- Joined
- Dec 5, 2013
- Messages
- 31,768
सोनू की चाची का गदराया बदन सूरज को भा गया था,,, इसीलिए तो घास का ढेर उठाते समय सूरज उसका हाथ पकड़ लिया था और कुछ देर के लिए दोनों एक दूसरे की आंखों में खो गए थे वैसे तो सूरज को ज्यादा अनुभव औरतों के बारे में था नहीं लेकिन सोनू की चाची की आंखों में भी वही दिख रहा था जो मुखिया की बीवी की आंखों में दिख रहा था इससे सुरज अंदाजा लगा दिया था कि सोनू की चाची का भी हाल मुखिया की बीवी की तरह ही है,,,, वैसे तो सोनू की चाची से सूरज बहुत बार मिल चुका था कई बार मुलाकात हुई थी और बातचीत भी हुई थी क्योंकि वह सोनू का दोस्त जो था उसके घर पर आना जाना अक्सर उसका लगा रहता था लेकिन सूरज ने कभी भी सोनू की चाची को गलत नजरिए से नहीं देखा था लेकिन सोनू ने ही खुद सूरज को झाड़ियां में अपनी चाची को पेशाब करते हुए दिखाया था उसकी बड़ी-बड़ी गांड उसे समय सूरज के तन बदन में आग लगागई थी,,, उस समय सूरज को औरतों के अंगों के बारे में कुछ ज्यादा ज्ञान नहीं था लेकिन फिर भी सोनू की चाची की बड़ी-बड़ी गांड उसे औरतों के बारे में सोने के लिए मजबूर कर गई थी,,,।
सोनू की चाची की गांड के दर्शन करने के बाद सूरज की मुलाकात मुखिया की बीवी के साथ हुआ था जिसने उसे एक ही बात में स्वर्ग का सुख प्रदान की थी,,, और मुखिया की बीवी के बदौलत ही औरतों के अंगों के बारे में सोचने समझने लगा था उनके तरफ आकर्षित होने लगा था और यही कारण था कि सोनू की चाची की तरफ उसका आकर्षण बढ़ता जा रहा था एक तो सोनू ने खुद अपनी ही चाची की मजबूरी बता दिया था सोनू ने खुद यह बता दिया था कि उसका मरियल सा चाचा उसकी चाची को खुश नहीं कर पाता इससे सूरत समझ गया था की मुखिया की बीवी की तरह सोनू की चाची को भी मोटा तगड़ा लंड चाहिए,,,।
आगे आगे चल रही सोनू की चाची का पिछवाड़ा देखकर सूरज का लंड खड़ा हो गया था,, और सूरज मन ही मन ठान लिया था कि मुखिया की बीवी की तरह सोनू की चाची की भी बुर में वह झंडा गाड़ के रहेगा,,,, घास के गठ्ठर को सोनू के घर पहुंचाते पहुंचाते ही दोपहर हो गई थी,,, सूरज को बहुत जोरों की भूख लगी हुई थी,,,, दोपहर हो चली थी खाने का समय भी हो रहा था उसे मालूम था कि उसकी मां खाने पर उसका इंतजार कर रही होगी,,, इसलिए वह अपने घर की ओर चल दिया,,,।
नदी पर जो कुछ भी उसने देखा था वह एक अमिट छाप की तरह उसके दिमाग पर छप गया था,,,। उसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था की नदी पर जो कुछ भी उसने देखा था वह उसकी मां थी उसे तो ऐसा ही लग रहा था कि जैसे स्वर्ग से कोई अप्सरा नदी में नहाने के लिए नदी में जल क्रीड़ा करने के लिए उतर आई हो,,, उसकी अदाएं उसका भोलापन उसके घने घने बाल पानी में भीगे हुए जो कभी उसकी पीठ से चिपके हुए तो कभी बालों की लट सीधा उसकी चूचियों तक पहुंच रही थी पानी में भीगी हुई बालों की लट बेहद खूबसूरत लग रही थी,,, खरबूजे की तरह गोल-गोल चुचीया एकदम कसी हुई,,, भरावधार बदन होने के बावजूद भी पूरा बदन एकदम कसा हुआ था जरा भी ढीलापन नहीं था,,, गोलाकार नितंबों को देखकर सूरज को ऐसा ही लग रहा था कि जैसे चंद्रमा आसमान को छोड़कर नदी के पानी में उतर आया हो कुल मिलाकर नदी में जो कुछ भी सूरज ने देखा था उसे स्वर्ग से उतरी हुई अप्सरा लग रही थी वह यकीन नहीं कर पा रहा था कि,, नदी के पानी में नहा रही हो औरत स्वर्ग से उतरी हुई अप्सरा नहीं बल्कि उसकी मां है,,,।
सूरज इस बात को तो अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां खूबसूरत है लेकिन इतनी ज्यादा खूबसूरत है यह पहली बार उसे एहसास हो रहा था और पल भर में ही हुआ मुखिया की बीवी की खूबसूरती से अपनी मां की खूबसूरती की तुलना करने लगा था जिसमें उसकी मां की खूबसूरती बाजी मार गई थी,,, इसीलिए तो वह अपनी मां की तरफ आकर्षित हो गया था,,, वैसे भी जब उसका झुकाव औरतों की तरफ बढ़ रहा था,, तभी उसे अपनी मां में एक औरत नजर आने लगी थी जिसकी तरफ वह धीरे-धीरे आकर्षित हो रहा था लेकिन अब वह पक्के तौर पर अपनी मां की जवानी का दीवाना बन गया था,,,,।
देखते ही देखते थोड़ी देर में हो अपने घर पर पहुंच गया जहां पर उसकी मां खाने पर उसका इंतजार कर रही थी,,,, जैसे ही वह घर में प्रवेश किया तो सामने आंगन में ही उसकी मां बेठी हुई थी और उसे देखते ही मुस्कुराते हुए बोली,,,।
अरे खाना तो खा लिया होता,,, सुबह से गांव-गांव भटक रहा है,,,।
भूख नहीं लगी थी मां,,,(अपनी मां की तरफ देखते हुए बोला,,,)
अभी भी नहीं लगी है,,,
नहीं नहीं अभी तो लगी है इसीलिए तो आया हूं,,,,
तो जल्दी से हाथ मुंह धो ले,,,, मैं खाना परोस देती हूं,,,
ठीक है मां,,,(इतना कहकर वह हाथ मुंह धोने के लिए बाहर चला गया,,,, और हाथ मुंह धोते हुए अपने मन में सोचने लगा,,,,,,, नदी में नहा रही मां मे और अभी खाने पर इंतजार कर रही मां मे कितना जमीन आसमान का फर्क है,,,, इसे देखकर तो लगता ही नहीं है की नदी में यही नहा रही थी और वह भी एकदम नंगी होकर,,,, अभी तो घर में एकदम संस्कारी और मर्यादा से भरी हुई लग रही है लेकिन नदी पर अपने कपड़े उतार कर जिस तरह से नहा रही थी उसे देखने के बाद लगता ही नहीं था कि यह जमीन की कोई औरत है ऐसा ही लग रहा था कि स्वर्ग से उतरी हुई कोई अप्सरा है,,,। इस समय वह अपने बदन के कीमती अंगों को कपड़ों में छुपा रखी है लेकिन उसे समय नदी पर अपने सारे कपड़े उतार कर अपने बेश कीमती अंगों को एकदम उजागर करके नहा रही थी,,,, यह सब सोच कर सूरज अपने मन में सोचने लगा कि कहीं उसकी मां का भी चरित्र मुखिया की बीवी की तरह तो नहीं फिर अपने ही मन में उठकर सवाल का खुद ही जवाब देते हुए वह बोला,,,
नहीं नहीं किसी के कपड़े उतारकर नहाने पर उसके चरित्र के बारे में कैसे जान सकते हो,, नंगी होकर नहाना तो कोई चरित्र का मापदंड नहीं है,,, मां बिल्कुल भी मुखिया की बीवी की तरह नहीं है अगर होती तो वह नदी में खुली जगह पर नहाती ना कि बड़े-बड़े पत्थरों के पीछे,,,, लेकिन फिर भी अगर मन को उसे समय उसे अवस्था में नहाते हुए कोई भी देख लेता तो उसका भी लंड खड़ा हो जाता,,,, यह सब सोते हुए उसे थोड़ी देर हो गई तो उसकी मां खुद घर के बाहर निकाल कर उसे देखने के लिए आई और उसे अभी भी हाथ पैर धोते हुए देखकर बोली,,,)
अभी तक धो नहीं पाया,,,।
(अपनी मां की आवाज सुनते ही वहां एकदम से अपने ख्यालों से बाहर आया और अपनी मां की तरफ देखते हुए बोला ,,,)
बस बस हो गया,,, तुम चलो मैं आता हूं,,,,,।
ठीक है जल्दी आ,,,,(इतना कहकर वह अंदर की तरफ जाने लगी तब तक सूरज भी उसके पीछे-पीछे चलने लगा आगे आगे चल रही है अपनी मां का पिछवाड़ा देखकर वह अपने मन में कल्पना करने लगा कि अगर यह बिना कपड़े के चलेगी तो कैसी नज़र आएगी और उसकी कल्पना इतनीजबरदस्ती थी कि वह सच में सोचने लगा था कि जैसे उसकी मां सच में उसके आगे आगे बिना कपड़ों के नग्न अवस्था में चल रही है एकदम नंगी होकर और पीछे-पीछे वह चल रहा है,,, नदी पर नहाते हुए अपनी मां को पूरी तरह से नंगी दे चुका था इसलिए उसकी गांड के आकार की कल्पना करना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी इसलिए वह बड़े आराम से अपनी मां की नंगी गांड की कल्पना कर रहा था और आगे आगे चल रही सुनैना उसके कल्पना के मुताबिक ही जबरदस्त लग रही थी अपनी गांड मटका मटका चल रही थी जिसे देखकर सूरज का लंड अपनी औकात में आकर खड़ा हो गया था,,,।
आंगन में पहुंचने के बाद सूरज सबसे पहले पालथी मार कर बैठ गया क्योंकि उस समय उसके पजामे में तंबू बना हुआ था,,, और वह नहीं चाहता था कि उसकी मां की नजर उसके पजामे पर पड़े,,,, ठीक उसके सामने उसकी मां बैठ गई थी लेकिन वह सूरज की तरह नहीं बल्कि अपने घुटनों को मोड कर बैठी थी,,,, वह खाना परोस रही थी और खाना परोसते हुए उसकी साड़ी कंधे पर से नीचे सरक गई थी जिसकी वजह से उसकी भारी भरकम भरावदार छातिया एकदम साफ नजर आ रही थी,, सूरज की नजर सीधे अपनी मां की छाती पर पहुंच गई उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों के बीच की लकीर एकदम साफ नजर आ रही थी जो की बहुत ही लंबी और गहरी थी और उसके सांस लेने की वजह से उसकी चूचियां ऊपर नीचे हो रही थी जो कि सूरज को एकदम साफ नजर आ रही थी सूरज एकदम पागल हुआ जा रहा था मदहोश हुआ जा रहा था लेकिन इस बात से उसकी मां पूरी तरह से अनजान थी,,,।
उसकी मां सुनना तो सहज रूप से खाना परोस रही थी वह नहीं जानती थी कि उसका बेटा उसके अंगों को प्यासी नजरों से देख रहा है ब्लाउज में से झांक रही है उसकी चूचियां कबूतर की तरह फड़फड़ा रही थी मानो कि जैसे आजादी के लिए नारा लगा रही हो,,,, अपनी मां की चूचियों को देखकर जो की ब्लाउज में कह दी सूरज को मुखिया की बीवी की चुचीया याद आ गई,,,, क्योंकि सूरजमुखी की बीवी की तरह ही अपनी मां की चूचियों को आजाद करना चाहता था उन्हें ब्लाउज के कैद से बाहर निकलना चाहता था उन्हें खुली हवा में सांस लेने देना चाहता था,,,, लेकिन वह जानता था कि ऐसा करना उसके लिए नामुमकिन है,,,,।
देखते ही देखते सुनैना अपने बेटे के लिए और खुद के लिए खाना परोस ली और खाने की थाली को अपने बेटे की तरफ आगे बढ़कर अपनी जगह से उठने लगी तो वह थोड़ा सा आगे की तरफ झुक गई जिसकी वजह से उसकी सूचना ब्लाउज में एकदम खरबूजे की तरह गोल-गोल लटक गई उसकी चूचियां इतनी भारी हुई थी कि,,, सूरज को इस बात का डर था कि कहीं चूचियों के भार से उसकी मां की ब्लाउज का बटन ना टूट जाए,,,, और सूरज अपने मन में कल्पना करने लगा कि बिना ब्लाउज पहने नंगी चूचियां लेकर अगर उसकी मां उसके लिए खाना परोसेगी तो कैसी नज़र आएगी,,, अपनी मां के बारे में सोच सोच कर उसकी हालत खराब हुए जा रही थी,,,, तभी सुनैना पानी भर लोटा लेकर आई हो इस बार साड़ी को थोड़ा घुटनों के नीचे तक उठकर बैठ गई और पानी भर लोटा बीच में रख दी,,,,,।
अरे खाना तो खा,,,(खाने का निवाला अपने मुंह में डालते हुए सुनैना बोली)
खा रहा हूं मा ,,(और इतना कहकर वह भी खाने लगा,,, खाते-खाते वह बोला,,)
रानी कहां गई दिखाई नहीं दे रही है,,,,
पका हुआ आम लेकर अपनी सहेली के वहां गई है खाते हुए,,,,,,
लगता है आज वह बहुत खुश है,,,
हां खुश क्यों नहीं होगी पका हुआ आम जो मिल गया है,,,,,,।
सही कह रही हो मा रानी को आम बहुत पसंद है,,,
रानी को ही क्यों मुझे भी बहुत पसंद है लेकिन क्या करें,,, मौसम चल जाता है लेकिन जी भर कर आम खाने को नहीं मिलता,,,,।
लेकिन मैं और रानी बगीचे में आम तोड़ कर तो लाए थे,,,।
अरे उसे बगीचे के हम तो केवल अचार बनाने को ही काम आते हैं पकाने पर भी वह ठीक तरह से पकता नहीं है,,,(खाना खाते हुए सुनैना पूरी इस बार वह अपनी साड़ी को अपने कंधे से गिरने नहीं दी थी और सूरज अपने मन में यही चाहता था कि किसी भी तरह से उसकी मां की साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिर जाए तो एक बार फिर से उसे बेहद खूबसूरत नजारा देखने को मिल जाए,,,, वैसे भी सूरज की तरह हर मर्दों कि यही फितरत होती है औरत को भले ही कितनी बार नंगी देखने अपने ही बिस्तर पर भोग ले लेकिन हर एक बार औरत के अंगों से उनकी नई ख्वाहिश जागने लगती है जिसमें सूरज भी बाकात नहीं था।)
सोनू की चाची की गांड के दर्शन करने के बाद सूरज की मुलाकात मुखिया की बीवी के साथ हुआ था जिसने उसे एक ही बात में स्वर्ग का सुख प्रदान की थी,,, और मुखिया की बीवी के बदौलत ही औरतों के अंगों के बारे में सोचने समझने लगा था उनके तरफ आकर्षित होने लगा था और यही कारण था कि सोनू की चाची की तरफ उसका आकर्षण बढ़ता जा रहा था एक तो सोनू ने खुद अपनी ही चाची की मजबूरी बता दिया था सोनू ने खुद यह बता दिया था कि उसका मरियल सा चाचा उसकी चाची को खुश नहीं कर पाता इससे सूरत समझ गया था की मुखिया की बीवी की तरह सोनू की चाची को भी मोटा तगड़ा लंड चाहिए,,,।
आगे आगे चल रही सोनू की चाची का पिछवाड़ा देखकर सूरज का लंड खड़ा हो गया था,, और सूरज मन ही मन ठान लिया था कि मुखिया की बीवी की तरह सोनू की चाची की भी बुर में वह झंडा गाड़ के रहेगा,,,, घास के गठ्ठर को सोनू के घर पहुंचाते पहुंचाते ही दोपहर हो गई थी,,, सूरज को बहुत जोरों की भूख लगी हुई थी,,,, दोपहर हो चली थी खाने का समय भी हो रहा था उसे मालूम था कि उसकी मां खाने पर उसका इंतजार कर रही होगी,,, इसलिए वह अपने घर की ओर चल दिया,,,।
नदी पर जो कुछ भी उसने देखा था वह एक अमिट छाप की तरह उसके दिमाग पर छप गया था,,,। उसे अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हो रहा था की नदी पर जो कुछ भी उसने देखा था वह उसकी मां थी उसे तो ऐसा ही लग रहा था कि जैसे स्वर्ग से कोई अप्सरा नदी में नहाने के लिए नदी में जल क्रीड़ा करने के लिए उतर आई हो,,, उसकी अदाएं उसका भोलापन उसके घने घने बाल पानी में भीगे हुए जो कभी उसकी पीठ से चिपके हुए तो कभी बालों की लट सीधा उसकी चूचियों तक पहुंच रही थी पानी में भीगी हुई बालों की लट बेहद खूबसूरत लग रही थी,,, खरबूजे की तरह गोल-गोल चुचीया एकदम कसी हुई,,, भरावधार बदन होने के बावजूद भी पूरा बदन एकदम कसा हुआ था जरा भी ढीलापन नहीं था,,, गोलाकार नितंबों को देखकर सूरज को ऐसा ही लग रहा था कि जैसे चंद्रमा आसमान को छोड़कर नदी के पानी में उतर आया हो कुल मिलाकर नदी में जो कुछ भी सूरज ने देखा था उसे स्वर्ग से उतरी हुई अप्सरा लग रही थी वह यकीन नहीं कर पा रहा था कि,, नदी के पानी में नहा रही हो औरत स्वर्ग से उतरी हुई अप्सरा नहीं बल्कि उसकी मां है,,,।
सूरज इस बात को तो अच्छी तरह से जानता था कि उसकी मां खूबसूरत है लेकिन इतनी ज्यादा खूबसूरत है यह पहली बार उसे एहसास हो रहा था और पल भर में ही हुआ मुखिया की बीवी की खूबसूरती से अपनी मां की खूबसूरती की तुलना करने लगा था जिसमें उसकी मां की खूबसूरती बाजी मार गई थी,,, इसीलिए तो वह अपनी मां की तरफ आकर्षित हो गया था,,, वैसे भी जब उसका झुकाव औरतों की तरफ बढ़ रहा था,, तभी उसे अपनी मां में एक औरत नजर आने लगी थी जिसकी तरफ वह धीरे-धीरे आकर्षित हो रहा था लेकिन अब वह पक्के तौर पर अपनी मां की जवानी का दीवाना बन गया था,,,,।
देखते ही देखते थोड़ी देर में हो अपने घर पर पहुंच गया जहां पर उसकी मां खाने पर उसका इंतजार कर रही थी,,,, जैसे ही वह घर में प्रवेश किया तो सामने आंगन में ही उसकी मां बेठी हुई थी और उसे देखते ही मुस्कुराते हुए बोली,,,।
अरे खाना तो खा लिया होता,,, सुबह से गांव-गांव भटक रहा है,,,।
भूख नहीं लगी थी मां,,,(अपनी मां की तरफ देखते हुए बोला,,,)
अभी भी नहीं लगी है,,,
नहीं नहीं अभी तो लगी है इसीलिए तो आया हूं,,,,
तो जल्दी से हाथ मुंह धो ले,,,, मैं खाना परोस देती हूं,,,
ठीक है मां,,,(इतना कहकर वह हाथ मुंह धोने के लिए बाहर चला गया,,,, और हाथ मुंह धोते हुए अपने मन में सोचने लगा,,,,,,, नदी में नहा रही मां मे और अभी खाने पर इंतजार कर रही मां मे कितना जमीन आसमान का फर्क है,,,, इसे देखकर तो लगता ही नहीं है की नदी में यही नहा रही थी और वह भी एकदम नंगी होकर,,,, अभी तो घर में एकदम संस्कारी और मर्यादा से भरी हुई लग रही है लेकिन नदी पर अपने कपड़े उतार कर जिस तरह से नहा रही थी उसे देखने के बाद लगता ही नहीं था कि यह जमीन की कोई औरत है ऐसा ही लग रहा था कि स्वर्ग से उतरी हुई कोई अप्सरा है,,,। इस समय वह अपने बदन के कीमती अंगों को कपड़ों में छुपा रखी है लेकिन उसे समय नदी पर अपने सारे कपड़े उतार कर अपने बेश कीमती अंगों को एकदम उजागर करके नहा रही थी,,,, यह सब सोच कर सूरज अपने मन में सोचने लगा कि कहीं उसकी मां का भी चरित्र मुखिया की बीवी की तरह तो नहीं फिर अपने ही मन में उठकर सवाल का खुद ही जवाब देते हुए वह बोला,,,
नहीं नहीं किसी के कपड़े उतारकर नहाने पर उसके चरित्र के बारे में कैसे जान सकते हो,, नंगी होकर नहाना तो कोई चरित्र का मापदंड नहीं है,,, मां बिल्कुल भी मुखिया की बीवी की तरह नहीं है अगर होती तो वह नदी में खुली जगह पर नहाती ना कि बड़े-बड़े पत्थरों के पीछे,,,, लेकिन फिर भी अगर मन को उसे समय उसे अवस्था में नहाते हुए कोई भी देख लेता तो उसका भी लंड खड़ा हो जाता,,,, यह सब सोते हुए उसे थोड़ी देर हो गई तो उसकी मां खुद घर के बाहर निकाल कर उसे देखने के लिए आई और उसे अभी भी हाथ पैर धोते हुए देखकर बोली,,,)
अभी तक धो नहीं पाया,,,।
(अपनी मां की आवाज सुनते ही वहां एकदम से अपने ख्यालों से बाहर आया और अपनी मां की तरफ देखते हुए बोला ,,,)
बस बस हो गया,,, तुम चलो मैं आता हूं,,,,,।
ठीक है जल्दी आ,,,,(इतना कहकर वह अंदर की तरफ जाने लगी तब तक सूरज भी उसके पीछे-पीछे चलने लगा आगे आगे चल रही है अपनी मां का पिछवाड़ा देखकर वह अपने मन में कल्पना करने लगा कि अगर यह बिना कपड़े के चलेगी तो कैसी नज़र आएगी और उसकी कल्पना इतनीजबरदस्ती थी कि वह सच में सोचने लगा था कि जैसे उसकी मां सच में उसके आगे आगे बिना कपड़ों के नग्न अवस्था में चल रही है एकदम नंगी होकर और पीछे-पीछे वह चल रहा है,,, नदी पर नहाते हुए अपनी मां को पूरी तरह से नंगी दे चुका था इसलिए उसकी गांड के आकार की कल्पना करना उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं थी इसलिए वह बड़े आराम से अपनी मां की नंगी गांड की कल्पना कर रहा था और आगे आगे चल रही सुनैना उसके कल्पना के मुताबिक ही जबरदस्त लग रही थी अपनी गांड मटका मटका चल रही थी जिसे देखकर सूरज का लंड अपनी औकात में आकर खड़ा हो गया था,,,।
आंगन में पहुंचने के बाद सूरज सबसे पहले पालथी मार कर बैठ गया क्योंकि उस समय उसके पजामे में तंबू बना हुआ था,,, और वह नहीं चाहता था कि उसकी मां की नजर उसके पजामे पर पड़े,,,, ठीक उसके सामने उसकी मां बैठ गई थी लेकिन वह सूरज की तरह नहीं बल्कि अपने घुटनों को मोड कर बैठी थी,,,, वह खाना परोस रही थी और खाना परोसते हुए उसकी साड़ी कंधे पर से नीचे सरक गई थी जिसकी वजह से उसकी भारी भरकम भरावदार छातिया एकदम साफ नजर आ रही थी,, सूरज की नजर सीधे अपनी मां की छाती पर पहुंच गई उसकी बड़ी-बड़ी चूचियों के बीच की लकीर एकदम साफ नजर आ रही थी जो की बहुत ही लंबी और गहरी थी और उसके सांस लेने की वजह से उसकी चूचियां ऊपर नीचे हो रही थी जो कि सूरज को एकदम साफ नजर आ रही थी सूरज एकदम पागल हुआ जा रहा था मदहोश हुआ जा रहा था लेकिन इस बात से उसकी मां पूरी तरह से अनजान थी,,,।
उसकी मां सुनना तो सहज रूप से खाना परोस रही थी वह नहीं जानती थी कि उसका बेटा उसके अंगों को प्यासी नजरों से देख रहा है ब्लाउज में से झांक रही है उसकी चूचियां कबूतर की तरह फड़फड़ा रही थी मानो कि जैसे आजादी के लिए नारा लगा रही हो,,,, अपनी मां की चूचियों को देखकर जो की ब्लाउज में कह दी सूरज को मुखिया की बीवी की चुचीया याद आ गई,,,, क्योंकि सूरजमुखी की बीवी की तरह ही अपनी मां की चूचियों को आजाद करना चाहता था उन्हें ब्लाउज के कैद से बाहर निकलना चाहता था उन्हें खुली हवा में सांस लेने देना चाहता था,,,, लेकिन वह जानता था कि ऐसा करना उसके लिए नामुमकिन है,,,,।
देखते ही देखते सुनैना अपने बेटे के लिए और खुद के लिए खाना परोस ली और खाने की थाली को अपने बेटे की तरफ आगे बढ़कर अपनी जगह से उठने लगी तो वह थोड़ा सा आगे की तरफ झुक गई जिसकी वजह से उसकी सूचना ब्लाउज में एकदम खरबूजे की तरह गोल-गोल लटक गई उसकी चूचियां इतनी भारी हुई थी कि,,, सूरज को इस बात का डर था कि कहीं चूचियों के भार से उसकी मां की ब्लाउज का बटन ना टूट जाए,,,, और सूरज अपने मन में कल्पना करने लगा कि बिना ब्लाउज पहने नंगी चूचियां लेकर अगर उसकी मां उसके लिए खाना परोसेगी तो कैसी नज़र आएगी,,, अपनी मां के बारे में सोच सोच कर उसकी हालत खराब हुए जा रही थी,,,, तभी सुनैना पानी भर लोटा लेकर आई हो इस बार साड़ी को थोड़ा घुटनों के नीचे तक उठकर बैठ गई और पानी भर लोटा बीच में रख दी,,,,,।
अरे खाना तो खा,,,(खाने का निवाला अपने मुंह में डालते हुए सुनैना बोली)
खा रहा हूं मा ,,(और इतना कहकर वह भी खाने लगा,,, खाते-खाते वह बोला,,)
रानी कहां गई दिखाई नहीं दे रही है,,,,
पका हुआ आम लेकर अपनी सहेली के वहां गई है खाते हुए,,,,,,
लगता है आज वह बहुत खुश है,,,
हां खुश क्यों नहीं होगी पका हुआ आम जो मिल गया है,,,,,,।
सही कह रही हो मा रानी को आम बहुत पसंद है,,,
रानी को ही क्यों मुझे भी बहुत पसंद है लेकिन क्या करें,,, मौसम चल जाता है लेकिन जी भर कर आम खाने को नहीं मिलता,,,,।
लेकिन मैं और रानी बगीचे में आम तोड़ कर तो लाए थे,,,।
अरे उसे बगीचे के हम तो केवल अचार बनाने को ही काम आते हैं पकाने पर भी वह ठीक तरह से पकता नहीं है,,,(खाना खाते हुए सुनैना पूरी इस बार वह अपनी साड़ी को अपने कंधे से गिरने नहीं दी थी और सूरज अपने मन में यही चाहता था कि किसी भी तरह से उसकी मां की साड़ी का पल्लू उसके कंधे से नीचे गिर जाए तो एक बार फिर से उसे बेहद खूबसूरत नजारा देखने को मिल जाए,,,, वैसे भी सूरज की तरह हर मर्दों कि यही फितरत होती है औरत को भले ही कितनी बार नंगी देखने अपने ही बिस्तर पर भोग ले लेकिन हर एक बार औरत के अंगों से उनकी नई ख्वाहिश जागने लगती है जिसमें सूरज भी बाकात नहीं था।)