Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में - Page 37 - SexBaba
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Adultery छुटकी - होली दीदी की ससुराल में

रीत और करन -एक्शन, थ्रिल

पेज ५५ और ५७

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Erotica - जोरू का गुलाम उर्फ़ जे के जी

जोरू का गुलाम भाग १८६ - कोचिंग, और पार्टीमिसेज मल्होत्रा गुड्डी को समझा रही थी और मुझे याद आ रहा था नीचे सैंडविच , फास्ट फ़ूड की दुकानों पर जितने लड़के लड़कियां थे सब ने गले में ये टांग रखा था। और आर्म्स टैग भी ,गुड्डी अपने आर्म्स टैग को देख रही थी तो मिसेज मल्होत्रा ने मुस्करा कर कहा "...

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जोरू का गुलाम भाग १८२ - कोचिंग, और पार्टी

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जोरू का गुलाम भाग १८२ - कोचिंग, और पार्टी

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Erotica - जोरू का गुलाम उर्फ़ जे के जी

जोरू का गुलाम भाग १८६ - कोचिंग, और पार्टीमिसेज मल्होत्रा गुड्डी को समझा रही थी और मुझे याद आ रहा था नीचे सैंडविच , फास्ट फ़ूड की दुकानों पर जितने लड़के लड़कियां थे सब ने गले में ये टांग रखा था। और आर्म्स टैग भी ,गुड्डी अपने आर्म्स टैग को देख रही थी तो मिसेज मल्होत्रा ने मुस्करा कर कहा "...

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पूर्वाभास - पृष्ठ १ और २

भाग १ -पृष्ठ ५ छुटकी - होली, दीदी की ससुराल में

भाग २
पृष्ठ ८ छुटकी -बंधे हाथ, ट्रेन में

भाग ३ पृष्ठ १३ चाय चाय

भाग ४,
पृष्ठ १९ छुटकी का पिछवाड़ा और नन्दोई जी का इरादा

भाग ५ - पृष्ठ २२ गोलकुंडा पर चढ़ाई- चलती ट्रेन में

भाग ६ --पृष्ठ २९ -३० रात भर ट्रेन में, सटासट,...

भाग ७ पृष्ठ ३५ रेल में धक्क्म पेल

भाग ८ पृष्ठ ४० छुटकी पहुंच गयी जीजा के गाँव

भाग ९ -पृष्ठ ४६ मेरी सास

भाग १० --पृष्ठ ५० ननद, नन्दोई और छुटकी का पिछवाड़ा

भाग ११ - पृष्ठ ५३ सासू , ननदिया ( नैना ) का महाजाल

भाग १२ - पृष्ठ ५८ दो बहेलिये ( सासू और नैना ननदिया)

भाग १३ -पृष्ठ ६२ पूरा गाँव,... जीजा

भाग १४ पृष्ठ ६६ देवर मेरे

भाग १५ पृष्ठ ७२ चंदू देवर

भाग १६ -पृष्ठ ७७ फागुन का पहला दिन- देवर भौजाई

भाग १७ -पृष्ठ ८१ छुटकी - प्यार दुलार और,...

भाग १८ - पृष्ठ ८७ चुन्नू की पढ़ाई

भाग १९ - पृष्ठ ९१ ननदों भौजाइयों की रंगभरी कबड्डी

भाग २० -पृष्ठ ९३ छुटकी की हालचाल

भाग २१ - पृष्ठ ९९ छुटकी पर चढ़ाई -

भाग २२ पृष्ठ १०३ रात बाकी

भाग २३ पृष्ठ १०९ नई सुबह

भाग २४ पृष्ठ ११३ देवर भाभी की होली

भाग २५
पृष्ठ १२१ छोटा देवर - कैसे उतरी नथ चुन्नू की

भाग २६
पृष्ठ १२७ पिलानिंग - कच्ची ननदों की लेने की

भाग २७ पृष्ठ १३२ और छुटकी की होली

भाग २८ पृष्ठ १३६ - किस्सा इन्सेस्ट यानी भैया के बहिनिया पर चढ़ने का-
उर्फ़ गीता और उसके भैया अरविन्द का

भाग २९ पृष्ठ - १४५ इन्सेस्ट का किस्सा -तड़पाओगे, तड़पा लो,... हम तड़प तड़प के भी

भाग ३० पृष्ठ १५२ किस्सा इन्सेस्ट का, भैया और बहिनी का -( अरविन्द -गीता ) दूध -मलाई

भाग ३१ पृष्ठ १६५ किस्सा इन्सेस्ट का,-रात बाकी बात बाकी

भाग ३२ पृष्ठ १७८ इन्सेस्ट गाथा अरविन्द और गीता,-
सुबह सबेरे

भाग ३३ पृष्ठ २०० अरविन्द और गीता की इन्सेस्ट गाथा सांझ भई घर आये

भाग ३४ पष्ठ २१४ इन्सेस्ट कथा - चाची ने चांदनी रात में,...

भाग ३५ पृष्ठ २२५ फुलवा

भाग ३६ - पृष्ठ २३६ इन्सेस्ट किस्सा- मस्ती भैया बहिनी उर्फ़ गीता -अरविन्द की

भाग ३७ - पृष्ठ २५० इन्सेस्ट कथा - और माँ आ गयीं

भाग ३८ पृष्ठ २६० मेरे पास माँ है

भाग ३९ - पृष्ठ २७१ माँ, बेटा, बेटी और बरसात की रात

भाग ४० पृष्ठ २८६ इन्सेस्ट गाथा - गोलकुंडा पर चढ़ाई -भाई की माँ के सामने

भाग ४१ पृष्ठ ३०३ इन्सेस्ट कथा - मामला वल्दियत का उर्फ़ किस्से माँ के

भाग ४२ पृष्ठ ३१७ इन्सेस्ट कथा माँ के किस्से,

भाग ४३ पृष्ठ ३२९ इन्सेस्ट कथा- माँ के किस्से, मायके के

भाग ४४ पृष्ठ ३४१ रिश्तों में हसीन बदलाव उर्फ़ मेरे पास माँ है

भाग ४५ पृष्ठ ३४८ गीता चली स्कूल

भाग ४६ पृष्ठ ३६३ तीन सहेलियां खड़ी खड़ी, किस्से सुनाएँ घड़ी घड़ी

भाग ४७ पृष्ठ ३७५ रोपनी

भाग ४८ - पृष्ठ 394 रोपनी -फुलवा की ननद

भाग ४९ पृष्ठ ४२० मस्ती -माँ, अरविन्द और गीता की

भाग ५० पृष्ठ ४३५ माँ का नाइट स्कूल


भाग ५१ पृष्ठ ४५६ भैया के संग अमराई में
 
भाग ५२

गन्ने के खेत में भैया के संग

अगले पन्ने पर

भाग ४७ पृष्ठ ३७५ रोपनी



भाग ४८ - पृष्ठ 394 रोपनी -फुलवा की ननद

भाग ४९ पृष्ठ ४२० मस्ती -माँ, अरविन्द और गीता की

भाग ५० पृष्ठ ४३५ माँ का नाइट स्कूल


भाग ५१ पृष्ठ ४५६ भैया के संग अमराई में
 
भाग ५२

गन्ने के खेत में भैया के संग

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भाग ४७ पृष्ठ ३७५ रोपनी

भाग ४८ - पृष्ठ 394 रोपनी -फुलवा की ननद

भाग ४९ पृष्ठ ४२० मस्ती -माँ, अरविन्द और गीता की

भाग ५० पृष्ठ ४३५ माँ का नाइट स्कूल

भाग ५१ पृष्ठ ४५६ भैया के संग अमराई में
 
भाग ५२

गन्ने के खेत में भैया के संग





पर छुटकी तो अभी फास्ट फारवर्ड के मूड में थी उसने एक्सीलेटर पर दबाया, गीता को बाग़ से बाहर निकालने के लिए, और गीता ने अगले दिनों की बात बताई,...

गीता की माँ, वो तो गीता के भाई अरविन्द से भी एक हाथ आगे बढ़ की गीता के पीछे,...

होता ये था की गीता के स्कूल की तो दो ढाई बजे छुट्टी हो जाती थी , दस मिनट में वो घर,भाई उसका अरविन्द भी दोपहर में बाहर का काम कामधाम करके वापस,...

लेकिन दोपहर के खाने के बाद ही माँ की गप्प गोष्ठी शुरू होती थी, सब पडोसिने, कभी और कोई नहीं तो ग्वालिन भौजी माँ की तेल मालिश करने या कभी ब्लाक से कोई आ गया, कोई मिलने वाले,... तो वो भी चाहती थीं की उस समय दोनों भाई बहन बाहर रहें,..





फिर अब धीरे धीरे जो इत्ते सालो से वो घर की खेत की बाग बगीचे की जिम्मेदारी अकेले देख रही थीं अब धीरे धीरे पूरी तरीके से अपने बेटे के कंधे पर डाल रही थीं,... लेकिन साथ साथ वो बेटी को भी इस बात में शामिल करना चाहती थीं, आखिर इतने दिनों से वो सब काम देख रही थी तो गीता को भी अंदाज तो होना चाहिए,...भाई का हाथ बटाये साथ दे, और उन से बढ़ के गाँव वालियों को काम करने वालियों को भी मालूम हो की ये खाली स्कूल और घर वाली नहीं है, तो उसे भी वो हाँक देती थीं भाई के साथ, बाहर,...

गीता की भी मन तो करता ही था,

रात भर तो माँ और भैया मिल के उस की चटनी बनाते ही थे,...





लेकिन इस उमर में मन कहाँ भरता है,... उस की बाकी सहेलियां किसी के दो तीन से कम आशिक नहीं थे, कई तो शाम को किसी से सिवान में मिलती थीं तो स्कूल से लौटते हुए किसी और के सामने गन्ने के खेत में स्कर्ट पसारती थीं,... दिन भर क्लास में पढाई से ज्यादा तो कल किस ने किस से,... बस यही बातें,... और सुन सुन के जब लौटती गीता तो इतनी गर्मायी रहती की मन करता की कब भैया से अकेले में मिल के,.. बस अरविन्द भैया कब उसकी चोदे,...

और सिर्फ सहेलियां ही नहीं, गाँव की भौजाइयां, काम करने वालियां, सब,..अब सब को तो मालूम ही था की वो अरविंदवा से चुदती है तो एकदम खुल के चिढ़ाती थीं,...

और उसका भाई भी, एक बार बहन की चूत का स्वाद लगने के बाद कौन भाई,... और अरविन्द तो अपनी चाची का ट्रेंड किया,...

तो वो भी अक्सर चक्कर काटता रहता, .... जहाँ जहाँ गीता जाती,... और स्कूल भी गाँव का, हफ्ते में दो तीन दिन तो कभी छुट्टी तो कभी जल्दी छुट्टी,..

और सावन का महीना, तो लड़कियां सब ( जिनको यारों के पास नहीं जाना होता था ) झरर मार के झूले पे भौजाइयों के साथ झूला झूलने, कजरी गाने,... और झूले से ज्यादा मजा झूले पे होने वाली छेड़छाड़ से, और अब तो गीता भी गाँव में साड़ी ही पहन के निकलती थी, बस झूला शुरू होते ही छेड़छाड़ शुरू, उसके पीछे बैठी कोई भौजाई, साड़ी उलट देती थी और सोन चिरैया में ऊँगली डाल के पूछती,

" अरविंदवा के मलाई हो न "





और बुर में ऊँगली शुरू, कोई न कोई भौजी चोली में बंद जोबन भी खोल देती,... और उसके भाई का नाम ले ले के,

अरे देवर अरविन्द ऐसे दबाते हैं ना,... "

भाई का नाम सुन के और उसकी चूत गरमा जाती थी, ... एक तो रोपनी के दिन उसने खुद कबूल कर लिया था

फिर अमराई में तो चुदते ही,... दो लड़कियों ने साफ़ साफ़ देखा था ,





लेकिन गीता को कुछ भी बुरा नहीं लगता था बल्कि वो इसी छेड़छाड़ का इन्तजार करती थी पर सबसे मजा आता था कजरी ख़त्म होते जब वह भौजाइयों सहेलियों के साथ घर की ओर लौटती तो आस पास उसका भाई अरविन्द बाइक पे चक्कर काटता रहा, और उसे खींच के पीछे बैठा लेता, सब सहेलियां अरविन्द को खुद चिढ़ातीं,

" अरे कभी हमारे भी साथ,... "

लेकिन छुटकी चाहती थी सीधे मुद्दे पर कब खुले आसमान के नीचे गीता अपने भाई अरविन्द से कब कहाँ कैसे चुदी।





" गन्ने के खेत में, आम की बाग़ में चोदने के दो दिन बाद ही अरविन्द भैया ने गन्ने के खेत में नंबर लगा दिया , दोपहर में " गीता ने कबूला

अब छुटकी हाल खुलासा चाहती थी और गीता ने सब किस्सा गन्ने के खेत का बताया।

गितवा के क्लास वाली शायद ही कोई बची हो जिसने गन्ने के खेत में मोटा गन्ना न खाया हो, और वो सब ऐसे ऐसे किस्से गन्ने के खेत के सुनाती थी की गितवा का भी मन बौरा जाता था. कैसे सरसराते गन्ने के खेतों के बीच में हाथ पकड़ के खींच के ले गया,इतने ऊँचे गन्ने की दो हाथ दूर भी कोई हो पता न चले की कोई लड़की चोदी जा रही है, नीचे मिट्टी, ऊपर आसमान, ... चूतड़ से रगड़ रगड़ के मिटटी का ढेला चूर चूर हो जाता है,...





गीता का बहुत मन करता था किसी दिन अरविन्द के साथ, गन्ने के खेत में, दिन दहाड़े,...
 
भैया के मोटे गन्ने का मज़ा





बहुत मन करता था किसी दिन अरविन्द के साथ, गन्ने के खेत में, दिन दहाड़े,...

लेकिन सब ज्यादा किस्से सुनाती थीं चमेलिया और उसके टोले वाली वाली।

रोपनी के बाद से चमेलिया से गितवा की पक्की दोस्ती हो गयी थी, आखिर दोनों की झिल्ली अरविन्द ने फाड़ी थी,.. और उस टोली में फुलवा की ननदिया,... कुछ चमेलिया की साथ की,... और वो सब तो ऐसे ऐसे किस्से रोज सुनाती थीं की गीता की बुर लासा हो जाती थी कई तो इसमें दिन में दो तीन बार गन्ने के खेत में टांग फैला के, दिन में खेत काम करने जातीं तो कोई बबउआने वाला गन्ने के खेत में खींच लेता,





और शाम को किसी यार से मिलना होता तो, वो भी गन्ने के खेत में बुलाता और फिर दो बार से कम खूब रगड़ रगड़ के,...

और वो सब गीता को खूब उकसाती भी थीं,..

अरे जब तक दिन दहाड़े यार से गन्ने के खेत में न चुदवाया,... फिर तोहार तो यार भी है सगा भाई भी है तू तो एकदमे,...

और ये सब सुन के गीता की बिल में ऐसे मोटे मोटे चींटे काटते,... और जब से उसके भाई अरविन्द ने उसे आम की बाग़ में जबरदस्त खड़े खड़े चोदा था, तब से तो और,...

बस दो दिन बाद ही मौका मिल गया। माँ ने ही भेजा उसे,... गन्ने के खेत में और दस बार निहोरा भी किया, जल्दी कोई नहीं है लौटने की, आज बहुत दिन बाद थोड़ी धूप निकली है,... दो ढाई घंटे के बाद ही आना, थोड़ा घूम टहल के,... मैं भी तोहरे ग्वालिन भौजी के साथ बाजार जा रही हूँ, ढाई घंटे के बाद ही लौटूंगी।





बात ये थी की भाई उसका अरविन्द, सुबह मुंह अँधेरे निकल गया था खेत में कुछ काम था,... बिना कुछ खाये और तिझहरिया को ही लौटता,

तो माँ ने अरविन्द के के लिए ही खाना भेजा था, वैसे भी गाँव में काम के समय औरतें काम करने वालों के लिए दोपहर में कुछ कुछ ले कर जाती थीं। माँ ने गीता से दस बार कहा

तेरा भाई पागल है, उसे खाना देकर लौट आएगी तो वो काम के चक्कर में खाना भूल जाएगा और शाम को बर्तन लाना भी,... तो तू उसे अपने सामने, अपने हाथ से खिलाना,... और जब खा ले तो उसके बाद ही,... वैसे भी ढाई घंटे तक तो मैं भी नहीं हूँ।

बस गीता चल दी.

और अरविन्द वहीँ गन्ने के खेत में सामने ही मिल गया, धान के खेत से सटा जहाँ गीता दो दिन रोपनी के लिए गयी थी उसी खेत के पास, वही गन्ने का खेत जहाँ उसने फुलवा की ननदिया की फाड़ी थी,...





वही कुछ काम करने वालों को समझा रहा था,... और जो वो खेत में आता तो बस एक बनियान और छोटा सा लोवर पहन के, बस वही पहने,... सारी अखाड़े की कसरती मसल्स साफ़ साफ़ दिख रही थीं और गीता तो अपने मन की आँखों से लोवर के अंदर की मसल्स भी देख रही थी , पनिया रही थी.

आज गीता ने साड़ी एकदम कूल्हे के नीचे से और बहुत कस कस के बाँधी थी, जिससे उसके मटकते छोटे छोटे चूतड़ एकदम साफ़ दिख रहे थे, चोली तो दर्जिन भौजी ने सब ऐसी सिली थी की दोनों जोबना छलक के बाहर ही कूदते रहते थे, और ऊपर से गीता ने आँचल की बस एक रस्सी सी दोनों पहाड़ों के बीच , देख के ही अरविन्द की हालत खराब,... रोज ही तो अपनी बहना की चूँचियों को रगड़ता मसलता था, चूसता था, काटता था, फिर भी जब भी उन्हें चोली में बंद देखता था उसका हाथ खुजलाने लगता था,...





और आज तो रोज से भी ज्यादा मन कर रहा था बहन को पेलने का,...

ऊपर से गीता ने साफ़ साफ बोल दिया, ' मा ने बोला है की अपने सामने खिला के बर्तन ले आना और दो घंटे से पहले नहीं, वो भौजी के साथ बजार गयी हैं। "

बस, अरविन्द ने गीता का हाथ पकड़ा और बोला, चलो खेत में बैठ के खाते हैं और बहन का हाथ पकड़ के गन्ने के ऊँचे से खेत में धंस गया. गन्ने इतने ऊँचे की उनमें हाथी छुप जाए,...

अरविन्द ने अपनी बहन गीता का हाथ कस के पकड़ रखा था, और उसके हाथ को छूते ही गीता के बदन में एक सरसराहट सी दौड़ गयी, और बीस पच्चीस कदम भी वो अंदर नहीं घुसी होगी, उसने पीछे मुड़ के देखा,... और जहाँ से वो और अरविन्द अंदर घुसे थे, .. कुछ भी नहीं दिख रहा था सिर्फ गन्ने ऊँचे ऊँचे, अगल बगल भी कुछ नहीं, उनकी पत्तियां उसकी देह को सहरा रही थीं,रगड़ रही थी,

उसको चमेलिया की बात याद आ रही थी, गन्ने के खेतवा में घुसते खुदे मन करता है नाड़ा खोल दें, ढेरो किस्से जो गीता ने सुने थे अपनी सहेलियों से सब याद आ रहे थे, सोच सोच के उसकी बुर पनिया रही थी, बस,यही मन कर रहा था आज उसका भाई अरविन्द इसी खेत में उसे पटक कर चोद दे तो कल वो भी अपनी सहेलियों को किस्से सुनाएगी,...

और सौ डेढ़ सौ कदम अंदर घुसने के बाद, एक जगह दिखी जहाँ से लगता है २०-२५ गन्ने किसी ने तोड़ लिए हों,... थोड़ी सी खुली जगह, ... वहां पर गन्ने की सूखी पत्तियां, और मिट्टी,... अरविन्द कुछ सोचता, गीता ने झट पेटीकोट में खोंसी अपनी साड़ी खींच के उतार दी और वहीँ मिट्टी पे बिछाती हुयी बोली,

"ऐसे भैया बैठ और चल पहले चुप चाप खाना खा, आज मैंने बनाया है जैसा भी हो चुप चाप खा लेना और तारीफ़ भी करना। "

गीता अपनी सहेली की भौजी की बात कभी नहीं भूलती थी की पहल हमेशा लड़कियों को ही करनी पड़ती है वरना लड़के तो यही सोचते रहते हैं की बात की शुरआत कैसे करें,... और साड़ी इसलिए उसने खुद उतार दी।

पर उसका भाई अरविन्द भी कम खिलाड़ी नहीं था और उस दिन आम की बाग़ में चोदने में के बाद उस की धड़क खुल गयी थी, और इस गन्ने के खेत में उसने गाँव की दर्जनों लड़कियों की चोद के झिल्ली फाड़ी थी,...

उसने खींच के अपनी बहन को गोद में बिठा लिया। और गीता के नरम नरम चूतड़ों का टच पा के उसका खूंटा फनफनाने लगा,... और गीता भी कम बदमाश नहीं थी, वो अपने चूतड़ रगड़ रगड़ के और अरविन्द के मूसल को जगा रही थी। जैसे कुछ वो शरारत कर ही नहीं रही हो इस तरह से उसने खाने का डब्बा खोला और अपने हाथ से कौर बना के भाई के मुंह में और बोली,

" चुपचाप मेरे हाथ से खा लो, अपने हाथ से खा के हाथ गन्दा करोगे और फिर उसी हाथ से मुझे यहाँ वहां छुओगे। "

और जब गितवा ने खुद ही कह दिया, 'यहाँ वहां छुओगे' तो अरविन्द काहे रुकता।

गीता कभी अपने हाथ से कभी होंठों से उसे कौर खिलाती और अरविन्द के दोनों हाथ पहले तो चोली के ऊपर से बहन के जोबन का हाल चाल लेते रहते, फिर चोली उतर के जमीन पर बिखरी पसरी साड़ी के पास पहुंच गयी,... और बहन के दोनों उभार भाई के हाथों में,... क्या कस के रगड़ता मसलता था वो, कोई भी औरत पानी फेंक देती और गीता तो,...

उसकी भी बुर पनिया रही थी लेकिन वो अपने ढंग से बदला ले रही थी, चूतड़ों से कस कस के भाई के पगलाते मूसल को रगड़ रगड़ के,...

और भाई ने अगर उसकी चोली उतारी तो,... सावन से भादों दूबर,... उसने भी अरविन्द की बनियान उतार के फेंक दी, और अब भाई बहन दोनों टॉपलेस।

और अपनी छुटकी बहिनिया के छोटे जोबना देख के अरविन्द तो बौरा गया,... खाना तो कब का ख़त्म हो गया था अब तो ये रसमलाई खानी थी, और अरविन्द से ज्यादा उसका मोटा मूसल पागल हो गया, गन्ने के खेत में कुंवारी चढ़ती जवानी वाली बहन की कच्ची अमिया देख के कौन भाई काबू में रहता और अरविन्द तो अब तक पंचायती सांड़ हो चुका था.

बस कभी उसके दोनों हाथ कस कस के बहन की छोटी छोटी चूँचियों को रगड़ते मसलते तो कभी उन्हें वो पागल हो के काटता चूसता।

बहन, गीता अरविन्द से भी समझदार थी, तभी तो न उसने सिर्फ अपने हाथ और होंठ से खाना खिलाया उसे बल्कि साफ़ साफ़ बता भी दिया।

" अपने हाथ से खिला रही हूँ , इसलिए की तुम पहले तो अपना हाथ गन्दा करोगे, फिर उसी हाथ से जगह जगह छुओगे " और उन्ही साफ़ हाथों से उसका भइआ अरविन्द अपनी बहन पे हाथ साफ़ कर रहा था.

जोबन पे हाथ लगने से तो कोई भी लड़की पिघल जाती, और अगर भाई का हाथ बहन के जोबन पे पड़ जाए तो वो खुद नाड़ा खोल देगी, ... और वही हुआ, गीता ने न सिर्फ अपने पेटीकोट का नाड़ा खोला बल्कि भाई का भी लोवर सरका दिया और जिस मस्ती से भाई उसके जोबन को पकड़ रहा था उसी तरह बहन ने भैया के एकम तन्नाए खूंटे को पकड़ लिया और प्यार से दबाने मसलने लगी, कभी अंगूठे से सुपाड़े के बेस पे रगड़ती तो कभी हलके हलके मुठियाती,...

और अब भैया से नहीं रहा गया, इस गन्ने के खेत में उसने कितनी कुंवारियों की झिल्ली फाड़ी थी, हर दूसरे तीसरे किसी न की किसी को अपना मोटा गन्ना खिलाता था, लेकिन उससे अब रहा नहीं जा रहा था , पहली बार उसकी सगी बहन उसके नीचे,...

गप्प से उसने पहले एक ऊँगली बहन की बुर में पेल दी,... बुर एकदम मस्ती से लसलसा रही थी,... वो समझ गया जमीन जुताई के लिए तैयार है, इतनी नमी आ गयी है इसमें,... फिर भी घचाघच अरविन्द बहन की कसी बुर में ऊँगली पेल रहा था, थोड़ी देर में मस्ती से बहन पागल हो गयी खुद ही लंड के लिए चूतड़ उछालने लगी,

बहन की बुर भाई का लंड मांग रही थी, सिसक रही थी तड़प रही थी,...

और अरविन्द ने अबकी दूसरी ऊँगली भी पेल दी,

और गीता चीख उठी, उईईईईई ओह्ह्ह्ह नहीं,... कुछ मजे से ज्यादा दर्द से,... महीने भर से उसकी बुर भाई का लंड खा रही थी लेकिन तब भी एक दम कसी टाइट थी, लेकिन अरविन्द जानता था की उसका लंड तो इतना मोटा है, गितवा की कलाई से भी ज्यादा, चार चार बच्चों की माँ, पक्की भोंसड़ी वालियां जो सैकड़ों लंड खा चुकी थी होती हैं वो भी पसीना छोड़ देती हैं और ये बेचारी तो अभी जवानी की चौखट डांक ही रही है,... इसलिए पूरी दो ऊँगली अंदर तक और देर तक गोल गोल,...

उसकी बहन की बुर अब एकदम गीली हो गयी थी, बुरी तरह पनिया रही थी, बीच बीच में बुर में घुसी ऊँगली की नक्लस से वो प्रेम गली के अंदर की नर्व्स को रगड़ के छेड़ छेड़ के बहन को पागल कर रहा था,...

आज गीता पहली बार गन्ने के खेत का मजा ले रही थी,... बस उसका यही मन कर रहा था की बस अब भैया पेल दे, टांग उठा के,
 
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