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आदित्य ने अपने हाथ से उसके हाथ को पकड़ कर अपने कंधे पर रख लिया और बिना कोई बात किये बाइक को आगे बढ़ा दिया और इस बार dhéere dhéere चलने लगा. दोनों के दिल में प्यार की पहली चिंगारी लग चुकी थी जो अब इतनी आसानी से भुजने वाली नहीं लग रही थी.
उधर घर पर संध्या और आदित्य के जाने के बाद
मोहनलाल: खुश
रुचिका: (मोहनलाल के गले लगते हुए) बहुत खुश
मोहनलाल: कान्हा चलना चोहोही
रुचिका: जंहा आप ले जाएँ, मुझे तू बस आपके पास रहना है.
मोहनलाल: मुंबई या पुणे
रुचिका: वैसे तू जंहा आपका मन हो, लेकिन मैं पुणे को प्रेफर करुँगी.
मोहनलाल: मैं समझ सकता हु, लेकिन अब तुम आराम करो और थोड़ी देर सो जाओ
रुचिका: (मोहनलाल से बिलकुल सट्टे हुए) अभी तू बड़ी मुश्किल से अकेले रहने का मौका मिला है और आप कह रहे हैं की मैं सो जॉन
मोहनलाल ने भी उसे अपनी बांहों में बड़े प्यार से कस लिया और कहा "अब तू मौके hi मौके हैं, लेकिन मुझे तुम्हारा ख्याल पहले है, इसलिए मेरी बात मनो और थोड़ा आराम कर लो"
रुचिका: मुझे तू आराम सिर्फ और सिर्फ आपकी बांहों में मिलता है और आप हैं की मुझे अपने से दूर करने का मौका ढूंढते हो
मोहनलाल ने एकदम से उसे अपनी बांहों में भरकर उठा लिया और रुचिका ने अपनी बांहों का घेरा मोहनलाल के गले में दाल कर उसके सीने में अपना सर रख दिया तू मोहनलाल ने रुचिका को कहा "दूर कर रहा हु इसलिए की हमेशा पास रह सको, वार्ना दिल तू मंटा hi नहीं की तुम से दूर हो"
इतना कहकर मोहनलाल ने उसे उठाकर उसके बैडरूम में ले गए और उसको बीएड पर लेता दिया और उसके साथ बैठकर अपने हाथ को उसके सर पर रखकर उसके सर को सहलाने लगे जिससे रुचिका को आनंद और सुकून की अनुभूति होने लगी और उसकी आँखे बंद होने लगी.
मोहनलाल धीरे धीरे अपने हाथ की उँगलियों को उसके बालो में फिरता रहा और रुचिका ने करवट बदलकर मोहनलाल के दूसरे हाथ को अपने दोनों हाथों में पकड़ कर अपने सीने के पास रख लिया, जिससे मोहनलाल को थोड़ा झुकना पड़ा और वो तिरछा होकर बीएड पर अधलेटा हो गया और रुचिका के मासूम चेरे को निहारते हुए उसके बालों में उँगलियों को फिरता रहा. उसका मक़सद था की किसी तरीके से रुचिका सो जाये.
मोहनलाल सोचने लगा की कैसे कब क्या बदला और उसकी जिंदगी में क्या क्या रंग आये और गए.
उसकी आँखों के सामने वो दृश्ये उभरने लगे. उससे आज भी धयान है की जब उसकी गाँव में शादी संध्या से हुई थी, तब वो और संध्या छोटे थे, लेकिन गाँव के लिहाज़ से बड़े हो गए थे. शादी के एक साल बाद प्यारी सी लड़की ने जनम लिया. लड़की का जनम हुआ तू माँ बाप, रिश्तेदार और गाँव वाले कहने लगे की 'लड़का होता तू अच्छा होता, खानदान को आगे बढ़ाता' उस गाँव में लड़कियों की कोई इज़्ज़त नहीं थी और लड़की को हमेशा से hi वंहा पर भोझ समझा जाता था.
जिस दिन उस लड़की का जनम हुआ उसके अगले दिन मेरे कानो ने सुना की गाँव वाले उस लड़की को जिन्दा hi दफ़न कर देंगे. लोगों की बातें सुन सुनकर मुझे बहुत बुरा लगने लगा पर उस गाँव के लोगों से लड़कर उसे बचाना मुश्किल लग रहा था और मेरा मन करता था की गाँव से भाग जॉन, लेकिन कान्हा जॉन.
उसदिन लोगों के बातों से इतना परेशां हो गया मैंने गांव छोड़ने का फैसला कर लिया और संध्या को अपने फैसले के बारे में अवगत करा दिया. वो मेरी बात ताल तू नहीं सकती थी लेकिन उसने पूछा "कान्हा जायेंगे और अपना गुज़ारा कैसे करेंगे"
मैंने कहा "तुम चिंता न करो कुछ भी कर लेंगे लेकिन इस वक़्त हमें इस नन्ही सी जान को बचाना जयादा जरुरी है, इसलिए आज hi रात को चुपके से निकलना पड़ेगा, तयारी कर लो"
फिर उसीदिन मौका देखकर रात में hi संध्या और नन्ही सी जान को लेकर निकल गए, रात भर पैदल चलते रहे और सुबह बस पकड़कर कोई पांच घंटे का सफर करके इस शहर में पंहुच गए. एक धर्मशाला में कमरा लिया और कुछ खा पीकर अपने पुराने दोस्त की बताई हुई जगह पर पंहुच गया तू वो मुझे एक दूकान पर ले गया और उससे मेरे लिए काम के बारे में बात की.
वो जगह एक दूकान थी जंहा पर सदियों और रेडीमेड कपड़ो का व्युओंपर होता था तू सेठ ने मुझे ऊपर से नीचे देखा और कहा "ठीक है लग जाओ, लेकिन ईमानदारी से काम करना" मैंने हामी भर दी
मैं तू सिर्फ आठंवी पास था वो भी गाँव के स्कूल से तू जयादा अंग्रेजी नहीं आती थी, लेकिन हिसाब किताब में होशियार था तू सेठजी ने मुझे माल को गिनती करने पर लगा दिया की कितना माल कान्हा से आया और कितना बिका.
थोड़े दिन काम करने पर पता चला की वंहा का एक आदमी हेराफेरी कर रहा था, वो बिल काम बनाकर कुछ माल काम पैसे में दूकान से बहार निकलवा देता था. मैंने यह बात चुपके से सेठ जी को बता दी और उन्होंने अपने तरीके से पता लगवाया की वो आदमी सेठजी को हर महीने काम से काम 1 से 2 लाख का नुक्सान पंहुचा रहा था. सेठजी को बहुत गुस्सा आया और उसको बोले की या तू वो जितने पैसों की हेराफेरी की hI वो ला के दे दे नहीं तू उसको जेल करवा देंगे. वो माफ़ी मांगते हुए कहने लगा की पैसे तू ख़तम हो गए हैं और आगे से ऐसा न करने के लिए कहने लगा. सेठजी ने उसके घर की तलाशी करवाई तू वंहा से 5 लाख के करीब कॅश निकला जो सेठजी ने लेकर उससे दूकान से निकाल दिया और मेरी तरक्की करके वंहा का मैनेजर बना दिया और मेरी तन्खा दुगनी कर दी.
मैंने सेठजी का धन्यवाद् किया और मन लगाकर काम करने लगा जिससे सेठजी का कारोबार फैलने फूलने लगा.
इधर कोई 2 साल बाद नन्ही सी जान बड़ी होने लगी और उसका नाम रुचिका रखा और संध्या ने एक लड़के को जनम दिया. लड़के के जनम पर एक बार तू सोचा की घरवालों को बता दू, लेकिन वंहा के हाल को जानते हुए अपनी गुड़िया (रुचिका) के लिए चुप रहना hi मुनासिब समझा.
संध्या के साथ मेरी सेक्स लाइफ भी अच्छी चल रही थी, हम रोज प्यार करते थे और अपनी दुनिया में खुश थे, लेकिन लड़के (आदित्य) के जनम के बाद पता नहीं क्या हुआ की संध्या सेक्स के वक़्त बहुत चिल्लाने लगाती जैसे की उसे बहुत दर्द हो रहा हो, मैं इससे नार्मल समझाता रहा लेकिन वो समस्या बढ़ने लगी टब धीरे धीरे हमारी सेक्स लाइफ सुनी होने लगी. मैंने उसे कई बार कहा भी की किसी डॉक्टर से सलाह ले लेते हैं, लेकिन वो शर्म से कंही भी जाने को तैयार नहीं होती थी. इधर बच्चे भी बड़े हो रहे थे तू उनको पास के एक स्कूल में एडमिशन दिलवा दिया.
ऐसे hi 5 साल और बीत गए, सेठजी ने अपना कारोबार बढ़ने की सोची और मुझे अपना विश्वासपात्र मानते हुए मुझे बार बार माल लेन और पेमेंट लेने देने के लिए बहार जाना पड़ता था और बार बार दूसरे शेरोन में जाना पड़ता था, लेकिन मेरा दिल नहीं करता था, क्योँकि मुझे हमेशा संध्या और बच्चों का ख्याल रहता था और मन करता था की संध्या से रोज सेक्स करू. लेकिन उसकी समस्या की वजह से मन मसोस लेता था, परन्तु उससे सामने देखकर उसे तंग तू कर hi सकता था. मैं कभी उसे पीछे से बांहों में भरकर उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को दबा देता तू वो "si.....i...i" करती तू मुझे बहुत अच्छा लगता था और फिर मैं अपने होठों को उसकी गर्दन पर रखकर जोर जोर से उसकी चूचियों को दबाते हुए चुम्बन करता जाता था. कभी कभी तू उसके पेट पर हाथ फिरते हुए उसकी सदी खोल देता था तू वो "है दिया" करती थी और पलट कर अपनी पीठ मेरी तरफ कर लेती थी तू मन खुश हो जाता था. मैं उसे पीछे से जाकर उसके कन्धों को पकड़ता तू उसकी साँसे तेज़ होने लगती और मैं उसको घुमाकर अपनी तरफ करता था, उसकी पलके शर्म से झूखी हुई होती तू मैं अपनी ऊँगली को उसकी ठोढ़ी के नीचे ले जाकर उसके चेहरे को उठता और उसे निहारने लगता और उसके उरोजोनो का ऊपरी हिस्सा जो दुद्ध की रंगत का था को देखकर मेरा लिंग फंतानने लगता था तू मैं उसकी आँखों पर अपने होंठों को रखकर धीरे धीरे उसके गलों को चूमते हुए नीचे की और बढ़ने लगता तू वो मेरे सीने में लग जाती और उसकी चूचियों का मेरी छथि से टकराना मेरे लिंग में रक्त परवाह को बढ़ा देता था और मैं उसकी पीठ सहलाते हुए उसके ब्लाउज को खोलने लगता तू वो मुझे अपनी आँखों से न करने का इसशरए से रोकती तू मेरा मन उसको दर्द न देने के लिए रुक जाता लेकिन एक मन करता था की आगे बदु. पता नहीं क्योँ मैं उससे इतना प्यार करता था की उससे दर्द नहीं दे सकता था और उसको चुम चाट के छोड़ देता था, लेकिन मेरी पयास बढ़ती जाती थी.
दूसरा कारन घर से दूर न जाने का था रुचिका से बहुत ज्यादा लगाव. पता नहीं क्योँ लेकिन रुचिका के जनम से लोग उससे जितनी नफरत करते थे मैं उससे कंही जयादा उससे प्यार करता था और उसको छोड़ कर जाने का मन नहीं करता था.
एकदिन की बात है की मैं संध्या के साथ छेड़खानी कर रहा था वो आयी और बोली "पापा पापा आप सिर्फ माँ को प्यार करते हो हमें नहीं" मैं बोलै "क्योँ, मैं तू तुमसे सबसे जयादा प्यार करता हु" तू वो बोली "आप तू माँ को गाल पर किश करते हो हमें नहीं" संध्या तू शर्मा गयी लेकिन मैंने उसे अपनी गोदी में बैठकर उसके गलो पर किश किया तू वो खुश हो गयी. मैं यह खवाबो में कर रहा था लेकिन असल में रुचिका के गलो पर किश करता जा रहा था जिससे उसने कुनमुना कर आँखे खोलकर मेरे को भी किश करते हुए बोली "बहुत प्यार आ रहा है"
आदित्य ने अपने हाथ से उसके हाथ को पकड़ कर अपने कंधे पर रख लिया और बिना कोई बात किये बाइक को आगे बढ़ा दिया और इस बार dhéere dhéere चलने लगा. दोनों के दिल में प्यार की पहली चिंगारी लग चुकी थी जो अब इतनी आसानी से भुजने वाली नहीं लग रही थी.
उधर घर पर संध्या और आदित्य के जाने के बाद
मोहनलाल: खुश
रुचिका: (मोहनलाल के गले लगते हुए) बहुत खुश
मोहनलाल: कान्हा चलना चोहोही
रुचिका: जंहा आप ले जाएँ, मुझे तू बस आपके पास रहना है.
मोहनलाल: मुंबई या पुणे
रुचिका: वैसे तू जंहा आपका मन हो, लेकिन मैं पुणे को प्रेफर करुँगी.
मोहनलाल: मैं समझ सकता हु, लेकिन अब तुम आराम करो और थोड़ी देर सो जाओ
रुचिका: (मोहनलाल से बिलकुल सट्टे हुए) अभी तू बड़ी मुश्किल से अकेले रहने का मौका मिला है और आप कह रहे हैं की मैं सो जॉन
मोहनलाल ने भी उसे अपनी बांहों में बड़े प्यार से कस लिया और कहा "अब तू मौके hi मौके हैं, लेकिन मुझे तुम्हारा ख्याल पहले है, इसलिए मेरी बात मनो और थोड़ा आराम कर लो"
रुचिका: मुझे तू आराम सिर्फ और सिर्फ आपकी बांहों में मिलता है और आप हैं की मुझे अपने से दूर करने का मौका ढूंढते हो
मोहनलाल ने एकदम से उसे अपनी बांहों में भरकर उठा लिया और रुचिका ने अपनी बांहों का घेरा मोहनलाल के गले में दाल कर उसके सीने में अपना सर रख दिया तू मोहनलाल ने रुचिका को कहा "दूर कर रहा हु इसलिए की हमेशा पास रह सको, वार्ना दिल तू मंटा hi नहीं की तुम से दूर हो"
इतना कहकर मोहनलाल ने उसे उठाकर उसके बैडरूम में ले गए और उसको बीएड पर लेता दिया और उसके साथ बैठकर अपने हाथ को उसके सर पर रखकर उसके सर को सहलाने लगे जिससे रुचिका को आनंद और सुकून की अनुभूति होने लगी और उसकी आँखे बंद होने लगी.
मोहनलाल धीरे धीरे अपने हाथ की उँगलियों को उसके बालो में फिरता रहा और रुचिका ने करवट बदलकर मोहनलाल के दूसरे हाथ को अपने दोनों हाथों में पकड़ कर अपने सीने के पास रख लिया, जिससे मोहनलाल को थोड़ा झुकना पड़ा और वो तिरछा होकर बीएड पर अधलेटा हो गया और रुचिका के मासूम चेरे को निहारते हुए उसके बालों में उँगलियों को फिरता रहा. उसका मक़सद था की किसी तरीके से रुचिका सो जाये.
मोहनलाल सोचने लगा की कैसे कब क्या बदला और उसकी जिंदगी में क्या क्या रंग आये और गए.
उसकी आँखों के सामने वो दृश्ये उभरने लगे. उससे आज भी धयान है की जब उसकी गाँव में शादी संध्या से हुई थी, तब वो और संध्या छोटे थे, लेकिन गाँव के लिहाज़ से बड़े हो गए थे. शादी के एक साल बाद प्यारी सी लड़की ने जनम लिया. लड़की का जनम हुआ तू माँ बाप, रिश्तेदार और गाँव वाले कहने लगे की 'लड़का होता तू अच्छा होता, खानदान को आगे बढ़ाता' उस गाँव में लड़कियों की कोई इज़्ज़त नहीं थी और लड़की को हमेशा से hi वंहा पर भोझ समझा जाता था.
जिस दिन उस लड़की का जनम हुआ उसके अगले दिन मेरे कानो ने सुना की गाँव वाले उस लड़की को जिन्दा hi दफ़न कर देंगे. लोगों की बातें सुन सुनकर मुझे बहुत बुरा लगने लगा पर उस गाँव के लोगों से लड़कर उसे बचाना मुश्किल लग रहा था और मेरा मन करता था की गाँव से भाग जॉन, लेकिन कान्हा जॉन.
उसदिन लोगों के बातों से इतना परेशां हो गया मैंने गांव छोड़ने का फैसला कर लिया और संध्या को अपने फैसले के बारे में अवगत करा दिया. वो मेरी बात ताल तू नहीं सकती थी लेकिन उसने पूछा "कान्हा जायेंगे और अपना गुज़ारा कैसे करेंगे"
मैंने कहा "तुम चिंता न करो कुछ भी कर लेंगे लेकिन इस वक़्त हमें इस नन्ही सी जान को बचाना जयादा जरुरी है, इसलिए आज hi रात को चुपके से निकलना पड़ेगा, तयारी कर लो"
फिर उसीदिन मौका देखकर रात में hi संध्या और नन्ही सी जान को लेकर निकल गए, रात भर पैदल चलते रहे और सुबह बस पकड़कर कोई पांच घंटे का सफर करके इस शहर में पंहुच गए. एक धर्मशाला में कमरा लिया और कुछ खा पीकर अपने पुराने दोस्त की बताई हुई जगह पर पंहुच गया तू वो मुझे एक दूकान पर ले गया और उससे मेरे लिए काम के बारे में बात की.
वो जगह एक दूकान थी जंहा पर सदियों और रेडीमेड कपड़ो का व्युओंपर होता था तू सेठ ने मुझे ऊपर से नीचे देखा और कहा "ठीक है लग जाओ, लेकिन ईमानदारी से काम करना" मैंने हामी भर दी
मैं तू सिर्फ आठंवी पास था वो भी गाँव के स्कूल से तू जयादा अंग्रेजी नहीं आती थी, लेकिन हिसाब किताब में होशियार था तू सेठजी ने मुझे माल को गिनती करने पर लगा दिया की कितना माल कान्हा से आया और कितना बिका.
थोड़े दिन काम करने पर पता चला की वंहा का एक आदमी हेराफेरी कर रहा था, वो बिल काम बनाकर कुछ माल काम पैसे में दूकान से बहार निकलवा देता था. मैंने यह बात चुपके से सेठ जी को बता दी और उन्होंने अपने तरीके से पता लगवाया की वो आदमी सेठजी को हर महीने काम से काम 1 से 2 लाख का नुक्सान पंहुचा रहा था. सेठजी को बहुत गुस्सा आया और उसको बोले की या तू वो जितने पैसों की हेराफेरी की hI वो ला के दे दे नहीं तू उसको जेल करवा देंगे. वो माफ़ी मांगते हुए कहने लगा की पैसे तू ख़तम हो गए हैं और आगे से ऐसा न करने के लिए कहने लगा. सेठजी ने उसके घर की तलाशी करवाई तू वंहा से 5 लाख के करीब कॅश निकला जो सेठजी ने लेकर उससे दूकान से निकाल दिया और मेरी तरक्की करके वंहा का मैनेजर बना दिया और मेरी तन्खा दुगनी कर दी.
मैंने सेठजी का धन्यवाद् किया और मन लगाकर काम करने लगा जिससे सेठजी का कारोबार फैलने फूलने लगा.
इधर कोई 2 साल बाद नन्ही सी जान बड़ी होने लगी और उसका नाम रुचिका रखा और संध्या ने एक लड़के को जनम दिया. लड़के के जनम पर एक बार तू सोचा की घरवालों को बता दू, लेकिन वंहा के हाल को जानते हुए अपनी गुड़िया (रुचिका) के लिए चुप रहना hi मुनासिब समझा.
संध्या के साथ मेरी सेक्स लाइफ भी अच्छी चल रही थी, हम रोज प्यार करते थे और अपनी दुनिया में खुश थे, लेकिन लड़के (आदित्य) के जनम के बाद पता नहीं क्या हुआ की संध्या सेक्स के वक़्त बहुत चिल्लाने लगाती जैसे की उसे बहुत दर्द हो रहा हो, मैं इससे नार्मल समझाता रहा लेकिन वो समस्या बढ़ने लगी टब धीरे धीरे हमारी सेक्स लाइफ सुनी होने लगी. मैंने उसे कई बार कहा भी की किसी डॉक्टर से सलाह ले लेते हैं, लेकिन वो शर्म से कंही भी जाने को तैयार नहीं होती थी. इधर बच्चे भी बड़े हो रहे थे तू उनको पास के एक स्कूल में एडमिशन दिलवा दिया.
ऐसे hi 5 साल और बीत गए, सेठजी ने अपना कारोबार बढ़ने की सोची और मुझे अपना विश्वासपात्र मानते हुए मुझे बार बार माल लेन और पेमेंट लेने देने के लिए बहार जाना पड़ता था और बार बार दूसरे शेरोन में जाना पड़ता था, लेकिन मेरा दिल नहीं करता था, क्योँकि मुझे हमेशा संध्या और बच्चों का ख्याल रहता था और मन करता था की संध्या से रोज सेक्स करू. लेकिन उसकी समस्या की वजह से मन मसोस लेता था, परन्तु उससे सामने देखकर उसे तंग तू कर hi सकता था. मैं कभी उसे पीछे से बांहों में भरकर उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को दबा देता तू वो "si.....i...i" करती तू मुझे बहुत अच्छा लगता था और फिर मैं अपने होठों को उसकी गर्दन पर रखकर जोर जोर से उसकी चूचियों को दबाते हुए चुम्बन करता जाता था. कभी कभी तू उसके पेट पर हाथ फिरते हुए उसकी सदी खोल देता था तू वो "है दिया" करती थी और पलट कर अपनी पीठ मेरी तरफ कर लेती थी तू मन खुश हो जाता था. मैं उसे पीछे से जाकर उसके कन्धों को पकड़ता तू उसकी साँसे तेज़ होने लगती और मैं उसको घुमाकर अपनी तरफ करता था, उसकी पलके शर्म से झूखी हुई होती तू मैं अपनी ऊँगली को उसकी ठोढ़ी के नीचे ले जाकर उसके चेहरे को उठता और उसे निहारने लगता और उसके उरोजोनो का ऊपरी हिस्सा जो दुद्ध की रंगत का था को देखकर मेरा लिंग फंतानने लगता था तू मैं उसकी आँखों पर अपने होंठों को रखकर धीरे धीरे उसके गलों को चूमते हुए नीचे की और बढ़ने लगता तू वो मेरे सीने में लग जाती और उसकी चूचियों का मेरी छथि से टकराना मेरे लिंग में रक्त परवाह को बढ़ा देता था और मैं उसकी पीठ सहलाते हुए उसके ब्लाउज को खोलने लगता तू वो मुझे अपनी आँखों से न करने का इसशरए से रोकती तू मेरा मन उसको दर्द न देने के लिए रुक जाता लेकिन एक मन करता था की आगे बदु. पता नहीं क्योँ मैं उससे इतना प्यार करता था की उससे दर्द नहीं दे सकता था और उसको चुम चाट के छोड़ देता था, लेकिन मेरी पयास बढ़ती जाती थी.
दूसरा कारन घर से दूर न जाने का था रुचिका से बहुत ज्यादा लगाव. पता नहीं क्योँ लेकिन रुचिका के जनम से लोग उससे जितनी नफरत करते थे मैं उससे कंही जयादा उससे प्यार करता था और उसको छोड़ कर जाने का मन नहीं करता था.
एकदिन की बात है की मैं संध्या के साथ छेड़खानी कर रहा था वो आयी और बोली "पापा पापा आप सिर्फ माँ को प्यार करते हो हमें नहीं" मैं बोलै "क्योँ, मैं तू तुमसे सबसे जयादा प्यार करता हु" तू वो बोली "आप तू माँ को गाल पर किश करते हो हमें नहीं" संध्या तू शर्मा गयी लेकिन मैंने उसे अपनी गोदी में बैठकर उसके गलो पर किश किया तू वो खुश हो गयी. मैं यह खवाबो में कर रहा था लेकिन असल में रुचिका के गलो पर किश करता जा रहा था जिससे उसने कुनमुना कर आँखे खोलकर मेरे को भी किश करते हुए बोली "बहुत प्यार आ रहा है"