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- Dec 5, 2013
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दिलीप- अबे कौन है
[अखिल मेरे पास आके]
अखिल- किसी मादर्चोद ने अपने फोन में डोरबेल की रिंगटोन सेट की है
दिलीप- वो गया
अखिल- हां
दिलीप- अबे तो चल ना
[हम लोग शीतल के घर से अपने घर आ गये]
दिलीप- अच्छा ठीक है तो मैं चलता हूँ
अखिल- तू सच में जा रहा है
दिलीप- हाँ
अखिल- कितनी अजीब बात है हमारी दोस्ती को 24 घंटे ही हुए हैं पर अब तू जा रहा है अपुन का एकलौता दोस्त
दिलीप- ज़्यादा सेंटी मत हो और जान का ख्याल रखना
अखिल- कौन जान
दिलीप- अरषि
[यह कहते हुए मैने अखिल को आँख मार दी]
अखिल- ठीक है
[मैं अखिल के पास गया और उसके कान में कुछ कहा]
अब तू जा अपनी जान के पास मैं थोड़ी देर में जाउन्गा
अखिल चला गया
मैने वहाँ से सारा समान लपेटा और एक जगह बिल्डिंग बन रही थी वहाँ पे गड्ढा खोद के गाढ दिया कुछ समान मैने रख लिया और अपना पहले वाला कपड़ा पहेन लिया फिर वहाँ से 1 घंटा चलता रहा एक टॅक्सी में बैठ गया
1 घंटे बाद 1 एम मैं पहुँचा छोटे मामा के घर के बाहर मैने सेक्यूरिटी को जगाया
सेक्यूरिटी- छोटे मालिक आप कहाँ थे सुबह से
मालिक ने आपको ढूँढने के लिए पोलीस को बुलाया था मैं अभी जाके मालिक को बताता हूँ
दिलीप- [एक तो जब भी कहीं जाओ सब छोटे मालिक ही कहेंगे]
उसकी कोई ज़रूरत नही है मैं खुद जा रहा हूँ तुम सो जाओ
[मैने यह बात सेक्यूरिटी को घूर के कहा]
और अंदर गया
हॉल में कोई नही था अभी कौन होगा सब अपने अपने रूम में होंगे
मैं सीधी से उपर आते हुए वँया की रूम की तरफ जाने लगा
मैने गेट नॉक किया
वँया ने गेट नही खोला
मैं अपनी जेब से मास्टर की निकाली
और गेट खोलके अंदर गया
वँया के रूम में लाइट ऑन थी
वँया को अंधेरे में नींद नही आती
मैं वँया के चेहरे को गौर से देखा
वँया आँखें रोके सूज गयी थी
एक तरफ मुझे इस बात का दुख था
कि मैं मेघा दी का बदला नही ले पाया
और दूसरा दुख मेरे 1 दिन ना रहने से वँया की यह हालत हो गई
मैने वँया का सर अपनी गोद में रखके बैठ गया
पता नही कब नींद आ गई
जब मैं उठा तो देखा वँया अभी भी मेरे गोद में सोई हुई है
मैं वँया का सर आहिस्ता से तकिया पर रख ही रहा था
कि वँया की आँख खुल गयी
वँया चीखते हुए मेरे गले लग गयी
और मेरे चेहरे को चूमने लगी
दिलीप- अरे बस बस क्या कर रही हो
[मैं इतना ही बोला था कि वँया ने एक साथ 4 थप्पड़ मेरे 2नो गालो पे जड़ दिए और मेरे गले लग्के रोने लगी]
थप्पड़ मुझपे पड़े और रो तुम रही हो
वँया- तुमने ऐसा किया ही क्यूँ कहाँ थे सुबह से पता है सब कितने परेशान थे
दिलीप- सुबह में टहलने गया था
थोड़ी देर पार्क में बैठ गया बैठते हुए मुझे नींद आ गई
[मैने अपने हिसाब से जो कहानी सोची थी वही वँया को बता दी]
वँया- तुम यही पे बैठो मैं सब को बुलाती हूँ
दिलीप- क्यो तुम भी सुबह सुबह सब की नींद खराब कर रही हो
वँया- कोई नींद नही खराब होगी
दिलीप- वँया यह कहके बाहर चली गयी
मैं जल्दी से बाथरूम भागा और हल्का हुआ
मैं बाथरूम से निकलके बेड पे बैठ गया
और सोचने लगा कि 5 बहनो की हिसाब से कितने थप्पड़ पड़ेंगे
उपर से सी मामा की डाँट और कोटि मामी की गालियाँ....
दिलीप- अबे कौन है
[अखिल मेरे पास आके]
अखिल- किसी मादर्चोद ने अपने फोन में डोरबेल की रिंगटोन सेट की है
दिलीप- वो गया
अखिल- हां
दिलीप- अबे तो चल ना
[हम लोग शीतल के घर से अपने घर आ गये]
दिलीप- अच्छा ठीक है तो मैं चलता हूँ
अखिल- तू सच में जा रहा है
दिलीप- हाँ
अखिल- कितनी अजीब बात है हमारी दोस्ती को 24 घंटे ही हुए हैं पर अब तू जा रहा है अपुन का एकलौता दोस्त
दिलीप- ज़्यादा सेंटी मत हो और जान का ख्याल रखना
अखिल- कौन जान
दिलीप- अरषि
[यह कहते हुए मैने अखिल को आँख मार दी]
अखिल- ठीक है
[मैं अखिल के पास गया और उसके कान में कुछ कहा]
अब तू जा अपनी जान के पास मैं थोड़ी देर में जाउन्गा
अखिल चला गया
मैने वहाँ से सारा समान लपेटा और एक जगह बिल्डिंग बन रही थी वहाँ पे गड्ढा खोद के गाढ दिया कुछ समान मैने रख लिया और अपना पहले वाला कपड़ा पहेन लिया फिर वहाँ से 1 घंटा चलता रहा एक टॅक्सी में बैठ गया
1 घंटे बाद 1 एम मैं पहुँचा छोटे मामा के घर के बाहर मैने सेक्यूरिटी को जगाया
सेक्यूरिटी- छोटे मालिक आप कहाँ थे सुबह से
मालिक ने आपको ढूँढने के लिए पोलीस को बुलाया था मैं अभी जाके मालिक को बताता हूँ
दिलीप- [एक तो जब भी कहीं जाओ सब छोटे मालिक ही कहेंगे]
उसकी कोई ज़रूरत नही है मैं खुद जा रहा हूँ तुम सो जाओ
[मैने यह बात सेक्यूरिटी को घूर के कहा]
और अंदर गया
हॉल में कोई नही था अभी कौन होगा सब अपने अपने रूम में होंगे
मैं सीधी से उपर आते हुए वँया की रूम की तरफ जाने लगा
मैने गेट नॉक किया
वँया ने गेट नही खोला
मैं अपनी जेब से मास्टर की निकाली
और गेट खोलके अंदर गया
वँया के रूम में लाइट ऑन थी
वँया को अंधेरे में नींद नही आती
मैं वँया के चेहरे को गौर से देखा
वँया आँखें रोके सूज गयी थी
एक तरफ मुझे इस बात का दुख था
कि मैं मेघा दी का बदला नही ले पाया
और दूसरा दुख मेरे 1 दिन ना रहने से वँया की यह हालत हो गई
मैने वँया का सर अपनी गोद में रखके बैठ गया
पता नही कब नींद आ गई
जब मैं उठा तो देखा वँया अभी भी मेरे गोद में सोई हुई है
मैं वँया का सर आहिस्ता से तकिया पर रख ही रहा था
कि वँया की आँख खुल गयी
वँया चीखते हुए मेरे गले लग गयी
और मेरे चेहरे को चूमने लगी
दिलीप- अरे बस बस क्या कर रही हो
[मैं इतना ही बोला था कि वँया ने एक साथ 4 थप्पड़ मेरे 2नो गालो पे जड़ दिए और मेरे गले लग्के रोने लगी]
थप्पड़ मुझपे पड़े और रो तुम रही हो
वँया- तुमने ऐसा किया ही क्यूँ कहाँ थे सुबह से पता है सब कितने परेशान थे
दिलीप- सुबह में टहलने गया था
थोड़ी देर पार्क में बैठ गया बैठते हुए मुझे नींद आ गई
[मैने अपने हिसाब से जो कहानी सोची थी वही वँया को बता दी]
वँया- तुम यही पे बैठो मैं सब को बुलाती हूँ
दिलीप- क्यो तुम भी सुबह सुबह सब की नींद खराब कर रही हो
वँया- कोई नींद नही खराब होगी
दिलीप- वँया यह कहके बाहर चली गयी
मैं जल्दी से बाथरूम भागा और हल्का हुआ
मैं बाथरूम से निकलके बेड पे बैठ गया
और सोचने लगा कि 5 बहनो की हिसाब से कितने थप्पड़ पड़ेंगे
उपर से सी मामा की डाँट और कोटि मामी की गालियाँ....