इन्सेस्ट रिश्ता - Page 4 - SexBaba
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इन्सेस्ट रिश्ता

अपडेट 13



रुचिका मेरी तरफ देखने लगी तू मैंने उसे कहा की जो पसंद है ले लो. उसने कुछ नहीं लिया तू बहार आकर पूछने पर उसने कहा "आप मुझे बाद में ले देना, अभी कॉलेज जल्दी जाना है और दूसरा माँ को क्या बताउंगी" मैंने उसे कुछ न कहते हुए बाइक से कॉलेज छोड़ दिया. वो तू चली गयी लेकिन मोहनलाल के दिल में खलबली मचा गयी.

मोहनलाल वहां से जाने लगा लेकिन आज उसका मन बहुत विचलित था और उसका दिल कह रहा था की काश थोड़ा वक़्त और मिल जाता रुचिका के साथ गुजरने के लिए. लेकिन ये मुमकिन नहीं था और भरी मन से वह घर की तरफ चल पड़ा.

घर पहुँच कर संध्या ने पूछा "क्या बात है बहुत देर लगा दी" तो उसके जवाब में मोहनलाल ने कहा की "संध्या के लिए गहने लेने चला गया था और लेकर उसे कॉलेज में दे कर आया हूँ"

संध्या बात जानकार बहुत ख़ुशी हुई चलो एक काम तो निपटा और उससे ख़ुशी इस बात की थी की उसकी बेटी आज अच्छी लगेगी. उसके बाद वो जाकर मोहनलाल के लिए चाय लेकर आई तू मोहनलाल अपनी सोचो में गम थे और अपने आप से लड़ रहे थे की संध्या के चाय लेन से उनकी तन्द्रा भांग हुई और जब चाय देने के लिए वो झुकी तू उसका पल्लू सरक गया तू मोहनलाल के मन में आने लगा की वो कैसे अपनी बीवी को उस दर्द से छुटकारा दिलवाये तू उसने बड़े प्यार से उससे अपने पास बैठा लिया और उसको कहा की वो भी अपनी चाय ले आये और साथ में बैठ कर पिए.

संध्या बहाना करने लगी लेकिन मोहनलाल की ज़िद के सामने उसकी एक न चली और वो भी चाय लेकर आ गयी. दोनों चाय पिने लगे तू मोहनलाल उससे बड़े hi प्यार से बात करने लगा और उसको अपनी चिकनी चुपड़ी बातों में फंसा कर कह रहा था की वो उसके साथ डॉक्टर के पास चलकर पता कर ले की कोई बीमारी है तू उसका इलाज करवा लेते हैं.

संध्या उससे कहने लगी की उससे डॉक्टर के पास जाने में दर लगता है की अगर कुछ बड़ी बीमारी हुई तू फिर उसको हॉस्पिटल में एडमिट होना पड़ेगा और उसके बच्चों का ख्याल कौन करेगा.

मोहनलाल ने अपने एक हाथ को उसके कंधे पर रखकर कहा "तुम ऐसे hi चिंता कर रही हो, एक बार डॉक्टर को दिखा कर अपने दर को ख़तम कर लो", संध्या ने कहा "अगर कुछ बड़ी बात हुई तू".

मोहनलाल ने उसकी गर्दन के पीछे से हाथ निकलकर उसके कंधे को पकड़ कर अपने आगोश में लेते हुए उसके माथे को चूमकर उससे कहा "देखो जब तक हम दिखाएंगे नहीं तू हमें पता कैसे लगेगा की बात छोटी है या बड़ी, और चलो मैं एक मिनट के लिए मान लेते हैं की बात बड़ी है, जिसके लिए मेरा दिल नहीं मंटा फिर भी अगर बड़ी है तू उसका इलाज करवाएंगे और आजकल तू हर बीमारी का इलाज है"

संध्या भी उसकी बात सुनकर भावुक हो गयी और अपने चेहरे को मोहनलाल के कंधे पर रखकर आने लगी ,"अगर कुछ बड़ा हुआ तू मेरे बाद मेरे बच्चों का क्या होगा"

मोहनलाल: (उसके कंधे को सलहाते हुए) तुम तो बगैर कुछ जाने इतनी बड़ी बात बोल रही हो, हो सकता है की कुछ हो hi न और तुमने पता नहीं क्या क्या सोच लिया

संध्या: और कुछ हुआ तो

मोहनलाल: तो उसका इलाज करेंगे

संध्या: इलाज के लिए ऐसे कहाँ से आएँगे

मोहनलाल: तुम पैसों की चिंता क्यों कर रही हो और दूसरी बात यह मन कर क्यों चल रही हो की तुम्हें कोई बहुत बड़ी बीमारी हो गई है

संध्या: मुझे ऐसा लग रहा है

मोहनलाल: मैं तुम्हारी अब कुछ नहीं सुनूंगा और चलो तैयार हो जाओ तुम्हें डॉक्टर पास ले चल रहा हूँ

संध्या: फिर बच्चों का क्या होगा

मोहनलाल: अब बच्चे बच्चे नहीं रहे वह बड़े हो गए हैं (उसकी आँखों में रुचिका का अकास उभर आया)

संध्या: फिर भी

मोहनलाल: तुम नहीं चाहती की तुम नार्मल लाइफ जिओ और जिंदगी को एन्जॉय करो

संध्या: मैं क्यों नहीं चाहूंगी मुझे मालूम है की मैं मैं आपको पिछले कई सैलून से सुख नहीं दे पायी हूँ. मैं तो चाहूंगी की आपको पूरा सुख दूँ लेकिन मन में एक अजीब सा दर है

मोहनलाल: (उसके गालो को सहलाते हुए और उसके होठों पैर अपने अंगूठे से मलते हुए) बाकि बातें छोडो और चलो डॉक्टर के पास

संध्या मोहनलाल की बात मानकर तैयार होकर आ गई और वह दोनों बाइक पैर यह बैठकर डॉक्टर के पास जाने लगे तू आज मोहनलाल को फील हुआ की जैसे पीछे संध्या नहीं रुचिका बैठी हो.

वो दोनों डॉक्टर के पास पंहुच गए तू वंहा 2 पेशेंट्स पहले से वेट कर रहे थे, उनका नंबर आने पर वो अंदर गए तू डॉक्टर से बात की और फिर वो संध्या को एग्जामिनेशन रूम में ले गयी और मोहनलाल को बहार भेज दिया. 30 मिनट बाद मोहनलाल को बुलाया गया तू डॉक्टर जो एक अधेड़ उम्र की महिला थी उसने कहा "मैंने अच्छी तरह से चेक कर लिया है और जयादा घबराने की बात नहीं है, हाँ थोड़ा इलाज लम्बा चल सकता है, मैंने साडी बातें संध्या को समझा दी हैं और थोड़ी बातें मुझे तुम से अकेले में करनी हैं इसलिए संध्या तुम बहार इंतज़ार करो"

संध्या के बहार जाने पर डॉक्टर ने कहा की "देखो उसको योनि की जो मसल्स हैं वो इंटरकोर्स के वक़्त टाइट हो जाती हैं जिसका कारन जानना इतना आसान नहीं होता, कई बार ये प्रॉब्लम टेम्पररी होती है और कई बार बहुत लम्बे वक़्त तक चलती है और ऐसे वक़्त में तुम्हे उसके साथ जबरदस्ती नहीं करनी और उसे ये भी नहीं लग्न चाहिए की तुम इस वजह से उससे दूर हो रहे हो. सेक्स की जरुरत तुम्हारी भी है और उसकी भी है, इंटरकोर्स नहीं करना है जब तक वो ठीक न हो जाये, लेकिन दूसरे तरीकों से उसको रिलैक्स फील करवाना जरुरी है, नहीं तू बीमारी बाद जाएगी. तुम्हे कितना भी गुस्सा आ रहा हो या मूड ख़राब हो लेकिन उसके सामने कभी भी मत दिखाना क्यु उसका सीधा असर उसकी मनोदशा पर पड़ेगा और बीमारी ठीक होने की बजाये बढ़ जाएगी"

मोहनलाल: मैंने तू कभी भी उससे गुस्सा नहीं किया है फिर उसका इस तरह से बेहवे करना.

डॉक्टर: देखो जैसा की मैंने पहले भी कहा है की इस बीमारी का ठीक से बता पाना की क्योँ शुरू हुई बहुत मुश्किल है, लेकिन इसके कई कारन हो सकते है जैसे

1. किसी बात का दर

2. बचपन में घाटी कोई घटना

3. बच्चे के जनम के बाद योनि की मसल्स का कुछ जयादा सिकुड़ना

4.अर्ली मीनोपॉज

5. एंग्जायटी

6. साइकोलॉजिकल

और भी बहुत कुछ है, लेकिन इस बीमारी को दूर करने के लिए संयम की जरुरत है.

फिर डॉक्टर ने संध्या को बुलाकर इन दोनों की काउन्सलिंग की और कुछ खाने की दवाइयन और एक्सरसाइज बताई और हमेशा खुश रहने के लिए कहा. उसने कुछ टेस्ट्स भी बताये लेकिन ये कहा की 3 महीने लगातार दवाई खाने के बाद करना.

उसने सबसे जयादा जरुरी बात बताई की 'तुम दोनों में असली प्रेम की जरुरत है जो शारीरिक तू हो लेकिन बिना सहवास के और संयम रखे'

वंहा से निकलने के बाद घर पंहुच कर संध्या परेशान होने लगी और कहने लगी 'मैं अब आपके लायक नहीं रही और आपको पत्नी का सुख भी नहीं दे पाऊँगी'

मोहनलाल: (उसको अपने आगोश में लेते हुए और उसके माथे को चूमते हुए) तुम बिलकुल भी इस बारे में मत सोचो, मैंने कभी भी तुम से इस बारे में शिकायत की है ? देखो अब तू तुम्हे खुश होना चाहिए की तुम्हे कोई बहुत बड़ी बीमारी नहीं है. ये तू ठीक हो जाएगी, थोड़ा वक़्त लगेगा, इंतज़ार कर लेंगे.

संध्या: (सुबकते हुए) मैं आपको सुख नहीं दे सकती, आप दूसरी शादी कर लीजिये

मोहनलाल: तुम तू बिना बात के परेशान हो रही हो, सहवास hi तू नहीं कर सकते बाकि सब कुछ तू कर सकते हैं और वो भी कुछ वक़्त के लिए, तुम जब ठीक हो जाओगी तू फिर कर लेंगे.

संध्या: तब तक मैं बूढी हो जाउंगी और आपके किसी काम की नहीं रहूगी.

मोहनलाल: पहली बात तू तुम्हे बूढ़ा होने में बहुत वक़्त है, दूसरा कुछ वक़्त में तुम ठीक हो जाओगी. तुम तू अभी रुचिका की बड़ी बेहेन लगाती हो न की माँ

संध्या: (मुस्कराते हुए) जब भी मौका मिलता है छेड़ने लगते हो

मोहनलाल उसकी बात सुनकर संध्या को कास कर पकड़ लेता है और उसके रसभरे होंठों को अपने होंठों में जकड लेता है और धीरे धीरे चूसने लगता है और संध्या भी उससे सपोर्ट करने लगती है और दोनों धीरे धीरे एक दूसरे के शरीर को फील करने लगते हैं, परन्तु मोहनलाल अपने मन पर नियंत्रण करते हुए उससे आराम से बैठा देता है और कहता है 'तुम बहुत अच्छी हो'

संध्या शर्माने लगाती है और फिर किचन से कुछ खाने का लेकर आती है और दोनों बड़े प्यार से एक दूसरे को चढ़ते हुए खाना कहते रहे.

फिर संध्या ने मोहनलाल को रुचिका को लेन के लिए कहा तू मोहनलाल बाइक लेकर रुचिका को लेने चला गया.

मोहनलाल जब रुचिका को लेने पंहुचा तू फंक्शन ख़तम हो चूका था और वो कॉलेज के बहार बस स्टैंड पर वेट कर रही थी. उसके साथ उसकी एक सहेली भी वही वेट कर रही थी और दोनों hi थोड़ा घबराई हुई थी.

जब वो उससे लेने पंहुचा तू फंक्शन ख़तम हो चूका था और रुचिका कॉलेज के बहार बस स्टैंड पर वेट कर रही थी. उसके साथ उसकी एक सहेली भी वही वेट कर रही थी और दोनों hi थोड़ा घबराई हुई थी.

उनको उस तरह देखकर मोहनलाल ने पूछा की क्या हुआ तू उसने जवाब में इतना hi कहा "जल्दी चलो"

मोहनलाल ने कहा बैठो तू वो दोनों hi मेरे पीछे बाइक पर बैठ गयी. अब सीट की लमबी काम होने की वजह से मुझे थोड़ा आगे होना पड़ा लेकिन फिर भी रुचिका मुझसे बिलकुल सात गयी क्योँकि उसकी सहेली उसके पीछे बैठी थी. उसके सटने से रुचिका की चूचियां मोहनलाल की पीठ से दबने लगी जो की बहुत hi नरम और मुलायम लग रही थी. उसका इस तरह का स्पर्श उससे एक अजीब सी फीलिंग दे रहा था, लेकिन उसका दिमाग़ कह रहा था की ये क्या सोच रहा है वो तेरी बेटी है. अभी दिल और दिमाग में लड़ाई चल रही थी कुछ ऐसा हुआ जिससे मोहनलाल को एकदम से बाइक रोकनी पड़ी और जो कुछ हुआ उससे सोचकर मोहनलाल की आँख खुल गयी
 
थैंक्स फॉर रीडिंग, लिकिंग एंड कमेंटिंग.

फ्लैशबैक और प्रेजेंट साथ साथ चलेंगे.

जल्दी ख़तम करने में कोई प्रॉब्लम नहीं है लेकिन फिर आप लोग प्रश्न करोगे तू वापिस फ्लैशबैक में जाना पड़ेगा.

मेरी कोशिश है की आप को काम से काम प्रश्न पूछने पड़े.

बाकि जैसा आप लोग कहेंगे वैसा hi होगा.

रेस्पोंद अर्ली एंड स्टे कनेक्टेड

थैंक्स
 
अपडेट 14



मोहनलाल ने कहा बैठो तू वो दोनों hi मेरे पीछे बाइक पर बैठ गयी. अब सीट की लमबी काम होने की वजह से मुझे थोड़ा आगे होना पड़ा लेकिन फिर भी रुचिका मुझसे बिलकुल सात गयी क्योँकि उसकी सहेली उसके पीछे बैठी थी. उसके सटने से रुचिका की चूचियां मोहनलाल की पीठ से दबने लगी जो की बहुत hi नरम और मुलायम लग रही थी. उसका इस तरह का स्पर्श उससे एक अजीब सी फीलिंग दे रहा था, लेकिन उसका दिमाग़ कह रहा था की ये क्या सोच रहा है वो तेरी बेटी है. अभी दिल और दिमाग में लड़ाई चल रही थी कुछ ऐसा हुआ जिससे मोहनलाल को एकदम से बाइक रोकनी पड़ी और जो कुछ हुआ उससे सोचकर मोहनलाल आँख खुल गयी.

मोहनलाल को वो दृश्ये आज भी याद था और उस को सोचकर उसे पसीना आ गया.

एक जीप पीछे से तेजी से आयी और उसमे बैठे एक लड़के ने रुचिका की सहेली को उसकी पीठ पर कुछ मारा जिससे वो बाइक से गिरने लगी और बाइक को तेज़ झटका लगा और बाइक का बैलेंस बिगड़ गया तू मोहनलाल ने बाइक को सड़क के किनारे गद्दे में जाने से बचने के लिए ब्रेक मार दी लेकिन रुचिका इस सब में बहुत दर गयी और चीख मार कर मोहनलाल को कास कर पकड़ लिया.

जीप ने बाइक से आगे निकल कर रास्ता रोक लिया और उसमें से कोई 4 हेट कुत्ते लड़के निकले और बाइक के पास आने लगे. रुचिका की सहेली (सीमा) बाइक से नीचे उतर गयी और चोट लगने से उसकी पीठ पर बहुत दर्द हो रहा था और उसकी आँखों से आंसू बहे रहे थे और वो बहुत दरी हुई थी. मोहनलाल ने रुचिका को भी नीचे उतरने के लिए कहा लेकिन वो दर के मरे उत्तर नहीं रही थी तू उसने उससे बड़े प्यार से कहा की डरने की जरुरत नहीं है. वो उत्तर गयी और मोहनलाल भी, लेकिन रुचिका उससे छोड़ने को तैयार नहीं थी. मोहनलाल ने उसे उसकी सहेली को सँभालने के लिए कहा और वो आगे जाकर उन लड़को के पास पंहुचा.

मोहनलाल ने पूछा की क्या बात है तो उसमें से एक लड़का ने रुचिका की सहेली की तरफ हाथ से इषारा किया और बोलै "इस छमिया को यंहा छोड़ और तू निकल"

मोहनलाल को उसकी बात सुनकर बहुत गुस्सा आया और उसने कहा की लड़की तू उसके साथ hi जाएगी.

मोहनलाल की बात सुनकर उस लड़के ने कहा "अबे तुझे समझ नहीं ा रही, कहीं ऐसा न हो की तू अपने हाथ पेअर से सही सलामत hi न रहे, यह तो मैंने तुझे शराफत से कहा था एक लड़की को छोड़ और तू जा, अगर तू नहीं गया तो तेरे लिए अच्छा नहीं होगा'

मोहनलाल का इतना सुन्ना था की उसका गुस्सा बहुत बढ़ गया और वो उसके मुंह पैर एक मुक्का मार देता है और तब उसके दो साथियों ने दूसरी तरफ से जाकर रुचिका और उसकी सहेली को पकड़ लिया.

मोहनलाल ने देखा तू उसका खून खोलना लगा क्योँकि वो लड़के उन दोनों के साथ बदतमीज़ी कर रहे थे जिससे उसका पारा सातवे आसमान पर जाने लगा लेकिन उसने अपने आप को शांत रखा हुआ था क्योँकि उससे उन दोनों लड़कियों को पहले बचाना था बाकि सब बाद में.

तभी उन में से एक ने रुचिका को अपनी और खींचते हुए बोलै, “छमिया उस लौंडे से क्या चिपक रही थी, आ जा रानी जो तुझे चाहिए वो तो हमारे पास भी है.” और सब हसने लगे. मुझे गुस्सा आया और उन्हें गाली देते हुए कहा की बकवास बंद करो नहीं तो अच्छा नहीं होगा. वो चारों कहने लगे, “मुन्ना अच्छा तो अब तुम लोगों के साथ नहीं होगा, पहले तू हम एक लड़की को ले जा रहे थे, लेकिन ये दूसरी तू और भी कड़क है, आज इन दोनों के साथ रात भर मज़े करेंगे और अगर तू अपनी जान की सलामती चाहता है तू जल्दी से भाग यंहा से, नहीं तू अभी तेरा किर्या करम कर देंगे (उन लड़कों के सरदार ने एक बड़ा सा चाकू निकल लिया"

मोहनलाल ने कहा "ठीक है जो तुम्हे करना है करो लेकिन मुझे तू जाने दो"

इन लड़को का सरदार जिसको मुक्का मारा था उसने कहा "तू जायेगा तू सही लेकिन पहले उस मुक्के का हिसाब तू करना पड़ेगा न" ये कह कर वो मोहनलाल की तरफ आने लगा और अब वो थोड़ा लापरवाह लग रहा था और चाकू को अपनी पॉकेट में रखते हुए मोहनलाल की तरफ मुक्का मारा लेकिन मोहनलाल इस के लिए तैयार था और उसने मुक्के वाले हाथ को पकड़ कर हाथ मरोड़ दिया और उसकी गर्दन को अपनी बाज़ू में कैद कर लिया जिससे वो छूट न पाए.

मोहनलाल ने उन लड़को से कहा की "लड़कियों को छोड़ दो नहीं तू तुम्हारे सरदार की गर्दन मरोड़ दूंगा". वे दर गए लेकिन हिम्मत दिखते हुए बोले "अबे नहीं छोड़ेंगे"

तब मोहनलाल ने सरदार की जेब से चाकू निकल कर उनकी तरफ लहराते हुए कहा छोड़ दे नहीं तू उदा दूंगा इस की गर्दन. सरदार को इस तरह फास्ट देख उनोहोने लड़कियों को छूने के लिए मान लिया लेकिन साथ hi सरदार को छोड़ने के लिए कहने लगे तू ये तय हुआ की वो लड़कियों को छोड़ेंगे और मोहनलाल उनके सरदार को.

हुआ भी ऐसा hi और लडकियां डरकर मोहनलाल के पीछे आ गयी और उससे चिपक गयी. मोहनलाल ने उन लड़को से कहा निकल जाओ यंहा से नहीं तू अच्छा नहीं होगा. पता नहीं कैसे उनमे से एक लड़का एक डंडा अपने हाथ में ले आया और चाकू वाले हाथ पर मार दिया तू चाकू छिटक कर दूर जा गिरा और हाथ में दर्द की तेज लहार दौड़ गयी, लेकिन मोहनलाल ने अपने को संयमित करते हुए एक किक मार दी जिससे वो लड़का दूर जा गिरा और उन्हें चेतावनी देते हुए कहा की भाग जाओ.

पता नहीं बाकि तीनो ने क्या आपस में इषारा किया की वो सब िक्खत्ते होकर मोहनलाल पर कूद पड़े तू मोहनलाल ने उनके वार से बचते हुए एक को लात और दूसरे को मुक्का मार दिया तू तीसरे ने मोहनलाल के पेट में मार दिया. फिर क्या था मोहनलाल ने अपना गुस्सा उन तीनो पर खूब निकला लेकिन इस बीच में एक लड़का नज़र बचाकर लड़कियों के पास पंहुच कर उन्हें पकड़ लिया तू वो चिल्लाई.

मोहनलाल ने उनके चिल्लानी की आवाज़ सुनकर उस पर छलांग लगा दी लेकिन इस से हुआ ये की मोहनलाल उससे लेते हुए उन लड़कियों से दूर हो गया परन्तु बाकि के दो लड़के लड़कियों के पास पंहुच कर उन दोनों के कपडे खींचने लगे जिससे कपडे कुछ हद तक फैट गए.

जब मोहनलाल ने ये देखा तू उस पर बहुत सवार हो गया और उन लड़को को अपनी लात घूंसो पर रख दिया और उन सब को खूब मारा और इतना मारा की वो सब अधमरी हालत में हो गए और पुलिस को इन्फॉर्म करने लगा तू वो उसके पाँव पकड़ने लगे.

तब उसने पूछा की क्योँ तुम इस लड़की के पीछे पड़ा था तू उसने बताया की इस लड़की ने उसकी गांव में बेइज़्ज़ती की थी तू उसका बदला लेने के लिए ये सब किया. मोहनलाल ने उन्हें चेतावनी देकर वंहा से भगा दिया की आइंदा इस के आसपास भी नज़र आया तू घर में घुस कर मरूंगा. उन्होंने सीमा को वचन दिया की वो आगे से उसके आस पास भी नहीं फटकेंगे.

उनके जाने के बाद वो दोनों लडकियां जो अब तक खूब दरी हुई थी थोड़ी उनकी जान में जान आयी लेकिन इन दोनों के कपडे फटने से उनके उभारों का काफी हिस्सा नग्न हो गया था और इस हालत में उन्हें घर ले जाना ठीक नहीं था तू मैं उन्हें बाइक पर बैठा कर एक अच्छी जगह पर बाइक रोककर दुकान पर फ़ोन करके अपने एक साथी को दो रेडीमेड सूट और दो चादर लेन के लिए बोलै और जगह बताई की जल्दी से ले आये. लड़कियों को एक बड़े से पेड़ के पीछे छुपने के लिए कह दिया.

जब वो कपडे और चादर दे गया तू मोहनलाल ने उसे धन्यवाद् कह कर भेज दिया और लड़कियों को वो कपडे देकर कहा की चादर भांधकर कपडे बदल लो तू उनकी जान में जान आयी.

जब वो दोनों नए सूट पहनकर आयी तू khaàskar रुचिका उस सूट में बहुत खूबसूरत लग रही थी. उसने इस तरह का सूट पहली बार पहना था जिसमे उसके शरीर के कटाव बिलकुल नज़र आ रहे थे. सीमा भी बहुत खूबसूरत थी लेकिन मोहनलाल की नज़र तू रुचिका पर से हैट hi नहीं रही थी.

सीमा: क्या बात है जीजा जी, रुचिका कंही भागी नहीं जा रही है.

मोहनलाल: जीजा जी !

सीमा: आप मेरी सहेली के बॉयफ्रेंड हो तू मेरे जीजा जी हुए न

रुचिका: क्या बक रही है, तू जानती भी है की ये कौन हैं

सीमा: तेरा बॉयफ्रेंड है और कौन

रुचिका: कुछ भी बाके जा रही है

सीमा: अगर तू नहीं बटेगी तू पता नहीं चलेगा की ये तेरा बॉयफ्रेंड है

रुचिका: ये मेरे बॉयफ्रेंड नहीं हैं

सीमा: क्या बात है, तुझे छोड़ने और लेने आता हैं और आज तू तेरे लिए बड़े अच्छे गहने भी लेकर आया है.

रुचिका: बस कर, ये मेरे बॉयफ्रेंड नहीं हैं

सीमा: अगर ऐसी बात है तू मैं इससे अपना बॉयफ्रेंड बना लेती हु

रुचिका: तुझे कुछ शर्म भी है, जो मन में आता है बाके जा रही है.

सीमा: ऐसा मैंने क्या कह दिया, अगर ये तेरा बॉयफ्रेंड है तू ठीक है और नहीं है तब मैं अपना नंबर लगाउंगी और इस हैंडसम और स्मार्ट शक्श को अपना बॉयफ्रेंड बना लुंगी

रुचिका: (चिल्लाते हुए) ये मेरे पापा हैं

सीमा: ha...ha...ha..ha...ha...

ये तेरे पापा हैं, मज़ाक अच्छा है. तेरी और इनकी उम्र ऑलमोस्ट बराबर होगी, हाँ थोड़ा बहुत बड़ा होगा, लेकिन पापा बनने लायक तू नहीं है

रुचिका: ये सच में मेरे पापा हैं

सीमा: Ha...ha...ha...ha.....

समझ गयी ये तेरे

पर्सनल एंड साइकोलॉजिकल अदमीरेर

(पापा) हैं
 
अपडेट 15



रुचिका: ये सच में मेरे पापा हैं

सीमा: Ha...ha...ha...ha.....

समझ गयी ये तेरे

पर्सनल एंड साइकोलॉजिकल अदमीरेर

(पापा) हैं

रुचिका: हे इस माय फादर

सीमा: Don't जोके, it's नॉट पॉसिबल.

रुचिका: यार तुम मेरी बात मान क्योँ नहीं रही हो

सीमा: तुम बाकियों से झूठ बोलो, लेकिन मैं तुम्हारी सबसे पक्की सहेली हु, तब भी मुझसे छुपाओगी. मानती हु की तूने अपने बॉयफ्रेंड को दुसरो से छुपाने के लिए उसे पापा बना दिया

रुचिका: वो सच्ची में मेरे पापा हैं, तुम मान क्योँ नहीं रही हो

सीमा: ठीक है मान लेती हु, मतलब की ये शक्श तेरा बॉयफ्रेंड नहीं है

रुचिका: हाँ

सीमा: तब तू मेरी लाइन क्लियर है, अब मैं इनको अपना बॉयफ्रेंड बनूँगी

रुचिका: वो मेरे पापा हैं

सीमा: मुझे उससे भी कोई प्रॉब्लम नहीं है, अगर ये तेरे फादर भी हैं तू क्या हुआ, मेरे बॉयफ्रेंड तू बन hi सकते हैं

रुचिका: कुछ भी बाके जा रही है

सीमा: जरा सोच ऐसा जवान मर्द कान्हा मिलेगा जो औरतो की रक्षा के लिए अपनी जान जोखम में दाल दे, मैं तू सच में इन् पर फ़िदा हो गयी हु

रुचिका: भगवन के लिए बस कर

मोहनलाल जो काफी देर से चुपचाप इन् दोनों की गुफ्तगू का मज़ा ले रहा था तू उसने कहा "तुम दोनों ठीक हो न, कोई चोट तू नहीं लगी. अगर लगी हो तू पहले डॉक्टर के पास चलें, नहीं मैं तुम लोगों को छोड़ देता हु.

सीमा: मुझे तू मामूली खरंच आयी है, जिसपर मैं घर जाकर दवाई लगा लुंगी. लगता है रुचिका को गहरी चोट आयी है.

रुचिका: नहीं नहीं मैं भी ठीक हु, थोड़ी बहुत चोट लगी है, ठीक हो जाएगी.

मोहनलाल: तू चलो, फिर बैठो

और फिर वो दोनों मोहनलाल के पीछे बाइक पर बैठ गयी तू मोहनलाल ने बाइक को आगे बढ़ा दिया. रुचिका के उभारों का मोहनलाल की पीठ पर दबने से मोहनलाल की भावनाएं फिर से भड़काने लगी, लेकिन कुछ न बोलते हुए बाइक को आगे बढ़ा दिया.

थोड़ी देर के बाद रुचिका ने मोहनलाल को बाइक रोकने के लिए कहा तू उसने बाइक को रोका और सीमा ने बाइक से उत्तरकार मोहनलाल को हाथ जोड़कर थैंक्स कहा और ये भी कहा की "आपने आज मेरी जिंदगी बचायी है, मैं ापनका कर्ज कभी भी नहीं चूका पाऊँगी" ये कहते हुए उसकी आँखों में आंसू थे.

मोहनलाल ने उससे कहा की "ये तू मेरा फ़र्ज़ था, अगर मैं तुम लोगों को नहीं बचता तू ये मे लिए दुब मरने जैसी बात थी, इसलिए अपने मन पर कोई भी भोज न रखो और हंसी ख़ुशी ऐसे घर जाओ की जैसे कुछ हुआ hi न हो"

सीमा ने एक बार फिर थैंक्स कहा और रुचिका को कहा 'पापा' तुम्हे मुबारक हो. वो उससे चढ़ कर हँसते हुए चली गयी. उसकी बात सुनकर रुचिका तू असमंजस की स्थिति में आ गयी और मोहनलाल ने बाइक को आगे बढ़ा दिया. कुछ देर के बाद

रुचिका: पापा, आप सीमा की बातों का बुरा न मन्ना, वो बातूनी है, लेकिन दिल की बहुत अच्छी है.

मोहनलाल: (उसकी बातो पर धयान न देते हुए) ये बताओ अपनी माँ को क्या बाँटोगी

रुचिका: उनको बता दूंगी की कैसे लड़ाई हुई और कपडे फटने की वजह से ये कपडे बदले हैं

मोहनलाल: तुम्हे आगे पढाई करनी है या अब से घर बैठना है.

रुचिका: मुझे तू पढाई करनी है और बाहर साड़ी पढाई करनी है

मोहनलाल: तू अपनी माँ को लड़ाई के बारे में बिलकुल न बताना, नहीं तू वो दर जाएँगी और तुम्हारा घर से निकलना बंद हो जायेगा, फिर पढाई लिखे तू भूल hi जाओ.

रुचिका: पापा मैं कभी माँ से झूठ नहीं बोलती, उन्हें सब बता देती हु.

मोहनलाल: ये तू अच्छी बात है और मैं ये नही कह रहा हु की न बताओ लेकिन आज नहीं बल्कि कुछ सालो बाद जब तुम पढ़ लिख कर किसी काबिल हो जाओ तू बता देना और साथ में ये भी कह देना की मेरी वजह से नहीं बताई थी.

रुचिका: मेरा मन तू नहीं मान रहा है

मोहनलाल: सोच लो मैं तुम्हे इसके आगे कुछ नहीं कहुगा, जो तुम्हारा फैसला होगा मैं उसके साथ हु

रुचिका: आप सही कह रहे हो की माँ को लड़ाई का पता चलने पर वो मुझे कभी भी घर से बहार नहीं निकलने देंगी, इसलिए आप hi बताओ की मैं क्या कान्हू.

मोहनलाल: एक काम करो, अपनी माँ को कहना की तुम्हारी सहेली को तुम्हारी ड्रेस पसंद आ गयी थी तू तुमने उससे दे दी और तुमने उसके कपडे पहन लिए.

रुचिका को मोहनलाल की बात पसंद आयी और फिर दोनों घर आ गए तू संध्या ने सबसे पहले डेरेस के बारे में पूछा तू रुचिका ने उसी जवाब से संध्या को शांत कर दिया और फिर उसने रुचिका के गहनों की तरफ भी देखकर उनकी टैरिफ की.

अभी वो इन्ही सोचो में बैठा हुआ था की उसे किचन से खतरनपटर की आवाज़ आयी जिसे सुनकर वो बहार आया तू देखा की दिन होने वाला है और संध्या सुबह की चाय और नाश्ता बना रही थी, जब उसने मोहनलाल को देखा तू

संध्या: आप उठ गए, मैं तू आपको उठाने आने वाली थी

मोहनलाल: हाँ, जल्दी जाना हैं न

संध्या: आप चलो मैं चाय लेकर आती हु और रूचि को भी उठा देती हु

मोहनलाल अपने कमरे में आ जाता है और फ्रेश होने लगता है, संध्या भी चाय लेकर आ जाती है. मोहनलाल रुचिका के बारे में पूछता है तू वो बताती है की वो भी उठ गयी है.

संध्या: क्या आपका विदेश जाना जरुरी है

मोहनलाल: जरुरी नहीं होता तू मैं क्यों जाता, लेकिन तुम कैसे रहोगी.

संध्या: रह लुंगी, वैसे भी अब बच्चे बड़े हो गए हैं, रुचिका तू जा रही है, आदित्य की भी पढाई पूरी होने वाली है, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है.

मोहनलाल: तुम मेरे साथ चलो न

संध्या: अभी तू आप जाओ, मैं कैसे जा पाऊँगी, मेरे पास तू पासपोर्ट भी नहीं है. न hi मुझे अंग्रेजी आती है, कंही गम हो गयी तू वापिस भी नहीं आ पाऊँगी. आप को hi मुबारक हो विदेश यात्रा, मैं यही खुश हु

मोहनलाल: मैं तू पता नहीं कब से कह रहा हु की अंग्रेजी सीख लो, दंसवी भी कर लो, नहीं तुम तू मेरी बात मानती hi नहीं हो.

संध्या: अब मैं इस उम्र में कान्हा से ये सब करू

मोहनलाल: कान्हा से उम्र हो गयी है, अच्छी खासी जवान हो और आजकल की लड़कियों को मात दे सकती हो, अगर तुम कॉलेज चली जाओ तू कोई पहचान नहीं सकता की तुम उनसे बड़े बच्चों की माँ हो, वो सब तुम्हे हम उम्र hi कहेगे

संध्या: क्या सुबह सुबह hi छेड़ने लगे

मोहनलाल: मैंने तू वही कहा है जैसा तुम दिखती हो

संध्या: क्या बात करते हो चला तू जाता hi नहीं, घुटनो में दर्द रहता है और आप कहते हो की मैं जवान हु

मोहनलाल: ये दर्द तू तुम्हारी खुद की वजह से है, तुम पता नहीं क्यों जान बुझ कर ठीक होना hi नहीं चाहती, जब देखो एक दिन दवाई खाई नहीं की शुरू हो जाती हो की मुझे चाकर आते हैं, जी मिचलाता है और पता नहीं क्या क्या. डॉक्टर ने कहा था की तीन महीने लगातार दवाई कहानी हैं और तुमने खाई नहितु टेस्ट भी नहीं हुए तू फिर ठीक कैसे होगी. मैं तू अब भी यही कहुगा की तीन महीने लगातार दवाई खा लो और टेस्ट करवा कर ठीक होने के लिए जो भी डॉक्टर कहे मनो.

संध्या: अच्छा कोशिश करती हु, अब आप तैयार हो जाओ नहीं तू लेट हो जाओगे.

संध्या चली गयी और मोहनलाल नाहा धोकर तैयार हो जाता है. तब तक संध्या भी नाश्ता लगा देती है और दिंनिंग टेबल पर रुचिका और आदित्य भी आ जाते हैं. सब मिलकर नाश्ता करते हैं और नाश्ता करते हुए सब के मन में बहुत कुछ चल रहा था लेकिन ऊपर से सब शांत लग रहे थे.

नाश्ता करने के बाद सब एक दूसरे से गले मिले और मन में बिछड़ने का दुःख भी था और आगे आने वाले दिनों की ख़ुशी भी थी. फिर कैब आ गयी तू मोहनलाल और रुचिका उसमे बैठ गए और bye करके चल दिए.

मोहनलाल ने रुचिका के कंधे पर हाथ रखकर उसे अपने पास कर लिया और धीरे धीरे उसके कंधे को सहलाने लगा और थोड़ा सा रुचिका ने मोहनलाल की और झुककर अपना सर उसके कंधे पर रख दिया. सफर कोई 4 घंटे का था तू रुचिका को नींद आ गयी.

रस्ते में एक जगह कैब को रोककर दोनों चाय पीने के लिए उत्तर गए और ड्राइवर को भी कह दिया की वो भी चाय पी ले. दोनों चाय पीने के लिए जब चेयर पर आमने सामने बैठे तू मोहनलाल ने रुचिका की उदासी का कारन पूछा तू उसने कहा "पता नहीं क्योँ ऐसा लग रहा है की जैसे माँ से आखरी बार मिल के आयी हु"

मोहनलाल ने उसके हाथ पर अपने हाथ को रखने के बाद उससे कहा "देखो जो होगा अच्छा hi होगा, अभी से ऐसा मत सोचो और मेरी मनो तू उस बारे में बिलकुल भी धयान न दो, बस खुश रहो और अब तू तुम्हारा मेरे साथ रहने की इच्छा पूरी होने जा रही हैं.

रुचिका के चेरे पर एक फीकी सी हंसी आयी और कहने लगी की "समझ नहीं आ रहा की खुश होणु या दुखी"

मोहनलाल और रुचिका ने चाय ख़तम की और कैब में आकर जैसे hi बैठे तू रुचिका को आगोश में लेते हुए सुला दिया क्योँकि मोहनलाल चाहता था की वो जयादा न सोचे और अपने दिमाग़ को शांत रखे. मोहनलाल के आगोश में एक हुस्नपरी थी और काफी समय के बाद वो उसके साथ इस तरह से थी तू उसके जज्बात तू भड़काने hi थे तू वो उसको सोते हुए निहारते हुए उसके कंधे और सर को सहलाता रहा.
 
अपडेट 16

मोहनलाल और रुचिका ने चाय ख़तम की और कैब में आकर जैसे hi बैठे तू रुचिका को आगोश में लेते हुए सुला दिया क्योँकि मोहनलाल चाहता था की वो जयादा न सोचे और अपने दिमाग़ को शांत रखे. मोहनलाल के आगोश में एक हुस्नपरी थी और काफी समय के बाद वो उसके साथ इस तरह से थी तू उसके जज्बात तू भड़काने hi थे तू वो उसको सोते हुए उसके कंधे और सर को सहलाता रहा.

रुचिका तू नींद के आगोश में चली गयी और मोहनलाल बीते हुए लम्हो में खो गया.

मोहनलाल को याद आया की उस हादसे के दो दिन बाद hi वो टूर पर चला गया लेकिन उसको लग रहा था की कुछ पीछे छूट गया है और वो क्या है उसे समझ नहीं आ रहा था.

उसके मैं में रुचिका की खूबसूरती कुछ इस कदर बैठ गयी थी की उसकी हालत सांप छछूंदर जैसी हो गयी थी क्योंकि उसका एक दिल तू उसकी खूबसूरती और अदाओं का दीवाना हो गया था और दूसरा दिल कहता था की वो उसका बाप है और ऐसा सोचना भी पाप हैं. वो अपनी भावनाओं को अपने मन में hi दबाये हुए था लेकिन कभी भी किसी पर जाहिर नहीं होने दिया था.

हाँ ये जरूर था की जब भी उसका मन विचलित होने लगता वो रुचिका की सेल्फी को देखकर खुश हो लेता था. ये वो सेल्फी थी जो उसने रेस्टोरेंट में खींची थी जब वो उससे गहने पहनाने गया था.

मोहनलाल उस बात को याद करके आज भी मुस्कुरा दिया और रुचिका को प्यार से निहारने लगा और फिर से बीती यादों में खो गया.

इतना जरूर था की पहले वो रुचिका की हर इच्छा को पूरी करने की कोशिश करता था, लेकिन अब उसका मैं करता था की उसके बिना मांगे hi उसके लिए नयी नयी चीज़े लेकर जाये. पहले वो सिर्फ संध्या के लिए बिना मांगे ले जाता था लेकिन अब वो रुचिका के लिए भी ऐसी चीज़े ढूंढता था जिससे वो उसको खुश कर सके.

ऐसे hi दिन बीतते रहे और रुचिका अन्तर में भी सिर्फ फर्स्ट डिवीज़न नहीं बल्कि उसकी यूनिवर्सिटी में पोजीशन आयी थी, जब उसको यह पता लगा तू वो बहुत खुश हुआ और उसने रुचिका को कुछ गिफ्ट देने की सोची. उसने इस बारे में बहुत सोचा की क्या दिया जाये की वो अलग भी हो लेकिन घर के दूसरे लोग ऐतराज़ भी न करें.

जब मोहनलाल घर पंहुचा तू घर में ख़ुशी का माहौल था, संध्या का बर्ताव तू ऐसा था जैसे की एग्जाम उसने पास किया हो न की उसकी बेटी ने. आदित्य तू खेलकूद में hi जयादा बिजी था. मोहनलाल संध्या और रुचिका के लिए कपडे लाया था और आदित्य के लिए एक नया क्रिकेट बात.

संध्या ने मोहनलाल को कहा की बेटी इतने अच्छे नम्बरी से पास हुई है उससे कोई अच्छी सी गिफ्ट तू देनी थी.

मोहनलाल ने संध्या से कहा की "गिफ्ट तू देनी चाहिए लेकिन वो हम दोनों की तराई से होनी चाहिए, इसलिए तुम बताओ की क्या हो". तब संध्या ने उससे सोने की चैन देने की बात कही जो की मोहनलाल को पसंद आयी और उसने उससे साथ चलकर लेन के लिए कहा लेकिन उसने बहाना बना दिया तू उससे अकेले hi जाकर लानी पड़ी.

जब वो चैन लेकर आया तू संध्या ने उस चैन की काफी टैरिफ की और रुचिका को बुलाकर उससे कहा की पापा तेरे लिए गिफ्ट लाये हैं तू मोहनलाल ने उससे देते हुए कहा की ये उन दोनों की तरफ से है तू उसने दोनों को धन्यवाद कहा.

मोहनलाल तू उसको खुश देखकर अपने दिल में ठंढक महसूस कर रहा था, उससे समझ नहीं आता था की उसके साथ ये क्या हो रहा है.

उसका मन करता था की वो रुचिका के साथ बहुत साडी मीठी मीठी बातें करते हुए उसकी खूबसूरती को अपनी नेत्रों से रसपान करे, उसको कहीं घूमने ले जाये, उससे नयी नयी चीजे उसकी पसंद की दिलवाये और उसकी हंसी और अठखेलियों का आनंद ले. जब भी उसके मन में ऐसे विचार आते तू उसकी अंतरात्मा उससे धिक्कारती की अपनी बेटी के बारे में ऐसे नीच विचार. तब वो अपनी अंतरात्मा से कहता की वो तू सिर्फ उसे खुश देखना चाहता है.

उसकी अंतरात्मा उससे कहती की कौन सा बाप अपनी बेटी की खूबसूरती का रसपान करता है. तब वो शर्म से अपना चेरा झुका लेता और प्राण करता था की वो अब उसके बारे में ऐसा वैसा कुछ नहीं सोचेगा.

लेकिन जो होना होता है उससे कोई नहीं रोक सकता. एक बार की बात है की रुचिका कॉलेज में पढ़ रही थी तब मोहनलाल टूर से घर वापिस आया तू संध्या ने कहा की "आप तू जयादा समय बहार hi रहते हो. बच्चों से कॉलेज जाने के बाद ख़ास तौर पर जब वो लेट होने लगते हैं तू उससे उनकी चिंता होती है और जयादा चिंता रुचिका की होती है. वो चाहकर भी उनसे संपर्क का कोई भी साधन न होने के कारन नहीं कर पाती. इसलिए मैं चाहती हूँ की आप दोनों बच्चों के लिए एक एक मोबाइल ला दो ताकि मैं उनसे संपर्क कर सकूँ"

मोहनलाल ने उसकी बात मानते हुए दोनों बच्चो को बुलाया और उनको बताया की तुम्हारी माँ तुम दोनों को मोबाइल लेने के लिए कह रही है तू ऐसा करो की चलो तुम्हे मोबाइल दिलवा देता हु. आदित्य तू मैच का बोलकर चला गया और कहा की जो भी मोबाइल उसके लिए लाएंगे वह उससे मंजूर होगा. तब संध्या और रुचिका को मार्किट चलने के लिए कहा तू संध्या ने काम का बहाना करके नहीं गई और रुचिका को मोहनलाल के साथ भेज दिया.

रुचिका मोहनलाल के साथ उस हादसे के बाद कभी अकेले नहीं गयी थी. आज उस हादसे के करीब एक साल बाद वो बाइक पैर बैठ कर जा रही थी. मोहनलाल अपने प्राण पर कायम था परन्तु आज काफी समय बाद वो रुचिका के साथ इस तरह जाने से फिर से अपने मन के अंदर पैदा होने वाली भावनाओं को दबा नहीं प् रहा था.

उसका मन कर रहा था की आज वो उससे घुमाये, बहुत साडी बाटे करे और हो सके तू उसके मन की बात जानने की कोशिश करे. धीरे धीरे वो सिटी में पंहुच गए और मार्किट में बाइक कड़ी करके मोबाइल लेने चल दिए. मार्किट में भीड़ बहुत थी तू पता नहीं रुचिका को क्या सुझा की उसने अपने दांये हाथ से मोहनलाल का बनयान हाथ पकड़ लिया और उसके साथ साथ चलने लगी. मोहनलाल तू उसके ऐसा करने से आनंदित हो गया.

भीड़ काफी थी और लोग चलते हुए एक दूसरे से रगड़ खा रहे थे. कई बार ऐसा हुआ की लोगों के चलने से रुचिका को लोगों से बचने के लिए मोहनलाल से सत्तना पद रहा था तू मोहनलाल की सोई हुई भावनाएं फिर से जागने लगी और वो भूलने लगा की साथ चलने वाली लड़की उसकी बेटी है, उससे तू बस ये लग रहा था की इस वक़्त एक बहुत सुन्दर लड़की उसके साथ कदम से कदम मिलकर चल रही है और वो इस बात से hi अपने आप को दुनिया का बहुत hi खुशनसीब इंसान समझने लगा.

रुचिका ने हाथ इस तरह थमा हुआ था की दोनों की हथेलियों ने एक दूसरे को जकड़ा हुआ था, जबकि मोहनलाल का मन कर रहा था की वो उसकी उँगलियों में अपनी उँगलियों को डालकर कसकर पकड़ ले, परन्तु वो अभी जल्दीबाजी करके इस खेल को बिगड़ना नहीं चाहता था और जो हो रहा था उसी में hi खुश रहने की कोशिश कर रहा था.

मोहनलाल अपनी दुनिया में खोया हुआ था की साइड से किसी का धक्का लगने से बाप बेटी बिलकुल एक दूसरे से सात गए और इतना hi नहीं रुचिका के उभारों ने मोहनलाल की छथि का स्पर्श करके उसके मन में खलबली मचा दी. रुचिका को भी इस बात का आभास हुआ लेकिन ये सब अनजाने में होने की वजह से वो इग्नोर कर गयी.

अभी थोड़ा आगे चले थे की कुछ लड़के तेजी से आगे निकलने की कोशिश कर रहे थे जिस वजह से मोहनलाल और रुचिका ने धक्कों से बचने के चाकर में एक दूसरे की तरफ घूमना पड़ा. अभी घूमे hi थे की दोनों के पीछे से धक्के लगे जिस वजह से रुचिका का शरीर पूरा का पूरा मोहनलाल के आगोश में आ गया. रुचिका का सीना और उसके उभारों ने मोहनलाल की चाहती से टकराकर उनके कुचलने में कोई कसार नहीं छोड़ी क्योँकि उन दोनों के सीने आपस में बात कर रहे थे.

क्योँकि ये सब एक डैम से हुआ था तू रुचिका की सांस लेने की गति बढ़ने से उसके सीने के उभारों ने ऊपर नीचे होकर मोहनलाल के छथि को रगड़ने लगे. मोहनलाल का रक्त परवाह बढ़ने लगा और भावनाएं अनियंटित होने लगी.

मोहनलाल का एक हाथ अपने आप hi उसकी कमर पर पंहुच गया और उससे सहलाते हुए उसने रुचिका से पूछा "ठीक हो न", उसने सिर्फ इतना hi कहा "हाँ". उसके बाद मोहनलाल उसकी कमर में हाथ डेल डेल आगे बढ़ रहा था तू रुचिका को लग रहा था की वो उससे भीड़ से बचने के लिए कर रहा है, लेकिन मोहनलाल तू उन पालो का जयादा से जयादा आनंद लेना छह रहा था.

दोनों मोबाइल की दुकान पर पंहुचे तू एक सेल्समेन इन दोनों को बहुत सरे मोबाइल दिखा रहा था और उनके फीचर्स बता रहा था तू रुचिका को जो मोबाइल पसंद आ रहा था वो थोड़ा सा महंगा था इसलिए उसने उसे अलग रखने के लिए बोलै लेकिन उसकी नज़र बार बार उस मोबाइल पर जा रही थी जो मोहनलाल ने नोट कर ली.

जब वो डीडे नहीं कर प् रही थी तू उसने मोहनलाल से पूछा की कौनसा मोबाइल लू तू मोहनलाल ने कहा "तुम्हे जो भी पसंद है ले लो"

रुचिका ने एक सस्ता वाला मोबाइल बताया तू मोहनलाल ने कहा पसंद है तू ले लो, लेकिन रुचिका के चेरे पर ऐसे भाव थे जैसे की वो मज़बूरी में ले रही हो. मोहनलाल ने उस मोबाइल के बारे में पूछा जिस पर रुचिका की नज़र थी तू सेल्समेन ने उसका प्राइस बताया लेकिन साथ में ये भी बताया की उसके साथ एक स्क्रैच कार्ड भी है जिसमे हो सकता है की आपको इनाम निकल आये और आपको मोबाइल फ्री में भी मिल सकता है.

मोहनलाल ने उससे कहा की ठीक है आप इससे दीजिये. जब स्क्रैच कार्ड को स्क्रैच करना था तू उसने वो रुचिका को दे दिया और स्क्रैच करने के लिए कहा तू उसके चेहरे की मुस्कान देखकर मोहनलाल तू गदगद हो गया. रुचिका ने धड़कते दिल से उस कार्ड को स्क्रैच किया तू उसमे एक कोड निकला और वो कोड जब सेल्समेन को दिया गया तू उसने कहा "साहब मुबारक हो, आप ने तीन दिन का कपल टूर इंडिया के किसी भी जगह के लिए जीता है"

रुचिका तू बहुत खुश हुई और मोहनलाल ने डिटेल्स के बारे में पूछा तू उसने बताया की "इसमें आपको दो लोगों के लिए इंडिया में फ्लाइट टिकट्स, रहना, खाना और टूर अब फ्री है और ये ऑफर अगले एक साल तक वैलिड रहेगी ". रुचिका तू ये जान कर बहुत खुश हुई और मोहनलाल के बाज़ू को पकड़ कर अपनी ख़ुशी का इज़हार कर रही थी.

मोहनलाल ने वैसा hi एक और मोबाइल के लेने के लिए पूछा तू सेल्समेन ने कहा की दूसरे मोबाइल पर वो एक हज़ार का डिस्काउंट भी देगा. तब स्क्रैच कार्ड के बारे में पूछा तू उसने कहा की वो भी मिलेगा. दूसरे स्क्रैच कार्ड में 2000 का डिस्काउंट निकला. तब दोनों मोबाइल की पेमेंट करके नए सिम कार्ड डलवा कर जो की थोड़ी देर में चालू होने थे लेकर निकले hi थे की सामने से सीमा (रुचिका की सहेली) ने उन दोनों को पकड़ लिया और कहा "Hello, रुचिका एंड हेर पापा"

रुचिका उसको देखकर चौंक गयी और मन में सोचने लगी की अब ये फिर उससे चढ़ेगी, जैसे ये रोज रोज कॉलेज में चढ़ती हैं, लेकिन उससे कोई तरीका नहीं मिलता था उसको जवाब देने का.

सीमा ने उससे कहा की वो कुछ सामान लेने आयी थी, अब थक गयी है और उसका कॉफ़ी पीने का मन था तू किसी रेस्टोरेंट में जा रही थी, लेकिन अकेले मन नहीं कर रहा था की वो दोनों मिल गए. उसने उन दोनों को भी साथ चलने के लिए कहा तू रुचिका मन करने लगी तू सीमा ने उससे चढ़ते हुए कहा "दर लग रहा है की उसके पापा को बॉयफ्रेंड बना लुंगी" उसकी बात सुनकर रुचिका चिढ गयी और कहा चल आज तेरे साथ कॉफ़ी जरूर पिएंगे.

मोहनलाल जो अब तक चुप था उसने उन दोनों को कहा "लड़ो नहीं, चलो तुम दोनों को कॉफ़ी मैं पिलाऊंगा". फिर वो तीनो एक अच्छे से रेस्टोरेंट में जाने लगते हैं और वंहा पर एक फॅमिली रूम में जाकर बैठते हैं और खाने पिने का आर्डर कर देते हैं. जब वो आर्डर का वेट कर रहे थे तू

सीमा: (मोहनलाल से मुखातिब होकर) आज आपसे काफी वक़्त के बाद मिली हु, लेकिन जब से आप से मिली हु, मैं आपसे इम्प्रेस्सेड हु और मैं आप से दोस्ती करना चाहती हु

रुचिका: क्या बोल रही है

सीमा: मैं इनसे दोस्ती कर रही हु, इसमें कुछ गलत है क्या, वैसे तुम चिंता न कर इनसे दोस्ती करने के बाद भी तू मेरी बेस्ट फ्रेंड hi रहेगी.

रुचिका: तुम्हे और कुछ नहीं सूझता

सीमा: जब से इनसे मिली हु, मेरे दिन और रात का चैन लूट गया है. मैं तू बस इनके ख्यालों में खोयी रहती हु.

रुचिका: तू होश में तू है

अभी और कोई बात होती उससे पहले वेटर आर्डर सर्वे कर गया और उसके जाने के बाद मोहनलाल जो चुपके चुपके उन दोनों की बातों का मज़ा ले रहा था ने उन दोनों को खाने के लिए कहा. उनोहोने अपनी कॉफ़ी की तरफ देखते हुए बात फिर से शुरू कर दी

सीमा: होश तू खो चुकी हु, जब से इन्हे देखा है.

रुचिका: तू पागल हो गयी है

सीमा: हाँ बिलकुल पागल हो गयी हु, मैंने तू तेरी वजह से अपने दिल पर पत्थर रखा हुआ था की ये तेरे बॉयफ्रेंड हैं, लेकिन ये तू तेरे बॉयफ्रेंड न होकर तेरे पापा है तू मेरी लाइन क्लियर है और मैं इन्हे अपना बॉयफ्रेंड बनाना चाहती हु, लेकिन इनकी अगर मर्जी होगी तू, नहीं तू कोई बात नहीं

रुचिका: बास कर और अब तुम इसके आगे कुछ नहीं कहोगी, मैं सब जानती हु की तुम मुझे क्योँ चढ़ रही हो और जो बात तुम सुन्ना चाहती हो तू सुन और ध्यान से सुन. तू सही कह रही थी की तू इनकी गर्लफ्रेंड नहीं बन सकती क्योँकि ये सही में मेरे बॉयफ्रेंड हैं, और तू अब चुप करके कफ पि और हमें अकेला छोड़ दे
 
अपडेट 17



रुचिका: बास कर और अब तुम इसके आगे कुछ नहीं कहोगी, मैं सब जानती हु की तुम मुझे क्योँ चढ़ रही हो. तुम सही कह रही थी की और जो बात तुम सुन्ना चाहती हो तू सुनो की तुम इनकी गर्लफ्रेंड नहीं बन सकती क्योँकि ये सही में मेरे बॉयफ्रेंड हैं, और तू अब चुप करके कॉफ़ी पि और हमें अकेला छोड़ दे.

सीमा: अरे यार नाराज़ क्योँ होती है, मैं तुम्हारे बॉयफ्रेंड को अपना नहीं बनाने जा रही, सिर्फ तेरे मुंह से सच उगलवाना था. वैसे अगर घर जा रही है तू मुझे भी रस्ते में छोड़ देना.

रुचिका ने मोहनलाल की तरफ देखा और साथ में चलने के लिए बोल दिया और तीनो वंहा से निकलकर बाइक पर पंहुचे तू मोहनलाल ने बैठने के लिए कहा तू पहले रुचिका बैठी तू सीमा ने चढ़ते हुए कहा "अब तू मुझे पता है, गर्लफ्रेंड की तरह बॉयफ्रेंड की कमर में हाथ डालकर बैठ. रुचिका को पता नहीं क्या सुझा उसको चिढ़ाने के लिए मोहनलाल की कमर में हाथ डालकर उससे सत् कर बैठ गयी. फिर सीमा बैठी तू सीट छोटी होने के कारन रुचिका तू एकदम से मोहनलाल और सीमा के बिच में सैंडविच बनकर फँस गयी.

बाइक चल पड़ी तू सीमा ने रुचिका को चढ़ते हुए थोड़ा और रुचिका की तरफ हुई तू उससे भी मोहनलाल की तरफ होना पड़ा और ऐसा लग रहा था की जैसे रुचिका मोहनलाल के ऊपर लड़ गयी हो. रुचिका का चेहरा मोहनलाल के कंधे पर, उभर उसकी पीठ पर और टंगे उसकी पीठ से बिलकुल सत्ती हुई थी, जिससे दोनों बाप बेटी का रक्त परवाह बढ़ने लगा. मोहनलाल तू इस आनंद को जयादा से जयादा पानी के लिए बाइक धीरे धीरे चला रहा था और उधर रुचिका मन में सोच रही थी की उसका पापा उसके बारे में क्या क्या सोच रहा होंगे. पहले तू उन्हें बॉयफ्रेंड बोल दिया और फिर अब उनकी कमर में हाथ डालकर उनके शरीर से सत्ती हूँ, पता नहीं मैं उनसे नज़र कैसे मिला पाऊँगी और कहीं उन्होंने माँ से कह दिया तू मेरा घर से बहार निकलना hi बंद हो जायेगा, पढाई को तू भूल hi जाओ.

खैर जैसे कैसे करके वंहा पंहुच गए जंहा सीमा को उतरना था. सीमा ने उत्तर कर उन दोनों को थैंक्स कहा और फ्रेंडशिप एन्जॉय करने का बोलकर कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए चली गयी लेकिन उन दोनों के मन में आग लगाकर कई सवाल छोड़ गयी.

उसके जाने के बाद मोहनलाल ने बाइक को आगे बढ़ाया hi था की रुचिका ने बड़ी हिम्मत करके थोड़ा शरमाते हुए मोहनलाल से कहा "पापा, आप मेरी कही बातों का बुरा नहीं मन्ना, मैं उस वक़्त कंफ्यूज हो गयी थी की क्या करूँ. वो मुझे रोज तंग करती है तू मैंने उसके तंग करने पर ब्रेक लगाने के लिए वो सब किया है. आप प्लीज मुझे माफ़ कर देना" उसके जवाब में मोहनलाल ने कहा "बीटा जो हुआ ठीक नहीं हुआ, उसको जब पता लगेगा की तुम वाकई मेरी बेटी हो तू वो तुम्हारे बारे में क्या सोचेगी?"

रुचिका ने कहा "पापा आप तू जयादातर बहार hi रहते हैं, वो जब आपको देखेगी hi नहीं तू सब भूल जाएगी, और कभी देख लिया तू फिर हम थोड़ी सी एक्टिंग कर लेंगे." मोहनलाल ने कहा "जैसे तुम्हारी मर्जी" तब रुचिका ने कहा "पापा, एक बात और, आप प्लीज माँ को न बताना" तू मोहनलाल ने बाइक रोक दी और पूछा "तुम तू माँ को हर बात बताने में विश्वास करती हो" तब उसने जवाब दिया "पापा, मैं उनसे कुछ भी छुपाना नहीं चाहती, लेकिन अगर ये बताया तू उनका विश्वास डगमगा जायेगा और हो सकता है की वो फिर कभी आपको और मुझे कहीं भी अकेले न भेजे और घर में बवाल हो जायेगा, हो सकता है की मेरी छोटी सी गलती की वजह से घर hi टूट जाये" इतना कहकर वो रोने लगी.

मोहनलाल ने उसे अपने आगोश में लेते हुए उससे सान्तवना दी और उसके माथे को चूमते हुए कहा "मेरी बेबी डॉल अब बड़ी और समझदार हो गयी हैं, चल चिनता न कर जैसे कहेगी , वैसा hi करूँगा" रुचिका ने भी मोहनलाल को अपनी बांहो में भींच कर कहा "थैंक्स माय बॉयफ्रेंड पापा" और खिलखियकार हंसने लगी और मोहनलाल ने एक बार फिर उसका माथा चुम लिया.

इधर जब वो ये सोच रहा था तब वो असल में भी रुचिका का माथा चुम रहा था, तभी ड्राइवर ने कहा "साहब हम पंहुच गए हैं". मोहनलाल ने रुचिका को उठाया और फिर सामान लेकर वो दोनों एयरपोर्ट के अंदर चले गए.

इनको जाने देते हैं और हम चलते हैं वापिस घर पर और देखते हैं वंहा का हाल

संध्या की जब शादी हुई थी तू मोहनलाल उसके साथ बहुत सहवास करता था लेकिन आदित्य के जनम के बाद से hi ऐसी लोई बीमारी हो गयी की मोहनलाल का लिंग जैसे hi संध्या की योनि में जाता तू दर्द की ऐसी लहार उठती थी की उसके लिए ये बहुत hi असहनीय होता था और उससे दर लगने लगता था की कहीं सहवास के वक़्त hi उसने डैम तोड़ दिया तू उसके बच्चों का क्या होगा.

संध्या ने इस दर्द से बचने के लिए अपने आप को मोहनलाल से दूर करना शुरू कर दिया था जिससे उसी उस दर्द के दौर से न गुज़ारना पड़े. इस दर्द से तू वो बच जाती थी लेकिन उसके मन में दूसरे दर्द ने जनम ले लिया था, वो यह था की वो अपने पति को सुख नहीं दे पा रही है और अपने शरीर की आग को अंदर hi अंदर में समेटे रहती थी.

संध्या के जिस्म में आग तो बहुत थी मगर उसे बुझाने के लिए वह कोई खतरे नहीं मोल सकती तह. संध्या किसी कीमत पर भी अपनी आग को भुजने के लिए अपने बच्चो की खुशियों में आग नहीं लगाना चाहती थी. ये सब उसका मन्ना था या उसकी नासमझी. अपने शरीर की आग को भुझाने के लिए उससे दो hi तरीके आते थे, पहला भगवन का भजन और दूसरा अपने शरीर पर पानी डालना इसलिए वो दिन में कई कई बार नाहा लेती थी.

संध्या की फिगर बहुत मस्त थी, वह 38 की होने के बावजूद अपनी बॉडी को कैसा हुआ रखे हुए थी, इसलिए वो अपनी उम्र से काम से काम 10 साल छोटी लगती थी. संध्या का रंग गोरा, 34 साइज की बड़ी गोरी चुच्यों जिन के ऊपर हलके भूरे रंग के दो मोठे दाने, पतली बल कहती कमर उसके नितम्ब बहहत ज्यादा मोठे तो नहीं थे पर भरे हुए थे.

संध्या को पहली नज़र में देखने वाले का ख्याल उसकी चुच्यों और उसके नितम्बों पर hi जाता था और उसकी खूबसूरती को निहारे बगैर रह नहीं सकता था.

जब रुचिका और मोहनलाल चले गए तू वो उठकर अलमारी से कपड़े निकालते हुए बाथरूम में चली गयी और फ्रेश हनी के बाद नहाने लगी और काफी देर नहाने के बाद टॉवल से अपने बदन को पोछने लगी.

अपने बदन को पोछते हुए उसकी नज़र जैसे hi अपनी चुच्यों पर पड़ी वह हैरान रहगयी, संध्या वहां से चलते हुए बाथरूम में लगे आईने के सामने आ गयी और अपने नंगे जिस्म को गौर से निहारने लगी. संध्या अपनी बड़ी चुच्यों, और मांसल चुतरों को देखकर खुद शर्मा गयी.

संध्या ने शादी के इतने सालों के बाद अपने जिस्म को गौर से देखा था, संध्या अपने जिस्म को देखकर फखर महसूस कर रही थी के 2 बच्चों की माँ होते हुए भी वह बिलकुल बदली नहीं थी, बल्कि उसका बदन निखार कर और जयादा आक्रर्षक हो गया था.

संध्या को अचानक कुछ याद आया और वह जल्दी से अपने कपड़े पहन कर बाथरूम से बाहर आ गयी तू देखा की आदित्य तैयार होकर वंहा कॉलेज जाने के लिए खड़ा था और जैसे hi उसने संध्या को देखा तू वो जैसे सब कुछ भूल गया हो. आज उससे पता नहीं क्योँ उसकी माँ कुछ जयादा hi खूबसूरत लग रही थी क्योँकि वो अभी अभी नाहा कर आयी थी और उसके बालो से पानी की बुँदे चालक रही थी जो उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रही थी. इतना hi नहीं वो बिना मेकअप के आज उससे एक ऐसी नवयुवती लग रही थी जो नयी नयी जवान हुई हो और अपनी जवानी का मज़ा लूटना छह रही हो.

आदित्य ने अपने विचारों को झटका और प्रत्यक्ष में "माँ मैं कॉलेज जा रहा हु"

संध्या: कब तक आएंगे

आदित्य: क्यों माँ कोई काम था क्या.

संध्या: (उदास होते हुए) अब क्या काम हो सकता है, पति चला गए, पता नहीं कब वापिस आएंगे, बेटी भी बहार चली गयी, किसी को मैं जानती नहीं और रह गए तुम. काम तू बस यही रहे गया है की तुम्हारे लिए खाना बनाऊ और बैठ कर तुम्हारा इंतज़ार करू.

आदित्य: (माँ को गले लगते हुए) आप चिंता न करो मैं जल्दी आ जाऊंगा और आप भी कुछ न कुछ बिजी रहने का तरीका धुंध लो

संध्या: मैंने अपनी जिंदगी में सिर्फ और सिर्फ तुम लोगों के लिए व्यतीत की है तू अब बिजी कैसे हो जॉन, जब सब अपने अपने काम में बिजी हो चुके हैं.

आदित्य: मैं हु न आपके लिए

संध्या: अभी तुम्हारी भी जॉब लग जाएगी, फिर तू मैं बिलकुल अकेली हो जाउंगी.

आदित्य: तब की तब देखेंगे, लेकिन अभी जो भी वक़्त है हम साथ में गुजरेंगे

संध्या: क्योँ तुम कॉलेज नहीं जाओगे.

आदित्य: जाऊंगा, लेकिन कल से आप भी बिजी हो जाओगी और आज आप तैयार रहना, मैं दोपहर तक आ जाऊंगा, फिर आप मेरे साथ घूमने चल रही हैं

संध्या: (आदित्य की बांहों से निकलते हुए) किसको ले जायेगा अपनी माँ को या गर्लफ्रेंड को

आदित्य: (उसकी आँखों में झांकते हुए) जो जाना चाहे
 
डिअर फ्रेंड्स,

ी ऍम गेटिंग रेगुलर रिक्वेस्ट्स तो व्रिठे थे सेकंड part ऑफ़ थे प्रीवियस स्टोरी

"माँ और बेटी से प्यार"

वेल राइट नाउ ी ऍम बिजी विथ थिस स्टोरी

"रिश्ता"

वेल िफ़ यू फील तहत थे सेकंड part बे स्टार्टेड सिमुलतानूसली, ी कैन दो तहत, बूत यू won't बे गेटिंग रेगुलर उपदटेस फॉर ऐथेर ऑफ़ थे स्टोरी.

ी कैन गिव टोटल ऑफ़ 4 उपदटेस पैर वीक. आईटी कुड बे 2 फॉर एच स्टोरी.

प्लीज लेट में क्नोव योर लिकिंग्स.

नीड योर कमैंट्स इन थिस रेगार्ड. प्लीज मेक में अवेयर.

थैंक्स
 
अपडेट 18



आदित्य: जाऊंगा, लेकिन कल से आप भी बिजी हो जाओगी और आज आप तैयार रहना, मैं दोपहर तक आ जाऊंगा, फिर आप मेरे साथ घूमने चल रही हैं

संध्या: (आदित्य की बांहों से निकलते हुए) किसको ले जायेगा अपनी माँ को या गर्लफ्रेंड को

आदित्य: (उसकी आँखों में झांकते हुए) जो जाना चाहे

आदित्य चला गया लेकिन संध्या के मन में खलबली मचा गया, वो सोचने पर मजबूर हो गयी की माँ बन कर जाये या गर्लफ्रेंड.

संध्या आदित्य के जाने के बाद ये सोचने लगी की अब उससे क्या करना चाहिए. वो अब इस सोच में दुब गयी थी की उसका सामना अब अपने पति से काम से काम 6 महीने तू होता नहीं और ये भी हो सकता है की वक़्त कुछ जयादा hi लग जाये और रुचिका का भी कुछ पता नहीं. अब रह गया आदित्य तू उसकी भी अगर जॉब बहार लग gayi.tu वो किसके सहारे जियेगी. उसके पास तू न कुछ करने को रहेगा, न hi वो पढ़ी लिखी है की कुछ कर पाए. बहार के लोगों से भी मिलना जुलना न के बराबर था, इसलिए उसको लोग जानते भी हैं या नहीं पता नहीं. ले देके रिश्तेदार के नाम पर एक भाई है वो भी अब बूढ़ा हो गया है और कई सालो से मुलाकात भी नहीं है. बस राखी भेझ देती थी और वो कुछ मनी आर्डर भेझ देता था, बस यही रिश्ता था.

अब समस्या ये थी की अगर आदित्य ने बहार जॉब कर ली और उसकी कोई गर्लफ्रेंड भी हुई तू वो उसमे व्यस्त हो जायेगा और वो फिर उससे क्योँ पूछेगा. अगर ये भी मान लिया जाये की वो मेरी इज़्ज़त करता है और मुझे अकेला नहीं छोड़ेगा तब भी वो मुझे वक़्त नहीं दे पायेगा और मेरी जिंदगी एकेकेपन की वजह से नरक बन जाएगी.

जब ये विचार संध्या के मन में आ रहे थे तू उससे अपनी जिंदगी अंधकार में डूबती हुई नज़र आने लगी. उसके मन से अपने आप hi ये शब्दों की माला निकली

बेहतर है एक किरण घने अंधकार से

बेहतर है एक कोशिश जीवन भर के काश! से

उसने सोचा की अंधकार तू ठीक है लेकिन किरण, और उसके चेरे पर मुस्कान आ गयी क्योँकि वो किरण और कोई नहीं बल्कि 'आदित्य'

एक कोशिश क्या करू. उसने अपनी पिछली जिंदगी को खंगाला तू पाया की उसने पढाई नहीं की और वो हर बार असफल रही है तू उसने एक दृढ निश्चय ले लिए की चाहे कुछ भी हो जाये इस बार हार नहीं मानूंगी और अपने जीवन को सुधरने के लिए एड़ी छोटी का ज़ोर लगा दूंगी और इस बार सफल होकर hi रहूगी.

एक तू उसने थान लिया की अब जल्दी से जल्दी दसंवी करनी है और अंग्रेजी सीखनी है.

जब उसने ये सोचा तू फिर उसके दिमाग़ में ये विचार आने लगे की जब वो पढ़ने जाएगी तू क्या सदी पहन कर और गहने पहन कर जाएगी.

उसके एक मन ने कहा की क्या फरक पड़ता है तू दिमाग़ ने समझाया की ये उचित नहीं है. जब वो पढ़ने जाएगी तू दूसरी लडकियां उससे काम उम्र की होंगी और उसके पहनावे की वजह से हो सकता है की वो उससे न घुले मिले और मज़ाक भी उदा सकती है. उसके मन ने कहा की अगर वो मज़ाक udayengi.tu क्या फरक पद जायेगा. तब उसके दिमाग़ ने उसे चेतावनी दी की अगर मज़ाक बुरा लग गया तू तुम हो सकता है की पढाई बीच में छोड़ दो और दुबारा तुम्हारी हिम्मत hi न हो और हमेशा के लिए अंधकार में चली जाओ.

संध्या दिमाग़ की चेतावनी सुनते hi पसीने पसीने हो गयी और एक बार तू उससे लगा की वो हिम्मत हार रही है और उससे नहीं हो पायेगा. जैसे hi उसके दिमाग़ ने कहा की नहीं हो पायेगा तू उसके दिल ने ये कहा

पछतावा करने से अच्छा है कोशिश करके असफल हो जाना

जैसे hi ये बात उससे सूझी तू उसका निश्चय और भी दृढ हो गया और उसने सोचा की सफलता के रस्ते में जो जो रुकावट आएँगी वो उन सब को दूर करती जाएगी. सबसे पहले तू उसने सोचा की उससे अपना पहनावा बदलना पड़ेगा क्योँकि वो खुद को हंसी का पातर बनाकर अपनी मंज़िल से नहीं भटक सकती.

उसने मन में सोचा की उससे क्या पेहनंना चाहिए तू उसके दिमाग़ में एक hi बात आयी की सलवार सूट. अब समस्या ये थी की उसने पूरी जिंदगी सदी hi पहनी थी तू सूट कान्हा से लाये. तभी उससे याद आया की उसका पति पिछली बार रुचिका के लिए सूट लाया रह तू उसके लिए भी लेकर आया था. वो जल्दी से गयी और बॉक्स खोलकर उस सूट को निकलकर पहनाने लगी.

इसमें कोई दो राइ नहीं थी की वो सूट बहुत hi अच्छा था, लेकिन उसको थोड़ा टाइट था लेकिन चल सकता था. जब उसने सूट पहनकर अपने आप को आईने में देखा तू उससे विश्वास hi नहीं हुआ की ये वो है. उससे लगा की कोई 20- 25 साल की नवयुवती आईने में दिखाई दे रही है.

संध्या अपनी उम्र से कोई 10 साल तू छोटी दिखाई देती थी और सूट पहनकर वो और जयादा छोटी लग रही थी. वो अपने आप को इस तरह देखकर अपने ऊपर फकर महसूस कर रही थी.

उसने अपने आप को निहारा तू लगा की वो खिली हुई लग रही थी और उसने सोचा की अगर इस तरह रुचिका के साथ निकल जाये तू कोई भी नहीं कह सकता था की वो उसकी माँ हो सकती है. हर कोई उससे रुचिका की सहेली या बहिन hi कह सकता था. सूट टाइट होने की वजह से उसके सरे अंग और शरीर के उठाव और कटाव बहुत जयादा दिखाई दे रहे थे बल्कि मनमोहक लग रहे थे. आज उससे अपनी खूबसूरती पर इतने सालो के बाद नाज़ होने लगा की उससे देखकर कोई भी उस पर लट्टू होंसक्ता है.

उसका शरीर कैसा हुआ ऐसा लग रहा था जैसे की उसका शरीर एक कोल्ड ड्रिंक की बोतल की तरह हो.

उसका खिला हुआ चेहरा, सुराहीदार गर्दन, बड़ी बड़ी चूचियां सूट टाइट होने की वजह से कुछ ऊपर उठकर उनका काफी सारा हिस्सा नुमाया हो गया था जो की बहुत hi आकर्षक लग रहा था. पतली कमर और नीचे भरे हुए नितम्ब और केले के तने की तरह लम्बी टंगे उसकी खूबसूरती को बड़ा रही थी. उसने अपनी चूचियों को देखने के लिए चुन्नी ओढ़ ली और अपने आप को घूम कर आईने में देख कर खुश होने लगी.

उसने अब अपने मन में थान लिया था की वो अब अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरू करेगी और मेहनत करके अपने पैरों पर कड़ी होगी और उस लक्ष्य को पाने के लिए उससे जो भी करना पड़ेगा वो करेगी. आईने में देखकर वो काम उम्र की तू लग रही थी लेकिन उसके सुहाग की निशानियां अभी भी उसके शरीर पर मौजूद थी तू उसने सोचा क्या किया जाये. इसके लिए उसने सोचा की मांग में सिंदूर वो सिर्फ निशानी के टूर पर सिर्फ इतना hi लगाएगी जिससे वो किसी को भी न दिखे लेकिन शगुन भी हो जाये.

दूसरा गहने के नाम पर वो सिर्फ एक हलकी सी गले में चैन पहनेगी और कान में नाम के लिए बहुत hi छोटे बुँदे पहनेगी. ये सब वो इसलिए कर रही थी ताकि बाकि लड़कियों के साथ घुलमिल सके.

एक समस्या और थी की आदित्य कैसे बर्ताव करेगा तू उससे याद आया की उसने जाते हुए घूमने की बात हुई थी और उसने पूछा था की "किसको ले जाना चाहेगा" तू आदित्य ने जवाब दिया था की 'जो जाना चाहे' बस ये याद आते hi उसने तय कर लिया की अगर वो पूछेगा तू यही कहुगा की 'गर्लफ्रेंड'

जैसे hi संध्या के मन में ये ख्याल आया तू उसके दिल की धड़कन बढ़ गयी और अपने मन में सोचने लगी "बेटे की गर्लफ्रेंड". क्या ये उचित रहेगा? तब उसने सोचा की जो होगा देखा जायेगा.

संध्या ने गर्लफ्रेंड बनने का निर्णय तू ले लिया लेकिन अब उसका किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था और वो बार बार घड़ी की तरफ देख रही थी की कब आदित्य आएगा और वो उसको इस तरह देखकर क्या कहेगा. उसका कई बार मन हुआ की वो आदित्य को फ़ोन कर ले लेकिन शर्म की वजह से कुछ नहीं किया और बस इंतज़ार करती रही और फिर वो वक़्त भी आ गया, जब आदित्य घर वापिस आया और अपनी माँ को इस तरह देखकर बिलकुल ा अचम्भे में आ गया लेकिन अपनी माँ की खूबसूरती की मन hi मन प्रशंसा करने से बच नहीं पाया. उसने प्रत्यक्ष में यही पूछा "माँ कान्हा जाना है" , संध्या ने सुनकर कहा "अब से जब भी बहार जायेंगे तू मैं तुम्हारी माँ नहीं बल्कि तुम्हारी गर्लफ्रेंड हु"
 
अपडेट 19

संध्या ने गर्लफ्रेंड बनने का निर्णय तू ले लिया लेकिन अब उसका किसी भी काम में मन नहीं लग रहा था और वो बार बार घड़ी की तरफ देख रही थी की कब आदित्य आएगा और वो उसको इस तरह देखकर क्या कहेगा. उसका कई बार मन हुआ की वो आदित्य को फ़ोन कर ले लेकिन शर्म की वजह से कुछ नहीं किया और बस इंतज़ार करती रही और फिर वो वक़्त भी आ गया, जब आदित्य घर वापिस आया और अपनी माँ को इस तरह देखकर बिलकुल ा अचम्भे में आ गया लेकिन अपनी माँ की खूबसूरती की मन hi मन प्रशंसा करने से बच नहीं पाया. उसने प्रत्यक्ष में यही पूछा "माँ कान्हा जाना है" , संध्या ने सुनकर कहा "अब से जब भी बहार जायेंगे तू मैं तुम्हारी माँ नहीं बल्कि तुम्हारी गर्लफ्रेंड हु"

जब आदित्य घर पहुंचा और दरवाजा खुलने पर सामने उससे अपनी माँ की जगह एक लड़की को देख कर चौंक गया और उस लड़की से पूछा "मेरी माँ कहाँ है और आप कौन हैं'

उसकी बात सुनकर संध्या बड़ी जोर से हंसी और आदित्य की तरफ देख कर कहा "क्या तुमने वाकई मुझे नहीं पहचाना, अरे बाबा मैं hi तुम्हारी माँ हु"

आदित्य ने संध्या को एक बार फिर से बड़े गौर से देखा और शॉकेड हो गया और बड़ी मुश्किल से उसके मुंह से निकला "माँ यह तू आप hi हैं, आप तो वाकई में पहचानी नहीं जा रही, आपको देख कर कोई नहीं कर सकता की आप मेरी माँ हैं"

आदित्य घर के अंदर आया और माँ से कहा "ये क्या है माँ, आप तू बिलकुल hi चेंज हो गयी हो"

संध्या ने उससे कहा की पहले खाना खा लो फिर बात करेंगे तू आदित्य बात मानते हुए दिंनिंग टेबल पर आ गया और खाना खाने के लिए बैठा तू संध्या ने खाना परोसने ke.liye झुक कर उसकी प्लेट में खाना डालने लगी.

संध्या ने सूट के ऊपर एक पतला सा दुपटा ले रखा था और उससे बास अपने गले मैं दाल रखा था. आदित्य तो बास अपनी माँ को उस रूप में हे देखे जा रहा था तू उसकी नज़र अनायास hi संध्या की छाती पर गयी जो उससे बोहत हे प्यारी लग रही थी. दुपटा गले में ऊपर होने से संध्या के मोममे साफ़ साफ़ दिखाई दे रहे थे, जो की बहुत hi आकर्षक थे और एक एक मां कोई 2..2 किलो का होगा और चलने से या हिलने से वे हलकी हलकी हरकत करते थे ऊपर नीचे होते हुए.

आदित्य ये नज़ारा देखकर एक बार तू हिल गया और उसका वंहा से नज़र हटाने का बिलकुल मन नहीं था, लेकिन मन में दर भी था की माँ ने देख लिया तू क्या होगा. इसलिए उसने अपनी माँ की नज़र उसकी तरफ हनी से पहले hi उस ने फॉरेन hi वंहा से अपनी नज़र हटा ली क्योँकि वो नहीं चाहता था की बात बिगड़ जाये.

इसलिए बिना बात किये वो खाना खाने लगा, लेकिन उसका मन खाने में काम और माँ के मोममे पर जयादा लगा हुआ था और छह रहा था की एक बार फिर से देखे लेकिन मन के किसी कोने में दर भी था. लेकिन उसके जवान मन को कौन समझाए, इसलिए कनखियोँ से माँ के मोममे को देख कर मन hi मन प्रस्सन हो रहा था. जैसे कैसे खाना ख़तम करके आदित्य उठकर अपने कमरे में जाने लगा तू

संध्या: कान्हा जा रहे हो

आदित्य: अपने कमरे में

संध्या: मुझे घूमने नहीं ले जायेगा

आदित्य: क्योँ नहीं बोलो कान्हा चलना हैं

संध्या: जंहा तुम घूमना चाहो

आदित्य: चलो फिर आज आपको मॉल में घुमा देता हु

संध्या: (मुस्कराते हुए) मुझे पानी पूरी भी कहानी है, लेकिन इस बार अकेले नहीं

आदित्य: ठीक है मैं कपडे बदल कर आता हु

आदित्य जब कपडे बदल कर आया तू संध्या ने कहा "आदित्य आज वाक़ई तुम बुहत अचे लग रहे हो जीन्स और शर्ट मैं”

आदित्य: क्या माँ, आप भी न, अब चलें

संध्या आदित्य के पीछे दोनों टंगे एक तरफ करके बाइक पर बैठकर आदित्य के कंधे पर हाथ रख दिया और उसे चलने के लिए कहा. आदित्य ने बाइक को आगे बढ़ाया लेकिन उसके मन में अपनी माँ के मोममे घूम रहे थे और वो छह रहा था की उनको फील करे लेकिन मन के किसी कोने में दर भी था. वो बाइक को धीरे धीरे चला रहा था तू संध्या ने पूछा की क्या बात है बहुत धीरे धीरे चला रहा है तू उसने कहा की उससे उनकी चिंता है की कहीं वो गिर न जाये इसलिए वो धीरे चला रहा है.

संध्या ने कहा की उसने अच्छे से पकड़ रखा है और वो थोड़ा आदित्य के नजदीक हो जाती है और आदित्य से चिपक के बैठती है और जब बाइक की ब्रेक लगती तो उसके मुलायम बूब एकदम प्रेस हो जाते थे. आदित्य अब जान बुझ कर थोड़ा फ़ास्ट बाइक चलता जिससे उसकी माँ उसके साथ एकदम चिपक जाती और उससे बड़ा मजा आता. आदित्य उस मजे को महसूस करते हुए आन्दातीत हो रहा था और उसके आनंद में इज़ाफ़ा हो रहा था उसके नथुनों में पंहुचने वाली उसकी माँ की खुशबु. उसकी माँ के जिस्म से बहुत प्यारी खुसबू आ रही थी और वो उस खुस्भु की मस्ती में खोया हुआ था की वो मॉल की पार्किंग में पंहुच गया और उसकी मस्ती में खलल पद गया. बाइक कड़ी करके वो दोनों मॉल में पंहुचते हैं.

वो मॉल में ऐसे hi घूम रहे थे और संध्या तू वंहा की चकाचौंध को देखकर बहुत खुश हो रही थी और वो अलग अलग तरह की दुकाने देख रहे थे और बिच बिच में आदित्य अपनी माँ को कहता था की कुछ पसंद हो तू ले लेना. संध्या उससे ये कह कर ताल देती की नहीं आज सिर्फ और सिर्फ घूमना है.

घूमते हुए मॉल की दुकानों और उसमे रखे सामान की खूबसूरती को देखकर संध्या टैरिफ करने से नहीं चूक रही थी, की तभी किसीने आदित्य के कंधे पर हाथ रखा और कहा "Hi, और कैसा है आदित्य" वो और कोई नहीं उसका दोस्त था और उसके साथ उसकी गर्लफ्रेंड भी थी.

आदित्य ने भी उसे Hello कहा और बताया की वो भी घूमने आया था और जब उसने संध्या को देखा तू उसके दोस्त (सूरज) ने कहा "यार बड़ा छुपा रुस्तम है, कॉलेज में तू कहता है की उससे लड़कियों में इंटरेस्ट नहीं है और यंहा इतनी सुन्दर लड़की के साथ घूम रहा है"

आदित्य ने कहा "नहीं यार ऐसी बात नहीं है" तब मनोज ने कहा "यार देख मैं तू खुलमखुला कहता हु की रिया मेरी गर्लफ्रेंड है और तू है की चुप चुप के अपनी गर्लफ्रेंड के साथ मॉल में घूम रहा है. वैसे नहीं मिलाना चाहता तू ठीक है हम चले और वो रिया को ले जाने लगा"

आदित्य ने उससे कहा की शायद उससे ग़लतफहमी हो गयी है और उससे रोककर कहता है "यार तू मेरा बेस्ट फ्रेंड है, मैं तुझसे क्या छुपाऊंगा चल बैठकर बात करते हैं "वो मान जाता है और चारो लोग एक रेस्टोरेंट में एक टेबल पर बैठ जाते हैं और शेक का आर्डर कर देते हैं.

मनोज: कब से बना राखी है गर्लफ्रेंड

संध्या: (आदित्य के कहने से पहले) मैं इनकी रिश्तेदार हु और अभी इनकी गर्लफ्रेंड नहीं बानी हु.

मनोज: (मुस्कराते हुए) कोई बात नहीं पहले सब ऐसे hi इंट्रोडस करते हैं की ये मेरी रिश्तेदार है या मेरी कजिन है और कुछ दिन बाद ये मेरी गर्लफ्रेंड है और कोई कोई तू ये मेरी वाइफ है कह देते हैं.

उसकी बात सुनकर सब जोर से हंसने लगे. आदित्य तू अपनी माँ को इस तरह हँसते हुए देखकर बहुत खुश हुआ क्योँकि उसके हंसने से उसके गाल फूल गए और मोममे ऊपर नीचे हो रहे थे जो उसको बहुत आनंदित काट रहे थे. फिर वो शेक आ गए और सब पिने लगे तू रिया ने कहा की "चलो सब मूवी चलते हैं"

संध्या: नहीं आज नहीं, फिर कभी

रिया: (संध्या को देखकर) ठीक हैं अगली बार चलेंगे, लेकिन अगली बार आप इनकी रिश्तेदार नहीं, गर्लफ्रेंड बनकर आना, वैसे मुझे पता है आप इनकी रिश्तेदार नहीं, गर्लफ्रेंड हो

संध्या: (मुस्कराते हुए) अभी तू रिश्तेदार hi हु आगे देखो क्या होता है

फिर सब इधर उधर की बाटे करके वो चले गए और संध्या और आदित्य भी वंहा से बहार आ गए तू आदित्य ने संध्या को सूट लेने के लिए कहा तू वो दोनों रेडीमेड गारमेंट्स की दूकान में चले गए और सूट देखने लगे.

सलेसगिरल जब सूट दिखा रही थी तू वो सब आजकल के फैशन के हिसाब से थे तू संध्या ने उससे कहा की 'सिंपल दिखाओ न' तू उस सलेसगिरल ने कहा 'मैडम, ये सिंपल hi तू है, आपको कैसा चाहिए', तब उसने उससे वैसा सूट दिखने के लिए कहा जैसा उसने पहना हुआ था तू उस सलेसगिरल ने कहा 'मैडम, ये तू आजकल फैशन में नहीं है, ऐसा चाहिए तू आपको सिलवाना पड़ेगा, लेकिन आप अगर मेरी राइ मने तू आप एक बार पहनकर देख ले, अगर पसंद आये तू लीजिये नहींतु कोई बात नहीं" उसने आदित्य की तरफ देखा तू उसने तरय करने के लिए बोल दिया. वो सूट लेकर ट्रायल रूम में चली गयी.

जब वो ट्रायल रूम में थी तू अपना पहना हुआ सूट उत्तरकार अपने आप को सामने लगे आदमकद शीशे में निहारकर मन hi मन खुश हो गयी और उस सूट को पहनकर देखने लगी तू उससे वो सूट अच्छा लगने लगा, लेकिन वो चाहती थी की एक बार आदित्य देख ले तू उसने आदित्य को बुलाया तू वो ट्रायल रूम में आया तू बो हैरान रह गया.

संध्या: (अपने आप को उससे दिखते हुए) कैसी लग रही हु.

आदित्य ने जब संध्या को सामने से देखा तू उसका सूट बिना चुन्नी के डीप गले वाला सूट था जिसमे से उसके दूधिया उरोजोनो का बहुत बड़ा हिस्सा नज़र आ रहा था. उसके गले के नीचे जंहा उरोज शुरू होते हैं वंहा उन दोनों उरोजोनो के बीचो बिच एक बहुत hi सुन्दर घाटी की शुरुआत होती दिखाई दे रही थी. आदित्य के लिए तू बहुत hi बड़ी मज़बूरी थी की वो अपनी नज़र को वंहा से हटाना भी नहीं छह रहा था लेकिन शर्म के मरे अपनी नज़ारे चुराने लगा तू संध्या ने कहा "इतनी बुरी लग रही हु जो अपनी नज़रे चुरा रहा है"

आदित्य ने एक डैम पलट कर उसकी आँखों में देखते हुए अपनी नज़र नीचे करके फिर से उरोजोनो के दर्शन करते हुए जैसे hi थोड़ा और नीचे देखा तू उसकी जान हलक में आ गयी क्योँकि संध्या की बड़ी बड़ी चूचियां सूट में ऐसी कासी हुई लग रही थी की जैसे कपडे को उन चूचियों पर रखकर नाप लिया गया हो, उसने प्रत्यक्ष में इतना hi कहा की "बहुत खूबसूरत लग रही हो"

उसकी बात सुनकर संध्या खुश hi गयी और एकदम से मुड़कर अपने को पलट के बोली "पीछे से कैसी लग रही हु". अब बेचारा आदित्य क्या बोलता क्योँकि सूट पीछे से भी काफी डीप गले का था और यंहा तक की उसमे से ब्रा स्ट्राप का ऊपरी कुछ हिस्सा तक नज़र आ रहा था और उसके नीचे पतली कमर और उसके नीचे कैसे हुए नितम्बों का उस सूट में नज़ारा ऐसा था की किसी का भी मन ख़राब कर दे. वो दृश्य देखकर आज पहली बार आदित्य का रक्त परवाह बढ़ गया और उसके लिंग में कुछ तनाव आने लगा. उसने बस इतना hi कहा की सूट तू आप पर बहुत अच्छा लग रहा है लेकिन पीछे से काफी डीप है जिससे आपकी पीठ का काफी हिस्सा नज़र आ रहा है और बोलकर ट्रायल रूम से बहार आ गया.

संध्या ने उसके जाने के बाद अपने हाथ को पीछे ले जाकर अपनी पीठ पर हाथ फिरते हुए महसूस किया की उसकी ब्रा का स्ट्राप उसके सूट की लिंनिंग से ऊपर है. जब उससे ये एहसास हुआ तू वो समझ गयी की क्योँ आदित्य बहार चला गया और अब उससे भी ये सोचकर शर्म आने लगी की उसके बेटे ने उसकी ब्रा देख ली. अपने आप को हिम्मत देते हुए उसने कपडे बदले आउट बहार आ गयी तू आदित्य को देखकर उससे शर्म आने लगी और अपनी पलके झुका कर वो सलेसगिरल के पास गयी तू उसने उससे कहा की कोई काम गले वाला सूट दिखा दो तू उसने बताया की सबसे काम गले वाला तू यही है, बाकि तू और डीप हैं, अभी और कोई बात होती आदित्य ये बोलकर की कुछ काम है और तिधि देर बाद बहार मिलेगा, वंहा से चला गया.

उसके जाने के बाद संध्या ने सलेसगिरल को ब्रा वाली समस्या बताई तू उसने कहा 'मैडम आपने पुराने वाली ब्रा पहन राखी है, आप उसकी चिनता न करें आपको अभी दूसरी अच्छी वाली ब्रा दिखती हु". यह कहकर वो संध्या का साइज पूछकर उसके लिए बहुत hi अच्छे वाली ब्रा ले आयी जो की बहुत मुलायम कपडे की थी और उसका स्ट्राप बहुत hi काम चौड़ा था जो की संध्या को बहुत पसंद आयी और उसने दो ब्रा भी खरीद ली.

थोड़ी देर बाद आदित्य आ गया और बिल चूका कर बहार आ गए और दोनों ने घर जाने की सोची.

वापस एते समय बाइक पर संध्या आदित्य से चिपक के बैठी थी उसके लिंग अभी फिर से तन्ना शुरू हो गया था. जब कभी रस्ते में गढ्ढा अत तो उसकी माँ जान बूझकर उससे और चिपक जाती और अपने मुलायन बूब्स को उसकी पीठ पे दबा देती, ऐसा आदित्य को लग रहा था, लेकिन हो सकता है ये सब अनजाने में हो रहा हो. रस्ते में संध्या ने आदित्य से पानी पूरी खाने के लिए कहा तू उसी ठेले पर पंहुच गए.

पानी पूरी वाले से खिलने के लिए कहा तू संध्या ने उससे तीखा खिलने के लिए याद दिलाया. वो दो दोने देने लगा तू आदित्य ने एक के लिए कह दिया तू संध्या ने कहा की तुमने तू साथ में खाने के लिए वादा किया था. तब आदित्य ने कहा साथ खाएँगे लेकिन आपके दोने से, जिससे सुनकर संध्या खुश हो गयी.

जैसे hi पानी पूरी आयी तू सांध्य ने पहला आदित्य को खाने के लिए कहा तू उसने कहा नहीं पहले आप खा लो, तब दो खाने के बाद तीसरा उसने उठाकर आदित्य के मुंह में डाला तू आदित्य ने पानी पूरी के लिए मुंह खोला और उसके हाथ की उँगलियों को भी पानी पूरी के साथ चाट गया. ऐसे hi वो पानी पूरी कहते रहे और फिर बाइक पर बैठ कर घर की तरफ चल पड़े.

रस्ते में संध्या ने आदित्य से पूछा की पानी पूरी कैसी थी तू आदित्य जो अपनी सोचो में खोया हुआ था बोलै "माँ आपकी उँगलियाँ बहुत मीठी हैं" संध्या एक बार तू शर्मा गयी लेकिन फिर उसने कहा "मैंने पानी पूरी के बारे में पूछा था" तब आदित्य ने कहा "माँ मुझे तू पानी पूरी का पता hi नहीं चला, मैं तू आपकी उँगलियों की मिठास में खोया हुआ था" उसकी बात सुनकर संध्या एक डैम से शर्मा गयी और उसकी पीठ पर मुक्का मरते हुए "घाट" कहकर चुप होकर बैठ गयी और बिच बिच में ब्रेक लगने पर वो आगे को खिसक जाती थी जिससे उसकी चूचियां आदित्य की पीठ पर डाब कर उसका हाल बुरा कर रही थी. एक बार तो माँ ने झटका लगने पर अपने गाल को भी उसकी गर्दन पर दबा दिया था, जिससे दोनों के साँसों की गति बढ़ गयी थी. फिर वो दोनों घर पहुंच गए. घर में ए तो संध्या आदित्य को अजीब नजर से देख रही थी और मुस्कुरा भी रही थी.
 
सबसे पहले तू मैं आपका धन्यवाद करना चाहूंगी की आप इस कहानी को इतना जयादा पसंद करते हैं.

दूसरा माँ और बेटी से प्यार को मैंने एक सुखद अंजाम दिया है और ये बात भी सही है की कई पाठको की वजह से उससे जल्दी अंजाम तक पंहुचाया था, लेकिन कुछ भी मिस नहीं किया था, परन्तु ये भी सच है की आप जैसे बहुत से पाठक उस कहानी को बहुत प्यार करते हैं इसलिए उसका दूसरा भाग जल्दी hi शुरू करुँगी.

इस कहानी की आप चिंता न करें, ये अपने अंजाम तक पंहुचेगी और पूर्ण तरीके से.

धन्यवाद्
 
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