्ट करो. में आपका ध्यान यही रखूंगी.

रागिनी : नहीं काव्य! वीर को कुछ देरर अकेला रहने दो. उससे नींद की ज़रुरत है. मेने डॉक्टर को भी इन्फॉर्म कर दिया है. वो आते hi होंगे...

सुमन : माली... एहम! वीर जी! अपना ध्यान रखियेगा. कोई भी परेशानी हो तोह मुझे आवाज़ लगा देना. मेरा कमरा आपके बगल से hi जो है. रागिनी जी को परेशां करने की कोई ज़रुरत नहीं. में हु न.

और सभी उसके कमरे से बाहर निकल गए. आज बेचारा वीर इतना बड़ा पर्व दिवाली न मन सका. एक के बाद एक जैसे उसकी ज़िन्दगी में बस परेशानिया hi लिखी हुई थी. न जाने कब उसकी ज़िन्दगी में खुशियों की बौछार आएगी!?

***

'वेट!!! G-Golu? गोलू का क्या हुआ? वो भी तोह वही था!? उसका क्या हुआ? बेचारा वो भी मेरे कारण...'

सोचते हुए वीर देरर रात बिस्तर से उठ खड़ा हुआ.

पर जैसे...

ये घबराहट काम थी? जो एक और आवाज़ ने उसकी इस घबराहट को बढ़ा दिया...?

*डिंग*

[Mission : Get to Golu as fast as possible and save him.

Rewards : ?? Points.

Location : Jalsa Building. xxxxxxx road, near xxxxxxx route.

Time Limit : 19 hours.

Mission Fail Penalty : 100 Points Deduction.]

'N-Noo... No... नूवो Nooooooooooo...'

मिशन पढ़ते hi वीर अपने बिस्तर पर गिर पड़ा.

'न्यूऊऊ... वो मेरी वजह से... वो...'

पर जैसे ये सब कुछ भी काम था उसके लिए जब अचानक hi उसका फ़ोन बज उठा. एक अननोन नंबर से कॉल.

वीर : H-Hello!??

वौइस् : Hello! वैसे... Hello कहने लायक माहौल तोह नहीं होगा तुम्हारे लिए ः~ क्यों!? झटका लगा न?

वीर (फ्रोंस) : K-Kaun!?

वौइस् : कौन हु, क्या हु ये सब बाद में जान जाओगे अपने आप. तुमने एक बोहत बड़ी गलती कर दी. अनजाने में hi करि पर गलती तोह गलती होती है. है न? और गलती की है तोह सजा तोह मिलती hi है. है न?

वीर : ??

वौइस् : तोह ये तुम्हारा दोस्त है न!?? क्या नाम है इसका!??

वीर : हहहहह!??? G-Goluuuuu!?

वौइस् : ओह्ह्ह! तोह गोलू है इसका नाम. हां तोह तुम्हारा ये गोलू मेरे क़ब्ज़े में है. वैसे तोह में तुम्हारी उन् दो बहनो में से एक को उठाने वाला था पर... ये भी बुरा टारगेट नहीं है. ः~

ये सुनते hi वीर के रौंगटे खड़े हो गए. की उसकी बहने कितनी बड़ी मुसीबत से बच के बाहर आयी थी. वर्ण न जाने क्या होता वीर का.

वीर : N-Nahiiiii! No..... तुमममम...

वौइस् (गुस्से में) : कल! कल रात 8 बजे... क्सक्सक्सक्सक्स रूट पर क्सक्सक्सक्सक्स रोड है. उधर एक ढलान वाला रास्ता मिलेगा. अंडरर जाते जाना, और एक बिल्डिंग दिखेगी.

तुम्हारे स्वागत के लिए वह बड़े से अक्षरों में जलसा लिखा होगा. पुलिस को खबर करने का कोई फायदा नहीं है. वो मेरे नाम से hi कापते है. फिर भी बताना चाहो तोह बता लेना, पर तुम्हारे दोस्त की गारंटी फिर में नहीं लूंगा. यदि अपने दोस्त को बचाना चाहते हो तोह kal..bataayi गयी जगह पर पहुँच जाना... वर्ण...

*कॉल एंड्स*

वीर को मानो सांप सूंघ गया था. वो अगले पल अपना सर्र पकड़, बाल खींचने लगा.

'नूवो!!!! न्यूऊऊ!!! ये सब क्या... मेरे कारण आज सभी दिवाली नहीं मन पाए... और बेचारा गोलू... no no no no नूवो... जिसका कोई कसूर नहीं था... वो... आज मेरे कारण... आरोही या काव्य भी उसकी जगह हो सकती थी... सब कुछ मेरे कारण... काश... राइट... ी... ी shouldn't हैवे एक्सिस्टेंड... ी shouldn't हैवे... *स्निफ्फ*'

[Maaaaaaaasttteeeeeerrrrrrrr!!!]

'हँ!?'

[Please master! Don't get demotivated. Mein hu aapke saath. Aisa kabhi mat sochiyega. I'm always with you. Aap akele nahi ho. We... We will save Golu, just like we saved Arohi and Kavya. Ghabraaiye mat Master... Please! Mein aapko aise nahi dekhna chaahti. Aapki himmat tootate hue... Because, it hurts me too... Pleaassee! Be strong Master. Mein aapke harr ek kadam par aapke saath hu.]

'P-Pariii!??'

पारी की बातो ने जैसे अपना असर कर दिया था. क्युकी अगले hi पल वीर ने आपने ासु पोछे और उसने निश्चय कर लिया.

'राइट! वे... वे विल सेव हिम... वे विल... पहली बार कोई दोस्त बना है. *स्माइल्स* में उससे कुछ नहीं होने दूंगा. ी don't क्नोव ये कौन है और क्यों मेरी फॅमिली के पीछे पड़ा है. बूत... में अपनी फॅमिली और फ्रेंड्स को कुछ नहीं होने दूंगा. राइट!!'

[That's the spirit master!]

'मेरे स्टैट्स दिखाओ पारी!'

[ स्टैट्स :

स्ट्रेंथ - 50/100

इंटेलिजेंस - 35/100

अगिलिटी - 30/100

ेंदुराने - 45/100

अपीयरेंस - 22/100]

'हम्म! मेरे पास 90 पॉइंट्स अवेलेबल है. में... में उन्हें ऐड कर सकता हु राइट?'

[Yes but changes subah dekhne ko nahi milenge master. Changes ke liye night time zaroori hai. Raat ke 12 se subah ke 8 tak. Abhi raat ke 2 baj chuke hai. Aapko points add 12 ke pehle karne the, tab jaake subah 8 ke baad aapko changes dekhne ko milte.]

'ी सी! वेल कोई नहीं. अब गोलू को बचाने के बाद hi... में इखट्टे पॉइंट्स इन्वेस्ट करूँगा. ी विल सेव हिम.'

[As you wish Master. It's time to rest.]

'एआआह्ह्ह्ह!!'

***

दिवाली की अगली रात...

आज के इस दिन सब कुछ बंद रहता है. मार्किट से लेके सब कुछ...

यहाँ तक की आज के दिन अखबार वाले भी छुट्टी लेते थे. और आज की इस रात वीर एक बिल्डिंग के सामने खड़ा हुआ था.

समय 7:55 हो रहा था.

उससे उस आदमी ने 8 बजे का बोलै था.

बिल्डिंग एक सुनसान सी जगह hi बानी हुई थी. बेहद बड़ी, और काफी पुरानी लग रही थी.

उसकी बनावट भी पुराने तरीको से की गयी थी. मॉडर्न कही से नहीं लग रही थी वह...

सामने एक बड़ा सा लोहे का गेट था. और ऊपर लेद लाइट्स से लिखा हुआ था.

जलसा

'भला किसी जगह है ये!?'

[It looks old master. Par saath hi saath modern touch bhi hai.]

'येह!!!'

वो यहाँ केवल एक शर्ट पहने और नीचे जीन्स डाले पूरा प्रेपरेड़ होक आया था.

उसके जीन्स में एक लाइटर था, साथ hi साथ वही पॉकेट नाइफ भी डाली हुई थी. और कुछ कॅश भी था.

'हैंग इन तेरे.... गोलू! तुम्हे कुछ नहीं होगा. तुमने मेरी जान दो बार बचाई... नाउ it's माय टाइम तो सेव यू.'

8 बज चुके थे...

और...

*रिंग* *रिंग*

वही अननोन नंबर देखते hi वीर ने कॉल उठाया,

वीर : में पहुँच गया हु. आगे बताओ.

वौइस् : ओह्ह्ह!? इतना कॉन्फिडेंस? ी लिखे आईटी... अंदर आओ. दरवाज़ा खुला है.

*कॉल एंड्स*

एक लम्बी सास लेते हुए वीर ने अपने धड़कते दिल को थोड़ा कलम करते हुए आगे बढ़, दरवाज़े को खोला...

*क्रियाककक*

पर अंदर आते hi...

एकदम घप्प अँधेरा था...

कुछ कदम वो चला की तभी पीछे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया.

'हँ???'

और उसकी कॉमनेस यु पल में गायब हो गयी.

*बेदुम्प*

अँधेरा इतना था की उससे कुछ नज़र नहीं आ रहा था.

पूरा काला अन्धेरा... एकदम शांत माहौल...

और तभी वीर ने अपने जेब से लाइटर निकाल उससे जलाया...

*क्लिक*

लाइटर की मद्धम आग की रौशनी से जैसे hi उससे सामने का नज़ारा नज़र आया तोह उसके रौंगटे खड़े हो गए...

सामने तोह कुछ नहीं था...

पर...

नीचे...

धेरर सारे लाल रंग के गुब्बारे डेल हुए थे. यदि ये सन किसी हॉरर मूवी का होता तोह आदमी की देख के hi पहात जाती.

और वीर तोह खुद वह उस सिचुएशन में था.

'Y-Ye...!?'

तभी अचानक...

*टक*

एकदम से किसी बटन की आवाज़ आयी और वीर के सामने लेद लाइट्स से बड़े से अक्षर जगमगा उठे...

लिखा हुआ था..

वेलकम

'????'

वो कुछ सोच पाटा की तभी...

उसके कानो में एक आवाज़ पड़ी...

*क्लैप* *क्लैप* *क्लैप*

"वेलकम! वेलकम! जलसा में तुम्हारा स्वागत है.... वीरररर!!!"

ये आवाज़ ऊपर लगे इण्टरकॉम से आयी. एक काले रंग का बॉक्स था जो बसीकली स्कूल और कॉलेजेस में क्लास्सरूम्स में लगाया जाता है अनाउंसमेंट के लिए.

वीर : ??? तुम... मेरा नाम...

वौइस् : बिलकुल! बिलकुल! में तोह तुम्हारे बारे में सब जानता हु. आखिर तुमने इतना परेशां जो किया है मुझे. इतना परेशां की मुझे तुम जैसे चूहों से खुद डील करना पद रहा है बताओ.

वीर (चिल्लाते हुए) : गोलू कहा है!???


वौइस् : शांत! उससे ढूंढ़ने तोह तुम्हे खुद आना पड़ेगा. वैसे में तुम्हे लाइटर देने वाला था पर देख के अच्छा लगा की तुम पूरे इंतज़ाम से आये हो.

वीर (फ्रोंस) : व्हाट दो यू मैं की मुझे उससे ढूंढ़ना पड़ेगा!?

वौइस् : तुम्हारा दोस्त थर्ड फ्लोर पर है. यदि बचा सकते हो तोह बचा लो... सब कुछ तुम्हारे ऊपर है... तीसरे फ्लोर पर पहुचने के लिए तीन पड़ाव पार करने है. सबसे पहले बगल में लगी लिफ्ट में जाओ. और फर्स्ट फ्लोर के लिए बटन दबाना. ध्यान रहे... No चीटिंग... पहली मंज़िल यानी पहली मंज़िल... यदि बाकी बटन्स दबायी और यदि... करंट का झटका लगने से तुम्हारी मौत हो गयी... तोह... तुम्हारा दोस्त बेचारा... हाहाहाहा~

वीर (स्क्रीम्स) : दाहाम्णणन्न ोूउऊउउउ...

वौइस् : हाहाहाहा~ यही तोह पसंद है मुझे... लोगो की तड़प, घबराहट, डर...

वीर : क्योऊ??? क्या बिगाड़ा है मेने तुम्हारा? क्यू कर रहे हो ये सब मेरी फॅमिली के साथ? में तोह तुम्हे जानता भी नहीं हु... फिर क्यूँउउउ??

वौइस् (गुस्से में) : श्याना बनता है साले!? क्लब से तू hi उस लड़की को भगा के ले गया था न? बोल!?? उस रागिनी को बचाने भी तू hi आया था न?? बोल?? और उस अंगूठी को भी तू hi छिना के लाया था न??? हाँ? अब समझ आया तुझीऐ!?? बोल!!!! हर्र वक़्त तू कही न कही मेरे प्लान के बीच में आया है. और तेरे कारण... तेरे कारण मेरे प्लान्स बिखर के रह गए... मात्र एक चूहे के कारण... सजा तोह बनती है. नहीं?

ये बात सुनते hi वीर को एक ज़ोरदार झटका लगा. और उससे जैसे अतीत याद आने लगा. जैसे उससे सब कुछ समझ में आने लगा.

'हँ? N-No वे... रागिनी भाभी... W-Wo लड़की... वो रिंग...'

[Iska matlab harr kartoot ke peeche ye aadmi ka haath tha master. Yahi hai jo hamaari family ke peeche pada hua hai. We have to take him down.]

और तभी वीर के कानो में एक जानी पहचानी सी धुन पड़ी...

जिससे सुनते hi उसके हाथ कप कपाने लगे...

इण्टरकॉम से hi वही माउथ ऑर्गन की आवाज़ आ रही थी और ये वही धुन थी जो वीर ने उस दिन क्लब में सुनी थी.

'N-Nooo... ये... ये तोह... आईटी वास् हिम!???'

ये आभास होते hi उसकी आँखें शॉक के मारे फैलती चली गयी. आखिर वो बाँदा आतिश था.

आतिश : आह्हः! वाक़ई! मेरा प्यारा माउथ ऑर्गन hi मेरे गुस्से को काबू में करता है.

वीर (शिवेर्स) : T-Tumm... तुम...

आतिश : ओह्ह्ह! मुझे जानते हो? कोई बात नहीं. और अच्छे से जान जाओगे... जैसे तुम्हारी... क्या नाम था उसका... हां! रागिनी मुझे जान गयी. आअह्ह्ह्ह! क्या सन था उस दिन... उसका रोना... उसके पति का अपनी ज़िन्दगी की भीक माँगना... क्या तोडा था मेने उस दिन उसको अंदर से...

वीर : Bh-Bhabhiii!???

आतिश : हाँ! आह्हः मज़ा आ गया था उस दिन.

मुझे लोगो का विश्वाश तोड़ने में बोहत मज़ा आता है. पता वीर!? मतलब बोहत ज़्यादा... जब... जब उनकी वो शकल बनती है न, बाद में जब उनका विश्वाश toot'ta है, और फिर वो बिना कोई आशा वाला चेहरा बनाते है न... वो... उससे देख के न... उससे देख के न... पता नहीं क्यों पर... पर मुझे बोहत ज़्यादा सुकून मिलता है. क्या गज़ब का चेहरा बनाया था उस रागिनी ने... अब तोह पूरी तरह से टूट गयी होगी... और यही तुम्हारे साथ होने वाला है... *स्माइल्स*

वीर : तुमने... तुमने ये सब किया था... ी... ी विल किल यू... में तुझे छोड़ूंगा नहीं हराम जाड़े...

आतिश : लिफ्ट में जाओ और पहला पड़ाव पार करो... ये बिलबिलाना बाद में... तुम्हारा समय शुरू होता है अब...

न चाहते हुए भी, वीर को आखिर लिफ्ट में जाना hi था.

अंदर घुसते hi लाइटर की कोई ज़रुरत नहीं थी. क्युकी लिफ्ट में लाइट्स ों थी.

लिफ्ट के अंदर सब कुछ नार्मल दिख रहा था.

इसलिए आहिस्ता से वीर अंदर गया और जैसा की बताया गया था उससे फर्स्ट फ्लोर पर जाने के लिए. वीर ने ठीक वैसा hi किया.

लिफ्ट का दरवाज़ा बंद हुआ और लिफ्ट चलना शुरू हो गयी.

पर...

आधे रस्ते में hi जैसे वो रुक सी गयी.

'There's समथिंग रॉंग... हम्म्म्म!???'

खतरे का आभास होते hi वीर की नज़र ऊपर गयी और...

*हिस्स्स्स*

एक अजीब सी गैस लीक की आवाज़ उससे सुनाई दी...

ऊपर देखा तोह पाया की ऊपर लिफ्ट में कही से गैस लीक हो रही थी.

बिना एक सेकंड गवाए...

'चेक'

[Description : Fluothane gas. Ek baar inhale karte hi behosh kar sakti hai. Common cases me vomiting, nausea, breathing problems. Worst case - Death.]

'शीट्ट्ट्ट्ट!!!!'

वीर को जैसे hi रीलीज़ हुआ की वो क्या था, मानो जैसे उसका दिल बाहर को आ गया था.

*बेदुम्प* *बेदुम्प*

दिल की तेज़्ज़ धड़कन कण्ट्रोल कर उसने ऊपर फिरसे ध्यान दिया तोह देखा...

ऊपर कुछ वायर्स गुच्छो में मौजूद थे.

[Cover your mouth master.]

पारी की सलाह सुन्न वीर ने फौरन hi मुँह पे रुमाल बाँध लिया...

तभी नीचे की फ्लोर से इण्टरकॉम से फिरसे आतिश की धीमी आवाज़ आयी,

"सही सोच रहे हो. हाहाहाहा~ उन् सारे वायर्स में से केवल 3 hi वायर है जो लिफ्ट की ऊपर लगी गैस मशीन को रोक सकते है. काम सिंपल है. सही वायर काटो, और मशीन बंद करो. वैसे इतनी जल्दी बेहोश नहीं होइगे तुम. क्युकी मेने कंसंट्रेशन उसका थोड़ा सा काम रखा है. और हां... वायर काटने के लिए... नीचे चाक़ू पड़ा है. गुड लक! हाहाहाहा~ "

वीर (स्क्रीम्स) : दामनननननन ोूउउ....

वीर ने अपनी खुद की पॉकेट नाइफ निकाली और...

'वेट! में वायर्स को चेक कर सकता हु. मुझे हर्र एक काटने की ज़रुरत नहीं है.'

[Right master!]

'चेक!... ये नहीं...'

'चेक... नॉट थिस...'

'चेक... शीट्ट्ट्ट!'

.

.

.

.

'चेक'

[Description : One of the wires of the gas machine.]

'मिल गया...'

*कट्स*

और कुछ hi पालो में वीर को तीनो वायर मिल चुके थे. जैसे hi उसने तीनो वायर काटे...

मशीन अपने आप बंद पद गयी...

हालांकि हलकी सी गैस वीर िंहले कर चूका था जिसके चलते खासी और उसके सीने में दर्द शुरू हो चूका था. यहाँ तक की उसका अब उलटी करने का भी मैं कर रहा था.

और लिफ्ट के चालु होते hi फर्स्ट फ्लोर पर पॅहुचते hi वो लिफ्ट से बाहर निकल नीचे गिर पड़ा.

अपना सीना दबाये वो तेज़्ज़ तेज़्ज़ सासें ले रहा था.

[Master! Are you okay??? Maaasteerrrr!!!]

'हह! हहहह हाहहह हाहह!!! परीई...'

*कुघ* *कुघ*

[Mein... Aap... Aap ko breathe karne me problem ho rahi hai master.]

'It's... It's okay पारी... I'm फाइन...'

[But...]

'मेने कहा न... *कुघ* I'm... I'm फाइन...'

'ी विल किल हिम... में उससे नहीं... *कुघ* नहीं चोरडूंगा... गोलू... में तुम्हे बचा के रहूँगा...'

आतिश (क्लाप्स) : मान न पड़ेगा... की तुमने मेरी उम्मीद से कही ज़्यादा अच्छा परफॉर्म किया. तोह? तैयार हो? अगले पड़ाव के लिए? सामने एक कमरा है. कमरे के बाहर एक लाल बटन है. उससे दबाओ... दरवाज़ा खुल जाएगा.

लड़खड़ाते हुए वीर बिना कुछ कहे आगे बढ़ा और बटन दबायी तोह दरवाज़ा खुल गया.

पर...

अंदर आते hi उससे एक बेहद hi भयंकर डर की अनुभूति हुई. जैसे मानो उसकी मौत आने वाली हो. उससे नहीं पता था की अगला पड़ाव उसके लिए क्या कुछ लाने वाला था. क्या वो वाक़ई गोलू को बचा पाएगा!?

.

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद!

Don't फॉरगेट तो लिखे.
 
तेरे वेरे सम ग्रम्मतिकाल मिस्टेक्स व्हिच ी हैवे करेक्टेड नाउ. िफ़ यू फंड अन्य मोरे मिस्टेक्स थें लेट में क्नोव. I'll एडिट ठोस अस वेल.
 
अपडेट - 36 ~ डेस्पेयर एंड लव

[This update contains some gore scenes. Beware!]

अब तक...

लड़खड़ाते हुए वीर बिना कुछ कहे आगे बढ़ा और बटन दबायी तोह दरवाज़ा खुल गया.

पर...

अंदर आते hi उससे एक बेहद hi भयंकर डर की अनुभूति हुई. जैसे मानो उसकी मौत आने वाली हो. उससे नहीं पता था की अगला पड़ाव उसके लिए क्या कुछ लाने वाला था. क्या वो वाक़ई गोलू को बचा पाएगा!?


अब आगे...

"हह हह हाहहहहह..."

[Master! Calm down! Saas araam araam se lijiye. Aap jitna zorr zorr se saas lenge, utna hi panic karenge aur fir behosh ho sakte ho aap.]

लिफ्ट से निकलने के बाद वीर की हालत सही तोह कही से भी नहीं थी. फ्लूयःने का कंसंट्रेशन भले hi काम था. पर शरीर के अंदर जाते hi उसके कुछ न कुछ साइड इफेक्ट्स तोह होने hi थे.

पारी की बात मान जब उसने अपनी अनियंत्रित सासो को कण्ट्रोल किया तोह कुछ पल बाद उससे थोड़ा सही महसूस हुआ.

वो आलरेडी एक नए कमरे में आ चूका था. ये कमरा अंदर से हर्र जगह सफ़ेद रंग से पता हुआ था. कमरा कहना गलत होगा. बल्कि एक बेहद बड़ा हॉल टाइप का था. पर...

पर एक hi बात थी जो बोहत hi ज़्यादा अजीब सी लग रही थी इस वक़्त. यहाँ तक की वीर खुद कन्फूसिओं में खड़ा हुआ था.

वो ये की...

ऊपर सीलिंग से धेरर साड़ी रस्सिया लटक रही थी. मतलब इतनी ज़्यादा तादाद थी उनकी की ऐसा लग रहा था मानो रस्सिया नहीं बल्कि जंगल में पेड़ से लटक रही बेल हो.

और हर्र एक रस्सी, दूसरी रस्सी से बराबर के गैप में लगी हुई थी. साथ hi साथ ऊपर सीलिंग में चौकोर खंड बने हुए थे जिनके बीचो बीच एक एक रस्सिया लगी हुई थी.

'ये सब... क्या है!?'

[Dusri paheli master! Shayad inni rassiyo se aapko kuch karna hai!?]

और पारी के बोल जैसे सही साबित हो गए.

क्युकी उसके बाद hi आतिश की आवाज़ इण्टरकॉम से एक बार फिर आयी और वीर के कानो में पड़ी,

"अब तुम सोच रहे होंगे की भला ये सब क्या है? क्या बाला है ये!? तोह बताता हु... ये साड़ी जो रस्सिया देख रहे हो, इनमे से कुछ ऐसी है जिन्हे खींचने से कुछ नहीं होगा. पर इन्ही में से कुछ ऐसी है, जिन्हे खींचने पर कुछ न कुछ होगा. अब तुम्हे इन्ही साड़ी रस्सियों में से एक रस्सी ऐसी ढूंढ़नी है जिससे खींचने से वो वह दिवार में लगा केस खुल जाए."

आतिश की बात सुन्न वीर की नज़र बगल में गयी जहा दीवार पर एक काले कलर का केस लगा हुआ था.

"उसके खुलते hi तुम्हे फिरसे एक बड़ी सी वही गोल लाल बटन मिलेगी, जिससे दबा कर तुम्हारा इस कमरे का लॉक खुल जाएगा. सिंपल है. है न!? तोह फिर शुरू हो जायो."

आतिश इस वक़्त जिधर भी बैठा हुआ था, वो कामर्स से वीर को देख पा रहा था. और इस वक़्त उसकी आवाज़ सुन्न के hi ये पता लगाया जा सकता था की वो कितना खुश था.

[Master!]

'हम्म?'

[Mujhe kuch gadbad lag rahi hai. Lift me gas leakage tha. Par yaha toh sab kuch normal lag raha hai. Aur mein nahi maanti ki ye itna simple hai.]

'तुमने ठीक कहा पारी... पर मुझे पता है मुझे क्या करना है.'

[Hmm?]

'चेक!!!!'

वीर ने एक एक कर के सीलिंग पर लगी उन् चौकोर खंडो के बीच, हर्र एक रस्सी को चेक किया. और ये करने के बाद जो रिजल्ट्स उससे मिले, उससे जानकार hi उसका दिमाग हिल गया.

कुछ खंडो के ऊपर ऐसी ऐसी चीज़े डाली हुई थी की उनके बारे में सवाल उठना स्वाभाविक था.

कुछ खंडो के ऊपर बड़ी बड़ी धेरर साड़ी ीते डाली हुई थी. कुछ के ऊपर लोहे की रोडस. तोह वही कुछ में तेज़ाब डाला हुआ था.

जैसे hi वीर को इन् चीज़ो के बारे में पता चला उसका बदन सिहर उठा, ये सोच के की यदि उसके पास आज ये चेक फंक्शन न होता और यदि उसने इनमे से किसी भी एक रस्सी को खींचा होता तोह उसका क्या होता?

मौत!

यही जवाब था बस.

रस्सी खींचते hi ऊपर का चौकोर खंड पलटने के लिए बनाया गया था. ज़ाहिर सी बात थी, की जैसे hi चौकोर पलटता, ऊपर रखा जो भी सामान होता वो सीधा आके नीचे मौजूद व्यक्ति पर गिरता.

आज वीर तीन चीज़ो से बच गया था. ीते, रोडस और सवसे खतरनाक चीज़ ~ तेज़ाब.

सोच के hi वीर के रौंगटे खड़े हो गए थे...

तेज़ाब जैसी चीज़ बन होती है और आम आदमी के पास तोह बिलकुल hi नहीं रहती. न जाने आतिश ने कहा से मंगवाया होगा. पर ये भी बात थी...

की आतिश भी कोई आम आदमी थोड़ी था.

आतिश भले hi खुश था अभी. पर इस राउंड में बाज़ी वीर ने मार ली थी.

अपने चेक फंक्शन के कारण उसने सब कुछ पहले hi पता लगा लिया था.

अब केवल वीर को एक्टिंग करनी थी.

उसने आगे बढ़ पहली रस्सी खींची, और सीलिंग का वो चौकोर हिस्सा पलट गया.

पर...

अंदर से कुछ न निकला.

ऐसे hi उसने कुछ रस्सिया खींची जिनमे से कुछ खाली थी तोह कुछ में ीते नीचे गिरी पर उनके गिरने से पहले hi वीर पीछे हट गया. क्युकी उससे पहले hi पता था की उन् सब में क्या था.

तेज़ाब वाली एक भी रस्सी वीर ने नहीं खींची. ये बोहत रिस्की था और वीर रिस्क नहीं लेना चाहता था.

वीर ने इन् रस्सियों को इसलिए खींचा था ताकि आतिश को कोई शक न हो. यदि वो पहली hi बार में सही रस्सी चुन लेता तोह ये सस्पीशियस मामला बन्न जाता. बस इसलिए उसने ढोंग किया और ऐसे hi कुछ एक दो रस्सिया खींचने लगा.

अंत में उसने वही रस्सी खींची जिसके चलते वो कला केस साइड में खुला और अंदर एक लाल बटन उससे नज़र आयी.

बटन दबाते hi दरवाज़ा खुल गया और रूम से बाहर निकल उससे दूसरी लिफ्ट भी नज़र आ गयी.

जिसके ज़रिये वो सेकंड फ्लोर पर पहुँच गया.

'तहत वास् तू इजी... गोलू... चिंता मत करना... में आ रहा हु... बस थोड़ी देरर और...'

वीर इस समय थोड़ा असमंजस में भी था. क्युकी कुछ देरर पहले जो आतिश इतना जोरर जोरर से ठहाके ले रहा था, वो एकदम से शांत सा पद गया था.

'शायद उससे नहीं लगा था की में उसका दूसरा राउंड क्लियर कर पाउँगा इतनी ैसिलय.'

[Haha~ Usse kya pata ki aap akele nahi ho. Ye Pari bhi aapke saath hai.]

***

जब वीर सेकंड फ्लोर पर पहुचा. तोह इण्टरकॉम से फिरसे आतिश की आवाज़ आयी,

"Maan'na पड़ेगा वीर. वाक़ई! तुम्हारी किस्मत के क्या कहने. पर पता है!?... में तुम्हारी इसी किस्मत को सबक सिखाऊंगा अभी. बस देखते जाओ. उस रागिनी को जैसे मेने तोडा था... वैसे hi तुम्हे तोडूंगा वीएररर.... तुम्हारा जब वो दर्रा हुआ चेहरा देखूंगा नाआ... जिसमे एक पल भी जान न बची होऊ.... जिसने जीने की इच्छा चोरर दी होऊ... वही... बस वही देखना चाहता हु में... आअह्ह्ह! तभी... तभी मुझे चेन्न मिलेगा..."

उसकी आवाज़ अचानक hi इतनी बढ़ गयी की इण्टरकॉम से साउंड फ्रीक्वेंसी ज़्यादा होने के कारण वीर को अपने कानो में हाथ लगाना पद गया.

नेक्स्ट रूम में एंटर करते hi...

उससे अपने परर पे एक अजीब सा सेंसेशन हुआ.

पर इसके पहले की वो नज़रे नीचे कर देख पाटा...

अचानक hi वो इतनी स्पीड में खींचता चला गया की उसकी कुछ समझ में hi नहीं आया. उसका परर, रस्सी के एक फंदे में फस्स चूका था. और वो रस्सी जैसे किसी पुल्लिंग मशीन से बंधी हुई थी. की वीर का परर जैसे hi उसमे आया और मशीन ने उससे खींचना शुरू कर दिया.

इस वक़्त वीर हवा में उल्टा लटका हुआ था. उसका एक परर रस्सी में बंधा हुआ था और वो दाए बाए झूल रहा था. और उसके नीचे...

पानी का बोहत बड़ा टैंक रखा हुआ था.

"दाआमंन्त्र ितत्तत्त!!!"

आतिश : वीईएएरररर!! अब तुम्हे पता चलेगा की क्या होता है मुझसे उलझना.

नेक्स्ट सेकंड hi...

अचानक hi वो रस्सी नीचे आयी और...

*सपलायआजशहहहह*

वीर को पूरा का पूरा उस पानी से भरे टैंक में डुबो दी.

"Blurrrrghhhhhh...grrrhhhh" पानी के बुलबुले वीर के मुँह से चूत रहे थे और वो किसी मछली की तरह छटपटा रहा था, जब वो पानी के बाहर आ जाती है.

[Master!!!? Hold your breath. Paani andar mat lijiye.]

कमर तक वीर अंदर hi था और फिर रस्सी ऊपर हुई और वीर पानी के बाहर निकल आया. वो तेज़्ज़ तेज़्ज़ हाफ रहा था, ख़ास रहा था, ठीक से सास लेने की कोशिश कर रहा था.

उसका पूरा शरीर कमर से ले कर सर्र तक पानी से गीला हो चूका था.

आतिश : वीर! में चाहता तोह तुम्हे कब का ख़तम कर सकता था. पर भला... उसमे मज़ा hi कहा? जो मज़ा टार्चर करने में है. वो मज़ा किसी चीज़ में नहीं. हाहाहाहा~

न जाने कितनी hi बार वीर को यु पानी में डुबोया गया होगा. पर वीर...

कुछ नहीं बोलै...

उसकी आँखों में बस क्रोध के भाव थे. एकदम लाल आँखें जो बदला लेने के लिए तड़प रही थी.

वो तैयार था. चाहे जितना भी टार्चर क्यों न कर लिया जाए उससे. एक न एक दिन वो इस आतिश को अपने खुद के हाथो से सजा देगा. उसने ये निर्णय कर लिया था.

पर अचानक hi जिस बात की वीर को बिलकुल भी उम्मीद नहीं थी वो हुआ उसके साथ.

अचानक hi उससे नीचे किया गया.

अब वो ऐसी पोजीशन पर था की वो अपना एक हाथ नीचे कंटेनर पर टिका सकता था.

और इसी का इस्तेमाल कर उसने अपने जेब से नाइफ निकाली और खुद को ऊपर कर जितने कट्स रस्सी में मार सकता था उतने मारे...

नतीजा...

वो कुछ पालो में hi फ्री था.

"जाओ... तुम मेरे टेस्ट पास हुए वीर. जाओ... इंतज़ार किसका है? वो लाल बटन दबाओ और दरवाज़ा खोल लिफ्ट में जाओ. थर्ड फ्लोर पे hi तुम्हारा दोस्त है वीर. जाओ..."

भले hi आतिश के शब्द पॉजिटिव थे. पर थे तोह आतिश के मुँह से निकले शब्द...

इतनी आसानी से कैसे विश्वाश कर लेता वीर!?

उसने सावधानी barat'te हुए वो बटन दबायी, जिसके चलते दरवाज़ा खुल गया.

और लिफ्ट का इस्तेमाल कर वो थर्ड फ्लोर पे भी पहुँच गया. कोई भी तकलीफ या कोई भी ट्रैप नहीं मिला उससे.

सब कुछ एकदम शांत था. कही कोई गड़बड़ नज़र नहीं उससे.

अब बस इस दरवाज़े के खुलते hi उससे गोलू नज़र आ जाएगा.

एक आस लिए... वीर अपने मैं में hi खुश होने लगा. भले hi उसकी जान इन् ट्रैप्स में जाते जाते बची थी. पर...

पर आज वो उन् ट्रैप्स को पार कर गोलू के पास पहुँच चूका था.

और गोलू को जल्द से जल्द चुर्राने के लिए जैसे hi वीर ने गेट खोल के सामने का नज़ारा देखा...

तोह...

वो अपने आप अपने घुटनो पर आ गिरा...

सामने का नज़ारा देख उसकी रूह काँप गयी.

"N-No...!"

उसने अपने कांपते हुए होंठो से बुदबुदाया...

आखिर ऐसा क्या था जो उससे नज़र आ गया था! रास्ते में तोह उससे कोई गड़बड़ी महसूस नहीं हुई थी. फिर ऐसा क्या था...!?

पर सामने का नज़ारा hi ऐसा था की वीर ने अपनी ज़िन्दगी में इस से ज़्यादा खौफनाक दृश्य नहीं देखा था.

उसकी नज़रे एक hi जगह पर तिकी हुई थी. वो जैसे अपनी पलके झपकना भूल गया था. भयंकर खौफनाक, डर्रावना और रूह हिला देने वाला मंज़र मौजूद था उसके सामने.

क्युकी...

सामने...

एक शीशे का बड़ा सा एक्वेरियम था. और अंदर उसमे एक मगर टेरर रहा था.

पर... बात सिर्फ यही नहीं थी.

जिस पानी में वो टेरर रहा था...

वो...

एकदम लाल होता जा रहा था. और...

वीर ने देखा की...

मगर के hi पास में...

कुछ पानी में टेरर रहा था.

और वो देख वीर की नज़रे डर के मारे फैलती चली गयी.

क्युकी...

वो कुछ और नहीं... बल्कि... एक इंसान का हाथ था.

जिसकी त्वचा के चीथड़े उड़द पानी में hi टेरर रहे थे और भयानक लाल रंग पानी में घुलता जा रहा था. वो क्या था... इस बात का अंदाजा लगाना बिलकुल भी मुश्किल नहीं था.

खून!

इंसान का खून...

"नूवो... नूवो...."

उसका बदन बोहत तेज़्ज़ कम्पन मार रहा था.

हर्र एक अंग डर के मारे हिल रहा था. और उसके बदन में हर्र जगह रोये खड़े हो चुके थे. ऐसा खौफनाक नज़ारा पहले कभी नहीं देखा था वीर ने अपनी लाइफ में.

और जैसे एक आवाज़ ने उसका डर सातवे आसमान पर पहुचा दिया...

*डिंग*

['मिशन : गेट तो गोलू अस फ़ास्ट अस पॉसिबल एंड सेव हिम.' है बीन फेल्ड.]

[Mission Fail Penalty : 100 points Deduction.]

[90 points have been deducted. 10 remaining.]

ये झटका जैसे काम था था जब अगले hi पल आतिश की बात सुन्न वीर का डर यकीन में बदल गया,

"हाहाहाहाहा~ सही सोच रहे हो वीईएएरररर... एकदम सही... यही है तुम्हारा गोलू... अरे यही है... जो अब नहीं रहा हाहाहाहा~ देख रहे हो? लाल रंग ... ाःह! अध्भुत! अपनी शकल देखो वीर... यही... यही तोह में देखना चाहता था.."

वीर की आँखों से ासु अपने आप निकल रहे थे. वो जैसे किसी सदमे में जा चूका था पर सबसे बड़ा सदमा जैसे उससे अभी लग्न बाकी था.

"वीईएएररररर!!! हाहाहाहाहा~ तुम्हे पता है? तुमने hi उससे मारा है वीर... तुमने... मेने नहीं... तुमने अपने hi दोस्त का क़त्ल कर दिया वीएररर... हाँ तुमने hi..."

वीर : !!?

आतिश : मेने कहा था न वीर... में तुम्हारी किस्मत को भी सबक सिखाऊंगा... और तुम्हे भी अंदर से तोडूंगा ... तुम्हे पता है वीर...!? वो देखो... टैंक में तुम्हे तीन गेट दिख रहे है!?

आतिश की एक्ससिटेड सी आवाज़ सुन्न वीर की लिफेलेस सी नज़रे अपने आप hi टैंक के उस हिस्से पर चली गयी...

और वाक़ई...

वह उससे तीन बड़े गेट्स नज़र आये जो टैंक के hi अंदर मौजूद थे.

आतिश : वो सारे गेट्स बंद थे वीर... वो सारे बंद थे. और तुम्हारा दोस्त एक तरफ था और गेट्स के उस तरफ मेरा पालतू मगरमच्छ 'क्लच'.

वीर : ???

आतिश : तुमने अपने दोस्त की जान लेली वीर. जब जब तुम उस लाल बटन को दबा रहे थे... तब तब यहाँ टैंक में मौजूद अंदर के ये गेट्स खुल रहे थे. तुम्हे लगा था... की तुम अपने दोस्त को बचा रहे हो... पर वीईएएरररर... तुम उन्ही हाथो से अपने दोस्त को मौत के मुँह में धकेल रहे थे. तुम अपनी खुद की जान बचाने के लिए, उस लाल बटन को जब जब दबा के आगे बढ़ रहे थे. तब तब तुम्हे नहीं पता था... की तुम अपने दोस्त को मारते जा रहे थे वीइररररर... हाहाहाहाहा~ हाँ! यहीइ.... यहीइ चेहरा मुझे देखना था वीरररर....

मानो जैसे एक बम सा फूटा वीर के सर्र और उसकी साड़ी सोचने समझने की शक्ति गायब हो गयी ये सुन्न ने के बाद...

वीर : ....

आतिश : देखु.... देखू वीरररर! कैसे... कैसे तुम्हारे दोस्त के शरीर के टुकड़े पानी में टेरर रहे है. कैसे चीथड़े उड़ा के रख दिया मेरे पालतू मगर ने... खून hi खून है वीरररर... और ये सब... तुमने अपने हाथो से किया वीर... तुमने... हाहाहाहा~ तुमने hi अपने दोस्त को मार दिया... मेने तोह कुछ न किया वीर. तुमने hi उसकी जान लेली...

वीर का दिमाग जैसे काम करना बंद कर चूका था. उसका हाल इस वक़्त शब्दों में बताने लायक नहीं था. उसका चेहरा सफ़ेद पद गया था. आँखें ऐसी जैसे मानो उनमे जान hi नहीं थी. अब न तोह उससे कुछ सुनाई दे रहा था और न hi कुछ फील हो रहा था.

जिस गोलू ने उसकी दो बार जान बचाई थी. आज उसी गोलू की जान वीर ने अपने हाथो से लेली. भला कैसे निकल पाटा वो इस ग्लानि से? इन् फीलिंग्स के लिए ग्लानि भी एक छोटा शब्द था.

वीर यहाँ ये सोच रहा था की... वो अपने पहले मित्र, गोलू को बचा रहा था. वो ये सोच रहा था की हर्र पल वो उससे बचाने में कामयाब हो रहा है. पर... पर ऐसा बिलकुल भी न था.

वो तोह उल्टा अपने उसी दोस्त को मार रहा था. ऐसी दर्दनाक मौत इंसान कभी किसी को न दे. जो मंज़र वीर ने देखा था. वो बताने में भी कहो उसके रौंगटे खड़े हो जाए. फिर वो तोह खुद एक्सपीरियंस कर रहा था. न जाने वो इस वक़्त किन्न भावो से गुज़र रहा था. ये शॉक इतना बड़ा था की बेचारी पारी भी एकदम शांत पद चुकी थी. उससे बिलकुल भी ऐसी उम्मीद नहीं थी.

तोह वो सब नीचे गुब्बारे!? किसी के मौत के जश्न के लिए थे!? वीर ने बटन्स चेक नहीं की थी. क्युकी उन् बटन्स को दबाने से दरवाज़ा खुल जा रहा था. पर उससे क्या पता था...

की जिन बटन्स को वो दबा रहा था वो साथ hi साथ टैंक में मौजूद गेट्स से भी कनेक्टेड थी. आखिर सही hi तोह कहा था आतिश ने. एक प्रकार से वीर hi तोह गोलू का हत्यारा था?

आतिश : अब हमारे मेहमान की भी खातिर दारी करि जाए...

वीर घुटनो के बल बैठे सामने अभी तक टैंक में हो रही हलचल को देख रहा था. वो इंसान की टांग जिसके मांस के न जाने कितने टुकड़े पानी में इधर से उधर हो रहे थे, वो हाथ...

ये वही हाथ था... जो गोलू ने उससे दोस्ती के लिए आगे बढ़ाया था!?

कुछ भाग ऐसे थे... जो पहचान में तक नहीं आ रहे थे.

पूरा टैंक... लहू लुहान हो चूका था एकदम.

और ये सब देख... अचानक hi वीर को उबकाई सी आयी... और उसके मुँह से उलटी बहना शुरू हो गयी.

पर जैसे आतिश को ये मंज़ूर नहीं था. क्युकी अगले hi पल, वीर के इर्द गिर्द 8 से 10 लोग इखट्टा हो गए और फिर...

उससे इतना मारा गया की अधमरी हालत में चोरर दिया.

वीर तोह पहले hi सदमे में जा चूका था. उसने एक बार भी अपने आप को डिफेंड करने की कोशिश न की. सारे हमले वो तब तक सेहत गया जब तक की वो बेहोश न हो गया.

एक दोस्त मिला था उससे...

और वीर ने अपने hi हाथो से उसकी hi जान लेली.

आदमी 1 : भौ! ये बेहोश हो गया है. क्या करना है? इससे मार दे?

आतिश : न न न न! मार देंगे तोह मज़ा hi क्या? वैसे अब मेरा काम इस से नहीं है. वो तोह बस कुछ दिनों से जलसा में कोई मनोरंजन नहीं हुआ था. और वीर की बदकिस्मती थी की वो मेरे प्लान के बीच में आ गया. नतीजा... सामने है. मौत से अच्छी सजा होती है लोगो को तड़पा के उन्हें ज़िंदा रखना.

आदमी 1 : भौ फिर?

आतिश : अक्सर हम बस यही धारणा लेके चलते है की... कुछ लोग बुरे होते है कुछ लोग अच्छे... क्यों है न?

आदमी 2 : J-Jii भौ!

आतिश : वीर की नज़रो में में बुरा था क्युकी में उसके रास्ते में आया. पर यही बात में भी तोह कह सकता हु? मेरी नज़र में वीर बुरा था क्युकी वो मेरेर रास्ते में आया!? इंसान बुरा या अच्छा नहीं होता कभी भी समझे?

आदमी 1 : समझे भौ!

आतिश : हर्र आदमी अपनी परिस्थिति के हिसाब से एक्ट करता है. अब हर्र आदमी के अपने अपने तरीके हो सकते है. वीर की किस्मत खराब थी, जो वो मेरे रास्ते के बीच आया. अब न केवल मेने उसकी किस्मत का सच उससे बता दिया बल्कि उससे अंदर से पूरा तोड़ दिया है. ज़िन्दगी भर अब वो ग्लानि की ज़िन्दगी जियेगा... हमेशा उसके मैं में यही रहेगा की वही अपने दोस्त का हत्यारा है. जाओ अब... इससे इसके घर के बाहर hi फेक आओ... अब ये किसी लायक नहीं रहा. और अब हमारा रास्ता साफ़ है.

इतना बोल आतिश कैमरा कण्ट्रोल रूम से बाहर निकल गया...

पर... उसका चेहरे पर बड़े hi गुस्से के भाव थे. और असंतुष्टि के भी.

***

पूरा एक दिन गुज़र चूका था इस घटना के बाद.

शाम का वक़्त था और मंद मंद हवाएं चल रही थी.

निधि के घर इस वक़्त निधि जूही के संग बैठ उससे पढ़ाने में लगी हुई थी.

तोह वही श्रेया आज शाम का इवनिंग स्नैक बना रही थी.

"ये मेरी कुकिंग इतनी बुरी क्यों है? ारघः! क्या लिखा है?? वेजटेबल्स को काट के सोते करो?? हम्म! लो भाई दाल दिए वेजटेबल्स..."

आज उसने जोश जोश में जूही को बोल दिया था की वो आज नूडल्स बनाएगी... और बस... शाम होते hi जूही उसके पीछे पद गयी. अब बोलै है तोह करना तोह था hi काम...

इसलिए मोहतरमा लगी हुई थी, सभी के लिए नूडल्स बनाने में.

और बाहर बैठी निधि जूही को प्यार से समझाते हुए पढ़ा रही थी.

तभी अचानक hi उसका फ़ोन बज उठा...

जब निधि ने कॉलर नाम देखा तोह वो वही स्थिर सी पद गयी और स्क्रीन पे नाम देख वो बस वही देखती रह गयी.

'वीर!?'

वीर का कॉल आ रहा था.

'इस वक़्त!? आखिर अब कैसे उससे मेरी याद आ गयी? उस दिन मंदिर में तोह... यु नाराज़ होक चला गया था? कभी मुझसे बात नहीं करता... फिर क्यों? हलाकि दिवाली पर उसने hi मुझे मैसेज किया था... फिर भी...'

अंत में वो कॉल उठा लेती है.

निधि : अब कैसे याद आ गयी तुम्हे वीर अपनी इस मैडम की?

पर दूसरी तरफ से कोई आवाज़ न आयी...

निधि : ???

वौइस् : उम्... वो... एक्चुअली... में वीर भैया की छोटी बहिन बोल रही Ma'am. I'm काव्य.

निधि : आह्हः!?

काव्य : J-Jii!

निधि (ब्लशेस) : ओह्ह no no! K-Kavya? हाँ! वीर ने मुझे बताया था बीटा आपके बारे में. K-Kaho न? क्या बात हो गयी?

काव्य : बात बोहत hi सीरियस है Ma'am.

निधि (फ्रोंस) : क्या हुआ?

काव्य : मुझे आपसे कुछ पूछना है? क्या आप और वीर भैया के बीच अच्छा रिलेशनशिप है?

निधि (ब्लशेस) : एहहहहह?? W-Whaat??

काव्य : हम्म! ी मैं... एक अच्छा रिलेशनशिप है न आप दोनों के बीच?

निधि : Y-Ye!? तुम क्या पूछ रही हो...!?

तभी काव्य की रुवासी सी आवाज़ निधि के कानो में पड़ी,

काव्य : दरअसल... कल भैया कही गए थे रात में... और... कल रात में वो... इतनी बुरी हालत में घर के बाहर मिले थे. हर्र जगह *स्निफ्फ* चोट hi चोट थी... यहाँ सभी *स्निफ्फ* इतना परेशां है... डॉक्टर को भी दिखाया... वो तोह मेडिसिन देके चले गए. पर... पर भैया किसी से बात hi नहीं कर रहे है. *स्निफ्फ* न जाने क्या हो गया है उन्हें. बस अपने रूम में सर्र झुकाये बैठे हुए है. न खाना खा रहे और न कुछ... *स्निफ्फ*

निधि : H-Huh???

काव्य : मेने आपको इसलिए फ़ोन किया है, क्युकी वीर भैया को जब घर से निकाला गया था तब वो आपके hi साथ रुके हुए थे. तोह मुझे लगा आपके और उनके बीच अच्छी खासी अंडरस्टैंडिंग होगी. शायद आपकी बात मान जाए वो? *स्निफ्फ* इसलिए मेने आपको कॉल किया है. K-Kya आप यहाँ आ सकती है? प्लीज? I-I बेग यू...

जब पूरी बात का निधि को पता चला तोह न जाने क्यों पर उससे एकदम से बेचैनी सी होने लगी.

घबराहट भी.

निधि : M-Mein अभी आती हु.

और उसने बिना कोई समय वास्ते किये, सीधा वीर के घर की ऑर्डर प्रस्थान किया.

जूही को वो श्रेया की hi निगरानी में चोरर आयी.

और जैसे hi वीर के घर पहुँच वो वीर के कमरे में दाखिल हुई.

वीर की हालत देख उसकी रूह काँप गयी. दरवाज़े की देहलीज़ पे hi उसके कदम थम गए. और एक अत्यंत hi पीड़ा और अजीब सा दर्द उसके दिल में हुआ वीर को उस हालत में देख.

निधि : V-Veeeer!??

वीर : ??

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आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद!


पसंद आये तोह लिखे कर दियो रे. 😁
 
अपडेट - 37 ~ कॉन्सोलेशन एंड स्कीम्स

अब तक...

वीर की हालत देख उसकी रूह काँप गयी. दरवाज़े की देहलीज़ पे hi उसके कदम थम गए. और एक अत्यंत hi पीड़ा और अजीब सा दर्द उसके दिल में हुआ वीर को उस हालत में देख.

निधि : V-Veeeer!??

वीर : ??


अब आगे...

कल जो कुछ भी ख़ौफनायक हादसा हुआ था, उस हादसे के बाद से ज़ाहिर सी बात थी की वीर की हालत इस वक़्त शब्दों में बया करने वाली नहीं थी.

वो अंदर से और साथ hi साथ बाहर से भी टूटा हुआ था. न केवल आतिश ने उससे अंदर से तोडा था बल्कि उसके गुंडों ने मिलके, वीर पे हाथ साफ़ करने की भी कोई कसार नहीं छोर्री थी.

उससे जैसे एक बेहद बड़ा झटका सा लगा था. अपने कमरे में ज़मीन पर पाँव सिकोड़े और अपना सर्र झुकाये बैठे हुए था वो. बीच बीच में वीर का शरीर काँप उठता और वो अपने कांपते हुए हाथ खोल उन्हें देख खुद से hi बात करने लगता...

'I-I किल्ड हिम... मेने... मेने उससे... मेने इन्ही हाथो से G-Golu को... मेने मार दिया... पारी!?? मेने... ी किल्ड हिम पारी... ी... *स्निफ्फ* ी किल्ड हिम.'

[Master! Please! I beg you! Isme aap ki koi galti nahi thi Master. Hume nahi pata tha ki hum jab jab aage badh rahe the, hum Golu ko maar rahe the. Ye sab anjaane me hua Master. Isme saari galti uss aadmi ki hai. He set that trap. M-Master... Please! Khud ko sambhaaliye... Golu ki death ka badla aap ko hi lena hai master. Aap aise haar nahi maan sakte. Wo aadmi yahi chaahta hai master. Usne Ragini ke saath bhi wahi kiya tha na... Dekha nahi aapne? Waha se aane ke baad hi uske aur Vivek ke beech kitni badi daraar aa gayi hai? Master... Aapko hi kuch karna hoga.]

'पारी... पारी... गोलू को मेने मार दिया पारी... मेने अपने hi हाथो से... उसने मेरी जान दो बार बचाई थी. और जहा मुझे उससे बचाना चाहिए था. वह... वह मेने उल्टा इन्ही हाथो से उससे मार दिया.'

[Master! No! You didn't! Aapne nahi maara hai Golu ko master. Uss aadmi ne maara hai. Aap toh ye soch ke aage badh rahe the ki hum Golu ko bachaane ke liye uske nazdeek pohuch rahe hai. Par hume kuch nahi pata tha Master.]

'सब मेरी गलती है... सब... मेने किसी का खून कर दिया पारी... मेने... I'm ा मर्डरर नाउ... *स्निफ्फ* में hi दोषी हु... सारा का सारा दोष मेरा है. हाँ! तुम... तुम सब मुझे अकेला चोरर दो... में... में अकेला hi ठीक था. चली जाओ पारी तुम भी... I'm रियली ा लोसर नाउ. एक दोस्त को नहीं बचा सका में... उल्टा उसकी hi जान ले लिया. पारी... जाओ... में कुछ नहीं हु पारी. तुम्हे इस शरीर में सब बेकार hi मिलेगा पारी... *स्निफ्फ*'

[Master! Please aisa mat kahiye. You are the best master. Aur, I cannot leave your body. Mein aapki body chorr kar jau, iske keval do hi raaste hai. Aur wo dono boht hi extreme hai. Aur mein kabhi aapse alag nahi houngi. Please! Master! Meri baat samajhne ki koshish kariye.]

'No... पारी... ी...'

वीर की मानसिक हालत इतनी खराब थी की वो पारी की बात समझने का प्रयास hi नहीं कर पा रहा था. जो झटका उससे लगा था, वो कही हद्द तक उससे अंदर से हिला के रखा हुआ था.

पारी की हर्र बात को वो इग्नोर कर खुद को दोष दिए जा रहा था, जब अचानक hi उसके कानो में एक आवाज़ पड़ी...

"V-Veer!?"

'??'

और ये आवाज़ सुनते hi वीर ने अपना सर्र हौले से उठाया.

उसके सामने निधि चिंतित सा चेहरा लिए दरवाज़े की देहलीज़ पे कड़ी हुई थी. और इतना hi नहीं, निधि के पीछे hi काव्य और आरोही भी कड़ी हुई थी.

धीरे धीरे...

निधि अपने कदम बढ़ाते हुए आगे आयी. उसके पेर्रो में बंधी पायल की आवाज़ वीर भली भाति सुन्न पा रहा था.

वो उसके समीप आके झुकी और उससे देखने लगी.

निधि वीर की वर्तमान हालत देख के hi घबराई सी हुई थी. आँखों में हलके हलके ासु थे, वो लाल हो राखी थी, और उन्ही आँखों के नीचे कालापन. जो ये बतला रहा था की वीर सोया नहीं है रात भर.

'ये!? ये क्या हालत हो राखी है वीर की!?'

निधि मैं में सोच आगे बढ़ वीर के चेहरे पर अपने हाथ ले गयी और बड़े hi हौले से उसने वीर के गालो से उन् आसुओ को पोछा.

"Ma'am!?"

उसके थार ठहराते हुए होंठो से जब वो शब्द निकले तोह निधि ने उसकी हथेली अपने हाथो में भींच ली.

निधि : ये... ये सब क्या हाल बना रखा है वीर!?

पर वीर कुछ न बोलै. उसकी आँखों से ासु निरंतर बहते चले जा रहे थे, जो निधि अपने हाथो से पोछती जा रही थी.

'कही...!? कही वीर के घरवालों ने तोह कुछ नहीं किया उसके साथ!?'

ये सोच निधि की नज़रे काव्य और आरोही की तरफ गयी और उसने थोड़ा गुस्से से उन् दोनों को देखा.

पर जब उससे लगा की काव्य ने hi तोह उससे यहाँ कॉल करके बुलाया था और साथ hi साथ दोनों बहनो के चेहरे पर जब उससे चिंता नज़र आयी तोह निधि ने ये ख़याल फौरन hi अपने मैं से निकाल दिया.

निधि : वीर!? में तुमसे कुछ पूछ रही हु. जवाब दो मेरी बात का. ये सब क्या है? क्या हुआ है?

पर वीर अभी भी कुछ नहीं बोल रहा था. यहाँ से निधि की आवाज़, तोह अंदर से पारी की आवाज़ और फिर उसके खुद के अंतर मैं की आवाज़ जो उससे दोषी ठहरा रही थी. इन् सब के चलते वो बस एक जगह बिना किसी होश के बेसुध सा देखे जा रहा था.

निधि : तुम काव्य हो न!?

काव्य : हँ? J-Jii!

निधि : कल ऐसा क्या हुआ था? जो वीर की हालत ऐसी हो गयी है? बताओ मुझे... जल्दी...

निधि के चेहरे पर चिंता देख, काव्य थोड़ी हैरान थी. पर एक बात उससे क्लियर हो चुकी थी. वो ये की उसने निधि को यहाँ बुला के एकदम सही डिसिशन लिया था.

काव्य : वो... Ma'am... में आपको पूरी बात बताती हु. दरअसल... दिवाली की नाईट में में और आरोही दी यहाँ पर आ रहे थे. तब रास्ते में hi कुछ गुंडे हमारे पीछे पद गए थे. मेने वीर भैया को कॉल करके बुलाया था और उन्होंने hi हमे बचाया था. पर उस दिन उन् लोगो ने वीर भैया को काफी चोटिल कर दिया था.

निधि : क्या?

काव्य : हम्म! और फिर कल... अचानक hi भैया बोले की उन्हें कुछ काम है और रात में hi करीब 7:30 बजे घर से निकल गए. पर... *स्निफ्फ* पर...

बोलते बोलते काव्य यु रोने लगी तोह उसकी बात को आरोही ने पूरा किया.

आरोही : पर रात में hi... कल वीर हमे घर के बाहर मिला. वीर को बोहत चोट आयी हुई थी. अभी भी उसके बदन पर चोट के निशाँ है. डॉक्टर ने ट्रीटमेंट किया और मेडिसिन देके चला गया था वो. पर उसके बाद से... वीर न तोह कुछ खा रहा है, न किसी से बात कर रहा है और कुछ बता भी नहीं रहा है. मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है ma'am. वो लोग कौन थे!? और क्यों हमारे पीछे पड़े हुए थे? और वीर कहा गया था कल जो उसकी ये हालत हो गयी? यदि आप कुछ हल निकाल सकती है तोह प्लीज...

[Master! Look! Nidhi ko aapki kitni chinta hai. Please! Listen to her.]

निधि : वीर! मेरी तरफ देखो... किधर गए थे तुम कल!? बताओ! में कुछ पूछ रही हु तुमसे वीर! मेरी बातो को यु अनसुना कर डोज!? में तुम्हारी Ma'am हु न!? बोलो!?

वो उससे थोड़ा सा हिलाते हुए पूछी पर...

वीर तोह जैसे किसी मुर्दे की तरह हो चूका था. कोई हरकत नहीं कर रहा था.

[No! No! No! This is bad... Master ka emotional state itna unstable kese...!? Yadi aisa hi chalta raha toh master pakka depression me chale jaenge. Nooooo! Mujhe kuch karna hoga...]

और अगले hi पल...

[Maaaaaassssteeeeeeerrrrrrrrr!]

'हहहहह!?'

पारी उसके अंदर इतनी जोरर से चिल्लाई जिसके चलते वीर को कुछ होश आया.

[Wo aadmi ab aapki Nidhi Ma'am ko maarega.]

ये सुनते hi वीर की आँखें फैलती चली गयी!

'हँ!? M-Ma'am?? N-Nooo...'

[Yes! Even Shreya ko... Aapki Kavya ko... Arohi too... Ragini ko... Sabko maarega wo.]

'N-Nahi... ऐसा नहीं...'

[Of course! Aur kabhi aapne zara bhi fikar kii!?]

'???'

[Ki yadi aapki Juhi ko kuch hua toh!?]

जूही का नाम सुनते hi वीर के रौंगटे खड़े हो गए. उस प्यारी सी बच्ची का खिलखिलाता चेहरा उसके मैं में आया. यदि उससे गलती से भी कुछ हुआ...

ये सोचते hi वीर इतना डर गया की उसका बदन कांपने लगा.

[Of course! He will kill them all. Kyuki aap toh yaha haath pe haath dharre baithe rahoge. Uske liye kaam asaan ho jaega. Yahi toh chaahta hai woh...]

'N-Nahiiiii... ऐसा... ऐसा कभी नहीं...'

[Bilkul hoga. Yadi aapne jald hi action nahi liya toh aisa hi hoga. Kabhi socha hai!? Ki yadi uss raat Kavya ya Arohi me se koi bhi pakdi jaati toh kya haal hota unka!? Fir aap... Apni hi behan ke hatyaare ho jaate Master. Aapki ek behan ki jaan jaati, ya dono ki hi jaa sakti thi.]

ये बात जैसे किसी भारी पत्थर की तरह आके वीर के ऊपर गिरी. और उसका पूरा अस्तित्व जैसे हिला कर रख दिया.

[Aapki ye Nidhi Ma'am! Kabhi socha hai ki wo aadmi yadi inke peeche pad jaaye toh!?]

पारी की बात सुन्न वीर ने निधि को देखा जो उससे hi चिंतित नज़रो से देख रही थी.

[You will lose her. You will lose everything. She will die.]

'N-Nahiiiiiiii'

[Bilkul! Yahi hoega! Aap sab kuch kho doge. Kaha gayi aapki wo pride? Kaha gaya aapke andar ka wo josh? Kya yu hi haar maan jaoge aap? Bhool gaye apna lakshya!? Aapko toh ek boht bada aadmi bann'na hai na? Kya hoga uss vaade ka jo aapne Juhi ko diya tha? Uske liye chocolate ki poori factory kholne waale the na aap?

Kya Nidhi jii ko uss Rajat ke changul se nahi nikaalenge aap? Bhool gaye ki abhi aapko apni saalo se bichdi Maa ko bhi dhundna hai? Kaha gaye wo saare vaade jo aapne mujh se kiye the? Kya wo sab dhong tha?

Yadi aise hi rahe aap... Toh sab kuch gawa baithoge Master. Nidhi, Shreya, Kavya... Ye sab aapke saamne maari jaengi aur aap kuch nahi kar paoge.]

'N-Nooooooo... ी don't वांट तो लूज़ हेर... ी don't वांट तो लूज़ एनीवन... में किसी को भी नहीं खोना चाहता... नूवो... ी रियली don't...'

और अगले hi पल वीर ने आगे बढ़ निधि को अपनी बाहो में भर लिया.

"आह्हः!? वीररर!?"

निधि इस हमले से थोड़ी हैरान ज़रूर थी पर जब उससे वीर का कांपता हुआ बदन महसूस हुआ और जब उससे अपने नग्न कंधे पर वीर के आसुओ का एहसास हुआ तोह निधि कुछ न बोली और उसके हाथ अपने आप hi वीर के इर्द गिर्द लेपित गए. उसने उसके सर्र के पीछे हाथ ले जा उससे थामा और अपने से लगा लगा. धीरे धीरे वो वीर की पीठ सहलाते हुए उससे शांत करने लगी.

इधर काव्य और आरोही दोनों hi हैरत के मारे ये सब देख रही थी. पर कही न कही उन्हें इस बात से ज़्यादा ख़ुशी थी की वीर ात लीस्ट अब कुछ मूवमेंट्स तोह शो कर रहा था.

[Phew! Master ka dil boht kamzor hai. Unki family ne unke saath itna bura behave kiya hai... Aaarghhh! I hate them all. Hmm? Nidhi ki favourability 56? That's good! Kavya ki...!? 78!! Ohh! And Arohi?? Huh??? 40!?? Wow! This is surprising. Master ko baad me bata dungi mein.]

'में... में उन्हें खोना नहीं चाहता... ी विल किल हिम... में... कुछ नहीं होने दूंगा किसी को... ी... ी...'

"हाहहहह हहहहह हहहह..."

और अचानक hi वीर की सासें इतनी तेज़्ज़ हो गयी की वह मौजूद सभी लड़किया घबरा गयी.

निधि : वीर??? ये... ये क्या हो रहा है...!? क्या हुआ तुम्हे?

वो लम्बी लम्बी सासें ले रहा था और अचानक hi उसने अपना सीना जोरर से हाथो से भींच लिया.

"हाआअह... हहहह"

काव्य : भाआईयाआआ

काव्य चिल्लाई तोह आरोही बिना समय गवाए भागते हुए नीचे गयी और रागिनी को बुला कर लायी.

रागिनी समेत सुमन और बाकी सभी भागती हुई आयी और वीर की हालत देख रागिनी ने कोई गलती नहीं की और सीधे hi डॉक्टर को फ़ोन लगा दिया.

डॉक्टर का घर पास में hi था और उसका क्लिनिक भी उसके घर से बगल में था तोह वह फौरन hi कुछ मिनट्स में आ गया.

***

कुछ देरर बाद...

वीर बिस्तर पर लेता हुआ था, उसकी आँखें बंद थी और शर्ट की साड़ी बटन्स खुली थी जिसके चलते उसका सारा सीना नज़र आ रहा था. शायद डॉक्टर ने अभी चेक उप किया था.

रागिनी : K...Kya हुआ था डॉक्टर वीर को?

डॉक्टर : हे वास् ह्य्पेर्बेंटिलटिंग.

काव्य : हँ???

डॉक्टर : समझाता हु... इमोशनल स्ट्रेस या इमोशनल ब्रेकडाउन, एंग्जायटी की वजह से कभी कभी आदमी पैनिक कर जाता है और लम्बी लम्बी सासें लेने लगता है और इससे हम ह्य्पेर्बेंटिलतिओं कहते है.

काव्य : ??

डॉक्टर : इंसान ऑक्सीजन को अंदर लेता है और कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर चोररटा है राइट?

काव्य : हम्म!

डॉक्टर : ह्य्पेर्बेंटिलतिओं के समय... आप जितना ऑक्सीजन अंदर नहीं लेते हो उस से ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर चौररने लगते हो, जिसके चलते कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बॉडी में काम हो जाती है और ये सिचुएशन क्रिएट हो जाती है.

काव्य : अह्ह्ह!

निधि : तोह... तोह ठीक तोह है न वीर!?

डॉक्टर : जी हां! बस थोड़ा आराम की ज़रुरत है. इन्हे रेस्ट करने दीजिये... अच्छा! रागिनी जी! अब में चलता हु. यदि फिर से कोई दिक्कत समझ आती है तोह आप कॉल कर लीजियेगा.

रागिनी : J-Jii! थैंक यू सो मच डॉक्टर!

डॉक्टर : ये तोह हमारा काम है रागिनी जी!

और इतना बोल डॉक्टर फीस लेके वह से निकल गया.

इधर वीर की खुली शर्ट देख, काव्य आगे बढ़ उन् बटन्स को बंद करने hi वाली थी जब उससे अपने बगल में अचानक hi एक हवा का झोका महसूस हुआ.

'हहहह!?'

देखा तोह पाया की...

आरोही उसके बगल से निकल आगे बढ़ी और वीर के पास जा पहुची.

अपने हाथो को आगे बढ़ा के वो वीर की शर्ट की बटन्स धीरे धीरे बंद करने लगी.

कभी बॉहे सिकोड़े वो वीर के चेहरे को देखती तोह कभी उसके सीने को जिनपर हलके हलके छोटो के निशाँ थे.

न जाने क्या चल रहा था उसके मैं में.

काव्य ने जब ये देखा तोह उसके कदम वही थम गए. पर...

होंठो पर अगले hi पल एक संतुष्टि भरी मुस्कान भी आ चुकी थी.

***

एक बड़े से घर में इस वक़्त एक कमरे में एक आदमी इधर से उधर टहल रहा था और किसी उलझन में नज़र आ रहा था.

तोह वही उसके पीछे एक सोफे पे एक और नौजवान लड़का बैठा हुआ था.

और ये टहलने वाला व्यक्ति कोई और नहीं, विवेक hi था. साथ hi साथ सोफे पर बैठा युवक उसका छोटा भाई ~ प्रांजल था.

प्रांजल : ऐसे टहलने से कुछ नहीं होगा भैया.

विवेक : तोह क्या करूऊ?? हँ?? रागिनी... एक नंबर की मुर्ख औरत है... इधर अपने पति का साथ चोरर के उधर घर में रह रही है. साला कंपनी में न जाने क्या क्या अफ़वाए फैला रहे है एम्प्लाइज. की भाग गयी होगी, उठा के ले गया कोई, तलाक हो गया... फ़क! और ऊपर से वो साला वीर भी वही है. क्या सोच के रागिनी ने उससे अपने घर में रख लिया? दिमाग ख़राब हो गया है क्या उसका?

प्रांजल : देखा जाए तोह इसमें आपकी भी थोड़ी गलती थी भैया. लड़किया बोहत hi सेंसिटिव होती है. आपने जो बात कही थी उसके चलते भाभी बोहत ज़्यादा नाराज़ है आपसे जो की बानी बात है. आपको उन्हें बेहला फुसला कर मनाना होगा तब hi कुछ होगा.

विवेक : सब कर चूका हु छोटे. यहाँ तक की माँ डैड को भी लेके गया था. पर साला वो sunn'ne को hi तैयार नहीं है. ऊपर से पता नहीं कौन सी सहेली को बुलाई है जो उसके घर में डेरा जमा के बैठी हुई है. एक बार में उसने माँ डैड और मेरी बोलती बंद कर दी थी वह...

प्रांजल : हम्म?? ओह्ह! थोड़ा समय दीजिये फिर भाभी को. पर हर्र एक दो दिन में उनसे बात करते रहना. उन्हें जताइए की आपका उनके बजर्र मैं नहीं लगता. देखना, वो जल्द hi मान जाएंगी.

विवेक : हम्म! वैसे... कुछ सोचा? प्रॉपर्टी के बारे में!?

प्रांजल : आपकी बात तै जी से हुई थी न?

विवेक : हम्म! हाँ! उन्हें प्रॉपर्टी भूमिका के लिए चाहिए ः~

प्रांजल (स्माइल्स) : बड़ा hi मस्त प्लान बना के उन्हें अपने साइड लिया था हमने है न? वीर को घर से बाहर निकलवाने में आखिर उन्होंने भी समय समय पर अपना योगदान देते हुए हमारी मदद की थी. और हमने उन्हें प्रॉपर्टी का कुछ हिस्सा देने का वादा किया था. तोह? डोज आप? उन्हें प्रॉपर्टी?

विवेक (स्माइल्स) : हाहाहा~ पागल है क्या? देने के लिए थोड़ी hi ये प्लान किया हु. एक रूपया भी न मिलने वाला उन्हें. वो तोह ऊपर से सौतेली माँ है वीर की. भला जब वीर को कुछ न मिला तोह हमारे रहते हुए ये सौतेली तै और उनकी बेटी को कहा से कुछ मिलेगा?

प्रांजल : हम्म! पर यदि उन्होंने ये राज़ खोल दिया की वीर को बाहर निकलवाने में हमारा हाथ है तोह?

विवेक (स्माइल्स) : तोह? तोह क्या... उनका मुँह कैसे बंद करवाना है उसका भी इलाज है मेरे पास... हाहाहा~

प्रांजल : वाह! वैसे... दादा जी के बारे में कुछ सोचा है? क्युकी जब वो राज़ी होंगे तभी तोह प्रॉपर्टी हमे मिलेगी भैया. और उन्होंने तोह कह के रखा है की जब तक वीर नहीं आ जाता तब तक वो कोई फैसला नहीं लेंगे.

विवेक : बस! उसी की तोह टेंशन है छोटे. कुछ समझ नहीं आ रहा.

प्रांजल : वैसे... मेरे पास एक आईडिया है. यदि आप सुनो तोह...

विवेक : केसा आईडिया?

प्रांजल : इधर आइये...

विवेक को अपने पास बुला के प्रांजल ने धीरे से अपने कुछ बोल रखे, जिससे सुन्न के विवेक एकदम से हड़बड़ा के उठ गया.

विवेक : Ch-Chote!?? ये... ये?? तू? ये बोहत ज़्यादा नहीं हो गया?

प्रांजल : सच में? यही बात आपने मुझे तब भी कही थी जब हम वीर को निकलवा रहे थे. कहिये! क्या तब ज़्यादा हुआ था? क्या किसी को पता चला? नहीं न!? फिर?

विवेक : फिर भी छोटे...

प्रांजल : इसमें जितना आप सोच रहे हो उतना रिस्क नहीं है. हां थोड़ा मामला गंभीर रहेगा बूत सलूशन इसी से निकलेगा आप देखना...

विवेक : हम्म! ठीक है फिर... यदि यही सही है तोह... याद रखना... कोई गड़बड़ नहीं...

प्रांजल : बिलकुल! इसमें मुझे आपकी मदद लगेगी.

विवेक : हम्म!

***

वाशिंगटन, यूनाइटेड स्टेट्स...

एक बड़े सी 5 स्टेट होटल में इस वक़्त एक शानदार लक्ज़री रूम में बिस्तर पर एक बेहद hi सुन्दर लड़की सो रही थी.

कुछ आहात पाते hi उसकी बॉहे सिकुड़ी और अगले hi पल वो नींद से बाहर आ गयी.





पलके झपकाते हुए वो उठी. केवल एक ब्रा और नीचे पंतय पहनी हुई थी वह.

उसने जब गौर किया की तोह देखा साइड में ड्रेसिंग टेबल के पास एक रेड हैरेड ब्यूटी कड़ी हुई थी. और ड्रेसिंग को जमा रही थी.

लड़की : हम्म? जूलिया?

उस लड़की ने पुकारा तोह वो लाल बालो वाली औरत फौरन hi पलटी और उससे देखि...

ये थी जूलिया. बिस्तर पर लेती हुई लड़की की हेड माइड. बोले तोह साड़ी मैड्स की हेड.

रुस्सियन ब्यूटी थी वह. उसके लाल बाल बड़े hi अच्छे से एक बन में बंधे हुए थे. और उसका आकर्षण hi देखने लायक था.

जूलिया : मिस! यू अरे अवेक!? (मिस! उठ गयी आप?)

लड़की : येह!

आगे बढ़ वो ड्रेसिंग के पास आयी तोह जूलिया ने फौरन hi उसके शरीर को ढकने के लिए एक निघ्त्य निकाल और उससे पीछे से पहनाने लगी.

लड़की : जूलिया?

जूलिया : यस मिस!?

लड़की : व्हाट इस लाइफ?

जूलिया : मिस! यू अरे आस्किंग में थिस क्वेश्चन फॉर थे 12तह टाइम. (मिस! ये प्रश्न आप मुझसे बारवी बार पूछ रही है.)

लड़की : जस्ट आंसर में जूलिया.

जूलिया (शिघ्स) : पीपल अरे बोर्न मिस. It's ा जर्नी. दूरिंग थिस जर्नी, थे मेक फ्रेंड्स, एस्टब्लिश रिलेशनशिप्स, थे लाफ, थे लव, थे क्राई एंड थिस गोज ों. थे मेक किड्स तो टीच थम हाउ तो लाइव एंड थें अगेन थिस गोज ों. ओने डे, वे दिए एंड एवरीथिंग वे एअर्नेड रिमेंस हेरे ओनली.

(लोगो का जन्म होता है मिस! ये एक सफर है. और इस सफर में, लोग दोस्त बनाते है, रिश्ते बनाते है, वो हस्ते है, प्यार करते है, रट है और यही चलता जाता है. वो अपनी संताने करते है और उन्हें सिखाते है की ज़िन्दगी कैसे जीते है और फिर वही चलता जाता है. एक दिन, हम मर्डर जाते है और हमने जो कुछ भी कमाया वो यही रह जाता है.)

लड़की : ....

जूलिया : वास् माय आंसर तो योर सटिस्फैक्शन? (क्या मेरा जवाब आपके लिए संतुष्टि जनक था?)

लड़की : No! ी स्टिल don't अंडरस्टैंड.

जूलिया (शिघ्स) : सॉरी! मिस!

लड़की : No! It's okay! प्रेपर थे टिया. I'll टेक ा बाथ.

जूलिया : अस यू विश मिस!

हुए वो लड़की इतना बोल नहाने चली गयी. और जूलिया केवल उससे जाता हुआ देखती रही.

'पुअर मिस! िफ़ ओनली ी कुड हेल्प हेर...'

***

मुंबई...

आउटर एरिया में स्थित एक बिल्डिंग की टॉप फ्लोर पर एक आदमी कुर्सी पर बैठा हुआ था.

की तभी उसका फ़ोन बज उठा...

आदमी : Hello?

वौइस् : कैसे हो आतिश मेरे शेर!?

जी हां! ये आतिश hi था. और फ़ोन के दूसरे तरफ से आ रही आवाज़ सुन्न वो अगले पल hi उठ के खड़ा हो गया.

आतिश : D-Dada आप!?

वौइस् : हम्म! सुनो... मेने ये बताने के लिए फ़ोन किया है, की अब तुम्हे उस लड़की के पीछा करने की कोई ज़रुरत नहीं है. में आलरेडी इंडिया आने वाला हु और वैसे भी... वो मेरा शिकार है. मेने तोह केवल तुम्हे थोड़े दिन मज़ा करने के लिए ये काम दे दिया था ः~

आतिश : ओह्ह! जैसा आप कहे दादा!

वौइस् : तोह? तुम्हारी आदत गयी या नहीं? या अभी भी लोगो के विश्वाश तोड़ने में लगे हो?

आतिश : हाहाहा~ आप तोह जानते hi हो... यही मेरा सुकून है. वाक़ई! अभी कुछ दिनों से मज़ा काफी आ रहा है.

वौइस् : हम्म! चलो! अच्छा रखता हु. मेरी फ्लाइट का टाइम हो रहा है.

आतिश : Okay दादा!

*कॉल एंड्स*

आतिश मुस्कुराते हुए अपनी हैट और हॉकी स्टिक उठाये नीचे जाने लगा.

'तुम्हारे लिए एक उपहार है...'

सोच वो नीचे चला गया.

पर...

उससे नहीं पता था. की शायद वीर को चोरर के उसने एक बोहत बड़ी गलती कर दी है. शायद अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती...

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आज के लिए इतना hi गाइस!

लिखे कर दियो रे! :बिगबॉस:

धन्यवाद!
 
अरे मेरे प्यारे टुचकुलो... :लाफिंग:

अपडेट में कितनी साड़ी हिंट्स दी गयी है. पर समझे hi नहीं जो लोग?

वो दादा जो आतिश से बात किया वो कोई और नहीं स्लोगन था. अरे उसी ने तोह आतिश को कहा था न उस क्लब वाली लड़की को पकड़ने के लिए!? तोह अब वो इंडिया आ रहा है, और उसने आतिश को रोक दिया है. वो खुद अपने टारगेट को पकड़ेगा.

जो लड़की देखि इस अपडेट में, वो कोई और नहीं क्लब वाली लड़की hi है. भूल कैसे जाते हो जो लोग? :लाफिंग:


हर्र बार उसकी शामे फेस की पिछ लगाता हु में. ऊपर से केवल उसको hi मिस कहकर बुलाते है सब. जूलिया को भी नहीं पहचान पाए!? उसकी एंट्री तोह सेकंड टाइम थी यहाँ पर. अपडेट 11 का एन्ड part फिरसे पढ़ो जाके. सब भूल जाते हो जो लोग. :स्लैप:
 
अपडेट - 38 ~ I'm नॉट थे शामे अस बिफोर

अब तक...

आतिश मुस्कुराते हुए अपनी हैट और हॉकी स्टिक उठाये नीचे जाने लगा.

'तुम्हारे लिए एक उपहार है...'

सोच वो नीचे चला गया.

पर...

उससे नहीं पता था. की शायद वीर को चोरर के उसने एक बोहत बड़ी गलती कर दी है. शायद अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती...


अब आगे...



सुबह के 10 बज रहे थे और घर में इधर ऊपर अपने कमरे में वीर सोया हुआ था. कल निधि समेत सभी उसकी हालत के चलते काफी टेंशन में थे जिसके चलते उन् सभी ने वीर को आराम hi करने दिया.

और यही कारण था की वीर अभी तक सोया हुआ था. अब जब 10 बजते hi उसकी आँख खुली तोह उसने साड़ी बातो का जायज़ा लिया और उससे समझ आया की कल वो किस स्थिति में था.

[Ab aapko kesa mehsoos ho raha hai Master!?]

बिस्तर पर बैठते hi उससे पारी की आवाज़ सुनाई दी अपने मैं में. उसने ये भी गौर किया की उसने ऊपर कुछ भी नहीं पहना हुआ था. वो पूरा शिरट्लेस्स था. शायद सुबह रागिनी ने फिरसे डॉक्टर को उसका चेक उप करवाने के लिए बुलाया था. और शायद इसलिए उसके बदन पर शर्ट नहीं थी.

'में ठीक हु, पारी!'

[Phew! Aap ko pata hai aapne kitna darra diya tha mujhe? Mujhe laga tha aap sahi ho chuke ho but fir achanak se hi aapki pulse badh gayi, saath hi saath aapki breathing bhi itni zyaada ho gayi thi ki mein boht darr gayi thi. Accha hua, Ragini ne forun hi doctor ko bula liya. Aap unconscious ho gaye the Master!]

'हम्म? भाभी ने डॉक्टर को बुलाया था!?'

[Yes! Aapki haalat dekh wo toh accha hua ki unka dimaag chala aur doctor ko turant bula liya unhone.]

'ी सी!'

वीर की नज़र जब सामने एक छोटी सी टेबल पर गयी तोह उससे कुछ जानी मानी चीज़ दिखाई दी.

वो उठ के आगे आया और उस चीज़ को अपने हाथो में लेते hi उसके होंठो पर एक हलकी सी मुस्कान बिखर गयी.

'अभी तक नहीं बदली वो...'

[Hmm?]

'निधि Ma'am के बालो में लगाने वाली क्लिप. वो हर्र वक़्त उतार के कही न कही रख देती है, और बाद में भूल जाती है. I'm सूरे ये उन्ही की है.'

[O-Ohhh!]

'वो कल यही थी न? मेरे बेहोश हो जाने के बाद क्या हुआ था, पारी!?'

[Hmm... Aapke behosh ho jaane ke baad Nidhi baaki sabhi se yahi par kaafi derr tak baatein karti rahi. Beech beech me Suman, Kavya aur Arohi aake aapko dekh jaati thi. Raat me Ragini aapko dekhne aayi thi. Uske baad se ab jaake uthe ho aap.]

'ओह्ह्ह!'

[Aap... Waqai theek ho na Master!? Even though mujhe andar se sab normal lag raha hai par pata nahi kyu I think aap thode badle badle se lag rahe ho.]

पर पारी की बात का वीर ने कोई जवाब न दिया. वो बस निधि की क्लिप लिए वह से पलट कर बिस्तर की ऑर्डर आया.

अपनी शर्ट उठायी और उससे पेहेन hi रहा था जब उसके कमरे में अचानक hi आरोही ने दस्तक दे दी.

आरोही : ??

'??'

कुछ पालो तक दोनों की hi नज़रे आपस में मिली रही. आरोही कभी उसकी आँखों में देखती तोह कभी उसके सीने को.

आरोही : वो... अब... तुम्हे होश आ गया! अब केसा लग रहा है!?

वीर : बेहतर!

वीर का जवाब सुन्न, आरोही धीरे धीरे अपने कदम बढ़ा के उसके समीप आयी और बिना कुछ कहे hi, यु नज़रे नीचे झुकाये उसके हाथ khud-ba-khud वीर के सीने की ऑर्डर बढ़ गए.

बटन्स को हाथ में ले वो उन्हें बंद करने लगी. अचानक से इस रवैय्ये में बदलाव को देख, वीर कुछ कहने के लिए हुआ, पर उसका मुँह खुलते hi बंद हो गया. वो बस यु खड़े खड़े अपनी इस बड़ी बहिन को देखता रहा, जो उस से ऐसे नज़रे चुराए उसकी शर्ट में बटन्स लगा रही थी.

क्या ये वही बहिन थी, जो घर में उस से आज तक बात करना पसंद नहीं करती थी? न कभी उसके बारे में सोचते थी. क्या ये वाक़ई वही बहिन थी?

यदि हाँ... तोह फिर आज कैसे उसकी बहिन इतनी परवाह दिखा रही थी? क्या कारण यही था बस, की वीर ने उसकी जान बचाई थी. या फिर कुछ और भी बातें थी, जिनसे वीर अनजान था?

साड़ी बटन्स लगाने की बाद आखिर कार आरोही ने अपनी नज़रे उठा के वीर को देखा और बोली,

"नाश्ता तैयार हो रहा है. तुम ब्रश कर के, फ्रेश हो के नीचे आ जाओ, जल्दी से..."

वीर : हम्म!

आरोही : और...

वीर : ??

आरोही : मुझे सब कुछ jaan'na है. कहा गए थे तुम, किस से मिलने, किसने ये हालत की तुम्हारी...

वीर (शिघ्स) : में उन्ही से मिलने गया था जो आपका पीछा कर रहे थे. या यु कहु... की उन्हें सबक सिखाने गया था. पर... वो ज़्यादा थे.

बातो को थोड़ा घुमाते हुए वीर ने आरोही को आधा सच बता दिया, जिससे सुनते hi आरोही स्तब्ध रह गयी.

आरोही : T-Tum?? वह उन् गुंडों के पीछे गए थे??

वीर : हम्म!

आरोही (स्क्रीम्स) : क्यूँउउउउउउउ!???

इस बेहेवियर की वीर को उम्मीद बिलकुल भी नहीं थी. उससे बिलकुल भी अंदाजा नहीं था की आरोही इतनी जोरर से चिल्ला के उस से ये पूछेगी. उसके चिल्लाने से सुमन बगल के कमरे से दौड़ के बाहर आयी और दोनों भाई बहनो को देख वो वही दरवाज़े पर कड़ी हो गयी.

शायद ये सही समय नहीं था बीच में दखल अंदाज़ी देने का. इसलिए, सुमन कुछ मैं में सोच पीछे हट गयी और अपने कमरे में आके कड़ी हो गयी.

वीर : चिल्ला क्यों रही हो आप?

आरोही : ी... मेरा मतलब है... तुम क्यों गए थे वह??? मुझे जवाब दो!

वीर : क्यों नहीं जाऊंगा? वो मेरे परिवार वालो के पीछे पड़े थे. हाथ पे हाथ रख के बैठा रहूँगा क्या?

आरोही : यू...

वीर : में आता हु... कुछ देरर में...

वीर पलटा और बाथरूम में जाने के लिए हुआ जब उससे फील हुआ की कोई उसकी शर्ट का निचला भाग पकडे हुए था.

आरोही, उसकी शर्ट पकड़ धीरे से आगे बढ़ी और इस बार थोड़ी thar-tharaati सी आवाज़ में बोली,

"W-Wahi पूछ रही हु में... में कबसे... तुम्हारा परिवार...!?"

वीर : आँखों के सामने जब कुछ गलत हो रहा हो... तोह आप भले hi उससे नज़र अंदाज़ कर दो... पर में कभी नहीं करता...

उसके हर्र एक शब्द किसी खंजर के भाति आरोही के दिल में चुभ रहे थे और हर्र गुज़रते पल उससे चोटिल कर रहे थे.

वो भली भाति समझ गयी थी की वीर किस विषय की बात कर रहा था. यही की...

कैसे वो शुरू से वीर पे हो रहे हर्र एक अन्याय को देखती आयी, हर्र एक अपराध को देखती आयी पर हर्र बार उसने वीर को नज़रअंदाज़ कर अपना मुँह फेर्रा था. और यहाँ आज...

वीर ने एक बार क्या उससे मुसीबत में देखा...

वो उससे बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में दाल दिया.

कितना अंतर था.

शायद अब, आरोही को पूरी तरह समझ आ चूका था. क्युकी अगले hi पल उसकी आँखों से ासु जो बहने लगे.

वो आगे बढ़ी और वीर को पीछे से hi उसने अपनी बाहो में भर लिया. उसकी पीठ में वो अपना चेहरा छुपाये बिना कोई आवाज़ किये बस रोटी रही.

जब वो शांत हुई तोह वीर पीछे मुड़े बिना hi बाथरूम में चला गया. और इधर आरोही उससे बस जाता देखती रही.

***

कुछ देरर बाद hi सभी डाइनिंग टेबल पर बैठ के नाश्ता कर रहे थे. वीर से सभी ने उसकी हालत के बारे में पूछा तोह उसने सभी को यही बताया की अब वो बेहतर है.

वीर : तुम लोग घर नहीं गयी, काव्य!?

काव्य : हम्म? भैया! चले जाएंगे! क्या ये हमारा घर नहीं? क्यों भाभी?

रागिनी : अरे अरे... क्यों नहीं है? ये तुम्हारा hi घर है. जब तक रहना है रहो.

काव्य : सुन्न लिया न भैया? हहै~

वीर (स्माइल्स) : हम्म! सुना...

[Master! Aap ekdum se itne normal...!? Mujhe aisa kyu lag raha hai aap boht badal gaye ho?]

'उस आदमी ने... में भुला नहीं हु... उसने मेरे साथ क्या किया है... गोलू के साथ... हे विल पाय फॉर तहत. और मेरी फर्स्ट प्रायोरिटी वही है...'

वीर अपनी सोच में डूब गया. तभी आरोही की आवाज़ उससे होश में लायी...

आरोही : उम्... भाभी... आप कब तक यहाँ रहने वाली हो? वो... विवेक भैया घर पे काफी...

अपने पति का नाम सुनते hi रागिनी की नज़रे नीचे झुक गयी और उसने अपना चेहरा भी फेरर लिया.

काव्य : आरोही दी... ी don't थिंक हमे इस बारे में कुछ कहना चाहिए. भाभी का पर्सनल मटर है वो. भाभी को हमे स्पेस देना चाहिए...

आरोही : अहह! राइट! T-Tum ठीक कह रही हो काव्य... I'm सॉरी भाभी... में बस क्यूरियस थी... इसलिए आप से पूछा... क्युकी... घर में रोज़ hi आपको और भैया को लेकर टॉपिक चिढ़ता hi है.

रागिनी : कोई बात नहीं आरोही... में बस... मुझे समय चाहिए.

आरोही : आप... आप वापस तोह आएंगी न?

काव्य : हँ? K-Kya मतलब दी? वापस क्यों नहीं आएंगी? भाभी? आप क्या वाक़ई में...!? No! आप ऐसे...

रागिनी : में... अभी कुछ नहीं कह सकती काव्य! मेने कहा न... मुझे समय चाहिए और...

काव्य : O-Okay भाभी!

काव्य और आरोही ये जान के काफी दुविधा में थी की शायद अब उनकी भाभी रागिनी कही घर न लौटे. उन् दोनों का hi रागिनी से अच्छा रिलेशनशिप था, जिसके चलते वो दोनों hi कभी भी रागिनी से अलग नहीं होना चाहेंगी.

इधर रागिनी भी अपने विचारो में लीं थी जब उससे अपने हाथ पर किसी की हथेली महसूस हुई.

देखा तोह पाया की...

उसके बगल में बैठा वीर उसका हाथ थामे हुए था.

रागिनी : हँ!?

वीर : Don't वोर्री! हम सब आपके साथ है. आप इत्मीनान से अपना फैसला लीजिये.

कुछ हो न हो, पर वीर की बात सुन्न के रागिनी का मैं ज़रूर खुश हो गया था. उसके चिंतित चेहरे पर अगले hi पल एक स्माइल आ गयी और उसने हौले से हां में सर्र हिलाया.

***

Nidhi's अपार्टमेंट...

इस वक़्त, निधि बाहर से कुछ सामान ले कर अपने फ्लैट की ऑर्डर जा रही थी.

आज सैटरडे था तोह आज निधि ने छुट्टी ली हुई थी. वैसे भी सैटरडे को कॉलेज में बच्चे बोहत hi काम आते थे.

वो एक छोटी सी थैली लिए अभी अपने फ्लैट का दूर खोलने hi वाली थी जब उसके पीछे से एक बड़ी hi परिचित सी आवाज़ आयी और उसका बदन सिहर उठा...

"Ma'am!??"

वो फौरन पलटी...

तोह देखा की... वीर उसके सामने खड़ा था.

निधि : वीररर!?

वीर : हम्म! आज आप... कॉलेज नहीं गयी!?

निधि : N-Nahi... पर वो सब चोर्रो... तुम... तुम ठीक हो न अब!? और वो सब क्या...

उसने आगे हाथ बढ़ा के वीर के गाल पर रखा पर अगले hi पल जैसे उससे कुछ ध्यान आया और उसने अपना हाथ पीछे खींच लिया.

वीर : Don't वोर्री! में ठीक हु...

निधि : O-Ohhh! तोह... अंदर आओ न...

वो पलटी, इस आस में की वीर भी अंदर आएगा पर...

मुड़ते hi उससे अपनी गर्दन के पास वीर के चेहरे का आभास हुआ.

और अगले hi पल...

"मुझे कुछ ज़रूरी काम है. बाद में ज़रूर आऊंगा..."

वीर की गरम गरम सासें निधि को अपनी नग्न गर्दन पर महसूस हुई और अचानक hi उसकी धड़कने तेज़्ज़ हो गयी.

पर जैसे इतना काफी नहीं था, जब अगले पल hi उससे फील हुआ की उसके बालों को वीर छी रहा है.

"ाःह!?"

उसका बदन एक झटका मारा, क्युकी उसके बाल वीर के हाथो में थे.

निधि के बालो को मोड़ वीर ने दूसरे हाथ से वो क्लिप उसके बालो में लगाई और फिरसे उसके कान के समीप आया और कहा,

"मेरा कभी भी आपको हर्ट करने का इरादा नहीं रहता ma'am. फिर भी... यदि be-iraada मुझसे कुछ खटाये हुई हो... तोह उन्हें मेरी नादानी समझ के इग्नोर कर दीजियेगा प्लीज... आफ्टर आल, ी don't वांट तो लूज़ यू."

और नेक्स्ट सेकंड hi... निधि की आँखें फैलती चली गयी जब पीछे से वीर ने उससे जोरर से अपनी बाहो में जकड लिया.

निधि कहना तोह बोहत साड़ी बाते चाहती थी पर वीर के इस एक जेस्चर ने जैसे उसकी बोलती बंद कर दी थी.

निधि : V...Veer!?

उसने अपनी नज़रे टेढ़ी कर वीर को देखने का प्रयास किया पर कोई और उसकी नज़रो में आ गया.

बगल के फ्लैट की औरत उससे और वीर को बड़ी hi अजीब निगाहो से देख रही थी.

और ये देखते hi निधि एकदम से हड़बड़ा गयी और वीर के हाथो को उसने अपने पेट से जल्दी से हटा दिया और उसकी तरफ घूम गयी.

भले hi वीर का उससे यु इस तरह हुग करना बुरा नहीं लगा था. पर आखिर वो जिस जगह खड़े थे, उस बात का ध्यान रखना ज़रूरी था. न जाने बगल वाली औरत क्या सोच रही होगी. यदि उसने लैंडलॉर्ड को गलत सलत कंप्लेंट कर दी तोह? और इन्ही सब बातो को सोच उससे मजबूरन वीर का हाथ इस क़दर हटाना पड़ा.

निधि : W-Wo... तुम...

किन्तु शायद वीर ने निधि के इस जेस्चर को अलग वे में ले लिया था. उससे महसूस हुआ जैसे निधि उसके टच से उनकंफर्टबले फील कर रही थी.

और ये आभास होते hi वीर झटके से 2 कदम पीछे हो गया.

वीर : अहह! राइट! I'm रियली सॉरी... में भी न... ः~ रियली... रियली सॉरी... मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. बेवक़ूफ़ हु में भी... में चलता हु... आप... आप अपना काम करिये...

और बिना कोई जवाब सुने hi, वीर जल्दबाज़ी में वह से मुदा और तेज़्ज़ कदमो के साथ लिफ्ट की ऑर्डर चल दिया.

निधि : N-Nooo! वीएररर!

निधि ने थोड़ी तेज़्ज़ आवाज़ में पुकारा, पर तब तक वीर काफी आगे जा चूका था.

वो इसी वक़्त वीर के पास जाके उससे रोकना चाहती थी पर जैसे... उसके बगल के फ्लैट में कड़ी वो औरत की शंका जनक नज़रे ऐसा करने से रोक रही थी.

और न चाहते हुए भी, निधि अपने फ्लैट का दूर खोल अंदर चली गयी.

***

क्सक्सक्सक्सक्सक्सक्सक्स होटल...

टाइम - 2:15 पं

लंच का समय था और होटल में इस वक़्त हलकी हलकी आवाज़ में गाने बज रहे थे और कुछ कपल्स अपना लंच एन्जॉय कर रहे थे.

और उन्ही कपल्स वाले एरिया में एक टेबल पर एक औरत और एक लड़का बैठा हुआ था.

ये लड़का कोई और नहीं, अपना वीर hi था.

और उसके सामने बैठी हुई ये महिला सोनिआ की बड़ी बहिन सुहाना थी.

वीर : मुझे समझ जाना चाहिए था की आप इसी होटल में मुझे बुलाओगी...

ये होटल पिछली बार की तरह, वही होटल थी. यानी की उसकी सौतेली माँ एयर बहिन की होटल.

सुहाना : वेल! ः~ ऑफ़ कोर्स! इतनी अच्छी ओप्पोर्तुनिटी कैसे चोरर सकती हु में? जब से सोनू ने मुझे बताया है की ये तुम्हारी स्टेप माँ की होटल है, तब से hi में तुम्हारा और उनके बीच का इंटरेक्शन देखना चाहती थी.

वीर : जले पे नमक छिड़कना हाँ!?

सुहाना (स्माइल्स) : हम्म! तोह बोलो... क्यों मिलना चाहते हो तुम मुझसे!?

वीर अगले hi पल सीरियस हो गया... और टेबल पर अपने दोनों हाथ रख थोड़ा आगे बढ़ते हुए बोलै,

वीर : ी कैन फिनिश योर प्रॉब्लम.

सुहाना : हँ!?

वीर : सर्र पर हैट pehan'ne वाला व्यक्ति, वही जो माउथ ऑर्गन बजाता है, जो आपकी प्यारी बहिन के पीछे पड़ा हुआ है, वही जिस से पुलिस तक दरर्ति है... उस प्रॉब्लम की बात कर रहा हु में. ी कैन फिनिश हिम.

वीर के बोल सुनते hi सुहाना को जैसे मानो 440 वाल्ट का झटका लगा था. वो फटी आँखों से वीर को घूरे जा रही थी.

और अगले hi पल उसने आगे बढ़ वीर के मुँह पे अपना हाथ रख दिया.

सुहाना : Y-Ye...!? हु टोल्ड यू??? तुम्हे इस बारे में कैसे पता है!? बोलो?

वीर (सुहाना का हाथ हटाते हुए) : क्युकी में भी उसके हमलो का विक्टिम हु. और उसने मुझसे कुछ छीना है.

सुहाना : तुम्हे कैसे पता की में इस सब के बारे में जानती हु!?

सुहाना की बात सुन्न वीर के होंठों पे एक मुस्कान आ गयी.

जब वीर उस दिन सुहाना के घर से उससे रिंग दे कर वापस लौट रहा था, तब उसने सुहाना को चेक करना नहीं भुला था.

और चेक करते hi उससे एक सच के बारे में पता चला था...

की सुहाना जो दिखती थी, वो थी नहीं.

[Name - Suhana

Age - 29

Bio - Suhana! Ek split personality waali aurat hai. Chanchal, ghamandi, confident behaviour wo saamne se dikhaati hai par sabhi se chhipi ek aur personality hai uski, jo ki timid, cutesy, caring aur loving nature se bhari hui hai. Suhana ka husband IT company ka C.E.O hai. Aur iske alawa Suhana ke kayi contacts hai jinhe wo apne husband se chhipa ke rakhti hai. Police, CBI, Forensic department me bhi Suhana ki kaafi pehchan hai. Apni family se boht pyaar karti hai. Khaas kar apni behan Sonia se.

Favourability : 38

Relationship : Familiar one.]

जबसे वीर ने सुहाना का बायो पढ़ा था. तब से hi उसने ये अनुमान लगा लिया था की सुहाना शायद उसके बोहत काम आ सकती थी.

सुहाना : में कुछ पूछ रही हु तुमसे... बोलो? किसने बताया तुम्हे इन् सब के बारे में?

वीर : ी जस्ट गेस्सेड. मुझे लगा की आप अपनी बहिन की इतनी फ़िक़र करती है तोह ऑब्वियस्ली आप जैसी स्मार्ट बहिन हर्र तरफ से अपनी छोटी बहिन को प्रोटेक्ट करेगी hi... है न?

सुहाना (नॉड्स) : हम्म! हम्म! ये तोह तुमने ठीक कहा वैसे... स्मार्ट तोह में हु... हहै~

वेट! Don't चेंज थे क्वेश्चन... ये बताओ... की... तुमने जो अभी अभी कहा... की... यू विल फिनिश हिम... उसका क्या मतलब है.

वीर : ....

सुहाना : ....

वीर : ी विल किल हिम.

सुहाना : ??

कुछ देरर तक मानो सुहाना को कुछ सुनाई hi नहीं दिया. वो भूत बने वीर को देख रही थी. जैसे मानो वीर ने कोई चुटकुला मारा हो..

सुहाना : K-Kya कहा तुमने?

वीर : वही जो आपने सुना. प्रॉब्लम वो आदमी है. में उस प्रॉब्लम को hi मिटा दूंगा.

सुहाना : कह दो की तुम जोके मार रहे हो?

वीर : I'm सीरियस!

सुहाना : व्हाट थे फुसक्कक्कककककक!!!?

और वो चिल्लाते हुए अपनी जगह से कड़ी हो गयी.

आस पास के सभी लोग उससे घूर के देख रहे थे.

सिचुएशन को समझ वो वापस अपनी चेयर पर बैठी और वीर को इस बार चिंतित नज़रो से देखि.

सुहाना : D-Dekho वीर! थिस इस नॉट ा जोके okay!? वो आदमी का नाम है आतिश. हलाकि मेने उसपे नज़र रखवाई हुई है और में ये भी जानती हु की वो मेरी बहिन के पीछे पड़ा हुआ है. एक मिनट, तुम्हे कैसे पता चला वो मेरी बहिन के पीछे पड़ा हुआ है?

वीर : सोनिआ जी ने मुझे खुद बताया था. की कोई है, जो उन्हें मारना चाहता है. ी जस्ट गेस्सेड. थैंक्स फॉर टेलिंग में हिज नाम..

आतिश हाँ...!?

सुहाना : वेट! तोह तुन्हे अभी तक उसका नाम भी नहीं पता था!?? मतलब जब से तुम बस तुक्का मार रहे थे!??

वीर : येह!

सुहाना : उग्गहह!

सुहाना इस से पहले कुछ और बोलती...

की तभी वीर के कानो में एक काफी फेमिलिअर सी आवाज़ पड़ी.

"अरे!? सुहाना जी आप!?"

सुहाना : O-Ohhh! िफ़ आईटी isn't थे ओनर ऑफ़ थे होटल...!?? *स्माइल्स*

सामने से आ रही एक काली साड़ी पहने हुए कोई और नहीं बल्कि उसकी स्टेपमॉम थी ~ श्वेता.

जैसे hi श्वेता की नज़रे वीर पर गयी वो हैरानी और शॉक के मारे वही जैम गयी.

पर अगले hi पल उसने अपने चेहरे से वो भाव हटाए और सुहाना के नज़दीक आके उस से बोली,

श्वेता : एंड who's थिस जेंटलमैन?

[What the hell? I will kill her. Wo aisa kese keh sakti hai? Sab kuch jaante hue bhi... Dekho toh master... Aaarrrghhh! I hate her... I hate her...]

'मेरे अपने hi मुझसे अजनबी पेश आते है, पारी. इसमें कोई नयी बात नहीं है. अब तोह आदत सी हो गयी है.'

[Maaasteeerr!!!]

सुहाना : क्या आप अपने hi बेटे को नहीं जानती मिस श्वेता?

सुहाना के इस प्रश्न के लिए श्वेता बिलकुल भी तैयार नहीं थी. उससे नहीं लगा था... की सुहाना डायरेक्टली इतना बड़ा सच उसके सामने रख देगी.

श्वेता : बीटा!? मिस सुहाना! ी डोंट हैवे अन्य सोन. मेरी एक hi डॉटर है. वही मेरा सब कुछ है. भूमिका!

पल भर के लिए, सुहाना की भी बॉहे सिकुड़ गयी. क्या मोती चमड़ी लेके पैदा हुई थी ये श्वेता. इस वक़्त सुहाना वाक़ई यही सोच रही थी. और इस बार अब थोड़ा तरस भी आ रहा था उससे वीर के ऊपर. उसने तोह बस हल्का सा मज़ाक करने के लिए वीर को इस होटल में बुलाया था. पर अब जब उसने अपनी आँखों से ये व्यवहार देखा...

तोह उससे ये बिलकुल भी पसंद न आया.

उसने खीजते हुए वीर का हाथ थामा और श्वेता की तरफ मुड़ी,

"चलती हु..."

श्वेता : जी! आती रहना मिस! एंड प्लीज सोनिआ ma'am को भी अपने साथ लाना मत भूलना. शी लव्स आवर कॉफ़ी आफ्टर आल...

सुहाना : चलो वीर...

वीर को यु खींचते हुए वो अपनी गाडी में ले गयी.

और इधर अंदर से श्वेता केवक मुस्कुराते हुए देखती रही. पर दोनों के जाते hi उसकी मुस्कराहट गायब हो गयी. और वो तेज़्ज़ कदमो के साथ अंदर केबिन में घुस गयी.

इधर वीर के हाथ सुहाना की गिरफ्त में थे इस वक़्त...

वीर : वेट!!!

सुहाना : घर चलो... वही बात करेंगे हम. और ये तुम्हारी स्टेपमॉम... व्हाट थे हेलल इस रॉंग विथ हेर?? हाँ?

वीर : ???

सुहाना : गॉड दमन! शी पिस्सेद में ऑफ. मुँह पे कैसे कह सकती है वो तुम्हारे की वो तुम्हे नहीं जानती?

वीर : ....

सुहाना : उग्गहह! अन्य्वयस! घर चलो...

***

पुलिस स्टेशन...

अफसर : देखिये! में लौटा तोह दू... पर क्या वाक़ई!?

सुहाना : क्या मुझे वाक़ई सारे प्रूफ लाने पड़ेंगे अफसर? इतनी छोटी सी बात है ये मेरे लिए. फिर भी में यहाँ आयी हु. ऑब्वियस्ली बात सच होगी इसलिए में यहाँ हु... है न?

अफसर : J-Jii! मैडम! में आपकी बात समझता हु. में बस एक बार पूरी तरीके से क्लैरिफिकेशन मांग रहा था.

वीर : जी हां! वो मेरी hi है. बिल होता तोह ज़रूर में आपको दिखा देता. ट्रस्ट में.

अफसर : ुघ्घ! अच्छा चलिए ठीक है. गुप्ता जी!??

गुप्ता : जी! साब!?

अफसर : इन्हे वो देके अलग करिये... लॉक हटा दीजिये...

गुप्ता : J-Jii! सर!

और कुछ hi पालो बाद, वीर अपने घर पर था.

उसके घर के सामने सुहाना अपनी कार के पास कड़ी हुई थी.

सुहाना : ी हैवे एग्रीड! पर... ये बात सोनू को कभी पता नहीं चलना चाहिए वर्ण वो मेरी जान खा जाएगी.

वीर : हम्म!

सुहाना : और... तुम... You'll बे फाइन राइट? अभी भी समय है... चाहो तोह...

वीर : No! मेरा इरादा पक्का है.

सुहाना : O-Okay! में चलती हु... जस्ट कॉल में िफ़ यू नीड अन्य हेल्प.

वीर : हम्म! थैंक्स!

सुहाना : थैंक्स अपनी बात को पूरा साबित करने के बाद कहना... गुडबाय!

और सुहाना वह से चली गयी...

वीर उसके जाते hi अपने बगल में राखी एक चीज़ को देखने लगा और उस पर हाथ धीरे से रखा उसने...

'कल... ी प्रॉमिस... ी विल टेक हिम डाउन...'

उसने मैं में थाना, और उससे चीज़ को जोरर से भींच लिया.

और वो चीज़ थी...

गोलू की साइकिल...

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आज के लिए इतना hi गाइस!

धन्यवाद!

लिखे कर के जइयो!

 
Today's अपडेट विल कॉन्टैन एक्सट्रीम गोर सीन्स. सो बे प्रेपरेड़.
 
मेगा अपडेट

अपडेट - 39 ~ ा Mother's लव विल ऑलवेज बे इटरनल

[This update contains explicit gore scenes. Beware!]


अब तक...

वीर उसके जाते hi अपने बगल में राखी एक चीज़ को देखने लगा और उस पर हाथ धीरे से रखा उसने...

'कल... ी प्रॉमिस... ी विल टेक हिम डाउन...'

उसने मैं में थाना, और उससे चीज़ को जोरर से भींच लिया.

और वो चीज़ थी...

गोलू की साइकिल...


अब आगे...

वो महीना था मार्च का. जब ठण्ड का मौसम जा रहा था और गर्मियों का मौसम आना शुरू हो चूका था. में अपनी माँ की गॉड में सर्र रख के लेता हुआ था.

बड़े hi प्यार से वो अपना एक पाँव झूला रही थी ताकि मुझे नींद जल्दी आ जाए, पर आज जैसे मुझे नींद आ hi नहीं रही थी.

में और माँ घर के अंदर hi नीचे ज़मीन पर चटाई बिछाये बैठे थे. या यु कहु, की माँ बैठी थी और में लेता हुआ था. घर कहना भी गलत होगा. एक छोटा सा हिस्सा था चार दीवारों का जिसमे ऊपर से खप्पर की छत थी और दरवाज़े के नाम पे बस एक टूटा फूटा लकड़ी का दरवाज़ा.

"आई!?"

मेरे पुकारने पर मेरी आई ने मुझे झुकते हुए देखा और बोली,

"तू अभी तक सोया नहीं आशु?"

"नहीं आई! मुझे नींद hi नहीं आ रही है."

"अच्छा? और क्यों नहीं आ रही है मेरे लल्ला को नींद?"

"आई! में ये सोच रहा था, कल हमारे घर वो 3-4 पुलिस वाले क्यों आये थे?"

मेरे ये सवाल करते hi मेने देखा की आई के चेहरे पर अगले hi पल चिंता आ गयी और वो किसी सोच में पद गयी.

"आई?"

"H-Huh?? कुछ नहीं लल्ला. तू अपने खेल कूद और पढ़ाई पर ध्यान दिया कर समझा?"

आई ने थोड़ा ुचि आवाज़ में बोलै तोह में शांत हो गया. स्कूल तोह नाम मात्र का था. हम सभी बच्चे जाते, टीचर आता या नहीं आता बात एक hi थी. केवल उन्ही के ऊपर ध्यान ज़्यादा देते थे टीचर जिनके बाप के पास पैसा ज़्यादा होता था.

मेरे बाबा तोह बड़ी मुश्किल से मेरी स्कूल फीस दे पाते थे. अभी में बाबा के hi बारे में सोच रहा था की उतने में घर का दरवाज़ा खुला और बाबा अंदर आ गए.

"बबआ!"

में उठा और बाबा से लिपट गया.

"हाहाहाहा~ मेरा बीटा!! आज तेरे लिए तोहफा लाया हु. वही जिसके बारे में तू रोज़ चर्चा किया करता था."

मेने बाबा को प्रश्न भरी नज़रो से देखा तोह उन्होंने मुझे थोड़ा दूर करते हुए अपने पीछे से एक झोला निकाला और उससे जैसे hi खोला तोह मेरी आँखें हैरानी और ख़ुशी दोनों के मारे फैलती चली गयी.

"Y-Ye तोह..."

"हाहाहाहा~ ये रहा तुम्हारा तोहफा."

"मेरा तोह्फाआ..."

में चिल्लाते हुए उस पर झपटा. और क्यों नहीं झपटता? सामने मेरे एक हॉकी स्टिक मौजूद थी. रोज़ में मैदान में खेलने जाता था. वह हम सभी हॉकी खेलते थे. कुछ लोगो के पास हॉकी स्टिक थी तोह कुछ बस लकड़ियों से अपना काम चलाते थे.

रोज़ में बाबा को इस बारे में बताता था और वो मेरी बात सुनके सर्र हिला देते थे. पर मुझे नहीं पता था की वो मेरी बात को ऐसे hi पूरा कर देंगे. आज में बोहत खुश था. कितनी चमक रही थी मेरी हॉकी स्टिक. कल जब में अपने दोस्तों को दिखाऊंगा तोह कितना जलेंगे सभी.

वैसे तोह यदि आप अच्छा खेलो तोह प्रदेश स्टारर पर खेलने का भी मौका दिया जाता था. पर ये मौका केवल 18 उम्र से ऊपर वालो के लिए था. और मुझे 18 का होने में अभी 5 साल बाकी थे.

"इतना खर्चा? क्यों??? आप जानते है हम वैसे hi कितनी परेशानी में है फिर भी?"

आई ने चिंतित नज़रो से बाबा को देखते हुए कहा.

"अरे ठीक है अब... कब से लगा हुआ था वो... कभी कभी चलता है."

"कभी कभी...? अरे घर की स्थिति का भी तोह ध्यान रखिये."

"में सब ध्यान रख रहा हु मेरी प्रिये. तुम्ही बताओ... क्या मेने तुमलोगो के अलावा कभी किसी और बारे में सोचा है?"

"अब... अब आप ऐसा बोलेंगे तोह में क्या hi वरोध कर पाऊँगी?"

"हाहाहा~ तुम चिंता मत करो. सब सही हो जाएगा."

न जाने आई बाबा क्या बात कर रहे थे पर में इतना तोह जानता था की हमारे घर की आर्थिक स्थिति बोहत कमज़ोर थी.

"आई! तुम्हारी क्या ख्वाइश है?"

मेने अपनी हॉकी को रखते हुए पूछा. तोह आई मुस्कुरायी और बगल में रखे एक छोटे से लकड़ी के बने मंदिर को देखने लगी.

"मेरी ख्वाइश? मेरी ख्वाइश तोह बस यही है की तू एक बोहत बड़ा आदमी बने. और ये जो मंदिर है न... में इससे पूरी चांदी का बनवाना चाहती हु. पर वो तभी मुमकिन होगा जब तू बड़ा आदमी बनेगा समझा?"

"हम्म्म!"

"जा अब सो जा."

न चाहते हुए भी, मुझे लेटना पड़ा. पर नींद तोह आज जैसे मेरी आँखों से कोसो दूर थी. में करवट लेके लेता हुआ था काफी देरर से और इसलिए शायद आई बाबा को लगा की में सो गया हु.

और वो बातें करने लगे. पर में जाग रहा था. और इसी कारण मुझे कई साड़ी बातें पता चली जो वैसे मुझे कभी नहीं पता थी.

"आज आप को इतना महंगा तोहफा लाने की क्या ज़रुरत थी वाक़ई..."

"तुम अभी भी उसके पीछे लगी हो. अरे बच्चा है. और वो मेने अपनी जमा पूंजी से लिया है उसके लिए."

"यदि कोई किताब लाके देते तोह भी कोई बात होती..."

"खेल से भी आदमी बड़ा आदमी बन सकता है. और आशु को खेल में रूचि है तोह हमे तोह उससे उस तरफ बढ़ावा देना hi चाहिए न?"

"आपके सामने मेरी एक न चलती. अच्छा वो... फिर क्या हुआ? हमारी ज़मीन का? मुझे बोहत चिंता हो रही है. यदि वो हमारे हाथ से गयी, तोह क्या होगा हमारा?"

"हम्म! उस कमीने ने छल से हमारी ज़मीन के कागज़ात चोरी करवाए है. और अब हमे कैसे भी करके उन्हें वापस लेना है."

"वही पूछ रही हु आप से. कल पुलिस वाले भी आये थे. कितनी धमकी देके गए हमे. सब मिले हुए है. ऊपर से... ऊपर से मुझे तोह उन् पुलिस वालो के इरादे बिलकुल ठीक न लग रहे..."

"क्या कहती हो? क्या कल उन् ने...?"

"हम्म! आपने शायद गौर नहीं किया. पर वो सभी मेरे बदन को गन्दी नज़र से देख रहे थे."

"उन् हराम के पिल्लो की तोह में..."

"शांत! आशु उठ जाएगा!"

"हम्म! मुझे अब वो कदम उठाना hi पड़ेगा..."

"??"

"भूलो मत की में उसके hi घर में काम करता हु. मुझे पता है उसने कागज़ात कहा रखे होंगे... बस एक बार हाथ आ जाए..."

"चोरीइ??"

"चोरी नहीं है ये... ये हमारा अपना हक़ है प्रिये! ये तोह हमारी ज़मीन है. उस ठाकुर को यदि वह बिल्डिंग बनवानी है तोह बनवाये. पर हमारी खेती की ज़मीन को चोरर के बनवाये. और हम अपना हक़ लेके रहेंगे. भले hi मुझे उसके घर से अपने कागज़ात क्यों न लेने पड़े."

"पर... पर यदि उस ठाकुर को पता चला तोह..."

"पता चला भी तोह क्या? काम से काम हमारे पास... कचेहरी में दिखाने के लिए कागज़ात तोह रहेंगे."

"कचेहरी तोह हमे सुरक्षित रख लेगी पर उसके बाद क्या? वो हरामी ठाकुर कुछ भी कर सकता है. यदि हमारे आशु को कुछ हो गया तोह?"

"बिलकुल नहीं! तुम कल एक काम करना... आशु को मैदान खेलने भेज देना. जैसे hi में कागज़ लेके आऊंगा हम सीधे दूसरे थाने चलेंगे और कचेहरी भी जाएंगे. वकील को देने के लिए है पैसा हमारे पास. बस हमे जल्द से जल्द सब कुछ करना होगा. इस से पहले की वो ठाकुर हमारे वकील को खरीद पाए."

"क्या आपको वाक़ई लगता है की हम सफल होंगे?"

"भगवान् के घर देरर है, अंधेरर नहीं!"

"हम्म्म! और... हमारा सब्ज़ी और फल का धंधा तोह अच्छा है hi पर आपके मोची के धंदे का क्या हुआ?"

"आज अच्छी कमाई हुई. वो जिनकी हवेली है न? सिंह साहब की? वो आज मुझे हवेली में बुलवाये थे."

"क्या?"

"हां! हाहाहा~ अरे उनके जूते विदेश से आये है. और तुम जानती hi हो की जूतों का मुझे कितना शौक है. मेने जूते के बारे में इतना सब कुछ बताया उन्हें की वो खुश हो गए और मेरी अच्छी खासी कमाई हो गयी."

"चलिए! ये तोह बड़ी hi अच्छी बात है."

आई, बाबा कुछ देरर यु बात करके सो गए थे. पर उनकी बाते मेरे दिमाग में hi रात भर घूमती रही.

अगली सुबह वही हुआ. आई ने नाश्ते में मुझे रोटी दी और बस आम का अचार. में थोड़ा बोहत खाया और तब तक सूरज सर्र को चढ़ने पर था.

दिन होते hi आई ने मुझे मैदान में जाने कह दिया. मुझे पता था घर में कुछ सही नहीं है और इसलिए मेने जाने से मन कर दिया.

"अब जाता क्यों नहीं!? वैसे तोह रोज़ घर में लगा रहेगा. अब जब बाबा तेरे लिए हॉकी ले आये है तोह जा न... दिखा अपने दोस्तों को... क्यों नहीं जा रहा अब!?"

"मुझे नहीं जाना..."

"तू... जाता है या में पिटाई करू तेरी...!?"

आई ने झाड़ू उठायी तोह में गुस्से में बिना हॉकी उठाये hi भाग गया. मुझे रोना आ रहा था. एक तोह में इतनी चिंता कर रहा था ऊपर से आई ने मेरी भावनाओ को समझा hi नहीं. हम्फ!

गुस्से और उदासी के चलते में पूरा दिन मैदान में रहा. घर गया hi नहीं.

जब शाम हुई और अँधेरा होने को आया तब hi में उठा और घर की ऑर्डर जाने लगा.

हमारा घर थोड़ा उच्चे स्थान पर था. थोड़ा सा पहाड़ी इलाका था. वैसे मुंबई में पहाड़ नहीं थे पर बाहरी छेत्र में कुछ कुछ होते थे जिनपे लोग मकान बना कर गुज़ारा करते थे.

जैसे hi में कच्ची सड़क से होते हुए अपने घर के पास पहुचा तोह...

मुझे नज़र आया की घर के बाहर से 3 से 4 पुलिस वाले निकल रहे थे. उनकी शकले मुझे बोहत अच्छे से याद थी. क्युकी यही लोग कल भी आये थे.

वो घर से बाहर निकले और जल्दबाज़ी में भाग गए. में थोड़ा चिंतित होते घर के नज़दीक आया तोह पाया की अंदर से लालटेन जलने की रौशनी बाहर सड़क तक आ रही थी.

"आई!?? बबआ!?"

आवाज़ लगाते हुए में जैसे hi अंदर आया तोह...

मेरी आँखें फटी की फटी रह गयी. सामने के दृश्य को देख मेरी रूह काँप गयी. एक पल में मेरे शरीर के रौंगटे खड़े हो गए. दिल ज़र्रों से धड़कने लगा. और डर के मारे मेरा बदन कापने लगा.

में वह ऐसे जैम गया था जैसे मेने कोई भूत देख लिया हो.

"N-Nahiiiiiiiiiiiii!!!"

में चींख... और लड़खड़ा के आगे बढ़ा...

सामने...

सामने मेरे बाबा का सर्र फटा हुआ था. उनके सर्र से पूरा खून hi खून बह रहा था. खून के छींटे दीवारों पर बिखरे हुए था. ज़मीन पर खून बहते हुए फैलता जा रहा था.

और उनके बगल से...

मेरी हॉकी स्टिक राखी हुई थी, जिस पर...

खून hi खून लगा हुआ था.

"बाअबाआआआआ!!!"

में फिरसे चीखा... और thar-tharaate हुए बगल में बिस्तर की ऑर्डर देखा... तोह मानो जैसे मेरे पेर्रो के नीचे से ज़मीन खिसक गयी थी.

सामने मेरी आई...

पीठ के बल बिस्तर पर पड़ी हुई थी. मुँह से झाग बह रहा था. और उनकी आँखें...

उनकी आँखें एकदम खुली हुई थी, मानो बाहर hi आ जाएंगी.

उनके सीने का कपडा फटा हुआ था, नीचे का कपडा भी फटा हुआ था. अलग अलग जगह से उनके अंग दिख रहे थे.

"A-Aaiii!?"

में गिरता हुआ रेंग के उनके पास पहुचा और उन्हें जैसे hi मेने छिया...

उनका शरीर हल्के धड़ाम से बिस्तर से नीचे गिर गया.

"आआअह्ह्ह्हह्ह्ह्ह!"

में डर के 2 कदम पीछे हटा, और उन्हें सीधा किया तोह... वो बस आँखें खोले हुए थी.

"एआईई!!! उठाऊ... उठू आयी!!!"

मेने न जाने कितनी गुहार लगाई होंगी. पर आई एक बार भी न उठी.

"नहीं... Nahiiiiiiiiiiiii!!? आयआईईईई!!! बाजबबाआआ!!"

अपना गाला पहाड़ पहाड़ के मेने उन्हें पुकारा. पर मेरे आई बाबा दोनों ने hi कोई जवाब नहीं दिया.

मेने कापते हुए हाथो से अपनी वो हॉकी स्टिक उठायी और देखा... तोह मुझे समझ आया की इस्पे जो खून लगा था और जो खून बाबा के सर्र से बह रहा था, वो शायद एक hi था.

और ये सब सोचते hi में अगले hi पल, वही बेहोश हो गया.

जब मेरी नींद खुली तोह पता चला में किसी और hi जगह पर था. एक अनजान जगह.

मेने देखा तोह पाया की सामने मेरे एक आदमी मौजूद था, जो करीब 30-32 साल का प्रतीत हो रहा था.

"तोह होश आ गया तुम्हे!?"

उसके सवाल पर मेने हां में सर्र हिलाया. मेने गौर किया की वो बड़े hi अच्छे कपडे पहने हुए था.

"आज से तुम मेरे साथ रहोगे. क्युकी... तुम्हारा अब अपना घर तोह रहा नहीं... है न?"

उसकी बात से मुझे सब कुछ याद आ गया. और अगले hi पल मेरी आँखों से ासु बहने लगे. में खूब रोया. पर जितना में उदास था, उस से कही ज़्यादा मुझमे गुस्सा भरा हुआ था. और एक जोश था, प्रतिशोध लेने का.

"बोलो? रहोगे मेरे साथ?"

मेरे पास और कोई चारा नहीं था. मेने हां में सर्र हिलाया और बस...

उस दिन से में उस आदमी के साथ रहने लगा. उस आदमी ने मुझे कहा था की में उससे 'दादा' कह के पुकारू. तोह में उससे दादा कह के hi बुलाने लगा. मुझे पता चला की उस रात दादा के कुछ आदमी उधर से गुज़र रहे थे. और मुझे वह देख के वो मुझे दादा के पास ले आये थे.

धीरे धीरे जैसे जैसे मेरी उम्र बढ़ने लगी, में दादा के साथ काम करने में और भी लीं होता गया.

मुझे पता चला दादा क्या काम करते थे. ड्रग्स, और अवैध चीज़ो की स्मगलिंग. दारु से लेके हर्र एक चीज़ जिसमे काला धन रहता था, वो सभी का धंदा दादा करते थे. मुझे कभी इसमें बुराई नज़र नहीं आयी. आखिर इतना पैसा जो आ रहा था.

मुझे पता चला की कैसे इन् सब कामो को किया जाता था. दादा मुझे हर्र छोटी सी छोटी बात समझाते, जिससे में अपने दिमाग में बैठा लेता था.

पर इसी वक़्त मुझे ये भी पता चला, की उस रात मेरी माँ को उन्होंने मारा hi नहीं था, बल्कि उनकी इज़्ज़त भी लूटी थी और बेरहमी से मेरे आई बाबा की जान ली थी. तब से लेकर अब तक... में बस तड़प रहा था. की कब मुझे मौका मिले, और कब में उन् सारे पुलिसवालो को अपने हाथो से मौत दू.

"तुम बदला लेना चाहते हो?"

"जी! दादा!"

और आज वो दिन आ चूका था. मेने आखिर कार अपने बदले की भावना दादा के सामने राखी. वो मुस्कुराये और बोले,

"आदमी और हथ्यार में दिलवा दूंगा. पर मारना तुम्हे है. की कैसे तुम मारना चाहते हो और कहा पे... तुम भी मेरी hi तरह किस्मत के मारे हो. मुझे तुम से बड़ी उमीदे है. एक अच्छा प्रदर्शन रखना.""

"जी! दादा!"

दादा की बात साफ़ थी. वो मुझसे काफी कुछ उमीदे लिए बैठे थे. और में उन्हें बिलकुल भी निराश नहीं करना चाहता था.

फिर वो दिन आया...

मेरे जीवन का सबसे khush-haal दिन...

साड़ी जड़ तोह वो ठाकुर था. मेने न केवल अपनी ज़मीन के कागज़, बल्कि अपनी चतुराई के चलते उसकी खुद की बिल्डिंग भी मेने अपने कब्ज़े में करवा ली थी.

जिन पुलिस वालो की मुझे तलाश थी. वो सब भी मेरे चंगुल में फसे हुए थे.

इस वक़्त हम सभी ठाकुर की hi उस बिल्डिंग में खड़े हुए थे. और ऊपर...

ऊपर उचाई पर...

ठाकुर, और वो सभी पुलिस वाले रस्सी से बंधे लटके हुए थे, जो गिड़गिड़ा रहे थे. हवा में परर उनके किसी बिन पानी की मछली की तरह हिल रहे थे.

और आँखों में उनका वो खौफ देख, पता नहीं क्यों... मेरे होंठो पर अपने आप एक डरावनी सी मुस्कराहट फैलती जा रही थी. मुझे ये सब अच्छा लग रहा था. आनंद आ रहा था मुझे ये सब करने में.

"हह... हाहाहाःहाहा~"

में पागलो की तरह हस्सन लगा. 10 साल... 10 साल तक मेने इंतज़ार किया था अपना बदला लेने के लिए.

आज... मेरे हाथो में बाबा की दी हुई वही हॉकी थी. पेर्रो में महंगे जूते, जिनका बाबा को हमेशा शौक रहता था. और आज उन् हराम के पिल्लो की बिलखती हुई आवाज़ें जो 10 साल पहले मेरे आई बाबा पर गरजती थी.

मेने न केवल आई बाबा की ज़मीन वापस ली थी बल्कि उस मादरचोद ठाकुर की ज़मीन भी हड़प ली थी. और इन् सब को करने में मेरी चतुराई तोह काम आयी hi पर दादा ने भी मेरा बोहत साथ दिया.

"उड़ा दो एक एक को..."

मेने अंत में इशारा किया और तभी...

*बंग* *बंग*

*बंग* *बंग*

*बंग* *बंग*

गोलियों की आवाज़ पूरी बिल्डिंग में गूँज उठी. ऊपर खड़े आदमियों ने अपनी बंदूकों से एक के बाद एक गोलिया उन् आदमियों के शरीर में घोप दी...

और...

गोली पड़ते hi, उन् सभी के जिस्म से ऐसे खून के छींटे उचक के बिखर रहे थे मानो जैसे हवा में कोई राकेट फूट के चिंगारिया बिखेर रहा हो. उनके अंग गोली के लगते चीथड़ों की तरह शरीर से निकल के अलग होक गिर रहे थे.

वाक़ई! आज मेने खून की आतिशबाज़ी करवा दी थी.

नीचे में अपने हाथ फैलाये आँखें बंद किये, अपने दुश्मनो के खून में नाहा रहा था. और होंठो पर एक संतुष्टि भरी मुस्कान बिखरी हुई थी.

जब सब कुछ शांत हुआ तोह दादा, जो कुछ दूर खड़े हुए थे वो बोले,

"आज! आज हमारे ख़ास, आशु ने अपना बदला लिया है. जिसका वो 10 साल से इंतज़ार कर रहा था. आज ये बिल्डिंग भी उसकी हुई और उसकी अपनी ज़मीन भी. इसलिए... आज इस ख़ुशी के मौके पर में कुछ घोषणा करना चाहता हु..."

हम सभी दादा की बातें बड़े hi ध्यान से सुन्न रहे थे.

"आज से... आशु, 'आतिश' के नाम से जाना जाएगा. और ये बिल्डिंग... 'जलसा' के नाम से."

"आतिश भौ! आतिश भौ! आतिश भौ! आतिश भौ!"

और बस...

मेरे नए नाम के नारे लगने शुरू हो गए. में खुश था. बेहद खुश. अजीब सी मुस्कान फैली थी मेरे होंठो पर जो जा hi नहीं रही थी.

दादी मेरे करीब आये और मेरे कंधे पर हाथ रखे और बोले,

"आज से ये अक्खा मुंबई को तू भी संभालेगा. में जल्द hi यहाँ से चला जाऊंगा... तब... पूरा का पूरा ये मुंबई तेरे हाथो में होगा. मुझे निराश न करना."

"जी! दादा!" मेने मुस्कुराते हुए जवाब दिया.

और दादा चले गए. एक बात थी, जो मुझे पता थी. यही... की मेने आज इतिहास लिख दिया था.

***

अपने हाथो में एक तस्वीर लिए आतिश इस वक़्त जलसा के hi बेसमेंट में अपनी पुरानी यादो को याद कर रहा था.

"देख! मेने कहा था न... तेरे लिए उपहार है एक."

उसने कहते हुए जेब से एक कागज़ निकाला,

"ये देख आई! इस पूरी बेसमेंट की दीवारों पर सोने की परत चढ़ जाएगी. उसी का कॉन्ट्रैक्ट है ये. तू कहती रही न? तुझे चांदी का मंदिर चाहिए? अरे तेरे आशु ने पूरा सोने का इतना बड़ा मंदिर बनवाया है देख..."

उसने फोटो को घुमाया, जैसे मानो फोटो को कुछ दिखा रहा हो.

सामने एक बेहद hi शानदार बोहत बड़ा सा सोने का मंदिर था. पर...

बस एक hi बात अजीब थी. वो ये की वो एकदम खाली था.

"अब तू पूछेगी की भगवान् कहा है? तू जानती है न? में भगवन पे विश्वाश नहीं करता. में तोह केवल तुझ पे और बाबा पे विश्वाश करता हु. हाहाहा~ काम करो तोह बड़ा करो..."

वो हिस्सा...

पर तभी...

"एकदम सही कहा..."

उससे पीछे से एक आवाज़ सुनाई दी. और ये सुनते hi आतिश के पल भर के लिए रौंगटे खड़े हो गए.

वो फौरन hi पलटा पर...

*Pooooooooooowwww*

एक ज़ोरदार घुसा उसके चेहरे पर आके किसी पत्थर की तरह लगा और उस इम्पैक्ट से आतिश की बॉडी हवा में उचक के पीछे जा गिरी.

*करायअस्स्सह्ह्ह्हह्ह्ह्ह*

पीछे राखी एक टेबल भी गिर गयी और साथ hi साथ उसमे रखा सामान भी.

उसके हाथ से उसकी हॉकी की स्टिक भी गिर चुकी थी और साथ hi साथ वो कॉन्ट्रैक्ट का पेपर और वो तस्वीर भी.

जैसे hi आतिश खड़ा हुआ उसने देखा की सामने एक लड़का मौजूद था. जो एक काला हूडि और काला hi जीन्स पहने हुए था. यहाँ तक की उसकी आँखों के नीचे भी काले रंग का कपडा बंधा हुआ था.

आतिश : K-Kaun हो तुम!?? यहाँ अंदर कैसे आये...!?

पर जैसे उससे समझ आया की सवाल करना फ़िज़ूल है और यही सोच आतिश ने फटाक से अपने कोट की इनर जेब से अपना रिवाल्वर निकला और वो सामने खड़े लड़के पर चलाने hi वाला था की तभी...

*कराआआस्स्स्सस्ठ्हठ्ठ*

उसके हाथ पे एक दारु की बोतल उड़द के आयी और सीधा उसके हाथ पे hi फूट गयी.

"अअअअअररघः!"

रिवाल्वर के नीचे गिरते hi वो लड़का आगे बढ़ा और उसकी कल्लोर पकड़ के घुसे पे घुसे देना शुरू कर दिया.

"अअअअअररह्ह्ह्ह!! ुघ्हहहह... हरामियों बाहर आओ जल्दी... कहा छुपे हो?"

उसने अपने पंटरों को बुलाना चाहा...

पर... जैसे कोई फायदा hi नहीं था. क्युकी कोई नहीं आया.

छीना झपटी में जब आतिश ने कुछ वार किये तोह उस लड़के के मुँह से कपडा हट गया और सामने उस परिचित चेहरे को देख उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी...

"T-Tummm!???"

"हाँ! में!"

सामने खड़ा वो लड़का कोई और नहीं, वीर hi था.

वीर को देख आतिश फौरन hi भागा. और लिफ्ट की ऑर्डर गया.

[Wo bhaag raha hai Master! Chase him down!]

वीर तेज़्ज़ी से आगे बढ़ा और नेक्स्ट सेकंड hi...

*डिंग*

[Mission : Take Down Aatish!


रिवार्ड्स : 1) ??? पॉइंट्स.

2) ओने रैंडम फ्री स्किल.


टाइम लिमिट : 30 मिनट्स.]

वीर को मिशन मिल चूका था पर इस वक़्त मिशन पढ़ने का टाइम बिलकुल नहीं था उसके पास. वो तोह आज वैसे hi आतिश को मारने hi आया था, चाहे मिशन मिले या नहीं.

*हफ्फ्फ्फ़* *हुफ्फ*

तेज़्ज़ तेज़्ज़ सासें लिए आतिश लिफ्ट में घुस ऊपर सीधा सेकंड फ्लोर पर जाने लगा.

बूत तू बाद फॉर हिम. वीर ने नीचे से hi चेक कर लिया था की लिफ्ट किस फ्लोर पर जा रही है. और अगले hi पल वीर स्टैर्स की मदद से सीधा सेकंड फ्लोर की ऑर्डर भागा.

लिफ्ट खुलते hi जैसे hi आतिश बाहर निकला, तोह सामने hi वीर खड़ा हुआ था.

आतिश : हँ???

आतिश को यु पकड़ वीर ने उससे कमरे में फेक दिया. ये वही कमरा था, जहा रस्सिया hi रस्सिया लटकी हुई थी.

किसी में ऊपर तेज़ाब भरा था तोह किसी में ीते, तोह किसी में लोहे की रोडस.

आतिश : वीईईएएरररर!! तुम यहाँ आ ज़रूर गए... पर लौट के अब कभी नहीं जा पाओगे... तुमने यहाँ आ के सबसे बड़ी गलती की hi वीईईएररर...

वो चींख... इस उम्मीद में की शायद उसके ये कहने से वीर का मनोबल डगमगाएगा.

पर वीर तोह जैसे किसी फौलाद की तरह सामने निडर होक खड़ा हुआ था. उसका सीना हाफने से ऊपर नीचे हो रहा था. और आँखें एकदम लाल थी. गुस्से से भरपूर.

अगले hi पल दोनों एक दूसरे पर झपटे. एक दूसरे के कपडे पकड़ वो जैसे हावी होने की कोशिश कर रहे थे.

कुछ पंचेस वीर देता तोह कुछ आतिश उससे मारता. पर मोस्ट ऑफ़ थे टाइम, वीर डॉज कर ले रहा था. जिसके कारण आतिश की हालत जल्द hi खराब हो रही थी.

अभी वो एक दूसरे को जकड़े hi हुए थे की तभी... आतिश हैवानो की तरह मुस्कुराया और...

*पुललस*

उसने बगल में लटक रही एक रस्सी खींच दी.

ऊपर की सीलिंग का बॉक्स पलटा और...

*Craaaaaaaaaaassssssshhhhh!*

साड़ी लोहे की रोड्स नीचे गिरी. वीर जानता था की ऊपर रोडस थी. वो आतिश से एक कदम आगे hi चल रहा था. उसने पहले hi नज़र मार ली थी ऊपर.

आतिश वीर के चंगुल से चूत पीछे कूड़ा और वीर भी कई बैकफ्लिप मारते हुए पीके हो गया.

'हँ!??'

[Moves apne aap niklenge. Mene kaha tha na master. Basic Martial Arts skill aapko parkour aur acrobatics me kaafi madad karengi.]

'गोत आईटी!'

वीर को बचता देख आतिश दांत पीसते हुए भागने के लिए हुआ पर तभी...

वीर ने एक रस्सी हाथ में ली और वो आतिश के पास जा पहुचा. उसने आतिश को एक लात दी...

*पुऊववववव*

और आतिश पीछे की ऑर्डर गिरा...

'गोत यू!'

और अगले hi पल वीर ने मुस्कुराते हुए हाथ में ली हुई रस्सी खींच दी.

*Craasssssssssshhhhhhh*

*थुड़* *थुड़* *थुड़*

धेरर सारे ीते उसके ऊपर गिरने लगे.

"Aaaaaaaaaaaaahhhhh"

वो चिल्लाया और अपना जैसे तैसे सर्र उसने बचाया. पर इतना तोह साफ़ था की उसकी पीठ की एक आड़ हड्डी तोह टूट hi गयी होंगी.

वीर धीरे धीरे उसके करीब आया और उसने ीटो को हटा के आतिश को घसीट के बाहर निकाला.

अभी वो आतिश को और मारता की तभी आतिश ने चालाकी से अपने कोट की जेब में छुपी एक पॉकेट नाइफ निकाली और वीर के परर में घोप दी...

"अअअअअअअअरररररग्ग्घहहह.... सससससस"

वीर जैसे hi गिरा तोह आतिश खुद को चुर्रा के लिफ्ट की ऑर्डर भागा.

[He's running away master! Oh Noooo~ Are you okayyyy!?]

'फूऊकक्कककककक!!!! ाआर्डरह्ह्ह्ह!'

[Jaldi! Apna rumaal use kariye. Hum koi bhi aham clue nahi chorr sakte. Aur isliye toh mene aapko gloves pehnaaye hai.]

पारी की बात सुन्न वीर ने जल्दी जल्दी अपना रुमाल निकाल के अपने मुँह की मदद से रुमाल को टांग पर लगा के उसमे एक गठान बाँधी और अपनी ब्लीडिंग को जैसे तैसे थोड़ा रोका.

आतिश थर्ड फ्लोर पे गया था. उधर से hi सीक्रेट पैसेज था जो सीधा कण्ट्रोल रूम को होते हुए निकलता था. कण्ट्रोल रूम बोले तोह वही रूम जहा पर बैठ के आतिश सभी कामर्स की फूटगेस पे नज़र रखता था.

उठाते हुए वीर भी अपना दर्द इग्नोर कर सीधा थर्ड फ्लोर पे जा पहुचा. आतिश ने जैसे hi देखा की वीर पीछे से आ रहा है, वो देख के आज पहली बार उससे घबराहट महसूस हो रही थी.

वीर भी लंगड़ा रहा था. पर... उसके बावजूद वो धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था. ऐसे जैसे मानो वो जानता था की आगे क्या होने वाला है.

आतिश हफ्ते हुए भागते भागते जैसे hi दरवाज़ा खोलने के लिए हुआ तोह उससे एक और झटका लगा.

दरवाज़ा दूसरी तरफ से लॉक्ड था.

"हहहहह!??? ये... ये दरवाज़ा!? हराम के पिल्लो तुम सब सो गए क्या??? बाहर आओ मादरचोदो... किस बात की तन्खा खाते हो तुम?""

पर उससे क्या पता था... की वीर यहाँ पूरी तैयारी से आया था. वीर ने hi कण्ट्रोल रूम से सारे कामर्स ऑफ किये थे. वीर ने hi उस दरवाज़े पर पीछे से लॉक लगाया था. वीर ने hi उसके पंटरों को एक एक करके दबोच के मार के उन्हें बाँध दिया था.

सब कुछ...

वो इतनी देरर पहले कर चूका था. अब बाकी था..

तोह बस बड़ी मछली का शिकार करना.

"वीईईएरररररर!!!! आज या तोह तुम बचोगे या तोह में." आतिश घबराते हुए चिल्लाया और वो आगे बढ़ के वीर पे हमला करने hi वाला था की तभी...

"हहहहह?"

उसका परर एक रस्सी के फंदे में फसा और तभी...

उसका पूरा का पूरा शरीर हवा में उल्टा झूल गया.

एक ट्रैप! बिलकुल वैसा hi जैसा आतिश ने वीर के लिए बनाया था.

वीर आगे धीरे धीरे बढ़ा और उसने आतिश के नीचे उस बोहत बड़ी सी चीज़ से पर्दा हटा दिया.

आतिश ने जैसे hi नीचे देखा तोह उसकी हालत पतली हो गयी. आज पहली बार उससे इतना डर महसूस हो रहा था. अपनी जान का डर.

नीचे बड़ा सा गिलास टैंक था. और उस गिलास टैंक में... वही मगर मौजूद था जिसने गोलू की जान ली थी.

वही मगर, यानी की आतिश का पालतू जानवर उर्फ़ क्लच.

"Na-Nahiiiiii!!!! नाहीईई!!!" उसने अपना सर्र ना में हिलाया और घबराते हुए वीर को देखने लगा.

नीचे मगर उसका जैसे वेट hi कर रहा था और उस मगर की आँखें इतनी खतरनाक लग रही थी इस वक़्त की आतिश शब्दों में भी बया नहीं कर सकता था.

"ऐसे hi... ऐसे hi तुमने गोलू को मारा था... मुझ से मरवाया था उससे हाँ!? ी विल किल यू इन थे एक्सएक्ट शामे वे!!!!!!"

वीर ने इतना बोल धीरे धीरे उसी पॉकेट नाइफ से रस्सी काटना शुरू कर दी, जो आतिश ने कुछ देरर पहले उससे मारी थी.

"Naaaaaaahiiiiiiiiiiiii.... नाहीइइइइइइ वीईईएईरररर"

वो चिल्लाया पर....

*सपलायस्स्सस्स्स्शह्ह्ह*

तब तक बोहत देरर हो चुकी थी. और अगले hi पल वो पानी में जा गिरा.

*छाप* *छाप*

उसके हाथ परर व्यर्थ hi इधर उधर मचलते हुए बाहर निकलने का प्रयत्न कर रहे थे. पर...

अगले hi पल...

*क्रुणक्कक्कछ्हःहःहः*

मगर आगे बढ़ा और एक बार में hi आतिश के सर्र को अपने नुकीले दातो में जकड उससे दबा दिया...

"आई!!!!" बस... यही आखिरी शब्द उसके मुँह से निकला.

उसके बाद... पूरे टैंक का साफ़ पानी बस लाल रंग के खून hi खून से भर गया.

और वीर अपनी बॉहे सिकोड़े सामने के इस मंज़र को देखता रहा जब तक की पानी में हो रही वो छाप छाप आवाज़ काम न हो गयी. और फिर शान्ति सी न छ गयी...

'It's ओवर!'

[Yes master! Aap theek ho na?]

'I'm नॉट फाइन. बूत...'

[???]

'आतिश ने तीन बड़ी गलतिया करि थी.'

[Hmm?]

'पहली ये... की उसने मेरे करीबी जानो को छर्रा.'

[...]

'दूसरी ये की उसने मुझे ज़िंदा चोरर दिया.'

[Master!]

'और तीसरी ये... की उसने ऐसा जानवर पाला जो अपने hi मालिक और मालिक के दुश्मनो में अंतर करना नहीं जानता.'

[Hmm!]

पारी कुछ सोच के शांत हो गयी पर तभी...

*डिंग*

['मिशन : टेक डाउन आतिश!!!' है बीन कम्प्लेटेड.]

*डिंग*

[120 points have been rewarded.]

*डिंग*

[You have been rewarded a Random skill. ~ Hawkeye.]

*डिंग*

[Past Illustration function is invoked.]

[Do you want to see Aatish' Past?]

'हँ???'

वीर चकित एकदम सामने की ऑर्डर देख रहा था. टैंक में आतिश के कुछ शरीर के हिस्से टेरर रहे थे. और उसी के ऊपर सिस्टम की स्क्रीन हवा में खुली हुई थी.

'ये सब..!?'

[Mene aapko bataya tha na master. Past Illustration function ke baare me... Aap yadi kisi vyakti ko maarte hai toh uske baad uska past padh sakte hai. So? Kya aap dekhna chaahte hai?]

वीर ने कुछ सोचा और फिर हां में सर्र हिलाया और मैं में hi 'यस' कह दिया.

उसके बाद आतिश का पूरा पास्ट वीर के सामने उसी स्क्रीन में लिख के आ गया. सब कुछ.

जब वीर ने वो सब पढ़ा तोह उसका सर्र अपने आप झुक गया.

[Master! Do you regret it now?]

'No! ी don't... पारी! उसने गोलू की जान ली. और न जाने कितने निर्दोष लोगो की जान ली होगी उसने. ी don't रिग्रेट आईटी. It's फाइनली ओवर.'

[Yes! Aapko yaha se jaana chaahiye!]

'हम्म्म! पर उस से पहले... कुछ काम है..'

वीर थर्ड फ्लोर से वापस बेसमेंट में आया जहा वही सोना का मंदिर रखा हुआ था.

उसने आगे आके वही हॉकी स्टिक उठायी और वो कॉन्ट्रैक्ट भी...

और वो तस्वीर भी... उसमे एक आदमी, एक औरत और एक बच्चे की तस्वीर थी.

उन् सभी को लेके वो मंदिर के करीब आया और तीनो चीज़े उसने मंदिर में hi रख दी.

[Hmm? Maaasteeerr!?? W-Whyy!? Aapne...!?]

वीर का बेहेवियर पारी के पल्ले नहीं पड़ा था और इसलिए... उसने ये सवाल किया. इस वक़्त तोह वीर को अपने घर की ऑर्डर भागना चाहिए था और सबसे पहले अपनी चोट के बारे में सोचना चाहिए था. पर वो उल्टा यहाँ वापस आके दुश्मन की चीज़ो को उठा के इधर से उधर कर रहा था.

ये सब कुछ पारी के लिए प्रश्न जनक था.

पर...

पारी के सवाल पर...

वीर के मुँह से एक hi उत्तर निकला...

"माँ... तोह आखिर माँ होती है... पारी!!!"

.

.

.

.

.

.

.

आज के लिए इतना hi गाइस!

इसी के साथ यहाँ पर ख़तम होता है आतिश' अर्च. स्लोगन अर्च शुरू होएगा नेक्स्ट अपडेट से. तब तक के लिए लिखे करके जाने का पसंद आये तोह और कमेंट करने का. 😁


धन्यवाद!
 
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