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- Dec 5, 2013
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अपडेट :::: 16
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अब्ब तक्क
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कोठी दिल्ली शहर के बहरी तरफ थी.. मैं अपने hi ख्यालों में डूबा हुआ चलता hi जा रहा था. सोचों ने यलग़र की हुई थी शरीर का अंग अंग दर्द कर रहा था. लेकिन अब्ब बर्दाश्त करने की आदत का फ़ायदा होने लगा tha.main शुरू से ढीट भी था.
दर्द तो भूल कर मैं अपनी hi बनाई ख्यालों की दुन्या में गम चलता रहा.
na-jaane कितना दूर तक चला गया था. मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था. जब मैं कोठी से निकला तो 2:पं के आस पास का टाइम तो होगा शायद. कन्फर्म नहीं है. बस अंदाज़ा hi था.
मुझे ख्यालों की दुन्या से बहार निकलने वाली एक चीख थी.
जिस में दर्द था जैसे कोई खतरे में हो.
मैंने हड़बड़ा कर अपने ird-gird के माहौल को देखा दूर दूर तक कोई भी मकान नहीं दिखाई दे रहा tha."chalte चलते मैं इतनी दूर कैसे आ गया. में इतना अपने ख्यालों में गम था के मुझे पता hi नहीं चल"
सनसन इलाका था. रोड से काफी दूर झाड़ियों में कुछ लोग दिखे मुझे.
मैं उस तरफ को चल दिया. जब वहां पोहंचा तो देखा एक लड़की ज़मीन पर पड़ी कराह रही है और एक औरत के साथ गुंडे टाइप बन्दे जबर्सती कर रहे थे.....
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अपडेट : 16
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अब्ब आगी
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""ये देख कर मेरा दमाग hi ख़राब होने लगा साला अभी एक hi दिन हुआ है कोठे की दुन्या को छोड़े हुए, और यहाँ भी कोठे पर रहने वाली bebas,majboor और लाचार लड़कियों और ौटों की तरह कोई भी कोई भी लड़की हो या औरत मेहफ़ूज़ नहीं.
क्या कोई ऐसी जगा भी है जहाँ aurat-zaat की इज़्ज़त की जाती हो. हर कोई औरत को सिर्फ भोगने की मशीन hi समझता है. साली दुन्या जब भी किसी अकेली लड़की या औरत को देखती है तो राल टपकने लगती है हरामी साले कुत्ते कही के""
""मेरा ग़ुस्सा आखरी हद को छूने लगा मेरा सारा दर्द कहाँ गया मुझे नहीं पता. मुझे अपनी माँ की बेबसी याद आने लगी जब भी उसका उत्तरा हुआ चेहरा देखता था मैं सब समझ जाया करता था. के माँ hi ये ऐसी हालत क्यों है..!!
आज भी एक माँ की इज़्ज़त खतरे में थी. और मेरे रहते कोई एक माँ की इज़्ज़त को तार तार करे मैं उसका सर्र hi उखड के रख दूंगा. आज मुझे अपने अंदर की दुन्या hi बदली हुई महसूस होने lagi.aisa लगने लगा के मेरे अंदर कोई जवालामुखी उबाल रहा हो. और बहार आने को बेचैन हो रहा हो...
लेकिन एक बात थी, मैं लड़ाई लड़ना नहीं जनता था. इस लिए सोचना पड़ा क ऐसा क्या करून क उस बेचारी औरत की इज़्ज़त बच जाये. कुछ समझ नहीं आया तो टाइम को बर्बाद न करते हुए मैं भाग कर एक गुंडे के पीछे आया और एक ज़ररदार लात उस के पिछवाड़े पर दे मारी वो थोड़ी दूर जा कर गिरा. लेकिन tab-tak दूसरा संभल गया. और मेरी तरफ लपका. मेने भी आगे बढ़ कर उसके पेट पे सर की टक्कर दे मारी टक्कर कुछ ज़यादा hi जोरर की लग गई. वो पेट पकड़ कर थोड़ा पीछे हटा.
मुझे भी चक्कर आने लगे. साला गेंदे की नेसल से था वो. वो गुंडा तो गिरा नहीं लेकिन मेरा सर्र चक्र गया. फिर पहले गुंडे ने आ के मुझे पीछे से लात मारी मेरी गांड हिल कर रह गई.
"aaaaaaaaaaaaaaa mamaaaaaaaaaaaaaaa" merrrrrrraaaaaaaaaaaaaaaaa piiiiccccccchhhhhhhwwwwwwaaaaaaadddddddaaaaaaaaaaaa""
""हाय मारररर दिया साले हरामी ने""
"साला अपनी चोटों को तो मैं भूल hi गया था". चूतड़ों का एक बार फिरसे हशर नशर हो गया. दिल किया भाग लून यहाँ से कही आंटी को बचने के चक्कर में मेरे चुत्तडों का hi सत्यानाश न हो जाये"
गुंडे की लत लगने से मैं उछाल कर आगे दुसरे गुंडे के ऊपर जा गिरा. अब्ब सर्र के चक्कर तो काम हो गए थे लेकिन चुत्तडों का दर्द जान निकलने लगा.
जिस गुंडे के ऊपर में गुरा उसने मुझे अपने ऊपर से उठा कर साइड फ़ेंक diya.aur दोनों गुंडे मिलकर चल दिए उस औरत की तरफ.
मैं लड़ाई में शामिल तो गया था ग़ुस्से में आ कर. लेकिन मुझे तो लड़ना भी नहीं आता था. ""क्या करून"" अब्ब लड़ाई तो लड़नी hi थी.
""...लडूंगा नहीं तो सीखों गए कैसे .. और सीखों गए नहीं तो अपनी माँ और बहनो को बचाऊँगा कैसे..""
ऐसी सोच के आते hi मेरी हिम्मत बढ़ने लगी. एक लड़की की आवाज़ सुनाई दी. वो चीखते हुए ""माँ उठो .. माँ उठो"" ..बोल रही थी. मैंने देखा तो दोनों गुंडे फिर से उस औरत पर झपटने की तैयारी कर रहे थे. मैंने idhar-udhar देखा कोई काम की चीज़ मिल सके तो कुछ किया जाये.
एक छोटा पत्थर का नुकीला टुकड़ा नज़र आया मुझे. वो कुछ ज़यादा hi छोटा था. 4" का छोटे से पठार का टुकड़ा था. चलो कुछ न कुछ तो है शायद इस से काम बन जाये. मैंने उस पत्थर की नोक को अपनी उँगलियों के दरमियान से बहार निकल कर अपनी मुठी को बंद किया और नोक वाली साइड को एक आदमी के सर पे पीछे की तरफ जोरर से मारा लेकिन वो साला ऐन मौका पर अचानक से थोड़ा सा घूम गया. पत्थर उसे लगा ज़रूर. लेकिन कुछ ख़ास फरक नहीं पड़ा. वो सतर्क हो गया और दूसरा गुंडा भी ये देख चौकन्ना हो गया. अब्ब उन दोनों को मुझपर ग़ुस्सा कुछ ज़यादा hi आने लगा tha.(saala कल का छोकरा उन गुंडों से लड़ेगा) मैंने उनके man-pasnad काम में टांग जो घुसा दी thi.abb वो दोनों गुंडे मुझे छोड़ने वाले नहीं थे. साले दोनों अचानक से मुझ पर झपट पड़े....
मेरी सेहत अछि है जिस्म भी मज़बूत है मैं कमज़ोर भी नहीं हूँ. बस इन तीन चार दिनों में कुछ कुछ पंक्चर हो गया tha.lekin वो दोनों हराम के जाने पूरे सांड थे. मुझसे टकराये और में किसे बचे की तरह उछलता हुआ थोड़ा दूर जा कर धड़ाम से नीचे गिरा.
"aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa"
मैं फिरसे पिछवाड़े के बॉल गिरा एक बार तो मुझे दिन में hi तारे नज़र आने लगे. ऐसे लगा मैं ज़मीन पारर नहीं ज़मीन पारर पड़े छोटे छोटे पत्थर के नुकीले टुकड़ों पर जा गिरा हूँ और सारे छोटे छोटे पत्थर मेरे पिछवाड़े में घुस गए हैं. मेरी चीखें निकलने लगी..
वो हरामज़ादे दोनों गुंडे हंसने लगे ....
""लेकिन मैंने एक बात पर धयान ज़रूर दिया था.""
गिरते गिरते भी "पत्थर" को मैंने अपने हाथ से छूटने नहीं दिया. एक गुंडा आगे मेरे तरफ आया और मेरे पेट पारर एक लात मरने लगा. खुद को पेट में पड़ने वाली से बचने के लिए मैंने अपने दर्द को बर्दाश्त करते हुए अपने हाथ में मौजूद पत्थर के नुकीले हिस्से को उस गुंडे के घुटने के जोड़ पर अपनी बची खुची ताक़त लगा कर मार दिया. पत्थर की नोक सही से उसके घुटने पर लग गई.
Aaaaaaaaaaa मर्डरर गैय्यिययियाआआआ ....
की आवाज़ उस वीराने में गूँज गई और वो अपने घुटने को पाकर लंगड़ाता हुआ एक टांग पर नाचने लगा. दूसरा आदमी कुछ देर के लिए पहले आदमी की तरफ देखने लगा उसे पता hi नहीं चला के उस के दोस्त को चोट किस चीज़ से लगी है. वो इस लिए थोड़ा सुरप्रीसेड था. मैंने दुसरे गुंडे के पीछे आ कर उसे कोई मौका दिए बगैर उस के सर्र के पिछली तरफ उस नुकीले पत्थर से अपनी पूरी ताक़त से वर्कर कर दिया.
क्यूंकि मैं डर गया था अगर अब अगर मैं इनके हाथ लगा तो ये मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे. क्यूंकि मैंने एक गुंडे को ज़ख़्मी कर दिया था. इन जैसे हरामी आदमियों की नेचर मैं अच्छी तरह से जनता था. मुझे लड़ना भले hi न आता हो लेकिन जिस माहौल में मैं रहा हूँ वहां इन जैसे haram-zaadon की दुन्या बस्ती है. इस लिए इस दुन्या की साड़ी haram-zadgiyon का नॉलेज था मुझे. बस लड़ना नहीं आता था. जिस आदमी के मैंने पीछे से पत्थर मारा था. उसे पत्थर कुछ ज़यादा hi लग गया था. वो बेहोश होने के करीब था. पहले वाला भी अभी तक लंगड़ा रहा था लेकिन अब्ब तब उसने अपने दर्द पर काबू प् लाया था. हाँ लंगड़ा ज़रूर रहा था.
मैंने उसकी तरफ देखा
""' ओह्ह्ह्हह टेरररीई भिन्नन्न न के..""""
साले ने चाकू निकल लिया था.
मुझे तो हाथ से भी सही तरह से लड़ना नहीं आता था. इसने तो चाकू hi निकल लिया था.. अब क्या करून..???
चाकू देख कर चूतड़ों के साथ साथ अब्ब गांड में भी कुछ कुछ चुभने laga.saala कही आज मैं मर्डर hi न जाओं.
"ऐसे कैसे मैं मर्डर सकता हूँ. मैं यहाँ मरने के लिए तो नहीं आया. कुछ तो करना पड़ेगा"
मैंने इधर उधर देखा वो औरत और लड़की अब्ब काफी दूर कड़ी थी.
मैं उस लड़की और औरत को देख हैरान रह gaya"me लड़ाई में ीनता गम था के मुझे इन दोनों का पता hi नहीं चला . "चलो ाचा हुआ अब्ब तो वो दोनों सेफ हैं"
अब्ब इस चाकू वाले से कैसे बचूं. इतना तो मुझे पता था वो साला अब्ब इतना तेज़ी से नहीं लाडे गए लंगड़ा जो हो गया था.
उसका चाकू देख कर मुझे लगा इस दुसरे गुंडे के पास भी चाकू होना चाहिए जो बेहोश पड़ा है. मैंने जल्दी ने उस की तलाशी लेनी शुरू की.
मुझे उसके पास से चाकू मिल गया. मैंने जल्दी से चाकू निकल कर अपने हाथ में पकड़ लिया.
साला वो लंगड़ा इतनी देर में मुझ तक पोहंच गया था. इससे पहले के वो मेरे चाकू मरता मैं जल्दी से नीचे गिर gaya.warna मेरा गाला hi कट जाता.
वो एक पेअर से लंगड़ा हो गया था तो खुद को संभाल नहीं पाया और गिरने लगा.
वो गुंडा मेरे ऊपर hi गिरने वाला था, मैं जल्दी से कल्टी मार के साइड हो कर खुद को बचाया, कहीं मुझपर न आ गिरे, और मेरा राम नाम सत्य यही हो जाये और माँ और बहनो वही कोठे पे......
वो चाकू समेत अपने साथी के ऊपर गिरा उस का चाकू उसके अपने साथी की hi पीठ में घुस गया. मैंने देर नहीं की. मैंने जल्दी से अपने हाथ की मुठी में दबे पत्थर से उस गुंडे के भी सर्र पारर वारर कर दिया वो भी नीचे गिर गया. फिर मैंने तीन बार और उसके सर्र पे जोरर से उस पत्थर को फिर से मारा उस का काम ख़तम. शायद ये भी बेहोश हो गया था....
मैंने उसे लात से हिला कर देखा वो साइड में पलट गया लेकिन बेहोश था
मैंने औरत की तरफ देखा. तो वो और उस की बेटी मेरी तरफ आ रही थी.
औरत रट हुए मुझे boli.....""Beta में तेरा किस मोहन से शुक्रिया अदा करून तुमने हमें बचा लिया........
विजय ....... आंटी जी ऐसी बात न करें औरत की इज़्ज़त बड़ी कीमती होती है.
"फिर खुद में hi बोलै" इस बात को मुझसे बेहतर कौन जान सकता है.
मुझे आपको इस हालत में देख कर बोहत बुरा लगा. इस लिए मुझसे रहा नहीं गया. तो आप की मदद कर दी.
आंटी .... बीटा तुम न आते तो मेरा और बेटी का पता नहीं क्या होता.
""मैंने लड़की की तरफ देखा. दर्री दर्री हुई सी मासूम सी फटते पुराने से कपडे पहने हुए मुझे चक्कर चक्कर देख रही थी...."""
विजय ..... आंटी आप का घर कहाँ है.
आंटी ....बीटा शहर के शुरू में जो आबादी है वहां रहती हूँ.
विजय ... आप यहाँ कैसे आई इस वरन इलाके में ....
आंटी. .... बीटा यहाँ से थोड़ी एक और बस्ती है. वहां मेरी बेटी के लिए दवाई लेने जा रही तो ये गुंडे रास्ते में मिल गए. ये मुझे पहले भी परेशां करते रहते थे. आज मुझे देख कर ये मेरे पीछे आ गए.
विजय .... तो इतनी दूर जा के दवाई लेने जाने की क्या ज़रुरत थी. और अगर आपको ये गुंडे परेशां करते थे तो आपने अपने घर में किसी को बताया क्यों नहीं.
आंटी .... जहाँ हम रहते हैं वहां का डॉक्टर आज नहीं आया था. इस लिए पास वाली बस्ती जा रहे थे... (फिर रट हुए) हमारा इस दुन्या में और कोई नहीं है. हम दोनों माँ बेटी अकेले hi रहती है.
विजय .... गुंडों की तरफ इशारा करते हुए.
विजय .... ये दोनों कौन हैं.
आंटी ......""दररते हुए"" ये हमारे इलाके के आवारा गुंडे हैं सारा दिन
gunda-gardi करते रहते हैं.
विजय ..... फिर तो मसला हो गया अब्ब क्या करें ये तो अब्ब हमें भी नहीं छोड़ें गे.
आंटी .... (रट हुए) बीटा इन दोनों के और भी साथी हैं अब्ब ये हम माँ बेटी को उठा लें जायेंगे हम तो पहले hi dar-ba-dar की ठोकरें कहते हुए इस जगा ए थे. अब कहाँ जायेंगे हमारे पास तो कोई ठिकाने भी नहीं.
मैंने दोनों गुंडों की तरफ देखा.
""""ओह्ह्ह्हह्हह terrrrrrrrrrriiiiiiii"""
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अब्ब तक्क
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कोठी दिल्ली शहर के बहरी तरफ थी.. मैं अपने hi ख्यालों में डूबा हुआ चलता hi जा रहा था. सोचों ने यलग़र की हुई थी शरीर का अंग अंग दर्द कर रहा था. लेकिन अब्ब बर्दाश्त करने की आदत का फ़ायदा होने लगा tha.main शुरू से ढीट भी था.
दर्द तो भूल कर मैं अपनी hi बनाई ख्यालों की दुन्या में गम चलता रहा.
na-jaane कितना दूर तक चला गया था. मुझे कोई अंदाज़ा नहीं था. जब मैं कोठी से निकला तो 2:पं के आस पास का टाइम तो होगा शायद. कन्फर्म नहीं है. बस अंदाज़ा hi था.
मुझे ख्यालों की दुन्या से बहार निकलने वाली एक चीख थी.
जिस में दर्द था जैसे कोई खतरे में हो.
मैंने हड़बड़ा कर अपने ird-gird के माहौल को देखा दूर दूर तक कोई भी मकान नहीं दिखाई दे रहा tha."chalte चलते मैं इतनी दूर कैसे आ गया. में इतना अपने ख्यालों में गम था के मुझे पता hi नहीं चल"
सनसन इलाका था. रोड से काफी दूर झाड़ियों में कुछ लोग दिखे मुझे.
मैं उस तरफ को चल दिया. जब वहां पोहंचा तो देखा एक लड़की ज़मीन पर पड़ी कराह रही है और एक औरत के साथ गुंडे टाइप बन्दे जबर्सती कर रहे थे.....
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अपडेट : 16
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अब्ब आगी
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""ये देख कर मेरा दमाग hi ख़राब होने लगा साला अभी एक hi दिन हुआ है कोठे की दुन्या को छोड़े हुए, और यहाँ भी कोठे पर रहने वाली bebas,majboor और लाचार लड़कियों और ौटों की तरह कोई भी कोई भी लड़की हो या औरत मेहफ़ूज़ नहीं.
क्या कोई ऐसी जगा भी है जहाँ aurat-zaat की इज़्ज़त की जाती हो. हर कोई औरत को सिर्फ भोगने की मशीन hi समझता है. साली दुन्या जब भी किसी अकेली लड़की या औरत को देखती है तो राल टपकने लगती है हरामी साले कुत्ते कही के""
""मेरा ग़ुस्सा आखरी हद को छूने लगा मेरा सारा दर्द कहाँ गया मुझे नहीं पता. मुझे अपनी माँ की बेबसी याद आने लगी जब भी उसका उत्तरा हुआ चेहरा देखता था मैं सब समझ जाया करता था. के माँ hi ये ऐसी हालत क्यों है..!!
आज भी एक माँ की इज़्ज़त खतरे में थी. और मेरे रहते कोई एक माँ की इज़्ज़त को तार तार करे मैं उसका सर्र hi उखड के रख दूंगा. आज मुझे अपने अंदर की दुन्या hi बदली हुई महसूस होने lagi.aisa लगने लगा के मेरे अंदर कोई जवालामुखी उबाल रहा हो. और बहार आने को बेचैन हो रहा हो...
लेकिन एक बात थी, मैं लड़ाई लड़ना नहीं जनता था. इस लिए सोचना पड़ा क ऐसा क्या करून क उस बेचारी औरत की इज़्ज़त बच जाये. कुछ समझ नहीं आया तो टाइम को बर्बाद न करते हुए मैं भाग कर एक गुंडे के पीछे आया और एक ज़ररदार लात उस के पिछवाड़े पर दे मारी वो थोड़ी दूर जा कर गिरा. लेकिन tab-tak दूसरा संभल गया. और मेरी तरफ लपका. मेने भी आगे बढ़ कर उसके पेट पे सर की टक्कर दे मारी टक्कर कुछ ज़यादा hi जोरर की लग गई. वो पेट पकड़ कर थोड़ा पीछे हटा.
मुझे भी चक्कर आने लगे. साला गेंदे की नेसल से था वो. वो गुंडा तो गिरा नहीं लेकिन मेरा सर्र चक्र गया. फिर पहले गुंडे ने आ के मुझे पीछे से लात मारी मेरी गांड हिल कर रह गई.
"aaaaaaaaaaaaaaa mamaaaaaaaaaaaaaaa" merrrrrrraaaaaaaaaaaaaaaaa piiiiccccccchhhhhhhwwwwwwaaaaaaadddddddaaaaaaaaaaaa""
""हाय मारररर दिया साले हरामी ने""
"साला अपनी चोटों को तो मैं भूल hi गया था". चूतड़ों का एक बार फिरसे हशर नशर हो गया. दिल किया भाग लून यहाँ से कही आंटी को बचने के चक्कर में मेरे चुत्तडों का hi सत्यानाश न हो जाये"
गुंडे की लत लगने से मैं उछाल कर आगे दुसरे गुंडे के ऊपर जा गिरा. अब्ब सर्र के चक्कर तो काम हो गए थे लेकिन चुत्तडों का दर्द जान निकलने लगा.
जिस गुंडे के ऊपर में गुरा उसने मुझे अपने ऊपर से उठा कर साइड फ़ेंक diya.aur दोनों गुंडे मिलकर चल दिए उस औरत की तरफ.
मैं लड़ाई में शामिल तो गया था ग़ुस्से में आ कर. लेकिन मुझे तो लड़ना भी नहीं आता था. ""क्या करून"" अब्ब लड़ाई तो लड़नी hi थी.
""...लडूंगा नहीं तो सीखों गए कैसे .. और सीखों गए नहीं तो अपनी माँ और बहनो को बचाऊँगा कैसे..""
ऐसी सोच के आते hi मेरी हिम्मत बढ़ने लगी. एक लड़की की आवाज़ सुनाई दी. वो चीखते हुए ""माँ उठो .. माँ उठो"" ..बोल रही थी. मैंने देखा तो दोनों गुंडे फिर से उस औरत पर झपटने की तैयारी कर रहे थे. मैंने idhar-udhar देखा कोई काम की चीज़ मिल सके तो कुछ किया जाये.
एक छोटा पत्थर का नुकीला टुकड़ा नज़र आया मुझे. वो कुछ ज़यादा hi छोटा था. 4" का छोटे से पठार का टुकड़ा था. चलो कुछ न कुछ तो है शायद इस से काम बन जाये. मैंने उस पत्थर की नोक को अपनी उँगलियों के दरमियान से बहार निकल कर अपनी मुठी को बंद किया और नोक वाली साइड को एक आदमी के सर पे पीछे की तरफ जोरर से मारा लेकिन वो साला ऐन मौका पर अचानक से थोड़ा सा घूम गया. पत्थर उसे लगा ज़रूर. लेकिन कुछ ख़ास फरक नहीं पड़ा. वो सतर्क हो गया और दूसरा गुंडा भी ये देख चौकन्ना हो गया. अब्ब उन दोनों को मुझपर ग़ुस्सा कुछ ज़यादा hi आने लगा tha.(saala कल का छोकरा उन गुंडों से लड़ेगा) मैंने उनके man-pasnad काम में टांग जो घुसा दी thi.abb वो दोनों गुंडे मुझे छोड़ने वाले नहीं थे. साले दोनों अचानक से मुझ पर झपट पड़े....
मेरी सेहत अछि है जिस्म भी मज़बूत है मैं कमज़ोर भी नहीं हूँ. बस इन तीन चार दिनों में कुछ कुछ पंक्चर हो गया tha.lekin वो दोनों हराम के जाने पूरे सांड थे. मुझसे टकराये और में किसे बचे की तरह उछलता हुआ थोड़ा दूर जा कर धड़ाम से नीचे गिरा.
"aaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaaa"
मैं फिरसे पिछवाड़े के बॉल गिरा एक बार तो मुझे दिन में hi तारे नज़र आने लगे. ऐसे लगा मैं ज़मीन पारर नहीं ज़मीन पारर पड़े छोटे छोटे पत्थर के नुकीले टुकड़ों पर जा गिरा हूँ और सारे छोटे छोटे पत्थर मेरे पिछवाड़े में घुस गए हैं. मेरी चीखें निकलने लगी..
वो हरामज़ादे दोनों गुंडे हंसने लगे ....
""लेकिन मैंने एक बात पर धयान ज़रूर दिया था.""
गिरते गिरते भी "पत्थर" को मैंने अपने हाथ से छूटने नहीं दिया. एक गुंडा आगे मेरे तरफ आया और मेरे पेट पारर एक लात मरने लगा. खुद को पेट में पड़ने वाली से बचने के लिए मैंने अपने दर्द को बर्दाश्त करते हुए अपने हाथ में मौजूद पत्थर के नुकीले हिस्से को उस गुंडे के घुटने के जोड़ पर अपनी बची खुची ताक़त लगा कर मार दिया. पत्थर की नोक सही से उसके घुटने पर लग गई.
Aaaaaaaaaaa मर्डरर गैय्यिययियाआआआ ....
की आवाज़ उस वीराने में गूँज गई और वो अपने घुटने को पाकर लंगड़ाता हुआ एक टांग पर नाचने लगा. दूसरा आदमी कुछ देर के लिए पहले आदमी की तरफ देखने लगा उसे पता hi नहीं चला के उस के दोस्त को चोट किस चीज़ से लगी है. वो इस लिए थोड़ा सुरप्रीसेड था. मैंने दुसरे गुंडे के पीछे आ कर उसे कोई मौका दिए बगैर उस के सर्र के पिछली तरफ उस नुकीले पत्थर से अपनी पूरी ताक़त से वर्कर कर दिया.
क्यूंकि मैं डर गया था अगर अब अगर मैं इनके हाथ लगा तो ये मुझे ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे. क्यूंकि मैंने एक गुंडे को ज़ख़्मी कर दिया था. इन जैसे हरामी आदमियों की नेचर मैं अच्छी तरह से जनता था. मुझे लड़ना भले hi न आता हो लेकिन जिस माहौल में मैं रहा हूँ वहां इन जैसे haram-zaadon की दुन्या बस्ती है. इस लिए इस दुन्या की साड़ी haram-zadgiyon का नॉलेज था मुझे. बस लड़ना नहीं आता था. जिस आदमी के मैंने पीछे से पत्थर मारा था. उसे पत्थर कुछ ज़यादा hi लग गया था. वो बेहोश होने के करीब था. पहले वाला भी अभी तक लंगड़ा रहा था लेकिन अब्ब तब उसने अपने दर्द पर काबू प् लाया था. हाँ लंगड़ा ज़रूर रहा था.
मैंने उसकी तरफ देखा
""' ओह्ह्ह्हह टेरररीई भिन्नन्न न के..""""
साले ने चाकू निकल लिया था.
मुझे तो हाथ से भी सही तरह से लड़ना नहीं आता था. इसने तो चाकू hi निकल लिया था.. अब क्या करून..???
चाकू देख कर चूतड़ों के साथ साथ अब्ब गांड में भी कुछ कुछ चुभने laga.saala कही आज मैं मर्डर hi न जाओं.
"ऐसे कैसे मैं मर्डर सकता हूँ. मैं यहाँ मरने के लिए तो नहीं आया. कुछ तो करना पड़ेगा"
मैंने इधर उधर देखा वो औरत और लड़की अब्ब काफी दूर कड़ी थी.
मैं उस लड़की और औरत को देख हैरान रह gaya"me लड़ाई में ीनता गम था के मुझे इन दोनों का पता hi नहीं चला . "चलो ाचा हुआ अब्ब तो वो दोनों सेफ हैं"
अब्ब इस चाकू वाले से कैसे बचूं. इतना तो मुझे पता था वो साला अब्ब इतना तेज़ी से नहीं लाडे गए लंगड़ा जो हो गया था.
उसका चाकू देख कर मुझे लगा इस दुसरे गुंडे के पास भी चाकू होना चाहिए जो बेहोश पड़ा है. मैंने जल्दी ने उस की तलाशी लेनी शुरू की.
मुझे उसके पास से चाकू मिल गया. मैंने जल्दी से चाकू निकल कर अपने हाथ में पकड़ लिया.
साला वो लंगड़ा इतनी देर में मुझ तक पोहंच गया था. इससे पहले के वो मेरे चाकू मरता मैं जल्दी से नीचे गिर gaya.warna मेरा गाला hi कट जाता.
वो एक पेअर से लंगड़ा हो गया था तो खुद को संभाल नहीं पाया और गिरने लगा.
वो गुंडा मेरे ऊपर hi गिरने वाला था, मैं जल्दी से कल्टी मार के साइड हो कर खुद को बचाया, कहीं मुझपर न आ गिरे, और मेरा राम नाम सत्य यही हो जाये और माँ और बहनो वही कोठे पे......
वो चाकू समेत अपने साथी के ऊपर गिरा उस का चाकू उसके अपने साथी की hi पीठ में घुस गया. मैंने देर नहीं की. मैंने जल्दी से अपने हाथ की मुठी में दबे पत्थर से उस गुंडे के भी सर्र पारर वारर कर दिया वो भी नीचे गिर गया. फिर मैंने तीन बार और उसके सर्र पे जोरर से उस पत्थर को फिर से मारा उस का काम ख़तम. शायद ये भी बेहोश हो गया था....
मैंने उसे लात से हिला कर देखा वो साइड में पलट गया लेकिन बेहोश था
मैंने औरत की तरफ देखा. तो वो और उस की बेटी मेरी तरफ आ रही थी.
औरत रट हुए मुझे boli.....""Beta में तेरा किस मोहन से शुक्रिया अदा करून तुमने हमें बचा लिया........
विजय ....... आंटी जी ऐसी बात न करें औरत की इज़्ज़त बड़ी कीमती होती है.
"फिर खुद में hi बोलै" इस बात को मुझसे बेहतर कौन जान सकता है.
मुझे आपको इस हालत में देख कर बोहत बुरा लगा. इस लिए मुझसे रहा नहीं गया. तो आप की मदद कर दी.
आंटी .... बीटा तुम न आते तो मेरा और बेटी का पता नहीं क्या होता.
""मैंने लड़की की तरफ देखा. दर्री दर्री हुई सी मासूम सी फटते पुराने से कपडे पहने हुए मुझे चक्कर चक्कर देख रही थी...."""
विजय ..... आंटी आप का घर कहाँ है.
आंटी ....बीटा शहर के शुरू में जो आबादी है वहां रहती हूँ.
विजय ... आप यहाँ कैसे आई इस वरन इलाके में ....
आंटी. .... बीटा यहाँ से थोड़ी एक और बस्ती है. वहां मेरी बेटी के लिए दवाई लेने जा रही तो ये गुंडे रास्ते में मिल गए. ये मुझे पहले भी परेशां करते रहते थे. आज मुझे देख कर ये मेरे पीछे आ गए.
विजय .... तो इतनी दूर जा के दवाई लेने जाने की क्या ज़रुरत थी. और अगर आपको ये गुंडे परेशां करते थे तो आपने अपने घर में किसी को बताया क्यों नहीं.
आंटी .... जहाँ हम रहते हैं वहां का डॉक्टर आज नहीं आया था. इस लिए पास वाली बस्ती जा रहे थे... (फिर रट हुए) हमारा इस दुन्या में और कोई नहीं है. हम दोनों माँ बेटी अकेले hi रहती है.
विजय .... गुंडों की तरफ इशारा करते हुए.
विजय .... ये दोनों कौन हैं.
आंटी ......""दररते हुए"" ये हमारे इलाके के आवारा गुंडे हैं सारा दिन
gunda-gardi करते रहते हैं.
विजय ..... फिर तो मसला हो गया अब्ब क्या करें ये तो अब्ब हमें भी नहीं छोड़ें गे.
आंटी .... (रट हुए) बीटा इन दोनों के और भी साथी हैं अब्ब ये हम माँ बेटी को उठा लें जायेंगे हम तो पहले hi dar-ba-dar की ठोकरें कहते हुए इस जगा ए थे. अब कहाँ जायेंगे हमारे पास तो कोई ठिकाने भी नहीं.
मैंने दोनों गुंडों की तरफ देखा.
""""ओह्ह्ह्हह्हह terrrrrrrrrrriiiiiiii"""