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अपडेट #13
सन
#05
मोनू को लेके पहले से hi व्याकुल भानु मुश्किल से हीरा पन्ना क लिए कोई जुगाड़ कर पाया था.. और उसकी इस परेशानी मैं घी डालने का काम करती है उस ताली की करकस आवाज़
भानु ग़ुस्से से उस आदमी को कुछ कहने क लिए जैसे hi पीछे की तरफ मुड़ता है उसके सब्द बहार hi नहीं आ पाते ककी उसके सामने ताली बजने वाला और कोई नहीं अपितु 'त्यागी' था
भानु मन hi मन सोचने पे मजबूर हो जाता है
'कही इसने कुछ ज्यादा तोह नहीं सुन लिया'
ये सोचते hi भानु क जिस्म मैं एक सार्ड लहर सी दौड़ जाती है.. की कही उसके सालों की म्हणत पे पानी तोह नहीं फिर जायेगा
ठण्ड तोह वैसे भी थी पर ऐसा लगता है जैसे मौसम और ज्यादा सार्ड होता चला जा रहा हो
ठंडी हवा पत्तों को हिला रही हो, मानो किसी तेज़ तूफान से पहले की शांति हो
त्यागी- (मानो जैस कटाक्ष सी करता है) कैसा चल रहा है तुम्हारा सद्यन्त्र ?
भानु को ऐसा लगा जैसे उसके सालों की म्हणत पे सच मैं पानी फिरने वाला हो.. पर वो इतनी आसानी से टूट जाये, ऐसा इन्शान कहा
पर त्यागी आगे बोलता है
"अनोखी.. फिर मोनू, और सायद... खालिद का बाप भी गुफरान भी.. 3 जान, वाह मन्ना पड़ेगा तुम्हे?"
भानु क कानो मैं पड़ने वाले ये सब्द ऐसे थे मानो किसी ने उसके कान मैं जलता हुआ कोयला भर दिया हो
भानु कुछ बोलना चाहता है पर वो रुक जाता है और अस्स पास देखने लगता है मानो पक्का कर रहा हो वह उन दोनों क अलावा और कोई तोह नहीं.. और जब उसे पूरी तरह यकीं हो जाता है वह बस वही दोनों है तोह वो अपनी नज़रों को घुमा क खेत की माइड क पास बहने वाली नाली क पास राखी हुई अपनी कुदाल की तरफ देखता है और मानो किसी निष्कर्ष पे पहुंचने की कोशिश कर रहा हो
त्यागी ने भी भानु की नज़रों को भाप लिया था इसलिए वो भी मुस्कुरा पड़ता है.. वैसे कही न कही उसे भी एक पल क लिए दर तोह लगा था, ककी वो अचे से जान चूका था की भानु किस प्रकार का आदमी है
त्यागी- (मुस्कुराते हुए) किया हुआ.. उस कुदाल से मुझे मरना चाहते हो.. हम्म्म.. सायद वैसे hi जैसे अनोखी, मोनू.. और गुफरान को मारा होगा.. एक मं सायद ये काम तुमने नहीं...
त्यागी दर तोह रहा था ककी वो भलीभांति जनता था की वो भानु से शारीरिक ताक़त मैं जीत नहीं सकता, पर दिमाग का इस्तेमाल करना वो भी अचे से जनता था
"ये सब तोह तुमने अपने आदमी जब्बार से करवाया होगा न.. हम्म तभी उसने मालती को भी मरने की कोशिश की"
भानु- (एक अंतिम बार कोशिश करते हुए) ये सब किया बकवास कर रहे है.. आपको पता है न मैं उस घर का दामाद हु
त्यागी मुस्कुराते हुए वही इमली क पेड क नीचे पड़ी चारपाई की तरफ बढ़ता है और मुस्कुराते हुए उसपे बैठ जाता है और हसकर अपनी बात आगे कहता है
"यकीं मानो.. मुझे ज्यादा म्हणत नहीं लगेगी ये सब साबित करने मैं, और अगर किसी को मेरी बात पे भरोषा नहीं हुआ तोह..
मोनू है न"
भानु ग़ुस्से से लाल होने लगता है, ककी त्यागी ने मोनू का नाम लेके उसके दर को और बड़ा दिया था.. भानु ग़ुस्से से कुदाल की तरफ बढ़ने लगता है
भानु को यु कुदाल की तरफ बढ़ते हुए देख क एक पल क लिए त्यागी भी दर से काँप जाता है पर वो अपने ऊपर दर को हावी नहीं होने देता
"मोनू सिर्फ मेरी वजह से होश मैं नहीं आ रहा.. वर्ण वो तोह कब का ठीक हो चूका है"
त्यागी ने मानो कोई धमाका सा किया हो, भानु क कदम भी वही क वही रुक जाते है और सवालिया नज़रों से त्यागी की तरफ देखते हुए
"किया मतलब है तुम्हारा ?"
भानु क मुख से निकली ये बात त्यागी क लिए विजयपथ पे चलने का रास्ता सा था
त्यागी- (मुस्कुराते हुए एक अंगड़ाई सा लेता है, मानो भानु की हालत का भरपूर मज़ा ले रहा हो.. और फिर वो एक राज़ खोलता है) तुम्हे किया लगता है.. मेरे जैसा वाडिया सर की एक जरा सी चोट को अब तक ठीक नहीं कर सका ?
भानु, कुदाल को भूल क त्यागी की तरफ कुछ कदम आगे बढ़ता है
"साफ़ साफ़ कहो"
त्यागी- मोनू तोह सुरु क 10 दिनों मैं hi ठीक हो गया था, कुछ बात तोह है उस लड़के मैं जो इतना जोरदार वार खाने क बाद भी मौत उसका कुछ बिगड़ नहीं पायी
भानु- किया कहना च रहे हो.. मैंने कहा न मेरा इन सब से कोई लेना देना नहीं है
भानु एक बार फिर से साडी बातों को मैंने से पूरी तरह मन करते हुए
त्यागी- (है पड़ता है.. और शांत आवाज़ मैं आगे कहता है) पता है.. मैं जब चहु मोनू को होश मैं ला सकता हु, और तुम्हे तोह पता hi है वो होश मैं आते hi सबको किया बताएगा
त्यागी अपनी जगह से उठता है और हस्ते हुए भानु क चारो तरफ ऐसे घूमने लगता है मानो उसकी परिक्रमा सी कर रहा हो और आगे कहता है
"वैसे मन्ना पड़ेगा, बड़े ताक़तवर मालूम पड़ते हो.. पर किया तुम कुंदन से जीत पाओगे, इतनी ताक़त है तुममे"
भानु का सब्र अब पूरी तरह टूट जाता है.. ककी त्यागी ने उसके दुश्मन को उससे ज्यादा बड़ा बता दिया था
भानु- (किसी सांड की तरह फुफकारते हुए) तुम मुझे जानते नहीं हो त्यागी.. अपनी हद मैं रहो वर्ण..
त्यागी- (वापस से मुस्कुरा पड़ता है) वर्ण किया.. मुझे भी मरवा डोज जैसे मालती को वर्ण की कोशिश की
भानु- मैंने मालती को मरवाने की कोशिश नहीं की.. ककी उसे तोह मैं अपने एक हाथों से मरूंगा, वो भी तड़पा तड़पा क
भानु ने अपने अंतिम सब्द ऐसे ग़ुस्से से कहे की त्यागी क जिस्म मैं भी झुरझुरी सी दौड़ पड़ी थी
त्यागी- (खुद को सँभालते हुए) हम्म.. मुझे पता है, तुम्हारे छोटे भाई क ज़हर खाने का सबब और यहाँ तक तुम्हारे माँ बाप क ज़िंदा जलने की वजह वही औरत 'मालती' है
भानु ऐसी हैरानी से त्यागी को देखता है.. जैसे उसके जीवन का सबसे बड़ा सच उसको पता चल गया हो
पर त्यागी बिना रुके आगे कहता है
"पर तुम अकेले नहीं हो जिसका परिवार और ज़िन्दगी मालती क परिवार ने बर्बाद की
फर्क सिर्फ इतना है की तुम्हारे छोटे भाई और माँ बाप क साथ जो हुआ उसकी वजह मालती और उसके दोनों भाई.. और मालती की बड़ी भाभी प्रेमलता है"
इससे पहले hi त्यागी कुछ आगे बोलता भानु ग़ुस्से से जलता हु बोल पड़ता है
"और वो हरामी 'मुरली दस' भी"
त्यागी है मैं सर हिलाते हुए आगे कहता है
"है.. मुरली दस, कुंदन का बाप.. भला उसे कैसे भूल सकता हु"
इस बार आगे बोलने का काम भानु करता है
"तुम्हारा किया बिगाड़ा है मालती ने"
त्यागी हैरानी से भानु को देखता है मानो पूछ रहा है..
'मेरा.. मतलब'
भानु अब काफी शांत नज़र आने लगा था वो आसानी से चलते हुए उस चारपाई पे बैठ जाता है और पुरे शांत स्वर मैं कहता है
"अब जब तुम्हे मेरे बारे मैं इतना सब पता है.. पर तुमने ये सब अपने दोस्त महेंद्र को बताने की जगह यहाँ मेरे पास आये हो, तोह ये सब यही तोह नहीं हो सकता"
असल मैं भानु को थोड़ा समय लगता है पर वो जल्दी hi समझ चूका था की त्यागी का यु उसे डरना और उसके बारे मैं इतना सब पता होना.. पर अब तक चुप रहना, जरूर उसके पीछे कुछ तोह राज़ है
त्यागी- (एक लम्बी सी सांस चोरते हुए, वही भानु क पास चारपाई पे बैठ जाता है और किसी सुण्या मैं ताकते हुए कहता है) 'बेला'.. बेला नाम था उसका, मेरा प्रेम और मेरा जीवन थी वो.. पर 'मुरली दस' और उसके दोनों बेटों महेंद्र और कुंदन ने पुरे गाओं क आगे उस बेचारी को बदचलन और कुलटा बता क उसे ख़ुदकुशी करने पे मजबूर कर किया.. और चीन लिया मेरी बेला को मुझसे
बेला
त्यागी की आँखों मैं पानी भर आया था और गाला रुँधा सा गया था.. वो एक पल क लिए रुकता है और आगे कहता है
"पता है.. जब मेरी बेला ने गाओं वालों क तानो से परेशां होक ख़ुदकुशी की तोह वो अकेली नहीं मरी थी, उसके पेट मैं मेरा बचा भी था
उस दिन मुरली दस क दोनों बेटों ने सिर्फ मेरी होने वाली पत्नी को नहीं, बल्कि मेरे पैदा होने वाले बचे को भी मारा था
20 सालों से उनसे बदला लेने क लिए तरप रहा हु.. एक एक दिन कैसा काटा है सिर्फ मैं hi जनता हु, मेरी इन हड्डियों मैं तुम्हारी जैसी जान नहीं है.. पर जड़ी बूटियों का ऐसा ज्ञान जरूर है जिससे मैं उनसे बदला लेके रहूँगा"
भानु क लिए ये सब बिलकुल नया था.. वैसे उसने ये नाम 'बेला' सुना हुआ था
अपनी पत्नी शीला क मुख से.. पर उसके हिसाब से कहानी कुछ और hi थी और अब त्यागी क हिसाब से कुछ और
भानु- (सिर्फ मतलब की बात पे आते हुए) फिर मेरी किया जरुरत.. ककी तुम यहाँ ऐसे तोह नहीं आये होंगे ?
त्यागी- (भानु की तरफ देखता है और अपनी भर आयी आँखों को साफ़ करते हुए) मेरे पास जड़ी बूटियों का ज्ञान तोह है.. पर मैं मुरली दस क पुरे परिवार को तड़पा तड़पा क मरना चाहता हु, चाहता हु की वो सब भी वो दर्द महसूस करे जो मेरी बेला ने उस दिन महसूस किया होगा, इसलिए बूढी क साथ साथ मुझे तुम्हारा बल भी चाहिए
भानु अब सब कुछ समझ चूका था.. पर अब भी उसके मन मैं कई सवाल थे
भानु- आज अचानक क्यू.. पहले कभी मेरे पास आने क बारे मैं क्यू नहीं सोचा ?
"सच कहु तोह मुझे लगता था की महेंद्र और उसके परिवार से मैं और वनराज अकेले hi बदला ले सकते थे.. पर अभी कुछ दिनों पहले वनराज गाओं क बाजार मैं कुंदन से टकराया था और तब वो बड़ी मुश्किल से अपनी जान और पहचान छुपा क भाग पाया था
सीधा सीधा काबू तोह इस जुंग मैं वनराज और मैं.. काफी नहीं है, हमे तुम्हारी ताक़त भी चाहिए
वैसे भी हमारा दुश्मन लगभग एक hi है"
त्यागी अपनी पूरी बात कहते हुए, भानु की तरफ ऐसे देखने लगता है जैसे अब उसके उत्तर का इंतज़ार हो उसे
भानु- वनराज ?
पर भानु अलग hi सवाल करता है
त्यागी- (जैसे उसे अपनी गलती का एहसास हुआ हो) अरे है.. मैं बताना hi भूल गया, वनराज मेरी बेला का भाई है
भानु- (अब वापस सबसे हम सवाल पे आता है) तुम कह रहे थे की.. मोनू अब तक सिर्फ तुम्हारी वजह से उस बेहोशी की हालत मैं है ?
त्यागी- (मुस्कुरा पड़ता है) है.. मैं उसे जो जड़ी बूटियां देता हु वो उसे ठीक करने क लिए नहीं.. बल्कि उसे उसी अवस्था मैं रखने क लिए है
भानु- और इसकी वजह ?
त्यागी- (भानु की तरफ देख क मुस्कुराते हुए) किया तुम मालती की औलाद को इतनी आसान और शांत मौत देना चाहते हो, जहा उसे दर्द का पता तक न चले
भानु- (मानो ग़ुस्से की आग भड़क उठी हो) बिलकुल नहीं.. उसे तोह ऐसी मौत दूंगा की मालती और कुंदन देख क अपनी मौत की भीख मांगेंगे, पर उस दिन सब कुछ मेरी सोच से अलग चल रहा था इसलिए उसे इतनी आसान मौत देनी पड़ी.. पर मेरी किस्मत की वो तब भी नहीं मारा
त्यागी- मैं फिर से मौका दे सकता हु.. इस बार उसका वो हाल करो जो तुम चाहते हो
भानु- (त्यागी की तरफ देखते हुए) ऐसा कैसे संभव है.. वो होश मैं आते hi मेरा सच सबको बता देगा
त्यागी- (मुस्कुराते हुए) जब उसे याद रहेगा तब न.. मैं अपनी जड़ी बूटियों से उसके दिमाग मैं बसी अंतिम यादों को दबा दूंगा, और जब तक मैं नहीं चाहूंगा उसे बेहोशी से पहले का कुछ पल याद नहीं आएंगे
भानु, त्यागी की तरफ ऐसे देखता है मानो आँखों hi आँखों मैं सवाल कर रहा हो
त्यागी- (मुस्कुराते हुए) है.. तुम्हारा सोचना सही है, मैं उन यादों को पूरी तरह भी मिटा सकता हु.. पर तब तुम मुझे भी तोह मार सकते हो न.. अब तुम्हारा किया भरोषा, आखिर अनोखी भी तोह तुम्हारे लिए काम करती थी.. देखो किया हाल किया तुमने उसका
वैसे त्यागी ने जो बातें कही.. खास करके अनोखी और जब्बार को लेके उनपे अब तक वो खुद पक्का नहीं था, पर उसकी इन बातों से भानु का रवैया देख क वो समझ चूका था की वो जो सोच रहा है.. वो सब सच है
भानु डाट पेश क रह जाता है.. ककी त्यागी क हिसाब से भानु कभी भी उसके विरुद्ध नहीं जा सकता था, वर्ण वो मोनू की यादों को जागृत भी कर सकता है
कुलमिलाकर त्यागी, मोनू क बहाने भानु पे अपना काबू बना रहा है.. जो बात वो अचे से समझ रहा था
भानु- ठीक है.. पर याद रहे, अगर तुमने मुझे देखा देने की सोची भी तोह..
त्यागी- (उसकी बात काटे हुए) और तुम भी याद रखना.. अगर तुम मेरे खिलाफ गए तोह.. मोनू को सब कुछ याद आ सकता है
त्यागी ने साफ़ सब्दो मैं बता दिया था की अब भानु बिना उसकी मर्ज़ी क कुछ नहीं सकता
त्यागी अपनी जगह से उठते हुए
"चलो फिर कल एक चमत्कार होगा.. कल मोनू को होश आएगा"
त्यागी अपनी बात कहते हुए मुस्कुरा पड़ता है और वह से चल पड़ता है.. उसे जाते हुए देख क भानु किसी ज़हरीली नाग जैसा फुफकार पड़ता है
"एक बार मैं इस जब्बार का मसला हल कर दू, फिर तुझे भी तेरी औकात दिखाऊंगा.. मादरचोद त्यागी"
वही खेत से दूर निकल आने पे त्यागी लम्बी सी सांस लेते हुए मुस्कुरा पड़ता है और खुद से कहता है
"भानु.. अब तू वही करेगा जो मैं चाहूंगा, ककी अब तेरे गले मैं त्यागी का पत्ता रहेगा
मेरा जड़ी बूटियों को लेके इतने सालों का ज्ञान अब काम आएगा.. वैसे भी मोनू क अंतिम पलों की यादें तोह मैं कब का दबा चूका हु, लोगो को अंदाज़ा hi नहीं आयुर्वेद कोण कोण से चमत्कार कर सकता है"
यहाँ तक चीज़े अब साफ़ हो चुकी है.. इसलिए वापस उसी समय लौट चलते है जब त्यागी मोनू क उपचार करने वाला है, या सिर्फ एक नाटक मात्र
सन
#06
त्यागी ने कमरे को अंदर से बंद कर रखा था.. और यहाँ हर किसी की नज़रें सिर्फ और सिर्फ दरवाजे की तरफ अटकी हुई थी
सविता, मालती, शीला और हर्षिता चारो औरते कभी दरवाजे की तरफ देखती तोह कभी ईश्वर से प्रधान करने लगती
वही मर्दों का भी हाल कुछ अलग नहीं था.. जहा महेंद्र बार बार सब ाचा होने की कामना करता वही मोनू का बाप कुंदन, बार बार अपने बचे क सही होने की दुआ मांग रहा था
वीरू, सत्तू और सोनू भी अपने भाई क जल्दी से ठीक होने की प्राथना करने मैं पीछे नहीं थे.. अगर कोई था जिसे किसी बात का फर्क नहीं पद रहा था वो था सत्यम, ककी उसकी नज़रें बार बार मालती की गठीले जिस्म पे नाच रही थी
सत्यम मन hi मन
'अगर ये मोनू ठीक हो गया तोह लगता नहीं हम कभी इस गाओं की गरीबी को चोर क सेहर की खुशाल ज़िन्दगी देख पाएंगे..
वैसे ये भी है की जब तक मोनू सही नहीं होगा मेरा मालती चची पे चढ़ने का सपना भी पूरा नहीं होगा.. बहनचोद अजीब मुशीबत है'
तभी सविता की आवाज़ सभी का धियान अपनी तरफ खींचने मैं कामयाब रहती है
"अरे ये इत्ता सारा दुआ कैसे.. ?"
कुंदन- सायद त्यागी भैया ने उस खास हिमालयन जड़ी बड़ी से मोनू का इलाज सुरु कर दिया है
कुंदन सभी को त्यागी की कही बातें याद दिलाते हुए
समय यही बीतता चला जाता है..10 मं.. 15 मं.. 20 मं.. 1 जानता
कमरे की बंद खिड़की और दरवाजे क बीचे से हल्का हल्का धुआँ अब भी बहार आता जा रहा था पर न त्यागी अभी तक बहार आया था न hi उसका कोई जवाब
जबकि यहाँ मर्दो का हाल ऐसा था की कभी कुंदन पुरे आँगन मैं चैहाल कदमी करते हुए दीखता तोह कभी महेंद्र, है भानु जरूर कुछ परेशां सा था
भानु मन hi मन
'कही ये त्यागी मुझे देखा तोह नहीं देखा.. इसने जो कहा है की मोनू की अंतिम समय क कुछ पल याद नहीं रहेंगे, कही वो सब झूट तोह नहीं.. ये मादरचोद कही मेरा खेल बिगड़ न दे'
पर तभी भानु की सोच मैं वीगन पद जाता है ककी दरवाजा हल्का सा खुलता है और त्यागी का पसीने से भीगा हुआ चेहरा बहार आता है
सभी क सभी उठ क त्यागी की तरफ लगभग भाग से पड़ते है पर त्यागी उन्हें रोकते हुए
"वही रुकिए आप सभी.. मोनू का उपचार जितना सरल समझ रहा था, उतना है नहीं.. मुझे.. सविता भौजाई से थोड़ी मदद चाहिए"
सविता ये सुनते hi आगे बढ़ने मैं कोई भी विलम्ब नहीं करती और तुरंत hi दरवाजे क पास पहुंच जाती है, त्यागी बिना कुछ कहे दरवाजे से हट्टे हुए अंदर आने का रास्ता देता है और फिर वापस से दरवाजा बंद कर देता है
सविता अब कमरे क अंदर थी.. वो देखती है की कमरे मैं एक तरफ लोहे क तसले मैं आग जल रही थी जिसके पास hi त्यागी का झोला रखा हुआ था.. और उस आग से हल्का हल्का धुवा निरन्तन निकलता जा रहा था
वही जब वो मोनू की तरफ देखती है तोह पाती है मोनू क सर पे किसी जड़ी बूटी का लैप सा लगा हुआ था
सविता- (व्याकुलता भरे स्वर मैं) किया बात है.. त्यागी भैया, हमारा मोनू ठीक तोह हो जायेगा न ?
त्यागी एक पल क लिए मन hi मन हस्ता है और सोचता है
'मोनू तोह कब का ठीक हो चूका है, पर अपने खेल को आगे बढ़ाने क लिए अभी थोड़ा और नाटक करना है मुझे, उसके बाद hi उसे होश मैं लाऊंगा
वैसे भी असली खेल तोह अब सुरु होगा'
त्यागी ये सोचते हुए सविता क भारीभरकम जिस्म को बड़ी hi पियासी नज़रों से देखता है
त्यागी वापस से अपने चेहरे पे चिंता की लकीरे लाते हुए
"भौजाई.. बात ये है की.. wo...ki.."
सविता- (परेशां सी होने लगती है) बात किया है भैया.. बताइए न, कुछ भी करिये बस हमारे मोनू को ठीक कर दीजिये
त्यागी- (एक लम्बी सी सांस चोरते हुए) भौजाई बात ये है की.. मेरी जड़ी बूटी को काम करने क लिए बहुत सी गर्मी की जरुरत है.. और वो.. मैं..
सविता- अरे तोह इसमें कोनसी बड़ी बात है, आप कहिये तोह मैं अभी यहाँ आग जलवा देती हु
त्यागी- (एक पल क लिए रुकता है, वो जान क माहौल को संजीदा बनाने की पूरी कोशिश करते हुए आगे कहता है) आप समझी नहीं भौजाई.. मैं.. कैसे समझौ.. कुछ समझ नहीं प् रहा.. किस मुंह से बताऊ
"त्यागी भैया जो भी बात है आप खुल क साफ़ साफ़ कहिये न यु पहेलियाँ क्यू भुजा रहे है..
मैं मालती का ऐसा भुजा हुआ चेहरा और नहीं देख सकती..
एक माँ पे अपने बचे को इस हालत मैं देख क उसपे किया बीत रही होगी.. मैं सोच भी लेती हु तोह मेरा कलेजा पहात पड़ता है
त्यागी- (एक लम्बी सी सांस लेते हुए) भौजाई मैं जो बोलने जा रहा हु.. उसे सुनकर आप मुझे गलत मत समझना पर और कोई रास्ता नहीं है, और अगर मोनू को जल्दी hi होश नहीं लाया गया तोह वो हमेशा हमेशा क लिए ऐसी अवस्था मैं फास जायेगा
त्यागी की बात सुनकर सविता काँप सी पड़ती है
"अरे तोह दिएर क्यू कर रहे है.. मोनू को भले hi मैंने जन्म नहीं दिया है, पर मैं भी उसकी माँ जैसी हु.. आप बस बताइए करना किया है"
त्यागी- (मन hi मन है पड़ता है अपनी चाल क सफल होने पे) असल मैं भौजाई.. मोनू को जिस गर्मी की जरुरत है वो है शारीरिक गर्मी.. आप समझ रही है न.. मैं कैसे समझौ.. वो
सविता ने दुनिया देखि थी.. और शारीरिक गर्मी का मतलब भी भली भाटी समझ चुकी थी, पर फिर भी धीमी सी आवाज़ मैं कहती है
"आप.. आप कहना किया च रहे है भैया.. साफ़ साफ़ कहिये न"
त्यागी- भौजाई.. मोनू को जल्दी से होश मैं लाने क लिए मेरी इस जड़ी बूटी क साथ साथ उसे बहुत सी शारीरिक गर्मी की आवश्यकता है.. और ये काम सिर्फ एक औरत कर सकती है अपने जिस्म से.. आप समझ रही है न
सविता इस बार कुछ बोल hi नहीं पाती, पर है मैं अपना सर जरूर हिला देती है
त्यागी- (आगे बोलते हुए) और मेरी नज़रों मैं सिर्फ आप hi है जो मोनू को वो गर्मी दे सकती है.. वैसे मैंने पहले मालती को ये सब बताने का निरयण लिया था पर फिर सोचा वो एक माँ है.. उसकी कुछ सीमा है.. इसलिए
त्यागी अपनी बात कहते हुए चुप हो जाता है
सविता- (कुछ पलों तक शांत रहने क बाद) और कोई रास्ता नहीं..
त्यागी अपना सर 'न' मैं सर हिला देता है, सविता कुछ पलों तक कड़ी कड़ी सोचती hi रहती है पर जब वो बहसः मोनू क मासूम चेहरे को द्केहती है तोह उसके अंदर की ममता भी उछाल मरने लगती है
सविता- मुझे मंजूर है.. बताइए किया करना है, पर ये बात
त्यागी- (अपनी ख़ुशी को छुपाते हुए) मैं जनता हु.. ये बात सिर्फ हम दोनों तक hi रहेगी.. बल्कि मोनू को भी कभी इस उपचार का बारे मैं पूरी बात नहीं पता चलेगी
सविता- (अपनी नज़रें नीचे झुकाये हुए) तोह किया यहाँ..
त्यागी- नहीं नहीं भौजाई.. ये सब इतना सरल भी नहीं.. इसके लिए पहले आपके सरीर पे एक खास जड़ी बूटी से बना टेल लगेगा, ताकि अपने जिस्म की गर्मी और ज्यादा बाद सके और उसके बाद.. मैं बताऊंगा कैसे..
यानि त्यागी ने साफ़ कर दिया था की जब ये सब हो रहा होगा.. वो खुद भी वही होगा
त्यागी आगे कहता है
"जंगल क उत्तरी हिस्से मैं एक पुराण मंदिर हुआ करता था जहा अब सिर्फ खंडहर बचे है.. वो जगह सही है, वह हम थोड़ी आग भी जला सकते है मदद क लिए और वह कोई आएगा भी नहीं, और सबसे बड़ी बात मुझे कुछ और जड़ी बूटियों की जरुरत है जो मुझे उसी जगह मिल जाएँगी.. पर आप जानती है न मेरे कहने का किया मतलब है
देखो भौजाई मैं जनता हु की मैं किया कह रहा हु.. पर किया करू, और कोई रास्ता भी नहीं है
और अगर मोनू जल्दी से होश मैं नहीं आया तोह वो हमेशा हमेशा क लिए ऐसी अवस्था मैं फास क रह जायेगा"
सविता- (तुरंत बोल पड़ती है) नहीं नहीं.. आप जो चाहते है वो सब होगा, आप बस उपचार करिये
त्यागी- तोह ठीक है मैं महेंद्र और सभी से बात करके उस जगह पे सरे इंतिज़ाम करवाता हु
सविता बस है मैं अपना सर हिला क रह जाती है और फिर मोनू क सर क पास बैठ क बड़े hi स्नेह भरे हाथों से उसके बालों मैं अपनी उंगलिया चलने लगती है.. पर इस समय उसकी आँखों मैं सिर्फ ममता थी.. हवस नहीं
दूसरी तरफ त्यागी बहार आके सभी को ये बताता है की उसको कुछ ताज़ी जड़ी बूटियों की जरुरत है जिसे वो तुरंत तोड़ क इस्तिमाल करेगा और जिसके लिए जंगल क उत्तरी हिस्से मैं उस खण्डार वाली जगह पे आगे का उपचार होगा
और वो ये भी बताता है की इसके लिए उसे सविता भौजाई की जरुरत पड़ेगी ककी इन सभी मैं उन्ही को सबसे ज्यादा अनुभव है.. वैसे त्यागी की इस बात पे बाकि तीनो औरते भी अपना सहयोग देने की बात कहती है जिसपे त्यागी मन hi मन है पड़ता है.. ककी उन्हें पता नहीं था की आज कोनसा सहयोग होने वाला है
कुंदन- (त्यागी की बात सुनकर अपनी सनका व्यक्त करते हुए) त्यागी भैया आपकी सब बात ठीक है, पर आप तोह जानते hi है.. की इस समय मोनू को खतरा है ऐसे मैं उसे उस एकांत जगह पे और आप कह रहे है हम भी वह नहीं आ सकते ?
त्यागी- है कुंदन तुमने सही सुना, ककी यहाँ एक बंद कमरा था पर वह पूरा खुला वातावरण होगा और उस बूटी का धुआँ दूर तक जा सकता है.. मेरे पास उस बूटी की काट वाली दवा सिर्फ इतनी hi है की मैं उसे सिर्फ किसी एक को दे सकता हु और मैंने सविता भौजाई को दे दी ताकि उनपे उस दुवे का प्रभाव न पड़े.. और रही बात मोनू पे खतरे की तोह माना मैं तुम्हारे जैसा जवान नहीं.. पर तुम्हसे वडा करता हु अगर मोनू पे किसी प्रकार का कोई खतरा हुआ तोह चाहे मुझे अपनी जान क्यू न देनी पड़े पर मैं उसे कुछ नहीं होने दूंगा
महेंद्र- नहीं नहीं त्यागी भाई कैसी बात करते हो हम सभी को आप पर पूरा भरोषा है
महेंद्र बरी बरी से सभी की तरफ देखता है जहा हर कोई महेंद्र से सहमत था
करीब 40 मं बाद..
जंगल क उत्तरी हिस्से मैं एक चटाई बिछी हुई थी जिसपे मोनू बेहोशी की हालत मैं लेता हुआ था और उसके समीप hi त्यागी और सविता खड़े थे.. बाकि सभी लोग वह से करीब 500 मीटर दूर एक छोटी सी पुलिया क पास खड़े थे
असल मैं हर कोई वह आना च रहा था इसलिए त्यागी ने की कहा था की वो सब आ सकते है पर काम से काम 500म उनसे दूर रहना होगा ताकि उस दुवे का गलत प्रभार उन सभी पे न पड़े
इधर उस पुराने खादर जैसी जगह पे कड़ी सविता पहले मोनू और फिर त्यागी की तरफ देखते हुए
"तोह अब.."
त्यागी आने झोले से एक बोतल निकलता है जिसमें सरसो जैसा कोई टेल भरा हुआ था.. उस बोतल को हाथ मैं लेते हुए
"कपडे उतरो भौजाई.."
कंटिन्यू.. इन अपडेट #14
सन
मोनू को लेके पहले से hi व्याकुल भानु मुश्किल से हीरा पन्ना क लिए कोई जुगाड़ कर पाया था.. और उसकी इस परेशानी मैं घी डालने का काम करती है उस ताली की करकस आवाज़
भानु ग़ुस्से से उस आदमी को कुछ कहने क लिए जैसे hi पीछे की तरफ मुड़ता है उसके सब्द बहार hi नहीं आ पाते ककी उसके सामने ताली बजने वाला और कोई नहीं अपितु 'त्यागी' था
भानु मन hi मन सोचने पे मजबूर हो जाता है
'कही इसने कुछ ज्यादा तोह नहीं सुन लिया'
ये सोचते hi भानु क जिस्म मैं एक सार्ड लहर सी दौड़ जाती है.. की कही उसके सालों की म्हणत पे पानी तोह नहीं फिर जायेगा
ठण्ड तोह वैसे भी थी पर ऐसा लगता है जैसे मौसम और ज्यादा सार्ड होता चला जा रहा हो
ठंडी हवा पत्तों को हिला रही हो, मानो किसी तेज़ तूफान से पहले की शांति हो
त्यागी- (मानो जैस कटाक्ष सी करता है) कैसा चल रहा है तुम्हारा सद्यन्त्र ?
भानु को ऐसा लगा जैसे उसके सालों की म्हणत पे सच मैं पानी फिरने वाला हो.. पर वो इतनी आसानी से टूट जाये, ऐसा इन्शान कहा
पर त्यागी आगे बोलता है
"अनोखी.. फिर मोनू, और सायद... खालिद का बाप भी गुफरान भी.. 3 जान, वाह मन्ना पड़ेगा तुम्हे?"
भानु क कानो मैं पड़ने वाले ये सब्द ऐसे थे मानो किसी ने उसके कान मैं जलता हुआ कोयला भर दिया हो
भानु कुछ बोलना चाहता है पर वो रुक जाता है और अस्स पास देखने लगता है मानो पक्का कर रहा हो वह उन दोनों क अलावा और कोई तोह नहीं.. और जब उसे पूरी तरह यकीं हो जाता है वह बस वही दोनों है तोह वो अपनी नज़रों को घुमा क खेत की माइड क पास बहने वाली नाली क पास राखी हुई अपनी कुदाल की तरफ देखता है और मानो किसी निष्कर्ष पे पहुंचने की कोशिश कर रहा हो
त्यागी ने भी भानु की नज़रों को भाप लिया था इसलिए वो भी मुस्कुरा पड़ता है.. वैसे कही न कही उसे भी एक पल क लिए दर तोह लगा था, ककी वो अचे से जान चूका था की भानु किस प्रकार का आदमी है
त्यागी- (मुस्कुराते हुए) किया हुआ.. उस कुदाल से मुझे मरना चाहते हो.. हम्म्म.. सायद वैसे hi जैसे अनोखी, मोनू.. और गुफरान को मारा होगा.. एक मं सायद ये काम तुमने नहीं...
त्यागी दर तोह रहा था ककी वो भलीभांति जनता था की वो भानु से शारीरिक ताक़त मैं जीत नहीं सकता, पर दिमाग का इस्तेमाल करना वो भी अचे से जनता था
"ये सब तोह तुमने अपने आदमी जब्बार से करवाया होगा न.. हम्म तभी उसने मालती को भी मरने की कोशिश की"
भानु- (एक अंतिम बार कोशिश करते हुए) ये सब किया बकवास कर रहे है.. आपको पता है न मैं उस घर का दामाद हु
त्यागी मुस्कुराते हुए वही इमली क पेड क नीचे पड़ी चारपाई की तरफ बढ़ता है और मुस्कुराते हुए उसपे बैठ जाता है और हसकर अपनी बात आगे कहता है
"यकीं मानो.. मुझे ज्यादा म्हणत नहीं लगेगी ये सब साबित करने मैं, और अगर किसी को मेरी बात पे भरोषा नहीं हुआ तोह..
मोनू है न"
भानु ग़ुस्से से लाल होने लगता है, ककी त्यागी ने मोनू का नाम लेके उसके दर को और बड़ा दिया था.. भानु ग़ुस्से से कुदाल की तरफ बढ़ने लगता है
भानु को यु कुदाल की तरफ बढ़ते हुए देख क एक पल क लिए त्यागी भी दर से काँप जाता है पर वो अपने ऊपर दर को हावी नहीं होने देता
"मोनू सिर्फ मेरी वजह से होश मैं नहीं आ रहा.. वर्ण वो तोह कब का ठीक हो चूका है"
त्यागी ने मानो कोई धमाका सा किया हो, भानु क कदम भी वही क वही रुक जाते है और सवालिया नज़रों से त्यागी की तरफ देखते हुए
"किया मतलब है तुम्हारा ?"
भानु क मुख से निकली ये बात त्यागी क लिए विजयपथ पे चलने का रास्ता सा था
त्यागी- (मुस्कुराते हुए एक अंगड़ाई सा लेता है, मानो भानु की हालत का भरपूर मज़ा ले रहा हो.. और फिर वो एक राज़ खोलता है) तुम्हे किया लगता है.. मेरे जैसा वाडिया सर की एक जरा सी चोट को अब तक ठीक नहीं कर सका ?
भानु, कुदाल को भूल क त्यागी की तरफ कुछ कदम आगे बढ़ता है
"साफ़ साफ़ कहो"
त्यागी- मोनू तोह सुरु क 10 दिनों मैं hi ठीक हो गया था, कुछ बात तोह है उस लड़के मैं जो इतना जोरदार वार खाने क बाद भी मौत उसका कुछ बिगड़ नहीं पायी
भानु- किया कहना च रहे हो.. मैंने कहा न मेरा इन सब से कोई लेना देना नहीं है
भानु एक बार फिर से साडी बातों को मैंने से पूरी तरह मन करते हुए
त्यागी- (है पड़ता है.. और शांत आवाज़ मैं आगे कहता है) पता है.. मैं जब चहु मोनू को होश मैं ला सकता हु, और तुम्हे तोह पता hi है वो होश मैं आते hi सबको किया बताएगा
त्यागी अपनी जगह से उठता है और हस्ते हुए भानु क चारो तरफ ऐसे घूमने लगता है मानो उसकी परिक्रमा सी कर रहा हो और आगे कहता है
"वैसे मन्ना पड़ेगा, बड़े ताक़तवर मालूम पड़ते हो.. पर किया तुम कुंदन से जीत पाओगे, इतनी ताक़त है तुममे"
भानु का सब्र अब पूरी तरह टूट जाता है.. ककी त्यागी ने उसके दुश्मन को उससे ज्यादा बड़ा बता दिया था
भानु- (किसी सांड की तरह फुफकारते हुए) तुम मुझे जानते नहीं हो त्यागी.. अपनी हद मैं रहो वर्ण..
त्यागी- (वापस से मुस्कुरा पड़ता है) वर्ण किया.. मुझे भी मरवा डोज जैसे मालती को वर्ण की कोशिश की
भानु- मैंने मालती को मरवाने की कोशिश नहीं की.. ककी उसे तोह मैं अपने एक हाथों से मरूंगा, वो भी तड़पा तड़पा क
भानु ने अपने अंतिम सब्द ऐसे ग़ुस्से से कहे की त्यागी क जिस्म मैं भी झुरझुरी सी दौड़ पड़ी थी
त्यागी- (खुद को सँभालते हुए) हम्म.. मुझे पता है, तुम्हारे छोटे भाई क ज़हर खाने का सबब और यहाँ तक तुम्हारे माँ बाप क ज़िंदा जलने की वजह वही औरत 'मालती' है
भानु ऐसी हैरानी से त्यागी को देखता है.. जैसे उसके जीवन का सबसे बड़ा सच उसको पता चल गया हो
पर त्यागी बिना रुके आगे कहता है
"पर तुम अकेले नहीं हो जिसका परिवार और ज़िन्दगी मालती क परिवार ने बर्बाद की
फर्क सिर्फ इतना है की तुम्हारे छोटे भाई और माँ बाप क साथ जो हुआ उसकी वजह मालती और उसके दोनों भाई.. और मालती की बड़ी भाभी प्रेमलता है"
इससे पहले hi त्यागी कुछ आगे बोलता भानु ग़ुस्से से जलता हु बोल पड़ता है
"और वो हरामी 'मुरली दस' भी"
त्यागी है मैं सर हिलाते हुए आगे कहता है
"है.. मुरली दस, कुंदन का बाप.. भला उसे कैसे भूल सकता हु"
इस बार आगे बोलने का काम भानु करता है
"तुम्हारा किया बिगाड़ा है मालती ने"
त्यागी हैरानी से भानु को देखता है मानो पूछ रहा है..
'मेरा.. मतलब'
भानु अब काफी शांत नज़र आने लगा था वो आसानी से चलते हुए उस चारपाई पे बैठ जाता है और पुरे शांत स्वर मैं कहता है
"अब जब तुम्हे मेरे बारे मैं इतना सब पता है.. पर तुमने ये सब अपने दोस्त महेंद्र को बताने की जगह यहाँ मेरे पास आये हो, तोह ये सब यही तोह नहीं हो सकता"
असल मैं भानु को थोड़ा समय लगता है पर वो जल्दी hi समझ चूका था की त्यागी का यु उसे डरना और उसके बारे मैं इतना सब पता होना.. पर अब तक चुप रहना, जरूर उसके पीछे कुछ तोह राज़ है
त्यागी- (एक लम्बी सी सांस चोरते हुए, वही भानु क पास चारपाई पे बैठ जाता है और किसी सुण्या मैं ताकते हुए कहता है) 'बेला'.. बेला नाम था उसका, मेरा प्रेम और मेरा जीवन थी वो.. पर 'मुरली दस' और उसके दोनों बेटों महेंद्र और कुंदन ने पुरे गाओं क आगे उस बेचारी को बदचलन और कुलटा बता क उसे ख़ुदकुशी करने पे मजबूर कर किया.. और चीन लिया मेरी बेला को मुझसे
बेला
त्यागी की आँखों मैं पानी भर आया था और गाला रुँधा सा गया था.. वो एक पल क लिए रुकता है और आगे कहता है
"पता है.. जब मेरी बेला ने गाओं वालों क तानो से परेशां होक ख़ुदकुशी की तोह वो अकेली नहीं मरी थी, उसके पेट मैं मेरा बचा भी था
उस दिन मुरली दस क दोनों बेटों ने सिर्फ मेरी होने वाली पत्नी को नहीं, बल्कि मेरे पैदा होने वाले बचे को भी मारा था
20 सालों से उनसे बदला लेने क लिए तरप रहा हु.. एक एक दिन कैसा काटा है सिर्फ मैं hi जनता हु, मेरी इन हड्डियों मैं तुम्हारी जैसी जान नहीं है.. पर जड़ी बूटियों का ऐसा ज्ञान जरूर है जिससे मैं उनसे बदला लेके रहूँगा"
भानु क लिए ये सब बिलकुल नया था.. वैसे उसने ये नाम 'बेला' सुना हुआ था
अपनी पत्नी शीला क मुख से.. पर उसके हिसाब से कहानी कुछ और hi थी और अब त्यागी क हिसाब से कुछ और
भानु- (सिर्फ मतलब की बात पे आते हुए) फिर मेरी किया जरुरत.. ककी तुम यहाँ ऐसे तोह नहीं आये होंगे ?
त्यागी- (भानु की तरफ देखता है और अपनी भर आयी आँखों को साफ़ करते हुए) मेरे पास जड़ी बूटियों का ज्ञान तोह है.. पर मैं मुरली दस क पुरे परिवार को तड़पा तड़पा क मरना चाहता हु, चाहता हु की वो सब भी वो दर्द महसूस करे जो मेरी बेला ने उस दिन महसूस किया होगा, इसलिए बूढी क साथ साथ मुझे तुम्हारा बल भी चाहिए
भानु अब सब कुछ समझ चूका था.. पर अब भी उसके मन मैं कई सवाल थे
भानु- आज अचानक क्यू.. पहले कभी मेरे पास आने क बारे मैं क्यू नहीं सोचा ?
"सच कहु तोह मुझे लगता था की महेंद्र और उसके परिवार से मैं और वनराज अकेले hi बदला ले सकते थे.. पर अभी कुछ दिनों पहले वनराज गाओं क बाजार मैं कुंदन से टकराया था और तब वो बड़ी मुश्किल से अपनी जान और पहचान छुपा क भाग पाया था
सीधा सीधा काबू तोह इस जुंग मैं वनराज और मैं.. काफी नहीं है, हमे तुम्हारी ताक़त भी चाहिए
वैसे भी हमारा दुश्मन लगभग एक hi है"
त्यागी अपनी पूरी बात कहते हुए, भानु की तरफ ऐसे देखने लगता है जैसे अब उसके उत्तर का इंतज़ार हो उसे
भानु- वनराज ?
पर भानु अलग hi सवाल करता है
त्यागी- (जैसे उसे अपनी गलती का एहसास हुआ हो) अरे है.. मैं बताना hi भूल गया, वनराज मेरी बेला का भाई है
भानु- (अब वापस सबसे हम सवाल पे आता है) तुम कह रहे थे की.. मोनू अब तक सिर्फ तुम्हारी वजह से उस बेहोशी की हालत मैं है ?
त्यागी- (मुस्कुरा पड़ता है) है.. मैं उसे जो जड़ी बूटियां देता हु वो उसे ठीक करने क लिए नहीं.. बल्कि उसे उसी अवस्था मैं रखने क लिए है
भानु- और इसकी वजह ?
त्यागी- (भानु की तरफ देख क मुस्कुराते हुए) किया तुम मालती की औलाद को इतनी आसान और शांत मौत देना चाहते हो, जहा उसे दर्द का पता तक न चले
भानु- (मानो ग़ुस्से की आग भड़क उठी हो) बिलकुल नहीं.. उसे तोह ऐसी मौत दूंगा की मालती और कुंदन देख क अपनी मौत की भीख मांगेंगे, पर उस दिन सब कुछ मेरी सोच से अलग चल रहा था इसलिए उसे इतनी आसान मौत देनी पड़ी.. पर मेरी किस्मत की वो तब भी नहीं मारा
त्यागी- मैं फिर से मौका दे सकता हु.. इस बार उसका वो हाल करो जो तुम चाहते हो
भानु- (त्यागी की तरफ देखते हुए) ऐसा कैसे संभव है.. वो होश मैं आते hi मेरा सच सबको बता देगा
त्यागी- (मुस्कुराते हुए) जब उसे याद रहेगा तब न.. मैं अपनी जड़ी बूटियों से उसके दिमाग मैं बसी अंतिम यादों को दबा दूंगा, और जब तक मैं नहीं चाहूंगा उसे बेहोशी से पहले का कुछ पल याद नहीं आएंगे
भानु, त्यागी की तरफ ऐसे देखता है मानो आँखों hi आँखों मैं सवाल कर रहा हो
त्यागी- (मुस्कुराते हुए) है.. तुम्हारा सोचना सही है, मैं उन यादों को पूरी तरह भी मिटा सकता हु.. पर तब तुम मुझे भी तोह मार सकते हो न.. अब तुम्हारा किया भरोषा, आखिर अनोखी भी तोह तुम्हारे लिए काम करती थी.. देखो किया हाल किया तुमने उसका
वैसे त्यागी ने जो बातें कही.. खास करके अनोखी और जब्बार को लेके उनपे अब तक वो खुद पक्का नहीं था, पर उसकी इन बातों से भानु का रवैया देख क वो समझ चूका था की वो जो सोच रहा है.. वो सब सच है
भानु डाट पेश क रह जाता है.. ककी त्यागी क हिसाब से भानु कभी भी उसके विरुद्ध नहीं जा सकता था, वर्ण वो मोनू की यादों को जागृत भी कर सकता है
कुलमिलाकर त्यागी, मोनू क बहाने भानु पे अपना काबू बना रहा है.. जो बात वो अचे से समझ रहा था
भानु- ठीक है.. पर याद रहे, अगर तुमने मुझे देखा देने की सोची भी तोह..
त्यागी- (उसकी बात काटे हुए) और तुम भी याद रखना.. अगर तुम मेरे खिलाफ गए तोह.. मोनू को सब कुछ याद आ सकता है
त्यागी ने साफ़ सब्दो मैं बता दिया था की अब भानु बिना उसकी मर्ज़ी क कुछ नहीं सकता
त्यागी अपनी जगह से उठते हुए
"चलो फिर कल एक चमत्कार होगा.. कल मोनू को होश आएगा"
त्यागी अपनी बात कहते हुए मुस्कुरा पड़ता है और वह से चल पड़ता है.. उसे जाते हुए देख क भानु किसी ज़हरीली नाग जैसा फुफकार पड़ता है
"एक बार मैं इस जब्बार का मसला हल कर दू, फिर तुझे भी तेरी औकात दिखाऊंगा.. मादरचोद त्यागी"
वही खेत से दूर निकल आने पे त्यागी लम्बी सी सांस लेते हुए मुस्कुरा पड़ता है और खुद से कहता है
"भानु.. अब तू वही करेगा जो मैं चाहूंगा, ककी अब तेरे गले मैं त्यागी का पत्ता रहेगा
मेरा जड़ी बूटियों को लेके इतने सालों का ज्ञान अब काम आएगा.. वैसे भी मोनू क अंतिम पलों की यादें तोह मैं कब का दबा चूका हु, लोगो को अंदाज़ा hi नहीं आयुर्वेद कोण कोण से चमत्कार कर सकता है"
यहाँ तक चीज़े अब साफ़ हो चुकी है.. इसलिए वापस उसी समय लौट चलते है जब त्यागी मोनू क उपचार करने वाला है, या सिर्फ एक नाटक मात्र
सन
त्यागी ने कमरे को अंदर से बंद कर रखा था.. और यहाँ हर किसी की नज़रें सिर्फ और सिर्फ दरवाजे की तरफ अटकी हुई थी
सविता, मालती, शीला और हर्षिता चारो औरते कभी दरवाजे की तरफ देखती तोह कभी ईश्वर से प्रधान करने लगती
वही मर्दों का भी हाल कुछ अलग नहीं था.. जहा महेंद्र बार बार सब ाचा होने की कामना करता वही मोनू का बाप कुंदन, बार बार अपने बचे क सही होने की दुआ मांग रहा था
वीरू, सत्तू और सोनू भी अपने भाई क जल्दी से ठीक होने की प्राथना करने मैं पीछे नहीं थे.. अगर कोई था जिसे किसी बात का फर्क नहीं पद रहा था वो था सत्यम, ककी उसकी नज़रें बार बार मालती की गठीले जिस्म पे नाच रही थी
सत्यम मन hi मन
'अगर ये मोनू ठीक हो गया तोह लगता नहीं हम कभी इस गाओं की गरीबी को चोर क सेहर की खुशाल ज़िन्दगी देख पाएंगे..
वैसे ये भी है की जब तक मोनू सही नहीं होगा मेरा मालती चची पे चढ़ने का सपना भी पूरा नहीं होगा.. बहनचोद अजीब मुशीबत है'
तभी सविता की आवाज़ सभी का धियान अपनी तरफ खींचने मैं कामयाब रहती है
"अरे ये इत्ता सारा दुआ कैसे.. ?"
कुंदन- सायद त्यागी भैया ने उस खास हिमालयन जड़ी बड़ी से मोनू का इलाज सुरु कर दिया है
कुंदन सभी को त्यागी की कही बातें याद दिलाते हुए
समय यही बीतता चला जाता है..10 मं.. 15 मं.. 20 मं.. 1 जानता
कमरे की बंद खिड़की और दरवाजे क बीचे से हल्का हल्का धुआँ अब भी बहार आता जा रहा था पर न त्यागी अभी तक बहार आया था न hi उसका कोई जवाब
जबकि यहाँ मर्दो का हाल ऐसा था की कभी कुंदन पुरे आँगन मैं चैहाल कदमी करते हुए दीखता तोह कभी महेंद्र, है भानु जरूर कुछ परेशां सा था
भानु मन hi मन
'कही ये त्यागी मुझे देखा तोह नहीं देखा.. इसने जो कहा है की मोनू की अंतिम समय क कुछ पल याद नहीं रहेंगे, कही वो सब झूट तोह नहीं.. ये मादरचोद कही मेरा खेल बिगड़ न दे'
पर तभी भानु की सोच मैं वीगन पद जाता है ककी दरवाजा हल्का सा खुलता है और त्यागी का पसीने से भीगा हुआ चेहरा बहार आता है
सभी क सभी उठ क त्यागी की तरफ लगभग भाग से पड़ते है पर त्यागी उन्हें रोकते हुए
"वही रुकिए आप सभी.. मोनू का उपचार जितना सरल समझ रहा था, उतना है नहीं.. मुझे.. सविता भौजाई से थोड़ी मदद चाहिए"
सविता ये सुनते hi आगे बढ़ने मैं कोई भी विलम्ब नहीं करती और तुरंत hi दरवाजे क पास पहुंच जाती है, त्यागी बिना कुछ कहे दरवाजे से हट्टे हुए अंदर आने का रास्ता देता है और फिर वापस से दरवाजा बंद कर देता है
सविता अब कमरे क अंदर थी.. वो देखती है की कमरे मैं एक तरफ लोहे क तसले मैं आग जल रही थी जिसके पास hi त्यागी का झोला रखा हुआ था.. और उस आग से हल्का हल्का धुवा निरन्तन निकलता जा रहा था
वही जब वो मोनू की तरफ देखती है तोह पाती है मोनू क सर पे किसी जड़ी बूटी का लैप सा लगा हुआ था
सविता- (व्याकुलता भरे स्वर मैं) किया बात है.. त्यागी भैया, हमारा मोनू ठीक तोह हो जायेगा न ?
त्यागी एक पल क लिए मन hi मन हस्ता है और सोचता है
'मोनू तोह कब का ठीक हो चूका है, पर अपने खेल को आगे बढ़ाने क लिए अभी थोड़ा और नाटक करना है मुझे, उसके बाद hi उसे होश मैं लाऊंगा
वैसे भी असली खेल तोह अब सुरु होगा'
त्यागी ये सोचते हुए सविता क भारीभरकम जिस्म को बड़ी hi पियासी नज़रों से देखता है
त्यागी वापस से अपने चेहरे पे चिंता की लकीरे लाते हुए
"भौजाई.. बात ये है की.. wo...ki.."
सविता- (परेशां सी होने लगती है) बात किया है भैया.. बताइए न, कुछ भी करिये बस हमारे मोनू को ठीक कर दीजिये
त्यागी- (एक लम्बी सी सांस चोरते हुए) भौजाई बात ये है की.. मेरी जड़ी बूटी को काम करने क लिए बहुत सी गर्मी की जरुरत है.. और वो.. मैं..
सविता- अरे तोह इसमें कोनसी बड़ी बात है, आप कहिये तोह मैं अभी यहाँ आग जलवा देती हु
त्यागी- (एक पल क लिए रुकता है, वो जान क माहौल को संजीदा बनाने की पूरी कोशिश करते हुए आगे कहता है) आप समझी नहीं भौजाई.. मैं.. कैसे समझौ.. कुछ समझ नहीं प् रहा.. किस मुंह से बताऊ
"त्यागी भैया जो भी बात है आप खुल क साफ़ साफ़ कहिये न यु पहेलियाँ क्यू भुजा रहे है..
मैं मालती का ऐसा भुजा हुआ चेहरा और नहीं देख सकती..
एक माँ पे अपने बचे को इस हालत मैं देख क उसपे किया बीत रही होगी.. मैं सोच भी लेती हु तोह मेरा कलेजा पहात पड़ता है
त्यागी- (एक लम्बी सी सांस लेते हुए) भौजाई मैं जो बोलने जा रहा हु.. उसे सुनकर आप मुझे गलत मत समझना पर और कोई रास्ता नहीं है, और अगर मोनू को जल्दी hi होश नहीं लाया गया तोह वो हमेशा हमेशा क लिए ऐसी अवस्था मैं फास जायेगा
त्यागी की बात सुनकर सविता काँप सी पड़ती है
"अरे तोह दिएर क्यू कर रहे है.. मोनू को भले hi मैंने जन्म नहीं दिया है, पर मैं भी उसकी माँ जैसी हु.. आप बस बताइए करना किया है"
त्यागी- (मन hi मन है पड़ता है अपनी चाल क सफल होने पे) असल मैं भौजाई.. मोनू को जिस गर्मी की जरुरत है वो है शारीरिक गर्मी.. आप समझ रही है न.. मैं कैसे समझौ.. वो
सविता ने दुनिया देखि थी.. और शारीरिक गर्मी का मतलब भी भली भाटी समझ चुकी थी, पर फिर भी धीमी सी आवाज़ मैं कहती है
"आप.. आप कहना किया च रहे है भैया.. साफ़ साफ़ कहिये न"
त्यागी- भौजाई.. मोनू को जल्दी से होश मैं लाने क लिए मेरी इस जड़ी बूटी क साथ साथ उसे बहुत सी शारीरिक गर्मी की आवश्यकता है.. और ये काम सिर्फ एक औरत कर सकती है अपने जिस्म से.. आप समझ रही है न
सविता इस बार कुछ बोल hi नहीं पाती, पर है मैं अपना सर जरूर हिला देती है
त्यागी- (आगे बोलते हुए) और मेरी नज़रों मैं सिर्फ आप hi है जो मोनू को वो गर्मी दे सकती है.. वैसे मैंने पहले मालती को ये सब बताने का निरयण लिया था पर फिर सोचा वो एक माँ है.. उसकी कुछ सीमा है.. इसलिए
त्यागी अपनी बात कहते हुए चुप हो जाता है
सविता- (कुछ पलों तक शांत रहने क बाद) और कोई रास्ता नहीं..
त्यागी अपना सर 'न' मैं सर हिला देता है, सविता कुछ पलों तक कड़ी कड़ी सोचती hi रहती है पर जब वो बहसः मोनू क मासूम चेहरे को द्केहती है तोह उसके अंदर की ममता भी उछाल मरने लगती है
सविता- मुझे मंजूर है.. बताइए किया करना है, पर ये बात
त्यागी- (अपनी ख़ुशी को छुपाते हुए) मैं जनता हु.. ये बात सिर्फ हम दोनों तक hi रहेगी.. बल्कि मोनू को भी कभी इस उपचार का बारे मैं पूरी बात नहीं पता चलेगी
सविता- (अपनी नज़रें नीचे झुकाये हुए) तोह किया यहाँ..
त्यागी- नहीं नहीं भौजाई.. ये सब इतना सरल भी नहीं.. इसके लिए पहले आपके सरीर पे एक खास जड़ी बूटी से बना टेल लगेगा, ताकि अपने जिस्म की गर्मी और ज्यादा बाद सके और उसके बाद.. मैं बताऊंगा कैसे..
यानि त्यागी ने साफ़ कर दिया था की जब ये सब हो रहा होगा.. वो खुद भी वही होगा
त्यागी आगे कहता है
"जंगल क उत्तरी हिस्से मैं एक पुराण मंदिर हुआ करता था जहा अब सिर्फ खंडहर बचे है.. वो जगह सही है, वह हम थोड़ी आग भी जला सकते है मदद क लिए और वह कोई आएगा भी नहीं, और सबसे बड़ी बात मुझे कुछ और जड़ी बूटियों की जरुरत है जो मुझे उसी जगह मिल जाएँगी.. पर आप जानती है न मेरे कहने का किया मतलब है
देखो भौजाई मैं जनता हु की मैं किया कह रहा हु.. पर किया करू, और कोई रास्ता भी नहीं है
और अगर मोनू जल्दी से होश मैं नहीं आया तोह वो हमेशा हमेशा क लिए ऐसी अवस्था मैं फास क रह जायेगा"
सविता- (तुरंत बोल पड़ती है) नहीं नहीं.. आप जो चाहते है वो सब होगा, आप बस उपचार करिये
त्यागी- तोह ठीक है मैं महेंद्र और सभी से बात करके उस जगह पे सरे इंतिज़ाम करवाता हु
सविता बस है मैं अपना सर हिला क रह जाती है और फिर मोनू क सर क पास बैठ क बड़े hi स्नेह भरे हाथों से उसके बालों मैं अपनी उंगलिया चलने लगती है.. पर इस समय उसकी आँखों मैं सिर्फ ममता थी.. हवस नहीं
दूसरी तरफ त्यागी बहार आके सभी को ये बताता है की उसको कुछ ताज़ी जड़ी बूटियों की जरुरत है जिसे वो तुरंत तोड़ क इस्तिमाल करेगा और जिसके लिए जंगल क उत्तरी हिस्से मैं उस खण्डार वाली जगह पे आगे का उपचार होगा
और वो ये भी बताता है की इसके लिए उसे सविता भौजाई की जरुरत पड़ेगी ककी इन सभी मैं उन्ही को सबसे ज्यादा अनुभव है.. वैसे त्यागी की इस बात पे बाकि तीनो औरते भी अपना सहयोग देने की बात कहती है जिसपे त्यागी मन hi मन है पड़ता है.. ककी उन्हें पता नहीं था की आज कोनसा सहयोग होने वाला है
कुंदन- (त्यागी की बात सुनकर अपनी सनका व्यक्त करते हुए) त्यागी भैया आपकी सब बात ठीक है, पर आप तोह जानते hi है.. की इस समय मोनू को खतरा है ऐसे मैं उसे उस एकांत जगह पे और आप कह रहे है हम भी वह नहीं आ सकते ?
त्यागी- है कुंदन तुमने सही सुना, ककी यहाँ एक बंद कमरा था पर वह पूरा खुला वातावरण होगा और उस बूटी का धुआँ दूर तक जा सकता है.. मेरे पास उस बूटी की काट वाली दवा सिर्फ इतनी hi है की मैं उसे सिर्फ किसी एक को दे सकता हु और मैंने सविता भौजाई को दे दी ताकि उनपे उस दुवे का प्रभाव न पड़े.. और रही बात मोनू पे खतरे की तोह माना मैं तुम्हारे जैसा जवान नहीं.. पर तुम्हसे वडा करता हु अगर मोनू पे किसी प्रकार का कोई खतरा हुआ तोह चाहे मुझे अपनी जान क्यू न देनी पड़े पर मैं उसे कुछ नहीं होने दूंगा
महेंद्र- नहीं नहीं त्यागी भाई कैसी बात करते हो हम सभी को आप पर पूरा भरोषा है
महेंद्र बरी बरी से सभी की तरफ देखता है जहा हर कोई महेंद्र से सहमत था
करीब 40 मं बाद..
जंगल क उत्तरी हिस्से मैं एक चटाई बिछी हुई थी जिसपे मोनू बेहोशी की हालत मैं लेता हुआ था और उसके समीप hi त्यागी और सविता खड़े थे.. बाकि सभी लोग वह से करीब 500 मीटर दूर एक छोटी सी पुलिया क पास खड़े थे
असल मैं हर कोई वह आना च रहा था इसलिए त्यागी ने की कहा था की वो सब आ सकते है पर काम से काम 500म उनसे दूर रहना होगा ताकि उस दुवे का गलत प्रभार उन सभी पे न पड़े
इधर उस पुराने खादर जैसी जगह पे कड़ी सविता पहले मोनू और फिर त्यागी की तरफ देखते हुए
"तोह अब.."
त्यागी आने झोले से एक बोतल निकलता है जिसमें सरसो जैसा कोई टेल भरा हुआ था.. उस बोतल को हाथ मैं लेते हुए
"कपडे उतरो भौजाई.."
कंटिन्यू.. इन अपडेट #14


