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- Dec 5, 2013
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- ननद पर, चढ़ा मेरा मरद
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उनके कानों में मैंने जीभ की टिप से सुरसुरी की और कान की लर चूमते बोली, बहुत हो गया चढ़ जा यार...
और गाड़ी नाव पर थी,...
इनके साथ कितनी बार मैंने विपरीत रति की थी, ... ऊपर चढ़ के, लकिन बस थोड़ी देर फिर वही ऊपर आ जाते थे और इस बार भी वही लेकिन मैं भी तो थी,
ननद की भौजाई साथ में,
--ननद की दोनों गोरी लम्बी टाँगे, मैंने खुद पकड़ के इनके कंधे पर सेट कर दी करीब दुहरी हो गयी थीं
वो औ ये पलटी जब भी मारते थे, नीचे से ऊपर होते थे मजाल जो की खूंटा एक इंच भी बाहर सरक जाए,... ऑलमोस्ट पूरा अंदर वैसे भी धंसा था ८ इंच के ऊपर ही बस थोड़ा ही बाहर था,... मेरे साजन ने भी एक हाथ से ननद जी की पतली कमर पकड़ी और दूसरे हाथ से गदराया जोबन,...
और मैंने एक झटके से उनकी आँख पर बंधी पट्टी खोल दी,
क्या रूप था उनकी बहन का, क्या जोबन, रच रच के सिंगार, जैसे सुहागरात की सेज चढ़ने आयी हों,...
और सिंगार किया भी मैंने था, मांग में खूब चौड़ा सिन्दूर, नाक तक झरता,... माथे पर चौड़ी सी बिंदी, बड़ी बड़ी दीये ऐसी आँखों में भर के काजल,... नाक में बड़ी सी नथ और उसकी मोती की लड़ कान के झुमके तक,... नथ ऐसी चमक रही थी जैसे आज ही उतर रही हो,.... खूब गाढ़ी लिपस्टिक लाल लाल, जो ननद के दूधिया चम्पई रंग पे खूब फब रही थी,
गले में मंगल सूत्र जिसका लाकेट उनकी बहन के दोनों गजब के उभारों के बीच, चूड़ियां भी जिद्द करके मैंने लाल हरी पूरी कोहनी तक पहनाई थी, जब तक सेज पर चुरुर मुरुर न हो भाई बहन की चुदाई में, आधी से ज्यादा चूर चूर न हो जाए, कुछ पलंग पर बिखरें कुछ फर्श पर तो क्या मजा,...
और सबसे बड़ा सिंगार होता है सुहागन का जब वो मस्तायी, गर्मायी चुदवासी, मरद से ज्यादा बेचैन होती है लंड पूरा अंदर घोंटने के लिए,....
और मेरे मरद की बहिन की यही हालत थी, गरम तावे पर जैसे कोई दो चार बूंदो का छींटा मार दे और वो छिनछिना उठे, बस वही..
मेरी तरह उन्हें भी लगा की कहीं उनका भाई सामने अपनी बहन को देख के एक पल के लिए,..
तो पहल उनकी बहन ने ही की,...
हल्का सा मुस्करायी, अपने उभारों को और उभार के उनके झुके सीने पर रगड़ दिया, जैसे निपल की दो बर्छियों ने बेध दिया हो ,
सीधे दिल मे कटार उतर गयी उनके भाई के. और जैसे ये काफी न हो लता की तरह उनकी बहन के दोनों हाथों ने अपने भाई को को पकड़ के अपनी ओर खींच लिया, और अपने होंठों से अपने भाई के होंठों को चूम के नए रिश्ते पर मोहर लगा दी,... गवाही में मैं थी ही।
बस, इसके बाद कौन मरद रुकता है,...
और मेरा मरद तो वैसे ही पूरा सांड़ था,...
बहन की दोनों मस्तायी गदरायी चूँची को पकड़ के पेल दिया पूरी ताकत से उनके भाई, मेरे मरद ने, ... मैं अपने मरद के पीछे खड़ी खेल तमासा देख रही थी, खुश हो रही थी, बस थोड़ा सा पीछे खींच के क्या ताकत से पेला अपनी बहनिया की बुरिया में मेरे मरद ने,...
रोकते रोकते भी ननद की चीख निकल गयी.
कस के दोनों हाथों से उन्होंने पलंग की पाटी पकड़ रखी थी, पहाड़ी आलू ऐसा उनके भाई का मोटा सुपाड़ा जब बहिनिया की बच्चेदानी में लगा तो उनकी चूल चूल ढीली हो गयी,
लेकिन बहन की बच्चेदानी पर भाई के सुपाड़े का धक्का, इससे ज्यादा मज़ा क्या हो सकता है, और अगर भाई ऐसा जबरदस्त चुदकक्ड़, खिलाडी नंबर वन,... वो पूरे जड़ तक घुसे लंड के बेस से अपनी बहन की बुर के ऊपर रगड़ने लगे, बहन की क्लिट फूल कर कुप्पा,
लेकिन बहन उनकी ननद मेरी कम छिनरा नहीं थी, बचपन की खेलाड़, उनके चेहरे को देख मैं समझ गयी उनकी शैतानी, वो अपनी चूत को कस के सिकोड़ के दबोच के अपने भाई का लंड अपनी बुर में निचोड़ रही थी,...
पीछे से अपने राजा को पकडे, अपने साजन की पीठ पे अपने अपने जोबन को रगड़ते चिढ़ाते मैं बोली,... मुझे मालूम था जब उनके बहिन महतारी का नाम ले ले के मैं छेड़ती थी तो का हालत होती थी उनकी और आज तो सामने सामने कुश्ती हो रही थी,..
" क्यों कैसा मजा आ रहा है बहिनिया के साथ, कैसा लग रहा है,... "
वो शायद टाल जाते, न भी बोलते, लेकिन नीचे से अपने छोटे छोटे चूतड़ उचकाती, एक बार फिर से उन्हें चूम के उनकी बहिन भी बोली,
" अरे भैया बोल न दे, भौजी कुछ पूछ रही हैं, कैसा लग रहा है,... "
जैसे मुझे न जवाब दे के अपनी बहन से बोल रहे हों वो बोले,
" बहुत अच्छा, बहुत मस्त "
और भाई बहिन के बीच बातचीत चालू हो गयी थी
लेकिन बदमाश तो वो पैदायशी थे, माँ की कोख से सीख के पैदा हुए थे,...
बस उनसे रहा नहीं गया, अपने खूंटे के बेस से अपनी बहिनिया की बुर को उसकी क्लिट को रगड़ ही रहे थे अब अंगूठे से भी उस फूली मस्तायी गर्मायी क्लिट को रगड़ने लगे, खूंटा उसी तरह पूरा अंदर घुसा हुआ, बहिन उनकी कुछ देर में ही पगलाने लगी, मस्ती से कभी अपना चूतड़ पलंग पे रगड़ती कभी उन्हें अपनी ओर खींचती, कभी सिसकिया भरती, कभी लम्बे नाख़ून उनके कन्धों में धंसा देती,...
मैं समझ रही थी अपनी ननद की हालत, मेरे साथ तो अक्सर इसी तरह, लेकिन मैं अब तक उनकी बहन महतारी सात पुश्त गरिया देती, ...
" करो न भैया " बहन से नहीं रहा गया, चूतड़ उचकाते हुए वो बोल पड़ी,...
" क्या करूँ बोल न साफ़ साफ़ " शैतानी से अपनी बहन को देखते हुए वो बोले।
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उनके कानों में मैंने जीभ की टिप से सुरसुरी की और कान की लर चूमते बोली, बहुत हो गया चढ़ जा यार...
और गाड़ी नाव पर थी,...
इनके साथ कितनी बार मैंने विपरीत रति की थी, ... ऊपर चढ़ के, लकिन बस थोड़ी देर फिर वही ऊपर आ जाते थे और इस बार भी वही लेकिन मैं भी तो थी,
ननद की भौजाई साथ में,
--ननद की दोनों गोरी लम्बी टाँगे, मैंने खुद पकड़ के इनके कंधे पर सेट कर दी करीब दुहरी हो गयी थीं
वो औ ये पलटी जब भी मारते थे, नीचे से ऊपर होते थे मजाल जो की खूंटा एक इंच भी बाहर सरक जाए,... ऑलमोस्ट पूरा अंदर वैसे भी धंसा था ८ इंच के ऊपर ही बस थोड़ा ही बाहर था,... मेरे साजन ने भी एक हाथ से ननद जी की पतली कमर पकड़ी और दूसरे हाथ से गदराया जोबन,...
और मैंने एक झटके से उनकी आँख पर बंधी पट्टी खोल दी,
क्या रूप था उनकी बहन का, क्या जोबन, रच रच के सिंगार, जैसे सुहागरात की सेज चढ़ने आयी हों,...
और सिंगार किया भी मैंने था, मांग में खूब चौड़ा सिन्दूर, नाक तक झरता,... माथे पर चौड़ी सी बिंदी, बड़ी बड़ी दीये ऐसी आँखों में भर के काजल,... नाक में बड़ी सी नथ और उसकी मोती की लड़ कान के झुमके तक,... नथ ऐसी चमक रही थी जैसे आज ही उतर रही हो,.... खूब गाढ़ी लिपस्टिक लाल लाल, जो ननद के दूधिया चम्पई रंग पे खूब फब रही थी,
गले में मंगल सूत्र जिसका लाकेट उनकी बहन के दोनों गजब के उभारों के बीच, चूड़ियां भी जिद्द करके मैंने लाल हरी पूरी कोहनी तक पहनाई थी, जब तक सेज पर चुरुर मुरुर न हो भाई बहन की चुदाई में, आधी से ज्यादा चूर चूर न हो जाए, कुछ पलंग पर बिखरें कुछ फर्श पर तो क्या मजा,...
और सबसे बड़ा सिंगार होता है सुहागन का जब वो मस्तायी, गर्मायी चुदवासी, मरद से ज्यादा बेचैन होती है लंड पूरा अंदर घोंटने के लिए,....
और मेरे मरद की बहिन की यही हालत थी, गरम तावे पर जैसे कोई दो चार बूंदो का छींटा मार दे और वो छिनछिना उठे, बस वही..
मेरी तरह उन्हें भी लगा की कहीं उनका भाई सामने अपनी बहन को देख के एक पल के लिए,..
तो पहल उनकी बहन ने ही की,...
हल्का सा मुस्करायी, अपने उभारों को और उभार के उनके झुके सीने पर रगड़ दिया, जैसे निपल की दो बर्छियों ने बेध दिया हो ,
सीधे दिल मे कटार उतर गयी उनके भाई के. और जैसे ये काफी न हो लता की तरह उनकी बहन के दोनों हाथों ने अपने भाई को को पकड़ के अपनी ओर खींच लिया, और अपने होंठों से अपने भाई के होंठों को चूम के नए रिश्ते पर मोहर लगा दी,... गवाही में मैं थी ही।
बस, इसके बाद कौन मरद रुकता है,...
और मेरा मरद तो वैसे ही पूरा सांड़ था,...
बहन की दोनों मस्तायी गदरायी चूँची को पकड़ के पेल दिया पूरी ताकत से उनके भाई, मेरे मरद ने, ... मैं अपने मरद के पीछे खड़ी खेल तमासा देख रही थी, खुश हो रही थी, बस थोड़ा सा पीछे खींच के क्या ताकत से पेला अपनी बहनिया की बुरिया में मेरे मरद ने,...
रोकते रोकते भी ननद की चीख निकल गयी.
कस के दोनों हाथों से उन्होंने पलंग की पाटी पकड़ रखी थी, पहाड़ी आलू ऐसा उनके भाई का मोटा सुपाड़ा जब बहिनिया की बच्चेदानी में लगा तो उनकी चूल चूल ढीली हो गयी,
लेकिन बहन की बच्चेदानी पर भाई के सुपाड़े का धक्का, इससे ज्यादा मज़ा क्या हो सकता है, और अगर भाई ऐसा जबरदस्त चुदकक्ड़, खिलाडी नंबर वन,... वो पूरे जड़ तक घुसे लंड के बेस से अपनी बहन की बुर के ऊपर रगड़ने लगे, बहन की क्लिट फूल कर कुप्पा,
लेकिन बहन उनकी ननद मेरी कम छिनरा नहीं थी, बचपन की खेलाड़, उनके चेहरे को देख मैं समझ गयी उनकी शैतानी, वो अपनी चूत को कस के सिकोड़ के दबोच के अपने भाई का लंड अपनी बुर में निचोड़ रही थी,...
पीछे से अपने राजा को पकडे, अपने साजन की पीठ पे अपने अपने जोबन को रगड़ते चिढ़ाते मैं बोली,... मुझे मालूम था जब उनके बहिन महतारी का नाम ले ले के मैं छेड़ती थी तो का हालत होती थी उनकी और आज तो सामने सामने कुश्ती हो रही थी,..
" क्यों कैसा मजा आ रहा है बहिनिया के साथ, कैसा लग रहा है,... "
वो शायद टाल जाते, न भी बोलते, लेकिन नीचे से अपने छोटे छोटे चूतड़ उचकाती, एक बार फिर से उन्हें चूम के उनकी बहिन भी बोली,
" अरे भैया बोल न दे, भौजी कुछ पूछ रही हैं, कैसा लग रहा है,... "
जैसे मुझे न जवाब दे के अपनी बहन से बोल रहे हों वो बोले,
" बहुत अच्छा, बहुत मस्त "
और भाई बहिन के बीच बातचीत चालू हो गयी थी
लेकिन बदमाश तो वो पैदायशी थे, माँ की कोख से सीख के पैदा हुए थे,...
बस उनसे रहा नहीं गया, अपने खूंटे के बेस से अपनी बहिनिया की बुर को उसकी क्लिट को रगड़ ही रहे थे अब अंगूठे से भी उस फूली मस्तायी गर्मायी क्लिट को रगड़ने लगे, खूंटा उसी तरह पूरा अंदर घुसा हुआ, बहिन उनकी कुछ देर में ही पगलाने लगी, मस्ती से कभी अपना चूतड़ पलंग पे रगड़ती कभी उन्हें अपनी ओर खींचती, कभी सिसकिया भरती, कभी लम्बे नाख़ून उनके कन्धों में धंसा देती,...
मैं समझ रही थी अपनी ननद की हालत, मेरे साथ तो अक्सर इसी तरह, लेकिन मैं अब तक उनकी बहन महतारी सात पुश्त गरिया देती, ...
" करो न भैया " बहन से नहीं रहा गया, चूतड़ उचकाते हुए वो बोल पड़ी,...
" क्या करूँ बोल न साफ़ साफ़ " शैतानी से अपनी बहन को देखते हुए वो बोले।
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