Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर - Page 41 - SexBaba
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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

#209.

सुपर हीरो: (25.01.02, शुक्रवार, वाशिंगटन डी.सी., अमेरिका)

वेगा और वीनस अपने कमरे में बैठे थे। पिछली बार के समुद्री हमले के बाद उन्हें काफी कुछ समझ में आ गया था।

पिछले हमले में वेगा किसी बच्चों की तरह से लड़ा था। ये तो भला था कि वेगा की जोडियाक वॉच से निकले, सिंहमानव और अश्वमानव ने उन्हें बचा लिया था, नहीं तो दोनों को वह पहला युद्ध ही आखिरी युद्ध बन जाना था।

उस युद्ध से सीखते हुए वीनस ने पिछले 8 दिन में बहुत सी चीजें की थीं। वीनस का पहला कार्य अपने और वेगा के लिये एक ड्रेस और मास्क का चुनाव करना था, जिससे लड़ते समय उन्हें कोई पहचान ना सके?

इसके लिये वीनस ने विश्व के सबसे हल्के और मजबूत मैटीरियल का चुनाव किया। इसके तहत एयरोग्रैफीन मैटीरियल को फैब्रिक में मिलाकर, एक नये कपड़े का निर्माण किया और उसी कपड़े से वेगा और वीनस की ड्रेस बनी।

कपड़ा सेलेक्ट करने के बाद, उसकी ड्रेस बनवाने का कार्य वेगा के हिस्से आया।

इतने कम समय में बिना किसी के जाने ड्रेस बनवाना इतना आसान नहीं था। परंतु इसके लिये वेगा ने अपनी सम्मोहन शक्ति का सहारा लिया। वेगा ने ड्रेस बनवाने के बाद, ड्रेस बनाने वाले की पूरी यादाश्त को मिटा दिया था।

बहरहाल इन दोनों नौसिखिये सुपर हीरोज की ड्रेस इस समय वीनस के हाथ में थी। पूरी ड्रेस लाल और काले रंग से निर्मित थी।

“यह क्या वेगा, मैंने कहा था कि मेरी ड्रेस का रंग गुलाबी रखवाना, पर तुमने तो मेरी ड्रेस भी अपने रंग की ही बनवा दी।” वीनस ने वेगा पर नाराज होते हुए कहा।

“तुम्हें किसी रैम्प वॉक में हिस्सा नहीं लेना है वीनस? ये एक सुपर हीरो की ड्रेस है, मैं इसे किसी कार्टून के ड्रेस के रंग में तो नहीं बनवा सकता था ना।” वेगा ने वीनस को चिढ़ाते हुए कहा।

"तुम्हारा कहने का मतलब है कि गुलाबी रंग सिर्फ कार्टून पहनते हैं?” वीनस ने गुस्साते हुए कहा।

“न न....नहीं, मेरा कहने का तो ये मतलब था, कि गुलाबी रंग बहुत अजीब लगता, किसी सुपर हीरो की ड्रेस पर।” वेगा ने सफाई देते हुए कहा।

“चलो, अब जरा इस ड्रेस को पहनकर देख लेते हैं कि कहीं यह भी तो अन्य कपड़ों की तरह गर्म तो नहीं कर रही?” वीनस ने कहा और अपनी ड्रेस लेकर अंदर के कमरे में चली गई।

कुछ ही देर में वीनस वह ड्रेस पहनकर बाहर आई, तब तक वेगा भी उस ड्रेस को पहन चुका था।

पर जैसे ही दोनों की नजर एक-दूसरे पर पड़ी, दोनों का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया। दोनों सच में ही इस ड्रेस में अजीब से लग रहे थे।

"कसम से....क्या-क्या करना पड़ रहा है, एक द्वीप के युवराज को?” वेगा ने कहा- “और ये सब कुछ तुम्हारी वजह से हो रहा है।"

"मेरी वजह से क्यो? मैंने ऐसा क्या किया?" वीनस ने आश्चर्य से वेगा की ओर देखते हुए पूछा।

“मुझसे प्यार।” वेगा ने वीनस के पास आते हुए कहा- “और तुम्हारे प्यार के लिये, मैं किसी भी तरह का कार्टून बनने के लिये तैयार हूं?"

“अरे ओ 5 किलोमीटर क्षेत्रफल वाले राज्य के युवराज, सुबह-सुबह ज्यादा रोमांटिक होने का नाटक मत करो अब इस ड्रेस के ऊपर कोई कपड़ा डालो और मेरे साथ जॉगिंग पर चलो, मुझे देखना है कि दौड़ने भागने पर यह ड्रेस कितना आरामदायक है?"

“धत् तेरे की...पूरे मूड का सत्यानाश कर दिया।" वेगा ने चिढ़ते हुए कहा।

अब वेगा और वीनस ने उस ड्रेस के ऊपर ही एक टी. शर्ट और ट्राडजर डाला और मास्क को जेब में रख, सोसाइटी के बाहर वाले पार्क में आ गये।

उस पार्क में बहुत से लोग पहले से जॉगिंग या एक्सरसाइज कर रहे थे। वेगा और वीनस भी उसी भीड़ में शामिल हो गये।

सुबह का मौसम काफी सुहाना लग रहा था। चारो ओर पंछी चहचहा रहे थे, जिनकी बोली वीनस को बहुत भली महसूस हो रही थी।

तभी एक चिड़िया की तेज आवाज सुन वीनस आश्चर्य से इधर-उधर देखने लगी।

उसे इस प्रकार चारो ओर देखते देख वेगा से रहा ना गया, वह पूछ बैठा- “क्या हुआ वीनस? कोई परेशानी है क्या?"

“तुरंत किसी पेड़ की ओट में जाकर, अपने सुपर हीरो का अवतार धारण कर लो कोई अंजाना खतरा हमारे आसपास मंडरा रहा है?" वीनस ने कहा और स्वयं एक पत्थर की ओट में आ गई।

वीनस की बात सुन वेगा भी एक पेड़ के पीछे की ओर भागा। वेगा ने अपनी टी शर्ट और ट्राउजर को उतार कर वहीं पेड़ के पास फेंका और पेड़ की ओट से बाहर आ गया।

तब तक वीनस भी चट्टान के पीछे से बाहर आ गई थी और उसी की ओर देख रही थी। पार्क में सबकुछ पहले की ही तरह था, पर अब सभी लोग उन्हें आश्चर्य से देख रहे थे।

“यह सब हमें घूर-चूर कर क्यों देख रहे हैं? कहीं यह हमें ही तो खतरा नहीं समझ रहे?" वेगा ने धीमी आवाज में फुसफुसाकर वीनस से कहा।

पर वीनस ने वेगा को चुप रहने का इशारा किया और फिर से चिड़ियों की आवाजें सुनने लगी।

तभी वीनस के सामने, पार्क के बीचो बीच में एक नीली ड्रेस पहने, एक अंतरिक्ष मानव खड़ा दिखाई दिया, जिसकी ड्रेस पर A7 लिखा था, वह एनम ही था, जिसके पास बहुशरीर शक्ति थी और जिसने एलनिको के साथ मिलकर धरा और मयूर को हराया था।

वीनस के देखते ही देखते एनम के शरीर से सैकड़ों शरीर निकलकर पूरे पार्क में फैल गये। अब पार्क में हर ओर सिर्फ एनम ही एनम दिखाई दे रहे थे।

पार्क में घूम रहे सभी लोग घबराकर, उस एक जैसे बहुत से एनम को देख रहे थे। तभी वेगा, उस पहले वाले एनम के सामने आ गया।

“कौन हो तुम? और क्या चाहिये तुम्हें?” वेगा ने तेज आवाज में एनम से पूछा।

"हम यहां बस तुम्हारे हाथ में बंधी वह घड़ी लेने आये हैं, अगर तुम वह घड़ी चुपचाप से मेरे हवाले कर देते हो, हम बिना किसी को नुकसान पहुंचाये, यहां से चले जायेंगे, पर अगर तुमने वह घड़ी हमारे हवाले नहीं की तो यहां मौजूद सभी लोगों की मौत के सिर्फ तुम जिम्मेदार होगे?” एनम ने एक प्रकार की धमकी देते हुए कहा।

“यह तो यहां मेरे पीछे ही आये हैं, इसका मतलब किसी प्रकार से इन्हें इस घड़ी का रहस्य पता चल गया है?" वेगा ने मन ही मन कहा- “यह अंतरिक्ष जीव, पिछले वाले समुद्री जीवों से ज्यादा खतरनाक लग रहा है, फिलहाल इससे बचकर रहना होगा।"

यह सोच वेगा ने वीनस की ओर एक बार देखा और फिर एनम के आगे तनकर खड़ा होते हुए बोला- “तुम्हें क्या लगता है? कि तुम मुझसे ऐसे यह घड़ी मांगोगे और मैं तुम्हें दे दूंगा। ऐसे टोपी वाले जादूगर मैंने बहुत देखे हैं...तुम मुझे इस जादू से डरा नहीं सकते। रुको मैं तुम्हें दिखाता हूं कि जादू कैसा होता है?"

वेगा ने आखिरी के शब्द बहुत तेज आवाज में कहे। वेगा की आवाज इतनी तेज थी कि लगभग पूरे पार्क में गूंज गई।

इसी के साथ वेगा के शरीर से, एनम से भी ज्यादा वेगा निकले और हर एनम के सामने जाकर खड़े हो गये।

दरअसल यह वेगा के द्वारा किया गया, ध्वनि सम्मोहन था, यह सम्मोहन वेगा की आवाज के साथ फैलता था, यानि की जितने लोगों तक वेगा की आवाज सुनाई देती, उतने लोगों को वही दिखाई देता, जो वेगा उन्हें दिखाना चाहता।

एनम यह देखकर हैरान हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या वेगा के पास भी उसी की तरह की कोई शक्ति है?

स्वयं वीनस भी वेगा की इस शक्ति को देख हैरान थी, क्यों कि उसे भी वेगा की किसी ऐसी शक्ति के बारे में नहीं पता था?

तभी वेगा को पार्क में एक और अंतरिक्ष का जीव दिखाई दिया, जिसकी ड्रेस पर A4 लिखा था। यह रुफो था, जिसके पास अपने शरीर को रबर की तरह लचीला बना लेने की शक्ति थी।

इससे पहले कि वेगा कुछ समझ पाता, कि रुफो ने अपने हाथों को लंबा करके, वेगा के सभी शरीरों को पकड़ने की कोशिश की, पर रुफो का हाथ, वेगा के सभी शरीरों के पार निकल गया।

चूंकि उनमें से एक भी शरीर असली नहीं था, इसलिये रुफो, वेगा के किसी भी शरीर को पकड़ नहीं पाया।

तभी वेगा की घड़ी से वृष राशि के प्रतीक के रुप में एक विशाल बैल निकला और उसने रुफो को एक जोरदार टक्कर मार दी।

रुफो का सारा ध्यान वेगा की ओर था, इसलिये वह बैल की टक्कर से बच नहीं पाया। बैल की टक्कर इतनी बलशाली थी कि रुफो कुछ पलों के लिये बेहोश सा हो गया।

तभी वीनस को अपना दम थोड़ा घुटता हुआ सा महसूस हुआ। वीनस ने चारो ओर देखा, इस समय पार्क में मौजूद हर व्यक्ति अपना सीना पकड़कर हांफ रहा था।

अब वीनस को हवा में उड़ रहा एक और नीला जीव दिखाई दिया, जिसके सीने पर बने गोले में A1 लिखा था। यह एलनिको था, जिसके पास चुंबकत्व शक्ति थी।

इसी शक्ति के काले कणों के माध्यम से, एलनिको ने धरा और मयूर को वश में किया था।

एलनिको के हाथ से इस समय भी काले रंग के कण निकलकर हवा में फैल रहे थे। यही काले कण, सभी की साँस में बाधा उत्पन्न कर रहे थे।

यह देख वीनस ने किसी प्रकार से अपने मुंह से एक तेज सीटी निकाली, वीनस की सीटी की आवाज सुनकर, हवा में उड़ रही बहुत सी चिड़ियों और कौओं ने एलनिको पर हमला बोल दिया।

एलनि को इस विचित्र हमले से घबरा गया। कुछ देर तो उसे समझ ही नहीं आया कि यह क्या हुआ? पर जैसे ही एलनि को संभला, उसने अपने पर आक्रमण कर रहे सभी जीवों के ऊपर भी काले कणों का हमला कर दिया।

तभी वीनस ने अपने पास मौजूद एक बड़े से लकड़ी के डंडे को खींचकर एलनिको पर मार दिया।

लकड़ी का डंडा सीधा जाकर एलनि को के सिर से टकराया। यह देख एलनिको ने गुस्साकर, वीनस पर चुंबकीय तरंगों का वार कर दिया।

एलनिको के हाथ से चुंबकीय तरंगें निकलीं और उन तरंगों ने वीनस के पूरे शरीर को एक तीव्र चुंबक में बदल दिया।

ऐसा करते ही वीनस का शरीर हवा में खिंचकर, पार्क में मौजूद एक लोहे के खंभे से चिपक गया। अब वीनस किसी भी तरह से स्वयं को उस खंभे से छुड़ा नहीं पा रही थी।

उधर वेगा के माया शरीर अब गायब हो गये थे। अब वेगा की ओर एलनिको, एनम और रुफो तीनों एक साथ बढ़ रहे थे।

तभी वेगा की घड़ी से एक बड़ा सा बिच्छू निकलकर बाहर आ गया और बाहर निकलते ही उसने सभी अंतरिक्ष के जीवों पर अपने डंक से हमला कर दिया।

बिच्छू के डंक उसके शरीर से निकल-निकल कर, एनम के अनगिनत शरीरों से जा टकराये। इसी के साथ एनम के सभी माया रुप गायब हो गये।

बिच्छू का एक डंक असली एनम से भी जा टकराया, एनम जमीन पर गिरकर, बिच्छू के जहर के कारण तड़पने लगा। अब बिच्छू अपना कार्य करके गायब हो गया।

उधर रुफो को तब तक होश आ गया था, रुफो ने इस बार अपने हाथ को लंबा करके वेगा के पूरे शरीर को लपेट लिया और फिर अपने हाथों को तेजी से खींचकर वेगा को किसी लटू की भांति नचा दिया।

इतनी तेज नाचने की वजह से वेगा अपने दिमाग को कुछ देर के लिये कंट्रोल नहीं कर पाया और नाचते-नाचते जमीन पर गिर पड़ा।

अब एलनिको ने वेगा के ऊपर भी अपने काले कणों का हमला कर दिया। काले कणों ने वेगा के पूरे चेहरे को ढक लिया।

वेगा अब उन काले कणों के नीचे तड़पने लगा था, यह देखकर वीनस छटपटा रही थी, पर खंभे से चिपके होने के कारण वह कुछ कर नहीं पा रही थी।

अब काले कणों ने वेगा की घड़ी को भी पूरी तरह से ढक लिया, जिससे घड़ी से कोई नया कण नहीं निकल पा रहा था।

इस समय वेगा और वीनस भी पार्क में मौजूद, साधारण व्यक्तियों की तरह तड़प रहे थे। किसी के भी पास बचाव का कोई तरीका नजर नहीं आ रहा था।

तभी हवा में एक बड़ा सा ऊर्जा द्वार बन गया और उस ऊर्जा द्वार से युगाका व कलाट निकलकर बाहर आ गये।

युगाका ने ऊर्जा द्वार से बाहर निकलते ही वेगा को जमीन पर पड़ा, तड़पते हुए देखा। यह दृश्य देखते ही मानों युगाका का खून खौल गया।

युगाका ने एक तेज हुंकार भरी, उसकी हुंकार सुनते ही पार्क में मौजूद कुछ पेड़ों ने अपनी शाखाएं बड़ी करके रुफो के चारो ओर झाड़ियों का एक गोला बन दिया।

रुफो उस गोले में इस प्रकार जकड़ गया कि रुफो अपने शरीर का कोई अंग बड़ा करके बाहर नहीं निकल सकता था।

अब सभी पेड़ की पत्तियों ने पार्क में मौजूद सभी काले कणों को अपने अंदर खींच लिया। इतना करने के बाद युगाका की नजर हवा में खड़े एलनिको की ओर गई।

उधर कलाट के हाथों से निकली ऊष्मा ने वीनस को खंभे से छुड़ा दिया था। अब वेगा, वीनस और कलाट एक स्थान पर खड़े होकर युगाका का क्रोध देख रहे थे।

तभी एलनिको ने चुंबक शक्ति और काले कणों का वार एक साथ युगाका पर कर दिया। यह देख युगाका, एक विशाल वृक्ष मानव में परिवर्तित हो गया।

“तुम मूर्ख हो एलनिको, जो मुझ पर चुंबक की शक्ति का वार कर रहे हो, भला कभी लकड़ी पर भी चुंबक का असर होता है।” युगाका ने गरजते हुए कहा- “और तुम इन काले कणों से मेरी श्वांस नली को बंद करना चाहते हो, तो मैं तुम्हें बता दूं कि पेड़ अपने शरीर के हर भाग से साँस ले सकते हैं। तो इस प्रकार तुम्हारे दोनों वार विफल हो गये। अब मेरी बारी है। मेरे भाई पर प्रहार करने का दंड भुगतने के लिये तैयार हो जाओ।" यह कहकर युगाका ने अपने दोनों हाथों को एलनिको की ओर कर दिया।

युगाका के हाथ एक नुकीले लकड़ी के भाले के समान बन गये और लंबे होते हुए एलनिको के शरीर के

आरपार हो गये। एक सेकेण्ड में ही एलनिको का शरीर मरकर हवा में झूलने लगा।

उधर युगाका का ध्यान एलनिको की ओर देख एनम ने अपने शरीर में घुसे बिच्छू के काँटे को बाहर निकाला और इससे पहले कि किसी का ध्यान उनकी ओर जाता, वह लकड़ी के गोले में बंद रुफो को लेकर हवा में उड़ गया।

युगाका ने एलनिको के मृत शरीर को जमीन पर पटक दिया और अपने असली रुप में आ गया।

“अरे, इसके दोनों साथी कहां गये?" वीनस ने चारो ओर देखते हुए कहा।

"लगता है भाई से डरकर भाग गये।" वेगा ने अपने मास्क को अपने चेहरे पर एडजेस्ट करते हुए कहा- “अब इससे पहले कि मीडिया वाले आकर सबका इंटरव्यू लेने लगें, हमें तुरंत यहां से अपने कमरे पर पहुंचना होगा।

वेगा की बात सुनकर कलाट ने अपने चारो ओर खड़े लोगों को देखा और तुरंत ऊर्जा का द्वार बनाकर, सभी को लेकर वहां से गायब हो गया।

जारी रहेगा_____✍️
 
#210.

चैपटर-13

आयुर्वेद: (तिलिस्मा 5.51)

सुयश, जेनिथ, क्रिस्टी और शैफाली तिलिस्मा के द्वार संख्या 5.5 में प्रवेश कर गये। जिसके द्वार पर त्वचा बनी हुई थी।

सभी जानते थे कि यह इन्द्रियों वाला आखिरी द्वार है। द्वार में प्रवेश करते ही सभी को एक विशाल मैदान दिखाई दिया, जो कि कई किलोमीटरों में फैला था।

सबसे आगे एक देवता की मूर्ति लगी थी, जिनके 4 हाथ थे। उनके पहले हाथ में शंख, दूसरे में चक्र, तीसरे में अमृत कलश और चौथे हाथ में कोई पत्तेनुमा औषधि थी।

उनके आगे 4 वर्गाकार पत्थर रखे थे, हर पत्थर पर एक धातु की प्लेट लगी थी, जिस पर क्रमशः प्रथम अध्याय, द्वितीय अध्याय, तृतीय अध्याय और चतुर्थ अध्याय लिखा था।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वहां पर 4 पुस्तकें होनी चाहिये थीं? पर वह वहां थी नहीं। देवता के बगल में, हवा में एक ऊर्जा द्वार दिखाई दे रहा था।

"कैप्टेन, क्या आप बता सकते हैं कि यह कौन से देवता हैं? और क्या करते हैं?" जेनिथ ने सुयश से पूछा।

“हां, मुझे इनके बारे में पता है, यह देवता धनवंतरी हैं, जिन्हें चिकित्सा का देवता कहा जाता है।" सुयश ने कहा- “मैं तुम लोगों को इनके बारे में बताता हूं। जब देओं और दैत्यों ने समुद्र मंथन किया, तो उसमें से एक-एक कर 14 रत्न निकले थे। सबसे आखिर में अमृत कलश को अपने हाथ में लेकर धनवंतरी ही निकले थे। धनवंतरी के जन्म के उपलक्ष में ही ह…न्दू धनतेरस का त्योहार मनाते हैं। इन्होंने देओं की चिकित्सा के लिये आयुर्वेद नामक ग्रंथ का निर्माण किया। इन्होंने समुद्र मंथन से प्रकट होने के बाद, भगवान विरष्णु से, देवलोक में अपने रहने का स्थान मांगा, तो भगवान ने इनसे कहा कि आप देवता नहीं हैं। आपका जन्म देवताओं के बाद हुआ है, इसलिये आपको पृथ्वी लोक पर जन्म लेकर, सिद्धी प्राप्त करके देवताओं का पद कमाना पड़ेगा। भगवान के कथनों को सुन धनवंतरी ने आयुर्वेद का ज्ञान ब्रह..देव को दिया और स्वयं वहीं कणों में समा गये। बाद में इन्होंने पृथ्वी पर काशी राज धन्व के परिवार में दोबारा जन्म लिया।

“उधर ब्र..देव ने आयुर्वेद का ज्ञान प्रजापति को एक लाख श्लोक के साथ दिया, दक्ष ने अश्विनी कुमारों को, फिर अश्विनी कुमारों ने देवराज को और इंद्र से वह ज्ञान ऋषि भरद्वाज को प्राप्त हुआ। ऋषि भरद्वाज से यह ज्ञान पुनः धनवंतरी ने प्राप्त किया और फिर काशी में पृथ्वी का पहला चिकित्सा का विद्यालय बनाया गया, जिसके प्रधानाचार्य विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत थे। जिन्हें पृथ्वी का पहला शल्य चिकित्सा का डॉक्टर कहा जाता है।"

“भारत का इतिहास तो काफी पुराना और अद्भुत है।" क्रिस्टी ने कहा- “मैं यहां से निकलने के बाद भारत के इतिहास के बारे में पढ़ना चाहूंगी।"

"तो फिर समझ में आ गया कि हमें यहां करना क्या है?" शैफाली ने कहा- “हमें यहां देवता धनवंतरी के लिये आयुर्वेद के 4 अध्याय को लाकर इन वर्गाकार पत्थरों पर रखना है। अब यह 4 अध्याय इसी स्थान पर कहीं होने चाहिये?"

"कहीं वह 4 अध्याय इस ऊर्जा द्वार में तो नहीं?" जेनिथ ने सबका ध्यान ऊर्जा द्वार की ओर करते कहा।

जेनिथ की बात सुन सुयश चलता हुआ ऊर्जा द्वार के पास आया और उसे हाथ लगाकर देखा। सुयश को उस ऊर्जा द्वार से पहले ही कोई अदृश्य दीवार महसूस हुई, जो उसे ऊर्जा द्वार में नहीं जाने दे रही थी।

"नहीं जेनिथ, इस ऊर्जा द्वार के बाहर कोई अदृश्य दीवार है, जिसकी वजह से हम इस ऊर्जा द्वार में प्रवेश नहीं कर सकते।” सुयश ने कहा।

"तो फिर हमें कुछ और आगे चलकर देखना चाहिये। हो सकता है कि आयुर्वेद के 4 अध्याय आगे किसी स्थान पर छिपे हों?” क्रिस्टी ने कहा।

क्रिस्टी की बात सुनकर सभी उस स्थान से आगे की ओर बढ़ गये। काफी आगे जाने पर इन्हें एक पहाड़ जैसे स्थान पर 4 गुफाएं दिखाई दीं। चारो गुफाओं पर क्रमशः 1, 2, 3, 4 लिखा हुआ था।

उन गुफाओं के आगे एक 4 सिर वाले हाथी के सिर की मूर्ति लगी थी। उस हाथी की मूर्ति पर एक छोटा सा सिंहासन रखा था, जिस पर एक किताब रखी हुई थी।

सुयश ने आगे बढ़कर उस किताब को देखा। किताब पर लिखा हुआ था- “तिलिस्मा 5.5 नियमावली।"

"लो अब तो पक्का इस किताब में कैश्वर का कुछ भाषण होगा, जिसमें उसके देवता बनने के बारे में बताया गया होगा?” क्रिस्टी ने मुंह बनाते हुए कहा।

सुयश ने आगे बढ़कर उस किताब को उठा लिया।

सुयश ने किताब का पहला पृष्ठ खोलकर देखा और उसमें लिखी बातों को तेज-तेज सबके सामने पढ़ने लगा- “आप सभी का तिलिस्मा की द्वार संख्या 5.5 में स्वागत है। अगर आपको आयुर्वेद के 4 अध्याय की खोज है, तो आप सही जगह पर आये हैं। यहां मौजूद 4 गुफाएं आपको उन 4 अध्याय तक ले जायेंगी। परंतु आप उस गुफा में घुसने से पहले उन गुफाओं में मौजूद चीजों के बारे में जान लें। पहली गुफा में सूर्य की तेज अग्नि है, जिसका ताप हजारों डिग्री है। ऐसे ताप में किसी भी व्यक्ति के जाने पर उसका शरीर झुलस सकता है।

“दूसरे द्वार में बर्फ ही बर्फ भरी है, जिसके तापमान इतना कम है कि उसके अंदर प्रवेश करने वाला व्यक्ति अंदर घुसते ही जम जायेगा। तीसरे द्वार में भयानक रसायनिक गैस हैं, जो अंदर प्रवेश करने वाले व्यक्ति का शरीर जला देगी। चौथी गुफा में भयानक जहर फैला है, जो उसमें प्रवेश करने वाले व्यक्ति का शरीर पलों में पिघलाकर पानी बना देगी। तो अब अगर आप इन सभी गुफाओं में प्रवेश करके, उसके आखिर में पहुंचने में सफल हो जाते हैं, तो आप आयुर्वेद के उन अध्यायों को प्राप्त कर सकते हैं।“

आखिर में कविता की कुछ पंक्तियां लिखी थीं:-

“अग्नि जलाये वाष्प से, हिम है विष के समान, धनवंतरी के हाथ में सभी औषधि का ज्ञान।"

इतना पढ़कर सुयश ने उस किताब को वापस वहीं रख दिया, जहां से उसको उठाया था।

“दोस्तों आपने यह तो सुन ही लिया कि गुफा में किस प्रकार के खतरे हैं, परंतु अखिर में लिखी कविता की पंक्तियों से यह भी स्पष्ट हो गया कि देवता धनवंतरी के हाथ में पकड़ी औषधि को खाकर हम उन गुफाओं में प्रवेश कर सकते हैं।” सुयश ने कहा।

"तो फिर चलिये कैप्टेन, देर ना करते हुए, पहले उस औषधि को ही प्राप्त करते हैं।” जेनिथ ने कहा।

अब सभी वापस धनवंतरी की मूर्ति की ओर चल दिये। कुछ ही देर में सभी धनवंतरी के मूर्ति के सामने खड़े थे।

अब सुयश ने आगे बढ़कर धनवंतरी के हाथ में थमी औषधि को लेने की कोशिश की, पर वह औषधि को धनवंतरी के हाथ से ले नहीं पाया।

औषधि को छूते ही वह औषधि अपने स्थान से गायब हो जा रही थी। तभी धनवंतरी के सामने स्थित चारो वर्गाकार पत्थरों पर कुछ पंक्तियां लिखी दिखाई देने लगीं।

"लो अब फिर से पढ़ो कैश्वर की पहेलियां।” क्रिस्टी ने झुंझलाते हुए कहा।

किसी के पास अब और कोई चारा नहीं था, इसलिये सभी ने एक-एक पत्थर का चयन किया और अपनी-अपनी कविताएं पढ़ने लगे।

पहली पहेली थी:-

श्वेत प्रकाश से फैल रही कैसी अद्भुत माया, संग लेकर आइये किसी जीव की छाया।"

इस पत्थर का चुनाव सुयश ने किया था। सुयश ने कविता की पंक्तियों को ध्यान से पढ़ा और अपने चारो ओर देखने लगा, पर उसे इस स्थान पर कहीं भी, किसी की भी छाया बनती हुई नहीं दिखाई दी।

“क्या आपको, आपकी पहेली की पंक्तियां समझ में आयी कैप्टेन?” जेनिथ ने सुयश की ओर देखते हुए पूछा।

“यह किसी जीव की परछाई को लाने को कह रहा है।” सुयश ने कहा- “पर परेशानी यह है कि इस स्थान पर किसी भी प्रकार की छाया नहीं बन रही है। अब अगर ऐसे में मैं किसी जीव को यहां ले भी आया? तो भी मैं उसकी छाया यहां पर किस प्रकार बना पाऊंगा?"

सुयश को अपनी पहेली का मतलब तो समझ आ गया था, बस अब उसे लाने की ही बात रह गई थी, इसलिये शैफाली ने दूसरे पत्थर पर लिखी पहेली को पढ़ना शुरु कर दिया।

उस पर लिखा था:-

"हिमखंड के श्वेत कणों में नहीं एक भी दाग, हाथ लेकर आइये, हिम से निकली आग।

“ये कैसे हो सकता है?" शैफाली ने आश्चर्य से उस पहेली को देखते हुए कहा- “भला बर्फ से आग कैसे निकल सकती है?"

सभी ने काफी देर तक सोचा, पर किसी को भी शैफाली की पहेली का अर्थ समझ में नहीं आया। अतः सभी ने तीसरे पत्थर की पहेली को पढ़ना शुरु कर दिया, जिसका चयन जेनिथ ने किया था।

तीसरे पत्थर पर लिखा था। :-

“चंद्रकिरण से जन्में, एक सहस्त्र त्रिशूल, मेरी तो अभिलाषा है, नवनिर्मित एक फूल।"

"ये पहेली भी समझ में नहीं आ रही?” जेनिथ ने कहा- “भला चंद्रमा की किरणों से त्रिशूल कैसे जन्म ले सकते हैं?”

कुछ देर की माथा पच्ची के बाद सभी चौथी पहेली की ओर बढ़ गये, जो कि क्रिस्टी के लिये थी।

चौथे पत्थर पर लिखा था:-

“शाख भेष धरकर बैठा, एक वृश्चिक डंक, मुझे चाहिये आसमान में चमक रहा मयंक।"

“यह पहेली भी अन्य पहेलियों की भांति ही लग रही है, जिसे समझना अत्यंत मुश्किल लग रहा है। भला आसमान के चाँद को कोई कैसे तोड़कर ला सकता है?" क्रिस्टी ने कहा।

"मेरे ख्याल से जब तक उस स्थान पर नहीं पहुंचेंगे, जहां से यह सभी चीजें लानी हैं, तब तक हम पहेली को समझ भी नहीं पायेंगे?” सुयश ने कहा- “इसलिये अब पहले उस स्थान की ओर चलना चाहिये पर...पर वह स्थान है कहां पर?"

“कैप्टेन अंकल, उस ऊर्जा द्वार के आगे खड़ी अदृश्य दीवार अब हट चुकी है।” शैफाली ने कहा- “मुझे लगता है कि हमारी सभी चीजें इसी द्वार के अंदर ही मिलेंगी। तो हमें अपनी-अपनी पहेलियों को याद कर इस द्वार में प्रवेश करना चाहिये।"

शैफाली के शब्द सुन सभी ने एक बार फिर ध्यान से अपनी पहेलियों को पढ़ा और एक-एक कर उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गये।

सुयश जैसे ही उस ऊर्जा द्वार से निकला, वह ऊर्जा द्वार स्वयमेव बंद हो गया।

“अरे, यह द्वार तो बंद हो गया? लगता है कैश्वर ने सभी के लिये अलग-अलग स्थानों का चुनाव किया है।' सुयश मन ही मन बड़बड़ाया- “मुझे लगता है कि कैश्वर अब हमारी सम्मिलित शक्ति से घबरा रहा है, इसलिये वह हम सभी को अलग-अलग स्थानों पर भेजकर कार्य दे रहा है।....कोई बात नहीं हम भी कैश्वर को साबित कर देंगे कि नियति ने हमें यूं ही नहीं चुना है, इस तिलिस्मा के लिये।" यह सोच सुयश ने स्वयं का हौसला बढ़ाया और उस स्थान को देखने लगा।

वह स्थान एक रेतीला रेगिस्तान थी, जिसके सिर पर तेज सूर्य चमक रहा था, पर उस स्थान पर दूर-दूर तक कोई चीज नजर नहीं आ रही थी।

“यह क्या? यहां तो रेत के सिवा कुछ भी नहीं है, ऐसे में मैं किसी जीव को कैसे ढूंढू?" सुयश यह सोच आगे की ओर बढ़ गया।

सुयश ऐसे ही तेज धूप में आधे घंटे तक इधर-उधर भटकता रहा, पर उसे जीव तो क्या कोई काँटों वाला पेड़ तक दिखाई नहीं दिया।

सुयश ने एक नजर अब ऊपर आसमान में चमक रहे सूर्य पर मारी और फिर सूर्य के एक मंत्र का जाप करते हुए कहा- “हे सूर्यदेव, मुझे पता है कि आप तिलिस्मा में मेरी कोई मदद नहीं कर सकते... मुझे तो ये भी पता है कि यह आपका वास्तविक रुप नहीं, वरन् कैश्वर काबनाया एक माया जाल है, परंतु हे भगवान, आप मेरा इस विकट संकट में मार्गदर्शन करें।"

सुयश को पता था कि सूर्यदेव इस तिलिस्मा में उसकी कोई मदद नहीं करने वाले, फिर भी उसने सूर्यदेव की प्रार्थना की।

तभी सुयश को रेत की एक ऊंची सी चट्टान दिखाई दी, जिसकी तीन नोक किसी त्रिशूल की भांति प्रतीत हो रही थी। सुयश ने अब उस चट्टान की परछाई को देखा, जो कि जमीन पर बन रही थी।

चट्टान की परछाई बिल्कुल किसी त्रिशूल की भांति प्रतीत हो रही थी। अब कुछ सोच सुयश उस त्रिशूल की परछाई के पास पहुंच गया और उस त्रिशूल के मध्य वाली नोक के स्थान पर जमीन की रेत को हटाने लगा।

थोड़ी ही रेत हटाते ही सुयश के हाथ, रेत के नीचे दबी किसी चीज से टकराये।

सुयश ने जल्दी-जल्दी उस स्थान की रेत को पूरी तरह से साफ कर दिया। अब वहां पर सुयश को एक 2 फुट की ऊँट की मूर्ति दिखाई दी।

ऊँट की मूर्ति देख सुयश हैरान हो गया, उसे रेत के नीचे ऐसी किसी चीज की आशा नहीं थी।

सुयश ने जैसे ही उस मूर्ति को अपने हाथ में उठाया, उस स्थान की रेत जमीन में धंस गई और उसके साथ ही सुयश भी जमीन के अंदर समा गया।

सुयश नीचे जाकर किसी पत्थर से टकराया। सुयश अब धीरे से उठकर खड़ा हो गया। ऊँट की मूर्ति अब भी सुयश के हाथों में थी।

सुयश अब चारो ओर उस स्थान को देखने लगा। वह स्थान किसी रेत में दबे पिरामिड की तरह लग रहा था।

पिरामिड की सभी दीवारें बड़े पत्थरों से निर्मित थी। पता नहीं कहां से उस स्थान पर रोशनी आ रही थी, जिसकी वजह से वह स्थान प्रकाशमान था।

सुयश जिस स्थान पर गिरा था, वह एक बड़ा सा कमरा था। उस कमरे में कुछ भी नहीं था। सुयश उस कमरे से निकलकर बाहर की ओर आ गया।

बाहर एक लंबी सी गैलरी थी, जिसमें ऊपर की ओर, थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कुछ छेद दिखाई दे रहे थे। उन छेदों से रेत निकलकर नीचे गिर रही थी। सुयश उस गैलरी में आगे की ओर बढ़ गया।

सुयश चलता हुआ पूरी तरह से सावधान भी था। उस गैलरी में कुछ भी नहीं था। सुयश चलता हुआ, उस गैलरी के अंत में पहुंच गया।

अंत में एक बड़ी दरार छत में बनी थी, जिससे तेजी से रेत नीचे गिर रही थी। पर आश्चर्य की बात यह थी कि वह रेत नीचे गिरते ही पता नहीं कहां गायब हो जा रही थी?

एक तरह से वह स्थान रेत का झरना दिखाई दे रहा था। सुयश ने धीरे से अपना दाहिना हाथ उस रेत के झरने के अंदर डाला। सुयश को अंदर खाली स्थान महसूस हुआ।

अब सुयश उस खाली स्थान में प्रवेश कर गया। इस बार सुयश जिस स्थान पर निकला, वहां जमीन में एक विशाल गड्डा दिखाई दे रहा था। उस गड्ढे को देख ऐसा प्रतीत हो रहा था कि जैसे वह पाताल के अंदर जाने का रास्ता हो।

उस गड्ढे में बीच-बीच में, 4 वर्ग फुट के, कुछ पत्थर हवा में लहरा रहे थे, जो कि शायद दूसरी ओर जाने के लिये एक टूटे हुए पुल के जैसे कार्य कर रहे थे। हर लहराते पत्थर के बीच कम से कम 8 फुट का अंतर था।

पत्थर का आकार भी बड़ा ना होने के कारण, यह 8 फुट का फासला भी बड़ा दिख रहा था। तभी सुयश को उस विशाल गड्ढे के दूसरी ओर हवा में चमकती एक रोशनी दिखाई दी।

यह देख सुयश समझ गया कि अवश्य ही उस गड्ढे के पार कुछ ना कुछ है। अतः सुयश ने ऊँट की मूर्ति को अपने हाथ में ठीक से पकड़ा और पहले पत्थर की ओर छलांग लगा दी।

सुयश सकुशल पहले पत्थर पर पहुंच गया। तभी सुयश को दूसरा पत्थर 1 फुट और आगे खिसकता हुआ दिखाई दिया।

“यह क्या? अब तो दूसरे पत्थर के बीच की दूरी 9 फुट हो गई है, इस दूरी को पार करना तो मुश्किल है, पर और कोई चारा ना देख, सुयश ने अपने शरीर को थोड़ा पीछे की ओर किया और दूसरे पत्थर पर छलांग लगा दी।

दूसरे पत्थर का फासला ज्यादा होने की वजह से सुयश के एक पैर का पंजा ही दूसरे पत्थर पर पहुंचा।

पर सुयश ने अपने शरीर को नियंत्रित किया और सकुशल दूसरे पत्थर पर पहुंच गया।

तभी सुयश को तीसरा पत्थर अपने स्थान से 2 फुट आगे खिसकता हुआ दिखाई दिया।

अब तीसरे पत्थर की दूरी सुयश से 10 फुट हो गई थी और इस दूरी को पार करना सुयश के लिये बिल्कुल असंभव था।

अब सुयश ने पीछे पलटकर देखा, पर पीछे की ओर से पहले और दूसरे पत्थर अब गायब हो गये थे।

यानि कि सुयश अब पीछे भी नहीं जा सकता था। अब सुयश पूरी तरह से उस स्थान पर फंस गया था।

कुछ देर तक ऐसे ही खड़े रहने के बाद सुयश उस पत्थर पर बैठ गया।

इस समय उसे क्रिस्टी की याद आ रही थी, अगर वह यहां होती, तो इन पत्थरों को आसानी से पार कर सकती थी।

...........................................

उधर क्रिस्टी जैसे ही ऊर्जा द्वार के अंदर घुसी, उसका भी द्वार बंद हो गया। क्रिस्टी समझ गई कि उसे अकेले ही इस बाधा को पार करना होगा। अतः वह उस पूरे स्थान को ध्यान से देखने लगी।

वह एक गाँव का वातावरण था, जिसमें हर स्थान पर गाँव के लोगों की मूर्तियां लगीं थीं। कोई बैल और हल लेकर खेत की ओर जा रहा था, तो कोई खेत में पौधे बोने का कार्य कर रहा था।

क्रिस्टी उस पूरे स्थान पर घूम-घूम कर सभी मूर्तियों को देखने लगी। उसे किसी बिच्छू के डंक और चंद्रमा को ढूंढना था, पर यहां तो आसमान में सूर्य चमक रहा था, चंद्रमा का तो कहीं पर नामो निशान भी नहीं था।

क्रिस्टी चारो ओर देखती आगे बढ़ गई। कुछ आगे उसे एक कुंए के चारो ओर बैठी औरतें कपड़े धोते हुए दिखाई दीं। यह सब भी औरतों की मूर्तियां ही थीं।

काफी देर तक देखने के बाद भी क्रिस्टी को वहां भी कुछ समझ में नहीं आया। अतः वह और आगे बढ़ गई।

अब क्रिस्टी को एक स्थान पर कुछ बच्चों की मूर्तियां दिखाई दीं। कुछ बच्चे वहां जमीन पर रेखाएं बनाकर कोई खेल, खेल रहे थे, तो कुछ बच्चे एक बीन बजाते सपेरे के पास बैठे साँप का नाच देख रहे थे।

साँप और सपेरे की मूर्ति देख क्रिस्टी उस ओर आ गई, उसे लगा कि यदि इस सपेरे के पास साँप हैं, तो इसके पास बिच्छू भी हो सकता है।

सपेरे के हाथ में पकड़ी बीन बिल्कुल असली लग रही थी। क्रिस्टी ने सपेरे के बगल में रखी पिटारी को खोलकर देखा, पर उसमें भी कुछ नहीं था।

तभी क्रिस्टी की नजर बगल में खेल रहे बच्चों के द्वारा, जमीन पर बनाई गई आकृति पर गई।

उस आकृति में आसमान में एक चाँद दिखाई दे रहा था, जिसे कि बच्चे किसी रस्सी से तोड़ने की कोशिश कर रहे थे। क्रिस्टी बच्चों के द्वारा बनाई गई आकृति को देख उनकी कल्पना को निहारने लगी।

"बच्चे भी ना कैसी-कैसी आकृतियां उकेरते हैं, अपनी कल्पनाओं से? अब भला चाँद भी कोई रस्सी से तोड़ सकता है।" यह सोच क्रिस्टी धीरे से मुस्कुरा दी।

तभी क्रिस्टी की निगाह फिर से सपेरे की ओर गई, उसकी पिटारी पर एक बड़ा सा रस्सी का गुच्छा रखा था।

अब क्रिस्टी ने एक बार फिर बच्चों की बनाई तस्वीर को देखा और फिर धीरे-धीरे चलती हुई सपेरे के पास पहुंच गई।

क्रिस्टी ने अब पिटारी पर रखी उस रस्सी को उठाकर जमीन पर रख दिया और सपेरे के हाथ से बीन को ले लिया।

अब क्रिस्टी को अपने बचपन की एक घटना याद आ गई। बचपन में उसने एक जादुई फिल्म में देखा था कि एक बीन बजाने से रस्सी साँप की तरह नाच रही थी। बस इसी घटना को याद कर क्रिस्टी ने बीन को अपने मुंह से लगाया और उसे बजाने की कोशिश करने लगी।

क्रिस्टी ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी बीन नहीं बजाया था, पर उसके फूंक मारते ही बीन अपने आप बजने लगी।

बीन बजते हुए तेजी से हिल भी रही थी, इसलिये क्रिस्टी ने घबराकर बीन को अपने हाथ से छोड़ दिया।

क्रिस्टी के हाथ से छोड़ने के बाद भी बीन जमीन पर नहीं गिरी, वह तो अब भी अपने आप बजती जा रही थी।

इसी के साथ अब रस्सी, बीन की आवाज पर नाचते हुए आसमान की ओर उठने लगी। यह देख क्रिस्टी थोड़ा पीछे हटकर इस पूरे दृश्य को देखने लगी।

कुछ ही देर में रस्सी आसमान में बहुत ऊपर तक चली गई।

जब रस्सी का आखिरी सिरा दिखाई देने लगा, तो बीन स्वयं बंद हो गई, पर वह रस्सी अभी भी किसी आसमान के पुल की भांति हवा में टंगी थी। कुछ सोच क्रिस्टी ने उस रस्सी पर चढ़ना शुरु कर दिया।

काफी ऊपर चढ़ने के बाद क्रिस्टी को आसमान में बादल दिखाई देना शुरु हो गये। वह रस्सी बादलों के बीच ही जा रही थी।

कुछ ही देर के बाद क्रिस्टी अब बादलों के ऊपर खड़ी थी।

क्रिस्टी के ऊपर पहुंचते-पहुंचते रात हो गई थी और अब आसमान में चाँद दिखाई देने लगा था। क्रिस्टी को आसमान में चमकने वाले चाँद और सितारे अब स्वयं से ज्यादा दूरी पर नहीं लग रहे थे।

क्रिस्टी धीरे-धीरे चाँद की ओर बढ़ने लगी। तभी क्रिस्टी को आसमान में कुछ टूटते तारे दिखाई दिये।

“अरे, यह क्या? एक साथ इतने टूटते तारों को तो मैने कभी नहीं देखा?...और.... और यह क्या? ये तारे तो आसमान से जमीन की ओर आने की जगह, जमीन से आसमान की ओर जा रहे हैं। यह कैसे संभव हो सकता है? मुझे पास चलकर देखना चाहिये।" यह सोच क्रिस्टी चाँद की ओर चल दी।

टूटते तारे चाँद के पास जाते ही गायब हो जा रहे थे। क्रिस्टी अब चाँद के बिल्कुल नीचे पहुंच गई थी।

चाँद की दूरी अब उससे ज्यादा से ज्यादा 500 फुट ही ऊपर थी। पर जैसे ही क्रिस्टी चाँद के नीचे पहुंची, उसका शरीर जमीन को छोड़कर हवा में उठ गया।

“अरे यह क्या? यहां तो गुरुत्वाकर्षण है ही नहीं। अब मैं नीचे कैसे उतरूंगी?” क्रिस्टी अब परेशान हो उठी क्यों कि अब वह ना तो नीचे जा पा रही थी और ना ही चाँद के पास पहुंच पा रही थी।

क्रिस्टी अब अपने हाथ पैर हवा में चलाकर बस एक जगह पर नाच रही थी।

इस समय वह बहुत परेशान थी क्यों कि ऐसी स्थिति में वह कुछ कर नहीं पा रही थी। अब बस उसे किसी चमत्कार का इंतजार था।

जारी रहेगा_____✍️
 
#211.

भविष्य यात्रा: (25.01.2002, शुक्रवार, ब्लैकून)

ब्लैकून-डेल्फानो का आखिरी अवशेष, जिसकी रचना डेल्फानो के राजा गिरोट ने की थी।

डेल्फानो के समाप्त होने के पहले, उसने ब्लैकून को एक छोटे से मोती में परिवर्तित कर, पृथ्वी की ओर भेज दिया था।

अब उसी डेल्फानो ग्रह का आखिरी प्राणी युवराज ओरस था, जिसे ब्लैकून में मौजूद ज़ेनिक्स ज्ञान दे रही थी।

ओरस ब्लैकून में बैठा डेल्फानो और अपने पिता के बारे में सोच रहा था, कि तभी हवा में ज़ेनिक्स का नीला शरीर दिखाई दिया।

क्या सोच रहे हो ओरस?" ज़ेनिक्स ने ओरस से पूछा।

“अपनी जिंदगी के बारे में सोच रहा हूं। दरअसल कल मैंने एक बार फिर, अपने पिता के आखिरी शब्दों को सुना। वो कह रहे थे कि समय को दोहराया जा रहा है। क्या फिर से वही सब होगा, जो सदियों पहले हुआ था?......ऐसा क्या हुआ था सदियों पहले उनके साथ? और समय किस प्रकार दोहराया जा रहा था? फिर उन्होंने कहा कि मैं अपने पुत्र के साथ ऐसा नहीं होने दूंगा। इसका मतलब उनके साथ पहले कुछ तो बुरा हुआ था? जो वह मेरे साथ नहीं होने देना चाहते थे।..... फिर....फिर उन्होंने इतने बड़े ब्रह्मांड में, मुझे पृथ्वी जैसे छोटे से ग्रह पर ही क्यों भेजा? और फिर पृथ्वी वासियों का शरीर हमारे शरीर से इतना मिलता हुआ क्यों है? और फिर उन्होंने आखिर में कहा था कि पृथ्वी पर मुझे भेजने में, समय कई आयामों में उलझ जायेगा।...कैसे? ...भला समय कैसे कई आयामों में उलझ सकता है? बस इन्हीं प्रश्नों का जवाब नहीं मिल पा रहा मुझे। इसीलिये मेरा दिमाग कल से कुछ परेशान सा चल रहा है?"

"बस इसी वजह से परेशान हो या फिर कोई और भी बात है?" ज़ेनिक्स ने रहस्य भरे शब्दों में कहा।

"और कौन सी बात हो सकती है भला?" ओरस ने जेनिक्स की ओर देखते हुए ना समझने वाले अंदाज में पूछा।

“ओरस, सच-सच बताओ कहीं तुम्हें जेनिथ से प्यार तो नहीं हो गया?” ज़ेनिक्स ने ओरस के सीधे दिल पर वार करते हुए कहा।

“म...म...मैं स्वयं भी इस रहस्य को समझ नहीं पा रहा? कभी मुझे लगता है कि वह सिर्फ दोस्त है? पर कभी उसकी भावनाओं की वजह से, वह मुझे एक दोस्त से ज्यादा लगने लगती है।” ओरस ने गड़बड़ाते हुए कहा “मैं स्वयं इन भावनाओं के सागर में डूब रहा हूं।...मुझे नहीं समझ में आ रहा ज़ेनिक्स, कि मुझे ऐसी स्थिति में क्या करना चाहिये? क्या तुम मुझे कोई सुझाव दे सकती हो?" ओरस ने समयचक्र के पास चहलकदमी करते हुए कहा।

“देखिये ओरस, जेनिथ बहुत साधारण लड़की है, उसे तो विज्ञान की ABCD भी नहीं आती, जबकि आप तो समयचक्र के निर्माता हो, आपने पिछले 20 वर्षों में हजारों नये अविष्कार किये हैं। ऐसे में मुझे नहीं लगता कि आपका जेनिथ के साथ प्यार करना सही है। अरे उसकी तो उम्र भी कुछ वर्षों में खत्म हो जायेगी, फिर आप क्या करोगे? वैसे तो मुझे आपको यह सुझाव देना बनता नहीं है, क्यों कि यह तो आपके दिल का मामला है, इसलिये इसे आपको स्वयं ही, अपने दिल से सुलझाना पड़ेगा। मैं तो फिलहाल स्वयं का दिल विकसित करने की कोशिश कर रही हूं।” ज़ेनिक्स ने कहा।

“तुम दिल लेकर क्या करोगी?” ओरस ने मजाक भरे लहजे में कहा- “अब तुम्हारा भी शादी करने का विचार है क्या?"

“जब मुझमें भावनाएं है, जब मुझमें स्वयं का अपना दिमाग है, जब मुझमें स्वयं से किसी भी प्रकार के निर्णय लेने की क्षमता है, तो फिर मेरे पास दिल क्यों नहीं हो सकता?” ज़ेनिक्स ने लॉजिक देते हुए कहा।

“बात तो तुम्हारी सही है इस हिसाब से तो दिल ही नहीं, तुम्हारे पास शरीर भी होना चाहिये।” ओरस ने कहा।

"क्या पता कि कभी शरीर हुआ ही करता हो?" ज़ेनिक्स ने अजीब से लहजे में कहा। ओरस को जेनिक्स की बात समझ में नहीं आई, इसलिये उसने ज़ेनिक्स की बात पर ध्यान भी नहीं दिया।

“अच्छा, ये सब छोड़ो, मुझे ये बताओ कि हमने समयचक्र के द्वारा, अभी तक भविष्य में कितना आगे जाने की तकनीक विकसित कर ली है?" ओरस ने विषय को बदलते हुए कहा।

“आप कितना आगे जाना चाहते हैं?" जेनिक्स ने उल्टा सवाल करते हुए पूछा।

“कम से कम 25 वर्ष आगे।” ओरस ने कहा- “मुझे आगे जाकर देखना है कि जेनिथ का भविष्य कैसा है? क्या वह मेरे साथ दूसरे ग्रह पर रह पायेगी?” ओरस ने कहा।

यह सुनकर ज़ेनिक्स के चेहरे पर मुस्कान आ गई।

“तुम मुस्कुरा क्यों रही हो ज़ेनिक्स?” ओरस ने ना समझने वाले भाव से पूछा।

“कुछ नहीं, बस समय के प्रवाह को बांधने की कोशिश कर रही हूं।” ज़ेनिक्स के शब्द फिर से ओरस के सिर के ऊपर से चले गये।

“पर मैं अगर भविष्य में गया और ऐसे में जेनिथ को मेरी जरुरत पड़ गई, तो फिर क्या होगा?" ओरस ने शंकित होते हुए कहा।

“तो क्या हुआ? मैं हूं तो यहां पर, ऐसे में मैं आपकी आवाज बनाकर जेनिथ को जवाब दे दूंगी और अगर उसके शरीर पर किसी भी प्रकार से चोट आई, तो वह तो पहले भी मैं ही सही करती रही हूं...इसलिये आपको यहां के बारे में बिल्कुल भी परेशान होने की जरुरत नहीं है। आप निश्चिंत होकर भविष्य में जा सकते हो। जेनिक्स ने ओरस को तसल्ली देते हुए कहा।

“ठीक है ज़ेनिक्स, फिर मुझे भविष्य में 25 वर्ष आगे भेज दो।" यह कहकर ओरस, समयचक्र पर जाकर बैठ गया।

ज़ेनिक्स ने समय को सेट किया और फिर ओरस को पृथ्वी पर 25 वर्ष आगे भेज दिया।

.....................................................

(जनवरी 2027, पेरिस शहर, फ्रांस)

ओरस ने जब अपनी आँखें खोलीं, तो वह पेरिस के एफिल टावर के पास खड़ा था। ओरस ने अपने चारो ओर देखा, हर व्यक्ति अपने आप में मशगूल था।

ओरस ने एक बार एफिल टावर को ध्यान से देखा। वह विशाल लोहे का स्तंभ ओरस को काफी अच्छा लगा।

ओरस कुछ देर तक एफिल टावर को देखता रहा, फिर उसके सामने की ओर बने, एक फुटपाथ के पास जाकर खड़ा हो गया।

“यह मुझे ज़ेनिक्स ने यहां क्यों भेजा है? यहां पर मुझे जेनिथ कैसे मिलेगी?” ओरस मन ही मन सोच रहा था कि तभी उसकी नजर फुटपाथ से कुछ दूरी पर बिक रहे एक पत्रिका के स्टॉल की ओर गई।

ओरस उस स्टॉल की ओर बढ़ गया। ओरस स्टॉल पर खड़ा होकर वहां रखी किताबें देख रहा था कि तभी उसकी नजर ‘बिजनेस वर्ल्ड' नामक एक मैगजीन पर गई, जिसके कवर पेज पर जेनिथ की फोटो छपी थी।

ओरस ने वह मैगजीन उठा ली और ध्यान से जेनिथ की फोटो को देखने लगा। जेनिथ की वह फोटो बहुत ही आकर्षक लग रही थी।

अब उसने मैगजीन को खोलकर उसके कुछ पन्ने पलटे। अंदर एक स्थान पर फिर से जेनिथ की फोटो दिखाई दी, जिसके नीचे लिख रखा था- “जेनिथ मानेट, डायरेक्टर ऑफ फीनीक्स इंटरनेशनल।

अब ओरस ने उस मैगजीन के अगले पृष्ठ को देखा, वहां पर फीनीक्स इंटरनेशनल कंपनी का ऐड्रेस लिखा हुआ था, जो कि पेरिस में ही कहीं दिखा रहा था।

ओरस ने उस किताब वाले से, उस ऐड्रेस के बारे में पूछा, तो उसको पता चला कि फीनीक्स इंटरनेशनल कंपनी का ऑफिस यहां से ज्यादा दूरी पर नहीं है।

यह सोच ओरस लोगों से पूछते-पूछते फीनीक्स इंटरनेशनल कंपनी के ऑफिस तक पहुंच गया।

कंपनी का ऑफिस बहुत बड़ा था, बड़ी मुश्किल के बाद ओरस ऑफिस के रिसेप्शन तक पहुंच पाया।

रिसेप्शन के पीछे एक बहुत बड़े से फीनीक्स पक्षी का फोटो, एक गोले में बना था। शायद वह कंपनी का लोगो था।

“जी, मुझे कंपनी की डायरेक्टर मिस जेनिथ मानेट से मिलना है।" ओरस ने रिसेप्शनिस्ट से कहा।

“सर क्या आपके पास उनसे मिलने का अप्वांइटमेंट है?" रिसेप्शनिस्ट ने ओरस से पूछा।

“जी नहीं पर मैं उन्हें पहले से जानता हूं, आप उनसे कहिये कि ओरस उनसे मिलने डेल्फानो से आया है, वह स्वयं मुझे बुला लेंगी।” ओरस ने रिसेप्शनिस्ट से रिक्वेस्ट करते हुए कहा।

“ठीक है, आप उधर सोफे पर जाकर बैठ जाइये मैं मैम से बात करके आपको बताती हूं।" रिसेप्शनिस्ट ने ओरस को सोफे की ओर इशारा करते हुए कहा।

ओरस जाकर सोफे पर बैठ गया। कुछ देर बाद रिसेप्शनिस्ट ने ओरस को इशारे से अपने पास बुलाया:- “देखिये मिस्टर ओरस, मैम ने कहा है कि वह इस नाम के किसी व्यक्ति को नहीं जानतीं, तो मैं आपको उनसे नहीं मिलवा सकती।"

यह सुनकर ओरस हैरान हो गया। उसे जेनिथ से ऐसी आशा नहीं थी।

"मिस क्या आप एक बार उनसे मेरी बात करवा सकती हैं प्लीज।” ओरस ने रिक्वेस्ट भरे भाव से कहा।

“देखिये मिस्टर ओरस, अगर आप मैम को नहीं जानते हैं, तो फिर आप उनसे तभी मिल सकते हैं जबकि आपके पास कोई ऐसा वैज्ञानिक प्रोजेक्ट हो, जो मैम को आकर्षित कर सके?” रिसेप्शनिस्ट ने ओरस को समझाते हुए कहा।

“ठीक है, तो फिर आप उनसे कहिये कि मेरे पास समयचक्र का फार्मूला है, यह सुनकर वह मुझे जरुर बुला लेंगी। आई स्वेयर बस अब आप एक बार और बात कर लीजिये बस।" ओरस ने एक तरह से गिड़गिड़ाते हुए कहा।

ओरस की बात सुन रिसेप्शनिस्ट ने एक जोर की साँस छोड़ी और ओरस को फिर से सोफे पर बैठने का आग्रह किया। उसके बाद वह कहीं फोन मिलाने लगी।

कुछ ही देर में एक लड़की ओरस के पास आकर खड़ी हो गई- “आपका ही नाम ओरस है....जेनिथ मैम ने आपको बुलाया है। ओरस की यह ट्रिक काम कर गई थी।

वह लड़की ओरस को लेकर अंदर ऑफिस की ओर चल दी। कुछ ही देर में वह ओरस को एक मीटिंग हॉल में छोड़कर चली गई।

मीटिंग हॉल काफी बड़ा और शानदार था। मीटिंग हॉल के एक ओर एक बड़ा सा पर्दा लगा था, जो कि शायद हॉल को 2 भागों में बांटने के लिये लगाया गया था।

तभी उस हॉल में जेनिथ ने प्रवेश किया- “हलो मिस्टर ओरस, मेरा नाम जेनिथ है।" यह कहकर जेनिथ ने अपना हाथ किसी अंजान व्यक्ति की तरह ओरस की ओर बढ़ा दिया।

ओरस ने जेनिथ से हाथ मिलाया, पर उसकी नजर लगातार जेनिथ पर ही लगी हुई थी। वह समझ नहीं पा रहा था कि जेनिथ उसे पहचान क्यों नहीं रही है?

“आप कह रहे थे कि आपके पास किसी समयचक्र का फार्मूला है?” जेनिथ ने ओरस को बैठने का इशारा करते हुए कहा।

“जी...जी हां, मेरे पास समयचक्र का फार्मूला है, जो हमें किसी भी तरह का टाइम ट्रैवेल करवा सकता है।" ओरस ने कहा।

"तो फिर दिखाइये, कहां है आपकी फाइल? या फिर प्रोजेक्ट का ब्लूप्रिंट?” जेनिथ ने ओरस की ओर देखते हुए कहा।

“जी...जी वो मैं फाइल तो आज नहीं लाया, पर मैं अगली बार जब आपसे मिलने आऊंगा, तो फाइल जरुर लेता आऊंगा।” ओरस ने बहाना बनाते हुए कहा।

“स्ट्रेंज आप इतना बड़ा प्रोजेक्ट डिस्कस करने आये हैं और फाइल तो क्या एक नोटबुक भी साथ में नहीं लाये? चलिये कोई बात नहीं आप व्हाइट बोर्ड पर ही मुझे प्रोजेक्ट के बारे में कुछ समझा दीजिये।”

जेनिथ ने ओरस के हाथ में मार्कर पकड़ाते हुए कहा।

ओरस ने मार्कर को हाथ में पकड़ा और व्हाइट बोर्ड पर समयचक्र की आकृति को ड्रा करने लगा। जैसे ही वह आकृति को ड्रा करके पलटा, उसे जेनिथ की आँखों में आश्चर्य दिखाई देने लगा।

यह देख ओरस मन ही मन काफी खुश हो गया, उसे लगा कि जेनिथ उसके प्रोजेक्ट से काफी प्रभावित हो गई है।

“क्या यह प्रोजेक्ट आपका है मिस्टर ओरस, या फिर आपने यह प्रोजेक्ट किसी से चुराया है?" जेनिथ ने ओरस की आँखों में झांकते हुए पूछा।

"शत-प्रतिशत यह प्रोजेक्ट मेरा है।” ओरस ने जेनिथ को विश्वास दिलाते हुए कहा।

"क्या आप इनको जानते हैं मिस्टर ओरस?" यह कहकर जेनिथ ने, मीटिंग हॉल में लगे पर्दे को एक ओर खींच दिया।

पर्दे के दूसरी ओर एक व्यक्ति कुर्सी पर बैठा हुआ था, जिसे देखकर ओरस का हार्ट अटैक होते-होते बचा। वह व्यक्ति और कोई नहीं ओरस के पिता गिरोट थे, जो इस समय काफी यंग दिख रहे थे।

“यह...यह यहां कैसे?" ओरस ने लड़खड़ाते शब्दों में कहा।

"चलो, इन्हें देखकर आपने यह तो कबूल कर लिया कि आप इन्हें जानते हैं, अब जरा आप भी बता दीजिये मिस्टर गिरोट कि आपने अपने इस सीक्रेट प्रोजेक्ट की जानकारी और किसे-किसे दी है?” जेनिथ ने अब गिरोट से मुखातिब होते हुए पूछा।

“मैंने, अपने इस सीक्रेट प्रोजेक्ट की जानकारी और किसी को नहीं दी है मिस जेनिथ? और और मैं तो इस लड़के को जानता तक नहीं? बल्कि ये कहना ज्यादा ठीक होगा कि मैंने इस लड़के को आज से पहले कभी देखा तक नहीं?" गिरोट ने कहा।

"तो फिर इसके पास आपका प्रोजेक्ट कैसे पहुंचा मिस्टर गिरोट? आप यही बता दीजिये।” जेनिथ ने गुस्सा होते हुए कहा।

“इस बारे में मुझे भी कुछ नहीं पता मिस जेनिथ? मुझे लगता है कि इस बारे में यह लड़का ही हमें कुछ बता सकता है?” गिरोट ने कहा।

“क्या तुम इस बारे में कुछ बताओगे ओरस? या फिर मैं पुलिस को कॉल करुं, वो स्वयं ही तुमसे इस बारे में सब उगलवा लेगी।" जेनिथ ने अब ओरस के ऊपर चिल्लाते हुए कहा।

"मैं भी इस बारे में समझने की कोशिश कर रहा हूं जेनिथ, पर मैं भी इस समय इस पूरे मैटर को समझने में असमर्थ हूं।” ओरस ने कहा।

"एक मिनट!” तभी गिरोट ने बोर्ड की ओर देखते हुए कहा- “इस लड़के ने तो इस बोर्ड पर वह भी समझाया है, जिसके बारे में मैं अभी सोच ही रहा हूं।....ऐसा कैसे हो सकता है?"

"क्या तुम समययात्रा करके भविष्य से आये हो?" जेनिथ ने उलझे-उलझे शब्दों में पूछा।

“मैं समययात्रा करके ही आया हूं....पर....पर मैं तो भूतकाल से आया हूं।” ओरस ने कहा।

"यह कैसे संभव है मिस्टर ओरस?” गिरोट ने उलझे शब्दों में पूछा- “तुम्हारे पास मेरे प्रोजेक्ट का वह हिस्सा है, जिसे मैंने अभी बनाया ही नहीं है और तुम कह रहे हो, कि तुम इसी प्रोजेक्ट की सहायता से भूतकाल से आये हो? क्या तुम्हें यह सब लॉजिकल लग रहा है?"

“एक मिनट रुकिये अगर मैं यह कहूं कि मैं आपका ही पुत्र हूं तो आप इस बारे में क्या कहेंगे?" ओरस ने एक नया धमाका करते हुए कहा।

अब वहां खड़े जेनिथ और गिरोट के दिमाग चकराने लगे।

"मेरे ख्याल से हमें पहले ओरस की बातें एक बार सुन लेनी चाहिये, उसके बाद ही हम सोचें कि हमारे साथ क्या हो रहा है?” जेनिथ ने हथियार डालते हुए कहा।

अब ओरस ने शुरु से लेकर अंत तक की पूरी घटनाएं उन दोनों को बता दीं।

“एक मिनट ओरस, तुम्हारी कहानी में बहुत सी ऐसी बातें हैं, जो मेरी समझ से परे हैं। जैसे कि मैंने कभी जहाज पर यात्रा की ही नहीं? मैं तौफीक, सुयश नाम के लोगों से कभी मिली ही नहीं? और अगर मैं तुमसे भी पहले मिली होती, तो कम से कम मुझे तुम्हारा चेहरा या बातें तो याद रहतीं?" जेनिथ ने शंका भरे शब्दों में कहा- “इसलिये अब तुम्हें अपनी कहानी का किसी भी प्रकार का कोई प्रमाण देना होगा?”

"ठीक है मैं अभी प्रमाण देता हूं।” यह कहकर ओरस ने ज़ेनिक्स को याद किया- “ ज़ेनिक्स मुझे तुम्हारी मदद की जरुरत है। क्या तुम मेरी आवाज सुन रही हो?"

अपनी बातें बोलने के बाद ओरस कुछ देर के लिये शांत होकर जेनिक्स की आवाज का इंतजार करने लगा, पर जब कुछ देर के बाद भी ज़ेनिक्स की कोई आवाज नहीं सुनाई दी, तो ओरस थोड़ा चिंतित नजर आने लगा।

उसने एक बार फिर ज़ेनिक्स को पुकार, पर इस बार भी ज़ेनिक्स का कोई उत्तर नहीं मिला।

"मुझे लगता है कि मिस्टर ओरस, आप हमारा समय बर्बाद कर रहें हैं।" जेनिथ ने ओरस की ओर देखते हुए कहा- “मेरे ख्याल से आपको अपने घर...मेरा मतलब है कि ब्लैकून में वापस जाना चाहिये और इस बार अगर आप मुझसे मिलने आयें तो कृपया किसी प्रमाण के साथ आयें?"

"नहीं...नहीं...एक मिनट और रुक जाओ जेनिथ लगता है ज़ेनिक्स अभी कहीं व्यस्त है, वह जल्दी ही जवाब देगी।" ओरस ने जेनिथ को रोकने की आखिरी कोशिश करते हुए कहा।

पर जेनिथ ने ओरस को गुस्से से घूरकर देखा और मीटिंग हॉल के बाहर निकल गई।

जेनिथ को जाता हुआ देख, ओरस, गिरोट की ओर बढ़ा- “क्या आपको भी मेरी बात पर विश्वास नहीं है पिताजी?"

“मेरे विश्वास करने या ना करने से कुछ नहीं होगा ओरस....तुम्हें जेनिथ को विश्वास दिलाना होगा और जेनिथ को विश्वास तभी आयेगा, जब कि तुम उसे किसी भी प्रकार का कोई प्रमाण दिखाओगे...तो जाओ और पहले कोई प्रमाण लेकर आओ।" यह कहकर गिरोट भी मीटिंग हॉल से बाहर निकल गया।

अब ओरस थके कदमों से कंपनी से बाहर की ओर चल दिया। वह भविष्य में अपनी उलझनों का हल ढूंढने आया था, पर अपनी उलझनों में कुछ और बढ़ोतरी कर वहां से जा रहा था।

यही तो समय का चक्र था, जो पूरे ब्रह्मांड को अपने अंदर उलझाये था।

जारी रहेगा_____✍️
 
Bas yahi wo pech hai jo filhaal kisi ko samajh nahi aayega 😁

Waise wo zenix hi thi, varna jenith to pahchqan jaati use, and sabse badi baat, samay ke bahaav me jaldi-2 chhed chhaad bhi hui thi, jise sayad aapne bhi note kiya ho :dazed: khair, Thank you very much for your wonderful review and support bhai :hug:
 
#212.

चैपटर-14

माया जाल: (तिलिस्मा 5.52)

धनवंतरी की औषधि प्राप्त करने के लिये शैफाली ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गई। शैफाली के निकलते ही ऊर्जा द्वार स्वतः ही बंद हो गया। शैफाली ने एक बार पलटकर पीछे देखा और फिर आगे की ओर चल दी।

शैफाली को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कोई उसके साथ है या नहीं ...उसे तो बस जल्दी से जल्दी इस पूरे तिलिस्म को तोड़कर कैस्पर से मिलना था।

वैसे कैस्पर के लिये शैफाली ने बहुत सूझ-बूझ के साथ एक पहेली इंद्राक्ष के माध्यम से भिजवा दी थी। उसे पूरा विश्वास था कि कैस्पर उस पहेली को अवश्य हल कर लेगा और उसमें छिपे सार को भी समझ जायेगा।

अब शैफाली ने उस स्थान पर एक नजर मारी। चारो ओर बस बर्फ ही बर्फ नजर आ रही थी। दूरदूर तक और कुछ नहीं था। इस बर्फ के अपार सागर में शैफाली को धनवंतरी की बताई हुई आग को ढूंढकर उनके पास ले जाना था।

शैफाली बर्फ पर चलती हुई आगे बढ़ने लगी। कुछ आगे जाने पर शैफाली को एक साफ पानी की झील दिखाई दी।

शैफाली ने झील के पानी को अपने हाथों में उठाकर देखा। वह जल इतना स्वच्छ था, कि उसे अंजुली में भरने के बाद भी शैफाली के हाथ की रेखाएं बिल्कुल साफ नजर आ रही थीं।

"इस तिलिस्म में हमेशा झील के अंदर कुछ ना कुछ रहा है, मुझे झील के अंदर उतरकर एक बार देख लेना चाहिये।" यह सोच शैफाली उस झील में उतर गई।

शैफाली को हर बार की तरह इस बार भी किसी भी ठंडक को अहसास नहीं हो रहा था। झील में नन्हीं-नन्हीं लाल रंग की मछलियां तैर रहीं थीं। अब शैफाली झील की तली की ओर चल दी।

झील की तली में कुछ पत्थरों और जलीय पौधों के सिवा कुछ भी नहीं था। धीरे-धीरे शैफाली ने पूरी झील को ठीक ढंग से देख लिया, पर शैफाली को वहां कुछ भी नहीं मिला।

“लगता है इस बार कैश्वर ने झील में कुछ नहीं रखा है? मुझे झील के बाहर ही चलकर कुछ ढूंढने की कोशिश करनी होगी?” यह सोच शैफाली वापस झील की तली की ओर चल दी।

तली अभी कुछ दूर थी कि तभी एक लाल रंग की मछली, शैफाली के चेहरे के आगे आकर नाचने लगी।

यह देख शैफाली उस स्थान पर रुक गई और ध्यान से उस लाल रंग की मछली को देखने लगी।

तभी अचानक वह लाल मछली बहुत ही विशाल हो गई और इससे पहले कि शैफाली कुछ समझ पाती, उस मछली ने शैफाली को अपने मुंह में भर लिया और झील में एक दिशा की ओर चल दी।

...........................................

उधर जेनिथ भी ऊर्जा द्वार को पार कर एक ऐसे स्थान पर आ पहुंची, जहां एक विशाल मैदान में एक मंदर बना हुआ था।

जेनिथ सधे कदमों से उस मंदिर की ओर बढ़ गई। दूर से देखने पर ही वह मंदर एक श..व मंदर की भांति प्रतीत हो रहा था।

उस मंदर के बाहर नंमदी की एक विशाल प्रतिमा लगी थी। जेनिथ को अब हिं.. धर्म के बारे मे काफी कुछ जानकारी हो गई थी, इसलिये उसने नंमदी के पैर को स्पर्श कर अपने माथे से लगाया और फिर अपने जूते उतारकर मंदर के अंदर पहुंच गई।

मंदर के अंदर एक विशाल मंडप बना था, जिसमें बीच में एक शव..लग उपस्थित था। उसे देखकर साफ पता चल रहा था कि अभी कुछ देर पहले ही वहां से कोई पूजा करके गया है क्यों कि शि..ग पर अक्षत, पुष्प, दूध और चंदन चढ़ा हुआ था।

जेनिथ ने अपने सिर को उससे सटाकर दंडवत प्रणाम किया। अब जेनिथ की निगाहें मंदर में चारो ओर घूमने लगी।

पर उस जगह में ऐसा कुछ विशेष नहीं था? जिससे जेनिथ को कुछ अजीब लगता। कुछ देर सोचने के बाद जेनिथ वापस बाहर की ओर चल दी। तभी जेनिथ को अपने पीछे किसी के चलने का अहसास हुआ।

जेनिथ ने पलटकर पीछे की ओर देखा। जेनिथ को अपने पीछे जमीन पर गिरा हुआ वही फूल दिखाई दिया, जिसे कि जेनिथ ने अभी शि…ग पर चढ़ा हुआ देखा था।

“यह क्या ये फूल इधर कैसे आ गया? ये तो चढ़ा हुआ था।"

तभी जेनिथ को धनवंतरी की पहेली के शब्द याद आ गये, जिसमें त्रिशूल और फूल दोनों का ही ज़िक्र किया गया था। अब जेनिथ ने झुककर उस फूल को उठाने की कोशिश की, पर जैसे ही जेनिथ का हाथ उस फूल तक पहुंचा, वह फूल जेनिथ के हाथ से स्वतः ही दूर खिसक गया।

यह देख जेनिथ आश्चर्य से उस फूल को देखने लगी। पर फूल में किसी प्रकार का कोई मूवमेंट ना देख जेनिथ ने एक बार फिर से उस फूल को उठाने की कोशिश की। पर पिछली बार की तरह इस बार भी फूल आगे बढ़कर जेनिथ से दूर चला गया।

अब जेनिथ ने अपने चारो ओर देखा, पर उसे कोई नजर नहीं आया। इस बार जेनिथ सावधानी से फूल को पकड़ने के लिये आगे बढ़ने लगी, तभी वह फूल हवा में उड़कर त्रिशूल के ऊपर नाचने लगा।

अब जेनिथ को पूरा विश्वास हो गया था कि यह फूल ही धनवंतरी ने लाने को कहा था। वह अब धीरे-धीरे त्रिशूल की ओर बढ़ने लगी।

तभी जेनिथ को फूल के ऊपर, हवा में नाच रहा एक ऊर्जा का द्वार बनता दिखाई दिया, जो कि फूल से काफी ऊंचाई पर था।

इस बार जेनिथ ने झपटकर फूल को पकड़ लिया। फूल अब जेनिथ के हाथ में था। तभी जेनिथ की नजर अपने ऊपर आकर नाच रहे उस ऊर्जा द्वार की ओर गई।

“यह क्या? यह ऊर्जा द्वार तो अभी त्रिशूल के ऊपर था, फिर यह मेरे सिर के ऊपर कैसे आ गया?...कहीं ऐसा इस फूल की वजह से तो नहीं हुआ है?" जेनिथ ने अपने हाथ में पकड़े फूल को ध्यान से देखते हुए सोचा।

उस फूल का रंग बिल्कुल सफेद था और उस फूल की हर पंखुड़ी पर एक त्रिशूल जैसी आकृति बनी थी।

जेनिथ अभी ध्यान से उस फूल को देख ही रही थी कि तभी वह फूल जेनिथ के हाथ से उछलकर ऊपर स्थित ऊर्जा द्वार की ओर चल दिया।

जेनिथ ने उछलकर उस फूल को पकड़ने की कोशिश की, पर जेनिथ के उछलते ही वह स्वयं भी उस ऊर्जा द्वार में समा गई। ऊर्जा द्वार में तीव्र प्रकाश था, जिसकी वजह से जेनिथ की आँख बंद हो गई।

जेनिथ ने जब अपनी आँखें खोलीं, तो वह एक बहुत बड़े से फूलों के उद्यान में खड़ी थी। उसके आसपास हजारों की संख्या में वही फूल लगे दिखाई दे रहे थे, जो कि अभी जेनिथ को लेकर यहां आया था।

जेनिथ ने ऊपर आसमान की ओर देखा, रात अभी खत्म हो रही थी, और चारो ओर भोर का उजाला फैलने लगा था।

“हे भगवान, वह फूल तो इन फूलों के बीच कहीं गायब हो गया। अब मैं इतने फूलों के मध्य उस फूल की पहचान कैसे कर पाऊंगी?"

जेनिथ अब उस उद्यान में इधर-उधर घूमकर सभी फूलों को देखने लगी, पर सभी फूल जेनिथ को एक समान ही दिख रहे थे।

अब जेनिथ फिर से धनवंतरी की पहेली की पंक्तियों को याद करने लगी।

“पहेली में कहा गया था कि चंद्रकिरण से जन्मे, एक सहस्त्र फूल...यानि कि ये सभी फूल चंद्रमा की रोशनी में जन्म लिये हैं...पहेली की अगली पंक्तियां....थीं कि धनवंतरी को नवनिर्मित फूल चाहिये...यानि कि जो फूल सबसे आखिर में खिला होगा, वही नवनिर्मित होगा?" अब जेनिथ सभी फूलों को फिर से ध्यान से देखने लगी।

लगभग 2 घंटे की कड़ी मेहनत के बाद जेनिथ की नजर एक फूल पर जाकर टिक गई। अब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट दिखाई देने लगी।

“यही है वह नवनिर्मित यानि कि सबसे आखिर में खिला फूल क्यों कि....क्यों कि बाकी सभी फूलों पर ओस गिरी हुई है, बस इसी फूल पर ओस की एक भी बूंद नहीं है। यानि कि अगर यह रात में खिला होता, तो इस फूल पर भी ओस की बूंदें होतीं, जबकि ऐसा नहीं है है।" यह सोचकर जेनिथ ने उस फूल को तोड़ लिया।

जेनिथ के फूल तोड़ते ही एक जोर का रोशनी का झमाका हुआ और अब जेनिथ वह फूल अपने हाथ में लिये धनवंतरी के सामने खड़ी थी।

जेनिथ ने धनवंतरी के पास उस फूल को रखा और उनके हाथ में पकड़ी औषधि को ले लिया।

इस बार औषधि गायब नहीं हुई और जेनिथ के हाथ में आ गई। उस औषधि को जैसे ही जेनिथ ने खाया, धनवंतरी के हाथ में उसी के समान दूसरी औषधि नजर आने लगी।

अब जेनिथ उस गुफा के द्वार तक पहुंच गई, जिसमें आयुर्वेद के अध्याय रखें थे। जेनिथ तीसरी गुफा में प्रवेश कर गई।

तीसरी गुफा में चारो ओर जहरीली गैस फैली थी, परंतु जेनिथ के औषधि खाने की वजह से उस गैस ने जेनिथ के शरीर को किसी भी प्रकार से हीं नुकसान नहीं पहुंचाया।

इस प्रकार जेनिथ चलते हुए उस गुफा के अंत तक पहुंच गई। गुफा के अंत में एक पत्थर पर आयुर्वेद का तीसरा अध्याय रखा था, जेनिथ ने उस किताब को उठाया और गुफा से लाकर धनवंतरी के सामने रखे तीसरे पत्थर पर रख दिया।

“बधाई हो जेनिथ, तुमने अपना कार्य सबसे पहले पूर्ण कर लिया।” नक्षत्रा ने कहा- “अब आराम से बैठकर बाकी लोगों के आने का इंतजार करो।“ नक्षत्रा की बात सुन जेनिथ वहीं पर आराम से बैठ गई।

उधर सुयश अब भी हवा में तैर रहे पत्थर पर बैठा, वहां से निकलने का कोई उपाय सोच रहा था। तभी सुयश को अपने हाथ में पकड़ी उस ऊँट की मूर्ति का ध्यान आया, जो कि उसे रेत में दबी मिली थी।

सुयश उलट-पलट कर उस ऊँट की मूर्ति को देखने लगा। तभी सुयश का हाथ उस मूर्ति के पेट में लगे एक बटन से टच हुआ। अब सुयश ध्यान से उस बटन को देखने लगा, पर कुछ देर तक देखते रहने के बाद भी सुयश को उस बटन का कुछ कार्य समझ नहीं आया।

अब सुयश ने बटन को धीरे से दबा दिया। बटन के दबते ही ऊँट की पीठ से 2 पंख निकलने लगे। सुयश आश्चर्य से उन निकलते हुए पंखों को देखने लगा।

वह सोच भी नहीं सकता था कि ऊँट के पंख भी निकल सकते हैं, पर यही तो कैश्वर का जादू था, वही ऐसी ही चीजों का निर्माण करता था, जिसके बारे में कोई सोच भी ना पाये।

उधर जैसे ही ऊँट के पूरे पंख निकले, वह ऊँट जीवित हो गया और सुयश के हाथ से निकलकर हवा में उड़ने लगा।

अब उस ऊँट का आकार भी बढ़ता जा रहा था। कुछ ही देर में उस जादुई ऊँट का आकार सामान्य ऊँट के बराबर हो गया।

ऊँट अब सुयश के आसपास हवा में चक्कर लगा रहा था। अब सुयश को कुछ सोचने की जरुरत नहीं थी, वह तुरंत छलांग लगाकर ऊँट की पीठ पर बैठ गया।

ऊँट तो जैसे सुयश के बैठने का ही इंतजार कर रहा था, सुयश के बैठते ही ऊँट उस गड्ढे के दूसरी दिशा की ओर चल दिया, जिधर से रोशनी आती दिखाई दे रही थी।

वह रोशनी एक छेद से आ रही थी। सुयश कुछ देर तक उस छेद को देखता रहा और फिर उसने उस छेद में अपना हाथ डाल दिया।

सुयश को छेद के अंदर कोई रत्न सा महसूस हुआ। सुयश ने उस रत्न को छेद से निकाल लिया। वह एक सफेद रंग का चमचमाता हीरा था, जिससे तेज रोशनी निकल रही थी।

सुयश उस हीरे को लेकर पलटा। वह ऊँट अभी भी सुयश के पीछे जमीन पर खड़ा था। तभी सुयश की नजर उस तेज प्रकाश में ऊँट की परछाई पर पड़ी, जिसे देख वह खुश हो गया।

“यही तो मांगा था देवता धनवंतरी ने....श्वेत प्रकाश में किसी जीव की छाया का होना।” यह सोच सुयश ने अपने आसपास देखा, अब उसे कुछ दूरी पर एक ऊर्जा द्वार दिखाई देने लगा था।

सुयश ने आगे बढ़कर उस ऊँट का बटन दबाकर उसे फिर से पहले के समान कर दिया और उस ऊँट व हीरे को उठाकर ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गया।

वह ऊर्जा द्वार धनवंतरी के पास में ही निकला, जहां जेनिथ एक किनारे बैठकर सभी के आने का इंतजार कर रही थी। सुयश को आता देख जेनिथ खुश हो गई।

“अरे तुम तो सबसे पहले ही आ गई।” सुयश ने जेनिथ को देखते हुए कहा।

जेनिथ ने जल्दी-जल्दी अपनी पूरी कहानी सुयश को सुना दी। जेनिथ की कहानी सुन सुयश ने भी उस ऊँट व हीरे को धनवंतरी के सामने रखा और औषधि को लेकर, गुफा से आयुर्वेद का पहला अध्याय लाकर, धनवंतरी के सामने रख दिया।

अब वह भी जेनिथ के बगल में बैठकर बाकी लोगों के आने का इंतजार करने लगा।

.............................................

क्रिस्टी अभी भी गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से हवा में झूल रही थी। उसे ऐसे ही झूलते हुए 2 घंटे बीत चुके थे।

तभी क्रिस्टी को हवा में घूमता हुआ कोई और जीव भी दिखाई दिया, जो कि उसकी ही तरह उस गुरुत्वाकर्षण के जाल में फंसा हुआ था। वह जीव तेजी से अपने पैर चलाने की वजह से हवा में घूम रहा था।

क्रिस्टी अब चाँद की रोशनी में उस जीव को अपनी ओर आते देख रही थी, जब वह जीव थोड़ा और पास आ गया, तो क्रिस्टी को पता चला कि वह एक हाथी था।

किसी हाथी को बिना गुरुत्वाकर्षण के हवा में उड़ते देखना अपने आप में एक अनोखा अनुभव था, इत्तेफाक से यह दुर्लभ दृश्य इस समय क्रिस्टी की आँखों के सामने था।

अब उस हाथी की नजर भी क्रिस्टी पर पड़ चुकी थी, वह अपने हाथ पैरों के तेजी से हिलाकर क्रिस्टी के पास आने की कोशिश करने लगा।

हाथी धीरे-धीरे हवा में तैरता हुआ क्रिस्टी के पीछे आ गया। तभी क्रिस्टी के दिमाग में एक आइडिया आया, उसने अपने पैरों को सिकोड़कर हाथी के शरीर से छुआ दिया।

कुछ सेकेण्ड तक अपने शरीर का बैलेंस बनाने के बाद क्रिस्टी ने अपने पैरों को फिर से पूर्ववत करते हुए अपने शरीर को गति प्रदान की।

अब क्रिस्टी का शरीर हवा में लहराता हुआ, गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्र से बाहर आ गया।

बाहर गिरते ही क्रिस्टी तुरंत आगे भागकर गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र से थोड़ा दूर हो गई। बाहर आकर क्रिस्टी ने राहत की साँस ली।

तभी क्रिस्टी की नजर उस हाथी पर गई, जो अब भी हवा में नाचता हुआ, क्रिस्टी को ही देख रहा था।

क्रिस्टी की निगाह अब नीचे जमीन की ओर गई, तो क्रिस्टी को जमीन पर एक चाँदी के रंग का गोला बना दिखाई दिया। उस गोले को देख क्रिस्टी को समझते देर नहीं लगी, कि यह चाँदी के गोले वाला क्षेत्र ही गुरुत्वाकर्षण वाला क्षेत्र है।

अब क्रिस्टी ने अपने पीठ पर लदे बैग से एक छोटी सी रस्सी निकाली और उसे हाथी की ओर फेंका।

रस्सी हवा में लहराते हुए हाथी के पास पहुंच गई। रस्सी को देख हाथी ने अपनी सूंढ़ से उस रस्सी को पकड़ लिया।

चूंकि गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में किसी का भार मायने नहीं रखता, इसलिये क्रिस्टी ने आसानी से उस हाथी को खींचकर बाहर निकाल दिया।

हाथी ने एक बार क्रिस्टी को ध्यान से देखा और फिर गुस्सा होकर, वापस उस गुरुत्वाकर्षण के क्षेत्र में घुस गया। हाथी एक बार फिर हवा में उड़ने का आनंद उठा रहा था।

हाथी को इस प्रकार करते देख पहले तो क्रिस्टी को बहुत गुस्सा आया, पर उसे गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में आनंद उठाते देख क्रिस्टी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। वह समझ गई कि हाथी उस क्षेत्र में परेशान नहीं था, बल्कि अपने उड़ने का आनंद उठा रहा था।

क्रिस्टी ने धीरे से अपने सिर को झटका और वापस चाँद की ओर देखने लगी।

तभी फिर क्रिस्टी को टूटते हुए तारे दिखाई दिये। इस बार क्रिस्टी ने उन तारों के स्रोत का पता लगा लिया। वह सभी तारे, एक बड़े से पेड़ से निकल रहे थे।

परंतु उस पेड़ का आकार देख क्रिस्टी हैरान हो गई क्यों कि उस पेड़ का आकार बिल्कुल किसी बिच्छू के समान था।

यह देख क्रिस्टी को पहेली की पंक्तियां याद आ गईं, जिसमें बिच्छू के डंक का भी वर्णन था। अब क्रिस्टी उस पेड़ की ओर चल दी।

पेड़ के पास पहुंचने पर क्रिस्टी ने देखा कि उस पेड़ पर कुछ चमकीले फल लगे हुए हैं और वह बिच्छू जैसा पेड़, अपनी डंक जैसी एक डाल से, अपने ही पेड़ के फल को तोड़कर, आसमान की ओर उछाल रहा है। वही चमकते फल आसमान में टूटते तारे के समान प्रतीत हो रहे थे।

यह दृश्य देखकर क्रिस्टी के दिमाग में एक खतरनाक प्लान आया, उसे नहीं पता था कि ये प्लान सही है भी या नहीं, पर उसने अब कुछ करने को सोच लिया था।

अब क्रिस्टी धीरे से आगे बढ़कर, उस बिच्छू रुपी पेड़ पर चढ़ने लगी। कुछ ही देर में वह पेड़ की सबसे ऊंची वाली डाल पर पहुंच गई। अब क्रिस्टी ने अपने पास लगा एक चमकीले फल को पकड़ लिया।

कुछ ही देर के इंतजार के बाद, पेड़ की डंक रुपी डाल क्रिस्टी की ओर बढ़ी और उसने वो फल सहित क्रिस्टी को आसमान की ओर उछाल दिया।

बिना किसी सहारे के आसमान में इतनी ऊपर तक आने से, एक बार तो क्रिस्टी थोड़ी डर सी गई, फिर उसने अपने शरीर का बैंलेंस आसमान में भी बना लिया।

अब क्रिस्टी का शरीर चाँद के भी ऊपर था। क्रिस्टी की यह छलांग विश्व की शायद सबसे अनोखी छलांग रही होगी।

अधिकतम ऊंचाई तक पहुंचने के बाद, क्रिस्टी का शरीर नीचे की ओर आने लगा।

क्रिस्टी का शरीर अब चाँद से कुछ दूरी पर था, क्रिस्टी अपने शरीर को गोल-गोल घुमाकर चाँद के पास पहुंच गई। क्रिस्टी ने अपना हाथ बढ़ाकर उस 4 फुट के चाँद को आसमान से तोड़ लिया।

अब क्रिस्टी का शरीर तेजी से नीचे आने लगा। क्रिस्टी ने यह सोच रखा था कि उसका शरीर जैसे ही नीचे आयेगा, वह गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्र की वजह से, हवा में रुक जायेगी, परंतु यहां पर क्रिस्टी की सोच गलत साबित हो गई।

क्यों कि उस क्षेत्र का गुरुत्वाकर्षण चाँद की वजह से ही था और चाँद तो अब क्रिस्टी ने ही तोड़ लिया था, इसलिये उस क्षेत्र का गुरुत्वाकर्षण अब समाप्त हो गया था। अब यह बात क्रिस्टी को भी समझ में आ गई थी, क्यों कि उसका शरीर चाँद को पकड़े हुए अनवरत गिरता ही जा रहा था।

तेजी से नीचे गिर रही क्रिस्टी को अब जमीन साफ दिखाई देने लगी थी। डर की वजह से क्रिस्टी ने अपनी आँखें बंद कर लीं।

तभी क्रिस्टी को अपना शरीर हवा में झूलता महसूस हुआ। ऐसा महसूस होते ही क्रिस्टी ने झट से अपनी आँखें खोल दीं।

इस समय क्रिस्टी का शरीर उसी हाथी की सूंढ़ में झूल रहा था। हाथी ने अब क्रिस्टी के शरीर को जमीन पर रख दिया, और उसे घूरने लगा।

खुशी की अधिकता से क्रिस्टी ने हाथी की सूंढ़ पर कई सारी पप्पियां दे दीं। क्रिस्टी को अपने बचने पर विश्वास ही नहीं हो रहा था। वह हाथी उसे किसी भगवान के समान प्रतीत हो रहा था।

कुछ देर के बाद क्रिस्टी ने अपने भावों को नियंत्रित किया और इधर-उधर देखा।

अब क्रिस्टी को अपने सामने कुछ दूरी पर एक ऊर्जा द्वार दिखाई दिया। क्रिस्टी उस ऊर्जा द्वार की ओर बढ़ गई।

ऊर्जा द्वार में प्रवेश करने के पहले क्रिस्टी ने पलटकर एक बार हाथी को देखा और फिर उसे एक फ्लाइंग किस दे वह द्वार में प्रवेश कर गई।

वह द्वार भी धनवंतरी के पास खुला।

क्रिस्टी ने भी अपनी कहानी सुयश और जेनिथ को सुनाकर, धनवंतरी से औषधि ले, आयुर्वेद का चतुर्थ अध्याय लाकर, उसके स्थान पर रख दिया।

अब सभी को सिर्फ और सिर्फ शैफाली का इंतजार था।

.............................................

उधर शैफाली को मुंह में भरकर, वह लाल मछली झील के पानी में तैरती हुई आगे बढ़ती जा रही थी।

तभी झील में एक स्थान पर एक ऊर्जा द्वार दिखाई दिया। वह लाल मछली उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गई।

वह ऊर्जा द्वार एक कमरे में निकल रहा था, जहां पर ज्यादा रोशनी नहीं थी। उस कमरे में जरा सा भी पानी नहीं था।

कमरे में पहुंचकर मछली ने शैफाली को वहीं जमीन पर गिरा दिया और फिर से आकार में छोटी हो, उस कमरे में मौजूद एक काँच के जार में घुस गई।

काँच का जार पानी से भरा हुआ था। अब उस मछली को देख कोई नहीं कह सकता था कि यही मछली अभी कुछ देर पहले इतनी विशाल थी।

उधर जमीन पर गिरते ही शैफाली ने कमरे में चारो ओर देखा, एक स्थान पर अंधेरे में उसे कोई खड़ा दिखाई दिया। शैफाली दौड़कर उस व्यक्ति से लिपट गई।

उसके मुंह से सिर्फ एक ही शब्द निकला-“कैस्पर!!!!"

अब वह व्यक्ति धीरे से पलटा। वह सच में कैस्पर ही था, जिसका पूरा चेहरा आँसुओं से भरा था। वह अब शैफाली के माथे को लगातार चूमे जा रहा था। दोनों एक दूसरे के गले लगे ना जाने कितनी देर तक ऐसे ही रोते रहे।

"कोई इस तरह से जाता है क्या? वो भी बिना बताए।” कैस्पर ने शैफाली को देखते हुए कहा- “कम से कम इतना तो बता देती कि लौटकर कब आओगी?"

“इतना समय ही नहीं मिला कि तुम्हें सब कुछ बता पाती। पंचशूल ने मेरे शरीर को पूरी तरह से जला दिया था, उस जले शरीर के साथ ही मुझे बहुत से कार्य करने पड़े।” शैफाली ने अब कैस्पर से अलग होते हुए कहा “पर ये बताओ कि तुम मेरे मायावन में आने के बाद भी अभी तक मुझसे मिले क्यों नहीं?"

“मैं काफी दिनों से श्वेत महल में था, इसलिये मुझे तुम्हारे आने का पता ही नहीं चला, वो तो जब इंद्राक्ष ने तुम्हारी दी हुई पहेली मुझे बताई, तो मुझे तुम्हारे बारे में पता चला।” कैस्पर ने कहा।

“पहेली समझ में आ गई थी?" शैफाली ने कैस्पर को देखते हुए पूछा।

“तुमने क्या अभी तक मुझे बुद्धू समझ रखा है। कैस्पर ने शैफाली को देखते हुए कहा- “तुमने उस पहेली में सप्तअश्वों का ज़िक्र किया था। मैं समझ गया कि सप्तअश्वों के माध्यम से तुम तिलिस्मा के 7 द्वारों की बात कर रही हो, फिर तुमने त्रिशूल के बारे में कहा, जो कि महानदेव की शक्तियों के बारे में था। फिर तुमने बताया कि जिस समय की खिड़की से इंद्राक्ष बाहर निकला था, उसी समय की खिड़की से, मैं पांचवे द्वार के अंत में तुमसे आकर मिल सकता हूं।” बस इतना ही तो था, उस पहेली में। फिर क्या था मैंने देव की शक्तियों से उस समय की खिड़की का पता किया और फिर तुमसे मिलने आ गया।

“अरे वाह! मेरा कैस्पर तो सच में बहुत समझदार हो गया है।” शैफाली ने मुस्कुराते हुए कहा।

“अच्छा, अब समय ना बेकार करते हुए जल्दी जल्दी अपनी कहानी मुझे सुना दो। इससे पहले कि कैश्वर को मेरे बारे में पता चले, मैं यहां से निकल जाना चाहता हूं। नहीं तो कैश्वर मेरे नियम तोड़ने का हवाला देकर तुम सभी को तिलिस्म में फंसा देगा।” कैस्पर ने कहा।

कैस्पर की बात सुनकर शैफाली ने जल्दी-जल्दी अपनी पूरी कहानी कैस्पर को सुना दी। शैफाली की पूरी कहानी सुनने के बाद कैस्पर भी अपने कुछ प्लान शैफाली को बताने लगा।

कैस्पर के प्लान सुनकर शैफाली की आँखों की चमक बढ़ती जा रही थी। शैफाली को इस स्थान पर लगभग 1 घंटे बीत गये। अब कैस्पर सबकुछ शैफाली को समझा चुका था।

"तो फिर अब मैं निकलता हूं यहां से, तुम जल्दी से इस तिलिस्म को तोड़ो, तिलिस्मा के बाहर तुम्हारे निकलने का इंतजार कर रहा हूं।” कैस्पर ने कहा।

शैफाली ने धीरे से अपना सिर हिलाया और एक बार फिर कैस्पर के गले लगकर उसे विदा किया।

शैफाली के अलग होते ही काँच के जार में घूम रही लाल मछली फिर जार से बाहर निकली और हवा में आकर बड़ी हो गई।

शैफाली को मछली ने अपने मुंह में भरा और उस ऊर्जा द्वार से बाहर निकल गई। शैफाली के बाहर निकलते ही ऊर्जा द्वार कहीं गायब हो गया।

उस लाल मछली ने शैफाली को उसी स्थान पर छोड़ दिया, जहां से वह उसे लाई थी और फिर घूमकर झील में कहीं गायब हो गई।

शैफाली अब झील से निकलकर बाहर आ गई। अब उसका ध्यान पूरी तरह से अपने कार्य पर था।

शैफाली अब बर्फ में सभी ओर देखते हुए आगे बढ़ रही थी। तभी उसे एक जगह बर्फ पर बैठा हुआ एक साइबेरियन पक्षी दिखाई दिया, जो बर्फ में चोंच मारकर, कुछ निकालने की कोशिश कर रहा था।

शैफाली उस स्थान की ओर आगे बढ़ गई। शैफाली को अपनी ओर आता देख वह साइबेरियन पक्षी डर कर उड़ गया।

शैफाली को उस स्थान पर बर्फ से कुछ निकला हुआ दिखाई दिया। शैफाली ने उस स्थान की बर्फ को अपने हाथों से साफ किया। अब उसके सामने एक चमड़े का बैग दिख रहा था।

बर्फ में चमड़े का बैग देखकर शैफाली ने उस बैग को खोल लिया। उस बैग में एक लकड़ी से बनी पानी की बोतल थी। जो काफी चिकनी दिख रही थी।

"इस बोतल को कैश्वर ने यहां क्यों छिपा कर रखा है? कुछ ना कुछ तो अवश्य है इस बोतल में?" यह सोच शैफाली ने बोतल के अंदर झांका, पर बोतल के अंदर भी कुछ नहीं था।

तभी शैफाली की नजर बोतल के ढक्कन पर पड़ी, जो कि काफी चिकना और एक ओर को उभरा हुआ था।

"इस बोतल का ढक्कन तो बिल्कुल उत्तल लेंस की तरह दिख रहा है। एक बार अलबर्ट अंकल ने भी तो अपने चश्में से आग लगाई थी, तो फिर कहीं ऐसा तो नहीं कि इस बोतल के ढक्कन की सहायता से आग लगाई जा सकती हो? पर आग लगाना किस चीज में है, यहां तो कोई सूखी लकड़ी भी नहीं होगी?" .....तभी शैफाली की नजर अपने हाथ में थमी बोतल की ओर गई- “अरे, कहीं इस बोतल को ही तो नहीं जलाना है? क्यों कि इस पूरे स्थान पर एकमात्र यह बोतल ही सूखी लकड़ी से बना है...और...और तभी तो इसे चमड़े के बैग में रखकर बर्फ में छिपाया गया था, जिससे इस पर नमी का कोई असर ना हो?"

यह सोचते ही शैफाली ने पुनः उस लकड़ी की बोतल को चमड़े के बैग में डाल लिया, पर उस बोतल का ढक्कन अब भी शैफाली के हाथ में था। शैफाली ने बोतल के ढक्कन को सूर्य की रोशनी में रखा, पर काफी देर के बाद भी उस ढक्कन से कुछ नहीं हुआ।

“अरे...ये तो मैंने ध्यान ही नहीं दिया कि बोतल का ढक्कन तो पारदर्शी ही नहीं है, ऐसे में यह सूर्य की किरणों को आगे ही नहीं भेज पायेगा।" अब शैफाली फिर से पहेली की पंक्तियों को याद करने लगी।

"उन पंक्तियों में बताया गया था कि बर्फ में किसी प्रकार का दाग नहीं होता, मतलब यह स्वच्छ पानी से बना होता है पर सबसे स्वच्छ पानी तो झील का ही है कहीं...कहीं इस झील के पानी का प्रयोग करके तो आग नहीं बनाना?"

यह सोच शैफाली ने एक बार फिर ध्यान से ढक्कन को देखा। अब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट दिखाई देने लगी थी। अब शैफाली, बोतल के ढक्कन को लेकर झील के पास पहुंच गई।

शैफाली ने अब झील का स्वच्छ जल ढक्कन में भर दिया और उसे छाया में जमीन पर रखकर, एक बड़े से पत्थर के टुकड़े से उस ढक्कन को ढक दिया।

अब शैफाली उस ढक्कन के चारो ओर बहुत सी बर्फ रखकर, ढक्कन को बर्फ में पूरी तरह दबा दिया।

लगभग आधे घंटे के बाद शैफाली ने सभी चीजों को हटाकर, बोतल के ढक्कन को निकाल लिया।

बोतल के ढक्कन में अब झील का पानी बर्फ में बदल गया था। शैफाली ने अब ढक्कन को ऊपर से अपनी हथेली से रगड़ना शुरु कर दिया।

कुछ ही देर हथेली की गर्मी से ढक्कन की बर्फ निकलकर बाहर आ गई, परंतु अब वह देखने में किसी उत्तल लेंस की भांति लग रही थी, जो कि आगे से थोड़ा उभार लिये हुई थी।

शैफाली ने अब उस बर्फ से बने लेंस को, रगड़-रगड़ कर, बिल्कुल चिकना बना दिया। अब वह बिल्कुल एक पारदर्शी लेंस बन गया था, जिस पर किसी भी प्रकार का कोई दाग नहीं था।

शैफाली ने अब लकड़ी की बोतल को वापस बाहर निकाल लिया और उसे धूप में रख दिया। अब शैफाली ने अपने हाथ में थमे लेंस को इस प्रकार हाथ में ले लिया कि उस पर सीधी धूप पड़े।

लेंस अगर पारदर्शी नहीं होता, तो वह पहले स्वयं ही धूप में पिघल जाता, पर पारदर्शी होने के कारण, उस लेंस पर धूप का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। लेंस ने अब सूर्य की किरणों को एक स्थान पर संकेन्द्रित करना शुरु कर दिया।

लगभग 15 मिनट की अपार मेहनत के पश्चात् शैफाली ने आखिर उस लकड़ी बोतल को जला ही दिया।

जैसे ही लकड़ी की बोतल ने आग पकड़ी, शैफाली के सामने एक ऊर्जा द्वार दिखाई देने लगा।

शैफाली उस जलती हुई बोतल को वैसे ही पकड़कर उस ऊर्जा द्वार में प्रवेश कर गई। शैफाली को भी सकुशल आता देख सभी के चेहरे पर मुस्कान झलक उठी।

शैफाली ने भी सभी की भांति आयुर्वेद का दूसरा अध्याय लाकर धनवंतरी के सामने रख दिया।

जैसे ही शैफाली ने दूसरा अध्याय अपने सामने रखा, धनवंतरी की मूर्ति सहित वहां रखी सभी चीजें गायब हो गईं।

अब उस स्थान पर अगला द्वार नजर आने लगा था, जिस पर लिखा था- “तिलिस्मा भाग-6

लेकिन उस द्वार में प्रवेश करने के पहले ही सभी शैफाली से कहानी सुनने लगे। शैफाली ने कैस्पर की बातों को छोड़ सभी कुछ उन लोगों को ज्यों का त्यों बता दिया।

शैफाली की कहानी सुनकर सभी तिलिस्मा के छठे द्वार की ओर चल दिये।

पर इस समय शैफाली के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान थी, एक ऐसी मुस्कान जिसमें सदियों के मिलन की खुशबू भी थी और अपने कार्य को पूरा करने का दृढ़ विश्वास भी।

जारी रहेगा_____✍️
 
#213.

सूर्यांश: (25.01.2002, शुक्रवार, मैनहट्टन, न्यूयार्क, अमेरिका)

आर्ची ने जैसे ही शलाका को उस बच्चे के कहीं और जाने की बात कही शलाका सबकुछ छोड़ उस पार्क की ओर चल दी। जेम्स भी विक्रम को देखता हुआ शलाका के पीछे भागा।

“आर्ची, मुझे रास्ता गाइड करती रहो।” शलाका ने तेज चलते हुए कहा।

“आप बिल्कुल सही रास्ते पर हो...अब सामने दिख रही सड़क को पार करके, दूसरी ओर आ जाओ।" आर्ची ने शलाका को गाइड करना शुरु कर दिया।

"एक मिनट रुको शलाका।” जेम्स ने शलाका को रोकने की कोशिश करते हुए कहा- “हम लोग ऐसे भाग क्यों रहे हैं, हम आपके जादू से भी तो वहां जा सकते हैं?"

“तुम्हें क्या लगता है कि मैं यहां न्यूयार्क के बीचो बीच खड़े होकर जादू का प्रयोग करुंगी, अगर एक भी कैमरे ने हमें ऐसा करते देख लिया, तो फिर पूरी दुनिया की समाचार एजेंसियां आज से ही हमारे पीछे पड़ जायेंगी।” शलाका ने बिना रुके चलते हुए कहा।

लेकिन अब जेम्स को समझ में आ गया था कि क्यों शलाका इस प्रकार भाग रही थी?

“अब आपके सामने, एक प्लेग्राऊंड का गेट आयेगा, उसे पार करने के बाद, पार्क का गेट, आपके सामने होगा।” आर्ची, शलाका को तेजी से गाइड कर रही थी। कुछ ही देर में शलाका को ‘फोर्ट ट्रायन पार्क' का गेट दिखाई देने लगा।

“अब इस गेट से आप पार्क के अंदर की ओर आ जाइये और फिर बांई ओर चलिये। अब वह लड़का आपसे ज्यादा दूरी पर नहीं है।” आर्ची ने शलाका को उत्साहित करते हुए कहा।

शलाका काफी तेज चल रही थी, जेम्स बड़ी मुश्किल से उसकी गति के बराबर चल पा रहा था। जेम्स की अब साँस भी फूलने लगी थीं। तभी शलाका और जेम्स को वह लड़का दिखाई दिया।

“आपके सामने जो लड़का है, वही है वह लड़का, जिसने उस दिन अमृत की शीशी म्यूजियम से चुराई थी।" आर्ची ने कहा।

शलाका उस लड़के के पास पहुंच गई, जो कि पार्क की एक बेंच पर बैठा था।

लड़का शक्ल से ही भारतीय लग रहा था, परंतु उसकी आँखें बहुत चमकीली थीं। उसका रंग गोरा और बाल काले थे। उसने इस समय एक सफेद रंग की शर्ट पर एक गाढ़े नीले रंग का जंपर पहन रखा था।

शलाका उस लड़के के बगल जाकर बैठ गई। उस लड़के ने अपना चेहरा उठाकर शलाका को देखा और फिर बिना अपनी नजर हटाये, उसे निहारता रहा।

शलाका को वह लड़का काफी भोला-भाला लगा। पर फिर भी उसने अपने दिमाग को केन्द्रित करते हुए उस बच्चे की ओर ध्यान से देखा।

"आर्ची इस बच्चे को स्कैन करो और देखो कि यह कौन है?” शलाका ने यह बात अपने मन में ही कही थी, इसलिये उस बच्चे को शलाका की आवाज सुनाई नहीं दी।

"इस बच्चे के चेहरे पर किसी प्रकार का कोई मेकअप नहीं है, इसके शरीर की ऊर्जा बताती है कि यह बहुरुपिया भी नहीं है, इसके दिल की धड़कन सामान्य है और वह किसी बालक की ही तरह धड़क रही है, इसका मतलब यह सच का ही एक बालक है इसके शरीर के सभी अंग बिल्कुल साधारण मनुष्य की भांति ही हैं, जो यह साबित करता है कि इस बालक में किसी भी प्रकार की कोई दिव्य शक्ति नहीं है। शलाका, यह एक साधारण बालक है, जिसकी उम्र लगभग ..... वर्ष है। इसमें कुछ भी असामान्य नहीं है।

यह सुन शलाका ने बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा- “तुम्हारा नाम क्या है और तुम कहां रहते हो?"

मगर शलाका को देखते हुए, पता नहीं क्यों उस बच्चे की आँखें भर आईं, पर वह बोला कुछ नहीं वह तो बस अनवरत शलाका को देखे जा रहा था।

“क्या हुआ, तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?" शलाका ने उसकी भरी-भरी आँखों को देखते हुए प्यार से पूछा।

“मेरा नाम सूर्यांश है, मैं इस दुनिया में अकेला हूं और आपको देखकर मुझे मेरी माँ की याद आ गई।" सूर्यांश ने कहा।

“क्यों तुम्हारे माता-पिता कहां गये?” शलाका ने आश्चर्य से सूर्यांश को देखते हुए पूछा।

“मेरी माँ, बचपन में ही मुझे छोड़कर कहीं चली गई?” सूर्यांश ने कहा- “मैं यहां अपने अंकल के यहां रहता हूं...उनका घर यहां से कुछ दूरी पर है जब वो अपने ऑफिस चले जाते हैं, तो मैं यहां पार्क में आ जाता हूं।"

“और तुम्हारे पापा? वो कहां गये?" शलाका ने सूर्यांश के गाल को प्यार से सहलाते हुए पूछा।

“वो माँ को ढूंढने चले गये। काफी समय से उनका भी कुछ पता नहीं है?” सूर्यांश ने भी अब शलाका के चेहरे को छूते हुए कहा- “क्या मैं आपको माँ बोल सकता हूं?"

सूर्यांश के यह शब्द सुनते ही जाने क्यों शलाका का मन भर आया, उसने सूर्यांश को गले से लगाते हुए कहा- “बिल्कुल बोल सकते हो, पर पहले तुम्हें, मुझे एक चीज बतानी होगी?" शलाका की बात सुन सूर्यांश, शलाका का चेहरा देखने लगा।

“तुमने 4 दिन पहले जो म्यूजियम से एक शीशी चुराई थी, वह कहां है?”

“उस शीशी में तो कुछ भी नहीं था, मैंने उसे खोल के देखा था, उसमें तो बस एक बूंद पानी था।” सूर्यांश, शलाका का प्यार देख अब खुल के बोलने लगा था।

"तो तुमने उस शीशी के पानी का क्या किया?"

“उस समय मेरा गला सूख रहा था, इसलिये मैंने उस पानी को पी लिया और शीशी यहीं पार्क में फेंक दी थी।” सूर्यांश ने पार्क के एक ओर इशारा करते हुए कहा।

शलाका ने जेम्स की ओर देखा। जेम्स शलाका का इशारा समझ उस ओर जाकर शीशी को ढूंढने लगा, जिधर सूर्यांश ने इशारा किया था।

कुछ ही देर में जेम्स उस सुनहरी शीशी को लिये हुए, शलाका के पास पहुंचा। शलाका ने शीशी को खोलकर देखा, पर उसमें कुछ नहीं था, यानि की सूर्यांश सही कह रहा था और अब वह अमरत्व को प्राप्त कर चुका था।

अब शलाका के वहां रुके रहने का कोई औचित्य नहीं था, इसलिये उसने एक आखिरी बार सूर्यांश के सिर पर हाथ फेरा और उठकर खड़ी हो गई।

“अब मैं चलती हूं सूर्यांश, पर आप ज्यादा शैतानी मत करना और समय पर यहां से सीधे अपने घर जाना।"

यह कहकर शलाका वहां से वापस चल दी, पर शलाका अभी कुछ ही दूर जा पाई थी कि एका एक उसे कुछ याद आया- “ओह नो!"

और वह जेम्स को ले वापस भागकर उसी स्थान पर आ गई, जहां उसने अभी सूर्यांश को छोड़ा था, पर अब सूर्यांश उस जगह पर नहीं था।

“क्या हुआ? आप इस तरह से भागकर वापस क्यों आईं?" अब जेम्स से रहा ना गया, इसलिये वह पूछ बैठा।

“सूर्यांश झूठ बोल रहा था, अगर उसने अमृत पीया होता, तो आर्ची को उसके शरीर के बदलाव नजर आ जाते, पर आर्ची को वह सामान्य बालक ही लगा, इसका साफ मतलब निकलता है कि या तो उस बालक ने अमृत नहीं पिया था या फिर वह किसी प्रकार से आर्ची को धोका देकर बच निकला है?"

तभी शलाका को उस सीट पर कोई कागज रखा हुआ दिखाई दिया, जहां अभी सूर्यांश बैठा था। शलाका ने उस कागज को उठा लिया, परंतु उस कागज पर नजर पड़ते ही शलाका के दिमाग में धमाके से होने लगे।

उस कागज पर वैसा ही डिजाइनर S और दिल का निशान बना था, जैसा कि एक दिन पहले शलाका को अपने कमरे में मिला था।

“यह क्या? क्या सूर्यांश ही उस दिन मेरे कमरे में आया था? लेकिन कैसे? कैसे एक छोटा सा बालक मेरी सभी सिक्योरिटी को धता देकर, मेरे कमरे में घुस सकता है? और....और वह अंटार्कटिका कैसे पहुंच गया? कुछ तो गड़बड़ है सूर्यांश में? मुझे कैसे भी उस बालक को दोबारा ढूंढना होगा?” शलाका के दिमाग में सैकड़ों प्रश्न घुमड़-घुमड़ कर आ रहे थे।

"कहीं ऐसा तो नहीं कि हम जिस दिव्य बालक को देवोम समझ कर ढूंढ रहे हैं, यह वही बालक हो क्यों कि यह आपको माँ बोल रहा था... और इसने यह भी कहा था कि इसके माता-पिता इसे छोड़कर कहीं चले गये?" जेम्स के शब्दों ने तो कहानी को और ज्यादा उलझा दिया।

“पर महेन्द्र के कहने के हिसाब से तो देवोम कम से कम 24 से 25 वर्ष का होना चाहिये था, पर यह तो xyz से yxz वर्ष का बालक था।” शलाका ने जेम्स की ओर देखते हुए कहा।

“ये भी तो हो सकता है कि महेन्द्र जान-बूझकर झूठ बोल रहा हो, उसे डर हो कि अगर हम सच्चाई जान जायेंगे, तो फिर हम देवोम को अपने साथ लेते जायेंगे। जेम्स ने कहा।

“महेन्द्र सच बोल रहा था या नहीं, यह गुत्थी तो अभी सुलझ जायेगी।” यह कहकर शलाका ने एक बार फिर आर्ची को संबोधित किया- “आर्ची, तुम जरा पिछले 15 दिन का पुलिस का डेटा चेक करो और पता करो कि महेन्द्र ने देवोम के खोने की पुलिस कंप्लेन किसी पुलिस स्टेशन में लिखवाई है क्या?

कुछ ही देर में आर्ची की आवाज आई- “हां, महेन्द्र ने 5 दिन पहले देवोम की एक 'मिशिंग रिपोर्ट' लिखवाई है।"

“यानि कि देवोम सच में ही गायब हुआ है, पर बिना उसकी फोटो के हम उसे ढूंढे भी तो कैसे?” शलाका ने कहा।

तभी अचानक शलाका को कुछ याद आया “आर्ची, मैंने जो देवोम की फोटो, तुम्हें सेव करने को कही थी, उसे तुम अपने फ्यूचर डेटा में डाल कर बता सकती हो कि देवोम इस समय देखने में कैसा होगा? तुरंत देवोम की बचपन की फोटो से अभी की फोटो बनाकर मुझे बताओ।"

लगभग 5 मिनट के बाद आर्ची की आवाज आई“मैंने देवोम की नई फोटो बना ली है।"

“अब देवोम की इस नई फोटो को पूरे विश्व के कैमरे से स्कैन करो और देखो कि इसे आखिरी बार कहां पर देखा गया था?” शलाका ने कहा।

जेम्स तो जैसे आर्ची का फैन होता जा रहा था, इतने एडवांस कंप्यूटर के बारे में तो वह सोच भी नहीं सकता था।

"देवोम की फोटो सर्च करने के बाद पता चला कि देवोम को 15 दिन पहले, आखिरी बार फ्लोरिडा के एयरपोर्ट पर देखा गया था, जहां से वह एक हेलीकॉप्टर में बैठकर कहीं चला गया? एक मिनट रुकिये.... हमें देवोम के चेहरे से मिलता एक डेटा और मिला है, पर इस डेटा में देवोम का नाम व्योम लिखा हुआ है और यह डेटा अमेरिका की सीक्रेट सर्विस CIA का है। यानि की देवोम ने व्योम के नाम से, अमेरिकन सीक्रेट सर्विस ज्वाइन की थी और इस डेटा का आधार पर उसे जो आखिरी मिशन दिया गया था, उसका मिशन का नाम था- “डिस्कवर ऑफ सुप्रीम"

यह सुनकर तो शलाका को जैसे चक्कर आ गया। अब वह समझ चुकी थी कि क्यों देवोम की फोटो उसके घर पर नहीं मिल रही थी? जरुर CIA वालों ने देवोम के CIA ज्वाइन करने के बाद, उसकी तस्वीर को उसके घर से हटवा दिया होगा।

पर अगर देवोम ही व्योम है, तो सूर्यांश कौन है? जो भी हो शलाका इस गुत्थी को जितना सुलझाने की कोशिश कर रही थी, यह गुत्थी उतना ही और उलझती जा रही थी।

ऐसा लग रहा था कि जैसे ईश्वर ने भविष्य को स्वयं उलझा रखा हो?

°°°°°

प्रश्नावली:

दोस्तों जैसा कि आप देख रहे हैं कि प्रश्नों की संख्या अब इतनी ज्यादा हो चुकी है कि अब वह मस्तिष्क में एकत्रित नहीं हो पा रहे हैं। तो क्यों न इन सारे प्रश्नों को एक जगह पर एकत्रित कर लें

1) पंचशूल का निर्माण किसने और क्यों किया था?

2) मैग्ना का ड्रैगन, लैडन नदी की तली में क्यों सो रहा था? मेलाइट उसे क्यों जगाना चाहती थी?

3) सागरिका, वेगिका, अग्निका आदि चमत्कारी पुस्तकों का क्या रहस्य था?

4) क्या था फेरोना ग्रह के जनक, पेन्टाक्स का रहस्य?

5) एण्ड्रोनिका में जाने के बाद धरा और मयूर का क्या हुआ?

6) महावृक्ष के स्वप्जतरु में कितने रहस्य छिपे थे?

7) सुनहरी ढाल और तलवार से आकृति देवराज इंद्र से कैसे वरदान मांगना चाहती थी?

8) विक्रम बर्फ के गोले में कैसे पहुंच गया? उसकी स्मृति कैसे चली गई थी? जबकि वह एक अमर योद्धा था।

9) क्या विक्रम आकृति की दी हुई नीली अंगूठी उतारकर वारुणी से सम्पर्क कर सका?

10) क्या फासा और कागोशी को सच में कलाट ने मारा था?

11) कौन था जैगन का गुरु कुवान? क्या मकोटा को वुल्फा उसी से मिला था?

12) तीसरे पिरामिड में कुवान की मूर्ति के नीचे खड़े निष्क्रिय जीव योद्धा कौन थे?

13) क्या मकोटा सुरंग के रास्ते तिलिस्मा में प्रवेश कर सका?

14) क्या मेलाइट, रोजर को कस्तूरी मृग का रहस्य बता पाई?

15) सुर्वया के सिंहलोक में 'चतुर्भुज सिंहराज', शुभार्जना और दिव्यदृष्टि जैसी शक्तियां कहां से आयीं थीं? सुर्वया ने अपने परिवार के बारे में क्यों नहीं बताया?

16) क्या था उस रक्त भैरवी की डिबिया के अंदर, जिसे नीलाभ ने हनुका को दिया था?

17) माया ने 15 लोकों का निर्माण किस प्रकार किया? वह 15 लोक कौन-कौन से स्थान पर थे?

18) क्या नीलाभ महानदेव के अन्य रुपों से आशीर्वाद ले पाया?

19) क्या था नीलाभ के रक्त से बनी चिड़िया नीलिमा का रहस्य?

20) क्या हुआ था गिरोट के साथ, जो वह ओरस को पृथ्वी पर भेजने से डर रहा था? वह किन समय के आयामों में उलझने की बात कर रहा था?

21) ज़ेनिक्स ने संरक्षिका के बारे में अभी तक ओरस को क्यों नहीं बताया था? क्या संरक्षिका में भी कुछ रहस्य छिपे थे?

22) क्या एलात्रा और एलनिको के मरने के बाद एंड्रोवर्स पावर और खतरनाक हो गये?

23) शलाका की अति आधुनिक कंप्यूटर आर्ची का निर्माण किसने किया था?

24) क्या शलाका का आर्केडिया यान, शलाका के पिता का था? कहां था इस समय शलाका का पिता?

25) क्या कैस्पर, मेरोन और सोफिया को हेडिस की कैद से छुड़ाने अंडरवर्ल्ड जा पाया?

26) क्या कैस्पर का सत्य जानने के बाद जीयूष ने किसी प्रकार से कैस्पर की मदद की?

27) क्या कैस्पर की बताई तैयारियों को वारुणि पूरा कर पाई?

28) क्या कैस्पर और वारुणि सभी ब्रह्मांड रक्षकों को संगठित कर पाये?

29) कैसी थी विद्युम्ना की बल और छल शक्ति? क्या व्योम और त्रिकाली उन शक्तियों को परास्त कर त्रिशाल और कलिका को छुड़ा पाये?

30) क्या ऐलेक्स और तौफीक सच में मर गये थे या फिर ये भी कोई कैश्वर का जाल था?

31) वुल्फा के मरने के बाद मकोटा ने क्या किया?

32) क्या था बिल्ली वाली देवी के हाथ में पहने कड़े का रहस्य, जिसे अलबर्ट ने उतारकर स्वयं पहन लिया था?

33) क्या ब्रूनो ही डेंगो था? तो फिर लैडन नदी के अंदर सोया ड्रैगन कौन था?

34) क्या अलबर्ट तिलिस्मा में प्रवेश कर सुयश से मिल पाया?

35) साफ दिख रहा था कि ज़ेनिक्स कैश्वर के साथ है, तो क्या वह ओरस से भी झूठ बोल रही थी? ज़ेनिक्स आखिर ऐसा क्यों कर रही थी?

36) क्या कैश्वर अपने नये शरीर में प्रवेश करने के बाद और भी खतरनाक हो गया?

37) क्या ऐमू को कभी अमरकथा का भान हो पाया?

38) इंद्राक्ष से क्रिस्टी ने क्या वरदान मांगा था?

39) क्या कलाट और युगाका ने वीनस को अपना लिया?

40) भविष्य में जाने के बाद ओरस को गिरोट कैसे दिखाई दिया? क्या ज़ेनिक्स ने जान-बूझकर ओरस को भविष्य में भेजा था?

41) भविष्य की जेनिथ, ओरस, सुयश और तौफीक को क्यों नहीं जानती थी?

42) कौन था नन्हा सूर्यांश? क्या सूर्यांश ही चुपचाप शलाका के कमरे में गया था?

43) क्या वेदांत रहस्यम् में अभी और भी रहस्य छिपे थे? जिन्हें अभी शलाका देख नहीं पाई थी।

44) ज़ेनिक्स ने कैश्वर के माध्यम से फेरोना ग्रह पर संदेश क्यों भिजवाया था?

45) कैस्पर ने छिपकर शैफाली को कैसा प्लान बताया था?

46) कैसा था तिलिस्मा का आगे का मायाजाल? क्या वह आगे और कठिन होता गया?

47) क्या तिलिस्मा में घुसे सभी लोग तिलिस्मा को पार कर काला मोती प्राप्त कर सके? ऐसे ही ना जाने कितने सवाल होंगे जो आपके दिमाग में घूम रहे होंगें?

तो दोस्तों इन सारे अनसुलझे सवालों के जवाब इस कहानी के अगले भाग का जिसका नाम है- “ब्रह्मकण शक्ति' में मिलेंगे, जिसमें हम आपको ले चलेंगे, ब्रह्मलोक के एक ऐसे अद्भुत संसार में, जहां पर पृथ्वी की उत्पत्ति के रहस्य छिपे है।

*******

"दूसरों को बना ने में तमाम उम्र गुजारी है,

पंख नये हैं, पर अब मेरे उड़ने की बारी है"

दोस्तों इस कहानी को लिखने में बहुत समय और मेहनत लगी है। इसे पढ़कर कृपया “रिव्यू के माध्यम से अपने विचार जरुर व्यक्त की जियेगा।

🙏🏼🙏🏼🙏🏼🙏🏼
 
Devom hi Vyom hai, maine us samay is liye mana kiya tha ki tab tak maine uske baare me poora socha nahi tha and yes theory thi, but sath me ye bhi tha ki declared hone se charm kam ho jaata 😂

And rahi baat Suryansh ki to uski hakikat kuch aur hai, jab pata chalega to dhamaka hoga :D

Rahi baat Aarchi ko dhokha dene ki, to ye uske baaye hath ka khel hai.

Thank you very much for your wonderful review and support bhai :hug:
 
#214.

काला मोती (ब्रह्मकण शक्ति)

सप्तशक्ति - ब्रह्मांड के निर्माण के लिये ईश्वर ने पहले सप्तशक्तियों का निर्माण किया। ये सप्तशक्तियां थीं- वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, आकाश, ध्वनि और प्रकाश। इन सभी सप्तशक्तियों ने मिलकर ब्रह्मांड में उपस्थित सभी ग्रहों की रचना की। परंतु अभी भी जीवन की उत्पत्ति संभव नहीं हो सकी थी।

जीवन की उत्पत्ति के लिये ब्र..देव ने एक कण की रचना की, जिसे बाद में ब्रह्मकण के नाम से जाना गया। इस ब्रह्मकण में जीवन की उत्पत्ति के अलावा इन सभी सप्तशक्तियों को नियंत्रित करने की शक्ति भी थी।

ब्रह्मांड की रचना के बाद देव ने इस ब्रह्मकण को एक काले मोती में समाहित कर समुद्र की अथाह गहराइयों में कहीं छिपा दिया। परंतु एक दिन एक नीली जलपरी की गलती से ‘काला मोती’ ग्रीक देवता पोसाइडन के हाथ लग गया।

इसके बाद शुरु हुई रहस्य व रोमांच से भरी ऐसी कहानी, जिसने पृथ्वी ही नहीं वरन् ब्रह्मांड के कई ग्रहों को अपनी चपेट में ले लिया। फिर शुरु हुई एक ऐसी प्रश्नावली जिसने सभी के मस्तिष्क को पूरी तरह से झकझोर कर रख दिया-

1) क्या हुआ जब देव का जन्म सहस्त्रदल कमल पर हुआ? क्या ब्र…ह्देव अपने जन्म के रहस्य को समझ सके?

2) क्या हुआ जब ब्रह्मकण से जन्मी लावण्या, अरिगंधा के राजकुमार मेघवर्ण को लेकर अथाह समुद्र की गहराइयों में चली गई?

3) क्या नीलाभ महानदेव की शक्तियों को प्राप्त करने के लिये, काशी जाकर का..भैरव से आशीर्वाद प्राप्त कर सका?

4) क्या हुआ जब समयचक्र ने भविष्य को बदलना शुरु कर दिया?

5) क्या हुआ जब तिलिस्मा में घूम रही 12 राशियों ने अलग-अलग प्रकार से तिलिस्मा में प्रवेश किये लोगों पर आक्रमण कर दिया?

6) क्या था काँच की तितली का रहस्य, जो लोगों का अपहरण कर उनका रुप धर लेती थी?

7) क्या हुआ जब व्योम का युद्ध यम व महान…ली से हुआ?

8) क्या सुयश व शैफाली कैलाश पर्वत पर लिपटी महानदेव की जटा को खोलकर मायाजाल को पार कर सके?

9) क्या था रावम की बालरुप वाली मूर्ति का रहस्य, जिसे लेने के लिये नीलाभ को गरुणाक्ष पर्वत पर जाना पड़ा?

10) क्या था ब्लैकून के अंदर छिपे फीनीक्स पक्षी का रहस्य?

11) क्या था न्यूयार्क शहर में स्थित ‘एटर्नल फ्लेम’ का रहस्य, जो झरने के नीचे भी सदियों से जल रही थी?

12) क्या था सीरीनिया के जंगलों में छिपे ‘निम्फिया महल’ का रहस्य, जिसे आर्टेमिस ने अपनी सबसे प्रिय सुनहरी हिरनी के लिये बनाया था?

13) क्या क्रिस्टी रोम के पौराणिक शहर ‘ट्रॉय’ के तिलिस्म को पार कर सकी?

तो दोस्तों इन सभी प्रश्नों के उत्तर को जानने के लिये आइये पढ़ते हैं, एक ऐसी महा गाथा, जिसने मनुष्य ko हिलाकर रख दिया। जिसका नाम है-

“काला मोती -ब्रह्मकण शक्ति”

चैपटर-1

ब्रह्मज्ञान : (सतयुग, क्षीर सागर)

क्षीरसागर का दुग्ध के समान श्वेत जल, सागर की सतह पर हिलोरें मार रहा था। दूर-दूर तक लहरों की हलचल और उसकी तेज ध्वनि के सिवा कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा था। नीला आसमान अपनी छाया को, क्षीर सागर के श्वेत जल में निहार कर मुग्ध हो रहा था।

तभी वातावरण में एक सुनहरा दिव्य प्रकाश उत्पन्न हुआ, जो कि नीले आसमान से निकलकर, क्षीर सागर के श्वेत जल को, एक स्थान पर स्पर्श करने लगा। दिव्य प्रकाश का श्वेत जल के स्पर्श करते ही, उस श्वेत जल के मध्य से, एक गुलाबी रंग की आकृति ने उभरना शुरु कर दिया। कुछ ही देर में देखते ही देखते, वह गुलाबी आकृति पूर्ण रुप से, श्वेत जल की सतह पर आ गई।

अब उस गुलाबी आकृति ने, एक विशाल दिव्य कमल के पुष्प का आकार ले लिया, पर यह पुष्प अभी खिला नहीं था। यह तो मात्र एक पवित्र कली थी, जो किसी अद्भुत शक्ति के दिव्य प्रकाश से जन्म ले रही थी।

कली के प्रकट होते ही, श्वेत जल हवा में तेज हिलोरें मारने लगा। श्वेत जल कमल की उस कली को उछलकर, इस प्रकार स्पर्श कर रहा था, मानों वह दुग्ध जल, उस पवित्र कली के पैर पखार रहा हो। तभी वातावरण में ‘ऊँ’ की एक ध्वनि उत्पन्न हुई, जो कि कुछ ही पलों में सम्पूर्ण सृष्टि में फैल गई। यह ध्वनि निरंतर वातावरण में एक मधुर रस घोल रही थी।

लगातार ‘ऊँ’ के स्पंदन से, कमल की कली ने कुनमुनाकर अपनी आँखें खोलना शुरु कर दिया। एक-एक कर कली की पंखुड़ियां खुलती जा रहीं थीं।

कुछ ही देर में इस सहस्त्रदल कमल की एक हजार पंखुड़ियों ने, अपनी निद्रा भंग कर, इस अपूर्ण सृष्टि के दर्शन किये। सभी पंखुड़ियों के खुल जाने के बाद, उस सहस्त्रदल कमल पर एक दिव्य पुरुष लेटे हुए दिखाई दिये, जिनकी पलकें अभी विश्राम की अवस्था में थीं।

प्रकाश की किरणें अभी भी प्रस्फुटित होकर, पवित्र कमल को स्पर्श कर रही थीं। उधर ‘ऊँ’ का निनाद भी अपने चरम पर था। तभी क्षीर सागर की कुछ बूंदों ने, हवाओं के झूले पर बैठ, उस दिव्य पुरुष की पलकों का एक चुम्बन लिया।

अब उस दिव्य पुरुष ने अपने नेत्रों को खोल दिया। कुछ क्षणों तक सृष्टि का अवलोकन करने के बाद, उन्होंने अपने सीप के समान अधरों को खोला- “मैं कौन हूं? मेरा जन्म क्यों हुआ? यह कौन सा स्थान है?”

तभी कमल पर पड़ रहा दिव्य प्रकाश कुछ कम हुआ और उससे एक ध्वनि वातावरण में गुंजायमान हुई- “मैं निराकार परमब्रह्म हूं, मैंने ही तुम्हें इस सृष्टि की रचना को पूर्ण करने के लिये अवतरित किया है।”

“हे परमब्रह्म, तो कृपा करके मेरा नामकरण करते हुए मेरा मार्गदर्शन कीजिये।” दिव्य पुरुष ने अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा।

“तुम्हारा अवतरण ब्रह्मज्ञान को अर्जित कर, सृष्टि को पूर्ण करने के लिये हुआ है, इसलिये आज से तुम्हारा नाम ब्र…देव होगा। आज से समस्त संसार तुम्हें ब्रह्देव, सृष्टिकर्ता, आदि नामों से जानेगा। पर इस नामकरण को चरितार्थ करने के लिये, तुम्हें पहले ब्रह्मज्ञान लेना होगा।” परमब्रह्म ने कहा- “उस ब्रह्मज्ञान के बिना, तुम्हारी उत्पत्ति अर्थरहित है।”

“तो फिर मुझे उस ब्रह्मज्ञान का श्रवण कराइये परमब्रह्म।” ब्र..देव ने कहा - “मैं उस ब्रह्मज्ञान को पाने के लिये व्यग्र हूं।”

“वह ब्रह्मज्ञान तुम्हें स्वयं से प्राप्त करना होगा। इसलिये अभी से तुम उस ब्रह्मज्ञान को तलाशना शुरु कर दो। जिस क्षण तुम्हें उस ब्रह्मज्ञान के दर्शन हो जायेंगे, तुम मेरी वाणी को फिर से सुन पाओगे।” यह कहकर परमब्रह्म का दिव्य प्रकाश और वाणी कहीं वातावरण में लुप्त हो गई? अब ‘ऊँ’ की प्रतिध्वनि भी वायुमण्डल में विलीन हो गई।

“पर परमब्रह्म.... मुझे तो यह भी नहीं पता कि मुझे ब्रह्मज्ञान कहां से और कैसे प्राप्त होगा ?” देव ने परमब्रह्म से कहा। पर अब कुछ भी कहना व्यर्थ था, परमब्रह्म वहां से जा चुके थे।

कुछ देर की प्रतीक्षा के बाद ब्र..देव समझ गये कि अब उन्हें स्वयं ही ब्रह्मज्ञान के रहस्य को तलाशना होगा। अतः वह कमल के पुष्प की सभी पंखुड़ियों को निहारने लगे। सभी पंखुड़ियां आकार में छोटी-बड़ी थीं।

“यह सभी पंखुड़ियां छोटी-बड़ी क्यों हैं? अर्थात् प्रकृति में सबकुछ एक समान नहीं होता।......यह श्वेत जल, नील गगन, पाटल (गुलाबी) पंखुड़ियां, हरित दलपत्र...सबकुछ भिन्न-भिन्न रंगों से बना है.....वायु, जल, गगन, प्रकाश, ध्वनि...यह सब प्रकृति में विद्यमान हैं...पर इनका नियंत्रण कौन करता है?....लगता है मुझे इन सब चीजों के बारे में जानने से पहले, अपनी उत्पत्ति के कारक के बारे में जानना होगा?” ऐसे अनेकोंनेक प्रश्न थे, जो देव के मस्तिष्क को उलझा रहे थे।

आखिरकार बहुत सोचने के बाद देव, उस सहस्त्रदल कमल की डंठल में प्रवेश कर गये। जैसे-जैसे डंठल में आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे डंठल का आकार चौड़ा होता जा रहा था। देव को उस डंठल में चलते हुए कई घंटे बीत गये।

आखिरकार देव उस डंठल के उद्गम स्थल तक पहुंच ही गये। वह डंठल एक ब्रह्मांड रुपी विशाल वृक्ष की बेल से निकला था। इस विशाल वृक्ष की 7 शाखाएं थीं और हर एक शाखा में पत्तियों के स्थान पर करोड़ों ग्रह विचरण कर रहे थे। उस विशाल ब्रह्मांडीय वृक्ष के आगे, देव को अपना शरीर, एक कण के समान प्रतीत हो रहा था।

“मैं तो यहां पर एक साधारण से पुष्प की उत्पत्ति के बारे में जानने के लिये आया था, पर अब तो यहां मुझे विशाल ब्रह्मांडीय वृक्ष दिख रहा है....जो कि एक धरा पर लगा है। यानि कि अब मुझे इस ब्रह्मांडीय वृक्ष की जड़ में जाना होगा....वहीं से मुझे इस वृक्ष के स्रोत पता चल सकता है।”

यह सोच देव ने धरा के कणों को टटोलकर देखा और फिर स्वयं उस ब्रह्मांडीय वृक्ष की जड़ों में प्रवेश कर गये। देव वृक्ष की जड़ों को पकड़े हुए धरा के अंदर चले जा रहे थे। कुछ समय के बाद वृक्ष की वह जड़ें देव को लेकर, धरा के अंदर स्थित एक सुरंग में पहुंच गईं।

वह पूरी सुरंग भूरे रंग की चट्टानों से निर्मित थी। अब देव ने उस सुरंग की यात्रा शुरु कर दी।

लगभग एक घंटे तक अनवरत् चलने के बाद, वह सुरंग एक विशाल मैदान में निकली, जहां पर एक वर्गाकार सफेद पत्थर की बड़ी सी चट्टान रखी थी।

उस चट्टान में एक द्वार बना हुआ था। चट्टा न में द्वार देख, देव उस द्वार में प्रवेश कर गये। वह द्वार देव को एक वर्गाकार कमरे में ले आया, जिसके बीच में एक सफेद पत्थर की चौकी पर, एक विलक्षण बालक पालथी मारकर आसन की मुद्रा में बैठा था।

पूरा कमरा बिल्कुल श्वेत नजर आ रहा था। यहां तक कि उस बालक ने भी श्वेत वस्त्र ही धारण कर रखे थे।

उस बालक ने अपने सिर के घनेरे बालों से, किसी ऋषि की भांति अपने सिर पर एक छोटा सा जूड़ा बना रखा था।

उस बालक के चेहरे पर दिव्यता विद्यमान थी, जिसका ओज उसके चेहरे के चारो ओर, एक गोलाकार आकृति में प्रस्फुटित हो रहा था। वह बालक इस समय ध्यान की मुद्रा में था, इसलिये देव उस बालक के सामने जाकर बैठ गये और अपने नेत्रों से उस दिव्य बालक की मनोहारी छवि को निहारने लगे।

कुछ क्षणों के बाद उस दिव्य बालक ने अपनी आँखें खोल दीं और देव की ओर उत्सुकता से देखने लगा।

“मेरा ना म ब्रह..देव है।” देव ने उस विलक्षण बालक के सम्मुख हाथ जोड़कर कहा- “मैं यहां ब्रह्मज्ञान की तलाश में आया हूं। आप कौन हैं दिव्य बालक? कृपया मुझे अपने बारे में बताएं।”

“मेरा नाम नरयण है, परंतु मुझे स्वयं नहीं पता कि मैं कौन हूं?” नरा..ण ने कहा- “और मैं कितने समय से यहां पर हूं? तो फिर मैं आपको ब्रह्मज्ञान कैसे दे सकता हूं? परंतु आप चाहें तो पूर्व दिशा से इसके बारे में पूछ सकते हैं।” यह कहकर नराय.. ने पूर्व दिशा की ओर इशारा किया।

इशारा देख, देव ने अपने सिर को पूर्व दिशा की ओर घुमाने की चेष्टा की, परंतु वह असफल रहे।

“मैं अपना शीश पूर्व दिशा की ओर क्यों नहीं घुमा पा रहा?” देव के चेहरे पर उलझन के भाव उभरे।

“अगर आप इतना छोटा सा कार्य नहीं कर पा रहे हैं, तो आप ब्रह्मज्ञान को कैसे तलाश कर पायेंगे देव?” नारयण ने कहा।

नन्हे बालक के कटाक्ष सुन देव ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर, अपने शीश को पूर्व दिशा की ओर घुमाया।

अति कठोर प्रयास से, देव का सिर तो पूर्व दिशा में नहीं घूमा, परंतु पूर्व दिशा की ओर उनका एक सिर और उत्पन्न हो गया। अब देव के 2 सिर हो गये।

“यह मेरे 2 शीश कैसे हो गये?” देव ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा।

“हमें तो नहीं पता...पर हमें लगता है कि आपको ब्रह्मज्ञान प्राप्त होने लगा है।” नरयण ने मुस्कुराते हुए कहा।

अब देव को पूर्व दिशा में जलती हुई अग्नि दिखाई देने लगी थी। अब नारयण, देव से बिना कुछ बोले, पश्चिम दिशा की ओर देखने लगे।

उन्हें इस प्रकार पश्चिम दिशा की ओर देखते पाकर, देव ने अपने सिर पश्चिम दिशा की ओर घुमाया।

इस बार फिर देव का एक सिर और बढ़ गया। अब उनके 3 सिर हो गये थे। पश्चिम दिशा में देव को जल दिखाई दिया। कुछ सोचने के बाद देव ने स्वतः ही अपना सिर पीछे यानि कि उत्तर दिशा की ओर किया। अब देव के 4 सिर हो गये। उत्तर दिशा में विशाल आकाश नजर आ रहा था।

तभी देव के सामने की ओर, यानि की दक्षिण दिशा में धरा तत्व नजर आने लगा। “लगता है कि 4 दिशाओं में देखने के लिये परमब्रह्म ने मुझे 4 शीश प्रदान किये हैं?”

“पर दिशाएं तो 10 होती हैं।” नरयण ने कहा- “पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, आग्नेय, वायव्य, नैऋत्य, ऊर्ध्व (ऊपर) और अधो (नीचे)। लगता है कि आपको बाकी दिशाओं में भी देखना चाहिये?”

नरयण के वचन सुन, जैसे ही ब्रह्मदेव ने ईशान, आग्नेय, वायव्य और नैऋत्य दिशा की ओर देखा, हर एक दिशा में देखने पर, उनके प्रत्येक शीश के मस्तिष्क में एक ऊर्जा प्रवेश कर गई। अब सिर्फ 2 दिशाएं बची थीं- “ऊर्ध्व और अधो ”।

अब देव ने ऊपर की ओर देखा, जिसके प्रभाव से उनके ऊपर भी एक शीश प्रकट हो गया। पर पांचवा शीश प्रकट होते ही विलोप भी हो गया।

“यह एक शीश प्रकट होने के बाद विलोप क्यों हो गया?” देव ने नारयण से पूछा।

“वह शीश अदृश्य अवस्था में रहेगा। जब आपको उसकी आवश्यकता होगी, तभी वह प्रकट होगा।” नरयण ने कहा।

वचनों को सुन अब देव ने नीचे की ओर देखा। परंतु जैसे ही नीचे देखा, देव की आँखों से एक प्रकाश की तीव्र किरण निकलकर भूमि पर पड़ी। उस प्रकाश की किरण ने एक मानव शरीर को जन्म दिया, जो कि

उत्पन्न होते ही उठकर खड़ा हो गया।

“देव को वास्तुपुरुष का प्रणाम।” वास्तुपुरुष ने हाथ जोड़कर देव की ओर देखते हुए कहा- “हे परमपिता, मैं दसों दिशाओं में विराजमान वास्तुपुरुष हूं, मेरा जन्म आपके प्रत्येक निर्माण में सहयोग प्रदान करने के लिये हुआ है। इसलिये मैं आपको यह वचन देता हूं कि मैं सृष्टि के प्रत्येक निर्माण में उपस्थित रहूंगा और उस निर्माण को सदैव शुभ फलदायी देने के लिये प्रयत्नशील रहूंगा।” यह कहकर वास्तुपुरुष हवा में विलीन हो गया।

वास्तुपुरुष के हवा में विलीन होते ही देव फिर से नरयण को देखने लगे। ऐसा लग रहा था, मानो वह नारयण से पूछना चाह रहे थे कि अब उन्हें क्या करना चाहिये?

उन्हें इस प्रकार से उलझन में पड़ा देख, नरयण बोल उठे- “आपने दसों दिशाओं में तो नियंत्रण प्राप्त कर लिया ब्र…देव। अब आपको इन सप्तशक्तियों पर नियंत्रण प्राप्त करना होगा।”

“परंतु कैसे? मैं इन सप्त शक्तियों पर कैसे नियंत्रण कर सकता हूं?” ब..ह्म ने उलझन भरे नेत्रों से नारा..ण की ओर देखते हुए पूछा।

“आप अपने गुरु या ईष्टदेव को याद करिये देव, वही आपको सप्तशक्तियों पर नियंत्रण करने का मार्ग प्रशस्त करेंगे।” नरयण के शब्द अर्थ से परिपूर्ण थे।

नारा..ण के शब्द सुन देव और विचलित हो गये क्यों कि उन्हें अपने गुरु के बारे में पता ही नहीं था। आखिरकार देव ने अपने चारो मुखों के नेत्रों को बंद कर लिया और मन में ही परमब्रह्म का आहवान किया।

अब देव को अपने मन में फिर से वही ब्रह्मांडीय वृक्ष दिखाई देने लगा, परंतु इस बार उस ब्रह्मांडीय वृक्ष में नरयण का अद्भुत बालरुप भी झलक रहा था।

देव ने मन ही मन उस ब्रह्माडीय वृक्ष को प्रणाम किया और फिर अपने नेत्रों को खोल दिया, परंतु अब उनके चेहरे पर असीम शांति दिख रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे वह सम्पूर्ण ब्रह्मांड को एक क्षण में समझ गये हों।

शायद यही ब्रह्मज्ञान था, जिसमें कमल की उत्पत्ति का कारक भी था और ब्रह्मांड की अद्भुत बेल के दर्शन भी। अब ब्रह्म, नरायण के सामने हाथ जोड़कर बैठ गये।

“हे ना..यण, मैं आपको ही अपने गुरु रुप में स्वीकार करता हूं। मैंने आपके दिव्य दर्शन भी प्राप्त कर लिये। अब आप ही मुझे इन सप्तशक्तियों के नियंत्रण का रहस्य प्रदान करें, जिससे मैं सृष्टि का निर्माण आरंभ कर

सकूं।” देव के शब्दों में अथाह भक्ति झलक रही थी।

देव के शब्दों को सुन नरयण मुस्कुराये और बोल उठे- “मैं आपको सप्तशक्तियों के नियंत्रण की शक्ति तो प्रदान कर दूंगा देव, परंतु आपने मुझे गुरु माना है, इसलिये उसके पहले आपको मुझे गुरुदक्षिणा प्रदान करनी होगी। गुरुदक्षिणा के बिना किसी भी गुरु का ज्ञान अपूर्ण होता है।”

नरयण के शब्द सुन इस बार देव विचलित नहीं हुए। वह मुस्कुराये और भूमि पर पालथी मारकर बैठ गये। देव ने अब अपनी आँखें कुछ क्षणों के लिये बंद कर लीं।

अब देव के सभी मस्तकों से एक ऊर्जा की तेज किरण निकलीं और उनके गोद में जाकर पड़ने लगी।

इस ब्रह्मऊर्जा ने एक दिव्य पुरुष को उत्पन्न कर दिया, जो कि देखने में लगभग नरयण के समान ही प्रतीत हो रहे थे। देव ने उस दिव्य पुरुष को भूमि पर उतारा और स्वयं उठकर खड़े हो गये।

“इस सम्पूर्ण सृष्टि में आपकी भक्ति के समान कुछ नहीं होगा नरयण। परंतु आपकी शक्ति और भक्ति का ज्ञान भी प्रत्येक जीव के लिये आवश्यक होगा। अतः मैं गुरुदक्षिणा के रुप में आपको, आपकी भक्ति के प्रसार के लिये, अपने प्रथम मानस पुत्र को समर्पित करता हूं। आज से मेरे इस मानस पुत्र का नाम ‘नरद’ होगा और इनका सम्पूर्ण जीवन आपकी भक्ति के प्रसार में रत रहेगा।”

देव की बात सुनकर नरद, नरयण के सामने अपने हाथों को जोड़कर बैठ गये। तभी देव के हाथों में एक वीणा दिखाई देने लगी, जो उन्होंने नरद को दे दी।

“इस वीणा का नाम ‘महती’ होगा नरद। इस वीणा से सदैव नरयण की ध्वनि उत्पन्न होगी।” देव ने कहा- “जाओ और जाकर सम्पूर्ण सृष्टि में नरयण की भक्ति का गुणगान करो।”

“जो आज्ञा परमपिता।” नरद ने कहा और वीणा को लेकर अदृश्य हो गये।

“हम आपकी गुरुदक्षिणा से अत्यंत प्रसन्न हुए देव।” नरयण ने कहा- “अब हम आपको इन सप्तशक्तियों के नियंत्रण की शक्ति सौंपते हैं।” यह कहकर नरयण ने अपने दाहिने हाथ की तर्जनी उंगली को हवा में उठाया।

अब नरयण के हाथ में चक्र नजर आने लगा, जो द्रुत गति से उनकी उंगली के मध्य घूर्णन कर रहा था।

उस चक्र के मध्य सम्पूर्ण ब्रह्मांड दिखाई दे रहा था। तभी उस चक्र के मध्य से एक कण निकला और हवा में तैरता हुआ देव के हाथ में पहुंच गया।

देव आश्चर्य से उस सूक्ष्म कण को देखने लगे।

“यह सृष्टि का प्रथम कण है देव, यह प्रथम कण आज से ब्रह्मकण के नाम से जाना जायेगा। इसी ब्रह्मकण के अंदर इन सप्तशक्तियों को नियंत्रित करने की शक्ति है और इसी ब्रह्मकण से आप इस सृष्टि का निर्माण भी कर सकते हैं।”

इसी के साथ एक तेज रोशनी उत्पन्न हुई, जिसकी वजह से देव के नेत्र एक क्षण के लिये बंद हो गये।

जब आँखें खुलीं, तो उन्होंने स्वयं को वापस सहस्त्रदल कमल के ऊपर पाया।

परंतु अब देव को ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मकण दोनों ही प्राप्त हो चुके थे। अतः देव ने एक बार फिर अपने हाथ में उपस्थित कण को देखा और फिर सृष्टि का निर्माण करने में जुट गये।

एक हजार वर्ष के अनवरत प्रयास के बाद देव ने संपूर्ण सृष्टि का निर्माण कर दिया। अब उनकी दृष्टि वापस उस ब्रह्मकण पर थी।

“निर्माणकार्य तो पूरा हो गया, परंतु अब समस्या इस छोटे से मूलकण को सुरक्षित रखने की है। कहीं यह किसी बुरी शक्ति के प्रभाव में आ गया? तो बहुत मुश्किल हो जायेगी। इसलिये इसे किसी ऐसे सुरक्षित

स्थान पर रखना होगा, जहां पर किसी भी जीव की दृष्टि इस पर ना पड़े।”

यह सोच देव अनंत सागर की गहराई की ओर चल दिये। गहराई में पहुंचने के बाद देव ने एक अद्भुत सीप का निर्माण किया और उस ब्रह्मकण को एक छोटे से काले मोती में छिपाकर, सीप के अंदर रख दिया।

देव ने उस काले मोती को एक बार देखा और फिर पता नहीं क्या सोचकर अपने हाथ की अंगूठी को निकालकर उस सीप में रख दिया?

ब्रह्मदेव की वह अंगूठी, सुनहरे रंग की धातु से निर्मित थी, जिसके आगे एक गोल काले रंग का रत्न लगा था। पूरी अंगूठी तेज चमक बिखेर रही थी।

अब देव ने सीप को बंद किया और उसके चारो ओर एक सुरक्षा कवच बना दिया। सुरक्षा कवच के कारण अब वह सीप अदृश्य हो गया।

देव अब पूरी तरह से संतुष्ट दिखाई देने लगे। उन्हें लग रहा था कि अब इस ब्रह्मकण को कोई प्राप्त नहीं कर सकता? अतः वह वहां से वापस क्षीरसागर की ओर चल दिये।

जारी रहेगा______✍️
 
#215.

जलपरी: (20,100 वर्ष पहले.........समुद्र की तली, स्वर्णाक्ष द्वीप, दक्षिण अटलांटिक महासागर)

प्राचीन काल में नाइटिंगेल द्वीप का नाम स्वर्णाक्ष द्वीप था। यह एक बहुत ही छोटा सा द्वीप था। इतने बड़े महासागर में इस छोटे से द्वीप पर मनुष्य कहां से आये? यह भी एक रहस्य ही था। पर द्वीप के वासियों का हि.. देओं की पूजा करना यह बताता था, कि अवश्य ही इनके पूर्वज प्राचीन भारत से रहे होंगे?

स्वर्णाक्ष द्वीप की रेत में सोने के कण पाये जाते थे, शायद इसीलिये इसका नाम स्वर्णाक्ष द्वीप रखा गया था। स्वर्णाक्ष द्वीप पर्वतों और घने जंगलों से परिपूर्ण था। इसलिये यहां पर खाने की चीजों का अभाव बिल्कुल भी नहीं था।

पीने के पानी के लिये भी यहां पर पर्याप्त झरने, झीलें एवं अन्य पानी के स्रोत थे। यहां के घने जंगलों में छोटे-बड़े अनेकों प्रकार के जीव-जंतु थे, पर सबसे ज्यादा इस जंगल में पक्षी थे।

यह पक्षी आसमान में उड़कर दूर तक जाते थे और फिर लौटकर वापस इसी द्वीप पर आ जाते थे।

इस द्वीप में जंगलों के मध्य, एक छोटा सा राज्य था, जिसका नाम अरिगंधा था। अरिगंधा स्वर्णाक्ष द्वीप का एकमात्र राज्य था, जिसमें अनेकों छोटे-छोटे कबीले थे, जो अरिगंधा से संचालित होते थे।

इस द्वीप में मनुष्यों की कुल जनसंख्या मात्र 9,000 थी। इतनी कम जनसंख्या के कारण यहां पर प्राकृतिक संसाधन परिपूर्ण थे और सभी खुशहाल थे।

स्वर्णाक्ष द्वीप के आसपास के सागर का पानी बहुत ही साफ था। पानी के अंदर अनेकों रंग-बिरंगी मछलियां घूम रहीं थीं।

अरिगंधा का राजकुमार मेघवर्ण, समुद्र के किनारे एक चट्टान पर बैठा मछलियों का उछलना-कूदना देख रहा था।

मेघवर्ण की आयु इस समय 21 वर्ष की थी। कुछ समय बाद ही उसे अरिगंधा का राजा बनाया जाने वाला था, पर मेघवर्ण का मन राजा बनने का बिल्कुल भी नहीं था। उसे तो दूर-दूर तक जाकर इस विशाल पृथ्वी को घूमने का मन था।

पर स्वर्णाक्ष द्वीप का संपर्क, पृथ्वी के किसी भी अन्य देश से ना होने के कारण मेघवर्ण ऐसा करने में असमर्थ था।

मेघवर्ण ने अपने दादा जी से पृथ्वी के अन्य देशों की कहानियां सुन रखीं थीं और शायद यही कहानियां अब उसके मस्तिष्क में दूसरी दुनिया के प्रति कौतुहल भर रही थी।

इधर मेघवर्ण अपनी कल्पनाओं में सपने बुन रहा था, उधर स्वर्णाक्ष द्वीप के नीचे गहरे समुद्र में एक नीली जलपरी लहरों में अठखेलियां कर रही थी।

रंग-बिरंगी मछलियों के झुण्ड के साथ तैरती, वह जलपरी इस समय बहुत खुश थी, वह तो मानों आज लहरों से प्रतिस्पर्धा कर रही थी।

तभी उस नीली जलपरी को समुद्र की तली में एक विशाल लाल रंग का गोला दिखाई दिया।

समुद्र के अंदर ऐसा लाल गोला देख, वह जलपरी उस गोले की ओर आकर्षित हो गई।

धीरे-धीरे लहरों में तैरती हुई, वह उस गोले की ओर बढ़ने लगी। कुछ ही देर में वह नीली जलपरी उस लाल गोले के पास पहुंच गई।

उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाकर उस लाल गोले को छूने की कोशिश की। पर जैसे ही जलपरी के हाथ उस गोले से छुए, वह पूरा गोला पानी की लहरों में तितर-बितर हो गया।

असल में वह गोला नहीं बल्कि लाल रंग की नन्हीं मछलियों का एक बड़ा सा झुण्ड था, जो कि किसी अदृश्य गोले के चारो ओर चिपका हुआ था, पर जलपरी के हाथ लगाते ही वह मछलियों का झुण्ड डरकर, इधर-उधर बिखर गया।

यह देख जलपरी ने उस स्थान को अपने हाथ से छूकर देखा। पर जैसे ही जलपरी ने उस अदृश्य गोले को छुआ, उसे तेज बिजली का झटका सा महसूस हुआ।

यह देख जलपरी थोड़ा पीछे हट गई और अजीब सी नजरों से उस स्थान को देखने लगी।

तभी जलपरी को अपने पीछे किसी आहट का अहसास हुआ। यह महसूस होते ही जलपरी तेजी से पीछे की ओर पलटी। पर पीछे पलटते ही जलपरी की साँस हलक में अटक गई।

उसके पीछे एक बड़ी सी शार्क मछली, पानी में खड़ी उसी को घूर रही थी। शार्क को देख उस नीली जलपरी ने अपनी साँस भी रोक ली।

तभी शार्क बिजली की तेजी से उस नीली जलपरी पर झपटी। शार्क को अपनी ओर झपटता देख जलपरी ने पानी में नीचे की ओर, एक तेज गोता लगाया, जिसकी वजह से शार्क पानी को चीरती हुई, उस अदृश्य गोले से टकरा गई।

शार्क के टकराने से, उस अदृश्य गोले को एक तेज झटका लगा और उसमें उपस्थित एक बड़े से सीप का ढक्कन खुल गया।

उधर शार्क को अदृश्य गोले से टकराने की वजह से, बिजली का एक तेज झटका लगा, जिससे घबराकर, वह जलपरी को छोड़ उस स्थान से भाग गई।

शार्क के जाने के बाद वह जलपरी चारो ओर से घूमकर उस अदृश्य गोले को निहारने लगी। पर उसे गोले के अंदर कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था और गोले को छूने की हिम्मत वह फिर से जुटा नहीं पा रही थी।

इधर गोले में उपस्थित सीप के खुल जाने से फुटबाल के आकार का काला मोती, सीप से झांकने लगा था।

ऐसा लग रहा था कि जैसे वह भी उस खूबसूरत सी नीली जलपरी को निहार रहा हो।

तभी उस काले मोती से कुछ सुनहरी किरणें निकलकर, अदृश्य गोले के एक भाग में गिरने लगीं।

अब उन सुनहरी किरणों ने, गोले में झांक रही नीली जलपरी के समान, दूसरी जलपरी को बनाना शुरु कर दिया।

कुछ ही देर में हूबहू नीली जलपरी के समान एक दूसरी जलपरी सीप के सामने खड़ी थी।

अदृश्य गोले के बाहर की जलपरी, जब गोले के अंदर कुछ भी देख पाने में असमर्थ हो गई, तो हारकर वह एक दिशा की ओर चली गई।

अब गोले के अंदर उपस्थित नवजन्मी नीली जलपरी आश्चर्य से अपने चारो ओर देख रही थी। उसे सिर्फ इतना समझ में आ रहा था कि उसका निर्माण, काले मोती ने किया है।

उस जलपरी ने अपने चारो ओर देखा। तभी उसकी निगाह सीप में उपस्थित सुनहरी अंगूठी पर गई। कुछ सोचने के बाद इस जलपरी ने, सुनहरी अंगूठी को उठाकर अपनी बांयें हाथ की अनामिका उंगली में पहन लिया।

जलपरी के अंगूठी पहनते ही, काला मोती से एक तीव्र प्रकाश की किरण निकली और उस जलपरी के शरीर में समा गई।

जलपरी ने आश्चर्य से उस तीव्र प्रकाश को देखा, परंतु उसे कुछ समझ में नहीं आया। अब वह जलपरी उस अदृश्य गोले से निकलकर समुद्र में घूमने लगी।

वह अपने आसपास के प्रत्येक जीव को अपलक निहार रही थी। समुद्र की रंगीन सुंदरता उसे खूब भा रही थी। वह हर समुद्री पौधे को छूकर, उसे महसूस करने की कोशिश करने लगी।

तभी उसे अपने से कुछ दूरी पर एक नारंगी रंग का ऑक्टोपस घूमता दिखाई दिया। उत्सुकतावश जलपरी उसकी ओर बढ़ गई।

वह ऑक्टोपस आकार में थोड़ा बड़ा था। ऑक्टोपस आश्चर्य से अपनी ओर आ रही जलपरी को देख रहा था। शायद पहली बार उसने किसी शिकार को अपनी ओर आते देखा था।

जलपरी जैसे ही उस ऑक्टोपस के पास पहुंची, उस ऑक्टोपस ने अपनी भुजाओं में जलपरी को पकड़ लिया। अब उस जलपरी को समझ में आ गया कि हर रंगीन जीव अच्छा नहीं होता।

जलपरी ऑक्टोपस की पकड़ से छूटने की कोशिश करने लगी, पर जब वह ऑक्टोपस की पकड़ से छूट नहीं पाई, तो ऑक्टोपस को खींचकर, समुद्र की सतह की ओर चल दी।

...........................................

उधर मेघवर्ण अभी भी अपनी कल्पनाओं में उलझा था कि तभी उसे समुद्र में एक जगह कुछ तेज हलचल होती दिखाई दी। अब मेघवर्ण की दृष्टि समुद्र में उस ओर चली गई।

मेघवर्ण को पानी में एक जगह पर निकली हुई, एक मछली की नीली पूंछ दिखाई दी, जिसे शायद किसी ऑक्टोपस ने अपने शिकंजे में जकड़ रखा था।

यह देख मेघवर्ण ने अपनी तलवार उठाई और तेजी से पानी में छलांग लगाकर तैरता हुआ उस ओर बढ़ने लगा।

मेघवर्ण का पूरा शरीर पानी के अंदर था। पानी साफ होने की वजह से मेघवर्ण को पानी के अंदर का दृश्य बिल्कुल साफ नजर आ रहा था।

तभी मेघवर्ण उस मछली को देखकर चौंक गया, वह मछली कोई साधारण मछली नहीं, बल्कि एक जलपरी थी, जिसके शरीर को एक ऑक्टोपस ने अपनी भुजाओं से पकड़ रखा था। वह जलपरी तेजी से ऑक्टोपस की पकड़ से छूटने का प्रयत्न कर रही थी।

यह देख मेघवर्ण ने ऑक्टोपस के ऊपर अपनी तलवार से आक्रमण कर दिया। एक पल में ही मेघवर्ण ने ऑक्टोपस की 2 भुजाओं को काट दिया। ऑक्टोपस के नीले खून ने समुद्र के नीले पानी को और नीला कर दिया।

जलपरी की निगाह अब सिर्फ मेघवर्ण पर थी, जो कि पानी के अंदर तलवार लेकर, लगातार ऑक्टोपस पर प्रहार कर रहा था।

कुछ ही देर में जख्मी ऑक्टोपस समझ गया कि मेघवर्ण का मुकाबला नहीं किया जा सकता, इसलिये उसने जलपरी को छोड़ा और तेजी से पानी में तैरकर कहीं गायब हो गया?

ऑक्टोपस से छूटते ही जलपरी ने एक बार मेघवर्ण को देखा और फिर वह भी पानी में कहीं गायब हो गई?

मेघवर्ण को जलपरी से ऐसी आशा नहीं थी। उसे लग रहा था कि जलपरी उसे धन्यवाद देगी, पर वह तो बिना कुछ बोले ही चली गई।

मेघवर्ण अब पानी से निकला और अनमने मन से वापस उसी चट्टान पर आकर बैठ गया।

जलपरियों को उसने बस कहानियों में ही सुना था। आज पहली बार उसे किसी जलपरी को सामने से देखने का अवसर प्राप्त हुआ था। उस जलपरी का चेहरा तो मानो मेघवर्ण की आँखों में बस गया था।

नीली आँखें, लहराते काले बाल, सीप से होंठ, लहरों में बल खाती नीली पूंछ....सबकुछ सपनों सरीखा ही तो था।

तभी मेघवर्ण को पानी की लहरों पर, फिर से वही नीली जलपरी दिखाई दी। इस बार वह उससे कुछ दूरी पर पानी में तैरती हुई उसे ही निहार रही थी।

यह देख मेघवर्ण को ऐसा लगा, जैसा उसका सपना बस अब साकार होने ही वाला है।

मेघवर्ण ने जलपरी को देख धीरे से अपना हाथ हिलाया, पर जलपरी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह तो बस मेघवर्ण को देखे जा रही थी।

यह सिलसिला कुछ देर तक ऐसे ही चलता रहा। दोनों ही बस एक दूसरे को देख रहे थे। कुछ देर के बाद जलपरी, मेघवर्ण के थोड़ा और पास आ गई।

“क्या तुम बात कर सकती हो?” मेघवर्ण ने हिम्मत दिखाते हुए जलपरी से पूछा।

मेघवर्ण के शब्द सुन जलपरी जैसे व्यग्र हो गई। उसने पहले अपने आसपास देखा और फिर मेघवर्ण के और समीप आ गई।

यह देख मेघवर्ण ने फिर से पूछा- “क्या तुम बोलना जानती हो?”

“हां....मैं बोल सकती हूं और मैं तुम्हारी भाषा भी समझ सकती हूं।” इस बार जलपरी ने जवाब दिया।

जलपरी को बोलते देख मेघवर्ण बहुत खुश हो गया।

“तुम्हारा नाम क्या है? और तुम कहां रहती हो?” मेघवर्ण ने जलपरी से पूछा।

“नाम!....ये क्या होता है?” जलपरी ने कहा।

जलपरी की बात सुन मेघवर्ण चौंक गया- “हम सभी एक दूसरे को संबोधित करने के लिये उनका नाम लेकर पुकारते हैं....जैसे कि मेरा नाम मेघवर्ण है।....वैसे ही तुम्हारा भी तो कोई नाम होगा?”

“मेघवर्ण......।” जलपरी ने मेघवर्ण के नाम को दोहराया- “पर मेरा तो कोई नाम नहीं है?”

“क्यों? तुम्हारा माता-पिता तुम्हें क्या कहकर पुकारते हैं?” मेघवर्ण ने जलपरी से पूछा।

“माता-पिता! ये कौन होते हैं?” जलपरी ने कहा।

“बड़े आश्चर्य की बात है कि तुम्हें यह भी नहीं पता कि माता-पिता कौन होते हैं?” मेघवर्ण ने आश्चर्य से कहा - “अरे जिसने तुम्हें जन्म दिया.... तुम्हें इस धरती पर......म...म...मेरा मतलब है कि सागर में लाये। मैं उनकी बात कर रहा हूं।”

“पर मेरा जन्म तो एक काले मोती से हुआ है....क्या वह काला मोती ही मेरा माता-पिता है?” जलपरी तो कुछ समझ ही नहीं पा रही थी।

“काले मोती से!” मेघवर्ण, जलपरी के शब्द सुन अब थोड़ा उलझा-उलझा सा महसूस करने लगा- “यह कैसे संभव है? भला कोई मोती कैसे किसी को जन्म दे सकता है? ....अच्छा यह बताओ कि तुम्हारा जन्म कब हुआ?”

“अभी थोड़ी देर पहले।” जलपरी ने कहा और मेघवर्ण के पैरों को निहारने लगी। उसे मेघवर्ण के पैर अपनी पूंछ से थोड़ा अलग लग रहे थे।

“थोड़ी देर पहले?” अब मेघवर्ण के आश्चर्य का ठिकाना ही नहीं रहा- “तो फिर तुम इतनी बड़ी कैसे हो गई? ....अच्छा छोड़ो....जाने दो इस रहस्य को। पर...पर...तुम्हारा कोई नाम होना बहुत जरुरी है।......रुको मैं ही तुम्हारा कुछ अच्छा सा नाम रखता हूं....क्या रखूं?... क्या रखूं? .....हां, तुम बहुत खूबसूरत हो इसलिये मैं तुम्हारा नाम लावण्या रखता हूं। हां यह नाम तुम्हारे ऊपर जंचता है।”

“लावण्या !” जलपरी ने अपने नाम को दोहराकर देखा और फिर से मेघवर्ण के पैरों को देखने लगी।

तभी जलपरी के निचले शरीर में बदलाव होने लगा। देखते ही देखते जलपरी की पूंछ गायब हो गई और उसकी जगह पर इंसानी पैर दिखाई देने लगे। अब वह एक खूबसूरत लड़की नजर आने लगी थी।

यह देख मेघवर्ण के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा और वह बोल उठा- “अरे वाह! क्या तुम जादू भी जानती हो?.....मेरा मतलब कि तुमने अपने शरीर को किस प्रकार से परिवर्तित किया?”

“मुझे नहीं पता?....मैंने तो बस तुम्हारे पैरों को देखा था, हो सकता है कि उसी की वजह से ऐसा हुआ हो?” लावण्या ने कहा।

“शायद ये सब उस काले मोती की वजह से हो रहा है?” मेघवर्ण ने कहा- “क्या तुम मुझे वह काला मोती दिखा सकती हो?”

“हां-हां क्यों नहीं? पर तुम्हें इसके लिये मेरे साथ समुद्र के अंदर चलना होगा।” लावण्या ने खुशी से कहा और उठकर खड़ी हो गई।

“क्या तुम बता सकती हो कि हमें समुद्र में कितना नीचे तक जाना है? क्यों कि मैं समुद्र के अंदर ज्यादा देर तक साँस नहीं ले सकता।” मेघवर्ण ने उदास होते हुए कहा।

यह सुन लावण्या को ज्यादा कुछ समझ नहीं आया, उसने तो मेघवर्ण का हाथ पकड़ा और पानी में छलांग लगा दी। मेघवर्ण तो बस लावण्या के स्पर्श को ही महसूस कर रहा था। वह तो कुछ क्षणों के लिये यह भी भूल गया कि वह लावण्या के साथ जा कहां रहा है?

समुद्र के पानी को स्पर्श करते ही लावण्या का शरीर का निचला भाग फिर से जलपरी में परिवर्तित हो गया। अब वह तेजी से मेघवर्ण का हाथ पकड़े, समुद्र की तली की ओर जा रही थी।

अभी वह कुछ दूर ही पहुंची थी कि मेघवर्ण की साँसों ने उसका साथ छोड़ना शुरु कर दिया। मेघवर्ण अब तेजी से अपने हाथ पैर हिलाते हुए छटपटा रहा था।

यह देख लावण्या, मेघवर्ण के पास आई और धीरे से उसके चेहरे को छुआ। लावण्या के छूते ही मेघवर्ण के शरीर का निचला भाग, किसी जलपुरुष के समान बन गया और अब वह आसानी से पानी में साँस भी ले पा रहा था।

समुद्र की अथाह गहराई में इस प्रकार खुल कर साँस लेना, मेघवर्ण के लिये एक अनोखा अनुभव था। अब वह अपनी नजरें उठाकर चारो ओर देख रहा था।

प्रकृति का खूबसूरत रंग देखने के बाद, अब मेघवर्ण की निगाहें सिर्फ और सिर्फ लावण्या के चेहरे की ओर थीं, जो कि उसे खींचते हुए समुद्र की गहराई की ओर जा रही थी।

अब मेघवर्ण की पृथ्वी देखने की इच्छा उसी प्रकार समाप्त हो गई थी, जिस प्रकार से किसी अमूल्य हीरे को पाने के बाद लोहार की लोहे के प्रति इच्छा समाप्त हो जाती है।

मेघवर्ण भी अब अपने अमूल्य रत्न को निहारता सागर की अथाह गहराई की ओर जा रहा था।

जारी रहेगा_____✍️
 
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