इन्सेस्ट रिश्ता - Page 2 - SexBaba
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इन्सेस्ट रिश्ता

अपडेट 7



आदित्य ने अपने हाथ से उसके हाथ को पकड़ कर अपने कंधे पर रख लिया और बिना कोई बात किये बाइक को आगे बढ़ा दिया और इस बार dhéere dhéere चलने लगा. दोनों के दिल में प्यार की पहली चिंगारी लग चुकी थी जो अब इतनी आसानी से भुजने वाली नहीं लग रही थी.

उधर घर पर संध्या और आदित्य के जाने के बाद

मोहनलाल: खुश

रुचिका: (मोहनलाल के गले लगते हुए) बहुत खुश

मोहनलाल: कान्हा चलना चोहोही

रुचिका: जंहा आप ले जाएँ, मुझे तू बस आपके पास रहना है.

मोहनलाल: मुंबई या पुणे

रुचिका: वैसे तू जंहा आपका मन हो, लेकिन मैं पुणे को प्रेफर करुँगी.

मोहनलाल: मैं समझ सकता हु, लेकिन अब तुम आराम करो और थोड़ी देर सो जाओ

रुचिका: (मोहनलाल से बिलकुल सट्टे हुए) अभी तू बड़ी मुश्किल से अकेले रहने का मौका मिला है और आप कह रहे हैं की मैं सो जॉन

मोहनलाल ने भी उसे अपनी बांहों में बड़े प्यार से कस लिया और कहा "अब तू मौके hi मौके हैं, लेकिन मुझे तुम्हारा ख्याल पहले है, इसलिए मेरी बात मनो और थोड़ा आराम कर लो"

रुचिका: मुझे तू आराम सिर्फ और सिर्फ आपकी बांहों में मिलता है और आप हैं की मुझे अपने से दूर करने का मौका ढूंढते हो

मोहनलाल ने एकदम से उसे अपनी बांहों में भरकर उठा लिया और रुचिका ने अपनी बांहों का घेरा मोहनलाल के गले में दाल कर उसके सीने में अपना सर रख दिया तू मोहनलाल ने रुचिका को कहा "दूर कर रहा हु इसलिए की हमेशा पास रह सको, वार्ना दिल तू मंटा hi नहीं की तुम से दूर हो"

इतना कहकर मोहनलाल ने उसे उठाकर उसके बैडरूम में ले गए और उसको बीएड पर लेता दिया और उसके साथ बैठकर अपने हाथ को उसके सर पर रखकर उसके सर को सहलाने लगे जिससे रुचिका को आनंद और सुकून की अनुभूति होने लगी और उसकी आँखे बंद होने लगी.

मोहनलाल धीरे धीरे अपने हाथ की उँगलियों को उसके बालो में फिरता रहा और रुचिका ने करवट बदलकर मोहनलाल के दूसरे हाथ को अपने दोनों हाथों में पकड़ कर अपने सीने के पास रख लिया, जिससे मोहनलाल को थोड़ा झुकना पड़ा और वो तिरछा होकर बीएड पर अधलेटा हो गया और रुचिका के मासूम चेरे को निहारते हुए उसके बालों में उँगलियों को फिरता रहा. उसका मक़सद था की किसी तरीके से रुचिका सो जाये.

मोहनलाल सोचने लगा की कैसे कब क्या बदला और उसकी जिंदगी में क्या क्या रंग आये और गए.

उसकी आँखों के सामने वो दृश्ये उभरने लगे. उससे आज भी धयान है की जब उसकी गाँव में शादी संध्या से हुई थी, तब वो और संध्या छोटे थे, लेकिन गाँव के लिहाज़ से बड़े हो गए थे. शादी के एक साल बाद प्यारी सी लड़की ने जनम लिया. लड़की का जनम हुआ तू माँ बाप, रिश्तेदार और गाँव वाले कहने लगे की 'लड़का होता तू अच्छा होता, खानदान को आगे बढ़ाता' उस गाँव में लड़कियों की कोई इज़्ज़त नहीं थी और लड़की को हमेशा से hi वंहा पर भोझ समझा जाता था.

जिस दिन उस लड़की का जनम हुआ उसके अगले दिन मेरे कानो ने सुना की गाँव वाले उस लड़की को जिन्दा hi दफ़न कर देंगे. लोगों की बातें सुन सुनकर मुझे बहुत बुरा लगने लगा पर उस गाँव के लोगों से लड़कर उसे बचाना मुश्किल लग रहा था और मेरा मन करता था की गाँव से भाग जॉन, लेकिन कान्हा जॉन.

उसदिन लोगों के बातों से इतना परेशां हो गया मैंने गांव छोड़ने का फैसला कर लिया और संध्या को अपने फैसले के बारे में अवगत करा दिया. वो मेरी बात ताल तू नहीं सकती थी लेकिन उसने पूछा "कान्हा जायेंगे और अपना गुज़ारा कैसे करेंगे"

मैंने कहा "तुम चिंता न करो कुछ भी कर लेंगे लेकिन इस वक़्त हमें इस नन्ही सी जान को बचाना जयादा जरुरी है, इसलिए आज hi रात को चुपके से निकलना पड़ेगा, तयारी कर लो"

फिर उसीदिन मौका देखकर रात में hi संध्या और नन्ही सी जान को लेकर निकल गए, रात भर पैदल चलते रहे और सुबह बस पकड़कर कोई पांच घंटे का सफर करके इस शहर में पंहुच गए. एक धर्मशाला में कमरा लिया और कुछ खा पीकर अपने पुराने दोस्त की बताई हुई जगह पर पंहुच गया तू वो मुझे एक दूकान पर ले गया और उससे मेरे लिए काम के बारे में बात की.

वो जगह एक दूकान थी जंहा पर सदियों और रेडीमेड कपड़ो का व्युओंपर होता था तू सेठ ने मुझे ऊपर से नीचे देखा और कहा "ठीक है लग जाओ, लेकिन ईमानदारी से काम करना" मैंने हामी भर दी

मैं तू सिर्फ आठंवी पास था वो भी गाँव के स्कूल से तू जयादा अंग्रेजी नहीं आती थी, लेकिन हिसाब किताब में होशियार था तू सेठजी ने मुझे माल को गिनती करने पर लगा दिया की कितना माल कान्हा से आया और कितना बिका.

थोड़े दिन काम करने पर पता चला की वंहा का एक आदमी हेराफेरी कर रहा था, वो बिल काम बनाकर कुछ माल काम पैसे में दूकान से बहार निकलवा देता था. मैंने यह बात चुपके से सेठ जी को बता दी और उन्होंने अपने तरीके से पता लगवाया की वो आदमी सेठजी को हर महीने काम से काम 1 से 2 लाख का नुक्सान पंहुचा रहा था. सेठजी को बहुत गुस्सा आया और उसको बोले की या तू वो जितने पैसों की हेराफेरी की hI वो ला के दे दे नहीं तू उसको जेल करवा देंगे. वो माफ़ी मांगते हुए कहने लगा की पैसे तू ख़तम हो गए हैं और आगे से ऐसा न करने के लिए कहने लगा. सेठजी ने उसके घर की तलाशी करवाई तू वंहा से 5 लाख के करीब कॅश निकला जो सेठजी ने लेकर उससे दूकान से निकाल दिया और मेरी तरक्की करके वंहा का मैनेजर बना दिया और मेरी तन्खा दुगनी कर दी.

मैंने सेठजी का धन्यवाद् किया और मन लगाकर काम करने लगा जिससे सेठजी का कारोबार फैलने फूलने लगा.

इधर कोई 2 साल बाद नन्ही सी जान बड़ी होने लगी और उसका नाम रुचिका रखा और संध्या ने एक लड़के को जनम दिया. लड़के के जनम पर एक बार तू सोचा की घरवालों को बता दू, लेकिन वंहा के हाल को जानते हुए अपनी गुड़िया (रुचिका) के लिए चुप रहना hi मुनासिब समझा.

संध्या के साथ मेरी सेक्स लाइफ भी अच्छी चल रही थी, हम रोज प्यार करते थे और अपनी दुनिया में खुश थे, लेकिन लड़के (आदित्य) के जनम के बाद पता नहीं क्या हुआ की संध्या सेक्स के वक़्त बहुत चिल्लाने लगाती जैसे की उसे बहुत दर्द हो रहा हो, मैं इससे नार्मल समझाता रहा लेकिन वो समस्या बढ़ने लगी टब धीरे धीरे हमारी सेक्स लाइफ सुनी होने लगी. मैंने उसे कई बार कहा भी की किसी डॉक्टर से सलाह ले लेते हैं, लेकिन वो शर्म से कंही भी जाने को तैयार नहीं होती थी. इधर बच्चे भी बड़े हो रहे थे तू उनको पास के एक स्कूल में एडमिशन दिलवा दिया.

ऐसे hi 5 साल और बीत गए, सेठजी ने अपना कारोबार बढ़ने की सोची और मुझे अपना विश्वासपात्र मानते हुए मुझे बार बार माल लेन और पेमेंट लेने देने के लिए बहार जाना पड़ता था और बार बार दूसरे शेरोन में जाना पड़ता था, लेकिन मेरा दिल नहीं करता था, क्योँकि मुझे हमेशा संध्या और बच्चों का ख्याल रहता था और मन करता था की संध्या से रोज सेक्स करू. लेकिन उसकी समस्या की वजह से मन मसोस लेता था, परन्तु उससे सामने देखकर उसे तंग तू कर hi सकता था. मैं कभी उसे पीछे से बांहों में भरकर उसकी बड़ी बड़ी चूचियों को दबा देता तू वो "si.....i...i" करती तू मुझे बहुत अच्छा लगता था और फिर मैं अपने होठों को उसकी गर्दन पर रखकर जोर जोर से उसकी चूचियों को दबाते हुए चुम्बन करता जाता था. कभी कभी तू उसके पेट पर हाथ फिरते हुए उसकी सदी खोल देता था तू वो "है दिया" करती थी और पलट कर अपनी पीठ मेरी तरफ कर लेती थी तू मन खुश हो जाता था. मैं उसे पीछे से जाकर उसके कन्धों को पकड़ता तू उसकी साँसे तेज़ होने लगती और मैं उसको घुमाकर अपनी तरफ करता था, उसकी पलके शर्म से झूखी हुई होती तू मैं अपनी ऊँगली को उसकी ठोढ़ी के नीचे ले जाकर उसके चेहरे को उठता और उसे निहारने लगता और उसके उरोजोनो का ऊपरी हिस्सा जो दुद्ध की रंगत का था को देखकर मेरा लिंग फंतानने लगता था तू मैं उसकी आँखों पर अपने होंठों को रखकर धीरे धीरे उसके गलों को चूमते हुए नीचे की और बढ़ने लगता तू वो मेरे सीने में लग जाती और उसकी चूचियों का मेरी छथि से टकराना मेरे लिंग में रक्त परवाह को बढ़ा देता था और मैं उसकी पीठ सहलाते हुए उसके ब्लाउज को खोलने लगता तू वो मुझे अपनी आँखों से न करने का इसशरए से रोकती तू मेरा मन उसको दर्द न देने के लिए रुक जाता लेकिन एक मन करता था की आगे बदु. पता नहीं क्योँ मैं उससे इतना प्यार करता था की उससे दर्द नहीं दे सकता था और उसको चुम चाट के छोड़ देता था, लेकिन मेरी पयास बढ़ती जाती थी.

दूसरा कारन घर से दूर न जाने का था रुचिका से बहुत ज्यादा लगाव. पता नहीं क्योँ लेकिन रुचिका के जनम से लोग उससे जितनी नफरत करते थे मैं उससे कंही जयादा उससे प्यार करता था और उसको छोड़ कर जाने का मन नहीं करता था.

एकदिन की बात है की मैं संध्या के साथ छेड़खानी कर रहा था वो आयी और बोली "पापा पापा आप सिर्फ माँ को प्यार करते हो हमें नहीं" मैं बोलै "क्योँ, मैं तू तुमसे सबसे जयादा प्यार करता हु" तू वो बोली "आप तू माँ को गाल पर किश करते हो हमें नहीं" संध्या तू शर्मा गयी लेकिन मैंने उसे अपनी गोदी में बैठकर उसके गलो पर किश किया तू वो खुश हो गयी. मैं यह खवाबो में कर रहा था लेकिन असल में रुचिका के गलो पर किश करता जा रहा था जिससे उसने कुनमुना कर आँखे खोलकर मेरे को भी किश करते हुए बोली "बहुत प्यार आ रहा है"
 
बहुत बहुत धन्यवाद्.

आपके सुझाव मेरे लिए बहुत अहम् हैं.

आप चिंता न करो यह कहानी इन्सेस्ट होते हुए भी सेक्स वंही होगा जंहा पर कहानी की जरुरत होगी. इसलिए मुझे कई बार पाठको का गुस्सा झेलना पड़ता है. परन्तु आप जैसे भी बहुत सरे पाठक है जो मेरी कहानी को पसंद करते हैं.

आशा है की इस कहानी में भी खरी ुत्त्रु और वही प्यार आप लोगो से मिलेगा जैसा मुझे पहली स्टोरी 'माँ और बेटी से प्यार में मिला और मिल रहा है '

साथ बनाये रखिये.

शुक्रिया
 
अपडेट 8



एकदिन की बात है की मैं संध्या के साथ छेड़खानी कर रहा था वो आयी और बोली "पापा पापा आप सिर्फ माँ को प्यार करते हो हमें नहीं" मैं बोलै "क्योँ, मैं तू तुमसे सबसे जयादा प्यार करता हु" तू वो बोली "आप तू माँ को गाल पर किश करते हो हमें नहीं" संध्या तू शर्मा गयी लेकिन मैंने उसे अपनी गोदी में बैठकर उसके गलो पर किश किया तू वो खुश हो गयी. मैं यह खवाबो में कर रहा था लेकिन असल में रुचिका के गलो पर किश करता जा रहा था जिससे उसने कुनमुना कर आँखे खोलकर मेरे को भी किश करते हुए बोली "बहुत प्यार आ रहा है"

उसको जगा देखकर मैं बोलै "नींद नहीं आ रही" तू उसने कहा की उसे नींद तू आ गयी थी लेकिन मेरे किश करने से वो उठ गयी तब मैंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए "सॉरी की मैंने तुम्हे डिस्टर्ब कर दिया लेकिन क्या करू, तुम हो hi इतनी प्यारी की मैं अपने आपको रोक नहीं सका" तब उसने कहा की "उससे बहुत अच्छा लगा" मैंने उससे आँखे बंद करके सोने के लिए कहा तू उसने मेरी बात मान ली और मैं उसके सर पर हाथ फिरते हुए उसे सुलाने लगा, वो मुझे हद से जयादा मासूम लग रही थी. उसको सोता हुआ देखकर मैं फिर से अपनी यादों में खो गया.

मेरा काम की वजह से दूसरे शहरों में आना जाना बढ़ गया था. इसमें कोई दो राइ नहीं थी के टूर की वजह से सेठजी को कारोबार में काफी फायदा होने लगा और मैं उनका एक ख़ास विश्वासपात्र बन चूका था. मुझे भी टूर की वजह से कुछ पैसे जयादा बच जाते थे क्योँकि जो सेठजी मुझे खर्चे के लिए देते थे मैं कंजूसी करके उसमे से कुछ बचा लेता था और उनसे मैं संध्या और बच्चों के लिए गिफ्ट्स ले आता था.

सेठजी भी हर बार मुझे टूर से वापिस आने के पद कुछ न कुछ दे देते थे जो मेरे लिए एक्स्ट्रा इनकम होती थी. ये सब तू अच्छा था लेकिन मैं अपनी शारीरिक जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा था और जब वापिस आता था तू संध्या को देखकर वो प्यास और बढ़ जाती थी और संध्या को जब मैं छेड़खानी करता तू वो मुझसे बचती नज़र आती क्योँकि उससे सेक्स से होने वाले दर्द से दर लगने लगता था.

मैं उससे प्यार से समझाता की "कुछ नहीं होगा और मैं प्यार से करूँगा" लेकिन वो मन कर देती. मैं उससे डॉक्टर के पास जाकर इलाज़ के लिए कहता तू वो नहीं मानती थी, कहती थी की उसको शर्म आती है. मैं उससे समझाता की कुछ नहीं होगा तू वो मुझे कहती की कोई बड़ी बीमारी निकल आयी तू पैसे कान्हा से आएंगे तू मैं कहता की तुम उसकी चिंता न करो. वो कहती थिन्की उससे दर लगता है और कुछ हो गया तू बच्चों की देखभाल कैसे होगी, एक तू आप बहार चले जाते हो और मैं भी बिस्तर पकड़ लू तू क्या होगा. मैं कहता की तुम्हारा मन नहीं करता तू वो कहती की करता क्यों नहीं है, लेकिन मैं कोई भी दवाई वग़ैरा लेकर जबरदस्ती बीमार नहीं होना चाहते. उसकी बात सुनकर मेरे पास कोई भी उपाए नहीं बचता था की बस मैं भी उसकी तरह अपने पर नियंत्रण राखु.

मैंने सोचा की इससे अगली बार टूर पर ले जाऊंगा तू हो सकता है की ये जगह बदलने और दूसरे लोगों को देखकर शायद कुछ हिम्मत करे. लेकिन इसका एस्सार बिलकुल hi उल्टा हुआ क्योँकि उससे लोगों से मिलने से डिप्रेशन होने लगा और उसने जाना hi छोड़ दिया. अब मैं उससे सिर्फ थोड़ी बहुत छेड़छाड़ करके hi रह जाता था, लेकिन उसके साथ कभी जबरदस्ती नहीं की, उससे समझाता था की उससे कोई तकलीफ नहीं होगी, लेकिन उसके प्रति मुझे कोई सफलता नहीं मिली.

इधर मेरे टूर भी बढ़ने लगे और साथ साथ इनकम भी. मेरे दूसरे लोगों से लिंक भी बढ़ रहे थे जो होते तू बुसिनेस्स के थे लेकिन कुछ एक पारिवारिक भी थे और वो कहते भी थे की कभी भाभी जी को लेकर आओ और मैं कोई न कोई बहाना करके ताल देता था. मेरा तू अब घर भी जाने का मन नहीं करता था क्योँकि संध्या मेरे साथ सेक्स करने से घबराती थी, फिर भी मुझे घर से लगाव इसलिए था क्योंकि बच्चों से बहुत प्यार करता था खासकर अपनी गुड़िया (रुचिका) जिससे कुछ ख़ास hi लगाव था, उसकी मुस्कराहट मेरी साडी चिंताओं को दूर कर देती थी. मैं यह भी चाहता था की मेरा अपना घर हो जाये ताकि किराये के घर से छुटकारा मिले और बच्चों को अच्छी जिंदगी दे पौन, इसलिए मैं पैसे भी इक्क्ठे कर रहा था.

दिन बीतते गए और एक दिन सेठजी ने मुझे बुलाया और कहा "बीटा देखो तुम मेरे बेटे जैसे हो और मैं पुणे में स्टोर डालने के लिए सोच रहा हु और मैं चाहता हु की तुम वंहा जा कर उससे खोलो और सम्भालो".

मैं अपने बच्चों को छोड़ कर जाना नहीं चाहता था इसलिए मन करने वाला था लेकिन नहीं कर पाया क्योँकि सेठजी की ऑफर इतनी अच्छी थी की कोई भी मन नहीं कर पता. सेठजी ने कहा, "देखो मैं तुम्हे अपने बेटे की तरह मंटा हु, इसलिए उस स्टोर में तुम्हारी 25% की भागीदारी होगी "

मैं बोलै "मेरे पास तू कोई पूंजी नहीं है, दूसरा मेरे बच्चे यंहा पढ़ रहे हैं और फिर अगर नुक्सान हो गया तू मैं बिलकुल भी सेह नहीं पाउँगा और सड़क पर आ जाऊंगा"

सेठजी: तुम्हे कोई पूंजी नहीं लगनी और न hi घाटे में तुम्हे कुछ देना होगा. लोगो की नज़रों में तुम मेरे एक मुलाज़िम होंगे परन्तु मेरी नज़र में मालिक. दूसरा तुम्हारे परिवार की जिम्मेदारी मेरी, हर महीने उनको 10000 ₹ अलग से मिलते रहेंगे. तुम्हारा जब मन करे उनसे मिलाने आ जाया करना और एक बार वंहा सेट हो जाओ तू बेशक फॅमिली को शिफ्ट कर लेना"

इसके बाद उन्होंने दो चाभियाँ पकड़ते हुए बोले की इनमे एक घर की चाभी है जो आज से तुम्हारा और दूसरी चाभी बाइक की वो भी तुम्हारे लिए है.

मैंने कहा "सेठजी मुझे तू बाइक चलनी नहीं आती"

सेठजी ने कहा की "तुमने पुणे जाकर सिर्फ बाइक hi नहीं बल्कि कार चलना भी सीखना है और वंहा पर इवनिंग क्लासेज ज्वाइन करके दसवीं और आगे की पढाई भी पूरी करनी है"

मैं सेठजी के चरणों में झुककर उनसे कहने लगा " आपका यह एहसान मैं कैसे चुकाऊंगा, आप तू मेरे लिए भगवन बनकर आये हैं"

उन्होंने मुझे उठाते हुए कहा "बीटा कोई एहसान नहीं है बल्कि तुम्हारे आने के बाद से मुझे ऐसा लग रहा है की मेरा बीटा वापिस आ गया है और मेरा कारोबार भी इतना फ़ैल गया है की उसको सम्बलने के लिए मैं अब बूढ़ा हो चूका हु, मैं चाहता हु की तुम मेरे बेटे की तरह उससे सम्भालो, अब और कुछ नहीं, बस जाने की तयारी करो"

मैं वंहा से निकलकर घर आया और साडी बात बताई तू पहले तू संध्या बहुत खुश हुई, लेकिन अकेले रहने से थोड़ा उदास भी हो गयी तू मैंने कहा की "नहीं जाते"

संध्या: नहीं नहीं ऐसा अवसर बार बार नहीं मिलता और फिर घर भी तू मिल रहा है जिससे हम अपना कह सकेंगे.

मोहनलाल: लेकिन तुम अकेली रह लोगी और बच्चों की देखभाल कर लोगी

संध्या: आपके प्यार के सहारे कर hi लुंगी

मोहनलाल: प्यार तू करने नहीं देती

संध्या: (शरमाते हुए) आज आपको नहीं रोकूंगी.

उसकी बात सुनकर तू मैं जोश में आ गया और जल्दी से उसको गले लगा लिया और उसकी सदी उत्तर कर फेंक दी, वो मुझे कहती रही की बाद में करेंगे. उसकी बात सुनकर मैं बहुत उतावला हो गया और सोचा की कंही ये बदल न जाये, इसलिए मैं उसकी बात को अनसुना करते हुए उसका ब्लाउज और पेटीकोट भी उत्तर दिया अब वो सिर्फ ब्रा और पैंटी में थी तू जाकर अपने आप को चादर में लापरत लिया. मैंने जल्दी से अपने कपडे उत्तर कर उसके पास गया और चादर को उत्तर फेंका और बड़े प्यार से उससे चूमते हुए उसकी चूचियों को ब्रा के ऊपर से hi दबाता रहा और दूसरे हाथ को उसकी पैंटी पर लेजाकर उसे टांगों में से निकल दिया. अब संध्या के शरीर पर सिर्फ एक ब्रा थी तू मैंने उसके पेट पर अपने होंठों को रखकर उसे चूमते हुए अपने आगोश में ले लिया और उसकी चूचियों को दबाने लगा और फिर हाथ को उसकी पीठ पर लेजाकर उसकी ब्रा भी खोल दी जो उसके कंधे पर झूल गई तू मैंने उसे थोड़ा अपने से अलग करके वो भी दूर फेंक दी.

अब इसके बाद जो होने वाला था उससे सोच कर hi संध्या की आँखों में दर साफ़ साफ़ नज़र आने लगा तू मैं उसे तस्सली देते हुए कहा की dhéere करूँगा लेकिन भय उसके चेहरे पर साफ़ दिख रहा था.

मैं थोड़ी देर उसको चूमता छत्ते हुए नीचे गया और अपने सुपडे को उसके योनि दवार पर जैसे hi रखा तू उसने आँखों से मन करना चाहा लेकिन अब मैं इतना उत्तेजित हो गया था की मैं पीछे हटना नहीं चाहता था तू उसकी योनि में सुपडे को पेवस्त कर दिया तू उसके मुंह से इतनी जोर से चीख निकली की एक बार तू मैं दर गया, लेकिन फिर धीरे धीरे वो शांत हो गयी.

अब मैं दुविधा में था की आगे बदु या अपने लिंग को बहार निकल लू, क्योँकि मैं संध्या को दर्द में नहीं देख सकता था पर मेरी उत्तेजना अपनी चरम को पा चुकी थी, ऊपर से आज कोई 3 साल बाद सहवास कर रहा था तू मैंने सोचा की जो होगा देखा जायेगा. पता नहीं ऐसा मौका फिर मिलेगा भी की नहीं, इसलिए इस मौके का फायदा उठाना चाहिए और अगर संध्या को दर्द बढ़ गया और उससे उसे रहत न मिली तू डॉक्टर के पास ले जाऊंगा. ये अब सोचते हुए मैंने आव देखा न ताव एक जोरदार धक्का लगाया जिससे मेरा आधा लिंग उसकी योनि के अंदर चला गया परन्तु संध्या की आँखों में आंसू निकल आये जिससे देखकर मेरा मन एक बार फिर पसीज गया और अपने ऊपर नियंत्रण रखते हुए अपने लिंग को बहार निकलने लगा तू संध्या ने आँखों के इशारे से मन कर दिया और मेरी कमर को पकड़ कर अपने ऊपर दबाने लगी, मैंने उसके होठों को अपने होठों में कैद करके चुमत्ता और छत्ता रहा जिससे उससे थोड़ा आराम मिले. सच बताऊँ तू उसके इस तरह करने से मुझे उसपर बहुत जयादा प्यार आने लगा और अब मैं आगे नहीं बढ़ना चाहता था.

मैंने आँखों के इशारे से संध्या को इस बारे में अवगत कराया तू उसने आँखों के इशारे से hi मुझे आगे बढ़ने के लिए कहा, तब मैंने धीरे धीरे लिंग को बहार निकलकर फिरसे जोर लगते हुए लिंग को अंदर डालना शुरू किया तू संध्या बहुत बुरी तरह से तड़प गयी.

मुझे समझ नहीं आ रहा था की दो बच्चों की माँ बनने के बाद इसको क्या हो गया है जबकि एक वक़्त सहवास में पूरा सहयोग देती थी और बहुत एन्जॉय करती थी. खैर मैंने आधे लिंग को hi अंदर बहार करके अपने चरम को पा लिया तू मुझे सहवास में चाहे मज़ा नहीं आया, परन्तु संध्या से कुछ जयादा hi प्यार हो गया था और इस सहवास में संध्या की तू बात hi छोड़ दो वो तू दर्द से बेहाल हो गयी थी.

थोड़ी देर बाद मैं उसके लिए गरम पानी और रुई लेकर उसकी योनि की सिकाई की तू उसे थोड़ा आराम मिला. फिर मैंने उसे एक पेनकिलर भी खिलाई तू उसे कुछ और आराम मिला. वो अपने आप को दोषी मानत्ते हुए कहने लगी "मैं आपको पूरा सुख नहीं दे पति ना" मैंने कहा "ऐसा मत सोचो मैं तू यह सोच रहा हु की तुम्हे जो भी समस्या है वो डॉक्टर को दिखती क्यों नहीं हो? ये भी तो हो सकता है की प्रॉब्लम कुछ भी न हो और ठीक हो जाये, फिर जिंदगी पहले की तरह हो जाएगी"

मेरी बात सुनकर संध्या बोली "प्रॉब्लम अगर बड़ी हुई तू फिर आपका और बच्चों का ख्याल कौन करेगा" मैंने कहा "इसलिए तू कह रहा हु की तुम्हे डॉक्टर को दिखने में भलाई है ताकि समस्या का समाधान ढूंढा जा सके" लेकिन मेरे बहुत बार कहने के बावजूद वो नहीं गयी और मैं भी पुणे आ गया.
 
अनुज जी

यह कहानी बिलकुल ओरिजिनल है और कंही से भी कॉपी पेस्ट नहीं हैं.

आप से निवेदन हैं की पाठकों को कृपया न भटकायें और अगर आप कहते हैं कंही से कॉपी पेस्ट है तू मैं उससे पढूंगी और आप से और बाकि सभी पाठको से निवेदन है की यह कहानी अभी के अभी बंद कर दूंगी और आज के बाद कभी कोई कहानी नहीं लिखूंगी.

यह कहानी सिर्फ और सिर्फ मेरी है जो की बिलकुल ओरिजिनल है.

अगर आप प्रोवे न कर सके तू आप से इतनी hi कामना है की आप ऐसे कमैंट्स के लिए माफ़ी मांगे.

धन्यवाद्

डिअर फ्रेंड्स,

Don't गेट कन्फ्यूज्ड बी सुच कमैंट्स, it's ओनली तो हररस एंड हुमिलियते में विथ चार्जेज व्हिच स्टैंड नोवेयर.

ी वोउल्ड रिक्वेस्ट आल ऑफ़ यू तो फंड सुच स्टोरी एनीवेयर एंड लेट में क्नोव. इतस ा प्रॉमिस तहत ी वोउल्ड स्टॉप राइटिंग नाउ ोंवर्ड्स एंड वोउल्ड नेवर व्रिठे एंड िफ़ it's नॉट तेरे थें आल्सो लेट में क्नोव.

प्लीज don't मालिगन थे इमेज ऑफ़ ओरिजिनल वरिटेरस.

थैंक्स सो मच
 
सबसे पहले तो आपका इस थ्रेड पर स्वागत है.

आपने बिलकुल सही कहा है की ऐसे रीडर्स की बात को दिल पर नहीं लगाना चाहिए.

मैं किसी भी क्रिटिसिज्म को दिल पर नहीं लगाती लेकिन ऐसे इलज़ाम की कहानी की चोरी हुई है तू आप सोचिये की जो राइटर एक एक अपडेट में 4 से 5 घंटे लगता हो और पुरे दिल से अपनी कल्पनाओ को अपनी कलम से शब्दों को माला पिरोता हो ताकि उसके रीडर्स को कुछ ऐसा फाड़ने को मिले ताकि वो एन्जॉय कर सके और सबसे बड़ी बात यंहा पर जितने भी वरिटेरस है उन्हें कोई मेहनताना नहीं मिलता वो तू बस अपने शौक से लिखते है.

ऐसा भद्दा इलज़ाम की कहानी कंही से ली गयी है तू मैं उस कहानी को पढ़ना चाहूंगी और अगर वो शामे या सिमिलर भी होगी तू आप सब से निवेदन है की आप उस कहानी को पढ़ लेना जैसे की मैं भी पढूंगी आउट फिर कभी कहानी नहीं लिखूंगी.

अगर ऐसा नहीं है तू मैं आप सब के लिए इस कहानी को हर हाल में पूरा करुँगी.

धन्यवाद्
 
कामदेव जी,

आपका बहुत सम्मान करते हुए कंहूगी की आप जो कह रहे हैं वो काफी हद तक सही हैं, लेकिन आप स्वयं एक लेखक है और लेखक बिना संवेदनाओं के नहीं लिख सकता.

वर्ल्ड चाहे रियल हो या वर्चुअल संवेदना एक अभिन्न अंग होता है किसी भी इंसान का.

कहानी पर फोकस तू था लेकिन उस फोकस का क्या फायदा जब जिस चीज़ के लिए फोकस कर रहे हो और कोई आप से कहे की जो आप पाना चाहते है वो तू आलरेडी कोई पा चूका है.

मेरी तू सिर्फ एक hi गुज़ारिश है की मुझे कृपया करके अनुज जी या और भी कोई उस स्टोरी का लिंक बता दे तू मैं भी उससे पढ़कर अपने मन को संतुष्ट कर लू.

अगर ऐसा नहीं हैं तब आपसे वादा है की इस कहानी को जरूर पूरा करुँगी.

धन्यवाद्
 
थैंक्स फॉर थे सपोर्ट.

आईटी इस नॉट थे क्वेश्चन ऑफ़ बीइंग अपोजिट तो में, अस ी वोउल्ड वेलकम थे सीरियस एंड सिंकेरे क्रिटिसिज्म बिकॉज़ आईटी हेल्प्स इन इम्प्रोविंग थे स्टोरी.

वेल it's नॉट थे क्वेश्चन ऑफ़ क्रिटिसिज्म, बूत ऑफ़ ाक्सुसाशंस.

ी हद ओनली रेक्वेस्टेड हिम तो लेट में क्नोव थे लिंक ऑफ़ थे स्टोरी सो तहत ी कुड आल्सो एन्जॉय एंड व्हाई शुड ी पूत एफ्फोर्ट्स तो व्रिठे थे शामे स्टोरी.

ी वोउल्ड तेल्ल माय रीडर्स तो फॉलो थे शामे एंड एन्जॉय.

बूत ओने थिंग ी प्रॉमिस िफ़ आईटी isn't तेरे ी वोउल्ड सर्टेनली एंड डेफिनिटेली कम्पलीट थिस स्टोरी.

थैंक्स
 
हयान जी,

मैं भी यही कह रही हु की अगर ऐसी कोई स्टोरी है तू क्यों टाइम वास्ते किया जाये. मैं और आप मिलकर उससे पढ़ेंगे.

ये आपका बढ़प्पन है की आप ऐसा सोचते वार्ना हम तू किसी काबिल hi नहीं हैं.

समझा था खुद को क्या और क्या बन गया

यह आपसे तह दिल से वादा है की अगर जिस काल्पनिक स्टोरी की बात हो रही है उसका लिंक न मिला तू हर हाल में इस कहानी को पूरा करुँगी, लेकिन मुझे भी थोड़ा वक़्त दे दो, मैं भी तू देखु की किसी के इलज़ाम में कितना डैम है.

आपके साथ के लिए बहुत बहुत धन्यवाद्
 
राहुल जी,

आप सही कह रहे हैं की मुझे किसी एक की वजह से बाकियों को नहीं छोड़ना चाहिए.

मैं भी नहीं छोड़ना शांति, बस इतना hi कह रही हु की अगर ऐसी कोई कहानी है तू आप सब रीडर्स को वो कहानी रेडीमेड मिल जाएगी और इंतज़ार भी नहीं करना पड़ेगा और मैं भी पढ़ कर आनंदित हो लुंगी.

अगर ऐसा नहीं है तू आप को बिलकुल भी निराश नहीं करुँगी और कहानी को पूरा करुँगी.

धन्यवाद्
 
सबसे पहले तू इस थ्रेड पर आपका स्वागत है.

आप बिलकुल चिंता न करिये, मैं पाठको के सुझाव और उनके आपकेशो को ध्यान में रखकर कहानी तू मैं अपने हिसाब से hi लिखती हु, लेकिन मैं सिर्फ यह देखना चाहती हु की कौनसी स्टोरी है जिसको मैं रेप्रोडूके कर रही हु.

एक दिन तू इंतज़ार करने दो, देखे की कोई लिंक आता है की नहीं

अगर नहीं आया तू कहानी फिर से शुरू होगी और सिर्फ शुरू नहीं बल्कि पूरी भी होगी

सिर्फ एक दिन और

धन्यवाद
 
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